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१ : बटुक भैरव स्त्रोत्र : इस स्त्रोत्र के पाठ करने मात्र से महामारी राजभय अग्निभय चोरभय उत्पात दुह्स्वप्न के भय में घोर बंधन में इस बटुक भैरव का पाठ अति लाभदाई है | तथा हर प्रकार की सिद्धी हो जाती है | इस प्रयोग का कम से कम १०८ पाठ करना चाहिए |
२ : श्री सूक्त प्रयोग : श्री सूक्त प्रयोग एक ऐसा प्रयोग है जिससे लक्ष्मी जी प्रसन्न होकर घर में स्थिर रूप से निवास करती है | इसके ११०० आवृति [ पाठ ] कराने पर विशेष लाभ होता है |
३ : श्री कनकधारा स्तोत्र : यह स्तोत्र आद्य शंकराचार्य जी द्वारा रचित है जिसके पाठ से स्वर्ण वर्षा हुई थी | कनकधारा स्तोत्र के पाठ करवाने से घर ऑफिस व्यापार स्थल में उतरोत्तर वृद्धि होती रहती है कनकधारा में कमला प्रयोग से अत्यधिक लाभ प्राप्त होता है |
३ : श्री मद भागवत गीता : यह महाभारत के भीष्म पर्व से लिया गया है | इसमें भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को आत्मज्ञान दिया तथा कर्म में लगे रहने के विषय में बतलाया है | इस के पाठ करवाने से घर में शांति सुख व् समृद्धि आती है , तथा सभी दोष पाठ मात्र से नष्ट होते है यह अत्यंत लाभकारी है |
४ : श्री अखंड रामचरित मानस पाठ : यह तुलसीदास द्वारा रचित है | इस मानसमें सात कांड जिसका पारायण [पाठ] अनवरत है | इसलिए इसे अखंड पाठ कहते है | यह २० से २५ घंटे में पूर्ण होता है | मानस पाठ से घर मे काफी शांती तथा यश व कीर्ती बढती हे तथा मनुष्य सही नीती से चलता है |
५ : सुंदर कांड पाठ : सुंदर कांड पाठ तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस से लिया गया है इस पाठ से हनुमान जी को प्रसन्न किया जाता है विशेषतः शनी के प्रकोप को शांत करणे के लिये सुंदरकांड का पाठ लाभदायक होता है , वैसे कम से कम १०८ पाठ ब्राह्मण के द्वारा करवाया जाता है |
६ : हनुमान चालीसा : हनुमान चालीसा कलियुग मे मनुष्य के जीवन का आधार है इसका पाठ प्रायः प्रतिदिन किया जाता है | परंतु विशेष रूप से ४१ दिन मे प्रतिदिन १०० पाठ कराने से कोई भी महत्वपूर्ण कार्य के लिए किये गया सभी अनुष्ठान पूर्ण होता है |
७ : बजरंग बाण : बजरंग बाण के पाठ से मनुष्य स्वयं सुरक्षित रहता है | बजरंग बाण के पाठ से मनुष्य सुरक्षित राहता है इसका कम से कम ५२ पाठ करके हवन करने पर विशेष लाभ प्राप्त होता है |
८ : हरि किर्तन [ हरे राम हरे कृष्ण ] : प्रभू कि कृपा प्राप्ती तथा घर मे आनंद एवं सुख के लिये तथा सन्मार्ग प्राप्ती के लिये हरि किर्तन करवाया जाता है |
९ : श्री सुंदर कांड [ वाल्मिकी रामायण ] : वाल्मिकी रामायण के सुंदर कांड का पाठ करने से संतान बाधा दूर होती है तथा इसके प्रयोग से सारी कठिनाइय समाप्त हो जाती है | वाल्मिकी द्वारा रचित सुंदर कांड एक याज्ञिक प्रयोग है | इस पाठ का १०८ पाठ विशेषतः हवनात्मक रूप से लाभ दायक है |
१० : श्री ललिता सहस्त्र नामावली : ललिता सहस्त्र नाम अर्थात दुर्गा माताकि प्रतिमूर्ती है | इस सहस्त्र नाम के पाठ से अर्चन व अभिषेक तथा हवन करने से विशेषतः रोग बाधा दूर होता है |
११ : श्री शिव सहस्त्र नामावली : शिव सहस्त्र नामावली के कई प्रयोग है | इस प्रयोग से कई लाभ मिळते है | सहस्त्र नामावली के द्वारा अर्चन व अभिषेक तथा हवन प्रयोग से अपारशांती मिळती है |
१२ : श्री हनुमत सहस्त्र नामावली : श्री हनुमत सहस्त्र नामावली के प्रयोग से विशेषतः शनी शांती होती है |
१३ : श्री शनी सहस्त्र नामावली : शनी के प्रकोप या शनी कि साढे साती या अढ्या चाल रही हो तो शनी सहस्त्रनाम का प्रयोग किया जाता है |
१४ : श्री कात्यायनी देवी जप : जिस किसी भी कन्या के विवाह मे बाधा आ रही हो या विलंब हो रहा हो तो कात्यायनी देवी का ४१००० मंत्र का जप केले के पत्ते पर ब्राह्मण पान खाकर जप करता है , तो उस कन्या के विवाह मे आने वाली सभी बाधाये दूर हो जाती है | यह अनुष्ठान २१ दिन मे पूर्ण हो जाता है | यह प्रयोग अनुभव सिद्ध है |
१५ : श्री गोपाल सहस्त्र नाम : जब किसी भी दंपती को पुत्र या संतान कि प्राप्ती न हो रही हो तो ,वह सदाचार तथा धार्मिक पुत्र कि प्राप्ती के लिये गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ करावे |गोपाल मंत्र का सवा लाख जप पुत्र प्राप्ती मे अत्यंत लाभदायक है | यह प्रयोग अनुभूत है |
१६ : श्री हरिवंश पुराण : श्री हरिवंश पुराण कथा का श्रवण अत्यंत प्रभावी होता है | जिस किसी भी परिवार मे संतान न उत्पन्न हो रहा हो तो इस पुराण के पारायण [ पाठ ] से घर मे संतान उत्पत्ती होती है |यह अनुभूत है तथा , यह ७ दिन का कार्यक्रम होता है |
१७ : श्री शिव पुराण : श्री शिव पुराण मे शिव जी के महिमा का हि विशेष वर्णन है तथा उनके सभी अवतरो का वर्णन किया गया है | यह श्रावण मास या पुरुषोत्तम मास मे विशेष रूप से पाठ बैठाया जाता है |

2….सुन्दरकाण्ड के विषय में कुछ रोचक जानकारी,

सुन्दरकाण्ड का नित्यप्रति पाठ करना हर प्रकार से लाभ दायक होता है, इसके अनंत लाभ है, इस पाठ को हनुमान जी के सामने चमेली के तेल का दीपक लगा कर करने से अधिक फल प्राप्त होता है, सुन्दरकाण्ड एक ऐसा पाठ है जो की हर प्रकार की बाधा और परेशानियों को खतम कर देने में पूर्णतः समर्थ है. आजकल के व्यस्तता भरे दिनचर्या में बहुत अधिक समय तक पूजा कर पाना हमेशा संभव नहीं होता, ऐसे में इस पाठ को आप पूरा पढ़ सके तो बहुत अच्छा है पर नहीं पढ़ सकते या समय का आभाव है तो ऐसा करे के इसमें कुल ६० दोहे है, हर दिन १० दोहों का आप पाठ कर ले, ये आप मंगलवार से शुरू कर सकते है जो की रविवार तक खतम हो जायेगा, ऐसे आप बार बार कर सकते है पर इस चीज़ का विशेष ख्याल रखना बहुत जरुरी है के आप जब तक पाठ करे न तो मांस मदिरा का सेवन करे न ही अपने घर में मांस मदिरा लाये जब तक पाठ हो आपको ब्रह्मचर्य और सदाचार अपनाना होगा अन्यथा दोष के भागी बनेंगे..

आइये जाने ज्योतिष के अनुसार सुन्दरकाण्ड का पाठ किसके लिए विशेष फलदाई मन जाता है-
ज्योतिष के अनुसार भी सुन्दरकाण्ड एक अचूक उपाय है ज्योतिषो के द्वारा उपाय के तौर पर अक्सर बताया जाता है, उन लोगो के लिए ये विशेष फलदाई होता है जिनकी जन्म कुंडली में – मंगल नीच का है, पाप ग्रहों से पीड़ित है, पाप ग्रहों से युक्त है या उनकी दृष्टि से दूषित हो रहा है, मंगल में अगर बल बहुत कम हो, अगर जातक के शरीर में रक्त विकार हो, अगर आत्मविश्वास की बहुत कमी हो, अगर मंगल बहुत ही क्रूर हो तो भी ये पाठ आपको निश्चित रहत देगा. अगर लगन में राहू स्थित हो, लगन पर राहू या केतु की दृष्टि हो, लगन शनि या मंगल के दुष्प्रभावो से पीड़ित हो, मंगल अगर वक्री हो या गोचर में मंगल के भ्रमण से अगर कोई कष्ट आ रहे हो, शनि की सादे साती या ढैय्या से आप परेशान हो, इत्यादि….. इन सभी योगो में सुन्दरकाण्ड का पाठ अचूक फल दायक माना जाता है…
सुन्दरकाण्ड के पाठ से बहुत सारे लाभ होते है उनमे से कुछ हम यहाँ बता रहे है -

१) इसका पाठ करने से विद्यार्थियों को विशेष लाभ मिलता है, ये आत्मविश्वास में बढोतरी करता है और परीक्षा में अच्छे अंक लाने में मददगार होता है, बुद्धि कुशाग्र होती है, अगर बहुत छोटे बच्चे है तो उनके माता या पिता उनके लिए इसका पाठ करे.
२) इसका पाठ मन को शांति और सुकून देता है मानसिक परेशानियों और व्याधियो से ये छुटकारा दिलवाने में कारगर है,
३) जिन लोगो को गृह कलेश की समस्या है इस पाठ से उनको विशेष फल मिलते है,
४) अगर घर का मुखिया इसका पाठ घर में रोज करता है तो घर का वातावरण अच्छा रहता है,
५) घर में या अपने आप में कोई भी नकारात्मक शक्ति को दूर करने का ये अचूक उपाय है,
६) अगर आप सुनसान जगह पर रहते है और किसी अनहोनी का डर लगा रहता हो तो उस स्थान या घर पर इसका रोज पाठ करने से हर प्रकार की बाधा से मुक्ति मिलती है और आत्मबल बढ़ता है.
७) जिनको बुरे सपने आते हो रात को अनावश्यक डर लगता हो इसके पाठ निश्चित से आराम मिलेगा.
८) जो लोग क़र्ज़ से परेशान है उनको ये पाठ शांति भी देता है और क़र्ज़ मुक्ति में सहायक भी होता है,
९) जिस घर में बच्चे माँ पिता जी के संस्कार को भूल चुके हो, गलत संगत में लग गए हो और माँ पिता जी का अनादर करते हो वहा भी ये पाठ निश्चित लाभकारी होता है.
१०) किसी भी प्रकार का मानसिक या शारीरिक रोग भले क्यों न हो इसका पाठ लाभकारी होता है.
११) भूत प्रेत की व्याधि भी इस पाठ को करने से स्वतः ही दूर हो जाती है.
१२) नौकरी में प्रमोशन में भी ये पाठ विशेष फलदाई होता है.
१३) घर का कोई भी सदस्य घर से बाहर हो आपको उसकी कोई जानकारी मिल पा रही हो या न भी मिल पा रही हो तो भी आप अगर इसका पाठ करते है तो सम्बंधित व्यक्ति की निश्चित ही रक्षा होगी, और आपको चिंता से भी राहत मिलेगी.

और इसके अलावा ऐसे बहुत से लाभ है जो सुन्दरकाण्ड से मिलते है आप सभी इस पाठ का लाभ उठाये और अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव महसूस करे, जीवन सार्थक बनाये इस पाठ के मदद से हर दिन को नए उत्साह से जिए और परेशानियों से निजात पाए..

3….गणेश पुराण में लिखा गया है कि -
ध्यानद्यैरुपचारैर्मां तथा पञ्चामृतादिभि:।
स्नानवस्त्राद्यलंकारसुगन्धधूपदीपकै:।।
नैवेद्यै: फलताम्बूलैर्दक्षिणाभिश्चयोर्चयेत्।
भक्त्यैकचेतसा चैव तस्येष्टं पूरयाम्यहम्।
एवं प्रतिदिनं भक्त्या मद्भक्तो मां समर्चयेत्।।
इस श्लोक के मुताबिक भगवान गणेश ने कहा है कि जो इंसान नीचे बताए तरीके से मेरी पूजा करता है, उसकी हर मनोकामना सिद्ध हो जाती है -
- सबसे पहले गणेशजी का ध्यान, पञ्चामृत स्नान, शुद्ध जल स्नान, वस्त्र, आभूषण, इत्र, धूप, दीप नैवेद्य, फल, सुपारी और दक्षिणा अर्पित कर पूरी भक्ति भाव और एकाग्रता के साथ आरती और प्रार्थना करना चाहिए।
- इसी तरीके से रोज खासतौर पर चतुर्थी पर आस्था के साथ गणेश पूजा-अर्चना हर विघ्र दूर करती है और मनचाहा सौभाग्य पाने की इच्छा पूरी करती है।

4….भैरव जी का शक्ति शाली धन दायक शबर मंत्र प्रयोग इस मंत्र का जाप करने से आजीविका के नये मार्ग खुलने लगते है धन लाभ होता है।. ओम नमो आदेश गुरु को भैरव भैरव स्वर्ण भैरव द्रव्य आन आन नहीं आने तो माता पार्वती की आन पिता महादेव की आन मेरी आन मेरे गुरु की आन नहीं तो महाकाली की दुहाई
जिन व्यक्तियों को निरन्तर कर्ज घेरे रहते हैं, उन्हें प्रतिदिन “ऋणमोचक मंगल स्तोत्र´´ का पाठ करना चाहिये। यह पाठ शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से शुरू करना चाहिये। यदि प्रतिदिन किसी कारण न कर सकें, तो प्रत्येक मंगलवार को अवश्य करना चाहिये।
सर्वप्रथम 5 लाल गुलाब के पूर्ण खिले हुए फूल लें। इसके पश्चात् डेढ़ मीटर सफेद कपड़ा ले कर अपने सामने बिछा लें। इन पांचों गुलाब के फुलों को उसमें, गायत्री मंत्र 21 बार पढ़ते हुए बांध दें। अब स्वयं जा कर इन्हें जल में प्रवाहित कर दें। भगवान ने चाहा तो जल्दी ही कर्ज से मुक्ति प्राप्त होगी।
कर्ज-मुक्ति के लिये “गजेन्द्र-मोक्ष´´ स्तोत्र का प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व पाठ अमोघ उपाय है।
घर में स्थायी सुख-समृद्धि हेतु पीपल के वृक्ष की छाया में खड़े रह कर लोहे के बर्तन में जल, चीनी, घी तथा दूध मिला कर पीपल के वृक्ष की जड़ में डालने से घर में लम्बे समय तक सुख-समृद्धि रहती है और लक्ष्मी का वास होता है।
अगर निरन्तर कर्ज में फँसते जा रहे हों, तो श्मशान के कुएं का जल लाकर किसी पीपल के वृक्ष पर चढ़ाना चाहिए। यह 6 शनिवार किया जाए, तो आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त होते हैं।

