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कौन हैं शिव
शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, कल्याणकारी या शुभकारी। यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है। ‘शि’ का अर्थ है, पापों का नाश करने वाला, जबकि ‘व’ का अर्थ देने वाला यानी दाता।
क्या है शिवलिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग
शिव की दो काया है। एक वह, जो स्थूल रूप से व्यक्त किया जाए, दूसरी वह, जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग के रूप में जानी जाती है। शिव की सबसे ज्यादा पूजा लिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है। लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है। संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न। इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है। शिवलिंग का अर्थ है : शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न।
शिव, शंकर, महादेव…
शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं – शिव शंकर भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। शिव ने सृष्टि की स्थापना, पालना और विनाश के लिए क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु और महेश (महेश भी शंकर का ही नाम है) नामक तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना की है। इस तरह शिव ब्रह्मांड के रचयिता हुए और शंकर उनकी एक रचना। भगवान शिव को इसीलिए महादेव भी कहा जाता है। इसके अलावा शिव को 108 दूसरे नामों से भी जाना और पूजा जाता है।
अर्द्धनारीश्वर क्यों
शिव को अर्द्धनारीश्वर भी कहा गया है, इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव आधे पुरुष ही हैं या उनमें संपूर्णता नहीं। दरअसल, यह शिव ही हैं, जो आधे होते हुए भी पूरे हैं। इस सृष्टि के आधार और रचयिता यानी स्त्री-पुरुष शिव और शक्ति के ही स्वरूप हैं। इनके मिलन और सृजन से यह संसार संचालित और संतुलित है। दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। नारी प्रकृति है और नर पुरुष। प्रकृति के बिना पुरुष बेकार है और पुरुष के बिना प्रकृति। दोनों का अन्योन्याश्रय संबंध है। अर्धनारीश्वर शिव इसी पारस्परिकता के प्रतीक हैं। आधुनिक समय में स्त्री-पुरुष की बराबरी पर जो इतना जोर है, उसे शिव के इस स्वरूप में बखूबी देखा-समझा जा सकता है। यह बताता है कि शिव जब शक्ति युक्त होता है तभी समर्थ होता है। शक्ति के अभाव में शिव ‘शिव’ न होकर ‘शव’ रह जाता है।
नीलकंठ क्यों
अमृत पाने की इच्छा से जब देव-दानव बड़े जोश और वेग से मंथन कर रहे थे, तभी समुद से कालकूट नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं। समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया। देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि, मुनि, मनुष्य, गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गरमी से जलने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान शिव विषपान के लिए तैयार हो गए। उन्होंने भयंकर विष को हथेलियों में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए। भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं। उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव खत्म कर दिया। विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
भोले बाबा
शिव पुराण में एक शिकारी की कथा है। एकबार उसे जंगल में देर हो गई। तब उसने एक बेल वृक्ष पर रात बिताने का निश्चय किया। जगे रहने के लिए उसने एक तरकीब सोची। वह सारी रात एक-एक पत्ता तोड़कर नीचे फेंकता रहा। कथानुसार, बेल के पत्ते शिव को बहुत प्रिय हैं। बेल वृक्ष के ठीक नीचे एक शिवलिंग था। शिवलिंग पर प्रिय पत्तों का अर्पण होते देख शिव प्रसन्न हो उठे, जबकि शिकारी को अपने शुभ काम का अहसास न था। उन्होंने शिकारी को दर्शन देकर उसकी मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया। कथा से यह साफ है कि शिव कितनी आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं। शिव महिमा की ऐसी कथाओं और बखानों से पुराण भरे पड़े हैं।
शिव स्वरूप
भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही आकर्षक भी। शिव जो धारण करते हैं, उनके भी बड़े व्यापक अर्थ हैं :
जटाएं : शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं।
चंद्र : चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है।
त्रिनेत्र : शिव की तीन आंखें हैं। इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव की ये आंखें सत्व, रज, तम (तीन गुणों), भूत, वर्तमान, भविष्य (तीन कालों), स्वर्ग, मृत्यु पाताल (तीनों लोकों) का प्रतीक हैं।
सर्पहार : सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है।
त्रिशूल : शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशूल भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है।
डमरू : शिव के एक हाथ में डमरू है, जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है।
मुंडमाला : शिव के गले में मुंडमाला है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में किया हुआ है।
छाल : शिव ने शरीर पर व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल पहनी हुई है। व्याघ्र हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है।
भस्म : शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से किया जाता है। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है।
वृषभ : शिव का वाहन वृषभ यानी बैल है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ धर्म का प्रतीक है। महादेव इस चार पैर वाले जानवर की सवारी करते हैं, जो बताता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनकी कृपा से ही मिलते हैं।
इस तरह शिव-स्वरूप हमें बताता है कि उनका रूप विराट और अनंत है, महिमा अपरंपार है। उनमें ही सारी सृष्टि समाई हुई है।
महामृत्युंजय मंत्र
शिव के साधक को न तो मृत्यु का भय रहता है, न रोग का, न शोक का। शिव तत्व उनके मन को भक्ति और शक्ति का सामर्थ्य देता है। शिव तत्व का ध्यान महामृत्युंजय मंत्र के जरिए किया जाता है। इस मंत्र के जाप से भगवान शिव की कृपा मिलती है। शास्त्रों में इस मंत्र को कई कष्टों का निवारक बताया गया है। यह मंत्र यों हैं : ओम् त्र्यम्बकं यजामहे, सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनात्, मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।
(भावार्थ : हम भगवान शिव की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो हर श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं और पूरे जगत का पालन-पोषण करते हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, ताकि मोक्ष की प्राप्ति हो जाए, उसी उसी तरह से जैसे एक खरबूजा अपनी बेल में पक जाने के बाद उस बेल रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाता है।)
क्या है महाशिवरात्रि
– भगवान शिव हिंदुओं के प्रमुख देवताओं में से एक हैं, जिन्हें हिंदू बड़ी ही आस्था और श्रद्धा के साथ स्वीकारते और पूजते हैं।
– यूं तो शिव की उपासना के लिए सप्ताह के सभी दिन अच्छे हैं, फिर भी सोमवार को शिव का प्रतीकात्मक दिन कहा गया है। इस दिन शिव की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है।
– हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि कहते हैं। लेकिन फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी पर पड़ने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है, जिसे बड़े ही हषोर्ल्लास और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
– शिवरात्रि बोधोत्सव है। ऐसा महोत्सव, जिसमें अपना बोध होता है कि हम भी शिव का अंश हैं, उनके संरक्षण में हैं।
– माना जाता है कि सृष्टि की शुरुआत में इसी दिन आधी रात में भगवान शिव का निराकार से साकार रूप में (ब्रह्मा से रुद के रूप में) अवतरण हुआ था।
– ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात आदि देव भगवान श्री शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंगरूप में प्रकट हुए।
– ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चंदमा सूर्य के नजदीक होता है। उसी समय जीवनरूपी चंदमा का शिवरूपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है। इसलिए इस चतुर्दशी को शिवपूजा करने का विधान है।
– प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म कर देते हैं। इसलिए इसे महाशिवरात्रि या जलरात्रि भी कहा गया है।
– इस दिन भगवान शिव की शादी भी हुई थी। इसलिए रात में शिव जी की बारात निकाली जाती है। रात में पूजा कर फलाहार किया जाता है। अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेल पत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।
2…अबपाप तथा विपत्तियों को दूर करने वाले महामृत्युञ्जय मन्त्र को कहता हूँ, जिसे शुक्राचार्य ने भगवान् शंकर से प्राप्त कर मरे हुये दैत्यों को जिलायाथा ॥१॥महामृत्युञ्जय मन्त्र का उद्धार – तार (ॐ), व्यापिनी चन्द्रयुक्त (औ), बिन्दु सहित खं (ह), अर्थात् (हौं), फिर तार (ॐ), फिर अर्धीश (ऊकार), बिन्दु (अनुस्वार) से युक्त चतुरानन ‘ज’ अर्थात् (जूं), सर्गी हंसः (सः) इसके बाद ‘भूर्भुवः फिर वाल (ब) विसर्ग युक्त सकार अर्थात् (स्वः), फिर ‘त्र्यम्बकं यजामहे० यह वैदिक मन्त्र, फिर ‘भूर्भुवः स्वः’, तारयुक्तभुजङेश रों जूं, फिर सर्गवान् भृगु (मनु और बिन्दु सहित आकाश (ह) अर्थातहौं, पुनः प्रणव जोडने से पचास अक्षरों का महामृत्युञ्जय संज्ञक श्रेष्ठतममन्त्र बनता है ॥२-४॥विमर्श – महामृत्युञ्जय मन्त्र का स्वरुप इसप्रकार है – ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् भूर्भुवःस्वरों जूं सः हौं ॐ (५०) ॥२-४॥इस मन्त्र के वामदेव, कहोल एवंवशिष्ठ ऋषि हैं, भगवान्‍ रुद्र से इस मन्त्र का पंक्ति, गायत्री औरअनुष्टुप् छन्द कहा है । सदाशिव महामृत्युञ्जय रुद्र इसके देवता हैं । माया (ह्रीं) शक्ति है, रमा (श्रीं) बीज है । अभीष्ट सिद्धि हेतु इसका विनियोगकिया जाता है ॥५-६॥विनियोग – अस्य श्रीमहामृत्युञ्जयामन्त्रस्यवामदेवकहोलवशिष्ठा ऋषयः पंक्तिर्गायत्र्यनुष्टुप्छन्दांसिसदाशिवमहामृत्युञ्जयरुद्रो देवता हीं शक्तिः श्रींबीजमात्मनोऽभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।ऋष्यादिन्यास – शिर, मुख, हृदय, लिङ्ग, एवं पैरों पर ऋष्यादिन्यास करना चाहिए ॥७॥विमर्श – यथा- वामदेवहोलवशिष्ठऋषिभ्यो नमः शिरसि, पंक्तिर्गायत्र्यनुष्टुप्छन्दोभ्यः नमः मुखे, सदाशिवमहामृत्युञ्जरुद्राख्यदेवतायै नमः हृदि, ह्रीं शक्तये नमः लिङ्गे श्रीं बीजाय नमः पादयोः ॥७॥अबषडङ्गन्यास कहते हैं – अनुष्टुप् छान्द के ३, ४, ५, ९, ५, तथा ३ वर्णों सेषडङ्गन्यास करना चाहिए । उसकी विधि इस प्रकार है – प्रारम्भ में मूलमन्त्रके ९ अक्षरों के बाद त्र्यबकादि अक्षर लगाकर, फिर तार (ॐ), फिर ‘नमो भगवतेरुद्राय’ पद, फिर क्रमशः ‘शूलपाणये स्वाहा’ पद से हृदय में, फिर ‘अमृतमूर्तये मां जीवय’ से शिर में, फिर ‘चन्दशिरसे जटिने स्वाहा’ से शिखामें, फिर ‘त्रिपुरान्तकाय हां हीं’ से कवच में, फिर ‘त्रिलोचनायऋग्यजुःसाममन्त्राय’ से नेत्र में, फिर ‘अग्नित्रयाय ज्वल ज्वल मां रक्षरक्ष ॐ अघोरास्त्राय’ से अस्त्र में लगाकर न्यास करे ॥७-१२॥विमर्श -यथा – १. ॐ हौ ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः त्र्यम्बकं ॐ नमो भगवते रुद्रायशूलपाणये स्वाहा हृदयाय नमः, २. ॐ हौं ॐ जूँ सः भूर्भुवः स्वः यजामहे ॐ नमोभगवते रुद्राय अमृतमूर्तये मां जीवय शिरसे स्वाहा, ३. ॐ हौं ॐ जूं सःभूर्भुवः स्वः सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ॐ नमो भगवते रुद्राय चन्द्रशिरसेजटिने स्वाहा शिखायै वषट्, ४. ॐ हौं जूं सः भूर्भुवः स्वः उर्वारुकमिवबन्धनत् ॐ नमो भगवते रुद्राय त्रिपुरान्तकाय हां ह्रीं कवचाय हुम्, ५. ॐहौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मृत्योर्मुक्षीय ॐ नमो भगवते रुद्रायत्रिलोचनाय ऋग्यजुः साममन्त्राय नेत्रत्रयाय वौषट्, ६. ॐ हौं ॐ जूं सःभूर्भुवः स्वः मामृतात् ॐ नमो भगवते रुद्राय अग्नित्रयाय ज्वल ज्वलं मामरक्ष रक्ष ॐ अघोरास्त्राय अस्त्राय फट् ॥७-१२॥अब उक्त मन्त्र कावर्णन्यास कहते है – प्रारम्भ में मूल मन्त्र के ९ वर्ण लगाकर फिरत्र्यम्बकादि ३२ अक्षरों के एक एक वर्ण पर बिन्दु तथा अन्त में नमः लगाकरपूर्व, पश्चिमे, दक्षिण, उत्तर पूर्वक मुख में, फिर उरःस्थल कण्ठ, पुख, नाभि, हृदय, पीठ, कुक्षि, लिङ्ग और गुदा में न्यास करना चाहिए । फिर दोनोऊरुओं के मूल और मध्य में, दोनों जानुओं में एवं दोनों जानुवृत्त में, स्तनोम में, पार्श्वो में, पैरो में, हाघों में, नासिका, रन्ध्रों में तथाशिर इन ३२ स्थानोम में इस प्रकार न्यस करना चाहिए ॥१३-१५॥विमर्श – वर्णन्यास की विधि – (१) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः त्र्यं नमः पूर्वमुखे, (२) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः वं नमः पश्चिममुखे, (३) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः कं नमः दक्षिणमुखे, (४) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः यं नमः उत्तरमुखे, (५) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः जां नमः उरसि, (६) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मं नमः कण्ठे, (७) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः हें नमः मुखे, (८) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः सुं नमः नाभौ, (९) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः गं नमः हृदि, (१०) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः धिं नमः पृष्ठे, (११) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः पुं नमः कुक्षौ, (१२) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः ष्टिं नमः लिङ्गे, (१३) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः वं नमः गुदे, (१४) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः र्धं नमः दक्षिणोरुमूले, (१५) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः नं नमः वामोरुमूले, (१६) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः ॐ नमः दक्षिणोरुमध्ये, (१७) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः र्वा नमः वामोरुमध्ये, (१८) ॐ हौं ॐ जंह सः भूर्भुवः स्वः सं नमः दक्षिणजानुवृत्ते, (१९) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः कं नमः वामजानुनि, (२०) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मिं नमः दक्षिणजानुवृत्ते, (२१) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः वं नमः वामजानुवृत्ते, (२२) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः बं नमः दक्षिणस्तने, (२३) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः न्धं नमः वामस्तने, (२४) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः नां नमः दक्षिणपार्श्वे, (२५) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मृं नमः वामपार्श्वे, (२६) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः त्यों नमः दक्षिणपादे, (२७) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः र्मुं नमः वामपादे, (२८) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः क्षीं नमः दक्षिणकरे, (२९) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः यं नमः वामकरे, (३०) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मां नमः दक्षिणनासापुटे, (३१) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मृं नमः वामनासापुटे, (३२) ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः तां नमः मूर्ध्नि ॥१३-१५॥तदनन्तरग्यारह पदों का शिर, भौह, नेत्र, मुख, गण्डस्थल, हृदय, उदर, लिङ्ग, ऊरु, जानु और दोनो पैरो में न्यास करना चाहिए । ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ इत्यादिमन्त्र के ३, ४, ३, ५, ४, २, ३, २, ३, १ और ३ वर्णों से विद्वान् एक एक पदबना लें । फिर मूल मन्त्र से व्यापक न्यास कर भगवान् शंकर का ध्यान करनाचाहिए ॥१६-१८॥विमर्श – एकादश पदन्यास । यथा – १. त्र्यम्बकं शिरसि, २. यजामहे भ्रुवोः ३. सुगन्धिं नेत्रयो. ४. पुष्टिवर्धनम् मुखे, ५.उर्वारुकं गण्डयोः, ६. एव हृदये, ७, बन्धनात् जठरे, ८. मृत्योः लिङ्गे, ९.मुक्षीय उर्वोः, १०. मा जान्वोः, ११. अमृतात् पादयोः ॥१६-१८॥अबभगवान शंकर द्वारा उपयोग में लाये गये हाथोम का वर्णन करते हुए ध्यान कहतेहैं – अपने अङ्गास्थ दो करों में अमृत कुम्भ धारण किए हुये, उसके ऊपर वालेदो हाथों से उस अमृत कुम्भ से सुधामय जल निकालते हुये, उसके ऊपर के दोनोंहाथों से उस अमृत जल को शिर पर अभिषिक्त करते हुये, शेष दो हाथो में क्रमशःमृग और अक्षमाला धारण किए हुये, शिरःस्थित चन्द्रमण्डल से स्त्रवित अमृतधारा से अपने शरीर को आप्लावित करते हुये, पार्वती सहित त्रिनेत्र सदाशिवमृत्युञ्जय का मैं ध्यान करता हूँ ॥१९॥मुष्टि सारङ्ग, शक्ति, लिङ्ग, एवं पञ्चमुख मुद्रायें प्रदर्शित कर एक लाख की संख्या में इस मन्त्र का जप करना चाहिए ॥२०॥विमर्श – मुष्टि मुद्रा – दाहिने हाथ की हथेली से मुष्टिका बना कर ऊपर की ओरप्रदर्शित करने से मुष्टि मुद्रा बनती है । यह मुद्रा सभी विघ्नों का विनाशकरने वाली कही गई है ।मृगमुद्रा – दहिने हाथ की अनामिका और अँगूठेको मिलाकर उस पर मध्यमा को भी रख्खे । शेश दो उँगलियों को ऊपर की ओर सीधाखडा करे । यह मृग मुद्रा है ।शक्ति मुद्रा – दोंनों हाथों सेमुठ्ठी बन कर बॉये हाथ की मुठ्ठी के ऊपर दाहिने हाथ की मुठ्ठी को रख कर शिरके ऊपर संयोजन करने से शक्ति मुद्रा निष्पन्न होती है ।