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1…नवाक्षर गणपति साधना
कुम्हार की चाक की मिट्टी से गणेश -प्रतिमा बनाकर पंचोपचार से पूजाकर प्रतिदिन सहस्र जप करे,तो सात दिन में मंत्र सिद्ध होता है.फिर प्रतिदिन जप करने से बुद्धि का विकास ,एक मास तक जप करे तो स्त्री लाभ,छः मास में धन की प्राप्ति .जप मध्यान्ह काल या संध्याकाल में ही करना चाहिये.
(मंत्र महार्णव —वीरभद्रोड्डीश तंत्र)

संकट निवारण प्रयोग
प्रत्येक प्रकार के संकट निवारण के लिए सर्वार्थसिद्ध योग मे भगवान गणेश की प्रतिमा पर २१दिनों तक प्रतिदिन थोड़ी-थोड़ी जावित्री चढ़ावेऔर रात को सोते समय थोड़ी जावित्री खाकर सोये.यह प्रयोग २१दिन तक अवश्य करे,अथवा ४२,६३या ८४दिनों तक भी किया जा सकता है.अकेला गणपति मंदिर जहाँ प्राण -प्रतिष्ठित मू्र्ति हो वहीं यह साधना करे.
स्वप्न में हनुमत दर्शन
यह अनुष्ठान ८१दिनों का है.अनुष्ठान काल मे ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है.क्षौर,नख कृन्तन,मद्यपान,मांसाहार सर्वथा वर्जित है
अनुष्ठानारंभ के दिन प्रातः काल उठकर शौच,मुखमार्जन और स्नान के पश्चात शुद्ध वस्त्र पहनकर एक लोटा जल और एक दाना उड़द लेकर हनुमान जी के मंदिर मे जायऔर जल से मूर्ति को स्नान कराकर उड़द का दाना उनके मस्तक पर चढ़ा दे.पुनः ११प्रदक्षिणा कर मन ही मन अपनी मनोकामना हनुमान को बतला दे.
पुनः उड़द दाना लेकर घर आ जावे.दुसरे दिन से एक-एक दाना उड़द बढ़ाता जावे.अर्थात् दूसरे दिन-२दाना,तीसरे दिन -३इस प्रकार ४१वे दिन–४१दाना रखकर ४२वे दिन से एक-एक दाना कम करता जाय.अर्थातं ४२वे दिन ४०,४३वे दिन-३९और अंत मे ८१वे दिन -१दाना.८१ दिन का अनुष्ठान पूर्ण होने पर उसी दिन रात्री मे हनुमान जी साधक को दर्शन देकर उसकी मनोकामना को पूर्ण कर देते हैं.
एकत्रित उड़द दानों को किसी नदी या तालाब मे विसर्जित कर दे.

2… वशीकरण मन्त्रः- “ॐ नमो फूल सुगन्धा । फूल ही बाँधूँ सात समुद्रा । अहो फूल झटियारा, चौंसठ जोगिनी खरा प्यारा । ए फूल ए दिन पाऊँ, सूती सुवासिनी सेज बुलाऊँ । मुआ मड़ा मसान जगाऊँ, हाक करी उचाट लाऊँ । गलिहट मेरे पगे लगाऊँ । देखूँ गोरा भैरव ! तेरी शक्ति । मेरी भक्ति, गुरू की शक्ति । फुरो मन्त्र, ईश्वरो वाचा ।।”

विधि – होली के एक दिन पूर्व जिस स्थान पर होली जलती हो, शाम को होलिका को हल्दी-चावल से निमन्त्रण दे आए और दूसरे दिन होली जलने पर १०८ बार मन्त्र जपते हुए सिन्दूर और गूगल से होली में हवन करे । फिर जब भी, किसी भी फूल पर १ बार मन्त्र पढ़़कर जिस स्त्री या पुरुष को सुँधाएंगे, वह वशीभूत होगा ।

3…तांत्रोक्त भैरव कवच
ॐ सहस्त्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः |
पातु मां बटुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु ||
पूर्वस्यामसितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा |
आग्नेयां च रुरुः पातु दक्षिणे चण्ड भैरवः ||
नैॠत्यां क्रोधनः पातु उन्मत्तः पातु पश्चिमे |
वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेश्वरः ||
भीषणो भैरवः पातु उत्तरास्यां तु सर्वदा |
संहार भैरवः पायादीशान्यां च महेश्वरः ||
ऊर्ध्वं पातु विधाता च पाताले नन्दको विभुः |
सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः ||
रामदेवो वनान्ते च वने घोरस्तथावतु |
जले तत्पुरुषः पातु स्थले ईशान एव च ||
डाकिनी पुत्रकः पातु पुत्रान् में सर्वतः प्रभुः |
हाकिनी पुत्रकः पातु दारास्तु लाकिनी सुतः ||
पातु शाकिनिका पुत्रः सैन्यं वै कालभैरवः |
मालिनी पुत्रकः पातु पशूनश्वान् गंजास्तथा ||
महाकालोऽवतु क्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा |
वाद्यम् वाद्यप्रियः पातु भैरवो नित्यसम्पदा ||
ये भैरव कवच भगवान भैरव की क्रपा प्राप्त करने का और अपने शरीर की
सुरक्षा ,अपने घर की सुरक्षा ,भूत ,प्रेत से सुरक्षा करने का अमोघ अस्त्र
है ,,आप इस कवच का प्रतिदिन 11 बार पाठ करे ,और परिणाम स्वयं देख..

4…दुर्गा शाबर मन्त्र
“ॐ ह्रीं श्रीं चामुण्डा सिंह-वाहिनी। बीस-हस्ती भगवती, रत्न-मण्डित सोनन की माल। उत्तर-पथ में आप बैठी, हाथ सिद्ध वाचा ऋद्धि-सिद्धि। धन-धान्य देहि देहि, कुरु कुरु स्वाहा।”
विधिः- उक्त मन्त्र का सवा लाख जप कर सिद्ध कर लें। फिर आवश्यकतानुसार श्रद्धा से एक माला जप करने से सभी कार्य सिद्ध होते हैं। लक्ष्मी प्राप्त होती है, नौकरी में उन्नति और व्यवसाय में वृद्धि होती है।

5…शत्रु-विध्वंसिनी-स्तोत्र
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीशत्रु-विध्वंसिनी-स्तोत्र-मन्त्रस्य ज्वालत्-पावक ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, श्रीशत्रु-विध्वंसिनी देवता, मम शत्रु-पाद-मुख-बुद्धि-जिह्वा-कीलनार्थ, शत्रु-नाशार्थं, मम स्वामि-वश्यार्थे वा जपे पाठे च विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यासः- शिरसि ज्वालत्-पावक-ऋषये नमः। मुखे अनुष्टुप छन्दसे नमः, हृदि श्रीशत्रु-विध्वंसिनी देवतायै नमः, सर्वाङ्गे मम शत्रु-पाद-मुख-बुद्धि-जिह्वा-कीलनार्थ, शत्रु-नाशार्थं, मम स्वामि-वश्यार्थे वा जपे पाठे च विनियोगाय नमः।।
कर-न्यासः- ॐ ह्रां क्लां अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ ह्रीं क्लीं तर्जनीभ्यां नमः। ॐ ह्रूं क्लूं मध्यमाभ्यां नमः। ॐ ह्रैं क्लैं अनामिकाभ्यां नमः। ॐ ह्रौं क्लौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ ह्रः क्लः करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयादि-न्यासः- ॐ ह्रां क्लां हृदयाय नमः। ॐ ह्रीं क्लीं शिरसे स्वाहा। ॐ ह्रूं क्लूं शिखायै वषट्। ॐ ह्रैं क्लैं कवचाय हुम्। ॐ ह्रौं क्लौं नेत्र-त्रयाय वौषट्। ॐ ह्रः क्लः अस्त्राय फट्।
ध्यानः-
रक्तागीं शव-वाहिनीं त्रि-शिरसीं रौद्रां महा-भैरवीम्,धूम्राक्षीं भय-नाशिनीं घन-निभां नीलालकाऽलंकृताम्।
खड्ग-शूल-धरीं महा-भय-रिपुध्वंशीं कृशांगीं महा-दीर्घागीं त्रि-जटीं महाऽनिल-निभां ध्यायेत् पिनाकीं शिवाम्।।
मन्त्रः- “ॐ ह्रीं क्लीं पुण्य-वती-महा-माये सर्व-दुष्ट-वैरि-कुलं निर्दलय क्रोध-मुखि, महा-भयास्मि, स्तम्भं कुरु विक्रौं स्वाहा।।” (३००० जप)
मूल स्तोत्रः-
खड्ग-शूल-धरां अम्बां, महा-विध्वंसिनीं रिपून्। कृशांगींच महा-दीर्घां, त्रिशिरां महोरगाम्।।
स्तम्भनं कुरु कल्याणि, रिपु विक्रोशितं कुरु। ॐ स्वामि-वश्यकरी देवी, प्रीति-वृद्धिकरी मम।।
शत्रु-विध्वंसिनी देवी, त्रिशिरा रक्त-लोचनी अग्नि-ज्वाला रक्त-मुखी, घोर-दंष्ट्री त्रिशूलिनी।।
दिगम्बरी रक्त-केशी, रक्त पाणि महोदरीयो नरो निष्कृतं घोरं, शीघ्रमुच्चाटयेद् रिपुम्।।
।।फल-श्रुति।।
इमं स्तवं जपेन्नित्यं, विजयं शत्रु-नाशनम्। सहस्त्र-त्रिशतं कुर्यात्। कार्य-सिद्धिर्न संशयः।।
जपाद् दशांशं होमं तु, कार्यं सर्षप-तण्डुलैः पञ्च-खाद्यै घृतं चैव, नात्र कार्या विचारणा।।
।।श्रीशिवार्णवे शिव-गौरी-सम्वादे विभीषणस्य रघुनाथ-प्रोक्तं शत्रु-विध्वंसनी-स्तोत्रम्।।
विशेषः-
यह स्तोत्र अत्यन्त उग्र है। इसके विषय में निम्नलिखित तथ्यों पर ध्यान अवश्य देना चाहिए
(क) प्रथम और अन्तिम आवृति में नामों के साथ फल-श्रुति मात्र पढ़ें। पाठ नहीं होगा।
(ख) घर में पाठ कदापि न किया जाए, केवल शिवालय, नदी-तट, एकान्त, निर्जन-वन, श्मशान अथवा किसी मन्दिर के एकान्त में ही करें।
(ग) पुरश्चरण की आवश्यकता नहीं है। सीधे ‘प्रयोग’ करें। प्रत्येक ‘प्रयोग’ में तीन हजार आवृत्तियाँ करनी होगी।

