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उड्डीस तंत्र
ज्ञानांजन शलाका द्वारा अज्ञानता को दूर कर ज्ञान चक्षुओं को खोल देने वलेश्री सदगुरुदेव को नमस्कार है। कैलाश पर्वत की चोटी पर बैठे हुये भगवान शिवसे रावण ने निवेदन किया हे प्रभु आप मुझे ऐसी कोई तंत्र विद्या बतायेंजिससे क्षणमात्र मे सिद्धि की प्राप्ति हो जाये। भगवान शिव बोले हे वस्ततुमने यह श्रेष्ठ प्रश्न पूछा है अत: लोक हितार्थ मैं उड्डीस तंत्र कावर्णन कर रहा हूँ।
जिसे उड्डीस तंत्र का पता नही है वह दूसरो पर गुस्सा करने के बाद कर भीक्या सकता है वह केवल अपने लहू और आत्मा मे चीत्कार कर सकता है और अपने हीशरीर को जला सकता है अपनी दिन चर्या को बरबाद कर सकता है। जैसे रात मेचन्द्रमा नही हो तो रात बेकार लगती है दिन मे सूर्य नही उदय हो तो दिनबेकार हो जाता है जिस राज्य मे राजा नही होता वह राज्य बेकार होती है वैसेबिना गुरु के कोई भी मंत्र की सिद्धि नही होती है।
पुस्तकों को पढकर किसी भी विद्या का ज्ञान नही होता है बिना गुरु के किसीभी तंत्र का अनुष्ठान हो ही नही सकता है,कलयुग मे जब गुरु की मान्यता हीसमाप्त हो जाती है तो तंत्र के नाम पर केवल मदारी जैसे करिश्मे दिखाने सेकोई तांत्रिक नही बनता है,गुरु मिलते भी है तो वे केवल अपना भंडार भरनेवाले होते है,जो झूठ बोलना जानता हो और मजाक करने के बाद अपनी प्रस्तुतिदेना जानता हो कलयुग मे वही ज्ञानी और भक्ति से युक्त जान पडता है,इस समयमे भजन और कीर्तन भी चकाचौंध मे किये जाते है जो जितना मोहक और कामुक गानाबजाना नृत्य करना जानता है वही बडा भजन गाने वाला और भक्त कहलाता है।
उड्डीस तंत्र मे षडकर्म का उल्लेख जरूरी है इनके विधिवत अनुष्ठान से मनुष्यकुछ सिद्धिया जरूर प्राप्त कर सकता है जिससे वह अपनी जीविका और घोरजिन्दगी को खुशी जिन्दगी मे बदल सकता है। षटकर्म विधान मे शान्ति कर्मवशीकरण स्तंभन बैरभाव उच्चाटन और मारण आदि षटकर्म कहे गये है। जब मनुष्यअधिक क्रूर व्यक्तियों और समुदाय मे घिर जाता है चारो तरफ़ कलह और मारधाड हीदेखने को मिलती है कसाई का काम करने वाले बढ जाते है तो शान्ति कर्म कीप्रधानता बताई जाती है इस शान्ति कर्म वाले विधान करने से क्रूर शक्तियांपलायन कर जाती है और खुशहाली आजाती है लोग एक दूसरे के प्रति दया करना शुरुकर देते है। यही शान्ति कर्म जब शरीर मे रोग पैदा होते है ग्रहो का दोषपैदा हो जाता है तो किये जाते है।
जब अपना स्थान बनाने केलिये और अपने को सभी के प्रति सम्मान के भाव मेप्रस्तुत करने के लिये सभी को अपने प्रभाव मे लाने के लिये जो कार्य कियेजाते है वह वशीकरण की श्रेणी मे आते है।पति पत्नी मे जब बैर भाव पैदा होजाये माता पुत्र अलग अलग हो जाये पिता का सहयोग नही बन रहा हो भाई बहिन हीखुद के बैरी हो जाये तो वशीकरण नामक प्रयोग लाभदायी होता है।
जब समस्याये लगातार आगे बढती आ रही हो बैर करने वाले लोग चारो तरफ़ से घेराडाल रहे हो पुलिस मुकद्दमा अस्प्ताल आदि के कारण लगातार घेरने लगे हो तोस्तम्भन नाम का तंत्र प्रयोग किया जाता है यही प्रयोग वे लोग भी अपनाते हैजो अपने साथ के लोगो से आगे निकलने की होड मे अपने प्रभाव को हमेशा रखने केलिये उन्हे पीछे करना चाहते है लेकिन यह पापकर्म के अन्दर आने से उड्डीसतंत्र मे इसका प्रयोग खुद के लिये हानिकारक बन जाता है,जहां कोई बैर से आगेबढने की योजना को बनाता है और छल फ़रेब से आगे निकलने की क्रिया को करता हैअनुचित काम करने के बाद वह आगे जाना चाहता है उसके लिये स्तम्भन का कार्यकरना हितकर होता है।
जब दो लोग या कई लोग मिलकर किसी के अहित की बात करते है राज्य को गिराने कीकोशिश मे होते है किसी दयावान को परास्त करने की योजना को बनाते है किसीएक समुदाय द्वारा हिंसक योजना से किसी अन्य समुदाय को विनाश की योजना आदिबनाने मे जिनका मन लगता है और वे कई लोगो के साथ मिलकर योजना को बनाकरअनुचित काम करना चाहते है या कई ग्रुप मिलकर एक ग्रुप को समाप्त करना चाहतेहै उनके लिये विद्वेषण तंत्र का प्रयोग किया जाता है जिससे वह इकट्ठे भीनही रह पाते है और वह किसी अन्य के प्रति कभी भी कोई अनुचित काम भी नही करपाते है।
जब कोई एक स्थान पर रहकर अनुचित कामो मे लगा हुआ है उसके रहते हुये कई लोगोको परेशानी हो रही है वह लोकहित के कामो को तिलांजलि देकर अनैतिक कामो कोकर रहा है जिससे समाज परिवार और घर के अन्दर कलह का वातावरण आदि बनता जारहा है एकता के अन्दर वह व्यक्ति अपनी नीति और चालाकी से दिक्कत को देनेवाला है उसके लिये उच्चाटन नामक तंत्र का प्रयोग किया जाता है। इस प्रयोगके बाद वह दिक्कत देने वाला व्यक्ति दूर चला जाता है और समाज परिवार समुदायसुरक्षित रह जाता है।
जब एक व्यक्ति लोगो के लिये हिंसा का काम करने लग जाये वह मनुष्य और जीवोको मारने काटने मे ही रुचि को रखना शुरु कर दे उसे दया का नाम ही पता नहीहो तथा वह धर्म अर्थ काम और मोक्ष नामक पुरुषार्थो का विनास करने पर तुलजाये तो उसके लिये जो प्रयोग किया जाता है वह मारण प्रयोग के नाम से जानाजाता है।
षटकर्मो के देवी देवता भी होते है जिनकी उपासना करने से इन कर्मो की सिद्धिप्राप्त होती है। शांति के काम करने के लिये वशीकरण के लिये अपनी वाणी कोप्रयोग मे लाने के लिये स्तंभन के लिये लक्ष्मी की उपासना की जाती है।ज्येष्ठा नामक शक्ति की उपासना उच्चाटन के लिये की जाती है,मारण प्रयोग केलिये काली की उपासना की जाती है।
षटकर्मो को करने के लिये दिशा का निर्धारण भी किया जाता है शांति कर्म कोकरने के लिये ईशान दिशा मे बैठ कर और ईशान मे ही अपने मुंह को करने के बादआराधना करना चाहिये वशीकरण के लिये उत्तर दिशा की तरफ़ बैठ कर और अपना मुंहभी उत्तर दिशा की तरफ़ करके बैठ कर उपासना करना चाहिये। स्तम्भन के लियेपूर्व दिशा मे मुंह करके बैठना चाहिये विद्वेषण के लिये दक्षिण-पश्चिम दिशामे बैठकर उपासना करना चाहिये और इसी दिशा मे अपने मुंह को करना चाहिये।उच्चाटन के लिये उत्तर-पश्चिम दिशा मे मुंह करके बैठना चाहिये मारण कर्म केलिये उपासना करने के लिये अग्नि कोण यानी दक्षिण-पूर्व दिशा मे बैठ कर औरमुंह करके उपासना करना चाहिये।
इन कर्मो को करने के लिये समय का भी निर्धारण किया जाता है। वैसे तो साल मेऋतुओं का आना जाना होता है लेकिन सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच मे भीछ: ऋतुयें आती जाती है। सूर्योदय से चार घंटे के लिये बसंत ऋतु का आनाहोता है,फ़िर चार घंटे के लिये ग्रीष्म ऋतु का आना होता है उसके बाद वर्षाऋतु का आना होता है,फ़िर शरद ऋतु का आना होता है फ़िर हेमंत ऋतु का आना होताहै और दूसरे सूर्योदय के समय तक शिशिर ऋतु का आना होता है।
सूर्योदय से चार घंटे की अवधि बसंत ऋतु की होती है इस समय में वशीकरण वालीसाधना की जाती है,सूर्योदय के चार घंटे बाद ग्रीष्म ऋतु में विद्वेषण कीसाधना की जाती है। सूर्योदय के आठ घंटे बाद वर्षा ऋतु के समय में उच्चाटनकी साधना की जाती है,सूर्योदय के बारह घंटे बाद मारण क्रिया की साधना कीजाती है,सूर्योदय के सोलह घंटे बाद शांति कर्म की साधना की जातीहै,सूर्योदय के बीस घंटे के बाद स्तम्भन क्रिया की साधना की जाती है यहसाधना किसी भी देश मे किसी भी ऋतु मे हमेशा ही मान्य होती है।
हिन्दू तिथि के अनुसार दूज तीज पंचमी और सप्तमी बुधवार गुरुवार और सोमवारशांति कर्म के लिये प्रयोग मे है गुरुवार सोमवार को आने वाली छठ चौथत्रियोदशी नवमी अष्टमी दसमी पुष्टि कर्मो के लिये दसवी एकादशी अमावस्यानवमी पडवा व शुक्रवार रविवार को आने वाली पूर्णिमा विद्वेषण हेतु कही गयीहै। छठ चौथ आठें विशेष रूप से प्रदोष को यदि शनिवार आता हो तो उच्चाटन करनाउचित नही होता है इसी प्र्काअर से अन्धेरी रात की चौदस अमावस्या तिथि औरशनिवार या मंगलवार के दिन मारण कर्म करना मना किया गया है,साथ ही स्तंभन केकाम हेतु बुधवार या सोमवार तथा पंचमी दसवी और पूर्णिमा तिथि खराब बताईजाती है,जब अनुकूल ग्रह हों तभी शांति पुष्ट और शुभ काम करना चाहिये। जबप्रतिकूल ग्रह हो तब मारण उच्चाटन आदि कार्य नही करना चाहिये इसी प्रकार सेरिक्ता तिथियों चौथ नौवीं चौदस मे विद्वेषण व उच्चाटन आदि काम और मृत्युयोग होने पर मारण करना नही बताया गया है।
ज्येष्ठा उत्तराषाढाअनुराधा रोहिणी उतराभाद्रपद मूल शतभिषा पूर्वाभाद्रपद आश्लेषा नक्षत्रों मेस्तंभव मोहन वशीकरण करने मे सफ़लता मिलती हिअ इसी तरह से स्वाति हस्तमृगशिरा चित्रा उत्तराफ़ाल्गुनी पुष्य व पुनर्वसु अश्विनी भरणी आर्द्राधनिष्ठा श्रवण मघा विशाखा कृत्तिका पूर्वाफ़ाल्गुनी रेवती नक्षत्रों मेंविद्वेषण व उच्चाटन कर्म करने से सफ़लता मिलती है। दिन के पूर्व भाग मेवशीकरण मध्यभाग में विद्वेषण व उच्चाटन अंतिम भाग में शांति और पुष्ट कर्मप्रदोषकाल शाम के समय मे मारण आदि कर्म करना फ़लदायी नही होता है। सिंह यावृश्चिक लगन मे स्तंभन कर्म कर्क या तुला लगन मे उच्चाटन कर्म तथा मेषकन्या धनु मीन लगन मे वशीकरण शंति पुष्टि मारण उच्चाटन शत्रुदमन आदि करनाखराब बताया गया है।
तत्व के उदय होने पर कौन सा कर्म करना उचितरहताहै वह इस प्रकार है शांति कर्म जल तत्व के उदय होने पर वशीकरण अग्नितत्व के उदय होने पर स्तंभन भूमि तत्व के उदय होने पर विद्वेषण आकाश तत्वके उदय होने पर उच्चाटन वायु तत्व के उदय होने पर मारण कर्म भूमि तत्व केउदय होने पर करना उचित नही होता है इसी तरह तत्व उदय के बारे मे जानकारतत्संबन्धी तत्वानुसार मंडल बनाकर कर्म करने से सिद्धि मिलती है। वशीकरणशोभन कार्यो के लिये लाल रंग के देव देवी शांति विष प्रभाव को दूर करने केलिये पुष्टि कर्म के लिये सफ़ेद रंग के देव का मनाया जाना उचित होताहै,स्तम्भन कार्य के लिये पीले रंग के देव देवी उच्चाटन कर्म के लिये धुयेंके रंग के देवी देवता उन्माद कर्म के लिये भी लाल रंग के देवी देवता मारणकर्म के लिये काले रंग के देवी देवता का ध्यान करना उचित होता है।
मारणकर्म मे खडे हुये रूप में उच्चाटन काल मे सोते हुये अन्य कर्मो मे सामनेबैठे हुये देवता का ध्यान करना चाहिये। सात्विक काम मे सफ़ेद देवता का सामनेबैठे हुये रूप का ध्यान करना ठीक होता है इसी प्रकार किसी प्रकार के राजसीकाम पीले व लाल रंग के व काले रंग के देवता को ध्यान मे रखना चाहियेतामसिक काल मे वाहन पर सवार काले देवता का ध्यान करना चाहिये मोक्षकामी कोसात्विक राज्य की आशा वाले को राजसी रूप का ध्यान रखना चाहिये इसी प्रकारसे शत्रु विनास पीडा हरण व समस्त विघ्न विनाश हेतु देवता का तामसिक रूप काध्यान करना चाहिये।
रुद्र मंगल गरुड गंधर्व यक्ष सर्प किन्नर पिशाचभूत असुर इंद्र विद्याधर देवता आदि सभी मंत्रो के अधिष्ठाता देवता है। एकवर्ण का मंत्र कर्तरी यानी इच्छा को खत्म करने वाला और कमजोर दो वर्ण कामंत्र सूची यानी बिना मांगे ही दुख को देने वाला तीन अक्षर का मंत्र डंडेका काम करने वाला चार अक्षर का मंत्र मूसल का काम करने वाला पांच अक्षरो कामंत्र क्रूर शनि के रूप में छ: अक्षर का मंत्र लगातार विचार मे मग्न रहनेवाला सात अक्षर का मंत्र कांच की तरह तोड देने वाला आठ अक्षर का मंत्रकांटे की तरह से चुभने वाला नौ अक्षर का मंत्र पत्थर की तरह से कठोर दस काशक्ति ग्यारह का फ़रसे जैसा बारह का चक्र तेरह का दो भालो के रूप मे चौदह कानाराच पन्द्रह का भुसुंडी अस्त्र सोलह का पद्म यानी कमल के रूप का मानाजाता है। वाणी को समाप्त करने मे कर्तरी भेद कर्म मे सूची भजन मे मुदगरअरुचि पैदा करने में मूसल बन्धन में श्रंखल विद्वेषण मे डंडा सभी कामो मेचक्र उन्माद मे कुलिस सैन्य भेदन में नाराच मारण कर्म में भुसुण्डी शांतिकर्म मे पदम मंत्र का उच्चारण करने मे अभीष्ट की प्राप्ति होती है।
पचासअक्षरो का मंत्र जो देवी माँ के रूप मे प्रयोग किया गया हो वह सभी प्रकारके भय हरने वाला कहा जाता है जो व्यक्ति जिस किसी कामना से किसी प्रकार कामंत्र जाप करता है उसकी वह मनोकामना पूरी होती है मंत्र के प्रारम्भ मे आनेवाला नाम पल्लव कहलाता है मारण विनाश ग्रह भूत आदि के शमन के लिये उच्चाटनविद्वेषण कामो के लिये पल्लव युक्त मंत्र का ही जाप किया जाता है। मंत्रके आखिर मे आने वाला नाम योजन मंत्र कहलाता है इस मंत्र का जाप वशीकरणप्रायश्चित मोहन दीपन आदि कामो मे प्रयोग किया जाता है इनके अतिरिक्तस्तंभन व विद्वेषण कर्मो मे भी इस मंत्र का जाप किया जाता है नाम केप्रारम्भ मध्य और अंत मे मंत्र आने से इसे रोध मंग कहा जाता है अभिमुखीकरणसभी प्रकार की व्याधियों बुखार ग्रह प्रकोप विष आदि के प्रभाव को दूर करनेके लिये रोध मंत्र का ही जाप किया जाना चाहिये। नाम के आदि मध्य अंत मे जोमंत्र आता है वह ग्रंथन मंत्र कहलाता है,इस मंत्र का जाप शांति कर्म मेकिया जाता है नाम के प्रारम्भ मे अनुलोम व अंत मे विलोम रूप से जो मंत्रआता है वह संपुट मंत्र कहलाता है कीलन कर्म मे संपुट मंत्र का जाप कियाजाता है इसके अलावा स्तंभन मौत को दूर करने रक्षा करने जैसे कर्म भी इसमंत्र का जाप करने से सिद्धि मिलती है।
प्रारम्भ मे पूर्ण मंत्रबोलकर साध्य का नामोच्चारण कर फ़िर प्रतिकूल भाव से पूर्ण मंत्र का उच्चारणकरने को भी तंत्रशास्त्र मे संपुट मंत्र ही कहा गया है इसी प्रकार मंत्र वसाध्य नाम के दो वर्णों का क्रमानुगत उच्चारण ही सविदर्भ मंत्र कहलाता हैइस मंत्र का उपयोग वशीकरण आकर्षण व पुष्टि कर्म आदि मे करने से सिद्धिप्राप्त होती है। बन्धन उच्चाटन व विद्वेषण मे हुं अरिष्ट ग्रह शांति हेतुहुं फ़ट पुष्टि शांति कर्म हेतु वौषट हवन करते समय स्वाहा पूजन काल मे नम:का उच्चारण किया जाना चाहिये,शांति व पुष्टि कर्म मे स्वाहा वशीकरण मेस्वधा विद्वेषण मे वषट आकर्षण में हुं उच्चाटन में वैषट मारण में फ़टबीजमंत्र का उच्चारण किया जाता है।

