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रुद्राष्टाध्यायी में अन्य मंत्रों के साथ इस मंत्र का भी उल्लेख मिलता है। शिव और रुद्र परस्पर एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। शिव को ही रुद्र कहा जाता है क्योंकि- रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: यानि की भोले सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं। हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं। रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारे पटक-से पातक कर्म भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है।

रूद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है कि- सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका: अर्थात् सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रूद्र की आत्मा हैं।

हमारे शास्त्रों में विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक के पूजन के निमित्त अनेक द्रव्यों तथा पूजन सामग्री को बताया गया है। साधक रुद्राभिषेक पूजन विभिन्न विधि से तथा विविध मनोरथ को लेकर करते हैं। किसी खास मनोरथ की पूर्ति के लिये तदनुसार पूजन सामग्री तथा विधि से रुद्राभिषेक की जाती है।

रुद्राभिषेक के विभिन्न पूजन के लाभ इस प्रकार हैं-

• जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है।

• असाध्य रोगों को शांत करने के लिए कुशोदक से रुद्राभिषेक करें।

• भवन-वाहन के लिए दही से रुद्राभिषेक करें।

• लक्ष्मी प्राप्ति के लिये गन्ने के रस से रुद्राभिषेक करें।

• धन-वृद्धि के लिए शहद एवं घी से अभिषेक करें।

• तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

• इत्र मिले जल से अभिषेक करने से बीमारी नष्ट होती है ।

• पुत्र प्राप्ति के लिए दुग्ध से और यदि संतान उत्पन्न होकर मृत पैदा हो तो गोदुग्ध से रुद्राभिषेक करें।

• रुद्राभिषेक से योग्य तथा विद्वान संतान की प्राप्ति होती है।

• ज्वर की शांति हेतु शीतल जल/गंगाजल से रुद्राभिषेक करें।

• सहस्रनाम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए घृत की धारा से रुद्राभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।

• प्रमेह रोग की शांति भी दुग्धाभिषेक से हो जाती है।

• शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने पर जडबुद्धि वाला भी विद्वान हो जाता है।

• सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है।

• शहद के द्वारा अभिषेक करने पर यक्ष्मा (तपेदिक) दूर हो जाती है।

• पातकों को नष्ट करने की कामना होने पर भी शहद से रुद्राभिषेक करें।

• गो दुग्ध से तथा शुद्ध घी द्वारा अभिषेक करने से आरोग्यता प्राप्त होती है।

• पुत्र की कामनावाले व्यक्ति शक्कर मिश्रित जल से अभिषेक करें।

ऐसे तो अभिषेक साधारण रूप से जल से ही होता है। परन्तु विशेष अवसर पर या सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि पर्व के दिनों मंत्र गोदुग्ध या अन्य दूध मिला कर अथवा केवल दूध से भी अभिषेक किया जाता है। विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग अथवा सब को मिला कर पंचामृत से भी अभिषेक किया जाता है। तंत्रों में रोग निवारण हेतु अन्य विभिन्न वस्तुओं से भी अभिषेक करने का विधान है। इस प्रकार विविध द्रव्यों से शिवलिंग का विधिवत् अभिषेक करने पर अभीष्ट कामना की पूर्ति होती है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी पुराने नियमित रूप से पूजे जाने वाले शिवलिंग का अभिषेक बहुत ही उत्तम फल देता है। किन्तु यदि पारद के शिवलिंग का अभिषेक किया जाय तो बहुत ही शीघ्र चमत्कारिक शुभ परिणाम मिलता है। रुद्राभिषेक का फल बहुत ही शीघ्र प्राप्त होता है। वेदों में विद्वानों ने इसकी भूरि भूरि प्रशंसा की गयी है। पुराणों में तो इससे सम्बंधित अनेक कथाओं का विवरण प्राप्त होता है।

वेदों और पुराणों में रुद्राभिषेक के बारे में तो बताया गया है कि रावण ने अपने दसों सिरों को काट कर उसके रक्त से शिवलिंग का अभिषेक किया था तथा सिरों को हवन की अग्नि को अर्पित कर दिया था। जिससे वो त्रिलोकजयी हो गया। भष्मासुर ने शिव लिंग का अभिषेक अपनी आंखों के आंसुओ से किया तो वह भी भगवान के वरदान का पात्र बन गया।

रुद्राभिषेक करने की तिथियां

कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, चतुर्थी, पंचमी, अष्टमी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या, शुक्लपक्ष की द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, नवमी, द्वादशी, त्रयोदशी तिथियों में अभिषेक करने से सुख-समृद्धि संतान प्राप्ति एवं ऐश्वर्य प्राप्त होता है। कालसर्प योग, गृहकलेश, व्यापार में नुकसान, शिक्षा में रुकावट सभी कार्यो की बाधाओं को दूर करने के लिए रुद्राभिषेक आपके अभीष्ट सिद्धि के लिए फलदायक है।

किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वास का विचार करने पर अनुष्ठान अवश्य सफल होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है। प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, अमावस्या तथा शुक्लपक्ष की द्वितीया व नवमी के दिन भगवान शिव माता गौरी के साथ होते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है।

कृष्णपक्ष की चतुर्थी, एकादशी तथा शुक्लपक्ष की पंचमी व द्वादशी तिथियों में भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर होते हैं और उनकी अनुकंपा से परिवार में आनंद-मंगल होता है।

कृष्णपक्ष की पंचमी, द्वादशी तथा शुक्लपक्ष की षष्ठी व त्रयोदशी तिथियों में महादेव नंदी पर सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते है। अत: इन तिथियों में रुद्राभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है।

कृष्णपक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी तथा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, पूर्णिमा में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं। अतएव इन तिथियों में किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर उनकी साधना भंग होती है जिससे अभिषेककर्ता पर विपत्ति आ सकती है।

कृष्णपक्ष की द्वितीया, नवमी तथा शुक्लपक्ष की तृतीया व दशमी में महादेव देवताओं की सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं। इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने पर संताप या दुख मिलता है।

कृष्णपक्ष की तृतीया, दशमी तथा शुक्लपक्ष की चतुर्थी व एकादशी में सदाशिव क्रीडारत रहते हैं। इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चन संतान को कष्ट प्रदान करते है।

कृष्णपक्ष की षष्ठी, त्रयोदशी तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी व चतुर्दशी में रुद्रदेव भोजन करते हैं। इन तिथियों में सांसारिक कामना से किया गया रुद्राभिषेक पीडा देते हैं।

ज्योर्तिलिंग-क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, श्रावण के सोमवार आदि पर्वो में शिव-वास का विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है। वस्तुत: शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिव को शीघ्र प्रसन्न करके साधक को उनका कृपापात्र बना देता है और उनकी सारी समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाती हैं। अतः हम यह कह सकते हैं कि रुद्राभिषेक से मनुष्य के सारे पाप-ताप धुल जाते हैं। स्वयं श्रृष्टि कर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है की जब हम अभिषेक करते है तो स्वयं महादेव साक्षात् उस अभिषेक को ग्रहण करते है। संसार में ऐसी कोई वस्तु, वैभव, सुख नही है जो हमें रुद्राभिषेक से प्राप्त न हो सके।

सुख-शांति-वैभव और मोक्ष का प्रतीक महाशिवरात्रि

साथ ही महाशिवरात्रि पूजन का प्रभाव हमारे जीवन पर बड़ा ही व्यापक रूप से पड़ता है। सदाशिव प्रसन्न होकर हमें धन-धान्य, सुख-समृधि, यश तथा वृद्धि देते हैं। महाशिवरात्रि पूजन को विधिवत करने से हमें सदाशिव का सानिध्य प्राप्त होता है और उनकी महती कृपा से हमारा कल्याण होता है।

शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता में बताया गया है कि शिवरात्रि व्रत करने से व्यक्ति को भोग एवं मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते हैं। देवताओं के पूछने पर भगवान सदाशिव ने बताया कि शिवरात्रि व्रत करने से महान पुण्य की प्राप्ति तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि परम कल्याणकारी व्रत है जिसके विधिपूर्वक करने से व्यक्ति के दुःख, पीड़ाओं का अंत होता है और उसे इच्छित फल की प्राप्ति होती है।

पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री, धन, सौभाग्य, समृद्धि व आरोग्यता प्राप्त होती है। पूजन करने वाला अपने तप-साधना के बल पर मोक्ष की प्राप्ति करता है। परम कल्याणकारी व्रत महाशिवरात्रि के व्रत को विधि-पूर्वक करने से व्यक्ति के दुःख, पीड़ाओं का अंत होता है और उसे इच्छित फल-प्राप्ति, पति, पत्नी, पुत्र, धन, सौभाग्य, समृद्धि व आरोग्यता प्राप्त होती है तथा वह जीवन में गति और मोक्ष को प्राप्त करते हैं और चिरंतर-काल तक शिव-स्नेही बने रहते हैं और शिव-आशीष प्राप्त करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं।

परोपकार करने के लिए महाशिवरात्रि का दिवस होना भी आवश्यक नहीं है। पुराण में चार प्रकार के शिवरात्रि पूजन का वर्णन है। मासिक शिवरात्रि, प्रथम आदि शिवरात्रि, तथा महाशिवरात्रि। पुराण वर्णित अंतिम शिवरात्रि है-नित्य शिवरात्रि। वस्तुत: प्रत्येक रात्रि ही `शिवरात्रि` है अगर हम उन परम कल्याणकारी आशुतोष भगवान में स्वयं को लीन कर दें तथा कल्याण मार्ग का अनुसरण करें, वही शिवरात्रि का सच्चा व्रत है।

महाशिवरात्रि का व्रत मनोवांछित अभिलाषाओं को पूर्ण करनेवाली तथा परम कल्याणकारी है। देवों-के-देव महादेव की प्रसन्नता की कामना लिये हुए जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनका अभीष्ट मनोरथ पूर्ण होता है तथा वे हमेशा-हमेशा के लिया शिव-सानिध्यता को प्राप्त कर लेते हैं।

॥ ॐ नमः शिवाय॥ ॥ अथ श्री शिवमहिम्नस्तोत्रम्॥

महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ।
अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥ १॥

अतीतः पंथानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः
अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः॥ २॥

मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतः
तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम्।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता॥ ३॥

तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिस्रुषु गुणभिन्नासु तनुषु।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः॥ ४॥

किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसर दुःस्थो हतधियः
कुतर्कोऽयं कांश्चित् मुखरयति मोहाय जगतः॥ ५॥

अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां
अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति।
अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे॥ ६॥

त्रयी साङ्ख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥ ७॥

महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भूप्रणिहितां
न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति॥ ८॥

ध्रुवं कश्चित् सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परो ध्रौव्याऽध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये।
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवन् जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता॥ ९॥

तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरिञ्चिर्हरिरधः
परिच्छेतुं यातावनलमनलस्कन्धवपुषः।
ततो भक्तिश्रद्धा-भरगुरु-गृणद्भ्यां गिरिश यत्
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति॥ १०॥

अयत्नादासाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं
दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डू-परवशान्।
शिरःपद्मश्रेणी-रचितचरणाम्भोरुह-बलेः
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम्॥ ११॥

अमुष्य त्वत्सेवा-समधिगतसारं भुजवनं
बलात् कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः।
अलभ्या पातालेऽप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः॥ १२॥

यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सतीं
अधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयोः
न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः॥ १३॥

अकाण्ड-ब्रह्माण्ड-क्षयचकित-देवासुरकृपा
विधेयस्याऽऽसीद् यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवन-भय- भङ्ग- व्यसनिनः॥ १४॥

असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः।
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः॥ १५॥

मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोर्भ्राम्यद् भुज-परिघ-रुग्ण-ग्रह- गणम्।
मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृत-जटा-ताडित-तटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता॥ १६॥

वियद्व्यापी तारा-गण-गुणित-फेनोद्गम-रुचिः
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते।
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति
अनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः॥ १७॥

रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो
रथाङ्गे चन्द्रार्कौ रथ-चरण-पाणिः शर इति।
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बर-विधिः
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः॥ १८॥

हरिस्ते साहस्रं कमल बलिमाधाय पदयोः
यदेकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम्।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषः
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम्॥ १९॥

क्रतौ सुप्ते जाग्रत् त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते।
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदान-प्रतिभुवं
श्रुतौ श्रद्धां बध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः॥ २०॥

क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां
ऋषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुर-गणाः।
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफल-विधान-व्यसनिनः
ध्रुवं कर्तुः श्रद्धा-विधुरमभिचाराय हि मखाः॥ २१॥

प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद् भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं
त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः॥ २२॥

स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत्
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत-देहार्ध-घटनात्
अवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः॥ २३॥

श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः
चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः।
अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मङ्गलमसि॥ २४॥

मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमविधायात्त-मरुतः
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमद-सलिलोत्सङ्गति-दृशः।
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये
दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान्॥ २५॥

त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवहः
त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च।
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रति गिरं
न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत् त्वं न भवसि॥ २६॥

त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरान्
अकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः
समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम्॥ २७॥

भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहान्
तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम्।
अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि
प्रियायास्मैधाम्ने प्रणिहित-नमस्योऽस्मि भवते॥ २८॥

नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः।
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमः
नमः सर्वस्मै ते तदिदमतिसर्वाय च नमः॥ २९॥

बहुल-रजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रबल-तमसे तत् संहारे हराय नमो नमः।
जन-सुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः॥ ३०॥

कृश-परिणति-चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं क्व च तव गुण-सीमोल्लङ्घिनी शश्वदृद्धिः।
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद् वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम्॥ ३१॥

असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिन्धु-पात्रे सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥ ३२॥

असुर-सुर-मुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दु-मौलेः ग्रथित-गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य।
सकल-गण-वरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानः रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार॥ ३३॥

अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत् पठति परमभक्त्या शुद्ध-चित्तः पुमान् यः।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र प्रचुरतर-धनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च॥ ३४॥

महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः। अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्॥ ३५॥

दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः। महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ३६॥

कुसुमदशन-नामा सर्व-गन्धर्व-राजः
शशिधरवर-मौलेर्देवदेवस्य दासः।
स खलु निज-महिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्य-दिव्यं महिम्नः॥ ३७॥

सुरगुरुमभिपूज्य स्वर्ग-मोक्षैक-हेतुं
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्य-चेताः।
व्रजति शिव-समीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम्॥ ३८॥

आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्व-भाषितम्।
अनौपम्यं मनोहारि सर्वमीश्वरवर्णनम्॥ ३९॥

इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्कर-पादयोः।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः॥ ४०॥

तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः॥ ४१॥

एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः।
सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते॥ ४२॥

श्री पुष्पदन्त-मुख-पङ्कज-निर्गतेन
स्तोत्रेण किल्बिष-हरेण हर-प्रियेण।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः॥ ४३॥

