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1…जय सियाराम

स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रबि-तरुन-तेज-घन ।
उर बिसाल भुज-दंड चंड नख-बज्र बज्र-तन ।।
पिंग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन ।
कपिस केस, करकस लँगूर, खल-दल बल भानन ।।
कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति बिकट ।
संताप पाप तेहि पुरुष पहिं सपनेहुँ नहिं आवत निकट ।

भावार्थ – वे सुवर्ण-पर्वत (सुमेरु) – के समान शरीरवाले, करोड़ों मध्याह्न के सूर्य के सदृश अनन्त तेजोराशि, विशाल-हृदय, अत्यन्त बलवान् भुजाओं वाले तथा वज्र के तुल्य नख और शरीरवाले हैं, भौंह, जीभ, दाँत और मुख विकराल हैं, बाल भूरे रंग के तथा पूँछ कठोर और दुष्टों के दल के बल का नाश करने वाली है। तुलसीदासजी कहते हैं – श्रीपवनकुमार की डरावनी मूर्ति जिसके हृदय में निवास करती है, उस पुरुष के समीप दुःख और पाप स्वप्न में भी नहीं आते ।।

2…!! श्री महर्षि मार्कण्डेय प्रणीत सरस्वती साधना !!
विधा बुद्धि प्राप्त करने एवं शिक्षा क्षेत्र में प्रगति हेतु कामना अहर्निश हम भगवती सरस्वती से करते है ! आज शिक्षा एवं प्रतियोगिता क्षेत्र में प्रत्येक छात्र मर-मिटने को तैयार मालूम होता है ! ऐसी स्थिति में दैवीय सहायता लेनी आवश्यक हो जाती है ! इस हेतु विधार्थी जगत के लिए एक सरस्वती साधना प्रयोग एवं अनुष्ठान यहां दिया जा रहा है !
मंत्र -
!! ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं ॐ वाग्देव्यै नमः !!
विनियोगः -
ॐ अस्य श्री वागवादिनी-शारदा मंत्रस्य मार्कण्डेयाश्वलायनौ ऋषि स्रग्धरा-अनुष्ट्भौ छंदसौ, श्री सरस्वती देवता, श्री सरस्वतीप्रसाद-सिद्धयर्थे जपे विनियोग: !
ध्यानम् -
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमाम् आद्यां जगद्व्यापिनीम् !
वीणा पुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् !
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम् !
वन्दे ताम् परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदाम् शारदाम् !!
विधि -
१- इस मंत्र को गुरु मुख से प्राप्त करे अथवा गुरु के हाथ से प्राप्त करें !
२- किसी शुभ मुहूर्त में, सोमवार को अनुष्ठान प्रारम्भ करें ! गुरु पूजन कर, गणेश जी का पूजन तथा सरस्वती पूजन करे और भोग के लिए मिश्री और छोटी इलयाची किसी पात्र में सामने रखें !
३- शुद्ध घी का दीपक लगाएं !
४- इस साधना को सफ़ेद वस्त्रधारण कर पूर्व दिशा की और मुख कर करना है !
५- यह साधना 40 दिन की है !
६- मंत्र जप सफ़ेद हकीक या स्फटिक की माला से करे ! ग्यारह माला प्रतिदिन जपनी है
७- साधना के अंतिम दिन किसी पात्र में अग्नि जला कर खीर और घी से 1008 आहुति दे ! इस प्रकार साधना सिद्ध हो जाती है और व्यक्ति को चमत्कारी लाभ मिलता है !!! श्री महर्षि मार्कण्डेय प्रणीत सरस्वती साधना !!

3…….श्री यंत्र—–

यह सर्वाधिक लोकप्रिय प्राचीन यन्त्र है,इसकी अधिष्टात्री देवी स्वयं श्रीविद्या अर्थात त्रिपुर सुन्दरी हैं,और उनके ही रूप में इस यन्त्र की मान्यता है। यह बेहद शक्तिशाली ललितादेवी का पूजा चक्र है,इसको त्रैलोक्य मोहन अर्थात तीनों लोकों का मोहन यन्त्र भी कहते है। यह सर्व रक्षाकर सर्वव्याधिनिवारक सर्वकष्टनाशक होने के कारण यह सर्वसिद्धिप्रद सर्वार्थ साधक सर्वसौभाग्यदायक माना जाता है। इसे गंगाजल और दूध से स्वच्छ करने के बाद पूजा स्थान या व्यापारिक स्थान तथा अन्य शुद्ध स्थान पर रखा जाता है। इसकी पूजा पूरब की तरफ़ मुंह करके की जाती है,श्रीयंत्र का सीधा मतलब है,लक्ष्मी यंत्र जो धनागम के लिये जरूरी है। इसके मध्य भाग में बिन्दु व छोटे बडे मुख्य नौ त्रिकोण से बने ४३ त्रिकोण दो कमल दल भूपुर एक चतुरस ४३ कोणों से निर्मित उन्नत श्रंग के सद्रश्य मेरु प्रुष्ठीय श्रीयंत्र अलौकिक शक्ति व चमत्कारों से परिपूर्ण गुप्त शक्तियों का प्रजनन केन्द्र बिद्नु कहा गया है। जिस प्रकार से सब कवचों से चन्डी कवच सर्वश्रेष्ठ कहा गया है,उसी प्रकार से सभी देवी देवताओं के यंत्रों में श्रीदेवी का यंत्र सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसी कारण से इसे यंत्रराज की उपाधि दी गयी है। इसे यन्त्रशिरोमणि भी कहा जाता है। दीपावली धनतेरस बसन्त पंचमी अथवा पौष मास की संक्रान्ति के दिन यदि रविवार हो तो इस यंत्र का निर्माण व पूजन विशेष फ़लदायी माना गया है,ऐसा मेरा विश्वास है।

श्री महालक्ष्मी यंत्र——
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श्री महालक्षमी यंत्र की अधिष्ठात्री देवी कमला हैं,अर्थात इस यंत्र का पूजन करते समय श्वेत हाथियों के द्वारा स्वर्ण कलश से स्नान करती हुयी कमलासन पर बैठी लक्ष्मी का ध्यान करना चाहिये,विद्वानों के अनुसार इस यंत्र के नित्य दर्शन व पूजन से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इस यंत्र की पूजा वेदोक्त न होकर पुराणोक्त है इसमे बिन्दु षटकोण वृत अष्टदल एवं भूपुर की संरचना की गयी है,धनतेरस दीवावली बसन्त पंचमी रविपुष्य एवं इसी प्रकार के शुभ योगों में इसकी उपासना का महत्व है,स्वर्ण रजत ताम्र से निर्मित इस यन्त्र की उपासना से घर व स्थान विशेष में लक्ष्मी का स्थाई निवास माना जाता है।इस यंत्र की संरचना विचित्र है, यंत्रों में जो भी अंक लिखे होते हैं या जो भी आकृतियां निर्मित होती हैं वह देवी देवताओं की प्रतीक होती हैं. यंत्र-शक्ति द्वारा वातावरण में सकारात्मक उर्जा क अप्रवाह होत है. श्री यंत्र को पास रखने से शुभ कार्य सम्पन्न होते रहते हैं. श्रीयंत्र को सर्व सिद्धिदाता, धनदाता या श्रीदाता कहा गया है. इसे सिद्ध या अभिमंत्रित करने के लिए लक्ष्मी जी का मंत्र अति प्रभावशाली माना जाता है मंत्र जप के लिए कमलगट्टे की माला का प्रयोग करना चाहिए.पौराणिक कथा के अनुसार एक बार लक्ष्मी जी पृथ्वी से बैकुंठ धाम चली जाती हैं, इससे पृथ्वी पर संकट आ जाता है तब प्राणियों के कल्याण हेतु वशिष्ठ जी लक्ष्मी को वापस लाने का प्रयास करते हैं. पृथ्वी पर ‘‘श्रीयंत्र’’ की साधना करते हैं श्रीयंत्र को स्थापित कर, प्राण-प्रतिष्ठा एवं पूजा करते हैं उनकी इस पूजा एवं श्री यंत्र स्थापना द्वारा लक्ष्मी जी वहां उपस्थित हो जाती हैं. इस यंत्र का प्रयोग दरिद्रता का नाश करता है. इसकी कृपा से व्यक्ति एकाएक धनवान हो जाता है.

बगलामुखी यंत्र—–

बगला दस महाविद्याओं में एक है इसकी उपासना से शत्रु का नाश होता है,शत्रु की जिव्हा वाणी व वचनों का स्तम्भन करने हेतु इससे बढकर कोई यंत्र नही है। इस यंत्र के मध्य बिंदु पर बगलामुखी देवी का आव्हान व ध्यान करना पडता है,इसे पीताम्बरी विद्या भी कहते हैं,क्योंकि इसकी उपासना में पीले वस्त्र पीले पुष्प पीली हल्दी की माला एवं केशर की खीर का भोग लगता है। इस यंत्र में बिन्दु त्रिकोण षटकोण वृत्त अष्टदल वृत्त षोडशदल एवं भूपुर की रचना की गयी है,नुकसान पहुंचाने वाले दुष्ट शत्रु की जिव्हा हाथ से खींचती हुयी बगलादेवी का ध्यान करते हुये शत्रु के सर्वनाश की कल्पना की जाती है। इस यंत्र के विशेष प्रयोग से प्रेतबाधा व यक्षिणीबाधा का भी नाश होता है।बगलामुखी यंत्र की उपासना से शत्रु का नाश होता है, स्तम्भन करने हेतु इससे बढकर कोई यंत्र नही है. प्रेत बाधा निवारक यंत्र इस यंत्र के विशेष प्रयोग से प्रेतबाधा व यक्षिणीबाधा का भी नाश होता है. महामृत्युंजय इस यंत्र के उपयोग से अकाल मृत्यु से मुक्ति प्राप्त होती है. यह शिव भगवान का प्रिय यंत्र है. भगवान शंकर की स्तुति व उक्त यंत्र की स्थापना भक्त को समस्त बाधाओं से मुक्त कर देती है. रोगों की निवृत्ति के लिये एवं दीर्घायु की कामना के लिये इस यंत्र का उपयोग बहुत लाभदायक होता है.

श्रीमहाकाली यन्त्र—–

शमशान साधना में काली उपासना का बडा भारी महत्व है,इसी सन्दर्भ में महाकाली यन्त्र का प्रयोग शत्रु नाश मोहन मारण उच्चाटन आदि कार्यों में किया जाता है। मध्य बिन्दु में पांच उल्टे त्रिकोण तीन वृत अष्टदल वृत एव भूपुर से आवृत महाकाली का यंत्र तैयार होता है। इस यंत्र का पूजन करते समय शव पर आरूढ मुण्डमाला धारण की हुयी कडग त्रिशूल खप्पर व एक हाथ में नर मुण्ड धारण की हुयी रक्त जिव्हा लपलपाती हुयी भयंकर स्वरूप वाली महाकाली का ध्यान किया जाता है। जब अन्य विद्यायें असफ़ल होजातीं है,तब इस यंत्र का सहारा लिया जाता है। महाकाली की उपासना अमोघ मानी गयी है। इस यंत्र के नित्य पूजन से अरिष्ट बाधाओं का स्वत: ही नाश हो जाता है,और शत्रुओं का पराभव होता है,शक्ति के उपासकों के लिये यह यंत्र विशेष फ़लदायी है। चैत्र आषाढ अश्विन एवं माघ की अष्टमी इस यंत्र के स्थापन और महाकाली की साधना के लिये अतिउपयुक्त है।

महामृत्युंजय यंत्र—-

इस यंत्र के माध्यम से मृत्यु को जीतने वाले भगवान शंकर की स्तुति की गयी है,भगवान शिव की साधना अमोघ व शीघ्र फ़लदायी मानी गयी है। आरक दशाओं के लगने के पूर्व इसके प्रयोग से व्यक्ति भावी दुर्घटनाओं से बच जाता है,शूल की पीडा सुई की पीडा में बदल कर निकल जाती है। प्राणघातक दुर्घटना व सीरियस एक्सीडेंट में भी जातक सुरक्षित व बेदाग होकर बच जाता है। प्राणघातक मार्केश टल जाते हैं,ज्योतिषी लोग अरिष्ट ग्रह निवारणार्थ आयु बढाने हेतु अपघात और अकाल मृत्यु से बचने के लिये महामृत्युयंत्र का प्रयोग करना बताते हैं। शिवार्चन स्तुति के अनुसार पंचकोण षटकोण अष्टदल व भूपुर से युक्त मूल मन्त्र के बीच सुशोभित महामृत्युंजय यंत्र होता है। आसन्न रोगों की निवृत्ति के लिये एवं दीर्घायु की कामना के लिये यह यंत्र प्रयोग में लाया जाता है। इस यंत्र का पूजन करने के बाद इसका चरणामृत पीने से व्यक्ति निरोग रहता है,इसका अभिषिक्त किया हुआ जल घर में छिडकने से परिवार में सभी स्वस्थ रहते हैं,घर पर रोग व ऊपरी हवाओं का आक्रमण नहीं होता है।

कनकधारा यंत्र—-

लक्ष्मी प्राप्ति के लिये यह अत्यन्त दुर्लभ और रामबाण प्रयोग है,इस यंत्र के पूजन से दरिद्रता का नाश होता है,पूर्व में आद्य शंकराचार्य ने इसी यंत्र के प्रभाव से स्वर्ण के आंवलों की वर्षा करवायी थी। यह यंत्र रंक को राजा बनाने की सामर्थय रखता है। यह यंत्र अष्ट सिद्धि व नव निधियों को देने वाला है,इसमें बिन्दु त्रिकोण एवं दो वृहद कोण वृत्त अष्टदल वृत्त षोडस दल एव तीन भूपुर होते हैं,इस यंत्र के साथ कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना अनिवार्य होता है।

श्रीदुर्गा यंत्र—-

यह श्री दुर्गेमाता अम्बेमाता का यंत्र है,इसके मूल में नवार्ण मंत्र की प्रधानता है,श्री अम्बे जी का ध्यान करते हुये नवार्ण मंत्र माला जपते रहने से इच्छित फ़ल की प्राप्ति होती है। विशेषकर संकट के समय इस यंत्र की प्रतिष्ठा करके पूजन किया जाता है। नवरात्र में स्थापना के दिन अथवा अष्टमी के दिन इस यंत्र निर्माण करना व पूजन करना विशेष फ़लदायी माना जाता है,इस यन्त्र पर दुर्गा सप्तशती के अध्याय चार के श्लोक १७ का जाप करने पर दुख व दरिद्रता का नाश होता है। व्यक्ति को ऋण से दूर करने बीमारी से मुक्ति में यह यंत्र विशेष फ़लदायी है।

सिद्धि श्री बीसा यंत्र—-

कहावत प्रसिद्ध है कि जिसके पास हो बीसा उसका क्या करे जगदीशा,अर्थात साधकों ने इस यंत्र के माध्यम से दुनिया की हर मुश्किल आसान होती है,और लोग मुशीबत में भी मुशीबत से ही रास्ता निकाल लेते हैं। इसलिये ही इसे लोग बीसा यंत्र की उपाधि देते हैं। नवार्ण मंत्र से सम्पुटित करते हुये इसमे देवी जगदम्बा का ध्यान किया जाता है। यंत्र में चतुष्कोण में आठ कोष्ठक एक लम्बे त्रिकोण की सहायता से बनाये जाते हैं,त्रिकोण को मन्दिर के शिखर का आकार दिया जाता है,अंक विद्या के चमत्कार के कारण इस यंत्र के प्रत्येक चार कोष्ठक की गणना से बीस की संख्या की सिद्धि होती है। इस यंत्र को पास रखने से ज्योतिषी आदि लोगों को वचन सिद्धि की भी प्राप्ति होती है। भूत प्रेत और ऊपरी हवाओं को वश में करने की ताकत मिलती है,जिन घरों में भूत वास हो जाता है उन घरों में इसकी स्थापना करने से उनसे मुक्ति मिलती है।

श्री कुबेर यंत्र—-

यह धन अधिपति धनेश कुबेर का यंत्र है,इस यंत्र के प्रभाव से यक्षराज कुबेर प्रसन्न होकर अतुल सम्पत्ति की रक्षा करते हैं। यह यंत्र स्वर्ण और रजत पत्रों से भी निर्मित होता है,जहां लक्ष्मी प्राप्ति की अन्य साधनायें असफ़ल हो जाती हैं,वहां इस यंत्र की उपासना से शीघ्र लाभ होता है। कुबेर यंत्र विजय दसमीं धनतेरस दीपावली तथा रविपुष्य नक्षत्र और गुरुवार या रविवार को बनाया जाता है। कुबेर यंत्र की स्थापना गल्ले तिजोरियों सेफ़ व बन्द अलमारियों में की जाती है। लक्ष्मी प्राप्ति की साधनाओं में कुबेर यंत्र अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

श्री गणेश यंत्र—–

गणेश यंत्र सर्व सिद्धि दायक व नाना प्रकार की उपलब्धियों व सिद्धियों के देने वाला है,इसमें देवताओं के प्रधान गणाध्यक्ष गणपति का ध्यान किया जाता है। एक हाथ में पास एक अंकुश एक में मोदक एवं वरद मुद्रा में सुशोभित एक दन्त त्रिनेत्र कनक सिंहासन पर विराजमान गणपति की स्तुति की जाती है। इस यंत्र के प्रभाव से और भक्त की आराधना से व्यक्ति विशेष पर रिद्धि सिद्धि की वर्षा करते हैं,साधक को इष्ट कृपा की अनुभूति होने लगती है। उसके कार्यों के अन्दर आने वाली बाधायें स्वत: ही समाप्त हो जातीं हैं,व्यक्ति को अतुल धन यश कीर्ति की प्राप्ति होती है,रवि पुष्य गुरु पुष्य अथवा गणेश चतुर्थी को इस यंत्र का निर्माण किया जाता है,इन्ही समयों में इस यंत्र की पूजा अर्चना करने पर सभी कामनायें सिद्धि होती हैं।

गायत्री यंत्र—–

गायत्री की महिमा शब्दातीत है,इस यंत्र को बनाते समय कमल दल पर विराजमान पद्मासन में स्थिति पंचमुखी व अष्टभुजा युक्त गायत्री का ध्यान किया जाता है,बिन्दु त्रिकोण षटकोण व अष्टदल व भूपुर से युक्त इस यंत्र को गायत्री मंत्र से प्रतिष्ठित किया जाता है। इस यंत्र की उपासना से व्यक्ति लौकिक उपलब्धियों को लांघ कर आध्यात्मिक उन्नति को स्पर्श करने लग जाता है। व्यक्ति का तेज मेधा व धारणा शक्ति बढ जाती है। इस यंत्र के प्रभाव से पूर्व में किये गये पाप कर्मों से मुक्ति मिल जाती है। गायत्री माता की प्रसन्नता से व्यक्ति में श्राप व आशीर्वाद देने की शक्ति आ जाती है। व्यक्ति की वाणी और चेहरे पर तेज बढने लगता है। गायत्री का ध्यान करने के लिये सुबह को माता गायत्री श्वेत कमल पर वीणा लेकर विराजमान होती है,दोपहर को गरूण पर सवार लाल वस्त्रों में होतीं है,और शाम को सफ़ेद बैल पर सवार वृद्धा के रूप में पीले वस्त्रों में ध्यान में आतीं हैं।

दाम्पत्य सुख कारक मंगल यंत्र—-

विवाह योग्य पुत्र या पुत्री के विवाह में बाधा आना,विवाह के लिये पुत्र या पुत्री का सीमाओं को लांघ कर सामाजिक मर्यादा को तोडना विवाह के बाद पति पत्नी में तकरार होना,विवाहित दम्पत्ति के लिये किसी न किसी कारण से सन्तान सुख का नहीं होना,गर्भपात होकर सन्तान का नष्ट हो जाना, मनुष्य का ध्यान कर्ज की तरफ़ जाना और लिये हुये कर्जे को चुकाने के लिये दर दर की ठोकरें खाना,किसी को दिये गये कर्जे का वसूल नहीं होना,आदि कारणों के लिये ज्योतिष शास्त्र में मंगल व्रत का विधान है,मंगल के व्रत में मंगल यंत्र का पूजन आवश्यक है। यह यंत्र जमीन जायदाद के विवाद में जाने और घर के अन्दर हमेशा क्लेश रहने पर भी प्रयोग किया जाता है,इसके अलावा इसे वाहन में प्रतिष्ठित कर लगाने से दुर्घटना की संभावना न के बराबर हो जाती है।

श्री पंचदसी यंत्र—-

पंचदसी यंत्र को पन्द्रहिया यन्त्र भी कहा जाता है,इसके अन्दर एक से लेकर नौ तक की संख्याओं को इस प्रकार से लिखा जाता है दायें बायें ऊपर नीचे किधर भी जोडा जाये तो कुल योग पन्द्रह ही होता है,इस यन्त्र का निर्माण राशि के अनुसार होता है,एक ही यन्त्र को सभी राशियों वाले लोग प्रयोग नहीं कर सकते है,पूर्ण रूप से ग्रहों की प्रकृति के अनुसार इस यंत्र में पांचों तत्वों का समावेश किया जाता है,जैसे जल तत्व वाली राशियां कर्क वृश्चिक और मीन होती है,इन राशियों के लिये चन्द्रमा का सानिध्य प्रारम्भ में और मंगल तथा गुरु का सानिध्य मध्य में तथा गुरु का सानिध्य अन्त में किया जाता है। संख्यात्मक प्रभाव का असर साक्षात देखने के लिये नौ में चार को जोडा जाता है,फ़िर दो को जोड कर योग पन्द्रह का लिया जाता है,इसके अन्दर मंगल को दोनों रूपों में प्रयोग में लाया जाता है,नेक मंगल या सकारात्मक मंगल नौ के रूप में होता है और नकारात्मक मंगल चार के रूप में होता है,तथा चन्द्रमा का रूप दो से प्रयोग में लिया जाता है। यह यंत्र भगवान शंकर का रूप है,ग्यारह रुद्र और चार पुरुषार्थ मिलकर ही पन्द्रह का रूप धारण करते है। इस यंत्र को सोमवार या पूर्णिमा के दिन बनाया जाता है,और उसे रुद्र गायत्री से एक बैठक में पन्द्रह हजार मंत्रों से प्रतिष्टित किया जाता है।

