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श्री सिद्ध तारा महाविद्या
काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, बगलामुखी, धूमावती, मातंगी और कमला, ये दश महाविद्या कही गई है। इन महाविद्याओं के मूल स्थानों का संबंध शक्ति-पीठों से भी है एवं सभी पूजा, उपासना, हवन आदि कार्यों में दशों महाविद्याओं का समान महत्व है। तंत्र साधना के लिए सर्वाधिक सिद्धि-दायक स्थान कामरूप क्षेत्र के नील पर्वत पर स्थित माँ कामाख्या का पवित्र धाम है जहां तंत्र-साधना में महाविद्या षोडशी कामाख्या का प्राकृतिक योगदान मानव मस्तिष्क की सोच तथा समझ से परे है। तंत्र-साधना का प्रथम सोपान कुमारी पूजन विधान इसी स्थान पर किया जाता है। जो साधक तंत्र साधना में प्रवेश करते हैं उन्हें सर्वप्रथम इस स्थान पर कुमारी पूजन अनिवार्य रूप से करना होता है। अन्य साधनाओं में अम्बूवाची योग में यहां सर्वाधिक सिद्धिदायी साधना विश्व प्रसिद्ध है। तंत्र साधना में शीघ्र सिद्धि-प्राप्ति हेतु श्मशान में साधना की जाती है। इसके लिए महाश्मशान ही प्रशस्त हैं। जाग्रत श्मशान में साधना भी शीघ्र फलदायी कही गई है। चक्रतीर्थ श्मशान, उज्जैन तथा मणिकर्णिका घाट जाग्रत श्मशान हैं जबकि बंगाल के वीरभूमि जिले में रामपुराहाट के समीप तारापीठ का श्मशान महाश्मशान कहालाता है। तंत्र साधना की पराकाष्ठा इसी श्मशान की साधना में निहित है।
मां तारा को विपदुद्धारिणी तारा-, विपदुद्धारिणी मां तारा, तारिणी मां तारा कहा जाता है। सभी आपदाओं से, विपदाओं से तारने वाली मां तारा मृत्यु के पश्चात भी तारने वाली शक्ति मातंगी के चरण कमल इस स्थान पर महा श्मशान में प्रतिष्ठित हंै |जहां साधना, पूजन, हवन आदि कार्य किया जाता है। महापुरुषों व अवतारों की साधना स्थली: भगवान राम, बुद्ध, महावीर, ऋषि वशिष्ठ, विश्वामित्र, देवगुरु बृहस्पति, महर्षि दधीचि जैसे महाऋषियों ने इस स्थान पर साधनाएं कर सिद्धियां प्राप्त की थीं। वामाक्षेपा नामक महान तांत्रिक जिन्हें मां तारा ने स्वयं स्तन पान कराया था वह इस स्थान के प्रथम पूज्य महामानव हंै। तंत्र के षटकर्मों का अध्ययन इसी श्मशान भूमि में साधना करके ही किया जा सकता है। प्रत्येक अमावस्या को यहां मेला जैसा लगता है। सबसे बड़ा मेला और सिद्धि-प्राप्ति का वार्षिक महोत्सव प्रत्येक भाद्रपद माह की अमावस्या पर होता है। इस महापर्व पर, ग्रहण की अमावस्या पर्व पर तथा दीपावली की अमावस्या पर अनुभवी और विशिष्ट तांत्रिकगण अपने शिष्यों को यहां गुप्त तंत्र सिद्धियां-प्राप्ति हेतु गुह्यतम साधनाएं सम्पन्न कराते हैं। इस स्थान में अनेक तंत्र साधिकाएं जिन्हें भैरवियां कहा जाता है, निवास करती हैं तथा अनेक तंत्र साधकों की साधनाओं में सहायता करती है ।
