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“ वक्रतुण्ड महाकाय , सूर्यकोटि समप्रभ ! निर्विघ्नं कुरु मे देव , सर्व कार्येषु सर्वदा” !!

लक्ष्मी से युक्त श्रीनृसिंहभगवान् , महागणपति एवं श्रीगुरु (श्रीनृसिंहाश्रम ) को में नमस्कार करता हुँ।

श्रीगुरुदेव स्तुति:-

“अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरूवे नमः॥

अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।चक्षुरून्मीलितं येन तस्मै श्री गुरूवे नमः॥

गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।गुरू साक्षात परंब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नमः॥

स्थावरं जंगमं व्याप्तं यत्किञ्चित् सचराचरम् ।तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरूवे नमः॥

चिन्मयं व्यापितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥

सर्वश्रुति शिरोरत्न विराजित पदाम्बुजः।वेदान्ताम्बुज सूर्याय तस्मै श्री गुरवे नमः॥

चैतन्य शाश्वतं शान्तं व्योमातीतं निञ्जनः।बिन्दु नाद कलातीतःतस्मै श्री गुरवे नमः॥

ज्ञानशक्ति समारूढःतत्त्व माला विभूषितम्।भुक्ति मुक्ति प्रदाता च तस्मै श्री गुरवे नमः॥

अनेक जन्म सम्प्राप्त कर्म बन्ध विदाहिने।आत्मज्ञान प्रदानेन तस्मै श्री गुरवे नमः॥

शोषणं भव सिन्धोश्च ज्ञापनं सार संपदः।गुरोर्पादोदकं सम्यक् तस्मै श्री गुरवे नमः॥

न गुरोरधिकं त्तत्वं न गुरोरधिकं तपः।तत्त्व ज्ञानात् परं नास्ति तस्मै श्री गुरवे नमः॥

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोर्पदम् ।मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोर्कृपा॥

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं।द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्षयम्॥

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं।भावातीतं त्रिगुणरहितं सद् गुरूं तन्नमामि॥

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥

ध्यानं सत्यं पूजा सत्यं सत्यं देवो निरञ्जनम्।गुरिर्वाक्यं सदा सत्यं सत्यं देव उमापतिः॥”

गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो गुरौ निष्ठा परं तपः | गुरोः परतरं नास्ति त्रिवारं कथयामि ते || ……

भगवान शिवजी कहते हैं – “गुरु ही देव हैं, गुरु ही धर्म हैं, गुरु में निष्ठा ही परम तप है | गुरु से अधिक और कुछ नहीं है यह मैं तीन बार कहता हूँ |” (श्री गुरुगीता श्लोक 152).

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम ! कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा !!

ध्यानं मूलं गुरू: मूर्ती, पूजा मूलं गुरू: पदम्।

मंत्र मूलं गुरू: वाक्यं, मोक्ष मूलं गुरू: कृपा।।

गुरुब्र्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरा:।

गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै: श्री गुरुवे नम:॥

अब महाप्रभु गणेश का ध्यान कहते हैं -

जिनका अङ्ग प्रत्यङ्ग उदीयमान सूर्य के समान रक्त वर्ण का है, जो अपने बायें हाथों में पाश एवं अभयमुद्रा तथा दाहिने हाथों में वरदमुद्रा एवं अंकुश धारण किये हुये हैं, समस्त दुःखों को दूर करने वाले, रक्तवस्त्र धारी, प्रसन्न मुख तथा समस्त भूषणॊं से भूषित होने के कारण मनोहर प्रतीत वाल गजानन गणेश का ध्यान करना चाहिए ॥

“ वक्रतुण्ड महाकाय , सूर्यकोटि समप्रभ ! निर्विघ्नं कुरु मे देव , सर्व कार्येषु सर्वदा” !!

मेरी इस वेबसाईट पर जो  प्रकाशित  लेख है।  इनमे से मेरे कुछ निजी लेख भी है । और मेरे द्वारा कुछ अनुभूत प्रयोग भी है। और कुछ प्रकाशित  लेख कही ना कही लिये गये है। अगर इससे किसी को कोई परेशानी होती है। तो सूचित करे । अगर किसी लेख से किसी को आपत्ति है। तो उसे तुरन्त हटा दिया जायेगा । इस साईट का निमाणॅ इस लिये किया गया है। कि यहाँ पर भारतीय वैदिक ज्योतिष और अंक ज्योतिष॰ रत्न विज्ञान ॰मंत्र यंत्र तंत्र और अन्य गुप्त विद्धयाओ की जानकारी सभी को मिले ।

लक्ष्मी से युक्त श्रीनृसिंहभगवान् , महागणपति एवं श्रीगुरु (श्रीनृसिंहाश्रम ) को में नमस्कार करता हुँ। ॐ श्री सद गुरूदेवाय नमः ॐ श्री गणेशाय नमः ॐ श्री लक्ष्मीनृसिंहाय नम:। भगवान् श्री लक्ष्मीनृसिंह की जय हो । ॐ श्री हनुमते नमः ॐ बं बटुक भैरवाय नमः ॐ ईष्ट देवताभ्यो नमः ।

आप हमारे यहा से व्यापार वृर्दि यंत्र . धनाधीशकुबेरदेवता यंत्र . बगलामुखी यंत्र . श्री यंत्र .  शत्रु नाशक यंत्र . आर्थिक स्थिति में सुधार यंत्र . कर्ज मुक्ति यंत्र . सम्पूर्णवास्तु दोष निवारण यंत्र. सर्वकार्य सिद्धि यंत्र . वशीकरण यंत्र  . नवगग्रह यंत्र  . ऑर तंत्र व नकारात्मक ऊर्जा दूर करने का उपाय जाने . रक्षा मंत्र यंत्र  .विशेष सामग्री से प्रेत बाधा से ग्रस्त घर में धूनी दें, प्रेत बाधा, क्लेशादि दूर होंगे और परिवार में शांति और सुख का वातावरण उत्पन्न होगा। व्यापार स्थल पर यह सामग्री धूनी के रूप में प्रयोग करें, व्यापार में उन्नति होगी।

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वनं समाश्रिता येपि निर्ममा निष्परिग्रहा:

अपिते परिपृच्छन्ति ज्योतिषां गति कोविदम ॥

• जो सर्वस्व त्यागकर वनों में जा चुके हैं, ऐसे राग-द्वेष शुन्य,निष्परिग्रह ऋषि भी अपना भविष्य जानने को उत्सुक रहते हैं, तब साधारण मानव की तो बात ही क्या है ?

आइये जाने,समझे एवं प्रयोग करें.हमारे ऋषि मुनियों द्वारा प्रदत्त उस ज्योतिषीय ज्ञान को.जिसका कोई विकल्प नहीं हें. इस ज्योतिष विद्या के द्वारा आप और हम सभी…

भविष्य में होने वाले अच्छे-बुरे घटना क्रम को जान सकते हें. उपाय. कर सकते हें..

पूजा पाठ,मन्त्र जाप जेसे उपायों द्वारा उस अशुभ घटना को टालने का प्रयास कर सकते हें

2…हरि: ॐ तत् सत्…. महारामायण में शिव जी पारवती जी से कहते है , की जैसे देवताओ में इंद्र ,मनुष्यों में राजा ,अखिल लोको के मध्य गोलोक , समस्त नदियों में श्री सरयू जी ,कवि वृन्दो में अनंत , भक्तो में श्री हनुमान जी ,शक्तियों में श्री जानकी जी ,अवतारों में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी ,.पर्वतों में सुमेरु ,जलाशयों में सागर ,गौओ में कामधेनु ,धनुर्धारियो में कामदेव , पक्षियों में गरुण ,तीर्थो में पुष्कर ,धर्मो में अहिंसा ,साधुत्व प्रतिपादन में दया ,क्षमा वालो में प्रथ्वी ,मणियो में कौस्तुभ ,धनुषो में सारंग ,खड्गो में नंदक ,ज्ञानो में ब्रम्हज्ञान ,भक्ति में प्रेमाभक्ति ,मन्त्र समूह में प्रणव ,वृक्षों में कल्पवृक्ष ,सप्तपुरियो में अयोध्या पुरी ,वेद विहित कर्मो में भगवत्सम्बन्धी कर्म , स्वरसंग्यक वर्णों में अकार श्रेष्ठ है |वैसे ही भगवान के समस्त नामो में श्री राम नाम परम श्रेष्ठ है |

एक बार एक शिस्य अपने गुरु जी के पास पहुंचा और निवेदन किया कि हे गुरुदेव मुझे ऐसा मंत्र दीजिये कि जो मंत्र इस संसार में किसी को न मिला हो | गुरु देव ने कहा कि ” सीता राम ” मंत्र का जप करो | शिस्य वहाँ से मंत्र प्राप्त कर इलाहाबाद संगम स्नान करने गया और संगम स्थान में डुबकी लगा कर ज्यों ही उठा तो देखा कि वहाँ उपस्थित सारे लोग “सीता राम” कर रहे हैं | शिस्य को बड़ा अजीब लगा कि मैंने गुरुदेव से कहा था कि ऐसा मंत्र दीजियेगा जो कोई ने जपता हो और मुझे ऐसा मंत्र दे दिया जो सारी दुनिआ जपती है |

ऐसा सोच कर शिस्य वापस गुरूजी के पास पहुंचा और अपनी सारी बात कही | गुरुदेव समझ गए कि मेरा ये शिस्य निहायत बेवकूफ है | गुरुदेव ने अपने शिस्य को धरती पर पड़े एक ठोस टुकड़े को उठा कर दिया और कहा कि इसको ले कर बाजार में जाओ और इसको बेचना मत केवल इसका मूल्य पता कर के आओ |

शिस्य वो पत्थर का टुकड़ा ले कर आश्रम से बाहर निकला तो पहले सब्जी वाले अपना ठेला लगा कर सब्जी बेचते हुए मिले | उनके पास जा कर पुछा कि भाई इस पत्थर का क्या मूल्य लगाते हो | सब्जी वाले ने कहा कि ये पत्थर हमको बटखरा के काम आ जायेगा इसलिए हम इसका तुमको दो रुपये दे देंगे | शिस्य आगे बढ़ा और एक किराना कि दुकान में पहुंचा उससे भी पुछा तो दुकानदार ने कहा कि ये पत्थर हमको अपने कागज दबाने के काम में आ जायेगा तो हम इसका तुमको पांच रुपये दे देंगे | ऐसे ही दुकान – दुकान घुमते हुए शिस्य पहुँच गया जौहरी के पास और वही सवाल जौहरी से दुहराया |

जौहरी ने पत्थर को देखा तो कहा कि मै अगर अपने दुकान का सारा माल भी बेच दूंगा तो इसकी कीमत नहीं चूका सकता क्योंकि ये तो अमूल्य हीरा है | शिस्य चकरा गया और भागते हुए गुरुदेव के पास पहुंचा और सारी बात बताई | शिस्य ने कहा कि गुरुदेव एक ही पत्थर का सब लोग अलग-अलग मूल्य लगा रहे थे | गुरुदेव ने कहा कि हाँ रे यही बात तो तुम्हे समझानी थी कि जो चीज मैंने तुझे दी है उसकी कीमत दुनिया वाले नहीं जानते , उसकी कीमत सिर्फ जौहरी या पारखी ही जानेगा जो उसका सही जानकर होगा | तुझे अपने जीवन में गुरु के सावधान बचनो को बस उतारना है ,फिर तू सामान्य नहीं रहेगा ,तू भी हीरा बन जायेगा |

किन्तु निष्काम भाव से देवताओं की उपासना करने वालों की सारी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है । केवल सुख प्राप्ति के लिए प्रत्येक मन्त्रों के जितने भी प्रयोग बतलाये गए हैं उनकी आसक्ति का त्याग कर निष्काम रुप से देवता की पूजा करनी चाहिए ॥

अब मन्त्र सिद्धि का लक्षण कहते हैं -

मन में प्रसन्नता आत्मसन्तोष, नगाङ्गे की ध्वनि, गाने की ध्वनि, ताल की ध्वनि, गन्धर्वो का दर्शन, अपने तेज को सूर्य के समान देखना, निद्रा, क्षुधा, जप करना, शरीर का सौन्दर्य बढना, आरोग्य होना, गाम्भीर्य, क्रोध और लोभ का अपने में सर्वथा अभाव, इत्यादि चिन्ह जब साधक को दिखाई पडे ती मन्त्र की सिद्धि तथा देवता की प्रसन्नता समझनी चाहिए ॥

अब मन्त्र सिद्धि के बाद के कर्त्तव्य का निर्देश करते हैं – मन्त्र सिद्धि प्राप्त कर लेने वाले साधक को ज्ञान प्राप्ति के लिए जप की संख्या में निरन्तर वृद्धि का यन्त करते रहना चाहिए । जब वेदान्त प्रतिपादित (अयमात्माब्रह्म, अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वामसि श्वेतोकेतो इत्यादि) तत्त्वों का ज्ञान प्राप्त है जाय तब साधक कृतार्थ हो जाता है और संसार बन्धन से छूट जाता है ॥

अब कलियुग में सिद्धिल्प्रद मन्त्रों का आख्यान करते हैं -

नृसिंह का त्र्यक्षर, एकाक्षर, एवं अनुष्टुप्‍ मन्त्र, (कार्तवीर्य) अर्जुन के एकाक्षर और अनुष्टुप्‍ दो मन्त्र, हयग्रीव, मन्त्र, चिन्तामणि मन्त्र, क्षेत्रपाल, भैरव यक्षराज (कुबेर) गोपाल, गणपति, चेटकायक्षिणी, मातंगी सुन्दरी, श्यामा, तारा, कर्ण पिशाचिनी, शबरी, एकजटा, वामाकाली, नीलसरस्वती त्रिपुरा और कालरात्रि के मन्त्र कलियुग में अभीष्टफलदायक माने गये है ॥

अब संक्षिप्त पुरश्चरण विधि कहते हैं -

चन्द्रग्रहण अथवा सूर्यग्रहण के समय समुद्र्गामिनी गंगा आदि नदियोम के जल में खडा होकर स्पर्शकाल से मोक्षकाल पर्यन्त जप कर उसके दशांश का होम तथा होम के दशांश संख्या में ब्राह्मणों को विविध प्रकार का भोजन कराने से मन्त्र सिद्धि हो जाती है । निरन्तर जप करने वाले साधकों को शीघ्रातिशीघ्र मन्त्र सिद्ध हो जाते है ॥

निष्काम भाव से देवताओं की उपासना करने वालों की सारी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है । केवल सुख प्राप्ति के लिए प्रत्येक मन्त्रों के जितने भी प्रयोग बतलाये गए हैं उनकी आसक्ति का त्याग कर निष्काम रुप से देवता की पूजा करनी चाहिए ॥

वेदों में कर्मकाण्ड, उपासना और ज्ञान तीन काण्ड बतलाये गए हैं । ‘ज्योतिष्टोमेन यजेत्‍’ यह कर्मकाण्ड है, ‘सूर्यो ब्रह्मेत्युपासीत’ यह उपासना है, ये दोनों काण्ड ज्ञान के साधन हैं हैं ‘अयमात्मा ब्रह्म’ यह ज्ञान है जो स्वयं में साध्य है । यही उक्त दोनों में ही वेदोक्त मार्ग के अनुसार प्रवृत्त होना चाहिए । देवता की उपासना से अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है । जिससे उत्तम ज्ञान की प्राप्ति होती है । कार्यकारणसंघात शरीर में प्रविष्ट हुआ जीव ही परब्रह्म है । इसी ज्ञान से साधक मुक्त हो जाता है । अतः मनुष्य देह प्राप्त कर देवताओम की उपासना से मुक्ति प्राप्त कर लेनी चाहिए । जो मनुष्य देह प्राप्त कर संसार बन्धन से मुक्त नही होता, वही महापापी ॥इसलिए उपासना और कर्म से काम-क्रोधादि शत्रुओं का नाश कर आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए सत्पुरुषों को सतत्‍ प्रयत्न करते रहना चाहिए ॥जो व्यक्ति इस प्रकार धर्माचरण करते हुये त्रिकाल देव पूजन करता है वह कभी भी शत्रुओं एवं दुःखों से पीडित नहीं होता उसके इष्टदेव स्वयम उसकी रक्षा करते है ॥क्योंकि देवपूजा न करने पर नरक की प्राप्ति होती है अतः व्यक्ति को देवता के प्रति आस्था एवं श्रद्धा रख कर देव पूजन ही चाहिए ॥

महागणपति–आराधना

शास्त्रकारों की आज्ञा के अनुसार गृहस्थ–मानव को प्रतिदिन यथा सम्भव पंचदेवों की उपासना करनी ही चाहिए। ये पंचदेव पंचभूतों के अधिपति हैैं। इन्हीं में महागणपति की उपासना का भी विधान हुआ है। गणपति को विध्नों का निवारक एवं ऋद्धि–सिद्धि का दाता माना गया है। ऊँकार और गणपति परस्पर अभिन्न हैं अत: परब्रह्यस्वरुप भी कहे गये हैं। पुण्यनगरी अवन्तिका में गणपति उपासना भी अनेक रुपों में होती आई है। शिव–पंचायतन में 1. शिव, 2. पार्वती, 3. गणपति, 4. कातकेय और 5. नन्दी की पूजा–उपासना होती है और अनादिकाल से सर्वपूज्य, विघ्ननिवारक के रुप में भी गणपतिपूजा का महत्वपूर्ण स्थान है। गणपति के अनन्तनाम है। तन्त्रग्रन्थों में गणपति के आम्नायानुसारी नाम, स्वरुप, ध्यान एवं मन्त्र भी पृथक–पृथक दशत हैं। पौराणिक क्रम में षड्विनायकों की पूजा को भी महत्वपूर्ण दिखलाया है। उज्जयिनी में षड्विनायक–गणेष के स्थान निम्नलिखित रुप में प्राप्त होते है–

1. मोदी विनायक – महाकालमन्दिरस्थ कोटितीर्थ पर इमली के नीचे।

2. प्रमोदी ;लड्डूद्ध विनायक – विराट् हनुमान् के पास रामघाट पर।

3. सुमुख–विनायक ;स्थिर–विनायकद्ध– स्थिरविनायक अथवा स्थान–विनायक गढकालिका के पास।

4. दुमु‍र्ख–विनायक – अंकपात की सडक के पीछे, मंगलनाथ मार्ग पर।

5. अविघ्न–विनायक – खिरकी पाण्डे के अखाडे के सामने।

6. विघ्न–विनायक – विध्नहर्ता ;चिन्तामण–गणेशद्ध ।

इनके अतिरिक्त इच्छामन गणेश(गधा पुलिया के पास) भी अतिप्रसिद्ध है। यहाँ गणपति–तीर्थ भी है जिसकी स्थापना लक्ष्मणजी द्वारा की गई है ऐसा वर्णन प्राप्त होता है।

तान्त्रिक द्ष्टि से साधना–क्रम से साधना करते हैं वे गणपति–मन्त्र की साधना गौणरुप से करते हुए स्वाभीष्ट देव की साधना करते है। परन्तु जो स्वतन्त्र–रुप से परब्र–रुप से अथवा तान्त्रिक–क्रमोक्त–पद्धित से उपासना करते हैं वेश्गणेश–पंचांग में दशत पटल, पद्धित आदि का अनुसरण करते है। मूत–विग्रह–रचना वामसुण्ड, दक्षिण सुण्ड, अग्रसुण्ड और एकाधिक सुण्ड एवं भुजा तथा उनमें धारण किये हुए आयुधों अथवा उपकरणों से गणपति के विविध रुपों की साधना में यन्त्र आदि परिवतत हो जाते हैं। इसी प्रकार कामनाओं के अनुसार भी नामादि का परिवर्तन होता हैं। ऋद्धि–सिद्धि (शक्तियाँ), लक्ष–लाभ(पुत्र) तथा मूशक(वाहन) के साथ समष्टि–साधना का भी तान्त्रिक विधान स्पृहणीय है।

