Aghor Ghanesh(1)_2

श्रीगुरु मंत्र – दीक्षा , विभिन्न समस्या समाधान के लिये एवं कार्य सिध्दि के लिये हवन यज्ञ , पूजा व अनुष्ठानादि के लिये सम्पर्क करे – पंडित आशु बहुगुणा—09760924411

अबगणेश जी के सर्वाभीष्ट प्रदायक मन्त्रों को कहता हूँ – जल (व) तदनन्तरवहिन (र) के सहित चक्

विमर्श – मन्त्र का स्वरुप इस प्रकार है – गं हं क्लौं ग्लौं उच्छिष्टगणेशाय महायक्षायायं बलिः ॥५१-५२॥

री (क) (अर्थात् क्र् )
, कर्णेन्दु के साध कामिका (तुं), दीर्घ से युक्तदारक (ड) एवं वायु (य) तथा अन्त में कवच (हुम्) इसप्रकार ६ अक्षरों वाला यह गणपति मन्त्र साधकों को सिद्धि प्रदान करता है॥१-२॥

विमर्श – इस षडक्षर मन्त्र स्वरुप इस प्रकार है – वक्रतुण्डाय हुम्॥१-२॥

अबइस मन्त का विनियोग कहते हैं – इस मन्त्र के भार्गव ऋषि हैं, अनुष्टुप्छन्द है, विघ्नेश देवता हैं, वं बीज है तथा यं शक्ति है ॥३॥

विमर्श -विनियोग का स्वरुप इस प्रकार है – अस्य श्रीगणेशमन्त्रस्य भार्गव ऋषि -रनुष्टुंप् छन्दः विघ्नेशो देवता वं बीजं यं शक्तिरात्मनोऽभीष्टसिद्धर्थेजपे विनियोगः ॥३॥

अब इस मन्त्र के षडङ्ग्न्यास की विधि कहते हैं -
उपर्युक्त षडक्षर मन्त्रों के ऊपर अनुस्वार लगा कर प्रथम प्रणव तथा अन्त में नमः पद लगा कर षडङ्गन्यास करना चाहिए ॥४॥

विमर्श – कराङ्गन्यास एवं षडङ्गन्यास की विधि -
ॐ वं नमः अङ्‍गुष्ठाभ्यां नमः,ॐ क्रं नमः तर्जनीभ्यां नमः,
ॐ तुं नमः मध्यमाभ्यां नमः,ॐ डां नमः अनामिकाभ्यां नमः,
ॐ यं नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः,ॐ हुँ नमः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः,
इसी प्रकार उपर्युक्त विधि से हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्रत्रय एवं अस्त्राय फट्से षडङ्गन्यास करना चाहिए ॥४॥

अबइसी मन्त्र से सर्वाङ्गन्यास कहते हैं – भ्रूमध्य, कण्ठ, हृदय, नाभि, लिङ्ग एवं पैरों में भी क्रमशः इन्हीं मन्त्राक्षरों का न्यास कर संपूर्णमन्त्र का पूरे शरीर में न्यास करना चाहिए, तदनन्तर गणेश प्रभु का ध्यानकरना चाहिए ॥५॥

विमर्श – प्रयोग विधि इस प्रकार है -
ॐ वं नमः भ्रूमध्येॐ क्रं नमः कण्ठेॐ तुं नमः हृदयेॐ डां नम्ह नाभौ,
ॐ यं नमः लिङ्गेॐ हुम् नमः पादयोः, ॐ वक्रतुण्डाय हुम् सर्वाङ्गे ॥५॥

अब महाप्रभु गणेश का ध्यान कहते हैं -
जिनकाअङ्ग प्रत्यङ्ग उदीयमान सूर्य के समान रक्त वर्ण का है, जो अपने बायेंहाथों में पाश एवं अभयमुद्रा तथा दाहिने हाथों में वरदमुद्रा एवं अंकुशधारण किये हुये हैं, समस्त दुःखों को दूर करने वाले, रक्तवस्त्र धारी, प्रसन्न मुख तथा समस्त भूषणॊं से भूषित होने के कारण मनोहर प्रतीत वालगजानन गणेश का ध्यान करना चाहिए ॥६॥

अब इस इस मन्त्र से पुरश्चरण विधि कहते हैं -
पुरश्चरणकार्य में इस मन्त्र का ६ लाख जप करना चाहिए । इस (छःलाख) की दशांश संख्या (साठ हजार) से अष्टद्रव्यों का होम करना चाहिए । तदनन्तर मन्त्र के फलप्राप्ति के लिए संस्कार-शुद्ध ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये ॥७॥

१. ईख, २. सत्तू, ३. केला, ४. चपेटान्न (चिउडा), ५. तिल, ६. मोदक, ७. नारिकेल और, ८ . धान का लावा – ये अष्टद्रव्य कहे गये हैं ॥८॥

अब पीठपूजाविधान करते हैं -
आधारशक्ति से आरम्भ कर परतत्त्व पर्यन्त पीठ की पूजा करनी चाहिए । उस पर आठ दिशाओं में एवं मध्य में शक्तियों की पूजा करनी चाहिए ॥९॥

१.तीव्रा, २. चालिनी, ३. नन्दा, ४. भोगदा, ५. कामरुपिणी, ६. उग्रा, ७.तेजोवती, ८. सत्या एवं ९. विघ्ननाशिनी – ये गणेश मन्त्र की नव शक्तियों केनाम हैं ॥१०-११॥

प्रारम्भ में गणपति का बीज (गं) लगा करसर्वशक्तिकमतदनन्तर लासनायऔर अन्त में हृत्  (नमः) लगाने से पीठमन्त्र बनता है । इस मन्त्र से आसन देकर मूलमन्त्र से गणेशमूर्ति की कल्पनाकरनी चाहिए ॥११-१२॥

विमर्श – मन्त्र का स्वरुप इस प्रकार है – गं सर्वशक्तिकमलासनाय नमः॥११-१२॥

उस मूर्ति में गणेश जी का आवाहन कर आसनादि प्रदान कर पुष्पादि से उनका पूजन कर आवरण देवताओं की पूजा करनी चाहिए ॥१३॥

गणेशका पञ्चावरण पूजा विधान – प्रथमावरण की पूजा में विद्वान् साधक आग्नेयकोणों (आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य, ईशान) में गां हृदयाय नमःगीं शिरसेस्वाहा’, ‘गूं शिखायै वषट्’, ‘गैं कवचाय हुम्तदनन्तर मध्य में गौंनेत्रत्रयाय वौषट्तथा चारों दिशाओं में अस्त्राय फट् इन मन्त्रों सेषडङ्गपूजा करे ॥१४॥

द्वितीयावरण में पूर्व आदि दिशाओं में आठशक्तियों का पूजन करना चाहिए । विद्या, विधात्री, भोगदा, विघ्नघातिनी, निधिप्रदीपा, पापघ्नी, पुण्या एवं शशिप्रभा – ये गणपति की आठ शक्तियाँ हैं॥१५-१६॥

तृतीयावरण में अष्टदल के अग्रभाग में वक्रतुण्ड, एकदंष्ट्र, महोदर, गजास्य, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज एवं धूम्रवर्ण का पूजन करना चाहिए। फिर चतुर्थावर में अष्टदल के अग्रभाग में इन्द्रादि देव तथा पञ्चावरणमें उनके वज्र आदि आयुधों का पूजन करना चाहिए । इस प्रकार पाँच आवरणों केसाथ गणेश जी का पूजन चाहिए । मन्त्र सिद्धि के लिए पुरश्चरण के पूर्वपूर्वोक्त पञ्चावरण की पूजा आवश्यक है ॥१५-१८॥

विमर्श – प्रयोग विधि – पीठपूजा करने के बाद उस पर निम्नलिखित मन्त्रों से गणेशमन्त्र की नौ शक्तियों का पूजन करना चाहिए ।
पूर्व आदि आठ दिशाओं में यथा -
ॐ तीव्रायै नमः,ॐ चालिन्यै नमः,ॐ नन्दायै नमः,
ॐ भोगदायै नमः,ॐ कामरुपिण्यै नमः,ॐ उग्रायै नमः,
ॐ तेजोवत्यै नमः, ॐ सत्यायै नमः,
इसप्रकार आठ दिशाओं में पूजन कर मध्य में विघ्ननाशिन्यै नमःफिर सर्वशक्तिकमलासनाय नमःमन्त्र से आसन देकर मूल मन्त्र से गणेशजी की मूर्तिकी कल्पना कर तथा उसमें गणेशजी का आवाहन कर पाद्य एवं अर्ध्य आदि समस्यउपचारों से उनका पूजन कर आवरण पूजा करनी चाहिए ।
ॐ गां हृदाय नमः आग्नेये,ॐ गीं शिरसे स्वाहा नैऋत्ये,
ॐ गूं शिखायै वषट् वायव्ये,ॐ गैं कवचाय हुम् ऐशान्ये,
ॐ गौं नेत्रत्रयाय वौषट् अग्रे,ॐॐ गः अस्त्राय फट् चतुर्दिक्षु ।
इनमन्त्रों से षडङ्पूजा कर पुष्पाञ्जलि लेकर मूल मन्त्र का उच्चारण करअभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले । भक्तयो समर्पये तुभ्यंप्रथमावरणार्चनम् कह कर पुष्पाञ्जलि समर्पित करे । फिर -
ॐ विद्यायै नम्ह पूर्वे,ॐ विधात्र्यै नमः आग्नेये,
ॐ भोगदायै नमः दक्षिणे,ॐ विघ्नघातिन्यै नमः नैऋत्यै,
ॐ निधि प्रदीपायै नमः पश्चिमे,ॐ पापघ्न्यै नमः वायव्ये,
ॐ पुण्यायै नमः सौम्ये,ॐ शशिप्रभायै नमः ऐशान्ये
इनशक्तियों का पूर्वादि आठ दिशाओं में क्रमेण पूजन करना चाहिए । फिरपूर्वोक्त मूल मन्त्र के साथ अभीष्टसिद्धिं मे देहि… सेद्वितीयावरणार्चनम् पर्यन्त मन्त्र बोल कर पुष्पाञ्जलि समर्पित करनीचाहिए । तदनन्तर अष्टदल कमल में -
ॐ वक्रतुण्डाय नमः,ॐ एकदंष्ट्राय नमः,ॐ महोदरय नमः,
ॐ गजास्याय नमः,ॐ लम्बोदराय नमः,ॐ विकटाय नमः,
ॐ विघ्नराजाय नमः, ॐ धूम्रवर्णाय नमः
इनमन्त्रों से वक्रतुण्ड आदि का पूजन कर मूलमन्त्र के साथ अभिष्टसिद्धिं मेदेहि … से तृतीयावरणार्चनम् पर्यन्त मन्त्र पढ कर तृतीय पुष्पाञ्जलिसमर्पित करनी चाहिए ।
तत्पश्चात्  अष्टदल के अग्रभाग में -  ॐ इन्द्राय नमः पूर्वे,
ॐ अग्नये नमः आग्नये,ॐ यमाय नमः दक्षिने,ॐ निऋतये नमः नैऋत्ये,
ॐ वरुणाय नमः पश्चिमे,ॐ वायवे नमः वायव्य,ॐ सोमाय नमः उत्तरे,
ॐ ईशानाय नमः ऐशान्ये,ॐ ब्रह्मणे नमः आकाशे,ॐ अनन्ताय नमः पाताले
इनमन्त्रों से दश दिक्पालोम की पूजा कर मूल मन्त्र पढते हुएअभिष्टसिद्धिं…से चतुर्थावरणार्चनम् पर्यन्त मन्त्र पढ करचतुर्थपुष्पाञ्जलि समर्पित करे ।
तदनन्तर अष्टदल के अग्रभाग के अन्त में
ॐ वज्राय नमः,ॐ शक्तये नमः,ॐ दण्डाय नमः,
ॐ खड्‍गाय नमः,ॐ पाशाय नमः,ॐ अंकुशाय नमः,
ॐ गदायै नमः,ॐ त्रिशूलाय नमः, ॐ चक्राय नमः,ॐ पद्‍माय नमः
इनमन्त्रों से दशदिक्पालों के वज्रादि आयुधों की पूजा कर मूलमन्त्र के साथअभीष्टसिद्धिं… से ले कर पञ्चमावरणार्चनम् पर्यन्त मन्त्र पढ कर पञ्चमपुष्पाञ्जलि समर्पित करनी चाहिए । इसके पश्चात्  २.७ श्लोक में कही गई विधिके अनुसार ६ लाख जप, दशांश हवन, दशांश अभिषेक, दशांश ब्राह्मण भोजन करानेसे पुरश्चरण पूर्ण होता है और मन्त्र की सिद्धि हो जाती है ॥१५-१८॥