6…1 काली मंत्र – ॐ ह्रीं ह्रीं हूं हूं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणे कलिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं !!
2 तारा मंत्र –ऐं औं ह्रीं स्त्रीं हूं फट !!
3 त्रिपुर भैरवी मंत्र – हँसे हंसकरीं हँसे !!
4 भुवनेश्वरी मंत्र – ऐं ह्रीं श्रीं !!
5 त्रिपुर सुंदरी मंत्र –ह्रीं ह्रीं हसकलह ह्रीं सकल ह्रीं !!
6 छिनमस्तका मंत्र – ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं बज्रविरोचनिये ह्रीं ह्रीं फट स्वाहा !!
7 धूमावती मंत्र – धूं धूं धूमावती ठ: ठ: !!
8 बगला मुखी मंत्र – ॐ हलीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदम स्तंभय जिवहां कीलया बुद्धिमं विनाशया हलीं ॐ स्वाहा !!
9 मतंगी मंत्र – ॐ ह्रीं क्लीं हूं मतांग्ये फट स्वाहा !!
10 कमला मंत्र – ॐ ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं !!

7…… सिद्ध शाबर मन्त्र-कल्पतरु आत्म-बल, स्व-शरीर-रक्षा का अनुभूत मन्त्र मन्त्र :- (१) “ॐ गुरू जी काल-भैरव ! काली लट हाथ, फरसी साथ, नगरी करहुँ प्रवेश । नगरी की करो बकरी । राजा को करो बिलाई । जो कोई मेरा जोग भङ्ग करै, बाबा कृष्णनाथ की दुहाई ।”
विधि – किसी ग्राम या नगर में किसी विशिष्ट काम से जाएँ, तो उस नगर या गाँव में प्रवेश करते ही ७ बार उक्त मन्त्र को पढ़कर फूँक मार कर प्रवेश करें । सभी काम अवश्य पूर्ण होंगे । प्रयोग करने से पूर्व मन्त्र को होली, दीवाली, मङ्गल या अमावास्या को १००८ बार जप कर, हवन कर, सिद्ध कर लेना आवश्यक है ।
8… टोना झारने के मन्त्र (१) “मन्त्रा-तन्त्रा की ऐसी – तैसी, पारबती के मन्त्रा वैसी । जिहाँ पठाऊँ, तिहाँ तैं जाय, फोर करेजा भीतर खाय । काली कमाख्या का नाम है, पार्वती का काम है । आ रे ! टोनही के टोना जादू पाँगन होखे तो फिर जाबे । मोर फूकें, मोर गुरू के फूकें । मोर गुरू कौन ? महा-देव पारबती के फूकें । जा माढ़ जा ।”

विधि – नीम की टहनी या मोर-पङ्ख से सात बार उक्त मन्त्र पढ़कर झारने से नजर, टोना, डीठ आदि दूर हो जाते हैं ।

(२) “कट-कट-कट-कट काली करे । काट करेजा भीतर खाय, जिहाँ मैं भेजों, तिहाँ तैं जाय । काली दुर्गा का नाम है, पार्वती का काम हैं । टोनही के टोना-विद्या पाँगन होबे, तो माढ़ जाबे । मोर फूकें । मोर गुरू के फूँकें । गौरा महा- देव के फूँके । जा, फिर जा ।”

विधि – उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित सरसों को पीड़ित व्यक्ति के ऊपर फेंकने से नजर, टोना आदि से मुक्ति मिल जाती है ।

(३) “ॐ नमो आदेश गुरू का । काया कलप कपाट, बज्र लङ्का उलट पलङ्का । पलट, दूर – दूर हट, टोना नजर । शब्द सांचा, फुरो मन्त्र – ईश्वरो वाचा । दुहाई गुरू गोरख- नाथ की ॐ ।”

विधि – एक कपड़े का पलीता बनाकर अलसी के तेल में भिगोकर काँसे की थाली में पानी भरकर उसके ऊपर पलीते को जलाए । तेल थाली में टपकेगा । १२ बार मन्त्र पढ़कर फूंक मारे और थाली की थोड़ी-सी राख माथे पर लगा दे । टोने का प्रभाव दूर होगा ।

9… लोक कल्याण-कारक शाबर मन्त्र १॰ अरिष्ट-शान्ति अथवा अरिष्ट-नाशक मन्त्रः- क॰ “ह्रीं हीं ह्रीं” ख॰ “ह्रीं हों ह्रीं” ग॰ “ॐ ह्रीं फ्रीं ख्रीं” घ॰ “ॐ ह्रीं थ्रीं फ्रीं ह्रीं” विधिः- उक्त मन्त्रों में से किसी भी एक मन्त्र को सिद्ध करें । ४० दिन तक प्रतिदिन १ माला जप करने से मन्त्र सिद्ध होता है । बाद में संकट के समय मन्त्र का जप करने से सभी संकट समाप्त हो जाते हैं ।

२॰ सर्व-शुभ-दायक मन्त्रः- मन्त्र – ” ॐ ख्रीं छ्रीं ह्रीं थ्रीं फ्रीं ह्रीं ।” विधिः- उक्त मन्त्र का सदैव स्मरण करने से सभी प्रकार के अरिष्ट दूर होते हैं । अपने हाथ में रक्त पुष्प (कनेर या गुलाब) लेकर उक्त मन्त्र का १०८ बार जप कर अपनी इष्ट-देवी पर चढ़ाए अथवा अखण्ड भोज-पत्र पर उक्त मन्त्र को दाड़िम की कलम से चन्दन-केसर से लिखें और शुभ-योग में उसकी पञ्चोपचारों से पूजा करें ।

३॰ अशान्ति-निवारक-मन्त्रः- मन्त्रः- “ॐ क्षौं क्षौं ।” विधिः- उक्त मन्त्र के सतत जप से शान्ति मिलती है । कुटुम्ब का प्रमुख व्यक्ति करे, तो पूरे कुटुम्ब को शान्ति मिलती है ।

४॰ शान्ति, सुख-प्राप्ति-मन्त्रः- मन्त्रः- “ॐ ह्रीं सः हीं ठं ठं ठं ।” विधिः- शुभ योग में उक्त मन्त्र का १२५ माला जप करे । इससे मन्त्र-सिद्धि होगी । बाद में दूध से १०८ अहुतियाँ दें, तो शान्ति, सुख, बल-बुद्धि की प्राप्ति होती है ।

५॰ रोग-शान्ति-मन्त्रः- मन्त्रः- “ॐ क्षीं क्षीं क्षीं क्षीं क्षीं फट् ।” विधिः- उक्त मन्त्र का ५०० बार जप करने से रोग-निवारण होता है । प्रतिदिन जप करने से सु-स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है । कुटुम्ब में रोग की समस्या हो, तो कुटुम्ब का प्रधान व्यक्ति उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित जल को रोगी के रहने के स्थान में छिड़के । इससे रोग की शान्ति होगी । जब तक रोग की शान्ति न हो, तब तक प्रयोग करता रहे ।

६॰ सर्व-उपद्रव-शान्ति-मन्त्रः- मन्त्रः- “ॐ घण्टा-कारिणी महा-वीरी सर्व-उपद्रव-नाशनं कुरु कुरु स्वाहा ।” विधिः- पहले इष्ट-देवी को पूर्वाभिमुख होकर धूप-दीप-नैवेद्य अर्पित करें । फिर उक्त मन्त्र का ३५०० बार जप करें । बाद में पश्चिमाभिमुख होकर गुग्गुल से १००० आहुतियाँ दें । ऐसा तीन दिन तक करें । इससे कुटुम्ब में शान्ति होगी ।

७॰ ग्रह-बाधा-शान्ति मन्त्रः- मन्त्रः- “ऐं ह्रीं क्लीं दह दह ।” विधिः- सोम-प्रदोष से ७ दिन तक, माल-पुआ व कस्तूरी से उक्त मन्त्र से १०८ आहुतियाँ दें । इससे सभी प्रकार की ग्रह-बाधाएँ नष्ट होती हैं ।

८॰ देव-बाधा-शान्ति-मन्त्रः- मन्त्रः- “ॐ सर्वेश्वराय हुम् ।” विधिः- सोमवार से प्रारम्भ कर नौ दिन तक उक्त मन्त्र का ३ माला जप करें । बाद में घृत और काले-तिल से आहुति दें । इससे दैवी-बाधाएँ दूर होती हैं और सुख-शान्ति की प्राप्ति होती है ।

10…… शत्रु-पीड़ा-कारक मन्त्र विधि — पहले किसी मङ्लवार को हनुमान मन्दिर में जाकर तेल, सिन्दूर, लाल फूल चढ़ाए । गुड का भोग लगाकर १०८ बार उक्त मन्त्र का जप करे । प्रयोग के समय मङ्गलवार की आधी रात को उक्त मन्त्र द्वारा हनुमान जी को लाल वस्त्र, चने की दाल, गुड का भोग लगाए । फिर दूसरे लाल कपड़े में तेल, सिन्दूर से शत्रु का नाम लिखकर, ‘अमुक’ की जगह शत्रु का नाम बोलकर सात सुइयाँ कपड़े में चुभो दें । उस कपड़े को मिट्टी की छोटी-सी हांडी में रखकर जमीन में गाड़ दें, तो शत्रु भारी कष्ट में रहेगा । जब अच्छा करना हो, तो जमीन से कपड़ा निकाले, सूई निकाल कर उसे धो डाले ।

