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हिमालय से लगते उत्तराखण्ड राज्य के गढवाल मण्डल में तांत्रिक साधना के बारे में जानकारी दे रहा हूं। गढवाल में बहुत पहले से तीन प्रकार की तांत्रिक पद्वतियां प्रचलित हैं। वैदिक काल से ही यहां तंत्र साधना थी। तंत्र सांधना के लिए गढवाल एक उपयुक्त स्थान है क्योंकि यहां फल, फूल, मूल और पानी और तंत्र के लिए अन्य सभी सामग्री आसानी से उपलब्ध हो जाती है। तंत्र साधना पहाड की चोटी में, नदियों के संसगत में, पर्वत की गुफाओं में, घाटियों में और घनघोर जंगलों में होती है। गढवाल में विनसॅर मंदिर, हरियाली देवी का कोठा, क्यूंकालेश्वर महादेव (पौडी), कांडा, ज्वाल्पा, धारी देवी, देवलगढ, श्रीनगर, चंद्रबनी, कालीमठ, मैठाणा, सूर्यप्रयाग, देवप्रयाग आदि स्थान तांत्रिक साधना के लिए उपयुक्त माने गये है। इसके अतिरिक्त पट्टी भरदार में कुष्माडा और कुमासना देवी का सिद्धपीठ भी तांत्रिक साधनों के लिए उचित स्थान है। यमनोत्तरी, गंगोत्तरी, केदारनाथ, बदरीनाथ, तगनाथ, मद्महेश्वर, अनुसूया और कार्तिकेय स्थान भी गढवाल में तंत्र साधको के लिए सिद्धि प्राप्ति हेतु उपयुक्त स्थान माने गये हैं। इन सिद्धपीठों में भावनानुसार साधको को निश्चित रुप से सिद्धि मिली हैं इन साधको ने अपने जीवन में अद्भूत चमत्कार भी किये। इन स्थानों में मनुष्य से पहले देवताओं, दानवों, राक्षसों ने भी साधना की है तभी से गढवाल में तांत्रिक साधना का महत्व शुरु हुआ। यद्यपि गढवाल में तंत्र शास्त्र के षटकर्मी मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तम्भन और शांतिकर्म सभी का प्रयोग, विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के निर्मित किया जाता है लेकिन शांतिकर्म, जिसके अन्तर्गत दैहिक और भौतिक व्याधियों का निराकरण किया जाता है, मुख्य रुप से जनमानस में प्रचलित है। विभिन्न आधिव्याधियों से मुक्त होने की प्रक्रिया को चिकित्सा नाम से जाना जाता है। तंत्र चिकित्सा में प्रयुक्त किये जाने वाले सभी पदार्थ अपने भीतर औषधीय गुणों को समेटे होते हैं। जब किसी निश्चित तिथि, दिन, बार, नक्षत्र आदि पर राशि के अनुसार उचित विधि विधान से इसका उपयोग किया जाता है तब इनसे चमत्कारिक लाभ दृष्टिगोचर होता है।
देवासुर काल में यहां सबसे पहले मधु-कैटभ नामक दो दानवों ने भिलगंना नदी के ऊपर एक ऊॅचे पर्वत पर साधना की थी। आज मधु-कैटभ की यह तप की भूमि भैरा खाल के नाम से बोली जाती है। यह आज आरयों का प्रसिद्ध स्थान माना जाता है। पौडी में क्यूक्वालेश्वर महादेव के र्वत से पहले साहित्य में यह स्थान कौनाश पर्वत कहलाता था। इस जगह यमराज ने भगवान शंकर की आराधाना की थी और मृत्यु का स्वामी बना था। टिहरी गढवाल में कीर्तिनगर के ऊपर ऊॅचे पहाड में महाभारत काल में यहां अर्जुन ने भगवान शंकर की स्तुति कर पाशु-पतास्त्र प्राप्त किया था। अलकनंदा के किनारे भिल्लकेदार नामक स्थान पर अर्जुन और भील के वेश में भगवान शंकर का युद्ध हुआ था। श्रीनगर गढवाल में परशुराम और गुरु वशिष्ठ ने श्रीविद्या की स्तुति की थी। रावण की भी त्रेता युग में यही तपस्या स्थली थी। त्रेता युग में बाली ने हिंदाव पट्टी में तप किया था। महाकवि कालीदास ने अपने काव्य मेघदूत में इस स्थल को चंडीश्वर धाम कहा था।
केदार घाटी में बहुत ऊॅचाई पर काल शिला नामक स्थल पर रावण ने शंक के पैरों के निशान बनाकर आराधना की। कालीमठ में कालीदास ने तांत्रिक साधना की थी। आज भी काला पत्थर पर शिवजी के पैरों के ये निशान दृष्टिगोचर होते हैं। आज भी कालीमठ तांत्रिक साधना का सिद्ध पीठ माना जाता हैं इन सिद्ध पीठों में कई सुप्रसिद्ध साधक हुए। इनमें पंडित रुद्रिदत बहुत प्रसिद्ध साधक हुए। इन्होंने चन्द्रबदनी में तांत्रिक साधना की थी। जनश्रुति के अनुसार जब पंडित जी साधना में लीन थे तो बीच में ही इनकी माला टूट गयी। इन्होंने फिर से उसी धागे में दानों को पिरोया, गांठ लगाई और साधना में लीन हो गए। इन्हें अपने सामने एक बिल्ली घाघरा पहने नाचते दिखाई दी। पंडित जी ने उसके मुख से निकले इन शब्दों को सुना, रुद्रिदत पंडित, माला जपदु, पंडित, बिल्ली का यह गीत सुनकर पंडितजी हंसने लगे और यही हंसी फिर उनके जीवन पर्यत उनके साथ रही। यहीं चन्द्रबदनी की धार में राजगुरु हरिदत्त जोशी ने भी तांत्रिक साधना की थी। उहोंने भुवनेश्वरी रहस्य नामक पुस्तक भी लिखी। श्री हरिदत्त शास्त्री, भारत में कई राज्यों के राजगुरु भी समय-समय पर बने। वह जो बोलते थे, वह सच होता था। चंद्रबदनी की चोटी में ही काशीनाथ नामक तांत्रिक ने कई दिनों तक साधना साधी। वे भी अपने समय के एक चमत्कारी साधक हुए।
चन्द्रबदनी की चोटी के ठीक सामने इन्द्रजीत पर्वत है। वहीं चाकखिंडा नामक गांव में पंडित वासवानंद बलोणी बहुत बडे तांत्रिक हुए। इनके बारे में यह प्रसिद्ध था कि वे रात में यात्रा करते थे और महाकाली इनके साथ चलती थी। चाकखिंडा गांव में आज भी कालिका शिला है जिसे कालिका पठाल कहते हैं। कहते हैं कि वासवानंद के समय में काली इस शिला में बैठती थी।
चन्द्रबदनी की चोटी में दिवाकर भट्ट ने २००७ के शुरुआत माह में घनघोर तप किया जिससे मार्च २००७ में वह उत्तराखण्ड राज्य के काबिना मंत्री बने।
टिहरी के लोस्तु पट्टी के अन्तर्गत एक चुपल्या जोशी नामक तांत्रिक बहुत प्रसिद्ध हुए। वे बडे चमत्कारी व्यक्ति थे। अपने गांव खत्वाड में इन्होंने लोगों को कई बडे चमत्कार दिखाए। इन्होंने तंत्र द्वारा मसाण को भी जागृत कर कई काम करवाए। इनकी मृत्यु भी तांत्रिक साधना में त्रुटि के कारण हुई। टिहरी गढवाल की पट्टी नैलचामी में मुपाल गांव के नौटियाल भाई भी तांत्रिक विद्या में प्रवीण थे। दो भाई इस गांव के बहुत प्रसिद्ध हुए। नैलचामी के साथ ही एक दूसरी पट्टी ढुडकि ढागर है, यहां उनियाल पंडितों में कई तांत्रिक हुए। इनमें हृदयराम उनियाल भी थे। पट्टी लस्या के डयूना गांव में लोग आज भी बहुत बडे तांत्रिक माने जाते हैं। इस गांव को शितला देवी की सिद्धि प्राप्त थी। यहां के लोगों ने कई आश्चर्यजनक कार्य किये। रुद्रप्रयाग के ऊपर स्वीली जवाडी नामक गांव है। यहां बदरु नाम का एक बहुत बडा तांत्रिक हुआ। यह डिमरी जाति का था। गढवाल महाराज को इस पंडित ने कई बार अद्भूत कार्य करके दिखाए। उस समय गढवाल की राजधानी श्रीनगर थी। महाराज ने इसे राजधानी बुलाया। यह वहां नहीं गया। तब राजा ने अपना दूत इसे लेने भेजा। इस तांत्रिक ने अपने तंत्र बल से उसे ग्रसित किया और वह भाग गया। राजा अपनी हार मान गये। यही खत्वाड गांव में भोलाराम जोशी, धरणीधर बहुगुणा आदि कई तांत्रिक हुए।
भरदार पट्टी में भी पं.गजाधर भट्ट बहुत बडे तांत्रिक हुए। इनकी परम्परा के क्वाला गांव में आज भी तांत्रिक हैं। कुछ समय पूर्व पंडित लालकृष्ण भट्ट प्रसिद्ध कवि हुए इन्होंने कुछ किताबे भी लिखी है। इनकी पुस्तक जगदम्बा स्तुति शतक एक प्रसिद्ध पुस्तक है। पौडी के पोखरी गांव में बहुगुणा पंडितों में भी कई प्रसिद्ध तत्रिक हुए हैं। एक जनश्रुति के अनुसार पोखरी गांव में एक जजमान के यहां एक ब्राह्मण के द्वारा अशुद्ध पाठ करने पर उसे बहुत जोर का थप्पड लगा, किन्तु थप्पड मारने वाला कहीं दिखाई नहीं दिया।
इस प्रकार हिमालय से लगते गढवाल और कुमायूं में अभी भी कई तांत्रिक हैं जो अपने तंत्र-मंत्र और यंत्र के जरिए कई चमत्कार दिखाने में समर्थ हैं। पिथौरागढ जनपद के डीडीहाट से आगे कौली क्षेत्र के जोशियों की तांत्रिक शक्ति भी अद्वितीय थी। तंत्र साधना के बल पर बारिश तक करवाने में समर्थ थे।
आवश्यकता है इस खोजपूर्ण सतत प्रयत्नों की। वास्तव में तंत्र एक विद्या है और यदि इसे ठीक ढंग से काम में लाया जाए तो यह एक कामधेनु है। इससे असम्भव काम भी सम्भव हो जाते हैं। आज वैज्ञानिक युग में लोगों का विश्वास इसके ऊपर कम होता जा रहा है किन्तु यह एक पौराणिक विद्या है जो यहां के जन-जीवन के लिए लाभकारी भी है। इसका ह्रास होना ठीक नहीं। आवश्यकता इस विद्या में दक्ष विद्वानों की खोज हो ताकि तांत्रिक विद्या का लाभ जनमानस की भलाई्र के लिए किया जा सके।
उत्तराखण्ड के गढवाल तथा कुमायूं क्षेत्र में तांत्रिक संस्कृति का विशिष्ट महत्व है। यहां कुछ सिद्ध पीठ, नदियों के संगम, विशेष प्रकार के पेड तंत्र साधना के साधन हैं। समय-समय पर कुछ साधको ने इन साधनों का प्रयोग कर तांत्रिक साधना की नींव रखी। तंत्र का अर्थ हम शास्त्र सिद्धांत, अनुष्ठान, विज्ञान आदि से लेते हैं। तंत्र द्वारा सांसारिक और पारलौकिक जीवन में सुख प्राप्त होता है। कभी-कभी हम तंत्र शब्द का अर्थ परित्राण व रक्षा से भी लेते हैं। आचार्य वाचस्पति मिश्र ने तंत्र शब्द की व्याख्या करते हुए कहा है कि तंत्र वह शास्त्र है जिससे भोग और मोक्ष तथा मोक्ष के उपाय बुद्धि में आते हैं। अनेक विद्वानों ने तंत्र का अर्थ लगाया है कि जो विद्या अनेकों अर्थो को लिए हुए है और जो मनुष्यों को अनेक डरों से छुटकारा दिलाती है, उनकी रक्षा करने में समर्थ है, वहीं तंत्र है। विश्व की भलाई की खातिर पार्वती ने जो प्रश्न शिवजी से पूछे और जो उत्तर शिवजी ने दिये थे वे अनेक तंत्रों के रुप में प्रकट हुए। इन दोनों के संवाद रुप से जो विद्या प्रकट हुई, वह तंत्र का भी रुप बनी।