इसबाद मन्त्र सिद्धि हो जाने काम्य प्रयोग करना चाहिए – यदि साधक ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते हुये प्रतिदिन १२ हजार मन्त्रों का जप करे तो ६ महीनेके भीतर निश्चितरुप से उसकी दरिद्रता विनष्ट हो सकती है । एक चतुर्थी सेदूसरी चतुर्थी तक प्रतिदिन दश हजार जप करे और एकाग्रचित्त हो प्रतिदिन एकसौ आठ आहुति देता रहे तो भक्तिपूर्वक ऐसा करते रहने से ६ मास के भीतरपूर्वोक्त फल (दरिद्रता का विनाश) प्राप्त हो
जाता है ॥१९-२१॥
घृतमिश्रित अन्न की आहुतियाँ देने से मनुष्य धन धान्य से समृद्ध हो जाता है ।चिउडा अथवा नारिकेल अथवा मरिच से प्रतिदिन एक हजार आहुति देन ए से एक महिनेके भीतर बहुत बडी समत्ति होती है । जीरा, सेंधा नमक एवं काली मिर्च सेमिश्रित अष्टद्रव्यों से प्रतिदिन एक हजार आहुति देने से व्यक्ति एक हीपक्ष (१५ दिनों) में कुबेर के समान धनवान् है । इतना ही नहीं प्रतिदिनमूलमन्त्र से ४४४ बार तर्पण करने से मनुष्यों को मनो वाञ्छित फल कीप्राप्ति हो जाती है ॥२२-२५॥


अब साधकों के लिए निधिप्रदान करने वाले अन्य मन्त्र को बतला रहा हूँ ॥२५॥

रायस्पोषशब्द के आगे भृगु (स) जो से युक्त हो (अर्थात स्य), फिर ददिता’, पश्चात इकार युक्त मेष (नि) तथा इकार युक्त ध (धि) (निधि), तत्पश्चात्  ‘दोरत्नधातुमान् रक्षोतदनन्तर गगन (ह), सद्य (ओ) से युक्त रति (ण) (अर्थात्  हणो), फिर बलतथा शार्ङ्गी (ग)खं(ह), तदनन्तर नोफिर अन्तमें षडक्षर मन्त्र (वक्रतुण्डाय हुम्) लगाने से ३१ अक्षरों का मन्त्र बनजाता है, जो मनोवाञ्छित फल प्रदान करता है ॥२६-२७॥


विमर्श – मन्त्र का स्वरुप इस प्रकार है – रायस्पोषस्य ददिता निधिदो रत्नधातुमान् रक्षोहणो बलगहनो वक्रतुण्डाय हुम् ॥२६-२७॥

इसमन्त्र के क्रमशः ५, , , , , एवं षडक्षरों से षडङ्गन्यास कहा गया है ।इसके ऋषि, छन्द, देवता, तथा पूजन का प्रकार पूर्ववत है; यह मन्त्र निधिप्रदान करता है ॥१८-२९॥

विमर्श – विनियोग की विधि – अस्यश्रीगणेशमन्त्रस्य भार्गवऋषिः अनुष्टुप्‌छन्दः गणेशो देवता वं बीजं यंशक्तिः अभीष्टसिद्धये जपे विनियोगः ।
ऋष्यादिन्यास की विधि – भार्गवऋषयेनमः शिरसि, अनुष्टुप्‌छन्दसे नमः मुखे, गणेशदेवतायै नमः हृदि, वं बीजायनमः गुह्ये, यं शक्तये नमः पादयोः ।
करन्यास एवं षडङ्गन्यास की विधि -रायस्पोषस्य अङ्‍गुष्ठाभ्यां नमः, ददिता तर्जनीभ्या नमः, निधिदोरत्नधातुमान् मध्यमाभ्यां नमः, रक्षोहणो अनामिकाभ्यं नमः, बलगहनोकनिष्ठिकाभ्यां नमः, वक्रतुण्डाय हुं करतलपृष्ठाभ्यां नमः, इसी प्रकारहृदयादि स्थानों में षडङ्गन्यास करना चाहिए ।
तदनन्तर पूर्वोक्त – २. ६ श्लोक द्वारा ध्यान करना चाहिए ।
इस मन्त्र की भी जपसंख्या ६ लाख है । नित्यार्चन एवं हवन विधि पूर्ववत्  (२७.१९) विधि से करना चाहिए ॥१८-२९॥

गणेश जी का अन्य षडक्षर मन्त्र इस प्रकार है -
पद्‌मनाभ (ए) से युक्त भानु म (मे), सद्य (ओ) के सहित घ (घो), दीर्घ आकार के सहितल् और ककार (ल्का) फिर वायु (य) और अन्त में पावकगेहिनी (स्वाहा) लगाने सेनिष्पन्न होता है यह षडक्षर मन्त्र साधक के लिए सर्वाभीष्टप्रदाता कहा गयाहै । पुरश्चरण, अर्घ तथा होमादि का विधान पूर्ववत्  (२. ७-२०) है ॥२९-३१॥

विमर्श – इस षडक्षर मन्त्र का स्वरुप इस प्रकर है – मेघोल्काय स्वाहा॥३१॥

अबउच्छिष्ट गणपति मन्त्र का उद्धार कहते हैं – लकुली (ह) के साथ भृगु (स) एवं त अर्थात्  ‘स्तिसदृक के सहित लोहित अर्थात्  पि, दीर्घके सहित वक (श) अर्थात्  ‘शासाक्षि से युक्त च (चि), फिर लिखे अन्तमें शिर (स्वाहा) लगाने से नवाक्षर निष्पन्न होता है ॥३१-३२॥

विमर्श – मन्त्र का स्वरुप -  ‘ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा॥३१-३२॥
इसमन्त्र के कङ्कोल ऋषि विराट्छन्द उच्छिष्ट गणपति देवता कहे गये हैं ।मन्त्र के दो, तीन दो, दो अक्षरोम से न्यास के पश्चात्  सम्पूर्ण मन्त्र सेपञ्चाङ्गन्यास करना चाहिए तदनन्तर उच्छिष्ट गणपति की पूजा करनी चाहिए॥३२-३४॥

विनियोग – अस्योच्छिष्टगणपतिमन्त्रस्य कङ्कोलऋषिर्विराट्छन्दः उच्छिष्टगणपतिर्देवता सर्वाभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।पञ्चाङ्गन्यास – यथा – ॐ हस्ति हृदया नमः, ॐ पिशाचेइ शिरसे स्वाहा, ॐ लिखेशिखायै वौषट्, ॐ स्वाहा कवचाय हुम्, ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा अस्त्रायफट् ॥३१-३४॥

पञ्चाङ्गन्यास करने के बाद उच्छिष्ट गणपति का ध्यान इसप्रकार करना चाहिए – मस्तक पर चन्द्रमा को धारण करने वाले चार भुजाओं एवंतीन नेत्रों वाले महागणपति का मैं ध्यान करता हूँ । जिनके शरीर का वर्णरक्त है, जो कमलदल पर विराजमान हैं, जिनके दाहिने हाथों में अङ्‍कुश एवंमोदक पात्र तथा बायें हाथ में पाश एवं दन्त शोभित हो रहे हैं, मैं इसप्रकार के उन्मत्त उच्छिष्ट गणपति भगवान् का ध्यान करता हूँ ॥३४॥

अबउच्छिष्ट गणपति मन्त्र की पुरश्चरण विधि कहते हैं – इस मन्त्र का एक लाखजप करना चाहिए, तदनन्तर तिलों से उसका दशांश होम करना चाहिए । पूर्वोक्त (२.६.२०) विधान से पीठ पर उच्छिष्ट गणपति का पूजन करना चाहिए ॥३५॥