5….महागणपति–आराधना
शास्त्रकारों की आज्ञा के अनुसार गृहस्थ–मानव को प्रतिदिन यथा सम्भव पंचदेवों की उपासना करनी ही चाहिए। ये पंचदेव पंचभूतों के अधिपति हैैं। इन्हीं में महागणपति की उपासना का भी विधान हुआ है। गणपति को विध्नों का निवारक एवं ऋद्धि–सिद्धि का दाता माना गया है। ऊँकार और गणपति परस्पर अभिन्न हैं अत: परब्रह्यस्वरुप भी कहे गये हैं। पुण्यनगरी अवन्तिका में गणपति उपासना भी अनेक रुपों में होती आई है। शिव–पंचायतन में 1. शिव, 2. पार्वती, 3. गणपति, 4. कातकेय और 5. नन्दी की पूजा–उपासना होती है और अनादिकाल से सर्वपूज्य, विघ्ननिवारक के रुप में भी गणपतिपूजा का महत्वपूर्ण स्थान है। गणपति के अनन्तनाम है। तन्त्रग्रन्थों में गणपति के आम्नायानुसारी नाम, स्वरुप, ध्यान एवं मन्त्र भी पृथक–पृथक दशत हैं। पौराणिक क्रम में षड्विनायकों की पूजा को भी महत्वपूर्ण दिखलाया है। उज्जयिनी में षड्विनायक–गणेष के स्थान निम्नलिखित रुप में प्राप्त होते है–
1. मोदी विनायक – महाकालमन्दिरस्थ कोटितीर्थ पर इमली के नीचे।
2. प्रमोदी ;लड्डूद्ध विनायक – विराट् हनुमान् के पास रामघाट पर।
3. सुमुख–विनायक ;स्थिर–विनायकद्ध– स्थिरविनायक अथवा स्थान–विनायक गढकालिका के पास।
4. दुमु‍र्ख–विनायक – अंकपात की सडक के पीछे, मंगलनाथ मार्ग पर।
5. अविघ्न–विनायक – खिरकी पाण्डे के अखाडे के सामने।
6. विघ्न–विनायक – विध्नहर्ता ;चिन्तामण–गणेशद्ध ।
इनके अतिरिक्त इच्छामन गणेश(गधा पुलिया के पास) भी अतिप्रसिद्ध है। यहाँ गणपति–तीर्थ भी है जिसकी स्थापना लक्ष्मणजी द्वारा की गई है ऐसा वर्णन प्राप्त होता है।
तान्त्रिक द्ष्टि से साधना–क्रम से साधना करते हैं वे गणपति–मन्त्र की साधना गौणरुप से करते हुए स्वाभीष्ट देव की साधना करते है। परन्तु जो स्वतन्त्र–रुप से परब्र–रुप से अथवा तान्त्रिक–क्रमोक्त–पद्धित से उपासना करते हैं वेश्गणेश–पंचांग में दशत पटल, पद्धित आदि का अनुसरण करते है। मूत–विग्रह–रचना वामसुण्ड, दक्षिण सुण्ड, अग्रसुण्ड और एकाधिक सुण्ड एवं भुजा तथा उनमें धारण किये हुए आयुधों अथवा उपकरणों से गणपति के विविध रुपों की साधना में यन्त्र आदि परिवतत हो जाते हैं। इसी प्रकार कामनाओं के अनुसार भी नामादि का परिवर्तन होता हैं। ऋद्धि–सिद्धि (शक्तियाँ), लक्ष–लाभ(पुत्र) तथा मूशक(वाहन) के साथ समष्टि–साधना का भी तान्त्रिक विधान स्पृहणीय है।

6…कोई भी अनुष्ठान के पश्चात हवन करने का शास्त्रीय विधान है और हवन करने हेतु भी कुछ नियम बताये गए हैं जिसका अनुसरण करना अति – आवश्यक है , अन्यथा अनुष्ठान का दुष्परिणाम भी आपको झेलना पड़ सकता है । इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात है हवन के दिन ‘अग्नि के वास ‘ का पता करना ताकि हवन का शुभ फल आपको प्राप्त हो सके ।
जिस दिन आपको होम करना हो , उस दिन की तिथि और वार की संख्या को जोड़कर १ जमा करें फिर कुल जोड़ को ४ से भाग देवें
-यदि शेष शुन्य (०) अथवा ३ बचे , तो अग्नि का वास पृथ्वी पर होगा और इस दिन होम करना कल्याणकारक होता है ।
-यदि शेष २ बचे तो अग्नि का वास पाताल में होता है और इस दिन होम करने से धन का नुक्सान होता है ।
-यदि शेष १ बचे तो आकाश में अग्नि का वास होगा , इसमें होम करने से आयु का क्षय होता है ।
अतः यह आवश्यक है की होम में अग्नि के वास का पता करने के बाद ही हवन करें ।

7…..टोना टोटका तंत्र बाधा निवारण मंत्र- आज यह भी देखने को मिलता है कि कुछ दुष्ट लोग किसी टोना करने वाले से कोई प्रयोग करा देते है और लोग भयानक कष्ट भोगने लगते है।
दवा करने पर भी लाभ नहीं मिलता है,तब इस मंत्र को ११ माला से सिद्ध कर प्रयोग करे।लोग जादू टोना से प्रभावित होकर विक्षिप्त भी हो जाते है।किसी शुभ मूर्हूत मे ईस मंत्र का प्रयोग करें।एक दीपक जलाकर किशमिश का भोग लगा कर मंत्र सिद्ध करे,फिर प्रयोग करते समय ७बार मंत्र पढ़ फूंक मारकर उतारा कर दें।ऐसा ७बार कर देने पर सभी जादू टोना नष्ट हो जाता हैं।बाद मे एक सफेद भोजपत्र पर अष्टगंध की स्याही से अनार के कलम से मंत्र लिख ताँबा या चाँदी की ताबीज मे यंत्र भरकर काला धागा लगाकर स्त्री हो तो बांया पुरूष हो तो दांये बांह मे ७बार मंत्र पढ़ बाँध ले।
शाबर मंत्र- ॐ नमो आदेश गुरू को।ॐ अपर केश विकट भेष।खम्भ प्रति पहलाद राखे,पाताल राखे पाँव।देवी जड़घा राखे,कालिका मस्तक रखें।महादेव जी कोई या पिण्ड प्राण को छोड़े,छेड़े तो देवक्षणा भूत प्रेत डाकिनी,शाकिनी गण्ड ताप तिजारी जूड़ी एक पहरूँ साँझ को सवाँरा को कीया को कराया को,उल्टा वाहि के पिण्ड पर पड़े।इस पिण्ड की रक्षा श्री नृसिंह जी करे।शब्द साँचा,पिण्ड काचा।फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा।

8….घर में कलह के निवारण हेतु साधना:—–
घर में होने वाली रोज की कलह और तू तू मैं मैं को दूर करने के लिए इस होली पर ये सरल साधना करे और दुसरो को बता कर उनका बी कल्याण करे। आप सब सुखी हो मैं इसी मैं खुस हु।
|| मंत्र ||
काला कलुआ काली रात, मैं बंगारा आधी रात
आवे ता आवे नहीं ता वीर वैताल की लत खाके गिर जावें,
कलुआ रे तु कैसा वीर, सुती को जगा, बैठे को उठा,
चले मंत्र फुररे बादशा
देखां कलुआ वीर तेरे ईल्म का तमाशा
|| विधि ||
होली की रात इस मंत्र का 2500 बार जाप करे ! एक तेल का दीपक जलता रहे और 5 लड्डू रखे ! मंत्र जप समाप्त होने के बाद पांचो लड्डू उजाड में रख आयें !
|| प्रयोग विधि ||
इस मंत्र से 2500 बार जप करके चीनी को अभिमंत्रित कर ले ! उस चीनी को अपने घर की चीनी में मिला दे और 5 लड्डू उजाड में रख आयें !

9….“काली घाटे काली माँ, पतित-पावनी काली माँ, जवा फूले-स्थुरी जले।
सई जवा फूल में सीआ बेड़ाए। देवीर अनुर्बले। एहि होत करिवजा होइबे।
ताही काली धर्मेर बले ।काहार आज्ञे राठे। कालिका चण्डीर आसे।”
विधिः- उक्त मन्त्र भगवती कालिका का बँगला भाषा में शाबर मन्त्र है। इस मन्त्र को तीन बार ‘जप’ कर दाएँ हाथ पर फूँक मारे और अभीष्ट कार्य को करे। कार्य में निश्चित सफलता प्राप्त होगी। गलत कार्यों में इसका प्रयोग न करें।

10….किसी भी बुधवार या शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथी से आरम्भ करेँ। विघ्नहर्ता गणेश जी की प्रतिमा या चित्र सामने रख करं। संकल्प कर प्रति दिन या प्रति बुधवार को श्री संकटनाशक गणेश स्त्रोत के 12 पाठ करेँ गणेश जी को मोदक भोग लगावें। दूर्वा चढावेँ। दीप धूप आदि देँ
“श्री संकटनाशक गणेशस्त्रोतम्”
प्रणम्य शिरसा देवं गौरी पुत्र विनायकम्।
भक्तावासं स्मरेनित्यमायुः कामार्थ सिद्धये।
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्त द्वितीयकम।
तृतीयं कृष्णपिग्ङक्षं गजवक्त्रम् चतुर्थकम्।
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकट मेव च।
सप्तमं विघ्नराजं च धुम्रवर्ण तथाष्टकम्।
नवमं भारचन्द्रं च दशमं तु विनायकभ।
एकादशं गणपति द्वादशं तु गजाननम्।
द्वादशेः तानि नामानि त्रिसन्ध्यं पठेन्नतरः।
न च विघ्न भयं तस्य सर्वसिद्ध करं प्रभो।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्न मोक्षार्थी लभते गतिम्।
जपेत् गणपति स्तोत्रं षडभिर्मासैः फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धं च लभते नात्र संशयः।
अष्टेभ्यो ब्रम्हणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत!
तस्य विद्या भवेत सर्वा गणेशस्य प्रसादतः।
साधक पूर्ण निष्ठा से करेँ तो निश्चित लाभ होता है..

11…शास्त्रों में मुश्किल व बड़े से बड़ा काम आसान बनाने वाला बताया गया गणेश भक्ति का छोटा सा उपाय है- श्रीगणेश के 12 विशेष नामों का स्मरण कर दिन की शुरुआत करना। माना जाता है कि ऐसा करने से रुके काम भी जल्द पूरे हो जाते हैं-
गणपतिर्विघ्रराजो लम्बतुण्डो गजानन:।
द्वेमातुरश्च हेरम्ब एकदन्ती गणाधिप:।।
विनायकश्चारुकर्ण: पशुपालो भवात्मज:।
द्वाद्वशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय य: पठेत्।।
सरल अर्थ है कि गणपति, विघ्रराज, लम्बतुण्ड, गजानन, द्वैमातुर, हेरम्ब, एकदन्त, गणाधिपति, विनायक, चारुकर्ण, पशुपालक व भवात्मज इन 12 नामों को सुबह उठकर बोलने या स्मरण करने पर मनचाही कामना पूरी हो जाती है।

12…..क्या आपको अपने कार्यक्षेत्र में अनावश्यक दबाव या गलत काम कराने का दबाव पड़ता यदि हां तो आप निम्न तांत्रिक प्रयोग करे ,,आप दबाव तनाव से मुक्त होगे ,आपको भ्रष्ट बनाने ,,आपसे गलत कराने का दबाव कम होगा आप सोमवार को दो फूलदार लौंग और थोडा सा कपूर ले ,पहले अपने ईष्ट की विधिवत पूजा करले ,फिर उस कपूर और
लौंग को १०८ बार गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करे ,,अब कपूर लोग को जला दे ,अपनी दृष्टि लगातार उस पर बनाए रखे और गायत्री मंत्र का पाठ करते रहे ,,जब लौंग-कपूर पूरी तरह जल जाए तब ,उससे बनी भष्म या राख को इकठ्ठा कर ले ,,आप इसे तीन बार [सुबह,शाम और कार्यक्षेत्र में प्रवेश पर ]अपनी जिह्वा [[जीभ]] पर थोडा सा लगाए ,,आप के कार्यक्षेत्र में आप पर दबाव ७ दिनों में कम हो जाएगा..

13….जो भी कोई सज्जन नोकरी या धन की चाह रखता हो तो मित्रो एक शक्तिशाली मन्त्र दे रहा हु इसके प्रभाव से जीवन में कभी भी धन का आभाव नहीं होगा। हर रोज सुबह और शाम 20 मिनट इस मन्त्र का जाप करें ।
ॐ कंकाली महाकाली केलिकलाभ्याम स्वाहा ।
बस कभी कभी कलि मंदिर में नारियल की भेंट चढाते रहे और चमत्कार देखें । नवरात्री के पवन पर्व से आरम्भ करें तो जयादा शुभ होगा ये साधना विशेष है इसके प्रभाव से आपको कभी भी धन की कमी महशुश नहीं होगी जाप के समय सरसों के तेल का दीपक लगावें व् 5 बताशे भी रखे । प्राण प्रतिष्ठित काली यंत्र भी धारण करे ।
14…हनुमान वशीकरण मन्त्र

“ॐ राई वर राई पचरसी। बारह सरसू तेरह राई। नब्बे दिन मंगलवार को ऐसी भाऊ, पराई स्त्री (साध्या का नाम) को भूल जाए घर-बार। घर छोड़, घर की डौरी छोड़। छोड़ माँ-बाप और छोड़ घर का साथ, हो जा मेरे साथ। दुहाई तुझे हलाहल हनुमान की। मेरा काम जल्दी कर, नी करे तो माँ अञ्जनी के सेज पर पाँव धरे। तेरी माता का चीर फाणीने लँगोट करे। फुरो मन्त्र, ईश्वरो वाचा।”

विधि- उक्त मन्त्र को पहले ‘नवरात्र’ या ‘ग्रहण’ में सिद्ध करे। ‘नवरात्र’ में मंगल और शनिवार को हनुमान जी को चोला चढ़ाए और प्रतिदिन हनुमान जी की मूर्ति के समक्ष १०८ बार जप करे। जप के समय अपने पास ‘राई’ और ‘सरसों’ रखे। मन्त्र पढ़कर इन्हें अभिमन्त्रित करे। बाद में आवश्यकतानुसार ‘प्रयोग’ करे। प्रयोग के समय चतुराई से तेरह राई ‘साध्या’ की डेहरी पर डाले और बारह सरसों उसके घर पर फेंके।
15…धन लाभ के लिये हनुमान जी का शक्तिशाली मन्त्र प्रयोग

आज मैं उन मित्रों के लिये मंत्र लिख रहा हु जिनको लगता है की दुकान का काम बांध दिया गया है
या किसी ने कोई टुना टोटका कर दिया है . दुकान से आमदानी कम हो रही है या ग्राहक नहीं आते
तो प्यारे इस दिव्य मंत्र का प्रयोग आपके लिये सफलता दाई होगा ये मेरा विश्वास है
क्योंकि इस मंत्र को खुद मैने अनेक बार प्रयोग किया है यदि हो सके तो सामने
हनुमंत शक्ति यन्त्र लकडी की चोकी पर रख लेवे

मन्त्र
औम नमो हनुमंत वीर ,रखो हद थिर ,
करो यह काम वैपार बढे
तन्तर दूर हो टुना टूटे ग्राहक बढे ,
काराज सिद्ध होये न होये तो माता अंजनी की आन …!

