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दश महाविद्या प्रयोग
१ : प्रथम महाविद्या काली : काली मंत्र किसी भी प्रकार की सफलता के लिए उपयुक्त है इस विद्या के प्रयोग से कोई भी बाधा सामने नहीं आती है |
२ : द्वितीय महाविद्या तारा : तारा [ कंकाल मालिनी ] यह सिद्ध विद्या शत्रुओ के नाश करने के लिए व जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए विशेष लाभदाई है |
३ : तृतीय महाविद्या षोडशी : षोडशी [ श्रीविद्या त्रिपुरा ललिता त्रिपुर सुंदरी ] यह सिद्ध विद्या और मोक्ष दात्री है जीवन में पूर्ण सफलता व आर्थिक दृष्टि से उच्च कोटि की सफलता के लिए इस मंत्र की साधना करे |
४ : चतुर्थ महा विद्या भुवनेश्वरी : भुवनेश्वरी [राजराजेश्वरी ] की साधना से विद्या प्राप्त वशीकरण सम्मोहन आदि कार्यो की सिद्धि के लिए इस महाविद्या का प्रयोग करे इस मंत्र के जप से [करे या कराये] वशीकरण प्रयोग विशेषत: लाभ प्राप्त होता है |
५ : पंचम महाविद्या छिन्नमस्ता : छिन्नमस्ता की साधना से मोक्ष विद्या प्राप्त होती है | विशेषत: शत्रु नाश व् शत्रु पराजय तथा मुक़दमे में विजय के लिए इस महाविद्या का प्रयोग किया जाता है |
६ : षष्टम महाविद्या त्रिपुरभैरवी : त्रिपुरभैरवी [ सिद्ध भैरवी ] की साधना से रोग शांति आर्थिक उन्नति सर्वत्र विजय व्यापर में सर्वोपरि होने के लिए त्रिपुरभैरवी का प्रयोग करे |
७ : सप्तम महाविद्या धूमावती : धूमावती [ लक्ष्मी ] की साधना से पुत्र लाभ धन लाभ और शत्रु पर विजय प्राप्ति के लिए अत्यंत लाभ दायक है |
८ : अष्टम महाविद्या बंगलामुखी : इस अनुष्ठान को सावधानी पूर्वक करना चाहिए,नहीं तो विपरीत प्रभाव पड़ सकता है | इस मन्त्र के प्रभाव से [ जप कराने से ] शत्रुओ पर विजय एवं मुकदमो में विजय प्राप्ति तथा विशेष आर्थिक उन्नति के लाभ है |
९ : नवम महाविद्या मातंगी : मातंगी [ सुमुखी उच्चिस्थ चंडालिक ] इसके अनुष्ठान से जीवन में पूर्णता और विवाह के लिए प्रयोग किया जाता है, मनोकामनापूर्ति के लिए इस मन्त्र का प्रयोग करे |
१० : दशम महाविद्या कमला : कमला [ लक्ष्मी नारायणी ] इस मन्त्र के अनुष्ठान से आर्थिक भौतिक क्षेत्र में उच्चतम स्थिति करने के लिए दरिद्रता दूर करने के लिए व्यापर उन्नति तथा लक्ष्मी प्राप्ति के लिए इस मन्त्र का प्रयोग करे |
[ महाविद्या प्रयोग ]
१ : महाविद्या प्रयोग उस समय किया जाता है जब घर में किसी प्रकार की अशांति हो या बाधा [ भूत प्रेत आदि ] उत्पन्न होती हो जिसके करने परिवार में अशांति हो रही हो तो इस प्रयोग के २१ पाठ कराने अथवा १०८ पाठ कराने व् हवन कराने से तत्काल लाभ प्राप्त होता है | यह प्रयोग अनुभव सिद्ध है |
[ प्रत्यंगिरा व् विपरीत प्रत्यंगिरा स्त्रोत्र ]
श्री प्रत्यंगिरा स्त्रोत्र : प्रत्यंगिरा के शास्त्रीय अनुष्ठान मात्र से समस्त शत्रु नष्ट हो जाते है | इसमें साधक को किसी प्रकार की कोई हानी नहीं होता है | इसके कम से कम १०८ पाठ कराने से लाभ शुरु हो जाता है | मुक़दमे में विजय तथा प्रबल शत्रु क्यों न हो ,उसकी पराजय अवश्य होती है
श्री विपरीत प्रत्यंगिरा स्त्रोत्र : विपरीत प्रत्यंगिरा स्त्रोत्र के पाठ करने मात्र से शत्रु का विशेष क्षय यहाँ तक की वह मृत्यु को भी प्राप्त हो जाता है , तथा इस पाठ के साथ – साथ साधक की सुरक्षा भी होती है | इस का कम से कम १०८ पाठ या संभव हो तो ११०० पाठ करवाहोता हैवे तो सफलता अवश्य प्राप्त होता है।..

2..

श्री कालीस्तुतिः
विद्युत्कान्तिसमानाभदन्तपङ्क्तिबलाकिनीम् ।
नमामि तां विश्वमातां कालमेघसमद्युतिम् ।।
मुण्डमालावलीरम्यां मुक्तकेशीं दिगम्बराम् ।।
ललज्जिह्वां घोररावामारक्तान्तत्रिलोचनाम् ।
कोटिकोटिकलानाथविलसन्मुखमण्डलाम् ।
अमाकलतासमुल्लासोज्जवलत्कोटीरमण्डलाम् ।
शवद्वयाभूषकर्णां नानामणिविभूषिताम् ।।
सूर्यकान्तेन्दुकान्तौघप्रोल्लसत्कर्णभूषणाम् ।
मृतहस्तसहस्रैस्तु कृत्काञ्चीं हसन्मुखीम् ।।
सुक्कद्वयगलद्रक्तधाराविस्फारितानननाम् ।
खड्गमुण्डवराभीतिसंशोभितचतुर्भुजानम् ।।
दन्तुरां परमां नित्यां रक्तमण्डितविग्रहाम् ।
शिवप्रेतसमारूढ़ां महाकालोपरिस्थिताम् ।
वादपादं शिवहृदि दक्षिणे लोकलाञ्छिताम् ।
कोटिसूर्यप्रीकाशां समस्तभुवनोज्ज्वलाम् ।।
विद्युत्पुञ्जसमानाभज्वलज्जटाविराजिताम् ।
रजताद्रिनिभां देवीं स्पटिकाचलविग्रहाम् ।।
दिगम्बरां महाघोरां चन्द्रार्कपरिमण्डिताम् ।
नानालङ्कारभूषाढ्यां भास्वत्स्वर्णतनूरुहाम् ।।
योगनिद्राधरां सुभ्रूं स्मेराननसरोरुहाम् ।
विपरीतरतासक्तां महाकालेन सन्ततम् ।।
अशेषब्रह्माण्डप्रकाशितमहाबलाम् ।
शिवाभिर्घोररावाभिर्वेष्टतां प्रलयोदिताम् ।।
कोटिकोटिशरच्चन्द्रन्यक्कृतोन्नखमण्डलाम् ।
सुधापूर्णशिरोशिरोहस्तयोगिनीभिर्विराजिताम् ।।
आरक्तमुखभीमाभिर्मदमत्ताभिरन्विताम् ।
घोररूपैर्महानादैश्चण्डतापैश्च भैरवैः ।।
गृहीतशवकङ्कालजयशब्दपरायणैः ।
नृत्यद्भिर्वादनपरैरनिशं च दिगम्बरैः ।।
श्मशानालयमध्यस्थां ब्रह्माद्दुपनिषेविताम् ।।
{
इति योगिनीतन्त्रे पूर्वखण्डे प्रथमपटले ईश्वरकृता – श्री कालीस्तुतिः }

3..… मां काली का ही स्वरूप है। मां काली को नीलरूपा होने के कारण ही तारा कहा गया है। भगवती काली का यह स्वरूप सर्वदा मोक्ष देने वाला है, जीव को इस संसार सागर से तारने वाला है- इसलिए वह तारा हैं। सहज में ही वे वाक्‌ प्रदान करने वाली हैं इसलिए नीलसरस्वती हैं। भयंकर विपत्तियों से साधक की रक्षा करती हैं, उसे अपनी कृपा प्रदान करती हैं, इसलिए वे उग्रतारा या उग्रतारिणी हैं। यद्यपि मां तारा और काली में कोई भेद नहीं है, तथापि बृहन्नील तंत्रादि त्रादि ग्रंथों में उनके विशिष्ट स्वरूप का उल्लेख किया गया है। हयग्रीव दानव का वध करने के लिए देवी को नील-विग्रह प्राप्त हुआ, जिस कारण वे तारा कहलाईं। शव-रूप शिव पर प्रत्यालीढ मुद्रा में भगवती आरूढ हैं, और उनकी नीले रंग की आकृति है तथा नील कमलों के समान तीन नेत्र तथा हाथों में कैंची, कपाल, कमल और खडग धारण किये हैं। व्याघ्र-चर्म से विभूषित इन देवी के कंठ में मुण्डमाला लहराती है। वे उग्र तारा हैं, लेकिन अपने भक्तों पर कृपा करने के लिए उनकी तत्परता अमोघ है । इस कारण मां तारा महा-करूणामयी हैं।
4…भगवती भद्रकाली के ध्यान

तन्त्रों में भगवती भद्रकाली का ध्यान इस प्रकार दिया गया है -
डिम्भं डिम्भं सुडिम्भं पच मन दुहसां झ प्रकम्पं प्रझम्पं, विल्लं त्रिल्लं
त्रि-त्रिल्लं त्रिखलमख-मखा खं खमं खं खमं खम् ।
गूहं गूहं तु गुह्यं गुडलुगड गुदा दाडिया डिम्बुदेति,
नृत्यन्ती शब्दवाद्यैः प्रलयपितृवने श्रेयसे वोऽस्तु काली ।।

भद्रकाली के भी दो भेद हैं () विपरित प्रत्यंगिरा भद्रकाली तथा () षोडश भुजा दुर्गाभद्रकालीमार्कण्डेय पुराणान्तर्गत दुर्गासप्तशती में जो काली अम्बिका के ललाट से उत्पन्न हुई, वह कालीपुराण से भिन्न हैं । उसका ध्यान इस प्रकार है -
नीलोत्पल-दल-श्यामा चतुर्बाहु समन्विता ।
खट्वांग चन्द्रहासञ्च चिभ्रती दक्षिणकरे ।।
वामे चर्म च पाशञ्च उर्ध्वाधो-भावतः पुनः ।
दधती मुण्डमालाञ्च व्याघ्र-चर्म वराम्बरा ।।
कृशांगी दीर्घदंष्ट्रा च अतिदीर्घाऽति भीषणा ।
लोल-जिह्वा निम्न-रक्त-नयना नादभैरवा ।।
कबन्धवाहना पीनविस्तार श्रवणानना ।।

दक्षिणकालीमन्त्र विग्रह हृदय में प्रलय-कालीन-ध्यानइस प्रकार है -
क्षुच्छ्यामां कोटराक्षीं प्रलय घन-घटां घोर-रुपां प्रचण्डां,
दिग्-वस्त्रां पिङ्ग-केशीं डमरु सृणिधृतां खड़गपाशाऽभयानि ।
नागं घण्टां कपालं करसरसिरुहैः कालिकां कृष्ण-वर्णां
ध्यायामि ध्येयमानां सकल-सुखकरीं कालिकां तां नमामि ।।

महाकाल-संहिता के शकारादि विश्वसाम्राज्य श्यामासहस्रनाम में निर्गुण-ध्यान इस प्रकार है -
ब्रह्मा-विष्णु शिवास्थि-मुण्ड-रसनां ताम्बूल रक्ताषांबराम् ।
वर्षा-मेघ-निभां त्रिशूल-मुशले पद्माऽसि पाशांकुशाम् ।।
शंखं साहिसुगंधृतां दशभुजां प्रेतासने संस्थिताम् ।
देवीं दक्षिणाकालिकां भगवतीं रक्ताम्बरां तां स्मरे ।।
विद्याऽविद्यादियुक्तां हरविधिनमितांनिष्कलां कालहन्त्रीं,
भक्ताभीष्ट-प्रदात्रीं कनक-निधि-कलांविन्मयानन्दरुपाम् ।
दोर्दण्ड चाप चक्रे परिघमथ शरा धारयन्तीं शिवास्थाम् ।
पद्मासीनां त्रिनेत्रामरुण रुचिमयीमिन्दुचूडां भजेऽहम् ।।

काली-विलास-तंत्रमें कृष्णमाता काली का ध्यान इस प्रकार दिया है -
जटा-जूट समायुक्तां चन्द्रार्द्ध-कृत शेखराम् ।
पूर्ण-चन्द्र-मुखीं देवीं त्रिलोचन समन्विताम् ।।
दलिताञ्जन संकाशां दशबाहु समन्विताम् ।
नवयौवन सम्पन्नां दिव्याभरण भूषिताम् ।।
दिड्मण्डलोज्जवलकरीं ब्रह्मादि परिपूजिताम् ।
वामे शूलं तथा खड्गं चक्रं वाणं तथैव च ।।
शक्तिं च धारयन्तीं तां परमानन्द रुपिणीम् ।
खेटकं पूर्णचापं च पाशमङ्कुशमेव च ।।
घण्टां वा परशुं वापि दक्षहस्ते च भूषिताम् ।
उग्रां भयानकां भीमां भेरुण्डां भीमनादिनीम् ।।
कालिका-जटिलां चैव भैरवीं पुत्रवेष्टिताम् ।
आभिः शक्तिरष्टाभिश्च सहितां कालिकां पराम् ।।
सुप्रसन्नां महादेवीं कृष्णक्रीडां परात् पराम् ।
चिन्तयेत् सततं देवीं धर्मकामार्थ मोक्षदाम् ।।

कादि, हादि, सादि इत्यादि क्रम से कालिका के कई प्रकार के ध्यान हैं । जिस मंत्र के आदि में हैं, वह कादि-विद्या, जिस मंत्र के आदि में है वह हादि-विद्या”, मंत्र में वाग् बीज हो वह वागादि-विद्यातथा जिस मंत्र के प्रारम्भ में हूं बीज हो वहक्रोधादि-विद्याकहलाती है ।
नादिक्रममें आदि में नमःका प्रयोग होता है एवं दादि-क्रममें मंत्र के आदि मेंहोता है, जैसे दक्षिणे कालिके स्वाहाप्रणवादि-क्रममें मंत्र प्रारम्भ मेंका प्रयोग होता है ।

१॰ कादिक्रमोक्त ध्यानम् -
करालवदनां घोरां मुक्तकेशीं चतुर्भुजाम् ।
कालिकां दक्षिणां दिव्यां मुण्डमाला विभूषिताम् ।।
सद्यश्छिन्नशिरः खडगं वामोर्ध्व कराम्बुजाम् ।
अभयं वरदं चैव दक्षिणोर्ध्वाधः पाणिकाम् ।।
महामेघ-प्रभां श्यामां तथा चैव दिगम्बरीम् ।
कण्ठावसक्तमुण्डालीं गलद्-रुधिरं चर्चिताम् ।।
कृर्णावतंसतानीत शव-युग्म भयानकाम् ।
घोरदंष्ट्रां करालास्यां पीनोन्नत-पयोधराम् ।।
शवानां कर-सङ्घातैः कृत-काञ्चीं हसन्मुखीम् ।
सृक्कद्वयगलद् रक्त-धारा विस्फुरिताननाम् ।।
घोर-रावां महा-रौद्रीं श्मशानालय-वासिनीम् ।
बालार्क-मण्डलाकार-लोचन-त्रियान्विताम् ।।
दन्तुरां दक्षिण-व्यापि मुक्तालम्बि कचोच्चयाम् ।
शवरुपं महादेव हृदयोपरि संस्थिताम् ।।
शिवामिर्घोर रावाभिश्चतुर्दिक्षु समन्विताम् ।
महाकालेन च समं विपरित-रतातुराम् ।।
सुखप्रसन्न-वदनां स्मेरानन सरोरुहाम ।
एवं सञ्चिन्तयेत् कालीं सर्वकामार्थ सिद्धिदाम् ।।

२॰क्रोध-क्रम का ध्यान इस प्रकार है -
दीपं त्रिकोण विपुलं सर्वतः सुमनोहराम् ।
कूजत् कोकिला नादाढ्यं मन्दमारुत सेवितम् ।।
भृंङ्गपुष्पलताकीर्ण मुद्यच्चन्द्र दिवाकरम् ।
स्मृत्वा सुधाब्धिमध्यस्थं तस्मिन् माणिक्य-मण्डपे ।।
रत्न-सिंहासने पद्मे त्रिकोणेज्ज्वल कर्णिके ।
पीठे सञ्चिन्तयेत् देवीं साक्षात् त्रैलोक्यसुन्दरीम् ।।
नीलनीरज सङ्काशां प्रत्यालीढ पदास्थिताम् ।
चतुर्भुजां त्रिनयनां खण्डेन्दुकृत शेखराम् ।।
लम्बोदरीं विशालाक्षीं श्वेत-प्रेतासन-स्थिताम् ।
दक्षिणोर्ध्वेन निस्तृंशं वामोर्ध्वनीलनीरजम् ।।
कपालं दधतीं चैव दक्षिणाधश्च कर्तृकाम् ।
नागाष्टकेन सम्बद्ध जटाजूटां सुरार्चिताम् ।।
रक्तवर्तुल-नेत्राश्च प्रव्यक्त दशनोज्जवलाम् ।
व्याघ्र-चर्म-परीधानां गन्धाष्टक प्रलेपिताम् ।।
ताम्बूल-पूर्ण-वदनां सुरासुर नमस्कृताम् ।
एवं सञ्चिनतयेत् कालीं सर्वाभीष्टाप्रदां शिवाम् ।।