सम्पुटित गायत्री यंत्र—–

वेदमाता गायत्री विघ्न हरण गणपति महाराज समृद्धिदाता श्री दत्तात्रेय के सम्पुटित मंत्रों द्वारा इस गायत्री यंत्र का निर्माण किया जाता है। यह यंत्र व्यापारियों गृहस्थ लोगों के लिये ही बनाया जाता है इसका मुख्य उद्देश्य धन,धन से प्रयोग में लाये जाने वाले साधन और धन को प्रयोग में ली जाने वाली विद्या का विकास इसी यंत्र के द्वारा होता है,जिस प्रकार से एक गाडी साधन रूप में है,गाडी को चलाने की कला विद्या के रूप में है,और गाडी को चलाने के लिये प्रयोग में ली जाने वाली पेट्रोल आदि धन के रूप में है,अगर तीनों में से एक की कमी हो जाती है तो गाडी रुक जाती है,उसी प्रकार से व्यापारियों के लिये दुकान साधन के रूप में है,दुकान में भरा हुआ सामान धन के रूप में है,और उस सामान को बेचने की कला विद्या के रूप में है,गृहस्थ के लिये भी परिवार का सदस्य साधन के रूप में है,सदस्य की शिक्षा विद्या के रूप में है,और सदस्य द्वारा अपने को और अपनी विद्या को प्रयोग में लाने के बाद पैदा किया जाने फ़ल धन के रूप में मिलता है,इस यंत्र की स्थापना करने के बाद उपरोक्त तीनों कारकों का ज्ञान आसानी से साधक को हो जाता है,और वह किसी भी कारक के कम होने से पहले ही उसे पूरा कर लेता है।

श्री नित्य दर्शन बीसा यंत्र—-

इस यंत्र का निर्माण अपने पास हमेशा रखने के लिये किया जाता है,इसके अन्दर पंचागुली महाविद्या का रोपण किया जाता है,अष्टलक्ष्मी से युक्त इस यंत्र का निर्माण करने के बाद इसे चांदी के ताबीज में रखा जाता है,जब कोई परेशानी आती है तो इसे माथे से लगाकर कार्य का आरम्भ किया जाता है,कार्य के अन्दर आने वाली बाधा का निराकरण बाधा आने के पहले ही दिमाग में आने लगता है,इसे शराबी कबाबी लोग अपने प्रयोग में नही ला सकते हैं।

श्री बीसा यंत्र—–

विधान एवं प्रभाव :—

-इस यंत्र को शुभ महूर्त में ताम्र पत्र पर खुदवा लें फिर सूर्य उदय के समय इस यंत्र का केसर और चन्दन से पूजन करें ।

मंत्र :- ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं लक्ष्मी दैव्य: नमः

इस मंत्र की 21 माला करें साथ में श्री शुक्त का भी पाठ करें । इस यंत्र के प्रभाव से कभी कोई अभाव नहीं रहता । माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती ।

4……अमोघ शिव गोरख प्रयोग

भगवान शिव का वर्णन करना भी क्या संभव है. एक तरफ वह भोलेपन की सर्व उच्चावस्था मे रह कर भोलेनाथ के रूप मे पूजित है वही दूसरी और महाकाल के रूम मे साक्षात प्रलय रुपी भी. निर्लिप्त स्मशानवासी हो कर भी वह देवताओं मे उच्च है तथा महादेव रूप मे पूजित है. तो इस निर्लिप्तता मे भी सर्व कल्याण की भावना समाहित हो कर समस्त जिव को बचाने के लिए विषपान करने वाले नीलकंठ भी यही है. मोह से दूर वह निरंतर समाधि रत रहने वाले महेश भी उनका रूप है तथा सती के अग्निकुंड मे दाह के बाद ब्रम्हांड को कंपाने वाले, तांडव के माध्यम से तीनों लोक को एक ही बार मे भयभीत करने वाले नटराज भी यही है. संहार क्रम के देवता होने पर भी अपने मृत्युंजय रूप मे भक्तो को हमेशा अभय प्रदान करते है. अत्यंत ही विचित्र तथा निराला रूप, जो हमें उनकी तरफ श्रध्धा प्रदर्शित करने के लिए प्रेम से मजबूर ही कर दे. सदाशिव तो हमेशा से साधको के मध्य प्रिय रहे है, अत्यधिक करुणामय होने के कारण साधको की अभिलाषा वह शीघ्रातिशिघ्र पूर्ण करते है.
शैव साधना और नाथयोगियो का सबंध तो अपने आप मे विख्यात है. भगवान के अघोरेश्वर स्वरुप तथा आदिनाथ भोलेनाथ का स्वरुप अपने आप मे इन योगियो के मध्य विख्यात रहा है. शिव तो अपने आप मे तन्त्र के आदिपुरुष रहे है. इस प्रकार उच्च कोटि के नाथयोगियो की शिव साधना अपने आप मे अत्यधिक महत्वपूर्ण रही है. शिवरात्री तो इन साधको के लिए कोई महाउत्सव से कम नहीं है. एक धारणा यह है की शिव रात्री के दिन साधक अगर शिव पूजन और मंत्र जाप करे तो भगवान शिव साधक के पास जाते ही है. वैसे भी यह महारात्रि तंत्र की द्रष्टि से भी अत्यधिक महत्वपूर्ण समय है. अगर इस समय पर शिव साधना की जाए तो चेतना की व्यापकता होने के कारण साधक को सफलता प्राप्ति की संभावना तीव्र होती है.
नाथयोगियो के गुप्त प्रयोग अपने आप मे बेजोड होते है. चाहे वह शिव साधना से सबंधित हो या शक्ति साधना के सबंध मे. इन साधनाओ का विशेष महत्व इस लिए भी है की सिद्ध मंत्र होने के कारण इन पर देवी देवताओं की विभ्भिन शक्तिया वचन बद्ध हो कर आशीर्वाद देती ही है साथ ही साथ साधक को नाथसिद्धो का आशीष भी प्राप्त होता है. इस प्रकार ऐसे प्रयोग अपने आप मे बहोत ही प्रभावकारी है. शिवरात्री पर किये जाने वाले गुप्त प्रयोगों मे से एक प्रयोग है अमोध शिव गोरख प्रयोग. यह गुप्त प्रयोग श्री गोरखनाथ प्रणित है.
साधक को पुरे दिन निराहार रहना चाहिए, दूध तथा फल लिए जा सकते है. रात्री काल मे १० बजे के बाद साधक सर्व प्रथम गुरु पूजन गणेश पूजन सम्प्पन करे तथा अपने पास ही सद्गुरु का आसान बिछाए और कल्पना करे की वह उस आसान पर विराज मान है. उसके बाद अपने सामने पारद शिवलिंग स्थापित करे अगर पारद शिवलिंग संभव नहीं है तो किसी भी प्रकार का शिवलिंग स्थापीत कर उसका पंचोपचार पूजन करे. धतूरे के पुष्प अर्पित करे. इसमें साधक का मुख उत्तर दिशा की तरफ होना चाहिए. वस्त्र आसान सफ़ेद रहे या फिर काले रंग के. उसके बाद रुद्राक्ष माला से निम्न मंत्र का ३ घंटे के लिए जाप करे. साधक थक जाए तो बिच मे कुछ देर के लिए विराम ले सकता है लेकिन आसान से उठे नहीं. यह मंत्र जाप ३:३० बजने से पहले हो जाना चाहिए.
ॐ शिव गोरख महादेव कैलाश से आओ भूत को लाओ पलित को लाओ प्रेत को लाओ राक्षस को लाओ, आओ आओ धूणी जमाओ शिव गोरख शम्भू सिद्ध गुरु का आसन आण गोरख सिद्ध की आदेश आदेश आदेश
मंत्र जाप समाप्त होते होते साधक को इस प्रयोग की तीव्रता का अनुभव होगा. यह प्रयोग अत्यधिक गुप्त और महत्वपूर्ण है क्यों की यह सिर्फ महाशिवरात्री पर किया जाने वाला प्रयोग है. और इस प्रयोग के माध्यम से मंत्र जाप पूरा होते होते साधक उसी रात्री मे भगवान शिव के बिम्बात्मक दर्शन कर लेता है. एक ही रात्रि मे साधक भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है और अपने जीवन को धन्य बना सकता है. अगर इस प्रयोग मे साधक की कही चूक भी हो जाए तो भी उसे भगवान शिव के साहचर्य की अनुभूति निश्चित रूप से होती ही है…….

5…सर्व अला-बला नाशक हनुमान चुटकी मंत्र-
हनुमान जी का सर्व सूरक्षा प्रदान करने वाला चूटकी मंत्र,इस मंत्र की सहायता से आप भूत,प्रेत,मसानी,चुङेल आदी से तुरंत मंत्र बोलकर 3 चूटकी बजाने से सभी अला बलाओ से सूरक्षा मिलती है साधना विधि —
इसे आप दीपावली के दिन अथवा किसी भी सामान्य रात्रि में कभी भी सिद्ध कर सकते है | किन्तु 12 से 1 बजे तक का समय न चुने, और कोई भी टाइम चलेगा | आसन कोई भी ले सकते हैं। वैसे कुशा का आसन सर्वोत्तम है |
इस साधना को करने के लिए पास किसी भी हनुमान जी के मंदिर में जाये | एक सरसों के तेल का दिया जला दे जो जब तक आपका मंत्र जप पूरा न हो दिया जलता रहना चाहिए | इस लिए एक बड़ा दिया ले लें | सवा मीटर लाल कपड़ा जो आपको हनुमान जी को लगोट के रूप में अर्पण करना है और सवा किलो लड्डू किसी भी तरह के ले ले | एक बात हमेशा याद रखे हनुमान जी को भोग अर्पण करते समय हमेशा एक तुलसी दल भोग के उपर रख देना चाहिए तभी उनकी क्षुधा शांत होती है |माला मूँगे की अथवा रुद्राक्ष की ले | आपको एक माला मंत्र जाप करना है | प्रसाद व लाल वस्त्र वही हनुमान जी के चरणों में छोड़ दे और अपनी व परिवार की रक्षा के लिए प्रार्थना करे और घर आ जाए |

साबर चुटकी मंत्र-
ॐ नमो गुरु जी चुटकी दाये चुटकी बाये,
चुटकी रक्षा करे हर थाएं |
बजर का कोठा अजर कबाड़ ,
चुटकी बांधे दसो दुयार ||
जो कोई घाले मुझ पे घाल उलटत देव वही पर जाए |
हनुमान जी चुटकी बजाए ,
राम चंदर पछताये, सीता माता भोग बनाया हनुमान मुसकाये |
माता अंजनी की आन ,
चुटकी रक्षा करो तमाम |
जय हनुमान, जय हनुमान, जय हनुमान ||

प्रयोग विधि –
सिद्ध करने के बाद जब भी जरूरत हो एक वार मंत्र पढ़ के तीन वार चुटकी वज़ा दे | एक वार दाये एक वार बाये एक वार सिर के उपर उसी वक़्त रक्षा होगी |

6…आसन शाबर मन्त्र

॥ मंत्र ॥

ॐ आसन ईश्वर आसन इंद्र।

आसन बैठे गुरु गोविन्द।

अजर आसन वज्र कपाट।

अजर जुड़ा पिंड सोहं द्वार।

जो धाले अज़र पर घाव।

उल्ट वीर वाह्य को खाव।

आसन बैठे गुरु रामानंद।

दो कर जोड़ आसन कि रक्षा करें।

काया आस

न बैठे लक्ष्मण यति।

सोहं गोविन्द पढ़ी आसन पर।

ॐ रैं सोहं मन की भम्रणा दुरि खोयें।

रात्रि राखे चन्द्रमा।

दिन को राखे भानु।

धरती माता सद राखै।

काली कंटक दुरी भागे।

करेगा सो भरेगा।

भक्त जन कि रक्षा वीर हनुमान करेगा।

विधि: पहले इस मन्त्र को चँद्रमा ग्रहण पर २१ माला जप कर सिद्ध कर लो। फिर कोई बी कार्य करने से पहले इस मन्त्र को जप कर आसन के चारों ओर फूंक मार कर बैठ जाओ। फिर अपनी साधना करो या कार्य करो। जरूर सफलता मिलेगी।

7……माला मंत्र :-

ॐ नमो भगवती, ॐ नमो वीरप्रतापविजय भगवती, बगलामुखी!

मम सर्वनिन्दकानाम् सर्वदुष्टानाम वाचम् मुखम् पदम् स्तम्भय,

जिव्हाम मुद्रय मुद्रय, बुद्धिम् विनाशय विनाशाय, अपरबुद्धिम कुरु,

कुरु, अत्मविरोधिनाम् शत्रुणाम् शिरो, ललाटम् मुखम्, नेत्र, कर्ण,

नासिकोरू, पद, अणु-अणु, दन्तोष्ठ, जिव्हा, तालु, गुह्य, गुदा, कटि,

जानु, सर्वांगेषु केशादिपादान्तम् पादादिकेश्पर्यन्तम् , स्तम्भय स्तम्भय,

खें खीं मारय मारय, परमंत्र, परयंत्र, परतन्त्राणि, छेदय छेदय, आत्ममन्त्रतंत्राणि

रक्ष रक्ष, ग्रहम निवारय निवारय , व्याधिम् विनाशय विनाशय, दुखम् हर हर,

दारिद्रयम् निवारय निवारय, सर्वमंत्रस्वरूपिणि, दुष्टग्रह, भूतग्रह, पाषाणग्रह,

सर्वचाण्डालग्रह, यक्षकिन्नरकिम्पुरुषग्रह, भूतप्रेत पिशाचानाम्, शाकिनी

डाकिनीग्रहाणाम, पूर्वदिशम् बंधय बंधय, वार्ताली! माम् रक्ष रक्ष, दक्षिणदिशम् बंधय

बंधय किरातवार्ताली! माम् रक्ष रक्ष, पश्चिमदिशम् बंधय बंधय, स्वप्नवार्ताली! माम्

रक्ष रक्ष, उत्तरदिशम् बंधय बांधय भद्रकालि! माम् रक्ष रक्ष, ऊर्ध्व दिशम् बंधय

बंधय उग्रकाली! माम् रक्ष रक्ष, पाताल दिशम् बंधय बंधय बगला परमेश्वरी! माम्

रक्ष रक्ष, सकल रोगान् विनाशय विनाशय, शत्रु पलायनम् पंचयोजनम्ध्ये

राजजनस्वपचम् कुरु कुरु, शत्रून दह दह, पच पच, स्तम्भयस्तम्भय, मोहय मोहय,

आकर्षय आकर्षय, मम शत्रून् उच्चाटय उच्चाटय हुम् फट् स्वाहा |

8…वज्रमुखी प्रयोग

मित्रो कइ बार आप स्वयं को तथा परिवार को लेकर असुरक्षित सा अनुभव करते है।इसके कइ कारण हो सकते है। जैसे, रोग, शत्रू,धन हानी,जनहानी,व्यर्थ के विवाद आदि।
इन्हि सारे भय मुक्ति तथा सुरक्षा का उपाय है,वज्रमुखी साधना, साधना मार्ग मे देवी का एक स्वरूप है,वज्रमुखी स्वरूप,और इन्हि का एक और रूप है जिन्हे वज्रेश्वरी के रूप मे पुजा जाता है।देवी वज्रेश्वरी स्वरूप की साधना पुर्व मे दि जा चुकी है।इस नवरात्र मे आप यह एक दिवसिय वज्रमुखी प्रयोग कर स्वयं तथा स्वयं के परिवार की सुरक्षा कि व्यवस्था करे।

यह प्रयोग नवरात्री कि किसी भी रात्री ११ से १ के मध्य संपन्न करे। आसन वस्त्र तथा दिशा का कोइ बंधन नही है। सामने एक तेल का बडा़ दिपक जला ले,तथा उस दिपक मे ४ छोटी सुपारी डाल दे। अब निम्न मंत्र का रूद्राक्ष माला से २१ माला जाप करे।

ओम ह्रीं ह्रीं हूं हूं वज्र मुखी वज्र देहा वज्र रूपिणी ह्रीं हूं फट्

साधना के पश्चात सुपारी निकाल ले, यह क्रिया अगले दिन करना है।सुपारी को लाल वस्त्र मे बाँधकर घर मे अथवा कही भी कच्ची मिट्टी मे या घर मे ही गमले मे गाड़ दे।यह साधना परिवार तथा साधक को सुरक्षा प्रदान करती है।

9…शारीरिक पीड़ा नाशक हनुमान शाबर मन्त्र

…. ये दर्द निवारक मंत्र है….
सर दर्द, बदन दर्द, हाथ पांव, कमर , पेट या किसी भी प्रकार के दर्द में बहुत जल्दी आराम देता है।
एक कप या कटोरी में जल लेकर जल को २१ बार जप करते हुए… हर मंत्र पर फूँक मारते हुए अभिमंत्रित करके रोगी को देना है….इस मंत्र में ये खास बात भी है.. कि.. अगर दवाई भी ना लग रही हो….. तो दवाई लगनी शुरू हो जाती…..

ठीक होने के बाद..बाबा हनुमान जी के चरणो में बस ५ लड्डू ही श्रद्धा से अर्पित करना है….

ॐ नमो भगवते चिंतामणी हनुमान,
अंग शूल अति शूल कटी शूल ,
कुक्षि शूल गुद शूल मस्तक शूल सर्व शूल ,
निर्मूलय निर्मूलय कुरु कुरु स्वाहा।।

इस मन्त्र से बच्चों और बड़ों की नजर भी झाड़ सकते हैं। हनुमान जी चरणों का सिंदूर लेकर नजर पीड़ित को तिलक लगा दें और उपरोक्त प्रकार से अभिमन्त्रित जल पीने को दे दें। नजर उतर जायेगी।

10……इसका नित्य प्रातः और रात्री में सोते समय पांच पांच बार पाठ करने मात्र से ही समस्त शत्रुओं का नाशहोता है और शत्रुअपनी शत्रुता छोड़ कर मित्रता का व्यवहार करने लगतेहै.शुभमस्तु!!!!
“ॐ नमो भगवते महा – प्रतापाय
महा-विभूति – पतये , वज्र -देह
वज्र – काम वज्र – तुण्ड वज्र -नख
वज्र – मुख वज्र – बाहु वज्र – नेत्र वज्र -
दन्त वज्र – कर- कमठ भूमात्म -कराय ,
श्रीमकर – पिंगलाक्ष उग्र – प्रलय
कालाग्नि-रौद्र -वीर-
भद्रावतार पूर्ण – ब्रह्म परमात्मने ,
ऋषि – मुनि -वन्द्य -शिवास्त्र-
ब्रह्मास्त्र -वैष्णवास्त्र-
नारायणास्त्र -काल -शक्ति-
दण्ड – कालपाश- अघोरास्त्र-
निवारणाय , पाशुपातास्त्र -
मृडास्त्र- सर्वशक्ति-प रास्त-
कराय, पर -विद्या -निवारण
अग्नि -दीप्ताय , अथर्व – वेद-
ऋग्वेद- साम- वेद – यजुर्वेद-सिद्धि
-कराय , निराहाराय , वायु -वेग
मनोवेग श्रीबाल -
कृष्णः प्रतिषठानन्द -
करः स्थल -जलाग्नि – गमे मतोद् -
भेदि, सर्व – शत्रु छेदि – छेदि , मम
बैरीन् खादयोत्खादय ,
सञ्जीवन -पर्वतोच्चाटय ,
डाकिनी – शाक िनी – विध्वंस -
कराय महा – प्रतापाय निज -
लीला – प्रदर्शकाय निष्कलंकृत -
नन्द -कुमार – बटुक – ब्रह्मचारी-
निकुञ्जस्थ- भक्त – स्नेह-कराय
दुष्ट -जन – स्तम्भनाय सर्व – पाप-
ग्रह- कुमार्ग- ग्रहान् छेदय छेदय ,
भिन्दि – भिन्दि , खादय,
कण्टकान् ताडय ताडय मारय
मारय, शोषय शोषय, ज्वालय-
ज्वालय, संहारय -संहारय ,
( देवदत्तं ) नाशय नाशय , अति -
शोषय शोषय, मम सर्वत्र रक्ष
रक्ष, महा – पुरुषाय सर्व – दुःख -
विनाशनाय ग्रह – मण्डल- भूत-
मण्डल -प्रेत -मण्डल- पिशाच-मण्डल
उच्चाटन उच्चाटनाय अन्तर -
भवादिक -ज्वर – माहेश्वर -ज्वर-
वैष्णव- ज्वर- ब्रह्म -ज्वर- विषम -
ज्वर – शीत -ज्वर -वात- ज्वर- कफ-
ज्वर -एकाहिक- द्वाहिक-
त्र्याहिक -चातुर्थिक – अर्द्ध-
मासिक मासिक षाण्मासिक
सम्वत्सरादि – कर भ्रमि – भ्रमि ,
छेदय छेदय , भिन्दि भिन्दि ,
महाबल – पराक्रमाय महा -
विपत्ति – निवारणाय भक्र – जन-
कल्पना- कल्प- द्रुमाय- दुष्ट- जन-
मनोरथ – स्तम्भनाय क्लीं कृष्णाय
गोविन्दाय गोपी – जन-
वल्लभाय नमः।।
इसका नित्य प्रातः औररात्री में सोते समय पांच- पांचबार पाठ करने मात्र सेही समस्त शत्रुओंका नाशहोता है और शत्रुअपनी शत्रुता छोड़करमित्रता का व्यवहार करने लगतेहै.!!!!