विधि – एक मीटर सूती कपडा लेवे उसमे काले तिल रखे और उस पर घी का दीपक जला के रख देवे दीपक के सामने 7 लॉन्ग 7 इलाची
7 सुपारी रख ले अब इस मन्त्र का जाप करे जितना हो सके .
अगले दिन तिल तो बाहर फेंक देवे और बाकी सामन को तिजोरी मे रख लेवे
ये प्रयोग रात को करे दुकान वैपार मे लाभ होगा
फिर हर रोज इस मन्त्र का जाप अपनी दुकान मे 5 मिनट हर रोज करते रहे।
तो सब विघन बाधाओं का नाश हो कर धन लाभ होगा
प्रत्येक मंगलवार को हनुमान जी को इस मंत्र का जाप करते हुए 2 लद्दू 1 मिठापान चढाते रहें तो हनुमान जी की कृपा सदा बनी रहेगी
16……दर्शन हेतु श्री काली मन्त्र

“डण्ड भुज-डण्ड, प्रचण्ड नो खण्ड। प्रगट देवि, तुहि झुण्डन के झुण्ड।
खगर दिखा खप्पर लियां, खड़ी कालका। तागड़दे मस्तङ्ग, तिलक मागरदे मस्तङ्ग।
चोला जरी का, फागड़ दीफू, गले फुल-माल, जय जय जयन्त।
जय आदि-शक्ति। जय कालका खपर-धनी।
जय मचकुट छन्दनी देव।जय-जय महिरा, जय मरदिनी।
जय-जय चुण्ड-मुण्ड भण्डासुर-खण्डनी, जय रक्त-बीज बिडाल-बिहण्डनी।
जय निशुम्भ को दलनी, जय शिव राजेश्वरी। अमृत-यज्ञ धागी-धृट, दृवड़ दृवड़नी।
बड़ रवि डर-डरनी ॐ ॐ ॐ।।”

विधि- नवरात्रों में प्रतिपदा से नवमी तक घृत का दीपक प्रज्वलित रखते हुए
अगर-बत्ती जलाकर प्रातः-सायं उक्त मन्त्र का ४०-४० जप करे।
17…श्री भैरव मन्त्र
ॐ नमो भैंरुनाथ, काली का पुत्र! हाजिर होके, तुम मेरा कारज करो तुरत।
कमर बिराज मस्तङ्गा लँगोट, घूँघर-माल। हाथ बिराज डमरु खप्पर त्रिशूल।
मस्तक बिराज तिलक सिन्दूर। शीश बिराज जटा-जूट, गल बिराज नोद जनेऊ।
ॐ नमो भैंरुनाथ, काली का पुत्र ! हाजिर होके तुम मेरा कारज करो तुरत।
नित उठ करो आदेश-आदेश।”

विधिः पञ्चोपचार से पूजन। रविवार से शुरु करके २१ दिन तक मृत्तिका की मणियों की माला से नित्य अट्ठाइस (२८) जप करे। भोग में गुड़ व तेल का शीरा तथा उड़द का दही-बड़ा चढ़ाए
और पूजा-जप के बाद उसे काले श्वान को खिलाए।
यह प्रयोग किसी अटके हुए कार्य में सफलता प्राप्ति हेतु है।

18…कई बार एसा होता है की किसी को प्रेत या कोई अन्य ओपरा हो जाने प्र व्यक्ति गुम हो जाता है या फिर बोलना बंद कर देता है यदि कभी किसी के साथ एसा हो तो ईलाज करने मे बड़ी मुश्किल हो ज़ाती है इसलिये मै यंहा प्रेत बुलवाने का मन्त्र दे रहा हु .इस मन्त्र के प्रभाव से कोई भी ओपरा हो अपना सही सही परिचय देगा।

मन्त्र
ओ३म् नमो हनुमंत वीर वज्र धरी डाकिनी शाकिनी घेरी मारी
गंगा जमुना हमारा बाण बोले बक रे नहीं तो राजा रामचन्द्र लक्ष्‍मण कुमार
जती हनुमंत गुरु गोरख की आन शब्द साँचा पिण्ड काचा फुरो मन्त्र ईश्वरी वाचा ।

विधि
सबसे पहले इस मन्त्र को सिद्ध कर लेवे मंगलवार से शुरू करके अगले मंगल वार तक एक माला का हर रोज शाम को हनुमान मंदिर मे जाप करें व हनुमान जी को हर रोज थोड़ा मीठे का भोग लगते रहे तो मन्त्र सिद्ध हो जायेगा।
इत्र एवम् चमेली के फूल को इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करके सूंघने को दें और मन्त्र जाप करते रहें तो कुछ हि देर मे किया कराया या प्रेत आदि ज़ो भी होगा अपना सही परिचय देगा इस मन्त्र से अभिमन्त्रित जल पिलाने से भी प्रेत बोलने लगेगा . फिर आपको ईलाज करने मे सुविधा होगी। करके देखिये परिणाम आश्चर्य चकित कर देगा..

19….अभिचार कर्म को वापिस भेजने का मंत्र
जब कभी आपको लगे कि किसी ने कुछ कर दिया है तो इन मंत्रों का प्रयोग करने से शत्रु द्वारा किया प्रयोग उस पर वापिस लोट जाता है उल्टे ही उसकी हानि होती है . और आपको किये गये किसी भी टोने टोटके से निजात मिल जाती है
सर्व प्रथम आप इन दोनो मंत्रो का जितना भी हो सके 7 दिन तक लगा तर किसी एकांत स्थान मे बैठ कर जाप करे
व मां काली का ध्यान करते जाएं और फिर पर योग के लिये तैयार हो जाये मंत्र के द्वारा 100 आहुति से हवन करे तो कैसा भी किया कराया हो नष्ट हो जायेगा .
मन्त्र
1 चण्डी चण्डी महा च़ण्ड़ी आवत मूठ करे नव खण्डी .
अष्टा दश भुजा धारी हाकिनी डाकिनी घेरी मारी जादू टोना टोटका मोहे न सतावे ,
जंहा से आया वंही को जाये जिसने भेजा उसको खाये
चले मन्त्र फुरे वाचा देखूँ मई चण्डिके तेरे इल्म का तमाशा
2 काल कलवा चोंसठ वीर मेरा कलवा मंघा तीर चलत बाण मारू उलट बाण मारू जांहा को भेजूं तन्हा को जाये मांस मछी को छुओ न जाये जिसने भेजा उसको खाये हम को फिर ना सूरत दिखाये दुशमन के हाथ को नाक को कान को सिर को पीठ को कमर को जितना जोखिम पहुंचा सको उतना पहुचाओ नहीं तो माँ का चूसा दूध हराम कहावे मेरी भक्ति गुरू कि शक्ति चले मन्त्र ईशवरो वाचा
हवन मे सामान्य हवन सामग्री व भोग का ही प्रयोग करें अधिक करने कि इछा हो तो मदिरा से भी हवन कर सकते है ..
20….ओम नमो वीर बजरंगी राम लक्ष्मण के संगी
जंहा जंहा जाये फ़तह के डंके बजाये
दुहाई माता अंजनी की आन !
यदि आपकी श्री हनुमान जी के चरणो मे अखंड श्रधा है ये मंत्र आपके लिये ब्रह्मास्त्र के समान सिद्ध होगा
इसका प्रयोग तब करे जब भी आप किसी विशेष काम के लिये कंही बाहर जा रहे हों ओर मन मे काम ना बनाने की आशंका हो
तो इस मंत्र का 108 बार जाप हनुमान जी की मूर्ति के सामने करें गुड चने का भोग लगावें फिर यात्रा पर निकलें
तो आपको हर काम मे सफलता जरूर मिलेगी .कुछ दिन इस मंत्र का जाप हर रोज करने से मंत्र सिद्ध हो जायेगा
साथ मे आप शाबर मंत्र शक्ति यंत्र भी धारण कर सकते है।

21..धन प्राप्ति के कुछ अचूक टोटके
संसार में रहकर गृहस्थ जीवन की सफलता के लिए सुख-समृद्धि का होना निहायत ही जरूरी है। धन-समृद्धि को अर्जित करने के लिए प्रबल पुरुषार्थ यानि कि ईमानदारी पूर्वक कठोर परिश्रम तो आवश्यक है ही। किंतु साथ ही कुछ जांचे-परखे और कारगर उपायों जिन्हें टोने-टोटके के रूप में जाना जाता है को भी आजमाना चाहिये।
1. हर पूर्णिमा को सुबह पीपल के वृक्ष पर जल चढ़ाएं।2. तुलसी के पौधे पर गुरुवार को पानी में थोड़ा दूध डालकर चढ़ाएं।3. यदि आपको बरगद के पेड़ के नीचे कोई छोटा पौधा उगा हुआ नजर आ जाए तो उसे उखाड़कर अपने घर में लगा दें।4. गूलर की जड़ को कपड़े में बांधकर उसे ताबीज में डालकर बाजु पर बांधे।5. पीपल के वृक्ष की छाया में खड़े होकर लोहे के पात्र में पानी लेकर उसमें दूध मिलाकर उसे पीपल की जड़ में डालने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और घर में लक्ष्मी का स्थाई निवास होता है।6. धन समृद्धि की देवी लक्ष्मी को प्रति एकादशी के दिन नौ बत्तियों वाला शुद्ध घी का दीपक लगाएं।7. घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर तांबे के सिक्के को लाल रंग के नवीन वस्त्र में बांधने से घर में धन, समृद्धि का आगमन होता है।8. शनिवार के दिन कृष्ण वर्ण के पशुओं को रोटी खिलाएं।

22…कई बार एसा होता है की किसी को प्रेत या कोई अन्य ओपरा हो जाने प्र व्यक्ति गुम हो जाता है या फिर बोलना बंद कर देता है यदि कभी किसी के साथ एसा हो तो ईलाज करने मे बड़ी मुश्किल हो ज़ाती है इसलिये मै यंहा प्रेत बुलवाने का मन्त्र दे रहा हु .इस मन्त्र के प्रभाव से कोई भी ओपरा हो अपना सही सही परिचय देगा।
मन्त्र
ओ३म् नमो हनुमंत वीर वज्र धरी डाकिनी शाकिनी घेरी मारी
गंगा जमुना हमारा बाण बोले बक रे नहीं तो राजा रामचन्द्र लक्ष्‍मण कुमार
जती हनुमंत गुरु गोरख की आन शब्द साँचा पिण्ड काचा फुरो मन्त्र ईश्वरी वाचा ।
विधि
सबसे पहले इस मन्त्र को सिद्ध कर लेवे मंगलवार से शुरू करके अगले मंगल वार तक एक माला का हर रोज शाम को हनुमान मंदिर मे जाप करें व हनुमान जी को हर रोज थोड़ा मीठे का भोग लगते रहे तो मन्त्र सिद्ध हो जायेगा।
इत्र एवम् चमेली के फूल को इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करके सूंघने को दें और मन्त्र जाप करते रहें तो कुछ हि देर मे किया कराया या प्रेत आदि ज़ो भी होगा अपना सही परिचय देगा इस मन्त्र से अभिमन्त्रित जल पिलाने से भी प्रेत बोलने लगेगा . फिर आपको ईलाज करने मे सुविधा होगी। करके देखिये परिणाम आश्चर्य चकित कर देगा..

23…ऋण-मोचन महा-गणपति-स्तोत्र
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीऋण-मोचन महा-गणपति-स्तोत्र-मन्त्रस्य भगवान् शुक्राचार्य ऋषिः, ऋण-मोचन-गणपतिः देवता, मम-ऋण-मोचनार्थं जपे विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यासः- भगवान् शुक्राचार्य ऋषये नमः शिरसि, ऋण-मोचन-गणपति देवतायै नमः हृदि, मम-ऋण-मोचनार्थे जपे विनियोगाय नमः अञ्जलौ।
।।मूल-स्तोत्र।।
ॐ स्मरामि देव-देवेश ! वक्र-तुणडं महा-बलम्। षडक्षरं कृपा-सिन्धु, नमामि ऋण-मुक्तये।।१
महा-गणपतिं देवं, महा-सत्त्वं महा-बलम्। महा-विघ्न-हरं सौम्यं, नमामि ऋण-मुक्तये।।२
एकाक्षरं एक-दन्तं, एक-ब्रह्म सनातनम्। एकमेवाद्वितीयं च, नमामि ऋण-मुक्तये।।३
शुक्लाम्बरं शुक्ल-वर्णं, शुक्ल-गन्धानुलेपनम्। सर्व-शुक्ल-मयं देवं, नमामि ऋण-मुक्तये।।४
रक्ताम्बरं रक्त-वर्णं, रक्त-गन्धानुलेपनम्। रक्त-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये।।५
कृष्णाम्बरं कृष्ण-वर्णं, कृष्ण-गन्धानुलेपनम्। कृष्ण-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये।।६
पीताम्बरं पीत-वर्णं, पीत-गन्धानुलेपनम्। पीत-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये।।७
नीलाम्बरं नील-वर्णं, नील-गन्धानुलेपनम्। नील-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये।।८
धूम्राम्बरं धूम्र-वर्णं, धूम्र-गन्धानुलेपनम्। धूम्र-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये।।९
सर्वाम्बरं सर्व-वर्णं, सर्व-गन्धानुलेपनम्। सर्व-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये।।१०
भद्र-जातं च रुपं च, पाशांकुश-धरं शुभम्। सर्व-विघ्न-हरं देवं, नमामि ऋण-मुक्तये।।११
।।फल-श्रुति।।
यः पठेत् ऋण-हरं-स्तोत्रं, प्रातः-काले सुधी नरः। षण्मासाभ्यन्तरे चैव, ऋणच्छेदो भविष्यति।।१
जो व्यक्ति उक्त “ऋण-मोचन-स्तोत्र’ का नित्य प्रातः-काल पाठ करता है, उसका छः मास में ऋण-निवारण होता है।

24….ऋण-हरण श्री गणेश-मन्त्र प्रयोग
यह धन-दायी प्रयोग है। यदि प्रयोग नियमित करना हो तो साधक अपने द्वारा निर्धारित वस्त्र में कर सकता है किन्तु, यदि प्रयोग पर्व विशेष मात्र में करना हो, तो पीले रंग के आसन पर पीले वस्त्र धारण कर पीले रंग की माला या पीले सूत में बनी स्फटिक की माला से करे। भगवान् गणेश की पूजा में ‘दूर्वा-अंकुर’ चढ़ाए। यदि हवन करना हो, तो ‘लाक्षा’ एवं ‘दूर्वा’ से हवन करे। विनियोग, न्यास, ध्यान कर आवाहन और पूजन करे। ‘पूजन’ के पश्चात् ‘कवच’- पाठ कर ‘स्तोत्र’ का पाठ करे।
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीऋण-हरण-कर्तृ-गणपति-मन्त्रस्य सदा-शिव ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, श्रीऋण-हर्ता गणपति देवता, ग्लौं बीजं, गं शक्तिः, गों कीलकं, मम सकल-ऋण-नाशार्थे जपे विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यासः- सदा-शिव ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टुप छन्दसे नमः मुखे, श्रीऋण-हर्ता गणपति देवतायै नमः हृदि, ग्लौं बीजाय नमः गुह्ये, गं शक्तये नमः पादयो, गों कीलकाय नमः नाभौ, मम सकल-ऋण-नाशार्थे जपे विनियोगाय नमः अञ्जलौ।
कर-न्यासः- ॐ गणेश अंगुष्ठाभ्यां नमः, ऋण छिन्धि तर्जनीभ्यां नमः, वरेण्यं मध्यमाभ्यां नमः, हुं अनामिकाभ्यां नमः, नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः, फट् कर-तल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः।
षडंग-न्यासः- ॐ गणेश हृदयाय नमः, ऋण छिन्धि शिरसे स्वाहा, वरेण्यं शिखायै वषट्, हुं कवचाय हुम्, नमः नेत्र-त्रयाय वौषट्, फट् अस्त्राय फट्।
ध्यानः-
ॐ सिन्दूर-वर्णं द्वि-भुजं गणेशं, लम्बोदरं पद्म-दले निविष्टम्।
ब्रह्मादि-देवैः परि-सेव्यमानं, सिद्धैर्युतं तं प्रणमामि देवम्।।
‘आवाहन’ आदि कर पञ्चोपचारों से अथवा ‘मानसिक पूजन’ करे।
।।कवच-पाठ।।
ॐ आमोदश्च शिरः पातु, प्रमोदश्च शिखोपरि, सम्मोदो भ्रू-युगे पातु, भ्रू-मध्ये च गणाधीपः।
गण-क्रीडश्चक्षुर्युगं, नासायां गण-नायकः, जिह्वायां सुमुखः पातु, ग्रीवायां दुर्म्मुखः।।
विघ्नेशो हृदये पातु, बाहु-युग्मे सदा मम, विघ्न-कर्त्ता च उदरे, विघ्न-हर्त्ता च लिंगके।
गज-वक्त्रो कटि-देशे, एक-दन्तो नितम्बके, लम्बोदरः सदा पातु, गुह्य-देशे ममारुणः।।
व्याल-यज्ञोपवीती मां, पातु पाद-युगे सदा, जापकः सर्वदा पातु, जानु-जंघे गणाधिपः।
हरिद्राः सर्वदा पातु, सर्वांगे गण-नायकः।।
।।स्तोत्र-पाठ।।
सृष्ट्यादौ ब्रह्मणा सम्यक्, पूजितः फल-सिद्धये। सदैव पार्वती-पुत्रः, ऋण-नाशं करोतु मे।।१
त्रिपुरस्य वधात् पूर्वं-शम्भुना सम्यगर्चितः। हिरण्य-कश्यप्वादीनां, वधार्थे विष्णुनार्चितः।।२
महिषस्य वधे देव्या, गण-नाथः प्रपूजितः। तारकस्य वधात् पूर्वं, कुमारेण प्रपुजितः।।३
भास्करेण गणेशो हि, पूजितश्छवि-सिद्धये। शशिना कान्ति-वृद्धयर्थं, पूजितो गण-नायकः।
पालनाय च तपसां, विश्वामित्रेण पूजितः।।४
।।फल-श्रुति।।
इदं त्वृण-हर-स्तोत्रं, तीव्र-दारिद्र्य-नाशनम्, एक-वारं पठेन्नित्यं, वर्षमेकं समाहितः।
दारिद्र्यं दारुणं त्यक्त्वा, कुबेर-समतां व्रजेत्।।
मन्त्रः- “ॐ गणेश ! ऋणं छिन्धि वरेण्यं हुं नमः फट्” (१५ अक्षर)
उक्त मन्त्र का अन्त में कम-से-कम २१ बार ‘जप करे। २१,००० ‘जप’ से इसका ‘पुरश्चरण’ होता है। वर्ष भर ‘स्तोत्र’ पढ़ने से दारिद्र्य-नाश होता है तथा लक्ष्मी-प्राप्ति होती है।

