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बाबा कीनाराम – संक्षिप्त जीवन परिचय

बाबा किनाराम !
बाबा किनाराम उत्तर भारतीय संत परंपरा के एक प्रसिद्ध संत जिनकी यश: सुरभि परवर्त्ती काल में संपूर्ण भारत में फैल गई। वाराणसी की चंदोली तहसील के ग्राम रामगढ़ में एक कुलीन रघुवंशी क्षत्रिय परिवार में संवत्‌ 1684 वि0 में इनका जन्म हुआ। बचपन से ही आध्यात्मिक संस्कार अत्यंत प्रबल थे। तत्कालीन रीत्यनुसार बारह वर्षों की अल्प वय में, इनकी घोर अनिच्छा रहते हुए भी, विवाह कर दिया गया किंतु दो तीन वर्षों बाद द्विरागमन की पूर्व संध्या को इन्होंने हठपूर्वक माँ से माँगकर दूध भात खाया। उन दिनों दूध भात मृतक संस्कार के बाद अवश्य खाया जाता था। दूसरे दिन सबेरे ही वधू के देहांत का समाचार आ गया। सबको आश्चर्य हुआ कि इन्हें पत्नी की मृत्यु का पूर्वाभास कैसे हो गया।
यह विरक्त तो रहते ही थे, घर से भी निकल पड़े और घूमते-फिरते गाजीपुर जिले के कारों ग्राम में रामानुजी महात्मा शिवाराम की सेवा में पहुँचे। कुछ समय बाद दीक्षा देने के पूर्व महात्मा जी ने परीक्षार्थ इनसे स्नान ध्यान के सामान लेकर गंगातट पर चलने को कहा। यह शिवाराम जी की पूजनादि की सामग्री लेकर गंगातट से कुछ दूर पहुँच कर रुक गए तथा गंगाजी को झुककर प्रणाम करने लगे। जब सिर उठाया तब देखा कि भागीरथी का जल बढ़कर इनके चरणों तक पहुँच गया है। इन्होंने इस घटना को गुरु की महिमा मानी। शिवाराम जी दूर से यह सब देख रहे थे। उन्होंने किशोर किनाराम को असामान्य सिद्ध माना तथा मंत्र दीक्षा दी। पत्नी की मृत्यु के बाद शिवाराम जी ने जब पुनर्विवाह किया तब किनाराम जी ने उन्हें छोड़ दिया। घूमते-घामते नईडीह गाँव पहुँचे। वहाँ एक वृद्धा बहुत रो कलप रही थी। पूछने पर उसने बताया कि उसके एकमात्र पुत्र को बकाया लगान के बदले जमींदार के सिपाही पकड़ ले गए हैं। किनाराम जी ने वृद्धा के साथ जमींदार के द्वार पर जाकर देखा कि वह लड़का धूप में बैठा रखा है। जमींदार से उसे मुक्त करने का आग्रह व्यर्थ गया तब किनाराम ने जमींदार से कहा-जहाँ लड़का बैठा है वहाँ की धरती खुदवा ले और जितना तेरा रुपया हो, वहाँ से ले ले। हाथ दो हाथ गहराई तक खुदवाने पर वहाँ अशेष रु पए पड़े देखकर सब स्तंभित रह गए। लड़का तो तुरंत बंधनमुक्त कर ही दिया गया, जमींदार ने बहुत बहुत क्षमा मांगी। बुढ़िया ने वह लड़का किनाराम जी को ही सौंप दिया। बीजाराम उसका नाम था और संभवत: किनाराम जी के शरीर त्याग पश्चात्‌ वाराणसी के उनके मठ की गद्दी पर वही अधिष्ठित हुआ।