इस स्थान पर अलग-अलग कामनाओं की पूर्ति के लिए अलग-अलग साधनों से हवन सामग्रियों से विभिन्न विशेष मुहूर्तों में हवन किया जाता है। सर्वमनोकामनाओं की पूर्ति, भूमि, भवन, वाहन, सुख, स्मृति, ऋणनाश, क्लेश नाश, दाम्पत्य, संतान, परिवार, कुटुम्ब आदि के सुख के लिए शत्रु नाश, वाद-विवाद, चुनाव, प्रतियोगिताओं में, परीक्षा में विजय व सफलता के लिए आरोग्य-प्राप्ति, ग्रह शांति, रोग नाश तथा शांति आदि की प्राप्ति सहित अनेक कार्यों हेतु तंत्र विधि से शीघ्र फलदायी हवन किया जाता है। कलियुग में तंत्र साधना शीघ्र फलदायी होती है वेदों के ये शब्द इसी स्थान पर सत्य अवश्य सिद्ध होते हैं। ऐसा इस स्थान के साधकों का मानना है। मां तारा त्वरित फल देने वाली आशुसिद्धिदायी दयामयी माता है।किन्तु ध्यान देने योग्य है माँ तारा साधना बहुत हि उच्च कोटि कि साधना है इस साधना को सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ । बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है क्योंकि तारा एक उग्र शक्ति है और प्रतिक्षण विनाश के बाद सृष्टिरत रहती हैं |
बड़े से बड़े दुखों का होगा नाश, सृष्टि के सर्वोच्च ज्ञान की होगी प्राप्ति, भोग और मोक्ष होंगे मुट्ठी में, जीवन के हर क्षत्र में मिलेगी अपार सफलता, दैहिक दैविक भौतिक तापों से तारेगी “सिद्धविद्या महातारा”
माँ काली का ही स्वरूप है माँ तारा । माँ काली को नीलरूपा होने के कारण ही तारा कहा गया है। भगवती काली का यह स्वरूप सर्वदा मोक्ष देने वाला है, जीव को इस संसार सागर से तारने वाला है- इसलिए वह तारा हैं। सहज में ही वे वाक्‌ प्रदान करने वाली हैं इसलिए नीलसरस्वती हैं। भयंकर विपत्तियों से साधक की रक्षा करती हैं, उसे अपनी कृपा प्रदान करती हैं, इसलिए वे उग्रतारा या उग्रतारिणी हैं। यद्यपि मां तारा और काली में कोई भेद नहीं है, तथापि बृहन्नील तंत्रादि त्रादि ग्रंथों में उनके विशिष्ट स्वरूप का उल्लेख किया गया है। हयग्रीव दानव का वध करने के लिए देवी को नील-विग्रह प्राप्त हुआ, जिस कारण वे तारा कहलाईं। शव-रूप शिव पर प्रत्यालीढ मुद्रा में भगवती आरूढ हैं, और उनकी नीले रंग की आकृति है तथा नील कमलों के समान तीन नेत्र तथा हाथों में कैंची, कपाल, कमल और खडग धारण किये हैं। व्याघ्र-चर्म से विभूषित इन देवी के कंठ में मुण्डमाला लहराती है। वे उग्र तारा हैं, लेकिन अपने भक्तों पर कृपा करने के लिए उनकी तत्परता अमोघ है । इस कारण मां तारा महा-करूणामयी हैं।
तारा तंत्र में कहा गया है- समुद्र मथने देवि कालकूट समुपस्थितम्‌ ॥