25…श्री भैरव मन्त्र
“ॐ गुरुजी काला भैरुँ कपिला केश, काना मदरा, भगवाँ भेस।
मार-मार काली-पुत्र। बारह कोस की मार, भूताँ हात कलेजी खूँहा गेडिया।
जहाँ जाऊँ भैरुँ साथ। बारह कोस की रिद्धि ल्यावो। चौबीस कोस की सिद्धि ल्यावो।
सूती होय, तो जगाय ल्यावो। बैठा होय, तो उठाय ल्यावो।
अनन्त केसर की भारी ल्यावो। गौरा-पार्वती की विछिया ल्यावो।
गेल्याँ की रस्तान मोह, कुवे की पणिहारी मोह, बैठा बाणिया मोह, घर बैठी बणियानी मोह,
राजा की रजवाड़ मोह, महिला बैठी रानी मोह।
डाकिनी को, शाकिनी को, भूतनी को, पलीतनी को, ओपरी को, पराई को,
लाग कूँ, लपट कूँ, धूम कूँ, धक्का कूँ, पलीया कूँ, चौड़ कूँ, चौगट कूँ, काचा कूँ, कलवा कूँ,
भूत कूँ, पलीत कूँ, जिन कूँ, राक्षस कूँ,
बरियों से बरी कर दे। नजराँ जड़ दे ताला, इत्ता भैरव नहीं करे,
तो पिता महादेव की जटा तोड़ तागड़ी करे, माता पार्वती का चीर फाड़ लँगोट करे।
चल डाकिनी, शाकिनी, चौडूँ मैला बाकरा, देस्यूँ मद की धार, भरी सभा में द्यूँ आने में कहाँ लगाई बार ?
खप्पर में खाय, मसान में लौटे, ऐसे काला भैरुँ की कूण पूजा मेटे।
राजा मेटे राज से जाय, प्रजा मेटे दूध-पूत से जाय, जोगी मेटे ध्यान से जाय।
शब्द साँचा, ब्रह्म वाचा, चलो मन्त्र ईश्वरो वाचा।”
विधिः- उक्त मन्त्र का अनुष्ठान रविवार से प्रारम्भ करें। एक पत्थर का तीन कोनेवाला टुकड़ा लिकर उसे अपने सामने स्थापित करें। उसके ऊपर तेल और सिन्दूर का लेप करें। पान और नारियल भेंट में चढावें। वहाँ नित्य सरसों के तेल का दीपक जलावें। अच्छा होगा कि दीपक अखण्ड हो। मन्त्र को नित्य २१ बार ४१ दिन तक जपें। जप के बाद नित्य छार, छरीला, कपूर, केशर और लौंग की आहुति दें। भोग में बाकला, बाटी बाकला रखें (विकल्प में उड़द के पकोड़े, बेसन के लड्डू और गुड़-मिले दूध की बलि दें। मन्त्र में वर्णित सब कार्यों में यह मन्त्र काम करता है।

26…हनुमान वशीकरण मन्त्र
“ॐ राई वर राई पचरसी। बारह सरसू तेरह राई। नब्बे दिन मंगलवार को ऐसी भाऊ, पराई स्त्री (साध्या का नाम) को भूल जाए घर-बार। घर छोड़, घर की डौरी छोड़। छोड़ माँ-बाप और छोड़ घर का साथ, हो जा मेरे साथ। दुहाई तुझे हलाहल हनुमान की। मेरा काम जल्दी कर, नी करे तो माँ अञ्जनी के सेज पर पाँव धरे। तेरी माता का चीर फाणीने लँगोट करे। फुरो मन्त्र, ईश्वरो वाचा।”
विधि- उक्त मन्त्र को पहले ‘नवरात्र’ या ‘ग्रहण’ में सिद्ध करे। ‘नवरात्र’ में मंगल और शनिवार को हनुमान जी को चोला चढ़ाए और प्रतिदिन हनुमान जी की मूर्ति के समक्ष १०८ बार जप करे। जप के समय अपने पास ‘राई’ और ‘सरसों’ रखे। मन्त्र पढ़कर इन्हें अभिमन्त्रित करे। बाद में आवश्यकतानुसार ‘प्रयोग’ करे। प्रयोग के समय चतुराई से तेरह राई ‘साध्या’ की डेहरी पर डाले और बारह सरसों उसके घर पर फेंके।

27…श्री हनुमाष्टादशाक्षर मन्त्र-प्रयोग
मन्त्रः- “ॐ नमो हनुमते आवेशय आवेशय स्वाहा ।”
विधिः- सबसे पहले हनुमान जी की एक मूर्त्ति रक्त-चन्दन से बनवाए । किसी शुभ मुहूर्त्त में उस मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा कर उसे रक्त-वस्त्रों से सु-शोभित करे । फिर रात्रि में स्वयं रक्त-वस्त्र धारण कर, रक्त आसन पर पूर्व की तरफ मुँह करके बैठे । हनुमान जी उक्त मूर्त्ति का पञ्चोपचार से पूजन करे । किसी नवीन पात्र में गुड़ के चूरे का नैवेद्य लगाए और नैवेद्य को मूर्ति के सम्मुख रखा रहने दे । घृत का ‘दीपक’ जलाकर, रुद्राक्ष की माला से उक्त ‘मन्त्र’ का नित्य ११०० जप करे और जप के बाद स्वयं भोजन कर, ‘जप’-स्थान पर रक्त-वस्त्र के बिछावन पर सो जाए ।
अगली रात्रि में जब पुनः पूजन कर नैवेद्य लगाए, तब पहले दिन के नैवेद्य को दूसरे पात्र में रख लें । इस प्रकार ११ दिन करे ।
१२वें दिन एकत्र हुआ ‘नैवेद्य’ किसी दुर्बल ब्राह्मण को दे दें अथवा पृथ्वी में गाड़ दे । ऐसा करने से हनुमान जी रात्रि में स्वप्न में दर्शन देकर सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान कर सेते हैं । ‘प्रयोग’ को गुप्त-भाव से करना चाहिए ।

28….बन्दी-मोचन-मन्त्र-प्रयोग
विनियोगः- ॐ अस्य बन्दी-मोचन-स्तोत्र-मन्त्रस्य श्रीकण्व ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, श्रीबन्दी-देवी देवता, ह्रीं वीजं, हूं कीलकं, मम-बन्दी-मोचनार्थे जपे विनियोगः ।
ऋष्यादि-न्यासः- श्रीकण्व ऋषये नमः शिरसि, त्रिष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, श्रीबन्दी-देवी देवतायै नमः हृदि, ह्रीं वीजाय नमः गुह्ये, हूं कीलकाय नमः नाभौ, मम-बन्दी-मोचनार्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे । मन्त्रः-
“ॐ ह्रीं ह्रूं बन्दी-देव्यै नमः ।” (अष्टोत्तर-शतं जप – १०८)

बन्दी देव्यै नमस्कृत्य, वरदाभय-शोभिनीम् । तदाज्ञां शरणं गच्छत्, शीघ्रं मोचं ददातु मे ।।
त्वं कमल-पत्राक्षी, लौह-श्रृङ्खला-भञ्जिनीम् । प्रसादं कुरु मे देवि ! रजनी चैव, शीघ्रं मोचं ददातु मे ।।
त्वं बन्दी त्वं महा-माया, त्वं दुर्गा त्वं सरस्वती । त्वं देवी रजनी, शीघ्रं मोचं ददातु मे ।।
संसार-तारिणी बन्दी, सर्व-काम-प्रदायिनी । सर्व-लोकेश्वरी देवी, शीघ्रं मोचं ददातु मे ।।
त्वं ह्रीं त्वमीश्वरी देवि, ब्रह्माणी ब्रह्म-वादिनी । त्वं वै कल्प-क्षयं कत्रीं, शीघ्रं मोचं ददातु मे ।।
देवी धात्री धरित्री च, धर्म-शास्त्रार्थ-भाषिणी । दुःश्वासाम्ब-रागिनी देवि, शीघ्रं मोचं ददातु मे ।।
नमोऽस्तु ते महा-लक्ष्मी, रत्न-कुण्डल-भूषिता । शिवस्यार्धाङ्गिनी चैव, शीघ्रं मोचं ददातु मे ।।
नमस्कृत्य महा-दुर्गा, भयात्तु तारिणीं शिवां । महा-दुःख-हरां चैव, शीघ्रं मोचं ददातु मे ।।
।। फल-श्रुति ।।
इदं स्तोत्रं महा-पुण्यं, यः पठेन्नित्यमेव च ।
सर्व-बन्ध-विनिर्मुक्तो, मोक्षं च लभते क्षणात् ।।
हवन-विधिः- कमल-गट्टा, गाय का घी, शुद्ध शहद, मिश्री, हल्दी एवं लाल-चन्दन के चूर्ण को मिश्रित कर
उससे जप-संख्या का दशांश हवन करना चाहिए ।

29…श्री भैरव मन्त्र
ॐ नमो भैंरुनाथ, काली का पुत्र! हाजिर होके, तुम मेरा कारज करो तुरत।
कमर बिराज मस्तङ्गा लँगोट, घूँघर-माल। हाथ बिराज डमरु खप्पर त्रिशूल।
मस्तक बिराज तिलक सिन्दूर। शीश बिराज जटा-जूट, गल बिराज नोद जनेऊ।
ॐ नमो भैंरुनाथ, काली का पुत्र ! हाजिर होके तुम मेरा कारज करो तुरत।
नित उठ करो आदेश-आदेश।”

विधिः पञ्चोपचार से पूजन। रविवार से शुरु करके २१ दिन तक मृत्तिका की मणियों की माला से नित्य अट्ठाइस (२८) जप करे। भोग में गुड़ व तेल का शीरा तथा उड़द का दही-बड़ा चढ़ाए
और पूजा-जप के बाद उसे काले श्वान को खिलाए।
यह प्रयोग किसी अटके हुए कार्य में सफलता प्राप्ति हेतु है।

30….दर्शन हेतु श्री काली मन्त्र
“डण्ड भुज-डण्ड, प्रचण्ड नो खण्ड। प्रगट देवि, तुहि झुण्डन के झुण्ड।
खगर दिखा खप्पर लियां, खड़ी कालका। तागड़दे मस्तङ्ग, तिलक मागरदे मस्तङ्ग।
चोला जरी का, फागड़ दीफू, गले फुल-माल, जय जय जयन्त।
जय आदि-शक्ति। जय कालका खपर-धनी।
जय मचकुट छन्दनी देव।जय-जय महिरा, जय मरदिनी।
जय-जय चुण्ड-मुण्ड भण्डासुर-खण्डनी, जय रक्त-बीज बिडाल-बिहण्डनी।
जय निशुम्भ को दलनी, जय शिव राजेश्वरी। अमृत-यज्ञ धागी-धृट, दृवड़ दृवड़नी।
बड़ रवि डर-डरनी ॐ ॐ ॐ।।”

विधि- नवरात्रों में प्रतिपदा से नवमी तक घृत का दीपक प्रज्वलित रखते हुए
अगर-बत्ती जलाकर प्रातः-सायं उक्त मन्त्र का ४०-४० जप करे।
कम या ज्यादा न करे। जगदम्बा के दर्शन होते हैं।
31…“डण्ड भुज-डण्ड, प्रचण्ड नो खण्ड। प्रगट देवि, तुहि झुण्डन के झुण्ड।
खगर दिखा खप्पर लियां, खड़ी कालका। तागड़दे मस्तङ्ग, तिलक मागरदे मस्तङ्ग।
चोला जरी का, फागड़ दीफू, गले फुल-माल, जय जय जयन्त।
जय आदि-शक्ति। जय कालका खपर-धनी।
जय मचकुट छन्दनी देव। जय-जय महिरा, जय मरदिनी।
जय-जय चुण्ड-मुण्ड भण्डासुर-खण्डनी, जय रक्त-बीज बिडाल-बिहण्डनी।
जय निशुम्भ को दलनी, जय शिव राजेश्वरी। अमृत-यज्ञ धागी-धृट, दृवड़ दृवड़नी।
बड़ रवि डर-डरनी ॐ ॐ ॐ।।”

विधि- नवरात्रों में प्रतिपदा से नवमी तक घृत का दीपक प्रज्वलित
रखते हुए अगर-बत्ती जलाकर प्रातः-सायं उक्त मन्त्र का ४०-४० जप करे।…कम या ज्यादा न करे। जगदम्बा के दर्शन होते हैं।

32…अक्षय-धन-प्राप्ति मन्त्र
हे मां लक्ष्मी, शरण हम तुम्हारी।
पूरण करो अब माता कामना हमारी।।
धन की अधिष्ठात्री, जीवन-सुख-दात्री।
सुनो-सुनो अम्बे सत्-गुरु की पुकार।
शम्भु की पुकार, मां कामाक्षा की पुकार।।
तुम्हें विष्णु की आन, अब मत करो मान।
आशा लगाकर अम देते हैं दीप-दान।।

मन्त्र- “ॐ नमः विष्णु-प्रियायै, ॐ नमः कामाक्षायै। ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्रीं क्रीं क्रीं श्रीं श्रीं श्रीं फट् स्वाहा।”

विधि- ‘दीपावली’ की सन्ध्या को पाँच मिट्टी के दीपकों में गाय का घी डालकर रुई की बत्ती जलाए। ‘लक्ष्मी जी’ को दीप-दान करें और ‘मां कामाक्षा’ का ध्यान कर उक्त प्रार्थना करे। मन्त्र का १०८ बार जप करे। ‘दीपक’ सारी रात जलाए रखे और स्वयं भी जागता रहे। नींद आने लगे, तो मन्त्र का जप करे। प्रातःकाल दीपों के बुझ जाने के बाद उन्हें नए वस्त्र में बाँधकर ‘तिजोरी’ या ‘बक्से’ में रखे। इससे श्रीलक्ष्मीजी का उसमें वास हो जाएगा और धन-प्राप्ति होगी। प्रतिदिन सन्ध्या समय दीप जलाए और पाँच बार उक्त मन्त्र का जप करे।

33…“ॐ काली-काली महा-काली कण्टक-विनाशिनी रोम-रोम रक्षतु सर्वं मे रक्षन्तु हीं हीं छा चारक।।”

विधिः चेत्र या आश्विन-शुक्ल-प्रतिपदा से नवमी तक देवी का व्रत करे। उक्त मन्त्र का १०८ बार जप करे। जप के बाद इसी मन्त्र से १०८ आहुति से। घी, धूप, सरल काष्ठ, सावाँ, सरसों, सफेद-चन्दन का चूरा, तिल, सुपारी, कमल-गट्टा, जौ (यव), इलायची, बादाम, गरी, छुहारा, चिरौंजी, खाँड़ मिलाकर साकल्य बनाए। सम्पूर्ण हवन-सामग्री को नई हांड़ी में रखे। भूमि पर शयन करे। समस्त जप-पूजन-हवन रात्रि में ११ से २ बजे के बीच करे। देवी की कृपा-प्राप्ति होगी तथा रोजाना अपने दोनों की हथेली पर 8 बार मन्त्र बोलकर फूक मारे व हाथो को पूरे शरीर पर फेरे इससे उपरी बाधा – तांत्रिक अभिचार से रक्षा होती है !