औघड़ों के मान्य स्थल गिरनार पर किनाराम जी को दत्तात्रेय के स्वयं दर्शन हुए थे जो रुद्र के बाद औघड़पन के द्वितीय प्रतिष्ठापक माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि परम सिद्ध औघड़ों को भगवान्‌ दत्तात्रेय के दर्शन गिरनार पर आज भी होते है वर्तमान काल में, किनारामी औघड़पंथी परमसिद्धों की बारहवीं पीढ़ी में, वाराण्सीस्थ औघड़ बाबा भगवान राम को भी गिरनार पर्वत पर ही दत्तात्रेय जी का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ था। गिरनार के बाद किनाराम जी बीजाराम के साथ जूनागढ़ पहुँचे। वहाँ भिक्षा माँगने के अपराध में उस समय के नवाब के आदमियों ने बीजाराम को जेल में बंद कर दिया तथा वहाँ रखी 981 चक्कियों में से, जिनमें से अधिकतर पहले से ही बंदी साधु संत चला रहे थे, एक चक्की इनको भी चलाने को दे दिया। किनाराम जी ने सिद्धिबल से यह जान लिया तथा दूसरे दिन स्वयं नगर में जाकर भिक्षा माँगने लगे। वह भी कारागार पहुँचाए गए और उन्हें भी चलाने के लिए चक्की दी गई। बाबा ने बिना हाथ लगाए चक्की से चलने को कहा किंतु यह तो उनकी लीला थी, चक्की नहीं चली। तब उन्होंने पास ही पड़ी एक लकड़ी उठाकर चक्की पर मारी। आश्चर्य कि सब 981 चक्कियाँ अपने आप चलने लगीं। समाचार पाकर नवाब ने बहुत क्षमा माँगी और बाबा के आदेशानुसार यह वचन दिया कि उस दिन से जो भी साधु महात्मा जूनागढ़ आएँगे उन्हें बाबा के नाम पर ढाई पाव आटा रोज दिया जाएगा। नवाब की वंशपरंपरा भी बाबा के आशीर्वाद से ही चली।
उत्तराखंड हिमालय में बहुत वर्षों तक कठोर तपस्या करने के बाद किनाराम जी वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट के श्मशान पर रहनेवाले औघड़ बाबा कालूराम (कहते हैं, यह स्वयं भगवान दत्तात्रेय थे) के पास पहुँचे। कालूराम जी बड़े प्रेम से दाह किए हुए शवों की बिखरी पड़ी खोपड़ियों को अपने पास बुला-बुलाकर चने खिलाते थे। किनाराम को यह व्यर्थ का खिलवाड़ लगा और उन्होंने अपनी सिद्धि शक्ति से खोपड़ियों का चलना बंद कर दिया। कालूराम ने ध्यान लगाकर समझ लिया कि यह शक्ति केवल किनाराम में है। इन्हें देखकर कालूराम ने कहा-भूख लगी है। मछली खिलाओ। किनाराम ने गंगा तट की ओर मुख कर कहा-गंगिया, ला एक मछली दे जा। एक बड़ी मछली स्वत: पानी से बाहर आ गई। थोड़ी देर बाद कालूराम ने गंगा में बहे जा रहे एक शव को किनाराम को दिखाया। किनाराम ने वहीं से मुर्दे को पुकारा, वह बहता हुआ किनारे आ लगा और उठकर खड़ा हो गया। बाबा किनाराम ने उसे घर वापिस भेज दिया पर उसकी माँ ने उसे बाबा की चरणसेवा के लिए ही छोड़ दिया।
इन सब के बाद, कहते हैं, कालूराम जी ने अपने स्वरूप को दर्शन दिया और किनाराम को साथ, कीकुंड, (कृमिकुंड) (भदैनी, वाराणसी) ले गए जहाँ उन्हें बताया कि इस स्थल को ही गिरनार समझो। समस्त तीर्थों का फल यहाँ मिल जाएगा। किनाराम तबसे मुख्यश: उसी स्थान पर रहने लगे। अपने प्रथम गुरु वैष्णव शिवाराम जी के नाप पर उन्होंने चार मठ स्थापित किए तथा दूसरे गुरु, औघड़ बाबा कालूराम की स्मृति में कींकुड (वाराणसी), रामगढ़ (चंदौली तहसील, वाराणसी), देवल (गाजीपुर) तथा हरिहरपुर (जौनपुर) में चार औघड़ गद्दियाँ कायम कीं। इन प्रमुख स्थानों के अतिरिक्त तकिया भी कितनी ही हैं।