समुद्र मंथन के समय जब कालकूट विष निकला तो बिना किसी क्षोभ के उस हलाहल विष को पीने वाले भगवान शिव ही अक्षोभ्य हैं और उनके साथ शब्द तारा विराजमान हैं। शिवशक्ति संगम तंत्र में अक्षोभ्य शब्द का अर्थ महादेव कहा गया है। अक्षोभ्य को दृष्टा ऋषि शिव कहा गया है। अक्षोभ्य शिव ऋषि को मस्तक पर धारण करने वाली तारा तारिणी अर्थात्‌ तारण करने वाली हैं। उनके मस्तक पर स्थित पिंगल वर्ण उग्र जटा का भी अद्‌भूत रहस्य है। ये फैली हुई उग्र पीली जटाएं सूर्य की किरणों की प्रतिरूपा हैं। यह एकजटा है। इस प्रकार अक्षोभ्य एवं पिंगोगै्रक जटा धारिणी उग्र तारा एकजटा के रूप में पूजी जाती हैं। वे ही उग्र तारा शव के हृदय पर चरण रखकर उस शव को शिव बना देने वाली नील सरस्वती हो जाती हैं।
सर्वप्रथम महर्षि वशिष्ट ने भगवती तारा की वैदिक रीति से आराधना की, परंतु वे सफल नहीं हुए। तब उन्हें उनके पिता ब्रह्मा जी से संकेत मिला कि वे तांत्रिक पद्धति से भगवती तारा की उपासना करें तो वे निश्चय ही सफल होंगें अतः महर्षि ने कामरूप प्रदेश (असम ) में साधना की । तदोपरान्त ही वशिष्ठ जी को भगवती तारा की सिद्धि प्राप्त हुई। इसी कारण कहा जाता है कि भगवती तारा की उपासना तांत्रिक पद्धति से ही सफल होती है।
महाकाल-संहिता के कामकला-खण्ड में तारा-रहस्य वर्णित है, जिसमें तारा-रात्रि में भगवती तारा की उपासनाका विशेष महत्व है। चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि की रात्रि को तारा-रात्रि कहा जाता है।
मां के स्वरूप का वर्णन
मां सर्वमयी, नूतन जलधर स्वरूपा लम्बोदरी हैं। उन्होंने अपने कटि प्रदेश में व्याघ्र चर्म लपेटा हुआ है, उनके स्तन स्थूल एवं समुन्नत कुच वाले हैं, उनके तीनों नेत्र लाल-लाल और वृताकार हैं, उनकी पीठ पर अत्यंत घोर घने काले केश फैले हुए हैं, उनका सिर अक्षोभ्य महादेव के प्रिय नाग के बगलो फनों से सुशोभित है, उनकी दोनों बगलों में नील कमलों की मालाएं शोभित हो रही हैं। पंचमुद्रा-स्वरूपिणि, शुभ्र त्रिकोणाकार कगल पंचक को धारण करने वाली, अत्यंत नील जटाजूट वाली, विशाल चंवर मुद्रा रूपी केशों से अलंकृत, श्वेतवर्ण के तक्षक नाग के वलय वाली, रक्त वर्ण सर्प के समान अल्पाहार वाली, विचित्र वर्णों वाले शेषनाग से बने हार को धारण करने वाली, सुनहले पीतवर्ण के छोटे-छोटे सर्पों की मुद्रिकाएं धारण करने वाली, हल्के लाल रंग के नाग की बनी कटिसूत्र वाली, दूर्वादल के समान श्यामवर्ण के नागों के वलय वाली, सूर्य, चन्द्र, अग्निस्वरूप, त्रिनयना, करोड़ो बाल रवि की छवियुक्त दक्षिण नेत्र वाली, शीतल कोटि-कोटि बालचन्द्र के समान शीतल नयनों वाली, लाखों अग्निशिखाओं से भी नयनां तीक्ष्ण तेजोरूप्पा नयनों वाली, लपलपाती जिह्‌वा वाली, महाकाल रूपी शव के हृदय पर दायें पद को कुछ मुडी हुई मुद्रा में एवं उसके दोनों पैरों पर अपने बायें पैर का को फैली हुर्इ्र अवस्था में उस प्रत्यालीढ पद वाली महाकाली हैं, जो तुरन्त ही कटे हुए रूधिराक्त केशों से गूंथे गये मुण्डमालों से अत्यन्त रमणीय हो गयी हैं। समस्त प्रकार के स्त्री-आभूषणों से विभूषित एवं महामोह को भी मोहने वाली हैं, महामुक्ति दायिनि, विपरीत रतिक्रीड़ा, निरता एवं रति कारण कामावेश के कारण आनन्दमुखी है।