॥ इति श्री पुष्पदन्त विरचितं शिवमहिम्नः॥

2….…|| श्री शिवरक्षा स्तोत्रम् || …………
। ॐ नमः शिवाय ।
अस्य श्रीशिवरक्षा-स्तोत्र-मन्त्रस्य याज्ञवल्क्य ऋषिः,
श्रीसदाशिवो देवता, अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीसदाशिव-प्रीत्यर्थे शिवरक्षा-स्तोत्र-जपे विनियोगः ॥
चरितं देवदेवस्य महादेवस्य पावनम् ।
अपारं परमोदारं चतुर्वर्गस्य साधनम् ॥ (१)
गौरी-विनायकोपेतं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रकम् ।
शिवं ध्यात्वा दशभुजं शिवरक्षां पठेन्नरः ॥ (२)
गङ्गाधरः शिरः पातु भालमर्द्धेन्दु-शेखरः ।
नयने मदन-ध्वंसी कर्णौ सर्प-विभूषणः ॥ (३)
घ्राणं पातु पुराराति-र्मुखं पातु जगत्पतिः ।
जिह्वांप वागीश्वारः पातु कन्धरां शिति-कन्धरः ॥ (४)
श्रीकण्ठः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ विश्वप-धुरन्धरः ।
भुजौ भूभार-संहर्त्ता करौ पातु पिनाकधृक् ॥ (५)
हृदयं शङ्करः पातु जठरं गिरिजापतिः ।
नाभिं मृत्युञ्जयः पातु कटी व्याघ्रजिनाम्बरः ॥ (६)
सक्थिनी पातु दीनार्त्त-शरणागत-वत्सलः ।
ऊरू महेश्वतरः पातु जानुनी जगदीश्वबरः ॥ (७)
जङ्घे पातु जगत्कर्त्ता गुल्फौ पातु गणाधिपः ।
चरणौ करुणासिन्धुः सर्वाङ्गानि सदाशिवः ॥ (८)
एतां शिव-बलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स भुक्त्वा सकलान् कामान् शिव-सायुज्यमाप्नुयात् ॥ (९)
ग्रह-भूत-पिशाचाद्यास्त्रैलोक्ये विचरन्ति ये ।
दूरादाशु पलायन्ते शिव-नामाभिरक्षणात् ॥ (१०)
अभयङ्कर-नामेदं कवचं पार्वतीपतेः ।
भक्त्या बिभर्त्ति यः कण्ठे तस्य वश्यं जगत् त्रयम् ॥ (११)
इमां नारायणः स्विप्ने शिवरक्षां यथादिशत् ।
प्रातरुत्थाय योगीन्द्रो याज्ञवल्क्यस्तथालिखत् ॥ (१२)
(इति श्रीयाज्ञवल्क्य-प्रोक्तं शिवरक्षा-स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।)

3……|| शिव ताण्डव स्तोत्रम् ||……………
ये वो शिव-ताण्डव-स्तोत्रम् है जिसे पढ़ कर रावण ने महादेव को प्रसन्न कर लिया था

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् |
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वय
चकार चण्ड्ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् || १||

जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावक
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम || २||

धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे |
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे( क्वचिच्चिदंबरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि || ३||

लताभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वध मुखे |
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि || ४|

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः |
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः || ५||

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
-निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् |
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः || ६||

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके |
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
- प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ||| ७||

नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः |
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः || ८||

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
- वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् |
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकछिदं तमंतकच्छिदं भजे || ९|

अखर्व( अगर्व) सर्वमङ्गलाकलाकदंबमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृंभणामधुव्रतम् |
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे || १०||

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-
- द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् |
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः || ११||

स्पृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-
- गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः |
तृष्णारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः ( समं प्रवर्तयन्मनः) कदा सदाशिवं भजे || १२||

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् |
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् || १३||

इदम् हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम्
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् || १४||

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः
शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे |
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शंभुः || १५||

सम्पूर्ण शिव- ताण्डव- स्तोत्रम्

4…..शिव षडक्षर स्तोत्रम् …………
ॐकारं बिंदुसंयुक्तं नित्यं ध्यायंति योगिनः ।
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः ॥१॥
नमंति ऋषयो देवा नमन्त्यप्सरसां गणाः ।
नरा नमंति देवेशं नकाराय नमो नमः ॥२॥
महादेवं महात्मानं महाध्यानं परायणम् ।
महापापहरं देवं मकाराय नमो नमः ॥३॥
शिवं शांतं जगन्नाथं लोकानुग्रहकारकम् ।
शिवमेकपदं नित्यं शिकाराय नमो नमः ॥४॥
वाहनं वृषभो यस्य वासुकिः कंठभूषणम् ।
वामे शक्तिधरं देवं वकाराय नमो नमः ॥५॥
यत्र यत्र स्थितो देवः सर्वव्यापी महेश्वरः ।
यो गुरुः सर्वदेवानां यकाराय नमो नमः ॥६॥
षडक्षरमिदं स्तोत्रं यः पठेच्छिवसंनिधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥७॥

5……शिवप्रातःस्मरणस्तोत्रम् ………
प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं
गङ्गाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम् ।
खट्वाङ्गशूलवरदाभयहस्तमीशं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥१॥
प्रातर्नमामि गिरिशं गिरिजार्धदेहं
सर्गस्थितिप्रलयकारणमादिदेवम् ।
विश्वेश्वरं विजितविश्वमनोभिरामं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥२॥
प्रातर्भजामि शिवमेकमनन्तमाद्यं
वेदान्तवेद्यमनघं पुरुषं महान्तम् ।
नामादिभेदरहितं षड्भावशून्यं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥३॥
39… (शिव पञ्चाक्षर स्तोत्रम्)
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय
तस्मै नकाराय नमः शिवाय ॥१॥
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय
नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय
तस्मै मकाराय नमः शिवाय ॥२॥
शिवाय गौरीवदनाब्जबालसूर्याय
दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय
तस्मै शिकाराय नमः शिवाय ॥३॥
वशिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमूनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय
तस्मै वकाराय नमः शिवाय ॥४॥
यज्ञस्वरूपाय जटाधराय
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय
तस्मै यकाराय नमः शिवाय ॥५॥
पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसंनिधौ ।
शिवलोकमावाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥६॥

6…..(दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्)………..
मौनव्याख्या प्रकटित परब्रह्मतत्त्वं युवानं
वर्षिष्ठांते वसद् ऋषिगणौः आवृतं ब्रह्मनिष्ठैः ।
आचार्येन्द्रं करकलित चिन्मुद्रमानंदमूर्तिं
स्वात्मारामं मुदितवदनं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥
विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं
पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया ।
यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥१॥
बीजस्याऽन्तरिवाङ्कुरो जगदिदं प्राङ्गनिर्विकल्पं पुनः
मायाकल्पितदेशकालकलना वैचित्र्यचित्रीकृतम् ।
मायावीव विजृम्भयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥२॥
यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थकं भासते
साक्षात्तत्त्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान् ।
यत्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुनरावृत्तिर्भवाम्भोनिधौ
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥३॥
नानाच्छिद्रघटोदरस्थितमहादीपप्रभा भास्वरं
ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरणद्वारा वहिः स्पन्दते ।
जानामीति तमेव भान्तमनुभात्येतत्समस्तं जगत्
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥४॥
देहं प्राणमपीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुः
स्त्रीबालान्धजडोपमास्त्वहमिति भ्रान्ता भृशं वादिनः ।
मायाशक्तिविलासकल्पितमहाव्यामोहसंहारिणो
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥५॥
राहुग्रस्तदिवाकरेन्दुसदृशो मायासमाच्छादनात्
सन्मात्रः करणोपसंहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान् ।
प्रागस्वाप्समिति प्रबोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥६॥
बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि
व्यावृत्तास्वनुवर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा ।
स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रयाभद्रया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥७॥
विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसम्बन्धतः
शिष्याचार्यतया तथैव पितृपुत्राद्यात्मना भेदतः ।
स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो मायापरिभ्रामितः
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥८॥
भूरम्भांस्यनलोऽनिलोऽम्बरमहर्नाथो हिमांशु पुमान्
इत्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम्
नान्यत् किञ्चन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभोः
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥९॥
सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिन् स्तवे
तेनास्य श्रवणात्तदर्थमननाद्ध्यानाच्च संकीर्तनात् ।
सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः
सिद्ध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्यमव्याहतम् ॥१०॥