चेतावनी-मेरे हर लेख का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबंधित जानकारी प्रदान करना है लेख को पढ़कर यदि कोई व्यक्ति किसी टोने-टोटके,गंडे,ताविज अथवा नक्स आदि का प्रयोग करता है और उसे लाभ नहीं होता या फिर किसी कारण वश हानि होती है,तो उसकी जिम्मेदारी मेंरी कतई नहीं होगी,क्योकि मेरा उद्देश्य केवल विषय से परिचित कराना है। किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श ले। साधको को चेतावनी दी जाती है की वे बिना किसी योग्य व सफ़ल गुरु के निर्देशन के बिना साधनाए ना करे। अन्यथा प्राण हानि भी संभव है। यह केवल सुचना ही नहीं चेतावनी भी है। साधको को किसी भी प्रकार की (शारीरिक व मानसिक)हानि के लिए मै उत्तर दाई नहीं रहूंगा ।अत: सोच समझ कर साधनाए प्रारम्भ करे।।

बाबा विश्वनाथ, भवानी अन्नपूर्णा, बिन्दुमाधव, मणिकर्णिका, भैरव, भागीरतेहे तथा दण्डपाणी मेरा सतत् कल्याण करें ॥

.विशेषः- इस प्रकार के मन्त्र उग्र प्रकृति के होते है। स्व-रक्षा व गुरु निर्देशन के अभाव में प्रयुक्त करना हानिकारक है तथा सामाजिक व नैतिक दृष्टि से अनुचित भी। यहाँ पर मात्र प्राचीन विद्या के संरक्षण हेतु प्रस्तुत किये ।

1…

सीताराम
जय वीर हनुमान
।। बीज तथा मंत्र ।।
आगमशास्त्र ही वह मूल, प्रामाणिक तथा सर्वमान्य ग्रन्थ हैं जिनमें जपयोग्य बीजों (एकाक्षर मंत्र) तथा मंत्रों (एक से अधिक बीज एवं मातृकाक्षरों का समूह) का विशद विवेचन किया गया है। हमारे ऋषि-मुनियों, तपस्वियों, साधकों तथा गुरूओं ने हजारों वर्षो की विकट साधना तथा आध्यात्मिक अनुसन्धान के पश्चात् ऐसे असंख्य बीजों तथा मंत्रों की संरचना (खोज) की है जिनका निर्धारित संख्या में जप करने से साधक को उस मंत्र के अधिष्ठाता देव-देवियों का दर्शन-लाभ प्राप्त हो जाता है। जपयोग्य किसी भी बीज तथा मंत्र की संरचना में वर्णाक्षरों (मातृकाक्षरों) का उपयोग होता है। वर्णाक्षरों (अ से अ: तथा क से क्ष तक) में अनन्त शक्ति निहित होती है। प्रत्येक वर्ण स्वयं में एक शक्तिपुंज है क्योंकि प्रत्येक वर्ण किसी न किसी देवी-देवता तथा तत्वों का प्रतीक होता है। हमारे गुरूओं ने विभिन्न वर्णाक्षरों (अर्ध तथा पूर्ण वर्ण) को विशेष प्रकार से आपस में संयोजित करके ऐसे असंख्य मंत्रों को प्रकट किया है जिनका सही उच्चारण तक कर पाना सामान्य व्यक्ति के लिए असम्भव होता है -
”अर्धमात्रा स्थिता नित्या
यानुच्चार्या विशेषत:”
मंत्र-शास्त्र के अनुसार ल-पृथ्वीतत्व, व-जलतत्व, र-अग्नितत्व य-वायुतत्व तथा ह-आकाशतत्व को निरूपित करता है। वर्णों को आपस में मिलाकर ह् र् ई म् मायाबीज तथा क् ल् ई म् कामबीज बनता है। ऐसे ही कुछ बीज तथा कुछ मातृकाक्षरों को मिलाकर मंत्र बन जाता है। नौ वर्णों का चन्डी मंत्र नवार्णमंत्र के नाम से विख्यात है। सामान्य रूप से एकाक्षर मंत्र को बीजमंत्र तथा अनेक वर्णाक्षरों से युक्त मंत्र को मंत्र कहते हैं। जिस मंत्र में बहुत अधिक वर्णाक्षर सम्मिलित हो जाते हैं उसे ‘मालामंत्र’ कहा जाता है। जिस प्रकार अत्यन्त लघुबीज के अन्दर विशाल वृक्ष विद्यमान रहता है उसी प्रकार एक अक्षर (बीज) के अन्दर उस बीज से सम्बन्धित देवता का वास होता है जो निर्धारित संख्या में जप किए जाने पर साधक के समक्ष उपस्थित हो जाता है। यह अभ्यास का विषय है। तर्क का नहीं।

।। मंत्र की आवश्यकता ।।

हमारे धर्मशास्त्रों में बताया गया है कि कोई भी आध्यात्मिक (धार्मिक) कार्य अथवा अनुष्ठान बिना किसी देवता को साक्षी बनाये तथा बिना किसी मंत्र का आश्रय लिए पूर्ण नहीं हो सकता है। जन्म से मृत्युपर्यन्त जितने भी कर्म-संस्कार तथा धार्मिक अनुष्ठानादि किए जाते हैं वे सभी किसी न किसी मंत्र का आश्रय लेकर ही पूर्ण हो सकते हैं क्योंकि उस मंत्र का अधिष्ठाता देव-देवी ही हमारे सकाम अथवा निष्काम कर्मों का सुफल प्रदान करते हैं। जिस प्रकार अष्टांग योग की कियाऐं (अभ्यास) तथा औषधियों का सेवन प्रत्यक्षरूप से फलप्रद होता है उसी प्रकार मंत्र की शक्ति भी प्रत्यक्ष फलदाई होती है। शर्त यही है कि वह मंत्र किसी ग्रन्थ से नकल किया हुआ न होकर सिद्ध गुरू से प्राप्त हुआ होना चाहिए। जो व्यक्ति पुस्तकों से प्राप्त मंत्रों का जप करते हैं उन्हें कोई लाभ नहीं हो सकता है वरन् पग-पग पर शारीरिक एवं मानसिक ब्याधियों का शिकार होना पड़ता है :-
”पुस्तके लिखितो मंत्रो-येन सुन्दरि ! जप्यते
न तस्य जायते सिद्धि-हानिरेव पदे पदे” -(चामुन्डा तंत्र)

”पुस्तके लिखिता मंत्रान्-विलोक्य प्रजपन्ति ये
ब्रह्महत्या समं तेषां-पातकं परिकीर्तितम्”
(जो व्यक्ति पुस्तकों से प्राप्त मंत्र जपते हैं उन्हें ब्रह्महत्या के समान पाप का भागी होना पड़ता है।)

।। मंत्र का अभिप्राय ।।

विभन्न मंत्रशास्त्रों में मंत्र को अनेक प्रकार परिभाषित किया गया है :-
”मननाद् विश्वविज्ञानं-त्रांणसंसार बन्धनात्
……………………………………………..
त्रायते सतंत चैव तस्मांन्मत्र इतीरित%”
(जिसका मनन करने से समस्त ब्रह्मान्ड का ज्ञान हो जाता है, साधक सांसारिक बन्धन से छूट जाता है तथा जो रोग-शोक, भय, दु:ख एवं मृत्यु से सदैव रक्षा करता है उसको ही मंत्र कहते हैं।)

”मनना प्राणनां चैव-मद्रूपस्याव बोधनात्
……………………………………………..
त्रायते सर्वभयत:-तस्मान्मंत्र इतीरित।।”
(जो साधक की सभी भयों से रक्षा करता है तथा जिसका चिन्तन-मनन करने से आत्मतत्व-शिवरूप का बोध हो जाता है उसी को मंत्र कहते हैं।)
भगवान शंकर मॉं पार्वती को बताते हैं कि मंत्र तथा मंत्रार्थ को समझने वाला साधक समस्त सिद्धियों का स्वामी ही नहीं वरन् ईश्वरत्व प्राप्त करके जीवन्मुक्त हो जाता है। अत: साधक को सदैव मंत्र-जप में तत्पर रहना चाहिए।
बीज तथा मंत्र की महिमा का यशोगान करते हुए भगवान शंकर मॉं पार्वती से कहते हैं:-
”सर्वेषामेव देवांना-मंत्र माद्य शरीरकम्
…………………………………………..
ध्यानेन दर्शनं दत्वा-पुनर्मंत्रेषु लीयते”
¿बीज तथा मंत्र ही देवता का प्रथमरूप (आदिशरीर) है। बीज-मंत्र के जप से सम्बन्धित देवता प्रकट होकर साधक को दर्शन देते हैं और पुन: उसी बीज-मंत्र में समा जाते हैं।

।। मंत्रों के विभिन्न दोष तथा उनका संस्कार (शुद्धिकरण) ।।

प्रमुंख आगम-ग्रन्थ ‘प्राणतोषिणी तंत्र’ में मंत्रो के विभिन्न दोषों तथा उन दोषों से मंत्र को शुद्ध (दोषमुक्त) करने के उपायों (संस्कारों) का विस्तार से विवरण दिया गया है। दोषयुक्त मंत्र उसे कहते हैं जो -
”बहुकूटाक्षरो मुग्धो-बद्ध: क्रुद्धश्च भेदित:
………………………………………………..
निस्नेहो विकल: स्तब्धो-निर्जीव: खन्डतारिक: ”

(बहुत कूटाक्षर वाला, मुग्ध, बद्ध, क्रुद्ध, भेदित, कुमार, युवा, बृद्ध गर्वित, स्तम्भितः, मूर्छित, खन्डित, बधिर, अन्ध, अचेतन, क्षुघित, दुष्ट, पीडि़त, निस्नेह, विकल, स्तब्ध, निर्जीव तथा खण्डतारिक मंत्र दोषपूर्ण होता है।)
मंत्र के अन्य दोष इस प्रकार है :-
”सुप्त: तिरस्कृतो लीढ,-मलिनश्च दुरासद:
……………………………………………..
जड़ो रिपु उदासीनो-लज्जितो मोहित प्रिये”
(भगवान शिव कहते हैं कि जो मंत्र सुप्त, तिरस्कृत, लीढ, मलिन, दुरासद, निसत्व, निर्दयी, दुग्ध, भयंकर, शप्त, रूक्ष, जड़, शत्रु, उदासीन, लज्जित तथा मोहित होते हैं वे भी दोषपूर्ण होते हैं)

भगवान शिव द्वारा उपरोक्त प्रकार बताए गए दोषपूर्ण मंत्रोको जप आरम्भ करने से पहले शुद्ध करना आवश्यक होता है। इसी मंत्र-शुद्धिकरण को ही मंत्रो का संस्कार कहते हैं। दोषयुक्त मंत्र का करोड़ों संख्या में जप करने से भी मंत्र-सिद्धि नहीं हो सकती है। तंत्र-शास्त्रों में मंत्र-शुद्धिकरण के लिए 10-संस्कारों का उल्लेख मिलता है। यथा –
”जनंन जीवनं पश्चात्-ताड़ंन बोधनं तथा
…………………………………………….
तर्पणं दीपंन गुप्ति-संस्कारा कुल नायिके”
(दोषयुक्त मंत्र को शुद्ध करने के लिए जो 10-संस्कार किए जाते हैं उनके नाम हैं जनन, जीवन, ताड़न, बोधन, अभिषेक, विमलीकरण, आप्यायन, तर्पण, दीपन, गुप्ति।)
शास्त्र बताते हैं कि जिस प्रकार अस्त्र-शस्त्रों पर धार लगाकर उन्हें तेज तथा धारदार बनाया जाता है उसी प्रकार मंत्र के 10-संस्कार करके उसे भी प्रभावशाली, सिद्धिप्रद तथा चैतन्य बना दिया जाता है। प्रसिद्ध तंत्र ग्रन्थ ‘मंत्र महोदधि’ तथा ‘शारदा तिलक तंत्र’ में मंत्र के 10-संस्कारों को सम्पादित करने के लिए जप की विधियां बताई गई है। सामान्य रूप से मंत्र संस्कारों की प्रचलित विधियों का संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है।
(1) जनन :- केशर, चन्दन अथवा भस्म से बनाए गए मातृकायंत्र से मंत्र-वर्णों का पर्याय क्रम से उद्धार करना।
(2) जीवन :- सभी मंत्र वर्णों को पंक्तिक्रम से प्रणव से सम्पुटित करके 100 बार जपना ।
(3) ताडन :- मंत्र के वर्णों को भोजपत्र पर लिखकर प्रत्येक वर्ण को चन्दन, जल तथा वायुबीज से 100-बार ताडि़त करना।
(4) बोधन :- उक्तानुसार मंत्र वर्णों को लिखकर मंत्र के वर्ण संख्या के बराबर कनेर पुष्पों से अग्निबीज से हनन करना।
(5) अभिषेक :- कुशमूल से भोजपत्र पर मंत्र को लिखकर मंत्र वर्णों की संख्या के बराबर पीपल के पत्तों से सिंचन करना।
(6) विमलीकरण :- सुषुम्ना के मूल तथा मध्य में मंत्र का ध्यान करके ज्योतिमंत्र से जलाना।
(7) आप्यायन :- भोजपत्र पर लिखे मंत्र को ज्योतिमंत्र का 108-जप करके अभिमंत्रित करना।
(8) तर्पण :- उक्तानुसार मंत्र लिखकर मंत्र की वर्ण संख्या में ज्योतिमंत्र से मधु से तर्पण करना।
(9) दीपन :- अपने मूलमंत्र को प्रणव माया तथा लक्ष्मी बीज से सम्पुटित करके 108 बार जपना।
(10) गोपन :- अपने मंत्र को गुप्त रखना तथा मंत्र जपते हुए अपने मन तथा प्राण का सुषुम्ना में लय करना।
जिस प्रकार सद्गुरू से प्राप्त मंत्र अत्यन्त गोपनीय होता है उसी प्रकार मंत्र के 10-संस्कारों को भी गोपनीय तथा केवल गुरूमुख से ज्ञातव्य रखा गया है।

शक्ति उपासक के ब्यवहार, आचरण, अनुशासन तथा नित्यप्रति के कर्तव्यों के लिए शास्त्र द्वारा विशेष रूप से विधि-निषेधों का प्राविधान किया गया है जिनका दीक्षा के उपरान्त शक्तिसाधक को मन, वचन तथा कर्म से सदैव तथा सर्वत्र अनुपालन करना आवश्यक होता है। पुरश्चरणकाल में इननियमों का अनुपालन किए बिना कोटि मंत्र-जप एवं समस्त प्रयासों के बावजूद भी मंत्र सिद्धि हो पाना असम्भव है। साधक को जिन निर्देशों का पालन करना होता है उनमें से प्रमुख है:-
(1) साधक को यह विश्वास रखना चाहिए कि जो मंत्र है वही देवता है तथा जो देवता है वही गुरू है। इनमें से किसी का भी पूजन-अर्चन करने का फल भी समान ही है।
”यथादेवस्तथा मंत्रो-यथामंत्र तथा गुरू
देव मंत्र, गुरूणांच-पूजाया सदृंश फलम्”
(कुलार्णव तंत्र)
(2) अपने गुरू में भगवान शिव की भावना करनी चाहिए न कि सामान्य मनुष्य की क्योंकि जो साधक अपने गुरू को सामान्य मनुष्य समझता है उसे न सिद्धि, न ज्ञान और न मोक्ष ही प्राप्त होता है :-
”मोक्षो न जायते देवि-मानुषे गुरू भावनात्
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गुरूरेक: शिव: प्रोक्त:-सोहं देवि न संशय:।।”
(3) जप, ध्यान तथा उपासना हेतु साधक को सदैव अपनी भावना को भ्रम रहित, संशय रहित, शुद्ध, सात्विक तथा श्रद्धायुक्त रखना चाहिए क्योंकि शुद्ध भावना ही सिद्धि प्रदाता होती है :-
”भावेन लभते सर्वं-भावेन देव दर्शनम्
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भावेन ……………….तस्मात् भावावलम्बनम्।।”
(रूद्रयामल तंत्र)
(4) साधक को जप करते समय गुरू से प्राप्त मंत्र तथा उसकी अधिष्ठात्री महाशक्ति कुण्डलिनी का सुषुम्ना विवर में प्रकाश रूप में ध्यान करना चाहिए तथा उनको मूलाधार से सहस्रार चक्र तक ऊपर-नीचे ले जाने का अभ्यास करना चाहिए। मंत्र के प्रत्येक वर्ण का ध्यान तथा उसके अर्थ का भी चिन्तन करते हुए जप करना चाहिए।
(5) साधक को दास बनकर नहीं वरन् अपने को शिव का अंश समझकर (शिव के साथ एकता) मॉं की उपासना करनी चाहिए।
(6) किसी भी प्रकार के भ्रम-संशय से मुक्त रहने के लिए अपने गुरूक्रम-उपासनाक्रम से सम्बन्धित शास्त्रों (ग्रन्थों) के अतिरिक्त किसी अन्य उपासना-ग्रन्थों का अध्ययन नहीं करना चाहिए परन्तु अन्य उपासना ग्रन्थों तथा विधियों की निन्दा भी नहीं करनी चाहिए।
(7) किसी अदीक्षित व्यक्ति को अपनी उपासना, जप, पूजा तथा ध्यान के सम्बन्ध में कुछ नहीं बताना चाहिए। पुरश्चरण काल में विशेष अनुभव, चमत्कार अथवा स्वप्न होने पर अपने गुरूदेव को अवश्य बताना चाहिए।

(8) अपनी साधना के परिणाम की आशा त्यागकर पूर्ण समर्पण तथा दृढ़ भावना के साथ गुरू द्वारा उपदिष्ट क्रम से साधना में तत्पर रहना चाहिए।
(9) पुरश्चरण की अवधि में खान-पान (भोजन) का विशेष ध्यान रखना चाहिए। कहा जाता है ‘जैसा अन्न-वैसा मन’ अर्थात् भोजन जिस प्रकार का होगा उसी प्रकार के विचार मन में उत्पन्न होंगे तथा साधक की तपस्या को तदनुसार प्रभावित करेंगे। शास्त्रों में बताया गया है कि साधक को अपनी पाचन क्षमता, शारीरिक एवं मानसिक अवस्था के अनुसार ही अनुकूल भोजन का चयन करना चाहिए। जिस साधक को जो गुरू-क्रम प्राप्त हुआ हो उसी अनुसार भोजन का निर्णय किया जा सकता है। यह भी विशेष ध्यान रखना होता है कि जो भी खाद्य पदार्थ खाये जावें वे सब अपने द्वारा अर्जित धन से खरीदे जायें। किसी व्यक्ति द्वारा दान दिए गए अन्नादि को कदापि ग्रहण नहीं करना चाहिए। इस विषय पर शास्त्र का बचन है कि –
”जिह्वा दग्धा परान्नेन-हस्तौ दग्धो परिग्रह
मनो दग्धो परस्त्रीभि: कथं सिद्धि वरानने।”
(हे पार्वती! जिस साधक की जीभ पराया अन्न खाकर जल गई हो, जिसका हाथ पराया अन्न ग्रहण करके जल गया हो, जिसका मन परस्त्री-भोग की कामना से जल गया हो उसकी मंत्र सिद्धि कैसे हो सकती है।)
(10) पुरश्चरण काल में दीर्घकाल तक जप में बैठने के लिए उपयुक्त आसन की भी आवश्यकता होती है। आसन का चुनाव भी अपने इष्ट मंत्र तथा अधिष्ठात्री देवी की साधना के अनुरूप किया जाता है। वीर साधना (श्मशान साधना) हेतु उपयुक्त आसन केवल गुरूमुख से जाने जा सकते हैं। घर में प्रयुक्त होने वाले आसनों में रक्तकम्बल, कुशासन, मृगचर्म, व्याघ्र-चर्म पर बैठकर साधना करने का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। साधक को पद्मासन तथा सिद्धासन में बैठकर जप का अभ्यास करना चाहिए। पुरश्चरणकाल में अस्वस्थता की अवस्था में पैर फैलाकर तथा लेटकर भी जप किया जा सकता है। शास्त्रों का उद्घोष है कि आसन तथा प्राणायाम भी मुख्य साधना में गौण हो जाते हैं क्योंकि अन्तर्जागृति की अवस्था ही सर्वश्रेष्ट है-
”असिका बन्धनं नास्ति-नासिका बन्धनं नहिं
न पद्मासन गतो योगी-न नासाग्र निरीक्षणम्।।”