लिङ्गमुद्रा – दाहिने हाथ के अँगूठे को ऊपर उठाकर उसे बायें अँगूठे से बाँधे । उसकेबाद दोंनो हाथों की उँगलियों को परस्पर बाँधे । यह शिवसान्निध्यकारकलिङ्गमुद्रा है ।पञ्चमुख मुद्रा – दोनों हाथों के मणिबन्धों कोमिलाकर आगे की अंगुलियों को परस्पर मिलाना चाहिए । शिव को संतुष्ट करनेवाली यह पञ्चमुख मुद्रा कही गई है ॥२०॥जप करने के बाद दश द्रव्योमसे दशांश होम करना चाहिए । १. बिल्वफल २. तिल, ३. खीर, ४. घी, ५. दूध, ५.दही, ७. दूर्वा, ८. वट की समिधा, ९. पलाश की समिधा एवं १०. खैर की समिधायेंदश द्रव्य कहे गये हैं । इन तीनों समिधाओं को घी, शहद और शक्कर में डुबोकरहोम करना चाहिए ॥२१-२२॥अब पीठ शक्तियाँ कहते हैं – वामादिशक्तियोम के साथ शैव पीठ पर शिव का पूजन करना चाहिए । १. वामा, २.ज्येष्ठा, ३. रौद्री, ४. काली चौथी शक्ति कही गई है । इसके बाद ५.कलविकरणी, ६. बलविकरणी, ७. बलप्रमथनी, ८. सर्वभूतदमनी, ९ शक्तियाँ कही गईहैं ॥२२-२४॥तार (ॐ), फिर ‘नमो भगवते सकल’, फिर ‘गुणात्मशक्तियुक्ताय अनन्ताय’ पद, फिर ‘योगपीठात्मने ’ पद और ‘नमः’ इसमन्त्र से पीठ पर पुष्पाञ्जति देकर मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे यहपीठ मन्त्र कहा है ॥२५-२६॥विमर्श – पीठपूजा विधि – वृत्ताकारकर्णिका अष्टदल फिर भूपुर लिख कर यन्त्र बनाना चाहिए । उसी परमहामृत्युञ्जय भगवान् का पूजन करना चाहिए । सर्वप्रथम (१६. १९ में वर्णित)भगवान् मृत्युञ्जय के स्वरुप का ध्यान कर, मानसोपचार से पूजन कर, उनके लिएविधिवत् अर्घ्य स्थापित कर पीठदेवतओं का पीठ के मध्य में इस प्रकार पूजनकरना चाहिए – ॐ आधारशक्तयै नमः, ॐ प्रकृत्यै नमः, ॐ कूंर्माय नमः, ॐ शेषाय नमः, ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ क्षीरसमुद्राय नमः, ॐ श्वेतद्वीपाय नमः, ॐ मणिमण्डपाय नमः, ॐ कल्पवृक्षाय नमः, ॐ मणिवेदिकायै नमः ॐ रत्नसिंहासनाय नमः, फिर आग्नेयादि कोणों में धर्म आदि का तथ पूर्वादि दिशाओम में अधर्म आदि का पूजन करना चाहिए । यथा -ॐ धर्माय नमः, आग्नेये, ॐ ज्ञानाय नमः नैऋत्ये, ॐ वैराग्याय नमः वायव्ये, ॐ ऐश्वर्याय नमः ऐशान्ये, ॐ अधर्माय नमः पूर्वे, ॐ अज्ञानाय नमः दक्षिणे, ॐ अवैराग्याय नमः पश्चिमे, ॐ अनैश्वर्याय नमः उत्तरे ।पुनः पीठ के मध्य में अनन्त आदि का इस प्रकार पूजन करना चाहिए -ॐ अनन्ताय नमः, ॐ पदम्‌नाभाय नमः, ॐ अं द्वादशकलात्मने सूर्यमण्डलाय नमः, ॐ उं षोडशकलात्मने सोममण्डलाय नमः, ॐ रं दशकलात्मने वहिनण्डलाय नमः, ॐ सं सत्त्वाय नमः, ॐ रं रजसे नमः, ॐ तं तमसे नमः, ॐ आं आत्मने नमः, ॐ पं परमात्मने नमःॐ ह्रीं ज्ञानात्मने नमः ।तत्पश्चात् केशरों में पूर्वादि ८ दिशाओं में तथा मध्य मे वामादि शक्तियोम की पूजा करनी चाहिए । यथा -ॐ वामायै नमः, पूर्वे ॐ ज्येष्ठायै नमः, आग्नेये, ॐ रौद्र्यै नमः, दक्षिणे, ॐ काल्यै नमः नैऋत्ये, ॐ कलविकरण्यै नम्ह पश्चिमे ॐ बलविकरण्यैः, वायव्ये, ॐ बलप्रमथिन्यै नमः, उत्तरे, ॐ सर्वभूतदमन्यै नमः, (पीठ्यमध्ये), फिर ‘ॐ नमो भगवते सकलगुणात्मशक्तियुक्ताय अनन्ताय योगपीठात्मने नमः’ इस मन्त्रसे आसन देकर, मूल मन्त्र से मूर्ति का ध्यान कर, आवाहनादि उपचारों सेपुष्पाञ्जलि पर्यन्त महामृत्युञ्जय का पूजन कर, उनकी अनुज्ञा ले आवरण पूजाप्रारम्भ करनी चाहिए ॥२२-२६॥पाद्यादि उपचारों से आरम्भ कर पुष्पाञ्जलि समर्पण पर्यन्त मृत्युञ्जय का पूजन करने के बाद आवरण पूजा करनी चाहिए ॥२७॥प्रथमआवरण में ‘ईशानः सर्वविद्यानाम०” (तैतिरीय संहितोक्त) मन्त्र से ईशान कोणमें ईशान का, फिर ‘तत्पुरुषाय विद्महे०’ ‘अघोरभ्योथ घोरेभ्यो०’ ‘वामदेवायनमः’ तत्पुरुष, अघोर, वामदेव, और सद्योजात का पूजन कर्ना चाहिए ॥२७-२८॥द्वितीयआवरण में पुनः ईशानादि के समीप में क्रमश निवृत्ति आदि कलाओं का पूजन करनाचाहिए । निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति एवं शान्त्यतेता ये पाँचकलायें है । फिर षडङ्गन्यास पूजा करनी चाहिए ॥२९-३०॥सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन, आकाश एवं वायु, वायु, तृतीयावरण में स्थित इन आठ देवताओं का पूजन करना चाहिए ॥३०-३१॥चतुर्थआवरण में श्वेत आभा वाली रमा, रमा, राका, प्रभा, ज्योत्स्ना, पूर्णा, उषा, पूरणी एवं सुधा – इन ८ शक्तियों का पूजन करना चाहिए ॥३१-३२॥पञ्चमआवरण में विश्वा, वन्द्या, सिता, प्रहवा, सारा, सन्ध्या, शिवा एवं निशा इनश्याम शरीर वाली ८ शक्तियों का पूजन करना चाहिए ॥३२-३३॥षष्ठ आवरण में अरुण आभावाली आर्या, प्रज्ञा, प्रभा, मेघा, शान्ति, कान्ति घृति तथा मति – इन ८ शक्तियों का पूजन करना चाहिए ॥३३-३४॥सप्तम आवरण में सोने जैसी आभा वाली धरा, उमा, पावनी, पद्मा, शान्ता, अमोघा, जया तथा अमला – इन आठ शक्तियों का पूजन करना चाहिए ।फिर अनन्त, सूक्ष्म, शिवोत्तम, एकनेत्र, एकरुद्र, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ तथा शिखण्डी, का अष्टम आवरण में पूजन करना चाहिए ॥३४-३६॥फिरनवम आवरण में उत्तर आदि दिशाओम के क्रम से उमा एवं चण्डेश्वर का, नन्दिएवं महाकाल का, गणेश एं वृषभ का, भृङ्गिरिटि एवं स्कन्द का पूजन करना चाहिए।तत्पश्चात दशम आवरण में ब्राह्यी अष्ट मातृकाओं का पूजन करनाचाहिए । फिर इन्द्रादि दश दिक्पालों का तथा उनके वज्रादि आयुधों का पूजनकरना चाहिए । इस प्रकार के पूजन से यह मन्त्र सिद्ध होता है ॥२७-३९॥विमर्श – आवरण पूजा – सर्वप्रथम कर्णिका के ईशान कोण में ‘ॐ ईशानसर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्याधिपति ब्रह्मणोधिपतिर्ब्रह्माशिवोमे अस्तु सदाशिवोम्’ इस वैद्क मन्त्र् से प्रथम आवरण में ईशान देव का पूजनकरना चाहिए ।फिर पूर्व में -‘ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि ।तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्’ इस वैदिक मन्त्र से तत्पुरुष का, इसके बाददक्षिण दिशा में – ‘अघोरेभ्यो अथ घोरेभ्या घोरघोरतरेभ्यः । सर्वेभ्यःसर्वसर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररुपेभ्यः’ इस वैदिक मन्त्र से अघोर का, तत्पश्चात् ‘ॐ वामदेवाय नमो बलविकरणाय नमः’ इस वैदिक मन्त्र से पश्चिमेदिशा में वामदेव का, तदनन्तर ‘ॐ अद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमः ।भवेभवे नातिभवे भवस्य मां भवदेवाय नमः’ इस वैदिक मन्त्र से सद्योजात काउत्तर दिशा में पूजन करना चाहिए । फिर ईशानादि देवों के पास निवृत्ति आदि ५कलाओं का निम्न मन्त्रों से पूजन करना चाहिए ।-ॐ निवृत्यै नमः, ॐ प्रतिष्ठायै नमः, ॐ विद्यायै नमः, ॐ शान्त्यै नमः ॐ शान्त्यतीतायै नमः ।इसप्रकार प्रथम आवरण का पूजन कर द्वितीयावरण में षडङ्ग मन्त्रों काआग्नेयादि कोणो में, मध्य में तथा दिशाओं में निम्न मन्त्रों से पूजन करनाचाहिए । ॐ ह्रौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः त्र्यम्बकं ॐ नमो भगवते रुद्रायशूलपाणये स्वाहा हृदयाय नमः, ॐ हौं ॐ जूं भूर्भुवः स्वः यजामहे ॐ रुद्रायअमृत मूर्तये याजीवय शिरसे स्वाहा, ॐ हौ ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः सुगन्धिंपुष्टिवर्धनं ॐ रुद्राय चन्द्र शिरसे जटिने स्वाहा शिखायै वषट्, ॐ हौं ॐजूं सः भूर्भुवः स्वः उर्वारुकमिव बन्धनात् ॐ रुद्राय त्रिपुरान्तकाय हांहीं कवचाय हुम्, ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मृत्योर्मुक्षीय ॐ रुद्रायत्रिलोचनाय० नेत्रत्रया वौषट्, ॐ हौं ॐ जूं सः भूर्भुवः स्वः मामृतात् ॐरुद्राय अग्निनत्रयाय ज्वल० अस्त्राय फट्‍ ।फिर तृतीय आवरण मेंअष्टपत्र में पूर्व आदि दिशाओं में नाम मन्त्रों से सूर्य आदिअष्टमूर्तियों का इस प्रकार पूजन करना चाहिए । यथा -ॐ सूर्यमूर्तये नमः, ॐ चन्द्रमूर्तये नमः, ॐ क्षितिमूर्तये नमः, ॐ जलमूर्तये नमः, ॐ अग्निमूर्तये नमः, ॐ वायुमूर्तये नमः, ॐ आकाशमूर्तये नमः, ॐ यज्ञमूर्तये नमः, चतुर्थ आवरण में पूर्वादि ८ दिशाओं के क्रम से श्वेत आभावाली रमा आदि का निम्न प्रकार से पूजन करना चाहिए । यथा -ॐ रमायै नमः, ॐ राकायै नमः, ॐ प्रभायै नमः, ॐ ज्योत्स्नायै नमः, ॐ पूर्णायै नमः, ॐ उषायै नमः, ॐ पूरण्यै नमः, ॐ सुधायै नमः, पञ्चम आवरण में पूर्वादि दिशाओं के क्रम से श्याम वर्ण वाली विश्वा आदि का निम्न मन्त्रों से पूजन करना चाहिए । यथा -ॐ विश्वायै नमः, ॐ वन्द्यायै नमः, ॐ सितायै नमः, ॐ प्रहवायै नमः, ॐ सारायै नमः, ॐ सन्ध्यायै नमः, ॐ शिवायै नमः, ॐ निशायै नमः, षष्ठ आवरण में पूर्वादि दिशाओं में अरुण आभा वाली आर्या आदि का निम्न मन्त्रों से पूजन करना चाहिए । यथा -ॐ आर्यायै नमः, ॐ प्रज्ञायै नमः, ॐ प्रभायै नमः, ॐ मेधायै नमः, ॐ शान्त्यै नमः, ॐ काल्यै नमः, ॐ धृत्यै नमः, ॐ मत्यै नम्हसप्तम आवरण में पूर्वादि दिशाओं के क्रम से स्वर्ण जैसी आभा वाली धरा आदि की इस प्रकार पूजा करनी चाहिए । यथा -ॐ धरायै नमः, ॐ उमायै नमः, ॐ पावन्यै नमः, ॐ पद्मायै नमः, ॐ शान्तायै नमः, ॐ अमोघायै नमः, ॐ जयायै नमः, ॐ अमलायै नमः, अष्टम आवरण में पूर्वादि दिशओं के क्रम से अनन्त आदि ८ रुद्रों की निम्न मन्त्रों से पूजा करनी चाहिए । यथा -ॐ अनन्ताय नमः, ॐ सूक्श्माय नमः, ॐ शिवोत्तमाय नमःॐ एकनेत्राय नमः, ॐ एकरुद्राय नमः, ॐ त्रिमूर्तये नमः, ॐ श्रीकण्ठाय नमः, ॐ शिखण्डिने नमः, नवम आवरण में उत्तर दिशा से विलोग क्रम द्वारा उमा आदि की निम्न मन्त्रों से पूजा करनी चाहिए । यथा -ॐ उमायै नमः, उत्तरे, ॐ चण्डेश्वराय नमः वायव्ये, ॐ नन्दिने नमः पश्चिमे, ॐ महाकालाय नमः, नैऋत्ये, ॐ गणेशाय नमः दक्षिणे, ॐ वृषभाय नमः आग्नेये, ॐ भृङ्गरिटिने नमः पूर्वे, ॐ स्कन्दाय नमः ऐशान्ये, फिर दशम आवरण में पूर्व आदि दिशाओं में ब्राह्यी आदि मातृकाओं का निम्न मन्त्रों से पूजन करना चाहिए । यथा -ॐ ब्राह्ययै नमः, ॐ माहेश्वर्यै नमः, ॐ कौमार्यै नमः, ॐ वैष्णव्यै नमः ॐ वाराह्यै नमः ॐ इन्द्राण्यै नमः, ॐ चामुण्डायै नमः, ॐ महालक्ष्म्यै नमः, ।इसके बाद भूपुर में अपनी अपनी दिशाओं में इन्द्रादि दश दिक्पालोम का निम्न मन्त्रों से पूजन करना चाहिए । यथा – ॐ लं इन्द्राय नमःॐ रं अग्नये नमः ॐ मं यमाय नमः ॐ लं इन्द्राय नमःॐ वं वरुणाय नमः ॐ यं वायवे नमः ॐ क्षं निऋत्ये नमःॐ ईशानाय नमः, ॐ आं ब्रह्मणे नमः, ॐ ह्रीं अनन्तयाय नमःफिर भूपुर के बाहर पूर्वादि दिशाओं में वज्रादि आयुधों की इस प्रकार पूजा करनी चाहिए । यथा -ॐ शं शक्तये नमः, ॐ दं दण्डाय नमः, ॐ वं वज्राय नमः, ॐ पां पाशय नमः, ॐ अं अंकुशाय नमः, ॐ गं गदायै नमः, ॐ शूं शूलाय नमः, ॐ चं चक्राय नमः, ॐ पं पद्‌माय नमः, इस प्रकार आवरण पूजा करने के बाद धूप दीपादि उपचारों से विधिवत् भगवान् महामृत्युञ्जय का पूजन करना चाहिए ॥२६-३९॥काम्यप्रयोग – जन्म नक्षत्र से १० वें नक्षत्र में अथवा २१ में गुडूची की चारअंगुल वाली समिधाओं से जो व्यक्ति हवन करता है वह अपने रोग एवं शत्रुओं काविनाश कर संपत्ति प्राप्त करता है और पुत्र पौत्रों के साथ आमोद पूर्वक सौवर्ष तक जीवित रहता है ॥३९-४१॥संपत्ति प्राप्त करने के लिए श्रीफलकी समिधाओं से हवन करना चाहिए । ब्रह्मवर्चस् वृद्धि के लिए पलाश वृक्ष कीलकडी से होम करना चाहिए । धन प्राप्ति के लिए बरगद की समिधाओं से तथा कान्तबढाने के लिए खदिर की समिधाओं से हवन करना चाहिए ॥४१-४२॥अधर्म नाशके लिए तिलों से और शत्रुनाश के लिए सररों का होम करना चाहिए । खीर का होमकरने कान्ति, लक्ष्मी तथा कीर्ति प्राप्त होती है । दही का होम परप्रयुक्तकृत्या एवं अपमृत्यु का नाश करता है तथा विवाद में सफलता है ॥४२-४४॥इन सभी आहुतियों में होम की संख्या दश हजार कही गई है ॥४४॥तीनपत्तों वाले तीन तीन दूर्वाओं के १०८ होम से रोग नष्ट होते है । जोव्यक्ति अपने वर्षगांठ के दिन त्रिमधुर (घी, मधु और शर्करा) मिश्रित खीर सेहोम करता है जीवन में उसकी लक्ष्मी, आरोग्य एवं कीर्ति का विस्तार होता है॥४५-४६॥जन्म नक्षत्र से तीन नक्षत्र पर्यन्त गुडूची एवं बकुल (मालश्रीं) की समिधाओं से होम करने से मनुष्यों का रोग एवं अपमृत्यु दूर होजाता है ॥४६-४७॥अपमृत्यु को नष्ट करने के लिए प्रतिदिन दूर्वाओं काहोम करना चाहिए । इस विषय में हम विशेष क्या कहें भगवान् शिव उपासना सेमनुष्यों को समस्त अभीष्ट फल देते हैं ॥४७-४९॥ज्वर नष्ट करने केलिए अपामार्ग की समिधाओं का होम करना चाहिए । तथा समस्त अभिलषित प्राप्तिहेतु दुग्ध में डुबोये गये गियोय के टुकडो से एक मास पर्यन्त होम करनाचाहिए ॥४८-४९॥ .
3.. ( पाशुपतास्त्र मंत्र साधना एवं सिद्धि )
शिव का एक भीषण शूलास्त्र जिसे अर्जुन ने तपस्या करके प्राप्त किया था। महाभारतका युद्ध हुआ, उसमें भगवान्‌ शंकरका दिया हुआ पाशुपतास्त्र अर्जुनके पास था, भगवान्‌ शंकरने कह दिया कि तुम्हें चलाना नहीं पड़ेगा । यह तुम्हारे पास पड़ा-पड़ा विजय कर देगा, चलानेकी जरूरत नहीं, चला दोगे तो संसारमें प्रलय हो जायगा । इसलिये चलाना नहीं ।
इस पाशुपत स्तोत्र का मात्र एक बार जप करने पर ही मनुष्य समस्त विघ्नों का नाश कर सकता है । सौ बार जप करने पर समस्त उत्पातो को नष्ट कर सकता है तथा युद्ध आदि में विजय प्राप्त कर सकता है । इस मंत्र का घी और गुग्गल से हवं करने से मनुष्य असाध्य कार्यो को पूर्ण कर सकता है । इस पाशुपातास्त्र मंत्र के पाठ मात्र से समस्त क्लेशो की शांति हो जाती है ।
यह अत्यन्त प्रभावशाली व शीघ्र फलदायी प्रयोग है। यदि मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ गुरू के निर्देशानुसार संपादित करे तो अवश्य फायदा मिलेगा। शनिदेव शिव भक्त भी हैं और शिव के शिष्य भी हैं। शनि के गुरु शिव होने के कारण इस अमोघ प्रयोग का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। यदि किसी साधारण व्यक्ति के भी गुरु की कोई आवभगत करें तो वह कितना प्रसन्न होता है। फिर शनिदेव अपने गुरु की उपासना से क्यों नहीं प्रसन्न होंगे। इस स्तोत्र के पाठ से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और शिव की प्रसन्नता से शनिदेव खुश होकर संबंधित व्यक्ति को अनुकूल फल प्रदान करते हैं। साथ ही एक विशेषता यह भी परिलक्षित होती है कि संबंधित व्यक्ति में ऐसी क्षमता आ जाती है कि वह शनिदेव के द्वारा प्राप्त दण्ड भी बड़ी सरलता से स्वीकार कर लेता है। साथ ही वह अपने जीवन में ऐसा कोई अशुभ कर्म भी नहीं करता जिससे उस पर शनिदेव भविष्य में भी नाराज हों।
यह किसी भी कार्य के लिए अमोघ राम बाण है। अन्य सारी बाधाओं को दूर करने के साथ ही युवक-युवतियों के लिए यह अकाटय प्रयोग माना ही नहीं जाता अपितु इसका अनेक अनुभूत प्रयोग किया जा चुका है। जिस वर या कन्या के विवाह में विलंब होता है, यदि इस पाशुपत-स्तोत्र का प्रयोग करें तो निश्चित रूप से शीघ्र ही उन्हें दाम्पत्य सुख का लाभ मिलता है। केवल इतना ही नहीं, अन्य सांसारिक कष्टों को दूर करने के लिए भी पाठ या जप, हवन, तर्पण, मार्जन आदि
.पाशुपतास्त्र स्तोत्रम
इस पाशुपत स्तोत्र का मात्र एक बार जप करने पर ही मनुष्य समस्त विघ्नों का नाश कर सकता है । सौ बार जप करने पर समस्त उत्पातो को नष्ट कर सकता है तथा युद्ध आदि में विजय प्राप्त के सकता है । इस मंत्र का घी और गुग्गल से हवं करने से मनुष्य असाध्य कार्यो को पूर्ण कर सकता है । इस पाशुपातास्त्र मंत्र के पाठ मात्र से समस्त क्लेशो की शांति हो जाती है ।
स्तोत्रम
ॐ नमो भगवते महापाशुपतायातुलबलवीर्यपराक्रमाय त्रिपन्चनयनाय नानारुपाय नानाप्रहरणोद्यताय सर्वांगडरक्ताय भिन्नांजनचयप्रख्याय श्मशान वेतालप्रियाय सर्वविघ्ननिकृन्तन रताय सर्वसिध्दिप्रदाय भक्तानुकम्पिने असंख्यवक्त्रभुजपादाय तस्मिन् सिध्दाय वेतालवित्रासिने शाकिनीक्षोभ जनकाय व्याधिनिग्रहकारिणे पापभन्जनाय सूर्यसोमाग्नित्राय विष्णु कवचाय खडगवज्रहस्ताय यमदण्डवरुणपाशाय रूद्रशूलाय ज्वलज्जिह्राय सर्वरोगविद्रावणाय ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनागक्षय कारिणे ।
ॐ कृष्णपिंग्डलाय फट । हूंकारास्त्राय फट । वज्र हस्ताय फट । शक्तये फट । दण्डाय फट । यमाय फट । खडगाय फट । नैऋताय फट । वरुणाय फट । वज्राय फट । पाशाय फट । ध्वजाय फट । अंकुशाय फट । गदायै फट । कुबेराय फट । त्रिशूलाय फट । मुदगराय फट । चक्राय फट । पद्माय फट । नागास्त्राय फट । ईशानाय फट । खेटकास्त्राय फट । मुण्डाय फट । मुण्डास्त्राय फट । काड्कालास्त्राय फट । पिच्छिकास्त्राय फट । क्षुरिकास्त्राय फट । ब्रह्मास्त्राय फट । शक्त्यस्त्राय फट । गणास्त्राय फट । सिध्दास्त्राय फट । पिलिपिच्छास्त्राय फट । गंधर्वास्त्राय फट । पूर्वास्त्रायै फट । दक्षिणास्त्राय फट । वामास्त्राय फट । पश्चिमास्त्राय फट । मंत्रास्त्राय फट । शाकिन्यास्त्राय फट । योगिन्यस्त्राय फट । दण्डास्त्राय फट । महादण्डास्त्राय फट । नमोअस्त्राय फट । शिवास्त्राय फट । ईशानास्त्राय फट । पुरुषास्त्राय फट । अघोरास्त्राय फट । सद्योजातास्त्राय फट । हृदयास्त्राय फट । महास्त्राय फट । गरुडास्त्राय फट । राक्षसास्त्राय फट । दानवास्त्राय फट । क्षौ नरसिन्हास्त्राय फट । त्वष्ट्रास्त्राय फट । सर्वास्त्राय फट । नः फट । वः फट । पः फट । फः फट । मः फट । श्रीः फट । पेः फट । भूः फट । भुवः फट । स्वः फट । महः फट । जनः फट । तपः फट । सत्यं फट । सर्वलोक फट । सर्वपाताल फट । सर्वतत्व फट । सर्वप्राण फट । सर्वनाड़ी फट । सर्वकारण फट । सर्वदेव फट । ह्रीं फट । श्रीं फट । डूं फट । स्त्रुं फट । स्वां फट । लां फट । वैराग्याय फट । मायास्त्राय फट । कामास्त्राय फट । क्षेत्रपालास्त्राय फट । हुंकरास्त्राय फट । भास्करास्त्राय फट । चंद्रास्त्राय फट । विघ्नेश्वरास्त्राय फट । गौः गां फट । स्त्रों स्त्रौं फट । हौं हों फट । भ्रामय भ्रामय फट । संतापय संतापय फट । छादय छादय फट । उन्मूलय उन्मूलय फट । त्रासय त्रासय फट । संजीवय संजीवय फट । विद्रावय विद्रावय फट । सर्वदुरितं नाशय नाशय फट ।
आर्थिक विघ्नों के निवारण हेतु पशुपतिनाथ मंत्र.
” ॐ श्रीं पशु हुं फट् ।