सहज ही प्रश्न उठता है कि औघड़ कौन हैं ? औघड़ (संस्कृत रूप अघोर) शक्ति का साधक होता है। चंडी, तारा, काली यह सब शक्ति के ही रूप हैं, नाम हैं। यजुर्वेद के रुद्राध्याय में रुद्र की कल्याण्कारी मूर्ति को शिवी की संज्ञा दी गई है, शिवा को ही अघोरा कहा गया है। शिव और शक्ति संबंधी तंत्र ग्रंथ यह प्रतिपादित करते हैं कि वस्तुत: यह दोनों भिन्न नहीं, एक अभिन्न तत्व हैं। रुद्र अघोरा शक्ति से संयुक्त होने के कारण ही शिव हैं। संक्षेप में इतना जान लेना ही हमारे लिए यहाँ पर्याप्त है। बाबा किनाराम ने इसी अघोरा शक्ति की साधना की थी। ऐसी साधना के अनिवार्य परिणामस्वरूप चमत्कारिक दिव्य सिद्धियाँ अनायास प्राप्त हो जाती हैं, ऐसे साधक के लिए असंभव कुछ नहीं रह जाता। वह परमहंस पद प्राप्त होता है। कोई भी ऐसा सिद्ध प्रदर्शन के लिए चमत्कार नहीं दिखाता, उसका ध्येय लोक कल्याण होना चाहिए। औघड़ साधक की भेद बुद्धि का नाश हो जाता है। वह प्रचलित सांसारिक मान्यताओं से बँधकर नहीं रहता। सब कुछ का अवधूनन कर, उपेक्षा कर ऊपर उठ जाना ही अवधूत पद प्राप्त करना है

अघोरी सम्प्रदाय के बाबा कीनाराम वि.सं. 1658 के भाद्रमास में कृष्ण पक्ष की अघोर चतुर्दशी को सूर्योदय काल में ग्राम रामगढ़, चंदौली (वाराणसी) में जन्मे थे। उनके पिता रघुवंशी क्षत्रिय श्री अंकवर सिंह थे। महात्मा दत्तात्रेय से बाबा कीनाराम ने दक्षिण भारत में दीक्षा ली थी। उन्होंने 16 वर्ष की आयु में ही गृह त्याग दिया था। 421 वर्ष पूर्व उनके द्वारा प्रज्ज्वलित की गई धूनी आज भी काशी के क्रीं कुण्ड स्थल पर जल रही है। बाबा के बैठने का तख्त भी यहां यथावत है। यहीं बाबा का समाधि स्थल भी है। लोलार्क छठ पर प्रतिवर्ष यहां विशाल मेला लगता है। क्रीं कुण्ड के रोग-निवारक कई चमत्कार विख्यात हैं। कहा जाता है कि बाबा ने सं. 1856 वि. में 178 वर्ष की आयु में समाधि ली थी।
वाराणसी के दक्षिणी भाग में स्थित काशी नरेश के महल में हलचल मची हुई थी. सवेरे से ही वेदपाठी वेड के चारों अंगों का पाठ कर रहे थे. नगर के गणमान्य नागरिकों के अलावा अनेक साधू संत उपस्थित थे. राजा चेतसिंह यहाँ शिव मंदिर बनवाकर आज यहाँ शिवलिंग की प्रतिष्ठा करा रहे थे.
चेतसिंह ने आदेश दे रखा था की ऐसे शुभ अवसर पर कोई अवांछनीय व्यक्ति समारोह में ना आ पाए. वंश परम्परा से काशी नरेश शिव भक्त थे. काशी के नागरिक भी गीता अनुसार नराणां च नराधिपम यानी काशी नरेश का स्वागत <हर हर महादेव> के नारे से करते हैं. उन्हें शिव का प्रातीक समझते हैं.
सहसा महल में चेतसिंह का वज्र कंठ कम्पित हो उठा-“यह नरपिशाच यहाँ कैसे आ गया? बाहर निकालो इस चांडाल को.“
सभी कर्मचारी भयभीत हो उठे. सामने कीनाराम बाबा खड़े थे. कई कर्मचारी बाबा की ओर लपके. तभी कीनाराम बाबा ने कहा-“ तू ने मेरा अपमान किया ? इसका फल तुझे शीघ्र मिलेगा. यह मत भूल की तुने विदेशियों को शिकस्त दी है. वे तुझे ऐसा सबक सिखायेंगे कि मेरी तरह तुझे भी इस महल से बिदा होना पड़ेगा.“
कीनाराम की इतनी बातें सुनने के बाद चेतसिंह आपे से बाहर हो गए. राजा को क्रुद्ध देखकर पहरेदारों ने जबरन कीनाराम को घसीटना प्रारम्भ किया.