1…..शिव – कल्याण स्वरूप
महेश्वर – माया के अधीश्वर
शम्भू – आनंद स्स्वरूप वाले
पिनाकी – पिनाक धनुष धारण करने वाले
शशिशेखर – सिर पर चंद्रमा धारण करने वाले
वामदेव – अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
विरूपाक्ष – भौंडी आँख वाले
कपर्दी – जटाजूट धारण करने वाले
नीललोहित – नीले और लाल रंग वाले
शंकर – सबका कल्याण करने वाले
शूलपाणी – हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले
खटवांगी – खटिया का एक पाया रखने वाले
विष्णुवल्लभ – भगवान विष्णु के अतिप्रेमी
शिपिविष्ट – सितुहा में प्रवेश करने वाले
अंबिकानाथ – भगवति के पति
श्रीकण्ठ – सुंदर कण्ठ वाले
भक्तवत्सल – भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले
भव – संसार के रूप में प्रकट होने वाले
शर्व – कष्टों को नष्ट करने वाले
त्रिलोकेश – तीनों लोकों के स्वामी
शितिकण्ठ – सफेद कण्ठ वाले
शिवाप्रिय – पार्वती के प्रिय
उग्र – अत्यंत उग्र रूप वाले
कपाली – कपाल धारण करने वाले
कामारी – कामदेव के शत्रु
अंधकारसुरसूदन – अंधक दैत्य को मारने वाले
गंगाधर – गंगा जी को धारण करने वाले
ललाटाक्ष – ललाट में आँख वाले
कालकाल – काल के भी काल
कृपानिधि – करूणा की खान
भीम – भयंकर रूप वाले
परशुहस्त – हाथ में फरसा धारण करने वाले
मृगपाणी – हाथ में हिरण धारण करने वाले
जटाधर – जटा रखने वाले
कैलाशवासी – कैलाश के निवासी
कवची – कवच धारण करने वाले
कठोर – अत्यन्त मजबूत देह वाले
त्रिपुरांतक – त्रिपुरासुर को मारने वाले
वृषांक – बैल के चिह्न वाली झंडा वाले
वृषभारूढ़ – बैल की सवारी वाले
भस्मोद्धूलितविग्रह – सारे शरीर में भस्म लगाने वाले
सामप्रिय – सामगान से प्रेम करने वाले
स्वरमयी – सातों स्वरों में निवास करने वाले
त्रयीमूर्ति – वेदरूपी विग्रह करने वाले
अनीश्वर – जिसका और कोई मालिक नहीं है
सर्वज्ञ – सब कुछ जानने वाले
परमात्मा – सबका अपना आपा
सोमसूर्याग्निलोचन – चंद्र, सूर्य और अग्निरूपी आँख वाले
हवि – आहूति रूपी द्रव्य वाले
यज्ञमय – यज्ञस्वरूप वाले
सोम – उमा के सहित रूप वाले
पंचवक्त्र – पांच मुख वाले
सदाशिव – नित्य कल्याण रूप वाले
विश्वेश्वर – सारे विश्व के ईश्वर
वीरभद्र – बहादुर होते हुए भी शांत रूप वाले
गणनाथ – गणों के स्वामी
प्रजापति – प्रजाओं का पालन करने वाले
हिरण्यरेता – स्वर्ण तेज वाले
दुर्धुर्ष – किसी से नहीं दबने वाले
गिरीश – पहाड़ों के मालिक
गिरिश – कैलाश पर्वत पर सोने वाले
अनघ – पापरहित
भुजंगभूषण – साँप के आभूषण वाले
भर्ग – पापों को भूंज देने वाले
गिरिधन्वा – मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले
गिरिप्रिय – पर्वत प्रेमी
कृत्तिवासा – गजचर्म पहनने वाले
पुराराति – पुरों का नाश करने वाले
भगवान् – सर्वसमर्थ षड्ऐश्वर्य संपन्न
प्रमथाधिप – प्रमथगणों के अधिपति
मृत्युंजय – मृत्यु को जीतने वाले
सूक्ष्मतनु – सूक्ष्म शरीर वाले
जगद्व्यापी – जगत् में व्याप्त होकर रहने वाले
जगद्गुरू – जगत् के गुरू
व्योमकेश – आकाश रूपी बाल वाले
महासेनजनक – कार्तिकेय के पिता
चारुविक्रम – सुन्दर पराक्रम वाले
रूद्र – भक्तों के दुख देखकर रोने वाले
भूतपति – भूतप्रेत या पंचभूतों के स्वामी
स्थाणु – स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले
अहिर्बुध्न्य – कुण्डलिनी को धारण करने वाले
दिगम्बर – नग्न, आकाशरूपी वस्त्र वाले
अष्टमूर्ति – आठ रूप वाले
अनेकात्मा – अनेक रूप धारण करने वाले
सात्त्विक – सत्व गुण वाले
शुद्धविग्रह – शुद्धमूर्ति वाले
शाश्वत – नित्य रहने वाले
खण्डपरशु – टूटा हुआ फरसा धारण करने वाले
अज – जन्म रहित
पाशविमोचन – बंधन से छुड़ाने वाले
मृड – सुखस्वरूप वाले
पशुपति – पशुओं के मालिक
देव – स्वयं प्रकाश रूप
महादेव – देवों के भी देव
अव्यय – खर्च होने पर भी न घटने वाले
हरि – विष्णुस्वरूप
पूषदन्तभित् – पूषा के दांत उखाड़ने वाले
अव्यग्र – कभी भी व्यथित न होने वाले
दक्षाध्वरहर – दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले
हर – पापों व तापों को हरने वाले
भगनेत्रभिद् – भग देवता की आंख फोड़ने वाले
अव्यक्त – इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले
सहस्राक्ष – अनंत आँख वाले
सहस्रपाद – अनंत पैर वाले
अपवर्गप्रद – कैवल्य मोक्ष देने वाले
अनंत – देशकालवस्तुरूपी परिछेद से रहित
तारक – सबको तारने वाला
परमेश्वर – सबसे परे ईश्वर
2…… शिव स्वरूप वर्णन…
भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही आकर्षक भी। शिव जो धारण करते हैं, उनके भी बड़े व्यापक अर्थ हैं :
जटाएं : शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं।
चंद्र : चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है।
त्रिनेत्र : शिव की तीन आंखें हैं। इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव की ये आंखें सत्व, रज, तम (तीन गुणों), भूत, वर्तमान, भविष्य (तीन कालों), स्वर्ग, मृत्यु पाताल (तीनों लोकों) का प्रतीक हैं।
सर्पहार : सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है।
त्रिशूल : शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशूल भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है।
डमरू : शिव के एक हाथ में डमरू है, जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है।
मुंडमाला : शिव के गले में मुंडमाला है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में किया हुआ है।
छाल : शिव ने शरीर पर व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल पहनी हुई है। व्याघ्र हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है।
भस्म : शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से किया जाता है। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है।
वृषभ : शिव का वाहन वृषभ यानी बैल है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ धर्म का प्रतीक है। महादेव इस चार पैर वाले जानवर की सवारी करते हैं, जो बताता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनकी कृपा से ही मिलते हैं