34….दिग्बन्धन
मन्त्र से जल, सरसों या पीले चावलों को ( अपने चारों ओर ) छोड़ें -
मन्त्र – ॐ पूर्वे रक्षतु वाराहः आग्नेयां गरुड़ध्वजः ।
दक्षिणे पदमनाभस्तु नैऋत्यां मधुसूदनः ॥
पश्चिमे चैव गोविन्दो वायव्यां तु जनार्दनः ।
उत्तरे श्री पति रक्षे देशान्यां हि महेश्वरः ॥
ऊर्ध्व रक्षतु धातावो ह्यधोऽनन्तश्च रक्षतु ।
अनुक्तमपि यम् स्थानं रक्षतु ॥
अनुक्तमपियत् स्थानं रक्षत्वीशो ममाद्रिधृक् ।
अपसर्पन्तु ये भूताः ये भूताः भुवि संस्थिताः ॥
ये भूताः विघ्नकर्तारस्ते गच्छन्तु शिवाज्ञया ।
अपक्रमंतु भूतानि पिशाचाः सर्वतोदिशम् ।
सर्वेषाम् विरोधेन यज्ञकर्म समारम्भे ॥

35…शत्रु-विध्वंसिनी-स्तोत्र
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीशत्रु-विध्वंसिनी-स्तोत्र-मन्त्रस्य ज्वालत्-पावक ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, श्रीशत्रु-विध्वंसिनी देवता, मम शत्रु-पाद-मुख-बुद्धि-जिह्वा-कीलनार्थ, शत्रु-नाशार्थं, मम स्वामि-वश्यार्थे वा जपे पाठे च विनियोगः।

ऋष्यादि-न्यासः- शिरसि ज्वालत्-पावक-ऋषये नमः। मुखे अनुष्टुप छन्दसे नमः, हृदि श्रीशत्रु-विध्वंसिनी देवतायै नमः, सर्वाङ्गे मम शत्रु-पाद-मुख-बुद्धि-जिह्वा-कीलनार्थ, शत्रु-नाशार्थं, मम स्वामि-वश्यार्थे वा जपे पाठे च विनियोगाय नमः।।
कर-न्यासः- ॐ ह्रां क्लां अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ ह्रीं क्लीं तर्जनीभ्यां नमः। ॐ ह्रूं क्लूं मध्यमाभ्यां नमः। ॐ ह्रैं क्लैं अनामिकाभ्यां नमः। ॐ ह्रौं क्लौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ ह्रः क्लः करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयादि-न्यासः- ॐ ह्रां क्लां हृदयाय नमः। ॐ ह्रीं क्लीं शिरसे स्वाहा। ॐ ह्रूं क्लूं शिखायै वषट्। ॐ ह्रैं क्लैं कवचाय हुम्। ॐ ह्रौं क्लौं नेत्र-त्रयाय वौषट्। ॐ ह्रः क्लः अस्त्राय फट्।
ध्यानः-
रक्तागीं शव-वाहिनीं त्रि-शिरसीं रौद्रां महा-भैरवीम्,
धूम्राक्षीं भय-नाशिनीं घन-निभां नीलालकाऽलंकृताम्।
खड्ग-शूल-धरीं महा-भय-रिपुध्वंशीं कृशांगीं महा-
दीर्घागीं त्रि-जटीं महाऽनिल-निभां ध्यायेत् पिनाकीं शिवाम्।।
मन्त्रः- “ॐ ह्रीं क्लीं पुण्य-वती-महा-माये सर्व-दुष्ट-वैरि-कुलं निर्दलय क्रोध-मुखि, महा-भयास्मि, स्तम्भं कुरु विक्रौं स्वाहा।।

36….नवनाथ-शाबर-मन्त्र
“ॐ नमो आदेश गुरु की। ॐकारे आदि-नाथ, उदय-नाथ पार्वती। सत्य-नाथ ब्रह्मा। सन्तोष-नाथ विष्णुः, अचल अचम्भे-नाथ। गज-बेली गज-कन्थडि-नाथ, ज्ञान-पारखी चौरङ्गी-नाथ। माया-रुपी मच्छेन्द्र-नाथ, जति-गुरु है गोरख-नाथ। घट-घट पिण्डे व्यापी, नाथ सदा रहें सहाई। नवनाथ चौरासी सिद्धों की दुहाई। ॐ नमो आदेश गुरु की।।”
विधिः- पूर्णमासी से जप प्रारम्भ करे। जप के पूर्व चावल की नौ ढेरियाँ बनाकर उन पर ९ सुपारियाँ मौली बाँधकर नवनाथों के प्रतीक-रुप में रखकर उनका षोडशोपचार-पूजन करे। तब गुरु, गणेश और इष्ट का स्मरण कर आह्वान करे। फिर मन्त्र-जप करे। प्रतिदिन नियत समय और निश्चित संख्या में जप करे। ब्रह्मचर्य से रहे, अन्य के हाथों का भोजन या अन्य खाद्य-वस्तुएँ ग्रहण न करे। स्वपाकी रहे। इस साधना से नवनाथों की कृपा से साधक धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। उनकी कृपा से ऐहिक और पारलौकिक-सभी कार्य सिद्ध होते हैं।
विशेषः-’शाबर-पद्धति’ से इस मन्त्र को यदि ‘उज्जैन’ की ‘भर्तृहरि-गुफा’ में बैठकर ९ हजार या ९ लाख की संख्या में जप लें, तो परम-सिद्धि मिलती है और नौ-नाथ प्रत्यक्ष दर्शन देकर अभीष्ट वरदान देते हैं।

37…पूजन हेतु वैदिक निर्देश

सूर्य गणेश दुर्गा शिव विष्णु ये पंचदेव कहे गए है। अतः सभी कार्योँ मेँ की जानी चाहिए
कल्याण चाहने ग्रहस्थ एक मूर्ति पूजन न करेँ। कनेक मूर्ति पूजन कल्याण करी माना गया है
अपने घर में दो शिवलिंग तीन गणेश दो सूर्य तीन दुर्गा प्रतिमा व दो शालग्राम न रखे ये अशांती का कारण बनतेँ
शालग्राम की प्राण प्रतिष्ठा नही होती
गंगा जी शालग्राम शिला व शिवलिंग मे सर्वदेव पूजन बिना आव्हान किया जा सकता है।
तुलसी व बेलपत्र को स्नान नही तोडा जाता
कूशा के अग्रभाग से देवताओ पर जल न चढावेँ
विष्णु जी को चावल गणेश जी को तुलसी दुर्गा जी को दूर्वा सूर्यदेव को बेलपत्री न चढावे
वस्त्र पर रखा जल मे डुबोया पुष्प निरमाल्य हो जाता है अतः ये देवता पर न चठावेँ
दीपक को दीपक से न जलावे इससे रोग होता है
विष्णुजी को तुलसी गणेश जी को दूब सूर्य देव को आक का पुष्प लक्ष्मी जी को कमल का पुष्प शिव जी को धतूरा अतिप्रीय हैँ
पान की डंडी से व्याधी और अग्रभाग से कुबुद्दी होती है अतः इन्हे तोड कर ही चढावेँ..

38…हनुमान जंजीरा मंत्र
ॐ हनुमान पहलवान, बारह बरस का जवान, हाथ मेँ लड्डू मुख मे पान,खेल खेल गढ लंका के चौगान,अंजनी का पूत राम का दूत छीण मेँ कीलै नौ खण्ड का भूत, जाग जाग हणमान हुँकाला, ताती लोहा लंकाला,शीश जटा डग डेरुँ उमर गाजे,बज्र की कोठडी बज्र का ताला, आगे अर्जुन पीछे भीम.चोर नार चंपे ने सीँव, अजरा झरे भरया भरे,ईँ घट पिंड की रक्षा राजा रामचंद्र जी लक्ष्मण कुँवर हडमान करे।

इसे आप हनुमान जयंती से आरंभ करेँ। हनुमान जी के मंदिर जा कर लड्डू मीठा पान गुड चने नारियल कामिया सिंदूर लाल लंगोट एक ध्वजा भेँट करेँ।
21 दिन 1 माला जाप करे तो सिद्द हो जाता है।21 दिन पुनः ये भेँट पुनः चढावेँ
कुछ आलौकिक अनुभव होते हैँ नियमो का ध्यान रखे ये जँजीरा आप को भूत बाधा टोने रक्षाहेतु प्रयोग होता है..

39..सर्वत्र रक्षाकारका शक्तिशाली हनुमान मंत्र
ॐ नमो वज्र का कोठा जिसमे पिंड हमारा पेठा | इशवर कुंजी ब्रहम का ताला
मेरे आठो याम का यति हनुमंत रखवाला
इस मंत्र के पाठ करके सिद्द करलेने से सब और से रक्षा होती है.
मोर पंख से झाडा देने से नज़र और भुत प्रेत सम्ब्न्धिता दोष दूर हो जाते है

40…नव नाथ क्रिपा प्राप्ति मन्त्र …..

ओन्कार आदिनाथ उदयनाथ पार्वति
सत्य नाथ ब्रह्मा सन्तोश नाथ विशणु
अचल अचम्भे नाथ गजबेली गज कन्थडी नाथ
गयान पारखि चोरन्गि नाथ माया रुपि दादा मच्छन्दर नाथ
यति गुरु है गोरखनाथ घट घट पिण्डे व्यापि
नाथ सदा रहे साहाइ नव नाथ चोरासि सिदौ कि दुहाई……….।

यह मन्त्र नाथ सम्प्र्दय का सबसे शक्तिशलि व सम्मान्नीय मन्त्र है..
इस मन्त्र के प्रभाव से घर मे हर प्रकार कि सम्पन्नता बडती है
मन मे जो भी सोच कर आप इस मन्त्र का जाप करेन्गे वहि कार्य आपका पुर्ण
होगा ..

41….परिवार प्रेम बढ़ाने का मन्त्र

मन्त्रः-
“जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू ।

सो तेहि मिलइ न कछु सन्देहू ।।”

मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभः-
शुक्रवार वाले दिन से स्फटिक की माला पर १००० मन्त्र प्रतिदिन जपते हुए ५१ दिन पूर्ण करें । इसके पश्चात् यदि सम्भव हो, तो इस मन्त्र के १०८ जप नित्य प्रति करते रहें ।

इस प्रकार से कुटुम्ब में प्रेम बढ़ता है और स्पष्ट है कि पूरे परिवार में प्रेम व एकता होगी तो संसार का कोई भी कार्य सरलता से होता है ।……

42….श्री नवग्रह तांत्रिक मंत्र:
सभी प्रकार की पूजा में नवग्रहों की पूजा प्राय अच्छे साधक अपनी साधना श्री गणेश और नवग्रह पूजन व साधना से ही आरंभ करते हैं, फिर निश्चिंत होकर आगे चलते जाते हैं। नवग्रह साधना प्रायः दो सप्ताह में पूर्ण हो जाती है। शनि या राहु केतु से आरंभ करें। शनिवार के दिन से फिर रवि, सोम, मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र और वापस शनिवार को उक्त तीन उग्रग्रहों में से एक या दो की कर लें। पुनः शेष ग्रहों का जप दिनानुसार पूर्ण करता जाए। इससे समान रूप से सभी ग्रहों की समान रूप से शांति हो जाती है।
प्रत्येक ग्रह का सामान्य पंचोपचार पूजन कर इन्हीं मंत्रों का निश्चित संख्यानुसार जप कर लें। माला रूद्राक्ष की, बृहस्पति में चंदन, चंद्रमा में चंदन की, शेष में रूद्राक्ष है। प्रत्येक ग्रह का दिन के अनुसार आधा-आधा जप दो बार (दो सप्ताह) में पूर्ण कर लें। हर बार हवन करता जाए, तो इससे वर्ष भर की ग्रह शांति हो जाती है। अधिक समय तक भी इसका प्रभाव बना रह सकता है। ग्रहों के विषय में इतनी भी चिंता आवश्यक नहीं है, जितना भय दिखाया गया है।
बाजार से नवग्रहों का एक चित्र तथा नवग्रह पूजन की सामग्री ले आएं, जो कम से कम दो बार पूजन के काम आ सके। प्रथम सप्ताह आधी, फिर दूसरे सप्ताह आधी प्रयोग कर लें।

केतु साधना — शनिवार के दिन पहली पूजा केतु की करके जप कर लें। अगले शनिवार पुनः केतु साधना करके जप कर लें। कर सकें, तो दिन भर में सायंकाल तक एक ही दिन में पूर्ण करके हवन कर लें या दूसरे शनिवार के साथ हवन करें। तत्पश्चात प्रसाद बांट दें।
राहु — पूर्वोक्त मंत्र से शनिवार के दिन ही राहु की पूजा चित्र पर करके इसका भी पूर्वानुसार जप और हवन कर लें। जप से सारे दोष स्वयं मिट जाते हैं। अधिक प्रपंच में पड़ने से कठिनाई अधिक है। सरल विधान ही ठीक रहता है। तत्पश्चात प्रसाद बांट दें।
शनि — अगले शनिवार को शनिदेव के चित्र पर शनि पदार्थों से पूजा करके शनि का भी जप एक या दो शनिवार में पूर्ण कर हवन कर दें और प्रसाद बांट दें।
सूर्य — रविवार के दिन सूर्यदेव की पूजा करके उनका भी जप एक या दो रविवार में पूरा करके हवन करके प्रसाद बांट दें। पूजा लाल पदार्थों से करें, हवन में थोड़ी सूर्य पूजा सामग्री मिला लें। यही विधि सभी ग्रहों के हवन में करनी होगी।
चंद्र — सोमवार को चंद्रमा की पूजा जप हवन करके एक या दो सेमवार में वही जप पूर्ण करके बच्चों में प्रसाद बांट दें। गरीबों में दे दें।
मंगल — मंगलवार के दिन मंगल की पूजा हवन पूरा करके प्रसाद बांट दें।
बुध — बुधवार के दिन बुधमंत्र से पूजा कर बुध का हवन कर दें।
गुरु — बृहस्पतिवार को गुरु की पूजा जप हवन करके प्रसाद बांट दें,
शुक्र — शुक्रवार के दिन शुक्रमंत्र से शुक्र पूजा जप हवन कर प्रसाद बांट दें, हो गई नवग्रह साधना।
फल – स्वयं किया हुआ जप हवन दूसरे के द्वारा किए हुए से ६ गुना अधिक फल देता है।
साधना मंत्र —
साधना मंत्र संख्या ग्रह दिन
ॐ कें केतवे नमः १७,००० केतु शनि
ॐ शं शनैश्चराय नमः २३,००० शनि शनि
ॐ रां राहवे नमः १८,००० राहु शनि
ॐ ऐं घृणि सूर्याय नमः ७,००० सूर्य रवि
ॐ सों सोमाय नमः ११,००० सोम चंद्र
ॐ अं अंगारकाय नमः १०,००० मंगल मंगल
ॐ बुं बुधाय नमः ८,००० बुध बुध
ॐ बृं बृहस्पतये नमः ११,००० बृहस्पति गुरु
ॐ शुं शुक्राय नमः १६,००० शुक्र शुक्र…