मन्त्रः- विशेष – उक्त मन्त्र की साधना करते समय स्त्री-सम्पर्क से दूर रहे, सत्य बोले, भूमि पर शयन करे, मांस-मदिरा का सेवन न करे । अन्यथा परिणाम उल्टा हो जाएगा । विशेषः- इस प्रकार के मन्त्र उग्र प्रकृति के होते है। स्व-रक्षा व गुरु निर्देशन के अभाव में प्रयुक्त करना हानिकारक है तथा सामाजिक व नैतिक दृष्टि से अनुचित भी। यहाँ पर मात्र प्राचीन विद्या के संरक्षण हेतु प्रस्तुत किये जा रहे हैं ।
11…… हनुमान शाबर मन्त्रः- “निज ध्यान धूप, शिव वीर हनुमान, जटा – जूट अवधूत, जङ्ग जञ्जीर, लँगोट गाढ़ो । भूत को वश, परीत को वश, गदा तेल सिन्दूर चढ़े । आप देखे, तो सत्य की नाव नारसिंह खेवे । दुष्ट को लात बजरङ्ग देवे । भक्त की कड़ी आठ लाख अस्सी हजार वश कर । रावण की ठनाठनी, भक्त वीर हनुमान बारह वर्ष का ज्वान । हाथ में लड्‌डू, मुख में पान, सीता की गए खोज लगावन । मो सों का कहे, हनुमान? धारता की नगरी पैठ, राज करन्ता, जा जल्दी से । इस प्रीत की दृष्टि निकाल के आवै, तो सच्चा सिजबार का हनु-मान कहावै ।।”

विधि – पहले गाय के शुद्ध घी से १०८ आहुतियां शनिवार के दिन देकर जगा ले । फिर कहीं भी प्रयोग करे । धारदार हथियार से झाड़ें । भूत-प्रेत, जादू-टोना और नजर आदि दूर हो ।

12…महाकौतूहल दक्षिणकाली ह्रदय स्तोत्रम्

दक्षिण काली के इस स्तोत्र के उचयिता स्वयं महाकाल हैं । एक बार महाकाल ने प्रजापिता ब्रह्मा को दंडित करने के लिए उनका शीश काट डाल था । इस कृत्य के कारण उन्हें ब्रह्महत्या का दोष लगा था । इस दोष के निवारणार्थ ही उन्होंने इस स्तोत्र की रचना की थी । जो मनुष्य देवी पूजन के बाद इस स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, वह ब्रह्महत्या दोष से मुक्त हो जाता है । संकटकाल में इसका पाठ करने से पाठकर्ता के सभी कष्ट दूर होते हैं ।

महाकालोवाच

महाकौतूहलं स्तोत्रं हृदयाख्यं महोत्तमम् ।
श्रृणु प्रिये महागोप्यं दक्षिणायः श्रृणोपितम् ॥
अवाच्येमपि वक्ष्यामि तव प्रीत्या प्रकाशितं ।
अन्येभ्यः कुरु गोप्यं च सत्यं सत्यं च शैलजे ॥

भावार्थः महाकाल बोले, हे प्रिये! अति गोपनीय, चमत्कारी काली ह्रदय स्तोत्र का तुम श्रवण करो । दक्षिणदेवी ने अब तक इसे गुप्त रखा था । इस स्तोत्र को केवल तुम्हारे कारण मैं कह रहा हूं । हे शैलकुमारी ! तुम इसे उजागर मत करना ।

देव्युवाच

कस्मिन् युगे समुत्पन्नं केन स्तोत्रं कृतं पुरा ।
तत्सर्वं कथ्यतां शंभो दयानिधि महेश्वरः ॥

भावार्थः देवी ने पूछा, हे प्रभो ! इस स्तोत्र की रचना किस काल में और किसके द्वारा हुई? वह सब कृपया मुझे बताएं ।

महाकालोवाच

पुरा प्रजापते शीर्षच्छेदनं च कृतावहन् ।
ब्रह्महत्या कृतेः पापैर्भैंरवं च ममागतम् ॥
ब्रह्महत्या विनाशाय कृतं स्तोत्रं मयाप्रिये ।
कृत्या विनाशकं स्तोत्रं ब्रह्महत्यापहारकम् ॥

भावार्थः महाकाल बोले, हे देवी ! सृष्टि से पूर्व जब मैंने ब्रह्मा का शिरविच्छेद किया तो मुझे ब्रह्महत्या का दोष लगा और मैं भैरव रूप होय गया । ब्रह्महत्या दोष के निवारणार्थ सर्वप्रथम मैंने ही इस स्तोत्र का पाठ किया था ।

विनियोग

ॐ अस्य श्री दक्षिणकाल्या हृदय स्तोत्र मंत्रस्य श्री महाकाल ऋषिरुष्णिक्छन्दः, श्री दक्षिण कालिका देवता, क्रीं बीजं, ह्नीं शक्तिः, नमः कीलकं सर्वत्र सर्वदा जपे विनियोगः ।

हृदयादिन्यास

ॐ क्रां ह्रदयाय नमः । ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा । ॐ क्रूं शिखायै वषट्, ॐ क्रैं कवचाय हुं, ॐ क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ क्रः अस्त्राय फट् ।

ध्यान

ॐ ध्यायेत्कालीं महामायां त्रिनेत्रां बहुरूपिणीं ।
चतुर्भुजां ललज्जिह्वां पुर्णचन्द्रनिभानवाम् ॥
नीलोत्पलदल प्रख्यां शत्रुसंघ विदारिणीम् ।
नरमुण्डं तथा खङ्गं कमलं वरदं तथा ॥
विभ्राणां रक्तवदनां दंष्ट्रालीं घोररूपिणीं ।
अट्टाटहासनिरतां सर्वदा च दिगम्बराम् ।
शवासन स्थितां देवीं मुण्डमाला विभूषिताम् ॥

अथ ह्रदय स्तोत्रम्

ॐ कालिका घोर रूपाढ्‌यां सर्वकाम फलप्रदा ।
सर्वदेवस्तुता देवी शत्रुनाशं करोतु में ॥
ह्नीं ह्नीं स्वरूपिणी श्रेष्ठा त्रिषु लेकेषु दुर्लभा ।
तव स्नेहान्मया ख्यातं न देयं यस्य कस्यचित् ॥
अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि निशामय परात्मिके ।
यस्य विज्ञानमात्रेण जीवन्मुक्तो भविष्यति ॥
नागयज्ञोपवीताञ्च चन्द्रार्द्धकृत शेखराम् ।
जटाजूटाञ्च संचिन्त्य महाकात समीपगाम् ॥
एवं न्यासादयः सर्वे ये प्रकुर्वन्ति मानवाः ।
प्राप्नुवन्ति च ते मोक्षं सत्यं सत्यं वरानने ॥
यंत्रं श्रृणु परं देव्याः सर्वार्थ सिद्धिदायकम् ।
गोप्यं गोप्यतरं गोप्यं गोप्यं गोप्यतरं महत् ॥
त्रिकोणं पञ्चकं चाष्ट कमलं भूपुरान्वितम् ।
मुण्ड पंक्तिं च ज्वालं च काली यंत्रं सुसिद्धिदम् ॥
मंत्रं तु पूर्व कथितं धारयस्व सदा प्रिये ।
देव्या दक्षिण काल्यास्तु नाम मालां निशामय ॥
काली दक्षिण काली च कृष्णरूपा परात्मिका ।
मुण्डमाला विशालाक्षी सृष्टि संहारकारिका ॥
स्थितिरूपा महामाया योगनिद्रा भगात्मिका ।
भगसर्पि पानरता भगोद्योता भागाङ्गजा ॥
आद्या सदा नवा घोरा महातेजाः करालिका ।
प्रेतवाहा सिद्धिलक्ष्मीरनिरुद्धा सरस्वती ॥
एतानि नाममाल्यानि ए पठन्ति दिने दिने ।
तेषां दासस्य दासोऽहं सत्यं सत्यं महेश्वरि ॥
ॐ कालीं कालहरां देवीं कंकाल बीज रूपिणीम् ।
कालरूपां कलातीतां कालिकां दक्षिणां भजे ॥
कुण्डगोलप्रियां देवीं स्वयम्भू कुसुमे रताम् ।
रतिप्रियां महारौद्रीं कालिकां प्रणमाम्यहम् ॥
दूतीप्रियां महादूतीं दूतीं योगेश्वरीं पराम् ।
दूती योगोद्भवरतां दूतीरूपां नमाम्यहम् ॥
क्रीं मंत्रेण जलं जप्त्वा सप्तधा सेचनेच तु ।
सर्वे रोगा विनश्यन्ति नात्र कार्या विचारणा ॥
क्रीं स्वाहान्तैर्महामंत्रैश्चन्दनं साधयेत्ततः ।
तिलकं क्रियते प्राज्ञैर्लोको वश्यो भवेत्सदा ॥
क्रीं हूं ह्नीं मंत्रजप्तैश्च ह्यक्षतैः सप्तभिः प्रिये ।
महाभयविनाशश्च जायते नात्र संशयः ॥
क्रीं ह्नीं हूं स्वाहा मंत्रेण श्मशानाग्नि च मंत्रयेत् ।
शत्रोर्गृहे प्रतिक्षिप्त्वा शत्रोर्मृत्युर्भविष्यति ॥
हूं ह्नीं क्रीं चैव उच्चाटे पुष्पं संशोध्य सप्तधा ।
रिपूणां चैव चोच्चाटं नयत्येव न संशयः ॥
आकर्षणे च क्रीं क्रीं क्रीं जप्त्वाक्षतान् प्रतिक्षिपेत् ।
सहस्त्रजोजनस्था च शीघ्रमागच्छति प्रिये ॥
क्रीं क्रीं क्रीं ह्नूं ह्नूं ह्नीं ह्नीं च कज्जलं शोधितं तथा ।
तिलकेन जगन्मोहः सप्तधा मंत्रमाचरेत् ॥
ह्रदयं परमेशानि सर्वपापहरं परम् ।
अश्वमेधादि यज्ञानां कोटि कोटिगुणोत्तमम् ॥
कन्यादानादिदानां कोटि कोटि गुणं फलम् ।
दूती योगादियागानां कोटि कोटि फलं स्मृतम् ॥
गंगादि सर्व तीर्थानां फलं कोटि गुणं स्मृतम् ।
एकधा पाठमात्रेण सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥
कौमारीस्वेष्टरूपेण पूजां कृत्वा विधानतः ।
पठेत्स्तोत्रं महेशानि जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥
रजस्वलाभगं दृष्ट्‌वा पठदेकाग्र मानसः ।
लभते परमं स्थान देवी लोकं वरानने ॥
महादुःखे महारोगे महासंकटे दिने ।
महाभये महाघोरे पठेत्स्तोत्रं महोत्तमम् ॥
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं गोपयेन्मातृजारवत् ।।