3…… शिव के शिर पर चन्द्र क्यों
उज्जैन. शिव, शंकर, भोलेनाथ, महादेव, महाकाल आदि असंख्य
नामों से पूजे जाते हैं भोलेभंडारी। इनका एक नाम शशिधर
भी है। शिवजी अपने मस्तक पर चंद्र को धारण किया है
इसी वजह से इन्हें शशिधर के नाम से भी जाना जाता है। भोलेनाथ ने मस्तक पर चंद्र को क्यों धारण कर रखा है?
इस संबंध में शिव पुराण में उल्लेख है कि जब देवताओं और
असुरों द्वारा समुद्र मंथन किया गया, तब 14 रत्नों के मंथन से
प्रकट हुए। इस मंथन में सबसे विष निकला। विष
इतना भयंकर था कि इसका प्रभाव पूरी सृष्टि पर
फैलता जा रहा था परंतु इसे रोक पाना किसी भी देवी- देवता या असुर के बस में नहीं था। इस समय सृष्टि को बचाने के
उद्देश्य से शिव ने वह अति जहरीला विष पी लिया। इसके
बाद शिवजी का शरीर विष प्रभाव से अत्यधिक गर्म होने
लगा। शिवजी के शरीर को शीतलता मिले इस वजह से
उन्होंने चंद्र को धारण किया।
चंद्र को धारण कर क्या संदेश देते हैं शिव? शिवजी को अति क्रोधित स्वभाव का बताया गया है। कहते
हैं कि जब शिवजी अति क्रोधित होते हैं
तो उनका तीसरा नेत्र खुल जाता हैं तो पूरी सृष्टि पर
इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। साथ ही विषपान के बाद
शिवजी का शरीर और अधिक गर्म हो गया जिसे शीतल
करने के लिए उन्होंने चंद्र आदि को धारण किया। चंद्र को धारण करके शिवजी यही संदेश देते हैं कि आपका मन
हमेशा शांत रहना चाहिए। आपका स्वभाव चाहे
जितना क्रोधित हो परंतु आपका मन हमेशा ही चंद्र की तरह
ठंडक देने वाला रहना चाहिए। जिस तरह चांद सूर्य से
उष्मा लेकर भी हमें शीतलता ही प्रदान करता है उसी तरह हमें
भी हमारा स्वभाव बनाना चाहिए।
4.…. शास्त्रों के मुताबिक शिव ग्यारहअलग-अलग रुद्र रूपों में दु:खों का नाश करते हैं। यह ग्यारह रूप एकादश रुद्र के नाम से जाने जाते हैं। जानते हैं ऐसे ही ग्यारह रूद्र रूपों को -
1. शम्भू – शास्त्रों के मुताबिक यह रुद्र रूप साक्षात ब्रह्म है। इस रूप में ही वह जगत की रचना, पालन और संहार करते हैं।
2. पिनाकी – ज्ञान शक्ति रुपी चारों वेदों के के स्वरुप माने जाने वाले पिनाकी रुद्र दु:खों काअंत करते हैं।
3. गिरीश – कैलाशवासी होने से रुद्र का तीसरा रुप गिरीश कहलाता है। इस रुप में रुद्र सुख और आनंद देने वाले माने गए हैं।
4. स्थाणु – समाधि, तप और आत्मलीन होने से रुद्र का चौथा अवतार स्थाणु कहलाता है। इस रुप में पार्वती रूप शक्ति बाएं भाग में विराजित होती है।
5. भर्ग – भगवान रुद्र का यह रुप बहुत तेजोमयी है। इस रुप में रुद्र हर भय और पीड़ा का नाश करने वाले होते हैं।
6. भव – रुद्र का भव रुप ज्ञान बल, योग बल और भगवत प्रेम के रुप में सुख देने वाला माना जाता है।
7. सदाशिव – रुद्र का यह स्वरुप निराकार ब्रह्मका साकार रूप मानाजाता है। जो सभी वैभव, सुख और आनंददेने वाला माना जाता है।
8. शिव – यह रुद्र रूप अंतहीन सुख देने वाला यानि कल्याण करने वाला माना जाता है। मोक्ष प्राप्ति के लिए शिव आराधना महत्वपूर्ण मानीजाती है।
9. हर – इस रुप में नाग धारण करने वाले रुद्र शारीरिक, मानसिक और सांसारिक दु:खों को हर लेते हैं। नाग रूपी काल पर इन का नियंत्रण होता है।
10. शर्व – काल को भी काबू में रखनेवाला यह रुद्र रूप शर्व कहलाता है।
11. कपाली – कपाल रखने के कारण रुद्र का यह रूप कपाली कहलाता है।इस रुप में ही दक्ष का दंभ नष्ट किया, किंतु प्राणीमात्र के लिए रुद्र का यही रूप समस्त सुख देने वाला माना जाता है।
दोस्तों, हनारी यही प्रार्थना रहेगी की आप शिव कृपा को जरूर शेयर करे ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग शिव ज्ञान से लाभ पा सकें..
5……… शिवजी की पूजा से क्यों मान जाते हैं रूठे शनि देव? शनि देव को न्यायाधीश भी कहते हैं। कहा जाता है कि शनि की कुदृष्टि जिस पर पड़ जाए वह रातों-रात राजा से भिखारी हो जाता है और वहीं शनि की कृपा से भिखारी भी राजा के समान सुख प्राप्त करता है। इसीलिए शनिदेव को मनाने के लिए उनके भक्तो द्वारा अनेक उपाय किए जाते हैं उनमें से ही एक है शिव पूजा व महामृत्युंजय मंत्र का जप। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि शिव को मना लेने पर रूठे शनि क्यों मान जाते हैं? दरअसल शास्त्रों के अनुसार शनिदेव सूर्यदेव के पुत्र हैं। शनि को काला माना गया है। कथा के अनुसार एक बार शनिदेव अपने काले रंग रूप से दुखी होकर अपने पिता के पास पहुंचे और उनसे बोले पिताश्री मैं आपका पुत्र हूं और आप तो इतने तेजस्वी हैं और मैं इतना श्यामवर्ण और कुरूप इसीलिए सभी आपको पूजते हैं लेकिन मेरी पूजा कोई नहीं करता है। इसीलिए मैं बहुत दुखी हूं। मुझे समझ नहीं आता कि मैं क्या करूं। तब सूर्यदेव ने कहा पुत्र तुम महामृत्युंजय मंत्र के जप से शिव का जप करो तो तुम्हारी इस समस्या का समाधान निश्चित ही हो जाएगा। उसके बाद शनिदेव ने शिवजी की महामृत्युंजय मंत्र द्वारा आराधना की , शनि देव के कठोर तप से प्रसन्न हो कर शिवजी ने स्वयम को भी काले रंग के पत्थर (शिवलिंग) में परिवर्तित कर लिया और कहा हे शनि जब तक संसार में शिवलिंग पर गंगा जल का अभिषेक होता रहेगा तुम शांतचित हो कर भक्तों को शुभ आशीर्वाद देते रहोगे वास्तव में काला पत्थर तुम हो और आने वाले समय में काले रंग की समस्त वस्तुयों पर तुम्हारा अधिकार रहेगा और मानव को जीवन में सबसे अधिक काले पत्थर और लोहे की आवश्यकता रहेगी , संसार तुम्हारे बिना अधुरा रहेगा | और शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें ग्रह के रूप में पूजा ने का आर्शीवाद दिया तभी से शनिदेव नौ ग्रहों में पूजे जाते हैं। इसीलिए धर्मशास्त्रों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि शिवजी के पूजन व महामृत्युंजय मंत्र के जप से भी शनि के अशुभ प्रभाव से मुक्ति मिलती है।
6…… शिवाष्टकं :