सर्वप्रथमअङ्गों का पूजन कर आठों दिशाओं में ब्राह्यी से ले कर रमा पर्यन्तअष्टमातृकाओं का पूजन करना चाहिए । ब्राह्यी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा एवं रमा ये आठ मातृकायें है । पुनः दशदिशओंमें वक्रतुण्ड, एकदंष्ट्र, लम्बोदर, विकट, धूम्रवर्ण, विघ्न, गजानन, विनायक, गणपति एवं हस्तिदन्त का पूजन करना चाहिए, तदनन्तर दो आवरणों मेंइन्द्रादि दश दिक्पालों का पूजन करना चाहिए । इस प्रकार पुरश्चरण द्वारामन्त्र सिद्ध हो जाने पर साधक में कम्य – प्रयोग की योग्यता हो जाती है॥३६-४०॥

विमर्श – ३५ श्लोक में कहे गये पीठ पूजा के लिए आधारशक्तिपूजा, मूल मन्त्र से देवता की मूर्ति की कल्पना, ध्यान, तदनन्तर आवाहनादिविधि २.९१८ के अनुसार करनी चाहिए ।
पूर्व आदि आठ दिशाओं में अष्टमातृका पूजा विधि
ॐ ब्राहम्यै नमः,ॐ माहेश्वर्यै नमःॐ क्ॐआर्यै नमः,
ॐ वैष्णवै नमः,ॐ वाराह्यै नमः,ॐ इन्द्राण्यै नमः,
ॐ चमुण्डायै नमः,ॐ महालक्ष्म्यै नमः ।

पुन पूर्वादि दश दिशाओं में – ॐ वक्रतुण्डाय नमः,ॐ एकदंष्ट्राय नमः,
ॐ लम्बोदराय नमः,ॐ विकटाय नमः,ॐ धूम्रवर्णाय नमः,
ॐ विघ्नाय नमः,ॐ गजाननाय नमः,ॐ विनायकाय नमः,
ॐ गणपतये नमः,ॐ हस्तिदन्ताय नमः

इनमन्त्रों से दश दिग्दलों में पुनः उसके बाहर इन्द्रादि दश दिक्पालों तथाउनके आयुधों का पूजन करना चाहिए (द्र० २. १७-१८) । इस इस प्रकार उक्त विधिसे मन्त्र सिद्ध हो जाने पर साधक में विविध काम्य प्रयोग करने की क्षमता आजाती है ॥३६-४०॥

अब काम्य प्रयोग का विधान करते हैं – साधक कपि (रक्त चन्दन) अथवा सितभानु (श्वेत अर्क) की अपने अङ्‍गुष्ठ मात्र परिमाणवाली गणेश की प्रतिमा का निर्माण करे । जो मनोहर एवं उत्तम लक्षणों सेयुक्त हो तदनन्तर विधिपूर्वक उसकी प्राणप्रतिष्ठा कर उसे मधुसे स्नान करावे॥४०-४१॥

कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी से शुक्लपक्ष की चतुर्दशी पर्यन्त गुड सहित पायस का नैवेद्य लगा कर इस मन्त्र का जप करे ॥४२॥

यहक्रिया प्रतिदिन एकान्त में उच्छिष्ट मुख एवं वस्त्र रहित हो कर, ‘मैंस्वयं गणेश हूँइस भावना के साथ करे। घी एवं तिल की आहुति प्रतिदिन एकहजार की संख्या में देता रहे तो इस प्रयोग के प्रभाव से पन्द्रह दिन केभीतर प्रयोगकर्ता व्यक्ति अथवा राजकुल में उत्पन्न हुआ व्यक्ति राज्यप्राप्त कर लेता है । इसी प्रकार कुम्हार के चाक की मिट्टी की गणेश प्रतिमाबना कर पूजन तथा हवन करने से राज्य अथवा नाना प्रकार की संपत्ति कीप्राप्ति होती है ॥४३-४४॥

बॉबी की मिट्टी की प्रतिमा में उक्त विधिसे पूजन एवं होम करने से अभिलषित सिद्धि होती है; गौडी (गुड निर्मित)प्रतिमा में ऐसा करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है, तथा लावणी प्रतिमाशत्रुओं को विपत्ति से ग्रस्त करती है ॥४५॥

निम्बनिर्मित प्रतिमामें उक्त विधि से पूजन जप एवं होम करने से शत्रु का विनाश होता है, औरमधुमिश्रित लाजा का होम सारे जगत्  को वश में करने वाला होता है ॥४६॥

शय्यापर सोये हुये उच्छिष्टावस्था में जप करने से शत्रु वश में हो जाते हैं ।कटुतैल में मिले राजी पुष्पों के हवन से शत्रुओं में विद्वेष होता है ॥४७॥

द्युत, विवाद एवं युद्ध की स्थिति में इस मन्त्र का जप जयप्रद होता है । इसमन्त्र के जप के प्रभाव से कुबेर नौ निधियों के स्वामी हो गये। इतना हीनहीं, विभीषण और सुग्रीव को इस मन्त्र का जप करने से राज्य की प्राप्ति होगई । लाल वस्त्र धारण कर लाल अङ्गराग लगा कर तथा ताम्बूल चर्वण हुए रात्रिके समय उक्त मन्त्र का जप करना चाहिए ॥४८-४९॥

अथवा गणेश जी को निवेदित लड्‌डू का भोजन करते हुए इस मन्त्र का जप करना चाहिए और मांस अथवा फलादि किसी वस्तु की बलि देनी चाहिए ॥५०॥

अबबलि के मन्त्र का उद्धार कहते हैं – सानुस्वार स्मृति (गं), इन्दुसहितआकाश (हं), अनुस्वार एवं औकार युक्त ककार लकार (क्लौं), उसी प्रकार गकारलकार (ग्लौं), तदनन्तर उच्छिष्टगफिर एकार युक्त ण (णे), फिर शायपद, फिर महायक्षायातदननत्र (यं) और अन्त में बलिःलगाने से १९ अक्षरों काबलिदान मन्त्र बनता है ।
विमर्श – मन्त्र का स्वरुप इस प्रकार है – गं हं क्लौं ग्लौं उच्छिष्टगणेशाय महायक्षायायं बलिः ॥५१-५२॥


2…हरिद्रा गणपति मां बगलामुखी के अंग देवता है। इसलिए जो साधक बगलामुखी की आराधना करते हैं, उन्हें हरिद्रा गणपति की साधना, पूजा अवश्य करनी चाहिए। इनकी साधना करने से शत्रु का हृदय द्रवित होकर साधक के वशीभूत हो जाता है। इनकी साधना अभिचारिक कर्म को भी नष्ट करने के लिए की जाती है। यही कारण है कि मां त्रिपुरसुन्दरी के द्वारा स्मरण किये जाने पर हरिद्रा गणपति ने प्रकट होकर भण्डासुर दैत्य के द्वारा किये गये अभिचार यंत्र को नष्ट कर दिया था।
हरिद्रा हल्दी को कहा जाता है। सभी साधक जानते हैं कि विवाह आदि जैसे मंगल कार्यो में हल्दी पाउडर के लेप का प्रयोग किया जाता है। उसका कारण यह है कि हल्दी को अति शुभ, सुख-सौभाग्य दायक एवं विघ्न विनाशक माना जाता है। हल्दी अनेकों बीमारियों में भी अचूक अस्त्र की भांति कार्य करती है। इसीलिए हरिद्रा गणपति को अत्यन्त ही शुभ माना जाता है। काम्य प्रयोग में विशेष रूप से इनकी साधना मनवांछित विवाह, पुत्र प्राप्ति, मनोवांछित फल प्राप्ति एवं शत्रु को वश में करने के लिए की जाती है।

3….तीव्र उच्छिष्ट गणपति साधना
कड़वे नीम की जड़ से कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन अंगूठे के बराबर की गणेश की प्रतिमा बनाकर रात्रि के प्रथम प्रहर में स्वयं लाल वस्त्र धारण कर लाल आसन पर पश्चिम मुख होकर झूठे मुँह से सामने थाली में प्रतिमा को स्थापित कर साधना में सफलता की सदगुरुदेव से प्रार्थना कर संकल्प करें और ततपश्चात गणपति का ध्यान कर उनका पूजन लाल चन्दन,अक्षत,पुष्प के द्वारा पूजन करे और लाल चन्दन की ही माला से झूठे मुँह से ही ५ माला मन्त्र जप करें. सात दिनों तक ऐसे ही पूजन करे और आठवे दिन अर्थात अमावस्या को पञ्च मेवे से ५०० आहुतियाँ करें इससे मंत्र सिद्ध हो जाता है. तब आप इनके विविध प्रयोगों को कर सकते हैं. २ प्रयोग नीचे दिए गए हैं.
१. जिस व्यक्ति का आकर्षण करना हो चाहे वो आपका बॉस हो, सहकर्मी हो, प्रेमी,प्रेमिका या फिर कोई मित्र या शत्रु हो जिससे, आपको अपना काम करवाना हो.उसके फोटो पर इस सिद्ध प्रतिमा का स्थापन कर ३ दिनों तक १ माला मन्त्र जप करने से निश्चय ही उसका आकर्षण होता है.
२. अन्न के ऊपर इस सिद्ध प्रतिमा का स्थापन कर ११ दिनों तक नित्य ३ माला मंत्र जप करने से वर्ष भर घर में धन धान्य का भंडार भरा रहता है और यदि इसके बाद नित्य ५१ बार मंत्र को जप कर लिया जाये तो ये भंडार भरा ही रहता है. नहीं तो आपको प्रति ६ माह या वर्ष में करना चाहिए.
ध्यान मन्त्र –
दंताभये चक्र- वरौ दधानं कराग्रग्रम् स्वर्ण-घटं त्रि-नेत्रं ,
धृताब्जयालिंगितमब्धि-पुत्र्या लक्ष्मी-गणेशं कनकाभमीडे.
मंत्र- ॐ नमो हस्ति मुखाय लम्बोदराय उच्छिष्ट महात्मने क्रां क्रीं ह्रीं घे घे उच्छिष्ठाय स्वाहा…..