बाबा कीनाराम ने कहा-“ देख लेना, यह बाबा का श्राप है, -<<तेरा राज्य नष्ट हो जाएगा. इस महल में उल्लू चमगादड़ रहेंगे. तेरा वंश भी समाप्त हो जाएगा.“
ठीक इसी समय महल के भीतर सदानंद बक्शी ने प्रवेश किया. बाबा कीनाराम के प्रति इनकी गहरी आस्था थी. राजा साहब के यहाँ से जाने के बदले वे बाबा को आदर पूर्वक उनके आश्रम तक पहुंचा आये. महल वापस आने के बाद मुंशी सदानंद को सारी बातें मालुम हुई.
उन्हें समझते देर नहीं लगी कि जो कुछ भी हुआ, अनुचित हुआ. बाबा कीनाराम सिद्ध पुरुष हैं. नगर के लोग आपको श्रद्धा की दृष्टी से देखते हैं. जरुरु किसी मतलब से आये होंगे. कहीं उनका शाप फलीभूत हुआ तो क्या होगा?
दुसरे दिन सदानंद क्रीम कुंड स्थित बाबा के आश्रम में आये और राजा को दिए श्राप के लिए क्षमा करने की प्रार्थना करने लगे.
बाबा कीनाराम ने कहा-“ अब जो बात जबान से निकल गयी है, वह तो होकर रहेगी. उसे अपनी बहादुरी का गर्व हो गया है. लेकिन मैं साफ़ देख रहा हूँ कि उसका पतन होने वाला है.“
सदानंद ने भीत स्वर में कहा-“ तब हम लोगों का क्या होगा? मेरा अनुरोध है कि आप राजा साहब पर कृपा कीजिये.“
बाबा ने कहा-“ साधू का वचन कभी टलता नहीं.
बाबा ने कहा, “अब काशी पर म्लेच्छ (अंग्रेज) कब्जा करेंगे।
राज परिवार उन्हें के आधीन रहेगा। जब विदेशी शासक चले जाएंगे तब दिल्ली में इस देश के लोगों का राज्य शुरू होगा तब स्थिति बदलेगी और तेरे घर की स्थिति भी बदलेगी। जा बक्शी, तू घर जा। जब तक तेरे वंशजों के नाम से “आनन्द” शब्द जुड़ा रहेगा तब तक तेरा वंश चलेगा।”

मैं तुम्हारे मनोविशय को समझ रहा हूँ. तुम्हारे वंश को कोई हानि नहीं होगी. समझे सदानंद. एक काम करना, भविष्य में तुम्हारे वंशधर अपने नाम के पीछे <आनंद> शब्द अगर जोड़ लेंगे तो तुम्हारा वंश अनादी काल तक चलेगा. अब तुम जा सकते हो.“
कीनाराम के श्राप ने प्रभाव दिखाया.
राजा चेतसिंह को शिवाले के किले से भागना पड़ा. राज्य ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथों चला गया.
यह बात भी सत्य सिद्ध हुई। सदानंद के वशंज डा. सम्पूर्णानन्द उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। आज भी उनके परिवार में “आनन्द” शब्द प्रचलित है।
बाबा कीनाराम – संक्षिप्त जीवन परिचय
कीनाराम अपने तीन भाईयों में सबसे बड़े थे. बचपन से ही आप राम के प्रति अनुरक्त थे. अवकाश के समय आप गाँव के अन्य साथियों समेत राम धुन गाया करते थे.
उन दिनों बाल विवाह की प्रथा थी. इस प्रथा के अनुसार आपका 12 वर्ष की आयु में विवाह कर दिया गया. विवाह के तीन वर्ष के बाद गौना लाने की तिथी निश्चित की गयी. यात्रा के एक दिन पूर्व उन्होँने अपनी माँ से दूध भात खाने का आग्रह किया.
माँ बिगड़ गयी-“ कल तुम्हारा गौना है और आज दूध भात मांग रहे हो? दही भात खा लो“
कीनाराम ने हाथ पकड़ लिया. लाचारी में माँ को दूध भात देना पड़ा. दुसरे दिन जब यात्रा की तय्यारी हो चुकी तो ससुराल पक्ष से समाचार आया कि वधु की मृत्यु हो गयी है.