तारा मां श्मशान वासिनि हैं, अत्यन्त ही भयंकर स्वरूप वाली हैं, शव जो कि चिता पर जल रही हैं, उस शव पर प्रत्यालिङ मुद्रा पर खङी हुई हैं। कटे हुऐ सरो के माला के स्थान पर मां ने खोपङीयो तथा हड्डीयो कि माला धारण की हुई हैं तथा सर्पो, रूद्राक्ष के आभूषणो से अलंकृत हैं। मां की चार भुजाऐं है और अपने हाथो में क्रमशः कैंची, नील कमल, खप्पर तथा खडग धारण किऐ हुऐ हैं, बाघम्बर के वस्त्र धारण करती हैं। वासतव में, मां अज्ञान रूपी शव पर प्रत्यालिङ मुद्रा में विराजमान हैं और उस शव को, ज्ञान रूपी शिव में परिवर्तित कर अपने मस्तक पर धारण किए हुए हैं, जिन्हें अक्ष्योभ शिव/ऋषि के नाम से जाना जाता हैं, ऐसी असाधारण शक्ति और विद्या कि ज्ञाता हैं मां। मां की अराधना विशेषतः मोक्ष पाने के लिए कि जाती हैं, मां मोक्ष दायिनी हैं। मां भोग और मोक्ष एक साथ भक्त को प्रदान करती हैं और तन्त्र साधको की अधिष्ठात्री देवी हैं। तन्त्र और अघोर पंथ के साधको की साधना मां के वरदान और कृपा के बिना पूर्ण नहीं होती। परन्तु व्यबहारिक दृष्टी से मां का स्वरूप अत्यन्त ही भयंकर होते हुऐ भी स्वाभाव बहुत ही कोमल ऐवम सरल हैं। ऐसा इस संसार में कुछ भी नहीं हैं जो मां अपने भक्तो/साधको को प्रदान करने में असमर्थ हैं।
तारा कुल की तिन माताओ में नीलसरस्वती मां अनेको सरस्वती की जननी हैं । श्रीष्टि में जो भी ज्ञान ईधर-उधर बटा हुया हैं, उसे एक जगह संयुक्त करने पर मां नीलसरस्वती की उत्पत्ति होती हैं । मां अपने अन्दर सम्पूर्ण ज्ञान समाये हुये हैं, फलस्वरूप मां का भक्त प्ररम ज्ञानी हो जाता हैं। मां भव सागर से तारने वाली हैं, तभी मां तारा के नाम से जानी जाती हैं।
मां का स्वरूप : मां के घ्यान मंत्र के अनुसार
(शास्त्रो के अनुसार स्वरूप का वर्णन घ्यान मंत्र कहलाता हैं।)
सात्विक ध्यान :
सस्थां द्गवेताम्बराढ्‌यां हंसस्थां मुक्ताभरणभूषिताम्‌। चतुर्वक्त्रामष्टभुजैर्दधानां कुण्डिकाम्बुजे ॥
वराभये पाद्गाद्गाक्ती अक्षस्रक्पुष्पमालिके । द्गाब्दपाथोनिधौ ध्यायेत्‌ सृष्टिध्यानमुदीरितम्‌ ॥
अर्थात्‌ -
सफेद वस्त्र धारण किये हुए, हंस पर विराजित, मोती के आभूषणों से अलंकृत, चार मुखों वाली तथा अपनी आठ भुजाओं में क्रमशः कमण्डल, कमल, वर, अभय मुद्रा, पाश, शक्ति, अक्षमाला एवं पुष्पमाला धारण किये हुए शब्द समुद्र में स्थित महाविद्या का ध्यान करें ।
राजसी ध्यान :
रक्ताम्बरां रक्तसिंहासनस्थां हेमभूषिताम्‌। एकवक्त्रां वेदसंखयैर्भुजैः संबिभ्रतीं क्रमात्‌ ॥
अक्षमालां पानपात्रम-भयं वरमुत्तमम्‌ । श्वेतद्वीपस्थितां ध्यायेत्‌ स्थितिध्यानमिदं स्मृतम्‌॥
अर्थात्‌ -