इस विषय पर ‘दीक्षा रहस्य’ नामक अध्याय के अन्तर्गत ‘दीक्षा हेतु उपयुक्त स्थान’ शीर्षक में कुछ लिखा गया है क्योंकि जिन पवित्र स्थानों पर दीक्षा प्राप्त करने से शीघ्र साधना सफल होती है उन्हीं स्थानों पर जप करना भी शुभप्रद माना गया है।
”पुण्य क्षेत्रं नदी तीरं-गुहा पर्वत मस्तकम्
तीर्थ प्रदेशा सिन्धूनां-संगम: पावनं बनम्”
(पुण्य क्षेत्रों, नदियों के किनारे, पर्वतों की चोटियों, समुद्रों के संगम स्थल, गंगा-सागर संगम, घने जंगल, उद्यान, देवस्थान, समुद्रतट, विल्व वृक्ष, पीपलवृक्ष, बटवृक्ष, तथा धात्रीवृक्ष के नीचे तथा गोशाला में पुरश्चरण करना चाहिए। इन दिव्य स्थानों पर जप करने का फल इस प्रकार बताया गया है -
”गृहे जप समं प्रोक्त:-गोष्ठे शतगुणासु स:।”
जबकि अन्य ग्रन्थों में लिखा गया है -
”गृहे शतगुंण विन्ध्याद्-गोष्ठे लक्षगुंण भवेत्
………………………………………………….
कोटि देवालये पुण्यं-अनन्तं शिव सन्निधौ।”
(अर्थात् अपने घर में जप करने से अधिक फल गोशाला में, गोशाला से अधिक फल एकान्त उद्यान में, एकान्त उद्यान से अधिक पर्वत शिखर पर, पर्वत शिखर से अधिक पुण्यक्षेत्र में, पुण्यक्षेत्र से अधिक फल देवालय में, तथा शिव सान्निध्य में जप का अनन्त फल मिलता है।)

।। सिद्ध पीठों में पुरश्चरण ।।
तंत्र-शास्त्रों में उन सभी सिद्ध तथा महासिद्ध पीठों का विवरण दिया गया है जहॉं पुरश्चरण करने से शीघ्र मंत्र-जागृत हो जाता है। चार धाम, द्वादश ज्योतिर्लिग तथा 51-शक्तिपीठों के अतिरिक्त भी भगवान शंकर द्वारा माता पार्वती को जिन सिद्धपीठों का परिचय दिया गया था उनमें से प्रमुख हैं :-
”मायावती, मधुपुरी-काशी गोरक्षकारिणी
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मणिपुरं हृषीकेशं-प्रयागंच तपोवनम्
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बदरी च महापीठं-उडि्डपानं महेश्वरि
…………………………………………..
कामरूपं महापीठं-सर्वकाम फलप्रदम्।”
अर्थात् मायावती, हरिद्वार, काशी, गोरखपुरी, हिगुलादेवी, ज्वालामुखी, रामगिरी पर्वत, त्र्यम्बकेश्वर, पशुपतिनाथ, अयोध्या, कुरूक्षेत्र, मणिपुर, रिषीकेष, प्रयाग, तपोवन, बद्रीनाथ, अम्बाजी, गंगासागर, उडि्डयानपीठ, जगन्नाथपुरी, महिष्मतीपुरी, वाराही क्षेत्र, गोवर्धन पर्वत, विन्ध्यवासिनी, क्षीरग्राम तथा वैद्यनाथधाम। इन सभी सिद्धपीठों में से आसाम का कामरूप कामाक्षादेवी धाम महासिद्ध पीठ है जहॉं पुरश्चरण करने से अतिशीघ्र मंत्र-सिद्धि मिलती है। धरती पर ऐसी महासिद्ध पीठ अन्यत्र नहीं है।

।। जप यज्ञ ।।

विश्व के सभी धर्मों ने भगवत् प्राप्ति हेतु जप को विशेष मान्यता प्रदान की है। आर्य, जैन, बौद्ध, ईसाई और इस्लाम धर्म सभी जप को महत्व देते हैं। आगम शास्त्र इस विषय पर निर्देश देते हैं :-
”सर्वेषां कर्मणां श्रेष्ठं-जपज्ञांन महेश्वरि
जप यज्ञो महेशानि-मत्स्वरूपो न संशय:
जपेन देवता नित्यं-स्तूयमाना प्रसीदति
प्रसन्ना विपुलां कामान्-दद्यान्मुक्ति च शाश्वतीम्”
(हे देवि! जप करना सर्वश्रेष्ट कर्म है। जपयज्ञ स्वयं मेरा ही स्वरूप है। जप करने से देवता प्रसन्न होकर समस्त कामनाओं की पूर्ति करके मुक्ति भी प्रदान करते हैं)
मनु महाराज का कथन है :-
”विधि यज्ञा जप यज्ञो-विशिष्टों दशभिगुर्णै”
आगम शास्त्रों में जप की महिमा का वर्णन निम्न प्रकार किया गया है:-
”जप यज्ञात्परो यज्ञो-नापरोस्तीह कश्चन:
तस्मात्जपेन धर्मार्थं-काम मोक्षाश्च साधयेत्”
(जप यज्ञ के समान श्रेष्ट कुछ भी नहीं है। अत: जप करके धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की प्राप्ति करनी चाहिए।)
अन्यच्च :-
”सर्वयज्ञेषु सर्वत्र-जप यज्ञ: प्रशस्यते
तस्मात्सर्व प्रयत्नेन-जप निष्ठापरो भवेत्”
(अत: समस्त प्रयास करते हुए जप में पूर्ण निष्ठा रखनी चाहिए। सर्वत्र तथा सर्वकाल में जप करना प्रशस्त है।)
भगवान श्रीकृष्ण जप की श्रेष्टता का सम्पादन करते हुए कहते हैं कि मैं ही यज्ञो में सर्वश्रेष्ट जपयज्ञ हूँ:-
”यज्ञानां जप यज्ञोस्मि।”
आचार्यपाद शंकराचार्य जी जप को ही योगक्षेम का कारण मानते हैं :-
”तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदम्
जन: को जानीते जननि जपनीयं जप विधौ”
आचार्यपाद के अनुसार जप यज्ञ अत्यन्त कठिन एवं गुरूमुखगम्य है। जप किसी मंत्र विशेष का किया जाता है तथा मंत्र अक्षरों से बनता है। अक्षर = अ+क्षरण अर्थात् जिसका नाश नहीं होता वही अक्षर है तथा मंत्र ही अक्षर ब्रह्म है। अक्षरों से बना मंत्र इसी कारण ‘शब्दब्रह्म’ कहा जाता है। वेदपाठ एवं स्तोत्रादि का उच्च स्वर से पाठ करते समय समीपवर्ती वातावरण भी पवित्र हो जाता है तथा आनन्द की प्राप्ति कराता है।
शास्त्रों में जप के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन करते हुए उनकी पारस्परिक महत्ता का प्रतिपादन किया गया है :-
”वाचिकश्च उपांशुश्च-मानस स्त्रिविधि स्मृत:
त्रयांणा जप यज्ञांना-श्रेयान् स्यादुत्तरोत्तरम्”
अर्थात् वाचिकजप से श्रेष्ट उपांशु जप तथा उससे श्रेष्ठ मानसिक जप माना गया है। जब तक सतत अभ्यास द्वारा साधक की वृत्ति अन्तमुर्खी नहीं हो जाती तब तक जप का उद्देश्य सफल नहीं हो सकता है। जप की सिद्धि का सम्बन्ध प्राणों (वायु) के आयाम (रोकना) से भी होता है। जप जितना अन्तमुर्खी होता जायेगा उस समय श्वास की गति उतनी ही कम (मन्द गति) हो जायेगी तथा एक आनन्द की अनुभूति होगी।
”मनसा य: स्मरेस्तोत्रं वचसा वा मनु जपेत्। उभयं निष्फलं देवि।”
(स्तोत्र को मन ही मन पढ़ना तथा जप को वाणी से उच्चारण करना निष्फल हो जाता है।) जप हमेशा मानसिक होना चाहिए।

”उत्तमो मानसो देवि! त्रिविध: कथितो जप:”
अभ्यास करते-करते साधक को निम्न छ: प्रकार की स्थितियों से गुजरना पड़ता है यथा- परातीतजप, पराजप, पश्यन्ती जप, मध्यमा जप, अन्त:वैरवरी जप तथा बहिरवैरवरी जप। जिस जप में जीभ तथा होठों को हिलाया जाता है वह जप बहिरवैरवरी के अन्तर्गत आता है। जब जिह्वा तथा होठों का संचालन किए बिना जप आरम्भ हो जायेगा उस समय जप के स्पन्दनों का प्रवाह हृदय चक्र की तरफ होने लगेगा तथा श्वास की गति अत्यन्त धीमी हो जायेगी। बाहर की तरफ श्वास चलना लगभग बन्द हो जायेगा। गुरूमुख से प्राप्त चैतन्य मंत्र का जप करते समय साधक को इस स्थिति का लाभ अल्प समय में ही मिलने लगता है। यह केवल स्वानुभव का विषय है। ऐसा जप साधक के मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान तथा मणिपूरक चक्र में स्वयं उच्चरित होता हुआ प्रतीत होता है। यह स्थिति मध्यमा जप सिद्ध हो जाने पर आती है तथा वास्तविक जप का श्री गणेश यहीं से माना जाता है। ऐसी अवस्था आ जाने पर साधक की वृत्ति अन्तमुर्खी हो जाती है और तब जप करने के लिए किसी आसन विशेष की आवश्यकता नहीं रह जाती। इस जप का साधक लेटे, सोये, उठे, बैठे, खाते-पीते भी अनुभव कर सकता है। शास्त्र बताते हैं कि मध्यमा जप की स्थिति आ जाने पर अनाहत चक्र में कई तरह के नाद भी उत्पन्न होते हैं जिन्हें जप कर्ता सुन सकता है। प्राय: साधक को अपना मंत्र अन्दर से स्वयं ही सुनाई देता है।
मध्यमा स्थिति के पश्चात् जप की तीसरी भूमिका पश्यन्ती पर साधक पदार्पण करता है। ऐसी स्थिति में साधक को अपना मंत्र आज्ञाचक्र (भ्रूमध्य) में प्रतिविम्बित होता दिखाई देता है। आचार्यपाद शंकराचार्य जी ने पश्यन्ती जप का स्थान आज्ञाचक्र बताते हुए लिखा है :-
”तवाज्ञाचक्रस्थं तपन शशि कोटि द्युतिधरं
परंशम्भु वन्दे परिमिलत पार्श्वं परिचिता”
(सौन्दर्य लहरी)
जप से उत्पन्न नाद की स्थिति केवल विशुद्धि चक्र (कंठ स्थान) तक ही सीमित रहती है। उसके बाद आज्ञा चक्र में स्वमंत्र प्रकाशमय अवस्था में दिखाई देता है। अत: आज्ञाचक्र के ऊपर के चक्रों में स्वमंत्र का दर्शन होना ही पश्चन्ती जप का सिद्ध हो जाना माना जाता है।
जब स्वमंत्र के सभी स्वर-व्यंजन सकुंचित होकर बिन्दु में लय हो जाते हैं तो यह अवस्था ‘पराजप’ की अवस्था कही जाती है। इस स्थिति को प्राप्त साधक परमानन्द की अनुभूति करने लगता है। इस अवस्था का वर्णन भगवान् श्री कृष्ण ने भी किया है :-
”युन्जन्नेवं सदात्मांन-योगी विगत कल्मश:
सुखेन ब्रह्म संस्पर्श-अत्यंन्त सुख मश्नुते।।”
(गीता)
इससे पूर्व के श्लोक में कहा गया है कि जिस प्रकार कछुआ अपने सभी अंगो को अपने में ही समेट कर छोटा हो जाता है उसी प्रकार मंत्र के वर्णादि भी बिन्दु में लय हो जाते हैं। इस बिन्दु का कम्पन ही आत्मसाक्षात्कार की अनुभूति दिलाता है जिसे ब्रह्म संस्पर्श का आनन्द मिलना कह सकते हैं।
मंत्र के अवयवों का शुद्ध उच्चारण जिह्वा तथा हौठों के विभिन्न स्थानों पर स्पर्श के कारण होता है परन्तु मंत्र के अद्धर्मात्रा में स्थित बिन्दु का उच्चारण सही रूप से तभी हो पाता है जब श्री सत्गुरू शिष्य को इसे उच्चारित कर बताते हैं। इसके सम्बन्ध में निम्न प्रमाण है -
”अमोध मव्यंजन मस्वंर च-अंकढ ताल्वोष्ट नासिकं च
अरेफ जातोपयोष्ठ वर्जितं-यदक्षरो न क्षरेत् कदाचित।।”
सहस्रार एवं उसके ऊपर के चक्रों-स्थानों पर ब्रह्मसंस्पर्श ही जप की अनुभूति कराता है। यहॉं पर समस्त बाह्य कियाऐं नष्ट हो जाती हैं। इस विषय पर आगम बचन है :-
”प्रथमे वैखरी भावो-मध्यमा हृदये स्थिता
भ्रूमध्ये पश्यन्ती भाव:-पराभाव स्वद्विन्दुनी।।”
महानिर्वाण तन्त्र में इनका सम्बन्ध वहिरअर्चन-ध्यानादि के साथ निम्न प्रकार वर्णित हैं -
उत्तमों ब्रह्म सद्भावो यह परावाक् नाम अन्तिम स्थिति है।
ध्यान भावस्तु मध्यम यह पश्यन्ती स्थिति है।
जप-पूजा अधमा प्रोक्ता यह मध्यमा जप की स्थिति है।
बाह्यपूजा अधमाधमा यह वहिरवैर्रवरी स्थिति है।
इस प्रकार सतत जप से आत्म-साक्षात्कार रूपी लक्ष्य की प्राप्ति हो जाती है। पूर्वोक्त अवस्थाओं की प्राप्ति हेतु हठयोगादि का अवलम्बन न केवल दुरूह वरन् परम हानिकारक भी सिद्ध होता है। आगम शास्त्र जप की सिद्धि के लिए निम्न उपायों का वर्णन करने हैं :-
(1) सिद्ध गुरू की प्राप्ति (2) स्वगुरूक्रम का यथोक्तचिन्तन (3) शुद्ध संस्कारों की प्राप्ति (4) मल निवृत्ति (आणव, मायिक, कार्मिक) (5) वीर साधना का अवलम्बन (6) पूंर्वाग तथा उत्तंराग जप।
उपरोक्त सभी उपायों का विस्तृत वर्णन आगम शास्त्रों में मिलता है जिनके अवलोकन से ज्ञात होता है कि ये सभी अंग सिद्ध भूमिका में आरोहण करने के लिए नितान्त आवश्यक हैं। मूल मंत्र जप के साथ ही जप के पूंर्वाग तथा उत्तरांग मंत्रो का जप भी करना पड़ता है जो कि निम्नानुसार है :-
(1) मंत्र के शिव का जप (2) कुल्लका मंत्र (3) मंत्र उत्कीलन (4) संजीवन मंत्र (5) मंत्र शिखा (6) मंत्र चैतन्य (7) मंत्रार्थ (8) मंत्र शोधन (9) मंत्र संकेत (10) मंत्र ध्यान (11) सेतु (12) महासेतु (13) निर्वाण मंत्र (14) दीपिनी मंत्र (15) चौरमंत्र (16) मुख शोधन (17) मातृका पुटित जप।
स्थूल से सूक्ष्म की तरफ अग्रसर होना ही मंत्र जप का रहस्य है। जिसके लिए आगम शास्त्र कहते हैं :-
”पूजा कोटि संम स्तोत्रं-स्तोत्र कोटि समो जप
जप कोटि समो ध्यानं-ध्यान कोटि समो लय:।।”
अर्थात् वाहरी पूजा से स्तोत्रपाठ करना श्रेष्ट है। स्तोत्रपाठ से जप करना करोड़ गुना श्रेष्ट है। जप से ध्यान करना श्रेष्ट है। ध्यान से करोड़ गुना फलदायक ‘लय’ अवस्था (आत्मसाक्षात्कार) प्राप्त हो जाना है। जप के सम्बन्ध में उक्तानुसार संक्षेप में विवेचन किया गया है परन्तु समस्त प्रयासों के बावजूद भी मंत्र वही सिद्ध होगा जो शिष्य को सक्षम गुरू से प्राप्त हुआ होगा। आगम शास्त्र कहते हैं:-
सिद्ध मंत्र गुरोर्दीक्षा-लक्ष मात्रेण सौख्यदा
……………………………………….
महामुनि मुखान्मत्रं-श्रवणाद् भुक्ति-मुक्तिदम्
जपहीन गुर्रोर्वक्त्रा-पुस्तकेन समं भवेत।”
(महाकाल संहिता)

2….श्री बगला दिग्बंधन रक्षा स्तोत्रम्

ब्रह्मास्त्र प्रवक्ष्यामि बगलां नारदसेविताम् ।

देवगन्धर्वयक्षादि सेवितपादपंकजाम् ।।

त्रैलोक्य-स्तम्भिनी विद्या सर्व-शत्रु-वशंकरी आकर्षणकरी उच्चाटनकरी विद्वेषणकरी जारणकरी मारणकरी जृम्भणकरी स्तम्भनकरी ब्रह्मास्त्रेण सर्व-वश्यं कुरु कुरु ॐ ह्लां बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ह्लां द्राविणि-द्राविणि भ्रामिणि एहि एहि सर्वभूतान् उच्चाटय-उच्चाटय सर्व-दुष्टान निवारय-निवारय भूत प्रेत पिशाच डाकिनी शाकिनीः छिन्धि-छिन्धि खड्गेन भिन्धि-भिन्धि मुद्गरेण संमारय संमारय, दुष्टान् भक्षय-भक्षय, ससैन्यं भुपर्ति कीलय कीलय मुखस्तम्भनं कुरु-कुरु ॐ ह्लां बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