हिमालय से लगते उत्तराखण्ड राज्य के गढवाल मण्डल में तांत्रिक साधना के बारे में जानकारी दे रहा हूं। गढवाल में बहुत पहले से तीन प्रक्ार की तांत्रिक पद्वतियां प्रचलित हैं। वैदिक काल से ही यहां तंत्र साधना थी। तंत्र सांधना के लिए गढवाल एक उपयुक्त स्थान है क्योंकि यहां फल, फूल, मूल और पानी और तंत्र के लिए अन्य सभी सामग्री आसानी से उपलब्ध हो जाती है। तंत्र साधना पहाड की चोटी में, नदियों के संसगत में, पर्वत की गुफाओं में, घाटियों में और घनघोर जंगलों में होती है। गढवाल में विनसॅर मंदिर, हरियाली देवी का कोठा, क्यूंकालेश्वर महादेव (पौडी), कांडा, ज्वाल्पा, धारी देवी, देवलगढ, श्रीनगर, चंद्रबनी, कालीमठ, मैठाणा, सूर्यप्रयाग, देवप्रयाग आदि स्थान तांत्रिक साधना के लिए उपयुक्त माने गये है। इसके अतिरिक्त पट्टी भरदार में कुष्माडा और कुमासना देवी का सिद्धपीठ भी तांत्रिक साधनों के लिए उचित स्थान है। यमनोत्तरी, गंगोत्तरी, केदारनाथ, बदरीनाथ, तगनाथ, मद्महेश्वर, अनुसूया और कार्तिकेय स्थान भी गढवाल में तंत्र साधको के लिए सिद्धि प्राप्ति हेतु उपयुक्त स्थान माने गये हैं। इन सिद्धपीठों में भावनानुसार साधको को निश्चित रुप से सिद्धि मिली हैं इन साधको ने अपने जीवन में अद्भूत चमत्कार भी किये। इन स्थानों में मनुष्य से पहले देवताओं, दानवों, राक्षसों ने भी साधना की है तभी से गढवाल में तांत्रिक साधना का महत्व शुरु हुआ। यद्यपि गढवाल में तंत्र शास्त्र के षटकर्मी मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तम्भन और शांतिकर्म सभी का प्रयोग, विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के निर्मित किया जाता है लेकिन शांतिकर्म, जिसके अन्तर्गत दैहिक और भौतिक व्याधियों का निराकरण किया जाता है, मुख्य रुप से जनमानस में प्रचलित है। विभिन्न आधिव्याधियों से मुक्त होने की प्रक्रिया को चिकित्सा नाम से जाना जाता है। तंत्र चिकित्सा में प्रयुक्त किये जाने वाले सभी पदार्थ अपने भीतर औषधीय गुणों को समेटे होते हैं। जब किसी निश्चित तिथि, दिन, बार, नक्षत्र आदि पर राशि के अनुसार उचित विधि विधान से इसका उपयोग किया जाता है तब इनसे चमत्कारिक लाभ दृष्टिगोचर होता है।
देवासुर काल में यहां सबसे पहले मधु-कैटभ नामक दो दानवों ने भिलगंना नदी के ऊपर एक ऊॅचे पर्वत पर साधना की थी। आज मधु-कैटभ की यह तप की भूमि भैरा खाल के नाम से बोली जाती है। यह आज आरयों का प्रसिद्ध स्थान माना जाता है। पौडी में क्यूक्वालेश्वर महादेव के र्वत से पहले साहित्य में यह स्थान कौनाश पर्वत कहलाता था। इस जगह यमराज ने भगवान शंकर की आराधाना की थी और मृत्यु का स्वामी बना था। टिहरी गढवाल में कीर्तिनगर के ऊपर ऊॅचे पहाड में महाभारत काल में यहां अर्जुन ने भगवान शंकर की स्तुति कर पाशु-पतास्त्र प्राप्त किया था। अलकनंदा के किनारे भिल्लकेदार नामक स्थान पर अर्जुन और भील के वेश में भगवान शंकर का युद्ध हुआ था। श्रीनगर गढवाल में परशुराम और गुरु वशिष्ठ ने श्रीविद्या की स्तुति की थी। रावण की भी त्रेता युग में यही तपस्या स्थली थी। त्रेता युग में बाली ने हिंदाव पट्टी में तप किया था। महाकवि कालीदास ने अपने काव्य मेघदूत में इस स्थल को चंडीश्वर धाम कहा था।
केदार घाटी में बहुत ऊॅचाई पर काल शिला नामक स्थल पर रावण ने शंक के पैरों के निशान बनाकर आराधना की। कालीमठ में कालीदास ने तांत्रिक साधना की थी। आज भी काला पत्थर पर शिवजी के पैरों के ये निशान दृष्टिगोचर होते हैं। आज भी कालीमठ तांत्रिक साधना का सिद्ध पीठ माना जाता हैं इन सिद्ध पीठों में कई सुप्रसिद्ध साधक हुए। इनमें पंडित रुद्रिदत बहुत प्रसिद्ध साधक हुए। इन्होंने चन्द्रबदनी में तांत्रिक साधना की थी। जनश्रुति के अनुसार जब पंडित जी साधना में लीन थे तो बीच में ही इनकी माला टूट गयी। इन्होंने फिर से उसी धागे में दानों को पिरोया, गांठ लगाई और साधना में लीन हो गए। इन्हें अपने सामने एक बिल्ली घाघरा पहने नाचते दिखाई दी। पंडित जी ने उसके मुख से निकले इन शब्दों को सुना, रुद्रिदत पंडित, माला जपदु, पंडित, बिल्ली का यह गीत सुनकर पंडितजी हंसने लगे और यही हंसी फिर उनके जीवन पर्यत उनके साथ रही। यहीं चन्द्रबदनी की धार में राजगुरु हरिदत्त जोशी ने भी तांत्रिक साधना की थी। उहोंने भुवनेश्वरी रहस्य नामक पुस्तक भी लिखी। श्री हरिदत्त शास्त्री, भारत में कई राज्यों के राजगुरु भी समय-समय पर बने। वह जो बोलते थे, वह सच होता था। चंद्रबदनी की चोटी में ही काशीनाथ नामक तांत्रिक ने कई दिनों तक साधना साधी। वे भी अपने समय के एक चमत्कारी साधक हुए।
चन्द्रबदनी की चोटी के ठीक सामने इन्द्रजीत पर्वत है। वहीं चाकखिंडा नामक गांव में पंडित वासवानंद बलोणी बहुत बडे तांत्रिक हुए। इनके बारे में यह प्रसिद्ध था कि वे रात में यात्रा करते थे और महाकाली इनके साथ चलती थी। चाकखिंडा गांव में आज भी कालिका शिला है जिसे कालिका पठाल कहते हैं। कहते हैं कि वासवानंद के समय में काली इस शिला में बैठती थी।
चन्द्रबदनी की चोटी में दिवाकर भट्ट ने २००७ के शुरुआत माह में घनघोर तप किया जिससे मार्च २००७ में वह उत्तराखण्ड राज्य के काबिना मंत्री बने।
टिहरी के लोस्तु पट्टी के अन्तर्गत एक चुपल्या जोशी नामक तांत्रिक बहुत प्रसिद्ध हुए। वे बडे चमत्कारी व्यक्ति थे। अपने गांव खत्वाड में इन्होंने लोगों को कई बडे चमत्कार दिखाए। इन्होंने तंत्र द्वारा मसाण को भी जागृत कर कई काम करवाए। इनकी मृत्यु भी तांत्रिक साधना में त्रुटि के कारण हुई। टिहरी गढवाल की पट्टी नैलचामी में मुपाल गांव के नौटियाल भाई भी तांत्रिक विद्या में प्रवीण थे। दो भाई इस गांव के बहुत प्रसिद्ध हुए। नैलचामी के साथ ही एक दूसरी पट्टी ढुडकि ढागर है, यहां उनियाल पंडितों में कई तांत्रिक हुए। इनमें हृदयराम उनियाल भी थे। पट्टी लस्या के डयूना गांव में लोग आज भी बहुत बडे तांत्रिक माने जाते हैं। इस गांव को शितला देवी की सिद्धि प्राप्त थी। यहां के लोगों ने कई आश्चर्यजनक कार्य किये। रुद्रप्रयाग के ऊपर स्वीली जवाडी नामक गांव है। यहां बदरु नाम का एक बहुत बडा तांत्रिक हुआ। यह डिमरी जाति का था। गढवाल महाराज को इस पंडित ने कई बार अद्भूत कार्य करके दिखाए। उस समय गढवाल की राजधानी श्रीनगर थी। महाराज ने इसे राजधानी बुलाया। यह वहां नहीं गया। तब राजा ने अपना दूत इसे लेने भेजा। इस तांत्रिक ने अपने तंत्र बल से उसे ग्रसित किया और वह भाग गया। राजा अपनी हार मान गये। यही खत्वाड गांव में भोलाराम जोशी, धरणीधर बहुगुणा आदि कई तांत्रिक हुए।
भरदार पट्टी में भी पं.गजाधर भट्ट बहुत बडे तांत्रिक हुए। इनकी परम्परा के क्वाला गांव में आज भी तांत्रिक हैं। कुछ समय पूर्व पंडित लालकृष्ण भट्ट प्रसिद्ध कवि हुए इन्होंने कुछ किताबे भी लिखी है। इनकी पुस्तक जगदम्बा स्तुति शतक एक प्रसिद्ध पुस्तक है। पौडी के पोखरी गांव में बहुगुणा पंडितों में भी कई प्रसिद्ध तत्रिक हुए हैं। एक जनश्रुति के अनुसार पोखरी गांव में एक जजमान के यहां एक ब्राह्मण के द्वारा अशुद्ध पाठ करने पर उसे बहुत जोर का थप्पड लगा, किन्तु थप्पड मारने वाला कहीं दिखाई नहीं दिया।
इस प्रकार हिमालय से लगते गढवाल और कुमायूं में अभी भी कई तांत्रिक हैं जो अपने तंत्र-मंत्र और यंत्र के जरिए कई चमत्कार दिखाने में समर्थ हैं। पिथौरागढ जनपद के डीडीहाट से आगे कौली क्षेत्र के जोशियों की तांत्रिक शक्ति भी अद्वितीय थी। तंत्र साधना के बल पर बारिश तक करवाने में समर्थ थे।
आवश्यकता है इस खोजपूर्ण सतत प्रयत्नों की। वास्तव में तंत्र एक विद्या है और यदि इसे ठीक ढंग से काम में लाया जाए तो यह एक कामधेनु है। इससे असम्भव काम भी सम्भव हो जाते हैं। आज वैज्ञानिक युग में लोगों का विश्वास इसके ऊपर कम होता जा रहा है किन्तु यह एक पौराणिक विद्या है जो यहां के जन-जीवन के लिए लाभकारी भी है। इसका ह्रास होना ठीक नहीं। आवश्यकता इस विद्या में दक्ष विद्वानों की खोज हो ताकि तांत्रिक विद्या का लाभ जनमानस की भलाई्र के लिए किया जा सके।
उत्तराखण्ड के गढवाल तथा कुमायूं क्षेत्र में तांत्रिक संस्कृति का विशिष्ट महत्व है। यहां कुछ सिद्ध पीठ, नदियों के संगम, विशेष प्रकार के पेड तंत्र साधना के साधन हैं। समय-समय पर कुछ साधको ने इन साधनों का प्रयोग कर तांत्रिक साधना की नींव रखी। तंत्र का अर्थ हम शास्त्र सिद्धांत, अनुष्ठान, विज्ञान आदि से लेते हैं। तंत्र द्वारा सांसारिक और पारलौकिक जीवन में सुख प्राप्त होता है। कभी-कभी हम तंत्र शब्द का अर्थ परित्राण व रक्षा से भी लेते हैं। आचार्य वाचस्पति मिश्र ने तंत्र शब्द की व्याख्या करते हुए कहा है कि तंत्र वह शास्त्र है जिससे भोग और मोक्ष तथा मोक्ष के उपाय बुद्धि में आते हैं। अनेक विद्वानों ने तंत्र का अर्थ लगाया है कि जो विद्या अनेकों अर्थो को लिए हुए है और जो मनुष्यों को अनेक डरों से छुटकारा दिलाती है, उनकी रक्षा करने में समर्थ है, वहीं तंत्र है। विश्व की भलाई की खातिर पार्वती ने जो प्रश्न शिवजी से पूछे और जो उत्तर शिवजी ने दिये थे वे अनेक तंत्रों के रुप में प्रकट हुए। इन दोनों के संवाद रुप से जो विद्या प्रकट हुई, वह तंत्र का भी रुप बनी।….

2….गढ़वाल कुमाऊँ के नाथपंथी देवता
भीष्म कुकरेती
गढ़वाल व कुमाओं में छटी सदी से नाथपंथी अथवा गोरखपंथी प्रचारकों का आना शुरू हुआ और बारवीं सदी तक इस पंथ
का पूरे समाज में एक तरह से राज रहा इसे सिद्ध युग भी कहते हैं
कुमाओं व गढ़वाल और नेपाल में निम्न नाथपंथी देवताओं की पूजा होती है और उन्हें जागरों नचाया भी जाता है
१- नाद्वुद भैरव : नाद का अर्थ है पहली आवाज और नाद वुद माने जो नाद का जानकार है जो नाद के बारे में बोलता है . अधिकतर जागरों में नाद्वुद भैरव को जागरों व अन्य मात्रिक तांत्रिक क्रियाओं में पहले स्मरण किया जाता है , नाद्वुद भगवान शिव ही हैं
पैलो का प्रहर तो सुमरो बाबा श्री नाद्वुद भैराऊं…. राम्छ्ली नाद बजा दो ल्याऊ. सामी बज्र दो आऊ व्भुती पैरन्तो आऊ . पाट की मेखळी पैरंतो आऊ . ब्ग्मरी टोपी पैरन्तो आऊ . फ्तिका मुंद्रा पैरंतो आऊ …
२- भैरव : भैरव शिव अवतार हैं. भैरव का एक अर्थ है भय से असीम सुख प्राप्त करना . गाँव के प्रवेश द्वार पर भैरव मुरती स्थापित होती है भैरव भी नचाये जाते हैं
एक हाथ धरीं च बाबा तेरी छुणक्याळी लाठी
एक हाथ धरीं च बाबा तेरी तेज्मली को सोंटा
एक हाथ धरीं च बाबा तेरी रावणी चिंता
कन लगायो बाबा तिन आली पराली को आसन
…..
३- नरसिंह : यद्यपि नरसिंघ विश्णु अवतार है किन्तु गढवाल कुमाओं में नरसिंह नाथपंथी देवता है और कथा संस्कृत आख्यानो से थोड़ा भिन्न है . कुमाऊं – गढवाल में नरसिंह गुरु गोरखनाथ के चेले /शिष्य के रूप में नचाये जाते है जो बड़े बीर थे नरसिंह नौ है -
इंगले बीर नरसिंघ, पिंगला बीर नरसिंह, जाती वीर नरसिंघ , थाती बीर नरसिंघ, गोर वीर नरसिंह, अघोर्बीर नरसिंघ, चंद्बीर नरसिंघ, प्रचंड बीर नरसिंघ, दुधिया नरसिंघ, डोडिया नरसिंह , नरसिंघ के हिसाब से ही जागरी जागर लगा कर अलग अलग नर्सिंगहो का आवाहन करते है
जाग जाग नरसिंह बीर जाग , फ़टीगु की तेरी मुद्रा जाग
रूपा को तेरा सोंटा जाग ख्रुवा की तेरी झोली जाग
………….
४- मैमंदा बीर : मैम्न्दा बीर भी नाथपंथी देवता है मैमंदा बीर मुसलमानी-हिन्दू संस्कृति मिलन मेल का रूप है मैम्न्दा को भी भैरव माना जाता है
मैम्न्दा बीरून वीर पीरून पीर तोड़ी ल्यासमी इस पिण्डा को बाण कु क्वट भूत प्रेत का शीर
५- गोरिल : गोरिल कुमौं व गढ़वाल का प्रसिद्ध देवता हैं गोरिल के कई नाम हैं – गोरिल, गोरिया , गोल, ग्विल्ल , गोल , गुल्ली . गोरुल देवता न्याय के प्रतीक हैं .ग्विल्ल की पूजा मंदिर में भी होती है और घड़े ल़ा लगा कर भी की जाती है
ॐ नमो कलुवा गोरिल दोनों भाई……
ओ गोरिया कहाँ तेरी ठाट पावार तेरी ज़ात
चम्पावत तेरी थात पावार तेरी ज़ात
६- कलुवा वीर ; कलुवा बीर गोरुल के भाई है और बीर हैं व घड़ेल़ा- जागरों में नचाये जाते हैं
क्या क्या कलुवा तेरी बाण , तेरी ल़ाण …. अजी कोट कामळी बिछ्वाती हूँ …..
७- खेतरपाल : माता महाकाली के पुत्र खेतरपाल (क्षेत्रपाल ) को भी नचाया जाता है
देव खितरपाल घडी -घडी का बिघ्न टाळ
माता महाकाली की जाया , चंड भैरों खितरपाल
प्रचंड भैरों खितरपाल , काल भैरों खितरपाल
माता महाकाली को जायो , बुढा महारुद्र को जायो
तुम्हारो द्यां जागो तुम्हारो ध्यान जागो
८- हरपाल सिद्ध बाबा भी कलुवा देवता के साथ पूजे जाते हैं नचाये जाते है
न्गेलो यद्यपि क्ष व कोल समय के देवता है किन्तु इनकी पूजा भी या पूजा के शब्द सर्वथा नाथपंथी हैं यथा
न्गेलो की पूजा में
उम्न्मो गुरु का आदेस प्रथम सुमिरों नाद भैरों …..
निरंकार ; निरंकार भी खश व कोली युद के देवता हैं किन्तु पुजाई नाथपंथी हिसाब से होती है और शब्द भी नाथपंथी हैं..

3…..सुरकंडा देवी का जागर
जै जगदम्बा भाख बाणी
सर्वाणि चंडिका माई
आदि संसार की माया
यो पिंड तैने उपाया
महा लक्ष्य महा नारायणी
जै जगदम्बे तेरो ध्यान जागो
कनि रैंदी माता उंचा सुरकंडा
उंचा सरकंडा माता रौन्सालू को छैल
उंचा सरकंडा का नीत माता कुंजापुरी
कनि भेंटदी माता बारा बैणि
रागसून नेग करी रागसून
मद पीक माता ह्वेगे विकराळ
तब मारे त्वेन रागस
मारिक त्वेन धड पौन्चाये नेपाल
मुंड पौन्चाये सुरकंडा
जय जगदम्बा संघारणी देवी
सब की चंडिका माई
आदि संसार की हे आदि माया
यो पिंड तीन उपजायो
हे महालक्ष्मी हे महानारायणी
हे जगदम्बे तेरो ध्यान जागे
मा तू उच्चो सुरकंडा मा रौंदी
उच्चू सुरकंडा मा जख रौन्सालू को छैलू
उख सबि बैणी मिलणो भींट्याणो आन्दन
जब रागसून करी उत्पात
तब तू ह्व़े मद पीके विकराळ
तीन एक एक मारी धड पौन्चाये नेपाल
अर मुंड पौन्चाये सुरकंडा….