रक्त वर्ण के वस्त्र धारण किये हुए, रक्त वर्ण के सिंहासन पर विराजित, सुवर्ण से बने आभूषणों से सुशोभित, एक मुख वाली, अपनी चार भुजाओं में अक्षमाला, पानपात्र, अभय एवं वर मुद्रा धारण किये हुए श्वेतद्वीप निवासिनी भगवती का ध्यान करें।
तामस ध्यान :-
कृष्णाम्बराढ्‌यां नौसंस्थामस्थ्याभरण-भूषिताम्‌ ।
नववक्त्रां भुजैरष्टादद्गाभिर्दधतींवरम्‌॥
अभयं परशुं दर्वीं खड्‌गं पाशुपतं हलम्‌ ।
भिण्डिं शूलं च मुसलं कर्त्रीं शक्तिं त्रिशीर्षकम्‌ ॥
अर्थात्‌ -
काले रंग का वस्त्र धारण किये हुए, नौका पर विराजित, हड्‌डी के आभूषणों से विभूषित, नौ मुखों वाली, अपनी अट्ठारह भुजाओं में वर, अभय, परशु, दर्वी, खड्‌ग, पाशुपत, हल, भिण्डि, शूल, मूशल, कैंची, शक्ति, त्रिशूल, संहार अस्त्र, पाश, वज्र, खट्‌वांग और गदा धारण करने वाली रक्त-सागर में स्थित देवी का ध्यान करना चाहिए।
वचनान्तरसे तारा नामका रहस्य यह भी है कि वे सर्वदा मोक्ष देनेवाली, तारनेवाली हैं, इसलिये इन्हें तारा कहा जाता है। महाविद्याओँ में ये द्वितीय स्थानपर परिगणित हैं। अनायास ही वाक्शक्ति प्रदान करने में समर्थ हैं, इसलिये इन्हें नीलसरस्वती भी कहते हैं। भयंकर विपप्तियों से भक्तों की रक्षा करती हैं। इसलिये उग्रतारा हैं। बृहन्नील-तन्त्रादि ग्रन्थों में भगवती ताराके स्वरूप की विशेष चर्चा है। हयग्रीवका वध करने के लिये इन्हें नील-विग्रह प्राप्त हुआ था। ये शवरूप शिवरूप प्रत्यालीढ़ मुद्रा में आरुढ़ हैं। भगवती तारा नीलवर्णवाली,नीलकमलों के समान तीन नेत्रोंवाली तथा हाथों में कैंची, कपाल, कमल और खड्ग धारण करनेवाली हैं। ये व्याघ्रचर्मसे विभूषिता तथा कण्ठ में मुण्डमाला धारण करने वाली हैं।
ताराका प्रादुर्भाव
मेरू-पर्वतके, पश्चिम भाग में चोलना’ नामकी नदीके या चोलन सरोवरके तटपर हुआ था, जैसा कि स्वतन्त्रतन्त्रमें वर्णित है-
मेरोः पश्र्चिमकूले नु चोत्रताख्यों हृदो महान्।
तत्र जज्ञे स्वयं तारा देवी नीलसरस्वती।।
“महाकाल-संहिता ” के काम कलाखण्ड में तारा-रहस्य वर्णित है, जिसमें तारारात्रिमें ताराकी उपासनाका विशेष महत्त्व है। चैत्र-शुक्ल नवमी की रात्रि ‘तारारात्रि’ कहलाती है-
चैत्रे मासि नवम्यां तु शुक्लपक्षे तु भूपते। क्रोधरात्रिर्महेशानि तारारूपा भविष्यति।। (पुरश्चर्यार्णव)
सृष्टि की उत्तपत्ति से पहले घोर अन्धकार था, तब न तो कोई तत्व था न ही कोई शक्ति थी, केवल एक अन्धकार का साम्राज्य था, इस परलायाकाल के अन्धकार की देवी थी काली, उसी महाअधकार से एक प्रकाश का बिन्दु प्रकट हुआ जिसे तारा कहा गया, यही तारा अक्षोभ्य नाम के ऋषि पुरुष की शक्ति है, ब्रहमांड में जितने धधकते पिंड हैं सभी की स्वामिनी उत्तपत्तिकर्त्री तारा ही हैं, जो सूर्य में प्रखर प्रकाश है उसे नीलग्रीव कहा जाता है, यही नील ग्रीवा माँ तारा हैं,