३॰हादि-क्रम का ध्यान इस प्रकार है -
देव्याध्यानमहं वक्ष्ये सर्वदेवोऽप शोभितम् ।
अञ्नाद्रिनिभां देवीं करालवदनां शिवाम् ।।
मुण्डमालावलीकीर्णां मुक्तकेशीं स्मिताननाम् ।
महाकाल हृदम्भोजस्थितां पीनपयोधराम् ।।
विपरीतरतासक्तां घोरदंष्ट्रां शिवेन वै ।
नागयज्ञोपवीतां च चन्द्रार्द्धकृत शेखराम् ।।
सर्वालंकार संयुक्तां मुक्तामणि विभूषिताम् ।
मृतहस्तसहस्रैस्तु बद्धकाञ्ची दिगम्बराम् ।।
शिवाकोटि ससहस्रैस्तु योगिनीभिर्विराजजिताम् ।
रक्तपूर्ण मुखाम्भोजां सद्यः पानप्रमम्तिकाम् ।।
सद्यश्छिन्नशिरः खड्ग वामोर्ध्धः कराम्बुजाम् ।
अभयवरदं दक्षोर्ध्वाधः करां परमेश्वरीम् ।।
वह्नयर्क -शशिनेत्रां च रण-विस्फुरिताननाम् ।
विगतासु किशोराभ्यां कृतवर्णावतंसिनीम् ।।

४॰ वागादि-क्रम का ध्यान इस प्रकार है -
चतुर्भुजां कृष्णवर्णां मुण्डमाला विभूषिताम् ।
खड्गं च दक्षिणे पाणौ विभ्रतीं सशरं धनुः ।।
मुण्डं च खर्परं चैव क्रमाद् वामे च विभ्रतीम् ।
द्यां लिखन्तीं जटामेकां विभ्रतीं शिरसा स्वयम् ।।
मुण्डमालाधरां शीर्षे ग्रीवायामपि सर्वदा ।
वक्षसा नागहारं तु विभ्रतीं रक्तलोचनाम् ।।
कृष्णवर्णधरां दिव्यां व्याघ्राजिन समन्विताम् ।
वामपादं शवहृदि संस्थाप्य दक्षिणं पदम् ।।
विन्यस्य सिंहपृष्ठे च लेलिहानां शवं स्वयम् ।
सट्टहासां महाशवयुक्तां महाविभीषिणा ।।
एवं विचिन्त्या भक्तैस्तु कालिका परमेश्वरी ।
सततं भक्तियुक्तैस्तु भोगेश्वर्यामभीप्सुभिः ।।

५॰ नादि-क्रमका ध्यान -
खड्गं च दक्षिणे पादौ विभ्रतीन्दीवरद्वयम् ।
कर्तृकां खर्परं चैव क्रमाद् भुजयोद्वयं करान्विताम् ।।

६॰ दादि-क्रमका ध्यान -
सद्यः कृन्तशिरः खड्गमूर्ध्वद्वय कराम्बुजाम् ।
अभयं वरदंतु भुजयोद्वयं करान्विताम् ।।

७॰ प्रणवादि-क्रमका ध्यान -
मंत्र के प्रारम्भ में प्रयुक्त होता है, उनका ध्यानकादि-क्रम के अनुसार करें ।

5…कालिका अष्टक

विरंच्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणास्त्रीँ, समाराध्य कालीं प्रधाना बभूवुः |
अनादिं सुरादिं मखादिं भवादिं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || १ ||

जगन्मोहिनीयं तु वाग्वादिनीयं, सुहृदपोषिणी शत्रुसंहारणीयं |
वचस्तम्भनीयं किमुच्चाटनीयं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || २ ||

इयं स्वर्गदात्री पुनः कल्पवल्ली, मनोजास्तु कामान्यथार्थ प्रकुर्यात |
तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ३ ||

सुरापानमत्ता सुभक्तानुरक्ता, लसत्पूतचित्ते सदाविर्भवस्ते |
जपध्यान पुजासुधाधौतपंका, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ४ ||

चिदानन्दकन्द हसन्मन्दमन्द, शरच्चन्द्र कोटिप्रभापुन्ज बिम्बं |
मुनिनां कवीनां हृदि द्योतयन्तं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ५ ||

महामेघकाली सुरक्तापि शुभ्रा, कदाचिद्विचित्रा कृतिर्योगमाया |
न बाला न वृद्धा न कामातुरापि, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ६ ||

क्षमास्वापराधं महागुप्तभावं, मय लोकमध्ये प्रकाशीकृतंयत् |
तवध्यान पूतेन चापल्यभावात्, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ७ ||

यदि ध्यान युक्तं पठेद्यो मनुष्य, स्तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च |
गृहे चाष्ट सिद्धिर्मृते चापि मुक्ति, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ८ ||

साधनाकाल में एक समय भोजन करें, भूमि शयन करें तथा ब्रह्मचर्य का दृढ़ता से पालन करें|

यदि चंडी यन्त्र ताबीज रूप में है तो अनुष्ठान के उपरांत उसे धारण करने से साधना का लाभ जीवन पर्यन्त साधक के साथ बना रहता है|

6…

भगवती तारा

विश्वव्यापकवारिमध्यविलसच्छ्वेताम्बुजन्मस्थितां
कर्त्रीँखड्गकपालनीलनलिनै राजत्करां नीलभां |
कांचीकुण्डलहारकंकणलसत्केयुरमंजीर
तामाप्तैर्नागवरैर्विभुषततनूमारक्तनेत्रत्रयां ||
पिंगोग्रैकजटां लसत्सुरसनां दंष्ट्राकरालाननां
चर्मद्वैपिवरंकटौ विदधतीँ श्वेतास्थिपट्टालिकां |
अक्षोभ्येण विराजमानशिरसं स्मेराननां भोरुहां तारां
शावहृदासनां दृढकुचामंबांत्रिलौक्याःस्मरेत ||

विश्वव्यापक जल के मध्य में श्वेत कमल पर अवस्थित हैं| दाहिने हाथों में खड्ग एवं नील कमल तथा बांये हाथों में कर्तरिका एवं कपाल धारण किए हुए हैं| नीलवर्ण जैसी आभामय कान्तिवाली तथा कांची, कुण्डल, हार एवं केयूर आदि आभूषणों से सुशोभित हैं| सुंदर नागों से विभूषित एवं लाल – लाल तीन नेत्रों से शोभायमान हैं| सर पर पिंगल वर्ण की एक जटा है| चंचल जिव्हा है| उनकी दंतपंक्ति मुख विकराल हैं| कमर में व्याघ्रचर्म धारण किए हुए हैं| माथे पर श्वेतास्थिपट्टिका धारण किए हैं| शिर पर नागरुपधारी अक्षोभ्य ऋषि विराजमान हैं| अपने भावावेश में हास्य वदन वाली हैं| शव के ह्रदय पर बैठी हूई, कठोर स्तन वाली एवं तीनों लोकों की स्वामिनी भगवती तारा का स्मरण करना चाहिए|

7….सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम्

प्रतिदिन प्रातःकाल सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम् का पाठ कराने से सभी प्रकार के विघ्न – बाधा नष्ट हो जाते हैं व परम सिद्धि प्राप्त होती है| इसके पाठ से काम – क्रोध का मारण, इष्टदेव का मोहन, मन का वशीकरण, इन्द्रियों की विषय – वासनाओं का स्तम्भन और मोक्ष प्राप्ति हेतु उच्चाटन आदि कार्य सफल होते हैं|

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे || ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ||

नमस्ते रूद्ररुपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि |
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि || १ ||

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि || २ ||

जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे |
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका || ३ ||

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते |
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी || ४ ||

विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणि || ५ ||

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी |
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु || ६ ||

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी |
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः || ७ ||

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा |
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा || ८ ||

सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्र सिद्धं कुरुष्व मे || ९

8….भगवती दक्षिणाकाली

सद्यश्छिन्नशिरः कृपाणमभयं हस्तैर्वरंबिभ्रतीँ
घोरास्यां शिरसांस्त्रजासुरुचिरामुन्मुक्तकेशावलिम ||
स्रुक्कयस्रुक्प्रवहांश्मशाननिलयां श्रुत्योः शवालंकृतिमं
श्यामांगीं कृतमेखालां शवकरैर्देविभजे कालिकां ||

दक्षिण कालिका देवी कराल मुख वाली हैं| उनके केश खुले हुए हैं| गले में मुण्डमाला है| उनकी चार भुजाएं हैं| बाएँ निचले हस्त में तुंरत कटा मुण्ड है तथा ऊपरी हस्त में अभय मुद्रा है| दायें निचले हस्त में वरद मुद्रा तथा ऊपरी हस्त में खड्ग है| उनके होठों के किनारों से रक्त चू रहा है| कानों में दो शव शिशु आभूषण के रूप में लटक रहे हैं| कमर में शवहस्त निर्मित करधनी शोभायमान है| उनका श्याम वर्ण है तथा वे सदा श्मशान में रहती हैं| ऐसी दक्षिण कालिका देवी का मैं ध्यान करता हूँ|

9….महाकाली

महाकाली को ही महाकाल पुरुष की शक्ति के रूप में माना जाता है । महाकाल का कोई लक्षण नहीं, वह अज्ञात है, तर्क से परे है । उसी की शक्ति का नाम है महाकाली । सृष्टि के आरंभ में यही महाविद्या चतुर्दिक विकीर्ण थी । महाकाली शक्ति का आरंभ में यही महाविद्या चतुर्दिक विकीर्ण थी । महाकाली शक्ति का आरंभिक अवतरण था । यही कारण है कि आगमशास्त्र में इसे प्रथमा व आद्या आदि नामों से भी संबोधित किया गया है ।

आगमशास्त्र में रात्रि को महाप्रल्य का प्रतीक माना गया है । रात के १२ बजे का समय अत्यंत अंधकारमय होता है । यही कालखंड महाकाली है । रात के १२ बजे से लेकर सूर्योदय होने से पहले तक संपूर्ण कालखंड महाकाली है । रात के १२ बजे से लेकर सूर्योदय होने से पहले तक संपूर्ण कालखंड महाकाली है । सूर्योदय होते ही अंधकार क्रमश: घटता जाता है । अंधकार के उतार-चढाव को देखते हुए इस कालखंड को ऋषि-मुनियों ने कुल ६२ विभागों में विभाजित किया है । इसी प्रकार महाकाली के भी अलग-अलग रूपों के ६२ विभाग हैं । शक्ति के अलग-अलग रूपों की व्याख्या करने के उद्देश्य से ऋषि-मुनियों ने निदान विद्या के आधार पर उनकी मूर्तियां बनाईं ।

समस्त शक्तियों को अचिंत्या कहा गया है । वे अदृश्य और निर्गुण हैं । शक्तियों की मूर्तियों को उनकी काया का स्वरूप मानना चाहिए ।

अचिंत्यस्थाप्रामैयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ।
उपासकानां सिद्धयर्थ ब्रह्मणों रूपकल्पना ॥

अर्थात शक्तियों के रूप की कल्पना करते हुए काल्पनिक मूर्तियों का इसलिए निर्माण किया गया, ताकि उनकी उपासना की जा सके तथा उनके रूप के दर्शन किए जा सकें ।

निदान शास्त्र में इन मूर्तियों के बारे में विस्तार से उल्लेख किया गया है । किंतु खेद है कि आज यह ग्रंथ विलुप्त और अनुपलब्ध है । यही कारण है कि शक्तियों की विलक्षण और विचित्र मूर्तियों की वास्ततिकता पर संदेह प्रकट किया जा रहा है । दश महाविद्याओं के स्वरूपों का संबंध निदान से है ।

यहां निदान का किस अर्थ में उपयोग किया जाता है । वस्तुत: संकेत को ही निदान कहा जाता है । निदान से पता चलता है कि किसका संबंध किससे है । इहलोक हो या परलोक-सर्वत्र यही नियम लागु है । कहीं संकट मंडराता है तो वहां लाल कपडे अथवा लाल तख्ती से संकेत किया जाता है । यानी संकट का निदान लाल कपडे में निहित है । इसी प्रकार काले वस्त्र को शोक का निदान माना है तो श्वेत वस्त्र को यश व सम्मान का निदान । शांति और उत्पादकता का निदा हरा वस्त्र है, विजयश्री का निदान पताका है और अंतरिक्ष का निदान नीला वस्त्र है ।

कई अज्ञानी लोग प्रश्न करते हैं कि शोक का काले वस्त्र से कैसा संबंध ? शोकाकुल व्यक्ति काला वस्त्र पहने या श्वेत वस्त्र, उससे शोक पर कोई असर नहीं पडता । अतएव काले वस्त्र को शोक का निदान मानना तार्किक नहीं है ।

किंतु निदान शास्त्र में इसके पक्ष में अनेक सबल तर्क दिए गए हैं । शोकसंतप्त व्यक्ति का सबसे नाता टूट जाता है, वह स्वयं को भी भूल जाता है । उसे प्रतीत होता है, मानो वह घोर तम (अंधकार) से घिर गया है । उसे रोशनी भली नहीं लगती, अंधेरे बंद कमरे में ही वह रोना-कलपना चाहता है । इसी करण निदान शास्त्र काले वस्त्र को शोक का प्रतीक मानता है ।

काला वस्त्र रोशनी को अपने अंदर समा लेता है, जबकि श्वेत वस्त्र रोशनी की परावर्तित करता है, सर्वत्र विकीर्ण कर देता है । इसीलिए इसे यश और सम्मान का निदान माना गया है, क्योंकि यशस्वी व्यक्ति की ख्याति सर्वत्र विकीर्ण हो जाती है ।

निदान विद्या का दृढ विश्वास है कि सृष्टि की रचना जल से हुई है । जल से ही पैदा होता है कमल, अतः कमल को पृथ्वी का निदान माना गया है । वर्षा ऋतु में चारों ओर हरियाली छा जाती है । हरियाली से उत्पादन होता है और शांति व्याप्त होती है। अतः हरे वस्त्र को शांति और उत्पादकता का निदान माना गया है ।

इससे सिद्ध होता है कि निदान का अपने समभाव से अटूट संबंध है । शक्ति का प्राकृतिक स्वरूप निराकार और अदृश्य है । किंतु कौन-सी शक्ति किस शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है, उसी के आधार पर उनकी मूर्तियों की भव्य कल्पना की गई है ।

शक्ति की मूर्तियां हम अनेक रूपों में देखते हैं । किसी में उसकी जीभ निकली हुई है तो किसी में उसने गले गले में नरमुंडों की माला धारण कर रखी है । इन मूर्तियों में शक्ति की भुजाओं की संख्या में भी अंतर है और भुजाओं द्वारा पकडे गए अवदानों में भी । किसी में वह दो भुजाओं में नजर आती है तो किसी में कमलपुष्प ।

मूर्तियों में शक्ति का उदार व विनम्र भव्य स्वरूप भी है और विकराला स्वरूप भी । किसी में वह मुर्दे पर आरूढ तो किसी में मदिरा पीते हुए अट्टहास कर रही है । मूर्तियों में उसे दिगंबर और पीतांबर दोनों अवस्थाओं में देखा जा सकता है ।

निस्संदेह प्रत्येक मूर्ति विशिष्ट अर्थ और उद्देश्य का निदान है । किंतु जो लोग इनमें अंतर्निहित भावों से अनभिज्ञ हैं, वे इनको अवज्ञा से देखते हैं और उपहास करते हैं । ये निरर्थक या मनमानी कल्पनाओं का मूर्त रूप नहीं, बल्कि विभिन्न शक्तियों के विभिन्न स्वरूपों का निरूपण है ।

हमारे यहां प्रत्येक देवता की भिन्न शक्ति और भिन्न स्वरूप होता है । ऋषिमुनियों ने निदान के माध्यम देवातों की स्तुति व उपासना करने की विधि बताई है । उनका कहना है कि जिस देवता की स्तुति करना चाहते हो, सर्वप्रथम उसठे स्वरूप का स्मरण का स्मरण करो । यदि महाकाली का उपासक महाकाली की स्तुति करना चाहता है तो सबसे पहले उसे उसके स्वरूप को चित्त में धारण करना चाहिए. जो इस प्रकार है:

महाकाली शव पर आरूढ है । उसका स्वरूप महाभयावह है । उसकी दाढ महाविकराल है । वह विद्रूपता से हंस रही है । उसकी चार भुजाओं में से एक में खडग है, दूसरे में नरमुंड, तीसरे में अभयमुद्रा और चौथे में वर । जीभ बाहर निकली हुई है और गले में मुंडों की माला । व्ह नग्रावस्था में है । उसका निवास स्थान श्मशान है ।

महाशक्ति महाकाली का संबंध प्रलयरात्रि मध्यकाल से है । जब तक मनुष्य शक्तिशाली होता है, वह शिव है । किंतु शक्तिहीन होते ही वह शव में परिवर्तित होता है । उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है ।

विश्व के अस्तित्व में आने से पहले महाकाली का अविर्भाव हो चुका था । वही विश्व की संहारक कालरात्रि है । उसकी प्रतिष्ठा संहार और प्रलय से है, सृष्टि की रचना से नहीं । प्रलय और संहार के समय सारी सृष्टि शव के समान हो गई है और उसके ऊपर महाकाली पांव धरकर खडी हुई है । विश्व मरणशील है, अतः शवस्वरूप है । इसी शवस्वरूप को विश्व का निदान कहा गया है ।

जो संहार करता है, प्रलय लाता है, वह महाप्रचंड होता है । उसकी मुखाकृति अत्यंत वीभत्स होती है । कोई उसकी ओर आंख उठाकर देखने का साहस नहीं जुटा पाता । महाकाली की कुखाकृति अत्यंत प्रचंड होती है. क्योंकि वह नाश और संहार की देवी है । उसकी आंखों में करुणा नहीं, काल होता है । उसके नाशक संहारक स्वरूप का निदान है यह भयोत्पादक मूर्ति ।

महाकाली का अट्टहास विजय का द्योतक है । उसका अट्टहास सुनकर चारों तरफ भय की सृष्टि होती है । सृष्टि उसकी प्रचंडता और भीषणता से त्राहि-त्राहि कर उठती है । यह अट्टहास महाकाली की विजय और भयावहता का निदान है ।

महाकाली की अनेक भुजाएं हैं । किंतु जब वह संहार अभियान पर निकलती है तो केवल चार भुजाओं का उपयोग करती है । वह खड्‌ग से विनाशलीला करती है । यह खड्‌ग उसकी संहारक शक्ति का निदान है । प्राणियों का संहार करने का निदान नरमुंड है । किंतु विनाशलीला करने वाली महाकाली का एक हाथ अभय मुद्रा में और दूसरा वरभाव में क्यों ?