4…महागणपति–आराधना
शास्त्रकारों की आज्ञा के अनुसार गृहस्थ–मानव को प्रतिदिन यथा सम्भव पंचदेवों की उपासना करनी ही चाहिए। ये पंचदेव पंचभूतों के अधिपति हैैं। इन्हीं में महागणपति की उपासना का भी विधान हुआ है। गणपति को विध्नों का निवारक एवं ऋद्धि–सिद्धि का दाता माना गया है। ऊँकार और गणपति परस्पर अभिन्न हैं अत: परब्रह्यस्वरुप भी कहे गये हैं। पुण्यनगरी अवन्तिका में गणपति उपासना भी अनेक रुपों में होती आई है। शिव–पंचायतन में 1. शिव, 2. पार्वती, 3. गणपति, 4. कातकेय और 5. नन्दी की पूजा–उपासना होती है और अनादिकाल से सर्वपूज्य, विघ्ननिवारक के रुप में भी गणपतिपूजा का महत्वपूर्ण स्थान है। गणपति के अनन्तनाम है। तन्त्रग्रन्थों में गणपति के आम्नायानुसारी नाम, स्वरुप, ध्यान एवं मन्त्र भी पृथक–पृथक दशत हैं। पौराणिक क्रम में षड्विनायकों की पूजा को भी महत्वपूर्ण दिखलाया है। उज्जयिनी में षड्विनायक–गणेष के स्थान निम्नलिखित रुप में प्राप्त होते है–
1. मोदी विनायक – महाकालमन्दिरस्थ कोटितीर्थ पर इमली के नीचे।
2. प्रमोदी ;लड्डूद्ध विनायक – विराट् हनुमान् के पास रामघाट पर।
3. सुमुख–विनायक ;स्थिर–विनायकद्ध– स्थिरविनायक अथवा स्थान–विनायक गढकालिका के पास।
4. दुमु‍र्ख–विनायक – अंकपात की सडक के पीछे, मंगलनाथ मार्ग पर।
5. अविघ्न–विनायक – खिरकी पाण्डे के अखाडे के सामने।
6. विघ्न–विनायक – विध्नहर्ता ;चिन्तामण–गणेशद्ध ।
इनके अतिरिक्त इच्छामन गणेश(गधा पुलिया के पास) भी अतिप्रसिद्ध है। यहाँ गणपति–तीर्थ भी है जिसकी स्थापना लक्ष्मणजी द्वारा की गई है ऐसा वर्णन प्राप्त होता है।
तान्त्रिक द्ष्टि से साधना–क्रम से साधना करते हैं वे गणपति–मन्त्र की साधना गौणरुप से करते हुए स्वाभीष्ट देव की साधना करते है। परन्तु जो स्वतन्त्र–रुप से परब्र–रुप से अथवा तान्त्रिक–क्रमोक्त–पद्धित से उपासना करते हैं वेश्गणेश–पंचांग में दशत पटल, पद्धित आदि का अनुसरण करते है। मूत–विग्रह–रचना वामसुण्ड, दक्षिण सुण्ड, अग्रसुण्ड और एकाधिक सुण्ड एवं भुजा तथा उनमें धारण किये हुए आयुधों अथवा उपकरणों से गणपति के विविध रुपों की साधना में यन्त्र आदि परिवतत हो जाते हैं। इसी प्रकार कामनाओं के अनुसार भी नामादि का परिवर्तन होता हैं। ऋद्धि–सिद्धि (शक्तियाँ), लक्ष–लाभ(पुत्र) तथा मूशक(वाहन) के साथ समष्टि–साधना का भी तान्त्रिक विधान स्पृहणीय है।

5…हिन्दू धर्म में भगवान गणेश को अनेक रूप में पूजा जाता है इनमें से ही एक श्वेतार्क गणपति भी हैं. धार्मिक लोक मान्यताओं में धन, सुख-सौभाग्य समृद्धि ऐश्वर्य और प्रसन्नता के लिए श्वेतार्क के गणेश की मूर्ति शुभ फल देने वाली मानी जाती है. श्वेतार्क के गणेश आक के पौधे की जड़ में बनी प्राकृतिक बनावट रुप में प्राप्त होते हैं. इस पौधे की एक दुर्लभ जाति सफेद श्वेतार्क होती है जिसमें सफेद पत्ते और फूल पाए जाते हैं इसी सफेद श्वेतरक की जड़ की बाहरी परत को कुछ दिनों तक पानी में भिगोने के बाद निकाला जाता है तब इस जड़ में भगवान गणेश की मूरत दिखाई देती है.
इसकी जड़ में सूंड जैसा आकार तो अक्सर देखा जा सकता है. भगवान श्री गणेश जी को ऋद्धि-सिद्धि व बुद्धि के दाता माना जाता है. इसी प्रकार श्वेतार्क नामक जड़ श्री गणेश जी का रुप मानी जाती है. श्वेतार्क सौभाग्यदायक व प्रसिद्धि प्रदान करने वाली मानी जाती है. श्वेतार्क की जड़ को तंत्र प्रयोग एवं सुख-समृद्धि हेतु बहुत उपयोगी मानी जाती है. गुरू पुष्य नक्षत्र में इस जड़ का उपयोग बहुत ही शुभ होता है. यह पौधा भगवान गणेश के स्वरुप होने के कारण धार्मिक आस्था को ओर गहरा करता है.
श्वेतार्क गणेश पूजन |
श्वेतार्क गणपति की प्रतिमा को पूर्व दिशा की तरफ ही स्थापित करना चाहिए तथा श्वेत आक की जड़ की माला से यह गणेश मंत्रों का जप करने से सर्वकामना सिद्ध होती है. श्वेतार्क गणेश पूजन में लाल वस्त्र, लाल आसान, लाल पुष्प, लाल चंदन, मूंगा अथवा रूद्राक्ष की माला का प्रयोग करनी चाहिए. नेवैद्य में लड्डू अर्पित करने चाहिए. “ऊँ वक्रतुण्डाय हुम्” मंत्र का जप करते हुए श्रद्धा व भक्ति भाव के साथ श्वेतार्क की पूजा कि जानी चाहिए पूजा के प्रभावस्वरुप प्रत्यक्ष रूप से इसके शुभ फलों की प्राप्ति संभव हो पाती है.
तन्त्र शास्त्र में भी श्वेतार्क गणपति की पूजा का विशेष विधान बताया गया है. तन्त्र शास्त्र अनुसार घर में इस प्रतिमा को स्थापित करने से ऋद्धि-सिद्धि कि प्राप्ति होती है. इस प्रतिमा का नित्य पूजन करने से भक्त को धन-धान्य की प्राप्ति होती है तथा लक्ष्मी जी का निवास होता है. इसके पूजन द्वारा शत्रु भय समाप्त हो जाता है. श्वेतार्क प्रतिमा के सामने नित्य गणपति जी का मन्त्र जाप करने से गणश जी का आशिर्वाद प्राप्त होता है तथा उनकी कृपा बनी रहती है.
श्वेतार्क गणेश महत्व |
दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन के साथ ही श्वेतार्क गणेश जी का पूजन व अथर्वशिर्ष का पाठ करने से बंधन दूर होते हैं और कार्यों में आई रुकावटें स्वत: ही दूर हो जाती हैं. धन की प्राप्ति हेतु श्वेतरक की प्रतिमा को दीपावली की रात्रि में षडोषोपचार पूजन करना चाहिए. श्वेतार्क गणेश साधना अनेकों प्रकार की जटिलतम साधनाओं में सर्वाधिक सरल एवं सुरक्षित साधना है .
श्वेतार्क गणपति समस्त प्रकार के विघ्नों के नाश के लिए सर्वपूजनीय है. श्वेतार्क गणपति की विधिवत स्थापना और पूजन से समस्त कार्य साधानाएं आदि शीघ्र निर्विघ्न संपन्न होते हैं. श्वेतार्क-गणेश के सम्मुख मन्त्र का प्रतिदिन 10 माला ‘जप’ करना चाहिए तथा “ॐ नमो हस्ति-मुखाय लम्बोदराय उच्छिष्ट-महात्मने आं क्रों ह्रीं क्लीं ह्रीं हुं घे घे उच्छिष्टाय स्वाहा” साधना से सभी इष्ट-कार्य सिद्ध होते है .

6….श्रीगणेशोपासनाः- शीघ्र विवाह हेतु
(१) ‘संकष्टी-चतुर्थी’ को उपासना प्रारम्भ करे। स्नान आदि से निवृत्त होकर श्रीगणेश जी के सामने बैठे। तथा-शक्ति ‘पूजन’ करे। ‘पूजा’ में रक्त अक्षत्, रक्त पुष्प, शमी-पत्र तथा दूर्वा चढ़ाए। फिर, हृदय में ‘श्रीगणेश’ का ‘ध्यान’ करे-
“श्वेताभं शशि-शेखरं त्रिनयनं श्वेताम्बरालंकृतं।
श्रीवाणी-सहितं रमेश-वरदं पीयूष-मूर्ति प्रभुम्।।
पीयूषं निज-बाहुभिश्चदधतं पाशांकुशौ मुद्-गरं।
नागास्यं सततं सुरैश्च मुनिभिः सम्पूजितं संस्मरे।।”
‘ध्यान’ कर ‘प्रणाम’ करे। इस प्रकार २१ ‘संकष्ट-चतुर्थी करे। २१ वीं ‘संकष्ट-चतुर्थी’ के दूसरे दिन अर्थात् पञ्चमी को ‘उपासना’ की पूर्ति करे और ‘चन्द्रोदय’ के समय श्रीगणेशजी को ३, चतुर्थी देवता को ३ तथा चन्द्र-भगवान् को ७ बार ‘अर्घ्य’ प्रदान करे। बाद में, उक्त ध्यान-मन्त्र नित्य पूजा में पढ़ पूजा करता रहे।
चन्द्रमा को अर्घ्य देने का मन्त्रः-
“ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिषां पते।
नमस्ते रोहिणीकान्त गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते।।”
भगवान् गणेश को अर्घ्य देने का मन्त्रः-
“गौरी-सुत नमस्तेऽस्तु सततं मोदकप्रिय।
सर्वसंकटनाशाय गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते।।”
चतुर्थी देवी को अर्घ्य देने का मन्त्रः-
“तिथीनामुत्तमे देवी गणेशप्रियवल्लभे।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं सर्वसिद्धिप्रदायिके।।”
(२) “ॐ संविघ्नं मां गणाध्यक्ष, निर्विघ्नं कुरु सर्वदा।
दासोऽहं ते विमुक्तस्य, संरक्ष विरहात् प्रभो।।”