11……यह अद्वितीय तान्त्रिक शक्ति से युक्त है |
अतः सुदर्शनचक्र की भान्ति पाठक की सदैव रक्षा करता है |
।।अथ शत्रुनाशन प्रयोगमन्त्रः।।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रूं सुदर्शनचक्रराजन् दुष्टान्
दह दह सर्वदुष्टान् भयं कुरु कुरु विदारय
विदारय परमन्त्रान् ग्रासय ग्रासय भक्षय
भक्षय द्रावय द्रावय हुं हुं फट् ||
संकल्प (नाम गोत्र जाती आदि) लेकर इस मन्त्र को प्रतिदिन 11-11 माला जप करें एक महीने तक ।

12…बटुक भैरव अष्टोत्तर-शतनाम स्तोत्र ( संहार क्रम )
विनियोग:- ॐ अस्य श्रीबटुक भैरव स्तोत्र मन्त्रस्य, कालाग्नि रूद्र ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, आपदुद्धारक बटुक भैरवो देवता, ह्रीं बीजम्, भैरवी वल्लभः शक्तिः, नील वर्णों दण्ड पाणि: कीलकं, समस्त शत्रु दमने समस्ता-पन्निवारणे सर्वाभीष्ट प्रदाने च विनियोगः ।
ऋष्यादि न्यास :-
ॐ कालाग्नि ऋषये नमः शिरसि ।
अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे ।
आपदुद्धारक श्रीबटुक भैरव देवतायै नमः हृदये ।
ह्रीं बीजाय नमः गुह्यये ।
भैरवी वल्लभ शक्तये नमः पादयोः
नील वर्णों दण्ड-पाणि: कीलकाय नमः नाभौ ।
समस्त शत्रु दमने समस्तापन्निवारणे सर्वाभीष्ट प्रदाने च विनियोगाय नमः सर्वांगे ।
मूल-मन्त्र :-
ॐ ह्रीं बं बटुकाय क्षौं क्षौं आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय स्वाहा ।
ध्यान :-
नील-जीमूत-संकाशो जटिलो रक्त-लोचनः ।
दंष्ट्रा कराल वदनः सर्प यज्ञोपवीत-वान् ।।
दंष्ट्राSSयुधालंकृतश्च कपाल-स्त्रग्-विभूषितः ।
हस्त-न्यस्त-करो टीका-भस्म-भूषित-विग्रहः ।।
नाग-राज-कटि-सूत्रों बाल-मूर्तिर्दिगम्बरः ।
मञ्जु-सिञ्जान-मञ्जरी-पाद-कम्पित-भूतलः ।।
भूत-प्रेत-पिशाचैश्च सर्वतः परिवारितः ।
योगिनी-चक्र-मध्यस्थो मातृ-मण्डल-वेष्टितः ।।
अट्टहास-स्फुरद्-वक्त्रो भृकुटी-भीषणाननः ।
भक्त-संरक्षणार्थ हि दिक्षु भ्रमण-तत्परः ।।
स्तोत्र
ॐ ह्रीं बटुकों वरदः शूरो भैरवः काल भैरवः ।
भैरवी वल्लभो भव्यो दण्ड पाणिर्दया निधिः ।।1
वेताल वाहनों रौद्रो रूद्र भृकुटि सम्भवः ।
कपाल लोचनः कान्तः कामिनी वश कृद् वशी ।।2
आपदुद्धारणो धीरो हरिणाङ्क शिरोमणिः ।
दंष्ट्रा-करालो दष्टोष्ठौ धृष्टो-दुष्ट-निवर्हणः ।।3
सर्प-हारः सर्प-शिरः सर्प-कुण्डल-मण्डितः ।
कपाली करुणा-पूर्णः कपालैक-शिरोमणिः ।।4
श्मशान-वासी मासांशी मधु-मत्तोSट्टहास-वान् ।
वाग्मी वाम-व्रतो वामो वाम-देव-प्रियंङ्करः ।।5
वनेचरो रात्रि-चरो वसुदो वायु-वेग-वान् ।
योगी योग-व्रत-धरो योगिनी-वल्लभो युवा ।।6
वीर-भद्रो विश्वनाथो विजेता वीर-वन्दितः ।
भूताध्यक्षो भूति-धरो भूत-भीति-निवरणः ।।7
कलङ्क-हीनः कंकाली क्रूरः कुक्कुर-वाहनः ।
गाढ़ो गहन-गम्भीरो गण-नाथ-सहोदरः ।।8
देवी-पुत्रो दिव्य-मूर्तिर्दीप्ति-मान् दिवा-लोचनः ।
महासेन-प्रिय-करो मान्यो माधव-मातुलः ।।9
भद्र-काली -पतिर्भद्रो भद्रदो भद्र-वाहनः ।
पशूपहार-रसिकः पाशी पशु-पतिः पतिः ।।10
चण्डः प्रचण्ड-चण्डेशश्चण्डी-हृदय-नन्दनः ।
दक्षो दक्षाध्वर-हरो दिग्वासा दीर्घ-लोचनः ।।11
निरातङ्को निर्विकल्पः कल्पः कल्पान्त-भैरवः ।
मद-ताण्डव-कृन्मत्तो महादेव-प्रियो महान् ।।12
खट्वांग-पाणिः खातीतः खर-शूलः खरान्त-कृत् ।
ब्रह्माण्ड-भेदनो ब्रह्म-ज्ञानी ब्राह्मण-पालकः ।।13
दिक्-चरो भू-चरो भूष्णुः खेचरः खेलन-प्रियः ,
सर्व-दुष्ट-प्रहर्त्ता च सर्व-रोग-निषूदनः ।
सर्व-काम-प्रदः शर्वः सर्व-पाप-निकृन्तनः ।।14
फल-श्रुति
इत्थमष्टोत्तर-शतं नाम्ना सर्व-समृद्धिदम् ।
आपदुद्धार-जनकं बटुकस्य प्रकीर्तितम् ।।
एतच्च श्रृणुयान्नित्यं लिखेद् वा स्थापयेद् गृहे ।
धारयेद् वा गले बाहौ तस्य सर्वा समृद्धयः ।।
न तस्य दुरितं किञ्चिन्न चौर-नृपजं भयम् ।
न चापस्मृति-रोगेभ्यो डाकिनीभ्यो भयं नहि ।।
न कूष्माण्ड-ग्रहादिभ्यो नापमृत्योर्न च ज्वरात् ।
मासमेकं त्रि-सन्ध्यं तु शुचिर्भूत्वा पठेन्नरः ।।
सर्व-दारिद्रय-निर्मुक्तो निधि पश्यति भूतले ।
मास-द्वयमधीयानः पादुका-सिद्धिमान् भवेत् ।।
अञ्जनं गुटिका खड्गं धातु-वाद-रसायनम् ।
सारस्वतं च वेताल-वाहनं बिल-साधनम् ।।
कार्य-सिद्धिं महा-सिद्धिं मन्त्रं चैव समीहितम् ।
वर्ष-मात्रमधीनः प्राप्नुयात् साधकोत्तमः ।।
एतत् ते कथितं देवि ! गुह्याद् गुह्यतरं परम् ।
कलि-कल्मष-नाशनं वशीकरणं चाम्बिके ! ।।

13…जय वीर हनुमान
(वशीकरणार्थम्)
ॐ नमो हनुमते ऊर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय
रुं रुं रुं रुं रुं रुं रुं रुद्रमूर्तये प्रयोजननिर्वाहकाय स्वाहा ॥

(मारणार्थम्)रं ह्रां रं ह्रीं रं ह्रूं रं ह्रैं रं ह्रौं रं ह्रः
रुद्रावताराय
शत्रुसंहारणाय रं ह्रां रं ह्रीं रं ह्रूं रं ह्रैं रं ह्रौं रं ह्रः फट्
स्वाहा ॥

(विद्वेषणार्थम्)
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय बं बं बं बं बं
अमुकामुकं विद्वेषय विद्वेषय हूं फट् ॥

(स्तम्भनार्थम्)
ॐ नमो हनुमते पञ्चवदनाय टं टं टं टं टं
अमुकं स्तम्भय स्तम्भय टं टं टं टं टं हूं फट् ॥

(मोहनार्थम्)ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं हूं ह्स्फ्रें ह्स्फ्रें ह्स्रौं ॐ
हनुमते अमुकं मोहय मोहय हुं फट् ॥

(त्रिदोषसन्निपातनिवृत्त्यर्थम्)
ॐ हनुमते श्रीरामदूताय नमः ।
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ।

(हार्दचक्रजागरणार्थम्)
गुरवे मम अञ्जनीसूनवे नमः ॥

(सर्वमनोरथपूरणार्थम्)
ॐ नमो भगवते महावीराय श्रीमते सर्वकामप्रदाय हुं स्वाहा ॥
असाध्यसाधक स्वामिन् असाध्यं तव किं वद ।
रामदूत महोत्साह ममाभीष्टं प्रसाधय ॥

(वशीकरणार्थम्)
ॐ नमो हनुमते ऊर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय
रुं रुं रुं रुं रुं रुं रुं रुद्रमूर्तये प्रयोजननिर्वाहकाय स्वाहा ॥

(मारणार्थम्)रं ह्रां रं ह्रीं रं ह्रूं रं ह्रैं रं ह्रौं रं ह्रः
रुद्रावताराय
शत्रुसंहारणाय रं ह्रां रं ह्रीं रं ह्रूं रं ह्रैं रं ह्रौं रं ह्रः फट्
स्वाहा ॥

 

14……जय वीर हनुमान
आसन मंत्र पूर्ण
सत नमो आदेश । गुरु जी को आदेश । ॐ गुरु जी ।
आसन मार सिंहासन बैठु – बैठे बैठे गुरु की छाया ।
पांच महेश्वर आज्ञा करें तो शब्द गुरां से पाया ।
स्थिर कर आसन – स्थिर कर ध्यान -
सत्य् सत्य् गुरु गोरक्षनाथ जी बैठे गादी प्रवान ।
गादी ब्रह्मा गादी इन्द्र – गादी बैठे गुरु गोबिन्द ।
आो बाल गोपाल ( सिद्धों ) तुम लागो पावं -
तब तुम पूजो ब्रह्मज्ञान ।
ब्रह्मा की कूँची – महादेव का ताला -
वीर नृसिंह भैरव मतवाला ।
श्री नाथ जी गुरु जी आदेश आदेश ।

15…जय वीर हनुमान
हनुमत्पञ्चरत्नस्तोत्रम्
(भगवत्पादानां रामभुजङ्गतः)

शंशंशंसिद्धनाथं प्रणमति चरणं वायुपुत्रं च रौद्रं
वंवंवंविश्वरूपं हहहहहसितं गर्जितं मेघक्षत्रम् ।
तन्तन्त्रैलोक्यनाथं तपति दिनकरं तं त्रिनेत्रस्वरूपं
कङ्कङ्कन्दर्पवश्यं कमलमनहरं शाकिनीकालरूपम् ॥ १ ॥
रंरंरंरामदूतं रणगजदमितं रावणच्छेददक्षं
बम्बम्बम्बालरूपं नतगिरिचरणं कम्पितं सूर्यबिम्बम् ।

16…भूत-प्रेत बाधाओं, जादू-टोनों आदि के प्रभाव से भले-चंगे लोगों का जीवन भी दुखमय हो जाता है। ज्योतिष तथा शाबर ग्रंथों में इन बाधाओं से मुक्ति के अनेकानेक उपाय उपाय बताए गए हैं।

इस प्रकार की बाधा निवारण करने से पूर्व स्वयं की रक्षा भी आवश्यक हें.इसलिए इन मन्त्रों द्वारा अपनी तथा अपने आसन की सुरक्षा कर व्यवस्थित हो जाएँ…

जब भी हम पूजन आदि धार्मिक कार्य करते हैं वहां आसुरी शक्तियां अवश्य अपना प्रभाव दिखाने का प्रयास करती हैं। उन आसुरी शक्तियों को दूर भगाने के लिए हम मंत्रों का प्रयोग कर सकते हैं। इसे रक्षा विधान कहते हैं। नीचे रक्षा विधान के बारे में संक्षिप्त में लिखा गया है। रक्षा विधान का प्रयोग करने से बुरी शक्तियां धार्मिक कार्य में बाधा नहीं पहुंचाती तथा दूर से ही निकल जाती हैं।

रक्षा विधान- रक्षा विधान का अर्थ है जहाँ हम पूजा कर रहे है वहाँ यदि कोई आसुरी शक्तियाँ, मानसिक विकार आदि हो तो चले जाएं, जिससे पूजा में कोई बाधा उपस्थित न हो। बाएं हाथ में पीली सरसों अथवा चावल लेकर दाहिने हाथ से ढंक दें तथा निम्न मंत्र उच्चारण के पश्चात सभी दिशाओं में उछाल दें।
मंत्र

ओम अपसर्पन्तु ते भूता: ये भूता:भूमि संस्थिता:।
ये भूता: बिघ्नकर्तारस्तेनश्यन्तु शिवाज्ञया॥
अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचा: सर्वतो दिशम।
सर्वेषामविरोधेन पूजा कर्मसमारभ्भे॥

17…शाबर मंत्र-सिद्धियाँ

शाबर मंत्र ग्रामीण अंचल के तांत्रिक मंत्र होते है। सामान्य मान्यता है कि गुरु गोरखनाथ के एक शिष्य शाबरी ने इन मन्त्रों का प्रचलन शुरू किया था। इनमें मुख्य तौर पर तकनीकी और रासायनिक (जड़ी-बूटी, खनिज, जैविक तत्व) का प्रयोग होता है और इसी कारण से ये अत्यधिक शक्तिशाली होते हैं।
यद्यपि यहाँ पूरी विधि दी गयी है; पर बिना किसी जानकार को गुरु बनाये इनकी सिद्धि का प्रयत्न करना खतरनाक होगा। किसी को गुरु बनाते है, तो अपनी महीने भर की सम्पूर्ण आय और कोई अपनी प्रिय वस्तु गुरु दक्षिणा में देकर उसका विश्वास अर्जित करें।
यहाँ एक विशेष तथ्य उल्लेखनीय है। सनातन धर्म ने हर प्रकार के संत और साधकों को प्रतिष्ठा देकर गुरु और भगवान् की संज्ञा दी है। इसमें इस धर्म के विरोधी और अपमान करने वाले भी कर रहे है । शाबर मन्त्रों में भी कहीं-कहीं इसकी झलक दिखाई देती है। इसे एक विद्या के रूप में लेकर ही सोचें। अन्यथा न लें।

मसान सिद्धि
मन्त्र –
ॐ नमो आठ खाट की लाकड़ी।
मंजू बनी की कावा।
भुवा मुर्दा बोले।
न बोले तो कालवीर की आन।
शब्द सांचा, फुरे मंत्र ईश्वरो वाचा।
ॐ नमः ह्रीं क्रीं श्री फट स्वाहा।

इस सिद्धि से वशीकरण सहित अनेक प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त होती है।

18…मन्त्र जप में प्रयोग करने से पूर्व सर्वप्रथम माला का विधि पूर्वक संस्कार करना चाहिए अन्यथा असंस्कारित माला पर जप निष्फल होता है ! यदि आपको इसका सही ज्ञान नहीं है तो किसी योग्य विद्धवान से उसका एक बार संस्कार अवश्य करा लें, जिस प्रकार किसी भी मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा के बाद वह मूर्ति चैतन्य हो जाती है उसी प्रकार माला के संस्कार से माला चैतन्य अवस्था में हो जाती है, और उसके द्वारा किया गया जप पूर्ण फलदाई हो जाता है !

माला संस्कार विधि इस प्रकार है :- साधक सर्वप्रथम स्नान आदि से शुद्ध हो कर अपने पूजा गृह में पूर्व या उत्तर की ओर मुह कर आसन पर बैठ जाए अब सर्व प्रथम आचमन, पवित्रीकरण आदि करने के बाद गणेश, गुरु तथा अपने इष्ट देव/ देवी का पूजन सम्पन्न कर लें !

तत्पश्चात पीपल के 9 पत्तो को भूमि पर अष्टदल कमल की भाती बिछा लें, एक पत्ता मध्य में तथा शेष आठ पत्ते आठ दिशाओ में रखने से अष्टदल कमल बनेगा, इन पत्तो के ऊपर आप माला को रख दें !

अब गाय का दूध , दही , घी , गोमूत्र , गोबर से बने पंचगव्य से किसी पात्र में माला को प्रक्षालित करें ! ओर पंचगव्य से माला को स्नान कराते हुए !! ॐ अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लॄं एं ऐं ओं औं अं अः कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं !! इस समस्त स्वर वयंजन का अनुनासिक उच्चारण करें !

माला को पंचगव्य से स्नान कराने के बाद माला को जल से स्नान कराएं !

माला को निम्न मंत्र बोलते हुए गौदुग्ध से स्नान कराने के बाद जल से स्नान कराएं !
ॐ सद्यो जातं प्रद्यामि सद्यो जाताय वै नमो नमः ! भवे भवे नाति भवे भवस्य मां भवोद्भवाय नमः !!

माला को निम्न मंत्र बोलते हुए दही से स्नान कराने के बाद जल से स्नान कराएं !
ॐ वामदेवाय नमः जयेष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमः रुद्राय नमः कालाय नमः कल विकरणाय नमः बलाय नमः !
बल प्रमथनाय नमः बलविकरणाय नमः सर्वभूत दमनाय नमः मनोनमनाय नमः !!

माला को निम्न मंत्र बोलते हुए गौघृत से स्नान कराने के बाद जल से स्नान कराएं !
ॐ अघोरेभ्योथघोरेभ्यो घोर घोर तरेभ्य: सर्वेभ्य: सर्व शर्वेभया नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्य:

माला को निम्न मंत्र बोलते हुए शहद से स्नान कराने के बाद जल से स्नान कराएं !
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात !!

माला को निम्न मंत्र बोलते हुए शक्कर से स्नान कराने के बाद जल से स्नान कराएं !
ॐ ईशानः सर्व विद्यानमीश्वर सर्वभूतानाम ब्रह्माधिपति ब्रह्मणो अधिपति ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदा शिवोम !! अब

माला को स्वच्छ वस्त्र से पोंछकर माला को कांसे की थाली अथवा किसी अन्य स्वच्छ थाली या चौकी पर स्थापित करके माला की प्राण प्रतिष्ठा हेतु अपने दाएं हाथ में जल लेकर विनियोग करके वह जल भूमि पर छोड़ दें !

ॐ अस्य श्री प्राण प्रतिष्ठा मंत्रस्य ब्रह्मा विष्णु रुद्रा ऋषय: ऋग्यजु:सामानि छन्दांसि प्राणशक्तिदेवता आं बीजं ह्रीं शक्ति क्रों कीलकम अस्मिन माले प्राणप्रतिष्ठापने विनियोगः !!

अब माला को दाएं हाथ से ढक ले और निम्न चैतन्य मंत्र बोलते हुए ऐसी भावना करे कि यह माला पूर्ण चैतन्य व शक्ति संपन्न हो रही है !

ॐ ह्रौं जूं सः आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं ह्रौं ॐ हं क्षं सोहं हंसः ह्रीं ॐ आं ह्रीं क्रों अस्य मालाम प्राणा इह प्राणाः !
ॐ ह्रौं जूं सः आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं ह्रौं ॐ हं क्षं सोहं हंसः ह्रीं ॐ आं ह्रीं क्रों अस्य मालाम जीव इह स्थितः !
ॐ ह्रौं जूं सः आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं ह्रौं ॐ हं क्षं सोहं हंसः ह्रीं ॐ आं ह्रीं क्रों अस्य मालाम सर्वेन्द्रयाणी वाङ् मनसत्वक चक्षुः श्रोत्र जिह्वा घ्राण प्राणा इहागत्य इहैव सुखं तिष्ठन्तु स्वाहा !
ॐ मनो जूतिजुर्षतामाज्यस्य बृहस्पतिरयज्ञमिमन्तनो त्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु विश्वे देवास इह मादयन्ताम् ॐ प्रतिष्ठ !!

अब माला का गंध, अक्षत, धूप, दीप, पुष्प आदि से पंचोपचार पूजन कर, उस माला पर जिस मन्त्र की साधना करनी है उस मन्त्र को मानसिक उच्चारण करते हुए माला के प्रत्येक मनके पर रोली से तिलक लगाएं, अथवा “ॐ अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लॄं एं ऐं ओं औं अं अः कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं” का अनुनासिक उच्चारण करते हुए माला के प्रत्येक मनके पर रोली से तिलक लगाएं ! तदुपरांत माला को अपने मस्तक से लगा कर पूरे सम्मान सहित गौमुखी में स्थापित कर दें ! इतने संस्कार करने के बाद माला जप करने योग्य शुद्ध तथा सिद्धिदायक होती है !