वस्तुः जिसने भी विनाशकारी महाकाली के रूप को साकार किया था, वह अवश्य कल्पनाशील और रचनाशील था । जिस शक्ति का महाकाली प्रतिनिधित्व करती है, उसके अर्थ, उद्देश्य और भाव से वह निस्संदेह भलीभांति परिचित था. तभी तों मूर्ति को सार्थकता दे सका ।

यह सच है कि महाकाली साक्षात भय और विनाश है । उसका काम केवल प्रलय और विध्वंस है । किंतु वह अभय और वर प्रदायनी है । विश्व मायाशील है, शोक संतप्त है, सुख की कामना से विह्वल है । उसे सबसे अधिक भयभाव सताता है । यदि वह महाकाली की शरण में आए तो अभयपद को प्राप्त हो सकता है । अतः महाकाली की उपासना करने वाला भयहीन और शोकमुक्त हो जाता है ।

प्रलय की बेला में जब प्राणी कालग्रास बनते हैं, तब महाकाली शवों को स्वयं धारण करती है । मरण महासत्य है । महाकाली इस सत्य की वाहक है । अतएव मृतकों को स्वयं पर प्रतिष्ठित कर उनका उद्धार करती है । इसी भाव को प्रकट करती है उसके गले में मुंडमाला ।

संपूर्ण ब्रह्मांड में महाकाली व्याप्त है । वह सृष्टि के चराचर में समाहित है । वह अनावृत है । आकाश, दिगंत और दिशाएं ही उसकी परिधान है । उसकी गग्रावस्था का निदान इसी भाव में है ।

महाकाली अपना विशाल, चरम और परम स्वरूप तब धारण करती है, जब प्रलय का आह्वान करती है । चारों ओर विनाशलीला का घनघोर रौरव व्याप्त हो जाता है । वह संपूर्ण विश्व को श्मशान बनाकर अपने नितांत तमस्वरूप को प्राप्त होती है । तभी तो श्मशान को उसका निवास स्थान बताया गया है । यह श्मशान और कुछ नहीं केवल उसके तमस्वरूप का निदान है । यही वास्तविक महाकाली है ।

निस्संदेह महाकाली के इस स्वरूप को देखकर साधारण जन उसकी उपासना करने की कल्पना से ही कांप उठता है । इस सत्य से ऋषि-मुनि अनभिज्ञ नहीं थे । अतः उन्होंने महाशक्तियों की आंतरिक संरचना ध्यान रखते हुए निदान के माध्यम से उनकी काल्पनिक मूर्तियों का निर्माण किया और उनके प्रत्येक स्वरूप की मीमांसा प्रस्तुत की, ताकि लोग उनके कल्याणकारी पहलू से परिचित हो सकें
साभार काली तंत्र से उद्धृत

9…महाकाली साधना

अपने साधनात्मक जीवन के प्रारंभ में गुरु साधना के उपरांत मेरे द्वारा सफलतापूर्वक की गई प्रथम साधना माँ काली की यह विलक्षण साधना है| सन्यासी साधकों द्वारा मूलतः श्मशान सिद्धि हेतु की जाने वाली यह उग्र प्रवृत्ति की साधना जीवन की जीवन्तता में बाधक बनी प्रत्येक परिस्थिति के निवारण में सक्षम है| इस अद्वितीय साधना द्वारा मैंने माँ काली की कृपा के साथ उनके बिम्बात्मक दर्शन भी प्राप्त किए हैं|

कृष्ण पक्ष की अष्टमी से प्रारंभ कर २१ दिन तक की जाने वाली इस साधना में चंडी यन्त्र के समक्ष प्रतिरात्रि कालिका अष्टक, जिस के उच्चारण मात्र से दिव्य आनंद की अनुभूति होती है, के ५१ पाठ करें|


कालिका अष्टक

विरंच्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणास्त्रीँ, समाराध्य कालीं प्रधाना बभूवुः |
अनादिं सुरादिं मखादिं भवादिं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ||

जगन्मोहिनीयं तु वाग्वादिनीयं, सुहृदपोषिणी शत्रुसंहारणीयं |
वचस्तम्भनीयं किमुच्चाटनीयं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ||

इयं स्वर्गदात्री पुनः कल्पवल्ली, मनोजास्तु कामान्यथार्थ प्रकुर्यात |


तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ||

सुरापानमत्ता सुभक्तानुरक्ता, लसत्पूतचित्ते सदाविर्भवस्ते |
जपध्यान पुजासुधाधौतपंका, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ||

चिदानन्दकन्द हसन्मन्दमन्द, शरच्चन्द्र कोटिप्रभापुन्ज बिम्बं |
मुनिनां कवीनां हृदि द्योतयन्तं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ||

महामेघकाली सुरक्तापि शुभ्रा, कदाचिद्विचित्रा कृतिर्योगमाया |
न बाला न वृद्धा न कामातुरापि, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ||

क्षमास्वापराधं महागुप्तभावं, मय लोकमध्ये प्रकाशीकृतंयत् |
तवध्यान पूतेन चापल्यभावात्, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ||

यदि ध्यान युक्तं पठेद्यो मनुष्य, स्तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च |
गृहे चाष्ट सिद्धिर्मृते चापि मुक्ति, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ||

साधनाकाल में एक समय भोजन करें, भूमि शयन करें तथा ब्रह्मचर्य का दृढ़ता से पालन करें|

यदि चंडी यन्त्र ताबीज रूप में है तो अनुष्ठान के उपरांत उसे धारण करने से साधना का लाभ जीवन पर्यन्त साधक के साथ बना रहता है|

यह साधना मंत्र तंत्र यन्त्र विज्ञान पत्रिका के सितम्बर १९९३ अंक में प्रकाशित हुई थी|

4. तिव्र चण्डिका स्तोत्र

या देवी खड्गहस्ता सकलजनपदव्यापिनी विश्वदुर्गा,
श्यामांगी शुक्लपाश द्वीजगणगुणिता ब्रह्म देहार्थवासा।
ज्ञानानां साधयित्री यतिगिरीगमनज्ञान दिव्य प्रबोधा

सा देवी दिव्यमुर्ती: प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा।।१।।

ह्रां ह्रीं ह्रुं चर्ममुण्डे शवगमनहते भीषणे भमवक्त्रे
क्रां क्रीं क्रुं क्रोधमुर्तीर्विकृत-कुचमुखे रौद्र द्रंष्ट्रांकराले।।
कं कं कंकाल धारीभ्रमसी जगदीदं भक्षयन्ती ग्रसन्ती
हुंकार चोच्चरन्ती प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा।।२।।

ह्रां ह्रीं ह्रुं रुद्ररुपे त्रिभुवनमिते पाशहस्ते त्रिनेत्रे
रां रिं रुं रंगरंगे किलिकिलीतरवे शुलहस्ते प्रचण्डे।
लां लीं लुं लम्बजिव्हे हसती कहकहा – शुद्धघोराट्टहासे
कंकाली काल रात्री: प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा।।३।।

घ्रां घ्रीं घ्रुं घोररुपे घघघघघटिते धुर्धुरारावघोरे
निर्मांसी शुष्कजंघे पिबतु नरवसाधुम्र धुम्रायमाने।
ॐ द्रां द्रीं द्रुं द्रावयन्ती सकलभुवी तथा यक्ष गन्धर्वनागान्
क्षां क्षीं क्षुं क्षोभयन्ती प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा।।४।।

भ्रां भ्रीं भ्रुं चण्डगर्वे हरिहरनमिते रुद्र मुर्तीश्च कीर्ती
श्चन्द्रादित्यौ च कर्णौ जडमुकुडशिरोवेष्टीता केतुमाला
स्त्रक् सर्वौ चोरगेन्द्रौ शशिकीरणनिभा तारकाहार कण्ठा
सा देवी दिव्य मुर्ती:प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा।।५।।

खं खं खं खड्ग हस्ते वरकनकनिभे सुर्यकान्ते स्वतेजो
विधुज्ज्वालाबलिनां नवनिशितमहाकृत्तिका दक्षिणे च।
वामे हस्ते कपालं वरविमलसुरापुरितं धारयन्ती
सा देवी दिव्यमुर्ती:प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा।।६।।

हुं हुं फट् काल रात्री रु रु सुरमथनी धुम्रमारी कुमारी
ह्रां ह्रीं ह्रुं हत्तीशोरौक्षपितु किलकिला शब्द अट्टा ट्टहासे।
हा हा भूत प्रसुते किलकिलतमुखा कलियन्ती ग्रसन्ती
हुंकार चोच्चरन्ती प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा।।७।।

भ्रींगी काली कपालीपरिजन सहिते चण्डीचामुण्डनित्वा
रों रों रों कार नित्ये शशिकरधवले काल कुटे दुरन्ते।
हुं हुं हुं कारकारी सुरगणनमिते कालकारी विकारी
वश्ये त्रैलोक्यकारी प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा।।८।।

वन्दे दण्ड प्रचण्डा डमरु रुणिमणिष्टोपटंकार घण्टै
र्न्रित्यन्ती याट्टपातैरुट पट विभवै र्निर्मला मंत्रमाला।
सुक्षौ कुक्षौ वहन्ती खरखरितसखा चार्चिनि प्रेत माला
मुच्चैस्तैश्चाट्टहासे धुरुं रितखा चर्म मुण्डा चण्डमुण्डा प्रचण्डा।।९।।

त्वं ब्राह्मी त्वं च रौद्री शवशिखीगमना त्वं च देवी कुमारी
त्वं चक्री चक्रहस्ता घुरघुरितरवा त्वं वराह स्वरुपा।
रौद्रे त्वं चर्ममुण्डा सकलभुवी परे संस्थिते स्वर्गमार्गे
पाताले शैलभ्रींगे हरिहरनमिते देवी चण्डे नमस्ते।।१०।।

रक्ष त्वं मुण्उधारि गिरिवरविवरे निर्झरे पर्वते वा
संग्रामे शत्रुमध्ये विशविशभविके संकटे कुत्सिते वा
व्याघ्रे चौरे च सर्पेप्युदधिभुवि तथा वहीमध्ये च दुर्गे
रक्षेत् सा दिव्यमुर्ती: प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा।।११।।

इत्येवं बिजमन्त्रै: स्तवनमति शिवं पातकं व्याधीनाशं,
प्रतयक्षं दिव्य रुपं ग्रहणमथनं मर्दनं शाकीनिनाम्
इत्येवं वेगवेगं सकलभयहरं मन्त्रशक्तिश्च नित्यं
मन्त्राणां स्तोत्रकंय: पठती स लभते प्रार्थितां मन्त्र सिद्धीम्।।१२।।

10…काली कवचम्

काली कवचम्

कवचं श्रोतुमिच्छामि तां च विद्यां दशाक्षरीम् । नाथ त्वत्तो हि सर्वज्ञ भद्रकाल्याश्च साम्प्रतम् ॥

नारायण उवाच

श्रृणु नारद वक्ष्यामि महाविद्यां दशाक्षरीम् । गोपनीयं च कवचं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ॥

ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहेति च दशाक्षरीम् । दुर्वासा हि ददौ राज्ञे पुष्करे सूर्यपर्वणि ॥

दशलक्षजपेनैव मन्त्रसिद्धि: कृता पुरा । पञ्चलक्षजपेनैव पठन् कवचमुत्तमम् ॥

बभूव सिद्धकवचोऽप्ययोध्यामाजगाम स: । कृत्स्नां हि पृथिवीं जिग्ये कवचस्य प्रसादत: ॥

नारद उवाच

श्रुता दशाक्षरी विद्या त्रिषु लोकेषु दुर्लभा । अधुना श्रोतुमिच्छामि कवचं ब्रूहि मे प्रभो ॥

नारायण उवाच

श्रृणु वक्ष्यामि विपे्रन्द्र कवचं परमाद्भुतम् । नारायणेन यद् दत्तं कृपया शूलिने पुरा॥

त्रिपुरस्य वधे घोरे शिवस्य विजयाय च । तदेव शूलिना दत्तं पुरा दुर्वाससे मुने ॥

दुर्वाससा च यद् दत्तं सुचन्द्राय महात्मने । अतिगुह्यतरं तत्त्‍‌वं सर्वमन्त्रौघविग्रहम् ॥

ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा मे पातु मस्तकम् । क्लीं कपालं सदा पातु ह्रीं ह्रीं ह्रीमिति लोचने ॥

ह्रीं त्रिलोचने स्वाहा नासिकां मे सदावतु । क्लीं कालिके रक्ष रक्ष स्वाहा दन्तं सदावतु ॥

ह्रीं भद्रकालिके स्वाहा पातु मेऽधरयुग्मकम् ।  ह्रीं ह्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा कण्ठं सदावतु ॥

ह्रीं कालिकायै स्वाहा कर्णयुग्मं सदावतु ।  क्रीं क्रीं क्लीं काल्यै स्वाहा स्कन्धं पातु सदा मम ॥

क्रीं भद्रकाल्यै स्वाहा मम वक्ष: सदावतु ।  क्रीं कालिकायै स्वाहा मम नाभिं सदावतु ॥

ह्रीं कालिकायै स्वाहा मम पष्ठं सदावतु । रक्त बीजविनाशिन्यै स्वाहा हस्तौ सदावतु ॥

ह्रीं क्लीं मुण्डमालिन्यै स्वाहा पादौ सदावतु ।  ह्रीं चामुण्डायै स्वाहा सर्वाङ्गं मे सदावतु ॥

प्राच्यां पातु महाकाली आगन्ेय्यां रक्त दन्तिका । दक्षिणे पातु चामुण्डा नैर्ऋत्यां पातु कालिका ॥

श्यामा च वारुणे पातु वायव्यां पातु चण्डिका । उत्तरे विकटास्या च ऐशान्यां साट्टहासिनी ॥

ऊध्र्व पातु लोलजिह्वा मायाद्या पात्वध: सदा । जले स्थले चान्तरिक्षे पातु विश्वप्रसू: सदा ॥

इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम् । सर्वेषां कवचानां च सारभूतं परात्परम् ॥

सप्तद्वीपेश्वरो राजा सुचन्द्रोऽस्य प्रसादत: । कवचस्य प्रसादेन मान्धाता पृथिवीपति: ॥

प्रचेता लोमशश्चैव यत: सिद्धो बभूव ह । यतो हि योगिनां श्रेष्ठ: सौभरि: पिप्पलायन: ॥

यदि स्यात् सिद्धकवच: सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् । महादानानि सर्वाणि तपांसि च व्रतानि च ॥

निश्चितं कवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥

इदं कवचमज्ञात्वा भजेत् कलीं जगत्प्रसूम् । शतलक्षप्रप्तोऽपि न मन्त्र: सिद्धिदायक:॥ अर्थ :- नारदजी ने कहा – सर्वज्ञ नाथ! अब मैं आपके मुख से भद्रकाली-कवच तथा उस दशाक्षरी विद्या को सुनना चाहता हूँ ।

श्रीनारायण बोले – नारद! मैं दशाक्षरी महाविद्या तथा तीनों लोकों में दुर्लभ उस गोपनीय कवच का वर्णन करता हूँ, सुनो ।  ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा यही दशाक्षरी विद्या है । इसे पुष्करतीर्थ में सूर्य-ग्रहण के अवसर पर दुर्वासा ने राजा को दिया था । उस समय राजा ने दस लाख जप करके मन्त्र सिद्ध किया और इस उत्तम कवच के पाँच लाख जप से ही वे सिद्धकवच हो गये । तत्पश्चात् वे अयोध्या में लौट आये और इसी कवच की कृपा से उन्होंने सारी पृथ्वी को जीत लिया ।

नारदजी ने कहा – प्रभो! जो तीनों लोकों में दुर्लभ है, उस दशाक्षरी विद्या को तो मैंने सुन लिया । अब मैं कवच सुनना चाहता हूँ, वह मुझसे वर्णन कीजिये ।