उक्त मन्त्र का नित्य ६ माला (१०८ मनकों की) जप करे। ऐसा २१ दिन तक करे।

किसी भी शुभ दिन को भगवान् गणेश का पूजन कर उक्त ‘उपासना’ प्रारम्भ करे। विवाह आदि कार्य हो जाएँगे।
(३) “नमः श्री गणेशाय”
उक्त मन्त्र का नित्य ६००० जप २१ दिन तक करे। अच्छे अनुभव होंगे तथा विवाह आदि कार्य शीघ्र पूरे होंगे। जप के पूर्व गन्ध-पुष्प आदि से भगवान् गणेश का पूजन करे। किसी भी दिन से यह उपासना प्रारम्भ की जा सकती है।

7…..श्रीगणपत्यथर्वशीर्षं :-
||शान्ति पाठ ||
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः | भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः || स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः | व्यशेम देवहितं यदायुः || ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः | स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः || स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः | स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु || ॐ तन्मामवतु तद् वक्तारमवतु अवतु माम् अवतु वक्तारम् ॐ शांतिः | शांतिः ||शांतिः||.
||उपनिषत् ||
हरिः ॐ नमस्ते गणपतये || त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ||त्वमेव केवलं कर्ताऽसि || त्वमेव केवलं धर्ताऽसि ||त्वमेव केवलं हर्ताऽसि || त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि || त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ||१||
||स्वरूप तत्त्व || ऋतं वच्मि (वदिष्यामि)||सत्यं वच्मि (वदिष्यामि)||२|| अव त्वं माम् ||अव वक्तारम् ||अव श्रोतारम् || अव दातारम् ||अव धातारम् || अवानूचानमव शिष्यम् || अव पश्चात्तात् ||अव पुरस्तात् || अवोत्तरात्तात् ||अव दक्षिणात्तात् || अव चोर्ध्वात्तात् ||अवाधरात्तात् || सर्वतो मां पाहि पाहि समंतात् ||३||
त्वं वाङ्ग्मयस्त्वं चिन्मयः || त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममयः || त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि || त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि || त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ||४||
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते || सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति || सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति || सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति || त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः || त्वं चत्वारि वाक्पदानि ||५||
त्वं गुणत्रयातीतः त्वमवस्थात्रयातीतः || त्वं देहत्रयातीतः ||त्वं कालत्रयातीतः || त्वं मूलाधारः स्थितोऽसि नित्यम् || त्वं शक्तित्रयात्मकः || त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यम् || त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुवःस्वरोम् ||६||
||गणेश मंत्र || गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरम् || अनुस्वारः परतरः ||अर्धेन्दुलसितम् ||तारेण ऋद्धम् || एतत्तव मनुस्वरूपम् ||गकारः पूर्वरूपम् || अकारो मध्यमरूपम् ||अनुस्वारश्चान्त्यरूपम् || बिन्दुरुत्तररूपम् ||नादः संधानम् || संहितासंधिः ||सैषा गणेशविद्या || गणकऋषिः ||निचृद्गायत्रीच्छंदः || गणपतिर्देवता ||ॐ गं गणपतये नमः ||७||
||गणेश गायत्री || एकदंताय विद्महे | वक्रतुण्डाय धीमहि || तन्नो दंतिः प्रचोदयात् ||८||
||गणेश रूप || एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम् || रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् || रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् || रक्तगंधानुलिप्तांगं रक्तपुष्पैः सुपूजितम् || भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम् || आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम् || एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ||९||
||अष्ट नाम गणपति || नमो व्रातपतये | नमो गणपतये | नमः प्रमथपतये | नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय | विघ्ननाशिने शिवसुताय | श्रीवरदमूर्तये नमो नमः ||१०||
||फलश्रुति ||
एतदथर्वशीर्षं योऽधीते ||स ब्रह्मभूयाय कल्पते || स सर्वतः सुखमेधते ||स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते || स पंचमहापापात्प्रमुच्यते || सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति || प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति || सायंप्रातः प्रयुंजानो अपापो भवति || सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति || धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति || इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम् || यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत् ||११||
अनेन गणपतिमभिषिंचति स वाग्मी भवति || चतुर्थ्यामनश्नन् जपति स विद्यावान् भवति | स यशोवान् भवति || इत्यथर्वणवाक्यम् ||ब्रह्माद्याचरणं विद्यात् न बिभेति कदाचनेति ||१२||
यो दूर्वांकुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति || यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति || स मेधावान् भवति || यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति || यः साज्यसमिद्भिर्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते ||१३||
अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति || सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्त्वा सिद्धमंत्रो भवति || महाविघ्नात्प्रमुच्यते ||महादोषात्प्रमुच्यते || महापापात् प्रमुच्यते || स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति || य एवं वेद इत्युपनिषत् ||१४||
||शान्ति मंत्र ||
ॐ सहनाववतु ||सहनौभुनक्तु || सह वीर्यं करवावहै || तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै || ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः | भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः || स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः | व्यशेम देवहितं यदायुः || ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः | स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः || स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः | स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु || ॐ शांतिः | शांतिः ||शांतिः ||.
||इति श्रीगणपत्यथर्वशीर्षं समाप्तम् ||

8….1…श्रीगणेश मन्त्र “ॐ नमो सिद्ध-विनायकाय सर्व-कार्य-कर्त्रे सर्व-विघ्न-प्रशमनाय सर्व-राज्य-वश्य-करणाय सर्व-जन-सर्व-स्त्री-पुरुष-आकर्षणाय श्रीं ॐ स्वाहा।” विधि- नित्य-कर्म से निवृत्त होकर उक्त मन्त्र का निश्चित संख्या में नित्य १ से १० माला ‘जप’ करे। बाद में जब घर से निकले, तब अपने अभीष्ट कार्य का चिन्तन करे। इससे अभीष्ट कार्व सुगमता से पूरे हो जाते हैं।
2…सिद्धि के लिए श्री गणेश मंत्र
श्री गणेश को सभी देवताओं में सबसे पहले प्रसन्न किया जाता है. श्री गणेश विध्न विनाशक है. श्री गणेश जी बुद्धि के देवता है, इनका उपवास रखने से मनोकामना की पूर्ति के साथ साथ बुद्धि का विकास व कार्यों में सिद्धि प्राप्त होती है. श्री गणेश को भोग में लडडू सबसे अधिक प्रिय है. इस चतुर्थी उपवास को करने वाले जन को चन्द्र दर्शन से बचना चाहिए.
ॐ ग्लां ग्लीं ग्लूं गं गणपतये नम : सिद्धिं मे देहि बुद्धिं
प्रकाशय ग्लूं गलीं ग्लां फट् स्वाहा||
विधि :- —-
इस मंत्र का जप करने वाला साधक सफेद वस्त्र धारण कर सफेद रंग के आसन पर बैठकर पूर्ववत् नियम का पालन करते हुए इस मंत्र का सात हजार जप करे| जप के समय दूब, चावल, सफेद चन्दन सूजी का लड्डू आदि रखे तथा जप काल में कपूर की धूप जलाये तो यह मंत्र ,सर्व मंत्रों को सिद्ध करने की ताकत (Power, शक्ति) प्रदान करता है|
3…श्री गणेश मूल मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः |
ॐ श्री विघ्नेश्वराय नमः ||
विघ्न-विनाशक गणेश मन्त्र—
मन्त्रः- “जो सुमिरत सिधि होइ
गननायक करिबर बदन ।
करउ अनुग्रह सोई
बुद्धिरासी सुभ गुन सदन ।।”
मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभ
सर्व-प्रथम गणेशजी को सिन्दूर का चोला चढ़ायें और फिर रक्त-चन्दन की माला पर प्रातःकाल के समय दस माला (108*10=1080) बार इस मन्त्र का पाठ करें । यह प्रयोग ४० दिन तक करते रहें तो प्रयोग-कर्त्ता के सभी विघ्नों का अन्त होकर गणेशजी का अनुग्रह प्राप्त होता है ।

**********|| श्री गणेश कवच ||****************
एषोति चपलो दैत्यान् बाल्येपि नाशयत्यहो ।
अग्रे किं कर्म कर्तेति न जाने मुनिसत्तम ॥ १ ॥

दैत्या नानाविधा दुष्टास्साधु देवद्रुमः खलाः ।
अतोस्य कंठे किंचित्त्यं रक्षां संबद्धुमर्हसि ॥ २ ॥

ध्यायेत् सिंहगतं विनायकममुं दिग्बाहु माद्ये युगे
त्रेतायां तु मयूर वाहनममुं षड्बाहुकं सिद्धिदम् । ई
द्वापरेतु गजाननं युगभुजं रक्तांगरागं विभुम् तुर्ये
तु द्विभुजं सितांगरुचिरं सर्वार्थदं सर्वदा ॥ ३ ॥

विनायक श्शिखांपातु परमात्मा परात्परः ।
अतिसुंदर कायस्तु मस्तकं सुमहोत्कटः ॥ ४ ॥

ललाटं कश्यपः पातु भ्रूयुगं तु महोदरः ।
नयने बालचंद्रस्तु गजास्यस्त्योष्ठ पल्लवौ ॥ ५ ॥

जिह्वां पातु गजक्रीडश्चुबुकं गिरिजासुतः ।
वाचं विनायकः पातु दंतान्‌ रक्षतु दुर्मुखः ॥ ६ ॥

श्रवणौ पाशपाणिस्तु नासिकां चिंतितार्थदः ।
गणेशस्तु मुखं पातु कंठं पातु गणाधिपः ॥ ७ ॥

स्कंधौ पातु गजस्कंधः स्तने विघ्नविनाशनः ।
हृदयं गणनाथस्तु हेरंबो जठरं महान् ॥ ८ ॥

धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरश्शुभः ।
लिंगं गुह्यं सदा पातु वक्रतुंडो महाबलः ॥ ९ ॥