नित्य जप करने से पूर्व माला का संक्षिप्त पूजन निम्न मंत्र से करने के उपरान्त जप प्रारम्भ करें !

ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि सर्व मंत्रार्थ साधिनी सर्व मन्त्र साधय-साधय सर्व सिद्धिं परिकल्पय मे स्वाहा !
ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः !

यह सदैव ही ध्यान रक्खे :-
जप करते समय माला पर किसी कि दृष्टि नहीं पड़नी चाहिए व तर्जनी अंगुली का माला को कभी स्पर्श नहीं होना चाहिए !
गोमुख रूपी थैली ( गोमुखी ) में माला रखकर इसी थैले में हाथ डालकर जप किया जाना चाहिए अथवा वस्त्र आदि से माला आच्छादित कर ले अन्यथा जप निष्फल होता है !
संस्कारित माला से ही किसी भी मन्त्र जप करने से पूर्णफल की प्राप्ति होती है !

19……” शिव भस्म ” -
!! ॐ अघोरेभ्यो अथ घोरेभ्यो घोर घोरतरेभ्यः
सर्वतः सर्व सर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः !!
उक्त अघोर मंत्र पढकर गाय के गोबर, बिल्व वृक्ष, शमी, पीपल, पलाश, बड, अमलतास या
बेर की लकडियों को जलायें , इसे शिवाग्नि कहते हैं और इस प्रकार बनी भस्म को
शिवाग्नि जनित भस्म कहते हैं और यही शिव उपासना में काम आती है।
इस प्रकार जलाये जाने पर जो भस्म बने उस भस्म का
सफ़ेद भाग निकालकर अलग रख लें, यही सफ़ेद भाग पूजा में काम आता है।
भगवान शिव के शिवलिंग पर तीन आड़ी रेखायें इस भस्म से बनायें, इसे त्रिपुण्ड्र कहते हैं ।
मध्यमा और अनामिका दो अँगुलियों से दो रेखायें
खींचें और अंगूठे से बीच की रेखा विपरीत दिशा में खींचें।
स्वयं को भी शिव पञ्चाक्षर मंत्र “नमः शिवाय” का उच्चारण करते हुए मस्तक,
दोनों भुजायें, ह्रदय और नाभि कम से कम इन पांच स्थानों पर त्रिपुण्ड्र अवश्य धारण करना चाहिये ।।

20……‘श्रीसुदर्शन-चक्र’ भगवान् विष्णु का प्रमुख आयुध है, जिसके माहात्म्य की कथाएँ पुराणों में स्थान-स्थान पर दिखाई देती है।

‘मत्स्य-पुराण’ के अनुसार एक दिन दिवाकर भगवान् ने विश्वकर्मा जी से निवेदन किया कि‘कृपया मेरे प्रखर तेज को कुछ कम कर दें,क्योंकि अत्यधिक उग्र तेज के कारण प्रायः सभी प्राणी सन्तप्त हो जाते हैं।’ विश्वकर्मा जी ने सूर्य को ‘चक्र-भूमि’ पर चढ़ा कर उनका तेज कम कर दिया। उस समय सूर्य से निकले हुए तेज-पुञ्जों को ब्रह्माजी ने एकत्रित कर भगवान् विष्णु के‘सुदर्शन-चक्र’ के रुप में, भगवान् शिव के ‘त्रिशूल′-रुप में तथा इन्द्र के ‘वज्र’ के रुप में परिणत कर दिया।
‘पद्म-पुराण’ के अनुसार भिन्न-भिन्न देवताओं के तेज से युक्त ‘सुदर्शन-चक्र’ को भगवान् शिव ने श्रीकृष्ण को दिया था। ‘वामन-पुराण’ के अनुसार भी इस कथा की पुष्टि होती है। ‘शिव-पुराण’ के अनुसार ‘खाण्डव-वन’ को जलाने के लिए भगवान् शंकर ने श्रीकृष्ण को ‘सुदर्शन-चक्र’प्रदान किया था। इसके सम्मुख इन्द्र की शक्ति भी व्यर्थ थी।
‘वामन-पुराण’ के अनुसार दामासुर नामक भयंकर असुर को मारने के लिए भगवान् शंकर ने विष्णु को ‘सुदर्शन-चक्र’ प्रदान किया था। बताया है कि एक बार भगवान् विष्णु ने देवताओं से कहा था कि ‘आप लोगों के पास जो अस्त्र हैं, उनसे असुरों का वध नहीं किया जा सकता। आप सब अपना-अपना तेज दें।’ इस पर सभी देवताओं ने अपना-अपना तेज दिया। सब तेज एकत्र होने पर भगवान् विष्णु ने भी अपना तेज दिया। फिर महादेव शंकर ने इस एकत्रित तेज के द्वारा अत्युत्तम शस्त्र बनाया और उसका नाम ‘सुदर्शन-चक्र’ रखा। भगवान् शिव ने‘सुदर्शन-चक्र’ को दुष्टों का संहार करने तथा साधुओं की रक्षा करने के लिए विष्णु को प्रदान किया।

‘हरि-भक्ति-विलास’ में लिखा है कि ‘सुदर्शन-चक्र’ बहुत पुज्य है। वैष्णव लोग इसे चिह्न के रुप में धारण करें। ‘गरुड़-पुराण’ में ‘सुदर्शन-चक्र’का महत्त्व बताया गया है और इसकी पूजा-विधि दी गई है। ‘श्रीमद्-भागवत’ में ‘सुदर्शन-चक्र’ की स्तुति इस प्रकार की गई है- ‘हे सुदर्शन! आपका आकार चक्र की तरह है। आपके किनारे का भाग प्रलय-कालीन अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान् विष्णु की प्रेरणा से सभी ओर घूमते हैं। जिस प्रकार अग्नि वायु की सहायता से शुष्क तृण को जला डालती है, उसी प्रकार आप हमारी शत्रु-सेना को तत्काल जला दीजिए।’
‘विष्णु-धर्मोत्तर-पुराण’ में ‘सुदर्शन-चक्र’ का वर्णन एक पुरुष के रुप में हुआ है। इसकी दो आँखें तथा बड़ा-सा पेट है। चक्र का यह रुप अनेक अलंकारों से सुसज्जित तथा चामर से युक्त है।
वल्लभाचार्य कृत

‘सुदर्शन-कवच’—–

वैष्णवानां हि रक्षार्थं, श्रीवल्लभः-निरुपितः। सुदर्शन महामन्त्रो, वैष्णवानां हितावहः।।
मन्त्रा मध्ये निरुप्यन्ते, चक्राकारं च लिख्यते। उत्तरा-गर्भ-रक्षां च, परीक्षित-हिते-रतः।।
ब्रह्मास्त्र-वारणं चैव, भक्तानां भय-भञ्जनः। वधं च सुष्ट-दैत्यानां, खण्डं-खण्डं च कारयेत्।।
वैष्णवानां हितार्थाय, चक्रं धारयते हरिः। पीताम्बरो पर-ब्रह्म, वन-माली गदाधरः।।
कोटि-कन्दर्प-लावण्यो, गोपिका-प्राण-वल्लभः। श्री-वल्लभः कृपानाथो, गिरिधरः शत्रुमर्दनः।।
दावाग्नि-दर्प-हर्ता च, गोपीनां भय-नाशनः। गोपालो गोप-कन्याभिः, समावृत्तोऽधि-तिष्ठते।।
वज्र-मण्डल-प्रकाशी च, कालिन्दी-विरहानलः। स्वरुपानन्द-दानार्थं, तापनोत्तर-भावनः।।
निकुञ्ज-विहार-भावाग्ने, देहि मे निज दर्शनम्। गो-गोपिका-श्रुताकीर्णो, वेणु-वादन-तत्परः।।
काम-रुपी कला-वांश्च, कामिन्यां कामदो विभुः। मन्मथो मथुरा-नाथो, माधवो मकर-ध्वजः।।
श्रीधरः श्रीकरश्चैव, श्री-निवासः सतां गतिः। मुक्तिदो भुक्तिदो विष्णुः, भू-धरो भुत-भावनः।।
सर्व-दुःख-हरो वीरो, दुष्ट-दानव-नाशकः। श्रीनृसिंहो महाविष्णुः, श्री-निवासः सतां गतिः।।
चिदानन्द-मयो नित्यः, पूर्ण-ब्रह्म सनातनः। कोटि-भानु-प्रकाशी च, कोटि-लीला-प्रकाशवान्।।
भक्त-प्रियः पद्म-नेत्रो, भक्तानां वाञ्छित-प्रदः। हृदि कृष्णो मुखे कृष्णो, नेत्रे कृष्णश्च कर्णयोः।।
भक्ति-प्रियश्च श्रीकृष्णः, सर्वं कृष्ण-मयं जगत्। कालं मृत्युं यमं दूतं, भूतं प्रेतं च प्रपूयते।।
“ॐ नमो भगवते महा-प्रतापाय महा-विभूति-पतये, वज्र-देह वज्र-काम वज्र-तुण्ड वज्र-नख वज्र-मुख वज्र-बाहु वज्र-नेत्र वज्र-दन्त वज्र-कर-कमठ भूमात्म-कराय, श्रीमकर-पिंगलाक्ष उग्र-प्रलय कालाग्नि-रौद्र-वीर-भद्रावतार पूर्ण-ब्रह्म परमात्मने, ऋषि-मुनि-वन्द्य-शिवास्त्र-ब्रह्मास्त्र-वैष्णवास्त्र-नारायणास्त्र-काल-शक्ति-दण्ड-कालपाश-अघोरास्त्र-निवारणाय, पाशुपातास्त्र-मृडास्त्र-सर्वशक्ति-परास्त-कराय, पर-विद्या-निवारण अग्नि-दीप्ताय, अथर्व-वेद-ऋग्वेद-साम-वेद-यजुर्वेद-सिद्धि-कराय, निराहाराय, वायु-वेग मनोवेग श्रीबाल-कृष्णः प्रतिषठानन्द-करः स्थल-जलाग्नि-गमे मतोद्-भेदि, सर्व-शत्रु छेदि-छेदि,मम बैरीन् खादयोत्खादय, सञ्जीवन-पर्वतोच्चाटय, डाकिनी-शाकिनी-विध्वंस-कराय महा-प्रतापाय निज-लीला-प्रदर्शकाय निष्कलंकृत-नन्द-कुमार-बटुक-ब्रह्मचारी-निकुञ्जस्थ-भक्त-स्नेह-कराय दुष्ट-जन-स्तम्भनाय सर्व-पाप-ग्रह-कुमार्ग-ग्रहान् छेदय छेदय, भिन्दि-भिन्दि, खादय, कण्टकान् ताडय ताडय मारय मारय, शोषय शोषय, ज्वालय-ज्वालय, संहारय-संहारय, (देवदत्तं) नाशय नाशय, अति-शोषय शोषय, मम सर्वत्र रक्ष रक्ष,महा-पुरुषाय सर्व-दुःख-विनाशनाय ग्रह-मण्डल-भूत-मण्डल-प्रेत-मण्डल-पिशाच-मण्डल उच्चाटन उच्चाटनाय अन्तर-भवादिक-ज्वर-माहेश्वर-ज्वर-वैष्णव-ज्वर-ब्रह्म-ज्वर-विषम-ज्वर-शीत-ज्वर-वात-ज्वर-कफ-ज्वर-एकाहिक-द्वाहिक-त्र्याहिक-चातुर्थिक-अर्द्ध-मासिक मासिक षाण्मासिक सम्वत्सरादि-कर भ्रमि-भ्रमि,छेदय छेदय, भिन्दि भिन्दि, महाबल-पराक्रमाय महा-विपत्ति-निवारणाय भक्र-जन-कल्पना-कल्प-द्रुमाय-दुष्ट-जन-मनोरथ-स्तम्भनाय क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपी-जन-वल्लभाय नमः।।
पिशाचान् राक्षसान् चैव, हृदि-रोगांश्च दारुणान् भूचरान् खेचरान् सर्वे, डाकिनी शाकिनी तथा।।
नाटकं चेटकं चैव, छल-छिद्रं न दृश्यते। अकाले मरणं तस्य, शोक-दोषो न लभ्यते।।
सर्व-विघ्न-क्षयं यान्ति, रक्ष मे गोपिका-प्रियः। भयं दावाग्नि-चौराणां, विग्रहे राज-संकटे।।
।।फल-श्रुति।।
व्याल-व्याघ्र-महाशत्रु-वैरि-बन्धो न लभ्यते। आधि-व्याधि-हरश्चैव, ग्रह-पीडा-विनाशने।।
संग्राम-जयदस्तस्माद्, ध्याये देवं सुदर्शनम्। सप्तादश इमे श्लोका, यन्त्र-मध्ये च लिख्यते।।
वैष्णवानां इदं यन्त्रं, अन्येभ्श्च न दीयते। वंश-वृद्धिर्भवेत् तस्य, श्रोता च फलमाप्नुयात्।।
सुदर्शन-महा-मन्त्रो, लभते जय-मंगलम्।।
सर्व-दुःख-हरश्चेदं, अंग-शूल-अक्ष-शूल-उदर-शूल-गुद-शूल-कुक्षि-शूल-जानु-शूल-जंघ-शूल-हस्त-शूल-पाद-शूल-वायु-शूल-स्तन-शूल-सर्व-शूलान् निर्मूलय, दानव-दैत्य-कामिनि वेताल-ब्रह्म-राक्षस-कालाहल-अनन्त-वासुकी-तक्षक-कर्कोट-तक्षक-कालीय-स्थल-रोग-जल-रोग-नाग-पाश-काल-पाश-विषं निर्विषं कृष्ण! त्वामहं शरणागतः। वैष्णवार्थं कृतं यत्र श्रीवल्लभ-निरुपितम्।। ॐ

इसका नित्य प्रातः और रात्री में सोते समय पांच – पांच बार पाठ करने मात्र से ही समस्त शत्रुओं का नाश होता है और शत्रु अपनी शत्रुता छोड़ कर मित्रता का व्यवहार करने लगते है.

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21……॥ श्रीसुदर्शनकवचम् ३ ॥ ॐ अस्य श्री सुदर्शनकवचमालामन्त्रस्य । श्रीलक्ष्मीनृसिंहः परमात्मा देवता । मम सर्वकार्यसिद्धयर्थे जपे विनियोगः । ॐ क्ष्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः । ॐ श्रीं मध्यमाभ्यां नमः । ॐ सहस्रार अनामिकाभ्यां नमः । ॐ हुं फट् कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ स्वाहा करतल-कर पृष्टाभ्यां नमः एवं हृद्यादि । ध्यानम् – उपास्महे नृसिंहाख्यं ब्रह्मावेदान्तगोचरम् । भूयो लालित-संसारच्छेदहेतुं जगद्गुरुम् ॥ मानस-पूजाः लं पृथिव्यात्मकं गन्धं समर्पयामि । हम् आकाशत्मिकं पुष्पं समर्पयामि यं वाय्वात्मकं धूपं आघ्रापयामि । रं वह्न्यात्मकं दीपं दर्शयामि । वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि । सं सर्वात्मकं ताम्बूलं समर्पयामि । नमस्करोमि । ॐ सुदर्शनाय नमः । ॐ आं ह्रीं क्रों नमो भगवते प्रलयकालमहाज्वालाघोर-वीर-सुदर्शन-नारसिंहाय ॐ महाचक्रराजाय महाबलाय सहस्रकोटिसूर्यप्रकाशाय सहस्रशीर्षाय सहस्राक्षाय सहस्रपादाय संकर्षणत्मने सहस्रदिव्यास्त्र-सहस्रहस्ताय सर्वतोमुखज्वलनज्वालामालावृताय विस्फुलिङ्गस्फोटपरिस्फोटित ब्रह्माण्ड भाण्डाय महापराक्रमाय महोग्रविग्रहाय महावीराय महाविष्णुरूपिणे व्यतीतकालान्तकाय महाभद्ररुद्रावताराय मृत्युस्वरूपाय किरीट-हार-केयूर-ग्रैवेय-कटकाङ्गुलीय कटिसूत्र मञ्जीरादिकनकमणिखचितदिव्य-भूषणाय महाभीषणाय महाभीक्षाय व्याहततेजोरूपनिधये रक्त चण्डान्तक मण्डितमदोरुकुण्डादुर्निरीक्षणाय प्रत्यक्षाय ब्रह्माचक्र-विष्णुचक्र-कालचक्र-भूमिचक्र-तेजोरूपाय आश्रितरक्षकाय । ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् इति स्वाहा स्वाहा ॥ ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् इति स्वाहा स्वाहा ॥ भो भो सुदर्शन नारसिंह मां रक्षय रक्षय । ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात्॥ ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् ॥ मम शत्रून्नाशय नाशय ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् ॥ ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् ॥ ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल चण्ड चण्ड प्रचण्ड प्रचण्ड स्फुर प्रस्फुर घोर घोर घोरतर घोरतर चट चट प्रचट प्रचट प्रस्फुट दह कहर भग भिन्धि हन्धि खटट प्रचट फट जहि जहि पय सस प्रलयवा पुरुषाय रं रं नेत्राग्निरूपाय । ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् ॥ ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् ॥ भो भो सुदर्शन नारसिंह मां रक्षय रक्षय । ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् ॥ ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् ॥ एहि एहि आगच्छ आगच्छ भूतग्रह-प्रेतग्रह-पिशाचग्रह दानवग्रह कृतिमग्रह-प्रयोगग्रह-आवेशग्रह-आगतग्रह-अनागतग्रह- ब्रह्माग्रह-रुद्रग्रह-पाताल-निराकारग्रह-आचार-अनाचारग्रह- नानाजातिग्रह-भूचरग्रह-खेचरग्रह-वृक्षचरग्रह- पीक्षिचरग्रह-गिरिचरग्रह-श्मशानचरग्रह- जलचरग्रह-कूपचरग्रह-देगारचलग्रह- शून्याचारचरग्रह-स्वप्नग्रह-दिवामनोग्रह-बालग्रह- मूकग्रह-मूर्खग्रह-बधिरग्रह-स्त्रीग्रह-पुरुषग्रह- यक्षग्रह-राक्षसग्रह-प्रेतग्रह-किन्नरग्रह-साध्यचरग्रह- सिद्धचरग्रह कामिनीग्रह-मोहिनीग्रह-पद्मिनीग्रह-यक्षिणीग्रह- पक्षिणीग्रह-संध्याग्रह-मार्गग्रह-कलिङ्गदेवोग्रह- भैरवग्रह-बेतालग्रह- गन्धर्वग्रह प्रमुखसकलदुष्टग्रह रातान् आकर्षय आकर्षय आवेशय ड ड ठ ठ ह्यय वाचय दह्य भस्मी कुरु उच्चाटय उच्चाटय । ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोद्यात् ॥ ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोद्यात् ॥ ॐ क्ष्रां क्ष्रीं क्ष्रूं क्ष्रैं क्ष्रोउं क्ष्रः । भ्रां भ्रीं भ्रूं भ्रैं भ्रौं भ्रः । ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रोउं ह्रः । घ्रां घ्रीं घ्रुं घ्रैं घ्रोउं घ्रः । श्रां श्रीं श्रूं श्रैं श्रोउं श्रः । ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् ॥ ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् ॥ एहि एहि सालवं संहारय शरभं क्रंदया विद्रावय विद्रावय भैरव भीषय भीषय प्रत्यगिरि मर्दय मर्दय चिदम्बरं बन्धय बन्धय विडम्बरं ग्रासय ग्रासय शांभव्ं निवर्तय कालीं दह दह महिषासुरीं छेदय छेदय दुष्टशक्तीः निर्मूलय निर्मूलय रूं रूं हूं हूं मुरु मुरु परमंत्रपरयंत्र-परतंत्र कटुपरं वादुपर जपपर होमपर सहस्रदीपकोटिपूजां भेदय भेदय मारय मारय खण्डय खण्डय परकर्तृकं विषं निर्विषं कुरु कुरु अग्निमुखप्रकाण्ड नानाविधि-कर्तृंमुख वनमुखग्रहान् चूर्णय चूर्णय मारीं विदारय कूष्माण्ड-वैनायक-मारीचगणान् भेदय भेदय मन्त्रांपरस्मांकं विमोचय विमोचय अक्षिशूल-कुक्षिशूल-गुल्मशूल-पार्शव-शूल- सर्वाबान्धान् निवारय निवारय पाण्डुरोगं संहारय संहारय विषमज्वरं त्रासय त्रासय एकाहिकं द्वाहिकं त्रयाहिकं चातुर्थिकं पङ्चाहिकं षष्टज्वरं सप्तमज्वरं अष्टमज्वरं नवमज्वरं प्रेतज्वरं पिशाचज्वरं दानवज्वरं महाकालज्वरं दुर्गाज्वरं ब्रह्माविष्णुज्वरं माहेश्वरज्वरं चतुःषश्टीयोगिनीज्वरं गन्धर्वज्वरं बेतालज्वरं एतान् ज्वारान्नाशय नाशय दोषं मन्थय मन्थय दुरितं हर हर अनन्त-वासुकि-तक्षक-कालिय-पद्म-कुलिक-कर्कोटक- शङ्खपालाद्यष्टनागकुलानां विषं हन हन खं खं घं घं पाशुपतं नाशय नाशय शिखण्डिं खण्डय खण्डय ज्वालामालिनीं निवर्तय सर्वेन्द्रियाणि स्तंभय स्तंभय खण्डय खण्डय प्रमुखदुष्टतंत्रं स्फोटय स्फोटय भ्रामय भ्रामय महानारायणास्त्राय पङ्चाशद्वर्णरूपाय लल लल शरणागतरक्षणाय हुं हूं गं व गं व शं शं अपृतमूर्तये तुभ्यं नमः । ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् ॥ ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् ॥ भो भो सुदर्शन नारसिंह मां रक्षय रक्षय । ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालय धीमहि । तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् ॥ मम सर्वारिष्टशान्तिं कुरु कुरु सर्वतो रक्ष रक्ष ॐ ह्रीं ह्रूं फट् स्वाहा । ॐ क्ष्रौं ह्रीं श्रीं सहस्रार हूं फट् स्वाहा ।