4….मृतसञ्जीवन स्तोत्रम्
एवमारध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयमेश्वरं ।मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा ॥१॥
गौरीपति मृत्युञ्जयेश्र्वर भगवान् शंकरकी विधिपूर्वक आराधना करनेके पश्र्चात भक्तको सदा मृतसञ्जीवन नामक कवचका सुस्पष्ट पाठ करना चाहिये ॥१॥
सारात् सारतरं पुण्यं गुह्याद्गुह्यतरं शुभं । महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकं ॥ २॥
समाहितमना भूत्वा शृणुष्व कवचं शुभं । शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ॥३॥
[आचार्य शिष्यको उपदेश करते हैं कि – हे वत्स! ] अपने मनको एकाग्र करके इस मृतसञ्जीवन कवचको सुनो । यह परम कल्याणकारी दिव्य कवच है । इसकी गोपनीयता सदा बनाये रखना ॥३॥
वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवितः । मृत्युञ्जयो महादेवः प्राच्यां मां पातु सर्वदा ॥४॥
जरासे अभय करनेवाले, निरन्तर यज्ञ करनेवाले, सभी देवतओंसे आराधित हे मृत्युञ्जय महादेव ! आप पर्व-दिशामें मेरी सदा रक्षा करें ॥४॥
दधाअनः शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुजः प्रभुः ।सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ॥५॥
अभय प्रदान करनेवाली शक्तिको धारण करनेवाले, तीन मुखोंवाले तथा छ: भुजओंवाले, अग्रिरूपी प्रभु सदाशिव अग्रिकोणमें मेरी सदा रक्षा करें ॥५॥
अष्टदसभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभुः । यमरूपि महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु ॥६॥
अट्ठारह भुजाओंसे युक्त, हाथमें दण्ड और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, सर्वत्र व्याप्त यमरुपी महादेव शिव दक्षिण-दिशामें मेरी सदा रक्षा करें ॥६॥
खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवितः । रक्षोरूपी महेशो मां नैरृत्यां सर्वदावतु ॥७॥
हाथमें खड्ग और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, धैर्यशाली, दैत्यगणोंसे आराधित रक्षोरुपी महेश नैर्ऋत्यकोणमें मेरी सदा रक्षा करें ॥७॥
पाशाभयभुजः सर्वरत्नाकरनिषेवितः । वरुणात्मा महादेवः पश्चिमे मां सदावतु ॥८॥
हाथमें अभयमुद्रा और पाश धाराण करनेवाले, शभी रत्नाकरोंसे सेवित, वरुणस्वरूप महादेव भगवान् शंकर पश्चिम- दिशामें मेरी सदा रक्षा करें ॥८॥
गदाभयकरः प्राणनायकः सर्वदागतिः । वायव्यां मारुतात्मा मां शङ्करः पातु सर्वदा ॥९॥
हाथोंमें गदा और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, प्राणोमके रक्षाक, सर्वदा गतिशील वायुस्वरूप शंकरजी वायव्यकोणमें मेरी सदा रक्षा करें ॥९॥
शङ्खाभयकरस्थो मां नायकः परमेश्वरः । सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्करः प्रभुः ॥१०॥
हाथोंमें शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले नायक (सर्वमार्गद्रष्टा) सर्वात्मा सर्वव्यापक परमेश्वर भगवान् शिव समस्त दिशाओंके मध्यमें मेरी रक्षा करें ॥१०॥
शूलाभयकरः सर्वविद्यानमधिनायकः । ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वरः ॥११॥
हाथोंमें.में शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, सभी विद्याओंके स्वामी, ईशानस्वरूप भगवान् परमेश्व शिव ईशानकोणमें मेरी रक्षा करें ॥११॥
ऊर्ध्वभागे ब्रःमरूपी विश्वात्माऽधः सदावतु । शिरो मे शङ्करः पातु ललाटं चन्द्रशेखरः॥१२॥
ब्रह्मरूपी शिव मेरी ऊर्ध्वभागमें तथा विश्वात्मस्वरूप शिव अधोभागमें मेरी सदा रक्षा करें । शंकर मेरे सिरकी और चन्द्रशेखर मेरे ललाटकी रक्षा करें ॥१२॥
भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु । भ्रूयुग्मं गिरिशः पातु कर्णौ पातु महेश्वरः ॥१३॥
मेरे भौंहोंके मध्यमें सर्वलोकेश और दोनों नेत्रोंकी त्रिनेत्र भगवान् शंकर रक्षा करें, दोनों भौंहोंकी रक्षा गिरिश एवं दोनों कानोंको रक्षा भगवान् महेश्वर करें ॥१३॥
नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वजः । जिह्वां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु ॥१४॥
महादेव मेरी नासीकाकी तथा वृषभध्वज मेरे दोनों ओठोंकी सदा रक्षा करें । दक्षिणामूर्ति मेरी जिह्वाकी तथा गिरिश मेरे दाँतोंकी रक्षा करें ॥१४॥
मृतुय्ञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषणः । पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम ॥१५॥
मृत्युञ्जय मेरे मुखकी एवं नागभूषण भगवान् शिव मेरे कण्ठकी रक्षा करें । पिनाकी मेरे दोनों हाथोंकी तथा त्रिशूली मेरे हृदयकी रक्षा करें ॥१५॥
पञ्चवक्त्रः स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वरः । नाभिं पातु विरूपाक्षः पार्श्वौ मे पार्वतीपतिः ॥१६॥
पञ्चवक्त्र मेरे दोनों स्तनोकी और जगदीश्वर मेरे उदरकी रक्षा करें । विरूपाक्ष नाभिकी और पार्वतीपति पार्श्वभागकी रक्षा करें ॥१६॥
कटद्वयं गिरीशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिपः । गुह्यं महेश्वरः पातु ममोरू पातु भैरवः ॥१७॥
गिरीश मेरे दोनों कटिभागकी तथा प्रमथाधिप पृष्टभागकी रक्षा करें । महेश्वर मेरे गुह्यभागकी और भैरव मेरे दोनों ऊरुओंकी रक्षा करें ॥१७॥
जानुनी मे जगद्दर्ता जङ्घे मे जगदम्बिका । पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्यः सदाशिवः ॥१८॥
जगद्धर्ता मेरे दोनों घुटनोंकी, जगदम्बिका मेरे दोनों जंघोकी तथा लोकवन्दनीय सदाशिव निरन्तर मेरे दोनों पैरोंकी रक्षा करें ॥१८॥
गिरिशः पातु मे भार्यां भवः पातु सुतान्मम । मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायकः ॥१९॥
गिरीश मेरी भार्याकी रक्षा करें तथा भव मेरे पुत्रोंकी रक्षा करें । मृत्युञ्जय मेरे आयुकी गणनायक मेरे चित्तकी रक्षा करें ॥१९॥
सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकालः सदाशिवः । एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभम् ॥२०॥
कालोंके काल सदाशिव मेरे सभी अंगोकी रक्षा करें । [ हे वत्स ! ] देवताओंके लिये भी दुर्लभ इस पवित्र कवचका वर्णन मैंने तुमसे किया है ॥२०॥
मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम् । सह्स्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम् ॥२१॥
महादेवजीने मृतसञ्जीवन नामक इस कवचको कहा है । इस कवचकी सहस्त्र आवृत्तिको पुरश्चरण कहा गया है ॥२१॥
यः पठेच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेत्सु समाहितः । सकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते ॥२२॥
जो अपने मनको एकाग्र करके नित्य इसका पाठ करता है, सुनता अथावा दूसरोंको सुनाता है, वह अकाल मृत्युको जीतकर पूर्ण आयुका उपयोग करता है ॥ २२॥
हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ । आधयोव्याध्यस्तस्य न भवन्ति कदाचन ॥२३॥
जो व्यक्ति अपने हाथसे मरणासन्न व्यक्तिके शरीसका स्पर्श करते हुए इस मृतसञ्जीवन कवचका पाठ करता है, उस आसन्नमृत्यु प्राणीके भीतर चेतनता आ जाती है । फिर उसे कभी आधि-व्याधि नहीं होतीं ॥२३॥
कालमृयुमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा । अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तमः ॥२४॥
यह मृतसञ्जीवन कवच कालके गालमें गये हुए व्यक्तिको भी जीवन प्रदान कर ‍देता है और वह मानवोत्तम अणिमा आदि गुणोंसे युक्त ऐश्वर्यको प्राप्त करता है ॥२४॥..
जो प्रात:काल उठकर इस कल्याणकारी कवच सदा पाठ करता है, उसे इस लोक तथा परलोकमें भी अक्षय्य सुख प्राप्त होता है ॥२७॥
सर्वव्याधिविनिर्मृक्तः सर्वरोगविवर्जितः । अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिकः ॥२८॥
वह सम्पूर्ण व्याधियोंसे मुक्त हो जाता है, सब प्रकारके रोग उसके शरीरसे भाग जाते हैं । वह अजर-अमर होकर सदाके लिये सोलह वर्षवाला व्यक्ति बन जाता है ॥२८॥
विचरव्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान् । तस्मादिदं महागोप्यं कवचम् समुदाहृतम् ॥२९॥
इस लोकमें दुर्लभ भोगोंको प्राप्त कर सम्पूर्ण लोकोंमें विचरण करता रहता है । इसलिये इस महागोपनीय कवचको मृतसञ्जीवन नामसे कहा है ॥२९॥
मृतसञ्जीवनं नाम्ना देवतैरपि दुर्लभम् ॥३०॥
यह देवतओंके लिय भी दुर्लभ है ॥३०॥
॥ इति वसिष्ठ कृत मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ॥
5…रुद्राष्टाध्यायी में अन्य मंत्रों के साथ इस मंत्र का भी उल्लेख मिलता है। शिव और रुद्र परस्पर एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। शिव को ही रुद्र कहा जाता है क्योंकि- रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: यानि की भोले सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं। हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं। रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारे पटक-से पातक कर्म भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है।
रूद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है कि- सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका: अर्थात् सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रूद्र की आत्मा हैं।
हमारे शास्त्रों में विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक के पूजन के निमित्त अनेक द्रव्यों तथा पूजन सामग्री को बताया गया है। साधक रुद्राभिषेक पूजन विभिन्न विधि से तथा विविध मनोरथ को लेकर करते हैं। किसी खास मनोरथ की पूर्ति के लिये तदनुसार पूजन सामग्री तथा विधि से रुद्राभिषेक की जाती है।
रुद्राभिषेक के विभिन्न पूजन के लाभ इस प्रकार हैं-
• जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है।
• असाध्य रोगों को शांत करने के लिए कुशोदक से रुद्राभिषेक करें।
• भवन-वाहन के लिए दही से रुद्राभिषेक करें।
• लक्ष्मी प्राप्ति के लिये गन्ने के रस से रुद्राभिषेक करें।
• धन-वृद्धि के लिए शहद एवं घी से अभिषेक करें।
• तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
• इत्र मिले जल से अभिषेक करने से बीमारी नष्ट होती है ।
• पुत्र प्राप्ति के लिए दुग्ध से और यदि संतान उत्पन्न होकर मृत पैदा हो तो गोदुग्ध से रुद्राभिषेक करें।
• रुद्राभिषेक से योग्य तथा विद्वान संतान की प्राप्ति होती है।
• ज्वर की शांति हेतु शीतल जल/गंगाजल से रुद्राभिषेक करें।
• सहस्रनाम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए घृत की धारा से रुद्राभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।
• प्रमेह रोग की शांति भी दुग्धाभिषेक से हो जाती है।
• शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने पर जडबुद्धि वाला भी विद्वान हो जाता है।
• सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है।
• शहद के द्वारा अभिषेक करने पर यक्ष्मा (तपेदिक) दूर हो जाती है।
• पातकों को नष्ट करने की कामना होने पर भी शहद से रुद्राभिषेक करें।
• गो दुग्ध से तथा शुद्ध घी द्वारा अभिषेक करने से आरोग्यता प्राप्त होती है।
• पुत्र की कामनावाले व्यक्ति शक्कर मिश्रित जल से अभिषेक करें।
ऐसे तो अभिषेक साधारण रूप से जल से ही होता है। परन्तु विशेष अवसर पर या सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि पर्व के दिनों मंत्र गोदुग्ध या अन्य दूध मिला कर अथवा केवल दूध से भी अभिषेक किया जाता है। विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग अथवा सब को मिला कर पंचामृत से भी अभिषेक किया जाता है। तंत्रों में रोग निवारण हेतु अन्य विभिन्न वस्तुओं से भी अभिषेक करने का विधान है। इस प्रकार विविध द्रव्यों से शिवलिंग का विधिवत् अभिषेक करने पर अभीष्ट कामना की पूर्ति होती है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी पुराने नियमित रूप से पूजे जाने वाले शिवलिंग का अभिषेक बहुत ही उत्तम फल देता है। किन्तु यदि पारद के शिवलिंग का अभिषेक किया जाय तो बहुत ही शीघ्र चमत्कारिक शुभ परिणाम मिलता है। रुद्राभिषेक का फल बहुत ही शीघ्र प्राप्त होता है। वेदों में विद्वानों ने इसकी भूरि भूरि प्रशंसा की गयी है। पुराणों में तो इससे सम्बंधित अनेक कथाओं का विवरण प्राप्त होता है।
वेदों और पुराणों में रुद्राभिषेक के बारे में तो बताया गया है कि रावण ने अपने दसों सिरों को काट कर उसके रक्त से शिवलिंग का अभिषेक किया था तथा सिरों को हवन की अग्नि को अर्पित कर दिया था। जिससे वो त्रिलोकजयी हो गया। भष्मासुर ने शिव लिंग का अभिषेक अपनी आंखों के आंसुओ से किया तो वह भी भगवान के वरदान का पात्र बन गया।
रुद्राभिषेक करने की तिथियां
कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, चतुर्थी, पंचमी, अष्टमी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या, शुक्लपक्ष की द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, नवमी, द्वादशी, त्रयोदशी तिथियों में अभिषेक करने से सुख-समृद्धि संतान प्राप्ति एवं ऐश्वर्य प्राप्त होता है। कालसर्प योग, गृहकलेश, व्यापार में नुकसान, शिक्षा में रुकावट सभी कार्यो की बाधाओं को दूर करने के लिए रुद्राभिषेक आपके अभीष्ट सिद्धि के लिए फलदायक है।
किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वास का विचार करने पर अनुष्ठान अवश्य सफल होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है। प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, अमावस्या तथा शुक्लपक्ष की द्वितीया व नवमी के दिन भगवान शिव माता गौरी के साथ होते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है।
कृष्णपक्ष की चतुर्थी, एकादशी तथा शुक्लपक्ष की पंचमी व द्वादशी तिथियों में भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर होते हैं और उनकी अनुकंपा से परिवार में आनंद-मंगल होता है।
कृष्णपक्ष की पंचमी, द्वादशी तथा शुक्लपक्ष की षष्ठी व त्रयोदशी तिथियों में महादेव नंदी पर सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते है। अत: इन तिथियों में रुद्राभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है।
कृष्णपक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी तथा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, पूर्णिमा में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं। अतएव इन तिथियों में किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर उनकी साधना भंग होती है जिससे अभिषेककर्ता पर विपत्ति आ सकती है।
कृष्णपक्ष की द्वितीया, नवमी तथा शुक्लपक्ष की तृतीया व दशमी में महादेव देवताओं की सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं। इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने पर संताप या दुख मिलता है।
कृष्णपक्ष की तृतीया, दशमी तथा शुक्लपक्ष की चतुर्थी व एकादशी में सदाशिव क्रीडारत रहते हैं। इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चन संतान को कष्ट प्रदान करते है।
कृष्णपक्ष की षष्ठी, त्रयोदशी तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी व चतुर्दशी में रुद्रदेव भोजन करते हैं। इन तिथियों में सांसारिक कामना से किया गया रुद्राभिषेक पीडा देते हैं।
ज्योर्तिलिंग-क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, श्रावण के सोमवार आदि पर्वो में शिव-वास का विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है। वस्तुत: शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिव को शीघ्र प्रसन्न करके साधक को उनका कृपापात्र बना देता है और उनकी सारी समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाती हैं। अतः हम यह कह सकते हैं कि रुद्राभिषेक से मनुष्य के सारे पाप-ताप धुल जाते हैं। स्वयं श्रृष्टि कर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है की जब हम अभिषेक करते है तो स्वयं महादेव साक्षात् उस अभिषेक को ग्रहण करते है। संसार में ऐसी कोई वस्तु, वैभव, सुख नही है जो हमें रुद्राभिषेक से प्राप्त न हो सके।
सुख-शांति-वैभव और मोक्ष का प्रतीक महाशिवरात्रि
साथ ही महाशिवरात्रि पूजन का प्रभाव हमारे जीवन पर बड़ा ही व्यापक रूप से पड़ता है। सदाशिव प्रसन्न होकर हमें धन-धान्य, सुख-समृधि, यश तथा वृद्धि देते हैं। महाशिवरात्रि पूजन को विधिवत करने से हमें सदाशिव का सानिध्य प्राप्त होता है और उनकी महती कृपा से हमारा कल्याण होता है।
शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता में बताया गया है कि शिवरात्रि व्रत करने से व्यक्ति को भोग एवं मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते हैं। देवताओं के पूछने पर भगवान सदाशिव ने बताया कि शिवरात्रि व्रत करने से महान पुण्य की प्राप्ति तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि परम कल्याणकारी व्रत है जिसके विधिपूर्वक करने से व्यक्ति के दुःख, पीड़ाओं का अंत होता है और उसे इच्छित फल की प्राप्ति होती है।
पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री, धन, सौभाग्य, समृद्धि व आरोग्यता प्राप्त होती है। पूजन करने वाला अपने तप-साधना के बल पर मोक्ष की प्राप्ति करता है। परम कल्याणकारी व्रत महाशिवरात्रि के व्रत को विधि-पूर्वक करने से व्यक्ति के दुःख, पीड़ाओं का अंत होता है और उसे इच्छित फल-प्राप्ति, पति, पत्नी, पुत्र, धन, सौभाग्य, समृद्धि व आरोग्यता प्राप्त होती है तथा वह जीवन में गति और मोक्ष को प्राप्त करते हंस और चिरंतर-काल तक शिव-स्नेही बने रहते हैं और शिव-आशीष प्राप्त करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं।
परोपकार करने के लिए महाशिवरात्रि का दिवस होना भी आवश्यक नहीं है। पुराण में चार प्रकार के शिवरात्रि पूजन का वर्णन है। मासिक शिवरात्रि, प्रथम आदि शिवरात्रि, तथा महाशिवरात्रि। पुराण वर्णित अंतिम शिवरात्रि है-नित्य शिवरात्रि। वस्तुत: प्रत्येक रात्रि ही `शिवरात्रि` है अगर हम उन परम कल्याणकारी आशुतोष भगवान में स्वयं को लीन कर दें तथा कल्याण मार्ग का अनुसरण करें, वही शिवरात्रि का सच्चा व्रत है।
महाशिवरात्रि का व्रत मनोवांछित अभिलाषाओं को पूर्ण करनेवाली तथा परम कल्याणकारी है। देवों-के-देव महादेव की प्रसन्नता की कामना लिये हुए जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनका अभीष्ट मनोरथ पूर्ण होता है तथा वे हमेशा-हमेशा के लिया शिव-सानिध्यता को प्राप्त कर लेते हैं।
6….नीलकंठ अघोर मंत्र स्तोत्र
संकल्प:(विनियोग ):>
ओम अस्य श्री नीलकंठ स्तोत्र-मन्त्रस्य ब्रह्म ऋषि अनुष्टुप छंद :नीलकंठो सदाशिवो देवता ब्रह्म्बीजम पार्वती शक्ति:शिव इति कीलकं मम काय जीव स्वरक्षनार्थे सर्वारिस्ट विनाशार्थेचतुर्विद्या पुरुषार्थ सिद्धिअर्थे भक्ति-मुक्ति
सिद्धिअर्थे श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थे च जपे पाठे विनियोग:
>मंत्र प्रयोग<
ओम नमो नीलकंठाय श्वेत शरीराय नमःसर्पलिंकृत भुषनाय नमः भुजंग परिकराय नाग यग्नोपविताय नमः,अनेक
काल मृत्यु विनाशनाय नमः,युगयुगान्त काल प्रलय प्रचंडाय नमः ज्वलंमुखाय नमः दंष्ट्रा कराल घोर रुपाय नमः
हुं हुं फट स्वाहा,ज्वालामुख मंत्र करालाय नमः,प्रचंडार्क सह्स्त्रान्शु प्रचंडाय नमः कर्पुरामोद परिमलांग सुगंधीताय
नमः इन्द्रनील महानील वज्र वैदूर्यमणि माणिक्य मुकुट भूषणाय नमः श्री अघोरास्त्र मूल मन्त्रस्य नमः
ओम ह्रां स्फुर स्फुर ओम ह्रीं स्फुर स्फुर ओम ह्रूं स्फुर स्फुर अघोर घोरतरस्य नमः रथ रथ तत्र तत्र चट चट कह कह
मद मदन दहनाय नमः
श्री अघोरास्य मूल मन्त्राय नमः ज्वलन मरणभय क्षयं हूं फट स्वाहा अनंत घोर ज्वर मरण भय कुष्ठ व्याधि विनाशनाय नमः डाकिनी शाकिनी ब्रह्मराक्षस दैत्य दानव बन्धनाय नमः अपर पारभुत वेताल कुष्मांड सर्वग्रह विनाशनाय नमः यन्त्र कोष्ठ करालाय नमः सर्वापद विच्छेदाय नमः हूं हूं फट स्वाहा आत्म मंत्र सुरक्ष्नाय नमः
ओम ह्रां ह्रीं ह्रूं नमो भुत डामर ज्वाला वश भूतानां द्वादश भूतानां त्रयोदश भूतानां पंचदश डाकिनीना हन् हन् दह दह
नाशन नाशन एकाहिक द्याहिक चतुराहिक पंच्वाहिक व्यप्ताय नमः
आपादंत सन्निपात वातादि हिक्का कफादी कास्श्वासादिक दह दह छिन्दि छिन्दि श्री महादेव निर्मित स्तम्भन मोहन वश्यआकर्षणों उच्चाटन किलन उद्दासन इति षटकर्म विनाशनाय नमः
अनंत वासुकी तक्षक कर्कोटक शंखपाल विजय पद्म महापद्म एलापत्र नाना नागानां कुलकादी विषं छिन्धि छिन्धि भिन्धि भिन्धि प्रवेशाये शीघ्रं शीघ्रं हूं हूं फट स्वाहा
वातज्वर मरणभय छिन्दि छिन्दि हन् हन्:भुतज्वर प्रेतज्वर पिशाचाज्वर रात्रिज्वर शीतज्वर सन्निपातज्वर ग्रह
ज्वर विषमज्वर कुमारज्वर तापज्वर ब्रह्मज्वर विष्णुज्वर महेशज्वर आवश्यकज्वर कामाग्निविषय ज्वर मरीची- ज्वारादी प्रबल दंडधराय नमः परमेश्वराय नमः
आवेशय आवेशय शीघ्रं शीघ्रं हूं हूं फट स्वाहा चोर मृत्यु ग्रह व्यघ्रासर्पादी विषभय विनाशनाय नमः मोहन मन्त्राणा
पर विद्या छेदन मन्त्राणा, ओम ह्रां ह्रीं ह्रूं कुली लीं लीं हूं क्ष कूं कूं हूं हूं फट स्वाहा, नमो नीलकंठाय नमः दक्षाध्वरहराय
नमः श्री नीलकंठाय नमः ओम
>सूचना <
पाठ जब शुरू हो उन दिनों में एक कप गाय के दूध में एक चम्मच गाय के घी का सेवन करना ही चाहिए जिससे शारीर में बढ़ने वाली गर्मी पर काबू रख सके वर्ना गुदामार्ग से खून बहार आने की संभावना हो सकती हैं इस मंत्र को शिव मंदिर में जाकर शिव जी का पंचोपचार पूजन करके करना चाहिए,कमसे कम एक और ज्यादा से ज्यादा तीन पाठ करने चाहिए १०८ पाठ करने पर यह सिद्ध हो जाता हैं.