*************** अन्य तंत्र साधना *****************

1….* दसों दिशाओं से रक्षा करते हैं श्री भैरव
जानिए श्री भैरव की अद्भुत महिमा
श्री भैरव के अनेक रूप हैं जिसमें प्रमुख रूप से बटुक भैरव, महाकाल भैरव तथा स्वर्णाकर्षण भैरव प्रमुख हैं। जिस भैरव की पूजा करें उसी रूप के नाम का उच्चारण होना चाहिए। सभी भैरवों में बटुक भैरव उपासना का अधिक प्रचलन है। तांत्रिक ग्रंथों में अष्ट भैरव के नामों की प्रसिद्धि है। वे इस प्रकार हैं-

1. असितांग भैरव,
2. चंड भैरव,
3. रूरू भैरव,
4. क्रोध भैरव,
5. उन्मत्त भैरव,
6. कपाल भैरव,
7. भीषण भैरव
8. संहार भैरव।

क्षेत्रपाल व दण्डपाणि के नाम से भी इन्हें जाना जाता है।
श्री भैरव से काल भी भयभीत रहता है अत: उनका एक रूप ‘काल भैरव’ के नाम से विख्यात हैं।

दुष्टों का दमन करने के कारण इन्हें “आमर्दक” कहा गया है।

शिवजी ने भैरव को काशी के कोतवाल पद पर प्रतिष्ठित किया है।

2…..हिमालय अपने में कई रहस्यों को समेटे है, कई सिद्ध योगी गण हज़ारों वर्ष से वहाँ तप कर रहे हैं ! कुछ समाधि भी लिये हुए हैं ! प्राचीन साहित्य में सप्त चिरंजीवी ये बताये गये है -
‘अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीविनः॥’
अर्थात् : अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और भगवान परशुराम ये सात चिरंजीवी हैं !
इसी प्रकार हठयोग-प्रदीपिका के रचनाकार ने निम्न सिद्ध-गण अमर बताया है -
श्री-आदिनाथ-मत्स्येन्द्र-शावरानन्द-भैरवाः।
चौरङ्गी-मीन-गोरक्ष-विरूपाक्ष-बिलेशयाः॥हयो-१.५॥
मन्थानो भैरवो योगी सिद्धिर् बुद्धश् च कन्थडिः।
कोरंटकः सुरानन्दः सिद्धपादश् च चर्पटिः॥हयो-१.६॥
कानेरी पूज्यपादश् च नित्य-नाथो निरञ्जनः।
कपाली बिन्दुनाथश् च काकचण्डीश्वराह्वयः॥हयो-१.७॥
अल्लामः प्रभुदेवश् च घोडा चोली च टिंटिणिः।
भानुकी नारदेवश् च खण्डः कापालिकस् तथा॥हयो-१.८॥
इत्य् आदयो महासिद्धा हठ-योग-प्रभावतः।
खण्डयित्वा काल-दण्डं ब्रह्माण्डे विचरन्ति ते॥हयो-१.९॥
अर्थात – श्री आदिनाथ जी, मत्स्येन्द्र, नाथ, साबर, अनन्द, भैरव, चौरन्गी, मीननाथ, गोरक्षनाथ, विरूपाक्ष, बीलेशय, मन्थन, भैरव, सिद्धि बुद्धै , कंथडी, कोरन्तक, सुरानन्द, सिद्धिपाद, चर्पटी , कानेरि, पूज्यपाद, नित्यनाथ, निरन्जन, कपालि, विन्दुनाथ, काक चन्डीश्वर, अल्लामा, प्रभुदेव, घोडा चोलि, टिंटनि, भानुकि , नारद आदि ये महासिद्ध महर्षि काल-दण्ड को खंडित कर ( मृत्यु को जीत कर ) अमरत्व को प्राप्त हुये हैं तथा ब्रम्हाण्ड में विचरण कर रहे है !
इनके अलावा मार्कंडेय , गोपीचंद , भरथरी , आल्हा भी अमर माने गये है !
आज भी किन्ही सौभाग्यशाली योगियों – भक्तो – साधको को इनके दर्शन होते है !
जूनागढ़ , अर्बुदाचल , हिमाचल और आसाम के नेपाल भूटान सीमावर्ती खासकर कामाख्या और अरुणाचल के क्षेत्र में ऐसे काफी अनुभव पढ़े सुने जाते हैं जहाँ हज़ार साल या इससे अधिक की उम्र के सिद्ध योगी सन्त अदि अदृश्य रूप में विचरण और साधना करते हैं ! वहां उनके अदृश्य मठ भी हैं ! जब कोई उच्च कोटि का साधक वहां पहुँचता है तो किसी किसी को इनके दर्शन हो जाते हैं और कुछ को वे अपने मठों में भी ले जाते हैं ! अधिकतर पूर्व जन्म के गुरु या गुरु भाई होते हैं ! सब उन्ही की इच्छा से होता है ! कई मठों में लोगों को योगिनियों के दर्शन भी हुए हैं……

3….माँ काली कृपा प्राप्ति मंत्र साधना :-
मंत्र :- ॐ काली-काली, महा-काली, इन्द्र की बेटी ब्रह्मा की साली, कुचेपान बजावे ताली, चल काली कल्कत्ते वाली, आल बांधू-ताल बांधू ओर बांधू तलैया, शिवजी का मंदिर बांधू, हनुमान जी की दुहेया, शब्द साँचा पिंड काचा, फुरे मंत्र ईश्वरो वाचा ।।

विधि :- इस मंत्र का अनुस्थान 21 दिन का हे । साधक को नदी के किनारे एकांत स्थान पे बेठकर शुद्ध घी का दीपक जलाकर सुगंधित धूप करके ऋतुफल ओर मिठाई का नेवेध करे ओर रोज 2 माला का जाप करे तो ये मंत्र सिद्ध हो जाएगा । मंत्र जाप के दोहरन जब माँ कालि प्रत्यक्ष दर्शन दे तब दो पान एक पान सीधा ओर एक पान उल्टा (पान का चिकास वाला जो बाग हो उसको ऊपर रखे) रखके उसके ऊपर कपूर जलाकर साधक को अपनी अनामिका उंगली से खून की दो बूंद जमीन पे गिरा के माँ कालि से 3 वचन ले .।।

4…..चामुंडा स्वप्न सिद्धि मंत्र साधना :-

ॐ ह्रीम आगच्छा गच्छ चामुंडे श्रीं स्वाहा ।।

विधि :- सबसे पहले मिट्टी ओर गोबर से जमीन को लीप ले ओर वो जगह पर कोई बिछोना बिछाले । फिर पंचोपचार से मटा का पूजन करके देवी मटा को नेवेध्य अर्पण करे । उसके बाद रुद्राक्ष की माला से उपरोक्त मंत्र का जाप 10,000 बार करे ओर देवी का द्यान करे इस तरह मंत्र सिद्धि कारले फिर उसके बाद जब कभी भी कोई प्रश्न मन मे हो तो मंत्र का 1 माला यानि 108 बार मंत्र का जाप करके सो जाए तो देवी अर्धरात्रि को स्वप्न मे आकार प्रश्न का उत्तर प्रदान करती हे …

5…..बटुक भैरव मंत्र :-

मंत्र :- ॐ नमो श्री बटुक भैरवाय जोगेन्द्राय, आस्या पुरणाय चिंतत कुयना कुरु कुरु,
कारय कारय सर्व विस्त्क मानय मानय, स्त्री हर हर हारय हारय ॐ ह्रीम श्रीं बटुक भैरवाय नमः ।।

विधि :- रविवार के दिन उपवास करे ओर क्षेत्रपाल की चोकी बनाए । गूगल का धूप करे और लाल कनेर के पुष्प मूर्ति को चढ़ाये। ओर स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहेनके चोकी के बीच मे बेथकर बार हजार मंत्र का जाप करना हे । जब जाप खतम हो जाए उसी वक्त क्षेत्रपाल (बटुक भैरव) साधक के सामने प्रत्यक्ष होकर वरदान मांगने को कहे तो पहले बकरे के कान की बाली दे तो क्षेत्रपाल भैरव प्रससन होकर वरदान प्रदान करते हे । उसकी वक्त साधक जो चाहता हे वोह वरदान मांग ले ।..