श्रीनारायण बोले- विप्रेन्द्र! पूर्वकाल में त्रिपुर-वध के भयंकर अवसर पर शिवजी की विजय के लिये नारायण ने कृपा करके शिव को जो परम अद्भुत कवच प्रदान किया था, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो । मुने! वह कवच अत्यन्त गोपनीयों से भी गोपनीय, तत्त्‍‌वस्वरूप तथा सम्पूर्ण मन्त्रसमुदाय का मूर्तिमान् स्वरूप है । उसी को पूर्वकाल में शिवजी ने दुर्वासा को दिया था और दुर्वासा ने महामनस्वी राजा सुचन्द्र को प्रदान किया था ।

ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा मेरे मस्तक की रक्षा करे । क्लीं कपाल की तथा ह्रीं ह्रीं ह्रीं नेत्रों की रक्षा करे ।  ह्रीं त्रिलोचने स्वाहा सदा मेरी नासिका की रक्षा करे । क्रीं कालिके रक्ष रक्ष स्वाहा सदा दाँतों की रक्षा करे । ह्रीं भद्रकालिके स्वाहा मेरे दोनों ओठों की रक्षा करे ।  ह्रीं ह्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा सदा कण्ठ की रक्षा करे ।  ह्रीं कालिकायै स्वाहा सदा दोनों कानों की रक्षा करें ।  क्रीं क्रीं क्लीं काल्यै स्वाहा सदा मेरे कंधों की रक्षा करे ।  क्रीं भद्रकाल्यै स्वाहा सदा मेरे वक्ष:स्थल की रक्षा करे ।  क्रीं कालिकायै स्वाहा सदा मेरी नाभि की रक्षा करे ।  ह्रीं कालिकायै स्वाहा सदा मेरे पृष्ठभाग की रक्षा करे । रक्तबीजविनाशिन्यै स्वाहा सदा हाथों की रक्षा करे ।  ह्रीं क्लीं मुण्डमालिन्यै स्वाहा सदा पैरों की रक्षा करे ।  ह्रीं चामुण्डायै स्वाहा सदा मेरे सर्वाङ्ग की रक्षा करे । पूर्व में महाकाली और अगिन्कोण में रक्तदन्तिका रक्षा करें । दक्षिण में चामुण्डा रक्षा करें । नैर्ऋत्यकोण में कालिका रक्षा करें । पश्चिम में श्यामा रक्षा करें । वायव्यकोण में चण्डिका, उत्तर में विकटास्या और ईशानकोण में अट्टहासिनी रक्षा करें । ऊ‌र्ध्वभाग में लोलजिह्वा रक्षा करें । अधोभाग में सदा आद्यामाया रक्षा करें । जल, स्थल और अन्तरिक्ष में सदा विश्वप्रसू रक्षा करें ।

वत्स! यह कवच समस्त मन्त्रसमूह का मूर्तरूप, सम्पूर्ण कवचों का सारभूत और उत्कृष्ट से भी उत्कृष्टतर है; इसे मैंने तुम्हें बतला दिया । इसी कवच की कृपा से राजा सुचन्द्र सातों द्वीपों के अधिपति हो गये थे । इसी कवच के प्रभाव से पृथ्वीपति मान्धाता सप्तद्वीपवती पृथ्वी के अधिपति हुए थे । इसी के बल से प्रचेता और लोमश सिद्ध हुए थे तथा इसी के बल से सौभरि और पिप्पलायन योगियों में श्रेष्ठ कहलाये । जिसे यह कवच सिद्ध हो जाता है, वह समस्त सिद्धियों का स्वामी बन जाता है । सभी महादान, तपस्या और व्रत इस कवच की सोलहवीं कला की भी बराबरी नहीं कर सकते, यह निश्चित है । जो इस कवच को जाने बिना जगज्जननी काली का भजन करता है, उसके लिये एक करोड जप करने पर भी यह मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता  ।

11…आद्या काली स्तोत्र

त्रिलोक्य  विजयस्थ  कवचस्य  शिव ऋषि ,

अनुष्टुप  छन्दः, आद्य काली देवता, माया बीजं,

रमा  कीलकम , काम्य सिद्धि विनियोगः || १ ||

ह्रीं आद्य मे शिरः पातु श्रीं  काली वदन  ममं,

हृदयं क्रीं परा शक्तिः पायात  कंठं  परात्परा ||२||

नेत्रौ पातु जगद्धात्री करनौ रक्षतु शंकरी,

घ्रान्नम पातु महा माया  रसानां  सर्व मंगला ||३||

दन्तान रक्षतु कौमारी  कपोलो कमलालया,

औष्ठांधारौं  शामा रक्षेत चिबुकं चारु हासिनि ||४|

ग्रीवां पायात  क्लेशानी  ककुत पातु कृपा मयी,

द्वौ बाहूबाहुदा  रक्षेत  करौ  कैवल्य दायिनी ||५||

स्कन्धौ  कपर्दिनी पातु पृष्ठं  त्रिलोक्य तारिनी,

पार्श्वे पायादपर्न्ना मे कोटिम मे कम्त्थासना ||६||

नभौ  पातु विशालाक्षी प्रजा स्थानं प्रभावती,

उरू रक्षतु कल्यांनी  पादौ मे  पातु  पार्वती ||७||

जयदुर्गे-वतु  प्राणान  सर्वागम सर्व  सिद्धिना,

रक्षा हीनां  तू यत  स्थानं  वर्जितं  कवचेन  च ||८||

इति ते कथितं दिव्य  त्रिलोक्य  विजयाभिधम,

कवचम कालिका देव्या आद्यायाह परमादभुतम ||९||

पूजा काले पठेद  यस्तु आद्याधिकृत मानसः,

सर्वान कामानवाप्नोती  तस्याद्या सुप्रसीदती ||१०||

मंत्र सिद्धिर्वा-वेदाषु  किकराह शुद्रसिद्धयः,

अपुत्रो लभते पुत्र धनार्थी प्राप्नुयाद धनं ||११|

विद्यार्थी लभते विद्याम कामो कामान्वाप्नुयात

सह्स्त्रावृति पाठेन वर्मन्नोस्य पुरस्क्रिया ||१२||

पुरुश्चरन्न  सम्पन्नम यथोक्त फलदं  भवेत्,

चंदनागरू  कस्तूरी कुम्कुमै  रक्त चंदनै ||१३||

भूर्जे विलिख्य गुटिका स्वर्नस्याम धार्येद यदि,

शिखायां दक्षिणे  बाह़ो कंठे वा साधकः कटी ||१४||

तस्याद्या  कालिका वश्या वांछितार्थ प्रयछती,

न कुत्रापि भायं तस्य सर्वत्र विजयी कविः ||१५||

अरोगी  चिर  जीवी  स्यात  बलवान  धारण शाम,

सर्वविद्यासु निपुण सर्व  शास्त्रार्थ  तत्त्व  वित्  ||१६||

वशे तस्य  माहि पाला भोग मोक्षै   कर  स्थितो,

कलि  कल्मष युक्तानां निःश्रेयस   कर  परम ||१७||

12…श्रीसरस्वतीस्तोत्रम.

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रस्त्रावृता

या वीनावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना!!

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता

सा माँ पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा!!१!!

आशासु राशीभवदंगवल्ली

भासैव दासीकृतदुग्धसिन्धुम!

मन्दस्मितैर्निन्दितशारदेन्दुं

वन्देsरविन्दासनसुन्दरि त्वाम!!२!!

शारदा शारादाम्भोजवदना वदनाम्बुजे!

सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात!!३!!

सरस्वतीं च तान नौमि वागधिष्ठातृदेवताम!

देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यद् नुग्रहतो जाना:!!४!!

पातु नो निकषग्रावा मातिहेम्न: सरस्वती!

प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैव करोति या!!५!!

शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं

वीणापुस्तकधारिणीमभयदानं जाडयान्धकारापहाम!

हस्ते स्फाटिकमालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम !!६!!

वीणाधरे विपुलमंगलदानशीले

भक्तार्तिनाशिनी विरंचिहरीशवन्द्ये!

कीर्ति प्रदेsखिलमनोरथदे महार्हे

विद्याप्रदायिनी सरस्वती नौमि नित्यम!!७!!

श्वेताब्जपूर्णविमलासनसंस्थिते हे

श्वेताम्बरावृत मनोहरमंजुगात्रे !

उद्यन्मनोज्ञसितपंकजमुन्जुलास्ये

विद्याप्रदायिनी सरस्वती नौमि नित्यम!!८!!

मातस्त्वदीयपदपंकजभक्तियुक्ता

ये त्वां भजन्ति निखिलानपरान्विहाय!

ते निर्जरत्वमिह यान्ति कलेवरेण

भूवह्विवायुगगनाम्बूविनिर्मितेन!!९!!

मोहान्धकारभरिते हृदये मदीये

मात: सदैव कुरु वासमुदारभावे!

स्वीयाखिलवयवनिर्मल सुप्रभाभी:

शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम!!१०!!

ब्रह्मा जगत सृजति पालयतीन्दिरेश:

शुम्भर्विनाशायति देवि तव प्रभावै:!

न स्याप्रिपा यदि तव प्रकटप्रभावे

न स्यु:कन्चिदपि ते निजकार्यदक्षा:!!११!!

लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तुष्टि: प्रभा धृति:!

एताभि: पाहि तनुभिर्ष्टाभिर्मां सरस्वती !!१२!!

सारस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नम:!

वेदावेदांतवेदांगविद्यास्थानेभ्य एव च !!१३!!

सरस्वती महाभागे विद्ये कमललोचने !

विद्यारूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोs स्तु ते !!१४!!

यद्क्षरं पदं भ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत !

तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरी!!१५!!

13…कालिकाष्टकम
धयानम्
गलद् रक्तमण्डावलीकण्ठमाला महाघोररावा सुदंष्ट्रा कराला ।
विवस्त्रा श्मशानलया मुक्तकेशी महाकालकामाकुला कालिकेयम् ॥१॥
भजे वामयुग्मे शिरोsसिं दधाना वरं दक्षयुग्मेsभयं वै तथैव ।
सुमध्याsपि तुङ्गस्तनाभारनम्रा लसद् रक्तसृक्कद्वया सुस्मितास्या ॥२॥
शवद्वन्द्वकर्णावतंसा सुकेशी लसत्प्रेतपाणिं प्रयुक्तैककाञ्ची ।
शवाकारमञ्चाधिरूढा शिवाभि-श्चतुर्दिक्षशब्दायमानाsभिरेजे ॥३॥
स्तुति:
विरञ्च्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणांस्त्रीन् समाराध्य कालीं प्रधाना बभूवु: ।
अनादिं सुरादिं मखादिं भवादिं स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥४॥
जगन्मोहनीयं तु वाग्वादिनीयं सुहृत्पोषिणीशत्रुसंहारणीयम् ।
वचस्तम्भनीयं किमुच्चाटनीयं स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥५॥
इयं स्वर्गदात्री पुन: कल्पवल्ली मनोजांस्तु कामान् यथार्थं प्रकुर्यात् ।
तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यं स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥६॥
सुरापानमत्ता सभुक्तानुरक्ता लसत्पूतचित्ते सदाविर्भवत्ते ।
जपध्यानपूजासुधाधौतपङ्का स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥७॥
चिदान्दकन्दं हसन् मन्दमन्दं शरच्चन्द्रकोटिप्रभापुञ्जबिम्बम् ।
मुनीनां कवीनां हृदि द्योतयन्तं स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा:॥८॥
महामेघकाली सुरक्तापि शुभ्रा कदाचिद् विचित्राकृतिर्योगमाया ।
न बाला न वृद्धा न कामातुरापि स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥९॥
क्षमस्वापराधं महागुप्तभावं मया लोकमध्ये प्रकाशीकृत यत् ।
तव ध्यानपूतेन चापल्यभावात् स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥१०॥

फलश्रुति:
यदि ध्यानयुक्तं पठेद् यो मनुष्य-स्तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च ।
गृह चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्ति: स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥११॥
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीकालिकाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

14…महाकाल स्तोत्रं :-
इस स्तोत्र को भगवान् महाकाल ने खुदभैरवी को बताया था.इसकी महिमा का जितना वर्णन किया जाये कम है.इसमें भगवान् महाकाल के विभिन्न नामों का वर्णनकरते हुए उनकी स्तुति की गयी है .
शिव भक्तों के लिएयह स्तोत्र वरदान स्वरुप है . नित्य एक बार जपभी साधक के अन्दर शक्ति तत्त्व और वीर तत्त्वजाग्रतकर देता है . मन में प्रफुल्लता आ जाती है . भगवान्शिव की साधना में यदि इसका एक बार जप करलिया जाये तो सफलता की सम्भावना बड जाती है .
ॐ महाकाल महाकाय महाकाल जगत्पते
महाकाल महायोगिन महाकाल नमोस्तुते
महाकाल महादेव महाकाल महा प्रभो
महाकाल महारुद्र महाकाल नमोस्तुते
महाकाल महाज्ञान महाकाल तमोपहन
महाकाल महाकाल महाकाल नमोस्तुते
भवाय च नमस्तुभ्यं शर्वाय च नमो नमः
रुद्राय च नमस्तुभ्यं पशुना पतये नमः
उग्राय च नमस्तुभ्यं महादेवाय वै नमः
भीमाय च नमस्तुभ्यं मिशानाया नमो नमः
ईश्वराय नमस्तुभ्यं तत्पुरुषाय वै नमः
सघोजात नमस्तुभ्यं शुक्ल वर्ण नमो नमः
अधः काल अग्नि रुद्राय रूद्र रूप आय वै नमः
स्थितुपति लयानाम च हेतु रूपआय वै नमः
परमेश्वर रूप स्तवं नील कंठ नमोस्तुते
पवनाय नमतुभ्यम हुताशन नमोस्तुते
सोम रूप नमस्तुभ्यं सूर्य रूप नमोस्तुते
यजमान नमस्तुभ्यं अकाशाया नमो नमः
सर्व रूप नमस्तुभ्यं विश्व रूप नमोस्तुते
ब्रहम रूप नमस्तुभ्यं विष्णु रूप नमोस्तुते
रूद्र रूप नमस्तुभ्यं महाकाल नमोस्तुते
स्थावराय नमस्तुभ्यं जंघमाय नमो नमः
नमः उभय रूपा भ्याम शाश्वताय नमो नमः
हुं हुंकार नमस्तुभ्यं निष्कलाय नमो नमः
सचिदानंद रूपआय महाकालाय ते नमः
प्रसीद में नमो नित्यं मेघ वर्ण नमोस्तुते
प्रसीद में महेशान दिग्वासाया नमो नमः
ॐ ह्रीं माया – स्वरूपाय सच्चिदानंद तेजसे
स्वः सम्पूर्ण मन्त्राय सोऽहं हंसाय ते नमः
फल श्रुति
इत्येवं देव देवस्य मह्कालासय भैरवी कीर्तितम पूजनं सम्यक सधाकानाम सुखावहम…

15…॥ दशमहाविद्यास्तोत्रम् ॥

ॐ नमस्ते चण्डिके चण्डि चण्डमुण्डविनाशिनि ।
नमस्ते कालिके कालमहाभयविनाशिनि ॥ १॥

शिवे रक्ष जगद्धात्रि प्रसीद हरवल्लभे ।
प्रणमामि जगद्धात्रीं जगत्पालनकारिणीम् ॥ २॥

जगत् क्षोभकरीं विद्यां जगत्सृष्टिविधायिनीम् ।
करालां विकटां घोरां मुण्डमालाविभूषिताम् ॥ ३॥

हरार्चितां हराराध्यां नमामि हरवल्लभाम् ।
गौरीं गुरुप्रियां गौरवर्णालङ्कारभूषिताम् ॥ ४॥

हरिप्रियां महामायां नमामि ब्रह्मपूजिताम् ।
सिद्धां सिद्धेश्वरीं सिद्धविद्याधरङ्गणैर्युताम् ॥ ५॥

मन्त्रसिद्धिप्रदां योनिसिद्धिदां लिङ्गशोभिताम् ।
प्रणमामि महामायां दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम् ॥ ६॥

उग्रामुग्रमयीमुग्रतारामुग्रगणैर्युताम् ।
नीलां नीलघनश्यामां नमामि नीलसुन्दरीम् ॥ ७॥

श्यामाङ्गीं श्यामघटितां श्यामवर्णविभूषिताम् ।
प्रणमामि जगद्धात्रीं गौरीं सर्वार्थसाधिनीम् ॥ ८॥

विश्वेश्वरीं महाघोरां विकटां घोरनादिनीम् ।
आद्यामाद्यगुरोराद्यामाद्यनाथप्रपूजिताम् ॥ ९॥

श्रीं दुर्गां धनदामन्नपूर्णां पद्मां सुरेश्वरीम् ।
प्रणमामि जगद्धात्रीं चन्द्रशेखरवल्लभाम् ॥ १०॥

त्रिपुरां सुन्दरीं बालामबलागणभूषिताम् ।
शिवदूतीं शिवाराध्यां शिवध्येयां सनातनीम् ॥ ११॥

सुन्दरीं तारिणीं सर्वशिवागणविभूषिताम् ।
नारायणीं विष्णुपूज्यां ब्रह्मविष्णुहरप्रियाम् ॥ १२॥