आत्मा रक्षा ब्रह्म रक्षा विष्णु रक्षा रुद्र रक्षा इन्द्र रक्षा अग्नि रक्षा यम रक्षा नैऋत रक्षा वरुण रक्षा वायु रक्षा कुबेर रक्षा ईशान रक्षा सर्व रक्षा भुत-प्रेत-पिशाच-डाकिनी-शाकिनी रक्षा अग्नि-वैताल रक्षा गण गन्धर्व रक्षा तस्मात् सर्व-रक्षा कुरु-कुरु, व्याघ्र-गज-सिंह रक्षा रणतस्कर रक्षा तस्मात् सर्व बन्धयामि ॐ ह्लां बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ह्लीं भो बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखि एहि-एहि पूर्वदिशायां बन्धय बन्धय इन्द्रस्य मुखं स्तम्भय स्तम्भय इन्द्रशस्त्रं निवारय निवारय सर्वसैन्यं कीलय कीलय पच पच मथ मथ मर्दय मर्दय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु-कुरु ॐ ह्लां बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं पीताम्बरे एहि-एहि अग्निदिशायां बन्धय बन्धय अग्निमुखं स्तम्भय स्तम्भय अग्निशस्त्रं निवारय निवारय सर्वसैन्यं कीलय कीलय पच पच मथ मथ मर्दय मर्दय ॐ ह्लीं अग्निस्तम्भं कुरु-कुरु ॐ ह्लां बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महिषमर्दिनि एहि-एहि दक्षिणदिशायां बन्धय बन्धय यमस्य मुखं स्तम्भय स्तम्भय यमशस्त्रं निवारय निवारय सर्वसैन्यं कीलय कीलय पच पच मथ मथ मर्दय मर्दय ॐ ह्लीं हृज्जृम्भणं कुरु-कुरु ॐ ह्लां बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं चण्डिके एहि-एहि नैऋत्यदिशायां बन्धय बन्धय नैऋत्य मुखं स्तम्भय स्तम्भय नैऋत्यशस्त्रं निवारय निवारय सर्वसैन्यं कीलय कीलय पच पच मथ मथ मर्दय मर्दय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु-कुरु ॐ ह्लां बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं करालनयने एहि-एहि पश्चिमदिशायां बन्धय बन्धय वरुण मुखं स्तम्भय स्तम्भय वरुणशस्त्रं निवारय निवारय सर्वसैन्यं कीलय कीलय पच पच मथ मथ मर्दय मर्दय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु-कुरु ॐ ह्लां बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कालिके एहि-एहि वायव्यदिशायां बन्धय बन्धय वायु मुखं स्तम्भय स्तम्भय वायुशस्त्रं निवारय निवारय सर्वसैन्यं कीलय कीलय पच पच मथ मथ मर्दय मर्दय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु-कुरु ॐ ह्लां बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महा-त्रिपुर-सुन्दरि एहि-एहि उत्तरदिशायां बन्धय बन्धय कुबेर मुखं स्तम्भय स्तम्भय कुबेरशस्त्रं निवारय निवारय सर्वसैन्यं कीलय कीलय पच पच मथ मथ मर्दय मर्दय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु-कुरु ॐ ह्लां बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ऐं महा-भैरवि एहि-एहि ईशानदिशायां बन्धय बन्धय ईशान मुखं स्तम्भय स्तम्भय ईशानशस्त्रं निवारय निवारय सर्वसैन्यं कीलय कीलय पच पच मथ मथ मर्दय मर्दय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु-कुरु ॐ ह्लां बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ऐं गांगेश्वरि एहि-एहि ऊर्ध्वदिशायां बन्धय बन्धय ब्रह्माणं चतुर्मुखं मुखं स्तम्भय स्तम्भय ब्रह्मशस्त्रं निवारय निवारय सर्वसैन्यं कीलय कीलय पच पच मथ मथ मर्दय मर्दय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु-कुरु ॐ ह्लां बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ऐं ललितादेवि एहि-एहि अन्तरिक्ष दिशायां बन्धय बन्धय विष्णु मुखं स्तम्भय स्तम्भय विष्णुशस्त्रं निवारय निवारय सर्वसैन्यं कीलय कीलय पच पच मथ मथ मर्दय मर्दय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु-कुरु ॐ ह्लां बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ऐं चक्रधारिणि एहि-एहि अधो दिशायां बन्धय बन्धय वासुकि मुखं स्तम्भय स्तम्भय वासुकिशस्त्रं निवारय निवारय सर्वसैन्यं कीलय कीलय पच पच मथ मथ मर्दय मर्दय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु-कुरु ॐ ह्लां बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

दुष्टमन्त्रं दुष्टयन्त्रं दुष्टपुरुषं बन्धयामि शिखां बन्ध ललाटं बन्ध भ्रुवौ बन्ध नेत्रे बन्ध कर्णौ बन्ध नसौ बन्ध ओष्ठौ बन्ध अधरौ बन्ध जिह्वा बन्ध रसनां बन्ध बुद्धिं बन्ध कण्ठं बन्ध हृदयं बन्ध कुक्षिं बन्ध हस्तौ बन्ध नाभिं बन्ध लिंगं बन्ध गुह्यं बन्ध ऊरू बन्ध जानू बन्ध हंघे बन्ध गुल्फौ बन्ध पादौ बन्ध स्वर्ग मृत्यु पातालं बन्ध बन्ध रक्ष रक्ष ॐ ह्लीं बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ऐं ॐ ह्लीं बगलामुखि इन्द्राय सुराधिपतये ऐरावतवाहनाय स्वेतवर्णाय वज्रहस्ताय सपरिवाराय एहि एहि मम विघ्नान् निरासय निरासय विभञ्जय विभञ्जय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं भेदय भेदय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु ॐ ह्लीं बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ऐं ॐ ह्लीं बगलामुखि अग्नये तेजोधिपतये छागवाहनाय रक्तवर्णाय शक्तिहस्ताय सपरिवाराय एहि एहि मम विघ्नान् विभञ्जय विभञ्जय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं भेदय भेदय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु ॐ ह्लीं बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ऐं ॐ ह्लीं बगलामुखि यमाय प्रेताधिपतये महिषवाहनाय कृष्णवर्णाय दण्डहस्ताय सपरिवाराय एहि एहि मम विघ्नान् विभञ्जय विभञ्जय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं भेदय भेदय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु ॐ ह्लीं बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ऐं ॐ ह्लीं बगलामुखि वरूणाय जलाधिपतये मकरवाहनाय श्वेतवर्णाय पाशहस्ताय सपरिवाराय एहि एहि मम विघ्नान् विभञ्जय विभञ्जय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं भेदय भेदय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु ॐ ह्लीं बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ऐं ॐ ह्लीं बगलामुखि वायव्याय मृगवाहनाय धूम्रवर्णाय ध्वजाहस्ताय सपरिवाराय एहि एहि मम विघ्नान् विभञ्जय विभञ्जय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं भेदय भेदय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु ॐ ह्लीं बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ऐं ॐ ह्लीं बगलामुखि ईशानाय भूताधिपतये वृषवाहनाय कर्पूरवर्णाय त्रिशूलहस्ताय सपरिवाराय एहि एहि मम विघ्नान् विभञ्जय विभञ्जय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं भेदय भेदय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु ॐ ह्लीं बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ऐं ॐ ह्लीं बगलामुखि ब्रह्मणे ऊर्ध्वदिग्लोकपालाधिपतये हंसवाहनाय श्वेतवर्णाय कमण्डलुहस्ताय सपरिवाराय एहि एहि मम विघ्नान् विभञ्जय विभञ्जय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं भेदय भेदय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु ॐ ह्लीं बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ऐं ॐ ह्लीं बगलामुखि वैष्णवीसहिताय नागाधिपतये गरुडवाहनाय श्यामवर्णाय चक्रहस्ताय सपरिवाराय एहि एहि मम विघ्नान् विभञ्जय विभञ्जय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्लीं अमुकस्य मुखं भेदय भेदय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु ॐ ह्लीं बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ऐं ॐ ह्लीं बगलामुखि रविमण्डलमध्याद् अवतर अवतर सान्निध्यं कुरु-कुरु । ॐ ऐं परमेश्वरीम् आवाहयामि नमः । मम सान्निध्यं कुरु कुरु । ॐ ह्लीं बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः बगले चतुर्भुजे मुद्गरशरसंयुक्ते दक्षिणे जिह्वावज्रसंयुक्ते वामे श्रीमहाविद्ये पीतवस्त्रे पञ्चमहाप्रेताधिरुढे सिद्धविद्याधरवन्दिते ब्रह्म-विष्णु-रुद्र-पूजिते आनन्द-सवरुपे विश्व-सृष्टि-स्वरुपे महा-भैरव-रुप धारिणि स्वर्ग-मृत्यु-पाताल-स्तम्भिनी वाममार्गाश्रिते श्रीबगले ब्रह्म-विष्णु-रुद्र-रुप-निर्मिते षोडश-कला-परिपूरिते दानव-रुप सहस्रादित्य-शोभिते त्रिवर्णे एहि एहि मम हृदयं प्रवेशय प्रवेशय शत्रुमुखं स्तम्भय स्तम्भय अन्य-भूत-पिशाचान् खादय-खादय अरि-सैन्यं विदारय-विदारय पर-विद्यां पर-चक्रं छेदय-छेदय वीरचक्रं धनुषां संभारय-संभारय त्रिशूलेन् छिन्ध-छिन्धि पाशेन् बन्धय-बन्धय भूपतिं वश्यं कुरु-कुरु सम्मोहय-सम्मोहय विना जाप्येन सिद्धय-सिद्धय विना मन्त्रेण सिद्धि कुरु-कुरु सकलदुष्टान् घातय-घातय मम त्रैलोक्यं वश्यं कुरु-कुरु सकल-कुल-राक्षसान् दह-दह पच-पच मथ-मथ हन-हन मर्दय-मर्दय मारय-मारय भक्षय-भक्षय मां रक्ष-रक्ष विस्फोटकादीन् नाशय-नाशय ॐ ह्लीं विष-ज्वरं नाशय-नाशय विषं निर्विषं कुरु-कुरु ॐ ह्लीं बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ क्लीं क्लीं ह्लीं बगलामुखि सर्व-दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय स्तम्भय जिह्वां कीलय कीलय बुद्धिं विनाशय विनाशय क्लीं क्लीं ह्लीं स्वाहा ।

ॐ बगलामुखि स्वाहा । ॐ पीताम्बरे स्वाहा । ॐ त्रिपुरभैरवि स्वाहा । ॐ विजयायै स्वाहा । ॐ जयायै स्वाहा । ॐ शारदायै स्वाहा । ॐ सुरेश्वर्यै स्वाहा । ॐ रुद्राण्यै स्वाहा । ॐ विन्ध्यवासिन्यै स्वाहा । ॐ त्रिपुरसुन्दर्यै स्वाहा । ॐ दुर्गायै स्वाहा । ॐ भवान्यै स्वाहा । ॐ भुवनेश्वर्यै स्वाहा । ॐ महा-मायायै स्वाहा । ॐ कमल-लोचनायै स्वाहा । ॐ तारायै स्वाहा । ॐ योगिन्यै स्वाहा । ॐ कौमार्यै स्वाहा । ॐ शिवायै स्वाहा । ॐ इन्द्राण्यै स्वाहा । ॐ ह्लीं बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ह्लीं शिव-तत्त्व-व्यापिनि बगलामुखि स्वाहा । ॐ ह्लीं माया-तत्त्व-व्यापिनि बगलामुखि हृदयाय स्वाहा । ॐ ह्लीं विद्या-तत्त्व-व्यापिनि बगलामुखि शिरसे स्वाहा । ॐ ह्लीं बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः शिरो रक्षतु बगलामुखि रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः भालं रक्षतु पीताम्बरे रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः नेत्रे रक्षतु महा-भैरवि रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः कर्णौ रक्षतु विजये रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः नसौ रक्षतु जये रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः वदनं रक्षतु शारदे विन्ध्यवासिनि रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः बाहू त्रिपुर-सुन्दरि रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः करौ रक्षतु दुर्गे रक्ष रक्ष स्वाहा ।

ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः हृदयं रक्षतु भवानी रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः उदरं रक्षतु भुवनेश्वरि रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः नाभिं रक्षतु महामाये रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः कटिं रक्षतु कमललोचने रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः उदरं रक्षतु तारे रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः सर्वांगं रक्षतु महातारे रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः अग्रे रक्षतु योगिनि रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः पृष्ठे रक्षतु कौमारि रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः दक्षिणपार्श्वे रक्षतु शिवे रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्लां ह्लीं ह्लूं ह्लैं ह्लौं ह्लः वामपार्श्वे रक्षतु इन्द्राणि रक्ष रक्ष स्वाहा ।

ॐ गं गां गूं गैं गौं गः गणपतये सर्वजनमुखस्तम्भनाय आगच्छ आगच्छ मम विघ्नान् नाशय नाशय दुष्टं खादय खादय दुष्टस्य मुखं स्तम्भय स्तम्भय अकालमृत्युं हन हन भो गणाधिपते ॐ ह्लीम वश्यं कुरु कुरु ॐ ह्लीं बगलामुखि हुं फट् स्वाहा ।

अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा सिद्धिर्भवति नान्यथा ।

भ्रूयुग्मं तु पठेत नात्र कार्यं संख्याविचारणम् ।।

यन्त्रिणां बगला राज्ञी सुराणां बगलामुखि ।

शूराणां बगलेश्वरी ज्ञानिनां मोक्षदायिनी ।।

एतत् स्तोत्रं पठेन् नित्यं त्रिसन्ध्यं बगलामुखि ।

विना जाप्येन सिद्धयेत साधकस्य न संशयः ।।

निशायां पायसतिलाज्यहोमं नित्यं तु कारयेत् ।

सिद्धयन्ति सर्वकार्याणि देवी तुष्टा सदा भवेत् ।।

मासमेकं पठेत् नित्यं त्रैलोक्ये चातिदुर्लभम् ।

सर्व-सिद्धिमवाप्नोति देव्या लोकं स गच्छति ।।

श्री बगलामुखिकल्पे वीरतन्त्रे बगलासिद्धिप्रयोगः ।

 

3……सर्व मनोकामना पूरक भैरव देव जी का नित्य जाप करने के लिए शाबर मंत्र जन हितार्थ प्रस्तुत है।

ॐ सत् नमो आदेश गुरु को आदेश
गुरूजी चंडी चंडी तो प्रचंडी
अला-वला फिरे नवखंडी
तीर बांधू तलवार बांधू बीस कोस पर बांधू वीर
चक्र ऊपर चक्र चले भैरव वली के आगे धरे
छल चले वल चले तब जानबा काल भैरव तेरा रूप कौन भैरव
आदि भैरव युगादी भैरव त्रिकाल भैरव कामरु देश रोला मचाबे
हिन्दू का जाया मुसलमान का मुर्दा फाड़ फाड़ बगाया
जिस माता का दूध पिया सो माता कि रक्षा करना
अबधूत खप्पर मैं खाये
मशान मैं लेटे
काल भैरव तेरी पूजा कोण मेटे
रजा मेटे राज-पाठ से जाये
योगी मेटे योग ध्यान से जाये
परजा मेटे दूध पूत से जाये
लेना भैरव लोंग सुपारी
कड़वा प्याला भेंट तुम्हारी
हाथ काती मोंडे मड़ा जहा सुमिरु ताहा हाज़िर खड़ा
श्री नाथ जी गुरूजी आदेश आदेश। ।

किसी भी पुष्य नक्षत्र या गुप्त नवरात्रि से किसी भी शुभ पर्व आदि को इस मंत्र को जाग्रत कर लें उसके बाद नित्य भैरव जी के सामने इस मंत्र कि दो माला का जाप करे। या यथाशक्ति जाप करे।

4……भूतशुद्धि
आगमोक्त पूजन में “भूतशुद्धि” एक आवश्यक अंग है। यह आगम में राजयोग का हिस्सा है। यों तो ग्रन्थों में इसके विस्तृत विधान का वर्णन है परन्तु इसके एक सुगम मन्त्रात्मक विधान का मैं उल्लेख आप विद्वत जनों के समालोचनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
निम्मन मन्त्र पढते हुए वाम नासिका से श्वास ग्रहण करे:
ॐ भूत-श्रृङ्गाटाच्छिर: सुषुम्नापथेन जीव शिवं परमशिव पदे योजयामि स्वाहा
अब श्वास को रोके रख निम्मन मन्त्रों को पढे:
ॐ यं लिङ्ग शरीरं शोषय शोषय स्वाहा
ॐ रं संकोच शरीरं दह-दह पच-पच स्वाहा
ॐ वं परमशिवामृतं वर्षय-वर्षय स्वाहा
ॐ शाम्भव शरीरं उत्पादय-उत्पादय स्वाहा
अब निम्मन मन्त्र पढते हुए दाहिनी नासिका से धीरे-धीरे श्वास को छोड़े:
ॐ हंस: सोऽहम् अवतरावतर परमशिव जीवं सुषुम्ना-पथेन प्रविश मूल श्रृङ्गाटमुल्लसोल्लस ज्वल ज्वल प्रज्वल-प्रज्वल सोऽहं हंस: स्वाहा
अपने शरीर को सभी पापों से मुक्त एवं देवता की साधना के योग्य समझे।
“भूत-शुद्धि” करें या “ॐ ह्रौं ” का ११बार जप करे ।
आचमन, प्राणायाम कर इष्टदेवता का मानसोपचार (संभव हो तो बाह्य भी) पूजन करे ।

5…महाभय-निवारक, सर्वरक्षक श्रीमहाविद्या-कवच
ॐ प्राच्यां रक्षतु मे तारा, कामरुप-निवासिनी,
आग्नेयां षोडशी पातु, याम्यां धूमावती स्वंय ।।१।।
नैर्ऋत्यां भैरवी पातु, वारुण्यां भुवनेश्वरी,
वायव्यां सततं पातु, छिन्नमस्ता महेश्वरी ।।२।।
कौबेर्यां पातु मे देवी, श्रीविद्या बगलामुखी,
ऐशान्यां पातु मे नित्यं, महा-त्रिपुर-सुन्दरी ।।३।।
उर्ध्वं रक्षतु मे विद्या, मातंगी पीठ-वासिनी,
सर्वत: पातु मे नित्यं, कामाख्या कालिका स्वयं।।४।।
ब्रह्म-रुपा महा-विद्या, सर्व-विद्या-मयी स्वयं,
शीर्षे रक्षतु मे दुर्गा, भालं श्रीभव-गेहिनी ।।५।।
त्रिपुरा भ्रू-युगे पातु, शर्वाणी पातु नासिकाम्,
चक्षुषी चण्डिका पातु, श्रोत्रे नील-सरस्वती।।६।।
मुखं सौम्यमुखी पातु, ग्रीवां रक्षतु पार्वती,
जिह्वां रक्षतु मे देवी, जिह्वा-ललन-भीषणा।।७।।
वाग्देवी वदनं पातु, वक्ष: पातु महेश्वरी,
बाहू महा-भुजा पातु, करांगुली: सुरेश्वरी ।।८।।
पृष्ठत: पातु भीमास्या, कट्यां देवी दिगम्बरी,
उदरं पातु मे नित्यं, महाविद्या महोदरी ।।९।।
उग्र-तारा महा-देवी, जंघोरू परि-रक्षतु,
गुदं मुष्कं च मेढ्रं च, नाभि च सुर-सुन्दरी।।१०।।
पदांगुली: सदा पातु भवानी त्रिदशेश्वरी,
रक्तं-मांसास्थि-मज्जादीन, वातु देवी शवासना।।११।।
महा-भयेषु घोरेषु, महाभय- निवारिणी,
पातु देवी महामाया, कामाख्या पीठवासिनी।।१२।।
भस्माचल-गता दिव्य-सिंहासन-कृताश्रया,
पातु श्रीकालिका-देवी, सर्वोत्पातेषु सर्वदा।।१३।।
रक्षा-हीनं तु यत् स्थानं, कवचेनापि वर्जितम्,
तत्-सर्वं सर्वदा पातु, सर्व-रक्षण-कारिणी।।१४।।

6…..शत्रुनाशक बगला माला-मन्त्र

ॐ नमो भगवति ॐ नमो वीरप्रतापविजय भगवति बगलामुखि मम सर्वनिन्दकानां सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं गतिं स्तम्भय स्तम्भय ब्रह्मीं मुद्रय मुद्रय बुद्धिं विनाशय विनाशय अपराबुद्धिं कुरु कुरु आत्मविरोधिनां शत्रूणां शिरो ललाट मुख नेत्र कर्ण नासिकोरु पद अणुरेणु दन्तोष्ठ जिह्वा तालु गुह्य गुद कटि जानु सर्वाङ्गेषु केशादिपादपर्यन्तं पादादिकेशपर्यन्तं स्तम्भय स्तम्भय खें खीं मारय मारय परमन्त्र परतन्त्राणि छेदय छेदय आत्मयन्त्रमन्त्रतन्त्राणि रक्ष रक्ष सर्वग्रहं निवारय निवारय व्याधिं विनाशय विनाशय दुखं हर हर दारिद्रयं निवारय निवारय सर्वमन्त्रस्वरूपिणि सर्वतन्त्रस्वरूपिणि सर्वशिल्प-प्रयोग-स्वरूपिणि सर्वतत्वस्वरूपिणि दुष्टग्रह भूतग्रह आकाशग्रह पाषाणग्रह सर्वचाण्डालग्रह यक्षकिन्नर-किम्पुरुषग्रह भूतप्रेतपिशाचानां शाकिणी-डाकिणीग्रहाणां पूर्वदिशां बन्धय बन्धय वार्तालि मां रक्ष रक्ष दक्षिणदिशां बन्धय बन्धय किरातवार्तालि मां रक्ष रक्ष पश्चिमदिशां बन्धय बन्धय स्वप्नवार्तालि मां रक्ष रक्ष उत्तरदिशां बन्धय बन्धय कालि मां रक्ष रक्ष ऊर्ध्वदिशं बन्धय बन्धय उग्रकालि मां रक्ष रक्ष पातालदिशं बन्धय बन्धय बगलापरमेश्वरि मां रक्ष रक्ष सकलरोगान् विनाशय विनाशय सर्वशत्रून् पलायनाय पञ्चयोजनमध्ये राजजनस्त्रीवशतां कुरु कुरु शत्रून् दह दह पच पच स्तम्भय स्तम्भय मोहय मोहय आकर्षय आकर्षय मम शत्रून् उच्चाटय उच्चाटय हुम् फट् स्वाहा !