प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं जगन्नाथनाथं सदानन्दभाजाम् ।
भवद्भव्यभूतेश्वरं भूतनाथं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ १॥

गले रुण्डमालं तनौ सर्पजालं महाकालकालं गणेशाधिपालम् ।
जटाजूटभङ्गोत्तरङ्गैर्विशालं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ २॥

मुदामाकरं मण्डनं मण्डयन्तं महामण्डल भस्मभूषधरंतम् ।
अनादिह्यपारं महामोहहारं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ३॥

तटाधो निवासं महाट्टाट्टहासं महापापनाशं सदासुप्रकाशम् ।
गिरीशं गणेशं महेशं सुरेशं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ४॥

गिरिन्द्रात्मजासंग्रहीतार्धदेहं गिरौ संस्थितं सर्वदा सन्नगेहम् ।
परब्रह्मब्रह्मादिभिर्वन्ध्यमानं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ५॥

कपालं त्रिशूलं कराभ्यां दधानं पदाम्भोजनम्राय कामं ददानम् ।
बलीवर्दयानं सुराणां प्रधानं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ६॥

शरच्चन्द्रगात्रं गुणानन्द पात्रं त्रिनेत्रं पवित्रं धनेशस्य मित्रम् ।
अपर्णाकलत्रं चरित्रं विचित्रं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ७॥

हरं सर्पहारं चिता भूविहारं भवं वेदसारं सदा निर्विकारम् ।
श्मशाने वदन्तं मनोजं दहन्तं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ८॥

स्तवं यः प्रभाते नरः शूलपाणे पठेत् सर्वदा भर्गभावानुरक्तः ।
स पुत्रं धनं धान्यमित्रं कलत्रं विचित्रं समासाद्य मोक्षं प्रयाति ॥ ९॥

॥ इति शिवाष्टकम् संपूर्णम्॥

7….लाङ्गूलास्त्र शत्रुञ्जय हनुमत् स्तोत्र…………
ॐ हनुमन्तमहावीर वायुतुल्यपराक्रमम् ।
मम कार्यार्थमागच्छ प्रणमाणि मुहुर्मुहुः ।।
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीहनुमच्छत्रुञ्जयस्तोत्रमालामन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः, नानाच्छन्दांसि श्री महावीरो हनुमान् देवता मारुतात्मज इति ह्सौं बीजम्, अञ्जनीसूनुरिति ह्फ्रें शक्तिः, ॐ हा हा हा इति कीलकम् श्री राम-भक्ति इति ह्वां प्राणः, श्रीराम-लक्ष्मणानन्दकर इति ह्वां ह्वीं ह्वूं जीव, ममाऽरातिपराजय-निमित्त-शत्रुञ्जय-स्तोत्र-मन्त्र-जपे विनियोगः ।

करन्यासः-
ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं हनुमते अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं रामदूताय तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं लक्ष्मण-प्राणदात्रे मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं अञ्जनीसूनवे अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं सीताशोक-विनाशाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं लङ्काप्रासादभञ्जनाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

हृदयादि-न्यासः-
ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं हनुमते हृदयाय नमः ।
ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं रामदूताय शिरसे स्वाहा ।
ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं लक्ष्मण-प्राणदात्रे शिखायै वषट् ।
ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं अञ्जनीसूनवे कवचाय हुम् ।
ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं सीताशोक-विनाशाय नेत्र-त्रयाय वोषट् ।
ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं लङ्काप्रासादभञ्जनाय अस्त्राय फट् ।

ध्यानः-
ध्यायेदच् बालदिवाकर द्युतनिभं देवार्रिदर्पापहं देवेन्द्रप्रमुख-प्रशस्तयशसं देदीप्यमानं रुचा ।
सुग्रीवादिसमस्तवानरयुतं सुव्यक्त-तत्त्व-प्रियं संरक्तारुण-लोचनं पवनजं पीताम्बरालंकृतम् ।।
उद्यन्मार्तण्ड-कोटि-प्रकटरुचियुतं चारुवीरासनस्थं मौञ्जीयज्ञोपवीताभरणरुचिशिखं शोभितं कुंडलाङ्कम् ।
भक्तानामिष्टदं तं प्रणतमुनिजनं वेदनादप्रमोदं ध्यायेद् देवं विधेयं प्लवगकुलपतिं गोष्पदी भूतवार्धिम् ।।
वज्राङ्गं पिङ्गकेशाढ्यं स्वर्णकुण्डल-मण्डितम् । निगूढमुपसङ्गम्य पारावारपराक्रमम् ।।
स्फटिकाभं स्वर्णकान्तिं द्विभुजं च कृताञ्जलिम् । कुण्डलद्वयसंशोभिमुखाम्भोजं हरिं भजे ।।
सव्यहस्ते गदायुक्तं वामहस्ते कमण्डलुम् । उद्यद्दक्षिणदोर्दण्डं हनुमन्तं विचिन्तयेत् ।।

इस तरह से श्रीहनुमानजी का ध्यान करके “अरे मल्ल चटख” तथा “टोडर मल्ल चटख” का उच्चारण करके हनुमानजी को ‘कपिमुद्रा’ प्रदर्शित करें ।
।। माला-मन्त्र ।।
“ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें हस्ख्फ्रें ह्सौं नमो हनुमते त्रैलोक्याक्रमण-पराक्रमण-श्रीरामभक्त मम परस्य च सर्वशत्रून् चतुर्वर्णसम्भवान् पुं-स्त्री-नपुंसकान् भूत-भविष्यद्-वर्तमानान् दूरस्थ-समीपस्थान् नाना-नामघेयान् नाना-संकर-जातियान् कलत्र-पुत्र-मित्र-भृत्य-बन्धु-सुहृत्-समेतान् प्रभु-शक्ति-समेतान् धन-धान्यादि-सम्पत्ति-युतान् राज्ञो-राजपुत्र-सरवकान् मंत्री-सचिव-सखीन् आत्यन्ति कान्क्षणेन त्वरया एतद्दिनावधि नानोपायैर्मारय मारय शस्त्रेण छेदय छेदय अग्निना ज्वालय ज्वालय दाहय दाहय अक्षयकुमारवत् पादताक्रमणे शिलातले त्रोटय त्रोटय घातय घातय बंधय बंधय भ्रामय भ्रामय भयातुरान्विसंज्ञान्सद्यः कुरु कुरु भस्मीभूतानुद्धूलय भस्मीभूतानुद्धूलय भक्तजनवत्सल सीताशोकापहारक सर्वत्र मामेनं च रक्ष रक्ष महारुद्रावतार हां हां हुं हुं भूत-संघैः सह भक्षय भक्षय क्रुद्ध चेतसा नखैर्विदारय नखैर्विदारय देशादस्मादुच्चाटय पिशाचवद् भ्रंशय भ्रंशय घे घे हूं फट् स्वाहा ।।१।।
ॐ नमो भगवते हनुमते महाबलपराक्रमाय महाविपत्ति-निवारकाय भक्तजन मनःकल्पना कल्पद्रुमाय दुष्टजन-मनोरथ-स्तम्भकाय प्रभञ्जन-प्राणप्रियाय स्वाहा ।।२।।
ध्यानः-
श्रीमन्तं हनुमन्तमात्तरिपुभिद्भूभृत्तरुभ्राजितं वल्गद्वालधिबद्धवैरिनिचयं चामीकराद्रिप्रभम् ।
रोषाद्रक्तपिशङ्ग-नेत्र नलिनं भ्रूमभङ्मङ्गस्फुरत् प्रोद्यच्चण्ड-मयूख-मण्डल-मुखं-दुःखापहं दुःखिनाम् ।।१।।
कौपीनं कटिसूत्रमौंज्यजिनयुग्देहं विदेहात्मजाप्राणाधीश-पदारविन्द-निरतं स्वान्तं कृतान्तं द्विषाम् ।
ध्यात्वैव समराङ्गणस्थितमथानीय स्वहृत्पङ्कजे संपूजनोक्तविधिना संप्रार्थयेत्प्रार्थितम् ।।२।।
।।मूल-पाठ।।
हनुमन्नञ्जनीसूनो ! महाबलपराक्रम ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१।।
मर्कटाधिप ! मार्तण्ड मण्डल-ग्रास-कारक ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।२।।
अक्षक्षपणपिङ्गाक्षक्षितिजाशुग्क्षयङ्र ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।३।।
रुद्रावतार ! संसार-दुःख-भारापहारक ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।४।।
श्रीराम-चरणाम्भोज-मधुपायितमानस ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।५।।
बालिप्रथमक्रान्त सुग्रीवोन्मोचनप्रभो ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।६।।
सीता-विरह-वारीश-मग्न-सीतेश-तारक ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।७।।
रक्षोराज-तापाग्नि-दह्यमान-जगद्वन ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।८।।
ग्रस्ताऽशैजगत्-स्वास्थ्य-राक्षसाम्भोधिमन्दर ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।९।।
पुच्छ-गुच्छ-स्फुरद्वीर-जगद्-दग्धारिपत्तन ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१०।।
जगन्मनो-दुरुल्लंघ्य-पारावार विलंघन ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।११।।
स्मृतमात्र-समस्तेष्ट-पूरक ! प्रणत-प्रिय ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१२।।
रात्रिञ्चर-चमूराशिकर्त्तनैकविकर्त्तन ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१३।।
जानकी जानकीजानि-प्रेम-पात्र ! परंतप ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१४।।
भीमादिक-महावीर-वीरवेशावतारक ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१५।।
वैदेही-विरह-क्लान्त रामरोषैक-विग्रह ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१६।।
वज्राङ्नखदंष्ट्रेश ! वज्रिवज्रावगुण्ठन ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१७।।
अखर्व-गर्व-गंधर्व-पर्वतोद्-भेदन-स्वरः ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१८।।
लक्ष्मण-प्राण-संत्राण त्रात-तीक्ष्ण-करान्वय ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।१९।।
रामादिविप्रयोगार्त्त ! भरताद्यार्त्तिनाशन ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।२०।।
द्रोणाचल-समुत्क्षेप-समुत्क्षिप्तारि-वैभव ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।२१।।
सीताशीर्वाद-सम्पन्न ! समस्तावयवाक्षत ! ।
लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।।२२।।
इत्येवमश्वत्थतलोपविष्टः शत्रुंजयं नाम पठेत्स्वयं यः ।
स शीघ्रमेवास्त-समस्तशत्रुः प्रमोदते मारुतज प्रसादात् ।।२३।।
।। इति शत्रुञ्जय-हनुमत्स्त्रोतं ।