गजक्रीडो जानु जंघो ऊरू मंगलकीर्तिमान् ।
एकदंतो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदावतु ॥ १० ॥

क्षिप्र प्रसादनो बाहु पाणी आशाप्रपूरकः ।
अंगुलीश्च नखान् पातु पद्महस्तो रिनाशनः ॥ ११ ॥

सर्वांगानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदावतु ।
अनुक्तमपि यत् स्थानं धूमकेतुः सदावतु ॥ १२ ॥

आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोवतु ।
प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥ १३ ॥

दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैऋत्यां तु गणेश्वरः ।
प्रतीच्यां विघ्नहर्ता व्याद्वायव्यां गजकर्णकः ॥ १४ ॥

कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्याविशनंदनः ।
दिवाव्यादेकदंत स्तु रात्रौ संध्यासु यःविघ्नहृत् ॥ १५ ॥

राक्षसासुर बेताल ग्रह भूत पिशाचतः ।
पाशांकुशधरः पातु रजस्सत्त्वतमस्स्मृतीः ॥ १६ ॥

ज्ञानं धर्मं च लक्ष्मी च लज्जां कीर्तिं तथा कुलम् । ई
वपुर्धनं च धान्यं च गृहं दारास्सुतान्सखीन् ॥ १७ ॥

सर्वायुध धरः पौत्रान् मयूरेशो वतात् सदा ।
कपिलो जानुकं पातु गजाश्वान् विकटोवतु ॥ १८ ॥

भूर्जपत्रे लिखित्वेदं यः कंठे धारयेत् सुधीः ।
न भयं जायते तस्य यक्ष रक्षः पिशाचतः ॥ १९ ॥

त्रिसंध्यं जपते यस्तु वज्रसार तनुर्भवेत् ।
यात्राकाले पठेद्यस्तु निर्विघ्नेन फलं लभेत् ॥ २० ॥

युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं चाप्नुयाद्ध्रुवम् ।
मारणोच्चाटनाकर्ष स्तंभ मोहन कर्मणि ॥ २१ ॥

सप्तवारं जपेदेतद्दनानामेकविंशतिः ।
तत्तत्फलमवाप्नोति साधको नात्र संशयः ॥ २२ ॥

एकविंशतिवारं च पठेत्तावद्दिनानि यः ।
कारागृहगतं सद्यो राज्ञावध्यं च मोचयोत् ॥ २३ ॥

राजदर्शन वेलायां पठेदेतत् त्रिवारतः ।
स राजानं वशं नीत्वा प्रकृतीश्च सभां जयेत् ॥ २४ ॥

इदं गणेशकवचं कश्यपेन सविरितम् ।
मुद्गलाय च ते नाथ मांडव्याय महर्षये ॥ २५ ॥

मह्यं स प्राह कृपया कवचं सर्व सिद्धिदम् ।
न देयं भक्तिहीनाय देयं श्रद्धावते शुभम् ॥ २६ ॥

अनेनास्य कृता रक्षा न बाधास्य भवेत् व्याचित् ।
राक्षसासुर बेताल दैत्य दानव संभवाः ॥ २७ ॥

॥ इति श्री गणेशपुराणे श्री गणेश कवचं संपूर्णम् ॥

 ******श्री गणेशाय नमः************
श्री सङ्कष्टनाशन गणेश स्तोत्रम् नारद उवाच।
प्रणम्य शिरसा देवं गौरी पुत्रं विनायाकम्।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यम् आयुष्कामार्थसिद्धये॥१॥
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतर्थकम्॥२॥
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम्॥३॥
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्॥४॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम्॥५॥
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम्॥६॥
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः॥७॥
अष्टभयो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत्।
तस्य विद्या भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादतः॥ ८॥
॥इति श्रीनारदपुराणे सङ्कष्टनाशनं नाम गणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥

.विशेषः- इस प्रकार के मन्त्र उग्र प्रकृति के होते है। स्व-रक्षा व गुरु निर्देशन के अभाव में प्रयुक्त करना हानिकारक है तथा सामाजिक व नैतिक दृष्टि से अनुचित भी। यहाँ पर मात्र प्राचीन विद्या के संरक्षण हेतु प्रस्तुत किये ।


2…..पाशुपतास्त्र मंत्र साधना एवं सिद्धि

शिव का एक भीषण शूलास्त्र जिसे अर्जुन ने तपस्या करके प्राप्त किया था। महाभारतका युद्ध हुआ, उसमें भगवान्‌ शंकरका दिया हुआ पाशुपतास्त्र अर्जुनके पास था, भगवान्‌ शंकरने कह दिया कि तुम्हें चलाना नहीं पड़ेगा । यह तुम्हारे पास पड़ा-पड़ा विजय कर देगा, चलानेकी जरूरत नहीं, चला दोगे तो संसारमें प्रलय हो जायगा । इसलिये चलाना नहीं ।
इस पाशुपत स्तोत्र का मात्र एक बार जप करने पर ही मनुष्य समस्त विघ्नों का नाश कर सकता है । सौ बार जप करने पर समस्त उत्पातो को नष्ट कर सकता है तथा युद्ध आदि में विजय प्राप्त कर सकता है । इस मंत्र का घी और गुग्गल से हवं करने से मनुष्य असाध्य कार्यो को पूर्ण कर सकता है । इस पाशुपातास्त्र मंत्र के पाठ मात्र से समस्त क्लेशो की शांति हो जाती है ।
यह अत्यन्त प्रभावशाली व शीघ्र फलदायी प्रयोग है। यदि मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ गुरू के निर्देशानुसार संपादित करे तो अवश्य फायदा मिलेगा। शनिदेव शिव भक्त भी हैं और शिव के शिष्य भी हैं। शनि के गुरु शिव होने के कारण इस अमोघ प्रयोग का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। यदि किसी साधारण व्यक्ति के भी गुरु की कोई आवभगत करें तो वह कितना प्रसन्न होता है। फिर शनिदेव अपने गुरु की उपासना से क्यों नहीं प्रसन्न होंगे। इस स्तोत्र के पाठ से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और शिव की प्रसन्नता से शनिदेव खुश होकर संबंधित व्यक्ति को अनुकूल फल प्रदान करते हैं। साथ ही एक विशेषता यह भी परिलक्षित होती है कि संबंधित व्यक्ति में ऐसी क्षमता आ जाती है कि वह शनिदेव के द्वारा प्राप्त दण्ड भी बड़ी सरलता से स्वीकार कर लेता है। साथ ही वह अपने जीवन में ऐसा कोई अशुभ कर्म भी नहीं करता जिससे उस पर शनिदेव भविष्य में भी नाराज हों।

यह किसी भी कार्य के लिए अमोघ राम बाण है। अन्य सारी बाधाओं को दूर करने के साथ ही युवक-युवतियों के लिए यह अकाटय प्रयोग माना ही नहीं जाता अपितु इसका अनेक अनुभूत प्रयोग किया जा चुका है। जिस वर या कन्या के विवाह में विलंब होता है, यदि इस पाशुपत-स्तोत्र का प्रयोग करें तो निश्चित रूप से शीघ्र ही उन्हें दाम्पत्य सुख का लाभ मिलता है। केवल इतना ही नहीं, अन्य सांसारिक कष्टों को दूर करने के लिए भी पाठ या जप, हवन, तर्पण, मार्जन आदि

पाशुपतास्त्र स्तोत्रम
इस पाशुपत स्तोत्र का मात्र एक बार जप करने पर ही मनुष्य समस्त विघ्नों का नाश कर सकता है । सौ बार जप करने पर समस्त उत्पातो को नष्ट कर सकता है तथा युद्ध आदि में विजय प्राप्त के सकता है । इस मंत्र का घी और गुग्गल से हवं करने से मनुष्य असाध्य कार्यो को पूर्ण कर सकता है । इस पाशुपातास्त्र मंत्र के पाठ मात्र से समस्त क्लेशो की शांति हो जाती है ।

स्तोत्रम…

ॐ नमो भगवते महापाशुपतायातुलबलवीर्यपराक्रमाय त्रिपन्चनयनाय नानारुपाय नानाप्रहरणोद्यताय सर्वांगडरक्ताय भिन्नांजनचयप्रख्याय श्मशान वेतालप्रियाय सर्वविघ्ननिकृन्तन रताय सर्वसिध्दिप्रदाय भक्तानुकम्पिने असंख्यवक्त्रभुजपादाय तस्मिन् सिध्दाय वेतालवित्रासिने शाकिनीक्षोभ जनकाय व्याधिनिग्रहकारिणे पापभन्जनाय सूर्यसोमाग्नित्राय विष्णु कवचाय खडगवज्रहस्ताय यमदण्डवरुणपाशाय रूद्रशूलाय ज्वलज्जिह्राय सर्वरोगविद्रावणाय ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनागक्षय कारिणे ।
ॐ कृष्णपिंग्डलाय फट । हूंकारास्त्राय फट । वज्र हस्ताय फट । शक्तये फट । दण्डाय फट । यमाय फट । खडगाय फट । नैऋताय फट । वरुणाय फट । वज्राय फट । पाशाय फट । ध्वजाय फट । अंकुशाय फट । गदायै फट । कुबेराय फट । त्रिशूलाय फट । मुदगराय फट । चक्राय फट । पद्माय फट । नागास्त्राय फट । ईशानाय फट । खेटकास्त्राय फट । मुण्डाय फट । मुण्डास्त्राय फट । काड्कालास्त्राय फट । पिच्छिकास्त्राय फट । क्षुरिकास्त्राय फट । ब्रह्मास्त्राय फट । शक्त्यस्त्राय फट । गणास्त्राय फट । सिध्दास्त्राय फट । पिलिपिच्छास्त्राय फट । गंधर्वास्त्राय फट । पूर्वास्त्रायै फट । दक्षिणास्त्राय फट । वामास्त्राय फट । पश्चिमास्त्राय फट । मंत्रास्त्राय फट । शाकिन्यास्त्राय फट । योगिन्यस्त्राय फट । दण्डास्त्राय फट । महादण्डास्त्राय फट । नमोअस्त्राय फट । शिवास्त्राय फट । ईशानास्त्राय फट । पुरुषास्त्राय फट । अघोरास्त्राय फट । सद्योजातास्त्राय फट । हृदयास्त्राय फट । महास्त्राय फट । गरुडास्त्राय फट । राक्षसास्त्राय फट । दानवास्त्राय फट । क्षौ नरसिन्हास्त्राय फट । त्वष्ट्रास्त्राय फट । सर्वास्त्राय फट । नः फट । वः फट । पः फट । फः फट । मः फट । श्रीः फट । पेः फट । भूः फट । भुवः फट । स्वः फट । महः फट । जनः फट । तपः फट । सत्यं फट । सर्वलोक फट । सर्वपाताल फट । सर्वतत्व फट । सर्वप्राण फट । सर्वनाड़ी फट । सर्वकारण फट । सर्वदेव फट । ह्रीं फट । श्रीं फट । डूं फट । स्त्रुं फट । स्वां फट । लां फट । वैराग्याय फट । मायास्त्राय फट । कामास्त्राय फट । क्षेत्रपालास्त्राय फट । हुंकरास्त्राय फट । भास्करास्त्राय फट । चंद्रास्त्राय फट । विघ्नेश्वरास्त्राय फट । गौः गां फट । स्त्रों स्त्रौं फट । हौं हों फट । भ्रामय भ्रामय फट । संतापय संतापय फट । छादय छादय फट । उन्मूलय उन्मूलय फट । त्रासय त्रासय फट । संजीवय संजीवय फट । विद्रावय विद्रावय फट । सर्वदुरितं नाशय नाशय फट ।