7….री क्षेत्रपाल-भैरवाष्टक-स्तोत्र
विश्वसार-तन्त्र का यह स्तोत्र भावपूर्वक पाठ करने मात्र से प्रभाव दिखाता है।

यं यं यं यक्ष-रूपं दश-दिशि-वदनं भूमि-कम्पाय-मानम्।
सं सं सं संहार-मूर्ति शिर-मुकुट-जटा-जूट-चन्द्र-बिम्बम्॥
दं दं दं दीर्घ-कायं विकृत-नख-मुखं ऊर्ध्व-रोम-करालं।
पं पं पं पाप-नाशं प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥१॥
रं रं रं रक्त-वर्णं कट-कटि-तनुं तीक्ष्ण-दंष्ट्रा-करालम् ।
घं घं घं घोष-घोषं घघ-घघ-घटितं घर्घरा-घोर-नादं॥
कं कं कं काल-रूपं धिग-धिग-धृगितं ज्वालित-काम-देहं।
दं दं दं दिव्य-देहं प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥२॥
लं लं लं लम्ब-दन्तं लल-लल-लुलितं दीर्घ-जिह्वा-करालं।
धूं धूं धूं धूम्र-वर्णं स्फुट-विकृत-मुखं भासुरं भीम-रूपं॥
रुं रुं रुं रुण्ड-मालं रुधिर-मय-मुखं ताम्र-नेत्रं विशालं।
नं नं नं नग्न-रूपं प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥३॥
वं वं वं वायु-वेगं प्रलय-परिमितं ब्रह्म-रूपं-स्वरूपम्।
खं खं खं खङ्ग-हस्तं त्रिभुवननिलयं भास्करं भीमरूपं॥
चं चं चं चालयन्तं चल-चल-चलितं चालितं भूत-चक्रं।
मं मं मं माया-रूपं प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥४॥
शं शं शं शङ्ख-हस्तं शशि-कर-धवलं यक्ष-सम्पूर्ण-तेजं।
मं मं मं माय-मायं कुलमकुल-कुलं मन्त्र-मूर्ति स्व-तत्वं॥
भं भं भं भूत-नाथं किल-किलित-वचश्चारु-जिह्वालुलंतं।
अं अं अं अंतरिक्षं प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥५॥
खं खं खं खङ्ग-भेदं विषममृत-मयं काल-कालांधकारं।
क्षीं क्षीं क्षीं क्षिप्र-वेगं दह दह दहनं गर्वितं भूमि-कम्पं॥
शं शं शं शान्त-रूपं सकल-शुभ-करं देल-गन्धर्व-रूपं।
बं बं बं बाल-लीलां प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥६॥
सं सं सं सिद्धि-योगं सकल-गुण-मयं देव-देव-प्रसन्नम्।
पं पं पं पद्म-नाभं हरि-हर-वरदं चन्द्र-सूर्याग्नि-नेत्रं ।
जं जं जं यक्ष-नागं प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥७॥
हं हं हं हस-घोषं हसित-कहकहा-राव-रुद्राट्टहासम्।
यं यं यं यक्ष-सुप्तं शिर-कनक-महाबद्-खट्वाङ्गनाशं॥
रं रं रं रङ्ग-रङ्ग-प्रहसित-वदनं पिङ्गकस्याश्मशानं।
सं सं सं सिद्धि-नाथं प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥८॥

॥फल-श्रुति॥
एवं यो भाव-युक्तं पठति च यत: भैरवास्याष्टकं हि ।
निर्विघ्नं दु:ख-नाशं असुर-भय-हरं शाकिनीनां विनाश:॥
दस्युर्न-व्याघ्र-सर्प: घृति विहसि सदा राजशस्त्रोस्तथाज्ञातं।
सर्वे नश्यन्ति दूराद् ग्रह-गण-विषमाश्चेति तांश्चेष्टसिद्धि:॥

श्री-यन्त्र की संक्षिप्त आवरण पूजन

सर्वप्रथम प्राणायाम आदि कर तीन बार आचमन कर इस प्रकार आसन पूजन करें

ॐ अस्य श्री आसन पूजन महामन्त्रस्य कूर्मो देवता मेरूपृष्ठ ऋषि पृथ्वी सुतलं छंद: आसन पूजने विनियोग: ।

विनियोग हेतु जल भूमि पर गिरा दें ।

पृथ्वी पर रोली से त्रिकोण का निर्माण कर इस मन्त्र से

पंचोपचार पूजन करें – ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवी त्वं विष्णुनां धृता त्वां च धारय मां देवी पवित्रां कुरू च आसनं ।ॐ आधारशक्तये नम: । ॐ कूर्मासनायै नम: । ॐ पद्‌मासनायै नम: । ॐ सिद्धासनाय नम: । ॐ साध्य सिद्धसिद्धासनाय नम: ।
तदुपरांत गुरू गणपति गौरी पित्र व स्थान देवता आदि का स्मरण व पंचोपचार पूजन कर कलश स्थापित करें व उसमें

।।ॐ गंगेश्च यमुनेश्चैव गोदावरी सरस्वती नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेस्मिन सन्निधिं कुरू।।

से जल में तीर्थों का आवाहन कर पंचोपचार से पूजन करें । उस पवित्र जल से ही समस्त पूजा सामग्री को पवित्र करें ।
श्री चक्र के सम्मुख व अपने बाईं ओर वृत्त के मध्य षटकोण व त्रिकोण से मण्डल का निर्माण कर पंचोपचार पूजन करें व मत्स्य मुद्रा का प्रदर्शन करें ।
फट्‌ का उच्चारण कर शंख को धोकर पुष्प गन्ध डालकर षोड़शाक्षरी अथवा दीक्षा में प्राप्त मूल मन्त्र जपते हुए शंख को जल से पूर्ण कर उस मण्डल पर स्थापित करें व शंख के जल में

।।ॐ गंगेश्च यमुनेश्चैव गोदावरी सरस्वती नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेस्मिन सन्निधिं कुरू।।

से जल में तीर्थों का आवाहन इस प्रकार पूजन करें

शंख के आधार पर :- ॐ अं वह्नि मण्डलाय दशकलात्मने नम: ।

शंख पर :- ॐ उं सूर्य मण्डलाय द्वादशकलात्मने नम: ।
शंख के जल में :- ॐ मं सोम मण्डलाय षोड़शकलात्मने नम:

“हुं” का उच्चारण करते हुए शंख पर पंचोपचार पूजन कर धेनु मुद्रा का प्रदर्शन करते हुए षोड़शाक्षरी अथवा दीक्षा में प्राप्त मूल मन्त्र का आठ बार जप करें व शंख में से थोड़ा जल प्रोक्षणी पात्र में गिरा दें ।

श्री चक्र के सम्मुख व अपने दाहिनी ओर पाद्य पात्र स्थापित करके श्री चक्र पर पीठ पूजन प्रारम्भ करें :

ॐ पृथिव्यै नम: । ॐ आधारशक्तये नम: । ॐ कूर्मायै नमः । ॐ अनन्तायै नमः । ॐ रत्नद्वीपायै नमः । ॐ रत्न मण्डपायै नमः । ॐ रत्न वेदिकायै नमः । ॐ रत्न सिंहासनायै नमः । ॐ रत्न पीठायै नमः ।

श्री चक्र के बिन्दु चक्र में भगवान शिव का ध्यान करके मन्त्र से पंचोपचार पूजन करें :

ॐ ह्सौं सदाशिव महाप्रेत पद्‌मासनाय लिंग मुद्रा स्वरूपिणे नमः ।

श्री चक्र के बिन्दु पीठ में भगवती शिवा महात्रिपुरभैरवी का ध्यान करके इस मन्त्र से पंचोपचार पूजन करें :

ॐ हसरैं हसकलरीं हसरौं: महायोनि मुद्रा स्वरूपिण्यै नमः

इस मन्त्र को बोलकर तीन बार पुष्पांजलि अर्पित करें :

ॐ महापद्‌मावनान्तस्थे कारणानन्द विग्रहे । सर्वभूतहिते मातरेह्येहि परमेश्वरी ।।
श्री पादुकां पूजयामि नमः

बोलकर शंख के जल से अर्घ्य प्रदान करते रहें ।
श्री चक्र के बिन्दु चक्र में निम्न मन्त्रों से षड़ांग पूजन करते हुए न्यास करें :

1 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं अंगुष्ठाभ्याम नमः । अंगुष्ठ शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

2 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा । तजर्नी शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः

3 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं मध्यमाभ्यां वष्‌ट । मध्यमा शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः

4 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं अनामिकाभ्यां हुम्‌ । अनामिका शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः

5 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट । कनिष्ठिका शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

6 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं करतल करपृष्ठाभ्यां फट्‌ । करतल करपृष्ठ शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

श्री चक्र के बिन्दु चक्र में निम्न मन्त्रों से षड़ांग पूजन करते हुए न्यास करें :

1 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं हृदयाय नमः । हृदय शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

2 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं शिरसे स्वाहा । शिर: शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

3 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं शिखायै वष्‌ट । शिखा शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

4 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क ए ई ल ह्रीं कवचायै हुम्‌ । कवच शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

5 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ह स क ह ल ह्रीं नेत्रत्रयाय वौषट । नेत्र शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः

6 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं स क ल ह्रीं अस्त्राय फट्‌ । अस्त्र शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

निम्न मन्त्रों से षोड़शांग पूजन करते हुए न्यास करें :

1 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं नमः पादयो । पाद शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । दोनों पैरों पर ।

2 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क नमः जंघे । जंघा शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । दोनों जंघाओं पर ।

3 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ए नमः जानु । जानु शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । दोनों घुटनों पर ।

4 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ई नमः कटिदेशे । कटि शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । छाती पर ।

5 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ल नमः लिंगे । लिंग शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । लिंग पर स्पर्श कर हाथ धो लें ।

6 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं नमः पृष्ठे । पृष्ठ शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । पीठ पर ।

7 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह नमः नाभौ । नाभी शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । नाभी पर ।

8 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं स नमः पार्श्वे । पार्श्व शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । दोनों बगल में ।

9 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क नमः स्तने । स्तन शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । दोनों स्तनों पर ।

10 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह नमः स्कन्धयो । स्कन्ध शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । दोनों कन्धों पर ।

11 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ल नमः कर्णयो । कर्ण शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । दोनों कानों पर

12 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं नमः ब्रह्मरन्ध्रे । ब्रह्म शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । शिखा पर

13 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं स नमः मुखे । मुख शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । मुख पर

14 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क नमः नेत्रयो । मुख शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । दोनों नेत्रों पर ।

15 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ल नमः ग्रीवे ग्रीवा शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । गर्दन पर ।

16 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं नमः गुह्ये । गुह्य शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । गुदा पर ।

श्री चक्र के बिन्दु चक्र में निम्न मन्त्रों से गुरू पूजन करें :

1 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गुरू पादुकां पूजयामि नमः ।

2 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री परम गुरू पादुकां पूजयामि नमः ।

3 ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री परात्पर गुरू पादुकां पूजयामि नमः ।

श्री चक्र के बिन्दु पीठ में भगवती शिवा महात्रिपुरसुन्दरी का ध्यान करके योनि मुद्रा का प्रदर्शन करते हुए पुन: इस मन्त्र से तीन बार पूजन करें :

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं श्री ललिता महात्रिपुर सुन्दरी श्री विद्या राज राजेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

भगवती श्री चक्रराज निलया का ध्यान करें :

ॐ बालार्क मण्डलाभासां चतुर्बाहां त्रिलोचनां। पाशांकुश शरांश्चापं धारयन्तीं शिवां भजे ।।

।। आवरण पूजा ।।

1 त्रैलोक्यमोहन चक्रे ।
प्रथम रेखा :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अणिमाद्यष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

द्वितीय रेखा : ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ब्राह्म्याद्यष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

तृतीय रेखा :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्वसंक्षोभिण्यादि दश मुद्रा देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

चक्राग्रे :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं प्रकट योगिनी त्रिपुरा चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

अर्घ्य जल प्रदान करें :

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रैलोक्यमोहन चक्रस्य अधिष्ठात्री प्रकट योगिनी त्रिपुरा चक्रेश्वरी देव्यै समुद्रा: ससिद्धय: सायुधा: सशक्तय: सवाहना: सपरिवारा: सर्वोपचारै: सम्पूजिता: सन्तर्पिता: सन्तुष्टा: सन्तु नमः ।

2 सर्वाशा परिपूरक चक्रे ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लृृं एं ऐं ओं औं अं अ: कामाकर्षण्यादि षोड़श नित्या कला देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

चक्राग्रे :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं गुप्त योगिनी त्रिपुरेशी चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

अर्घ्य जल प्रदान करें :

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्वाशा परिपूरक चक्रस्य अधिष्ठात्री गुप्त योगिनी त्रिपुरेशी चक्रेश्वरी देव्यै समुद्रा: ससिद्धय: सायुधा: सशक्तय: सवाहना: सपरिवारा: सर्वोपचारै: सम्पूजिता: सन्तर्पिता: सन्तुष्टा: सन्तु नमः ।

3 सर्व संक्षोभण चक्रे ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अनंग कुसुमादि अष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

चक्राग्रे :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं गुप्ततर योगिनी त्रिपुरसुन्दरी चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

अर्घ्य जल प्रदान करें :

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्व संक्षोभण चक्रस्य अधिष्ठात्री गुप्ततर योगिनी त्रिपुरसुन्दरी चक्रेश्वरी देव्यै समुद्रा: ससिद्धय: सायुधा: सशक्तय: सवाहना: सपरिवारा: सर्वोपचारै: सम्पूजिता: सन्तर्पिता: सन्तुष्टा: सन्तु नमः ।

4 सर्व सौभाग्य दायक चक्रे ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्व संक्षोभिणि आदि चतुर्दश देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

चक्राग्रे :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सम्प्रदाय योगिनी त्रिपुरवासिनी चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

अर्घ्य जल प्रदान करें :

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्व सौभाग्य दायक चक्रस्य अधिष्ठात्री सम्प्रदाय योगिनी त्रिपुरवासिनी चक्रेश्वरी देव्यै समुद्रा: ससिद्धय: सायुधा: सशक्तय: सवाहना: सपरिवारा: सर्वोपचारै: सम्पूजिता: सन्तर्पिता: सन्तुष्टा: सन्तु नमः ।

5 सर्वार्थसाधक चक्रे ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्व सिद्धि प्रदादि दश देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

चक्राग्रे :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कुलोत्तीर्ण योगिनी त्रिपुरा श्री चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

अर्घ्य जल प्रदान करें :

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्वार्थ साधक चक्रस्य अधिष्ठात्री कुलोत्तीर्ण योगिनी त्रिपुरा श्री चक्रेश्वरी देव्यै समुद्रा: ससिद्धय: सायुधा: सशक्तय: सवाहना: सपरिवारा: सर्वोपचारै: सम्पूजिता: सन्तर्पिता: सन्तुष्टा: सन्तु नमः ।

6 सर्व रक्षाकर चक्रे ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्व सर्वज्ञादि दश देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।
चक्राग्रे :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं निगर्भ योगिनी त्रिपुरमालिनी चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

अर्घ्य जल प्रदान करें :-

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्व रक्षाकर चक्रस्य अधिष्ठात्री निगर्भ योगिनी त्रिपुरमालिनी चक्रेश्वरी देव्यै समुद्रा: ससिद्धय: सायुधा: सशक्तय: सवाहना: सपरिवारा: सर्वोपचारै: सम्पूजिता: सन्तर्पिता: सन्तुष्टा: सन्तु नमः ।

7 सर्व रोगहर चक्रे ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वशिन्यादि अष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।
चक्राग्रे :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं रहस्य योगिनी त्रिपुरासिद्धा चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

अर्घ्य जल प्रदान करें :

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्व रोगहर चक्रस्य अधिष्ठात्री रहस्य योगिनी त्रिपुरासिद्धा चक्रेश्वरी देव्यै समुद्रा: ससिद्धय: सायुधा: सशक्तय: सवाहना: सपरिवारा: सर्वोपचारै: सम्पूजिता: सन्तर्पिता: सन्तुष्टा: सन्तु नमः ।

8 सर्व सिद्धि प्रद चक्रे ।

अग्रकोणे :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ब्रह्मा शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं महाकामेश्वरी देव्या शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

दक्षिणकोणे :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं विष्णु शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं महावज्रेश्वरी देव्या शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

वामकोणे :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं रूद्र शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सौं महाभगमालिनी देव्या शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

चक्राग्रे :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अतिरहस्य योगिनी त्रिपुराम्बा चक्रेश्वरी शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

अर्घ्य जल प्रदान करें :

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्व सिद्धि प्रद चक्रस्य अधिष्ठात्री अतिरहस्य योगिनी त्रिपुराम्बा चक्रेश्वरी देव्यै समुद्रा: ससिद्धय: सायुधा: सशक्तय: सवाहना: सपरिवारा: सर्वोपचारै: सम्पूजिता: सन्तर्पिता: सन्तुष्टा: सन्तु नमः ।

9 सर्वानन्द मये महाबिन्दु चक्रे ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महात्रिपुरसुन्दरी श्रीविद्या शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः । तीन बार पूजन करें ।

महाबिन्दु चक्र के दाहिनी ओर :

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महालिंग मुद्रा शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः

महाबिन्दु चक्र के बाईं ओर :

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महायोनि मुद्रा शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः

महाबिंदु पीठ पर :

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं परापरातिरहस्य योगिनी ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं श्री ललिता महात्रिपुरसुन्दरी श्री राजराजेश्वरी षोड़शात्मिका श्रीविद्या चक्रेश्वरी शक्ति श्री पादुकां पूजयामि नमः ।

तीन बार अर्घ्य जल प्रदान करें :

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महाबैन्दव चक्रस्य अधिष्ठात्री परापरातिरहस्य योगिनी ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं श्री ललिता महात्रिपुरसुन्दरी श्री राजराजेश्वरी षोड़शात्मिका श्रीविद्या चक्रेश्वरी शक्ति देव्यै समुद्रा: ससिद्धय: सायुधा: सशक्तय: सवाहना: सपरिवारा: सर्वोपचारै: सम्पूजिता: सन्तर्पिता: सन्तुष्टा: सन्तु नमः ।

महायोनि मुद्रा का प्रदर्शन करके प्रणाम करें ।
तदुपरान्त अरती स्तोत्र आदि तथा षोड़शाक्षरी अथवा दीक्षा में प्राप्त मूल मन्त्र जप आदि कर्म सम्पन्न कर हाथ में जल लेकर भगवती पराम्बा को अपना कर्म समर्पित कर आसन त्यागें ।

10…..(पञ्चमुखहनुमत्तन्त्रतः)
ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय पञ्चवदनाय पूर्वमुखे
सकलशत्रुसंहारकाय रामदूताय स्वाहा ॥
ॐ नमो हनुमते रुद्रावतारय पञ्चवदनाय दक्षिणमुखे करालवदनाय
नारसिंहाय सकलभूतप्रेतदमनाय रामदूताय स्वाहा ॥
ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय पञ्चवदनाय पश्चिममुखे गरुडाय
सकलविघ्ननिवारणाय रामदूताय स्वाहा ॥
ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय पञ्चवदनाय उत्तरमुखे आदिवराहाय
सकलसम्पत्कराय रामदूताय स्वाहा ॥
ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय ऊर्ध्वमुखे हयग्रीवाय
सकलजनवशीकरणाय रामदूताय स्वाहा ॥

(ग्रहोच्चाटनार्थम्)
ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वग्रहान् भूतभविष्यद्वर्तमानान्
समीपस्थान् सर्वकालदुष्टबुद्धीनुच्चाटयोच्चाटय परबलानि
क्षोभय क्षोभय मम सर्वकार्याणि साधय साधय स्वाहा ॥
ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय
परकृतयन्त्रमन्त्रपराहङ्कार-
भूतप्रेतपिशाचपरसृष्टिविघ्नतर्जनचेटकविद्यासर्वग्रहभयं
निवारय निवारय स्वाहा ॥
ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय डाकिनीशाकिनीब्रह्मराक्षसकुल-
पिशाचोरुभयं निवारय निवारय स्वाहा ॥

(व्याधिनिवारणार्थम्)
ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय भूतज्वरप्रेतज्वरचातुर्थिकज्वर-
विष्णुज्वरमहेशज्वरं निवारय निवारय स्वाहा ॥
ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय अक्षिशूल-पक्षशूल-शिरोऽभ्यन्तरशूल-
पित्तशूल-ब्रह्मराक्षसशूल-पिशाचकुलच्छेदनं निवारय निवारय स्वाहा ॥

(भूतादिग्रहबन्धनार्थम्)
ॐ नमो भगवते वीरहनुमते प्रलयकालानलप्रभाज्वलनाय
प्रतापवज्रदेहाय अञ्जनागर्भसम्भूताय प्रकटविक्रमवीरदैत्यदानव-
यक्षरक्षोगणग्रहबन्धनाय भूतग्रहनिबन्धनाय ब्रह्मबन्धनाय
शाकिनीकामिनीग्रहबन्धनाय ब्रह्मराक्षसग्रहबन्धनाय चोरग्रहबन्धनाय
मारिकाग्रहबन्धनाय एह्येहि आगच्छागच्छ आवेशयावेशय मम हृदयं
प्रवेशय प्रवेशय स्वाहा ॥
ॐ यं ह्रीं वायुपुत्राय एह्येहि आगच्छागच्छ आवेशयावेशय
श्रीरामचन्द्र आवेशयावेशय श्रीरामचन्द्र आज्ञापयति स्वाहा ॥

(सर्वतो विजयार्थम्)
ॐ हूं हनुमते रुद्रात्मकाय हूं फट् स्वाहा ॥
ॐ हं पवननन्दनाय हनुमते स्वाहा ॥
ॐ ह्रीं यं ह्रीं रामदूताय रिपुपुरीदहनाय अक्षकुक्षिविदारणाय
अपरिमितबलपराक्रमाय रावणगिरिवज्रायुधाय ह्रीं स्वाहा ॥
ॐ भगवते अञ्जनापुत्राय उज्जयिनीनिवासिने गुरुतरपराक्रमाय
श्रीरामदूताय लङ्कापुरीदाहनाय यक्षराक्षससंहारकारिणे हुं फट् स्वाहा ॥
ॐ श्रीं महाञ्जनेय पवनपुत्राऽवेशयाऽवेशय ॐ हनुमते फट् स्वाहा ॥

(ज्ञानार्थम्)
ॐ नमो हनुमते मम मदनक्षोभं संहर संहर आत्मतत्वं
प्रकाशय प्रकाशय हुं फट् स्वाहा ॥

(बन्धमोचनार्थम्)
ॐ हरिमर्कट वामकरे परिमुञ्च मुञ्च शृङ्खलिकां स्वाहा ।
ॐ यो यो हनूमन्त फलिफलिति धिगिधिगिति हर हर हूं फट् स्वाहा ॥
ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय शृङ्खलां त्रोटय त्रोटय
बन्धमोक्षं कुरु कुरु स्वाहा ॥
ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय महाबलाय स्वाहा ॥
ॐ नमो हनुमते आवेशयाऽवेशय स्वाहा ॥
ॐ नमो हरिमर्कटाय स्वाहा ।
ॐ नमो रामदूताञ्जनेयाय वायुपत्राय महाबलाय
कोलाहलसकलब्रह्माण्डविश्वरूपाय सप्तसमुद्रनीरलङ्घनाय
पिङ्गलनयनायामितविक्रमाय दृष्टिनिरालङ्कृताय
सञ्जीविनीसञ्जीविताङ्गदलक्ष्मणमहाकपिसैन्य-
प्राणदाय रामेष्टाय स्वाहा ॥

11….दीपदानम्

कवचमन्त्रपाठः-ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रों ह्यें फ्रें
हनुमन् प्रकटपराक्रम आक्रान्तदिङ्मण्डल
यशोधवलीकृतजगत्त्रितय वज्रदेह ज्वलत्सूर्यकोटिसमप्रभ
तनुरुद्रावतार लङ्कापुरदहन उदधिलङ्घन दशग्रीवशिरःकृन्तन
सीतात्रासनिवारक वायुसुत अञ्जनीगर्भसम्भूत
श्रीरामलक्ष्मणानन्दकर कपिसैन्यप्रकाश सुग्रीवसख्यकारण
वालिनिबर्हण द्रोणपर्वतोत्पाटन अशोकवनविदारण
अक्षकास्यच्छेदन वनरक्षाकारसमूहभञ्जन ब्रह्मशक्तिग्रसन
लक्ष्मणशक्ति-भेदननिवारण शिशुसमानपीनव
आलादित्यसानुग्रसन मेघनादहोमविध्वंसन
इन्द्रजिद्वधकारण सीतारक्षक राक्षसविदारण
कुम्भकर्णादिवधपरायण श्रीरामभक्तितत्पर
व्योमद्रुमोल्लङ्घन महासामर्थ्य महातेजःपुञ्जविराजमान
स्वामिवचनसम्पादित आर्जुन-संयुगसहाय ।
कुमारब्रह्मचारिन् गम्भीरस्वर दक्षिणामार्तण्ड
मेरुपर्वतोत्पाटकचरण सर्वदुष्टनिबर्हण व्याघ्रादिभयनिवारण
सर्वशत्रुच्छेदन मम त्रिभुवनस्त्रीपुन्नपुंसकात्मकं सर्वजीवजातं
वशय वशय । ममाज्ञाकारं सम्पादय नानानामधेयान्
राज्ञः सपरिवारान् कुरु कुरु सर्ववश्य अविषाण अविषाण
विध्वंसय विध्वंसय प्रबलानि परसैन्यानि क्षोभय क्षोभय
सर्वकार्याणि साधय साधय सर्वदुर्जनानां मुखानि स्तम्भय कीलय ।
घे घे घे हा हा हा हुं हुं हुं फट् स्वाहा ॥
(दीपदानकाले जप्यमिदम् ।)

आचम्य प्राणानायम्य देशकालौ स्मृत्वा मम इह जन्मनि जन्मान्तरे
च अभीप्सितफलावाप्त्यर्थं श्रीरामरूपिहनुमद्देवताप्रीत्यर्थं
मन्त्रसिद्ध्यर्थं
पञ्चपलैकतैलेन यथाशक्ति पञ्चपलमानताम्रपात्रेण
एकविंशतितन्तुनिर्मिताभिस्त्रिभिर्वर्त्तिभिर्नित्यं दीपदानमहं
करिष्ये इति सङ्कल्प्य ॥
सुमुखश्चैकदन्तश्चेति पठित्वा पुण्याहं वाचयित्वा गणेशं सम्पूज्य
गुरुचरणारविन्दं ध्यात्वा,
भक्त्या समागतोऽहं ते पादयोर्भक्तवत्सल ।
दीपकार्यं च भवता सम्पाद्यं वै नमो नमः ॥
इत्याज्ञां गृहीत्वा कपिलागोमयोपलिप्तभूमौ दीपयन्त्रं विलिख्य
रक्तचन्दनरक्ततण्डुलैस्तद्यन्त्रं सम्पूर्य ।
यद्वा धातुनिर्मितयन्त्रं गोमयोपलिप्तभूमौ निधाय तन्मध्ये
श्रीरामरूपिहनुमह्दीप-यन्त्रराजाय नमः ।
(मूलं)दीपप्रियाय (त्रिरावृत्ति)नमः अग्नीशासुरवायव्येषु
हृदयादि सम्पूज्य दिक्ष्वस्त्रं च सम्पूज्य
यन्त्रराजमहाराज हनुमत्प्रियकारक ।
दीपं स्थापय मद्दत्तं मत्कामान्परिपूरय ॥
इति मन्त्रराजं सम्प्रार्थ्य ।
ॐ हौं रामदूताय विद्माहे वायुपुत्राय धीमहि ।
तन्नो हनुमान् प्रचोदयात् । इति गायत्रीमन्त्रेण
पात्रमभिमन्त्र्य तेनैव मूलपूर्वेण दीपपात्रं यन्त्रोपरि स्थापयेत् ॥
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं हनुमन् एहि एहि मम सन्निधिं कुरु कुरु स्वाहा ।
अनेन शुद्धतैलेन पूरयामि जगत्पते ।
श्रीहनूमन् महावीर्य कार्यं साधय मे नमः ॥
इति मन्त्रेण दीपपात्रं तैलेनापूर्य तत्र चतुरङ्गुलां सूक्ष्माग्रां
स्थूलमूलां स्वर्णादिशलाकां दक्षिणतः क्षिप्त्वा
ॐ हों हनुमन्वर्तिनं कल्पय कल्पय स्वाहा इति कन्याकरस्पशिर्ते
यथातन्तुनिर्मिते वर्तिके श्रीहनुमते इष्टान्मत्कामान्परिपूरयेति
वर्तिकं दीपान्तरे निक्षिप्य
`ॐ हौं हनुमन्सन्धुक्ष्व मम ईप्सितं सिद्ध्यतु स्वाहा ।
श्रीहनुमन्महावीर्य योगज्वलितविग्रह ।
भव सन्निहितो देव ज्वालारूपेण वर्तिषु ।
ॐ ह्रां ह्रं ह्रूं श्रीहनुमन्मम समीहितमुद्दीपयोद्दीपय हुं फट् स्वाहा
रामप्रियाय हनुमते वातात्मजाय ।
यथा दीपयते दीपं तथा कार्यं प्रदीपय ।
इति पठित्वा मूलपूर्वकं गायत्र्या प्रज्वाल्य मूलगायत्रीभ्यां
त्रिधाभिमन्त्र्य प्राणप्रतिष्ठां कुर्यात् ॥
ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं हंसः सोहं
दीपस्य प्राणा इह प्राणाः (पुनस्तान्युच्चार्य)
दीपस्य जीव इह स्थितः ।
(पुनस्तान्युच्चार्य)दीपस्य सर्वेन्द्रियाणि ।
(पुनस्तान्युच्चार्य)
दीपस्य वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रघ्राणप्राणा इहागत्य सुखं चिरं
तिष्ठन्तु स्वाहा । इति त्रिः पठित्वा पुनस्तस्मिन्नेव
हनुमत्प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा पुनश्च अकारादि क्षकारान्तं
मातृकया मूलेन गायत्र्या चाभिमन्त्र्य गन्धादि दत्वा
न्यासं कुर्यात् । मूलेन प्राणायामत्रयं कृत्वा,
ॐ अस्य श्रीद्वादशवर्णात्मकहनुमन्मन्त्रस्य रामचन्द्र ऋषिः ।
जगती छन्दः । हनुमान् देवता । ह्सौं बीजं । हस्ख्फ्रें शक्तिः ।
हौं कीलकम् । दीपपूजने विनियोगः ॥
रामचन्द्रर्षये नमः शिरसि ।
जगतीछन्दसे नमः मुखे ।
हनुमद्देवतायै नमः हृदि ।
ह्सौम्बीजाय नमः गुह्ये ।
हस्ख्फ्रेंशक्तये नमः पादयोः ।
हांऐकीलकाय नमः सर्वाङ्गे । इति ऋष्यादिन्यासः ।
हौं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
हस्फ्रें तर्जनीभ्यां नमः ।
ख्फ्रें मध्यमाभ्यां नमः
ह्स्रौं अनामिकाभ्यां नमः ।
ह्स्ख्फ्रें कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ह्सौः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । इति करन्यासः ।

हौं हृदयाय नमः ।
ह्स्फ्रें शिरसे स्वाहा ।
ख्फ्रें शिखायै वषट् ।
ह्स्रौं कवचाय हुं ।
ह्स्ख्फ्रें नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ह्सौं अस्त्राय फट् । इति हृदयादि न्यासः ।
मूलेन सर्वाङ्गे ।

अथाङ्गन्यासः-
हौं नमः मूर्ध्नि ।
ह्स्फेर्ं नमः भाले ।
ख्फ्रें नमः नेत्रयोः ।
ह्स्त्रौं नमः मुखे ।
ह्स्ख्फ्रें नमः कण्ठे ।
ह्सौः नमः हस्तद्वये ।

अक्षरन्यासः-
हनुमते नमः जङ्घयोः ।
नमोनमः पादयोः ।
हं नमः हृदि ।
नुं नमः उदरे ।
मं नमः नाभौ ।
तें नमः लिङ्गे ।
नं नमः जान्वोः ।
मं नमः पादयोः ।
मूलेन व्यापकं विधाय ।

ध्यानम् ।
अस्य श्रीहनुमद्दीपदानमालामन्त्रस्य रामचन्द्र ऋषिः ।
हनुमान् देवता । दीपप्रदाने प्रयोगसिद्धये जपे विनियोगः ।
रां रीं रूं रैं रौं रः
इत्यनेन करषडङ्गन्यासौ कत्वा ।
ॐ हनुमते नाथनाथाय अनन्तबाहवे सेतुबन्धनाय रामप्रियाय
भुभुक्कारेण ॐ स्वाहा । मालामन्न्त्रकार्यपरत्वेन योजयित्वा दीपदेवं
मानसैरुपचारैः सम्पूज्य अद्य शुभपुण्यतिथौ मम
निखिलोपद्रवशान्तिपूर्वकं सकलाभीष्टसिद्ध्यर्थं
श्रीरामरूपिहनुमद्देवताप्रीत्यर्थं पञ्च एकं वा यथाशक्ति तैलनिर्मितं
पञ्चपलमितताम्रपात्रस्थितं नित्यदीपं श्रीहनुमते
श्रीहनुमतः आवरणपूजासम्प्रददे न मम इत्यादि द्वादशवर्णान्
हनुमते अनाथनाथाय अनन्तबाहवे सेतुबन्धनाय रामप्रियाय
वायुपुत्राय अञ्जनीगर्भरत्नाय हूं हौं इमं दीपं गृहाण
सम्पूटीकृत्य ॐ तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं ॐ स्वाहा ।
सकृज्जपेत् ।
मूलमन्त्रस्य पूर्वोक्तन्यासान् कुर्यात् ॥

12…पीताम्बरा बगलामुखी खड्ग मालामन्त्र

जय महाकाल यह स्तोत्र शत्रुनाश एवं कृत्यानाश, परविद्या छेदन करने वाला एवं रक्षा कार्य हेतु प्रभावी है । साधारण साधकों को कुछ समय आवेश व आर्थिक दबाव रहता है, अतः पूजा उपरान्त नमस्तस्यादि शांति स्तोत्र पढ़ने चाहिये ।

विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीपीताम्बरा बगलामुखी खड्गमाला मन्त्रस्य नारायण ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, बगलामुखी देवता, ह्लीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, ॐ कीलकं, ममाभीष्टसिद्धयर्थे सर्वशत्रु-क्षयार्थे जपे विनियोगः ।

हृदयादि-न्यासः-
नारायण ऋषये नमः शिरसि, त्रिष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, बगलामुखी देवतायै नमः हृदि, ह्लीं बीजाय नमः गुह्ये, स्वाहा शक्तये नमः पादयो, ॐ कीलकाय नमः नाभौ, ममाभीष्टसिद्धयर्थे सर्वशत्रु-क्षयार्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।

षडङ्ग-न्यास -
कर-न्यास – अंग-न्यास -
ॐ ह्लीं अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः
बगलामुखी तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा
सर्वदुष्टानां मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वषट्
वाचं मुखं पद स्तम्भय अनामिकाभ्यां नमः कवचाय हुम्
जिह्वां कीलय कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र-त्रयाय वौषट्
बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः अस्त्राय फट्

ध्यानः-
हाथ में पीले फूल, पीले अक्षत और जल लेकर ‘ध्यान’ करे -
मध्ये सुधाब्धि-मणि-मण्डप-रत्न-वेद्यां, सिंहासनोपरि-गतां परि-पीत-वर्णाम् ।
पीताम्बराभरण-माल्य-विभूषितांगीं, देवीं स्मरामि धृत-मुद्-गर-वैरि-जिह्वाम् ।।
जिह्वाग्रमादाय करेण देवीं, वामेन शत्रून् परि-पीडयन्तीम् ।
गदाभिघातेन च दक्षिणेन, पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि ।।

मानस-पूजनः-
इस प्रकार ध्यान करके भगवती पीताम्बरा बगलामुखी का मानस पूजन करें -
ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (अधोमुख-कनिष्ठांगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (अधोमुख-तर्जनी-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-तर्जनी-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ रं वह्नयात्मकं दीपं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि । (ऊर्ध्व-मुख-मध्यमा-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-अनामिका-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ शं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-सर्वांगुलि-मुद्रा) ।