सर्वसिद्धिप्रदां नित्यामनित्यां गुणवर्जिताम् ।
सगुणां निर्गुणां ध्येयामर्चितां सर्वसिद्धिदाम् ॥ १३॥

विद्यां सिद्धिप्रदां विद्यां महाविद्यां महेश्वरीम् ।
महेशभक्तां माहेशीं महाकालप्रपूजिताम् ॥ १४॥

प्रणमामि जगद्धात्रीं शुम्भासुरविमर्दिनीम् ।
रक्तप्रियां रक्तवर्णां रक्तबीजविमर्दिनीम् ॥ १५॥

भैरवीं भुवनां देवीं लोलजिव्हां सुरेश्वरीम् ।
चतुर्भुजां दशभुजामष्टादशभुजां शुभाम् ॥ १६॥

त्रिपुरेशीं विश्वनाथप्रियां विश्वेश्वरीं शिवाम् ।
अट्टहासामट्टहासप्रियां धूम्रविनाशिनीम् ॥ १७॥

कमलां छिन्नभालाञ्च मातङ्गीं सुरसुन्दरीम् ।
षोडशीं विजयां भीमां धूमाञ्च वगलामुखीम् ॥ १८॥

सर्वसिद्धिप्रदां सर्वविद्यामन्त्रविशोधिनीम् ।
प्रणमामि जगत्तारां साराञ्च मन्त्रसिद्धये ॥ १९॥

इत्येवञ्च वरारोहे स्तोत्रं सिद्धिकरं परम् ।
पठित्वा मोक्षमाप्नोति सत्यं वै गिरिनन्दिनि ॥ २०॥

इति दशमहाविद्यास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

16…..काली-सहस्रनाम
============
श्मशान-कालिका काली भद्रकाली कपालिनी ।
गुह्य-काली महाकाली कुरु-कुल्ला विरोधिनी ।।१।।
कालिका काल-रात्रिश्च महा-काल-नितम्बिनी ।
काल-भैरव-भार्या च कुल-वत्र्म-प्रकाशिनी ।।२।।
कामदा कामिनीया कन्या कमनीय-स्वरूपिणी ।
कस्तूरी-रस-लिप्ताङ्गी कुञ्जरेश्वर-गामिनी।।३।।
ककार-वर्ण-सर्वाङ्गी कामिनी काम-सुन्दरी ।
कामात्र्ता काम-रूपा च काम-धेनुु: कलावती ।।४।।
कान्ता काम-स्वरूपा च कामाख्या कुल-कामिनी ।
कुलीना कुल-वत्यम्बा दुर्गा दुर्गति-नाशिनी ।।५।।
कौमारी कुलजा कृष्णा कृष्ण-देहा कृशोदरी ।
कृशाङ्गी कुलाशाङ्गी च क्रीज्ररी कमला कला ।।६।।
करालास्य कराली च कुल-कांतापराजिता ।
उग्रा उग्र-प्रभा दीप्ता विप्र-चित्ता महा-बला ।।७।।
नीला घना मेघ-नाद्रा मात्रा मुद्रा मिताऽमिता ।
ब्राह्मी नारायणी भद्रा सुभद्रा भक्त-वत्सला ।।८।।
माहेश्वरी च चामुण्डा वाराही नारसिंहिका ।
वङ्कांगी वङ्का-कंकाली नृ-मुण्ड-स्रग्विणी शिवा ।।९।।
मालिनी नर-मुण्डाली-गलद्रक्त-विभूषणा ।
रक्त-चन्दन-सिक्ताङ्गी सिंदूरारुण-मस्तका ।।१०।।
घोर-रूपा घोर-दंष्ट्रा घोरा घोर-तरा शुभा ।
महा-दंष्ट्रा महा-माया सुदन्ती युग-दन्तुरा ।।११।।
सुलोचना विरूपाक्षी विशालाक्षी त्रिलोचना ।
शारदेन्दु-प्रसन्नस्या स्पुâरत्-स्मेराम्बुजेक्षणा ।।१२।।
अट्टहासा प्रफुल्लास्या स्मेर-वक्त्रा सुभाषिणी ।
प्रफुल्ल-पद्म-वदना स्मितास्या प्रिय-भाषिणी ।।१३।।
कोटराक्षी कुल-श्रेष्ठा महती बहु-भाषिणी ।
सुमति: मतिश्चण्डा चण्ड-मुण्डाति-वेगिनी ।।१४।।
प्रचण्डा चण्डिका चण्डी चर्चिका चण्ड-वेगिनी ।
सुकेशी मुक्त-केशी च दीर्घ-केशी महा-कचा ।।१५।।
पे्रत-देही-कर्ण-पूरा प्रेत-पाणि-सुमेखला ।
प्रेतासना प्रिय-प्रेता प्रेत-भूमि-कृतालया ।।१६।।
श्मशान-वासिनी पुण्या पुण्यदा कुल-पण्डिता ।
पुण्यालया पुण्य-देहा पुण्य-श्लोका च पावनी ।।१७।।
पूता पवित्रा परमा परा पुण्य-विभूषणा ।
पुण्य-नाम्नी भीति-हरा वरदा खङ्ग-पाशिनी ।।१८।।
नृ-मुण्ड-हस्ता शस्त्रा च छिन्नमस्ता सुनासिका ।
दक्षिणा श्यामला श्यामा शांता पीनोन्नत-स्तनी ।।१९।।
दिगम्बरा घोर-रावा सृक्कान्ता-रक्त-वाहिनी ।
महा-रावा शिवा संज्ञा नि:संगा मदनातुरा ।।२०।।
मत्ता प्रमत्ता मदना सुधा-सिन्धु-निवासिनी ।
अति-मत्ता महा-मत्ता सर्वाकर्षण-कारिणी ।।२१।।
गीत-प्रिया वाद्य-रता प्रेत-नृत्य-परायणा ।
चतुर्भुजा दश-भुजा अष्टादश-भुजा तथा ।।२२।।
कात्यायनी जगन्माता जगती-परमेश्वरी ।
जगद्-बन्धुर्जगद्धात्री जगदानन्द-कारिणी ।।२३।।
जगज्जीव-मयी हेम-वती महामाया महा-लया ।
नाग-यज्ञोपवीताङ्गी नागिनी नाग-शायनी ।।२४।।
नाग-कन्या देव-कन्या गान्धारी किन्नरेश्वरी ।
मोह-रात्री महा-रात्री दरुणाभा सुरासुरी ।।२५।।
विद्या-धरी वसु-मती यक्षिणी योगिनी जरा ।
राक्षसी डाकिनी वेद-मयी वेद-विभूषणा ।।२६।।
श्रुति-स्मृतिर्महा-विद्या गुह्य-विद्या पुरातनी ।
चिंताऽचिंता स्वधा स्वाहा निद्रा तन्द्रा च पार्वती ।।२७।।
अर्पणा निश्चला लीला सर्व-विद्या-तपस्विनी ।
गङ्गा काशी शची सीता सती सत्य-परायणा ।।२८।।
नीति: सुनीति: सुरुचिस्तुष्टि: पुष्टिर्धृति: क्षमा ।
वाणी बुद्धिर्महा-लक्ष्मी लक्ष्मीर्नील-सरस्वती ।।२९।।
स्रोतस्वती स्रोत-वती मातङ्गी विजया जया ।
नदी सिन्धु: सर्व-मयी तारा शून्य निवासिनी ।।३०।।
शुद्धा तरंगिणी मेधा शाकिनी बहु-रूपिणी ।
सदानन्द-मयी सत्या सर्वानन्द-स्वरूपणि ।।३१।।
स्थूला सूक्ष्मा सूक्ष्म-तरा भगवत्यनुरूपिणी ।
परमार्थ-स्वरूपा च चिदानन्द-स्वरूपिणी ।।३२।।
सुनन्दा नन्दिनी स्तुत्या स्तवनीया स्वभाविनी ।
रंकिणी टंकिणी चित्रा विचित्रा चित्र-रूपिणी ।।३३।।
पद्मा पद्मालया पद्म-मुखी पद्म-विभूषणा ।
शाकिनी हाकिनी क्षान्ता राकिणी रुधिर-प्रिया ।।३४।।
भ्रान्तिर्भवानी रुद्राणी मृडानी शत्रु-मर्दिनी ।
उपेन्द्राणी महेशानी ज्योत्स्ना चन्द्र-स्वरूपिणी ।।३५।।
सूय्र्यात्मिका रुद्र-पत्नी रौद्री स्त्री प्रकृति: पुमान् ।
शक्ति: सूक्तिर्मति-मती भक्तिर्मुक्ति: पति-व्रता ।।३६।।
सर्वेश्वरी सर्व-माता सर्वाणी हर-वल्लभा ।
सर्वज्ञा सिद्धिदा सिद्धा भाव्या भव्या भयापहा ।।३७।।
कर्त्री हर्त्री पालयित्री शर्वरी तामसी दया ।
तमिस्रा यामिनीस्था न स्थिरा धीरा तपस्विनी ।।३८।।
चार्वङ्गी चंचला लोल-जिह्वा चारु-चरित्रिणी ।
त्रपा त्रपा-वती लज्जा निर्लज्जा ह्नीं रजोवती ।।३९।।
सत्व-वती धर्म-निष्ठा श्रेष्ठा निष्ठुर-वादिनी ।
गरिष्ठा दुष्ट-संहत्री विशिष्टा श्रेयसी घृणा ।।४०।।
भीमा भयानका भीमा-नादिनी भी: प्रभावती ।
वागीश्वरी श्रीर्यमुना यज्ञ-कत्र्री यजु:-प्रिया ।।४१।।
ऋक्-सामाथर्व-निलया रागिणी शोभन-स्वरा ।
कल-कण्ठी कम्बु-कण्ठी वेणु-वीणा-परायणा ।।४२।।
वशिनी वैष्णवी स्वच्छा धात्री त्रि-जगदीश्वरी ।
मधुमती कुण्डलिनी शक्ति: ऋद्धि: सिद्धि: शुचि-स्मिता ।।४३।।
रम्भोवैशी रती रामा रोहिणी रेवती मघा ।
शङ्खिनी चक्रिणी कृष्णा गदिनी पद्मनी तथा ।।४४।।
शूलिनी परिघास्त्रा च पाशिनी शाङ्र्ग-पाणिनी ।
पिनाक-धारिणी धूम्रा सुरभि वन-मालिनी ।।४५।।
रथिनी समर-प्रीता च वेगिनी रण-पण्डिता ।
जटिनी वङ्किाणी नीला लावण्याम्बुधि-चन्द्रिका ।।४६।।
बलि-प्रिया महा-पूज्या पूर्णा दैत्येन्द्र-मन्थिनी ।
महिषासुर-संहन्त्री वासिनी रक्त-दन्तिका ।।४७।।
रक्तपा रुधिराक्ताङ्गी रक्त-खर्पर-हस्तिनी ।
रक्त-प्रिया माँस – रुधिरासवासक्त-मानसा ।।४८।।
गलच्छोेणित-मुण्डालि-कण्ठ-माला-विभूषणा ।
शवासना चितान्त:स्था माहेशी वृष-वाहिनी ।।४९।।
व्याघ्र-त्वगम्बरा चीर-चेलिनी सिंह-वाहिनी ।
वाम-देवी महा-देवी गौरी सर्वज्ञ-भाविनी ।।५०।।
बालिका तरुणी वृद्धा वृद्ध-माता जरातुरा ।
सुभ्रुर्विलासिनी ब्रह्म-वादिनि ब्रह्माणी मही ।।५१।।
स्वप्नावती चित्र-लेखा लोपा-मुद्रा सुरेश्वरी ।
अमोघाऽरुन्धती तीक्ष्णा भोगवत्यनुवादिनी ।।५२।।
मन्दाकिनी मन्द-हासा ज्वालामुख्यसुरान्तका ।
मानदा मानिनी मान्या माननीया मदोद्धता ।।५३।।
मदिरा मदिरोन्मादा मेध्या नव्या प्रसादिनी ।
सुमध्यानन्त-गुणिनी सर्व-लोकोत्तमोत्तमा ।।५४।।
जयदा जित्वरा जेत्री जयश्रीर्जय-शालिनी ।
सुखदा शुभदा सत्या सभा-संक्षोभ-कारिणी ।।५५।।
शिव-दूती भूति-मती विभूतिर्भीषणानना ।
कौमारी कुलजा कुन्ती कुल-स्त्री कुल-पालिका ।।५६।।
कीर्तिर्यशस्विनी भूषां भूष्या भूत-पति-प्रिया ।
सगुणा-निर्गुणा धृष्ठा कला-काष्ठा प्रतिष्ठिता ।।५७।।
धनिष्ठा धनदा धन्या वसुधा स्व-प्रकाशिनी ।
उर्वी गुर्वी गुरु-श्रेष्ठा सगुणा त्रिगुणात्मिका ।।५८।।
महा-कुलीना निष्कामा सकामा काम-जीवना ।
काम-देव-कला रामाभिरामा शिव-नर्तकी ।।५९।।
चिन्तामणि: कल्पलता जाग्रती दीन-वत्सला ।
कार्तिकी कृत्तिका कृत्या अयोेध्या विषमा समा ।।६०।।
सुमंत्रा मंत्रिणी घूर्णा ह्लादिनी क्लेश-नाशिनी ।
त्रैलोक्य-जननी हृष्टा निर्मांसा मनोरूपिणी ।।६१।।
तडाग-निम्न-जठरा शुष्क-मांसास्थि-मालिनी ।
अवन्ती मथुरा माया त्रैलोक्य-पावनीश्वरी ।।६२।।
व्यक्ताव्यक्तानेक-मूर्ति: शर्वरी भीम-नादिनी ।
क्षेमज्र्री शंकरी च सर्व- सम्मोह-कारिणी ।।६३।।
ऊध्र्व-तेजस्विनी क्लिन्न महा-तेजस्विनी तथा ।
अद्वैत भोगिनी पूज्या युवती सर्व-मङ्गला ।।६४।।
सर्व-प्रियंकरी भोग्या धरणी पिशिताशना ।
भयंकरी पाप-हरा निष्कलंका वशंकरी ।।६५।।
आशा तृष्णा चन्द्र-कला निद्रिका वायु-वेगिनी ।
सहस्र-सूर्य संकाशा चन्द्र-कोटि-सम-प्रभा ।।६६।।
वह्नि-मण्डल-मध्यस्था सर्व-तत्त्व-प्रतिष्ठिता ।
सर्वाचार-वती सर्व-देव – कन्याधिदेवता ।।६७।।
दक्ष-कन्या दक्ष-यज्ञ नाशिनी दुर्ग तारिणी ।
इज्या पूज्या विभीर्भूति: सत्कीर्तिब्र्रह्म-रूपिणी ।।६८।।
रम्भीश्चतुरा राका जयन्ती करुणा कुहु: ।
मनस्विनी देव-माता यशस्या ब्रह्म-चारिणी ।।६९।।
ऋद्धिदा वृद्धिदा वृद्धि: सर्वाद्या सर्व-दायिनी ।
आधार-रूपिणी ध्येया मूलाधार-निवासिनी ।।७०।।
आज्ञा प्रज्ञा-पूर्ण-मनाश्चन्द्र-मुख्यानुवूâलिनी ।
वावदूका निम्न-नाभि: सत्या सन्ध्या दृढ़-व्रता ।।७१।।
आन्वीक्षिकी दंड-नीतिस्त्रयी त्रि-दिव-सुन्दरी ।
ज्वलिनी ज्वालिनी शैल-तनया विन्ध्य-वासिनी ।।७२।।
अमेया खेचरी धैर्या तुरीया विमलातुरा ।
प्रगल्भा वारुणीच्छाया शशिनी विस्पुâलिङ्गिनी ।।७३।।
भुक्ति सिद्धि सदा प्राप्ति: प्राकम्या महिमाणिमा ।
इच्छा-सिद्धिर्विसिद्धा च वशित्वीध्र्व-निवासिनी ।।७४।।
लघिमा चैव गायित्री सावित्री भुवनेश्वरी ।
मनोहरा चिता दिव्या देव्युदारा मनोरमा ।।७५।।
पिंगला कपिला जिह्वा-रसज्ञा रसिका रसा ।
सुषुम्नेडा भोगवती गान्धारी नरकान्तका ।।७६।।
पाञ्चाली रुक्मिणी राधाराध्या भीमाधिराधिका ।
अमृता तुलसी वृन्दा वैâटभी कपटेश्वरी ।।७७।।
उग्र-चण्डेश्वरी वीर-जननी वीर-सुन्दरी ।
उग्र-तारा यशोदाख्या देवकी देव-मानिता ।।७८।।
निरन्जना चित्र-देवी क्रोधिनी कुल-दीपिका ।
कुल-वागीश्वरी वाणी मातृका द्राविणी द्रवा ।।७९।।
योगेश्वरी-महा-मारी भ्रामरी विन्दु-रूपिणी ।
दूती प्राणेश्वरी गुप्ता बहुला चामरी-प्रभा ।।८०।।
कुब्जिका ज्ञानिनी ज्येष्ठा भुशुंडी प्रकटा तिथि: ।
द्रविणी गोपिनी माया काम-बीजेश्वरी क्रिया ।।८१।।
शांभवी केकरा मेना मूषलास्त्रा तिलोत्तमा ।
अमेय-विक्रमा व्रूâरा सम्पत्-शाला त्रिलोचना ।।८२।।
सुस्थी हव्य-वहा प्रीतिरुष्मा धूम्रार्चिरङ्गदा ।
तपिनी तापिनी विश्वा भोगदा धारिणी धरा ।।८३।।
त्रिखंडा बोधिनी वश्या सकला शब्द-रूपिणी ।
बीज-रूपा महा-मुद्रा योगिनी योनि-रूपिणी ।।८४।।
अनङ्ग – मदनानङ्ग – लेखनङ्ग – कुशेश्वरी ।
अनङ्ग-मालिनि-कामेशी देवि सर्वार्थ-साधिका ।।८५।।
सर्व-मन्त्र-मयी मोहिन्यरुणानङ्ग-मोहिनी ।
अनङ्ग-कुसुमानङ्ग-मेखलानङ्ग – रूपिणी ।।८६।।
वङ्कोश्वरी च जयिनी सर्व-द्वन्द्व-क्षयज्र्री ।
षडङ्ग-युवती योग-युक्ता ज्वालांशु-मालिनी ।।८७।।
दुराशया दुराधारा दुर्जया दुर्ग-रूपिणी ।
दुरन्ता दुष्कृति-हरा दुध्र्येया दुरतिक्रमा ।।८८।।
हंसेश्वरी त्रिकोणस्था शाकम्भर्यनुकम्पिनी ।
त्रिकोण-निलया नित्या परमामृत-रञ्जिता ।।८९।।
महा-विद्येश्वरी श्वेता भेरुण्डा कुल-सुन्दरी ।
त्वरिता भक्त-संसक्ता भक्ति-वश्या सनातनी ।।९०।।
भक्तानन्द-मयी भक्ति-भाविका भक्ति-शज्र्री ।
सर्व-सौन्दर्य-निलया सर्व-सौभाग्य-शालिनी ।।९१।।
सर्व-सौभाग्य-भवना सर्व सौख्य-निरूपिणी ।
कुमारी-पूजन-रता कुमारी-व्रत-चारिणी ।।९२।।
कुमारी-भक्ति-सुखिनी कुमारी-रूप-धारिणी ।
कुमारी-पूजक-प्रीता कुमारी प्रीतिदा प्रिया ।।९३।।
कुमारी-सेवकासंगा कुमारी-सेवकालया ।
आनन्द-भैरवी बाला भैरवी वटुक-भैरवी ।।९४।।
श्मशान-भैरवी काल-भैरवी पुर-भैरवी ।
महा-भैरव-पत्नी च परमानन्द-भैरवी ।।९५।।
सुधानन्द-भैरवी च उन्मादानन्द-भैरवी ।
मुक्तानन्द-भैरवी च तथा तरुण-भैरवी ।।९६।।
ज्ञानानन्द-भैरवी च अमृतानन्द-भैरवी ।
महा-भयज्र्री तीव्रा तीव्र-वेगा तपस्विनी ।।९७।।
त्रिपुरा परमेशानी सुन्दरी पुर-सुन्दरी ।
त्रिपुरेशी पञ्च-दशी पञ्चमी पुर-वासिनी ।।९८।।
महा-सप्त-दशी चैव षोडशी त्रिपुरेश्वरी ।
महांकुश-स्वरूपा च महा-चव्रेâश्वरी तथा ।।९९।।
नव-चव्रेâश्वरी चक्र-ईश्वरी त्रिपुर-मालिनी ।
राज-राजेश्वरी धीरा महा-त्रिपुर-सुन्दरी ।।१००।।
सिन्दूर-पूर-रुचिरा श्रीमत्त्रिपुर-सुन्दरी ।
सर्वांग-सुन्दरी रक्ता रक्त-वस्त्रोत्तरीयिणी ।।१०१।।
जवा-यावक-सिन्दूर -रक्त-चन्दन-धारिणी ।
त्रिकूटस्था पञ्च-कूटा सर्व-वूâट-शरीरिणी ।।१०२।।
चामरी बाल-कुटिल-निर्मल-श्याम-केशिनी ।
वङ्का-मौक्तिक-रत्नाढ्या-किरीट-मुकुटोज्ज्वला ।।१०३।।
रत्न-कुण्डल-संसक्त-स्फुरद्-गण्ड-मनोरमा ।
कुञ्जरेश्वर-कुम्भोत्थ-मुक्ता-रञ्जित-नासिका ।।१०४।।
मुक्ता-विद्रुम-माणिक्य-हाराढ्य-स्तन-मण्डला ।
सूर्य-कान्तेन्दु-कान्ताढ्य-कान्ता-कण्ठ-भूषणा ।।१०५।।
वीजपूर-स्फुरद्-वीज -दन्त – पंक्तिरनुत्तमा ।
काम-कोदण्डकाभुग्न-भ्रू-कटाक्ष-प्रवर्षिणी ।।१०६।।
मातंग-कुम्भ-वक्षोजा लसत्कोक-नदेक्षणा ।
मनोज्ञ-शुष्कुली-कर्णा हंसी-गति-विडम्बिनी ।।१०७।।
पद्म-रागांगदा-ज्योतिर्दोश्चतुष्क-प्रकाशिनी ।
नाना-मणि-परिस्फूर्जच्दृद्ध-कांचन-वंâकणा ।।१०८।।
नागेन्द्र-दन्त-निर्माण-वलयांचित-पाणिनी ।
अंगुरीयक-चित्रांगी विचित्र-क्षुद्र-घण्टिका ।।१०९।।
पट्टाम्बर-परीधाना कल-मञ्जीर-शिंजिनी ।
कर्पूरागरु-कस्तूरी-कुंकुम-द्रव-लेपिता ।।११०।।
विचित्र-रत्न-पृथिवी-कल्प-शाखि-तल-स्थिता ।
रत्न-द्वीप-स्पुâरद्-रक्त-सिंहासन-विलासिनी ।।१११।।
षट्-चक्र-भेदन-करी परमानन्द-रूपिणी ।
सहस्र-दल – पद्यान्तश्चन्द्र – मण्डल-वर्तिनी ।।११२।।
ब्रह्म-रूप-शिव-क्रोड-नाना-सुख-विलासिनी ।
हर-विष्णु-विरंचीन्द्र-ग्रह – नायक-सेविता ।।११३।।
शिवा शैवा च रुद्राणी तथैव शिव-वादिनी ।
मातंगिनी श्रीमती च तथैवानन्द-मेखला ।।११४।।
डाकिनी योगिनी चैव तथोपयोगिनी मता ।
माहेश्वरी वैष्णवी च भ्रामरी शिव-रूपिणी ।।११५।।
अलम्बुषा वेग-वती क्रोध-रूपा सु-मेखला ।
गान्धारी हस्ति-जिह्वा च इडा चैव शुभज्र्री ।।११६।।
पिंगला ब्रह्म-सूत्री च सुषुम्णा चैव गन्धिनी ।
आत्म-योनिब्र्रह्म-योनिर्जगद-योनिरयोनिजा ।।११७।।
भग-रूपा भग-स्थात्री भगनी भग-रूपिणी ।
भगात्मिका भगाधार-रूपिणी भग-मालिनी ।।११८।।
लिंगाख्या चैव लिंगेशी त्रिपुरा-भैरवी तथा ।
लिंग-गीति: सुगीतिश्च लिंगस्था लिंग-रूप-धृव्â ।।११९।।
लिंग-माना लिंग-भवा लिंग-लिंगा च पार्वती ।
भगवती कौशिकी च प्रेमा चैव प्रियंवदा ।।१२०।।
गृध्र-रूपा शिवा-रूपा चक्रिणी चक्र-रूप-धृव्â ।
लिंगाभिधायिनी लिंग-प्रिया लिंग-निवासिनी ।।१२१।।
लिंगस्था लिंगनी लिंग-रूपिणी लिंग-सुन्दरी ।
लिंग-गीतिमहा-प्रीता भग-गीतिर्महा-सुखा ।।१२२।।
लिंग-नाम-सदानंदा भग-नाम सदा-रति: ।
लिंग-माला-वंâठ-भूषा भग-माला-विभूषणा ।।१२३।।
भग-लिंगामृत-प्रीता भग-लिंगामृतात्मिका ।
भग-लिंगार्चन-प्रीता भग-लिंग-स्वरूपिणी ।।१२४।।
भग-लिंग-स्वरूपा च भग-लिंग-सुखावहा ।
स्वयम्भू-कुसुम-प्रीता स्वयम्भू-कुसुमार्चिता ।।१२५।।
स्वयम्भू-पुष्प-प्राणा स्वयम्भू-कुसुमोत्थिता ।
स्वयम्भू-कुसुम-स्नाता स्वयम्भू-पुष्प-तर्पिता ।।१२६।।
स्वयम्भू-पुष्प-घटिता स्वयम्भू-पुष्प-धारिणी ।
स्वयम्भू-पुष्प-तिलका स्वयम्भू-पुष्प-चर्चिता ।।१२७।।
स्वयम्भू-पुष्प-निरता स्वयम्भू-कुसुम-ग्रहा ।
स्वयम्भू-पुष्प-यज्ञांगा स्वयम्भूकुसुमात्मिका ।।१२८।।
स्वयम्भू-पुष्प-निचिता स्वयम्भू-कुसुम-प्रिया ।
स्वयम्भू-कुसुमादान-लालसोन्मत्त – मानसा ।।१२९।।
स्वयम्भू-कुसुमानन्द-लहरी-स्निग्ध देहिनी ।
स्वयम्भू-कुसुमाधारा स्वयम्भू-वुुâसुमा-कला ।।१३०।।
स्वयम्भू-पुष्प-निलया स्वयम्भू-पुष्प-वासिनी ।
स्वयम्भू-कुसुम-स्निग्धा स्वयम्भू-कुसुमात्मिका ।।१३१।।
स्वयम्भू-पुष्प-कारिणी स्वयम्भू-पुष्प-पाणिका ।
स्वयम्भू-कुसुम-ध्याना स्वयम्भू-कुसुम-प्रभा ।।१३२।।
स्वयम्भू-कुसुम-ज्ञाना स्वयम्भू-पुष्प-भोगिनी ।
स्वयम्भू-कुसुमोल्लास स्वयम्भू-पुष्प-वर्षिणी ।।१३३।।
स्वयम्भू-कुसुमोत्साहा स्वयम्भू-पुष्प-रूपिणी ।
स्वयम्भू-कुसुमोन्मादा स्वयम्भू पुष्प-सुन्दरी ।।१३४।।
स्वयम्भू-कुसुमाराध्या स्वयम्भू-कुसुमोद्भवा ।
स्वयम्भू-कुसुम-व्यग्रा स्वयम्भू-पुष्प-पूर्णिता ।।१३५।।
स्वयम्भू-पूजक-प्रज्ञा स्वयम्भू-होतृ-मातृका ।
स्वयम्भू-दातृ-रक्षित्री स्वयम्भू-रक्त-तारिका ।।१३६।।
स्वयम्भू-पूजक-ग्रस्ता स्वयम्भू-पूजक-प्रिया ।
स्वयम्भू-वन्दकाधारा स्वयम्भू-निन्दकान्तका ।।१३७।।
स्वयम्भू-प्रद-सर्वस्वा स्वयम्भू-प्रद-पुत्रिणी ।
स्वम्भू-प्रद-सस्मेरा स्वयम्भू-प्रद-शरीरिणी ।।१३८।।
सर्व-कालोद्भव-प्रीता सर्व-कालोद्भवात्मिका ।
सर्व-कालोद्भवोद्भावा सर्व-कालोद्भवोद्भवा ।।१३९।।
कुण्ड-पुष्प-सदा-प्रीतिर्गोल-पुष्प-सदा-रति: ।
कुण्ड-गोलोद्भव-प्राणा कुण्ड-गोलोद्भवात्मिका ।।१४०।।
स्वयम्भुवा शिवा धात्री पावनी लोक-पावनी ।
कीर्तिर्यशस्विनी मेधा विमेधा शुक्र-सुन्दरी ।।१४१।।
अश्विनी कृत्तिका पुष्या तैजस्का चन्द्र-मण्डला ।
सूक्ष्माऽसूक्ष्मा वलाका च वरदा भय-नाशिनी ।।१४२।।
वरदाऽभयदा चैव मुक्ति-बन्ध-विनाशिनी ।
कामुका कामदा कान्ता कामाख्या कुल-सुन्दरी ।।१४३।।
दुःखदा सुखदा मोक्षा मोक्षदार्थ-प्रकाशिनी ।
दुष्टादुष्ट-मतिश्चैव सर्व-कार्य-विनाशिनी ।।१४४।।
शुक्राधारा शुक्र-रूपा-शुक्र-सिन्धु-निवासिनी ।
शुक्रालया शुक्र-भोग्या शुक्र-पूजा-सदा-रति:।।१४५।।
शुक्र-पूज्या-शुक्र-होम-सन्तुष्टा शुक्र-वत्सला ।
शुक्र-मूत्र्ति: शुक्र-देहा शुक्र-पूजक-पुत्रिणी ।।१४६।।
शुक्रस्था शुक्रिणी शुक्र-संस्पृहा शुक्र-सुन्दरी ।
शुक्र-स्नाता शुक्र-करी शुक्र-सेव्याति-शुक्रिणी ।।१४७।।
महा-शुक्रा शुक्र-भवा शुक्र-वृष्टि-विधायिनी ।
शुक्राभिधेया शुक्रार्हा शुक्र-वन्दक-वन्दिता ।।१४८।।
शुक्रानन्द-करी शुक्र-सदानन्दाभिधायिका ।
शुक्रोत्सवा सदा-शुक्र-पूर्णा शुक्र-मनोरमा ।।१४९।।
शुक्र-पूजक-सर्वस्वा शुक्र-निन्दक-नाशिनी ।
शुक्रात्मिका शुक्र-सम्पत् शुक्राकर्षण-कारिणी ।।१५०।।
शारदा साधक-प्राणा साधकासक्त-रक्तपा ।
साधकानन्द-सन्तोषा साधकानन्द-कारिणी ।।१५१।।
आत्म-विद्या ब्रह्म-विद्या पर ब्रह्म स्वरूपिणी ।
सर्व-वर्ण-मयी देवी जप-माला-विधायिनी ।।