माँ ने रोते हुवे कहा-“ कोई न कोई अशुभ होगा, सोच लिया था, तुमने दूध भात क्यूँ खाया. ऐसा जिद्दी लड़का है कि क्या कहूँ?“
कीनाराम ने कहा-“ माँ, उसके मरने के बाद ही मैंने दूध भात खाया है, विश्वास न हो तो पिताजी से पूछ लो. वह कल शाम को ही मर गयी थी और मैंने दूध भात कल रात को खाया.“
माँ से ये समाचार पुरे गाँव में फ़ैल गया. लोग इस बात पे आश्चर्य करने लगे आखिर कीनाराम को इस बात का पता यहाँ बैठे कैसे चल गया?
इस घटना के बाद वापिस विवाह की बात चलने लगे. कीनाराम ने इनकार किया, दबाव बढ़ने पर चुपचाप घर से निकल पड़े.
घूमते घूमते गाजीपुर आ गए. उन दिनों गाजीपुर में रामानंदी सम्प्रदाय के अनुयायी संत शिवराम रहते थे. नागरिकों में उनकी प्रसिद्धी थी. कीनाराम को पसंद आया. वे वहीँ रुक गए. सेवा करना और खाली समय में रामनाम जपना. वे चाहते थे कि शिवराम उन्हें दीक्षा दें. और शिवराम सोचते कि अगर कीनाराम दीक्षित हो गया तो मन्त्र लेकर चम्पत हो जाएगा. ऐसा सेवा करने वाला चेला कहाँ से मिलेगा. ये सोच कर टालते रहे. शिव राम जी हमेशा टालते रहे ।
कई महीनों बाद शिवराम बोले -“चलो कीनाराम तुम्हें आज दीक्षा देता हूँ. “ आसन कमंडल देकर बोले, -“तुम गंगा तट पर चलो मैं शौच आदि से निवृत्त होकर आता हूँ.“
कीनाराम जी ख़ुशी ख़ुशी गंगा तट पर चले गए. नहाकर आसन पर बैठ गए. आचमनी लेकर ध्यान करते हुए अनुभव हुआ की गंगा की लहरें उनके चरण स्पर्श कर रही हैं, तो उठ कर कुछ और ऊंचाई पर बैठ गए. आँख बंद की कि फिर लगा की गंगा की लहरें उनके पैरों को छू रही हैं. फिर और ऊपर बैठ गए. तब भी गंगा की लहरें उनके पैरों तक पहुँच गयी. पीछे शिवराम ये सब देख रहे थे. उनको अपार आश्चर्य हुआ. कि कीनाराम के रूप में ये लड़का कौन आया है.इसके बाद शिवराम कीनाराम को लेकर स्थानीय मंदिर में गए और दीक्षा दी. इसके बाद कीनाराम सेवा और केवल साधन भजन में लग गए.
इस बीच एक घटना हो गयी. शिवराम की पत्नी का देहांत हो गया. पत्नी चले जाने के बाद शिवराम अस्थिर हो गए. पुनर्विवाह की सोचने लगे. मन में दुविधा होने पर कीनाराम को पूछा.
कीनाराम ने तुरंत कहा-“महाराज इस उम्र में आपको विवाह शोभा नहीं देता. साधन भजन में समय लगायें तो बेहतर है.“
शिवराम को ऐसे उत्तर की अपेक्षा नहीं थी. नाराज होकर बोले- “ पत्नी के बिना मेरा काम नहीं चलेगा. ये सब बखेड़ा मुझसे सम्हाला नहीं जाता. “
गुरु शिष्य में विवाद बढ़ता ही गया. अंत में कीनाराम ने कहा-“अगर आप पुनर्विवाह करेंगे तो मैं अन्य किसी गुरु की सेवा में चला जाउंगा.“
शिवराम खिज्लाकर बोले-“ जाना है तो चला जा मैं तेरे ऐसे कृतघ्न का मुख नहीं देखना चाहता.“
गुरु के प्रति अश्रद्धा होने पर कीनाराम तुरंत वहां से चल पड़े ।
बाबा कीनाराम – संक्षिप्त जीवन परिचय
गुरु के प्रति अश्रद्धा होने पर कीनाराम तुरंत वहां से चल पड़े. मार्ग में नईडीह नामक एक गाँव आया. उन्होंने देखा कि एक वृक्ष के नीचे एक बुढिया बेतहाशा रो रही है । कारण पूछने पर बताया कि जमींदार का लगान बकाया हो गया था. उसके प्यादे उसके लड़के को पकड़ कर ले गए हैं और मार रहे हैं.