22……पशुपतास्त्र मंत्र साधना एवं सिद्धि ब्रह्मांड में तीन अस्त्र सबसे बड़े हैं। पहला पशुपतास्त्र, दूसरा नारायणास्त्र एवं तीसरा ब्रह्मास्त्र। इन तीनों में से यदि कोई एक भी अस्त्र मनुष्य को सिद्ध हो जाए, तो उसके सभी कष्टों का शमन हो जाता है। उसके समस्त कष्ट समाप्त हो जाते हैं। परंतु इनकी सिद्धि प्राप्त करना सरल नहीं है। यदि आपमें कड़ी साधना करने का साहस एवं धैर्य नहीं है तो ये साधना आपके लिए नहीं है। किसी भी प्रकार की साधना करने हेतु मनुष्य के भीतर साहस एवं धैर्य दोनों की आवश्यकता होती है।

मंत्र – ऊँ श्लीं पशु हुं फट्।

विनियोग :- ऊँ अस्य मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छंदः, पशुपतास्त्ररूप पशुपति देवता, सर्वत्र यशोविजय लाभर्थे जपे विनियोगः।

षडंग्न्यास :- ऊँ हुं फट् ह्रदयाय नमः। श्लीं हुं फट् शिरसे स्वाहा। पं हुं फट् शिखायै वष्ट्। शुं हुं फट् कवचाय हुं। हुं हुं फट् नेत्रत्रयाय वौष्ट्। फट् हुं फट् अस्त्राय फट्।

ध्यान:- मध्याह्नार्कसमप्रभं शशिधरं भीमाट्टहासोज्जवलम् त्र्यक्षं पन्नगभूषणं शिखिशिखाश्मश्रु-स्फुरन्मूर्द्धजम्। हस्ताब्जैस्त्रिशिखं समुद्गरमसिं शक्तिदधानं विभुम् दंष्ट्रभीम चतुर्मुखं पशुपतिं दिव्यास्त्ररूपं स्मरेत्।।

विधि :- सर्वप्रथम अपने गुरुदेव से इस मंत्र की दीक्षा प्राप्त करें। इस मंत्र का पुरश्चरण 6 लाख जप करने से होता है। उसका दशांश होम, उसका दशांश तर्पण, उसका दशांश मार्जन एवं उसका दशांश ब्राह्मण भोज होता है। इस मंत्र के साथ में पाशुपतास्त्र स्त्रोत का पाठ भी अवश्य करना चाहिए। इस पाशुपत मंत्र की एक बार आवृति करने से ही मनुष्य संपूर्ण विघ्नों का नाश कर सकता है। सौ आवृतियों से समस्त उत्पातों को नष्ट कर सकता है। इस मंत्र द्वारा घी और गुग्गल के होम से मनुष्य असाध्य कार्यों को भी सिद्ध कर सकता है। इस पाशुपतास्त्र मंत्र के पाठमात्र से समस्त क्लोशों की शांति हो जाती है। पशुपतास्त्र स्त्रोत का नियमित रूप से 21 दिन सुबह-शाम 21-21 पाठ करें। साथ ही निम्नलिखिल स्त्रोत का 108 बार जाप करें। सुबह अथवा शाम को काले तिल से इस मंत्र की 51 आहुतियां भी अवश्य करें।

विनियोग :- ऊँ अस्य मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छंदः, पशुपतास्त्ररूप पशुपति देवता, सर्वत्र यशोविजय लाभर्थे जपे

विनियोगः।

।।पाशुपतास्त्र स्त्रोतम।।

मंत्रपाठ :- ऊँ नमो भगवते महापाशुपतायातुलबलवीर्यपराक्रमाय त्रिपञ्चनयनाय नानारूपाय नानाप्रहरणोद्यताय सर्वांगरंक्ताय भिन्नाञ्जनचयप्रख्याय श्मशान वेतालप्रियाय सर्वविघ्ननिकृन्तन-रताय सर्वसिद्धिप्रप्रदाय भक्तानुकम्पिने असंख्यवक्त्रभुजपादय तस्मिन् सिद्धाय वेतालवित्रासिने शाकिनीक्षोभ जनकाय व्याधिनिग्रहकारिणे पापभंजनाय सूर्यसोमाग्निनेत्राय विष्णु-कवचाय खंगवज्रहस्ताय यमदंडवरुणपाशाय रुद्रशूलाय ज्वलज्जिह्वाय सर्वरोगविद्रावणाय ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनागक्षय-कारिणे।

ऊँ कृष्णपिंगलाय फट्। हुंकारास्त्राय फट्। वज्रह-स्ताय फट्। शक्तये फट्। दंडाय फट्। यमाय फट्। खड्गाय फट्। नैर्ऋताय फट्। वरुणाय फट्। वज्राय फट्। ध्वजाय फट्। अंकुशाय फट्। गदायै फट्। कुबेराय फट्। त्रिशुलाय फट्। मुद्गराय फट्। चक्राय फट्। शिवास्त्राय फट्। पद्माय फट्। नागास्त्राय फट्। ईशानाय फट्। खेटकास्त्राय फट्। मुण्डाय फट्। मुंण्डास्त्राय फट्। कंकालास्त्राय फट्। पिच्छिकास्त्राय फट्। क्षुरिकास्त्राय फट्। ब्रह्मास्त्राय फट्। शक्त्यस्त्राय फट्। गणास्त्राय फट्। सिद्धास्त्राय फट्। पिलिपिच्छास्त्राय फट्। गंधर्वास्त्राय फट्। पूर्वास्त्राय फट्। दक्षिणास्त्राय फट्। वामास्त्राय फट्। पश्चिमास्त्राय फट्। मंत्रास्त्राय फट्। शाकिन्यास्त्राय फट्। योगिन्यस्त्राय फट्। दंडास्त्राय फट्। महादंडास्त्राय फट्। नमोअस्त्राय फट्। सद्योजातास्त्राय फट्। ह्रदयास्त्राय फट्। महास्त्राय फट्। गरुडास्त्राय फट्। राक्षसास्त्राय फट्। दानवास्त्राय फट्। अघोरास्त्राय फट्। क्षौ नरसिंहास्त्राय फट्। त्वष्ट्रस्त्राय फट्। पुरुषास्त्राय फट्। सद्योजातास्त्राय फट्। सर्वास्त्राय फट्। नः फट्। वः फट्। पः फट्। फः फट्। मः फट्। श्रीः फट्। पेः फट्। भुः फट्। भुवः फट्। स्वः फट्। महः फट्। जनः फट्। तपः फट्। सत्यं फट्। सर्वलोक फट्। सर्वपाताल फट्। सर्वतत्व फट्। सर्वप्राण फट्। सर्वनाड़ी फट्। सर्वकारण फट्। सर्वदेव फट्। ह्रीं फट्। श्रीं फट्। डूं फट्। स्भुं फट्। स्वां फट्। लां फट्। वैराग्य फट्। मायास्त्राय फट्। कामास्त्राय फट्। क्षेत्रपालास्त्राय फट्। हुंकरास्त्राय फट्। भास्करास्त्राय फट्। चंद्रास्त्राय फट्। विध्नेश्वरास्त्राय फट्। गौः गां फट्। स्त्रों स्त्रों फट्। हौं हों फट्। भ्रामय भ्रामय फट्। संतापय संतापय फट्। छादय छादय फट्। उन्मूलय उन्मूलय फट्। त्रासय त्रासय फट्। संजीवय संजीवय फट्। विद्रावय विद्रावय फट्। सर्वदुरितं नाशय नाशय फट्।

इन मंत्रों का 1008 की संख्या में पाठ करने के उपरांत प्रतिदशांश हवन, तर्पण एवं मार्जन भी विधिपूर्वक करें।

23…।। ब्रह्मास्त्र माला मंत्र ।।

ॐ नमो भगवति चामुण्डे नरकंकगृधोलूक परिवार सहिते श्मशानप्रिये नररूधिर मांस चरू भोजन प्रिये सिद्ध विद्याधर वृन्द वन्दित चरणे ब्रह्मेश विष्णु वरूण कुबेर भैरवी भैरवप्रिये इन्द्रक्रोध विनिर्गत शरीरे द्वादशादित्य चण्डप्रभे अस्थि मुण्ड कपाल मालाभरणे शीघ्रं दक्षिण दिशि आगच्छागच्छ मानय-मानय नुद-नुद अमुकं (अपने शत्रु का नाम लें) मारय-मारय, चूर्णय-चूर्णय, आवेशयावेशय त्रुट-त्रुट, त्रोटय-त्रोटय स्फुट-स्फुट स्फोटय-स्फोटय महाभूतान जृम्भय-जृम्भय ब्रह्मराक्षसान-उच्चाटयोच्चाटय भूत प्रेत पिशाचान् मूर्च्छय-मूर्च्छय मम शत्रून् उच्चाटयोच्चाटय शत्रून् चूर्णय-चूर्णय सत्यं कथय-कथय वृक्षेभ्यः सन्नाशय-सन्नाशय अर्कं स्तम्भय-स्तम्भय गरूड़ पक्षपातेन विषं निर्विषं कुरू-कुरू लीलांगालय वृक्षेभ्यः परिपातय-परिपातय शैलकाननमहीं मर्दय-मर्दय मुखं उत्पाटयोत्पाटय पात्रं पूरय-पूरय भूत भविष्यं तय्सर्वं कथय-कथय कृन्त-कृन्त दह-दह पच-पच मथ-मथ प्रमथ-प्रमथ घर्घर-घर्घर ग्रासय-ग्रासय विद्रावय – विद्रावय उच्चाटयोच्चाटय विष्णु चक्रेण वरूण पाशेन इन्द्रवज्रेण ज्वरं नाशय – नाशय प्रविदं स्फोटय-स्फोटय सर्व शत्रुन् मम वशं कुरू-कुरू पातालं पृत्यंतरिक्षं आकाशग्रहं आनयानय करालि विकरालि महाकालि रूद्रशक्ते पूर्व दिशं निरोधय-निरोधय पश्चिम दिशं स्तम्भय-स्तम्भय दक्षिण दिशं निधय-निधय उत्तर दिशं बन्धय-बन्धय ह्रां ह्रीं ॐ बंधय-बंधय ज्वालामालिनी स्तम्भिनी मोहिनी मुकुट विचित्र कुण्डल नागादि वासुकी कृतहार भूषणे मेखला चन्द्रार्कहास प्रभंजने विद्युत्स्फुरित सकाश साट्टहासे निलय-निलय हुं फट्-फट् विजृम्भित शरीरे सप्तद्वीपकृते ब्रह्माण्ड विस्तारित स्तनयुगले असिमुसल परशुतोमरक्षुरिपाशहलेषु वीरान शमय-शमय सहस्रबाहु परापरादि शक्ति विष्णु शरीरे शंकर हृदयेश्वरी बगलामुखी सर्व दुष्टान् विनाशय-विनाशय हुं फट् स्वाहा। ॐ ह्ल्रीं बगलामुखि ये केचनापकारिणः सन्ति तेषां वाचं मुखं पदं स्तम्भय-स्तम्भय जिह्वां कीलय – कीलय बुद्धिं विनाशय-विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा । ॐ ह्रीं ह्रीं हिली-हिली अमुकस्य (शत्रु का नाम लें) वाचं मुखं पदं स्तम्भय शत्रुं जिह्वां कीलय शत्रुणां दृष्टि मुष्टि गति मति दंत तालु जिह्वां बंधय-बंधय मारय-मारय शोषय-शोषय हुं फट् स्वाहा।।

24…पीताम्बरा बगलामुखी खड्ग मालामन्त्र

यह स्तोत्र शत्रुनाश एवं कृत्यानाश, परविद्या छेदन करने वाला एवं रक्षा कार्य हेतु प्रभावी है । साधारण साधकों को कुछ समय आवेश व आर्थिक दबाव रहता है, अतः पूजा उपरान्त नमस्तस्यादि शांति स्तोत्र पढ़ने चाहिये ।
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीपीताम्बरा बगलामुखी खड्गमाला मन्त्रस्य नारायण ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, बगलामुखी देवता, ह्लीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, ॐ कीलकं, ममाभीष्टसिद्धयर्थे सर्वशत्रु-क्षयार्थे जपे विनियोगः ।
हृदयादि-न्यासः-नारायण ऋषये नमः शिरसि, त्रिष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, बगलामुखी देवतायै नमः हृदि, ह्लीं बीजाय नमः गुह्ये, स्वाहा शक्तये नमः पादयो, ॐ कीलकाय नमः नाभौ, ममाभीष्टसिद्धयर्थे सर्वशत्रु-क्षयार्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।
षडङ्ग-न्यास – कर-न्यास – अंग-न्यास -
ॐ ह्लीं अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः
बगलामुखी तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा
सर्वदुष्टानां मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वषट्
वाचं मुखं पद स्तम्भय अनामिकाभ्यां नमः कवचाय हुम्
जिह्वां कीलय कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र-त्रयाय वौषट्
बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः अस्त्राय फट्

ध्यानः-
हाथ में पीले फूल, पीले अक्षत और जल लेकर ‘ध्यान’ करे -
मध्ये सुधाब्धि-मणि-मण्डप-रत्न-वेद्यां, सिंहासनोपरि-गतां परि-पीत-वर्णाम् ।
पीताम्बराभरण-माल्य-विभूषितांगीं, देवीं स्मरामि धृत-मुद्-गर-वैरि-जिह्वाम् ।।
जिह्वाग्रमादाय करेण देवीं, वामेन शत्रून् परि-पीडयन्तीम् ।
गदाभिघातेन च दक्षिणेन, पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि ।।
मानस-पूजनः- इस प्रकार ध्यान करके भगवती पीताम्बरा बगलामुखी का मानस पूजन करें -
ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (अधोमुख-कनिष्ठांगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (अधोमुख-तर्जनी-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-तर्जनी-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ रं वह्नयात्मकं दीपं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि । (ऊर्ध्व-मुख-मध्यमा-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-अनामिका-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ शं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-सर्वांगुलि-मुद्रा) ।
खड्ग-माला-मन्त्रः-
ॐ ह्लीं सर्वनिन्दकानां सर्वदुष्टानां वाचं मुखं स्तम्भय-स्तम्भय बुद्धिं विनाशय-विनाशय अपरबुद्धिं कुरु-कुरु अपस्मारं कुरु-कुरु आत्मविरोधिनां शिरो ललाट मुख नेत्र कर्ण नासिका दन्तोष्ठ जिह्वा तालु-कण्ठ बाहूदर कुक्षि नाभि पार्श्वद्वय गुह्य गुदाण्ड त्रिक जानुपाद सर्वांगेषु पादादिकेश-पर्यन्तं केशादिपाद-पर्यन्तं स्तम्भय-स्तम्भय मारय-मारय परमन्त्र-परयन्त्र-परतन्त्राणि छेदय-छेदय आत्म-मन्त्र-यन्त्र-तन्त्राणि रक्ष-रक्ष, सर्व-ग्रहान् निवारय-निवारय सर्वम् अविधिं विनाशय-विनाशय दुःखं हन-हन दारिद्रयं निवारय निवारय, सर्व-मन्त्र-स्वरुपिणि सर्व-शल्य-योग-स्वरुपिणि दुष्ट-ग्रह-चण्ड-ग्रह भूतग्रहाऽऽकाशग्रह चौर-ग्रह पाषाण-ग्रह चाण्डाल-ग्रह यक्ष-गन्धर्व-किंनर-ग्रह ब्रह्म-राक्षस-ग्रह भूत-प्रेतपिशाचादीनां शाकिनी डाकिनी ग्रहाणां पूर्वदिशं बन्धय-बन्धय, वाराहि बगलामुखी मां रक्ष-रक्ष दक्षिणदिशं बन्धय-बन्धय, किरातवाराहि मां रक्ष-रक्ष पश्चिमदिशं बन्धय-बन्धय, स्वप्नवाराहि मां रक्ष-रक्ष उत्तरदिशं बन्धय-बन्धय, धूम्रवाराहि मां रक्ष-रक्ष सर्वदिशो बन्धय-बन्धय, कुक्कुटवाराहि मां रक्ष-रक्ष अधरदिशं बन्धय-बन्धय, परमेश्वरि मां रक्ष-रक्ष सर्वरोगान् विनाशय-विनाशय, सर्व-शत्रु-पलायनाय सर्व-शत्रु-कुलं मूलतो नाशय-नाशय, शत्रूणां राज्यवश्यं स्त्रीवश्यं जनवश्यं दह-दह पच-पच सकल-लोक-स्तम्भिनि शत्रून् स्तम्भय-स्तम्भय स्तम्भनमोहनाऽऽकर्षणाय सर्व-रिपूणाम् उच्चाटनं कुरु-कुरु ॐ ह्लीं क्लीं ऐं वाक्-प्रदानाय क्लीं जगत्त्रयवशीकरणाय सौः सर्वमनः क्षोभणाय श्रीं महा-सम्पत्-प्रदानाय ग्लौं सकल-भूमण्डलाधिपत्य-प्रदानाय दां चिरंजीवने । ह्रां ह्रीं ह्रूं क्लां क्लीं क्लूं सौः ॐ ह्लीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय राजस्तम्भिनि क्रों क्रों छ्रीं छ्रीं सर्वजन संमोहिनि सभास्तंभिनि स्त्रां स्त्रीं सर्व-मुख-रञ्जिनि मुखं बन्धय-बन्धय ज्वल-ज्वल हंस-हंस राजहंस प्रतिलोम इहलोक परलोक परद्वार राजद्वार क्लीं क्लूं घ्रीं रुं क्रों क्लीं खाणि खाणि , जिह्वां बन्धयामि सकलजन सर्वेन्द्रियाणि बन्धयामि नागाश्व मृग सर्प विहंगम वृश्चिकादि विषं निर्विषं कुरु-कुरु शैलकानन महीं मर्दय मर्दय शत्रूनोत्पाटयोत्पाटय पात्रं पूरय-पूरय महोग्रभूतजातं बन्धयामि बन्धयामि अतीतानागतं सत्यं कथय-कथय लक्ष्मीं प्रददामि-प्रददामि त्वम् इह आगच्छ आगच्छ अत्रैव निवासं कुरु-कुरु ॐ ह्लीं बगले परमेश्वरि हुं फट् स्वाहा ।

विशेषः- मूलमन्त्रवता कुर्याद् विद्यां न दर्शयेत् क्वचित् ।
विपत्तौ स्वप्नकाले च विद्यां स्तम्भिनीं दर्शयेत् ।
गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः ।
प्रकाशनात् सिद्धहानिः स्याद् वश्यं मरणं भवेत् ।
दद्यात् शानताय सत्याय कौलाचारपरायणः ।
दुर्गाभक्ताय शैवाय मृत्युञ्जयरताय च ।
तस्मै दद्याद् इमं खड्गं स शिवो नात्र संशयः ।
अशाक्ताय च नो दद्याद् दीक्षाहीनाय वै तथा ।
न दर्शयेद् इमं खड्गम् इत्याज्ञा शंकरस्य च ।।
।। श्रीविष्णुयामले बगलाखड्गमालामन्त्रः ।।

25…अथ भूत भगाने का शाबर मंत्र

ॐ नमो आदेश गुरुजी को आदेश माता भभूत पिता भभूत त्रिलोक तारिणी या भभूत किसने हाणी किसने छानी महादेव ने हाणी पार्वती ने छाणी !! स्यानौनाथ चौरासी सिद्धो की भभूत इस पिण्ड के मस्तिषक चढानी चढे भभूत धर्ती पडे धाऊ रक्षा करे गुरु गोरख राऊ !! भाग भाग रे शाकनि डाकनि मडी मसाणी दैत्य दानव राग – दाग शक्ति पाताल मीन मेखला को पुत्र उत्र हाको तेरो प्राण मै गाडो पांडवी बाण सरसों चेडा मैने साधी लंका जाये रावण बांधों कौउनिकी जिउदाल काल की पाती जाग जाग रे भैरों तीन त्रिलोकी नाथ हांकती डैणी वज्र मारो फांकती डैणी वज्र मारो अंम्बादी जंम्बादी डैणी वज्र मारो जल भूत को मारो थल भूत को मारो !

ॐ नमो आदेश गुरुजी को आदेश माता भभूत पिता भभूत त्रिलोक तारिणी या भभूत किसने हाणी किसने छानी महादेव ने हाणी पार्वती ने छाणी !! स्यानौनाथ चौरासी सिद्धो की भभूत इस पिण्ड के मस्तिषक चढानी चढे भभूत धर्ती पडे धाऊ रक्षा करे गुरु गोरख राऊ !! भाग भाग रे शाकनि डाकनि मडी मसाणी दैत्य दानव राग – दाग शक्ति पाताल मीन मेखला को पुत्र उत्र हाको तेरो प्राण मै गाडो पांडवी बाण सरसों चेडा मैने साधी लंका जाये रावण बांधों कौउनिकी जिउदाल काल की पाती जाग जाग रे भैरों तीन त्रिलोकी नाथ हांकती डैणी वज्र मारो फांकती डैणी वज्र मारो अंम्बादी जंम्बादी डैणी वज्र मारो जल भूत को मारो थल भूत को मारो !!