17….योनि स्तोत्रं

श्रृणु देवी सुर-श्रेष्ठे सुरासुर नमस्कृते |
इदानीं श्रोतुमिच्छामि स्तोत्रं ही सर्वदुर्लभम|
यस्या व् वोधानाद्देहे देहि ब्रह्म -मयो भवेत् ||१
श्री पार्वत्युवाच
श्रुणु देव सुरश्रेष्ठ सर्व-बीजस्य सम्मतम |न वक्तव्यं कदाचित्तु पाषन्ड नास्तिके नरे ||२
ममैव प्राण-सर्वस्वं लतास्तोत्रं दिगंबर | अस्य प्रपठनाद्देव जीवन्मुक्तोअपि जायते ||३
ॐ भग-रूपा जगन्माता सृष्टि-स्थिति -लयान्विता|दशविद्या-स्वरूपात्मा योनिर्मा पातु सर्वदा ||४
कोण-त्रय-युता देवी स्तुति-निंदा- विवर्जिता | जगदानंद -संभूता योनिर्मा पातु सर्वदा ||५
रक्त रूपा जगन्माता योनीमध्ये सदास्थिता |ब्रह्म-विष्णु-शिव-प्राणा योनिर्मा पातु सर्वदा ||६
कार्त्रिकी-कुन्तलं रूपं योन्युपरि सुशोभितम |भुक्ति-मुक्ति-प्रदा योनिः योनिर्मा पातु सर्वदा ||७
वीर्यरूपा शैलपुत्री मध्यस्थाने विराजिता |ब्रह्म- विष्णु- शिव श्रेष्ठा योनिर्मा पातु सर्वदा ||८
योनिमध्ये महाकाली छिद्ररूपा सुशोभना | सुखदा मदनागारा योनिर्मा पातु सर्वदा ||९
काल्यादी योगिनी देवी योनिकोणेषु संस्थिता |मनोहरा दुःख लभ्या योनिर्मा पातु सर्वदा ||१०
सदा शिवो मेरु-रूपों योनिमध्ये वसेत सदा | कैवल्यदा काममुक्ता योनिर्मा पातु सर्वदा ||११
सर्व -देव स्तुता योनिः सर्व -देव प्रपूजिता | सर्व- प्रसवकर्त्री त्वं योनिर्मा पातु सर्वदा ||१२
सर्व-तीर्थ-मयी योनिः सर्व-पाप-प्रणाशिनी | सर्वगेहे स्थिता योनिः योनिर्मा पातु सर्वदा ||१३
मुक्तिदा धनदा देवी सुखदा किर्तिदा तथा | आरोग्यदा वीर-रता पंच-तत्व-युता सदा ||१४
योनिस्तोत्रमिदं प्रोक्तं यः पठेत योनी संनिधौ |शक्तिरूपा महादेवी तस्यगेहे सदा स्थिता ||१५
तीर्थं पर्यटनं नास्ति नास्ति पुजादी-तर्पणं | पुरश्चरणम नास्त्येव तस्य मुक्तिरखंडिता ||१६
केवलं मैथुनेनैव शिवतुल्यो न संशयः |सत्यं सत्यं पुनः सत्यं मम वाक्यं वृथा न हि ||१७
यदि मिथ्या मया प्रोक्ता तव ह्त्या सुपातकी |कृतांजलि -पुटो भूत्वा पठेत स्तोत्रं दिगंबर ||१८
सर्वतीर्थेषु यत पुण्यं लभते च स साधकः |काल्यादी दशविद्याश्च गंगादी -तीर्थ-कोटयः ||
योनी दर्शन मात्रेण सर्वाः साक्षान्न संशयः ||१९
कुल-संभव -पुजायामादौ चांते पठेदिदम |अन्यथा पूजनाद्देव रामनाम मरणं भवेत् ||२०
एकसंध्या-त्रिसंध्या वा पठेत स्तोत्रमनन्यधि:| निशायाम सम्मुखे शक्त्याः स शिवो नात्र संशयः ||२१
इति निगमकल्पद्रुमे योनी स्तोत्रं समाप्तम|….