कीनाराम ने कहा- इस तरह रोने से कहीं लगान चुकता होता है? चल मैं तेरे लड़के को बचा लूँगा?
बुढिया ने कहा- महाराज वह बड़ा जालिम आदमी है. बिना रकम के मानेगा नहीं. आप बेकार में जाकर परेशान होने.
अब कीनाराम नाराज हो गए. उन्होंने कहा- इस तरह रोने से तेरा लड़का बच जाएगा? चल, मेरे साथ चल. मैं भी देखूं, कैसा जमींदार है.
बाबा को लेकर बुढिया जमींदार के यहाँ पहुंची. कीनाराम ने देखा कि लड़के को हाथ बाँध कर धुप में बिठा रखा है. कीनाराम ने कहा- जमींदार साहब आप इस बेवा के लड़के को छोड़ दें.
जमींदार ने कहा- मेरा लगान बाकी है. रकम चुका दीजिये और लड़के को ले जाईये.
कीनाराम ने कहा- लड़का जहाँ बैठा है वहां तेरी सारी रकम रखी है. किसी मजदूर से खोद कर निकलवा ले.
इसके बाद उन्होंने लड़के से कहा- तू इधर आके बैठ बेटा.
जमींदार को बाबा कि बातों पर विश्वास नहीं हुआ. मजदूर को कह कर खोदवाने पर वहां वांछित रकम मिलने पर उसको घोर आश्चर्य हुआ. और साथ ही भयभीत भी. बाबा कीनाराम के पैरों में आकर गिर पडा.
कीनाराम ने कहा- लो माताजी अपने लड़के को सम्हालो कई सालों का लगान चुकता हो गया.
इस चमत्कार को देखकर बुढिया भी स्तंभित हो गयी. वापिस आते समय भाव विव्हल होकर बोली- बाबाजी अब से मेरा लड़का आपकी सेवा में. लगान ना दे पाने पर मेरा लड़का पता नहीं कितने समय तक जमींदार के यहाँ बेगार करता अब आपकी सेवा में रहेगा तो जीवन सफल हो जाएगा.
पहले तो कीनाराम बाबा राजी नहीं हुए. बुढिया की जिद्द को देखते हुए भगवान् की इच्छा को माना और लड़के को साथ ले लिया. यही उनका प्रथम शिष्य हुआ जिसका नाम था- बीजाराम । ये भी एक बहुत सिद्ध साधक हुये ।
यायावरों की तरह घूमते हुए दोनों गिरनार पर्वत पर पहुंचे. आबू पर्वत, गिरनार, हिंगलाज, पुष्कर, वीरभूमि, कामाख्या और हिमालय के अनेक क्षेत्र संतों की साधना भूमी हैं. आज भी संत लोग अलक्ष्य रूप में यहाँ साधना करते हैं.
कीनाराम ने कहा- बीजाराम मैं पर्वत पर जा रहा हूँ. जब तक न लौटूं तुम यहाँ इंतज़ार करना. और एक बात याद रखना केवल तीन घर से भिक्षा मांगना, इससे अधिक नहीं. भिक्षा में जितना मिले उससे काम चलाना चौथे घर में मत जाना.
कहा जाता है इसी पर्वत पर कीनाराम की मुलाक़ात भगवान् दत्तात्रेय महाराज से हुई थी. और उन्हें योग का उपदेश दिया था । कहा जाता है कि नाथ सम्प्रदाय के संत गोरखनाथ तथा वारकरी सम्प्रदाय के संत एकनाथ ने भी यहीं दत्तात्रेय ऋषि का दर्शन किया था.
कुछ दिनों बाद गुरु शिष्य गिरनार पर्वत से जूनागढ़ आ गए. यहाँ नवाब का शासन था. नगर में भीख मांगने की मनाही थी. जो व्यक्ति भीख माँगता, उसे पकड़ कर जेल में डाल देते थे. वहां अपराधियों को चक्की चलानी पड़ती थी.