13…संकट-निवारक काली-मन्त्र
“काली काली, महा-काली। इन्द्र की पुत्री, ब्रह्मा की साली। चाबे पान, बजावे थाली। जा बैठी, पीपल की डाली। भूत-प्रेत, मढ़ी मसान। जिन्न को जन्नाद बाँध ले जानी। तेरा वार न जाय खाली। चले मन्त्र, फुरो वाचा। मेरे गुरु का शब्द साचा। देख रे महा-बली, तेरे मन्त्र का तमाशा। दुहाई गुरु गोरखनाथ की।”
सामग्रीः माँ काली का फोटो, एक लोटा जल, एक चाकू, नीबू, सिन्दूर, बकरे की कलेजी, कपूर की ६ टिकियाँ, लगा हुआ पान, लाल चन्दन की माला, लाल रंग के पूल, ६ मिट्टी की सराई, मद्य।
विधिः पहले स्थान-शुद्धि, भूत-शुद्धि कर गुरु-स्मरण करे। एक चौकी पर देवी की फोटो रखकर, धूप-दीप कर, पञ्चोपचार करे। एक लोटा जल अपने पास रखे। लोटे पर चाकू रखे। देवी को पान अर्पण कर, प्रार्थना करे- हे माँ! मैं अबोध बालक तेरी पूजा कर रहा हूँ। पूजा में जो त्रुटि हों, उन्हें क्षमा करें।’ यह प्रार्थना अन्त में और प्रयोग के समय भी करें।
अब छः अङ्गारी रखे। एक देवी के सामने व पाँच उसके आगे। ११ माला प्रातः ११ माला रात्रि ९ बजे के पश्चात् जप करे। जप के बाद सराही में अङ्गारी करे व अङ्गारी पर कलेजी रखकर कपूर की टिक्की रखे। पहले माँ काली को बलि दे। फिर पाँच बली गणों को दे। माँ के लिए जो घी का दिया जलाए, उससे ही कपूर को जलाए और मद्य की धार निर्भय होकर दे। बलि केवल मंगलवार को करे। दूसरे दिनों में केवल जप करे। होली-दिवाली-ग्रहण में या अमावस्या को मन्त्र को जागृत करता रहे। कुल ४० दिन का प्रयोग है।
भूत-प्रेत-पिशाच-जिन्न, नजर-टोना-टोटका झाड़ने के लिए धागा बनाकर दे। इस मन्त्र का प्रयोग करने वालों के शत्रु स्वयं नष्ट हो जाते हैं।

14…संकट से रक्षा का शाबर मन्त्र मन्त्रः- “हनुमान हठीला लौंग की काट, बजरंग का टीला ! लावो सुपारी । सवा सौ मन का भोगरा, उठाए बड़ा पहलवान । आस कीलूँ – पास कीलूँ, कीलूँ अपनी काया । जागता मसान कीलूँ, बैठूँ जिसकी छाया । जो मुझ पर चोट-चपट करें, तू उस पर बगरंग ! सिला चला । ना चलावे, तो अञ्जनी मा की चीर फाड़ लंगोट करें, दूध पिया हराम करें । माता सीता की दूहाई, भगवान् राम की दुहाई । मेरे गुरु की दुहाई ।”
विधिः- हनुमान् जी के प्रति समर्पण व श्रद्धा का भाव रखते हुए शुभ मंगलवार से उक्त मन्त्र का नित्य एक माला जप ९० दिन तक करे । पञ्चोपचारों से हनुमान् जी की पूजा करे । इससे मन्त्र में वर्णित कार्यों की सिद्धि होगी एवं शत्रुओं का नाश होगा तथा परिवार की संकटों से रक्षा होगी ।…..

15…करकलितकपाल कुँडलि दण्डपाणि तिमिरनीलो व्यालयज्ञोपवितं ।क्रतु समय सपर्याविघन विचेद हेतु जयति बटकुनाथ सिदीदे साधकानाम ।ॐ भेरवाय नमः

16… वशीकरण मन्त्रः- “ॐ नमो फूल सुगन्धा । फूल ही बाँधूँ सात समुद्रा । अहो फूल झटियारा, चौंसठ जोगिनी खरा प्यारा । ए फूल ए दिन पाऊँ, सूती सुवासिनी सेज बुलाऊँ । मुआ मड़ा मसान जगाऊँ, हाक करी उचाट लाऊँ । गलिहट मेरे पगे लगाऊँ । देखूँ गोरा भैरव ! तेरी शक्ति । मेरी भक्ति, गुरू की शक्ति । फुरो मन्त्र, ईश्वरो वाचा ।।”

विधि – होली के एक दिन पूर्व जिस स्थान पर होली जलती हो, शाम को होलिका को हल्दी-चावल से निमन्त्रण दे आए और दूसरे दिन होली जलने पर १०८ बार मन्त्र जपते हुए सिन्दूर और गूगल से होली में हवन करे । फिर जब भी, किसी भी फूल पर १ बार मन्त्र पढ़़कर जिस स्त्री या पुरुष को सुँधाएंगे, वह वशीभूत होगा ।

17… कामाख्या देवी – मन्त्रः- “ॐ कामरु देश कामाख्या देवी, तहाँ बैठा इस्माइल जोगी । इस्माइल जोगी दिए चार पान । एक पान सों राती माती । दूजे पान सों विरह सँजोती । तीजे पान सों अंग मरोड़े । चौथे पान सों दोऊ कर जोड़े । चारों पान जो मेरे खाय, मेरे पास से कहूँ न जाय । ठाड़े सुख न बैठे सुख, फिर-फिर देखे मेरा मुख । कामरु कामाख्या की आज्ञा फुरै, इस वचनों की सिद्धि पड़ै । ॐ ‌ठः ठः ठः ठः ठः ठः ।” विधिः- नित्य १०८ जप २१ दिन तक करके सिद्ध करें । फिर रविवार के दिन ४ पान का एक बीड़ा बनाकर खिला दें । ‘साध्या’ का वशीकरण होगा ।

18…कलुआ वीर – मन्त्रः- ” हरा बगीचा कँचना, महोबे का पान । कलुआ वीर का पहला मन्तर । हनूमान मैदान, जोगिनी जा । जिसको मैं कहूँ, उसको पकड़ के ला । कवाड़ देश, बंगाल का इलम साँचा । गुरु की शक्ति, मेरी भक्ति । चलो मन्त्र, ईश्वरी वाचा ।” विधिः- ऊदबत्ती सुलगाकर 100 दाने की माला से २५००० जप करने पर मन्त्र सिद्ध होगा । फिर किसी कंकड़ पर ७ बार मन्त्र पढ़कर जिस स्त्री को बुलाना हो, उसके मार्ग में पीछै से आगे की तरफ इस प्रकार फेंके कि कंकड़ स्त्री के बाजू से निकलकर आगे गिरे । जहाँ वह कंकड़ गिरेगा, स्त्री उसके आगे नहीं जा सकेगी । लौटकर साधक के पीछे-पीछे चली जाएगी ।

19…. विकट-मन्त्र – मन्त्रः- “चल, चली चल । नारे चल, खोरे चल । अगाड़ी चल, पिछाड़ी चल । जिस पर मैं कहूँ, उस पर चल । कवाड़ देश, बंगाल का इलम साँचा । गुरु की शक्ति, मेरी भक्ति । चलो मन्त्र, ईश्वरी वाचा ।” विधिः- होली या दीवाली पर ऊदबत्ती और कपूर जलाकर १२१ बार पढ़ने से सिद्ध होगा । फिर खाने-पीने की किसी वस्तु को सात बार अभिमन्त्रित कर खिलाने-पिलाने से वशीकरण होगा ।

20…..बैहा-नारसिंह – मन्त्रः- “कामरु खण्ड कामाक्षा देवी जहाँ बसै इस्माइक जोगी । इस्माइल जोगी फूल चढ़ावै । एक फूल हँसै, एक फूल बिहँसै । एक फूल बैहा नारसिंग बसै । जो लेय इस फूल की बास, सो उठ चलै हमारे साथ । जो ना उठ चले हमारे साथ, आधी रात कलेजा फटे । गुरु की शक्ति, मेरी भक्ति । फुरै मन्त्र, ईश्वरी वाचा ।” विधिः- सात बार अभिमन्त्रित पुष्प सुँघाने से वशीकरण होता है । पहले घी की आहुति 108 बार जप कर सिद्ध कर लें ।

21….लोना चमारिन – मन्त्रः- “कामरु देश कामाख्या देवी, जहाँ बसे इस्माइल जोगी । इस्माइल जोगी की लगी फुलवारी, जे के फूल चुनै लोना चमारिन । जो लेय इस फूल की बास, उसकी जान हमारे पास । घर छोड़, घर-आँगन छोड़, छोड़ै कुटुम्ब मोह-लाज । दुहाई लोना चमारिन की ।।” विधिः- १॰ ७ बार अभिमन्त्रित पुष्प सुँघाने या मारने से वशीकरण होता है ।

२॰ पीपल के वृक्ष के नीचे जो मन्दिर हो, वहाँ जाकर जिसका मन्दिर हो, उसे सिन्दूर आदि चढ़ावे और एक नारियल चढ़ावे । पूजन में सात चमेली के फूल अवश्य हों । फिर एक फूल पर १२१ बार मन्त्र पढ़कर जिसे मार दिया जाएगा, वह स्त्री वशीभूत होकर साधक के पीछे-पीछे चली आएगी । यह क्रिया प्रत्येक प्रयोग के समय करनी होगी ।