खड्ग-माला-मन्त्रः-
ॐ ह्लीं सर्वनिन्दकानां सर्वदुष्टानां वाचं मुखं स्तम्भय-स्तम्भय बुद्धिं विनाशय-विनाशय अपरबुद्धिं कुरु-कुरु अपस्मारं कुरु-कुरु आत्मविरोधिनां शिरो ललाट मुख नेत्र कर्ण नासिका दन्तोष्ठ जिह्वा तालु-कण्ठ बाहूदर कुक्षि नाभि पार्श्वद्वय गुह्य गुदाण्ड त्रिक जानुपाद सर्वांगेषु पादादिकेश-पर्यन्तं केशादिपाद-पर्यन्तं स्तम्भय-स्तम्भय मारय-मारय परमन्त्र-परयन्त्र-परतन्त्राणि छेदय-छेदय आत्म-मन्त्र-यन्त्र-तन्त्राणि रक्ष-रक्ष, सर्व-ग्रहान् निवारय-निवारय सर्वम् अविधिं विनाशय-विनाशय दुःखं हन-हन दारिद्रयं निवारय निवारय, सर्व-मन्त्र-स्वरुपिणि सर्व-शल्य-योग-स्वरुपिणि दुष्ट-ग्रह-चण्ड-ग्रह भूतग्रहाऽऽकाशग्रह चौर-ग्रह पाषाण-ग्रह चाण्डाल-ग्रह यक्ष-गन्धर्व-किंनर-ग्रह ब्रह्म-राक्षस-ग्रह भूत-प्रेतपिशाचादीनां शाकिनी डाकिनी ग्रहाणां पूर्वदिशं बन्धय-बन्धय, वाराहि बगलामुखी मां रक्ष-रक्ष दक्षिणदिशं बन्धय-बन्धय, किरातवाराहि मां रक्ष-रक्ष पश्चिमदिशं बन्धय-बन्धय, स्वप्नवाराहि मां रक्ष-रक्ष उत्तरदिशं बन्धय-बन्धय, धूम्रवाराहि मां रक्ष-रक्ष सर्वदिशो बन्धय-बन्धय, कुक्कुटवाराहि मां रक्ष-रक्ष अधरदिशं बन्धय-बन्धय, परमेश्वरि मां रक्ष-रक्ष सर्वरोगान् विनाशय-विनाशय, सर्व-शत्रु-पलायनाय सर्व-शत्रु-कुलं मूलतो नाशय-नाशय, शत्रूणां राज्यवश्यं स्त्रीवश्यं जनवश्यं दह-दह पच-पच सकल-लोक-स्तम्भिनि शत्रून् स्तम्भय-स्तम्भय स्तम्भनमोहनाऽऽकर्षणाय सर्व-रिपूणाम् उच्चाटनं कुरु-कुरु ॐ ह्लीं क्लीं ऐं वाक्-प्रदानाय क्लीं जगत्त्रयवशीकरणाय सौः सर्वमनः क्षोभणाय श्रीं महा-सम्पत्-प्रदानाय ग्लौं सकल-भूमण्डलाधिपत्य-प्रदानाय दां चिरंजीवने । ह्रां ह्रीं ह्रूं क्लां क्लीं क्लूं सौः ॐ ह्लीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय राजस्तम्भिनि क्रों क्रों छ्रीं छ्रीं सर्वजन संमोहिनि सभास्तंभिनि स्त्रां स्त्रीं सर्व-मुख-रञ्जिनि मुखं बन्धय-बन्धय ज्वल-ज्वल हंस-हंस राजहंस प्रतिलोम इहलोक परलोक परद्वार राजद्वार क्लीं क्लूं घ्रीं रुं क्रों क्लीं खाणि खाणि , जिह्वां बन्धयामि सकलजन सर्वेन्द्रियाणि बन्धयामि नागाश्व मृग सर्प विहंगम वृश्चिकादि विषं निर्विषं कुरु-कुरु शैलकानन महीं मर्दय मर्दय शत्रूनोत्पाटयोत्पाटय पात्रं पूरय-पूरय महोग्रभूतजातं बन्धयामि बन्धयामि अतीतानागतं सत्यं कथय-कथय लक्ष्मीं प्रददामि-प्रददामि त्वम् इह आगच्छ आगच्छ अत्रैव निवासं कुरु-कुरु ॐ ह्लीं बगले परमेश्वरि हुं फट् स्वाहा ।
विशेषः- मूलमन्त्रवता कुर्याद् विद्यां न दर्शयेत् क्वचित् ।
विपत्तौ स्वप्नकाले च विद्यां स्तम्भिनीं दर्शयेत् ।
गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः ।
प्रकाशनात् सिद्धहानिः स्याद् वश्यं मरणं भवेत् ।
दद्यात् शानताय सत्याय कौलाचारपरायणः ।
दुर्गाभक्ताय शैवाय मृत्युञ्जयरताय च ।
तस्मै दद्याद् इमं खड्गं स शिवो नात्र संशयः ।
अशाक्ताय च नो दद्याद् दीक्षाहीनाय वै तथा ।
न दर्शयेद् इमं खड्गम् इत्याज्ञा शंकरस्य च ।।
।। श्रीविष्णुयामले बगलाखड्गमालामन्त्रः ।।

13…… माला
अन्य धर्मों की तरह सनातन (हिन्दू) धर्म में भी जप के लिए माला का प्रयोग होता है। क्योंकि किसी भी जप में संख्या का बहुत महत्त्व होता है। निश्चित संख्या में जप करने के लिए माला का प्रयोग करते हैं। माला फेरने से एकाग्रता भी बनी रहती है। वैसे तो माला के अन्य बहुत से प्रयोग हैं, लेकिन मैं यहां जप संबंधी बातें बताना चाहता हूँ।

किसी देवी-देवता के मंत्र का जप करने के लिए एक निश्चित संख्या होती है। उस संख्या का १० प्रतिशत हवन, हवन का १० प्रतिशत तर्पण, तर्पण का १० प्रतिशत मार्जन, मार्जन की १० प्रतिशत संख्या में ब्राह्मण भोजन करना होता है। इन सभी संख्यों का निर्धारण बिना माना के संभव नहीं।

माला में १०८ (+१ सुमेरु) दाने (मनके) होने चाहिए। ५४, २७ या ३० (इत्यादि) मनको की माला से भी जप किया जाता है। साधना विशेष के लिए मनकों की संख्या का विचार है। दो मनकों के बीच डोरी में गांठ होना जरूर है, आमतौर से ढाई गांठ की माला अच्छी होती है। अर्थात् डोरी में मनके पिरोते समय साधक हर मनके के बाद ढाई गांठ लगाए। मनके पिरोते समय अपने इष्टदेव का जप करते रहना चाहिए। सफेद डोरी शान्ति, सिद्धि आदि शुभ कार्यों के लिए प्रयाग करनी चाहिए। लाल धागे से वशीकरण आदि तथा काले धागे से पिरोई गई माला द्वारा मारण कर्म किये जाते हैं।

माला पिरोते समय मुख और पुछ का ध्यान रखना चाहिए। मनके के माटे वाले सिरे को मुख तथा पतले किनारे को पुछ कहते हैं। माला पिरोते समय मनकों के मुख से मुख तथा पुछ से पुछ मिलाकर पिरोने चाहिए।

मनके किसी भी चीज (प्लास्टिक इत्यादि छोड़कर) के हों मगर खंडित नहीं होने चाहिए।

रुद्राक्ष की माला भगवान् शंकर को प्रिय है और इसे एज़ ए डिफ़ाल्ट सभी देवी देवताओं की पूजा आराधना प्रयोग किया जा सकता है। रुद्राक्ष पर जप करने से अनन्त गुना (अन्य सभी मालाओं की तुलना में बहुत अधिक) फल मिलता है। इसे धारण करना भी स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। जिस माला को धारण करते हैं उस पर जप नहीं करते लेकिन उसी जाति (किस्म) कि दूसरी माला पर जप कर सकते हैं।

जप करते समय माला गोमुखी या किसी वस्त्र से ढकी होनी चाहिए अन्यथा जप का फल चोरी हो जाता है। जप के बाद जप-स्थान की मिट्टी मस्तक पर लगा लेनी चाहिए अन्यथा जप का फल इन्द्र को चला जाता है।

प्रातःकाल जप के समय माला नाभी के समीप होनी चाहिए, दोपहर में हृदय और शाम को मस्तक के सामने।

जप में तर्जनी अंगुली का स्पर्श माला से नहीं होना चाहिए। इसलिए गोमुखी के बड़े छेद से हाथ अन्दर डाल कर छोटे छेद से तर्जनी को बाहर निकलकर जप करना चाहिए। अभिचार कर्म में तर्जनी का प्रयोग होता है।

जप में नाखून का स्पर्श माला से नहीं होना चाहिए।
सुमेरु के अगले दाने से जप आरम्भ करे, माला को मध्यमा अंगुली के मघ्य पोर पर रख कर दानों को अंगूठे की सहायता से अपनी ओर गिराए। सुमेरु को नहीं लांघना चाहिए। यदि एक माला से अधिक जप करना हो तो, सुमेरु तक पहुंच कर अंतिम दाने को पकड़ कर, माला पलटी कर के, माला की उल्टी दिशा में, लेकिन पहले की तरह ही जप करना चाहिए।

देवता विषेश के लिए माला का चयन करना चाहिए-
हाथी दांत की माला गणेशजी की साधना के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।

लाल चंदन की माला गणेशजी व देवी साधना के लिए उत्तम है।

तुलसी की माला से वैष्णव मत की साधना होती है (विष्णु, राम व कृष्ण)।

मूंगे की माला से लक्ष्मी जी की आराधना होती है। पुष्टि कर्म के लिए भी मूंगे की माला श्रेष्ठ होती है।

मोती की माला वशीकरण के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।

पुत्र जीवा की माला का प्रयोग संतान प्राप्ति के लिए करते हैं।

कमल गट्टे की माला की माला का प्रयोग अभिचार कर्म के लिए होता है।

कुश-मूल की माला का प्रयोग पाप-नाश व दोष-मुक्ति के लिये होता है।

हल्दी की माला से बगलामुखी की साधना होती है।

स्फटिक की माला शान्ति कर्म और ज्ञान प्राप्ति; माँ सरस्वती व भैरवी की आराधना के लिए श्रेष्ठ होती है।

चाँदी की माला राजसिक प्रयोजन तथा आपदा से मुक्ति में विशेष प्रभावकरी होती है।

जप से पूर्व निम्नलिखित मंत्र से माला की वन्दना करनी चाहिए–
(साधना या देवता विशेष के लिए अलग-अलग माला-वन्दना होती है)
ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणी।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव॥
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे।
जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये॥

पश्वाचार, कौलाचार या कुलाचार, दिव्याचार, शैव-शाक्तों के साधन क्रम।

तंत्र शास्त्र, सात प्रकार के साधना पद्धतियों या आचारों का वर्णन प्राप्त होता हैं तथा दो मुख्य धारणाओं में विभाजित हैं प्रथम पश्वाचार या पशु भाव तथा द्वितीय वीर भाव। इसके अतिरिक्त दिव्य भाव त्रय के अंतर्गत सम्पूर्ण प्रकार के सिद्धि के पश्चात् जब वो स्वयं शिव तथा शक्ति के समान हो जाता हैं। पशु भाव में चार प्रकार के साधन पद्धतियों को समाहित किया गया हैं जो निम्नलिखित हैं।
१. वेदाचार,
२. वैष्णवाचार,
३. शैवाचार
४. दक्षिणाचार
५. वामाचार
६. सिद्धान्ताचार
७. कुलाचार।

१. वेदाचार : तंत्र के अनुसार सर्व निम्न कोटि की उपासना पद्धति वेदाचार हैं, जिसके तहत वैदिक याग-यज्ञादि कर्म विहित हैं।
२. वैष्णवाचार : सत्व गुण से सम्बद्ध, सात्विक आहार तथा विहार, निरामिष भोजन, पवित्रता, व्रत, ब्रह्मचर्य, भजन-कीर्तन इत्यादि कर्म विहित हैं।
३. शैवाचार : शिव तथा शक्ति की उपासना, यम-नियम, ध्यान, समाधि कर्म विहित हैं।
४. दक्षिणाचार : उपर्युक्त तीनो पद्धतियों का एक साथ पालन करते हुए, मादक द्रव्यों का प्रयोग विहित हैं।

दक्षिणा-चार (पशु भाव), वीरा-चार तथा कुला-चार (वीर भाव), सिद्धान्ताचार (दिव्य भाव)

दक्षिणा-चार, वीरा-चार तथा कुला-चार, इन तीन प्रकार ने पद्धति या आचारों से शक्ति साधना करने का भिन्न भिन्न तंत्रों में वर्णन हैं। शाक्तों के क्रमानुसार साधन मार्ग।

१. दक्षिणा-चार, पश्वाचार (पशु भाव) ; जिसके अंतर्गत, वेदाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार के कर्म निहित हैं जैसे, दिन में पूजन, प्रात स्नान, शुद्ध तथा सात्विक आचार-विचार तथा आहार, त्रि-संध्या जप तथा पूजन, रात्रि पूजन का पूर्ण रूप से त्याग, रुद्राक्ष माला का प्रयोग, ब्रह्मचर्य इत्यादि नियम सम्मिलित हैं, मांस-मत्स्यादी से पूजन निषिद्ध हैं। ब्रह्मचर्य का पालन अत्यंत आवश्यक हैं, अथवा अपनी ही स्त्री में ही रत रहना ब्रह्मचर्य पालन ही समझा जाता हैं। पंच-मकार से पूजन सर्वथा निषिद्ध हैं, यदि कही आवश्यकता पड़ जाये तो उनके प्रतिनिधि प्रयुक्त हो सकते हैं। साधना का आरंभ पशु भाव से शुरू होता हैं, तत्पश्चात् शनैः शनैः साधक सिद्धि की ओर बढ़ता हैं।

२. वामा-चार या वीरा चार (वीर भाव) ; शारीरिक पवित्रता स्नान-शौच इत्यादि का कोई बंधन नहीं हैं, साधक सर्वदा, सर्व स्थान पर जप-पूजन इत्यादि करने का अधिकारी हैं। मध्य या अर्ध रात्रि में पूजन तय प्रशस्त हैं, मद्य-मांस-मत्स्य से देव पूजन, भेद-भाव रहित, सर्व वर्णों के प्रति सम दृष्टि तथा सम्मान इत्यादि निहित हैं। साधक स्वयं को शक्ति या वामा कल्पना कर साधना करता हैं।

३. सिद्धान्ताचार : शुद्ध बुद्धि का उदय इसी पद्धति या आचार के साधन काल में उदय होता हैं, अपने अन्दर वो शिव तथा शक्ति का साक्षात् अनुभव कर पाने में समर्थ होता हैं। संसार की प्रत्येक वस्तु या तत्व, साधक को शुद्ध तथा परमेश्वर या परमशिव से युक्त या सम्बंधित लगी हैं, अहंकार, घृणा, लज्जा इत्यादि पाशो का पूर्ण रूप से त्याग कर देता हैं। अंतिम स्थान कौलाचार या राज योग ही हैं, साधक साधना के सर्वोच्च स्थान को प्राप्त कर लेता हैं। इस स्तर तक पहुँचने पर साधक सोना और मिट्टी में, श्मशान तथा गृह में, प्रिय तथा शत्रु में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं रखता हैं, सब एक हैं, उसे अद्वैत ज्ञान की प्राप्ति हो जाती हैं।

इन्हीं आचार-पद्धतियों को भाव त्रय १. पशु भाव २. वीर भाव ३. दिव्य भाव कहा जाता हैं।

अष्ट पाश : घृणा, शंका, भय, लज्जा, जुगुप्सा, कुल, शील तथा जाती

पशु भाव आदि भाव हैं, मनुष्य पशुओ में सर्वश्रेष्ठ तथा सोचने-समझने या बुद्धि युक्त हैं। जब तक मनुष्य के बुद्धि का पूर्ण रूप से विकास ना हो, वो पशु के ही श्रेणी में आता हैं। जिसकी जितनी बुद्धि होगी उसका ज्ञान भी उतना ही श्रेष्ठ होगा। पशु भाव से ही साधन प्रारंभ करने का विधान हैं, ये प्रारंभिक साधन का क्रम हैं, आत्म तथा सर्व समर्पण भाव उदय का प्रथम कारक, पशु भाव क्रम से साधना करना हैं। यहाँ भाव, निम्न कोटि का माना गया हैं, स्वयं त्रिपुर सुंदरी श्री देवी ने अपने मुखारविंद से भाव चूड़ामणि तंत्र में पशु भाव को सर्व-निन्दित तथा सर्व-निम्न श्रेणी का बताया हैं। अपनी साधना द्वारा प्राप्त ज्ञान द्वारा, जब अज्ञान का अन्धकार समाप्त हो जाता हैं, पशु भाव स्वतः ही लुप्त हो जाती हैं। शास्त्रों के अनुसार पशुत्व के लक्षण, आठ प्रकार के मानव स्वभाव लक्षणों या पाशो से हैं;
१. घृणा, २. शंका, ३. भय, ४. लज्जा, ५. जुगुप्सा, ६. कुल, ७. शील तथा ८. जाती।

ये अष्ट मानव लक्षण सर्वदा ही मनुष्य के आध्यात्मिक उन्नति के बाधक माने गए हैं तथा तज्य हैं। पशु भाव साधन क्रम के अनुसार साधक इन्हीं लक्षणों या पाशो पर विजय पाने का प्रयास करता हैं।

१. घृणा : व्यक्ति-विशेष के शरीर, इन्द्रियां तथा मन को न भाने वाली तथा तिरस्कृत करने वाला लक्षण घृणा कहलाती हैं। संसार के समस्त तत्व या पञ्च तत्व से निर्मित प्रत्येक वस्तुओं में किसी भी प्रकार का विकार अनुभव करना ही घृणा हैं, जो अभिमान, अहंकार इत्यादि विकारों को जन्म देता हैं। मनुष्य के हृदय पर किसी वस्तु या तत्व के प्रति प्रेम तथा किसी के प्रति तिरस्कार हैं तथा प्रत्येक तत्व में परमात्मा के अस्तित्व से अनभिज्ञ हैं।

२. शंका : साधक के प्रति अन्य किसी व्यक्ति के प्रति संदेह की भावना, शंका हैं। विषय-आसक्त, माया-मोह में पड़ा हुआ मनुष्य, अपने विकास के लिये नाना प्रकार के छल-प्रपंच में लिप्त रहता हैं, कपट व्यवहार करता हैं, झूठ बोलता हैं, देहाभिमानी हैं, परिणाम स्वरूप वो दूसरे को भी ऐसा ही समझ कर उस पर संदेह करता हैं।

३. भय : मनुष्य को अपने शरीर, प्रिय-जन, संपत्ति, अभिलषित वस्तुओं से प्रेम रहता हैं, तथा इसके नष्ट होने का सर्वदा भय रहता हैं। भौतिक वस्तुओं के नाश का उसे सर्वदा भय रहता हैं परन्तु आत्म के नाश का नहीं तथा आत्म तत्व को जानने की कोई आवश्यकता नहीं होती हैं। अन्य कई कारण हैं, जो भय को उत्पन्न करती हैं; जैसे अपने सन्मुख होने वाली कोई अप्रिय घटना इत्यादि।

४. लज्जा : सामान्यतः मनुष्य के हृदय में मान-अपमान की भावना का उदय होना लज्जा कहलाती हैं। मनुष्य का शरीर नश्वर हैं, फिर शरीर के मान-अपमान का कितना महत्व हो सकता हैं, तथा शरीर को जीवन देने वाली आत्म साक्षात् परमात्मा ही हैं तथा मान-अपमान से परे हैं।

५. जुगुप्सा : दूसरों की निंदा-चर्चा करना जुगुप्सा कहलाती हैं, मनुष्य दूसरों के गुण तथा दोषों को देखता हैं तथा अपने दोषों का मनन नहीं कर पाता।