7….”पार्थिव में बसे शिव कल्याणकारी”
शिव सनातन देव हैं।दुनियां में जितने भी धर्म है वे किसी न किसी रूप या नाम से शिव की ही अराधना करते है।ये कही गुरू रूप में पूज्य है तो कही निर्गुण,निराकार रूप में।शिव बस एक ही हैं पर लीला वश कइ रूपों में प्रकट होकर जगत का कल्याण करते हैं।शक्ति इनकी क्रिया शक्ति है।सृष्टि में जब कुछ नहीं था तब सृजन हेतु शिव की शक्ति को साकार रूप धारण करना पड़ा और शिव भी साकार रूप में आ पाये इसलिए ये दोनों एक ही हैं।भेद लीला वश होता है।और इसका कारण तो ये ही जानते हैं क्योकिं इनके रहस्य को कोई भी जान नहीं सकता और जो इनकी कृपा से कुछ जान गये उन्होनें कुछ कहा ही नहीं,सभी मौन रह गए।शिव भोले औघड़दानी है इसलिए दाता है सबको कुछ न कुछ देते है,देना उनको बहुत प्रिय है।ये भाव प्रधान देव है,भक्ति से प्रसन्न हो जाते है,तभी तो ये महादेव कहलाते है।मैं आज यहाँ पार्थिव पूजन की विधि दे रहा हूँ इसे कोई भी कम समय में कर शिव की कृपा प्राप्त कर सकता है।शिव सबके अराध्य है एक बार भी दिल से कोई बस कहे “ॐ नमः शिवाय” फिर शिव भक्त के पास क्षण भर में चले आते है।
-:पार्थिव शिव लिंग पूजा विधि:-
पार्थिव शिवलिंग पूजन से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।इस पूजन को कोई भी स्वयं कर सकता है।ग्रह अनिष्ट प्रभाव हो या अन्य कामना की पूर्ति सभी कुछ इस पूजन से प्राप्त हो जाता है।सर्व प्रथम किसी पवित्र स्थान पर पुर्वाभिमुख या उतराभिमुख ऊनी आसन पर बैठकर गणेश स्मरण आचमन,प्राणायाम पवित्रिकरण करके संकल्प करें।दायें हाथ में जल,अक्षत,सुपारी,पान का पता पर एक द्रव्य के साथ निम्न संकल्प करें।
-:संकल्प:-
“ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्री मद् भगवतो महा पुरूषस्य विष्णोराज्ञया पर्वतमानस्य अद्य ब्रह्मणोऽहनि द्वितिये परार्धे श्री श्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति तमे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भारतवर्षे भरतखण्डे जम्बूद्वीपे आर्यावर्तेक देशान्तर्गते बौद्धावतारे अमुक नामनि संवत सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुक तिथौ अमुकवासरे अमुक नक्षत्रे शेषेशु ग्रहेषु यथा यथा राशि स्थानेषु स्थितेषु सत्सु एवं ग्रह गुणगण विशेषण विशिष्टायां अमुक गोत्रोत्पन्नोऽमुक नामाहं मम कायिक वाचिक,मानसिक ज्ञाताज्ञात सकल दोष परिहार्थं श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्तयर्थं श्री मन्महा महामृत्युञ्जय शिव प्रीत्यर्थं सकल कामना सिद्धयर्थं शिव पार्थिवेश्वर शिवलिगं पूजनमह करिष्ये।”
तत्पश्चात त्रिपुण्ड और रूद्राक्ष माला धारण करे और शुद्ध की हुई मिट्टी इस मंत्र से अभिमंत्रित करे…
“ॐ ह्रीं मृतिकायै नमः।”
फिर “वं”मंत्र का उच्चारण करते हुए मिटी् में जल डालकर “ॐ वामदेवाय नमःइस मंत्र से मिलाए।
१.ॐ हराय नमः,
२.ॐ मृडाय नमः,
३.ॐ महेश्वराय नमः बोलते हुए शिवलिंग,माता पार्वती,गणेश,कार्तिक,एकादश रूद्र का निर्माण करे।अब पीतल,तांबा या चांदी की थाली या बेल पत्र,केला पता पर यह मंत्र बोल स्थापित करे,
ॐ शूलपाणये नमः।
अब “ॐ”से तीन बार प्राणायाम कर न्यास करे।
-:संक्षिप्त न्यास विधि:-
विनियोगः-
ॐ अस्य श्री शिव पञ्चाक्षर मंत्रस्य वामदेव ऋषि अनुष्टुप छन्दःश्री सदाशिवो देवता ॐ बीजं नमःशक्तिःशिवाय कीलकम मम साम्ब सदाशिव प्रीत्यर्थें न्यासे विनियोगः।
ऋष्यादिन्यासः-
ॐ वामदेव ऋषये नमः शिरसि।ॐ अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे।ॐ साम्बसदाशिव देवतायै नमः हृदये।ॐ ॐ बीजाय नमः गुह्ये।ॐ नमः शक्तये नमः पादयोः।ॐ शिवाय कीलकाय नमः नाभौ।ॐ विनियोगाय नमः सर्वांगे।
शिव पंचमुख न्यासः ॐ नं तत्पुरूषाय नमः हृदये।ॐ मम् अघोराय नमःपादयोः।ॐ शिं सद्योजाताय नमः गुह्ये।ॐ वां वामदेवाय नमः मस्तके।ॐ यम् ईशानाय नमःमुखे।
कर न्यासः-
ॐ ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः।ॐ नं तर्जनीभ्यां नमः।ॐ मं मध्यमाभ्यां नमः।ॐ शिं अनामिकाभ्यां नमः।ॐ वां कनिष्टिकाभ्यां नमः।ॐ यं करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयादिन्यासः-
ॐ ॐ हृदयाय नमः।ॐ नं शिरसे स्वाहा।ॐ मं शिखायै वषट्।ॐ शिं कवचाय हुम।ॐ वाँ नेत्रत्रयाय वौषट्।ॐ यं अस्त्राय फट्।
“ध्यानम्”
ध्यायेनित्यम महेशं रजतगिरि निभं चारू चन्द्रावतंसं,रत्ना कल्पोज्जवलागं परशुमृग बराभीति हस्तं प्रसन्नम।
पदमासीनं समन्तात् स्तुतम मरगणै वर्याघ्र कृतिं वसानं,विश्वाधं विश्ववन्धं निखिल भय हरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्।
-:प्राण प्रतिष्ठा विधिः-
विनियोगः-
ॐ अस्य श्री प्राण प्रतिष्ठा मन्त्रस्य ब्रह्मा विष्णु महेश्वरा ऋषयःऋञ्यजुःसामानिच्छन्दांसि प्राणख्या देवता आं बीजम् ह्रीं शक्तिः कौं कीलकं देव प्राण प्रतिष्ठापने विनियोगः।
ऋष्यादिन्यासः-
ॐ ब्रह्मा विष्णु रूद्र ऋषिभ्यो नमः शिरसि।ॐ ऋग्यजुः सामच्छन्दोभ्यो नमःमुखे।ॐ प्राणाख्य देवतायै नमःहृदये।ॐआं बीजाय नमःगुह्ये।ॐह्रीं शक्तये नमः पादयोः।ॐ क्रौं कीलकाय नमः नाभौ।ॐ विनियोगाय नमःसर्वांगे। अब न्यास के बाद एक पुष्प या बेलपत्र से शिवलिंग का स्पर्श करते हुए प्राणप्रतिष्ठा मंत्र बोलें।
प्राणप्रतिष्ठा मंत्रः-
ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं शिवस्य प्राणा इह प्राणाःॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं शिवस्य जीव इह स्थितः।ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं शिवस्य सर्वेन्द्रियाणि,वाङ् मनस्त्वक् चक्षुः श्रोत्र जिह्वा घ्राण पाणिपाद पायूपस्थानि इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा।अब नीचे के मंत्र से आवाहन करें।
आवाहन मंत्रः-
ॐ भूः पुरूषं साम्ब सदाशिवमावाहयामि,ॐ भुवः पुरूषं साम्बसदाशिवमावाहयामि,ॐ स्वः पुरूषं साम्बसदाशिवमावाहयामि।अब शिद्ध जल,मधु,गो घृत,शक्कर,हल्दीचूर्ण,रोड़ीचंदन,जायफल,गुलाबजल,दही,एक,एक कर स्नान कराये”,नमःशिवाय”मंत्र का जप करता रहे,फिर चंदन, भस्म,अभ्रक,पुष्प,भांग,धतुर,बेलपत्र से श्रृंगार कर नैवेद्य अर्पण करें तथा मंत्र जप या स्तोत्र का पाठ,भजन करें।अंत में कपूर का आरती दिखा क्षमा प्रार्थना का मनोकामना निवेदन कर अक्षत लेकर निम्न मंत्र से विसर्जन करे,फिर पार्थिव को नदी,कुआँ,या तालाब में प्रवाहित करें।
विसर्जन मंत्रः-
गच्छ गच्छ गुहम गच्छ स्वस्थान महेश्वर पूजा अर्चना काले पुनरगमनाय च।