सृष्टि उत्तपत्ति के समय प्रकाश के रूप में प्राकट्य हुआ इस लिए तारा नाम से विख्यात हुई किन्तु देवी तारा को महानीला या नील तारा कहा जाता है क्योंकि उनका रंग नीला है, जिसके सम्बन्ध में कथा आती है कि जब सागर मंथन हुआ तो सागर से हलाहल विष निकला, जो तीनों लोकों को नष्ट करने लगा, तब समस्त राक्षसों देवताओं ऋषि-मुनिओं नें भगवान शिव से रक्षा की गुहार लगाई, भूत बावन शिव भोले नें सागर मन्थन से निकले कालकूट नामक विष को पी लिया, विष पीते ही विष के प्रभाव से महादेव मूर्छित होने लगे, उनहोंने विष को कंठ में रोक लिया किन्तुविष के प्रभाव
से उनका कंठ भी नीला हो गया, जब देवी नें भगवान् को मूर्छित होते देख तो देवी नासिका से भगवान शिव के भीतर चली गयी और विष को अपने दूध से प्रभावहीन कर दिया, किन्तु हलाहल विष से देवी का शरीर नीला पड़गया, तब भगवान शिव नें देवी को महानीला कह कर संबोधित किया, इस प्रकार सृष्टि उत्तपत्ति के बाद पहली बार देवी साकार रूप में प्रकट हुई, दस्माहविद्याओं में देवी तारा कीसाधना पूजा ही सबसे जटिल है, देवी के तीन प्रमुख रूप हैं -
१) उग्रतारा २) एकाजटा और ३) नील सरस्वती
देवी सकल ब्रह्म अर्थात परमेश्वर की शक्ति है, देवी की प्रमुख सात कलाएं हैं जिनसे देवी ब्रहमांड सहित जीवों तथादेवताओं की रक्षा भी करती है ये सात शक्तियां हैं-
१) परा २) परात्परा ३) अतीता ४) चित्परा ५) तत्परा ६)तदतीता ७) सर्वातीता
इन कलाओं सहित देवी का धन करने या स्मरण करने से उपासक को अनेकों विद्याओं का ज्ञान सहज ही प्राप्त होने लगता है, देवी तारा के भक्त के बुद्धिबल का मुकाबला तीनों लोकों मन कोई नहीं कर सकता, भोग और मोक्ष एक साथ देने में समर्थ होने के कारण इनको सिद्धविद्या कहा गया है | देवी तारा ही अनेकों सरस्वतियों की जननी है इस लिए उनको नील सरस्वती कहा जाता हैदेवी का भक्त प्रखरतम बुद्धिमान हो जाता है जिस कारण वो संसार और सृष्टि को समझ जाता है अक्षर के भीतर का ज्ञान ही तारा विद्य| है भवसागर से तारने वाली होने के कारण भी देवी को तारा
कहा जाता हैदेवी बाघम्बर के वस्त्र धारण करती है और नागों का हार एवं कंकन धरे हुये हैदेवी का स्वयं का रंग नीला है और नीले रंग को प्रधान रख कर ही देवी की पूजा होती हैदेवी तारा के तीन रूपों में से किसी भी रूप की साधना बना सकती है समृद्ध, महाबलशाली और ज्ञानवानसृष्टि की उतपाती एवं प्रकाशित शक्ति के रूप में देवी को त्रिलोकी पूजती है ये सारी सृष्टि देवी की कृपा से ही अनेक सूर्यों का प्रकाश प्राप्त कर रही हैशास्त्रों में देवी को ही सवित्राग्नी कहा गया हैदेवी की स्तुति से देवी की कृपा प्राप्त होती है |
स्तुति
प्रत्यालीढ़ पदार्पिताग्ध्रीशवहृद घोराटटहासापरा
खड़गेन्दीवरकर्त्री खर्परभुजा हुंकार बीजोद्भवा,
खर्वानीलविशालपिंगलजटाजूटैकनागैर्युता
जाड्यनन्यस्य कपालिकेत्रिजगताम हन्त्युग्रतारा स्वयं !!