18….ॐ श्री काल भैरव बटुक भैरव शाबर स्तोत्र मंत्र

ॐ अस्य श्री बटुक भैरव शाबर स्तोत्र मन्त्रस्य सप्त
ऋषिः ऋषयः, मातृका छंदः, श्री बटुक भैरव
देवता, ममेप्सित कामना सिध्यर्थे विनियोगः.
ॐ काल भैरु बटुक भैरु ! भूत भैरु ! महा भैरव
महा भी विनाशनम देवता सर्व सिद्दिर्भवेत .
शोक दुःख क्षय करं निरंजनम, निराकरम
नारायणं, भक्ति पूर्णं त्वं महेशं. सर्व
कामना सिद्दिर्भवेत. काल भैरव, भूषण वाहनं
काल हन्ता रूपम च, भैरव गुनी.
महात्मनः योगिनाम महा देव स्वरूपं. सर्व
सिद्ध्येत. ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु ! महा भैरव
महा भय विनाशनम देवता. सर्व सिद्दिर्भवेत.
ॐ त्वं ज्ञानं, त्वं ध्यानं, त्वं योगं, त्वं तत्त्वं, त्वं
बीजम, महात्मानम, त्वं शक्तिः, शक्ति धारणं
त्वं महा देव स्वरूपं. सर्व सिद्धिर्भवेत. ॐ काल भैरु,
बटुक भैरु, भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता. सर्व सिद्दिर्भवेत.
ॐ कालभैरव ! त्वं नागेश्वरम नाग हारम च त्वं वन्दे
परमेश्वरम, ब्रह्म ज्ञानं, ब्रह्म ध्यानं, ब्रह्म योगं,
ब्रह्म तत्त्वं, ब्रह्म बीजम महात्मनः, ॐ काल भैरु,
बटुक भैरु, भूत भैरु, महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता! सर्व सिद्दिर्भवेत.
त्रिशूल चक्र, गदा पानी पिनाक धृक ! ॐ काल
भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु, महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता! सर्व सिद्दिर्भवेत.
ॐ काल भैरव ! त्वं विना गन्धं, विना धूपम,
विना दीपं, सर्व शत्रु विनाशनम सर्व
सिद्दिर्भवेत विभूति भूति नाशाय, दुष्ट क्षय
कारकम, महाभैवे नमः. सर्व दुष्ट विनाशनम सेवकम
सर्व सिद्धि कुरु. ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु,
महा भैरव महा भय विनाशनम देवता! सर्व
सिद्दिर्भवेत.
ॐ काल भैरव ! त्वं महा-ज्ञानी , त्वं महा-
ध्यानी, महा-योगी, महा-बलि, तपेश्वर !
देही में सर्व सिद्धि . त्वं भैरवं भीम नादम च
नादनम. ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु, महा भैरव
महा भय विनाशनम देवता! सर्व सिद्दिर्भवेत.
ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ! अमुकम मारय मारय,
उच्चचाटय उच्चचाटय, मोहय मोहय, वशं कुरु कुरु.
सर्वार्थ्कस्य सिद्धि रूपम, त्वं महा कालम ! काल
भक्षणं, महा देव स्वरूपं त्वं. सर्व सिद्ध्येत. ॐ काल
भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु, महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता! सर्व सिद्दिर्भवेत.
ॐ काल भैरव ! त्वं गोविन्दं गोकुलानंदम !
गोपालं गो वर्धनम धारणं त्वं! वन्दे परमेश्वरम.
नारायणं नमस्कृत्य, त्वं धाम शिव रूपं च. साधकं
सर्व सिद्ध्येत. ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु,
महा भैरव महा भय विनाशनम देवता! सर्व
सिद्दिर्भवेत.
ॐ काल भैरव ! त्वं राम लक्ष्मणं, त्वं श्रीपतिम
सुन्दरम, त्वं गरुड़ वाहनं, त्वं शत्रु हन्ता च, त्वं यमस्य
रूपं, सर्व कार्य सिद्धि कुरु कुरु. ॐ काल भैरु, बटुक
भैरु, भूत भैरु, महा भैरव महा भय विनाशनम देवता!
सर्व सिद्दिर्भवेत.
ॐ काल भैरव ! त्वं ब्रह्म विष्णु महेश्वरम, त्वं जगत
कारणं, सृस्ती स्तिथि संहार कारकम रक्त बीज
महा सेन्यम, महा विद्या, महा भय विनाशनम .
ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु, महा भैरव महा भय
विनाशनम देवता! सर्व सिद्दिर्भवेत.
ॐ काल भैरव ! त्वं आहार मध्य, मांसं च, सर्व दुष्ट
विनाशनम, साधकं सर्व सिद्धि प्रदा.
ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं अघोर अघोर, महा अघोर,
सर्व अघोर, भैरव काल ! ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत
भैरु, महा भैरव महा भय विनाशनम देवता! सर्व
सिद्दिर्भवेत.
ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं, ॐ आं क्लीं क्लीं क्लीं, ॐ आं
क्रीं क्रीं क्रीं, ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं, रूं रूं रूं, क्रूम क्रूम
क्रूम, मोहन ! सर्व सिद्धि कुरु कुरु. ॐ आं
ह्रीं ह्रीं ह्रीं अमुकम उच्चचाटय उच्चचाटय, मारय
मारय, प्रूम् प्रूम्, प्रें प्रें , खं खं, दुष्टें, हन हन अमुकम
फट स्वाहा, ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु,
महा भैरव महा भय विनाशनम देवता! सर्व
सिद्दिर्भवेत.
ॐ बटुक बटुक योगं च बटुक नाथ महेश्वरः. बटुके वट
वृक्षे वटुकअं प्रत्यक्ष सिद्ध्येत. ॐ काल भैरु बटुक भैरु
भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम देवता सर्व
सिद्दयेत.
ॐ कालभैरव, शमशान भैरव, काल रूप कालभैरव !
मेरो वैरी तेरो आहार रे ! काडी कलेजा चखन
करो कट कट. ॐ काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव
महा भय विनाशनम देवता सर्व सिद्दयेत.
ॐ नमो हँकारी वीर ज्वाला मुखी ! तू दुष्टें बंध
करो बिना अपराध जो मोही सतावे, तेकर
करेजा चिधि परे, मुख वाट लोहू आवे. को जाने?
चन्द्र सूर्य जाने की आदि पुरुष जाने. काम रूप
कामाक्षा देवी. त्रिवाचा सत्य फुरे,
ईश्वरो वाचा . ॐ काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु !
महा भैरव महा भय विनाशनम देवता सर्व
सिद्दयेत.
ॐ कालभैरव त्वं डाकिनी शाकिनी भूत
पिसाचा सर्व दुष्ट निवारनम कुरु कुरु साधका-
नाम रक्ष रक्ष. देही में ह्रदये सर्व सिद्धिम. त्वं
भैरव भैरवीभयो, त्वं महा भय विनाशनम कुरु . ॐ
काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय
विनाशनम देवता सर्व सिद्दयेत.
ॐ आं ह्रीं. पश्चिम दिशा में सोने का मठ, सोने
का किवार, सोने का ताला, सोने की कुंजी,
सोने का घंटा, सोने की संकुली.
पहली संकुली अष्ट कुली नाग को बांधो.
दूसरी संकुली अट्ठारह कुली जाती को बांधो.
तीसरी संकुली वैरी दुष्ट्तन को बांधो,
चौथी संकुली शाकिनी डाकिनी को बांधो,
पांचवी संकुली भूत प्रेतों को बांधो,
जरती अग्नि बांधो, जरता मसान बांधो, जल
बांधो थल बांधो, बांधो अम्मरताई,
जहाँ जहाँ जाई,जेहि बाँधी मंगावू,
तेहि का बाँधी लावो. वाचा चुके, उमा सूखे,
श्री बावन वीर ले जाये, सात समुंदर तीर.
त्रिवाचा फुरो मंत्र , ईश्वरी वाचा. ॐ काल भैरु
बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता सर्व सिद्दयेत.
ॐ आं ह्रीं. उत्तर दिशा में रूपे का मठ, रूपे
का किवार, रूपे का ताला,रूपे की कुंजी, रूपे
का घंटा, रूपे की संकुली. पहली संकुली अष्ट
कुली नाग को बांधो. दूसरी संकुली अट्ठारह
कुली जाती को बांधो.
तीसरी संकुली वैरी दुष्ट्तन को बांधो,
चौथी संकुली शाकिनी डाकिनी को बांधो,
पांचवी संकुली भूत प्रेतों को बांधो,
जरती अग्नि बांधो, जरता मसान बांधो, जल
बांधो थल बांधो, बांधो अम्मरताई,
जहाँ जहाँ जाई,जेहि बाँधी मंगावू,
तेहि का बाँधी लावो. वाचा चुके, उमा सूखे,
श्री बावन वीर ले जाये, सात समुंदर तीर.
त्रिवाचा फुरो मंत्र , ईश्वरी वाचा. ॐ काल भैरु
बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता सर्व सिद्दयेत.
ॐ आं ह्रीं. पूरब दिशा में तामे का मठ, तामे
का किवार, तामे का ताला,तामे की कुंजी,
तामे का घंटा, तामे की संकुली.
पहली संकुली अष्ट कुली नाग को बांधो.
दूसरी संकुली अट्ठारह कुली जाती को बांधो.
तीसरी संकुली वैरी दुष्ट्तन को बांधो,
चौथी संकुली शाकिनी डाकिनी को बांधो,
पांचवी संकुली भूत प्रेतों को बांधो,
जरती अग्नि बांधो, जरता मसान बांधो, जल
बांधो थल बांधो, बांधो अम्मरताई,
जहाँ जहाँ जाई,जेहि बाँधी मंगावू,
तेहि का बाँधी लावो. वाचा चुके, उमा सूखे,
श्री बावन वीर ले जाये, सात समुंदर तीर.
त्रिवाचा फुरो मंत्र , ईश्वरी वाचा. ॐ काल भैरु
बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता सर्व सिद्दयेत.
ॐ आं ह्रीं. दक्षिण दिशा में अस्थि का मठ,
तामे का किवार,
अस्थि का ताला,अस्थि की कुंजी,
अस्थि का घंटा, अस्थि की संकुली.
पहली संकुली अष्ट कुली नाग को बांधो.
दूसरी संकुली अट्ठारह कुली जाती को बांधो.
तीसरी संकुली वैरी दुष्ट्तन को बांधो,
चौथी संकुली शाकिनी डाकिनी को बांधो,
पांचवी संकुली भूत प्रेतों को बांधो,
जरती अग्नि बांधो, जरता मसान बांधो, जल
बांधो थल बांधो, बांधो अम्मरताई,
जहाँ जहाँ जाई,जेहि बाँधी मंगावू,
तेहि का बाँधी लावो. वाचा चुके, उमा सूखे,
श्री बावन वीर ले जाये, सात समुंदर तीर.
त्रिवाचा फुरो मंत्र , ईश्वरी वाचा. ॐ काल भैरु
बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता सर्व सिद्दयेत.
ॐ काल भैरव ! त्वं आकाशं, त्वं पातालं, त्वं
मृत्युलोकं, चतुर भुजम, चतुर मुखं, चतुर बाहुम, शत्रु
हन्ता त्वं भैरव ! भक्ति पूर्ण कलेवरम. ॐ काल भैरु
बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता सर्व सिद्धिर भवेत् .
ॐ काल भैरव ! तुम जहाँ जहाँ जाहू, जहाँ दुश्मन
बेठो होए, तो बैठे को मारो, चालत होए
तो चलते को मारो, सोवत होए तो सोते
को मरो, पूजा करत होए तो पूजा में मारो,
जहाँ होए तहां मरो वयाग्रह ले भैरव दुष्ट
को भक्शो. सर्प ले भैरव दुष्ट को दसो. खडग ले
भैरव दुष्ट को शिर गिरेवान से मारो. दुष्तन
करेजा फटे. त्रिशूल ले भैरव शत्रु चिधि परे. मुख
वाट लोहू आवे. को जाने? चन्द्र सूरज जाने
की आदि पुरुष जाने. कामरूप कामाक्षा देवी.
त्रिवाचा सत्य फुरे मंत्र ईश्वरी वाचा. ॐ काल
भैरु बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता सर्व सिद्धिर भवेत् .
ॐ काल भैरव ! त्वं. वाचा चुके उमा सूखे, दुश्मन मरे
अपने घर में. दुहाई भैरव की. जो मूर वचन झूठा होए
तो ब्रह्म का कपाल टूटे, शिवजी के तीनो नेत्र
फूटें. मेरे भक्ति, गुरु की शक्ति फुरे मंत्र
ईश्वरी वाचा. ॐ काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु !
महा भैरव महा भय विनाशनम देवता सर्व
सिद्धिर भवेत् .
ॐ काल भैरव ! त्वं.भूतस्य भूत नाथासचा,भूतात्म
ा भूत भावनः, त्वं भैरव सर्व सिद्धि कुरु कुरु. ॐ
काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय
विनाशनम देवता सर्व सिद्धिर भवेत् .
ॐ काल भैरव ! त्वं ज्ञानी, त्वं ध्यानी, त्वं
योगी, त्वं जंगम स्थावरम त्वं सेवित सर्व काम
सिद्धिर भवेत्. ॐ काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु !
महा भैरव महा भय विनाशनम देवता सर्व
सिद्धिर भवेत् .
ॐ काल भैरव ! त्वं वन्दे परमेश्वरम, ब्रह्म रूपम,
प्रसन्नो भव. गुनी महात्मानं महादेव स्वरूपं सर्व
सिद्दिर भवेत्.

प्रयोग :
१. सायंकाल दक्षिणाभिमुख होकर पीपल
की डाल वाम हस्त में लेकर, नित्य २१ बार पाठ
करने से शत्रु क्षय होता है.
२. रात्रि में पश्चिमाभिमुख होकर उपरोक्त
क्रिया सिर्फ पीपल की डाल दक्षिण हस्त में
लेकर पुष्टि कर्मों की सिद्धि प्राप्त होती है,
२१ बार जपें.
३. ब्रह्म महूर्त में पश्चिमाभिमुख तथा दक्षिण हस्त
में कुश की पवित्री लेकर ७ पाठ करने से समस्त
उपद्रवों की शांति होती है.

ॐ परम अवधूताय नमः.