8….शिवरक्षास्तोत्रं
श्री गणेशाय नमः ॥
विनियोग:
अस्य श्रीशिवरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य याज्ञवल्क्य ऋषिः ॥
श्री सदाशिवो देवता ॥अनुष्टुप् छन्दः ॥
श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थं शिवरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः ॥
चरितं देवदेवस्य महादेवस्य पावनम् ।
अपारं परमोदारं चतुर्वर्गस्य साधनम् ।।1।।
गौरीविनायकोपेतं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रकम् ।
शिवं ध्यात्वा दशभुजं शिवरक्षां पठेन्नरः ॥२॥
गंगाधरः शिरः पातु भालं अर्धेन्दुशेखरः ।
नयने मदनध्वंसी कर्णो सर्पविभूषण ॥३॥
घ्राणं पातु पुरारातिः मुखं पातु जगत्पतिः ।
जिह्वां वागीश्वरः पातु कंधरां शितिकंधरः ॥४॥
श्रीकण्ठः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ विश्वधुरन्धरः ।
भुजौ भूभारसंहर्ता करौ पातु पिनाकधृक् ॥५॥
हृदयं शंकरः पातु जठरं गिरिजापतिः ।
नाभिं मृत्युञ्जयः पातु कटी व्याघ्राजिनाम्बरः ॥६॥
सक्थिनी पातु दीनार्तशरणागतवत्सलः ।
उरू महेश्वरः पातु जानुनी जगदीश्वरः ॥७॥
जङ्घे पातु जगत्कर्ता गुल्फौ पातु गणाधिपः ।
चरणौ करुणासिंधुः सर्वाङ्गानि सदाशिवः ॥८॥
एतां शिवबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स भुक्त्वा सकलान्कामान् शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥९॥
ग्रहभूतपिशाचाद्यास्त्रैलोक्ये विचरन्ति ये ।
दूरादाशु पलायन्ते शिवनामाभिरक्षणात् ॥१०॥
अभयङ्करनामेदं कवचं पार्वतीपतेः ।
भक्त्या बिभर्ति यः कण्ठे तस्य वश्यं जगत्त्रयम् ॥११॥
इमां नारायणः स्वप्ने शिवरक्षां यथाऽऽदिशत् ।
प्रातरुत्थाय योगीन्द्रो याज्ञवल्क्यः तथाऽलिखत् ॥१२॥
॥ इति श्रीयाज्ञवल्क्यप्रोक्तं शिवरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
9…ॐ नमो भगवते सदा-शिवाय । त्र्यम्बक सदा-शिव ! नमस्ते-नमस्ते । ॐ ह्रीं ह्लीं लूं अः एं ऐं महा-घोरेशाय नमः । ह्रीं ॐ ह्रौं शं नमो भगवते सदा-शिवाय ।
सकल-तत्त्वात्मकाय, आनन्द-सन्दोहाय, सर्व-मन्त्र-स्वरूपाय, सर्व-यंत्राधिष्ठिताय, सर्व-तंत्र-प्रेरकाय, सर्व-तत्त्व-विदूराय,सर्-तत्त्वाधिष्ठिताय, ब्रह्म-रुद्रावतारिणे, नील-कण्ठाय, पार्वती-मनोहर-प्रियाय, महा-रुद्राय, सोम-सूर्याग्नि-लोचनाय, भस्मोद्-धूलित-विग्रहाय, अष्ट-गन्धादि-गन्धोप-शोभिताय, शेषाधिप-मुकुट-भूषिताय, महा-मणि-मुकुट-धारणाय, सर्पालंकाराय, माणिक्य-भूषणाय, सृष्टि-स्थिति-प्रलय-काल-रौद्रावताराय, दक्षाध्वर-ध्वंसकाय, महा-काल-भेदनाय, महा-कालाधि-कालोग्र-रुपाय, मूलाधारैक-निलयाय ।
तत्त्वातीताय, गंगा-धराय, महा-प्रपात-विष-भेदनाय, महा-प्रलयान्त-नृत्याधिष्ठिताय, सर्व-देवाधि-देवाय, षडाश्रयाय, सकल-वेदान्त-साराय, त्रि-वर्ग-साधनायानन्त-कोटि-ब्रह्माण्ड-नायकायानन्त-वासुकि-तक्षक-कर्कोट-शङ्ख-कुलिक-पद्म-महा-पद्मेत्यष्ट-महा-नाग-कुल-भूषणाय, प्रणव-स्वरूपाय । ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः, हां हीं हूं हैं हौं हः ।
चिदाकाशायाकाश-दिक्स्वरूपाय, ग्रह-नक्षत्रादि-सर्व-प्रपञ्च-मालिने, सकलाय, कलङ्क-रहिताय, सकल-लोकैक-कर्त्रे, सकल-लोकैक-भर्त्रे, सकल-लोकैक-संहर्त्रे, सकल-लोकैक-गुरवे, सकल-लोकैक-साक्षिणे, सकल-निगम-गुह्याय, सकल-वेदान्त-पारगाय, सकल-लोकैक-वर-प्रदाय, सकल-लोकैक-सर्वदाय, शर्मदाय, सकल-लोकैक-शंकराय ।
शशाङ्क-शेखराय, शाश्वत-निजावासाय, निराभासाय, निराभयाय, निर्मलाय, निर्लोभाय, निर्मदाय, निश्चिन्ताय, निरहङ्काराय, निरंकुशाय, निष्कलंकाय, निर्गुणाय, निष्कामाय, निरुपप्लवाय, निरवद्याय, निरन्तराय, निष्कारणाय, निरातङ्काय, निष्प्रपंचाय, निःसङ्गाय, निर्द्वन्द्वाय, निराधाराय, नीरागाय, निष्क्रोधाय, निर्मलाय, निष्पापाय, निर्भयाय, निर्विकल्पाय, निर्भेदाय, निष्क्रियाय, निस्तुलाय, निःसंशयाय, निरञ्जनाय, निरुपम-विभवाय, नित्य-शुद्ध-बुद्धि-परिपूर्ण-सच्चिदानन्दाद्वयाय, ॐ हसौं ॐ हसौः ह्रीम सौं क्षमलक्लीं क्षमलइस्फ्रिं ऐं क्लीं सौः क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः ।
परम-शान्त-स्वरूपाय, सोहं-तेजोरूपाय, हंस-तेजोमयाय, सच्चिदेकं ब्रह्म महा-मन्त्र-स्वरुपाय, श्रीं ह्रीं क्लीं नमो भगवते विश्व-गुरवे, स्मरण-मात्र-सन्तुष्टाय, महा-ज्ञान-प्रदाय, सच्चिदानन्दात्मने महा-योगिने सर्व-काम-फल-प्रदाय, भव-बन्ध-प्रमोचनाय, क्रों सकल-विभूतिदाय, क्रीं सर्व-विश्वाकर्षणाय ।
जय जय रुद्र, महा-रौद्र, वीर-भद्रावतार, महा-भैरव, काल-भैरव, कल्पान्त-भैरव, कपाल-माला-धर, खट्वाङ्ग-खङ्ग-चर्म-पाशाङ्कुश-डमरु-शूल-चाप-बाण-गदा-शक्ति-भिन्दिपाल-तोमर-मुसल-मुद्-गर-पाश-परिघ-भुशुण्डी-शतघ्नी-ब्रह्मास्त्र-पाशुपतास्त्रादि-महास्त्र-चक्रायुधाय ।
भीषण-कर-सहस्र-मुख-दंष्ट्रा-कराल-वदन-विकटाट्ट-हास-विस्फारित ब्रह्माण्ड-मंडल नागेन्द्र-कुण्डल नागेन्द्र-हार नागेन्द्र-वलय नागेन्द्र-चर्म-धर मृत्युञ्जय त्र्यम्बक त्रिपुरान्तक विश्व-रूप विरूपाक्ष विश्वम्भर विश्वेश्वर वृषभ-वाहन वृष-विभूषण, विश्वतोमुख ! सर्वतो रक्ष रक्ष, ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल स्फुर स्फुर आवेशय आवेशय, मम हृदये प्रवेशय प्रवेशय, प्रस्फुर प्रस्फुर ।
महा-मृत्युमप-मृत्यु-भयं नाशय-नाशय, चोर-भय-मुत्सादयोत्सादय, विष-सर्प-भयं शमय शमय, चोरान् मारय मारय, मम शत्रुनुच्चाट्योच्चाटय, मम क्रोधादि-सर्व-सूक्ष्म-तमात् स्थूल-तम-पर्यन्त-स्थितान् शत्रूनुच्चाटय, त्रिशूलेन विदारय विदारय, कुठारेण भिन्धि भिन्धि, खड्गेन छिन्धि छिन्धि, खट्वांगेन विपोथय विपोथय, मुसलेन निष्पेषय निष्पेषय, वाणैः सन्ताडय सन्ताडय, रक्षांसि भीषय भीषय, अशेष-भूतानि विद्रावय विद्रावय, कूष्माण्ड-वेताल-मारीच-गण-ब्रह्म-राक्षस-गणान् संत्रासय संत्रासय, सर्व-रोगादि-महा-भयान्ममाभयं कुरु कुरु, वित्रस्तं मामाश्वासयाश्वासय, नरक-महा-भयान्मामुद्धरोद्धर, सञ्जीवय सञ्जीवय, क्षुत्-तृषा-ईर्ष्यादि-विकारेभ्यो मामाप्याययाप्यायय दुःखातुरं मामानन्दयानन्दय शिवकवचेन मामाच्छादयाच्छादय ।
मृत्युञ्जय त्र्यंबक सदाशिव ! नमस्ते नमस्ते, शं ह्रीं ॐ ह्रों ।
विशेषः नित्य-पाठ ही फल-दायक
10..भगवान शिव के 19 अवतारों :
1- पिप्पलाद अवतार
मानव जीवन में भगवान शिव के पिप्पलाद अवतार का बड़ा महत्व है। शनि पीड़ा का निवारण पिप्पलाद की कृपा से ही संभव हो सका। कथा है कि पिप्पलाद ने देवताओं से पूछा- क्या कारण है कि मेरे पिता दधीचि जन्म से पूर्व ही मुझे छोड़कर चले गए? देवताओं ने बताया शनिग्रह की दृष्टि के कारण ही ऐसा कुयोग बना। पिप्पलाद यह सुनकर बड़े क्रोधित हुए। उन्होंने शनि को नक्षत्र मंडल से गिरने का श्राप दे दिया। शाप के प्रभाव से शनि उसी समय आकाश से गिरने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक किसी को कष्ट नहीं देंगे। तभी से पिप्पलाद का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है। शिव महापुराण के अनुसार स्वयं ब्रह्मा ने ही शिव के इस अवतार का नामकरण किया था।
पिप्पलादेति तन्नाम चक्रे ब्रह्मा प्रसन्नधी:।
-शिवपुराण शतरुद्रसंहिता 24/61
अर्थात ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर सुवर्चा के पुत्र का नाम पिप्पलाद रखा।
2- नंदी अवतार
भगवान शंकर सभी जीवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भगवान शंकर का नंदीश्वर अवतार भी इसी बात का अनुसरण करते हुए सभी जीवों से प्रेम का संदेश देता है। नंदी (बैल) कर्म का प्रतीक है, जिसका अर्थ है कर्म ही जीवन का मूल मंत्र है। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- शिलाद मुनि ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने शिलाद से संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद ने अयोनिज और मृत्युहीन संतान की कामना से भगवान शिव की तपस्या की। तब भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के यहां पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को भूमि से उत्पन्न एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। भगवान शंकर ने नंदी को अपना गणाध्यक्ष बनाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ।
3- वीरभद्र अवतार
यह अवतार तब हुआ था, जब दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में माता सती ने अपनी देह का त्याग किया था। जब भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने क्रोध में अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसे रोषपूर्वक पर्वत के ऊपर पटक दिया। उस जटा के पूर्वभाग से महाभंयकर वीरभद्र प्रकट हुए। शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है-
क्रुद्ध: सुदष्टïोष्ठïपुट: स धूर्जटिर्जटां तडिद्वह्लिïसटोग्ररोचिषम्।
उत्कृत्य रुद्र: सहसोत्थितो हसन् गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि॥
ततोऽतिकायस्तनुवा स्पृशन्दिवं।
4- भैरव अवतार
शिव महापुराण में भैरव को परमात्मा शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। एक बार भगवान शंकर की माया से प्रभावित होकर ब्रह्मा व विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगे। तब वहां तेज-पुंज के मध्य एक पुरुषाकृति दिखलाई पड़ी। उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने कहा- चंद्रशेखर तुम मेरे पुत्र हो। अत: मेरी शरण में आओ। ब्रह्मा की ऐसी बात सुनकर भगवान शंकर को क्रोध आ गया। उन्होंने उस पुरुषाकृति से कहा- काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात कालराज हैं। भीषण होने से भैरव हैं। भगवान शंकर से इन वरों को प्राप्त कर कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा के पांचवें सिर को काट दिया।
ब्रह्मा का पांचवां सिर काटने के कारण भैरव ब्रह्महत्या के पाप से दोषी हो गए। तब काशी में भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल गई। काशीवासियों के लिए भैरव की भक्ति अनिवार्य बताई गई है।
5- अश्वत्थामा
महाभारत के अनुसार पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के अंशावतार हैं। आचार्य द्रोण ने भगवान शंकर को पुत्र रूप में पाने की लिए घोर तपस्या की थी और भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया था कि वे उनके पुत्र के रूप मे अवतीर्ण होंगे। समय आने पर सवन्तिक रुद्र ने अपने अंश से द्रोण के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में अवतार लिया। ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा अमर हैं तथा वह आज भी धरती पर ही निवास करते हैं। इस विषय में एक श्लोक प्रचलित है-
अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।
अर्थात अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय ये आठों अमर हैं।
शिवमहापुराण(शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे गंगा के किनारे निवास करते हैं। वैसे, उनका निवास कहां हैं, यह नहीं बताया गया है।
6- शरभावतार
भगवान शंकर का छठे अवतार हैं शरभावतार। शरभावतार में भगवान शंकर का स्वरूप आधा मृग (हिरण) तथा शेष शरभ पक्षी (आख्यानिकाओं में वर्णित आठ पैरों वाला जंतु जो शेर से भी शक्तिशाली था) का था। इस अवतार में भगवान शंकर ने नृसिंह भगवान की क्रोधाग्नि को शांत किया था। लिंगपुराण में शिव के शरभावतार की कथा है, उसके अनुसार हिरण्यकश्पू का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंहावतार लिया था।
हिरण्यकश्यपू के वध के पश्चात भी जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवता शिवजी के पास पहुंचे। तब भगवान शिव शरभ के रूप में भगवान नृसिंह के पास पहुंचे तथा उनकी स्तुति की, लेकिन नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत नहीं हुई तो शरभ रूपी भगवान शिव अपनी पूंछ में नृसिंह को लपेटकर ले उड़े। तब भगवान नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत हुई। उन्होंने शरभावतार से क्षमा याचना कर अति विनम्र भाव से उनकी स्तुति की।
7- गृहपति अवतार
भगवान शंकर का सातवां अवतार है गृहपति। इसकी कथा इस प्रकार है- नर्मदा के तट पर धर्मपुर नाम का एक नगर था। वहां विश्वानर नाम के एक मुनि तथा उनकी पत्नी शुचिष्मती रहती थीं। शुचिष्मती ने बहुत काल तक नि:संतान रहने पर एक दिन अपने पति से शिव के समान पुत्र प्राप्ति की इच्छा की। पत्नी की अभिलाषा पूरी करने के लिए मुनि विश्वनार काशी आ गए। यहां उन्होंने घोर तप द्वारा भगवान शिव के वीरेश लिंग की आराधना की।
एक दिन मुनि को वीरेश लिंग के मध्य एक बालक दिखाई दिया। मुनि ने बालरूपधारी शिव की पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने शुचिष्मति के गर्भ से अवतार लेने का वरदान दिया। कालांतर में शुचिष्मती गर्भवती हुई और भगवान शंकर शुचिष्मती के गर्भ से पुत्ररूप में प्रकट हुए। कहते हैं पितामह ब्रह्म ने ही उस बालक का नाम गृहपति रखा था।
8- ऋषि दुर्वासा
भगवान शंकर के विभिन्न अवतारों में ऋषि दुर्वासा का अवतार भी प्रमुख है। धर्म ग्रंथों के अनुसार सती अनुसूइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा के निर्देशानुसार पत्नी सहित ऋक्षकुल पर्वत पर पुत्रकामना से घोर तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों उनके आश्रम पर आए। उन्होंने कहा- हमारे अंश से तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोक में विख्यात तथा माता-पिता का यश बढ़ाने वाले होंगे। समय आने पर ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा हुए, जो देवताओं द्वारा समुद्र में फेंके जाने पर उससे प्रकट हुए। विष्णु के अंश से श्रेष्ठ संन्यास पद्धति को प्रचलित करने वाले दत्त उत्पन्न हुए और रुद्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया। शास्त्रों में इसका उल्लेख है-
अत्रे: पत्न्यनसूया त्रीञ्जज्ञे सुयशस: सुतान्।
दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मïसम्भवान्॥
-भागवत 4/1/15
अर्थ- अत्रि की पत्नी अनुसूइया से दत्तात्रेय, दुर्वासा और चंद्रमा नाम के तीन परम यशस्वी पुत्र हुए। ये क्रमश: भगवान विष्णु, शंकर और ब्रह्मा के अंश से उत्पन्न हुए थे।
9- हनुमान
भगवान शिव का हनुमान अवतार सभी अवतारों में श्रेष्ठ माना गया है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक वानर का रूप धरा था। शिवमहापुराण के अनुसार देवताओं और दानवों को अमृत बांटते हुए विष्णुजी के मोहिनी रूप को देखकर लीलावश शिवजी ने कामातुर होकर वीर्यपात कर दिया।
सप्तऋषियों ने उस वीर्य को कुछ पत्तों में संग्रहीत कर लिया। समय आने पर सप्तऋषियों ने भगवान शिव के वीर्य को वानरराज केसरी की पत्नी अंजनी के कान के माध्यम से गर्भ में स्थापित कर दिया, जिससे अत्यंत तेजस्वी एवं प्रबल पराक्रमी श्री हनुमानजी उत्पन्न हुए।
10- वृषभ अवतार
भगवान शंकर ने विशेष परिस्थितियों में वृषभ अवतार लिया था। इस अवतार में भगवान शंकर ने विष्णु पुत्रों का संहार किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार जब भगवान विष्णु दैत्यों को मारने पाताल लोक गए तो उन्हें वहां बहुत सी चंद्रमुखी स्त्रियां दिखाई पड़ी। विष्णु जी ने उनके साथ रमण करके बहुत से पुत्र उत्पन्न किए, जिन्होंने पाताल से पृथ्वी तक बड़ा उपद्रव किया। उनसे घबराकर ब्रह्माजी ऋषिमुनियों को लेकर शिवजी के पास गए और रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे। तब भगवान शंकर ने वृषभ रूप धारण कर विष्णु पुत्रों का संहार किया।
11- यतिनाथ अवतार
भगवान शंकर ने यतिनाथ अवतार लेकर अतिथि के महत्व का प्रतिपादन किया है। उन्होंने इस अवतार में अतिथि बनकर भील दम्पत्ति की परीक्षा ली थी। भील दम्पत्ति को अपने प्राण गंवाने पड़े। धर्म ग्रंथों के अनुसार अर्बुदाचल पर्वत के समीप शिवभक्त आहुक-आहुका भील दम्पत्ति रहते थे। एक बार भगवान शंकर यतिनाथ के वेष में उनके घर आए। उन्होंने भील दम्पत्ति के घर रात व्यतीत करने की इच्छा प्रकट की। आहुका ने अपने पति को गृहस्थ की मर्यादा का स्मरण कराते हुए स्वयं धनुषबाण लेकर बाहर रात बिताने और यति को घर में विश्राम करने देने का प्रस्ताव रखा।
इस तरह आहुक धनुषबाण लेकर बाहर चला गया। प्रात:काल आहुका और यति ने देखा कि वन्य प्राणियों ने आहुक को मार डाला है। इस पर यतिनाथ बहुत दु:खी हुए। तब आहुका ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि आप शोक न करें। अतिथि सेवा में प्राण विसर्जन धर्म है और उसका पालन कर हम धन्य हुए हैं। जब आहुका अपने पति की चिताग्नि में जलने लगी तो शिवजी ने उसे दर्शन देकर अगले जन्म में पुन: अपने पति से मिलने का वरदान दिया।
12- कृष्णदर्शन अवतार
भगवान शिव ने इस अवतार में यज्ञ आदि धार्मिक कार्यों के महत्व को बताया है। इस प्रकार यह अवतार पूर्णत: धर्म का प्रतीक है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इक्ष्वाकुवंशीय श्राद्धदेव की नवमी पीढ़ी में राजा नभग का जन्म हुआ। विद्या-अध्ययन को गुरुकुल गए। जब बहुत दिनों तक न लौटे तो उनके भाइयों ने राज्य का विभाजन आपस में कर लिया। नभग को जब यह बात ज्ञात हुई तो वह अपने पिता के पास गया। पिता ने नभग से कहा कि वह यज्ञ परायण ब्राह्मणों के मोह को दूर करते हुए उनके यज्ञ को सम्पन्न करके उनके धन को प्राप्त करे।
तब नभग ने यज्ञभूमि में पहुंचकर वैश्य देव सूक्त के स्पष्ट उच्चारण द्वारा यज्ञ संपन्न कराया। अंगारिक ब्राह्मण यज्ञ अवशिष्ट धन नभग को देकर स्वर्ग को चले गए। उसी समय शिवजी कृष्णदर्शन रूप में प्रकट होकर बोले कि यज्ञ के अवशिष्ट धन पर तो उनका अधिकार है। विवाद होने पर कृष्णदर्शन रूपधारी शिवजी ने उसे अपने पिता से ही निर्णय कराने को कहा। नभग के पूछने पर श्राद्धदेव ने कहा-वह पुरुष शंकर भगवान हैं। यज्ञ में अवशिष्ट वस्तु उन्हीं की है। पिता की बातों को मानकर नभग ने शिवजी की स्तुति की।
13- अवधूत अवतार
भगवान शंकर ने अवधूत अवतार लेकर इंद्र के अंहकार को चूर किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार एक समय बृहस्पति और अन्य देवताओं को साथ लेकर इंद्र शंकर जी के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। इंद्र की परीक्षा लेने के लिए शंकरजी ने अवधूत रूप धारण कर उसका मार्ग रोक लिया। इंद्र ने उस पुरुष से अवज्ञापूर्वक बार-बार उसका परिचय पूछा तो भी वह मौन रहा।
इस पर क्रुद्ध होकर इंद्र ने ज्यों ही अवधूत पर प्रहार करने के लिए वज्र छोडऩा चाहा त्यों ही उसका हाथ स्तंभित हो गया। यह देखकर बृहस्पति ने शिवजी को पहचान कर अवधूत की बहुविधि स्तुति की। इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने इंद्र को क्षमा कर दिया।
14- भिक्षुवर्य अवतार
भगवान शंकर देवों के देव हैं। संसार में जन्म लेने वाले हर प्राणी के जीवन के रक्षक भी ही हैं। भगवान शंकर का भिक्षुवर्य अवतार यही संदेश देता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार विदर्भ नरेश सत्यरथ को शत्रुओं ने मार डाला। उसकी गर्भवती पत्नी ने शत्रुओं से छिपकर अपने प्राण बचाए। समय पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया। रानी जब जल पीने के लिए सरोवर गई तो उसे घडिय़ाल ने अपना आहार बना लिया। तब वह बालक भूख-प्यास से तड़पने लगा। इतने में ही शिवजी की प्रेरणा से एक भिखारिन वहां पहुंची।
तब शिवजी ने भिक्षुक का रूप धर उस भिखारिन को बालक का परिचय दिया और उसके पालन-पोषण का निर्देश दिया तथा यह भी कहा कि यह बालक विदर्भ नरेश सत्यरथ का पुत्र है। यह सब कह कर भिक्षुक रूपधारी शिव ने उस भिखारिन को अपना वास्तविक रूप दिखाया। शिव के आदेश अनुसार भिखारिन ने उसे बालक का पालन पोषण किया। बड़ा होकर उस बालक ने शिवजी की कृपा से अपने दुश्मनों को हराकर पुन: अपना राज्य प्राप्त किया।
15- सुरेश्वर अवतार
भगवान शंकर का सुरेश्वर (इंद्र) अवतार भक्त के प्रति उनकी प्रेमभावना को प्रदर्शित करता है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक छोटे से बालक उपमन्यु की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपनी परम भक्ति और अमर पद का वरदान दिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु अपने मामा के घर पलता था। वह सदा दूध की इच्छा से व्याकुल रहता था। उसकी मां ने उसे अपनी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए शिवजी की शरण में जाने को कहा। इस पर उपमन्यु वन में जाकर ऊँ नम: शिवाय का जाप करने लगा।
शिवजी ने सुरेश्वर (इंद्र) का रूप धारण कर उसे दर्शन दिया और शिवजी की अनेक प्रकार से निंदा करने लगा। इस पर उपमन्यु क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए खड़ा हुआ। उपमन्यु को अपने में दृढ़ शक्ति और अटल विश्वास देखकर शिवजी ने उसे अपने वास्तविक रूप के दर्शन कराए तथा क्षीरसागर के समान एक अनश्वर सागर उसे प्रदान किया। उसकी प्रार्थना पर कृपालु शिवजी ने उसे परम भक्ति का पद भी दिया।
16- किरात अवतार
किरात अवतार में भगवान शंकर ने पाण्डुपुत्र अर्जुन की वीरता की परीक्षा ली थी। महाभारत के अनुसार कौरवों ने छल-कपट से पाण्डवों का राज्य हड़प लिया व पाण्डवों को वनवास पर जाना पड़ा। वनवास के दौरान जब अर्जुन भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे, तभी दुर्योधन द्वारा भेजा हुआ मूड़ नामक दैत्य अर्जुन को मारने के लिए शूकर( सुअर) का रूप धारण कर वहां पहुंचा।
अर्जुन ने शूकर पर अपने बाण से प्रहार किया। उसी समय भगवान शंकर ने भी किरात वेष धारण कर उसी शूकर पर बाण चलाया। शिव की माया के कारण अर्जुन उन्हें पहचान न पाया और शूकर का वध उसके बाण से हुआ है, यह कहने लगा। इस पर दोनों में विवाद हो गया। अर्जुन ने किरात वेषधारी शिव से युद्ध किया। अर्जुन की वीरता देख भगवान शिव प्रसन्न हो गए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर अर्जुन को कौरवों पर विजय का आशीर्वाद दिया।
17- सुनटनर्तक अवतार