देवी की कृपा से साधक प्राण ज्ञान प्राप्त करने के साथ- साथ भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करता हैगृहस्थ साधक को सदा ही देवी की सौम्य रूप में साधना पूजा करनी चाहिएदेवी अज्ञान रुपी शव पर विराजती हैं और ज्ञान की खडग से अज्ञान रुपी शत्रुओं का नाश करती हैंलाल व नीले फूल और नारियल चौमुखा दीपक चढाने से देवी होतीं हैं प्रसन्नदेवी के भक्त को ज्ञान व बुद्धि विवेक में तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पतादेवी की मूर्ती पर रुद्राक्ष चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती हैमहाविद्या तारा के मन्त्रों से होता है बड़े से बड़े दुखों का नाश | देवी माँ का स्वत: सिद्ध
महामंत्र है
श्री सिद्ध तारा महाविद्या महामंत्र
” ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट ”
इस मंत्र से काम्य प्रयोग भी संपन्न किये जाते हैं जैसे-
1. बिल्व पत्र, भोज पत्र और घी से हवन करने पर लक्ष्मी की
प्राप्ति होती है
2.मधु. शर्करा और खीर से होम करने पर वशीकरण होता है
3.घृत तथा शर्करा युक्त हवन सामग्री से होम करने पर आकर्षण
होता है।
4. काले तिल व खीर से हवन करने पर शत्रुओं का स्तम्भन होता
है।
देवी के तीन प्रमुख रूपों के तीन महा मंत्रमहाअंक-देवी द्वारा उतपन्न गणित का अंक जिसे स्वयं तारा ही कहा जाता है वो देवी का महाअंक है -”1”
विशेष पूजा सामग्रियां-
पूजा में जिन सामग्रियों के प्रयोग से देवी की विशेष कृपा मिलाती
है सफेद या नीला कमल का फूल चढ़ानारुद्राक्ष से बने कानों के कुंडल चढ़ानाअनार के दाने प्रसाद रूप में चढ़ाना सूर्य शंख को देवी पूजा में रखना भोजपत्र पर ह्रीं लिख करा चढ़ानादूर्वा,अक्षत,रक्तचंदन,पंचगव्य,पञ्चमेवा व पंचामृत चढ़ा एंपूजा में उर्द की ड़ाल व लौंग काली मिर्च का चढ़ावे के रूप प्रयोग करें सभी चढ़ावे चढाते हुये देवी का ये मंत्र पढ़ें-
” ॐ क्रोद्धरात्री स्वरूपिन्ये नम: ”
१) देवी तारा मंत्र – ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट
२) देवी एकाजटा मंत्र – ह्रीं त्री हुं फट
३) नील सरस्वती मंत्र – ह्रीं त्री हुं
सभी मन्त्रों के जाप से पहले अक्षोभ्य ऋषि का नाम लेना चाहिए तथा उनका ध्यान करना चाहिए
शत्रुनाश, वाक्-शक्ति की प्राप्ति तथा भोग-मोक्ष की प्राप्ति के लिये तारा अथवा उग्रतारा की साधना की जाती है। रात्रिदेवी की स्वरूपा शक्ति तारा महाविद्याओं में अद्भुत प्रभाववाली और सिद्ध की अधिष्ठाती देवी कहीं गयी है। भगवती ताराके तीन रूप हैं।–तारा, एकजटा और नील सरस्वती। तीनों रूपों के रहस्य, कार्य-कलाप तथा ध्यान परस्पर भिन्न हैं, किन्तु भिन्न भिन्न होते हुए सबकी शक्ति समान और एक है। भगवती ताराकी उपासना मुख्यरूप से तन्त्रोक्त पद्धतियों से होती हैं, जिसे आगमोक्त पद्धति भी कहते हैं। इनकी उपासना से समान्य व्यक्ति भी बृहस्पति के समान विद्वान हो जाते है।