43…तंत्र विज्ञान में हर समस्या का समाधान
व्यक्ति आम हो या खास, समस्या सबके पीछे रहती हैं। हम लोग छोटे-छोटे उपाय जानते हैं पर उनकी विधिवत जानकारी के अभाव में उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं। कोई इंसान अपनी किसी इच्छा की पूर्ति के लिए कोशिशें कर के हार जाता है तो फिर वह मंदिरों में जाकर मन्नतें मांगता है। इस तरह वह पैसों व समय दोनों का नुकसान उठाता है। फिर भी वह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि उसकी मनोकामना पूरी हो ही जाएगी। लेकिन तंत्र विज्ञान मे कुछ ऐसे टोटके हैं जिन्हे अपनाकर आप निश्चित ही अपनी सारी मनोकामनाओं को पूर्ण कर सकते हैं। इनकी जानकारी निम्न है-
* आँखों में यदि काला मोतिया हो जाए तो ताम्बे के पात्र में जल लेकर उसमें ताम्बे का सिक्का व गुड डालकर प्रतिदिन सूर्य को अर्ध्य दें। यह उपाय शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार से शुरू कर चौदह रविवार करें। अर्ध्य देते समय रोग से मुक्ति की प्रार्थना करते रहें। इसके अतिरिक्त पांच प्रकार के फल लाल कपडे में बांधकर किसी भी मन्दिर में दें। यह उपाय निष्ठापूर्वक करें, लाभ होगा।
* नौकरी न मिल रही हो तो मन्दिर में बारह फल चढ़ाएं। यह उपाय नियमित रूप से करें और इश्वर से नौकरी मिलने की प्रार्थना करें।
* विवाह योग्य वर या कन्या के शीघ्र विवाह के लिए घर के मन्दिर में नवग्रह यन्त्र स्थापित करें। जिनकी नई शादी हो, उन्हें घर बुलाएं, उनका सत्कार करें और लाल वस्त्र भेंट करें उन्हें भोजन या जलपान कराने के पश्चात सौंफ मिस्री जरूर दें। यह सब करते समय शीघ्र विवाह की कामना करें। यह उपाय शुक्ल पक्ष के मंगलवार को करें, लाभ होगा।
* व्यापार मंदा हो तथा पैसा टिकता न हो, तो नवग्रह यन्त्र और धन यन्त्र घर के मन्दिर में शुभ समय में स्थापित करें। इसके अतिरिक्त सोलह सोमवार तक पांच प्रकार की सब्जियां मन्दिर में दें और पंचमेवा की खीर भोलेनाथ को मन्दिर में अर्पित करें। सभी कामनाएं पूरी होंगी।
*बच्चे पढ़ते न हों तो उनकी स्टडी टेबल पर शुभ समय में सरस्वती यन्त्र व कुबेर यन्त्र स्थापित करें। उनके पढने के लिये बैठने से पहले यंत्रों के आगे शुभ घी का दीपक तथा गुलाब की अगरबत्ती जलाएं। पढ़ते समय उनका मुंह पूर्व की ओर होना चाहिय। यह उपाय करने के बच्चों का मन पढ़ाई में लगने लगेगा और पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद उन्हें मनोवांछित काम भी मिल जायेगा।
*समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति के लिये कबूतरों को चावल मिश्रित डालें, बाजरा शुक्रवार को खरीदें व शनिवार से डालना शुरू करें।
*शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार या बुधवार को चमकीले पीले वस्त्र में शुद्ध कस्तूरी लपेटकर अपने धन रखने के स्थान पर रखें, घर में सुख-समृद्धी आयेगी।
* यदि मार्ग में कोई सफाई कर्मचारी सफाई करता दिखाई दे तो उसे यह कहकर की चाय-पानी पी लेना या कुछ खा लेना, कुछ दान अवश्य दें, परिवार में प्यार व सुख-समृद्धी बढ़ेगी। यदि सफाई कर्मचारी महिला हो तो शुभ फल अधिक मिलेगा।
*किसी भी विशेष मनोरथ की पूर्ति के लिये शुक्ल पक्ष में जटावाला नारियल नए लाल सूती कपडे में बांधकर बहते जल में प्रवाहित करें। यह उपाय निष्ठापूर्वक करें।
* शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से नित्य प्रातः में अर्पित करें। फूल हनुमानजी को मन्दिर में अर्पित करें। फूल अर्पित करते समय हनुमान जी से मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करते रहें। ध्यान रहे यह उपाय करते समय कोई आपको टोके नहीं और टोके तो आप उसका उत्तर न दें।
* जन्म पत्रिका में 12वें भाव में मंगल हो और खर्च बहुत होता हो, तो बेलपत्र पर चन्दन से ‘भौमाय नमः’ लिखकर सोमवार को शिवलिंग पर चढ़ाएं, उक्त सारे कष्ट दूर हो जायेंगे।
* बड़ के पत्ते पर अपनी मनोकामना लिखकर जल में प्रवाहित करने से मनोरथ की पूर्ति होती है।
* नए सूती लाल कपड़े में जटावाला नारियल बांधकर बहते जल में प्रवाहित करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
* बहुधा देखा गया है कि प्राणी कहीं देर तक बैठा हो तो हाथ-पैर सुन्न हो जाते हैं। जो अंग सुन्न हो गया हो, उस पर उंगली से 27 का अंक लिख दीजिये, अंग ठीक हो जाएगा।
* काले तिल और जौ का आटा तेल में गूंथकर एक मोटी रोटी बनाएं और उसे अच्छी तरह सेंकें। गुड को तेल में मिश्रित करके जिस व्यक्ति की मरने की आशंका हो, उसके सिर पर से 7 बार उतार कर मंगलवार या शनिवार को भैंस को खिला दें।
* गुड के गुलगुले सवाएं लेकर 7 बार उतार कर मंगलवार या शनिवार व इतवार को चील-कौए को डाल दें, रोगी को तुरंत राहत मिलेगी।
* महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। द्रोव, शहद और तिल मिश्रित कर शिवजी को अर्पित करें। ‘ॐ नमः शिवाय’ षडाक्षर मंत्र का जप भी करें, लाभ होगा।
* श्रावण के महीने में 108 बिल्व पत्रों पर चन्दन से नमः शिवाय लिखकर इसी मंत्र का जप करते हुए शिवजी को अर्पित करें। 31 दिन तक यह प्रयोग करें, घर में सुख-शांति एवं सम्रद्धि आएगी, रोग, बाधा, मुकदमा आदि में लाभ एवं व्यापार में प्रगति होगी व नया रोजगार मिलेगा। यह एक अचूक प्रयोग है।
* भगवान् को भोग लगाई हुई थाली अंतिम आदमी के भोजन करने तक ठाकुरजी के सामने रखी रहे तो रसोई बीच में ख़त्म नहीं होती है।
* बालक को जन्म के नाम से मत पुकारें।
* पांच वर्ष तक बालक को कपडे मांगकर ही पहनाएं।
* 3 या 5 वर्ष तक सिर के बाल न कटाएं।
* उसके जन्मदिन पर बालकों को दूध पिलाएं।
* बच्चे को किसी की गोद में दे दें और यह कहकर प्रचार करें कि यह अमुक व्यक्ति का लड़का है।
* घर में सुख-शांति के लिये मंगलवार को चना और गुड बंदरों को खिलाएं। आठ वर्ष तक के बच्चों को मीठी गोलियां बाँटें। शनिवार को गरीब व भिखारियों को चना और गुड दें अथवा भोजन कराएं। मंगलवार व शनिवार को घर में सुन्दरकाण्ड का पाठ करें या कराएं।
* सूर्य के देवता विष्णु, चन्द्र के देवता शिव, बुध की देवी दुर्गा, ब्रहस्पति के देवता ब्रह्मा, शुक्र की देवी लक्ष्मी, शनि के देवता शिव, राहु के देवता सर्प और केतु के देवता गणेश। जब भी इन ग्रहों का प्रकोप हो तो इन देवताओं की उपासना करनी चाहिए।
* स्वस्थ शरीर के लिए एक रुपये का सिक्का लें। रात को उसे सिरहाने रख कर सो जाएं। प्रातः इसे ष्मशान की सीमा में फेंक आएं। शरीर स्वस्थ रहेगा।
* ससुराल में सुखी रहने के लिए साबुत हल्दी की गांठें, पीतल का एक टुकड़ा, थोड़ा सा गुड़ अगर कन्या अपने हाथ से ससुराल की तरफ फेंक दे, तो वह ससुराल में सुरक्षापूर्वक और सुखी रहती है। सुखी वैवाहिक जीवन के लिए कन्या का जब विवाह हो चुका हो और वह विदा हो रही हो, तो एक लोटे (गड़वी) में गंगा जल, थोड़ी सी हल्दी, एक पीला सिक्का डाल कर, लड़की के सिर के उपर से ७ बार वार कर उसके आगे फेंक दें। वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा। कन्या के घर से विदा होते समय एक लोटे में गंगाजल, थोड़ी सी हल्दी और एक पीला सिक्का डालकर उसके आगे फेंक दें, उसका वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा।
* परेशानियां दूर करने व कार्य सिद्धि हेतु शनिवार को प्रातः, अपने काम पर जाने से पहले, एक नींबू लें। उसके दो टुकड़े करें। एक टुकड़े को आगे की तरफ फेंके, दूसरे को पीछे की तरफ। इन्हें चौराहे पर फेंकना है। मुख भी दक्षिण की ओर हो। नींबू को फेंक कर घर वापिस आ जाएं, या काम पर चले जाएं। दिन भर काम बनते रहेंगे तथा परेषानियां भी दूर होंगी।
* काम या यात्रा पर जाते हुए, एक नारियल लें। उसको हाथ में ले कर, ११ बार श्री हनुमते नमः कह कर, धरती पर मार कर तोड़ दें। उसके जल को अपने ऊपर छिड़क लें और गरी को निकाल कर बांट दें तथा खुद भी खाएं, तो यात्रा सफल रहेगी तथा काम भी बन जाएगा।
* अगर आपको किसी विशेष काम से जाना है, तो नीले रंग का धागा ले कर घर से निकलें। घर से जो तीसरा खंभा पड़े, उस पर, अपना काम कह कर, नीले रंग का धागा बांध दें। काम होने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। हल्दी की ७ साबुत गांठें, ७ गुड़ की डलियां, एक रुपये का सिक्का किसी पीले कपड़े में बांध कर, रेलवे लाइन के पार फेंक दें। फेंकते समय कहें काम दे, तो काम होने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।
* धन के लिए एक हंडियां में सवा किलो हरी साबुत मूंग दाल या मूंगी, दूसरी में सवा किलो डलिया वाला नमक भर दें। यह दो हंडियां घर में कहीं रख दें। यह क्रिया बुधवार को करें। घर में धन आना शुरू हो जाएगा।
* मिर्गी के रोग को दूर करने के लिए अगर गधे के दाहिने पैर का नाखून अंगूठी में धारण करें, तो मिर्गी की बीमारी दूर हो जाती है।
* भूत-प्रेत और जादू-टोना से बचने के लिए मोर पंख को अगर ताबीज में भर के बच्चे के गले में डाल दें, तो उसे भूत-प्रेत और जादू-टोने की पीड़ा नहीं रहती।
* परीक्षा में सफलता हेतु गणेश रुद्राक्ष धारण करें। बुधवार को गणेश जी के मंदिर में जाकर दर्शन करें और मूंग के लड्डुओं का भोग लगाकर सफलता की प्रार्थना करें।
* पदोन्नति हेतु शुक्ल पक्ष के सोमवार को सिद्ध योग में तीन गोमती चक्र चांदी के तार में एक साथ बांधें और उन्हें हर समय अपने साथ रखें, पदोन्नति के साथ-साथ व्यवसाय में भी लाभ होगा।
* मुकदमे में विजय हेतु पांच गोमती चक्र जेब में रखकर कोर्ट में जाया करें, मुकदमे में निर्णय आपके पक्ष में होगा।
* पढ़ाई में एकाग्रता हेतु शुक्ल पक्ष के पहले रविवार को इमली के २२ पत्ते ले आएं और उनमें से ११ पत्ते सूर्य देव को ¬ सूर्याय नमः कहते हुए अर्पित करें। शेष ११ पत्तों को अपनी किताबों में रख लें, पढ़ाई में रुचि बढ़ेगी।
* कार्य में सफलता के लिए अमावस्या के दिन पीले कपड़े का त्रिकोना झंडा बना कर विष्णु भगवान के मंदिर के ऊपर लगवा दें, कार्य सिद्ध होगा।
* कारोबार में हानि हो रही हो अथवा ग्राहकों का आना कम हो गया हो, तो समझें कि किसी ने आपके कारोबार को बांध दिया है। इस बाधा से मुक्ति के लिए दुकान या कारखाने के पूजन स्थल में शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को अमृत सिद्ध या सिद्ध योग में श्री धनदा यंत्र स्थापित करें। फिर नियमित रूप से केवल धूप देकर उनके दर्शन करें, कारोबार में लाभ होने लगेगा।
* गृह कलह से मुक्ति हेतु परिवार में पैसे की वजह से कलह रहता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख में पांच कौड़ियां रखकर उसे चावल से भरी चांदी की कटोरी पर घर में स्थापित करें। यह प्रयोग शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार को या दीपावली के अवसर पर करें, लाभ अवश्य होगा।
* क्रोध पर नियंत्रण हेतु यदि घर के किसी व्यक्ति को बात-बात पर गुस्सा आता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख को साफ कर उसमें जल भरकर उसे पिला दें। यदि परिवार में पुरुष सदस्यों के कारण आपस में तनाव रहता हो, तो पूर्णिमा के दिन कदंब वृक्ष की सात अखंड पत्तों वाली डाली लाकर घर में रखें। अगली पूर्णिमा को पुरानी डाली कदंब वृक्ष के पास छोड़ आएं और नई डाली लाकर रखें। यह क्रिया इसी तरह करते रहें, तनाव कम होगा।
* मकान खाली कराने हेतु शनिवार की शाम को भोजपत्र पर लाल चंदन से किरायेदार का नाम लिखकर शहद में डुबो दें। संभव हो, तो यह क्रिया शनिश्चरी अमावस्या को करें। कुछ ही दिनों में किरायेदार घर खाली कर देगा। ध्यान रहे, यह क्रिया करते समय कोई टोके नहीं।
* बिक्री बढ़ाने हेतु ग्यारह गोमती चक्र और तीन लघु नारियलों की यथाविधि पूजा कर उन्हें पीले वस्त्र में बांधकर बुधवार या शुक्रवार को अपने दरवाजे पर लटकाएं तथा हर पूर्णिमा को धूप दीप जलाएं। यह क्रिया निष्ठापूर्वक नियमित रूप से करें, ग्राहकों की संख्या में वृद्धि होगी और बिक्री बढ़ेगी।
* शत्रु शमन के लिए साबुत उड़द की काली दाल के 38 और चावल के 40 दाने मिलाकर किसी गड्ढे में दबा दें और ऊपर से नीबू निचोड़ दें। नीबू निचोड़ते समय शत्रु का नाम लेते रहें, उसका शमन होगा और वह आपके विरुद्ध कोई कदम नहीं उठाएगा।
* ससुराल में सुखी रहने के लिए : कन्या अपने हाथ से हल्दी की 7 साबुत गांठें, पीतल का एक टुकड़ा और थोड़ा-सा गुड़ ससुराल की तरफ फेंके, ससुराल में सुरक्षित और सुखी रहेगी।
* घर में खुशहाली तथा दुकान की उन्नति हेतु घर या व्यापार स्थल के मुख्य द्वार के एक कोने को गंगाजल से धो लें और वहां स्वास्तिक की स्थापना करें और उस पर रोज चने की दाल और गुड़ रखकर उसकी पूजा करें। साथ ही उसे ध्यान रोज से देखें और जिस दिन वह खराब हो जाए उस दिन उस स्थान पर एकत्र सामग्री को जल में प्रवाहित कर दें। यह क्रिया शुक्ल पक्ष के बृहस्पतिवार को आरंभ कर ११ बृहस्पतिवार तक नियमित रूप से करें। फिर गणेश जी को सिंदूर लगाकर उनके सामने लड्डू रखें तथा ÷जय गणेश काटो कलेश’ कहकर उनकी प्रार्थना करें, घर में सुख शांति आ जागी।
* सफलता प्राप्ति के लिए प्रातः सोकर उठने के बाद नियमित रूप से अपनी हथेलियों को ध्यानपूर्वक देखें और तीन बार चूमें। ऐसा करने से हर कार्य में सफलता मिलती है। यह क्रिया शनिवार से शुरू करें।
* धन लाभ के लिए शनिवार की शाम को माह (उड़द) की दाल के दाने पर थोड़ी सी दही और सिंदूर डालकर पीपल के नीचे रख आएं। वापस आते समय पीछे मुड़कर नहीं देखें। यह क्रिया शनिवार को ही शुरू करें और 7 शनिवार को नियमित रूप से किया करें, धन की प्राप्ति होने लगेगी।
* संपत्ति में वृद्धि हेतु किसी भी बृहस्पतिवार को बाजार से जलकुंभी लाएं और उसे पीले कपड़े में बांधकर घर में कहीं लटका दें। लेकिन इसे बार-बार छूएं नहीं। एक सप्ताह के बाद इसे बदल कर नई कुंभी ऐसे ही बांध दें। इस तरह 7 बृहस्पतिवार करें। यह निच्च्ठापूर्वक करें, ईश्वर ने चाहा तो आपकी संपत्ति में वृद्धि होगी।
21 भगवान शिव ‘हर’ नाम से भी पूजनीय है। जिसके पीछे धार्मिक आस्था से यही भाव है कि शिव भक्त की पुकार पर उसकी सभी कष्ट व पीड़ाओं को हर यानी हरण कर लेते हैं। पौराणिक प्रसंग भी उजागर करते हैं कि चाहे वह समुद्र मंथन से निकले हलाहल यानी विष को पीने की बात हो या स्वर्ग से उतरी देव नदी गंगा के वेग को थामने के लिए उसे अपनी जटाओं में स्थान देने की बात, शिव ने संसार के संकटों को कल्याण भाव से हर लिया।
यही कारण है कि सांसारिक जीवन में हर परेशानियों से मुक्ति या कामनासिद्धि के लिए हर यानी शिव का ध्यान बहुत ही मंगलकारी माना जाता है। शिव उपासना की विशेष घडिय़ों में सोमवार का दिन बहुत शुभ है।
सोमवार की मंगल घड़ी में अगर नीचे लिखे सरल मंत्र से शिवलिंग की सामान्य पूजा भी करें तो यह पीड़ा व कष्टों से जल्द निजात दिलाने वाला उपाय माना गया है। जानते हैं विशेष शिव मंत्र, जिसमें शिव की अद्भुत महिमा व स्वरूप की वंदना है -
- सोमवार को स्नान के बाद स्वच्छ व सफेद वस्त्र पहन शांत मन से शिवालय या घर पर स्फटिक या धातु से बनी शिवलिंग को खासतौर पर शांति की कामना से दूध व शुद्ध जल से स्नान कराएं।
- शिव को सफेद चंदन, वस्त्र, अक्षत, बिल्वपत्र, सफेद आंकड़े के फूल व श्रीफल यानी नारियल पंचाक्षरी मंत्र ऊँ नम: शिवाय बोलते हुए चढाएं व पूजा के बाद नीचे लिखे शिव का श्रद्धा से स्मरण या जप करें -
शिवो गुरु: शिवो देव: शिवो बन्धु: शरीरिणाम्। शिव आत्मा शिवो जीव: शिवादन्यन्न किञ्चन।।
इसमें शिव की महिमा है कि शिव से अलग कुछ भी नहीं है, यानी शिव ही गुरु है, शिव देव हैं, शिव सभी प्राणियों के बन्धु हैं, शिव ही आत्मा है और शिव ही जीव हैं।
- इस मंत्र स्मरण व पूजा के बाद दूध की मिठाई का भोग लगा शिव की आरती धूप, दीप व कर्पूर से करें। प्रसाद ग्रहण कर सुकूनभरे जीवन की कामना से सिर पर शिव को अर्पित सफेद चंदन लगाएं।