4….हंत्या जागर ( कलेरा या रान्सो)
यह जागर एक स्त्री आत्मा के निमित जागर है जो घरभूत पुजाई के वक्त घड़ेल़ा में जागरी सुनाता है इसे सुनकर व पश्वा के करुणा जनक नृत्य से दर्शक रोने लगते हैं
तेरी छोडि च बोई चाखुड सि टीली
तेरी होली बोई जसी माता को पराणि
होला बोई पराणि जसी पाफड़ सी पाणी
कनो रई होली बोई तेरो उबाण रीट दो
कनो रई होलो बोई तेरी उकाळ छौम्पदो
जसी होली बोई तेरी द्युराणी जिठाणी
तीन बोली होलू ब्व़े मी हर्ष देखुलो
कै कालन डाळी होलो ब्व़े जोड़ी मा बिछोड
यखिम बैठ्युं च ब्व़े तेरा सिर कु छतर
देखी भाळी जान्दु अपणी इ भैरो भीतरी
देखी जा दों ब्व़े ईं रौन्त्याळी गँवाडि
निम्न कलेरे में एक युवक की ह्न्त्या नचाई जा रही है और इस गाने में जागर में करुण रस देखिये:
कनि छे भुला तेरी वा हौन्सिया उमर
कनि छो चुचा तू जै को पियारो
देख बैठ्याँ यखी म तेरा गोती सोरा
दूदा ब्व़े हुयीं चा या तेरी निपूती मयेड
कनि छे भुला तेरी वा जोड़ी सौंजडि
उना मयाल़ा सुभाऊ का रै यकुला रै तू
मर्दि बगत भुला त्वेन पाणी बि नि पियो
बिदेसू जगा होई तू भुचेणि नी पायो
कख गै ह्वेलो भुला तू तैं मयेडि ऐसे की
डारी मा की छुटी च त्य्री भग्यान ब्वारी
मौत सबकू औंद आग सबकू जगौन्द
तिन कायर नि होणु सागर कु पाणी समंद…

5….नरसिंग जागर : नाथपंथी मन्त्र
आम तौर पर नरसिंग भगवान को विश्णु अवतार माना जाता है किन्तु कुमाऊं व गढ़वाल में नर्सिंग भगवान गुरु गोरखनाथ के चेले के रूप में ही पूजे जाते हैं . नर्सिंगावली मन्त्रों के रूप में भी प्रयोग होता है और घड़ेलों में जागर के रूप में भी प्रयोग होता है. इस लेखक ने एक नरसिंग घडला में लालमणि उनियाल , खंडूरीयों का जिक्र भी सूना था
नरसिंग नौ हैं : इंगला वीर, पिंगला बीर , जतीबीर, थतीबीर, घोरबीर, अघोरबीर, चंड बीर , प्रचंड बीर , दुधिया व डौंडिया नरसिंग
आमतौर पर दुधिया नरसिंग व डौंडिया नरसिंग के जागर लगते हैं . दुधिया नरसिंग शांत नरसिंघ माने जाते है जिनकी पूजा रोट काटने से पूरी हो जाती है जब कि डौंडिया नरसिंग घोर बीर माने जाते हैं व इनकी पूजा में भेड़ बकरी का बलिदान की प्रथा भी है
निम्न जागर बर्दी केदार मन्दिर स्थापना के बाद का जागर लगता है क्योंकि इसमें डिमरी रसोईया (सर्युल ) व रावल का वर्णन भी है
जाग जाग नरसिंग बीर बाबा
रूपा को तेरा सोंटा जाग , फटिन्गु को तेरा मुद्रा जाग .
डिमरी रसोया जाग , केदारी रौल जाग
नेपाली तेरी चिमटा जाग , खरुवा की तेरी झोली जाग
तामा की पतरी जाग , सतमुख तेरो शंख जाग
नौलड्या चाबुक जाग , उर्दमुख्या तेरी नाद जाग
गुरु गोरखनाथ का चेला जाग
पिता भस्मासुर माता महाकाली जाग
लोह खम्भ जाग रतो होई जाई बीर बाबा नरसिंग
बीर तुम खेला हिंडोला बीर उच्चा कविलासू
हे बाबा तुम मारा झकोरा , अब औंद भुवन मा
हे बीर तीन लोक प्रिथी सातों समुंदर मा बाबा
हिंडोलो घुमद घुमद चढे बैकुंठ सभाई , इंद्र सभाई
तब देवता जागदा ह्वेगें , लौन्दन फूल किन्नरी
शिवजी की सभाई , पेंदन भांग कटोरी
सुलपा को रौण पेंदन राठवळी भंग
तब लगया भांग को झकोरा
तब जांद बाबा कविलास गुफा
जांद तब गोरख सभाई , बैकुंठ सभाई
अबोध्बंधू बहुगुणा ने ‘धुंयाळ” में जोशीमठ के रक्षक दुध्या बाबा का जागर इस प्रकार डिया
गुरु खेकदास बिन्नौली कला कल्पण्या
अजै पीठा गजै सोरंग दे सारंग दे
राजा बगिया ताम पातर को जाग
न्यूस को भैरिया बेल्मु भैसिया
कूटणि को छोकरा गुरु दैणि ह्व़े जै रे
ऊंची लखनपुरी मा जै गुरुन बाटो बतायो
आज वे गुरु की जुहार लगान्दु
जै दुध्या गुरून चुडैल़ो आड़बंद पैरे
ओ गुरु होलो जोशीमठ को रक्छ्यापाल
जिया व्बेन घार का बोठ्या पूजा
गाड का ग्न्ग्लोड़ा पूज्या
तौ भी तू जाती नि आयो मेरा गुरु रे
गुरून जैकार लगाये , बिछुवा सणि नाम गहराए
क्विल कटोरा हंसली घोड़ा बेताल्मुखी चुर्र
आज गुरु जाती को ऐ जाणि रे
डा शिवानन्द नौटियाल ने एक जागर की चर्चा भी की
जै नौ नरसिंग बीर छयासी भैरव
हरकी पैड़ी तू जाग
केदारी तू गुन्फो मा जाग
डौंडी तू गढ़ मा जाग
खैरा तू गढ़ मा जाग
निसासु भावरू जाग
सागरु का तू बीच जाग
खरवा का तू तेरी झोली जाग
नौलडिया तेरी चाबुक जाग
टेमुरु कु तेरो सोंटा जाग
बाग्म्बरी का तेरा आसण जाग
माता का तेरी पाथी जाग
संखना की तेरी ध्वनि जाग
गुरु गोरखनाथ का चेला पिता भस्मासुर माता महाकाली का जाया
एक त फूल पड़ी केदारी गुम्फा मा
तख त पैदा ह्वेगी बीर केदारी नरसिंग
एक त फूल पड़ी खैरा गढ़ मा
तख त पैदा ह्वेगी बीर डौंडि
एक त फूल पोड़ी वीर तों सागरु मा
तख त पैदा ह्वेगी सागरया नरसिंग
एक त फूल पड़ी बीर तों भाबरू मा
तख त पैदा ह्वेगी बीर भाबर्या नारसिंग
एक त फूल पड़ी बीर गायों का गोठ , भैस्यों क खरक
तख त पैदा ह्वेगी दुधिया नरसिंग
एक त फूल पड़ी वीर शिब्जी क जटा मा
तख त पैदा ह्वेगी जटाधारी नरसिंग
हे बीर आदेसु आदेसु बीर तेरी नौल्ड्या चाबुक
बीर आदेसु आदेसु बीर तेरो तेमरू का सोंटा
बीर आदेसु आदेसु बीर तेरा खरवा की झोली
वीर आदेसु आदेसु बीर तेरु नेपाली चिमटा
वीर आदेसु आदेसु बीर तेरु बांगम्बरी आसण
वीर आदेसु आदेसु बीर तेरी भांगला की कटोरी
वीर आदेसु आदेसु बीर तेरी संखन की छूक
वीर रुंड मुंड जोग्यों की बीर रुंड मुंड सभा
वीर रुंड मुंड जोग्यों बीर अखाड़ो लगेली
वीर रुंड मुंड जोग्युंक धुनी रमैला
कन चलैन बीर हरिद्वार नहेण
कना जान्दन वीर तैं कुम्भ नहेण
नौ सोंऊ जोग्यों चल्या सोल सोंऊ बैरागी
वीर एक एक जोगी की नौ नौ जोगणि
नौ सोंऊ जोगयाऊं बोडा पैलि कुम्भ हमन नयेण
कनि पड़ी जोग्यों मा बनसेढु की मार
बनसेढु की मार ह्वेगी हर की पैड़ी माग
बीर आदेसु आदेसु बीर आदेसु बीर आदेसु
पारबती बोल्दी हे मादेव , और का वास्ता तू चेला करदी
मेरा भंग्लू घोटदू फांफ्दा फटन , बाबा कल्लोर कोट कल्लोर का बीज
मामी पारबती लाई कल्लोर का बीज , कालोर का बीज तैं धरती बुति याले
एक औंसी बूते दूसरी औंसी को चोप्ती ह्व़े गे बाबा
सोनपंखी ब्रज मुंडी गरुड़ी टों करी पंखुरी का छोप
कल्लोर बाबा डाली झुल्मुल्या ह्वेगी तै डाली पर अब ह्वेगे बाबा नौरंग का फूल
नौरंग फूल नामन बास चले गे देवता को लोक
पंचनाम देवतों न भेजी गुरु गोरखनाथ , देख दों बाबा ऐगे कुसुम की क्यारी
फूल क्यारी ऐगे अब गुरु गोरखनाथ
गुरु गोरखनाथ न तैं कल्लोर डाली पर फावड़ी मार
नौरंग फूल से ह्वेन नौ नरसिंग निगुरा , निठुरा सद्गुरु का चेला
मंत्र को मारी चलदा सद्गुरु का चेला
पंडित गोकुल्देव बहुगुणा से प्राप्त नर्सिंगाव्ली पांडुलिपि का उल्लेख करते हुए डा विश्णु दत्त कुकरेती ने यह मंत्र उल्लेख किया है
ॐ नमो गुरु को आदेस … प्रथमे को अंड अंड उपजे धरती , धरती उपजे नवखंड , नवखंड उपजे धूमी, धूमी उपजे भूमि, भूमि उपजे डाली , डाली उपजे काष्ठ , काष्ठ उपजे अग्नि , अग्नि उपजे धुंवां , धुंवां उपजे बादल , बादल उपजे मेघ , मेघ पड़े धरती , धरती चले जल , जल उपजे थल , थल उपजे आमी , आमी उपजे चामी , चामी उपजे चावन छेदा बावन बीर उपजे म्हाग्नी , महादेव न निलाट चढाई अंग भष्म धूलि का पूत बीर नरसिंग…

6….अन्छेरी या मतारियों के जागर : अतृप्त अप्सराओं की आत्मा शांति हेतु जागर
तुम रैंदा ल़े तै दागुडिया गाँव , दिसई दागुडियो
तुम होली रौतों की बियाण , दिसई दागुडियो
चला बैणी मारछा काटण दिसई दागुडियो
चला बैणी मारछा कूटण दिसई दागुडियो
चला बैणी द्यू ह्वेगे उराड़ो, दिसई दागुडियो
तख़ ऐगे हुणिया को रथ दिसई दागुडियो
तुम पडीग्याँ हुणिया का रथ दिसई दागुडियो
सात बैणि एक छ भाई भड़ दिसई दागुडियो
चला बैणी बाटा का उडयारो दिसई दागुडियो
बाटा का उड्यारी टपकण्या पाणी दिसई दागुडियो
चला दागुडि बुरांसी का द्यूळ दिसई दागुडियो
तुम ह्वेगी पर्दा का धनी दिसई दागुडियो
चला बैणी सैणि खरसाली दिसई दागुडियो
कमर बांदी ऐड़ू की पुंगडि दिसई दागुडियो
चला बैणी तै उन्द गंगाड दिसई दागुडियो
तख़ हूंद जीरी बासमती दिसई दागुडियो
चला बैणी सैणि बड़ागडी दिसई दागुडियो
तख दीन्दा मऊ का बुखाणा दिसई दागुडियो
तख़ देंदा डब्लू का गौणु दिसई दागुडियो
तख़ देंदा पगड़ी का खाजा दिसई दागुडियो
तख़ देंदा छुणक्याळी दाथुड़ी दिसई दागुडियो
चला बैणि तै पावा वारसू दिसई दागुडियो
चला बैणी उच्चा रैथल दिसई दागुडियो
तख़ देंदा पोस्तु का छुम्मा दिसई दागुडियो
चला बैणी तै दागुडू गाँव दिसई दागुडियो
चला बैणी घर कै जौंला दिसई दागुडियो
तुम ह्वेग्याँ डांड़यूँ का आंछरी दिसई दागुडियो
सुवा पंखो त्वेकू मी साड़ी द्युलू
त्वे सणि लाड़ी मै गैणा द्यूंल़ू
नारंगी मै त्वेकू चोली द्युलू
सतरंगी त्योकू मि दुशाला द्योलू
सतनाजा त्योकू मि डीजी द्योलू
औंल़ा सरीको त्वे डोला द्योलू
सांकरी त्वेकू मि समूण द्योलू
झिलमिल आइना त्वे कांगी द्योलू
न्यूती की लाडली त्योकू बुलौलू
पूजिक त्वे साड़ी घर पठौल़ू…..

7…..आशीर्वचन जागर
यूँको राज राखी देवता
यूँका माथा भाग दे देवता
यूँका बेटा -बेटी राज रखी देवता
यूँका कुल की जोत जगै देवता
यूँका खजाना जस दे देवता
यूँका डंड़याळी भरीं रै देवता
यूँका साग सगवाड़ी रोज रै देवता
नाज का कुठार दे देवता
धन का भण्डार दे देवता…

8….साम्पू नृत्य गीत : नगेलो देवता को समर्पित नृत्य गीत
द्यूळ नागेलो नाचलो बल द्यूळ नागेलो
पिटासीणि का धोरा, बल नाचलो द्यूळ नागेलो नाचलो
लस्या थाती का बिच , बल नाचलो द्यूळ नागेलो नाचलो
भौकारों का रुणाट , बल नाचलो द्यूळ नागेलो नाचलो
पायाल़ा ल़ेण नाचलो , बल नाचलो द्यूळ नागेलो नाचलो
ढोलूं का दौर नाचलो, बल नाचलो द्यूळ नागेलो नाचलो
लून्गालों का पैल नाचलो , बल नाचलो द्यूळ नागेलो नाचलो
साठी फसल काटण नाचलो , बल नाचलो द्यूळ नागेलो नाचलो
भैन्स्यों का बैराट बल देखलो , नाचलो द्यूळ नागेलो नाचलो
पअयाग बल नाचलो द्यूळ नागेलो नाचलो जाणो नाचलो ,
स्युंरता की रात नाचलो , बल नाचलो द्यूळ नागेलो नाचलो
बजरा की थाती नाचलो, बल नाचलो द्यूळ नागेलो नाचलो
औतुं पुतर देलू, बल नाचलो द्यूळ नागेलो नाचलो ……….