22… पान वशीकरण १॰ “कामरु देश कामाख्या देवी, तहाँ बसे इस्माइल जोगी। इस्माइल जोगी ने दीना बीड़ा। पहला बीड़ा आती-जाती, दूजा बीड़ा दिखावे छाती, तीजा बीड़ा अंग लिपटाय। फुरो मन्त्र, ईश्वरो वाचा। दुहाई गुरु गोरखनाथ की।” विधिः- दीपावली की रात्रि में १४४ बार जपने से उक्त मन्त्र सिद्ध हो जाता है। जप के समय दीपक जलाएँ, धूप दें तथा मिठाई का प्रसाद रखें। मन्त्र सिद्ध कर लेने पर तीन पानों का मसालेदार बीड़ा बनाएँ। ७ बार उक्त मन्त्र से उस पर फूँक मारकर जिसे खिला देंगे, वह वश में हो जाएगा।

23…“हाथ पसारुँ, मुख मलूँ, काची मछली खाऊँ, आठ पहर चौंसठ घड़ी जग मोह घर जाऊँ।” विधिः- किसी शुभ शनिवार से जप प्रारम्भ करे। सात शनिवार तथा सात रविवार- दोनों दिन उक्त मन्त्र को रात्रि में १०१ बार जपें। जप के समय गूगल की धूप, दीपक तथा प्रसाद रखें। इस प्रकार सात सप्ताह की साधना से मन्त्र सिद्ध हो जाता है। बाद में अभीष्ट व्यक्ति को, उक्त मन्त्र से ७ बार अभिमन्त्रित पान खिला दें। वह वशीभूत हो जाएगा।
24… सर्व-जन-वशीकरण शाबर मन्त्र मन्त्रः- “जय हनुमन्ता, तेज चलन्ता, शहर-गाँव-मरघट में रमता । भैरव साथ उमा को नमता, मेरे वश में अमुक कु लावता । नमु हनुमन्त बजरंग बल-वीरा, ध्यान धरुँ – हिरदय में धीरा ।

विधिः- आक के उस वृक्ष के पास जाए, जिसके फूल जामुन के रंग के हों । शनिवार के दिन ऐसे आक के वृक्ष के पास दीप व धूप कर उक्त मन्त्र का १०००० (दस हजार) जप करें । १० हजार जप न हो सके, तो सूझ-बूझ से निश्चित संख्या में जप करें । जब तक जप संख्या पूरी न हो, तब तक जप सतत करे अथवा शेष जप दूसरे शनिवार को वैसे ही करें । वृक्ष के पास ही हनुमान् जी का पूजन करें । नैवेद्य और लंवग-युक्त पान का बीड़ा चढ़ाएं । पूजन के बाद पान का बीड़ा स्वयं खाएं और प्रसाद को वितरित करें । इस तरह ८ दिन लगातार या ८ शनिवार तक करने से मन्त्र की सिद्धि होती है । जब किसी को भी वश में करने की आवश्यकता हो, तब चिता की भस्म, चौराहे की धूल और सरोवर या तालाब की मिट्टी – तीनों को शनिवार की रात्रि में अपने सामने रखकर उसके ऊपर १११ बार उक्त मन्त्र का जप करें । ऐसा ७ दिनों तक करें । आठवें दिन पुनः शनिवार होगा, इस शनिवार को प्रातः-काल इन तीनों अभिमन्त्रित वस्तुओं को सरोवर या तालाब, जहाँ से मिट्टी लाए, वहीं डाले । विशेषः- ‘अमुक कु’ के स्थान पर जिसका वशीकरण करना हो, उसका नाम लेना चाहिए । जब मन्त्र सिद्ध करे, तब जो मन्त्र ऊपर दिया है, वैसे ही जप करें । प्रयोग के समय ‘अमुक कु’ के स्थान पर नाम जोड़ कर जपें ।

25…१॰ सिद्ध मोहन मन्त्र क॰ “ॐ अं आं इं ईं उं ऊं हूँ फट्।” विधिः- ताम्बूल को उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित कर साध्या को खिलाने से उसे खिलानेवाले के ऊपर मोह उत्पन्न होता है।

ख॰ “ॐ नमो भगवती पाद-पङ्कज परागेभ्यः।” ग॰ “ॐ भीं क्षां भीं मोहय मोहय।” विधिः- किसी पर्व काल में १२५ माला अथवा १२,५०० बार मन्त्र का जप कर सिद्ध कर लेना चाहिए। बाद में प्रयोग के समय किसी भी एक मन्त्र को तीन बार जप करने से आस-पास के व्यक्ति मोहित होते हैं

26…श्री कामदेव का मन्त्र (मोहन करने का अमोघ शस्त्र) “ॐ नमो भगवते काम-देवाय श्रीं सर्व-जन-प्रियाय सर्व-जन-सम्मोहनाय ज्वल-ज्वल, प्रज्वल-प्रज्वल, हन-हन, वद-वद, तप-तप, सम्मोहय-सम्मोहय, सर्व-जनं मे वशं कुरु-कुरु स्वाहा।” विधिः- उक्त मन्त्र का २१,००० जप करने से मन्त्र सिद्ध होता है। तद्दशांश हवन-तर्पण-मार्जन-ब्रह्मभोज करे। बाद में नित्य कम-से-कम एक माला जप करे। इससे मन्त्र में चैतन्यता होगी और शुभ परिणाम मिलेंगे। प्रयोग हेतु फल, फूल, पान कोई भी खाने-पीने की चीज उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित कर साध्य को दे। उक्त मन्त्र द्वारा साधक का बैरी भी मोहित होता है। यदि साधक शत्रु को लक्ष्य में रखकर नित्य ७ दिनों तक ३००० बार जप करे, तो उसका मोहन अवश्य होता है।

27…दृष्टि द्वारा मोहन करने का मन्त्र “ॐ नमो भगवति, पुर-पुर वेशनि, सर्व-जगत-भयंकरि ह्रीं ह्रैं, ॐ रां रां रां क्लीं वालौ सः चव काम-बाण, सर्व-श्री समस्त नर-नारीणां मम वश्यं आनय आनय स्वाहा।” विधिः- किसी भी सिद्ध योग में उक्त मन्त्र का १०००० जप करे। बाद में साधक अपने मुहँ पर हाथ फेरते हुए उक्त मन्त्र को १५ बार जपे। इससे साधक को सभी लोग मान-सम्मान से देखेंगे। 28…तेल अथवा इत्र से मोहन क॰ “ॐ मोहना रानी-मोहना रानी चली सैर को, सिर पर धर तेल की दोहनी। जल मोहूँ थल मोहूँ, मोहूँ सब संसार। मोहना रानी पलँग चढ़ बैठी, मोह रहा दरबार। मेरी भक्ति, गुरु की शक्ति। दुहाई गौरा-पार्वती की, दुहाई बजरंग बली की। ख॰ “ॐ नमो मोहना रानी पलँग चढ़ बैठी, मोह रहा दरबार। मेरी भक्ति, गुरु की शक्ति। दुहाई लोना चमारी की, दुहाई गौरा-पार्वती की। दुहाई बजरंग बली की।” विधिः- ‘दीपावली’ की रात में स्नानादिक कर पहले से स्वच्छ कमरे में ‘दीपक’ जलाए। सुगन्धबाला तेल या इत्र तैयार रखे। लोबान की धूनी दे। दीपक के पास पुष्प, मिठाई, इत्र इत्यादि रखकर दोनों में से किसी भी एक मन्त्र का २२ माला ‘जप’ करे। फिर लोबान की ७ आहुतियाँ मन्त्रोचार-सहित दे। इस प्रकार मन्त्र सिद्ध होगा तथा तेल या इत्र प्रभावशाली बन जाएगा। बाद में जब आवश्यकता हो, तब तेल या इत्र को ७ बार उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित कर स्वयं लगाए। ऐसा कर साधक जहाँ भी जाता है, वहाँ लोग उससे मोहित होते हैं। साधक को सूझ-बूझ से व्यवहार करना चाहिए। मन चाहे कार्य अवश्य पूरे होंगे।
29… मोहनी शाबर मन्त्र (१) “फूलर से फूल बसे अदूल फूल में, नरसिंह बसे वाही फूल, फूल कचनार छोड़ह, तिरिया माय-बाप कै, चल हमरा संग। दोहाय महत मानी कै।”

विधिः- अदूल (गुड़हल) फूल की कली पर बारह बार उक्त मन्त्र पढ़ें। जिस पर फेकेंगे, वह वशीभूत होगा।

30…“मोहन-मोहन क्या करे ? मोहन मेरा नाम। भीत पर तो देवी खड़ी। मोहों सारा गाँव, राजा मोहों, प्रजा मोहों, मोहों गणपत राय। तैंतीस कोटि देवता मोहों। नर लोग कहाँ जायँ ? दुहाई ईश्वर महादेव, गौरा पार्वती, नैना योगिनी, कामरु कमक्षा की।”

विधिः- दशहरे के दिन से नित्य एक माला का जप दस दिन तक करे। जप-काल में घी-गुग्गुल-कपूर से धूनी दे, तो मन्त्र सिद्ध होता है। ‘गोरोचन’ को उक्त मन्त्र से सात बार अभिमन्त्रित कर तिलक लगाएँ। तब जिस व्यक्ति के पास जाएँगे, वह मोहित होगा। ‘फूल’ को अभिमन्त्रित कर जिसे सुँघाया जाएगा, वह मोहित होगा। सभा को मोहित करना हो तो मन्त्र पढ़कर चारों ओर फूँक मारें-सभी मोहित होंगे।

 

31… नारी-मोहन “आ चन्दा की चाँदनी, होकर उन्मादिनी। सतगुरु की है पुकार। मान-मान मानिनी।। तुझे कामाक्षा की आन, छोड़ हठः चीर घटा-पट। आ जा नदी के किनार, गा ले प्रीति रागिनी।। ॐ नमः कामाक्षाय अं कं चं टं तं पं यं शं ह्रीं क्रीं श्रीं फट् स्वाहा।।”