भारतमें सर्वप्रथम महर्षि वसिष्ठ ने ताराकी अराधना की थी। इसलिये ताराको वसिष्ठाराधिता तारा भी कहा जाता है। वसिष्ठ ने पहले भगवती ताराकी आराधना वैदिक रीतिसे करनी प्रारम्भ की, जो सफल न हो सकी। इन्हें अदृश्य शक्ति से संकेत मिला कि वे तान्त्रिक-पद्धतिके द्वारा जिसे ‘चिनाचारा’ कहा जाता है, उपासना करें। जब वसिष्ठ ने तान्त्रिक पद्धति का आश्रय लिया, तब उन्हें सिद्ध प्राप्त हुई। यह कथा ‘आचार’ तन्त्र में वसिष्ट मुनि की आराधना उपाख्या में वर्णित है। इससे यह सिद्ध होता है कि पहले चीन, तिब्बत, लद्दाख आदि में ताराकी उपासना प्रचलित थी।
प्रसिद्ध ‘महिषी’ ग्राम में उग्रतारा का सिद्धपीठ विद्यमान है । कहा जाता है कि महर्षि वसिष्ठ ने यहीं ताराकी उपासना करके सिद्ध प्राप्त की थी। तन्त्रशास्त्रके प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘महाकाल’-संहिता के गुह्य-काली खण्ड में महाविद्याओं की उपासनाका विस्तृत वर्णन हैं, उनके अनुसार ताराका रहस्य अत्यन्त चमत्कारजनक हैं।
तारा : तारा के विषय में निम्नलिखित तंत्र ग्रथ विशेष उल्लेखनीय हैं-
1 तारणीतंत्र; 2. तोडलतंत्र; 3- तारार्णव; 4- नील-तंत्र; 5- महानीलतंत्र; 6- नील सरस्वतीतंत्र; 7- चीलाचार; 8- तंत्ररत्न; 9- ताराशाबर तंत्र; 10- तारासुधा; 11- तारमुक्ति सुधार्णव (नरसिंह ठाकुर कृत); 12- तारकल्पलता; – (श्रीनिवास कृत) ; 13- ताराप्रदीप (लक्ष्मणभट्ट कृत) ; 14- तारासूक्त; 15- एक जटीतंत्र; 16- एकजटीकल्प; 17- महाचीनाचार क्रम (ब्रह्म यामल स्थित) 18- तारारहस्य वृति; 19- तारामुक्ति तरंगिणी (काशीनाथ कृत); 20- तारामुक्ति तरंगिणी (प्रकाशनंद कृत); 21- तारामुक्ति तरंगिणी (विमलानंद कृत); 22- महाग्रतारातंत्र; 23- एकवीरतंत्र; 24- तारणीनिर्णय; 25- ताराकल्पलता पद्धति (नित्यानंद कृत); 26- तारिणीपारिजात (विद्वत् उपाध्याय कृत); 27- तारासहस्स्र नाम (अभेदचिंतामणिनामक टीका सहित); 28- ताराकुलपुरुष; 29- तारोपनिषद्; 30- ताराविलासोदय ) (वासुदेवकृत)।
‘तारारहस्यवृत्ति’ में शंकराचार्य ने कहा है कि वामाचार, दक्षिणाचार तथा सिद्धांताचार में सालोक्यमुक्ति संभव है। परंतु सायुज्य मुक्ति केवल कुलागम से ही प्राप्य है। इसमें और भी लिखा गया है कि तारा ही परा वग्रूपा, पूर्णाहंतामयी है। शक्तिसंगमतंत्र में भी तारा का विषय वर्णित है। रूद्रयामल के अनुसार प्रलय के अनंतर सृष्टि के पहले एक वृहद् अंड का आविर्भाव होता है। उसमें चतुर्भुज विष्णु प्रकट होते हैं जिनकी नाभि में ब्रह्मा ने विष्णु से पूछा- किसी आराधना से चतुभ्र्वेद का ज्ञान होता है। विष्णु ने कहा रूद्र से पूछो- रूद्र ने कहा मेरू के पश्चिम कुल में चोलह्द में वेदमाता नील सरस्वती का आविर्भाव हुआ। इनका निर्गम रूद्र के ऊध्र्व वस्त्र से है। यह तेजरूप से निकलकर चौलह्रद में गिर पड़ीं और नीलवर्ण धारण किया। ह्रद के भीतर अक्षोभ्य ऋषि विद्यमान थे। यह रूद्रयामल की कथा है।

विशेषः- इस प्रकार के मन्त्र उग्र प्रकृति के होते है। स्व-रक्षा व गुरु निर्देशन के अभाव में प्रयुक्त करना हानिकारक है तथा सामाजिक व नैतिक दृष्टि से अनुचित भी। यहाँ पर मात्र प्राचीन विद्या के संरक्षण हेतु प्रस्तुत किये ।

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