9….नगेलो जागर : यश व धन धान्य प्राप्ति का मन्त्र जागर नेगेलो का जागर
द्यूल नगेलो आयो जसीलो दिबता
द्यूल नगेलो आयो जसीलो भक्तों देंद जस
द्यूल नगेलो आयो मुलक लगे भेऊँ
द्यूल नगेलो आयो रमोली की थाती
द्यूल नगेलो आयो बजिरा की गादी
द्यूल नगेलो आयो तै मोतू का सिर
द्यूल नगेलो आयो चै मैना का बालक
द्यूल नगेलो आयो भौंकरूं का रुणाट
द्यूल नगेलो आयो घांडियों का घमणाट
द्यूल नगेलो आयो पर्चो बतौन्द
द्यूल नगेलो आयो जो बणोन्द चौंळ
द्यूल नगेलो आयो हरियाली जमौन्द
द्यूल नगेलो आयो लैंदी देंदी दूध
द्यूल नगेलो आयो मनखी देंद दूध
द्यूल नगेलो आयो औता देंद पूत
द्यूल नगेलो आयो क्वांरा देंद ब्यौउ…………

10….निरंकार जागर : ब्राह्मणवाद के विरुद्ध एक धार्मिक गीत
ओंकार सतगुरु प्रसाद ,
प्रथमे ओंकार , ओंकार से फोंकार
फोंकार से वायु , वायु से विषन्दरी
विषन्दरी से पाणी , पाणी से कमल,
कमल से ब्रह्मा पैदा ह्वेगे
गुसैं को सब देव ध्यान लेगे
जल का सागरु मा तब गुसैं जीन सृस्ठी रच्याले
तब देंदा गुसैं जी ब्रम्हा का पास
चार वेद , चौद शास्तर , अठार पुराण
चौबीस गायत्री
सुबेर पध्द ब्रह्मा स्याम भूलि जांद
अठासी हजार वर्स तक ब्रह्मा
नाभि कमल मा रैक वेद पढ़दो
तब चार वेद , अठार पुराण चौबीस गायत्री
वे ब्रह्मज्ञानी तैं गर्व बढ़ी गे
वेद शाश्त्रों धनी ह्वेई गयों
मेरा अग्वाड़ी कैन हूण?
मि छऊँ ब्रह्मा श्रिश्थी का धनी
तब चले ब्रह्मा गरुड़ का रास्ता
पंचनाम देवतौं की गरुड़ मा सभा लगीं होली
बुढा केदार की जगा बीरीं होली
सबकू न्यूतो दियो वैन गुसैं नी न्यूतो
वे जोगी को हमन जम्मा नी न्यूतण
स्यो त डोमाण खैक आन्द , स्यो त कनो जोगी होलो
तब पुछ्दो ब्रह्मा – को होलू भगत
नारद करदो छयो गंगा मै की सेवा
पैलो भगत होलू कबीर , कमाल तब कु भगत होलू
तब को भगत होलू रैदास चमार
बार बर्स की धूनी वैकी पूरी ह्व़े गे
तब पैटदू ब्रह्मा गंगा माई क पास
तुम जाणा छ्न्वां ब्रह्मा , गंगा मै का दर्शन
मेरी भेंट भी लिजावा , माई को दीण
एक पैसा दिन्यो वैन ब्रह्मा का पास
तब झिझडांद ब्रह्मा यो रैदास चमार
क्न्कैकू लीजौलू ये की भेंट
तब बोल्दो रैदास भगत —
मेरी भेंट को ब्रह्मा , गंगा माई हाथ पसारली
मेरी भेंट कु ब्रह्मा , गंगा माई बाच गाडलो
चली गये ब्रह्मा तब गंगा माई का पास
नहाए धोये ब्रह्मा छाला खड़ो ह्व़े गये
घाघु मारे वेन गंगा न बाच नी गाडी
तब उदास ह्व़ेगे ब्रह्मा घर बौडिक आये
रैदास की भेंट वू भूलि गए
अध्बाट आये ब्रह्मा , आंखी फूटी गेन
गंगा माई जथें दिखे आँखी खुली जैन
तब याद आये ब्रह्मा रैदास की भेंट
बौडी तब वो गंगा माई को छाला
रैदास की भेंट छ दीनी या माई
रैदास को नाम सुणीक तब
गंगा माई न बाच दियाले
रैदास होलू म्यारो पियारो भगत
एक शोभनी कंकण गंगा माई न गाड्यो
ब्रह्मा मेरी या समूण तू रैदास देई
ब्रह्मा का मन कपट ऐगे लोभ बसी गे
यो शोभनी कंकण होलू मेरी नौनि जुगत
तब रैदास का घर का बाटा
ब्रह्मा लौटिक नी औंदो
पर जै भी बाटा जांद रैदास खड़ो ह्व़े जांद
ब्रह्मा गंगा माई की मैं समूण दी होली
त्वेकू बोल्युं रैदास –
ब्याखुनी दां मैं तेरा घर औण
सुणदो रैदास तब प्रफुल्ल ह्वेगे
सुबेरी बिटे गौंत छिड़कदो
घसदो छ भीतरी लीप्दो छ पाळी
आज मेरा डेरा गंगा माई न आण
वैकु चेला होलू जल कुंडीहीत
जादू मेरा हीत बद्री का बाड़ा केदार का कोण्या
ल़ी आओ मैकू अखंड बभूत
देवतों न सुणे रैदास की बात
जोगी हीत तब पिंजरा बंद करयाले
इन होलो सत जत को पूरो
जोगी चाखुली बणी उडी जान्दो ……….

11….समैणा विध्यान –1
श्री गणेशाय नम: श्री गुरु चरण कमलेभ्ये नम : ॐ नमो गुरु को आदेस गुरु को जुवार विद्वामाता कु नमस्कार . अथा सुमैण विधयाँण लिखिते . ॐ नमो निलम द्यौ सुकिली सभा बोल्दी कालीझालीमाली देवी . गोरिखाडा खेत्रपाल बेतालमुखी छुरी: खेगदासझाळी भाली देवी सुजस जैपाल ब्रना महरि : लेंडा महरि कुव महरि छमना पातर गुरु बेग्दास झाली माली देवी तन का रंग सिकुवा महर सात भाई कोठी सात भाई फलदा कोठी . राजा धामदेव का दश भाई दुलंच का बैठण वाल़ा . सोळ सौ कैतापुरी नकुवा मासाण लागी अत्याचार सांदणि सादो बांदणि बंदो . पकड़ी लायो सगती पाताळ धरती फुठी का पाठ राजा धामदेव का पाठ ध्यानसिंग भवन का पाठ प्रिथी का मालिक आजित महल भवरू घोड़ी का असिवारी डबुवा बिछुवा सणि आमा बैद का नाती धामदेव का नाती : कलुवा बैद का बिछुवा मसाणि खड़साणि शांसुळीकोट फलदा जुद्ध मा कुमाऊं पर्याणा . गुरु खगदास आलू भट्ट को नाती तालू भट्ट को नाती जलकमल को नाती थल्कमल को नाती लाब्री भोटन्त को नाती गुजरात देस को कालदास मोहन दास कनपणि कालदास खेगदास दुलंचा का बैठण वाला राजा का बाण सुर विक्रम कि नातेण कोटा रग्री कि नातेण शाम्साई कि शार्दूला जने निम् धर्म लगायो बरत सत कयों हरद्वारी फेर लगायो बद्री घांद चढायो

12…नगेलो जागर : एक नाथपंथी मंत्र
गढवाल कुमाऊँ में नागराजा कृष्ण रूप है यद्यपि नाग देवता वेदों से पहले के देवता हैं . नाग देवता का उल्लेख ऋग्वेद आदि में भी है. गढवाल में नाग वंशियों का भी अधिपत्य रहा है और गढवाली में कई शब्द नागवंशी काल के शब्द मिलते हैं . खस व कोल वंस का नाग वंश के साथ अटूट रिश्ता रहा है
गढवाल कुमाऊं में नाग देवता के जागर लगते हैं और नागराजा नाचते हैं
नागराजा का जागर यद्यपि खड़ी व ब्रिज मिश्रित ( व गढवाली के एक दो शब्द हैं )भाषा में है किन्तु यही समझा जाता है कि यह मंत्र या जागर गढवाली भाषा का है जबकि यह जागर नाथपंथी मंत्र है
ॐ नमो आदेस, गुरु को आदेस ,
प्रथम सुमिरों नादबुद भैरों
द्वितीय सुमिरों ब्रह्मा भैरों ,
तृतीय सुमिरों मछेंद्रनाथ भैरों
मच्छ रूप धरी ल्याओ ,
चतुर्थ सुमिरों चौरंगी नाथ ,
विन्धा उतीर्थ करी ल्यायो .
पंचम सुमिरों पिंगला देवी
षष्ठे सुमिरों श्री गुरु गोरख साईं
सप्तमे सुमिरों चंडिका देवी
या पिंड को छल करी छिद्र करी
भूत प्रेत हर ल़े स्वामी
प्रचंड बाण मारी ल़े स्वामी
सप्रेम सुमिरों नादबुद भैरों
तेरा इस पिंड का ध्यान छोड़ा दे
इस पिण्डा को भूत प्रेत ज्वर उखेल दे स्वामी
फिर सुमिरों दहिका देवी
इस पिंड को दग्ध बाण उखेल दे स्वामी
अब मैं सुमिरों कालिपुत्र कलुवा बीर
गू ल़ो तोई स्वामी गूगल को धूप
कलुवा बीर आग रख पीछ रख
स्वा कोस मू रख , पातळ मू रख
फीलि फेफ्नी को मॉस रख
मूंड कि मुंडारो उखेल
मुंड को जर उखेल
पीठी को स्लको उखेल
कोखी को धमाल उखेल
बार बिथा छतीस बलई तू उखेल रे बाबा
मेरी भक्ति , गुरु कि शक्ति सब साचा
पिण्डा राचा चालो मंत्र , ईस्रोवाच
फॉर मंत्र फट स्वाहा
या बिक्षा आन मि दूसरी बार…….

13…तंत्रों में लाल मिर्च जलाने का रिवाज गाँव हो शहर आपको कुछ तन्त्र कार्य में लाल मिर्च जलाने वाले मिल ही जायेंगे
लाल मिर्च जलाने के पीछे भैरव तंत्र के दो सिद्धांत कार्य करते हैं . एक सिधांत है जिसमे भक्त को आती साँस, जाती साँस व स्वास नलिका में वहां जहाँ दोनों साँस मिलती हैं पर ध्यान देने का सिद्धांत है व दूसरा सिधांत छींक पर ध्यान देने का सिद्धांत है
आप भी अनुभव करेंगे कि साँस लेने या साँस छोड़ने के एक एक क्षण पर जब आप सूक्ष्म ध्यान देन तो एक असीम आनन्द प्राप्त होने लगता है .
इसी तरह छींक आने से पहले छींक पर ध्यान दिया जाय (छींक नही आनी चाहिए ) तो एक असीम आनन्द प्राप्त अवश्य होता है
उर्ध्वे प्राणों ह्याधो जीवो विसर्गात्मा पारोषरेत
उत्पति द्वितयस्थाने भरणद्भ्रिता स्तिति: (विज्ञानं भैरव २४ )मरुतोतअन्तवर्हिर्वापी वियद्यगमानिववर्तनात
भैर्व्या भैर्व्स्येत्थ्म भैरवी व्यज्यते वपु : ( विज्ञान भैरव २५ )न ब्रजेन विशेच्छक्तिर्म्रूदृपा विकासिते
निर्विक्ल्पत्या मध्ये ट्या भैर्वरूपता ( विज्ञानं भैरव २६ ) क्षुताद्यन्ते भये शोके ग्व्हरे वा रणाद्दृते
क्रित्हले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्ता समीपगा (विज्ञानं भैरव ११८ )तांत्रिक कर्मकांड में मिर्च का धुंवां या घी का धुपण पश्वा को साँस पर ध्यान देने व छींक पर ध्यान देने का एक योग क्रम है…

14…अघोरी तांत्रिक मानव खोपड़ी से तांत्रिक विधान क्यों करते हैं ?
यद्यपि कुमाऊं या गढवाल के ग्रामीण इलाकों में अघोरी तांत्रिक नही मिलते हैं किन्तु इस लेखक ने एक बार नयार गंगा संगम – व्यासचट्टी में
बिखोत मेले में मानव खोपड़ी की सहायता से एक स्त्री की छाया पूजते देखा था .
वैसे यह बात आम लोगों हेतु चौंकाने वाला है किन्तु हट्ठ योग या अघोर पंथियों के लिए मानव खोपड़ी एक पूज्य वस्तु है और इस के पीछे विज्ञानं भैरव का निम्न सिद्धांत काम करता है
कपालांतर्मनो न्यस्य तिष्ठन्मीलितलोचन:
क्रमेण मनसो दाध्यार्त लक्षयेल्लक्ष्यमुत्तम (विज्ञानं भैरव , ३४
स्थिरता पुर्बक बैठकर , ऑंखें मूंदकर कपाल के आंतरिक भाग पर ध्यान केन्द्रित करो धीरी धीरे भैरव प्राप्ति हो जायेगी…

15….भूत लगे पश्वा को कण्डाळी (बिछु घास ) या किन्गोड़ा से क्यों झपोड़ा जाता है ?
प्राय: यह देखा गया है की गढवाल या कुमाऊं के गाँव में जब किसी पर भूत लग जाता है तो झाडखंडी रख्वाळी मंत्र पढ़ते हुए पश्वा को
कण्डाळी के पौधों से झपोड़ता या कभी कभी काँटों भरे किनगोड़ा की डाली से झपोड़ता है. वैसे यह आज अनुचित सा लगता है किन्तु इस तंत्र अनुष्ठान
के पीछे अनुभव किया गया भैरव तन्त्र सूत्र का हाथ है जो इस प्रकार है
किंचिदगं विभिद्द्यादों तीक्ष्ण सूच्यादिना तत:
तत्रैद चेतनां युक्त्वा भैरवे निर्मला गति: (विज्ञान भैरव , भैरव तन्त्र ९३ )
यदि किसी अंग को सुई या किसी तेज नुकीली वस्तु से दबाया जाय और उस जगह व दर्द पर ध्यान दिया जाय तो भैरव स्तिथि //वर्तमान अव्षथा प्राप्त हो जाती है…

16….मान्त्रिक या तांत्रिक अनुष्ठानो में मयूरपंख की अहमियत
मान्त्रिक या तांत्रिक अनुष्ठानो में मयूरपंख की अहमियत
आपने देखा होगा कि मान्त्रिक या तांत्रिक म्युर्प्न्ख अपने पास रखते हैं और मान्त्रिक तांत्रिक अनुष्ठान में पश्वा (भक्त या जिस पर भूत लगा है )
को मयूरपंख दिखाता है
वास्तव में यह विज्ञान भैरव या भैरव तंत्र या रुद्रालय तंत्र का एक सिद्धांत का व्यवहारिक रूप है जो इस प्रकार से है
शिखीपक्षेश्चित्ररूपैरमंड़लै शून्यपंचकम
ध्यायातोअनुत्तरे शून्य प्रवेशो हृद्यम भवेत ( विज्ञान भैरव : ३२)
आम मनुष्य इन्द्रियों के शून्य को नही जानता किन्तु यदि मनुष्य देर तक मयूरपंख को निहारता रहे तो वह वर्तमान (जहाँ भूतकाल की शरम नही और भविष्य की इच्छा या चिंता नही ) में पहुंच जाता है
इसी भैरव तंत्र के सिद्धांत को व्यवहारिक जामा पंहुचाने हेतु झाडखंडी पश्वा को बार बार मयूरपंख दिखाता है….

17….भूत भगाने हेतु थप्पड़ क्यों मारा जाता है ?
भूत भगाने हेतु थप्पड़ क्यों मारा जाता है ?
जो गढवाल – कुमाऊं के गाँव में रहे हैं और भूत भगाने की क्रिया को जिन्होंने देखा हो या अनुभव किया हो तो उन्हेंने देखा होगा कि
झाड़खंडी भूत लगे मनुष्य को थप्पड़ मरता है या चावल के दानो का ताड़ देता है . कुछ लोग सोचते हैं कि यह अज्ञानियों का कोई खेल है
जी नही यह भुतहा गये मनुष्य को थप्पड़ मारने वाला तांत्रिक अनुष्ठान अज्ञानबस नही अपनाया गया है अपितु विज्ञानं भैरव या भैरव तंत्र के एक विशेष सिधांत को ब्यवहारिक
रूप देने हुतू अपनाया गया है
विज्ञान भैरव या भैरव तंत्र में एक सिद्धांत इस प्रकार है
यस्य कस्येंद्रियस्यापी व्याघाताच्च निरोध्त:
प्रवष्टिस्याद्व्ये शुन्य तत्रैवात्मा प्रकाशते
यदि अचानक या स्वयम शरीर के किसी अंग पर किसी वाह्य वस्तु से आघात किया जाय तो आत्म दर्शन याने भैरव प्राप्ति होती है
सभी को अनुभव होगा कि जब कभी अपघात से किसी बस्तु से जोर से टकराते हैं या कोई वस्तु हमारे शरीर के किसी अंग से जोर से टकराती है तो मनुष्य ना तो भूत काल की शरम या भविष्य की कोई बात सोचता है अपितु पूर्ण वर्तमान (ना भूत ना भविष्य की सोच/विचार) में आ जाता है. पूर्ण वर्तमान क़ी स्तिथि में आने के वक्त ही मनुष्य आत्मा से आत्मसात करता है या असीम आनन्द को प्राप्त होता है
भूत लगना याने डर याने भूतकाल में जीना . जब भुतहे मनुष्य को थप्पड़ मारा जाता है तो वह वर्तमान में आ जाता है . चावल के दानो का ताड़ भी इसी सिद्धांत के अनुसार दिया जाता है…..