44…सिद्ध वशीकरण मन्त्र
१॰ “बारा राखौ, बरैनी, मूँह म राखौं कालिका। चण्डी म राखौं मोहिनी, भुजा म राखौं जोहनी। आगू म राखौं सिलेमान, पाछे म राखौं जमादार। जाँघे म राखौं लोहा के झार, पिण्डरी म राखौं सोखन वीर। उल्टन काया, पुल्टन वीर, हाँक देत हनुमन्ता छुटे। राजा राम के परे दोहाई, हनुमान के पीड़ा चौकी। कीर करे बीट बिरा करे, मोहिनी-जोहिनी सातों बहिनी। मोह देबे जोह देबे, चलत म परिहारिन मोहों। मोहों बन के हाथी, बत्तीस मन्दिर के दरबार मोहों। हाँक परे भिरहा मोहिनी के जाय, चेत सम्हार के। सत गुरु साहेब।”
विधि- उक्त मन्त्र स्वयं सिद्ध है तथा एक सज्जन के द्वारा अनुभूत बतलाया गया है। फिर भी शुभ समय में १०८ बार जपने से विशेष फलदायी होता है। नारियल, नींबू, अगर-बत्ती, सिन्दूर और गुड़ का भोग लगाकर १०८ बार मन्त्र जपे।
मन्त्र का प्रयोग कोर्ट-कचहरी, मुकदमा-विवाद, आपसी कलह, शत्रु-वशीकरण, नौकरी-इण्टरव्यू, उच्च अधीकारियों से सम्पर्क करते समय करे। उक्त मन्त्र को पढ़ते हुए इस प्रकार जाँए कि मन्त्र की समाप्ति ठीक इच्छित व्यक्ति के सामने हो।.

15…..”भगवान सूर्य नारायण” के पुत्र और पुत्रियाँ
भगवान सूर्य नारायण के परिवार में 5 पुत्र और 2 पुत्रीयाँ थीं
उनके 5 पुत्रों के नाम कुछ इस प्रकार है -
1) वैवस्वत मनु देव
2) यम धर्मराज देव
3) शनि देव
4) भाग्य देव
5) अश्विनी कुमार देव
उनकी 2 पुत्रीयों के नाम कुछ इस प्रकार है -
1) यमुना देवी
2) तापती देवी
अब हम इनके पुत्रों के कर्मों के बारे में जानते हैं -
1) वैवस्वत मनु :- ये श्राद्ध देव हैं। ये पितृ लोक के अधिपति हैं। ये ही पितृों को तृप्त करते हैं। इन्हीं ने भूलोक पर सृजन का कार्य किया था।
2) यम धर्मराज :- आमतौर पर लोग इन्हें सिर्फ “यमराज” के नाम से ही जानते हैं पर ये समस्त देवताओं के मध्य “यम धर्मराज” के नाम से पुकारें जाते हैं। इन्हें मृत्यु का देवता भी कहा जाता हैं। जीवन और मृत्यु इन्हीं के नियंत्रण में हैं। ये काल रूप माने जाते हैं।
3) शनि देव :- ये न्याय प्रिय हैं स्वभाव से। ये कभी किसी के साथ अन्याय नहीं होने देते हैं और इसीलिए इन्हें “दंडाधिकारी” भी कहा जाता है। ये भगवान सूर्य की दूसरी पत्नी “छाया ” से उत्पन्न हुए थे।
4) भाग्य देव :- इनकी पितृभक्ति से प्रसन्न हो कर भगवान सूर्य नारायण ने इन्हें वरदान दिया कि ये जिससे चाहे कुछ भी ले सकते हैं और जिनको चाहे कुछ भी दे सकते हैं। ये भगवान सूर्य की पहली पत्नी “संज्ञा” से उत्पन्न हुए थे।
5) अश्विनी कुमार :- ये देवताओं के वैद्य हैं। इनके पास शरीर से जुडी हर समस्या का समाधान है। ये भी भगवान सूर्य की पहली पत्नी “संज्ञा” से उत्पन्न हुए थे।
अब हम इनकी पुत्रीयों के कर्मों के बारे में जानते हैं -
1) यमुना देवी :- यह नदी शांत नदी है। इस नदी का वेग भी सामान्य है। इस नदी में स्नान करने से यम की प्रताड़ना से मुक्ति मिलती हैं।
2) तापती देवी :- यह नदी यमुना देवी से स्वभाव में विपरीत है। इस नदी का वेग तीव्र है और स्वभाव से प्रचंड है। इस नदी में स्नान करने से पितृगड़ तृप्त होते हैं और शनि के साड़े साती से निजात मिलती हैं। और दोनों ही मोक्षदायनी नदी है।
आज विश्व के ज्यादातर ब्राह्मणों की अजिवीका के मुख्य कारण “भगवान सूर्य नारायण ” ही हैं जिन्होंने यजुर्वेद की रचना कर न सिर्फ “याज्ञवल्क मुनि ” को कृतज्ञ किया अपितु सम्पूर्ण ब्राह्मणों को भी कृतज्ञ किया है। आज अगर ब्राह्मण अपना कर्म करा कर गर्व की अनुभूति करता है तो निश्चित रूप से उसके इस गर्व का मूल कारण ” भगवान भास्कर ” ही हैं।

16…….माता त्रिपुरसुंदरी षोडशोपचार पूजन विधि
ध्यान
अरुण किरण जालै रंजीता सावकाशा,
विधृत जपवटीका पुस्तकाभीति हस्ता ।
इतरकर वराढय़ा फुल्ल कल्हार संस्था ,
निवसतु हृदि बाला नित्य कल्याण शीला ।।
पुष्प समर्पण :-
ॐ देवेशि भक्ति सुलभे परिवार समन्विते
यावत्तवां पूजयिष्यामि तावद्देवी स्थिरा भव
नमस्कार
शत्रुनाशकरे देवि ! सर्व सम्पत्करे शुभे
सर्व देवस्तुते ! त्रिपुरसुन्दर्यै ! त्वां नमाम्यहम
१. आसन :- प्रथम दिन कि पूजा में माँ को लाल रंग के कपडे का / आम कि लकड़ी का सिंहासन जो लाल / गुलाबी रंग से रंगा गया हो समर्पित करें एवं माँ को उस पर विराजित करने इसके बाद फिर प्रत्येक दिन माँ के चरणों में निम्न मंत्र को बोलते हुए पुष्प / अक्षत समर्पित करें
ॐ आसनं भास्वरं तुङ्गं मांगल्यं सर्वमंगले
भजस्व जगतां मातः प्रसीद जगदीश्वरी
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै आसनं समर्पयामि )
२. पाद्य :- इस क्रिया में शीतल एवं सुवासित जल से चरण धोएं और ऐसा सोचें कि आपके आवाहन पर माँ दूर से आयी हैं और पाद्य समर्पण से माँ को रास्ते में जो श्रम हुआ लगा है उसे आप दूर कर रहे हैं
ॐ गंगादि सलिलाधारं तीर्थं मंत्राभिमंत्रिम
दूर यात्रा भ्रम हरं पाद्यं तत्प्रति गृह्यतां
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै पाद्यं समर्पयामि )
३. उद्वर्तन :- इस क्रिया में माँ के चरणों में सुगन्धित / तिल के तेल को समर्पित करते हैं
ॐ तिल तण्डुल संयुक्तं कुश पुष्प समन्वितं
सुगंधम फल संयुक्तंमर्ध्य देवी गृहाण में
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै उद्वर्तन तैलं समर्पयामि )
४. आचमन :- इस क्रिया में माँ को आचमनी से या लोटे से आचमन जल प्रदान करते हैं ( याद रहे कि जल समर्पित करने का क्रम आप मूर्ति और यदि जल कि निकासी कि सुगम व्यवस्था है तो कर सकते हैं किन्तु यदि आपने कागज के चित्र को स्थापित किया हुआ है तो चित्र के सम्मुख एक पात्र रख लें और जल से सम्बंधित सारी क्रियाएँ करके जल उसी पात्र में डालते जाएँ )
ॐ स्नानादिक विधायापि यतः शुद्धिख़ाप्यते
इदं आचमनीयं हि कालिके देवी प्रगृह्यताम्
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै आचमनीयम् समर्पयामि )
५. स्नान :- इस क्रिया में सुगन्धित पदार्थों से निर्मित जल से स्नान करवाएं ( जल में इत्र , कर्पूर , तिल , कुश एवं अन्य वस्तुएं अपनी सामर्थ्य या सुविधानुसार मिश्रित कर लें यदि सामर्थ्य नहीं है तो सादा जल भी पर्याप्त है जो पूर्ण श्रद्धा से समर्पित किया गया हो )
ॐ खमापः पृथिवी चैव ज्योतिषं वायुरेव च
लोक संस्मृति मात्रेण वारिणा स्नापयाम्यहम्
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै स्नानं निवेदयामि )
६. मधुपर्क :- इस क्रिया में ( पंचगव्य मिश्रित करें प्रथम दिन ( गाय का शुद्ध दूध , दही , घी , चीनी , शहद ) अन्य दिनों में यदि व्यवस्था कर सकें तो बेहतर है अन्यथा सिर्फ शहद से काम लिया जा सकता है
ॐ मधुपर्क महादेवि ब्रह्मध्धे कल्पितं तव
मया निवेदितम् भक्तया गृहाण गिरिपुत्रिके
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै मधुपर्कं समर्पयामि )
विशेष :- ध्यान रखें चन्दन या सिन्दूर में से कोई भी चीज मस्तक पर समर्पित न करें बल्कि माँ के चरणों में समर्पित करें
७. चन्दन :- इस क्रिया में सफ़ेद चन्दन समर्पित करें
ॐ मळयांचल सम्भूतं नाना गंध समन्वितं
शीतलं बहुलामोदम चन्दम गृह्यतामिदं
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै चन्दनं समर्पयामि )
८. रक्त चन्दन :- इस क्रिया में माँ को रक्त / लाल चन्दन समर्पित करें
ॐ रुक्तानुलेपनम् देवि स्वयं देव्या प्रकाशितं
तद गृहाण महाभागे शुभं देहि नमोस्तुते
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै रक्त चन्दनं समर्पयामि )
९. सिन्दूर :- इस क्रिया में माँ को सिन्दूर समर्पित करें
ॐ सिन्दूरं सर्वसाध्वीनाम भूषणाय विनिर्मितम्
गृहाण वर दे देवि भूषणानि प्रयच्छ में
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै सिन्दूरं समर्पयामि )
१०. कुंकुम :- इस क्रिया में माँ को कुंकुम समर्पित करें
ॐ जपापुष्प प्रभम रम्यं नारी भाल विभूषणम्
भाष्वरम कुंकुमं रक्तं देवि दत्तं प्रगृह्य में
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै कुंकुमं समर्पयामि )
११. अक्षत :- अक्षत में चावल प्रयोग करने होते हैं जो लाल / गुलाबी रंग में रंगे हुए हों
ॐ अक्षतं धान्यजम देवि ब्रह्मणा निर्मितं पुरा
प्राणंद सर्वभूतानां गृहाण वर दे शुभे
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै अक्षतं समर्पयामि )
१२. पुष्प :- माता के चरणो में पुष्प समर्पित करें ( फूलों एवं फूलमालाओं का चुनाव करते समय गुलाब उपयुक्त होगा किन्तु यदि स्थानीय या बाजारीय उपलब्धता के हिसाब से जो उपलब्ध हो वही प्रयोग करें )
ॐ चलतपरिमलामोदमत्ताली गण संकुलम्
आनंदनंदनोद्भूतम् कालिकायै कुसुमं नमः
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै पुष्पं समर्पयामि )
१३. विल्वपत्र :- माता के चरणों में बिल्वपत्र समर्पित करें ( कहीं कहीं पर उल्लेख मिलता कि देवी पूजा में बिल्वपत्र का प्रयोग नहीं किया जाता है तो इस स्थिति में आप अपने लोक/ स्थानीय प्रचलन का प्रयोग करें )
ॐ अमृतोद्भवम् श्रीवृक्षं शंकरस्व सदाप्रियम
पवित्रं ते प्रयच्छामि सर्व कार्यार्थ सिद्धये
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै बिल्वपत्रं समर्पयामि )
१४. माला :- इस क्रिया में माँ को फूलों कि माला समर्पित करें
ॐ नाना पुष्प विचित्राढ़यां पुष्प मालां सुशोभताम्
प्रयच्छामि सदा भद्रे गृहाण परमेश्वरि
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै पुष्पमालां समर्पयामि )
१५. वस्त्र :- इस क्रिया में माता को वस्त्र समर्पित किये जाते हैं ( एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि वस्त्रों कि लम्बाई १२ अंगुल से कम न हो – प्रथम दिन कि पूजा में लाल वस्त्र समर्पित किये जाने चाहिए तत्पश्चात [ मौली धागा जिसे प्रायः पुरोहित रक्षा सूत्र के रूप में यजमान के हाथ में बांधते हैं वह चढ़ाया जा सकता है लेकिन लम्बाई १२ अंगुल ही होगी )
अ. ॐ तंतु संतान संयुक्तं कला कौशल कल्पितं
सर्वांगाभरण श्रेष्ठं वसनं परिधीयताम्
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै प्रथम वस्त्रं समर्पयामि )
ब. ॐ यामाश्रित्य महादेवि जगत्संहारकः सदा
तस्यै ते परमेशान्यै कल्पयाम्युत्रीयकम
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै द्वितीय वस्त्रं समर्पयामि )
१५. धूप :- इस क्रिया में सुगन्धित धुप समर्पित करनी है
ॐ गुग्गुलम घृत संयुक्तं नाना भक्ष्यैश्च संयुतम
दशांग ग्रसताम धूपम् त्रिपुरसुन्दर्यै देवि नमोस्तुते
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै धूपं समर्पयामि )
१६. दीप :- इस क्रिया में शुद्ध घी से निर्मित दीपक समर्पित करना है जो कपास कि रुई से बनी बत्तियों से निर्मित हो
ॐ मार्तण्ड मंडळांतस्थ चन्द्र बिंबाग्नि तेजसाम्
निधानं देवि त्रिपुरसुन्दर्यै दीपोअयं निर्मितस्तव भक्तितः
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै दीपं दर्शयामि )
१७. इत्र :- इस क्रिया में माता को इत्र / सुगन्धित सेंट समर्पित करना है
ॐ परमानन्द सौरभ्यम् परिपूर्णं दिगम्बरम्
गृहाण सौरभम् दिव्यं कृपया जगदम्बिके
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै सुगन्धित द्रव्यं समर्पयामि )
१८. कर्पूर दीप :- इस क्रिया में माँ को कर्पूर का दीपक जलाकर समर्पित करना है
ॐ त्वम् चन्द्र सूर्य ज्योतिषं विद्युद्गन्योस्तथैव च
त्वमेव जगतां ज्योतिदीपोअयं प्रतिगृह्यताम्
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै कर्पूर दीपम दर्शयामि )
१९. नैवेद्य :- इस क्रिया में माता को फल – फूल या भोजन समर्पित करते हैं भोजन कम से कम इतनी मात्रा में हो जो एक आदमी के खाने के लिए पर्याप्त हो बाकि सारा कुछ सामर्थ्यानुसार )
ॐ दिव्यांन्नरस संयुक्तं नानाभक्षैश्च संयुतम
चौष्यपेय समायुक्तमन्नं देवि गृहाण में
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै नैवेद्यं समर्पयामि )
२०. खीर :- इस क्रिया में ढूध से निर्मित खीर चढ़ाएं
ॐ गव्यसर्पि पयोयुक्तम नाना मधुर मिश्रितम्
निवेदितम् मया भक्त्या परमान्नं प्रगृह्यताम्
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै दुग्ध खीरम समर्पयामि )
२१. मोदक :- इस क्रिया में माँ को लड्डू समर्पित करने हैं
ॐ मोदकं स्वादु रुचिरं करपुरादिभिरणवितं
मिश्र नानाविधैर्द्रुव्यै प्रति ग्रह्यशु भुज्यतां
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै मोदकं समर्पयामि )
२२. फल :- इस क्रिया में माता को ऋतु फल समर्पित करने होते हैं
ॐ फल मूलानि सर्वाणि ग्राम्यांअरण्यानि यानि च
नानाविधि सुंगंधीनि गृहाण देवि ममाचिरम
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै ऋतुफलं समर्पयामि )
२३. जल :- इस क्रिया में खान – पान के पश्चात् अब माता को जल समर्पित करें
ॐ पानीयं शीतलं स्वच्छं कर्पूरादि सुवासितम्
भोजने तृप्ति कृद्य् स्मात कृपया प्रतिगृह्यतां
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै जलम समर्पयामि )
२४. करोद्वर्तन जल :- इस क्रिया में माता को हाथ धोने के लिए जल प्रदान करें
ॐ कर्पूरादीनिद्रव्याणि सुगन्धीनि महेश्वरि
गृहाण जगतां नाथे करोद्वर्तन हेतवे
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै करोद्वर्तन जलम समर्पयामि )
२५. आचमन :- इस क्रिया में माता को पुनः आचमन करवाएं
ॐ अमोदवस्तु सुरभिकृतमेत्तदनुत्तमम्
गृह्णाचमनीयम तवं मया भक्त्या निवेदितम्
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै पुनराचमनीयम् समर्पयामि )
२६. ताम्बूल :- इस क्रिया में माता को सुगन्धित पान समर्पित करें
ॐ पुन्गीफलम महादिव्यम नागवल्ली दलैर्युतम्
कर्पूरैल्लास समायुक्तं ताम्बूल प्रतिगृह्यताम्
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै ताम्बूलं समर्पयामि )
२७. काजल :- माता को काजल समर्पित करें
ॐ स्निग्धमुष्णम हृद्यतमं दृशां शोभाकरम तव
गृहीत्वा कज्जलं सद्यो नेत्रान्यांजय त्रिपुरसुन्दर्यै
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै कज्जलं समर्पयामि )
२८. महावर :- इस क्रिया में माँ को लाला रंग का महावर समर्पित करते हैं ( लाल रंग एवं पानी का मिश्रण जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं पैरों में लगाती हैं )
ॐ चलतपदाम्भोजनस्वर द्युतिकारि मनोहरम
अलकत्कमिदं देवि मया दत्तं प्रगृह्यताम्
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै महावरम समर्पयामि )
२९. चामर :- इस क्रिया में माँ को चामर / पंखा ढलना होता है
ॐ चामरं चमरी पुच्छं हेमदण्ड समन्वितम्
मायार्पितं राजचिन्ह चामरं प्रतिगृह्यताम्
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै चामरं समर्पयामि )
३० . घंटा वाद्यम् :- इस क्रिया में माँ के सामने घंटा / घंटी बजानी होती है ( यह ध्वनि आपके घर और आपसे सभी नकारात्मक शक्तियों को दूर करती है एवं आपके मन में प्रसन्नता और हर्ष को जन्म देती है )
ॐ यथा भीषयसे दैत्यान् यथा पूरयसेअसुरम
तां घंटा सम्प्रयच्छामि महिषधिनी प्रसीद में
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै घंटा वाद्यं समर्पयामि )
३१. दक्षिणा :- इस क्रिया में माँ को दक्षिणा धन समर्पित किया जाता है – ( जो कि सामर्थ्यानुसार है )
ॐ काञ्चनं रजतोपेतं नानारत्न समन्वितं
दक्षिणार्थम् च देवेशि गृहाण त्वं नमोस्तुते
( ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै आसनं समर्पयामि )
नीराजन :- इस क्रिया में पुनः माँ कि प्राथमिक आरती उतारते हैं जिसमे सिर्फ कर्पूर का प्रयोग होता है
ॐ कर्पूरवर्ति संयुक्तं वहयिना दीपितंचयत
नीराजनं च देवेशि गृह्यतां जगदम्बिके
क्षमा प्रार्थना :-
ॐ प्रार्थयामि महामाये यत्किञ्चित स्खलितम् मम
क्षम्यतां तज्जगन्मातः कालिके देवी नमोस्तुते
ॐ विधिहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं यदरचितम्
पुर्णम्भवतु तत्सर्वं त्वप्रसादान्महेश्वरी
शक्नुवन्ति न ते पूजां कर्तुं ब्रह्मदयः सुराः
अहं किं वा करिष्यामि मृत्युर्धर्मा नरोअल्पधिः
न जाने अहं स्वरुप ते न शरीरं न वा गुणान्
एकामेव ही जानामि भक्तिं त्वचर्णाबजयोः
आरती :- इस क्रिया में माता कि आरती उतारते हैं और यह चरण आपकी उस काल कि साधना के समापन का प्रतीक है -( इसके लिए अलग से कोई आरती जलने कि कोई जरुरत नहीं है आप उसी दीपक का उपयोग करेंगे जो आपने पूजा के प्रारम्भ में घी का दीपक जलाया था )
जय माता त्रिपुर सुंदरी
भक्तजन इस बात का ध्यान रखें कि माता के अन्य नाम जो सुविख्यात हैं वह हैं – महात्रिपुरसुन्दरी – त्रिपुरा – राजराजेश्वरी – कामाख्या – बालात्रिपुरसुन्दरी – षोडशी !
अतएव यदि आप माता के अन्य सुविख्यात नामों में से किसी अन्य नाम की उपासना करते हैं तो सिर्फ मन्त्र में परिवर्तन हो जायेगा अन्य सारी विधियां एवं चरण समान ही रहेंगे -!
उदाहरणस्वरूप :-
महात्रिपुरसुन्दरी :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महात्रिपुरसुन्दर्यै
राजराजेश्वरी :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं राजराजेश्वर्यै
त्रिपुरा :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुरर्यै
कामाख्या :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कामाख्यै
बाला त्रिपुरसुंदरी :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं बालात्रिपुरसुन्दर्यै
षोडशी :- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं षोडष्यै.|