26……मसान जगाने का शाबर मन्त्र

॥ मंत्र ॥

ॐ नमो आठ खाट की लाकड़ी।

मुंज बनी का कावा।

मुवा मुर्दा बोले।

न बोले तो महावीर कि आन।

शब्द साँचा।

पिंड कांचा।

फुरो मन्त्र ईश्वरोवाचा।

विधि: पहले कुछ सामग्री इकठी कर लो – लोबान,मिट्टी का दीपक ओर सरसों क तेल, १ बोतल सराब,लौंग, कपूर, ओर एक सेंट कि शीशी। अब शमशान में जाय और दीपक जलाऐ बैठ कर ध्यान से इस मन्त्र का ११ माला जप करो। डरावनी व् भयानक आवाजें आएंगी डरना मत ओर जप चालू रखना। सेंट का स्प्रे करदेना चारों और , फ़िर शराब छिड़क कर जप में लगे रहना फिर मसान प्रकट हो जायेगा। उसके सवागत में चमेली का पुष्प देना है ओर बाकी क समान भेंट मैं दें।

फिर अपनी मनोवांछित पूर्ति के लिये उनको बता दें।

27……प्रत्यंगिरा तन्त्र
शत्रु की प्रबल से प्रबलतम तांत्रिक क्रियाओं को वापिस
लौटने वाली एवं रक्षा करने वाली ये दिव्य
शक्ति है I परप्रयोग को नाश करने के लिए, शत्रुओं के किये-
करायों को नाश करने के लिए इस तन्त्र का प्रयोग किया जाता है I एक
तन्त्र सिद्ध एवं चलन क्रियाओं को जानने वाला तांत्रिक
ही इस विद्या का प्रयोग कर सकता है क्योंकि इस
विद्या को प्रयोग करने से पूर्व शत्रुओं के तन्त्र शक्ति,
उसकी प्रकृति एवं उसकी मारक
क्षमता का ज्ञान होना अति आवश्यक है क्योंकि साधारण युद्ध में
भी शत्रु की गति और शक्ति को न पहचानने
वाला, उसको कम आंकने वाला हमेशा मारा जाता है I फिर यह
तो तरंगों से होने वाला अदृश्य युद्ध है I
वास्तव में प्रत्यंगिरा स्वयं में शक्ति न होकर नारायण, रूद्र, कृत्य,
भद्रकाली आदि महा शक्तियों की संवाहक
है I जैसे तारें स्वयं में विद्युत् न होकर करंट
की सम्वाहिकाएँ हैं I
आईये प्रत्यंगिरा के कुछ मंत्रों को जानें एवं
अपनी रूचि अनुसार इनको साधें :
II ध्यानम् II
नानारत्नार्चिराक्रान्तं वृक्षाम्भ: स्त्रव??र्युतम् I
व्याघ्रादिपशुभिर्व्याप्तं सानुयुक्तं गिरीस्मरेत् II
मत्स्यकूर्मादिबीजाढ्यं नवरत्न समान्वितम् I
घनच्छायां सकल्लोलम कूपारं विचिन्तयेत् II
ज्वालावलीसमाक्रान्तं जग स्त्री तयमद्भुतम्
I
पीतवर्णं महावह्निं संस्मरेच्छत्रुशान्तये II
त्वरा समुत्थरावौघमलिनं रुद्धभूविदम् I
पवनं संस्मरेद्विश्व जीवनं प्राणरूपत: II
नदी पर्वत वृक्षादिकालिताग्रास संकुला I
आधारभूता जगतो ध्येया पृथ्वीह मंत्रिणा II
सूर्यादिग्रह नक्षत्र कालचक्र समन्विताम् I
निर्मलं गगनं ध्यायेत् प्राणिनामाश्रयं पदम् II
II प्रत्यंगिरा माला यन्त्र II
ॐ ह्रीं नमः कृष्णवाससेशते विश्वसहस्त्रहिं
सिनि सहस्त्रवदने महाबलेSपराजितो प्रत्यंगिरे परसैन्य परकर्म
विध्वंसिनि परमंत्रोत्सादिनि सर्वभूतदमनि सर्वदेवान् वंध बंध
सर्वविद्यां छिन्धि क्षोभय क्षोमय परयंत्राणि स्फोटय स्फोटय
सर्वश्रृंखलान् त्रोटय त्रोटय ज्वालाजिह्वे करालवदने प्रत्यंगिरे
ह्रीं नमः I
विनियोग अस्य मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषि अनुष्टप् छंद:
देवीप्रत्यंगिरा देवता ॐ बीजं,
ह्रीं शक्तिं, कृत्यानाशने जपे विनियोग: I
II ध्यानम् II
सिंहारुढातिकृष्णांगी ज्वालावक्त्रा भयंकरराम् I
शूलखड्गकरां वस्त्रे दधतीं नूतने भजे II
1 . अन्य मंत्र – ॐ ह्रीं कृष्णवाससे
नारसिंहवदे महाभैरवि ज्वल- ज्वल विद्युज्जवल ज्वालाजिह्वे
करालवदने प्रत्यंगिरे क्ष्म्रीं क्ष्म्यैम् नमो नारायणाय
घ्रिणु: सूर्यादित्यों सहस्त्रार हुं फट् I
2 . ॐ ह्रीं यां कल्ययन्ति नोSरय:
क्रूरां कृत्यां वधूमिव I
तां ब्रह्मणाSपानिर्नुद्म प्रत्यक् कर्त्तारमिच्छतु
ह्रीं ॐ II
II ध्यानम् II
खड्गचर्मधरां कृष्णाम मुक्तकेशीं विवाससम् I
दंष्ट्राकरालवदनां भीषाभां सर्वभूषणाम् I
ग्रसन्तीं वैरिणं ध्यायेत् प्रेरीतां शिवतेजसा I
II प्रत्यंगिरा मन्त्र भेदा: II
(क) ब्राह्मी प्रत्यंगिरा – ॐ आं
ह्रीं क्रों ॐ नमः कृष्णवसने सिंहवदने
महाभैरवि ज्वलज्ज्वालाजिह्वे करालवदने प्रत्यंगिरे क्ष्म्रों I
ॐ नमो नारायणाय घृणिसर्य आदित्योम् I सहस्त्रार हुं फट्
I अव ब्रह्मद्विषो जहि I
(ख) नारायणी प्रत्यंगिरा – ॐ
ह्रीं खें फ्रें भक्षज्वालाजिह्वे करालवदने
कालरात्रि प्रत्यंगिरे क्षों क्ष्म्रों ह्रीं नमस्तुभ्यं हन
हन मां रक्ष रक्ष मम शत्रून् भक्षय भक्षय हुं फट् स्वाहा I
(ग) रौद्री प्रत्यंगिरा -
श्रीं ह्रीं ॐ नमः कृष्णवाससेशते
विश्वसहस्त्रहिंसिनि सहस्त्रवदने महाबलेSपराजितो प्रत्यंगिरे
परसैन्य परकर्म विध्वंसिनि परमंत्रोत्सादिनि सर्वभूतदमनि सर्वदेवान्
वंध बंध सर्वविद्यां छिन्धि क्षोभय क्षोमय परयंत्राणि स्फोटय स्फोटय
सर्वश्रृंखलान् त्रोटय त्रोटय ज्वालाजिह्वे करालवदने प्रत्यंगिरे
ह्रीं नमः I
(घ) उग्रकृत्या प्रत्यंगिरा – ह्रीं यां कल्पयन्ति नोSरय
क्रूरां कृत्यां वधूमिव I तां ब्रह्मणाप निर्णुद्म प्रत्यक् कर्तारमिच्छ्तु
II
(ड.) अथर्वण भद्रकाली प्रत्यंगिरा – ऐं
ह्रीं श्रीं ज्वलज्ज्वालाजिह्वे करालदंष्ट्रे
प्रत्यंगिरे क्षीं ह्रीं हुं फट् I
आज के इस स्वार्थी और होड़ भरी दुनिया में
लोग अपने स्वार्थ के लिए, कभी सम्पत्ति प्राप्ति के लिए,
कभी अपने कॉम्पिटिटर को मिटाने के लिए,
कभी पद प्राप्ति के लिए, कभी मात्र
ईर्ष्या से प्रेरित होकर घातक तन्त्र प्रयोगों का अत्यधिक सहारा लेने
लगे हैं I आम आदमी तो समझ
ही नहीं पाता की आज के इस
अत्याधुनिक एवं तकनीकी युग में
भी क्या कोई इस तरह
की चीजों का सहारा लेता होगा ? लेकिन
नहीं, ये सरासर आपकी भूल है I यदि आप
भी किसी प्रकार की तन्त्र
क्रिया के शिकार हैं और बारम्बार अपनी रक्षा के लिए
उपाय करते- करते थक चुके हैं तो एक बार इस क्रिया को अवश्य
सम्पन्न करवाएं।।

28……कुछ अनुभूत टोटके :-

कौऐ का एक एक पूरा काला पंख कही से मिल जाए जो अपने आप ही निकला हो उसे “ॐ काकभूशुंडी नमः सर्वजन मोहय मोहय वश्य वश्य कुरु कुरु स्वाहा”इस मंत्र को बोलते जाए और पंख पर फूंक लगाते जाए, इस प्रकार १०८ बार करे. फिर उस पंख को आग लगा कर भस्म कर दे. उस भस्म को अपने सामने रख कर लोबान धुप दे और फिर से १०८ बाद बिना किसी माला के अपने सामने रख कर दक्षिण दिशा की और मुख कर जाप करे. इस भस्म का तिलक ७ दिन तक करे. तिलक करते समय भी मंत्र को ७ बार बोले. ऐसा करने पर सर्व जन साधक से मोहित होते है

मोर के पंख को घर के मंदिर मे रखने से समृद्धि की वृद्धि होती है.

गधे के दांत पर “ॐ नमो कालरात्रि सर्वशत्रु नाशय नमः”का जाप १०८ बार कर के उसे निर्जन स्थान मे रात्री काल मे गाड दे तो सर्व शत्रुओ से मुक्ति मिलती है.

उल्लू का पंख मिले तो उसे अपने सामने रख कर “ॐ उल्लुकाना विद्वेषय फट”का जाप १००० बार कर उसे जिस के घर मे फेंक दिया जाए वहा पर विद्वेषण होता है.

आक के रुई से दीपक बना कर उसे शिव मंदिर मे प्रज्वल्लित करने से शिव प्रस्सन होते है, ऐसा नियमित रूप से करने से ग्रह बाधा से मुक्ति मिलती है.

धतूरे की जड़ अपने आप मे महत्वपूर्ण है, इसे अपने घर मे स्थापित कर के महाकाली का पूजन कर “क्रीं” बीज का जाप किया जाए तो धन सबंधी समस्याओ से मुक्ति मिलती है..

अपने घर मे अपराजिता की बेल को उगाए, उसे रोज धुप दे कर “ॐ महालक्ष्मी वान्छितार्थ पूरय पूरय नमःका जाप १०८ बार करे तो मनोकामना की पूर्ति होती है .

निर्जन स्थान मे “प्रेत मोक्षं प्रदोमभवः”का ११ बार उच्चारण कर के खीर तथा जल रख कर आ जाए ऐसा ३ दिन करे तो मनोकामना पूर्ति मे सहायता मिलती है.

धुप करते समय चन्दन का टुकड़ा ड़ाल कर धुप करने से ग्रह प्रस्सन रहते है
किसी चेतनावान मज़ार पर मिठाई को बांटना अत्यंत ही शुभ माना गया है ऐसा विवरण कई प्राच्य ग्रंथो मे प्राप्त होता है, इससे सभी प्रकारसे उन्नति की प्राप्ति होती है.

29……।। अथ मारुति स्तोत्रम् ।।
ॐ नमो भगवते विचित्रवीरहनुमते प्रलयकालानल प्रभाप्रज्वलनाय ।
प्रतापवज्रदेहाय अंजनीगर्भसंभूताय ।
प्रकटविक्रमवीरदैत्यदानवयक्षर क्षोगणग्रहबंधनाय ।
भूतग्रहबंधनाय । प्रेतग्रहबंधनाय । पिशाचग्रहबंधनाय । शाकिनीडाकिनीग्रहबंधनाय । काकिनीकामिनीग्रहबंधनाय । ब्रह्मग्रहबंधनाय। ब्रह्मराक्षसग्रहबंधनाय । चोरग्रहबंधनाय । मारीग्रहबंधनाय । एहि एहि । आगच्छ आगच्छ । आवेशय आवेशय ।
मम हृदये प्रवेशाय प्रवेशाय । स्फुर स्फुर । प्रस्फुर प्रस्फुर । सत्यं कथय । व्याघ्रमुखबंधन सर्पमुखबंधन राजमुखबंधन राजमुखबंधन नारीमुखबंधन सभामुखबंधन शत्रुमुखबंधन सर्वमुखबंधन लंकाप्रासादभंजन ।
अमुकं मे वशमानय ।
क्लीं क्लीं क्लीं श्रीं श्रीं राजानं वशमानय श्रीं ह्रीं क्लीं स्त्रिय आकर्षय शत्रुन्मर्दय मारय मारय चूर्णय चूर्णय खे खे श्रीरामचन्द्राज्ञया मम कार्यसिद्धिं कुरु कुरु ।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रैं ह्रैं ह्रौं ह्र: फट् स्वाहा विचित्रवीर हनुमन् मम सर्वशत्रुन भस्मी कुरु कुरु । हन् हन् हुँ फट् स्वाहा ।
एकादशशतवारं जपित्वा सर्वशत्रुन् वशमानयति नान्यथा इति ।

30……भूत प्रत्यक्षिकरण साधना.

जिसका कोई वर्तमान न हो, केवल अतीत
ही हो वही भूत कहलाता है। अतीत में
अटका आत्मा भूत बन जाता है। जीवन न अतीत है और न भविष्य वह सदा वर्तमान है।जो वर्तमान में रहता है वह मुक्ति की ओर कदम बढ़ाता है ।
भूत-प्रेतों की गति एवं शक्ति अपार होती
है।इनकी विभिन्न जातियां होती हैं और
उन्हें भूत, प्रेत, राक्षस, पिशाच, यम, शाकिनी, डाकिनी, चुड़ैल, गंधर्व आदि
कहा जाता है।हिन्दू धर्म में गति और कर्म
अनुसार मरने वाले लोगों का विभाजन
किया है,आयुर्वेद के अनुसार 18 प्रकार के प्रेत होते हैं। भूत सबसे शुरुआती पद है या कहें कि जब कोई आम व्यक्ति मरता है तो सर्वप्रथम भूत ही बनता है।
इसी तरह जब कोई स्त्री मरती है तो उसे
अलग नामों से जाना जाता है। माना
गया है कि प्रसुता, स्त्री या नवयुवती
मरती है तो चुड़ैल बन जाती है और जब कोई कुंवारी कन्या मरती है तो उसे देवी कहते हैं। जो स्त्री बुरे कर्मों वाली है उसे डायन या डाकिनी करते हैं। इन सभी की उत्पति अपने पापों, व्याभिचार से, अकाल मृत्यु से या श्राद्ध न होने से होती है।
84 लाख योनियां पशुयोनि,पक्षीयोनि, मनुष्य योनि में जीवन यापन करने वाली आत्माएं मरने के बाद अदृश्य भूत-प्रेत योनि में चले जाते हैं।आत्मा के प्रत्येक जन्म द्वारा प्राप्त जीव रूप को योनि कहते हैं। प्रेतयोनि में जाने वाले लोग अदृश्य और बलवान हो जाते हैं। लेकिन सभी मरने वाले इसी योनि में नहीं जाते और सभी मरने वाले अदृश्य तो होते हैं लेकिन बलवान नहीं होते।यह आत्मा के कर्म और गति पर निर्भर करता है।बहुत से भूत या प्रेत योनि में न जाकर पुन: गर्भधारण कर मानव बन जाते हैं।
पितृ पक्ष में हिन्दू अपने पितरों का तर्पण
करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि पितरों
का अस्तित्व आत्मा अथवा भूत-प्रेत के रूप में होता है। गरुड़ पुराण में भूत-प्रेतों के विषय में विस्तृत वर्णन मिलता है। श्रीमद्भागवत पुराण में भी धुंधकारी के प्रेत बन जाने का वर्णन आता है।
पृथ्वी पर अनिष्ट शक्तियों का अस्तित्व
विभिन्न स्थानों पर होता है । जीवित और निर्जीव वस्तुओं में वे अपने लिए केंद्र बना सकती हैं । जहां वे अपनी काली शक्ति संग्रहित कर सकती हैं, उसे केंद्र कहते
है ।
केंद्र उनके लिए प्रवेश करने का स्थान
होता है तथा वे वहां से काली शक्ति ग्रहण अथवा प्रक्षेपित कर सकती हैं । अनिष्ट शक्तियां (भूत, प्रेत, पिशाच इ.)अपने लिए साधारणतः मनुष्य, वृक्ष, घर, बिजली के उपकरण आदि में केंद्र बनाती हैं। जब वे मनुष्य में अपने लिए केंद्र बनाती हैं, तब उनका उद्देश्य होता है-खाना-पीना, धूम्रपान करना तथा लैंगिक वासनाओं की पूर्ति करना अथवा लेन-देन खाता पूर्ण करना । मूलभूत वायुतत्त्व से बनने के कारण सूक्ष्म-दृष्टि के बिना उन्हें देख पाना संभव नहीं होता है इसलिये आज मै यहा अदृश्य शक्तीयो को देखने का विधान दे रहा हू।
कुत्ते, घोडे, उल्लू तथा कौए जैसे पक्षी तथा कुछ प्राणी अनिष्ट शक्तियों के अस्तित्व के संदर्भ में अधिक संवेदनशील होते हैं । रातमें जब कुत्तों का बिना किसी दृश्य कारण से अचानक भौंकना तथा रोना उनके द्वारा अनिष्ट शक्तियों के अस्तित्व को समझ पाने के कारण होता है ।
भुतोका अस्तित्व है यह बात आज अमेरिका वाले भी मानते है और हमारे देश मे तो यह मान्यता पहीले से ही है ।
साधना विधी:-
सामग्री:-भूतकेशी नामक जडि से निर्मित काजल,काली हकिक माला और भूत रक्षा कवच । विशेषता यह सामग्री आवश्यक है,बिना सामग्री के साधना करने पर सफलता प्राप्त करना मुश्किल है ।
भूतकेशी:-
यही जडि दुर्लभ है और हिमाचल प्रदेश के जंगल मे पायी जाती है,इसको घी मे पकाकर अग्नी के माध्यम से काजल निर्मित होता है ।इस जडि के काजल से अदृश्य शाक्तिया आसानी से देख सकते है क्युके इस जडि मे भूत का अस्तित्व सबसे ज्यादा होता है ।यह दिव्य काजल सिर्फ हमारे पास ही मिलता है ।
काली हकिक माला:-
यह तो आज कल मार्केट मे आसानी से मिल जाती है ।
भूत रक्षा कवच:-यह जरुरी है अन्यथा भूत-प्रेत साधक पर हमला करते है तो इसे पहेनना आवश्यक है और आप सुरक्षित रहेगे.बिना सुरक्षा कवच के साधना करना नुकसान दायक होता है ।
यह साधना तीन दिवसिय है और इसे अमावस्या के तीन दिन पूर्व शुरूवात करना होता है,आखरी दिन अमावस्या होना चाहिये ।आसन-वस्त्र-काले रंग के हो और दक्षिण दिशा के तरफ मुख होना चाहिये ।
साधना एक बंद कमरे मे करनी है जहा किसी भी प्रकार की कोई भी रोशनी ना हो सिर्फ तीव्र सुगंध युक्त अगरबत्ती जला सकते है ।साधना मे तीसरे दिन भयानक दृश्य आखो के सामने प्रकट होते है जिसे देखकर डर लगता है परंतु रक्षा कवच पहेनने के बाद डरना नही चाहिये ।
तीसरे दिन भूत प्रत्यक्ष हो तो उससे कोई भी तीन प्रकार के वचन माँगे,जिससे भूत आपका प्रत्येक कार्य पूर्ण कर दे ।
मंत्र-
ll ह्रीं क्रीं भुताय वश्यै फट

31……आप सब साधको के लिये सबसे सहज रक्षा कवच जो स्वयम् सिद्ध है क्योकि बंगाली सावर मंत्र स्व सिद्ध होते है और इनका प्रभाव वेग पूर्ण होता है और नाथ पन्थ के साधु इन्ही मंत्रो को ज्यादा प्रयोग करते है क्योकि इनके विधान सरल है काली रक्षा कवच ॐ काली काली महाकाली ! इन्द्र की बेटी ब्रह्मा की साली ! उड बैठी पीपल की डाली ! दोंनो हाथ बजावै ताली ! जहाँ जाये वज्र की ताली ! वहाँ न आये दुश्मन हाली ! दुहाई कामरू कामाक्षा नैना योगिनी की ! ईश्वर महादेव गौरा पार्वती की ! दुहाई वीर मसान की !
विधी – ७ बार पढ के ३ ताली बजाने से रक्षा होती है……

32…!!अत्यंत दुर्लभ भैरव साबर मन्त्र!! !!