6….जीन मंत्र साधना :-

मंत्र :- बिस्मिल्लाहिरहिमानीरहिम लाइल्ला लिल्लाह मुहम्मद रसूललिल्ला मुसलमानी अबादानी मरीन खाय परनी छोड़ मुस्लमान बहिस्त को खावे हुआ ईदा का रोज असल कर सैयद नहाजा बाबा तोप नगाड़ा बकतर तोप मंगाय दिया प्याले सहायबा सबचल खाये चौकी पे चौकी चली अम्बर हुआ सेत सैयदो से शरीहुई तरवर तारागढ़ के खेत खिगासा घोडा नहीं मीना सामर्द नहीं जिसने सरवार तारागढ़ तोरा अजयपाल सा देव नहीं जिसने चक्कर चलाया मीरा पड़ी नमाज़ वह का वही ठहराया आतिलकुरसी बंद गकुरात घाटे बाढे तुही समान आकाश बांध पाताल बांध बांधे नदी तलाब देह बांध धड को भी बांधे कहा हुये जार मर घटिया मसान हदिया मसान जहिहिया मसान मिरमिया मसान फलकिया मसान कालका ब्रह्मराक्षस की चुडेल पृथ्वी की देविदेवताओ को बांध कर वश मे न करे तो सूअर काट सुअर की बोटी दांते तारे दबाएगा सतर नाड़ी बहतर कोठा से बांध बांधकर जायेगा तो चमार के छिले और धोबी की नाद मे पड़े चलतों मेरी भक्ति गुरु की शक्ति फलो मंत्र ईश्वरी वाचा छूँ मंत्र ।।

विधि :- गुरुवार या शुक्रवार की रात को दो बजे अपने घर से निकले और अग्नि, धूप, अत्तर और ऋतुफल लेके श्मशान मे जाये । वाघंबर पे बेठके मंत्र का 5,000 जाप करे । इस तरह 21 दिन तक जाप करे । ये मंत्र के पीरदेवता ज्ज्स्को जीन्न कहते हे । वो साधक के सामने आके साधक के सब कार्यो को पूर्णा करेगा उससे पहले साधक मंत्र के देवता से वचन ले ले ।।।

7….रक्षा विधान
जय गुरुदेव !! रक्षा विधान… ॐ गुरुर्वै महाशान्तिक भूतप्रेतपिशाचराक्षसानां सर्वदष्टिभयविनाशाय स्वाहा | ॐ नमो भगवते रुद्राय स्वाहा | ॐ नमो भैरवाय स्वाहा | ॐ नमो गणेश्वराय स्वाहा | ॐ नमो दुर्गायै स्वाहा | ॐ सिं सिंह शार्दुल गजेन्द्र-ग्राह-वक्र सर्पव्याघ्रादिमृगान् बन्धामी | ॐ श्रोत्रं बन्धामी | ॐ वाछं बन्धामी | ॐ गति बन्धामी |ॐ आशां बन्धामी |ॐ सवबन्धं बन्धामी | ॐ सर्वमायां बन्धामी | ॐ सर्वजनाम् बन्धामी | ॐ बन्धं बन्धामी कुरु स्वाहा| ॐ पंचयाजनविस्तीर्णे रुद्रो बदती मण्डलं कुरु स्वाहा | ॐ नमो भगवते सदगुरु रात्रीज्वर-सायंज्वर-प्रातज्वर-अग्निज्वर-शीतज्वर-द्वन्द्वज्वर-राक्षसज्वर-भूतज्वर-माण्डज्वर-पापीज्वर-मति-प्रयोगादी ज्वरविनाशाय स्वाहा | अक्षिशूल-कुक्षिशूल-कर्णशूल-प्राणशूल-दन्तशूल-गण्डशूल-शिरःशूल-शिरोर्ध्दशूल-पादध्दशूल-पदाध्दशूल-सर्वांगशूल विनाशाय स्वाहा | ॐ सर्वव्याधि विनाशाय स्वाहा |ॐ सर्वशत्रु विनाशाय स्वाहा | अपहृतशोकादि विनाशाय स्वाहा |ॐ आत्मरक्षो प्राणरक्षे अग्निरक्षे ते शावकं बन्धामी ॐ ह्रां ह्रीं देहि स्वाहा | ॐ इन्द्राय देहि स्वाहा | ॐ स्वर स्वर ब्रम्हादै इति विजाते विष्णुदण्ड ॐ ज्वर ज्वर ईश्वरदण्ड ॐ जं तं नं भंजतिरितीदण्ड ॐ प्रहर ह्रीं लीं व्हिं लीं यमदण्ड ॐ नित्य-नित्य दण्डविषये विश्वाश्ववाहिनी हंसिनी शूलिनी गारुड़ी रक्षे आयु: पुत्रं प्रवक्ष्यामि |
कभी भी खुदको असुरक्षा की महसूस हो तो इस रक्षा मंत्र का पाठसे निश्चित रूप से सुरक्षा मिलेगी |

8…“हनुमान जंजीरा” नामक यह मंत्र आसान और बेहद कारगर है.

इस मंत्र की प्रतिदिन एक माला जप करने से मंत्र सिद्ध हो जाता है। हनुमान मंदिर में जाकर साधक अगरबत्ती जलाएँ। इक्कीसवें दिन उसी मंदिर में एक नारियल व लाल कपड़े की एक ध्वजा चढ़ाएँ। जप के बीच होने वाले अलौकिक चमत्कारों का अनुभव करके घबराना नहीं चाहिए। यह मंत्र भूत-प्रेत, डाकिनी-शाकिनी, नजर, टपकार व शरीर की रक्षा के लिए अत्यंत सफल है।

श्री हनुमान मंत्र (जंजीरा)

ॐ हनुमान पहलवान पहलवान, बरस बारह का जबान,

हाथ में लड्‍डू मुख में पान, खेल खेल गढ़ लंका के चौगान,

अंजनी‍ का पूत, राम का दूत, छिन में कीलौ

नौ खंड का भू‍त, जाग जाग हड़मान

हुँकाला, ताती लोहा लंकाला, शीश जटा

डग डेरू उमर गाजे, वज्र की कोठड़ी ब्रज का ताला

आगे अर्जुन पीछे भीम, चोर नार चंपे

ने सींण, अजरा झरे भरया भरे, ई घट पिंड

की रक्षा राजा रामचंद्र जी लक्ष्मण कुँवर हड़मान करें।

9….सप्त श्लोकी दुर्गा स्तोत्र
श्री दुर्गा सप्तशती, देवी की पूजा में पठन किया जाने वाला यह सर्वमान्य प्रमुख ग्रन्थ है . यह १३ अध्याय (३०० श्लोकों) में संस्कृत में होने के कारण प्रतिदिन पठन करना कठिन है, इसलिए इसे केवल सात श्लोकों में सारांशित किया है, जिसका सर्व साधारण लोग प्रतिदिन पठन करते हैं। इसे सरल हिंदी भाषा मं् पद्यान्तरित किया है जिससे समझने में आसान हो।

जय जगदेश्वरी जय जगद्जननी, वंदन करूँ तुम्हे मैं निशिदिनी !

… ज्ञानीजनों का चित्त भुलाती, बलपूर्वक उन्हें मोहित करती , महामाया सृष्टि रचयिता, विश्व-रूपा विश्व-मोहिनी //१//

स्मरण मात्र से दुःख भय हरिणी, चिंतन करते बुद्धि प्रदायिनी , भय दारिद्र्य दुःख विनाशिनी, चित्त सदा उपकारी चिरंतिनी//२//

सर्व मंगला मंगलदायिनी, शिवा स्वरूपा शिवकल्यानी, सिद्धि भक्ति मुक्ति प्रदायिनी, नमन त्रम्ब्केश्वरी नारायणी //३//

शरणांगत की रक्षा करती, उनके सान्निध्य सदैव रहती, उनकी दुख पीड़ा हरती, नमस्कार भगवती सुखदायिनी //४//

सर्वेश्वरी तू सर्व स्वरूपिणी, सर्वशक्तिमय दिव्यरूपिणी, विश्व का भवताप हारिणी, नमन भवानी विश्वरूपिणी //५//

प्रसन्न होकर रोगमुक्त करे, रुष्ठित हो कामना नष्ट करे, शरणांगत को शरणदाता करे, शरणांगत वत्सला त्रिनेत्री //६//

त्रैलोकेश्वरी तुम्हे प्रार्थना, समस्त बाधा दूर करना, मम दैत्यों का नाश करो हे, महिषासुर मर्दिनी भवानी //६//

10….नानक जी अन्नपूर्णा मन्त्र

ॐ सत्त नाम का सभी पसारा, धन गगन में जो वर तारा।
मन की जाय जहाँ लग आखा, तहँ तहँ सत्त नाम की राखा।
अन्नपूरना पास गई बैठाली, थुड़ो गई खुसाली।
… चिनत मनी कलप तराये। कामधेनु को साथ लियाये।
आया आप कुबेर भण्डारी, साथ लक्ष्मी आज्ञाकारी।
सत गुरू पूरन किया सवारथ, विच आ बइठे पाँच पदारथ।
राखा ब्रह्मा विशनु महेश काली भैरव हनु गनेस,
सिध चैरासी अरू नवनाथ बावन वीर जती चैसाठ।
धाकन गमन पिरथवी का वासन, रहे अम्बोल न डोले आसन।
राखा हुआ आप निरंकार, थुड़ी भाग गई समुन्दरो पार।
अतुत भण्डार, अखुत अपार, खात खरचत कुछ होय न ऊना, देव देवाये दूना चैना।
गुरू की झोली मेरे हाथ, गुरू वचनी बँधे पँच तात।
वेअण्ट बेअण्ट भण्डार, जिनकी पैज रखी करतार।
मन्तर पूरना जी का संपूरन भया।
बाबा नानकजी का गुरू के चरन कमल को नमस्ते नमस्ते नमस्ते।

11 बार प्रतिदिन जप करें। 1000 जप हो जाने पर किसी प्रकार की कमी नहीं होती।

11….मूठ निवारक तंत्र-मंत्र
यह पूर्व काल से ही आदिवासी जनजातियों द्वारा अपनाये जाने वाला यह निकृष्ट मारण प्रयोग है…हांडी उड़ने की क्रिया भी काफी निकृष्ट होती होती है. हाँ इनमें यदि यह किसी जानकार व्यक्ति के हाथ लग जाये तो वह भेजने वाले को भी इसे वापस भेज कर मार सकता है. जिस व्यक्ति पर हंडिया / मूठ का प्रयोग किया गया है वह व्यक्ति अपने ऊपर मंडराती हुई हांडी देखते ही तत्काल निम्नलिखित प्रयोग करेगा तो बच जायेगा और मूठ वापस भेजने वाले के पास चली जायेगी :-

१. हंडिया देखते ही अपने हाथ की अंगुली को काट कर भूमि पर रक्त छिटका दे तो मूठ वापस चली जायेगी.

२. निम्न जाति का जूठन / मलमूत्र या स्वमूत्र जिह्वाग्र में लगाते हुए एकटक उस हंडिया की ओर आकाश में देखता रहे तो मूठ वापिस चली जायेगी.