17……..श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र
श्री मार्कण्डेय उवाच
भगवन् ! प्रमथाधीश ! शिव-तुल्य-पराक्रम !
पूर्वमुक्तस्त्वया मन्त्रं, भैरवस्य महात्मनः ।।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि, तस्य स्तोत्रमनुत्तमं ।
तत् केनोक्तं पुरा स्तोत्रं, पठनात्तस्य किं फलम् ।।
तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि, ब्रूहि मे नन्दिकेश्वर !।।
श्री नन्दिकेश्वर उवाच
इदं ब्रह्मन् ! महा-भाग, लोकानामुपकारक !
स्तोत्रं वटुक-नाथस्य, दुर्लभं भुवन-त्रये ।।
सर्व-पाप-प्रशमनं, सर्व-सम्पत्ति-दायकम् ।
दारिद्र्य-शमनं पुंसामापदा-भय-हारकम् ।।
अष्टैश्वर्य-प्रदं नृणां, पराजय-विनाशनम् ।
महा-कान्ति-प्रदं चैव, सोम-सौन्दर्य-दायकम् ।।
महा-कीर्ति-प्रदं स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः ।
न वक्तव्यं निराचारे, हि पुत्राय च सर्वथा ।।
शुचये गुरु-भक्ताय, शुचयेऽपि तपस्विने ।
महा-भैरव-भक्ताय, सेविते निर्धनाय च ।।
निज-भक्ताय वक्तव्यमन्यथा शापमाप्नुयात् ।
स्तोत्रमेतत् भैरवस्य, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मनः ।।
श्रृणुष्व ब्रूहितो ब्रह्मन् ! सर्व-काम-प्रदायकम् ।।
विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-स्तोत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-देवता, ह्रीं बीजं, क्लीं शक्ति, सः कीलकम्, मम-सर्व-काम-सिद्धयर्थे पाठे विनियोगः ।
ध्यानः-
मन्दार-द्रुम-मूल-भाजि विजिते रत्नासने संस्थिते ।
दिव्यं चारुण-चञ्चुकाधर-रुचा देव्या कृतालिंगनः ।।
भक्तेभ्यः कर-रत्न-पात्र-भरितं स्वर्ण दधानो भृशम् ।
स्वर्णाकर्षण-भैरवो भवतु मे स्वर्गापवर्ग-प्रदः ।।
स्तोत्र-पाठ
ॐ नमस्तेऽस्तु भैरवाय, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मने,
नमः त्रैलोक्य-वन्द्याय, वरदाय परात्मने ।।
रत्न-सिंहासनस्थाय, दिव्याभरण-शोभिने ।
नमस्तेऽनेक-हस्ताय, ह्यनेक-शिरसे नमः ।
नमस्तेऽनेक-नेत्राय, ह्यनेक-विभवे नमः ।।
नमस्तेऽनेक-कण्ठाय, ह्यनेकान्ताय ते नमः ।
नमोस्त्वनेकैश्वर्याय, ह्यनेक-दिव्य-तेजसे ।।
अनेकायुध-युक्ताय, ह्यनेक-सुर-सेविने ।
अनेक-गुण-युक्ताय, महा-देवाय ते नमः ।।
नमो दारिद्रय-कालाय, महा-सम्पत्-प्रदायिने ।
श्रीभैरवी-प्रयुक्ताय, त्रिलोकेशाय ते नमः ।।
दिगम्बर ! नमस्तुभ्यं, दिगीशाय नमो नमः ।
नमोऽस्तु दैत्य-कालाय, पाप-कालाय ते नमः ।।
सर्वज्ञाय नमस्तुभ्यं, नमस्ते दिव्य-चक्षुषे ।
अजिताय नमस्तुभ्यं, जितामित्राय ते नमः ।।
नमस्ते रुद्र-पुत्राय, गण-नाथाय ते नमः ।
नमस्ते वीर-वीराय, महा-वीराय ते नमः ।।
नमोऽस्त्वनन्त-वीर्याय, महा-घोराय ते नमः ।
नमस्ते घोर-घोराय, विश्व-घोराय ते नमः ।।
नमः उग्राय शान्ताय, भक्तेभ्यः शान्ति-दायिने ।
गुरवे सर्व-लोकानां, नमः प्रणव-रुपिणे ।।
नमस्ते वाग्-भवाख्याय, दीर्घ-कामाय ते नमः ।
नमस्ते काम-राजाय, योषित्कामाय ते नमः ।।
दीर्घ-माया-स्वरुपाय, महा-माया-पते नमः ।
सृष्टि-माया-स्वरुपाय, विसर्गाय सम्यायिने ।।
रुद्र-लोकेश-पूज्याय, ह्यापदुद्धारणाय च ।
नमोऽजामल-बद्धाय, सुवर्णाकर्षणाय ते ।।
नमो नमो भैरवाय, महा-दारिद्रय-नाशिने ।
उन्मूलन-कर्मठाय, ह्यलक्ष्म्या सर्वदा नमः ।।
नमो लोक-त्रेशाय, स्वानन्द-निहिताय ते ।
नमः श्रीबीज-रुपाय, सर्व-काम-प्रदायिने ।।
नमो महा-भैरवाय, श्रीरुपाय नमो नमः ।
धनाध्यक्ष ! नमस्तुभ्यं, शरण्याय नमो नमः ।।
नमः प्रसन्न-रुपाय, ह्यादि-देवाय ते नमः ।
नमस्ते मन्त्र-रुपाय, नमस्ते रत्न-रुपिणे ।।
नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, सुवर्णाय नमो नमः ।
नमः सुवर्ण-वर्णाय, महा-पुण्याय ते नमः ।।
नमः शुद्धाय बुद्धाय, नमः संसार-तारिणे ।
नमो देवाय गुह्याय, प्रबलाय नमो नमः ।।
नमस्ते बल-रुपाय, परेषां बल-नाशिने ।
नमस्ते स्वर्ग-संस्थाय, नमो भूर्लोक-वासिने ।।
नमः पाताल-वासाय, निराधाराय ते नमः ।
नमो नमः स्वतन्त्राय, ह्यनन्ताय नमो नमः ।।
द्वि-भुजाय नमस्तुभ्यं, भुज-त्रय-सुशोभिने ।
नमोऽणिमादि-सिद्धाय, स्वर्ण-हस्ताय ते नमः ।।
पूर्ण-चन्द्र-प्रतीकाश-वदनाम्भोज-शोभिने ।
नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, स्वर्णालंकार-शोभिने ।।
नमः स्वर्णाकर्षणाय, स्वर्णाभाय च ते नमः ।
नमस्ते स्वर्ण-कण्ठाय, स्वर्णालंकार-धारिणे ।।
स्वर्ण-सिंहासनस्थाय, स्वर्ण-पादाय ते नमः ।
नमः स्वर्णाभ-पाराय, स्वर्ण-काञ्ची-सुशोभिने ।।
नमस्ते स्वर्ण-जंघाय, भक्त-काम-दुघात्मने ।
नमस्ते स्वर्ण-भक्तानां, कल्प-वृक्ष-स्वरुपिणे ।।
चिन्तामणि-स्वरुपाय, नमो ब्रह्मादि-सेविने ।
कल्पद्रुमाधः-संस्थाय, बहु-स्वर्ण-प्रदायिने ।।
भय-कालाय भक्तेभ्यः, सर्वाभीष्ट-प्रदायिने ।
नमो हेमादि-कर्षाय, भैरवाय नमो नमः ।।
स्तवेनानेन सन्तुष्टो, भव लोकेश-भैरव !
पश्य मां करुणाविष्ट, शरणागत-वत्सल !
श्रीभैरव धनाध्यक्ष, शरणं त्वां भजाम्यहम् ।
प्रसीद सकलान् कामान्, प्रयच्छ मम सर्वदा ।।
।। फल-श्रुति ।।
श्रीमहा-भैरवस्येदं, स्तोत्र सूक्तं सु-दुर्लभम् ।
मन्त्रात्मकं महा-पुण्यं, सर्वैश्वर्य-प्रदायकम् ।।
यः पठेन्नित्यमेकाग्रं, पातकैः स विमुच्यते ।
लभते चामला-लक्ष्मीमष्टैश्वर्यमवाप्नुयात् ।।
चिन्तामणिमवाप्नोति, धेनुं कल्पतरुं ध्रुवम् ।
स्वर्ण-राशिमवाप्नोति, सिद्धिमेव स मानवः ।।
संध्याय यः पठेत्स्तोत्र, दशावृत्त्या नरोत्तमैः ।
स्वप्ने श्रीभैरवस्तस्य, साक्षाद् भूतो जगद्-गुरुः ।
स्वर्ण-राशि ददात्येव, तत्क्षणान्नास्ति संशयः ।
सर्वदा यः पठेत् स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः ।।
लोक-त्रयं वशी कुर्यात्, अचलां श्रियं चाप्नुयात् ।
न भयं लभते क्वापि, विघ्न-भूतादि-सम्भव ।।
म्रियन्ते शत्रवोऽवश्यम लक्ष्मी-नाशमाप्नुयात् ।
अक्षयं लभते सौख्यं, सर्वदा मानवोत्तमः ।।
अष्ट-पञ्चाशताणढ्यो, मन्त्र-राजः प्रकीर्तितः ।
दारिद्र्य-दुःख-शमनं, स्वर्णाकर्षण-कारकः ।।
य येन संजपेत् धीमान्, स्तोत्र वा प्रपठेत् सदा ।
महा-भैरव-सायुज्यं, स्वान्त-काले भवेद् ध्रुवं ।।
मूल-मन्त्रः-
“ॐ ऐं क्लां क्लीं क्लूं ह्रां ह्रीं ह्रूं सः वं आपदुद्धारणाय अजामल-बद्धाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षण-भैरवाय मम दारिद्र्य-विद्वेषणाय श्रीं महा-भैरवाय नमः ।”.

विशेषः- इस प्रकार के मन्त्र उग्र प्रकृति के होते है। स्व-रक्षा व गुरु निर्देशन के अभाव में प्रयुक्त करना हानिकारक है तथा सामाजिक व नैतिक दृष्टि से अनुचित भी। यहाँ पर मात्र प्राचीन विद्या के संरक्षण हेतु प्रस्तुत किये ।

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