18…गढवाली कुमाउनी मन्त्रों में अमावस्य का महत्व
गढवाली कुमाउनी मन्त्रों में अमावस्य का महत्व
यह देखा गया है कि गढवाल व कुमाऊं क्षेत्र में तांत्रिक अनुष्ठान अधिकतर कृष्ण पक्ष या अमावस्य की रातों को किया जाता है .. आज आधुनिकता के नाम पर इस विधा या अनुष्ठान को दकियानूस अथवा अंधविश्वास का नाम दिया जाता है किन्तु वास्तव में ऐसा नही है . यह ठीक है कि चिकित्सा अथवा मानसिक दुःख दूर करने के के नाम पर मान्त्रिक तांत्रिक ठगी करने लगे हैं . कहीं कहीं समाज चिकित्सा कि उपेक्षा कर केवल मन्त्रों या तंत्रों के भरोसे रह जाते हैं और नुकसान पा जाते हैं . किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नही लगाना चाहिए कि शुद्ध तांत्रिक विधा में विज्ञान या मनोविज्ञान का अभाव है .
उत्तर भारत में तांत्रिक विधा या तो वाम पंथी शैव्यों या बुद्ध पंथियों की देन है .
नाथपंथी शैव्य हुए हैं और उनके अनुष्ठान हठ योग आधारित हैं . इसे वाम योग या विपासना योग भी कह लेते हैं, नाथपंथियों के प्रसिद्ध गुरु गोरखनाथ व उनके हजारों शिष्यों ने तंत्र विद्या में अभिनव अन्वेषण किये व तन्त्र विद्या को आम आदमी कि पंहुच तक पंहुचाया .
गढवाल कुमाऊं में भी मंत्र तन्त्र विधा को आम जन तक पंहुचाने में नाथपंथियों का सर्वाधिक हाथ रहा है , जैसा कि कहा गया है कि नाथपंथी शैव्य पन्थ के अनुचर रहे हैं अत : उनके तंत्रों में शैव्य तन्त्र का खजाना ” विज्ञान भैरव” का अर्वाधिक हाथ रहा है . विज्ञान भैरव भारत की एक ऐसी बौधिक सम्पदा है जिस पर अन्वेषण होने ही चाहिए . विज्ञान भैरव के १२३ सूत्र शरीर से आत्मदर्शन कराता है . जी हाँ विज्ञान भैरव वही वातावरण व शरीर को महत्व देता है . असीम आनन्द हेतु विज्ञान भैरव में मन व तन दोनों में से तन को अधिक महत्व दिया गया है . विज्ञान भैरव को शिव उपनिषद भी कहते हैं जो भारतीय तंत्र विज्ञान का जनक भी है .
गढवाल व कुमाऊं में अधिकतर तांत्रिक अनुष्ठान अमावश्य या कृष्ण पक्ष की रातों को किया जाता है और उसके पीछे ” विज्ञान भैरव” ड़ो सूत्र जनक हैं
एवमेव दुर्निशाया कृष्णपक्षागमे चिरम .
तिमिरम भव्यं रूपम भैरव रूपमध्यति
इसी तरह अमावस्य की रात या कृष्ण पक्ष की रात में अन्धकार पर सूक्ष्म ध्यान दो तो भैरव प्राप्ति हो जायेगी
एवमेव निमील्यादौ नेत्रेकृष्णा भमग्रत::
प्रसार्य भैरवम रूपम भाव्यं स्त्न्मयो भवेत
उसी प्रकार आँख बंद कर अँधेरे पर सूक्ष्म ध्यान दो फिर आँख खोलकर अँधेरे पर सूक्ष्म ध्यान दो , भैरव प्राप्ति हो जायेगी
जो लोग गढवाल या कुमाऊँ के गाँव में रहे हैं उन्हें अकेले में कृष्ण पक्ष की रात में डर , डर को दूर करने व अंत में सर्वाधिक आनन्द (जब भूत , वर्तमान, भविष्यकी चिंता सर्वथा समाप्त हो जाय ) का अनुभव अवस्य होगा , भैरव तन्त्र इसी अनुभव प्राप्ति की बात कर रहा है .
प्राचीन समय में जिन्होंने भैरव तंत्र को जिया हो परखा हो वे चाहते रहे होंगे किस तरह, इस तरह के आनन्द को आम जनता तक पंहुचाया जाय ! उन्होंने तांत्रिक विद्या का अनुष्ठान कृष्ण पक्ष या आमवस्य की रातों को करना शुरू किया जिससे की पश्वा (भक्त ) भी भैरव योनी (सर्वाधिक आनन्दित योनी) में पंहुच सके .
यही कारण है की अधिकतर तांत्रिक अनुष्ठान अमावस्य या कृष्ण पक्ष की रातों को किये जाते हैं….

19…बैरी बिणास मंत्र एवम यंत्र जिसमे मुसलमानी सभ्यता झलकती है
ॐ नमो आदेस गुरु को आदेस : उंज काला क्न्काला : बजुरमुखी बाण नाचे : : लग्न ऩा नाचे चौसठ मसाण नाचे : आट मारग कि जड़ नाचे : समसाण घाट को कुइलो नाचे : बेताल घाट को बेताल नाचे : छुर्की का अक्षत नाचे : घोर अघोर लग्न नाचे : डुकुर बोल नि बोले तो : तिन पाल कनिडु करे तो काली कलिन्द्रा कि द्वाई . फिर रे बोल बोल रे ब्यादी बियादी . लाया लगाया . तोई दूं अष्ट बली . कंकाली कंकाली . किल किल किलक्वार . औटे लग्न बाके मसाण नाचे निबोले नि नाचे तो कलचेरी कि .फुर मंच फटे स्वाहा .
अथ लग्न थमौण को मंत्र : ॐ नमो काली कंकाली बर्मा कि बेटी रूद्र कि साळी लठगण का मुख मार्रो ताळी . जो बक दारे सो मरे . उसी का बाण उसी का घर जावे . तोई काली दयून्लू काल़ा बानुर का मुख .कि बळी , ब्यादी बियादी ताका सिर मारो बज्र कि सिला . जा वि मारो लुब्बा कि कील श्रव काली ह्रीं ह्रीं लं लं हं हं त्रं त्रं पं पं श्रव व्याधि नसावे : फटे स्वाहा ये मंत्रल लगे डुकराण : सतनाजा को लगण करणु . छुरकी क साठी समसाण को कुइलो लगण का पेट धरणो : उड़द चौंळ मन्त्रिक लग्न पर ताड़ो मारणो स्टे . ॐ नमो आदेस . गुरु को जुहार . तो आयो बिर नरसिंग वायु नरसिंग वर्ण नरसिंग . मेरा जिय रख जंत रंग प्राण रख . अष्टन्गुली आत्मा रख .
मेरो बैरी को भख . दडी दुश्मन कि कलेजी चख . फुर मंत्र इस्स्रो वाच . सातर कि विभूति मन्त्रिक अपणा सिर ल़ाणी , तब लग्न को मंत्र करणो . ॐ नमो गुरु को आदेस गुरु को चड़े गेरू में सात गुदडि का देमड़ा . कालिका का पूत चेड़ा खादा औंदा नाड़ तोडि कपाळ फोड़ी चले सत्रु का घर सिव का बाण नाचे कुदेक लवानिवु के ताल हाडिक घुळ मसाण हवया. गाडो मंगाल बार बिर पथर पड़े . मेरा सत्रु के घर फुर मंत्र एसुरी वाच . येई मन्त्रण शयीराड़ो मड़घाट कि विभूति १०८ बेरी मंत्र कनु कुड़ अ का आसपास धरी देणु
ॐ नमो आदेस गुरु को : कालुर देस का कालुरी बिर दानो बिर धुन्दवा बिर सुन्द्रिका बिर लड़तिउं चले भगता लात मारते चले. खटंग बिर खितग ताल चले . सात सबद मार पेखंत खेलता चले . बिर चल चलूंडंति दानौ मार. बजुर गोला बाण ते चलाऊं तब ब्रिछ लडाऊं . राम्च्न्दरी बाण चलाऊं . बजुर बाण तेलग लागे . थातिया बिर लडाऊं गुम्बर गुबर नि लदे तो खेल नि खेले तो फेर सात त्रिपर कि दुबाई. फिरेसते चंद्रा बुतिणि बिर कि दुबाई फेरे सहि. इस मंत्र न मुसलमान को कब्र कि मटि . ७ जोड़ा लौंग ८ सूत को धागों करणो .एका ब्रिछ बंधणो . आफु अलग राणु , नजर मारणि : ७ चिक्ला मंत्र सूते लड़दि लकड़ी बज्र छीनती कि लकड़ी मुर्दा बोकण कि लकड़ी तीनो लकड़ी घुसाणो ब्रिछु पर छेद दिणि
ॐ नमो आदेस गुरु को इंद्रजाल हंकारो जिमजाळ हंकारो काल जिम हंकारो मेढक जाल हंकारो . उमड़े नही जाहाँ चलाऊं थान चलाऊं . दि चले त ह्न्कारनात भैरों कलुआ ध्यावन छूटे . गेदों सि फूटे डोरी सि टूटे , रुई को सिमडे लोट सि तड़े. जिम कि सभा नि बैठाई तो काला कलुआ तेरी आण पड़े . जो इंद्र कि सभा नि बैठाई तो नौ नौरतो कि पूजा नि पाई . देखो परचो उंकी नात भैंरों मेरा बैरी तेरा भक . जम कि सभा नि लग तो तिन नरग जाई . तिन घडी तिन पहर मड़घट नि ल्याई तो हंकार नात भैरों गुटा जाई तो मिटा खाई . बैण भांजा का पाप जाई ., चांडा बोग्सा कि जाटा तोड़ खाई . जांजी बोगसा उतरी जाई . मेरी भक्ति गुरु कि सती फुर मंत्र फटे स्वाहा . यई मंत्र तिघर कि लाल पिंगळी पिठाइ २ घर का ज्युंदाळ साड़े तीन हात को धागों नापणो धरणो . सत्रु का घर मा फुकणो ९ सत्रु मरे १८ बेरी काम करणु
ॐ नमो उस्ताद बैठे पास काम अवे रास . मेरा कलुवा एसा बिर जैसा हो तिर . जिम का मुहा पे बैठी कल़ेजी खाई , छाती पैराडि भैर निकळ आई . भोगे खाई भोगे का आड़ा दे मैं देवा क्रूर वारि करू ढाडा कलुवा कामड़ घाट बैठे ख़ुबाट कूद आवे मुर्दा के घाट. बारा घटी सोला बकरा खाई . असी कासकिदी ड़करे . सोटी ब्यानपे खावे ॐ काल भैरों कंकाल पाटी चन्द्र भैरों दुष्ट कि छ्यती. मेरा बैरी तेरा भक काट कल़ेजा कर चबट . मेरी बात नि माने त माता कालिका का दांत गीद्लिया . २१ जोड़ा लौंग .
अथ घट बंथण को :
तै बिट में कौं बिर बैठे . बिगठ मै बिर हणमंत रड़ बैठेउर हट्टी आगे दिया . उबैठे वबरी मैं महाकाली बैठे चार बिर घट के पेट में बैठे बंद बंदन भवन बंद पाणी का नागला . चरकी का घेर बंद चलदा घराट बंद .बोल बोल बंद बंद करी त्याई तो बिर हणमंत तेरी द्वाई . फुट ह्न्मन्त बीर तेरी दवाई . बर्ज मुख का कोइला मंत्रणा . उइरा गेरी देण घरात बंद होई
अथ उखेल मंत्र :
ॐ नमो आदेस गुरु का : बिगत बिरात कौं बिर उखेल बिगत बिट हणीमंत्र उखेल द्विखिं आगे दरिया उखेल. चार बीर घट के पेट में उखेल . घट उपरी महाकाली उखेल . उखेल उखेल लखेल करी नि त्याई त : बिर हणमंत तेरी द्वाई . तेरी आण पड़ी . फुर बरुवा अनजानी का पूत हनुमंत उखेल . फुर मंत्र इस्रोवाच पंच गारा मंत्रणा या तीन बेरी या सात बेरी ॐ नमो गुरु को आदेस गुरु को काली काली महाकाली . कंकाली माता गडदेवी या बर्मा कि बेटी . गर्भ ते छुटी रगत नि लेटी भैं माता कर्यो तेरो सुमरिण वेदी वोलाऊं औसान की बेला माता चली आयी . माता हंकारी ल़े मेरा बैरी सन्तान का जिए खाई .तुम मेरी बैणी मै तेरा भाई . मेरा बैरी का पेट काट ल्याई . मैदान का बाठा ल्याई रक्त निकाल ल्याई . नाक नकुआ उपाई अंक पाड़ो काल़ो उपाई . तुम मेरी बैणा मै तेरा भाई . तुम बैरी घडी तीसरा पहर तीसरा दिन बरपाई मेरा बैरी का बत्तीस दंत खाई . ताल़ू जिभ्या लाइ . सौ हात आन्द्ड़ो खाई. मेरा बैरी को जितमो फोड़ी खाई फबसो कल़ेजी फोड़ी खाई . मेरा पढ़ायियां नि जाई त अपणा भाई बाप का x x न जाई. तू मेरी बैणा मै तेरा भाई मेरा पठायाँ नि जाई त अपणा गुरु को मांश खाई पाए बिट सिर जाई . मेरा बैरी ढाई पहर ढाई घडी फ़ट जाई . छ्न्चर का दिन न्यूती मात . ऐतवार का दिन हंकार पठाई . आगे नि जाई पीछे रही त अपणा गुरु का मॉस खाई . कैसा फिराआं फिरि आई त भाई बाप का अफु नि जाई . नौ नौती पूजा नि पाई . तोई द्विल नरसिंग कि दुबाई . . अब तो माता किल्कन्ति आई . मेरा बैरी भकनडि आई कं कं किलकन्त जाई . मेरा बैरी भाकान्ति आई . खं खं खडख प्रले ल़े चली आई . मेरा बैरी तुरंत खाई . घं घं घं घोरंती जाई . मेरा बैरी तुरंत खाई ढं ढं ढं ढाल ल़े जाई . मेरा बैरी बैद हो तो बिदा खाई . सुता हो त सुतो खाई . मेरा बैरी रूसो होव तो मनाई खाई . मेरा बैरी कि डाँडि नदी तिर लाइ . नि ल्याई त अपणा भाई बाप का कुबोल जाई . नौ नारसिंग सोल़ा कलुवा असी मण चौरासी चेड़ा . चौसठ भैरों चौसठ जोगणि रथ बेरथ सुन बे -सुन बैरी का घर घाली तब चलो बाबा काल भैरों . गोल मैमंदा बिर मेरा बैरी का घर सुन बे-सुन घाली मेरा बैरी तीसरा दिन तीसरी पहर तीसरी धीवर ऩा खाई त बाबा सुन्गर हलाल कर खाई . अब मेरा बैरी खाईलो त तेरी पूजा देयून्लू लाल ल्वारण मॉस का बीड़ा कठ गई मठगढ़ बारा भोजन छतीस प्रकार देउलूं . कुखडी मेडा कि बली मद कि धार दयून्लू मेरी चलाई ऩा चली तो नी जाई त नौ नारसिंग बर्मा बिसनु मादेव पारबती कि आण पड़ी . हणमंत बिर कि आण पड़ी मेरी भगती गुरु कि सगती फीर मंत्र फटे स्वाहा . कागा कि पाग चित्रि का क्षर मड़ा हाड राता दयेपड़ा को क्षर नूर उंगुल को त्रिसुल करणो १०८ बेरी मंत्र करणो सबु नाम ल़ेणु………..