8…..।। अथ आञ्जनेयास्त्रम् ।।……..
अधुना गिरिजानन्द आञ्जनेयास्त्रमुत्तमम् ।
समन्त्रं सप्रयोगं च वद मे परमेश्वर ।।१।।
।।ईश्वर उवाच।।
ब्रह्मास्त्रं स्तम्भकाधारि महाबलपराक्रम् ।
मन्त्रोद्धारमहं वक्ष्ये श्रृणु त्वं परमेश्वरि ।।२।।
आदौ प्रणवमुच्चार्य मायामन्मथ वाग्भवम् ।
शक्तिवाराहबीजं व वायुबीजमनन्तरम् ।।३।।
विषयं द्वितीयं पश्चाद्वायु-बीजमनन्तरम् ।
ग्रसयुग्मं पुनर्वायुबीजं चोच्चार्य पार्वति ।।४।।
स्फुर-युग्मं वायु-बीजं प्रस्फुरद्वितीयं पुनः ।
वायुबीजं ततोच्चार्य हुं फट् स्वाहा समन्वितम् ।।५।।
आञ्जनेयास्त्रमनघे पञ्चपञ्चदशाक्षरम् ।
कालरुद्रो ऋषिः प्रोक्तो गायत्रीछन्द उच्यते ।।६।।
देवता विश्वरुप श्रीवायुपुत्रः कुलेश्वरि ।
ह्रूं बीजं कीलकं ग्लौं च ह्रीं-कार शक्तिमेव च ।।७।।
प्रयोगं सर्वकार्येषु चास्त्रेणानेन पार्वति ।
विद्वेषोच्चाटनेष्वेव मारणेषु प्रशस्यते ।।८।।

विनियोगः- ॐ अस्य श्रीहनुमाद्-आञ्जनेयास्त्र-विद्या-मन्त्रस्य कालरुद्र ऋषिः, गायत्री छन्दः, विश्वरुप-श्रीवायुपुत्रो देवता, ह्रूं बीजं, ग्लौं कीलकं, ह्रीं शक्तिः, मम शत्रुनिग्रहार्थे हनुमन्नस्त्र जपे विनियोगः ।
मन्त्रः- “ॐ ह्रीं क्लीं ऐं सौं ग्लौं यं शोषय शोषय यं ग्रस ग्रस यं विदारय विदारय यं भस्मी कुरु कुरु यं स्फुर स्फुर यं प्रस्फुर प्रस्फुर यं सौं ग्लौं हुं फट् स्वाहा ।”

।। विधान ।।
नामद्वयं समुच्चार्यं मन्त्रदौ कुलसुन्दरि ।
प्रयोगेषु तथान्येषु सुप्रशस्तो ह्ययं मनुः ।।९।।
आदौ विद्वेषणं वक्ष्ये मन्त्रेणानेन पार्वति ।
काकोलूकदलग्रन्थी पवित्रीकृत-बुद्धिमान् ।।१०।।
तर्पयेच्छतवारं तु त्रिदिनाद्द्वेषमाप्नुयात् ।
ईक्ष्यकर्ममिदं म मन्त्रांते त्रिशतं जपेत् ।।११।।
वसिष्ठारुन्धतीभ्यां च भवोद्विद्वेषणं प्रिये ।
महद्विद्वेषणं भूत्वा कुरु शब्दं विना प्रिये ।।१२।।
मन्त्रं त्रिशतमुच्चार्य नित्यं मे कलहप्रिये ।
ग्राहस्थाने ग्रामपदे उच्चार्याष्ट शतं जपेत् ।।१३।।
ग्रामान्योन्यं भवेद्वैरमिष्टलाभो भवेत् प्रिये ।
देशशब्द समुच्चार्य द्विसहस्त्रं जपेन्मनुम् ।।१४।।
देशो नाशं समायाति अन्योन्यं क्लेश मे वच ।
रणशब्दं समुच्चार्य जपेदष्टोत्तरं शतम् ।।१५।।
अग्नौ नता तदा वायुदिनान्ते कलहो भवेत् ।
उच्चाटन प्रयोगं च वक्ष्येऽहं तव सुव्रते ।।१६।।
उच्चाटन पदान्तं च अस्त्रमष्टोत्तरं शतम् ।
तर्पयेद्भानुवारे यो निशायां लवणांबुना ।।१७।।
त्रिदिनादिकमन्त्रांते उच्चाटनमथो भवेत् ।
भौमे रात्रौ तथा नग्नो हनुमन् मूलमृत्तिकाम् ।।१८।।
नग्नेन संग्रहीत्वा तु स्पष्ट वाचाष्टोत्तरं जपेत् ।
समांशं च प्रेतभस्म शल्यचूर्णे समांशकम् ।।१९।।
यस्य मूर्ध्नि क्षिपेत्सद्यः काकवद्-भ्रमतेमहीम् ।
विप्रचाण्डालयोः शल्यं चिताभस्म तथैव च ।।२०।।
हनुमन्मूलमृद्ग्राह्या बध्वा प्रेतपटेन तु ।
गृहे वा ग्राममध्ये वा पत्तने रणमध्यमे ।।२१।।
निक्षिपेच्छत्रुगर्तेषु सद्यश्चोच्चाटनं भवेत् ।
तडागे स्थापयित्वा तु जलदारिद्यमाप्नुयात् ।।२२।।
मारणं संप्रवक्ष्यामि तवाहं श्रृणु सुव्रते ।
नरास्थिलेखनीं कृत्वा चिताङ्गारं च कज्जलम् ।।२३।।
प्रेतवस्त्रे लिखेदस्त्रं गर्त्त कृत्वा समुत्तमम् ।
श्मशाने निखनेत्सद्यः सहस्त्राद्रिपुमारणे ।।२४।।
न कुर्याद्विप्रजातिभ्यो मारणं मुक्तिमिच्छता ।
देवानां ब्राह्मणानां च गवां चैव सुरेश्वरि ।।२५।।
उपद्रवं न कुर्वीत द्वेषबुद्धया कदाचन ।
प्रयोक्तव्यं तथान्येषां न दोषो मुनिरब्रवीत् ।।२६।।
।। इति सुदर्शन-संहिताया आञ्नेयास्त्रम् ।।