!! ॐ गुरु जी सत नाम आदेश आदि पुरुष को ! काला भैरूं, गोरा भैरूं, भैरूं रंग बिरंगा !! शिव गौरां को जब जब ध्याऊं, भैरूं आवे पास पूरण होय मनसा वाचा पूरण होय आस लक्ष्मी ल्यावे घर आंगन में, जिव्हा विराजे सुर की देवी ,खोल घडा दे दड़ा !! काला भैरूं खप्पर राखे,गौरा झांझर पांव लाल भैरूं,पीला भैरूं,पगां लगावे गाँव दशों दिशाओं में पञ्च पञ्च भैरूं !! पहरा लगावे आप !दोनों भैरूं मेरे संग में चालें बम बम करते जाप !! बावन भैरव मेरे सहाय हो गुरु रूप से ,धर्म रूप से,सत्य रूप से, मर्यादा रूप से, देव रूप से, शंकर रूप से, माता पिता रूप से, लक्ष्मी रूप से,सम्मान सिद्धि रूप से, स्व कल्याण जन कल्याण हेतु सहाय हो, श्री शिव गौरां पुत्र भैरव !! शब्द सांचा पिंड कांचा चलो मंत्र ईश्वरो वाचा !! सिद्धि की द्रष्टि से इस मन्त्र का विधि विधान अलग है, परन्तु साधारण रूप में मात्र 11 बार रोज जपने की आज्ञा है ! श्री शिव पुत्र भैरव आपकी सहायत करेंगे !चार लड्डू बूंदी के ,मन्त्र बोलकर 7 रविवार को काले कुत्ते को खिलाएं !!

33…शीघ्र प्रभावी हनुमानोपासना

वेद पुराणों में हनुमान जी को अजर-अमर कहा गया है। शास्त्रों में सप्त चिरंजीवों का उल्लेख प्राप्त होता है – हनुमान, राजाबली, महामुनि व्यास, अंगद, अश्वत्थामा कृपाचार्य और विभीषण। ये सब आज भी इस धरा पर विचरण करते हैं। इनमें सर्वाधिक पूजनीय श्री हनुमानजी ही हैं। चूंकि हनुमान जी सदेह इस भूमि पर विद्यमान हैं अतः उनकी उपासना किसी भी विधि से की जाए, निश्चित रूप से फलदायी होती है। तंत्र शास्त्र के कुछ प्रयोगों में हनुमान जी के साथ साथ अंगद तथा विभीषण की साधना भी प्रचलित है। संकलित प्रयोग तंत्र की महत्वपूर्ण विद्या शाबर मंत्र का शीघ्र फलदायी प्रयोग है।

विघ्न निवारक मंत्र प्रयोग

विधान- हनुमान जी के विग्रह के सामने बैठकर ऊँ नमो हनुमन्ते भय भंजनाय सुखं कुरु कुरु फट् स्वाहा मंत्र का नित्य एक हजार आठ बार जप करें। जप लाल वस्त्र पहनकर ही करें। फिर विधिवत् पूजन तथा आरती करें। यह प्रयोग एक सौ साठ दिन तक नियमित रूप से करना चाहिए।

रोग, ग्रहदोष, शत्रुपीड़ा, ऊपरी बाधा आदि से मुक्ति और शत्रु पर विजय हेतु प्रयोग

मंत्र-

ऊँ ऐं श्रीं ह्रीं ह्रीं हं ह्रौं ह्रः ऊँ नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत-पिशाच ब्रह्म राक्षस शाकिनी डाकिनी यक्षिणी पूतना मारी-महामारी राक्षस भैरव बेताल ग्रह राक्षसादिकान् क्षणेन हन हन, भंजय भंजय मारय मारय, शिक्षय शिक्षय महा-महेश्वर रुद्रावतार ऊँ हुम् फट स्वाहा। ऊँ नमो भगवते हनुमदाख्याय रुद्राय सर्व दुष्टजन मुख स्तम्भनं कुरु स्वाहा। ऊँ ह्रीं ह्रीं हं ह्रौं ह्रः ऊँ ठं ठं ठं फट् स्वाहा।

विधि: मंगलवार को व्रत रखें और सूर्यास्त के समय पूर्ण विधि से हनुमानजी की मंदिर में पूजा करें। फिर उक्त मंत्र का सात हजार बार जप करें और अर्धरात्रि के पश्चात् दशांश हवन करें। यह प्रयोग सात मंगलवार तक करने से कार्य सिद्ध हो जाता है। प्रतिद्वंद्वी को परास्त करने के लिए इस मंत्र का विशेष महत्व है। सिर्फ हवन सामग्री में परिवर्तन किया जाता है।

शत्रु संकट निवारण हेतु

ऊँ पूर्व कपि मुखाय पंचमुख हनुमते टं टं टं टं सकल शत्रु संहारणाय स्वाहा।।

इस मंत्र का पंचमुखी हनुमान जी के मंदिर या चित्र के समक्ष नित्य जप करें तथा गुग्गुल का धूप दें। यदि गंभीर संकट या शत्रु से अधिक पीड़ा हो तो सात दिन में 27 हजार जप करके आठवें दिन मंगलवार को रात्रि में सरसों का हवन करें। इसी मंत्र को बोलते हुए स्वाहा के साथ सरसों की आहुतियां दें। 270 आहुतियां देना आवश्यक है।

अनिष्टों से रक्षा तथा भय से मुक्ति के लिए निम्नलिखित मंत्र का जप करना चाहिए।

आसन बांधू, वासन बांधू, बांधू अपनी काया।

चारि खूंट धरती के बांधू हनुमत! तोर दोहाई।।

साधारण शब्दों का यह छोटा सा मंत्र अद्भुत प्रभाव वाला दिव्य मंत्र है। इसके जप से गंभीर से गंभीर अनिष्टों से रक्षा होती है।

मंत्र की प्रयोग विधि:

हनुमान जी के मंदिर के समीप स्थित बरगद या पीपल के वृक्ष की छोटी-छोटी चार टहनियां ले लें और उसी मंदिर में हनुमान जी के समक्ष रखकर उक्त मंत्र का एक माला (108 बार) जप करें और टहनियां घर ले आएं। अगले दिन पुनः उन टहनियों को लेकर उसी मंदिर में जाएं, 108 बार उक्त मंत्र का जप करें और पुनः वापस ले आएं। ऐसा 16 दिन करें। सत्रहवें दिन उन टहनियों को अपने घर या दुकान या कार्यालय के चारों दिशाओं में गाड़ दें। एक बार में सिर्फ चार टहनियां ही अभिमंत्रित करें। यह प्रयोग स्वयं करे, किसी अन्य व्यक्ति से न कराए।
हनुमान जी को लाल धागे में बनी लाल फूलों की माला चढ़ाएं। फिर वहीं मंदिर में बैठकर उक्त मंत्र का तीन हजार दो सौ बार जप करें। फिर उस माला फूलों को सावधानी से निकाल कर मंदिर की दहलीज पर रख दें और लाल धागा घर ले आएं। रात्रि में 10 बजे के बाद उक्त धागे में सात बार बारी बारी से मंत्र बोलकर सात गांठ लगाएं। फिर इस माला को हाथ अथवा गले में धारण करें, संकटों से रक्षा होगी।
एक नींबू, पांच साबुत सुपारियां, एक हल्दी की गांठ, काजल की डिबिया, 16 साबुत काली मिर्च, पांच लौंग तथा रुमाल के आकार का लाल कपड़ा घर या मंदिर में एकांत में बैठ जाएं। उक्त मंत्र का 108 बार जप करके उक्त सामग्री को लाल कपड़े में बांध लें। इस पोटली को घर या दुकान के मुख्य द्वार पर लगा दें, संकटों से मुक्ति मिलेगी। इस प्रयोग से कर्मचारियों की कार्य क्षमता में वृद्धि होती है और स्थायित्व भी आ जाता है।
यात्रा की सफलता के लिए:

मंत्र: रामलखन कौशिक सहित, सुमिरहु करहु पयान। लच्छि लाभ लौ जगत यश, मंगल सगुन प्रमान।।

यात्रा के पहले ग्रहण काल, हनुमान जयंती, रामनवी, होली, दीपावली या नवरात्रि के अवसर पर उक्त मंत्र का हनुमान जी के मंदिर में एक हजार आठ बार जप करके उसे सिद्ध कर लें। फिर जब भी यात्रा पर जाएं, यह मंत्र सात बार बोलकर घर से निकलें। सफलता प्राप्त होगी।

अन्य मंत्र:

प्रविसि नगर कीजे सब काजा।
हृदय राखि कौसल पुर राजा।।

उक्त विधान से यह मंत्र भी सिद्ध कर लें। जिस स्थान की यात्रा करनी हो, वहां पहुंचते ही उक्त मंत्र सात बार बोलें, उस स्थान से लाभ प्राप्त होने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।

परीक्षा में सफलता तथा विद्या की प्राप्ति के लिए:

बुद्धिहीन तनु जानुकै सुमिरो पवन कुमार ।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश बिकार।।

हनुमान चालीसा का यह दोहा न सिर्फ विद्यार्थियों के लिए बल्कि हर व्यक्ति के लिए हर क्षेत्र में लाभदायक है। इसके नियमित जप से बुद्धि, बल, विद्या आदि की प्राप्ति तथा क्रोध, क्लेश, रोग-विकार आदि से बचाव होता है। किसी भी पर्व के अवसर पर श्रद्धापूर्वक हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें और फिर नित्य नियमित रूप से एक पाठ करते रहें, हनुमान जी की दिव्य कृपा प्राप्त होगी।

हनुमान जी के मंदिर में या चित्र के सामने बैठकर एकाग्रचित्त होकर हनुमान चालीसा का पाठ श्रद्धापूर्वक करने पर शुभ फल की प्राप्ति होती ही है।

शत्रु शमन के लिए उग्र प्रयोग

शत्रु शमन के लिए हनुमान जी की उग्र साधना की जाती है। इससे अकारण या ईष्र्यावश शत्रुता रखने वाले व्यक्ति की दुष्ट भावना का शमन होता है। चूंकि यह प्रयोग उग्र है इसीलिए इसे नितांत आवश्यक होने पर ही इसका उपयोग करना चाहिए। अन्यथा हानि हो सकती है। चुनाव में प्रतिद्वंद्वी को परास्त करने अथवा व्यवसाय में दूसरों से आगे निकलने के ध्येय से या फिर स्थिति सामान्य होने पर यह प्रयोग नहीं करना चाहिए।

मंत्र:

उलटंत पलटंत काया। जागुवीर हनुमन्त आसा चकर पर चकर फिरे, सुरबोना चलय, डाकिनी चलय, शाकिनी चलय, जोगिनी चलय। बज्र को डण्डा लैकाल मारौ। महावीर हनुमान साहब मेरा शत्रु मार काडो। शत्रु दुष्टमति फैरी डालो। गुरु की शक्ति। फुरो मंत्र हनमानौवाच।

पहले पर्वकाल में उक्त मंत्र का दस हजार बार जप करें। फिर गुग्गुल व गाय के घी से उक्त मंत्र की एक हजार आहुतियां दें, वांछित फल मिलेगा।

प्रयोग विधि: एक नींबू में बबूल के सात कांटे मंत्र से लगाने हैं। प्रत्येक कांटे पर इक्कीस बार उक्त मंत्र का जप करके ही नींबू में कांटे गाड़ें। यह क्रिया करते समय ‘मेरा शत्रु अमुक (अमुक के स्थान पर शत्रु का नाम लें) मार काडो’ की प्रार्थना करें। फिर यह नींबू शत्रु के घर में डाल दें, शत्रु की मति आपके पक्ष में हो जाएगी। यह प्रयोग कुतूहलवश या जांच के लिए नहीं करें।

34…उच्छिष्ट गणपति मंत्र साधना.
उच्छिष्ट गणपति साधना करने में अत्यन्त सरल, शीघ्र फल को प्रदान करने वाला, अन्न और धन की वृद्धि के लिए, वशीकरण को प्रदान करने वाला भगवान गणेश जी का ये दिव्य तांत्रिक साधना है । इसकी साधना करते हुए मुह को जूठा रखा जाता है एवं सुबह दातुन भी करना वर्जित है ।
उच्छिष्ट गणपति साधना को जीवन की पूर्ण साधना कहा है। मात्र इस एक साधना से जीवन में वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है, जो अभीष्ट लक्ष्य होता है। अनेक इच्छाएं और मनोरथ पूरे होते हैं। इससे समस्त कर्जों की समाप्ति और दरिद्रता का निवारण,निरंतर आर्थिक-व्यापारिक उन्नति,लक्ष्मी प्राप्ति,रोजगार प्राप्ति,भगवान गणपति के प्रत्यक्ष दर्शनों की संभावना भी है। यह साधना किसी भी बुधवार को रात्री मे संपन्न किया जा सकता है।
साधक निम्न सामग्री को पहले से ही तैयार कर लें, जिसमें जल पात्र, केसर, कुंकुम, चावल, पुष्प, माला, नारियल, दूध,गुड़ से बना खीर, घी का दीपक, धूप-अगरबत्ती, मोदक आदि हैं। इनके अलावा उच्छिष्ट गणपति यंत्र और मुंगे की माला की आवश्यकता होती ही है।
सर्वप्रथम साधक, स्नान कर,लाल वस्त्र पहन कर,आसन भी लाल रंग का हो, पूर्व/उत्तर की ओर मुख कर के बैठ जाए और सामने उच्छिष्ट गणपति सिद्धि यंत्र को एक थाली में, कुंकुम से स्वस्तिक बनाकर, स्थापित कर ले और फिर हाथ जोड़ कर भगवान गणपति का ध्यान करें।

विनियोग :
ॐ अस्य श्रीउच्छिष्ट गणपति मंत्रस्य कंकोलऋषि:, विराट छन्द : उच्छिष्टगणपति देवता सर्वाभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोग: ।

ध्यान मंत्र:
सिंदुर वर्ण संकाश योग पट समन्वितं लम्बोदर महाकायं मुखं करि करोपमं अणिमादि गुणयुक्ते अष्ट बाहुत्रिलोचनं विग्मा विद्यते लिंगे मोक्ष कमाम पूजयेत।
ध्यान मंत्र बोलने के बाद अपना कोइ भी एक इच्छा बोलकर यंत्र पर एक लाल रंग का पुष्प अर्पित करे।

द्वादशाक्षर मन्त्र :
।। ॐ ह्रीं गं हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा ।।
मंत्र का नित्य 21 माला जाप 11 दिनो तक करना है।

अंत में अनार का बलि प्रदान करें।
बलि मंत्र:-
।। ॐ गं हं क्लौं ग्लौं उच्छिष्ट गणेशाय महायक्षायायं बलि: ।।

अगर किसी पर तांत्रोत्क भूत-प्रेत-पिशाच,कलवा-स्मशानी-जिन-जिन्नात-कृत्या-मारण जैसे अभिचार प्रयोग हुआ हो तो उच्छिष्ट गणपति शत्रु की गन्दी क्रियाओं को नष्ट करके रक्षा करते हैं । यदि आप भी तन्त्र द्वारा परेशान हैं तो “शाबर मंत्र विग्यान संस्था” के द्वारा यह तांत्रिक साधना उचित न्योच्छावर राशि दान स्वरुप मे देकर सम्पन्न करवा सकते हैं या स्वयं आप यह साधना विधान सम्पन्न कर सकते है। आपसे प्राप्त धनराशि गरीब किसानो के मदत हेतु हमारे सन्स्थान के तरफ उन्हें सहायता हेतु प्रदान किया जायेगा।
अंत में शुद्ध घृत से भगवान गणपति की आरती संपन्न करें और प्रसाद वितरित करें। इस प्रकार से साधक की मनोवांछित कामनाएं निश्चय ही पूर्ण हो जाती हैं और कई बार तो यह प्रयोग संपन्न होते ही साधक को अनुकूल फल प्राप्त हो जाता है।
कलियुग मे यह साधना शिघ्र फलदायी माना जाता है।

35…॥ मंत्र ॥
ॐ एक ठो सरसों।
सोला राई।
मोरो पटवल को रोजाई।
खाय खाय पडे भार।
जे करै ते मरे।
उल्ट विद्या ताही पर पड़े।
शब्द साँचा।
पिंड कांचा।
हनुमान का मंत्र साँचा।
फुरो मन्त्र ईश्वरोवाचा।
विधि: ग्रहण काल, य दिवाली ओर होली कि रात में 21 माला जप कर मन्त्र को सिद्ध कर लो.

अब जब भि जरूरत हो तब हि एक हाथ में सरसों, नमक, ओर राई लेकर सात बार मन्त्र को जपते हुए, सात बार पीडित व्यक्ति के ऊपर से घूमा कर आग मैं झटके से डाल दें, वशीकरण या तांत्रिक कर्म वापिस उल्टा जिसने किया या करवाया है उसी पर वार करेगा।

36……हनुमान शाबर मन्त्र
॥ मंत्र ॥
हनुमान जाग ।
किलकारी मार ।
तू हुंकारे।
राम काज सँवारे।
ओढ़ सिंदूर सीता मैया का।
तू प्रहरी राम द्वारे।
में बुलाऊँ , तु अब आ।
राम गीत तु गाता आ।
नहीं आये तो हनुमाना।
श्री राम जी ओर सीता मैया कि दुहाई।
शब्द साँचा।
पिंड कांचा।
फुरो मन्त्र ईश्वरोवाचा।

विधि: २१ माला प्रत्येक मंगलवार को सूर्योदय से पहले। ११ मंगलवार तक ये अनुष्ठान करना है। हनुमान जि कि पूजा देना है, जैसा पहले मंत्रो मैं दिया गय है. जब बाबा उपस्थित हो तो वार मांग लेना है।

37……भारत में बहुत-सी ऐसी साधनाएं है जिनका धर्म से कोई नाता नहीं और कुछ का है। तांत्रिक साधनाओं को नकारात्मक या वाम साधनाओं की श्रेणी में रखा जाता है। गायत्री और योगसम्मत दक्षिणमार्गी साधनाएं होती है वैसे ही उनसे अलग तंत्रोक्त साधनाएं भी होती है। हालांकि तांत्रिक साधनाओं के अलावा ऐसी भी साधनाएं हैं जिनको धर्म में निषेध माना गया है। शैव, शाक्त और नाथ संप्रदाय में सभी तरह की साधनाओं का प्रचलन है।

तंत्र साधना में शांति कर्म, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन और मारण नामक छ: तांत्रिक षट् कर्म होते हैं। इसके अलावा नौ प्रयोगों का वर्णन मिलता है:- मारण, मोहनं, स्तंभनं, विद्वेषण, उच्चाटन, वशीकरण, आकर्षण, यक्षिणी साधना, रसायन क्रिया तंत्र के ये नौ प्रयोग हैं।

उक्त सभी को करने के लिए अन्य कई तरह के देवी-देवताओं की साधना की जाती है। अघोरी लोग इसके लिए शिव साधना, शव साधना और श्मशान साधना करते हैं। बहुत से लोग भैरव साधना, नाग साधना, पैशाचिनी साधना, यक्षिणी साधा या रुद्र साधना करते हैं।

हमने खोजी है ऐसी 10 तरह की साधनाएं जिनके बारे में कहा जाता है कि जिनको करने से आपका जीवन सफल भी हो सकता है या बर्बाद भी। इन साधनाओं को करने में बहुत सावधानी और हिम्मत की जरूरत होती है। हालांकि कोई ऐसी साधना क्यूं करता है यह एक सवाल हो सकता है। आओ जानते हैं 10 तरह की खतरनाक साधनाओं के बारे में।

नवदुर्गा साधना:

माता दुर्गा की यह सात्विक साधना होती है जिसे नवरात्रि में किया जाता है। ये नौ दुर्गा है- 1.शैलपुत्री, 2.ब्रह्मचारिणी, 3.चंद्रघंटा, 4.कुष्मांडा, 5.स्कंदमाता, 6.कात्यायनी, 7.कालरात्रि, 8.महागौरी और 9.सिद्धिदात्री। लेकिन हम यहां आपको बताना चाहते हैं 10 महाविद्या के बारे में।

दिव्योर्वताम सः मनस्विता: संकलनाम।
त्रयी शक्ति ते त्रिपुरे घोरा छिन्न्मस्तिके च।।

10 महाविद्या की साधनाएं: माता दुर्गा की एक सात्विक साधना होती है जिसे नवरात्रि में किया जाता है। नवरात्रि समाप्त होने के बाद गुप्त नवरात्रि शुरू होती है तब 10 महाविद्याओं की साधना की जाती है। आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली नवरात्र को गुप्त नवरात्र कहा जाता है। गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है।

पिशाचिनी या पैशाचिनी साधनाएं:

पिशाची देवी ही पिशाचिनी साधनाओं की अधिष्ठात्री देवी है। यह हमारे हृदय चक्र की देवी है। इसे बहुत ही खतरनाक तरह की साधनाएं माना जाता है। किसी भी एक पिशाचिनी की साधना करने के बाद व्यक्ति को चमत्कारिक सिद्धि प्राप्त हो जाती है। पिशाचिनी साधना में कर्ण पिशाचिनी, काम पिशाचिनी आदि का नाम प्रमुख है। पिशाच शब्द से यह ज्ञात होता है कि यह किसी खतरनाक भूत या प्रेत का नाम है लेकिन ऐसा नहीं है। यह साधनाएं भी तंत्र के अंतर्गत आती है।