20….देवभूमि उत्तराखंड अनादि काल से ही वेदों , पुराणों ,उपनिषदों और समस्त धर्म ग्रंथों में एक प्रमुख अध्यात्मिक केद्र के रूप में जाना जाता रहा है | यक्ष ,गंधर्व ,खस ,नाग ,किरात,किन्नरों की यह करम स्थली रही है तो भरत जैसे प्राकर्मी और चक्रवर्ती राजा की यह जन्म और क्रीडा स्थली रही है | यह प्राचीन ऋषि मुनियों – सिद्धों की तप स्थली भूमि रही है | उत्तराखंड एक और जहाँ अपने अनुपम प्राक्रतिक सौंदर्य के कारण प्राचीन काल से ही मानव जाति को को अपनी आकर्षित करता रहा है तो वहीं दूसरी और केदारखंड और मानस खंड (गढ़वाल और कुमौं ) इतिहास के झरोखों में गढ़ों और भड़ों की ,बलिदानी वीरों की जन्मदात्री भूमि भी कही ज़ाती रही है | महाभारत युद्ध में इस क्षेत्र के वीर राजा सुबाहु (कुलिंद का राजा ) और हिडिम्बा पुत्र घटोत्कच का और अनेकों ऐसे राजा- महाराजाओं का वर्णन मिलता है जिन्होने कौरवों और पांडवों की और से युद्ध लड़ा था | नाग वीरों में यहाँ वीरंणक नाग (विनसर के वीर्नैस्वर भगवान ) ,जौनसार के महासू नाग (महासर नाग ) जैसे वीर आज भी पूजे जाते हैं | आज भी इन्हे पौड़ी -गढ़वाल में डांडा नागराजा ,टिहरी में सेम मुखिम,कुमौं शेत्र में बेरी – नाग ,काली नाग ,पीली नाग ,मूलनाग, फेर्री नाग ,पांडूकेश्वर में में शेषनाग ,रत्गौं में भेन्कल नाग, तालोर में सांगल नाग ,भर गोवं में भांपा नाग तो नीति घाटी में लोहान देव नाग और दूँन घाटी में नाग सिद्ध का बामन नाग अदि नाम से पूजा जाता है | जो प्राचीन काल में नाग बीरो कि वीरता परिभाषित करता है | बाडाहाट (उत्तरकाशी) कि बाड़ागढ़ी के नाग बीरों कि हुणो पर विजय का प्रतीक और खैट पर्वत कि अन्चरियों कि गाथा (७ नाग पुत्रियाँ जो हुणो के साथ अंतिम साँस तक तक संघर्ष करते हुए वीरगति का प्राप्त हो गयी थी ) आज भी ” शक्ति त्रिशूल “के रूप में नाग वीरों क़ी वीरता क़ी गवाही देता है तो गुजुडू गढ़ी का गर्जिया मंदिर गुर्जर और प्रतिहार वंश के वीरों का शंखनाद करता है | यूँ तो देवभूमि वीर भड़ो और गढ़ों क़ी भूमि होने के कारण अपनी हर चोटी हर घाटी में वीरों क़ी एक गाथा का इतिहास लिये हुए है जिनकी दास्तान आज भी यहाँ के लोकगीतों ,जागर गीतों आदि के रूप में गाई ज़ाती है यहाँ आज भी इन् वीरों को यहाँ आज भी देवरूप में पूजा जाता है |

उत्तराखंड के इतिहास में नाथ- सिद्ध प्रभाव प्रमुख भूमिका निभाता है क्यूंकि कत्युरी वंश के राजा बसंत देव (संस्थापक राजा ) क़ी नाथ गुरु मत्स्येन्द्र नाथ (गुरु गोरख नाथ के गुरु ) मे आस्था थी | १० वी शताब्दी में इन् नाथ सिद्धों ने कत्युर वंश में अपना प्रभाव देखते हुए नाथ सिद्ध नरसिंह देव (८४ सिद्धों मे से एक ) ने कत्युर वंश के राजा से जोशीमठ राजगद्दी को दान स्वरुप प्राप्त कर उस पर गोरखनाथ क़ी पादुका रखकर ५२ गढ़ूं के भवन नारसिंघों क़ी नियुक्ति क़ी जिनका उल्लेख नरसिंह वार्ता में निम्नरूप से मिलता है :

वीर बावन नारसिंह -दुध्याधारी नारसिंह ओचाली नरसिंह कच्चापुरा नारसिंह नो तीस नारसिंह -सर्प नो वीर नारसिंह -घाटे कच्यापुरी नरसिंह – -चौडिया नरसिंह- पोडया नारसिंह – जूसी नारसिंह -चौन्डिया नारसिंह कवरा नारसिंह-बांदू बीर नारसिंह- ब्रजवीर नारसिंह खदेर वीर नारसिंह – कप्पोवीर नारसिंह -वर का वीर नारसिंह -वैभी नारसिंह घोडा नारसिंह तोड्या नारसिंह -मणतोडा नारसिंह चलदो नार सिंह – चच्लौन्दो नारसिंह ,मोरो नारसिंह लोहाचुसी नारसिंह मास भरवा नारसिंह ,माली पाटन नारसिंह पौन घाटी नारसिंह केदारी नारसिंह खैरानार सिंह सागरी नरसिंह ड़ोंडिया नारसिंह बद्री का पाठ थाई -आदबद्री छाई-हरी हरी द्वारी नारसिंह -बारह हज़ार कंधापुरी को आदेश-बेताल घट वेल्मुयु भौसिया -जल मध्ये नारसिंह -वायु मध्ये नार सिंह वर्ण मध्ये नार सिंह कृष्ण अवतारी नारसिंह घरवीरकर नारसिंह रूपों नार सिंह पौन धारी नारसिंह जी सवा गज फवला जाणे-सवा मन सून की सिंगी जाणो तामा पत्री जाणो-नेत पात की झोली जाणी-जूसी मठ के वांसो नि पाई शिलानगरी को वासु नि पाई (साभार सन्दर्भ डॉ. रणबीर सिंह चौहान कृत ” चौरस की धुन्याल से ” , पन्ना १५-१७)

इसके साथ नारसिंह देव ने अपने राजकाज का संचालन करने और ५२ नारसिंह को मदद करने हेतु ८५ भैरव भी नियुक्त स्थापित किये इसके अलावा कईं उपगढ़ भी स्थापित किये गए जिनके बीर भडौं गंगू रमोला,लोधी रिखोला ,सुरजू कुंवर ,माधो सिंह भंडारी ,तिलु रौतेली ,कफ्फु चौहान आदि के उत्तराखंड में आज भी जागर गीतौं -पवाड़ों में यशोगान होता है |

” सागर ताल गढ़ विजय गाथा ”

इन्ही गढ़ों में से एक “सागर ताल गढ़ ” गढ़ों के इतिहास में प्रमुख स्थान रखता है जो कि भय-संघर्ष और विजय युद्ध रूप में उत्तराखंड के भडौं कि बीरता का साक्षी रहा है जो कि सोंन नदी और रामगंगा के संगम पर कालागढ़ (काल का गढ़ ) दुधिया चोड़,नकुवा ताल आदि नामों से भी जाना जाता है | तराई -भावर का यह क्षेत्र तब माल प्रदेश के नाम से जाना जाता था | उत्तराखंड के प्रामुख कत्युरी इतिहासकार डॉ० चौहान के अनुसार यह लगभग दो सो फीट लम्बा और लगभग इतना ही चौड़ा टापू पर बसा एक सात खण्डो का गढ़ था जिसके कुछ खंड जलराशि में मग्न थेय जिसके अन्दर ही अन्दर खैरा- गढ़ (समीपस्थ एक प्रमुख गढ़ ) और रानीबाग़ तक सुरंग बनी हुयी थी | स्थापत्य कला में में सागर ताल गढ़ गढ़ों में जितना अनुपम था उतना ही भय और आतंक के लिये भी जाना जाता था | सागर ताल गढ़ गाथा का प्रमुख नायक लखनपुर के कैंतुरी राजा प्रीतम देव(पृथिवी पाल और पृथिवी शाही आदि नामों से भी जाना जाता है ) और मालवा से हरिद्वार के समीप आकर बसे खाती क्षत्रिय राजा झहब राज कि सबसे छोटी पुत्री मौलादई (रानी जिया और पिंगला रानी आदि नाम से भी जानी ज़ाती है ) का नाथ सिद्धों और धाम यात्राओं के पुण्य से उत्पन्न प्रतापी पुत्र धामदेव था | रानी जिया धार्मिक स्वाभाव कि प्रजा कि जनप्रिय रानी थी ,चूँकि रानी जिया के अलावा राजा पृथिवी पाल कि अन्य बड़ी रानिया भी थी जिनको धामदेव के पैदा होते ही रानी जिया से ईर्ष्या होने लगी | धीरे धीरे धामदेव बड़ा होने लगा | उस समय माल-सलाँण अक्षेत्र के सागर ताल गढ़ पर नकुवा और समुवा का बड़ा आतंक रहता था जो सन् १३६०-१३७७ ई ० के मध्य फिरोज तुगलक के अधीन आने के कारण कत्युरी राजाओं के हाथ से निकल गया था जिसके बाद से समुवा मशाण जिसे साणापुर (सहारनपुर ) कि ” शिक” प्रदान कि गयी थी का आंतंक चारो तरफ छाया हुआ था ,समुवा स्त्रियों का अपरहण करके सागरतल गढ़ में चला जाता था ,और शीतकाल में कत्युरी राजाओं का भाबर में पशुधन भी लुट लेता था , चारो और समुवा समैण का आतंक मचा रहता था |

इधर कत्युरी राजमहल में रानी जिया और धाम देव के विरुद्ध बाकी रानियौं द्वारा साजिश का खेल सज रहा था | रानियों ने धामदेव को अपने रास्ते से हटाने कि चाल के तहत राजा पृथ्वीपाल को पट्टी पढ़ानी शुरू कर दी और राजपाट के के बटवारे में रानीबाग से सागरतल गढ़ तक का भाग रानी जिया को दिलवाकर और राज को मोहपाश में बांध कर धामदेव को सागर ताल गढ़ के अबेध गढ़ को साधने हेतु उसे मौत के मुंह में भिजवा दिया |

पिंगला रानी माता जिया ने गुरु का आदेश मानकर विजय तिलक कर पुत्र धाम देव को ९ लाख कैंत्युरी सेना और अपने मायके के बीर भड ,भीमा- पामा कठैत,गोरिल राजा (जो कि गोरिया और ग्वील भी कहा जाता है और जो जिया कि बड़ी बहिन कलिन्द्रा का पुत्र था ),डोंडीया नारसिंह और भेरौं शक्ति के वीर बिजुला नैक (कत्युर राजवंश कि प्रसिद्ध राजनर्तकी छ्मुना -पातर का पुत्र ) और निसंग महर सहित सागर ताल गढ़ विजय हेतु प्रस्थान का आदेश दिया |

धाम कि सेना ने सागर ताल गढ़ में समुवा को चारो और से घेर लिया ,इस बीच धामदेव को राजा पृथ्वीपाल कि बीमारी का समाचार मिला और उसने निसंग महर को सागर ताल को घेरे रखने कि आज्ञा देकर लखनपुर कि और रुख किया और रानियों को सबक सिखाकर लखनपुर कि गद्धी कब्ज़ा कर वापिस सागर ताल गढ़ लौट आया जहाँ समुवा कैंत्युरी सेना के भय से सागर ताल गढ़ के तहखाने में घुस गया था | ९ लाख कैंत्युरी सेना के सम्मुख अब समुवा समैण छुपता फिर रहा था | गढ़ के तहखानों में भयंकर युद्ध छिड़ गया था और खाणा और कटारों कि टक्कर से सारा सागर ताल गढ़ गूंज उठा था |युद्ध में समुवा समैण मारा गया नकुवा को गोरिल ने जजीरौं से बाँध दिया और जब बिछुवा कम्बल ओढ़ कर भागने लगा तो धाम देव ने उस पर कटार से वार कर उसे घायल कर दिया | चारो और धामदेव कि जय जयकार होने लगी | जब धामदेव ने गोरिल से खुश होकर कुछ मागने के लिये कहा तो गोरिल ने अपने पुरुष्कार में कत्युर कि राज चेलियाँ मांग ली जिससे धामदेव क्रुद्ध हो गया और गोरिल नकुवा को लेकर भाग निकला परन्तु भागते हुए धाम देव के वर से उसकी टांग घायल हो गयी थी | गोरिल ने नुकवा को लेकर खैरा गढ़ कि खरेई पट्टी के सेर बिलोना में कैद कर लिया जहाँ धामदेव से उसका फिर युद्ध हुआ और नकुवा उसके हाथ से बचकर धामदेव कि शरण में आ गया और अपने घाटों कि रक्षा का भार देकर धामदेव ने उसे प्राण दान दे दिया परन्तु बाद में जब नकुवा फिर अपनी चाल पर आ गया तो न्याय प्रिय गोरिया (गोरिल ) ने उसका वध कर दिया |
सागर ताल गढ़ विजय से धामदेव कि ख्याति दूर दूर तक फ़ैल चुकी थी और मौलादेवी अब कत्युर वंश कि राजमाता मौलादई के नाम से अपनी कत्युर का राज चलाने लगी | धामदेव को दुला शाही के नाम से भी जाना जाता था वह कत्युर का मारझान (चक्रवर्ती ) राजा था और उसकी राजधानी वैराठ-लखनपुर थी उसके राज में सिद्धों का पूर्ण प्रभाव था और दीवान पद पर महर जाति के वीर ,सात भाई निन्गला कोटि और सात भाई पिंगला कोटि प्रमुख थे |

धामदेव अल्पायु में कि युद्ध करते हुए शहीद हो गया था परन्तु उसकी सागर ताल गढ़ विजय का उत्सव आज भी उसके भगत जन धूमधाम से मानते है वह कत्युर वंश में प्रमुख प्रतापी राजा था जिसके काल को कत्युर वंश का स्वर्ण काल कहा जाता है जिसमे अनेकों मठ मंदिरों का निर्माण हुआ ,पुराने मंदिरों को जीर्णोद्धार किया गया और जिसने अत्याचारियों का अंत किया |

वीर धाम देव तो भूतांगी होकर चला गया परन्तु आज भी सागर ताल विजय गाथा उसकी वीरता का बखान करती है और कैंतुरी पूजा में आज भी उसकी खाणा और कटार पूजी ज़ाती है | कैंतुरी वार्ता में “रानी जिया कि खली म़ा नौ लाख कैंतुरा जरमी गयें ” सब्द आज भी कैंतुरौं मैं जान फूंक कर पश्वा रूप में अवतरित हो जाता है और युद्ध सद्रश मुद्रा में नाचने लगता है धामदेव समुवा को मरने कि अभिव्यक्ति देते हैं तो नकुवा जजीरौं से बंधा होकर धामदेव से अनुनय विनय कि प्रार्थना करने लगता है तो विछुवा को काले कम्बल से छुपा कर रखा जाता है | इसके उपरान्त समैण पूजा में एक जीवित सुकर को गुफा में बंद कर दिया जाता है और रात में विछुवा समैण को अष्टबलि दी ज़ाती है जो कि घोर अन्धकार में सन्नाटे में दी ज़ाती है और फिर चुप चाप अंधेरे में गड़ंत करके बिना किसी से बात किये चुपचाप आकर एकांत में वास करते हैं और तीन दिन तक ग्राम सीमा से बहार प्रस्थान नहीं करते अन्यथा समैण लगने का भय बना रहता है | धामदेव कि पूजा के विधान से ही समुवा कि क्रूरता और उस काल में उसके भय का बोध होता है | उसके बाद दल बल के सात और शस्त्र और वाद्या यंत्रों के सात जब गढ़ के समीप दुला चोड़ में धामदेव कि पूजा होती है तो धामदेव का पश्वा और ढोल वादक गढ़ कि गुफाओं में दौड़ पड़ता है और तृप्त होने पर स्वयं जल से बहार आ जाता हैं उसके बाद बडे धूम धाम-धाम से रानी जिया कि रानीबाग स्थित समाधि “चित्रशीला ” पर एक भव्य मेले का आयोजन किया जाता है |