३. मूठ निवारण मंत्र :

“ऊँ ह्रीं आई को लगाई को जट जट खट खट

उलट पलट लूका को मूका को नार नार

सिद्ध यति की दोहाई मन्त्र सांचा फुरो वाचा”

विधि : दीपावली या ग्रहण की रात्री को एक हज़ार जाप कर मन्त्र सिद्ध कर ले. फिर उडद के दानों पर २१ बार मन्त्र पढ़ कर जिधर से मूठ आ रही हो उधर या सभी दिशाओं में और जिस व्यक्ति के मूठ लगी हो उसके ऊपर वो दाने गिरा देन, तो मूठ शांत हो जायेगी…

12….भैरव के 52 रूपों में किसी भी रूप या पूर्ण 52 भैरव की साधना हर एक तंत्र साधक को करने ही चाहिए।
हर एक साधना की एक विशिष्ट दीक्षा पद्दति होती है हर एक साधना की अलग सिद्धि सूत्र जो केवल और मात्र गुरुमुख से ही प्राप्त की जा सकती है। पर क्या अगर किसी को सद्गुरु प्राप्त ना हुवा हो तो वह भैरव उपासना नहीं कर सकता??? कर सकता है पर स्तोत्र के रूप में।
आगे जो स्तोत्र दिया जा रहा है यह स्तोत्र साधक की हर इच्छा पूर्ण करने में सक्षम है। चाहे कोही भी हो। हर इच्छा अवश्य पूर्ण होती ही है।
और हर एक व्यक्ति को इस स्तोत्र का अनुष्ठान करने ही चाहिए।

सबसे पहले साधक श्री भैरव नाथ को या भगवान् महादेव को अपने गुरु रूप में स्वीकार करें।

इस स्तोत्र पाठ की विधान अत्यंत सरल है। साधक मंगलवार अपने सामने मात्र “बटुक भैरव यन्त्र ” स्थापित कर यन्त्र की पंचोपचार पूजन कर इस स्तोत्र की नित्य पाठ करें(एक बार में कम-से-कम 51 आवश्यक है।)। यह स्तोत्र 11000 पाठ से सिद्ध होती है। इसके बाद स्तोत्र की मात्र 1 पाठ से उच्चाटन और स्तम्भन जैसे कार्य किये जा सकते हैं।
नैवेद्य पूजन के बाद किसी कुत्ते को खिल दें।

विनियोग
अस्य श्री बटुक भैरवनामाष्टशतकाऽपदुद्धारणस्तोत्रमंत्रस्य वृहदारण्यक ऋषिः श्री बटुक भैरवो देवता, अनुष्टुप छन्दः ह्रीं बीजं बटुकयैति शक्तिः प्रणव कीलकम अभीष्टसिद्धयर्थे विनियोगः

करन्यास
ह्रां वां अंगुष्ठाभ्यां नमः
ह्रीं वीं तर्जनीभ्याम नमः
ह्रूं वूं मध्यमाभ्याम नमः
ह्रैं वैं अनामिकाभ्याम नमः
ह्रों वों कनिष्ठिकाभ्याम नमः
ह्रः वः करतलकरपृष्ठाभ्याम नमः
[ करन्यासवत हृद्यादी न्यास ]

नैवेद्य
ऎह्ये हि देवी पुत्र बटुकनाथ कपिलजटाभारभास्वर त्रिनेत्र ज्वालामुख सर्व विघ्नान नाशय नाशय सर्वोपचार सहित बलिं गृहण गृहण स्वाहा

ॐ भैरवो भूतनाथश्च भूतात्मा भूतभावन।
क्षेत्रज्ञः क्षेत्रपालश्च क्षेत्रदः क्षत्रियो विराट्॥१॥
श्मशान वासी मांसाशी खर्पराशी स्मरांतकः।
रक्तपः पानपः सिद्धः सिद्धिदः सिद्धिसेवित॥२॥
कंकालः कालशमनः कलाकाष्टातनु कविः।
त्रिनेत्रो बहुनेत्रश्च तथा पिंगल-लोचनः॥३॥
शूलपाणिः खङ्गपाणिः कंकाली धूम्रलोचनः।
अभीरूर भैरवीनाथो भूतपो योगिनीपतिः॥४॥
धनदो अधनहारी च धनवान् प्रतिभानवान्।
नागहारो नागपाशो व्योमकेशः कपालभृत्॥५॥
कालः कपालमाली च कमनीयः कलानिधिः।
त्रिलोचनो ज्वलन्नेत्रः त्रिशिखा च त्रिलोकपः ॥६॥
त्रिनेत्र तनयो डिम्भशान्तः शान्तजनप्रियः।
बटुको बहुवेषश्च खट्वांग वरधारकः॥७॥
भूताध्यक्षः पशुपतिः भिक्षुकः परिचारकः।
धूर्तो दिगम्बरः शूरो हरिणः पांडुलोचनः॥८॥
प्रशांतः शांतिदः शुद्धः शंकर-प्रियबांधवः।
अष्टमूर्तिः निधीशश्च ज्ञान-चक्षुः तपोमयः॥९॥
अष्टाधारः षडाधारः सर्पयुक्तः शिखिसखः।
भूधरो भुधराधीशो भूपतिर भूधरात्मजः॥१०॥
कंकालधारी मुण्डी च नागयज्ञोपवीतिकः ।
जृम्भणो मोहनः स्तम्भो मारणः क्षोभणस्तथा ॥११॥
शुद्धनीलांजन प्रख्यो दैत्यहा मुण्डभूषितः।
बलिभुग् बलिभंगः वैद्यवीर नाथी पराक्रमः ॥१२॥
सर्वापित्तारणो दुर्गे दुष्टभूत-निषेवितः।
कामी कलानिधि कान्तः कामिनी वशकृद्वशी॥१३॥
सर्व सिद्धि परदों वैद्यः प्रभुर्विष्णुरितीव हि
अष्टोतर शतं नाम्नां भैरवस्य महात्मनः ॥१४॥
मयाते कथितं देवी रहस्य सर्व कामिकं
यः इदं पठत स्तोत्रं नामाष्टशतमुत्तमम् ॥१५॥
—–इति—–

13….हर साधना से पूर्व भैरव साधना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है ….. पर कैसे करें भैरवनाथ की स्तुति??
यहाँ नीचे भैरव की सबसे प्रभावकारी स्तोत्रों में से एक स्तोत्र दे रहा हूँ जिससे भैरव तांडव स्तोत्र का भी संज्ञा दिया गया है।
बस पूर्ण भाव विभोर होकर स्तुति करें और देखें भैरव नाथ की चमत्कार।

यं यं यं यक्ष रूपं दश दिशि विदितं भूमि कम्पायमानं
सं सं सं संहार मूर्ति शुभ मुकुट जटा शेखरं चन्द्र विम्बं
दं दं दं दीर्घ कायं विकृत नख मुख चौर्ध्व रोमं करालं
पं पं पं पाप नाशं प्रणमतं सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ १ ॥

रं रं रं रक्तवर्णं कटक कटितनुं तीक्ष्णदंष्ट्रा विशालं
घं घं घं घोर घोसं घ घ घ घ घर्घरा घोर नादं
कं कं कं कालरूपं धग धग धगितं ज्वलितं कामदेहं
दं दं दं दिव्य देहं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ २ ॥

लं लं लं लम्ब दन्तं ल ल ल ल लुलितं दीर्घ जिह्वाकरालं
धूं धूं धूं धूम्रवर्ण स्फुट विकृत मुखंमासुरं भीम रूपं
रूं रूं रूं रुण्डमालं रुधिरमय मुखं ताम्र नेत्रं विशालं
नं नं नं नग्नरूपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ ३ ॥

वं वं वं वायुवेगं प्रलय परिमितं ब्रह्मरूपं स्वरूपं
खं खं खं खड्गहस्तं त्रिभुवन निलयं भास्करं भीमरूपं
चं चं चं चालयन्तं चल चल चलितं चालितं भूत चक्रं
मं मं मं मायकायं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ ४ ॥

खं खं खं खड्गभेदं विषममृतमयं काल कालान्धकारं
क्षि क्षि क्षि क्षिप्र वेग दह दह दहन नेत्रं सांदिप्यमानं
हूं हूं हूं हूंकार शब्दं प्रकटित गहन गर्जितं भूमिकंपं
बं बं बं बाललिलम प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं ॥ ५ ॥

14….कामख्या साधना :-

यह मंत्र वेदोक्त है और पुर्णता प्रभवि भि है, सिर्फ 3 हि दिन मे इस मंत्रा कि अनुभुतिया हमारे सामने आती है,इस साधनासे कइ अपुर्ण इच्याये त्वरित पूर्ण हो जाति है,परंतु मन मे अविश्वास जाग्रत हो तो साधना कि अनुभुतिया नहीं मिल पाति है, और ये साधना कम से कम 11 दिन तो करनि हि चहिये.
साधना किसी भि नवरात्रि मे कर सक्ते है, रोज मंत्र कि 108 बार पाठ मतलब 1 माला करनि है, आप चाहे तो अपनी अनुकुलता के नुसार 3, 5, या 11 मालाये भि कर सक्ते है,आसन लाल रंग कि हो वस्त्र कोइ भि हो सक्ति है,माला लाल हकिक या रुद्राक्ष कि.
मा भगवति या कामाख्या जि का चित्र स्थापित किजिये और चमेलि कि तेल का दिपक आवश्यक है,साथ मे साधना से पुर्व हि गुरुपूजन और गुरुमंत्रा कि जाप भि आवश्यक है,फिर कालभैरव मंत्रा कि 21 ,51 या 108 बार जाप भि आवश्यक है,और सद्गुरुजि से अपनि कामनापुर्ति हेतु प्रार्थना किजिये और कालभैरव जि से आज्ञा मांगिये.

॥ ॐ ह्रीम कालभैरवाय ह्रीम ॐ ॥

अपनी मनोकामना का उच्यारन करते हुये एक लाल कनेर का फूल भगवति जि कि चरणोमे समर्पित किजिये और मंत्र जाप प्रारम्भ किजिये.

मंत्र : -

ॐ कामाख्याम कामसम्पन्नाम कामेश्वरिम हरप्रियाम ।
कामनाम देहि मे नित्यम कामेश्वरि नमोस्तुते ॥

15….[मनोकामना पुर्ति और सर्वजन आकर्षण हेतु गणपति साधना] :-

सामग्री :-

पारद निर्मित मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त विजय गणपति की मुर्ति, जलपात्र, लाल चन्दन, कनेर के पुष्प, अगरबत्ती, शुद्ध गाय का घ्रत का दीपक,। माला:- लाल मूंगे की । समय:- ब्रम्ह मुहरत । दिन:- बुधवार । आसन:- लाल रंग का उनी । वस्त्र:- लाल । दिशा:- पूर्व दिशा । जपसंख्या:- इक्कीस सजार [21000] अवधि:- इक्कीस दिन [21 दिन]

मंत्र:- ओम वर वरदाय विजय गणपतये नम: ।।

प्रयोग:- सर्वजन आकर्णण हेतु यह प्रभावी साधना है । सबसे तहले पारद गणपति को स्नान कराकर उस पर केसर लगावे, तथा उसे रक्त चन्दन से तिलक करे , सामने गुड़ का भोग लगा के इक्कीस 21 पुष्पो से उसका पुजन करे , पुष्प कनेर के हो तो ज्यादा उचित है, पर यदि कनेर के पुष्प उपलब्ध ना हो तो किसी लाल रंग के पुष्प का प्रायोग करे । इसके बाद मंत्र जप प्रारम्भ कर दे और जब इक्कीस दिनो 21000 मंत्र जप पुर्ण होजाय तो कुंवारी कन्याओ को भोजन करा कर कुछ भेँट दे , एसा करने पर कुछ ही दिनो मेँ आपकी जो कामना होगी वह पुर्ण हो जायेगी।

16…..देवाकर्षण मन्त्र

“ॐ नमो रुद्राय नमः। अनाथाय बल-वीर्य-पराक्रम प्रभव कपट-कपाट-कीट मार-मार हन-हन पथ स्वाहा।”

विधिः- कभी-कभी ऐसा होता है कि पूजा-पाठ, भक्ति-योग से देवी-देवता साधक से सन्तुष्ट नहीं होते अथवा साधक बहुत कुछ करने पर भी अपेक्षित सुख-शान्ति नहीं पाता। इसके लिए यह ‘प्रयोग’ सिद्धि-दायक है।
उक्त मन्त्र का ४१ दिनों में एक या सवा लाख जप ‘विधिवत’ करें। मन्त्र को भोज-पत्र या कागज पर लिख कर पूजन-स्थान में स्थापित करें। सुगन्धित धूप, शुद्ध घृत के दीप और नैवेद्य से देवता को प्रसन्न करने का संकल्प करे। यम-नियम से रहे। ४१ दिन में मन्त्र चैतन्य हो जायेगा। बाद में मन्त्र का स्मरण कर कार्य करें। प्रारब्ध की हताशा को छोड़कर, पुरुषार्थ करें और देवता उचित सहायता करेगें ही, ऐसा संकल्प बनाए रखें।
17…नवनाथ-स्तुति

“आदि-नाथ कैलाश-निवासी, उदय-नाथ काटै जम-फाँसी। सत्य-नाथ सारनी सन्त भाखै, सन्तोष-नाथ सदा सन्तन की राखै। कन्थडी-नाथ सदा सुख-दाई, अञ्चति अचम्भे-नाथ सहाई। ज्ञान-पारखी सिद्ध चौरङ्गी, मत्स्येन्द्र-नाथ दादा बहुरङ्गी। गोरख-नाथ सकल घट-व्यापी, काटै कलि-मल, तारै भव-पीरा। नव-नाथों के नाम सुमिरिए, तनिक भस्मी ले मस्तक धरिए। रोग-शोक-दारिद नशावै, निर्मल देह परम सुख पावै। भूत-प्रेत-भय-भञ्जना, नव-नाथों का नाम। सेवक सुमरे चन्द्र-नाथ, पूर्ण होंय सब काम।।”