कर्ण पिशाचिनी साधना को सिद्ध करने के बाद साधक में वो शक्ति आ जाती है कि वह सामने बैठे व्यक्ति की नितांत व्यक्तिगत जानकारी भी जान लेता है। कर्ण पिशाचिनी साधक को किसी भी व्यक्ति की किसी भी तरह की जानकारी कान में बता देती है। इस साधना की सिद्धि के पश्चात् किसी भी प्रश्न का उत्तर कोई पिशाचिनी कान में आकर देती है अर्थात् मंत्र की सिद्धि से पिशाच-वशीकरण होता है। मंत्र की सिद्धि से वश में आई कोई आत्मा कान में सही जवाब बता देती है। पारलौकिक शक्तियों को वश में करने की यह विद्या अत्यंत गोपनीय और प्रामाणिक है।

भैरव साधना:

भगवान भैरव की साधनाएं भी कई तरह की होती है। उनमें सबसे प्रमुख है काल भैरव और बटुक भैरव साधनाएं। इसके अलावा उग्र भैरव, असितंग भैरव, क्रोध भैरव, स्वर्णाकर्षण भैरव, भैरव-भैरवी आदि साधनाएं भी होती है।

भैरव को शिव का रुद्र अवतार माना गया है। तंत्र साधना में भैरव के आठ रूप भी अधिक लोकप्रिय हैं- 1.असितांग भैरव, 2. रु-रु भैरव, 3. चण्ड भैरव, 4. क्रोधोन्मत्त भैरव, 5. भयंकर भैरव, 6. कपाली भैरव, 7. भीषण भैरव तथा 8. संहार भैरव। आदि शंकराचार्य ने भी ‘प्रपञ्च-सार तंत्र’ में अष्ट-भैरवों के नाम लिखे हैं। तंत्र शास्त्र में भी इनका उल्लेख मिलता है। इसके अलावा सप्तविंशति रहस्य में 7 भैरवों के नाम हैं। इसी ग्रंथ में दस वीर-भैरवों का उल्लेख भी मिलता है। इसी में तीन बटुक-भैरवों का उल्लेख है। रुद्रायमल तंत्र में 64 भैरवों के नामों का उल्लेख है।

योगिनी साधनाएं:

समस्त योगिनियों का संबंध आदि शक्ति काली के कुल से है। घोर नामक दैत्य से साथ युद्ध के समय आदि शक्ति काली ने ही समस्त योगिनियों के रूप में अवतार लिया था। महा विद्याएं, सिद्ध विद्याएं भी योगनियों की ही श्रेणी में आती हैं ये भी आद्या शक्ति काली के ही भिन्न भिन्न अवतारी अंश हैं। समस्त योगिनियां, अपने अंदर नाना प्रकार के अलौकिक शक्तिओं से सम्पन्न हैं तथा इंद्रजाल, जादू, वशीकरण, मारण, स्तंभन इत्यादि कर्म इन्हीं की कृपा द्वारा ही सफल हो पाते हैं। मुख्य रूप से योगिनियां अष्ट योगिनी तथा चौसठ योगिनी के नाम से जानी जाती हैं, जो अपने गुणों तथा स्वभाव से भिन्न-भिन्न रूप धारण करती हैं।

अष्ट योगिनियां- 1. सुर-सुंदरी योगिनी, 2. मनोहरा योगिनी 3. कनकवती योगिनी 4. कामेश्वरी योगिनी, 5. रति सुंदरी योगिनी 6. पद्मिनी योगिनी 7. नतिनी योगिनी और 8. मधुमती योगिनी हैं।

चौसठ योगिनी- १.बहुरूप, २.तारा, ३.नर्मदा, ४.यमुना, ५.शांति, ६.वारुणी, ७.क्षेमंकरी, ८.ऐन्द्री, ९.वाराही १०.रणवीरा, ११.वानर-मुखी, १२.वैष्णवी, १३.कालरात्रि, १४.वैद्यरूपा, १५.चर्चिका, १६.बेतली १७.छिन्नमस्तिका, १८.वृषवाहन, १९.ज्वाला कामिनी, २०.घटवार, २१.कराकाली, २२.सरस्वती, २३. बिरूपा, २४.कौवेरी, २५.भलुका, २६.नारसिंही, २७.बिरजा, २८.विकतांना, २९.महालक्ष्मी, ३०.कौमारी, ३१.महामाया, ३२.रति, ३३.करकरी, ३४.सर्पश्या, ३५.यक्षिणी, ३६.विनायकी, ३७.विंद्यावालिनी, ३८.वीर कुमारी, ३९.माहेश्वरी, ४०.अम्बिका, ४१.कामिनी, ४२. घटाबरी, ४३. स्तुती, ४४. काली, ४५. उमा, ४६.नारायणी, ४७.समुद्र, ४८.ब्रह्मिनी, ४९.ज्वालामुखी, ५०.आग्नेयी, ५१.अदिति, ५२.चन्द्रकान्ति, ५३. वायुवेगा, ५४.चामुण्डा, ५५.मूरति, ५६.गंगा, ५७.धूमावती, ५८.गांधार, ५९.सर्व मंगला, ६०.अजिता, ६१.सूर्य पुत्री, ६२.वायु वीणा, ६३.अघोर और ६४.भद्रकाली हैं।

यक्ष और यक्षिणी:

यक्ष की स्त्रियों को यक्षिणियां कहते हैं। ये भी कई प्रकार के होते हैं जो भूमि में गड़े हुए खजाने आदि के रक्षक हैं, इन्हें निधि पति भी कहा जाता हैं। इनके सर्वोच्च स्थान पर निधि पति ‘कुबेर’ विराजित हैं तथा देवताओं के निधि के रक्षक हैं।

ये देहधारी होते हुए भी सूक्ष्म रूप से युक्त होकर जहां चाहे वहां विचरण कर सकते हैं। इनका प्रमुख कर्म धन से संबंधित हैं, ये गुप्त धन या निधियों की रक्षा करते हैं तथा समृद्धि, वैभव, राज पाट के स्वामी हैं। आदि काल से ही, मनुष्य धन से सम्पन्न होने हेतु, अपने धन की रक्षा हेतु, यक्षों की अराधना करते आए हैं। भिन्न-भिन्न यक्षों की प्राचीन पाषाण प्रतिमा भारत के विभिन्न संग्रहालयों में आज भी सुरक्षित हैं, जो खुदाई से प्राप्त हुए हैं।

तंत्रो के अनुसार, रतिप्रिया यक्षिणी, साधक से संतुष्ट होने पर 25 स्वर्ण मुद्राएं प्रदान करती हैं। इसी तरह सुसुन्दरी यक्षिणी, धन तथा संपत्ति सहित, पूर्णायु, अनुरागिनी यक्षिणी, 1000 स्वर्ण मुद्राएं, जलवासिनी यक्षिणी, भिन्न प्रकार के नाना रत्नों को, वटवासिनी यक्षिणी, नाना प्रकार के आभूषण तथा वस्त्र को प्रदान करती हैं। तंत्र ग्रंथों में यक्षिणी तथा यक्ष के साधना के विस्तृत विवरण मिलते हैं।

प्रमुख यक्षिणियां है – 1. सुर सुन्दरी यक्षिणी, 2. मनोहारिणी यक्षिणी, 3. कनकावती यक्षिणी, 4. कामेश्वरी यक्षिणी, 5. रतिप्रिया यक्षिणी, 6. पद्मिनी यक्षिणी, 7. नटी यक्षिणी और 8. अनुरागिणी यक्षिणी।

अप्सरा साधना:

हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार अप्सरा देवलोक में रहने वाली अनुपम, अति सुंदर, अनेक कलाओं में दक्ष, तेजस्वी और अलौकिक दिव्य स्त्री है। वेद और पुराणों में उल्लेख मिलता है कि देवी, परी, अप्सरा, यक्षिणी, इन्द्राणी और पिशाचिनी आदि कई प्रकार की स्त्रियां हुआ करती थीं। उनमें अप्सराओं को सबसे सुंदर और जादुई शक्ति से संपन्न माना जाता है।

अप्सरा साधना : माना जाता है कि अप्सराएं गुलाब, चमेली, रजनीगंधा, हरसिंगार और रातरानी की गंध पसंद करती है। वे बहुत सुंदर और लगभग 16-17 वर्ष की उम्र समान दिखाई देती है। अप्सरा साधना के दौरान साधक को अपनी यौन भावनाओं पर संयम रखना होता है अन्यथा साधना नष्ट हो सकती है। संकल्प और मंत्र के साथ जब साधना संपन्न होती है तो अप्सरा प्रकट होती है तब साधन उसे गुलाब के साथ ही इत्र भेंट करता है। उसे फिर दूध से बनी मिठाई, पान आदि भेंट दिया जाता है और फिर उससे जीवन भर साथ रहने का वचन लिया जाता है। ये चमत्कारिक शक्तियों से संपन्न अप्सरा आपकी जिंदगी को सुंदर बनाने की क्षमता रखती है।

कितनी हैं अप्सराएं : शास्त्रों के अनुसार देवराज इन्द्र के स्वर्ग में 11 अप्सराएं प्रमुख सेविका थीं। ये 11 अप्सराएं हैं- कृतस्थली, पुंजिकस्थला, मेनका, रम्भा, प्रम्लोचा, अनुम्लोचा, घृताची, वर्चा, उर्वशी, पूर्वचित्ति और तिलोत्तमा। इन सभी अप्सराओं की प्रधान अप्सरा रम्भा थी।

अलग-अलग मान्यताओं में अप्सराओं की संख्या 108 से लेकर 1008 तक बताई गई है। कुछ नाम और- अम्बिका, अलम्वुषा, अनावद्या, अनुचना, अरुणा, असिता, बुदबुदा, चन्द्रज्योत्सना, देवी, घृताची, गुनमुख्या, गुनुवरा, हर्षा, इन्द्रलक्ष्मी, काम्या, कर्णिका, केशिनी, क्षेमा, लता, लक्ष्मना, मनोरमा, मारिची, मिश्रास्थला, मृगाक्षी, नाभिदर्शना, पूर्वचिट्टी, पुष्पदेहा, रक्षिता, ऋतुशला, साहजन्या, समीची, सौरभेदी, शारद्वती, शुचिका, सोमी, सुवाहु, सुगंधा, सुप्रिया, सुरजा, सुरसा, सुराता, उमलोचा आदि।

वीर या बीर साधना:

सभी वीरों की शक्तियां एक-दूसरे से भिन्न हैं। ये अलग-अलग शक्तियों से संपन्न होते हैं। गुप्त नवरात्रि में और कुछ विशेष दिनों में वीर साधना की जाती है। वीर साधना को तांत्रिक साधना के अंतर्गत माना गया है। मूलत: 52 वीर हैं।

वीरों के विषय में सर्वप्रथम पृथ्वीराज रासो में उल्लेख है। वहां इनकी संख्या 52 बताई गई है। इन्हें भैरवी के अनुयायी या भैरव का गण कहा गया है। इन्हें देव और धर्मरक्षक भी कहा गया है। मूलत: ये सभी कालिका माता के दूत हैं। उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब आदि प्रांतों में कई वीरों की मंदिरों में अन्य देवी और देवताओं के साथ प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। राजस्थान में जाहर वीर, नाहर वीर, वीर तेजाजी महाराज आदि के नाम प्रसिद्ध हैं।

कहते हैं कि वीर साधना एक बंद कमरे में, श्मशान में या किसी एकांत स्थान पर की जाती है, जहां कोई आता-जाता न हो। कई दिन, कई रातों तक महाकाली की पूजा करने के पश्चात कहा जाता है कि पूजा के दौरान एक ऐसा क्षण आता है, जब काली के दूत सामने आते हैं और साधक की मनोकामना पूर्ण करते हैं। वीर साधना को तांत्रिक साधना के अंतर्गत माना जाता है इसलिए ध्यान रहे कि यह साधना किसी गुरु या जानकार से पूछकर ही करें।

गंधर्व साधना:

गंधर्वों को देवताओं का साथी माना गया है। गंधर्व विवाह, गंधर्व वेद और गंधर्व संगीत के बारे में आपने सुना ही होगा। एक राजा गंधर्वसेभी हुए हैं जो विक्रमादित्य के पिता थे। गंधर्व नाम से देश में कई गांव हैं। गांधार और गंधर्वपुरी के बारे में भी आपने सुना ही होगा। दरअसल, गंधर्व नाम की एक जाति प्राचीनकाल में हिमालय के उत्तर में रहा करती थी। उक्त जाति नृत्य और संगीत में पारंगत थी। वे सभी इंद्र की सभा में नृत्य और संगीत का काम करते थे।

गन्धर्व नाम से एक अकेले देवता थे, जो स्वर्ग के रहस्यों तथा अन्य सत्यों का उद्घाटन किया करते रहते थे। वे देवताओं के लिए सोम रस प्रस्तुत करते थे। विष्णु पुराण के अनुसार वे ब्रह्मा के पुत्र थे और चूंकि वे मां वाग्देवी का पाठ करते हुए जन्मे थे, इसीलिए उनका नाम गंधर्व पड़ा। दरअसल, ऋषि कश्यप की पत्नी अरिष्ठा से गंधर्वों का जन्म हुआ। अथर्ववेद में ही उनकी संख्या 6333 बतायी गई है।

नाग और सर्प साधनाएं:

हिन्दू धर्म में नाग और सर्प को चमत्कारिक माना जाता है। नाग और सर्प में दिव्य आत्माएं निवास करती हैं। प्राचीनकाल में नाग नामक एक रहस्यमयी जाती हुआ करती थी। प्रजापकित कश्यप की पत्नी कद्रू से नागों की उत्पत्ति हुई है। नागों में प्रमुख- अनंत (शेष), वासुकी, तक्षक, कार्कोटक और पिंगला- उक्त पांच नागों के कुल के लोगों का ही भारत में वर्चस्व था। यह सभी कश्यप वंशी थे। इन्ही से नागवंश चला।

नाग से संबंधित कई बातें आज भारतीय संस्कृति, धर्म और परम्परा का हिस्सा बन गई हैं, जैसे नाग देवता, नागलोक, नागराजा-नागरानी, नाग मंदिर, नागवंश, नाग कथा, नाग पूजा, नागोत्सव, नाग नृत्य-नाटय, नाग मंत्र, नाग व्रत और अब नाग कॉमिक्स।

ग्रामिण क्षेत्रों में बहुत से लोगों के शरीर में नागदेवता आकर लोगों की समस्या का समाधान करते हैं। सर्पो तथा नागों ने देवताओं की कठिन साधना, तपस्या की तथा उन के निकट का ही विशेष पद भी प्राप्त किया। आज भी नागों की कई आलौकिक शक्तियां विचरण कर रही है। नागों के आह्‍वान और उनकी साधना करके मनचाही सफलता और मनोकामना पाई जाती है। नाग पूजा और साधना के विशेष दिन होते हैं।

कद्रू को नागों की माता कहा गया है। देवी मनसा, जो भगवान शिव की बेटी हैं, उन्हें भी नाग माता कहा जाता हैं, जिनका विवाह जरत्कारू नाम के ऋषि के साथ हुआ था। जनमेजय द्वारा सर्पों के नाश के लिए किए गए यज्ञ से सर्पों की रक्षा की थी देवी मनसा के पुत्र आस्तिक ने।

सर्प प्रजाति के मुख्य 12 सर्प हैं जीने के नाम – 1. अनंत 2. कुलिक 3. वासुकि 4. शंकुफला 5. पद्म 6. महापद्म 7. तक्षक 8. कर्कोटक 9. शंखचूड़ 10. घातक 11. विषधान 12. शेष नाग।

किन्नर और किन्नरियां साधना:

प्राचीनकाल में देवाताओं के साथ जहां गंधर्व रहते थे वहीं एक दूसरे क्षेत्र में किन्नर जाति के लोग भी रहते थे। किन्नर जाति के लोग पहाड़ी क्षेत्र में रहते थे। ये लोग अपने अनुपम तथा मनमोहक सौन्दर्य के लिए प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध हैं।

किन्नरों को मृदुभाषी तथा गायन में निपुण माना गया है। हिन्दू तंत्र ग्रंथों में किन्नरियों को विशेष स्थान प्राप्त है। किन्नरियों में रूप परिवर्तन की अद्भुत काला होती है। गायन तथा सौंदर्यता हेतु इनकी साधना विशेष लाभप्रद हैं। परिणामस्वरूप प्राचीन काल से किन्नरियों की साधना ऋषि मुनियों द्वारा की जाती हैं। किन्नरियों का वरदान अति शीघ्र तथा सरलता से प्राप्त हो जाता हैं।

माना जाता है कि प्रमख रूप से छह किन्नरियों का समूह है – 1. मनोहारिणी किन्नरी 2. शुभग किन्नरी 3. विशाल नेत्र किन्नरी 4. सुरत प्रिय किन्नरी 5. सुमुखी किन्नरी और 6. दिवाकर मुखी किन्नरी।

नायिका साधना:

यक्षिणियां तथा अप्सराओं की उपजाति में नायिकाएं आती हैं। यह भी यक्षिणियों और अप्सराओं की तरह मन मुग्ध करने वाले सौन्दर्य से परिपूर्ण होती है। इनकी साधना वशीकरण तथा सुंदरता प्राप्ति हेतु की जाती हैं।

माना जाता है कि नारियों को आकर्षित करने का हर उपाय इनके पास हैं। ये मुख्यतः 8 हैं- 1. जया 2. विजया 3. रतिप्रिया 4. कंचन कुंडली 5. स्वर्ण माला 6. जयवती 7. सुरंगिनी 8. विद्यावती। इन नायिकाओं का भी इस्तेमाल देवता लोग ऋषि-मुनियों की तपस्या भंग करने के लिए किया करते थे।

अन्य साधनाएं: इसके अलावा डाकिनी-शाकिनी, विद्याधर, सिद्ध, दैत्य, दानव, राक्षस, गुह्मक, भूत, वेताल, अघोर और रावण आदि की साधना भी होती है। वैसे हम यहां साबर साधना के बारे में बता रहे हैं। यह साधाना तुरंत सिद्ध होने वाली और असरकारक होती है। साबर साधनाएं कई प्रकार की होती है।

साबर साधनाएं:

वैदिक अथवा तांत्रोक्त अनेक ऐसे मंत्र हैं, जिसमें साधना करने के लिए अत्यंत सावधानी की जरूरत होती है। असावधानी से कार्य करने पर प्रभाव प्राप्त नहीं होता अथवा सारा श्रम व्यर्थ चला जाता है, परंतु शाबर मंत्रों की साधना या सिद्धि में ऐसी कोई आशंका नहीं होती। यह सही है कि इनकी भाषा सरल और सामान्य होती है। माना जाता है कि लगभग सभी साबर साधनाओं और मंत्रों का अविष्कार गुरु गोरखनाथ ने किया है।

।। ओम गुरुजी को आदेश गुरजी को प्रणाम, धरती माता धरती पिता, धरती धरे ना धीरबाजे श्रींगी बाजे तुरतुरि आया गोरखनाथ मीन का पुत मुंज का छड़ा लोहे का कड़ा हमारी पीठ पीछे यति हनुमंत खड़ा, शब्द सांचा पिंड काचा फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा।।

इस मन्त्र को सात बार पढ़ कर चाकू से अपने चारों तरफ रक्षा रेखा खींच ले गोलाकार, स्वयं हनुमानजी साधक की रक्षा करते हैं। शर्त यह है कि मंत्र को विधि विधान से पढ़ा गया हो।

साबर मंत्रों को पढ़ने पर ऐसा कुछ भी अनुभव नहीं होता कि इनमें कुछ विशेष प्रभाव है, परंतु मंत्रों का जप किया जाता है तो असाधारण सफलता दृष्टिगोचर होती है। कुछ मंत्र तो ऐसे हैं कि जिनको सिद्ध करने की जरूरत ही नहीं है, केवल कुछ समय उच्चारण करने से ही उसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देने लगता है। यदि किसी मंत्र की संख्या निर्धारित नहीं है तो मात्र 1008 बार मंत्र जप करने से उस मंत्र को सिद्ध समझना चाहिए।

दूसरी बात शाबर मंत्रों की सिद्धि के लिए मन में दृढ़ संकल्प और इच्छा शक्ति का होना आवश्यक है। जिस प्रकार की इच्छा शक्ति साधक के मन में होती है, उसी प्रकार का लाभ उसे मिल जाता है। यदि मन में दृढ़ इच्छा शक्ति है तो अन्य किसी भी बाह्य परिस्थितियों एवं कुविचारों का उस पर प्रभाव नहीं पड़ता है।

आप हमारे यहा से व्यापार वृर्दि यंत्र . धनाधीशकुबेरदेवता यंत्र . बगलामुखी यंत्र . श्री यंत्र .  शत्रु नाशक यंत्र . आर्थिक स्थिति में सुधार यंत्र . कर्ज मुक्ति यंत्र . सम्पूर्णवास्तु दोष निवारण यंत्र. सर्वकार्य सिद्धि यंत्र . वशीकरण यंत्र  . नवगग्रह यंत्र  . ऑर तंत्र व नकारात्मक ऊर्जा दूर करने का उपाय जाने . रक्षा मंत्र यंत्र  .विशेष सामग्री से प्रेत बाधा से ग्रस्त घर में धूनी दें, प्रेत बाधा, क्लेशादि दूर होंगे और परिवार में शांति और सुख का वातावरण उत्पन्न होगा। व्यापार स्थल पर यह सामग्री धूनी के रूप में प्रयोग करें, व्यापार में उन्नति होगी।

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