अब इसे वीर भडौं कि वीरता का प्रभाव कहें या गढ़-कुमौनी वीरों कि वीरता शोर्य और बलिदानी इतिहास लिखने कि परम्परा या फिर मात्रभूमि के प्रति उनका अपार स्नेह ,कारण चाहे जो भी हो पर आज भी उत्तराखंडी बीर अपनी भारत भूमि कि रक्षा के लिये कफ़न बांधने वालौं में सबसे आगे खडे नज़र आते है फिर चाहे वह चीन के अरुणाचल सीमा युद्ध का “जसवंत बाबा ” हो पाकिस्तान युद्ध के अमर शहीद ,या विश्व युद्ध के फ्रांस युद्ध के विजेता या ” पेशावर क्रांति ” के अग्रदूत ” वीरचन्द्र सिंह गढ़वाली ” ,या कारगिल के उत्तराखंडी रणबांकुरे या अक्षरधाम और मुंबई हमलों में शहीद म़ा भारती के अमर सपूत , सब आज भी उसी ” वीर भोग्या बसुन्धरा ” कि परम्परा का सगर्व निर्वाहन कर रहे हैं |

21…चौडिया मसाण मंत्र
श्री गणेशाय नमह , ॐ नमो गुरु जी को आदेस, बैरागणि माता को आदेस : अंत पौन कु आदेस, चंद सुर्ज को आदेस ; प्रथमे नाद बुद भैरों को आदेस , पिंगळी जटा को आदेस………
…….. दाई दुश्मन को बाण उखेल, भाट बामण को बाण उखेल : ठाडा ठडसेरी को बाण उखेल : मौनी तपेसी को बाण उखेल : छोटा बड़ा भाई की घात उखेल : इतना बाण कु उखेली नी लायी तो भागीरथी मूल को बासो नी पाई :……

22…..फोड़ी बायाळी /ततार दीण मंत्र और वैदिक मंत्र
वैदिक मंत्र किसी देवता या भगवान निर्मित मंत्र नही हैं अपितु स्थानीय भाषाओँ में उपलब्ध साहित्य को ग्यानी ऋषियों ने
वैदिक संस्कृत में रचे और श्रुतियों द्वारा हजारों सालों तक सुरक्षित रखा .
गढवाल कुमाओं में कई स्थानीय आवश्कता हेतु मंत्र रचे गये . फोड़ी बयाळी या ततार दीण वला मंत्र एक चिकित्सा मंत्र है . सीट पीत शरीर पर आने पर भी इसी तरह का मंत्र पढ़ा जाता है जिसमे मान्त्रिक या तांत्रिक घाव पर दूब या सिंवळ /सिंयारू ( बोयमीरिया मैक्रोफिला ) के पत्तों को पाणी में भिगोकर घाव या फोड़ी पर धीरे धीरे स्पर्श करता है . पाणी अधिक गिराया जाता है. सिंयारू के पत्ते वास्तव में एंटी वाइरल या एंटी बैकटी रियल पत्ते हैं . साथ साथ मान्त्रिक फोड़ी ब्याली का मंत्र भी पढ़ता है . यदि गाव प गया हो तो गरम सुई से उसे छेदा जाता है और पीप बाहर निकाला जाता है
फोड़ी बयालि मंत्र नरसिंग वाली मन्त्रावली का एक भाग है जिसमे ७० पंक्ति हैं जो इस प्रकार है
ॐ नमो आदेस मोट पीर का आदेस मर्दाने पीर को आदेस ……माता मन्दोगीरी की दुद्दी खाई : इस पिण्डा की रखल करी … ॐ नमो आदेस : आदेस पर्थमे ड़ोंकी ड़ोंकी की सौंकी सोंकी की मदोगीरी : मन्दोगीरी की सात बैण कुई बैण , फोड़ी की बयाळी ; कु डैण : कुई टाणगेणा : कुई चुडळी , कुई बैण चमानी, ……रक्त फोड़ी , अनुन फोड़ी …जल फोड़ी , थल फोड़ी , वरणफोड़ी , सीत , पीत खतम करे माराज ………….इस पिंड की रखल करी …. सिर चढ़ी पेट पढ़ी श्री राजा रामचन्द्र की दूवाई फोर्मन्त्र इसुरोवाच यो च फोड़ बयालि को मंत्र
वैदिक मंत्र
अथर्व वेद में इसी भाँति कई मंत्र मिलते हैं अथर्व वेद की एक संहिता में दूब की प्रशंशा इस प्रकार है (अध्याय एक, संहिता सात )
पिशाचादी से उत्पन पाप , विप्र श्राप आदि को नाश करने वाली देव निर्मित बीरुष जड़ी मुझको हर प्रकार के शापों से मुक्त कर …….
हे मणे ! नीचा मुख करके फैली हुयी जड़ के समान उपर उठी हुयी सैकड़ों ग्रन्थि वाली ” दुर्बा ” द्वारा तुम हमे श्राप मुक्त करो …….
इस तरह कहा जा सकता है की जल , जड़ी बूटी के साथ साथ मंत्र के योग से चिकित्सा प्ध्हती भारत में वेदों से भी पहले रही है
मंत्र जहां मानसिक बल प्रदान करते हैं वहीं जड़ी बूटी भौतिक चिकत्सा में सहायक होती थीं..

23….आंत स्राव मंत्र और वैदिक मंत्र
गढ़वाल कुमाऊं में हर परेशानी हेतु मंत्र रचे गये हैं कुछ की खोज हो चुकी और असंख्य मन्त्रों की खोज बाकी है
गणित प्रकाश एक ऐसी मंत्र ग्रंथावली है जिसमे चिकत्सा मन्त्र हैं . गणित प्रकाश में चिकित्सा मन्त्र और यंत्र हैं
इस ग्रन्थावली में एक मंत्र काट लगने (आंतो का रोग , आंत्र स्राव, पेचिस ) पर किस प्रकार से चिकत्सा प्रबंध किया जाय पर एक मंत्र इस प्रकार है
स्याळ की राल लौंग सूंठ आम की गुठली स्र्तींतो कट्ठा करण पीस्णों आदा कौड़ी बाण पूडी बाद्णी अनोपान एक बगोट उमरा को एक बगोट
तिमला की जड़ी को बगोट एक अणताज करणों सात मृच पीसिक डाळणों अदुड़ी पाणि मा कुवात करणों . गया घीउ ना त पथ देणों कटाई जाई
अथर्व वेद में चिकित्सा संकेत मंत्र
(अथर्व वेद, पांचवां अध्याय , इकाणवे संहिता, ऋषि – भ्रिग्रा, देवता- यक्ष्नाश्म , आप , छंद – अनुषटुपु)
यह जो औषधि में प्रयुक्त करने के लिए आठ बैल या चै बैल वाले हल द्वारा जोतकर उत्पन्न किये हैं उन यवों से तेरे रोग के कारण पाप को नीचे से निकालता हूँ
जैसे सूर्य नीचे तपते हैं , वायु नीचे चलती है , गौ नीचे मुख करके दूध देती है , वैसे ही रो तेरा मुख भी अधोमुखी हो , औषधियां जल की विकार रूप हैं
अत: जल ही रोग निवारण का सर्वोत्तम औषधि है . यह जल सब संसार की औषधि रूप है . वे ही तेरा रोग निवारण करें
इस तरह अनुमान लगाना सरल है क़ि वैदिक समहिताओं से चरक सम्हिताओं में होते हुए चिकत्सा मंत्र स्थानीय भाषाओं में आये एवम बहुत सी चिकत्सा पद्धति स्थानीय दृष्टि से खोजी भी गईं हैं….

24….गोरिल, ग्विल्ल, गोरिया , गोल देवता का मन्त्र
नाथपंथ ने कुमाऊं – गढ़वाल क्षेत्र को की देवता व मन्तर दिए है . इनमे एक मन्त्र ग्विल्ल , गोरिल देवता का सभी गाँव में महत्व है . यदि किसी पर ग्विल्ल/गोरिल का दोष लग जाय तो मान्त्रिक दूध , गुड, ल़ूण, राख आदि को मंत्रता है और यह मन्त्र इस प्रकार है :
ॐ नमो गुरु को आदेस
रिया : हंकार आऊ : बावन ह्न्तग्य तोडतो आऊ : हो गोरिया : कसमीर से चली आयो : जटा फिकरन्तो आयो,: घरन्तो आयो :गाजन्तो आयो : बजन्तो आयो : जुन्ज्तो आयो : पूजन्तो आयो : हो गोरिया बाबा : बारा कुरोड़ी क्रताणी : कुबन्द : नौ करोडी उराणी कुबन्द : : तीन सौ साट : गंगा बंद , नौ सौ नवासी नदी बंद : यक लाख अस्सी हजार वेद की कला बंध : रु रु बंद : भू भू बंद : चंड बंद : प्रचंड बंद : टूना पोखर बंद : अरवत्त बंद : सब रत्त बंद :अगवाडा बंद का बेद बंदऊँ : पीछे पिछवाडा को बेद बंदऊँ : महाकाली जा बन्दों : वन्द वन्द को गोरिया : हो गोरिया : नरसिंग की दृष्टा बंद : युंकाल की फांस बंद : चार कुणे धरा बंद : लाया तो भैराऊं बंद : खवायाँ चेडा बंद : सगुरु विद्या कु बंद निगु
इस मन्तर के अध्ययन से साफ़ पता चलता है की इस मन्तर में गोरिल की वीरता व ज्ञान की प्रशंशा की गयी है
9 गोरिल कलुआ देव के भाई थे और राजतंत्र या अधिनायक तंत्र के विरुद्ध जन आन्दोलन में भाग लेते थे एवम वे विकराल रूप भी धारण करते थे यही कारण है की गोरिल ग्राम देवताओं की सूची में आते हैं क्योंकि वे जन नेता थे )..

25…छाया , नगजाड डोलगड्डी अनुष्ठान में दरियावली मन्त्र
छाया का अर्थ है किसी भूत , अतृप्त आत्मा का किसी महिला पर दोष लगना . छाय निवारण हेतु कुमौं एवम गढवाल में छाय पूजी जाति है जो की एक तांत्रिक अनुष्ठान है छाया तन्त्र के कई प्रकार के अनुष्ठान होते हैं . सादी छाया , नगजोड़ , डोलगड्डी आदि . नगजोड़ (महिला को नंगा अनुष्ठान करना पड़ता है ) अनुष्ठान के डो भाग होते हैं एक घर में एवम दूसरा किसी नदी/ गधन किनारे या किसी उन्चीए छोटी में
छाया अनुष्ठान में मान्त्रिक दरियावली भी पढ़ता है या कहें की दरियावली मन्त्र पढ़ता है . दरियावली के दोहे बहुत हैं उन्हें एक साथ संकलित करना इस मध्यम में सम्भव नही है किन्तु मैं कुछ दोहों को पाठकों के सामने उदधगृत कर रहा हूँ जिससे उन्हें समझ आ सके की गढ़वाल में नाथपंथी मन्त्रों की असलियत क्या है ? और इन मन्त्रों का हमारे आज के जीवन में भी क्योंकर महत्व है . बिना पढ़े ही हम पढ़े लिखे लोग अपनी धरोहर (मन्त्र) की अवमानना किस तरह कर रहे हैं वह दरिय्वाली के कुछ पद पढ़ कर समझ में आ जायेगा !!
दरिया लच्छन साधू का क्या गिरही क्या भेख
निहकपटी निरसंक रही बाहर भीतर एक
सत शब्द सत गूमुखी मत गजंद -मुखदन्त
यह तो तोड़े पौलगढ़ वह तोड़े करम अनंत
दांत रहे हस्ति बना पौल ण टूटे कोय
कई कर थारे कामिनी के खैलाराँ होय
मतवादी जाने नही ततवादी की बात
सूरज उगा उल्लुवा गिं अँधेरी रात
सीखत ज्ञानी ज्ञान गम करे ब्रह्मा की बात
दरिया बाहर चांदनी भीतर काली रात
दरिया बहू बकबाद तज कर अनहद से नेह
औंधा कलसा उपरे कंहाँ बरसावे मेह
जन दरिया उपदेस से भितर प्रेम सधीर
गाहक हो कोई हीक कर कहाँ दिखावे हीर
दरिया गैला जगत को क्या कीजै सुलझाय
सुलझाया सुलझे नही सुलझ सुलझ उलझाय
रोग नीसरै देह में पत्थर पूजे जाय
कंचन कंचन ही सदा कांच कांच को कांच
दरिया झूठ सो झूठ है सांच सांच सौ सांच
इसी तरह दरियावली में सैकड़ो पद हैं जो छाया या अन्य तांत्रिक अनुष्ठानो में मान्त्रिक -तांत्रिक पढ़ता है और अब आपको भी समझ में आ जाएगा की दरियावली के मन्तर दर्शन , सच्चाई , आध्यात्म , वास्तविकता से भरे हैं…..