3….कुछ लोग दुर्गा सप्तशती के पाठ के बाद हवन खुद की मर्जी से कर लेते है और हवन सामग्री भी खुद की मर्जी से लेते है ये उनकी गलतियों को सुधारने के लिए है।
दुर्गा सप्तशती के वैदिक आहुति की सामग्री—(एक बार ये भी करके देखे और खुद महसुस करे चमत्कारो को)
प्रथम अध्याय-एक पान देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना।
द्वितीय अध्याय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, गुग्गुल विशेष
तृतीय अध्याय- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक सं. 38 शहद
चतुर्थ अध्याय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक सं.1से11 मिश्री व खीर विशेष,
चतुर्थ अध्याय- के मंत्र संख्या 24 से 27 तक इन 4 मंत्रों की आहुति नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से देह नाश होता है। इस कारण इन चार मंत्रों के स्थान पर ओंम नमः चण्डिकायै स्वाहा’ बोलकर आहुति देना तथा मंत्रों का केवल पाठ करना चाहिए इनका पाठ करने से सब प्रकार का भय नष्ट हो जाता है।
पंचम अध्ययाय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक सं. 9 मंत्र कपूर, पुष्प, व ऋतुफल ही है।
षष्टम अध्याय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक सं. 23 भोजपत्र।
सप्तम अध्याय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक सं. 10 दो जायफल श्लोक संख्या 19 में सफेद चन्दन श्लोक संख्या 27 में इन्द्र जौं।
अष्टम अध्याय- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 54 एवं 62 लाल चंदन।
नवम अध्याय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या श्लोक संख्या 37 में 1 बेलफल 40 में गन्ना।
दशम अध्याय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 5 में समुन्द्र झाग 31 में कत्था।
एकादश अध्याय- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 2 से 23 तक पुष्प व खीर श्लोक संख्या 29 में गिलोय 31 में भोज पत्र 39 में पीली सरसों 42 में माखन मिश्री 44 मेें अनार व अनार का फूल श्लोक संख्या 49 में पालक श्लोक संख्या 54 एवं 55 मेें फूल चावल और सामग्री।
द्वादश अध्याय- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 10 मेें नीबू काटकर रोली लगाकर और पेठा श्लोक संख्या 13 में काली मिर्च श्लोक संख्या 16 में बाल-खाल श्लोक संख्या 18 में कुशा श्लोक संख्या 19 में जायफल और कमल गट्टा श्लोक संख्या 20 में ऋीतु फल, फूल, चावल और चन्दन श्लोक संख्या 21 पर हलवा और पुरी श्लोक संख्या 40 पर कमल गट्टा, मखाने और बादाम श्लोक संख्या 41 पर इत्र, फूल और चावल
त्रयोदश अध्याय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 27 से 29 तक फल व फूल।

दुर्गा सप्तशती के अध्याय से कामनापूर्ति- 1- प्रथम अध्याय- हर प्रकार की चिंता मिटाने के लिए।
2- द्वितीय अध्याय- मुकदमा झगडा आदि में विजय पाने के लिए।
3- तृतीय अध्याय- शत्रु से छुटकारा पाने के लिये।
4- चतुर्थ अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिये।
5- पंचम अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिए।
6- षष्ठम अध्याय- डर, शक, बाधा ह टाने के लिये।
7- सप्तम अध्याय- हर कामना पूर्ण करने के लिये।
8- अष्टम अध्याय- मिलाप व वशीकरण के लिये।
9- नवम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।
10- दशम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।
11- एकादश अध्याय- व्यापार व सुख-संपत्ति की प्राप्ति के लिये।
12- द्वादश अध्याय- मान-सम्मान तथा लाभ प्राप्ति के लिये।
13- त्रयोदश अध्याय- भक्ति प्राप्ति के लिये।

दुर्गा सप्तशती का पाठ करने और सिद्ध करने की मुख्याविधियाँ:–

सामान्य विधि :
नवार्ण मंत्र जप और सप्तशती न्यास के बाद तेरह अध्यायों का क्रमशः पाठ, प्राचीन काल में कीलक, कवच और अर्गला का पाठ भी सप्तशती के मूल मंत्रों के साथ ही किया जाता रहा है। आज इसमें अथर्वशीर्ष, कुंजिका मंत्र, वेदोक्त रात्रि देवी सूक्त आदि का पाठ भी समाहित है जिससे साधक एक घंटे में देवी पाठ करते हैं।

वाकार विधि :
यह विधि अत्यंत सरल मानी गयी है। इस विधि में प्रथम दिन एक पाठ प्रथम अध्याय, दूसरे दिन दो पाठ द्वितीय, तृतीय अध्याय, तीसरे दिन एक पाठ चतुर्थ अध्याय, चौथे दिन चार पाठ पंचम, षष्ठ, सप्तम व अष्टम अध्याय, पांचवें दिन दो अध्यायों का पाठ नवम, दशम अध्याय, छठे दिन ग्यारहवां अध्याय, सातवें दिन दो पाठ द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय करके एक आवृति सप्तशती की होती है।

संपुट पाठ विधि :
किसी विशेष प्रयोजन हेतु विशेष मंत्र से एक बार ऊपर तथा एक नीचे बांधना उदाहरण हेतु संपुट मंत्र मूलमंत्र-1, संपुट मंत्र फिर मूलमंत्र अंत में पुनः संपुट मंत्र आदि इस विधि में समय अधिक लगता है।

सार्ध नवचण्डी विधि :
इस विधि में नौ ब्राह्मण साधारण विधि द्वारा पाठ करते हैं। एक ब्राह्मण सप्तशती का आधा पाठ करता है। (जिसका अर्थ है- एक से चार अध्याय का संपूर्ण पाठ, पांचवे अध्याय में ”देवा उचुः- नमो देव्ये महादेव्यै” से आरंभ कर ऋषिरुवाच तक, एकादश अध्याय का नारायण स्तुति, बारहवां तथा तेरहवां अध्याय संपूर्ण) इस आधे पाठ को करने से ही संपूर्ण कार्य की पूर्णता मानी जाती है। एक अन्य ब्राह्मण द्वारा षडंग रुद्राष्टाध्यायी का पाठ किया जाता है। इस प्रकार कुल ग्यारह ब्राह्मणों द्वारा नवचण्डी विधि द्वारा सप्तशती का पाठ होता है। पाठ पश्चात् उत्तरांग करके अग्नि स्थापना कर पूर्णाहुति देते हुए हवन किया जाता है जिसमें नवग्रह समिधाओं से ग्रहयोग, सप्तशती के पूर्ण मंत्र, श्री सूक्त वाहन तथा शिवमंत्र ‘सद्सूक्त का प्रयोग होता है जिसके बाद ब्राह्मण भोजन,’ कुमारी का भोजन आदि किया जाता है। वाराही तंत्र में कहा गया है कि जो ”सार्धनवचण्डी” प्रयोग को संपन्न करता है वह प्राणमुक्त होने तक भयमुक्त रहता है, राज्य, श्री व संपत्ति प्राप्त करता है।

शतचण्डी विधि :
मां की प्रसन्नता हेतु किसी भी दुर्गा मंदिर के समीप सुंदर मण्डप व हवन कुंड स्थापित करके (पश्चिम या मध्य भाग में) दस उत्तम ब्राह्मणों (योग्य) को बुलाकर उन सभी के द्वारा पृथक-पृथक मार्कण्डेय पुराणोक्त श्री दुर्गा सप्तशती का दस बार पाठ करवाएं। इसके अलावा प्रत्येक ब्राह्मण से एक-एक हजार नवार्ण मंत्र भी करवाने चाहिए। शक्ति संप्रदाय वाले शतचण्डी (108) पाठ विधि हेतु अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमा का दिन शुभ मानते हैं। इस अनुष्ठान विधि में नौ कुमारियों का पूजन करना चाहिए जो दो से दस वर्ष तक की होनी चाहिए तथा इन कन्याओं को क्रमशः कुमारी, त्रिमूर्ति, कल्याणी, रोहिणी, कालिका, शाम्भवी, दुर्गा, चंडिका तथा मुद्रा नाम मंत्रों से पूजना चाहिए। इस कन्या पूजन में संपूर्ण मनोरथ सिद्धि हेतु ब्राह्मण कन्या, यश हेतु क्षत्रिय कन्या, धन के लिए वेश्य तथा पुत्र प्राप्ति हेतु शूद्र कन्या का पूजन करें। इन सभी कन्याओं का आवाहन प्रत्येक देवी का नाम लेकर यथा ”मैं मंत्राक्षरमयी लक्ष्मीरुपिणी, मातृरुपधारिणी तथा साक्षात् नव दुर्गा स्वरूपिणी कन्याओं का आवाहन करता हूं तथा प्रत्येक देवी को नमस्कार करता हूं।” इस प्रकार से प्रार्थना करनी चाहिए। वेदी पर सर्वतोभद्र मण्डल बनाकर कलश स्थापना कर पूजन करें। शतचण्डी विधि अनुष्ठान में यंत्रस्थ कलश, श्री गणेश, नवग्रह, मातृका, वास्तु, सप्तऋषी, सप्तचिरंजीव, 64 योगिनी 50 क्षेत्रपाल तथा अन्याय देवताओं का वैदिक पूजन होता है। जिसके पश्चात् चार दिनों तक पूजा सहित पाठ करना चाहिए। पांचवें दिन हवन होता है।