पार्वती के पिता हिमाचल से उनकी पुत्री का हाथ मागंने के लिए शिवजी ने सुनटनर्तक वेष धारण किया था। हाथ में डमरू लेकर जब शिवजी हिमाचल के घर पहुंचे तो नृत्य करने लगे। नटराज शिवजी ने इतना सुंदर और मनोहर नृत्य किया कि सभी प्रसन्न हो गए।
जब हिमाचल ने नटराज को भिक्षा मांगने को कहा तो नटराज शिव ने भिक्षा में पार्वती को मांग लिया। इस पर हिमाचलराज अति क्रोधित हुए। कुछ देर बाद नटराज वेषधारी शिवजी पार्वती को अपना रूप दिखाकर स्वयं चले गए। उनके जाने पर मैना और हिमाचल को दिव्य ज्ञान हुआ और उन्होंने पार्वती को शिवजी को देने का निश्चय किया।
18- ब्रह्मचारी अवतार
दक्ष के यज्ञ में प्राण त्यागने के बाद जब सती ने हिमालय के घर जन्म लिया तो शिवजी को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया। पार्वती की परीक्षा लेने के लिए शिवजी ब्रह्मचारी का वेष धारण कर उनके पास पहुंचे। पार्वती ने ब्रह्मचारी को देख उनकी विधिवत पूजा की।
जब ब्रह्मचारी ने पार्वती से उसके तप का उद्देश्य पूछा और जानने पर शिव की निंदा करने लगे तथा उन्हें श्मशानवासी व कापालिक भी कहा। यह सुन पार्वती को बहुत क्रोध हुआ। पार्वती की भक्ति व प्रेम को देखकर शिव ने उन्हें अपना वास्तविक स्वरूप दिखाया। यह देख पार्वती अति प्रसन्न हुईं।
19- यक्ष अवतार
यक्ष अवतार शिवजी ने देवताओं के अनुचित और मिथ्या अभिमान को दूर करने के लिए धारण किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार देवताओं व असुरों द्वारा किए गए समुद्रमंथन के दौरान जब भयंकर विष निकला तो भगवान शंकर ने उस विष को ग्रहण कर अपने कंठ में रोक लिया। इसके बाद अमृत कलश निकला। अमृतपान करने से सभी देवता अमर तो हो गए, साथ ही उन्हें अभिमान भी हो गया कि वे सबसे बलशाली हैं।
देवताओं के इसी अभिमान को तोड़ने के लिए शिवजी ने यक्ष का रूप धारण किया व देवताओं के आगे एक तिनका रखकर उसे काटने को कहा। अपनी पूरी शक्ति लगाने पर भी देवता उस तिनके को काट नहीं पाए। तभी आकाशवाणी हुई कि यह यक्ष सब गर्वों के विनाशक शंकर भगवान हैं। सभी देवताओं ने भगवान शंकर की स्तुति की तथा अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी।
11….भगवान शिव को प्रिय है सावन का महीना :
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सावन का महीना आते है हर तरह बम भोले की गूंज सुनाई देने लगती है। इस महीने में भक्तजन भगवान शिव को कांवर में जल लाकर चढ़ाते हैं।
इसका कारण यह है कि सावन भगवान शिव का प्रिय महीना है। लेकिन सावन ही भगवान शिव को सबसे प्रिय क्यों है यह सावल अगर आपके भी मन उठता है तो इसका जवाब है।
शिव का प्रिय सावन, यह है पहला कारण :
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शास्त्र और पुराणों के अनुसार भगवान शिव का प्रिय महीना सावन होने का कई कारण है। इनमें सबसे प्रमुख कारण यह है कि, सती के देहत्याग करने के बाद जब आदिशक्ति ने पार्वती के रुप में जन्म लिया तो इसी महीने में तपस्या करके भगवान शिव को पति रुप में पाने का वरदान प्राप्त किया।
यानी भगवान शिव और पार्वती का मिलन इसी महीने में हुआ था। इसलिए यह महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है।
इसलिए शिव और पृथ्वी वासियों के लिए खास है सावन महीना :
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शिव का प्रिय मास होने का दूसरा बड़ा कारण यह है कि भगवान शिव इस महीने में अपने ससुराल यानी पृथ्वी पर आए थे। शिव जी के ससुराल आने पर आर्घ्य और जलाभिषेक से इनका स्वागत किया गया था।
मान्यता है कि हर वर्ष इस महीने में शिव जी अपने ससुराल पधारते हैं। इसलिए यह महीना उनका प्रिय है और पृथ्वीवासियों के लिए शिव कृपा पाने का उत्तम मास है।
तीसरा कारण जिससे शिव को सावन प्रिय है :
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सागर मंथन के समय जब हालाहल नामक विष सागर से निकला था। उस समय सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने इस विष को अपने गले में धारण कर लिया। यह घटना सावन के महीने में हुआ था।
विष को धारण करने से शिव जी मूर्च्छित हो गए। ब्रह्मा जी के कहने पर देवताओं ने शिव जी का जलाभिषेक किया और जड़ी बूटियों का भोग लगाया। इससे शिव जी की मूर्च्छा दूर हुई। इसके बाद से ही भगवान शिव का जलाभिषेक होने लगा। इस अद्भुत घटना के कारण शिव को सावन अति प्रिय है।
यह है बड़ा कारण जिससे शिव जी को सावन प्रिय है :
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शास्त्रों के अनुसार सावन मास में भगवान शिव योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद सृष्टि के संचालन का उत्तरदायित्व भगवान शिव ग्रहण करते हैं। इसलिए सावन के प्रधान देवता भगवान शिव बन जाते हैं।
यही कारण है कि सावन में अन्य किसी भी देवता की पूजा से शिव की पूजा का कई गुणा फल प्राप्त होता है। इसलिए माना जाता है कि भगवान शिव को सावन सबसे अधिक प्रिय है
12…भोलेनाथ कि महिमा
अतीतः पंथानं तव च महिमा वाड् मनसयो
रतद्व्यावृत्यायं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥२॥
हे प्रभु ! आप मन और वाणी से पर है ईसलिए वाणी से आपकी महिमा का वर्णन कर पाना अस…ंभव है । यही वजह है की वेद आपकी महिमा का वर्णन करते हुए ‘नेति नेति’ (मतलब ये नहि, ये भी नहि) कहकर रुक जाते है । आपकी महिमा और आपके स्वरूप को पूर्णतया जान पाना असंभव है, लेकिन जब आप साकार रूप में प्रकट होते हो तो आपके भक्त आपके स्वरूप का वर्णन करते नहीं थकते । ये आपके प्रति उनके प्यार और पूज्यभाव का परिणाम है ।
महिम्नः पारं ते परमविदुषो यज्ञसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीना मपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ।
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामधि गृणन्
ममाप्येषः स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥१॥
हे प्रभु ! बड़े बड़े पंडित और योगीजन आपके महिमा को नहीं जान पाये तो मैं तो… एक साधारण बालक हूँ, मेरी क्या गिनती ? लेकिन क्या आपके महिमा को पूर्णतया जाने बिना आपकी स्तुति नहीं हो सकती ? मैं ये नहीं मानता क्योंकि अगर ये सच है तो फिर ब्रह्मा की स्तुति भी व्यर्थ कहेलायेगी । मैं तो ये मानता हूँ कि सबको अपनी मति अनुसार स्तुति करने का हक है । इसलिए हे भोलेनाथ ! आप कृपया मेरे हृदय के भाव को देखें और मेरी स्तुति का स्वीकार करें ।
किमिहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं ।
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ॥
अतकर्यैश्वर्येत्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः ।
कुतर्कोडयंकांश्चि न्मुखरयति मोहाय जगतः ॥५॥
हे प्रभु, मूर्ख लोग अक्सर तर्क करते रहते है कि ये सृष्टि की रचना कैसे हु…ई, किसकी ईच्छा से हुई, किन चिजों से उसे बनाया गया वगैरह वगैरह । उनका उद्देश्य लोगों में भ्रांति पैदा करने के अलावा कुछ नहि । सच पूछो तो ये सभी प्रश्नों के उत्तर आपकी दिव्य शक्ति से जुड़े है और मेरी सीमित शक्ति से उसे बयाँ करना असंभव है ।
13..रूद्राभिषेक महत्वपूर्ण पूजा विधि
भोले में समायी है सारी दुनिया. जगत के कण-कण में है महादेव का वास. तभी तो महादेव हर रूप में करते हैं भक्तों का कल्याण. फिर चाहे महादेव की प्रतिमा की पूजा हो या फिर लिंग रूप उनकी आराधना.
धरती पर शिवलिंग को शिव का साक्षात स्वरूप माना जाता है तभी तो शिवलिंग के दर्शन को स्वयं महादेव का दर्शन माना जाता है और इसी मान्यता के चलते भक्त शिवलिंग को मंदिरों में और घरों में स्थापित कर उसकी पूजा अर्चना करते हैं. यू को भोले भंडारी एक छोटी सी पूजा से हो जाते हैं प्रसन्न लेकिन शिव आराधना की सबसे महत्वपूर्ण पूजा विधि रूद्राभिषेक को माना जाता है. रूद्राभिषेक… क्योंकि मान्यता है कि जल की धारा भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है और उसी से हुई है रूद्रभिषेक की उत्पत्ति. रूद्र यानी भगवान शिव और अभिषेक का अर्थ होता है स्नान करना. शुद्ध जल या फिर गंगाजल से महादेव के अभिषेक की विधि सदियों पुरानी है क्योंकि मान्यता है कि भोलभंडारी भाव के भूखे हैं. वह जल के स्पर्श मात्र से प्रसन्न हो जाते हैं. वो पूजा विधि जिससे भक्तों को उनका वरदान ही नहीं मिलता बल्कि हर दर्द हर तकलीफ से छुटकारा भी मिल जाता है.
साधारण रूप से भगवान शिव का अभिषेक जल या गंगाजल से होता है परंतु विशेष अवसर व विशेष मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए दूध, दही, घी, शहद, चने की दाल, सरसों तेल, काले तिल, आदि कई सामग्रियों से महादेव के अभिषेक की विधि प्रचिलत है. तो कैसे महादेव का अभिषेक कर आप उनका आशीर्वाद पाएं उससे पहले ये जानना बहुत जरूरी है कि किस सामग्री से किया गया अभिषेक आपकी कौन सी मनोकामनाओं को पूरा कर सकता है साथ ही रूद्राभिषेक को करने का सही विधि-विधान क्या हो क्योंकि मान्यता है कि अभिषेक के दौरान पूजन विधि के साथ-साथ मंत्रों का जाप भी बेहद आवश्यक माना गया है फिर महामृत्युंजय मंत्र का जाप हो, गायत्री मंत्र हो या फिर भगवान शिव का पंचाक्षरी मंत्र.
१) जल से अभिषेक
- हर तरह के दुखों से छुटकारा पाने के लिए भगवान शिव का जल से अभिषेक करें
- भगवान शिव के बाल स्वरूप का मानसिक ध्यान करें
- ताम्बे के पात्र में ऽशुद्ध जलऽ भर कर पात्र पर कुमकुम का तिलक करें
- ॐ इन्द्राय नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें
- पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय” का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें
- शिवलिंग पर जल की पतली धार बनाते हुए रुद्राभिषेक करें
- अभिषेक करेत हुए ॐ तं त्रिलोकीनाथाय स्वाहा मंत्र का जाप करें
- शिवलिंग को वस्त्र से अच्छी तरह से पौंछ कर साफ करें
२) दूध से अभिषेक
- शिव को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद पाने के लिए दूध से अभिषेक करें
- भगवान शिव के ऽप्रकाशमयऽ स्वरूप का मानसिक ध्यान करें
- ताम्बे के पात्र में ऽदूधऽ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें
- ॐ श्री कामधेनवे नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें
- पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवायऽ का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें
- शिवलिंग पर दूध की पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें.
- अभिषेक करते हुए ॐ सकल लोकैक गुरुर्वै नम: मंत्र का जाप करें
- शिवलिंग को साफ जल से धो कर वस्त्र से अच्छी तरह से पौंछ कर साफ करें
३) फलों का रस
- अखंड धन लाभ व हर तरह के कर्ज से मुक्ति के लिए भगवान शिव का फलों के रस से अभिषेक करें
- भगवान शिव के ऽनील कंठऽ स्वरूप का मानसिक ध्यान करें
- ताम्बे के पात्र में ऽगन्ने का रसऽ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें
- ॐ कुबेराय नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें
- पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें
- शिवलिंग पर फलों का रस की पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें
- अभिषेक करते हुए -ॐ ह्रुं नीलकंठाय स्वाहा मंत्र का जाप करें
- शिवलिंग पर स्वच्छ जल से भी अभिषेक करें
४) सरसों के तेल से अभिषेक
- ग्रहबाधा नाश हेतु भगवान शिव का सरसों के तेल से अभिषेक करें
- भगवान शिव के ऽप्रलयंकरऽ स्वरुप का मानसिक ध्यान करें
- ताम्बे के पात्र में ऽसरसों का तेलऽ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें
- ॐ भं भैरवाय नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें
- पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय” का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें
- शिवलिंग पर सरसों के तेल की पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें.
- अभिषेक करते हुए ॐ नाथ नाथाय नाथाय स्वाहा मंत्र का जाप करें
- शिवलिंग को साफ जल से धो कर वस्त्र से अच्छी तरह से पौंछ कर साफ करे
५) चने की दाल
- किसी भी शुभ कार्य के आरंभ होने व कार्य में उन्नति के लिए भगवान शिव का चने की दाल से अभिषेक करें
- भगवान शिव के ऽसमाधी स्थितऽ स्वरुप का मानसिक ध्यान करें
- ताम्बे के पात्र में ऽचने की दालऽ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें
- ॐ यक्षनाथाय नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें
- पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें
- शिवलिंग पर चने की दाल की धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें
- अभिषेक करेत हुए -ॐ शं शम्भवाय नम: मंत्र का जाप करें
- शिवलिंग को साफ जल से धो कर वस्त्र से अच्छी तरह से पौंछ कर साफ करें
६) काले तिल से अभिषेक
- तंत्र बाधा नाश हेतु व बुरी नजर से बचाव के लिए काले तिल से अभिषेक करें
- भगवान शिव के ऽनीलवर्णऽ स्वरुप का मानसिक ध्यान करें
- ताम्बे के पात्र में ऽकाले तिलऽ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें
- ॐ हुं कालेश्वराय नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें
- पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें
- शिवलिंग पर काले तिल की धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें
- अभिषेक करते हुए -ॐ क्षौं ह्रौं हुं शिवाय नम: का जाप करें
- शिवलिंग को साफ जल से धो कर वस्त्र से अच्छी तरह से पौंछ कर साफ करें
७) शहद मिश्रित गंगा जल
- संतान प्राप्ति व पारिवारिक सुख-शांति हेतु शहद मिश्रित गंगा जल से अभिषेक करें
- भगवान शिव के ऽचंद्रमौलेश्वरऽ स्वरुप का मानसिक ध्यान करें
- ताम्बे के पात्र में ” शहद मिश्रित गंगा जल” भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें
- ॐ चन्द्रमसे नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें
- पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवायऽ का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें
- शिवलिंग पर शहद मिश्रित गंगा जल की पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें
- अभिषेक करते हुए -ॐ वं चन्द्रमौलेश्वराय स्वाहाऽ का जाप करें
- शिवलिंग पर स्वच्छ जल से भी अभिषेक करें
८) घी व शहद
- रोगों के नाश व लम्बी आयु के लिए घी व शहद से अभिषेक करें
- भगवान शिव के ऽत्रयम्बकऽ स्वरुप का मानसिक ध्यान करें
- ताम्बे के पात्र में ऽघी व शहदऽ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें
- ॐ धन्वन्तरयै नम: का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें
- पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय” का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें
- शिवलिंग पर घी व शहद की पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें.
- अभिषेक करते हुए -ॐ ह्रौं जूं स: त्रयम्बकाय स्वाहा” का जाप करें
- शिवलिंग पर स्वच्छ जल से भी अभिषेक करें
९ ) कुमकुम केसर हल्दी
- आकर्षक व्यक्तित्व का प्राप्ति हेतु भगवान शिव का कुमकुम केसर हल्दी से अभिषेक करें
- भगवान शिव के ऽनीलकंठऽ स्वरूप का मानसिक ध्यान करें
- ताम्बे के पात्र में ऽकुमकुम केसर हल्दी और पंचामृतऽ भर कर पात्र को चारों और से कुमकुम का तिलक करें – ऽॐ उमायै नम:ऽ का जाप करते हुए पात्र पर मौली बाधें
- पंचाक्षरी मंत्र ऽॐ नम: शिवायऽ का जाप करते हुए फूलों की कुछ पंखुडियां अर्पित करें
- पंचाक्षरी मंत्र पढ़ते हुए पात्र में फूलों की कुछ पंखुडियां दाल दें-ऽॐ नम: शिवायऽ
- फिर शिवलिंग पर पतली धार बनाते हुए-रुद्राभिषेक करें.
- अभिषेक का मंत्र-ॐ ह्रौं ह्रौं ह्रौं नीलकंठाय स्वाहाऽ
- शिवलिंग पर स्वच्छ जल से भी अभिषेक करें..
14…क्या चढ़ाने से हो सकती है आपकी शिव पूजा बेकार, जानें
भोलेनाथ को देवों के देव यानी महादेव भी कहा जाता है। कहते हैं कि शिव आदि और अनंत हैं। शिव ही एक मात्र ऐसे देवता हैं जिनकी लिंग रूप में भी पूजा जाता है। शिव को प्रसन्न करने के लिए उन्हें अनेक ऐसी चीजें पूजा में अर्पित की जाती हैं जो और किसी देवता को नहीं चढ़ाई जाती। जैसे आंक, बिल्वपत्र, भांग आदि। लेकिन शास्त्रों के अनुसार, कुछ चीज़ें शिव पूजा में कभी उपयोग नहीं करनी चाहिए…
हल्दी
धार्मिक कार्यों में हल्दी का महत्वपूर्ण स्थान है। कई पूजन कार्य हल्दी के बिना पूर्ण नहीं माने जाते। लेकिन हल्दी, शिवजी के अलावा सभी देवी-देवताओं को अर्पित की जाती है। हल्दी का स्त्री सौंदर्य प्रसाधन में मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग पुरुषत्व का प्रतीक है, इसी वजह से महादेव को हल्दी इसीलिए नहीं चढ़ाई जाती है। शिवलिंग पर हल्दी नहीं चढ़ाना चाहिए परंतु जलाधारी पर चढ़ाई जानी चाहिए। शिवलिंग दो भागों से मिलकर बनी होती है। एक भाग शिवजी का प्रतीक है और दूसरा हिस्सा माता पार्वती का। शिवलिंग चूंकि पुरुषत्व का प्रतिनिधित्व करता है अत: इस पर हल्दी नहीं चढ़ाई जाती है। हल्दी स्त्री सौंदर्य प्रसाधन की सामग्री है और जलाधारी मां पार्वती से संबंधित है अत: इस पर हल्दी जाती है।
फूल
शिव को कनेर, और कमल के अलावा लाल रंग के फूल प्रिय नहीं हैं। शिव को केतकी और केवड़े के फूल चढ़ाने का निषेध किया गया है। सफेद रंग के फूलों से शिव जल्दी प्रसन्न होते हैं। कारण शिव कल्याण के देवता हैं। सफेद शुभ्रता का प्रतीक रंग है। जो शुभ्र है, सौम्य है, शाश्वत है वह श्वेत भाव वाला है। यानि सात्विक भाव वाला। पूजा में शिव को आक और धतूरा के फूल अत्यधिक प्रिय हैं। इसका कारण शिव वनस्पतियों के देवता हैं। अन्य देवताओं को जो फूल बिल्कुल नहीं चढ़ाए जाते, वे शिव को प्रिय हैं। उन्हें मौलसिरी चढ़ाने का उल्लेख मिलता है। एक धारना के अनुसार, शिव पूजा में तरह-तरह के फूलों को चढ़ाने से अलग-अलग तरह की इच्छाएं पूरी हो जाती है। जानिए किस कामना के लिए कैसा फूल शिव को चढ़ाएं.. वाहन सुख के लिए चमेली का फूल। दौलतमंद बनने के लिए कमल का फूल, शंखपुष्पी या बिल्वपत्र। विवाह में समस्या दूर करने के लिए बेला के फूल। इससे योग्य वर-वधू मिलते हैं। पुत्र प्राप्ति के लिए धतुरे का लाल फूल वाला धतूरा शिव को चढ़ाएं। यह न मिलने पर सामान्य धतूरा ही चढ़ाएं। मानसिक तनाव दूर करने के लिए शिव को शेफालिका के फूल चढ़ाएं। जूही के फूल को अर्पित करने से अपार अन्न-धन की कमी नहीं होती।
अगस्त्य के फूल से शिव पूजा करने पर पद, सम्मान मिलता है। शिव पूजा में कनेर के फूलों के अर्पण से वस्त्र-आभूषण की इच्छा पूरी होती है। लंबी आयु के लिए दुर्वाओं से शिव पूजन करें। सुख-शांति और मोक्ष के लिए महादेव की सफेद कमल के फूलों से पूजा करें।
अनाज
इसी तरह भगवान शिव की प्रसन्नता से मनोरथ पूरे करने के लिए शिव पूजा में कई तरह के अनाज चढ़ाने का महत्व बताया गया है। इसलिए श्रद्धा और आस्था के साथ इस उपाय को भी करना न चूकें। जानिए किस अन्न के चढ़ावे से कैसी कामना पूरी होती है…शिव पूजा में गेहूं से बने व्यंजन चढ़ाने पर कुंटुब की वृद्धि होती है। मूंग से शिव पूजा करने पर हर सुख और ऐश्वर्य मिलता है। चने की दाल अर्पित करने पर श्रेष्ठ जीवन साथी मिलता है। कच्चे चावल अर्पित करने पर कलह से मुक्ति और शांति मिलती है। तिलों से शिवजी पूजा और हवन में एक लाख आहुतियां करने से हर पाप का अंत हो जाता है। उड़द चढ़ाने से ग्रहदोष और खासतौर पर शनि पीड़ा शांति होती है।
भगवान शिव के १२ ज्योर्तिलिंग देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित हैं. जिसे साक्षात शिवस्वरूप माना जाता है. शास्त्रों के मुताबिक हर दिन भगवान शिव २४ घंटे में एक बार शिवलिंग में स्थित होते हैं इसलिए अपनी राशि के मुताबिक ज्योर्तिर्लिंग का ध्यान करते हुए शिव आराधना करने से विशेष लाभ मिलते हैं…शिव की पूजा के बाद ऽह्रीं ओम नमः शिवाय ह्रींऽ इस मंत्र का १०८ बार जप करें. शहद, गु़ड़, गन्ने का रस, लाल पुष्प चढ़ाएं. इस राशि के व्यक्ति मल्लिकार्जुन का ध्यान करते हुए ऽओम नमः शिवायऽ मंत्र का जप करें और कच्चे दूध, दही, श्वेत पुष्प चढ़ाएं. महाकालेश्वर का ध्यान करते हुए ऽओम नमो भगवते रूद्रायऽ मंत्र का यथासंभव जप करें. हरे फलों का रस, मूंग, बेलपत्र आदि चढाएं. शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए ऽओम हौं जूं सःऽ मंत्र का जितना संभव हो जप करें और शिवलिंग पर कच्चा दूध, मक्खन, मूंग, बेलपत्र आदि चढाएं. ऽओम त्र्यंबकं यजामहे सुगंधि पुष्टिवर्धनम, उर्वारूकमिव बन्ध्नान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्.ऽ इस मंत्र का कम से कम ५१ बार जप करें. इसके साथ ही ज्योतिर्लिंग पर शहद, गु़ड़, शुद्ध घी, लाल पुष्प आदि चढाएं. ओम नमो भगवते रूद्रायऽ मंत्र का यथासंभव जप करें. हरे फलों का रस, बिल्वपत्र, मूंग, हरे व नीले पुष्प. शिव पंचाक्षरी मंत्र ऽओम नमः शिवायऽ का १०८ बार जप करें और दूध, दही, घी, मक्खन, मिश्री चढ़ाएं.
‘ह्रीं ओम नमः शिवाय ह्रींऽ मंत्र का जप करें और शहद, शुद्ध घी, गु़ड़, बेलपत्र, लाल पुष्प शिवलिंग पर अर्पित करें.
इस राशि वाले ऽओम तत्पुरूषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रूद्रः प्रचोदयात॥ऽ इस मंत्र से शिव की पूजा करें. धनु राशि वाले मंत्र जाप के अलावा शिवलिंग पर शुद्ध घी, शहद, मिश्री, बादाम, पीले पुष्प, पीले फल चढ़ाएं. त्रयम्बकेश्वर का ध्यान करते हुए ऽओम नमः शिवायऽ मंत्र का ५ माला जप करें. इसके अलावा भगवान शिव का सरसों का तेल, तिल का तेल, कच्चा दूध, जामुन, नीले पुष्प से अभिषेक करें. कुंभ राशि के स्वामी भी शनि देव हैं इसलिए इस राशि के व्यक्ति भी मकर राशि की तरह ऽओम नमः शिवायऽ का जप करें. जप के समय केदरनाथ का ध्यान करें. कच्चा दूध, सरसों का तेल, तिल का तेल, नीले पुष्प चढाएं. ओम तत्पुरूषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रूद्र प्रचोदयात॥ इस मंत्र का जितना अधिक हो सके जप करें. गन्ने का रस, शहद, बादाम, बेलपत्र, पीले पुष्प, पीले फल चढाएं.