विधिः- किसी पूर्णिमा की रात को नदी के किनारे, एकान्त स्थान में पूर्व की ओर मुख करके आसन पर बैठे। १०८ बार उक्त मन्त्र पढ़कर एक फूल नदी में डाल दे। इस क्रिया से यह मन्त्र सिद्ध हो जाएगा। फिर जब चाहे, इस मन्त्र से अभिमन्त्रित फूल या रुमाल आदि कोई भी सुहावनी वस्तु, किसी भी युक्ति से, साध्या के हाथ में दे। साध्या मोहित होकर उसकी आज्ञानुवर्तिनी बन जाएगी।

32….अधिकारी-मोहन “ॐ नमो प्रजापत्यै नृपति-मन मोहय सर्वं सेद्धय नमः। कामाक्षात अं कं चं टं तं पं यं शं ह्रीं क्रीं श्रीं फट् स्वाहा।।” विधिः- शुक्ल पक्ष पँचमी की रात्रि में चनदन-काष्ठ के पीढ़े पर बैठकर उक्त मन्त्र का १०८ बार जप करे। जप करते समय श्री कामाक्षा देवी का ध्यान करता रहे, तो यह मन्त्र सिद्ध हो जाएगा। जिस अधिकारी के गले में उक्त मन्त्र से अभीमन्त्रित फूलों की माला पहनाएँगे, वह मोहित हो जाएगा।

33….ग्राम-मोहन “जल-जल-जीवन-दाता जल। जल के राजा कूप, जहाँ बसे वरुण भूप।। दोहाई कामाख्या की, मोहनी चला दे। भूप को फँसा कूप में, माया फैला दे।। तेरी महिमा महान, रख ले सतगुरु की आन।। ॐ नमः कामाक्षाय अं कं चं टं तं पं यं शं ह्रीं क्रीं श्रीं फट् स्वाहा।।”

विधिः- शुक्ल पक्ष एकादशी की अर्ध-रात्रि में किसी कुएँ के पास सवा सेर शक्कर (चीनी) लेकर जाए और पूर्व की ओर मुख कर, उल्लू के पँख पर पाँव रखकर बैठे। १०८ बार उक्त मन्त्र पढ़कर शक्कर को कुएँ में डाल दे। जितने नर-नारी उस कुएँ का जल पिएँगे, सभी जप-कर्त्ता पर मोहित होकर उसकी आज्ञा से प्राण तक देने के लिए सदा तैयार रहेंगे।

34…. सभा मोहन “गंगा किनार की पीली-पीली माटी। चन्दन के रुप में बिके हाटी-हाटी।। तुझे गंगा की कसम, तुझे कामाक्षा की दोहाई। मान ले सत-गुरु की बात, दिखा दे करामात। खींच जादू का कमान, चला दे मोहन बान। मोहे जन-जन के प्राण, तुझे गंगा की आन। ॐ नमः कामाक्षाय अं कं चं टं तं पं यं शं ह्रीं क्रीं श्रीं फट् स्वाहा।।”

विधिः- जिस दिन सभा को मोहित करना हो, उस दिन उषा-काल में नित्य कर्मों से निवृत्त होकर ‘गंगोट’ (गंगा की मिट्टी) का चन्दन गंगाजल में घिस ले और उसे १०८ बार उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित करे। फिर श्री कामाक्षा देवी का ध्यान कर उस चन्दन को ललाट (मस्तक) में लगा कर सभा में जाए, तो सभा के सभी लोग जप-कर्त्ता की बातों पर मुग्ध हो जाएँगे।

35…शत्रु-मोहन “चन्द्र-शत्रु राहू पर, विष्णु का चले चक्र। भागे भयभीत शत्रु, देखे जब चन्द्र वक्र। दोहाई कामाक्षा देवी की, फूँक-फूँक मोहन-मन्त्र। मोह-मोह-शत्रु मोह, सत्य तन्त्र-मन्त्र-यन्त्र।। तुझे शंकर की आन, सत-गुरु का कहना मान। ॐ नमः कामाक्षाय अं कं चं टं तं पं यं शं ह्रीं क्रीं श्रीं फट् स्वाहा।।” विधिः- चन्द्र-ग्रहण या सूर्य-ग्रहण के समय किसी बारहों मास बहने वाली नदी के किनारे, कमर तक जल में पूर्व की ओर मुख करके खड़ा हो जाए। जब तक ग्रहण लगा रहे, श्री कामाक्षा देवी का ध्यान करते हुए उक्त मन्त्र का पाठ करता रहे। ग्रहण मोक्ष होने पर सात डुबकियाँ लगाकर स्नान करे। आठवीं डुबकी लगाकर नदी के जल के भीतर की मिट्टी बाहर निकाले। उस मिट्टी को अपने पास सुरक्षित रखे। जब किसी शत्रु को सम्मोहित करना हो, तब स्नानादि करके उक्त मन्त्र को १०८ बार पढ़कर उसी मिट्टी का चन्दन ललाट पर लगाए और शत्रु के पास जाए। शत्रु इस प्रकार सम्मोहित हो जायेगा कि शत्रुता छोड़कर उसी दिन से उसका सच्चा मित्र बन जाएगा।

36… आत्म-रक्षा-मन्त्र मन्त्रः- “चन्दा बाँधों, सूरज बाँधों । बाँधों गङ्गा माई । तेंतीस कोटि के देवता बाँधों । हनुमत की राम दुहाई । मरघट का मसान बाँधों । मन चाहे लड्‌डू खाऊँ । पूजा करूँ गणेश की । मन चाहे जहाँ चला जाऊँ । श्री हनुमान जी की राम दुहाई ।।”.

विधि – किसी भी मङ्गलवार को घी – गूगल का होम देते हुए १०८ बार जप करके सिद्ध करें । रक्षा के लिए मन्त्र पढ़कर नीबू काटकर अपने चारों तरफ निचोड़ कर फेंक दें । सर्व – विध रक्षा होगी ।

37…… हनुमान जी का शत्रु-नाशक मन्त्र “ॐ हनुमान वीर नमः। ॐ नमो वीर, हनुमत वीर, शूर वीर, धाय-धाय चलै वीर। मूठी भर चलावै तीर। मूठी मार, कलेजा काढ़ै। क्रोध करता, हियरा काढ़ै। मेरा वैरी, तेरे वश होवै। धर्म की दुहाई। राजा रामचन्द्र की दोहाई। मेरा वैरी न पछाड़ मारै तो माता अञ्जनी की दोहाई।”

विधि- काले उड़द को अभिमन्त्रित करके शत्रु की ओर फेंके। इससे शत्रु का नाश होगा। प्रयोग करते समय मन्त्र का जप २१ से लेकर १०८ बार करे। पहले होली, दीपावली, एकादशी में सिद्ध कर लें। जप संख्या १००८।
38…… हनुमान शाबर मन्त्रः- “निज ध्यान धूप, शिव वीर हनुमान, जटा – जूट अवधूत, जङ्ग जञ्जीर, लँगोट गाढ़ो । भूत को वश, परीत को वश, गदा तेल सिन्दूर चढ़े । आप देखे, तो सत्य की नाव नारसिंह खेवे । दुष्ट को लात बजरङ्ग देवे । भक्त की कड़ी आठ लाख अस्सी हजार वश कर । रावण की ठनाठनी, भक्त वीर हनुमान बारह वर्ष का ज्वान । हाथ में लड्‌डू, मुख में पान, सीता की गए खोज लगावन । मो सों का कहे, हनुमान? धारता की नगरी पैठ, राज करन्ता, जा जल्दी से । इस प्रीत की दृष्टि निकाल के आवै, तो सच्चा सिजबार का हनु-मान कहावै ।।”
विधि – पहले गाय के शुद्ध घी से १०८ आहुतियां शनिवार के दिन देकर जगा ले । फिर कहीं भी प्रयोग करे । धारदार हथियार से झाड़ें । भूत-प्रेत, जादू-टोना और नजर आदि दूर हो ।

39… रुठी हुई स्त्री का वशीकरण- “मोहिनी माता, भूत पिता, भूत सिर वेताल। उड़ ऐं काली ‘नागिन’ को जा लाग। ऐसी जा के लाग कि ‘नागिन’ को लग जावै हमारी मुहब्बत की आग। न खड़े सुख, न लेटे सुख, न सोते सुख। सिन्दूर चढ़ाऊँ मंगलवार, कभी न छोड़े हमारा ख्याल। जब तक न देखे हमारा मुख, काया तड़प तड़प मर जाए। चलो मन्त्र, फुरो वाचा। दिखाओ रे शब्द, अपने गुरु के इल्म का तमाशा।” विधि- मन्त्र में ‘नागिन’ शब्द के स्थान पर स्त्री का नाम जोड़े। शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से ८ दिन पहले साधना प्रारम्भ करे। एक शान्त एकान्त कमरे में रात्रि मे १० बजे शुद्ध वस्त्र धारण कर कम्बल के आसन पर बैठे। अपने पास जल भरा एक पात्र रखे तथा ‘दीपक’ व धूपबत्ती आदि से कमरे को सुवासित कर मन्त्र का जप करे। ‘जप के समय अपना मुँह स्त्री के रगने की स्थान की ओर रखे। एकाग्र होकर घड़ी देखकर ठीक दो घण्टे तक जप करे। जिस समय मन्त्र का जप करे, उस समय स्त्री का स्मरण करता रहे। स्त्री का चित्र हो, तो कार्य अधिक सुगमता से होगा। साथ ही, मन्त्र को कण्ठस्थ कर जपने से ध्यान केन्द्रित होगा। इस प्रयोग में मन्त्र जप की गिनती आवश्यक नहीं है। उत्साह-पूर्वक पूर्ण संकल्प के साथ जप करे।