9……विविध गुरू-शिष्य परंपरा:…………
सदगुरु – सदशिष्य – संदर्भग्रंथ – ग्रंथकार
१) श्रीवसिष्ठऋषी, श्रीप्रभूरामचंद्र, योगवासिष्ठ,
२) श्रीमहाविष्णू, भक्त ध्रुव, श्रीमत भागवतपुराण
३) श्रीदत्तात्रेय, श्रीयदुराज, श्रीनाथभागवत (यदु-अवधूत संवाद), श्रीसंत एकनाथ
४) श्रीरामचंद्र, श्रीमारुतिराय, कंबरामायण, वाल्मिकीरामायण, वाल्मिक ऋषी
५) श्रीअंगिरसऋषी, श्रीकृष्ण, छांदोग्य उपनिषद
६) श्रीकृष्ण, श्रीउध्दव, श्रीएकनाथी भागवत, श्रीसंत एकनाथ
७) श्रीकृष्ण, श्रीअर्जुन, श्रीज्ञानेश्वरी, श्रीसंत ज्ञानेश्वर
८) श्रीपुरीमहाराज, श्रीचैतन्यमहाप्रभू, श्रीचैतन्यचरितावलि
९) श्रीशंकर, श्रीहरिनाथ, विवेकसिंधू, श्रीमुकुंदराज
१०) श्रीगहिनीनाथ, श्रीसंत निवृत्तिनाथ, श्रीज्ञानेश्वरी, श्रीसंत ज्ञानेश्वर
११) श्रीसंत निवृत्तिनाथ, श्रीसंत ज्ञानेश्वर, श्रीज्ञानेश्वरी, श्रीसंत ज्ञानेश्वर
१२) श्रीविसोबा खेचर, श्री नामदेव, श्रीनामदेवगाथा, श्रीसंत नामदेव
१३) श्रीदत्तात्रेय, श्रीजनार्दनस्वामी, श्रीएकनाथी भागवत, श्रीसंत एकनाथ
१४) श्रीजनार्दनस्वामी, श्रीसंत एकनाथ, सकलसंतगाथा
१५) श्रीव्यासमहर्षी, श्रीराघवचैतन्य, केशवचैतन्यकथातरु,
१६) श्रीराघवचैतन्य, केशवचैतन्य, केशवचैतन्यकथातरु,
१७) केशवचैतन्य, श्रीतुकाराममहाराज, केशवचैतन्यकथातरु, केशवचैतन्य
१८) श्रीतुकाराममहाराज, श्रीनिळोबा, श्री निळोबांची अभंगगाथा, श्रीनिळोबा
१९) श्रीगोरक्षनाथ, श्रीसोहरोबानाथ, भक्तमंजिरीमाला, श्रीराजारामप्रासादी
२०) श्रीरघुनाथ, श्रीनिरंजन, स्वात्मप्रचिती
२१) श्रीप्रभूरामचंद्र, श्रीसमर्थरामदासस्वामीमहाराज, भक्तमंजिरीमाला
२२) श्रीसमर्थ, श्रीशिवाजीमहाराज, भक्तमंजिरीमाला
२३) श्रीरघुनाथस्वामी, श्रीआनंदमूर्तीब्रह्मनाळकर, भक्तमंजिरीमाला
२४) श्रीतुकामाई, श्रीब्रह्मचैतन्य गोंदवलेकरमहाराज, श्रीगोंदवलेकरमहाराज चरित्र व वाङ्मय, प्रा.श्री.के.वि.बेलसरे
२५) श्रीगंगाधरतीर्थ, श्रीनारायणतीर्थदेव, श्री नारायण उपदेशामृत, श्रीस्वामीशिवोम्तीर्थमहाराज
२६) श्रीनारायणतीर्थ, श्रीशंकरपुरुषोत्तमतीर्थ, योगविभूति, श्रीस्वामीशिवोम्तीर्थमहाराज
२७) श्रीपरमहंस परिव्राजकाचार्य लोकनाथतीर्थ, श्रीगुळवणीमहाराज, चैतन्यचक्रवर्ती, श्री अच्युत पोटभरे..

10….॥ दिग्रक्षणम् ॥…..
बायें हाथ में पीली सरसों और रक्षासूत्र रखें और उसे दाहिने हाथ ढक कर निम्न मंत्र पढ़े -
ॐ रक्षोहणं वलगहनं वैष्णवीमिद् महन्तं वलागमुत्किरामि यम्मेनिष्टयो पममात्यो निचखानेदं महन्तं वलगमुत्किरामि यम्मे समानो यम समानो निचखानेदं महन्तं वलगमुत्किरामि यस्मे सबंधुर्यम संबधुर्निचखानेद महन्तं वलगमुत्किरामि यम्मे सजातो यम सजातो निचखानोम्कृत्याङ्किरामि ।(वैदिक मन्त्र)
अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमि संस्थिता : । ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ॥
अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचा : सर्वतोदिशम् । सर्वेषामवरोधेन पूजाकर्म समारभे ॥
यदत्र संस्थितं भूतं स्थान माश्रित्य सर्वत : । स्थानं त्यक्त्वा तु तत्सर्व यत्रस्थं तत्र गच्छतु ॥
भूत प्रेत पिशाचाधा अपक्रामन्तु राक्षसा : । स्थानादस्माद् व्रजन्त्वन्यत्स्वीकरोमि भुवंत्विमाम् ॥
भूतानि राक्षसा वापि येऽत्र तिष्ठन्ति केचन । ते सर्वेऽप्यप गच्छन्तु पूजा कर्म कोम्यहम् ॥(पौराणिक मन्त्र)
इसके बाद पीली सरसों दसों दिशाओं में निम्न मंत्रबोलते हुए बिखेरते जायें।
ॐ पूर्वे रक्षतु गोविन्द : आग्नेयां गरुडध्वज : । याम्यां रक्षतु वाराहो नारसिंहस्तु नैऋत्ये ॥
वारुण्या केशवो रक्षेद्वायव्यां मधुसूदन : । उत्तरो श्रीधरो रक्षेदीशाने तु गदाधर : ॥
उर्ध्व गोवर्धनो रक्षेदधस्ताच्च त्रिविक्रम : । एवं दशदिशो रक्षेद्वासुदेवो जनार्दन : ॥
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता । दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋत्यां खड्‌गधारिणी ॥
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी । उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी ॥
उर्ध्वं ब्रह्माणि में रक्षेद्‌धस्ताद् वैष्णवी तथा । एवं दश दिशो रखेच्चामुण्डा शव वाहना ॥
फिर दसों दिशाओं को नमस्कार करें और रक्षासूत्र का कुछ भाग भगवान के चढ़ा दें और बाकी खुद दाहिने हाथ में निम्न मंत्र बोलकर बाँध ले -
ॐ यदाबध्नन् दाक्षायणा हिरण्य गुग् शतानीकाय सुमनस्यमाना:।तन्म आ बध्नामिशतशारदायायुष्मांजरदष्टिर्यथासम।।(वैदिक मन्त्र)
येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबला,तेन्त्वां प्रतिबंधनामि रक्षेत् माम चलमाचल्।।(पौराणिक मन्त्र)
इस प्रकार करने से यज्ञ,अनुष्ठान,जाप,पूजन और साधना आदि में हर प्रकार की दृश्य अदृश्य बाधाओं से रक्षा होती हैं।

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