विधिः- प्रतिदिन नव-नाथों का पूजन कर उक्त स्तुति का २१ बार पाठ कर मस्तक पर भस्म लगाए। इससे नवनाथों की कृपा मिलती है। साथ ही सब प्रकार के भय-पीड़ा, रोग-दोष, भूत-प्रेत-बाधा दूर होकर मनोकामना, सुख-सम्पत्ति आदि अभीष्ट कार्य सिद्ध होते हैं। २१ दिनों तक, २१ बार पाठ करने से सिद्धि होती है।
18…नवनाथ-शाबर-मन्त्र

“ॐ नमो आदेश गुरु की। ॐकारे आदि-नाथ, उदय-नाथ पार्वती। सत्य-नाथ ब्रह्मा। सन्तोष-नाथ विष्णुः, अचल अचम्भे-नाथ। गज-बेली गज-कन्थडि-नाथ, ज्ञान-पारखी चौरङ्गी-नाथ। माया-रुपी मच्छेन्द्र-नाथ, जति-गुरु है गोरख-नाथ। घट-घट पिण्डे व्यापी, नाथ सदा रहें सहाई। नवनाथ चौरासी सिद्धों की दुहाई। ॐ नमो आदेश गुरु की।।”

विधिः- पूर्णमासी से जप प्रारम्भ करे। जप के पूर्व चावल की नौ ढेरियाँ बनाकर उन पर ९ सुपारियाँ मौली बाँधकर नवनाथों के प्रतीक-रुप में रखकर उनका षोडशोपचार-पूजन करे। तब गुरु, गणेश और इष्ट का स्मरण कर आह्वान करे। फिर मन्त्र-जप करे। प्रतिदिन नियत समय और निश्चित संख्या में जप करे। ब्रह्मचर्य से रहे, अन्य के हाथों का भोजन या अन्य खाद्य-वस्तुएँ ग्रहण न करे। स्वपाकी रहे। इस साधना से नवनाथों की कृपा से साधक धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। उनकी कृपा से ऐहिक और पारलौकिक-सभी कार्य सिद्ध होते हैं।
विशेषः-’शाबर-पद्धति’ से इस मन्त्र को यदि ‘उज्जैन’ की ‘भर्तृहरि-गुफा’ में बैठकर ९ हजार या ९ लाख की संख्या में जप लें, तो परम-सिद्धि मिलती है और नौ-नाथ प्रत्यक्ष दर्शन देकर अभीष्ट वरदान देते हैं।

19….कैसे करे भैरवनाथ को प्रसन्न :-
भैरवनाथ को काले वस्त्र और नारियल का भोग लगाना चाहिए .
कुत्तों को भोजन अवश्य खिलाना चाहिए,
काले रंग के कुते को पालने से भैरव प्रसन्न होते हैं

… भैरव जी के प्रमुख दो रूप :- 1:-बटुक भैरव, 2:-काल भैरव
बटुक भैरव : ‘बटुकाख्यस्य देवस्य भैरवस्य महात्मन:। ब्रह्मा विष्णु, महेशाधैर्वन्दित दयानिधे।।’- अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि देवों द्वारा वंदित बटुक नाम से प्रसिद्ध इन भैरव देव की उपासना कल्पवृक्ष के समान फलदायी है। बटुक भैरव भगवान का बाल रूप है। इन्हें आनंद भैरव भी कहते हैं। उक्त सौम्य स्वरूप की आराधना शीघ्र फलदायी है। यह कार्य में सफलता के लिए महत्वपूर्ण है। उक्त आराधना के लिए मंत्र है- ।।ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ।।
काल भैरव : यह भगवान का साहसिक युवा रूप है। उक्त रूप की आराधना से शत्रु से मुक्ति, संकट, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में विजय की प्राप्ति होती है। व्यक्ति में साहस का संचार होता है। सभी तरह के भय से मुक्ति मिलती है। काल भैरव को शंकर का रुद्रावतार माना जाता है। काल भैरव की आराधना के लिए मंत्र है- ।।ॐ भैरवाय नम:।।
प्रसिद्ध भैरव मंत्र :-
ॐ भं भैरवाय नमः ,
ॐ काल भैरवाय नमः ,
ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं।

प्रसिद्ध भैरव मंदिर :
1:-काशी का काल भैरव मंदिर सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर से भैरव मंदिर कोई डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
2:-नई दिल्ली के विनय मार्ग पर नेहरू पार्क में बटुक भैरव का पांडवकालीन मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है।
3:-उज्जैन के काल भैरव की प्रसिद्धि का कारण भी ऐतिहासिक और तांत्रिक है।
4:-नैनीताल के समीप घोड़ा खाड़ का बटुकभैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यहाँ गोलू देवता के नाम से भैरव की प्रसिद्धि है।

20…हनुमान वशीकरण मन्त्र

“ॐ राई वर राई पचरसी। बारह सरसू तेरह राई। नब्बे दिन मंगलवार को ऐसी भाऊ, पराई स्त्री (साध्या का नाम) को भूल जाए घर-बार। घर छोड़, घर की डौरी छोड़। छोड़ माँ-बाप और छोड़ घर का साथ, हो जा मेरे साथ। दुहाई तुझे हलाहल हनुमान की। मेरा काम जल्दी कर, नी करे तो माँ अञ्जनी के सेज पर पाँव धरे। तेरी माता का चीर फाणीने लँगोट करे। फुरो मन्त्र, ईश्वरो वाचा।”

विधि- उक्त मन्त्र को पहले ‘नवरात्र’ या ‘ग्रहण’ में सिद्ध करे। ‘नवरात्र’ में मंगल और शनिवार को हनुमान जी को चोला चढ़ाए और प्रतिदिन हनुमान जी की मूर्ति के समक्ष १०८ बार जप करे। जप के समय अपने पास ‘राई’ और ‘सरसों’ रखे। मन्त्र पढ़कर इन्हें अभिमन्त्रित करे। बाद में आवश्यकतानुसार ‘प्रयोग’ करे। प्रयोग के समय चतुराई से तेरह राई ‘साध्या’ की डेहरी पर डाले और बारह सरसों उसके घर पर फेंके।

21…डामर तंत्र के अति शक्तिशाली वशीकरण और आकर्षण मंत्र

डामर तंत्र सदाशिव जी के द्वारा रचित एक ऐसा तंत्र ग्रन्थ है जिसमे महादेव शिव शंकर महाराज जी ने अति गुप्त मंत्र,साधनायें और प्रयोगों का वर्णन किया है!डामर तन्त्र के सभी मंत्र और तंत्र अति प्रभावशाली हैं! इस तन्त्र ग्रन्थ की सबसे बड़ी विशेषता यह है की इस ग्रन्थ के सभी मंत्र कीलित नहीं हैं और इसमें पाएं सब मंत्र-तंत्र प्रयोग अपना असर शीघ्र दिखातें है!

अति प्रभावी वशीकरण मंत्र: म्रों ड्रों

यह एक सिद्ध वशीकरण प्रयोग हैं! इस मंत्र से आप अपनी माता ,पिता,भाई,बहन ,रिश्तेदार या किसी का भी वशीकरण कर सकतें हैं! इस मंत्र को सिर्फ ५०० बार रुद्राक्ष की माला से पूर्व या उत्तर दिशा में लाल रंग के आसन पर बैठकर जपने से आप किसी को भी अपने वशीभूत बना सकतें है!इसे सिर्फ ५०० बार जिसका ध्यान कर या जिसकी तस्वीर के सामने जपा जायेगा वे आपके वशीभूत होगा! जब तक काम ना बने जपते रहिये!

22….दुर्भाग्य दूर करने के लिये

आटे का दिया, १ नीबू, ७ लाल मिर्च, ७ लड्डू,२ बत्ती, २ लोंग, २ बड़ी इलायची बङ या केले के पत्ते पर ये सारी चीजें रख दें |रात्रि १२ बजे सुनसान चौराहे पर जाकर पत्ते को रख दें व प्रार्थना करें,
जब घर से निकले तब यह प्रार्थना करें = हे दुर्भाग्य, संकट, विपत्ती आप मेरे साथ चलें और पत्ते को रख दें | फिर प्रार्थना करें = मैं विदा हो रहा हूँ | आप मेरे साथ न आयें, चारों रास्ते खुले हैं आप कहीं भी जायें | एक बार करने के बाद एक दो महीने देखें, उपाय लाभकारी है| श्रद्धा से करें |

23….बीज मंत्र
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ॐ कार मंत्र जैसे दूसरे २० मंत्र और हैं | उनको बोलते हैं बीज मंत्र | उसका अर्थ खोजो तो समझ में नही आएगा लेकिन अंदर की शक्तियों को विकसित कर देते हैं | सब बिज मंत्रो का अपना-अपना प्रभाव होता है | जैसे ॐ कार बीज मंत्र है ऐसे २० दूसरे भी हैं |

ॐ बं ये शिवजी की पूजा में बीज मंत्र लगता है | ये बं बं…. अर्थ को जो तुम बं बं…..जो शिवजी की पूजा में करते हैं | लेकिन बं…. उच्चारण करने से वायु प्रकोप दूर हो जाता है | गठिया ठीक हो जाता है | शिव रात्रि के दिन सवा लाख जप करो बं….. शब्द, गैस ट्रबल कैसी भी हो भाग जाती है | बीज मंत्र है

खं…. हार्ट-टैक कभी नही होता है | हाई बी.पी., लो बी.पी. कभी नही होता | ५० माला जप करें, तो लीवर ठीक हो जाता है | १०० माला जप करें तो शनि देवता के ग्रह का प्रभाव चला जाता है | खं शब्द |

ऐसे ही ब्रह्म परमात्मा का कं शब्द है | ब्रह्म वाचक | तो ब्रह्म परमात्मा के ३ विशेष मंत्र हैं | ॐ, खं और कं |

ऐसे ही रामजी के आगे भी एक बीज मंत्र लग जाता है | रीं रामाय नम: ||
कृष्ण जी के मंत्र के आगे बीज मंत्र लग जाता है | क्लीं कृष्णाय नम: ||

तो जैसे एक-एक के आगे, एक-एक के साथ मिंडी लगा दो तो १० गुना हो गया | ऐसे ही आरोग्य में भी ॐ हुं विष्णवे नम: | तो हुं बिज मंत्र है | ॐ बिज मंत्र है | विष्णवे…, तो विष्णु भगवान का सुमिरन | ये आरोग्य के मंत्र हैं | तो बिज मंत्र जिसमें जितने |

एक मैं मंत्र देता हूँ, जो एकदम सीरियस है, केस ठीक नही है, डॉक्टरों को समझ में नही आ रहा, तबियत ठीक नही है, फलाना है, धिन्गना है, एकदम विशेष जो रोगग्रस्त अथवा समस्या से, तकलीफ से ग्रस्त है | उनको मैं मंत्र देता हूँ | उसको मैंने ऐसे ही विनोद में नाम रख दिया यमराज का मोबाईल नम्बर है, तो उसमें ४ बिज मंत्र हैं |

तो बीज मंत्रो की साधना अथवा बीज मंत्रो का प्रभाव उसी सच्चिदानंद परमात्मा से आता है |
ये जो देवता लोग आशीर्वाद देते हैं अथवा जिनका आशीर्वाद पड़ता है, उनके जीवन में बीज मंत्रो का भी प्रभाव पड़ता है |

मंत्र शास्त्र में बीज मंत्रों का विशेष स्थान है। मंत्रों में भी इन्हें शिरोमणि माना जाता है क्योंकि जिस प्रकार बीज से पौधों और वृक्षों की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार बीज मंत्रों के जप से भक्तों को दैवीय ऊर्जा मिलती है। ऐसा नहीं है कि हर देवी-देवता के लिए एक ही बीज मंत्र का उल्लेख शास्त्रों में किया गया है। बल्कि अलग-अलग देवी-देवता के लिए अलग बीज मंत्र हैं।

“ऐं” सरस्वती बीज । यह मां सरस्वती का बीज मंत्र है, इसे वाग् बीज भी कहते हैं। जब बौद्धिक कार्यों मंल सफलता की कामना हो, तो यह मंत्र उपयोगी होता है। जब विद्या, ज्ञान व वाक् सिद्धि की कामना हो, तो श्वेत आसान पर पूर्वाभिमुख बैठकर स्फटिक की माला से नित्य इस बीज मंत्र का एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

“ह्रीं” भुवनेश्वरी बीज । यह मां भुवनेश्वरी का बीज मंत्र है। इसे माया बीज कहते हैं। जब शक्ति, सुरक्षा, पराक्रम, लक्ष्मी व देवी कृपा की प्राप्ति हो, तो लाल रंग के आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर रक्त चंदन या रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

“क्लीं” काम बीज । यह कामदेव, कृष्ण व काली इन तीनों का बीज मंत्र है। जब सर्व कार्य सिद्धि व सौंदर्य प्राप्ति की कामना हो, तो लाल रंग के आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

“श्रीं” लक्ष्मी बीज । यह मां लक्ष्मी का बीज मंत्र है। जब धन, संपत्ति, सुख, समृद्धि व ऐश्वर्य की कामना हो, तो लाल रंग के आसन पर पश्चिम मुख होकर कमलगट्टे की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