*********|| शिव अमोघ कवच ||*****************
अस्य श्री शिवकवच स्तोत्रमहामन्त्रस्य ऋषभयोगीश्वर ऋषिः ।
अनुष्टुप् छन्दः ।
श्रीसाम्बसदाशिवो देवता ।
ॐ बीजम् ।
नमः शक्तिः ।
शिवायेति कीलकम् ।
मम साम्बसदाशिवप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥
करन्यासः
ॐ सदाशिवाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । नं गङ्गाधराय तर्जनीभ्यां नमः । मं मृत्युञ्जयाय मध्यमाभ्यां नमः ।
शिं शूलपाणये अनामिकाभ्यां नमः । वां पिनाकपाणये कनिष्ठिकाभ्यां नमः । यम् उमापतये करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
हृदयादि अङ्गन्यासः
ॐ सदाशिवाय हृदयाय नमः । नं गङ्गाधराय शिरसे स्वाहा । मं मृत्युञ्जयाय शिखायै वषट् ।
शिं शूलपाणये कवचाय हुम् । वां पिनाकपाणये नेत्रत्रयाय वौषट् । यम् उमापतये अस्त्राय फट् । भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥
ध्यानम्
वज्रदंष्ट्रं त्रिनयनं कालकण्ठ मरिन्दमम् ।
सहस्रकरमत्युग्रं वन्दे शम्भुम् उमापतिम् ॥
रुद्राक्षकङ्कणलसत्करदण्डयुग्मः पालान्तरालसितभस्मधृतत्रिपुण्ड्रः ।
पञ्चाक्षरं परिपठन् वरमन्त्रराजं ध्यायन् सदा पशुपतिं शरणं व्रजेथाः ॥
अतः परं सर्वपुराणगुह्यं निःशेषपापौघहरं पवित्रम् ।
जयप्रदं सर्वविपत्प्रमोचनं वक्ष्यामि शैवम् कवचं हिताय ते ॥
पञ्चपूजा
लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि ।
हम् आकाशात्मने पुष्पैः पूजयामि ।
यं वाय्वात्मने धूपम् आघ्रापयामि ।
रम् अग्न्यात्मने दीपं दर्शयामि ।
वम् अमृतात्मने अमृतं महानैवेद्यं निवेदयामि ।
सं सर्वात्मने सर्वोपचारपूजां समर्पयामि ॥
मन्त्रःऋषभ उवाच
नमस्कृत्य महादेवं विश्वव्यापिनमीश्वरम् ।
वक्ष्ये शिवमयं वर्म सर्वरक्षाकरं नृणाम् ॥ 1 ॥
शुचौ देशे समासीनो यथावत्कल्पितासनः ।
जितेन्द्रियो जितप्राणश्चिन्तयेच्छिवमव्ययम् ॥ 2 ॥
हृत्पुण्डरीकान्तरसन्निविष्टं स्वतेजसा व्याप्तनभो‌உवकाशम् ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममनन्तमाद्यं ध्यायेत् परानन्दमयं महेशम् ॥
ध्यानावधूताखिलकर्मबन्ध- श्चिरं चिदानन्द निमग्नचेताः ।
षडक्षरन्यास समाहितात्मा शैवेन कुर्यात्कवचेन रक्षाम् ॥
मां पातु देवो‌உखिलदेवतात्मा संसारकूपे पतितं गभीरे ।
तन्नाम दिव्यं परमन्त्रमूलं धुनोतु मे सर्वमघं हृदिस्थम् ॥
सर्वत्र मां रक्षतु विश्वमूर्ति- र्ज्योतिर्मयानन्दघनश्चिदात्मा ।
अणोरणियानुरुशक्तिरेकः स ईश्वरः पातु भयादशेषात् ॥
यो भूस्वरूपेण बिभर्ति विश्वं पायात्स भूमेर्गिरिशो‌உष्टमूर्तिः ।
यो‌உपां स्वरूपेण नृणां करोति सञ्जीवनं सो‌உवतु मां जलेभ्यः ॥
कल्पावसाने भुवनानि दग्ध्वा सर्वाणि यो नृत्यति भूरिलीलः ।
स कालरुद्रो‌உवतु मां दवाग्नेः वात्यादिभीतेरखिलाच्च तापात् ॥
प्रदीप्तविद्युत्कनकावभासो विद्यावराभीति कुठारपाणिः ।
चतुर्मुखस्तत्पुरुषस्त्रिनेत्रः प्राच्यां स्थितो रक्षतु मामजस्रम् ॥
कुठारखेटाङ्कुश शूलढक्का- कपालपाशाक्ष गुणान्दधानः ।
चतुर्मुखो नीलरुचिस्त्रिनेत्रः पायादघोरो दिशि दक्षिणस्याम् ॥
कुन्देन्दुशङ्खस्फटिकावभासो वेदाक्षमाला वरदाभयाङ्कः ।
त्र्यक्षश्चतुर्वक्त्र उरुप्रभावः सद्यो‌உधिजातो‌உवतु मां प्रतीच्याम् ॥
वराक्षमालाभयटङ्कहस्तः सरोजकिञ्जल्कसमानवर्णः ।
त्रिलोचनश्चारुचतुर्मुखो मां पायादुदीच्यां दिशि वामदेवः ॥
वेदाभयेष्टाङ्कुशटङ्कपाश- कपालढक्काक्षरशूलपाणिः ।
सितद्युतिः पञ्चमुखो‌உवतान्माम् ईशान ऊर्ध्वं परमप्रकाशः ॥
मूर्धानमव्यान्मम चन्द्रमौलिः भालं ममाव्यादथ भालनेत्रः ।
नेत्रे ममाव्याद्भगनेत्रहारी नासां सदा रक्षतु विश्वनाथः ॥
पायाच्छ्रुती मे श्रुतिगीतकीर्तिः कपोलमव्यात्सततं कपाली ।
वक्त्रं सदा रक्षतु पञ्चवक्त्रो जिह्वां सदा रक्षतु वेदजिह्वः ॥
कण्ठं गिरीशो‌உवतु नीलकण्ठः पाणिद्वयं पातु पिनाकपाणिः ।
दोर्मूलमव्यान्मम धर्मबाहुः वक्षःस्थलं दक्षमखान्तको‌உव्यात् ॥
ममोदरं पातु गिरीन्द्रधन्वा मध्यं ममाव्यान्मदनान्तकारी ।
हेरम्बतातो मम पातु नाभिं पायात्कटिं धूर्जटिरीश्वरो मे ॥
ऊरुद्वयं पातु कुबेरमित्रो जानुद्वयं मे जगदीश्वरो‌உव्यात् ।
जङ्घायुगं पुङ्गवकेतुरव्यात् पादौ ममाव्यात्सुरवन्द्यपादः ॥
महेश्वरः पातु दिनादियामे मां मध्ययामे‌உवतु वामदेवः ।
त्रिलोचनः पातु तृतीययामे वृषध्वजः पातु दिनान्त्ययामे ॥
पायान्निशादौ शशिशेखरो मां गङ्गाधरो रक्षतु मां निशीथे ।
गौरीपतिः पातु निशावसाने मृत्युञ्जयो रक्षतु सर्वकालम् ॥
अन्तःस्थितं रक्षतु शङ्करो मां स्थाणुः सदा पातु बहिःस्थितं माम् ।
तदन्तरे पातु पतिः पशूनां सदाशिवो रक्षतु मां समन्तात् ॥
तिष्ठन्तमव्याद् भुवनैकनाथः पायाद्व्रजन्तं प्रमथाधिनाथः ।
वेदान्तवेद्यो‌உवतु मां निषण्णं मामव्ययः पातु शिवः शयानम् ॥
मार्गेषु मां रक्षतु नीलकण्ठः शैलादिदुर्गेषु पुरत्रयारिः ।
अरण्यवासादि महाप्रवासे पायान्मृगव्याध उदारशक्तिः ॥
कल्पान्तकालोग्रपटुप्रकोप- स्फुटाट्टहासोच्चलिताण्डकोशः ।
घोरारिसेनार्णव दुर्निवार- महाभयाद्रक्षतु वीरभद्रः ॥
पत्त्यश्वमातङ्गरथावरूथिनी- सहस्रलक्षायुत कोटिभीषणम् ।
अक्षौहिणीनां शतमाततायिनां छिन्द्यान्मृडो घोरकुठार धारया ॥
निहन्तु दस्यून्प्रलयानलार्चिः ज्वलत्त्रिशूलं त्रिपुरान्तकस्य । शार्दूलसिंहर्क्षवृकादिहिंस्रान् सन्त्रासयत्वीशधनुः पिनाकः ॥
दुः स्वप्न दुः शकुन दुर्गति दौर्मनस्य- दुर्भिक्ष दुर्व्यसन दुःसह दुर्यशांसि । उत्पाततापविषभीतिमसद्ग्रहार्तिं व्याधींश्च नाशयतु मे जगतामधीशः ॥
ॐ नमो भगवते सदाशिवाय
सकलतत्वात्मकाय सर्वमन्त्रस्वरूपाय सर्वयन्त्राधिष्ठिताय सर्वतन्त्रस्वरूपाय सर्वतत्वविदूराय ब्रह्मरुद्रावतारिणे नीलकण्ठाय पार्वतीमनोहरप्रियाय सोमसूर्याग्निलोचनाय भस्मोद्धूलितविग्रहाय महामणि मुकुटधारणाय माणिक्यभूषणाय सृष्टिस्थितिप्रलयकाल- रौद्रावताराय दक्षाध्वरध्वंसकाय महाकालभेदनाय मूलधारैकनिलयाय तत्वातीताय गङ्गाधराय सर्वदेवादिदेवाय षडाश्रयाय वेदान्तसाराय त्रिवर्गसाधनाय अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायकाय अनन्त वासुकि तक्षक- कर्कोटक शङ्ख कुलिक- पद्म महापद्मेति- अष्टमहानागकुलभूषणाय प्रणवस्वरूपाय चिदाकाशाय आकाश दिक् स्वरूपाय ग्रहनक्षत्रमालिने सकलाय कलङ्करहिताय सकललोकैककर्त्रे सकललोकैकभर्त्रे सकललोकैकसंहर्त्रे सकललोकैकगुरवे सकललोकैकसाक्षिणे सकलनिगमगुह्याय सकलवेदान्तपारगाय सकललोकैकवरप्रदाय सकललोकैकशङ्कराय सकलदुरितार्तिभञ्जनाय सकलजगदभयङ्कराय शशाङ्कशेखराय शाश्वतनिजावासाय निराकाराय निराभासाय निरामयाय निर्मलाय निर्मदाय निश्चिन्ताय निरहङ्काराय निरङ्कुशाय निष्कलङ्काय निर्गुणाय निष्कामाय निरूपप्लवाय निरुपद्रवाय निरवद्याय निरन्तराय निष्कारणाय निरातङ्काय निष्प्रपञ्चाय निस्सङ्गाय निर्द्वन्द्वाय निराधाराय नीरागाय निष्क्रोधाय निर्लोपाय निष्पापाय निर्भयाय निर्विकल्पाय निर्भेदाय निष्क्रियाय निस्तुलाय निःसंशयाय निरञ्जनाय निरुपमविभवाय नित्यशुद्धबुद्धमुक्तपरिपूर्ण- सच्चिदानन्दाद्वयाय परमशान्तस्वरूपाय परमशान्तप्रकाशाय तेजोरूपाय तेजोमयाय तेजो‌உधिपतये जय जय रुद्र महारुद्र महारौद्र भद्रावतार महाभैरव कालभैरव कल्पान्तभैरव कपालमालाधर खट्वाङ्ग चर्मखड्गधर पाशाङ्कुश- डमरूशूल चापबाणगदाशक्तिभिन्दिपाल- तोमर मुसल मुद्गर पाश परिघ- भुशुण्डी शतघ्नी चक्राद्यायुधभीषणाकार- सहस्रमुखदंष्ट्राकरालवदन विकटाट्टहास विस्फारित ब्रह्माण्डमण्डल नागेन्द्रकुण्डल नागेन्द्रहार नागेन्द्रवलय नागेन्द्रचर्मधर नागेन्द्रनिकेतन मृत्युञ्जय त्र्यम्बक त्रिपुरान्तक विश्वरूप विरूपाक्ष विश्वेश्वर वृषभवाहन विषविभूषण विश्वतोमुख सर्वतोमुख मां रक्ष रक्ष ज्वलज्वल प्रज्वल प्रज्वल महामृत्युभयं शमय शमय अपमृत्युभयं नाशय नाशय रोगभयम् उत्सादयोत्सादय विषसर्पभयं शमय शमय चोरान् मारय मारय मम शत्रून् उच्चाटयोच्चाटय त्रिशूलेन विदारय विदारय कुठारेण भिन्धि भिन्धि खड्गेन छिन्द्दि छिन्द्दि खट्वाङ्गेन विपोधय विपोधय मुसलेन निष्पेषय निष्पेषय बाणैः सन्ताडय सन्ताडय यक्ष रक्षांसि भीषय भीषय अशेष भूतान् विद्रावय विद्रावय कूष्माण्डभूतवेतालमारीगण- ब्रह्मराक्षसगणान् सन्त्रासय सन्त्रासय मम अभयं कुरु कुरु मम पापं शोधय शोधय वित्रस्तं माम् आश्वासय आश्वासय नरकमहाभयान् माम् उद्धर उद्धर अमृतकटाक्षवीक्षणेन मां- आलोकय आलोकय सञ्जीवय सञ्जीवय क्षुत्तृष्णार्तं माम् आप्यायय आप्यायय दुःखातुरं माम् आनन्दय आनन्दय शिवकवचेन माम् आच्छादय आच्छादय
हर हर मृत्युञ्जय त्र्यम्बक सदाशिव परमशिव नमस्ते नमस्ते नमः ॥
पूर्ववत् – हृदयादि न्यासः ।
पञ्चपूजा ॥
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्विमोकः ॥
फलश्रुतिः%
ऋषभ उवाच इत्येतत्परमं शैवं कवचं व्याहृतं मया ।
सर्व बाधा प्रशमनं रहस्यं सर्व देहिनाम् ॥
यः सदा धारयेन्मर्त्यः शैवं कवचमुत्तमम् ।
न तस्य जायते कापि भयं शम्भोरनुग्रहात् ॥
क्षीणायुः प्राप्तमृत्युर्वा महारोगहतो‌உपि वा ।
सद्यः सुखमवाप्नोति दीर्घमायुश्च विन्दति ॥
सर्वदारिद्रयशमनं सौमाङ्गल्यविवर्धनम् ।
यो धत्ते कवचं शैवं स देवैरपि पूज्यते ॥
महापातकसङ्घातैर्मुच्यते चोपपातकैः ।
देहान्ते मुक्तिमाप्नोति शिववर्मानुभावतः ॥
त्वमपि श्रद्दया वत्स शैवं कवचमुत्तमम् ।
धारयस्व मया दत्तं सद्यः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि ॥
श्रीसूत उवाच
इत्युक्त्वा ऋषभो योगी तस्मै पार्थिव सूनवे ।
ददौ शङ्खं महारावं खड्गं च अरिनिषूदनम् ॥
पुनश्च भस्म संमन्त्र्य तदङ्गं परितो‌உस्पृशत् ।
गजानां षट्सहस्रस्य त्रिगुणस्य बलं ददौ ॥
भस्मप्रभावात् सम्प्राप्तबलैश्वर्य धृति स्मृतिः ।
स राजपुत्रः शुशुभे शरदर्क इव श्रिया ॥
तमाह प्राञ्जलिं भूयः स योगी नृपनन्दनम् ।
एष खड्गो मया दत्तस्तपोमन्त्रानुभावतः ॥
शितधारमिमं खड्गं यस्मै दर्शयसे स्फुटम् ।
स सद्यो म्रियते शत्रुः साक्षान्मृत्युरपि स्वयम् ॥
अस्य शङ्खस्य निर्ह्रादं ये शृण्वन्ति तवाहिताः ।
ते मूर्च्छिताः पतिष्यन्ति न्यस्तशस्त्रा विचेतनाः ॥
खड्गशङ्खाविमौ दिव्यौ परसैन्यविनाशकौ ।
आत्मसैन्यस्वपक्षाणां शौर्यतेजोविवर्धनौ ॥
एतयोश्च प्रभावेन शैवेन कवचेन च ।
द्विषट्सहस्र नागानां बलेन महतापि च ॥
भस्मधारण सामर्थ्याच्छत्रुसैन्यं विजेष्यसे ।
प्राप्य सिंहासनं पित्र्यं गोप्ता‌உसि पृथिवीमिमाम् ॥
इति भद्रायुषं सम्यगनुशास्य समातृकम् ।
ताभ्यां सम्पूजितः सो‌உथ योगी स्वैरगतिर्ययौ ॥
इति श्रीस्कान्दमहापुराणे ब्रह्मोत्तरखण्डे शिवकवच प्रभाव वर्णनं नाम द्वादशो‌உध्यायः सम्पूर्णः ॥