बीजाराम भिक्षा मांगने गए और पकडे गए. और नियमानुसार उन्हें भी जेल हो गयी. इधर कीनाराम काफी देर हो जाने पर चिंतिति हो उठे. ध्यान लगाने पर देखा तो माजरा समझ में आया. अब वे भी बीजाराम की तरह भीख मांगने निकले. इन्हें भी पकड़ कर जेल में डाल दिया.
वाह संतों की लीला – अपने को ही पकडवा दिया.
इन्हें भी एक चक्की चलाने को दी गयी. आपने अपनी चक्की पर एक डंडा मारते हुए कहा- चल बेटा, चक्की.
चक्की चलने लगी. इसके बाद अन्य संतों की चक्कियों को भी डंडा मार कर उन्हें चालू कर दिया. इस अनहोनी को देखकर पहरेदार भाग भाग कर नवाब तक पहुंचे और सारी घटना बयान की. नवाब पहचान गया और डर गया कि आज फकीर से पाला पड़ा है. फ़टाफ़ट बाबा को दरबार में इज्जत के साथ बुलाया.
ऊँचे दर्जे के फकीर हैं कहीं बद्दुआ ना दे दें इसलिए बाबा को प्रसन्न करने के लिए थाली में माफ़ी के रूप में हीरे जवाहरात पेश किये गए. बाबा ने एक उठा कर मुह में डाला और बोले- यह न तो मीठे हैं न ही खट्टे. मेरे किस काम के?
नवाब बोला- हजरत जो हुक्म दें वही पेश किया जाएगा.
बाबा को नवाब की मनःस्थिति का ज्ञान हुआ. हंसकर बोले- संत और फकीर मांग कर गुजारा करते हैं. तेरे यहाँ का गुनाह है, ठीक है. अब आइन्दा भीख मांगने वाले फकीर और संत को शासन की ओर से अढाई पाव आटा मुफ्त देनें का हुक्म दे दो.
इतने सस्ते में छूटते देख नवाब ने तुरंत इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया.
बाबा कीनाराम – संक्षिप्त जीवन परिचय
जूनागढ़ से चलकर बाबा कीनाराम खाड़ी और दलदलों को पार करते हुए कराँची से 70 किमी. दूर हिंगलाज पहुँचे। हिंगलाज मन्दिर से कुछ दूरी पर उन्होंने धूनी लगायी। हिंगलाज देवी स्वयं एक कुलीन महिला के रूप में वहाँ उन्हें प्रतिदिन भोजन पहुँचाती थी। धूनी की साफ-सफाई भैरव स्वयं एक वटुक के रूप में करते थे। कुछ दिनों के बाद बाबा ने उस महिला से परिचय पूछा तो देवी ने स्वयं अपने रूप का दर्शन दिया और कहा- ‘जिसके लिये आप तप कर रहे हैं मैं वही हूँ। मेरा यहाँ का समय पूरा हो गया है। अब मुझे मेरे स्थान काशी में ले चलो। मैं काशी में केदारखण्ड के क्रीं कुण्ड में निवास करूँगी।’ बाबा ने धूनी ठंडी की, और चल दिये।
सन् 1638 में बाबा हिंगलाज से मुल्तान और मुल्तान से कन्धार पहँचे। कन्धार में मिट्टी का एक विशाल किला था जो व्यापारिक और सामरिक दृष्टि से भारत और फारस दोनों देशों के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण था। बाबा के आशीर्वाद से शाहजहाँ ने किले को फारस के शाहअब्बास से जीत लिया। बाद में उसने वहाँ बुलाकर बाबा का भव्य सत्कार किया। कुछ दिनों बाद शाहजहाँ से बाबा की भेंट उत्तर भारत में हुई। इस समय शाहजहाँ अपनी प्रिय पत्नी मुमताज महल के ऊपर दीवाना था और राजकोष का बहुत अपव्यय कर रहा था। बाबा के प्रति उसने अवज्ञा और उद्दण्डता दिखायी। बाबा ने उसे शाप दे दिया- ‘तुमने साधु की अवज्ञा की है। तुम बीबी के गुलाम हो। अपनी ही औलाद के हाथों दु:ख पाओगे और अपनी करनी का फल चखोगे।’ वैसा ही हुआ। शाहजहाँ अपने पुत्र औरंगजेब के हाथों जेल में बन्द किया गया और यातना भोगता रहा।