“ह्रौं” शिव बीज । यह भगवान शिव का बीज मंत्र है। अकाल मृत्यु से रक्षा, रोग नाश, चहुमुखी विकास व मोक्ष की कामना के लिए श्वेत आसन पर उत्तराभिमुख बैठकर रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

“गं” गणेश बीज । यह गणपति का बीज मंत्र है। विघ्नों को दूर करने तथा धन-संपदा की प्राप्ति के लिए पीले रंग के आसन पर उत्तराभिमुख बैठकर रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

“श्रौं” नृसिंह बीज । यह भगवान नृसिंह का बीज मंत्र है। शत्रु शमन, सर्व रक्षा बल, पराक्रम व आत्मविश्वास की वृद्धि के लिए लाल रंग के आसन पर दक्षिणाभिमुख बैठकर रक्त चंदन या मूंगे की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

“क्रीं” काली बीज । यह काली का बीज मंत्र है। शत्रु शमन, पराक्रम, सुरक्षा, स्वास्थ्य लाभ आदि कामनाओं की पूर्ति के लिए लाल रंग के आसन पर उत्तराभिमुख बैठकर रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

“दं” विष्णु बीज । यह भगवान विष्णु का बीज मंत्र है। धन, संपत्ति, सुरक्षा, दांपत्य सुख, मोक्ष व विजय की कामना हेतु पीले रंग के आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर तुलसी की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।

24….आप अपना काम कर रहे हो कठिन परिश्रम के बावजूद भी लोग आपका हक मार देते हैं। अनावश्यक कार्य अवरोध उत्पन्न करते हों। आपकी गलती न होने के बावजूद भी आपको हानि पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा हो तो यह प्रयोग आपके लिए बहुत ही लाभदायक सिध्द होगा। रात्रि में 10 बजे से 12 बजे के बीज में यह उपाय करना बहुत ही शुभ रहेगा। एक चौकी के ऊपर लाल कपड़ा बिछा कर उसके ऊपर 11 जटा वाले नारियल। प्रत्येक नारियल के ऊपर लाल कपड़ा लपेट कर कलावा बांध दें। इन सभी नारियल को चौकी के ऊपर रख दें। घी का दीपक जला करके धूप-दीप नेवैद्य पुष्प और अक्षत अर्पित कर। नारियल के ऊपर कुमकुम से स्वस्तिक बनाए और उन प्रत्येक स्वस्तिक के ऊपर पांच-पांच लौंग रखें और एक सुपारी रखें। माँ भगवती का ध्यान करें। माँ को प्रार्थना करें कष्टों की मुक्ति के लिए। कम्बल का आसन बिछा कर ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नम:11 माला करें, तत्पश्चात नारियल सहित समस्त सामग्री को सफेद कपड़े में बांध कर अपने ऊपर से 11 बार वार कर सोने वाले पलंग के नीचे रख दें। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में बिना किसी से बात किए यह सामग्री कुएं, तालाब या किसी बहते हुए पानी में प्रवाह कर दें। कानूनी कैसी भी समस्या होगी उससे छुटकारा मिल जाएगा।

25…तांत्रिक मायाजाल उतारने का सिद्ध शाबर मंत्र -…

“ओम एक ठो सरसों सौला राइ मोरो पटवल को रोजाई खाय खाय पड़े भार जे करे ते मरे उलट विद्या ताहि पर परे शब्द साँचा पिंड काँचा हनुमान का मंत्र सांचा फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा .

“यदि किसी के ऊपर तांत्रिक अभिचार कर दिया हो तो थोड़ी सी राई, सरसों तथा नमक मिला कर रख ले, इसके बाद इस मंत्र का जाप करते हुए सात बार रोगी का उतारा करे और फिर जलती हुई भट्टी में यह सामग्री झटके से झोंक दे तो सारा मायाजाल वापस चला जायेगा..

26….*यक्ष-प्रिया सर्व-सुंदरी बसंत-लतिका साधना *

यह साधना ”यक्षराज-तन्त्रं’ के अंतर्गत है ! शुक्लपक्ष के अष्टमी तिथि से रात्रि के समय भगवान शिव और कुबेर का ध्यान-पूजन कर , आराध्या बसंत-लतिका का ध्यान कुछ इस प्रकार से करे – - -
” हे बसंत-लतिका ! आप शुभ्र -वस्त्र और अलंकारों से युक्त है ! आपका मुख-मंडल चन्द्रमा कि किरणों के सामान उज्जवल है , मृग क…ी भांति नयन-[मृगाक्षी] है ! , नितम्ब -प्रदेश तक आपके केश मुक्तावस्था में है , नासिका अति-सुन्दर और हास्य युक्त-रक्तमय आभा लिए हुए आपे अधर है ! आपका कटि-भाग धनुष के सामान लचीला है , जो करधनी से शोभायमान हो रहा है ! वामावर्त रूपी नाभि कामदेव को भी मोहित करने में समर्थ है ! आप साधको के अभीष्ट को सिद्ध करने में समर्थ है ! मै आपका नमन करता हूँ…..!!! ”
मंत्र का जप स्फटिक की माला पर नित्य ११ माला में जप होगा ! अपने सम्मुख चन्दन-मिश्रित जल का पात्र रखे ! जप समाप्ति के पश्चात ये जल चन्द्रमा को अर्पित करे ! पूर्णिमा तिथि तक ही जब साधना करनी है ! साधक को साधना को में सभी आचरण-नियमो का सही रूप से पालन करना है ! साधना कक्ष का द्वार खोलकर ही जप किया जाय ! जप में उत्त्साह और विश्वास की प्रबलता मुख्य है ! बसंत-लतिका साधक के सम्मुख सौम्य रूप में ही आती है और साधक के अभीष्ट को पूर्ण करती है ! मंत्र ये है—–

मंत्र:—- ” ॐ आं ह्रीं यं क्रों हुं आगच्छ आगच्छ बसंत-लतिके ह्रीं ह्रुं फट स्वाहा ! ”

27….हर साधक की इछा होती है की वोह हर पारकर की साधना करे.साध्नायो के कई कई आयाम हैं.यहाँ एक तरफ सौम्य साधनाए हैं तो दोसरी तरफ एक ही झटके में असर करने वाली साधनाए भी हैं…लक्ष्मी,सरस्वती,भुवनेश्वरी सध्नायों को तो सौम्य सध्नायों की श्रेणी में रखा जाता है और इन्हें साधक बड़ी आसानी से संपन्न करते हैं.लेकिन कुछ साधको का रुझान भूत प्रेत पिसाच आदि सध्ना…यों की तरफ अक्सर रहता ही है और भी कई ऐसी साधनाए है यहाँ पर साधक को एक सुरक्षा चाकर की ज़रुरत होती है.इसी सुरक्षा चक्कर को देखते हुए और बाकि सध्नायों में भी सुरक्षा के लिए भी बहुत सरे मन्त्रों का विधान है और उन्ही में से यहाँ एक सबर मंत्र आपके सामने रखा जा रहा है ……

(छोटी-मोटी थमंत वार को वार बांधे , पार को पार बांधे , मरघट मसान बांधे , टोना और टंवर बांधे ,जादू वीर बांधे .दीठ और मूठ बांधे .बिछु और सांप बांधे , भेडिया-बाघ बांधे ,लखूरी सियार बांधे .अस्सी अस्सी दोष बांधे ,कालिका लिलार बांधे ,योगिनी संहार बांधे ,ताडिका कलेज बांधे , उत्तर -दक्षिण-पूर्व -पश्चिम बांधे ,मरी मसानी बांधे और बांधे डायन भूत के गुण , लाइल्लाह को कोट इल्लल्लाह की खाई,मुहम्मद रसूलिलल्लाह की चौकी ,हजरत अली की दुहाई….)

किसी भी शुभ महूरत में इस मंत्र को १००० बार जप करके सिद्ध कर ले….ग्रहण कल में १५-२० मिनट भी हो जाये तो भी सिद्ध हो जाता है …..यह आजीवन कम आता है. यह मन्त्र अत्ति विशिष्ट और पर्भाव्शाली सुरक्षा मंत्र है…

28…पुत्र प्राप्ति का सरल मंत्र

आज भी कुछ परंपरावादी लोग यह मानते हैं कि वंश मात्र लड़कों से ही चलता है। जबकि पुत्रियां चारों दिशाओं में अपनी विजय पताका लहरा रही है। पुत्र प्राप्ति के लिए लोग कई प्रकार के तंत्र-मंत्र-यंत्र और टोटके अपनाते हैं जो गलत भी हो सकते हैं। यहां पेश है पुत्र प्राप्ति के लिए अत्यंत सरल उपाय।

पुत्र प्राप्ति का सरल मंत्र
श्री गणपति की मूर्ति पर संतान प्राप्ति की इच्छुक महिला प्रतिदिन स्नानादि से निवृत होकर एक माह तक बिल्ब फल चढ़ाकर ‘ॐ पार्वतीप्रियनंदनाय नम:’ मंत्र की 11 माला प्रतिदिन जपने से संतान प्राप्ति होती है।

29….सर्व-कामना-सिद्धि स्तोत्र—-

श्री हिरण्य-मयी हस्ति-वाहिनी, सम्पत्ति-शक्ति-दायिनी।
मोक्ष-मुक्ति-प्रदायिनी, सद्-बुद्धि-शक्ति-दात्रिणी।।१
सन्तति-सम्वृद्धि-दायिनी, शुभ-शिष्य-वृन्द-प्रदायिनी।
नव-रत्ना नारायणी, भगवती भद्र-कारिणी।।२
धर्म-न्याय-नीतिदा, विद्या-कला-कौशल्यदा।
प्रेम-भक्ति-वर-सेवा-प्रदा, राज-द्वार-यश-विजयदा।।३
धन-द्रव्य-अन्न-वस्त्रदा, प्रकृति पद्मा कीर्तिदा।
सुख-भोग-वैभव-शान्तिदा, साहित्य-सौरभ-दायिका।।४
वंश-वेलि-वृद्धिका, कुल-कुटुम्ब-पौरुष-प्रचारिका।
स्व-ज्ञाति-प्रतिष्ठा-प्रसारिका, स्व-जाति-प्रसिद्धि-प्राप्तिका।।५
भव्य-भाग्योदय-कारिका, रम्य-देशोदय-उद्भाषिका।
सर्व-कार्य-सिद्धि-कारिका, भूत-प्रेत-बाधा-नाशिका।
अनाथ-अधमोद्धारिका, पतित-पावन-कारिका।
मन-वाञ्छित॒फल-दायिका, सर्व-नर-नारी-मोहनेच्छा-पूर्णिका।।७
साधन-ज्ञान-संरक्षिका, मुमुक्षु-भाव-समर्थिका।
जिज्ञासु-जन-ज्योतिर्धरा, सुपात्र-मान-सम्वर्द्धिका।।८
अक्षर-ज्ञान-सङ्गतिका, स्वात्म-ज्ञान-सन्तुष्टिका।
पुरुषार्थ-प्रताप-अर्पिता, पराक्रम-प्रभाव-समर्पिता।।९
स्वावलम्बन-वृत्ति-वृद्धिका, स्वाश्रय-प्रवृत्ति-पुष्टिका।
प्रति-स्पर्द्धी-शत्रु-नाशिका, सर्व-ऐक्य-मार्ग-प्रकाशिका।।१०
जाज्वल्य-जीवन-ज्योतिदा, षड्-रिपु-दल-संहारिका।
भव-सिन्धु-भय-विदारिका, संसार-नाव-सुकानिका।।११
चौर-नाम-स्थान-दर्शिका, रोग-औषधी-प्रदर्शिका।
इच्छित-वस्तु-प्राप्तिका, उर-अभिलाषा-पूर्णिका।।१२
श्री देवी मङ्गला, गुरु-देव-शाप-निर्मूलिका।
आद्य-शक्ति इन्दिरा, ऋद्धि-सिद्धिदा रमा।।१३
सिन्धु-सुता विष्णु-प्रिया, पूर्व-जन्म-पाप-विमोचना।
दुःख-सैन्य-विघ्न-विमोचना, नव-ग्रह-दोष-निवारणा।।१४

ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं श्रीसर्व-कामना-सिद्धि महा-यन्त्र-देवता-स्वरुपिणी श्रीमहा-माया महा-देवी महा-शक्ति महालक्ष्म्ये नमो नमः।
ॐ ह्रीं श्रीपर-ब्रह्म परमेश्वरी। भाग्य-विधाता भाग्योदय-कर्त्ता भाग्य-लेखा भगवती भाग्येश्वरी ॐ ह्रीं।
कुतूहल-दर्शक, पूर्व-जन्म-दर्शक, भूत-वर्तमान-भविष्य-दर्शक, पुनर्जन्म-दर्शक, त्रिकाल-ज्ञान-प्रदर्शक, दैवी-ज्योतिष-महा-विद्या-भाषिणी त्रिपुरेश्वरी। अद्भुत, अपुर्व, अलौकिक, अनुपम, अद्वितीय, सामुद्रिक-विज्ञान-रहस्य-रागिनी, श्री-सिद्धि-दायिनी। सर्वोपरि सर्व-कौतुकानि दर्शय-दर्शय, हृदयेच्छित सर्व-इच्छा पूरय-पूरय ॐ स्वाहा।
ॐ नमो नारायणी नव-दुर्गेश्वरी। कमला, कमल-शायिनी, कर्ण-स्वर-दायिनी, कर्णेश्वरी, अगम्य-अदृश्य-अगोचर-अकल्प्य-अमोघ-अधारे, सत्य-वादिनी, आकर्षण-मुखी, अवनी-आकर्षिणी, मोहन-मुखी, महि-मोहिनी, वश्य-मुखी, विश्व-वशीकरणी, राज-मुखी, जग-जादूगरणी, सर्व-नर-नारी-मोहन-वश्य-कारिणी, मम करणे अवतर अवतर, नग्न-सत्य कथय-कथय।
अतीत अनाम वर्तनम्। मातृ मम नयने दर्शन। ॐ नमो श्रीकर्णेश्वरी देवी सुरा शक्ति-दायिनी। मम सर्वेप्सित-सर्व-कार्य-सिद्धि कुरु-कुरु स्वाहा। ॐ श्रीं ऐं ह्रीं क्लीं श्रीमहा-माया महा-शक्ति महा-लक्ष्मी महा-देव्यै विच्चे-विच्चे श्रीमहा-देवी महा-लक्ष्मी महा-माया महा-शक्त्यै क्लीं ह्रीं ऐं श्रीं ॐ।
ॐ श्रीपारिजात-पुष्प-गुच्छ-धरिण्यै नमः। ॐ श्री ऐरावत-हस्ति-वाहिन्यै नमः। ॐ श्री कल्प-वृक्ष-फल-भक्षिण्यै नमः। ॐ श्री काम-दुर्गा पयः-पान-कारिण्यै नमः। ॐ श्री नन्दन-वन-विलासिन्यै नमः। ॐ श्री सुर-गंगा-जल-विहारिण्यै नमः। ॐ श्री मन्दार-सुमन-हार-शोभिन्यै नमः। ॐ श्री देवराज-हंस-लालिन्यै नमः। ॐ श्री अष्ट-दल-कमल-यन्त्र-रुपिण्यै नमः। ॐ श्री वसन्त-विहारिण्यै नमः। ॐ श्री सुमन-सरोज-निवासिन्यै नमः। ॐ श्री कुसुम-कुञ्ज-भोगिन्यै नमः। ॐ श्री पुष्प-पुञ्ज-वासिन्यै नमः। ॐ श्री रति-रुप-गर्व-गञ्हनायै नमः। ॐ श्री त्रिलोक-पालिन्यै नमः। ॐ श्री स्वर्ग-मृत्यु-पाताल-भूमि-राज-कर्त्र्यै नमः।
श्री लक्ष्मी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीशक्ति-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीदेवी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्री रसेश्वरी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्री ऋद्धि-यन्त्रेभ्यो नमः। श्री सिद्धि-यन्त्रेभ्यो नमः। श्री कीर्तिदा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीप्रीतिदा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीइन्दिरा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्री कमला-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीहिरण्य-वर्णा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीरत्न-गर्भा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीसुवर्ण-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीसुप्रभा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपङ्कनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीराधिका-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपद्म-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीरमा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीलज्जा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीजया-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपोषिणी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीसरोजिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीहस्तिवाहिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीगरुड़-वाहिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीसिंहासन-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीकमलासन-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीरुष्टिणी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपुष्टिणी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीतुष्टिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीवृद्धिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपालिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीतोषिणी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीरक्षिणी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीवैष्णवी-यन्त्रेभ्यो नमः।
श्रीमानवेष्टाभ्यो नमः। श्रीसुरेष्टाभ्यो नमः। श्रीकुबेराष्टाभ्यो नमः। श्रीत्रिलोकीष्टाभ्यो नमः। श्रीमोक्ष-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीभुक्ति-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीकल्याण-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीनवार्ण-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीअक्षस्थान-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीसुर-स्थान-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीप्रज्ञावती-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपद्मावती-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीशंख-चक्र-गदा-पद्म-धरा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीमहा-लक्ष्मी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीलक्ष्मी-नारायण-यन्त्रेभ्यो नमः। ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं श्रीमहा-माया-महा-देवी-महा-शक्ति-महा-लक्ष्मी-स्वरुपा-श्रीसर्व-कामना-सिद्धि महा-यन्त्र-देवताभ्यो नमः।
ॐ विष्णु-पत्नीं, क्षमा-देवीं, माध्वीं च माधव-प्रिया। लक्ष्मी-प्रिय-सखीं देवीं, नमाम्यच्युत-वल्लभाम्। ॐ महा-लक्ष्मी च विद्महे विष्णु-पत्नि च धीमहि, तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्। मम सर्व-कार्य-सिद्धिं कुरु-कुरु स्वाहा।

विधिः-
१॰ उक्त सर्व-कामना-सिद्धी स्तोत्र का नित्य पाठ करने से सभी प्रकार की कामनाएँ पूर्ण होती है।
२॰ इस स्तोत्र से ‘यन्त्र-पूजा’ भी होती हैः-
‘सर्वतोभद्र-यन्त्र’ तथा ‘सर्वारिष्ट-निवारक-यन्त्र’ में से किसी भी यन्त्र पर हो सकती है। ‘श्रीहिरण्यमयी’ से लेकर ‘नव-ग्रह-दोष-निवारण’- १४ श्लोक से इष्ट का आवाहन और स्तुति है। बाद में “ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं” सर्व कामना से पुष्प समर्पित कर धऽयान करे और यह भावना रखे कि- ‘मम सर्वेप्सितं सर्व-कार्य-सिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा।’
फिर अनुलोम-विलोम क्रम से मन्त्र का जप करे-”ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीमहा-माया-महा-शक्त्यै क्लीं ह्रीं ऐं श्रीं ॐ।”
स्वेच्छानुसार जप करे। बाद में “ॐ श्रीपारिजात-पुष्प-गुच्छ-धरिण्यै नमः” आदि १६ मन्त्रों से यन्त्र में, यदि षोडश-पत्र हो, तो उनके ऊपर, अन्यथा यन्त्र में पूर्वादि-क्रम से पुष्पाञ्जलि प्रदान करे। तदनन्तर ‘श्रीलक्ष्मी-तम्त्रेभ्यो नमः’ और ‘श्री सर्व-कामना-सिद्धि-महा-यन्त्र-देवताभ्यो नमः’ से अष्टगन्ध या जो सामग्री मिले, उससे ‘यन्त्र’ में पूजा करे। अन्त में ‘लक्ष्मी-गायत्री’ पढ़करपुष्पाजलि देकर विसर्जन करे।..

30….रुद्राष्टाध्यायी में अन्य मंत्रों के साथ इस मंत्र का भी उल्लेख मिलता है। शिव और रुद्र परस्पर एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। शिव को ही रुद्र कहा जाता है क्योंकि- रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: यानि की भोले सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं। हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं। रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारे पटक-से पातक कर्म भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है।

रूद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है कि- सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका: अर्थात् सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रूद्र की आत्मा हैं।

हमारे शास्त्रों में विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक के पूजन के निमित्त अनेक द्रव्यों तथा पूजन सामग्री को बताया गया है। साधक रुद्राभिषेक पूजन विभिन्न विधि से तथा विविध मनोरथ को लेकर करते हैं। किसी खास मनोरथ की पूर्ति के लिये तदनुसार पूजन सामग्री तथा विधि से रुद्राभिषेक की जाती है।

रुद्राभिषेक के विभिन्न पूजन के लाभ इस प्रकार हैं-

• जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है।

• असाध्य रोगों को शांत करने के लिए कुशोदक से रुद्राभिषेक करें।

• भवन-वाहन के लिए दही से रुद्राभिषेक करें।

• लक्ष्मी प्राप्ति के लिये गन्ने के रस से रुद्राभिषेक करें।

• धन-वृद्धि के लिए शहद एवं घी से अभिषेक करें।

• तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

• इत्र मिले जल से अभिषेक करने से बीमारी नष्ट होती है ।

• पुत्र प्राप्ति के लिए दुग्ध से और यदि संतान उत्पन्न होकर मृत पैदा हो तो गोदुग्ध से रुद्राभिषेक करें।

• रुद्राभिषेक से योग्य तथा विद्वान संतान की प्राप्ति होती है।

• ज्वर की शांति हेतु शीतल जल/गंगाजल से रुद्राभिषेक करें।

• सहस्रनाम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए घृत की धारा से रुद्राभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।

• प्रमेह रोग की शांति भी दुग्धाभिषेक से हो जाती है।

• शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने पर जडबुद्धि वाला भी विद्वान हो जाता है।

• सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है।

• शहद के द्वारा अभिषेक करने पर यक्ष्मा (तपेदिक) दूर हो जाती है।

• पातकों को नष्ट करने की कामना होने पर भी शहद से रुद्राभिषेक करें।

• गो दुग्ध से तथा शुद्ध घी द्वारा अभिषेक करने से आरोग्यता प्राप्त होती है।

• पुत्र की कामनावाले व्यक्ति शक्कर मिश्रित जल से अभिषेक करें।

ऐसे तो अभिषेक साधारण रूप से जल से ही होता है। परन्तु विशेष अवसर पर या सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि पर्व के दिनों मंत्र गोदुग्ध या अन्य दूध मिला कर अथवा केवल दूध से भी अभिषेक किया जाता है। विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग अथवा सब को मिला कर पंचामृत से भी अभिषेक किया जाता है। तंत्रों में रोग निवारण हेतु अन्य विभिन्न वस्तुओं से भी अभिषेक करने का विधान है। इस प्रकार विविध द्रव्यों से शिवलिंग का विधिवत् अभिषेक करने पर अभीष्ट कामना की पूर्ति होती है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी पुराने नियमित रूप से पूजे जाने वाले शिवलिंग का अभिषेक बहुत ही उत्तम फल देता है। किन्तु यदि पारद के शिवलिंग का अभिषेक किया जाय तो बहुत ही शीघ्र चमत्कारिक शुभ परिणाम मिलता है। रुद्राभिषेक का फल बहुत ही शीघ्र प्राप्त होता है। वेदों में विद्वानों ने इसकी भूरि भूरि प्रशंसा की गयी है। पुराणों में तो इससे सम्बंधित अनेक कथाओं का विवरण प्राप्त होता है।

वेदों और पुराणों में रुद्राभिषेक के बारे में तो बताया गया है कि रावण ने अपने दसों सिरों को काट कर उसके रक्त से शिवलिंग का अभिषेक किया था तथा सिरों को हवन की अग्नि को अर्पित कर दिया था। जिससे वो त्रिलोकजयी हो गया। भष्मासुर ने शिव लिंग का अभिषेक अपनी आंखों के आंसुओ से किया तो वह भी भगवान के वरदान का पात्र बन गया।

रुद्राभिषेक करने की तिथियां

कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, चतुर्थी, पंचमी, अष्टमी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या, शुक्लपक्ष की द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, नवमी, द्वादशी, त्रयोदशी तिथियों में अभिषेक करने से सुख-समृद्धि संतान प्राप्ति एवं ऐश्वर्य प्राप्त होता है। कालसर्प योग, गृहकलेश, व्यापार में नुकसान, शिक्षा में रुकावट सभी कार्यो की बाधाओं को दूर करने के लिए रुद्राभिषेक आपके अभीष्ट सिद्धि के लिए फलदायक है।

किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वास का विचार करने पर अनुष्ठान अवश्य सफल होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है। प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, अमावस्या तथा शुक्लपक्ष की द्वितीया व नवमी के दिन भगवान शिव माता गौरी के साथ होते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है।

कृष्णपक्ष की चतुर्थी, एकादशी तथा शुक्लपक्ष की पंचमी व द्वादशी तिथियों में भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर होते हैं और उनकी अनुकंपा से परिवार में आनंद-मंगल होता है।

कृष्णपक्ष की पंचमी, द्वादशी तथा शुक्लपक्ष की षष्ठी व त्रयोदशी तिथियों में महादेव नंदी पर सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते है। अत: इन तिथियों में रुद्राभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है।

कृष्णपक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी तथा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, पूर्णिमा में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं। अतएव इन तिथियों में किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर उनकी साधना भंग होती है जिससे अभिषेककर्ता पर विपत्ति आ सकती है।

कृष्णपक्ष की द्वितीया, नवमी तथा शुक्लपक्ष की तृतीया व दशमी में महादेव देवताओं की सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं। इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने पर संताप या दुख मिलता है।

कृष्णपक्ष की तृतीया, दशमी तथा शुक्लपक्ष की चतुर्थी व एकादशी में सदाशिव क्रीडारत रहते हैं। इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चन संतान को कष्ट प्रदान करते है।