19….चतुःखष्टि योगिन्याः स्तोत्रम्

कलिकाले योगिन्याः प्रभावः अतुलनीये ।
सर्वसुख प्रदायिनी सर्व मंगलकारिणी ।।
इदं स्तोत्रम् बल-बुद्धि-विद्द्या प्रदायकम् ।
त्रैलोक्य विजय-भुक्ति-मुक्ति सहित सुखदायकम् ।।

काली नित्य सिद्धमाता च क़पालिनी नागलक्ष्मयै त्वां प्रणाम्यहम्
कुला देवी स्वर्णदेहा धन धर्म प्रदायिनी कुरुकुल्ला रसनाथायैः नमाम्यहम्
विरोधिनी विलासिन्यैः सर्व सुख प्रदात्री च विप्रचित्ता रक्तप्रिया शत्रुनाशिनी
उग्र रक्त भोग रूपा मातु रक्ष मम सर्व विपत्ति भव भय हारिणी
उग्रप्रभा शुक्रनाथा च दीपा मुक्तिः रक्ता देहा मुक्ति प्रदायकम
नीला भुक्ति रक्त स्पर्शा स्वाहा च घना महा जगदम्बा जगत्पालिनी
बलाका काम सेवितायैः नमामि च मातृ देवी आत्मविद्या विद्द्या दायिनी
मुद्रा पूर्णा रजतकृपा धनदात्री च मिता तंत्र कौला दीक्षा तन्त्र भय रक्षिणी
महाकाली सिद्धेश्वरी सिद्धिदात्री च कामेश्वरी सर्वशक्ति शक्तिप्रदायिनी
भगमालिनी तारिणी नमोस्तुते सह नित्यकलींना तंत्रार्पिता तंत्रेश्वरी
भेरुण्ड तत्व उत्तमा तत्वरूपा वह्निवासिनी शासिनि वह्निक्षेत्रे रक्षिता
महावज्रेश्वरी रक्त देवी विकरालरूपा शिवदूती आदि शक्तयैः नमः
त्वरिता ऊर्ध्वरेतादा उर्ध्व क्षेत्र रक्षिणी कुलसुंदरी कामिनी कुलरक्षिता
नीलपताका सिद्धिदा सिद्धि रूपिणी नित्य जनन स्वरूपिणी त्वां शरण्यहम्
विजया देवी वसुदा सर्वलोक विजय दात्री सर्वमङ्गला तन्त्रदा मंगलकारिणी
ज्वालामालिनी नागिनी च चित्रा देवी रक्तपुजा सर्व भय भव हारिणी
ललिता कन्या शुक्रदा च डाकिनी मदसालिनी मोह-माया-मद निवारिणी
राकिनी पापराशिनी च लाकिनी सर्वतन्त्रेसी मातु रक्ष मम यत्र-तत्र
काकिनी नागनार्तिकी एव शाकिनी मित्ररूपिणी सर्व मित्ररूपिणी
हाकिनी मनोहारिणी मनोहर रूप प्रदात्री रूपम देहि मातेश्वरी
तारा योग रक्ता पूर्णा तारा भव तारिणी भुक्तिं-मुक्ति दायिनी
षोडशी लतिका देवी सर्वदा नवयौवना अछिन्न यौवनदायिनी
भुवनेश्वरी मंत्रिणी भक्त रक्षिणी च छिन्नमस्ता योनिवेगा
भैरवी सत्य सुकरिणी सत्य प्रिया देवी त्वां प्रणाम्यहम्
धूमावती कुण्डलिनी सर्व धन-धान्य प्रदायिनी कृपा कुरू
बगलामुखी गुरु मूर्ति रक्ष मम मातंगी कांता युवती मातंगसुता
कमला शुक्ल संस्थिता वैभवदात्री च प्रकृति ब्रह्मेन्द्री देवी
गायत्री नित्यचित्रिणी मोहिनी एव माता योगिनी रक्ष मम
सरस्वती स्वर्गदेवी ज्ञानदात्री अन्नपूर्णी शिवसंगी भक्तपोषिणी
नारसिंही वामदेवी दुष्टदलिनी गंगा योनि स्वरूपिणी मातु
अपराजिता समाप्तिदा चामुंडा परि अंगनाथा रिपु भक्षिणी
वाराही सत्येकाकिनी सह कौमारी क्रिया शक्तिनि शक्तिदात्री
इन्द्राणी मुक्ति नियन्त्रिणी च वज्रेश्वरी ब्रह्माणी आनन्दा मूर्ती
वैष्णवी सत्य रूपिणी एव माहेश्वरी पराशक्ति माता आदिशक्ति
लक्ष्मी मनोरमायोनि सह दुर्गा सच्चिदानंद सदा सर्वदा रक्ष मम

इदं स्तोत्रम् उच्च महिम्न धारिताः
सर्व मनोरथ प्रदायकं नास्ति संशयः

(महाकालीपुत्र विरचित् चतुःखष्टि स्तोत्रम् सम्पूर्णम् )

20…भगवती काली की कृपा-प्राप्ति का मन्त्र
चमत्कारी महा-काली सिद्ध अनुभूत मन्त्र
“ॐ सत् नाम गुरु का आदेश। काली-काली महा-काली, युग आद्य-काली, छाया काली, छूं मांस काली। चलाए चले, बुलाई आए, इति विनिआस। गुरु गोरखनाथ के मन भावे। काली सुमरुँ, काली जपूँ, काली डिगराऊ को मैं खाऊँ। जो माता काली कृपा करे, मेरे सब कष्टों का भञ्जन करे।”
सामग्रीः लाल वस्त्र व आसन, घी, पीतल का दिया, जौ, काले तिल, शक्कर, चावल, सात छोटी हाँड़ी-चूड़ी, सिन्दूर, मेंहदी, पान, लौंग, सात मिठाइयाँ, बिन्दी, चार मुँह का दिया।
विधिः उक्त मन्त्र का सवा लाख जप ४० या ४१ दिनों में करे। पहले उक्त मन्त्र को कण्ठस्थ कर ले। शुभ समय पर जप शुरु करे। गुरु-शुक्र अस्त न हों। दैनिक ‘सन्ध्या-वन्दन’ के अतिरिक्त अन्य किसी मन्त्र का जप ४० दिनों तक न करे। भोजन में दो रोटियाँ १० या ११ बजे दिन के समय ले। ३ बजे के पश्चात् खाना-पीना बन्द कर दे। रात्रि ९ बजे पूजा आरम्भ करे। पूजा का कमरा अलग हो और पूजा के सामान के अतिरिक्त कोई सामान वहाँ न हो। प्रथम दिन, कमरा कच्चा हो, तो गोबर का लेपन करे। पक्का है, तो पानी से धो लें। आसन पर बैठने से पूर्व स्नान नित्य करे। सिर में कंघी न करे। माँ की सुन्दर मूर्ति रखे और धूप-दीप जलाए। जहाँ पर बैठे, चाकू या जल से सुरक्षा-मन्त्र पढ़कर रेखा बनाए। पूजा का सब सामान ‘सुरक्षा-रेखा’ के अन्दर होना चाहिए।
सर्वप्रथम गुरु-गणेश-वन्दना कर १ माला (१०८) मन्त्रों से हवन कर। हवन के पश्चात् जप शुरु करे। जप-समाप्ति पर जप से जो रेखा-बन्धन किया था, उसे खोल दे। रात्रि में थोड़ी मात्रा में दूध-चाय ले सकते हैं। जप के सात दिन बाद एक हाँड़ी लेकर पूर्व-लिखित सामान (सात मिठाई, चूड़ी इत्यादि) उसमें डाले। ऊपर ढक्कन रखकर, उसके ऊपर चार मुख का दिया जला कर, सांय समय जो आपके निकट हो नदी, नहर या चलता पानी में हँड़िया को नमस्कार कर बहा दे। लौटते समय पीछे मुड़कर नहीं देखें। ३१ दिनों तक धूप-दीप-जप करने के पश्चात् ७ दिनों तक एक बूँद रक्त जप के अन्त में पृथ्वी पर टपका दे और ३९वें दिन जिह्वा का रक्त दे। मन्त्र सिद्ध होने पर इच्छित वरदान प्राप्त करे।
सावधानियाँ- प्रथम दिन जप से पूर्व हण्डी को जल में सायं समय छोड़े और एक-एक सपताह बाद उसी प्रकार उसी समय सायं उसी स्थान पर, यह हाँड़ी छोड़ी जाएगी। जप के एक दिन बाद दूसरी हाँड़ी छोड़ने के पश्चात् भूत-प्रेत साधक को हर समय घेरे रहेंगे। जप के समय कार के बाहर काली के साक्षात् दर्शन होंगे। साधक जप में लगा रहे, घबराए नहीं। वे सब कार के अन्दर प्रविष्ट नहीं होंगे। मकान में आग लगती भी दिखाई देगी, परन्तु आसन से न उठे। ४० से ४२वें दिन माँ वर देगी। भविष्य-दर्शन व होनहार घटनाएँ तो सात दिन जप के बाद ही ज्ञात होने लगेंगी। एक साथी या गुरु कमरे के बाहर नित्य रहना चाहिए। साधक निर्भीक व आत्म-बलवाला होना चाहिए।

21…संकट-निवारक काली-मन्त्र
“काली काली, महा-काली। इन्द्र की पुत्री, ब्रह्मा की साली। चाबे पान, बजावे थाली। जा बैठी, पीपल की डाली। भूत-प्रेत, मढ़ी मसान। जिन्न को जन्नाद बाँध ले जानी। तेरा वार न जाय खाली। चले मन्त्र, फुरो वाचा। मेरे गुरु का शब्द साचा। देख रे महा-बली, तेरे मन्त्र का तमाशा। दुहाई गुरु गोरखनाथ की।”
सामग्रीः माँ काली का फोटो, एक लोटा जल, एक चाकू, नीबू, सिन्दूर, बकरे की कलेजी, कपूर की ६ टिकियाँ, लगा हुआ पान, लाल चन्दन की माला, लाल रंग के पूल, ६ मिट्टी की सराई, मद्य।
विधिः पहले स्थान-शुद्धि, भूत-शुद्धि कर गुरु-स्मरण करे। एक चौकी पर देवी की फोटो रखकर, धूप-दीप कर, पञ्चोपचार करे। एक लोटा जल अपने पास रखे। लोटे पर चाकू रखे। देवी को पान अर्पण कर, प्रार्थना करे- हे माँ! मैं अबोध बालक तेरी पूजा कर रहा हूँ। पूजा में जो त्रुटि हों, उन्हें क्षमा करें।’ यह प्रार्थना अन्त में और प्रयोग के समय भी करें।
अब छः अङ्गारी रखे। एक देवी के सामने व पाँच उसके आगे। ११ माला प्रातः ११ माला रात्रि ९ बजे के पश्चात् जप करे। जप के बाद सराही में अङ्गारी करे व अङ्गारी पर कलेजी रखकर कपूर की टिक्की रखे। पहले माँ काली को बलि दे। फिर पाँच बली गणों को दे। माँ के लिए जो घी का दिया जलाए, उससे ही कपूर को जलाए और मद्य की धार निर्भय होकर दे। बलि केवल मंगलवार को करे। दूसरे दिनों में केवल जप करे। होली-दिवाली-ग्रहण में या अमावस्या को मन्त्र को जागृत करता रहे। कुल ४० दिन का प्रयोग है।
भूत-प्रेत-पिशाच-जिन्न, नजर-टोना-टोटका झाड़ने के लिए धागा बनाकर दे। इस मन्त्र का प्रयोग करने वालों के शत्रु स्वयं नष्ट हो जाते हैं।

22….दर्शन हेतु श्री काली मन्त्र
“डण्ड भुज-डण्ड, प्रचण्ड नो खण्ड। प्रगट देवि, तुहि झुण्डन के झुण्ड। खगर दिखा खप्पर लियां, खड़ी कालका। तागड़दे मस्तङ्ग, तिलक मागरदे मस्तङ्ग। चोला जरी का, फागड़ दीफू, गले फुल-माल, जय जय जयन्त। जय आदि-शक्ति। जय कालका खपर-धनी। जय मचकुट छन्दनी देव। जय-जय महिरा, जय मरदिनी। जय-जय चुण्ड-मुण्ड भण्डासुर-खण्डनी, जय रक्त-बीज बिडाल-बिहण्डनी। जय निशुम्भ को दलनी, जय शिव राजेश्वरी। अमृत-यज्ञ धागी-धृट, दृवड़ दृवड़नी। बड़ रवि डर-डरनी ॐ ॐ ॐ।।”
विधि- नवरात्रों में प्रतिपदा से नवमी तक घृत का दीपक प्रज्वलित रखते हुए अगर-बत्ती जलाकर प्रातः-सायं उक्त मन्त्र का ४०-४० जप करे। कम या ज्यादा न करे। जगदम्बा के दर्शन होते हैं।

23….महा-काली शाबर मन्त्र
“सात पूनम काल का, बारह बरस क्वाँर।
एको देवी जानिए, चौदह भुवन-द्वार।।१
द्वि-पक्षे निर्मलिए, तेरह देवन देव।
अष्ट-भुजी परमेश्वरी, ग्यारह रुद्र सेव।।२
सोलह कल सम्पूर्णी, तीन नयन भरपूर।
दसों द्वारी तू ही माँ, पाँचों बाजे नूर।।३
नव-निधी षट्-दर्शनी, पन्द्रह तिथी जान।
चारों युग में काल का, कर काली! कल्याण।।४”७ १२ १ १४
२ १३ ८ ११
१६ ३ १० ५
९ ६ १५ ४

सामग्रीः काली-यन्त्र तथा चित्र, भट-कटैया के फूल-७, पीला कनेर के फूल, लौंग, इलायची-प्रत्येक ५, पञ्च-मेवा, नीम्बू-३, सिन्दूर, काले केवाँच के बीज-१०८, दीपक, धूप, नारियल।
विधिः उक्त मन्त्र की साधना यदि भगवती काली के मन्दिर में की जाए, तो उत्तम फल होगा। वैसे एकान्त में या घर पर भी कर सकते हैं। सर्व-प्रथम अपने सामने एक बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर श्रीकाली-यन्त्र और चित्र स्थापित करे। घी का चौ-मुखा दिया जलाए। पञ्चोपचार से पूजन करे। अष्ट-गन्ध से उक्त चौंतीसा-यन्त्र का निर्माण कर उसकी भी पञ्चोपचार से पूजा करें। पूजन करते समय भट-कटैया और कनेर पुष्प को यन्त्र व चित्र पर चढ़ाए।
तीनों नीम्बुओं के ऊपर सिन्दूर का टीका या बिन्दी लगाए और उसे भी अर्पित करे। नारियल, पञ्च-मेवा, लौंग, इलायची का भोग लगाए, लेकिन इन सबसे पहले गणेश, गुरु तथा आत्म-रक्षा मन्त्र का पूजन और मन्त्र का जप आवश्यक है। ‘काली-शाबर-मन्त्र’ को जपते समय हर बार एक-एक केवाँच का बीज भी काली-चित्र के सामने चढ़ाते रहें। जप की समाप्ति पर इसी मन्त्र की ग्यारह आहुतियाँ घी और गुग्गुल की दे। तत्पश्चात् एक नीम्बू काटकर उसमें अपनी अनामिका अँगुली का रक्त मिलाकर अग्नि में निचोड़े। हवन की राख, मेवा, नीम्बू, केवाँच के बीज और फूल को सँभाल कर रखे। नारियल और अगर-बत्ती को मन्दिर में चढ़ा दे तथा एक ब्राह्मण को भोजन कराए।
प्रयोग के समय २१ बार मन्त्र का जप करे। प्रतिदिन उक्त मन्त्र का १०८ बार जप करते रहने से साधक की सभी कामनाएँ पूर्ण होती है।
उक्त मन्त्र के विभिन्न प्रयोगः
१॰ शत्रु-बाधा का निवारणः अमावस्या के दिन १ नीम्बू पर सिन्दूर से शत्रु का नाम लिखे। २१ बार सात सुइयाँ उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित के नीम्बू में चुभो दे। फिर उसे श्मशान में जाकर गाड़ दे और उस पर मद्य की धार दे। तीन दिनों में शत्रु-बाधा समाप्त होगी।
२॰ मोहनः उक्त मन्त्र से सिन्दूर और भस्म को मिलाकर ११ बार अभिमन्त्रित कर माथे पर तिलक लगाकर जिसे देखेंगे, वह आपके ऊपर मोहित हो जायेगा।
३॰ वशीकरणः पञ्च-मेवा में से थोड़ा-सा मेवा लेकर २१ बार इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करे। इसे जिस स्त्री या पुरुष को खिलाएँगे, वह आपके वशीभूत हो जाएगा।
४॰ उच्चाटनः भट-कटैया के फूल १, केवाँच-बीज और सिन्दूर के ऊपर ११ बार मन्त्र पढ़कर जिसके घर में फेंक देंगे, उसका उच्चाटन हो जाएगा।
५॰ स्तम्भनः हवन की भस्म, चिता की राख और ३ लौंग को २१ बार मन्त्र से अभिमन्त्रित करके जिसके घर में गाड़ देंगे, उसका स्तम्भन हो जाएगा।
६॰ विद्वेषणः श्मशान की राख, कलीहारी का फूल, ३ केवाँच के बीज पर २१ बार मन्त्र द्वारा अभीमन्त्रित करके एक काले कपड़े में बाँध कर शत्रु के आने-जाने के मार्ग में या घर के दरवाजे पर गाड़ दे। शत्रुओं में आपस में ही भयानक शत्रुता हो जाएगी।
७॰ भूत-प्रेत-बाधाः हवन की राख सात बार अभिमन्त्रित कर फूँक मारे तथा माथे पर टीका लगा दे। चौंतिसा यन्त्र को भोज-पत्र पर बनाकर ताँबे के ताबीज में भरकर पहना दे।
८॰ आर्थिक-बाधाः महा-काली यन्त्र के सामने घी का दीपक जलाकर उक्त मन्त्र का जप २१ दिनों तक २१ बार करे।
विशेषः- यदि उक्त मन्त्र के साथ निम्न मन्त्र का भी एक माला जप नित्य किया जाए, तो मन्त्र अधिक शक्तिशाली होकर कार्य करता है।
“ॐ कङ्काली महा-काली, केलि-कलाभ्यां स्वाहा।”

24…भगवती काली की कृपा-प्राप्ति का मन्त्र
“काली-काली महा-काली कण्टक-विनाशिनी रोम-रोम रक्षतु सर्वं मे रक्षन्तु हीं हीं छा चारक।।”
विधिः आश्विन-शुक्ल-प्रतिपदा से नवमी तक देवी का व्रत करे। उक्त मन्त्र का १०८ बार जप करे। जप के बाद इसी मन्त्र से १०८ आहुति से। घी, धूप, सरल काष्ठ, सावाँ, सरसों, सफेद-चन्दन का चूरा, तिल, सुपारी, कमल-गट्टा, जौ (यव), इलायची, बादाम, गरी, छुहारा, चिरौंजी, खाँड़ मिलाकर साकल्य बनाए। सम्पूर्ण हवन-सामग्री को नई हांड़ी में रखे। भूमि पर शयन करे। समस्त जप-पूजन-हवन रात्रि में ११ से २ बजे के बीच करे। देवी की कृपा-प्राप्ति होगी।

विशेषः- इस प्रकार के मन्त्र उग्र प्रकृति के होते है। स्व-रक्षा व गुरु निर्देशन के अभाव में प्रयुक्त करना हानिकारक है तथा सामाजिक व नैतिक दृष्टि से अनुचित भी। यहाँ पर मात्र प्राचीन विद्या के संरक्षण हेतु प्रस्तुत किये ।

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