बनारस में ईश्वरगंगी मुहल्ले में बाबा लोटादास रहते थे। उनको लोटा की सिद्धि प्राप्त थी। वे उस पात्र में से मनोवाञ्छित वस्तु निकालकर दूसरों को दे देते थे। कीनाराम ने किसी समय लोटादास की किसी मामले में सहायता की थी। तब से दोनों में प्रगाढ़ सम्बन्ध था। एक बार लोटादास ने भण्डारा किया, उसमें कीनाराम को निमन्त्रित नहीं किया। कीनाराम चुपचाप जाकर वहाँ बैठ गये। जब भोजन के लिये पत्तल और पानी परोसा गया तो पत्तलों पर मछलियाँ कूदने लगीं और पानी में शराब की दुर्गन्ध आने लगी। लोटादास ने आकर बाबा से क्षमा मांगी। तब सब्जी की जगह तैर रहीं मछलियाँ बदल गयीं और पानी में सुगन्ध आ गयी। लोटादास ने अपने सिद्ध लोटा से कीनाराम के पात्र (कपाल) में भोजन देना शुरु किया। कई लोटा और दही देने पर भी कपाल नहीं भरा। क्षमा माँगने पर कीनाराम ने लोटादास के भण्डार गृह में पहले से चार गुनी अधिक दही पूड़ी की व्यवस्था कर दी।
एक बार कीनाराम अपनी जन्मभूमि रामगढ़ में रह रहे थे। उनके पास आकाशमार्ग से एक भैरवी आयी जो पूर्णतया नग्न थी। महाराज ने अपनी जटा से एक बहुत सुगन्धित रेशमी वस्त्र निकाल कर भैरवी के ऊपर फेंक दिया। भैरवी के ऊपर जो कोई वस्त्र फेंका जाता वह जल जाता था पर वह वस्त्र नहीं जला। भैरवी आश्चर्य में पड़ गयी। बाबा के पास एक ही लंगोटी रहती थी। नहाने के पहले उसे धुलकर आकाश में फेंक देते थे। नहाने के बाद हाथ आकाश में उठाते और लंगोटी उनके हाथ में आ जाती। लंगोटी को फट्कारने पर उसमें से चिनगारियाँ निकलती थीं। हाथ से सुरकने पर उसमें से रंगविरंगी किरणें निकला करती थी।
बाबा ने औरंगजब को फट्कारा था- ‘धर्म के नाम पर पृथिवी को न रंगें। भविष्य आपका कृतज्ञ नहीं होगा।…आपकी मृत्यु नजदीक है…आप लोलुपचित्त हैं….दिल्ली तक आपका पहुँचना कठिन है।
एक बार उन्होंने अपने सामने उपस्थित कामासक्त स्त्रियों को उपदेश के द्वारा कामवासनारहित कर सन्मार्ग पर पहुँचाया था।
एक बार बाबा मुंगेर जिले में श्मशान के समीप चातुर्मास्य कर रहे थे। एक मध्यरात्रि में पीले रंग के मांगलिक वस्त्र को पहने खड़ाऊँ पर चढ़ी एक योगिनी आकाशमार्ग से बाबा के सामने उतरी और निवेदन किया-’गिरनार की काली गुफा में निवास करती हूँ। अन्त:प्रेरणा हुई और आपके पास आ गयी। आप तान्त्रिक क्रियाओं द्वारा मेरे साध्य को पूरा करें ताकि मैं पूर्ण हो जाऊँ। श्मशान में एक शव था। चार खूँटियाँ चार कोनों में गाड़ कर शव के हाथ-पैर को चारों खूँटियों से बाँध दिया गया। लालवस्त्र से शव को ढँककर उसका मुख खोल दिया गया। योगिनी और महाराज भगलिङ्ग आसन पर बैठकर शव के मुख में हवन करते रहे। योगिनी तृप्त हुई। अन्त में श्मशान-देवता नन्दी पर बैठ कर उपस्थित हुए और इस साधना को सफल होने का आशीर्वाद दिया। अभी भी यदा कदा जूनागढ़ अहमदाबाद मार्ग पर योगिनियों का दर्शन लोगों को मिलता रहता है। इस प्रकार की अनेक चमत्कारपूर्ण घटनायें बाबा के जीवन में घटित हुईं।

 

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