26…कमरदानी मन्तर
ॐ नमो गुरु जी को आदेस . गुरु को जुवार विद्वामाता को नमस्कार . पैल कामरू कामरू थै : मेगल दानौ कामरू लै : छेपक दानौ करे को उजाला असी दानौ कामरा पारा: मेगल दानौ चाड़ण लागदा डांडा दानौ हलकण लागदा : बटुक भैरों हंशदो आयो चल हळव्या दिन छोड़ण लायो : घर घर देवी पूजा लायो : तुमेरू तुमे रक्षा फुर हो माई . गुरु का वाक: एक दोसरी कामरू थै : गेग्ड़ दानी कामरू लै : छेपक दानौ मारू छाल : . कामरू प्रचंडा कामुस्या हठ : जब हणुमंत शकिर ह्व़े नौलक दानौ भागी गे भागवा दानौ भागण लागवा : उबा भैरों परबत जाग्वा: भैरों खोले रथ फुर मन्तर इश्वरो वाच : तीसरी कामरू कामरू थै ; मेगल दोनों कामरू लै : गोला दानौ भयवार : बस्तरी दानौ कामरू पारा : पैरो दानौल लियो औतार : कावर देस्तो आयो भैरव खेत्रपाल : घांडी घुन्गरी उठे रिमीझिमीकार : राख देवी पारबली हमारा नाऊँ छेली मुड़ी भैसा दानौ लखब्याबद कामरू जाग्वो बटुका भैरों कामरू जाग्वों बतीस ब्यादी न्ठ्या भाग्वा बंदी जम्पो नगर जाई बतीस ब्यादी खुली जाई अप बति श्री राम की कार : ब्यादी नियो दोसरी बार : आवे कावरू अहोहार : अरहर कम्पे मेरु मन्दिर बजरंगी पार : मेगल दानौ हंकारो जाई : कावरू देसते खेड़ पेडाई : कपिला भैरों पाँव तो आयी सौल से ब्यादी लिच्ली लायो कपिला गोरिला दानौ मिल घटगडा विका वत हिंट . बावरी चोडा चड़कण : लाग्यो थरहर मन्दिर कम्पण लागवा गोठ गया इड दानौ मारा बाबरु भितर जीउराँ मार्या अब पवंति श्री रात की कार : ब्यादी नि अवे दोसरी बार : फुट मन्तर इश्वरो वाच : चौथी कामरू कामरू थैई चौडियाखेत्रपाल : गूंगी daanकतमरु लेई : गोला भैरों मन्दिर ठोई : टं का सबद ना जाने कोई फुर मन्तर इश्वरो वाच : पांचो कामरू थैई चौडिया खेत्रपाल कामरू लैई गूंगी दानौ कुंकारो ध्याऊं असी मसाण को भयो मिलाऊं : सिंगी चेडा हुकुम करे : नौलक दानौ थरहट पड़े : लुवारन घण गडायो तब असी दानौ की गल में पैराया माठल मुठल भैरों खेत्रपाल पवन्तो आयो वार ब्यादी लिली आयो ब्यादी रिबेसुर पूछण लायो : घर घर पूछे रिषेस्वर ब्यादी : नौलक दानौ लियो सादी : ब्यादी रिषेस्वरन लाया ताड़ा तब आयी पौंछे मदेस भराडा : आदा डमरू तिरसूल धारा बतीस ब्याधि लिचलेसमोदर पारा तब बीररूपी हणिमंतन लियो औतार : लेयिक मुगदर कामरू गये कामरू थरहर आणे सौल ब्यादी लोटो धरणे तले देहि बजरंगी श्री राम की कार : ब्याधि नी आवे दोसरिवार : रिख बंध थिर बन्धु बंधौ दौं दौं कार ; कामरू प्रचंड का मुख्या बीर खेत्रपाल : तब ब्यादी रिषेसुर कामरू गये घर घर तनो की पूजा लागी तब हणीमंतन मारी उछाल कम्पे कामरू मछ पाताळ : कम्पे कामरू डूंक हलाई पौन का सबद चलेच लेय्यीक मुकदर कामरू गये हणीमंत मुदगर दिनी ताल : सर्वब्यादी लिचले समोदर पार : फुर मंतर इश्व्रोवाच :
कन्च मन्तर काली मसाण : कामरू प्रचंड कामुख्या थान : भाज्दो , सीद कामरू जान : बोले देवी मन्दिर हाकि ललु ब्यादी न्ति या भागी : महाविद्या महादेवन उपाई व्यादी रिसेसुर का गल मा पिराई गोरक्नाथ समरो अब मैं तैं धुते सिषी खेत्रपाल भयो आदि सगती को पूत :टनेल सुमरी कामरू की सेउले खेत्रपाल लेखा निरंजन भयो : फुर मन्तर इश्वारोवाच : छटी कामरू कामरू थैई गेवर दानौ कामरू लेई : सुमरा दानौ करे अजाला : चौंडा दानौ कामरू पारा : चिलिमिली दानौ वसत्री दानौ को भयो मिलाज : सुमरा दानौ आदरु आयो वर्मा दानौ लेषण लागो चलहल चलणे लगा चार ब्यादी छोड़ण लाग्यो : आगे कामरू कामरू थै सुमरा सेट करौं विकराळ : लह लह हर्ट भर्यो विकराल़ा खंड प्रखंड कीय फाळ : सीद आसीद तब भयो विकराळ तब सरे व्यास्दी मरे श्री राम का काज ; हणमंत करे गुरु का वाक् : सीद की कार तब हणिमंत ल्क्नका पर जालि ट : लंकुट भैरों वा दोसरा सेट फुर मन्तर इश्वारोवाच
सातो कामरू कामरू थै सूद्र दानौ कामरू ल़े , इनल वीनल रूप उरावल खंडित मंडित सीदत सादत : बारा ब्यादी रिषेसुर पारसुर दानौ भयो : साट भाग्वे ज्युन्रा बतीस कोष : आपै वर्मा सबद फुराऊं : कामरू दानौ शंकर भैरों असरन कुंडली खेत्रपाल भैरों जेमला दानौ करे सुम्रिता त्रीण पाताळ का मरु गंजे सीदु शर ; बतीस ब्यादी लीच्ले समोदर पार जब चले बीर रूपी ह्न्मन्त चले लेईक मुदगर कामरू गये हणमंत मुदगर व्याधि णे ताल , सर्व व्याधि जी चले शगती पाताळ : सीव की अंग्वा ईश्वर की वाच्या फुर मन्तर इश्व्रोवाच : आटो कामरू मैगल दानौ कामरू लई रगत द्वि तुमको जै जैकार : तुन्मको नमस्कार बंदी कासमरी देस की विधी उखेल , मारूवाड़ देस की विद्या उखेल , कुंकुम छल़ा की विध्या उखेल जलन्द्र देस की विध्या उखेल : गोरष खंड की विध्या उखेल स्वा लाख परबत की विध्या उखेल बार लाख बैराड़ विध्या उखेल लुवार लाख भोटन्त की विध्या उखेल साट लाख सलाण की विध्या उखेल पांच लाख पछाड़ की विध्या उखेल . नौ लाख दुभाग की विध्वा उखेल मान्सरी वर की विध्वा उखेल फुर्मन्त्र इश्व्रोवाच : नौं कामरू कामरू थैं शनेशर दानौ कामरू लाई मन्दिर बैठा थ्य्र सौल हो गोपी भयो ध्यार : जमरघंटा दानौ भरे सेला काळ जिनुरा तनौ से डरयो : महाविद्वा महादेवन उषाई : व्याधि रिषेसुर का गल मा पैराई. हामू सुमरो कामुख्या माई लोचडि लोचडा भस्मत हो जाई : श्री श्रेष्ठ भैरवो वाच : फुर मन्तर इसुरोवाच . इति कमरदानि मन्तर सम्पूर्ण : शुभम…..

27…..विभूति मंत्र अथवा आपरक्षा मन्तर
(कृपया किसी भी मन्तर को अपने आप अनुष्ठान नही करना चाहिए . बगैर गुरु के अनुष्ठान नही किया जाता है )
ॐ नमो गुरूजी को आदेस गुरु को जुवार विद्वामाता को नमस्कार : विभूति माता विभूति पिता विभूति तीन लोक तारणी अंतर सीला मौन प्रवात सुमरी मै . श्री गोरख ऊँ दर्शन पैरो मै तुमरे नाऊँ ज्ञान खड्ग ल़े मै काल सन्गारो जब मरों तब डंक बजाऊं डंकण शंकण मै हाफिर खाऊं रोग पिंड विघिन बिनास ण जावै कचा घडा तरवे पाणि : डाडा वस्त्र गये कुआर शंकर स्वामी करले विचार : गल मै पैरो मोती हार : अमर दूदी पिउन धीर : बजरन्ग्या सादी ल़े रे बाबा श्री गोरखबीर : गोरख कुञ्जळी चारन्ति अर विचारती श्री गुरुपा काय नमस्तुते : घट पर गोष छेने रुतहा के वस्त्र नाथ का वचन : सीदा जने ना मा रि भय दुत : धर्म धात्री तुम को आरि : वंदि कोट तुमकौ आरि: वालारो वै फन्तासुर दाड़ी ईस पिंड का असी मसाण ताड़ी :बावन बीर ताड़ो छ कड़ दैत्र तोड़ो ताड़ी अग्नि पठ देउन उज्याळी ताड़ी ताड़ी माहा ताड़ी ईस पिंड का सब्बा सौ बाण दियुं ढोळी प्र्च्चेद का बाण दिऊँ ढाळी प्रभेद को बाण दिऊँ ढाळी प्रजन्त्र को बाण दिऊँ ढाळी प्रमन्त्र को बाण दिऊँ टाळी ल्यूं बाण दिऊँ टाळी लग्वायुं वां दिऊँ टाळी वायुं बाण दिऊँ ढाळी बाप बीर हणमंत चार डांडा पुरवी तोड्न्तो लायो : बाप बीर हणमंत चार डांडा पसीमी तोडंतो ल्याओ : बाप बीर हणमंत चार डांडा दखणी तोड्न्तो लायो बाबा बाप हणमंत चार डांडा उतरी तोड्न्तो ल्यायो : बाबा बीर बापबीर हणमंत जोधा चार दिसा का चार बाण तोड्न्तो ल्यायो : चार बाण औदी का तोड्न्तो ल्यायो बापबीर हणमंत जोधा से क्वा क्वा लंकाण बाण झंकाण बाण उखेल : बाबा बापबीर हणमंत खायु बाण उखेल लायुं बाण लग्वायुं बाण उखेल , कौं कौं बाण उखेल कवट को बाण उखेल छल को बाण उखेल छिद्र को बाण उखेल , लस्ग्दो बाण उखेल चस्गदो बाण उखेल , नाटक चेटक को बाण उखेल ,: ईस पिंड को आब्र्ट भैरों को बाण उखेल , धौण तोड्दा भैरों का बाण उखेल , मौण मोड़दा भैरों का बाप उखेल बापबीर हणमंत जोधा दृष्टि भैरों का बाण उखेल , घोर भैरों का बाण उखेल अघोर भैरों का बाण उखेल, कच्च्या भैरों को बाण उखेल , निच्या भैरों को बाण उखेल , खंकार भैरों को बाण उखेल , हंकार भैरों को बाण उखेल , लोटण भैरों को बाण उखेल , लटबटा भैरों का बाण उखेल , . सुसा भैरों का बाण उखेल , चौसठ भैरों का बाण उखेल , नौ नरसिंगुं ,बाण उखेल , .प्रथम सुन भैरोंकी बाणी को बाण उखेल , बसून भैरों की बाणी को बाण उखेल घोर भैरिओं की बाणी को बाण उखेल , अघोर भैरों की बाणी को बाण उखेल चौसठ भैरों की बाणी को बाण उखेल : बापबीर हणमंत जोधा दूना भैरों को बाणी को बाण उखेल , पोसण भैरों की बाणी को बाण उखेल, धौण तोड्दा भैरों की बाणी को बाण उखेल , मौण तोड्दा भैरों की बाणी को बाण उखेल , बाबा अठावन सौ कलुवा का बाण उखेल , बाप बीर हणमंत नि उखेली खाई त सात भाई चमारिका हात को पाणी पी : सुई का रंगत नायी: गै काच्डा दांत लगाई : नरम जाई : जागजंत्र लागतन्त्र : फुर मन्तर इश्वरो वाच : या रखवाळी विभूति मंत्रणि की छ : अपणा वास्ता आप रक्षा की छ और उखेल का काम कु सीध छ : शुभम :..

28…गांठा कि हेतु तांत्रिक सामग्री
गांठा की सामग्री
संकलन : अबोध बंधु बहुगुणा
अब गांठा की सामग्री लेषीत. पैल धूप देण . गेगाड़ो सुकाण . गैणा गू . रतागुळी की जड़ . . सूकी हल्दी . वज बराह की मेंमण . मर्च की जड़ . रूद्र का फूल . हड़ताळ गंधप इति .चीजी को धूप देणो . पैल़े गाऊं माझा जब गांठो करणों होव ट सामिग्री गुगुळ काल़ो बिष . भुत्केश कस्तुरी , काला धतूरा को जड़ . हींग, :बर्ज : : सर्वजीवनु डाला सर्व जीवनु नकल जडों सुदा आँक को जड़ , इति चीजे कठा पीसिक कूतिक चन्दन सि बणाण तांको गोला बणोण : स्र्व्जीव्नु की अमीर ,सर्व औषधि एक रतगुळी की जड़ सपेद पपड़ी की जड़ इति चीज सब भसम बनौण विभूति बणोण अपणा अंग पर मली तब सीर पर ल़ाणी नाग पर ल़ाणी बिडोणी पर ल़ाणी आफुक बि गांठो करणो येती चीजे सब गांठों पर धरणी दुखियों पर गांठा ल़ाण : षड मन्तर करणो ; सात सुट को पाणी झुंजण की जड़ डाळी सुदा तुलसी की जड़ डाळी सुदा ताछडि कि जड़ डाळी सुदा हिश्रा कि जड़ डालि सुदा किलगोड़ा कि जड़ डाळी सुदा इति चीजौन षड मंत्र करणो : सात बेरी सात चुल़ू दुखी सणी पेणु कु देणा और गांठों पर राज्श्थान कि माटी हरताल गंधप कुमाळी को माटो जड़ाउ को सिंग घोड़ाखुरि इति छेजे गांठों पर धरणी बिच गाँव मांझ कालिच्क्र लेखणो चक्र कि काख पर लांग पर हणमंत उठौणो : कुडा माझ श्रीनादबुद भैरों उठौणो काल़ो मेड़ो का आठ अंगुळ सींग होवन सो मेडा जापणो काळी कुत्ती सणी सात घरु कि खीचडि खैलौणी गाऊं मांझ भौत दुःख पोड त इतना जतन करणो बडो लोचडा पड़े त कोरा घडा पर येकोत्र सै कांडा धरणा : सरा गौं को सतनाज सब का नंग बाळ धरणो : वई घडा पर सर्व द्र्ष्तु का जड़ हरताल गंधण इति चीजे घडा पर धरणी सेमळ कि डाळी घडा पर धरणी घडा को मुख मुन्दिक मुणज्याड़ो बाँधणो कूड़ामांझ धरौणो तब भलो होऊ : जब भलो होव तब दिसौ माझ चार बले दीण चार दिसौ खीचड़ो पूरब बकरा उन्न मुर्गा पसीम गेगाड़ो दक्षिण ब्रजमुखो स्वा सेर को रोट अपणा इष्ट देव को काटणो गांठा तोड़ी देणा व गांठ घडा मा फूकी देणो व हणमंत पाणी मांझ सेल़ाइ देणो : तब गाँव को इष्टदेवता पुजणो गाईदान करौणो गाओ सुजाई देणो तब भलो हवे : पैल अफूको गाँठ करणो आफो खंडत चौंळ
नि खाण अपणो आसण अलग रखणो पराळ को आसण राखण एक बेळी भोजन करणो आफो तख को दूद दही नि खाणो अस्त्री संगम नि करणो तब करामात रंद : तीन दप ताईं षड़ मंत्र दुरोणो तब लोचड़ो जाव शुभम शुभम शुभम…

29…..गढवाल की वनौषधीय वनस्पति
खैर, बबूल, वज्रदंती , मूसली, आंवला , बेहडा , हरड़, पाटी , कंटेल़ा, सतावरी , गिलोय , पिस्सू-घास, जयंत, मदार, अमलतास, तेज, करेली, इन्द्रायण , पोस्ट, भांग, ब्रह्म्बूटी , वकायन,नीम, गुलाबांस , हरसिंगार, अश्वगंधा, शंखपुष्पी, धौलू , सिंगरी, चित्रा, ममेला,मरोड़फली अतीस, मीठा, मासी , ग्गुग्ग्ल, कुटकी, अष्टवर्ग, लहसुनिया, , सालमपंजा, मेदा, , महामेदा, पाषाणभेद, , सूमया, वन काखडि , चोरु , रत्न, ज्योति, , विषकोया, , चंद्रा, कॉल, ममीरी, चीरता, फरण , निर्देशी, , कल्याणी, कल्यारी, वनस्पा,वासा, दारु, चिरायता, अदरक, जीवक, रिश्भ्क, काकोली, क्षीर, रिधि, कचनार, जायफल, खदिर, नागरमोथा, मालकंगनी, काकोली, आपामर्ग, द्रोणपुष्पि, विदारीकन्द, जटामोंसी, भल्लातक, निर्गुन्डी, रीठा, मुलैठी, ब्रिधिकबीला, गुलबंफला, शतावरी, दालचीनी, सालाम्मिश्री, ……..

शुभम शुभम शुभम…

विशेषः- इस प्रकार के मन्त्र उग्र प्रकृति के होते है। स्व-रक्षा व गुरु निर्देशन के अभाव में प्रयुक्त करना हानिकारक है तथा सामाजिक व नैतिक दृष्टि से अनुचित भी। यहाँ पर मात्र प्राचीन विद्या के संरक्षण हेतु प्रस्तुत किये ।

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