६. कुल : मनुष्य के जन्मे कुल या वंश का परिचय, जैसे उच्च कुल में पैदा हुआ अपने अप को उच्च मानता हैं तथा दूसरे के कुल को छोटा। यह भाव मनुष्य के अन्दर छोटा या बड़ा होने के प्रवृति को उदित करता हैं तथा उसके विचार भेद-भाव युक्त हो जाते हैं।

७. शील : शिष्टाचार का अभिप्राय शील हैं, अन्य लोगो के प्रति मानव का व्यवहार, सेवा, उठने-बैठने का तरीका शिष्टाचार या शील कहलाती हैं। शीलता के बंधन को काट देने पर साधक विचार तथा कर्म में स्वतंत्र हो जाता हैं तथा उसे ये चिंता नहीं रहती हैं की कोई अन्य उसके बारे में क्या सोच रहा हैं।

८. जाती : मनुष्य का अपना जात्यभिमान, उसके हृदय में बड़े या छोटे भावना का प्रतिपादन करता हैं। जाती भेद को समदर्शी न मानने वाला पशु भाव से ग्रस्त हैं, चारों जातियां क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्र सभी परम-पिता ब्रह्मा जी के संतान हैं।

शक्ति साधना मार्ग में प्रयुक्त होने वाले, पञ्च-मकार (मद्ध, मांस, मत्स्य, मुद्रा तथा मैथुन) के कारण।

साधक को शिवत्व प्राप्त करने हेतु इन सभी पाशो या लक्षणों से मुक्ति होना अत्यंत आवश्यक हैं। जो इन अष्ट पाशो में से किसी एक से भी ग्रस्त हैं, मनोविकार युक्त हैं, वह सर्वदा, सर्व-काल तथा सर्व-व्यवस्था में साधना करने में समर्थ नहीं हो सकता। चित निर्मल हुए बिना, समदर्शिता तथा त्याग की भावना का उदय होना अत्यंत कठिन हैं, चित को निर्मल निर्विकार बनाने हेतु पशु भाव का त्याग अत्यंत आवश्यक हैं। पशु भाव से साधना प्रारंभ कर अष्ट पाशो, मनोविकारों पर विजय पा कर ही साधक वीर भाव में जाने का अधिकारी हैं। वस्तुतः पशु भाव युक्त साधना कर साधक इन अष्ठ-पशो या विकारों से मुक्त होने का प्रयास करता हैं।

वीर भाव : इस भाव तक आते आते साधक, अष्ठ पाशो के कारण होने वाले दुष्परिणामों को साधक समझने लगता हैं, परन्तु उन का पूर्ण रूप से वो त्याग नहीं कर पाया हैं परन्तु करना चाहता हैं। इसी प्रकार पशु भाव से अपने देह तथा मन की शुद्धि करने के प्रयासरत साधक, वीर-भाव से साधन कर पाता हैं। वीर भाव का मुख्य आधार केवल यह हैं, की साधक अपने आप में तथा अपने इष्ट देवता में कोई अंतर न समझें तथा साधना में रत रहा कर अपने इष्ट देव के समान ही गुण-स्वभाव वाला बने। वीर भाव बहुत ही कठिन मार्ग हैं, बिना गुरु आज्ञा तथा मार्गदर्शन के वीर साधन हानिकारक ही होती हैं, इस मार्ग को कुल, वाम, कौल, वीरा-चार नाम से भी जाना जाता हैं। साथ ही साधक का दृढ़ निश्चयी भी होना अत्यंत आवश्यक हैं, किसी भी कारण इस मार्ग का मध्य में त्याग करना उचित नहीं हैं, अन्यथा दुष्परिणाम अवश्य हैं। जिस साधक में किसी भी प्रकार से कोई शंका नहीं हैं, भय मुक्त हैं, निर्भीक हैं, निर्भय हो किसी भी समय कही पर भी चला जाये, लज्जा व कुतूहल से रहित हैं, वेद तथा शास्त्रों के अध्ययन में सर्वदा रत रहता हैं, वो ‘वीर साधन’ करने का अधिकारी हैं। साधन के इस क्रम में मूल पञ्च-तत्व के प्रतीक पञ्च-तत्वों से साधना करने का विधान हैं, जिसे पञ्च-मकार नाम से जाना जाता हैं।

इसी मार्ग का अनुसरण कर महर्षि वशिष्ठ ने, नील वर्णा महा विद्या ‘तारा’ की सिद्धि प्राप्त की थी। सर्वप्रथम, अपने पिता ब्रह्मा जी के आज्ञा से महर्षि वशिष्ठ ने देवीतारा की वैदिक रीति से साधन प्रारंभ की परन्तु सहस्त्रो वर्षों तक कठोर साधना करने पर भी मुनि राज सफल न हो सके। परिणाम स्वरूप क्रोध-वश उन्होंने तारा मंत्र को श्राप दे दिया। तदन्तर दैवीय आकाशवाणी के अनुसार, मुनि राज चीन गए, जहाँ उन्होंने भगवान् बुद्ध से कौल या कुलागम मार्ग का ज्ञान प्राप्त किया तथा देवी के प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त कर, सिद्धि प्राप्त की। साधना के इस क्रम में साधन पञ्च-मकार विधि से की जाती हैं या कहे तो पञ्च या पांच तत्व ये हैं १. मद्य, २. मांस ३. मत्स्य ४. मुद्रा तथा ५. मैथुन, इन समस्त द्रव्यों को कुल-द्रव्य भी कहा जाता हैं। सामान्यतः इन में से केवल मात्र मुद्रा (चवर्ण अन्न तथा हस्त मुद्रायें) को छोड़ कर सभी को निन्दित वस्तु माना जाता हैं, वैष्णव सम्प्रदाय तो इन समस्त वस्तुओं को महा पाप का कारण मानता हैं, मद्य या सुरा पान पञ्च-महा पापो में से एक हैं। परन्तु आदि काल से ही देव कार्यों में इन सब वस्तुओ का प्रयोग किये जाने का विधान हैं। कुला-चार केवल साधन का एक मार्ग हैं तथा इस मार्ग में प्रयोग किये जाने वाले इन पञ्च-तत्वों को केवल अष्ट पाशो का भेदन कर, साधक को स्वतंत्र-उन्मुक्त बनाने हेतु प्रयोग किया जाता हैं। साधक इन समस्त तत्वों का प्रयोग अपनी आत्म-तृप्ति हेतु नहीं कर सकता, इनका कदापि आदि नहीं हो सकता, साधक केवल अपने इष्ट देवता को समर्पित कर ग्रहण करने का अधिकारी हैं, यह केवल उपासना की सामग्री हैं, उपभोग की नहीं। अति-प्रिय होने पर भी, इन तत्वों से साधक किसी प्रकार की आसक्ति नहीं रख सकता हैं, ये ही साधक के साधना की चरम पराकाष्ठा हैं।

देखा जाये तो आदि काल से ही, शैव तथा विशेषकर शक्ति संप्रदाय से सम्बंधित पूजा-साधना तथा पितृ यज्ञ कर्मों में मद्य, मांस, मीन इत्यादि का प्रयोग किया जाता रहा हैं। ऋग्-वेद, देव तथा पितृ कार्यों हेतु हिंसा को पाप नहीं मानता। ‘कुलार्णव तंत्र’ (कौल या कुल धर्म के विवरण सम्बन्धी तंत्र) के अनुसार, शास्त्रोक्त विधि से देवता तथा तथा पितरों का पूजन कर मांस खानेवाला तथा मद्य पीने वाला किसी भी प्रकार के दोष का भागी नहीं होता। बिना यज्ञ कर्मों के मांस-मदिरा सेवन दोष युक्त माना गया हैं तथा पाप की श्रेणी में आता हैं। मंत्रो द्वारा पवित्र किया गया या शास्त्रोक्त विधि से कुल द्रव्य या तत्व, गुरु तथा देवता को अर्पण कर पान करने वाला, भव सागर के बंधन से मुक्त हो जाता हैं, तथा किसी भी प्रकार के दोष का भागी नहीं हैं। मत्स्य-मांस, सुरा इत्यादि मादक द्रव्यों का कौल मार्ग में दीक्षा संस्कार के पश्चात्, देव कार्य पूजन के अतिरिक्त सेवन दोष युक्त माना गया हैं।

मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा

मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा के सेवन का मुख्य कारण सामान्यत मद्य निन्दित वस्तुओं में माना जाता हैं परन्तु मादक द्रव्यों में मद्य या सुरा सर्वोत्तम द्रव्य माना जाता हैं, इसके सेवन से मनुष्य नशे में लिप्त हो, आत्म विस्मृत की अवस्था को प्राप्त कर उन्मत हो जाता हैं। अन्य मादक द्रव्यों के समान मद्य मनुष्य में आलस्य नहीं लाता हैं, आलसी मनुष्य को क्रिया-शील करने में मद्य विशेष प्रभाव दिखता हैं। अष्ठ-पशो का जो सादाहरण या मानसिक बल से परित्याग कर विमुक्त होने में समर्थ नहीं हैं, वो सुरा पान रूपी ओषधी का प्रयोग कर, इन पाशो का त्याग करने या नियंत्रण करने में सफल होता हैं। मद्य पान ध्यान केन्द्रित करने में पूर्णतः सक्षम हैं तथा इसी करण वश शक्ति साधनाओ में प्रयुक्त होता हैं। साधक जिस किसी ओर चाहे, अपना ध्यान पूर्ण केन्द्रित कर सकता हैं, वास्तव में मद्य पान कर साधक आत्म-विस्मृत की अवस्था को प्राप्त करता हैं तथा सर्व प्रकार से चिंता रहित हो, ध्यान केन्द्रित कर पाता हैं। मद्य उत्कट उत्तेजक पदार्थ हैं, तथा इस का प्रयोग मांस, मत्स्य, चर्वण अन्न के साथ प्रयोग किया जाता हैं। मदिरा के साथ, मांस-मत्स्य इत्यादि का प्रयोग, मदिरा में व्याप्त विष को शांत करने हेतु किया जाता हैं साथ ही पौष्टिक भोजन के अलावा मदिरा का सेवन मनुष्य को मृत्यु की ओर ले जाता हैं। मदिरा के साथ या अन्य मादक द्रव्यों के साथ मांस इत्यादि का सेवन मनुष्य को बलवान् तथा तेजस्वी बनता हैं।

स्त्री सेवन के मुख्य कारण

स्त्री के प्रति मोह, काम वासना या कामुकता, प्रेम किसी भी साधन पथ का सबसे बड़ा विघ्न हैं तथा विघ्न से दूर रह या स्त्री से दूर रहा कर इस विघ्न पर विजय नहीं पाया जा सकता हैं। प्रेम में लिप्त मनुष्य, सही और गलत को भूल कर, मनमाने तरीके से कार्य करता हैं। स्त्री सेवन में रहते हुए, काम-वासना, प्रेम इत्यादि आसक्ति का आत्म त्याग सर्वश्रेष्ठ माना गया हैं।
पूजन केवल, विभिन्न द्रव्यों को देवताओं पर अर्पित करना ही नहीं होता, अपितु देवता के पूर्ण रूप से संतुष्टि करने से निमित हैं। समस्त वस्तु या तत्व परमात्मा द्वारा ही बनायी गई हैं, पंच-मकार मार्ग समस्त प्रकार के वैभव-भोगो में रत रहते हुए, धीरे धीरे त्याग का मार्ग हैं। साधक का सदाचारी होना भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, संस्कार (दीक्षा) विहीन होने पर, गुरु आज्ञा का उलंघन करने पर तथा सदाचार विहीन होने पर साधक पाप का अधिकारी हो पतन की ओर अग्रसर होता हैं। ‘शक्ति संगम तंत्र’ के अनुसार मैथुन हेतु सर्वोत्तम स्त्री संग, दीक्षिता तथा देवताओं पर भक्ति भाव रखने वाली, मंत्र-जप इत्यादि देव कर्म करने वाली होना आवश्यक हैं। किसी भी स्त्री को केवल देख कर मन में विकार जागृत होना, साधक के नाश का कारण बनता हैं। कुल-धर्म दीक्षा रहित स्त्री का संग, सर्व सिद्धियो की हानि करने वाला होता हैं। स्त्री संग से पूर्व उसकी पूजन अनिवार्य हैं तथा स्त्रियों से द्वेष निषेध हैं, स्त्री सेवन या सम्भोग आत्म सुख के लिये करने वाला पापी तथा नरक गामी होता हैं। पर-द्रव्य, पर-अन्य, प्रतिग्रह, पर-स्त्री, पर-निंदा, से सर्वदा दूर रहा सदाचार का पालन अत्यंत आवश्यक हैं।

पंचमकार विधि से साधना करने का मुख्य उद्देश्य : पञ्च-मकार साधना केवल मात्र इष्ट देवता की पूजा हेतु विहित हैं न की स्व-तृप्ति या विषय-भोग के लिए, समस्त भौतिक सुखो से पंचमकार विधि मुक्ति पाने हेतु केवल साधन मात्र हैं। सादाहरण मनुष्य विषय-भोगो में सर्वदा आसक्त रहता हैं और अधिक प्राप्त करने का प्रयास करता हैं तथा सर्वदा उन में लिप्त रहता हैं, आदी हो जाता हैं। परन्तु वीराचारी आसक्त से सर्वदा दूर रहता हैं, किसी भी प्रकार से विषय-भोगो में आसक्ति, लिप्त रहने का उसे अधिकार नहीं हैं, सर्वदा ही उसे उन्मुक्त रहना पड़ता हैं, वह आदी नहीं हो सकता। स्त्री संग करने पर, साधक पर स्त्री का कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिये, न मोह न प्रेम। इसी तरह मद्य, मांस तथा मत्स्य के सेवन के पश्चात् भी, शरीर पर इनका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ना चाहिये, मद्य पान करने पर साधक के शरीर में पूर्ण चेतना रहनी चाहिये।

वास्तव में देखा जाये तो, ये पंच-मकार मनुष्य के अष्ट पाशो के बंधन से मुक्त होने में सहायक हैं, सर्वश्रेष्ठ विषय भोगो को भोग करते हुए भी, विषय भोगो के प्रति अनासक्ति का भाव, इस मार्ग का चरम उद्देश्य हैं। जब तक मानव पाश-बद्ध, विषय-भोगो के प्रति आसक्त, देहाभिमानी हैं, वो केवल जीव कहलाता हैं, पाश-मुक्त होने पर वो स्वयं सदा शिव के समान हो जाता हैं। वीर-साधना या शक्ति साधना का मुख्य उद्देश्य शिव तथा समस्त जीवो, तत्वों में ऐक्य प्राप्त करना हैं। यहाँ मानव देह देवालय हैं तथा आत्म स्वरूप में सदा शिव, इसी देवालय में विराजमान हैं, अष्ट पाशो से मुक्त हुए बिना देह में व्याप्त सदा शिव का अनुभव संभव नहीं हैं। शक्ति साधना के अंतर्गत पशु भाव, वीर भाव जैसे साधन कर्मों का पालन कर मनुष्य, सफल योगी बन पता हैं। वीर भाव से उपासना अत्यंत कठिन मार्ग हैं, केवल मात्र पञ्च-मकार ही नहीं, साधक को व्यवहारिक दृष्टि से वीर होना पड़ता हैं। संसार की प्रत्येक पञ्च-तत्वात्मक निर्मित वस्तुओं पर सम भावना रखना पड़ता हैं, अच्छे या बुरे तत्व जैसे कोई वस्तु साधक के हेतु नहीं होती हैं। फिर वो मुर्दा या मारा हुआ कोई भी जीव, विष्ठा, मल-मूत्र, स्त्री-रज, अस्थि, सड़ी-गली वस्तुएँ इत्यादि ही क्यों न हो, प्रत्येक वस्तु में सम भाव रखते हुए, परमात्मा या अपने अन्दर के ब्रह्म स्वरूप का अनुभव करना आवश्यक हैं। सर्वत्र, सर्व स्थान पर एक वीर के भाँति जाना पड़ता हैं, जैसे अर्ध रात्रि में उसे अकेले पूजा हेतु श्मशान, जंगल, नदी तट, निर्जन पड़े मंदिर या खँडहर इत्यादि स्थानों पर जाना पड़ता हैं।

ज्ञानाणव तंत्र में भगवान् शिव पार्वती से कहते हैं : पूर्ण ज्ञान से ही समस्त वस्तुयें पवित्र होती हैं। जल अनेक देवताओं का निवास स्थान हैं, जल से ही मूत्र का निर्माण होता हैं, फिर मूत्र दूषित क्यों ? गौ-मूत्र का सेवन से ब्रह्म-हत्या, गौ मांस भक्षण इत्यादि पापो से मुक्ति मिलती हैं, जब गौ-मूत्र के सेवन से पातकी भी पवित्र हो सकता हैं तो मूत्र अपवित्र कैसे हो सकता हैं। नारी-रज से मनुष्य या कहे तो जीव देह का निर्माण होता हैं, और ये मनुष्य देह ही परम-पद के प्राप्ति में सहायक हैं (८४ हजार योनियों में जन्म लेने के पश्चात् मानव देह प्राप्त होता हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना हैं), फिर नारी-रज से घृणा कैसे ? पुरुष वीर्य, शिव रूपी शरीर के सप्त धातु का निर्माण करते हैं। यदि साधक में कुछ तत्वों के प्रति भेद-बुद्धि हैं तो वो उस का अज्ञान हैं, तथा वो पाप का भागीदार हैं। जैसे, जब शिशु मातृ गर्भ से बहार निकलता हैं, तब उसके शरीर के प्रत्येक अंग का अपने माता की योनि से संसर्ग होना स्वाभाविक हैं, जिस में पुरुष लिंग भी हैं। परन्तु, उस अवस्था में निर्विकार होने से यह पाप नहीं कहलाती हैं। बड़ा होकर वही काम वासना से युक्त हो, वो अपनी माता से कुचेष्टा करे और ये कहे की पैदा होने पर में माता की योनि से निकला हूँ तो ये व्यक्ति की विकृत बुद्धि का परिचय करवाता हैं तथा पाप हैं। वासना ही समस्त दोषों का मूल कारण हैं तथा उक्त वासना को मरने का साधन वीर साधना हैं। नित्य प्राप्त होने वाली वस्तुओं पर आकर्षण समाप्त हो जाता हैं, जैसे प्रतिदिन अगर मांस खाये तो मांस के प्रति आकर्षण समाप्त हो जाती हैं। उसी प्रकार यह पंच-मकार में प्रयुक्त होने वाले द्रव्यों तथा वस्तुओं पर भी लागू होती हैं, समस्त वासनाओ को निर्बल करने का ये मुख्य साधन हैं। यह साधन पथ धर्म-शास्त्रों में वर्णित पाप को ही पुण्य में परिवर्तित कर देता हैं, अष्ठ-पाश काट कर मन को वासनाओ से मुक्त कर देता हैं। वासनाओ के मुक्ति के पश्चात्, साधक को पञ्च-मकार में प्रयुक्त होने वाले किसी भी स्थूल द्रव्य या तत्व की आवश्यकता नहीं रहती हैं, वह उन्मुक्त हो जाता हैं,‘दिव्य भाव’ को प्राप्त होता हैं।

सर्वप्रथम साधक, पशु भाव युक्त साधना से अपने शरीर को दृढ़ बना लेता हैं तथा मन को अपने इष्ट देवता पर केन्द्रित कर लेता हैं। वीर-भाव से सारे भेद भाव को मिटा कर, घृणा का त्याग कर, समस्त तत्वों को समता की दृष्टि से देख कर, परमात्मा का अनुभव करता हैं, भय, लज्जा तथा शंका का त्याग कर उन्मुक्त हो जाता हैं। अंतत दिव्य भाव को प्राप्त हुए, अपने तथा समस्त तत्वों में अपने इष्ट को देखता हैं।

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