40…… धूल वशीकरण- १॰ “धूल-धूल-तू धूल की रानी, जगमोहन सुन मोर बानी। जल से धुला आन पढूँ, तब पार्वती वरदान धूलि पड़ि। दू अमुकी अंग, जो जलती आती उमंग, उसका मन लावे निकाल, हमारी वश्यता करे स्वीकार।।” विधि- सिद्धि हेतु ‘होली’ की रात्रि में ११ माला जप करे। प्रयोग के समय साध्या के बाँए पैर की मिट्टी लेकर उसे उक्त मन्त्र से २१ बार अभिमन्त्रित करे। मन्त्र में ‘अमुकी’ शब्द के स्थान पर साध्या का नाम कहे। फिर एक चुटकी मिट्टी साध्या के सिर पर सावधानी-पूर्वक डाले।

41… ॐ नमो आदेश गुरु का, धूली-धूली विकट चाँदनी पर मारु धूली। फिर दिवाना महल तजे, घर-दुआर तजे, ठाठा भरतार तजे। देवी-दिवानी एक सठी फलवान, तू नरसिंह वीर। ‘अमुकी’ को उठाय ला। फुरो मन्त्र, ईश्वरो वाचा।” विधि- ‘सिद्धि’ हेतु किसी शनिवार से उक्त मन्त्र का जप प्रारम्भ करे। जप २१ दिन तक करे। प्रयोग के समय जिस स्त्री की मृत्यु शनिवार को हुई हो, श्मशान-क्रिया के पश्चात् उसके पैर की ओर का अंगार (कोयला) लाए तथा चौराहे की चुटकी भर धूल लेकर उसमें कोयले को पीस कर मिलाए। फिर उक्त मन्त्र से उसे ७ बार अभिमन्त्रित कर युक्ति-पूर्वक साध्या के शरीर पर डाले।

42… ॐ नमः धूली धूलेश्वरी, मातु परमेश्वरी, चञ्चती जय इनारन। चोप भरे छार-छारते में हटे, देता घर-बार, करे तो मशान लौटे। जीवे तो पाव लौटे। वचन बाँधी। ‘अमुकी’ को धाई लाव, मातु धूलेश्वरी। फुरो मन्त्र, ईश्वरो वाचा। ठः ठः स्वाहा।” विधि- सिद्धि हेतु ७ शनिवार (केवल शनिवार को) उक्त मन्त्र १४४ बार जपे। १४४ की संख्या को ध्यान में रखे। कम या ज्यादा न जपे। अन्तिम ७वें शनिवार को जप कर, ‘रविवार’ के दिन जो स्त्री मरे व जिसका रविवार को ही दाह-कर्म हो, उसकी चिता से तीन चुटकी राख लेकर उसमें चौराहे की थोड़ी धूल मिलाए। फिर उसे उक्त मन्त्र से अभीमन्त्रित कर ‘साध्या’ पर डाले। मन्त्र में ‘अमुकी’ के स्थान पर साध्या का नाम ले।

43……॰ “खरी सुपारी, टाम नगारी। राजा परजा, खरी पियारी। मन्त्र पढ़ लगाऊ, तो रहिया कलेजा लावे दौड़, जीवित चाटै पग-तली। मूवे सेवे मसान या शब्द की मारी, न लावे तो जयी हनुमन्त की आन। शब्द साँचा, पिण्ड कांचा। फुरो मन्त्र, ईश्वरो वाचा।” विधि- पहले ‘सूर्य’ या ‘चन्द्र’ ग्रहण में ३ माला जप करे। फिर सामान्य दिनों में ‘शनिवार’ से जप प्रारम्भ करे तथा नित्य २१ दिन तक एक माला जप करे। प्रयोग के समय सुपारी पर उक्त मन्त्र सात बार पढ़कर फूँक मारे और साध्या को खाने के लिए दे।

44… हनुमान वशीकरण मन्त्र “ॐ राई वर राई पचरसी। बारह सरसू तेरह राई। नब्बे दिन मंगलवार को ऐसी भाऊ, पराई स्त्री (साध्या का नाम) को भूल जाए घर-बार। घर छोड़, घर की डौरी छोड़। छोड़ माँ-बाप और छोड़ घर का साथ, हो जा मेरे साथ। दुहाई तुझे हलाहल हनुमान की। मेरा काम जल्दी कर, नी करे तो माँ अञ्जनी के सेज पर पाँव धरे। तेरी माता का चीर फाणीने लँगोट करे। फुरो मन्त्र, ईश्वरो वाचा।” विधि- उक्त मन्त्र को पहले ‘नवरात्र’ या ‘ग्रहण’ में सिद्ध करे। ‘नवरात्र’ में मंगल और शनिवार को हनुमान जी को चोला चढ़ाए और प्रतिदिन हनुमान जी की मूर्ति के समक्ष १०८ बार जप करे। जप के समय अपने पास ‘राई’ और ‘सरसों’ रखे। मन्त्र पढ़कर इन्हें अभिमन्त्रित करे। बाद में आवश्यकतानुसार ‘प्रयोग’ करे। प्रयोग के समय चतुराई से तेरह राई ‘साध्या’ की डेहरी पर डाले और बारह सरसों उसके घर पर फेंके।
45…… छत्तीसगढ़ के अनुभूत शाबर मन्त्र प्रस्तुत शाबर मन्त्र अनुभूत हैं और अल्प मात्रा में जपने पर ही सिद्ध हो जाते हैं । इन मन्त्रों को सिद्ध करने के लिए नव-रात्रि, दीपा-वली, होली, ग्रहण, अमावस्या आदि पर्व उपयुक्त माने गए हैं । इन मन्त्रों को सिद्ध करने के पहले ‘गुरु – सर्वार्थ साधन मन्त्र’ और ‘शरीर- रक्षा मन्त्र’ को जप लेना चाहिए, तभी इनमें सफलता मिलती है । यहाँ पर केवल ‘गुरु-स्थापना-मन्त्र’ और ‘शरीर-रक्षा-मन्त्र’ प्रस्तुत हैं, जो छत्तीसगढ़ में प्रचलित हैं । यथा-

गुरु-स्थापना-मन्त्र :- साधना प्रारम्भ के पहले एक पाँच बत्ती- वाला दीपक जला कर निम्न मन्त्र को सात बार पढ़ें – “गुरू दिन गुरू बाती, गुरू सहे सारी राती । वासतीक दीवना बार के, गुरू के उतारौं आरती ।।” शरीर-रक्षा-मन्त्र :- “ॐ नमो आदेश शुरू का । जय हनुमान, वीर महान । मै करथ हौं तोला प्रनाम, भूत-प्रेत-मरी मसान । भाग जाय, तोर सुन के नाम । मोर शरीर के रक्ष्या करिबे, नहीं तो सीता मैया के सय्या पर पग ला धरबे ! मोर फूकें । मोर गुरू के फूकें, गुरू कौन ? गौरा- महा-देव के फूकें । जा रे शरीर बँधा जा ।” विधि – उक्त मन्त्र को ग्यारह बार पढ़कर, अपने चारों ओर एक गोल घेरा बना लें । इससे साधना में सभी विघ्नों से साधक की रक्षा होती है । टोना झारने के मन्त्र टोना लगाने का मन्त्र भूत-प्रेत बाँधने के मन्त्र बैरी-नाशन मन्त्र शत्रु-स्तम्भन मन्त्र शत्रु-पीड़ा-कारक मन्त्र गर्भ-स्तम्भन मन्
46…… गण्डा देने का मन्त्र मन्त्रः- “ओम नमो आदेश गुरु को । जागे गणेश देवता, मुह-मदा वीर जागे । काले घोड़े को बाँधों । काली घोड़ी को बाँधों । अग्नि को बाँधों । बिजली को बाँधों । लगे-लगाए को बाँधों । भेजे-भेजाए को बाँधो । हाकिन-डाकिन को बाँधों । सुलेमान-पीर पैगम्बर की होय दुहाई । फुरो मन्त्र, ईश्वर महा-देव का वाचा फुरे ।।”
विधि – पहले होली, दिवाली या ग्रहण के समय उक्त मन्त्र का १००० ‘जप’ करके सिद्ध कर ले । फिर तान्त्रिक बाधा से ग्रस्त -व्यक्ति को उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित गण्डा-धागा देने से लाभ होगा ।
47… टोना झारने के मन्त्र (१) “मन्त्रा-तन्त्रा की ऐसी – तैसी, पारबती के मन्त्रा वैसी । जिहाँ पठाऊँ, तिहाँ तैं जाय, फोर करेजा भीतर खाय । काली कमाख्या का नाम है, पार्वती का काम है । आ रे ! टोनही के टोना जादू पाँगन होखे तो फिर जाबे । मोर फूकें, मोर गुरू के फूकें । मोर गुरू कौन ? महा-देव पारबती के फूकें । जा माढ़ जा ।” विधि – नीम की टहनी या मोर-पङ्ख से सात बार उक्त मन्त्र पढ़कर झारने से नजर, टोना, डीठ आदि दूर हो जाते हैं ।

(२) “कट-कट-कट-कट काली करे । काट करेजा भीतर खाय, जिहाँ मैं भेजों, तिहाँ तैं जाय । काली दुर्गा का नाम है, पार्वती का काम हैं । टोनही के टोना-विद्या पाँगन होबे, तो माढ़ जाबे । मोर फूकें । मोर गुरू के फूँकें । गौरा महा- देव के फूँके । जा, फिर जा ।” विधि – उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित सरसों को पीड़ित व्यक्ति के ऊपर फेंकने से नजर, टोना आदि से मुक्ति मिल जाती है ।

 

(३) “ॐ नमो आदेश गुरू का । काया कलप कपाट, बज्र लङ्का उलट पलङ्का । पलट, दूर – दूर हट, टोना नजर । शब्द सांचा, फुरो मन्त्र – ईश्वरो वाचा । दुहाई गुरू गोरख- नाथ की ॐ ।” विधि – एक कपड़े का पलीता बनाकर अलसी के तेल में भिगोकर काँसे की थाली में पानी भरकर उसके ऊपर पलीते को जलाए । तेल थाली में टपकेगा । १२ बार मन्त्र पढ़कर फूंक मारे और थाली की थोड़ी-सी राख माथे पर लगा दे । टोने का प्रभाव दूर होगा ।