*************|| शिव ताण्डव स्तोत्रम् ||******************************
ये वो शिव-ताण्डव-स्तोत्रम् है जिसे पढ़ कर रावण ने महादेव को प्रसन्न कर लिया था

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् |
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वय
चकार चण्ड्ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् || १||

जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावक
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम || २||

धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे |
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे( क्वचिच्चिदंबरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि || ३||

लताभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वध मुखे |
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि || ४|

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः |
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः || ५||

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
-निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् |
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः || ६||

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके |
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
- प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ||| ७||

नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः |
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः || ८||

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
- वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् |
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकछिदं तमंतकच्छिदं भजे || ९|

अखर्व( अगर्व) सर्वमङ्गलाकलाकदंबमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृंभणामधुव्रतम् |
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे || १०||

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-
- द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् |
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः || ११||

स्पृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-
- गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः |
तृष्णारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः ( समं प्रवर्तयन्मनः) कदा सदाशिवं भजे || १२||

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् |
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् || १३||

इदम् हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम्
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् || १४||

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः
शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे |
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शंभुः || १५||

सम्पूर्ण शिव- ताण्डव- स्तोत्रम्

.विशेषः- इस प्रकार के मन्त्र उग्र प्रकृति के होते है। स्व-रक्षा व गुरु निर्देशन के अभाव में प्रयुक्त करना हानिकारक है तथा सामाजिक व नैतिक दृष्टि से अनुचित भी। यहाँ पर मात्र प्राचीन विद्या के संरक्षण हेतु प्रस्तुत किये ।

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