इन सब विधियों (अनुष्ठानों) के अतिरिक्त प्रतिलोम विधि, कृष्ण विधि, चतुर्दशीविधि, अष्टमी विधि, सहस्त्रचण्डी विधि (1008) पाठ, ददाति विधि, प्रतिगृहणाति विधि आदि अत्यंत गोपनीय विधियां भी हैं जिनसे साधक इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति कर सकता है।

4….सर्व बाधा निवारक, सकल कार्य सिद्ध चौसठ योगिनी साधना
रविपुष्य नक्षत्र (जिस रविवार को पुष्य नक्षत्र हो) चुनिए इस दिन कहीं सिद्ध भैरव जी के मन्दिर से उनके चरणों की कालिमा एकत्र कर लें। इसे स्याही की तरह प्रयोग करना है। एक साफ-सा आयताकार भोजपत्र ले लें। इस पत्र पर यंत्र अंकित करना है। सिरस के वृक्ष की एक लकड़ी से कलम बना लें। यह न मिले तो अनार के वृक्ष की लकड़ी से बना लें।
भोजपत्र पर शतरंज के कोष्ठकों की तरह 64 कोष्ठक बना लें। प्रत्येक कोष्ठक में क्रमशः एक-एक योगिनी का नाम अंकित कर लें। लिखने का क्रम बाएं से दाएं तथा नीचे से ऊपर की ओर रहे, इसका ध्यान रखें। यदि सक्षम हैं तो यह यंत्र तांबे, चांदी अथवा सोने की शीट पर अंकित करवाकर प्राण-प्रतिष्ठा कर लें। 64 योगिनीयों के नाम निम्न प्रकार हैं।

1. दिव्ययोगिनी, 2. महायोगिनी, 3. सिद्धयोगिनी,
4. गणेश्वरी, 5. प्रेताक्षी, 6. डाकिनी, 7. काली,
8. कालरात्रि, 9. निशाचरी, 10. हुंकारी, 11. रूद्रवैताली, 12. खर्परी, 13. भूतयामिनी, 14. ऊर्ध्वकेशी,
15. विरुपाक्षी, 16. शुष्कांगी, 17. मॉसभोजनी,
18. फूत्कारी, 19. वीरभद्राक्षी, 20. धूम्राक्षी,
21. कलहप्रिया, 22. रक्ता, 23. घाररक्ताक्षी,
24. विरुपाक्षी, 25. भयंकरी, 26. चौरिका, 27. मारिका, 28. चंडी, 29. वाराही, 30. मुंडधारिणी, 31. भैरवी,
32. चक्रिणी, 33. क्रोधा, 34. दुर्मुखी, 35. प्रेतवाहिनी,
36. कंटकी, 37. दीर्घलंबौष्ठी, 38. मालिनी,
39. मंत्रयोगिनी, 40. कालाग्रि, 41. मोहिनी, 42. चक्री,
43. कंकाली, 44. भुवनेश्वरी, 45. कुंडलाक्षी, 46. जुही, 47. लक्ष्मी, 48. यमदूती, 49. करालिनी, 50. कौशिकी, 51. भाक्षिणी, 52. यक्षी, 53. कौमारी, 54. यंत्रवाहिनी, 55. विशाला, 56. कामुकी, 57. व्याघ्री, 58. याक्षिणी,
59. प्रेतभूषणी, 60. धूर्जटा, 61. विकटा, 62. घोरा,
63. कपाला, 64. लांगली।

ॐ आवाहम्याहं देवी योगिनीं परमेश्वरीम् । योगाभ्यासेन संतुष्टा परं ध्यान समन्विता।।
ॐ कालरात्रि शुष्कांगी विरुपाक्षी चक्रिणी कालागि यमदूती कामुकी लांगली
काली विरुपाक्षी घाररक्ताक्षी भैरवी मंत्रयोगिनी लक्ष्मी विशाला कपाला
डाकिनी ऊर्ध्वकेशी रक्ता मुंडधारिणी मालिनी जुही यंत्रवाहिनी घोरा
प्रेताक्षी भूतयामिनी कलहप्रिया वाराही दीर्घलंबौष्ठी कुंडलाक्षी कौमारी विकटा
गणेश्वरी खर्परी धूम्राक्षी चंडी कंटकी भुवनेश्वरी यक्षी धूर्जटा
सिद्धयोगिनी रूद्रवैताली वीरभद्राक्षी मारिका प्रेतवाहिनी कंकाली भाक्षिणी प्रेतभूषणी
महायोगिनी हुंकारी फेत्कारी चौरिका दुर्मुखी चक्री कौशिकी याक्षिणी
दिव्ययोगिनी निशाचरी मॉसभोजनी भयंकरी क्रोधा मोहिनी करालिनी व्याघ्री

यंत्र के सूखने तक प्रतीक्षा करें। जिस क्रम से नाम अंकित किए थे उसी क्रम से प्रत्येक कोष्ठक में एक चुटकी नागकेसर चढ़ाएं। यथा भक्ति यंत्र की धूप-दीप से पूजा अर्चना करें। अनामिका उंगली का पोर दबाते हुए यह उंगली अब पहले कोष्ठक में रखें तथा इसमें अंकित पहला नाम दिव्ययोगिनी 64 बार ‘‘ॐ दिव्ययोगिनी नमः’’ जपें। दूसरी बार दूसरे कोष्ठक पर उंगली रखकर 64 बार दूसरा नाम महायोगिनी जपें, ‘‘ॐ महायोगिनी नमः’’। इसी प्रकार यंत्र के प्रत्येक कोष्ठक में उंगली रखते हुए वह नाम 64-64 बार जपें।

अन्त 11 माला ‘‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्री हंसौः

चतुःषश्ठियोगिनोभ्यो नमः’’ जप करके यंत्र को ऐसे ही सुरक्षित रख लें। अगले दिन यंत्र बनाने की प्रक्रिया छोड़कर 64 कोष्ठकों में उंगली रखकर 64-64 बार नाम जप करें और अन्त में योगिनी महामंत्र की ग्यारह माला जप करें। यह तांत्रिक अनुष्ठान 64 दिन चलेगा। चौसठवें अर्थात् अन्तिम दिन मंत्र जप के बाद योगिनी महामंत्र की एक माला से हवन करें। हवन सामग्री में कमलगट्टे, गूगल, जौ, बताशे, घृत तथा पंचमेवा अवश्य मिला लें। इन चौसठ दिनों में नित्य गुग्गुल धूनी करें। शान्तिकुज हरिद्वार में गुग्गुल की अगरबत्ती मिलती है यह उपयोग करें तो थोड़ी सुविधा हो जाएगी। अन्तिम दिन एक, दो अथवा अधिक, अपने सामर्थ्य अनुसार सौभाग्यशाली स्त्रीयों को भोजन दक्षिणा से प्रसन्न करके उनका आशीष लें।
यंत्र को सुन्दर सा फ्रेम करवाकर अपने आवास, दुकान फैक्ट्री आदि में उत्तर दिशा वाली दीवार में रख दें अथवा टांग दें। पुष्प की माला सदैव इस यंत्र पर चढ़ी रहे। यंत्र पर चढ़े हुए नागकेसर एक लाल कपड़े में बांधकर यंत्र के पास ही रख लें। सम्भव हो तो नित्य योगिनी महामंत्र की एक माला जप करें।
आप कुछ ही समय में चमत्कारी रुप से अपने तथा अपने आस-पास के वातावरण में परिवर्तन अनुभव करने लगेगें। ऋण का भार, व्यापार अथवा अन्य कार्य का अकस्मात् बाधित हो जाना, धन संपदा के लिए लोगों से बैर, भूमि-भवन आदि के क्रय विक्रय में व्यवधान आदि अनेक बातों से आप अपने मुक्त कर शान्तिमय जीवन जीने लगेंगे।
यह उपाय सरलतम उपायों की श्रंखला में कठिन अवश्य है परन्तु यदि संयम से कर लिया जाए तो बहुत ही प्रभावशाली सिद्ध होता है। समय के अभाव में जो साधक यह करने में असमर्थ में वह यह यंत्र बनाकर रख लें तथा योगिनी महामंत्र की एक माला नित्य जप करें। पूजा के समय यंत्र को गूगुल की धूनी अवश्य दें। इस सरल उपाय से भी कई लोगों को लाभ पहुचा है। मै बार-बार लिख रहा हॅू कि लाभ के पीछे आपके प्रारब्ध का भी महत्वपूर्ण योगदान है।

आप हमारे यहा से व्यापार वृर्दि यंत्र . धनाधीशकुबेरदेवता यंत्र . बगलामुखी यंत्र . श्री यंत्र .  शत्रु नाशक यंत्र . आर्थिक स्थिति में सुधार यंत्र . कर्ज मुक्ति यंत्र . सम्पूर्णवास्तु दोष निवारण यंत्र. सर्वकार्य सिद्धि यंत्र . वशीकरण यंत्र  . नवगग्रह यंत्र  . ऑर तंत्र व नकारात्मक ऊर्जा दूर करने का उपाय जाने . रक्षा मंत्र यंत्र  .विशेष सामग्री से प्रेत बाधा से ग्रस्त घर में धूनी दें, प्रेत बाधा, क्लेशादि दूर होंगे और परिवार में शांति और सुख का वातावरण उत्पन्न होगा। व्यापार स्थल पर यह सामग्री धूनी के रूप में प्रयोग करें, व्यापार में उन्नति होगी।

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मेरा मोबाईल न0॰है। (9760924411) इसी नंबर पर और दोपहर-11.00 –बजे से शाम -08.00 -के मध्य ही संपर्क करें। मुजफ्फरनगर ॰उ0॰प्र0……..

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