48… छत्तीसगढ के अनुभूत शाबर मन्त्र बैरी-नाशन मन्त्र विधि — एक निम्बू, (२) एक नारियल, (३) चुटकी भर सिन्दूर, (४) काले कपड़े का टुकड़ा, (५) बबूल के सात कांटे । अमा-वस्या के दिन उक्त मन्त्र का १०८ बार जप कर ११ बार गूगुल की धूप दें । फिर निम्बू पर शत्रु का नाम सिन्दूर से लिखकर, सात बार मन्त्र पढते हुए बबूल का एक-एक काँटा निम्बू में चुभोते जाएँ । काँटों से युक्त इस निम्बू को काले कपड़े में बाँध कर श्मशान में गाड़ दें । नारियल और सिन्दूर को काली-मन्दिर में अर्पित कर दे । शत्रु का नाश होगा ।

विशेषः- इस प्रकार के मन्त्र उग्र प्रकृति के होते है। स्व-रक्षा व गुरु निर्देशन के अभाव में प्रयुक्त करना हानिकारक है तथा सामाजिक व नैतिक दृष्टि से अनुचित भी। यहाँ पर मात्र प्राचीन विद्या के संरक्षण हेतु प्रस्तुत किये जा रहे हैं ।
49… भूतादि भगाने का अनुभूत मन्त्र “ॐ गुरु जी ! काला भैरू क्या करे ? मरा मसान सेवे । मरा मसान से के क्या करे ? लाग को – लपट को, काचे को – कलवे को । झाँप को – झपट को, भूत को – प्रेत को ! जिन्द को – डाकन को, ताल को – बेताल को । पेट की पीड़ा, माथे की मथवा- ३६ रोग को दफा करे श्रीनाथ जी का चकरु घेर घाले । हनूमान का पर्चा । छोड़ डङ्कनी पूत पराया । शब्द साँचा, पिण्ड काचा । चलो ईश्वर वाचा । चलो मन्त्र, ईश्वर वाचा ।”

विधि :- उक्त मन्त्र महात्मा लक्ष्मण गिरि का बताया हुआ है ।
50… श्रीहनुमत जंजीरा (१) “ॐ गुरु जी । हनुमान पेलवान । बारे बरस का जुवान, हाथ में गदा – मुख में पान । ज्याँ समरूँ, त्याँ आगेवान । लुवे की पेटी – वज्र का ताला, पापी पाखण्डी का मुँह काला । जती सति का बोल – बाला, हमेरा पण्ड की रक्षा करो श्रीबजरङ्गवाला । सबद साचा, पण्ड काचा । बजरङ्गवाला रखवाला ।”

(२) “ॐ गुरु जी । हनुमन्ता बलवन्ता, घाट कोट रहन्ता । मार- मार करन्ता, पाय पडन्ता । हनुमान जति, लख-पति । चार भोम की रखावाली करे । आगे अर्जुन, पाछे भीम । सोल वाघ, संपेसीम । अजर जरे । नजर जरे । पण्ड प्राण की रक्षा श्रीहनुमान करे । जिसके हाथ में हनुमान बसे । भैरव बसे लँलाट । पण्ड काचा, सबद साचा । बजरङ्ग- वाला रखवाला ।”

(३) “ॐ गुरु जी । नगारा की ठौर पड़े, राम की फौज में हनुमान चढ़े । तेल-तेल महा-तेल । राजा-प्रजा, माणस तेल । तेल की लेरकी- लपेट । यहां से छोडूँ हनुमान के बाण । सुता कु जगा लावे । बैठै कू बाँध लावे । पण्ड काचा, सबद साचा । चलो मन्त्र, ईश्वरी वाचा ।”

(४) “ॐ गुरु जी । हनुमन्ता वीर वङ्कडा । तुजे समरे होय वज्र- शरीरा । करु गुगल का धूप । देखूँ तेरा स्वरूप । आसने बेसी-समरु राजा-प्रजा वश कर देजे मोई । चालनारा की चाल बाँध । बोलनार के बोल बाँध । मडा बाँध । मसाण बाँध । एसे बाँध कर आव । सबद साचा । पण्ड काचा । चलो मन्त्र, ईश्वरी वाचा ।” विधि :- काल-रात्रि में उड़द के आटे से सवा पाव की बाटी का नैवेद्य, तेल और सिन्दूर हनुमान जी को चढ़ाए । चढ़ाए हुए तेल का दिया जलाकर १०८ बार उक्त किसी भी मन्त्र का जप करे । तब वह सिद्ध हो जाएगा ।

(५) “ॐ गुरु जी । हनुमन्ता बलवन्ता । जेने ताता तेल चडन्ता । वे नर आवे मार – मार करन्ता, ते नर पाय पड़न्ता । इन्हँ कहाँ, से आयो ? मेरु पर्वत से आयो । कोण लायो ? गौरी – पुत्र गणेश लायो । कोण के काज? वीर हनुमान के काज । हनुमान बङ्का मारे डङ्का । गुरु चोट डाकणी-साकणी । माथे हाँक वगाडे वीर हनुमन्ता । कागज- पत्ररोल-सोल-मोल । जती-सती की मदद मति । संज्ञा माथे फारगती । चल-चल कर जहाँ पड़े डेरी । पड़े जले थले नवकुल नाँग की आज्ञा फिरे । मेरा शबद फिरे, श्रीरामचन्द्र की आज्ञा फिरे । सबद साचा, पण्ड काचा । स्फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा ।”

(६) “इल-इल-महा-इल । बोलते की जीभ कील । चलते का पाँव कील । मारते का हाथ कील । देखते की नजर कील । मुए की कबर कील । भूत बाँध । पलीत बाँध । बाँधनेवाला हनुमान कहां से आया ? कली कोट से आया । सब हमारा विघ्न हरता आया । जैसा रामचन्द्र का काज सुधार्या, तेसा काज हमारा सुधारो । मेरा सबद फिरे, श्री रामचन्द्र की आज्ञा फिरे । सबद साचा, पण्ड काचा । स्फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा ।”

(७) “उत्तर खण्ड से जोगी आया । साथे हनुमान वीर लाया । अताल बाँधू । पाताल बाँधू । पर-मन बाँधू । चर-मन बाँधू । चोरा बाँधू । चौंटा बांधू । भूत बाँधू । पलीत बाँधू । डाकणी बाँधू । सांकणी बाँधू । दश मस्तकवाला रावण बाँधू । सबद साचा, पण्ड काचा । चला मन्त्र, ईश्वरी वाचा

।” विधि : शनिवार को हनुमान जी को तेल, सिन्दूर, उड़द के आटे की बाटी, गूगल की धूप अर्पित करे और हनुमान जी को चढ़ाए हुए तेल का दिया जला कर रात के १२ बजे से १०८ बार उक्त किसी मन्त्र को पढ़ने से वह मन्त्र सिद्ध हो जाता है ।
51… इत्र-मोहिनी मन्त्रः- “काला भैंरु, बावन वीर, पर-त्रिया से कर दे सीर । पर-त्रिया छ: अगन कँवारी, पर जोबन में लागे प्यारी । चम्पा के फुल जू आवे बास, घर का धणी की छोड़ दे आस । कपड़ा से बाद भरावे, अङ्ग से अङ्ग मिलावे । तीजी घड़ी-तीजी शाद । अङ्ग से अङ्ग न मिलावे, तो माता कङ्काली की सेज पे काला भैंरू पग धरे । शब्द सांचा-पिण्ड काचा । फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा ।”

विधि — उक्त मन्त्र उग्र प्रकृति का है । वशीकरण में तत्काल कार्य करता है । परोपकार व धर्म के मार्ग हेतु इसकी साधना साहसी व्यक्ति ही करे । कामान्ध व्यक्ति दुरुपयोग करने का साहस न करे, दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा । श्मशान में स्थित भैरव-मन्दिर में या श्मशान में चिता के पास बैठकर, रक्षा विधान रचकर, मध्य रावि से श्रेष्ठ मुहूर्त में साधना करे । ९ दिनों तक ३०० जप करे । पूजा-सामग्री : १ हिना इत्र की शीशी, जिसे नित्य अभिमन्त्रित किया जाएगा, २ चमेली की माला ३ पञ्च-मेवा, ४ बाटी, ५ लौंग जोड़ा, ६ बताशा, ७ शराब, ८ धूप, ९ कलेजी बकरे की । यह सामग्री भैरव देव के लिए नित्य नौ दिनों तक अर्पित की जाएगी । ‘हिना इत्र’ सिद्ध होने के बाद सत्य-मार्ग या कार्य के लिए थोड़ा- सा इत्र रुई में लगाकर साध्या स्त्री के शरीर पर कही भी सावधानी से लगा दे ।
52… स्थान बाँधने का मन्त्र मन्त्र :- “उतरे पाँव परन्ते जी, सुमिरन सुग्रीव लाभा होय । चौगुना सान्से परे न जीव, धरती करो बिछौना । तम्बू तनू आकाश, सूर्य – चन्द्रमा दीपक-सुख, सोमै हरी के दास । पाँच पुतरी के रखवार, भाग-भाग रे दुष्ट ! हनुमन्त बिराजे आय । जहाँ बजी हनु- मन्त की ताली, तहाँ नहीं दुष्टन पैठारी ।”

विधि– उक्त अनुभूत शाबर मन्त्र को मङ्गलवार को हनुमान जी की मूर्ति के सामने १००८ बार जप कर दशांश गुग्गुल से हवन कर सिद्ध कर ले । तदनन्तर इस मन्त्र से किसी भी स्थान में, अपने चतुर्दिक् रेखा १२ अंगुल आम की कलम से खीचकर बैठने से, सोने से किसी भी प्रकार का कोई भय नही रहता । जङ्गल या वन पर्वत में निर्भय शयन कर सकते हैं ।

विशेषः- इस प्रकार के मन्त्र उग्र प्रकृति के होते है। स्व-रक्षा व गुरु निर्देशन के अभाव में प्रयुक्त करना हानिकारक है तथा सामाजिक व नैतिक दृष्टि से अनुचित भी। यहाँ पर मात्र प्राचीन विद्या के संरक्षण हेतु प्रस्तुत किये ।

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