कृष्णपक्ष की षष्ठी, त्रयोदशी तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी व चतुर्दशी में रुद्रदेव भोजन करते हैं। इन तिथियों में सांसारिक कामना से किया गया रुद्राभिषेक पीडा देते हैं।

ज्योर्तिलिंग-क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, श्रावण के सोमवार आदि पर्वो में शिव-वास का विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है। वस्तुत: शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिव को शीघ्र प्रसन्न करके साधक को उनका कृपापात्र बना देता है और उनकी सारी समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाती हैं। अतः हम यह कह सकते हैं कि रुद्राभिषेक से मनुष्य के सारे पाप-ताप धुल जाते हैं। स्वयं श्रृष्टि कर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है की जब हम अभिषेक करते है तो स्वयं महादेव साक्षात् उस अभिषेक को ग्रहण करते है। संसार में ऐसी कोई वस्तु, वैभव, सुख नही है जो हमें रुद्राभिषेक से प्राप्त न हो सके।

सुख-शांति-वैभव और मोक्ष का प्रतीक महाशिवरात्रि

साथ ही महाशिवरात्रि पूजन का प्रभाव हमारे जीवन पर बड़ा ही व्यापक रूप से पड़ता है। सदाशिव प्रसन्न होकर हमें धन-धान्य, सुख-समृधि, यश तथा वृद्धि देते हैं। महाशिवरात्रि पूजन को विधिवत करने से हमें सदाशिव का सानिध्य प्राप्त होता है और उनकी महती कृपा से हमारा कल्याण होता है।

शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता में बताया गया है कि शिवरात्रि व्रत करने से व्यक्ति को भोग एवं मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते हैं। देवताओं के पूछने पर भगवान सदाशिव ने बताया कि शिवरात्रि व्रत करने से महान पुण्य की प्राप्ति तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि परम कल्याणकारी व्रत है जिसके विधिपूर्वक करने से व्यक्ति के दुःख, पीड़ाओं का अंत होता है और उसे इच्छित फल की प्राप्ति होती है।

पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री, धन, सौभाग्य, समृद्धि व आरोग्यता प्राप्त होती है। पूजन करने वाला अपने तप-साधना के बल पर मोक्ष की प्राप्ति करता है। परम कल्याणकारी व्रत महाशिवरात्रि के व्रत को विधि-पूर्वक करने से व्यक्ति के दुःख, पीड़ाओं का अंत होता है और उसे इच्छित फल-प्राप्ति, पति, पत्नी, पुत्र, धन, सौभाग्य, समृद्धि व आरोग्यता प्राप्त होती है तथा वह जीवन में गति और मोक्ष को प्राप्त करते हैं और चिरंतर-काल तक शिव-स्नेही बने रहते हैं और शिव-आशीष प्राप्त करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं।

परोपकार करने के लिए महाशिवरात्रि का दिवस होना भी आवश्यक नहीं है। पुराण में चार प्रकार के शिवरात्रि पूजन का वर्णन है। मासिक शिवरात्रि, प्रथम आदि शिवरात्रि, तथा महाशिवरात्रि। पुराण वर्णित अंतिम शिवरात्रि है-नित्य शिवरात्रि। वस्तुत: प्रत्येक रात्रि ही `शिवरात्रि` है अगर हम उन परम कल्याणकारी आशुतोष भगवान में स्वयं को लीन कर दें तथा कल्याण मार्ग का अनुसरण करें, वही शिवरात्रि का सच्चा व्रत है।

महाशिवरात्रि का व्रत मनोवांछित अभिलाषाओं को पूर्ण करनेवाली तथा परम कल्याणकारी है। देवों-के-देव महादेव की प्रसन्नता की कामना लिये हुए जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनका अभीष्ट मनोरथ पूर्ण होता है तथा वे हमेशा-हमेशा के लिया शिव-सानिध्यता को प्राप्त कर लेते हैं।

31….शास्त्रों में वर्णित दिव्य अस्त्र शस्त्र

1.ब्रह्मास्त्र -अचूक और एक विकराल अस्त्र है। यह शत्रु का नाश करके ही छोड़ता है। इसका प्रतिकार दूसरे ब्रह्मास्त्र से ही हो सकता है, अन्यथा नहीं। रामायण काल में यह विभीषण और लक्ष्मण के पास था। अपने शत्रुओं के विनाश के लिए अर्जुन, कृष्ण, कुवलाश्व, युधिष्ठिर, कर्ण, प्रद्युम्न आदि ने ‘ब्रह्मास्त्र’ का प्रयोग समय-समय पर किया था।दो ब्रह्मास्त्रों के आपस में टकराने से प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इससे समस्त पृथ्वी के समाप्त होने का भय रहता है। यदि ऐसा हो जाये तो फिर से एक नई पृथ्वी तथा जीवधारियों की उत्पत्ति करनी पड़ेगी।

2.नारायणास्त्र पाशुपत के समान विकराल अस्त्र है। इस नारायण-अस्त्र का कोई प्रतिकार ही नहीं है। यह बाण चलाने पर अखिल विश्व में कोई शक्ति इसका मुक़ाबला नहीं कर सकती। इसका केवल एक ही प्रतिकार है और वह यह है कि शत्रु अस्त्र छोड़कर नम्रतापूर्वक अपने को अर्पित कर दे। कहीं भी हो, यह बाण वहाँ जाकर ही भेद करता है। इस बाण के सामने झुक जाने पर यह अपना प्रभाव नहीं करता।

3.आग्नेय अस्त्र एक विस्फोटक बाण है। यह जल के समान अग्नि बरसाकर सब कुछ भस्मीभूत कर देता है। इसका प्रतिकार पर्जन्य है। ये वे आयुध जो मन्त्रों से चलाये जाते हैं- ये दैवी हैं। प्रत्येक शस्त्र पर भिन्न-भिन्न देव या देवी का अधिकार होता है और मन्त्र-तन्त्र के द्वारा उसका संचालन होता है। वस्तुत: इन्हें दिव्य तथा मान्त्रिक-अस्त्र कहते हैं।

4.पर्जन्य अस्त्र एक विस्फोटक बाण है। यह अग्नि के समान जल बरसाकर सब कुछ भस्मीभूत कर देता है। इसका प्रतिकार पर्जन्य है। ये वे आयुध हैं जो मन्त्रों से चलाये जाते हैं- ये दैवी हैं। प्रत्येक शस्त्र पर भिन्न-भिन्न देव या देवी का अधिकार होता है और मन्त्र-तन्त्र के द्वारा उसका संचालन होता है। वस्तुत: इन्हें दिव्य तथा मान्त्रिक-अस्त्र कहते हैं।

5.पन्नग अस्त्र से सर्प पैदा होते हैं। इसके प्रतिकार स्वरूप गरुड़ बाण छोड़ा जाता है।

6.गरुड़ अस्त्र बाण के चलते ही गरुड़ उत्पन्न होते हैं, जो सर्पों को खा जाते हैं।

7.शक्ति अस्त्र लंबाई में गज भर होते हैं, उसका हेंडल बड़ा होता है, उसका मुँह सिंह के समान होता है और उसमें बड़ी तेज़ जीभ और पंजे होते हैं। उसका रंग नीला होता है और उसमें छोटी-छोटी घंटियाँ लगी होती हैं। यह बड़ी भारी होती है और दोनों हाथों से फेंकी जाती है। ये वे शस्त्र हैं, जो यान्त्रिक उपाय से फेंके जाते थे।

8.फरसा अस्त्र एक कुल्हाड़ा है। पर यह युद्ध का आयुध है। इसकी दो शक्लें हैं।

9.गदा एक प्राचीन शस्त्र है। इसकी लंबाई ज़मीन से छाती तक होती है। इसमें एक लंबा दंड होता है ओर उसके एक सिरे पर भारी गोल लट्टू सरीखा शीर्ष होता है। इसका वज़न बीस मन तक होता है। गदायुद्ध की चर्चा प्राचीन साहित्य में बहुत हुई हैं। महाभारत में पात्र भीम, दुर्योधन, जरासंध, बलराम आदि प्रख्यात गदाधारी थे। राम के सेवक हनुमान भी गदाधारी है।

10.चक्र अस्त्र दूर से फेंका जाता है। श्री कृष्ण ने महाभारत में इसका प्रयोग किया था। प्रमाणों की ज़रूरत नहीं है कि हमारे पूर्वज गोला-बारूद और भारी तोपें, टैंक बनाने में भी कुशल थे। इन अस्त्रों का प्राचीन संस्कृत-ग्रन्थों में उल्लेख है।ॐ ॐ

32…मंत्र संस्कार
मंत्र शब्द का अर्थ है गुप्त परामर्ष स्ग्र्धा का अवलंब पाकर जब अक्षर एक गहनता में प्रवेश करता है तो जिस दिव्य ज्योति का अविर्भाव होता है व्ही सिधि की संघ्या पाती मंत्र वास्तव में मनन पूर्वक वर्णउचार का घर्षण है जिसके मूल में लय ही सर्वोप्रिये है .पुस्तकों से मन्त्र लेकर बिना भाव के उन्हें दोहरा देना मातर मंत्रो उचारण नही होता.यह एक विषद विज्ञानं है .किन्तु प्रस्तुतु लेख में मैं इसके एक पक्ष संस्कार को करने का इछुक हूँ
भगवन शिव के डमरू से जिन सात करोड़ मंत्रो का पादुर्भाव हुआ वे कालअंतर में किसी न किसी दोष से ग्रसित हो गये .शाश्त्रो में ऐसे पचास परकार के दोष माने
गये हैं.
जनन ,दीपन,बोधन,तदन,अभिषेक,विम्लीकर्ण ,जीवन,तर्पण ,गोपन व् आप्यायन यह दस संस्कार है जो किसी व् मन्त्र को सिद्ध करने से पूर्व आवश्यक हैं
१.जनन – पूर्व की और मुख करके आसन पर शुधि पूर्वक बैठने के बाद भोजपत्र पर गोरेचन कुकुम एवेम चंदन से आत्माविमुख त्रिकोण बनावे एवेम तीनो कोनो से शह
शह रेखाए खींचे .एसा करने से ४९ त्रिकोण कोष्ठ बन जायेगे .फिर इशान कोण से आरंभ कर एक एक खाने में एक एक मात्रिका वरण लिखना चाहिए .प्रतिएक वर्ण का ,देवता का आह्वाहन करते हुए पूजन कर उसका उधारकरना चाहिए एवं उसे अलग से भोजपत्र पर लिखकर मन्त्र से संपृक्त भी करना चाहिए .अंत में मन्त्र को जल में विसर्जित कर देना चाहिए .इस प्रकार सम्पुरण वर्णों को लेकर करने से प्रथम संस्कार संपन होता है .
२.दीपन – इस संस्कार हेतु ‘ हंस ‘ मन्त्र से मूल को संपुटित के एक हजार जप करना आवश्यक होता है.यथा ‘हंस शिवाये नम:सो हम ‘
३.बोधन ‘हूं’ बिज मन्त्र से मूल मंत्र को संपुटित कर पञ्च हजार जप करने से मन्त्र का बोधन हो जाता है.यथा ‘हूं शिवाये नम : हूं”
४.ताडन-फट मन्त्र से मूल मन्त्र को संपुटित क्र एक हजार जप करने से मन्त्र का ताडन हो जाता है.यथा ‘फट शिवाये नम:फट”
५.अभिषेक – इस हेतु भोज पात्र पर मूल मन्त्र को लिखना चैये बाद में एक हजार बार ‘ह्रोम हंस:ओम” मन्त्र से अभिमंत्रित जल लेकर पीपल के पते द्वारा मूल मन्त्र का अभिषेक करने यह संपन हो जाता है.
६.विम्लीकर्ण-’ॐ त्रोम वष्ट” इन वर्ण से संपुटित करते हुए मूल मंत्र का एक हजार जप करने से यह संस्कार संपन होता है.यथा ‘ॐ त्रोम वष्ट शिवाये नम:वष्ट त्रोम ॐ”.
७.जीवन -”स्वधा वष्ट “संपुटित मूओल मंत्र का एक हजार जप करने से यह संस्कार संपन होता है .यथा “स्वधा वष्ट शिवाये नम:वष्ट स्वधा ”
८.तर्पण दूध जल तथा घी को मिलकर मूल मंत्र से सो बार तर्पण करना ही उस मन्त्र का तर्पण संस्कार होता है.
९.गोपन-’ह्रीं ” का सम्पुट देकर मूल मंत्र का एक हजार जप करना नवम संस्क्र होता है.
१०.अप्यायन-”ह्रों” बीज का संपुटित देकर मूल मन्त्र का एक हजार जप करने अंतिम व् महाताव्पूरण संस्कार संपन होता है. यथा “ह्रों नम:शिवाये ह्रों ”
इस परकार प्रयतन पूर्वक मूल मंत्र का संस्कार कर उसका जप करने ओत अभीशत सफलता अधिक सरलता से मिलती है .उपर संस्कार विधान के इलावा कूर्म चक्र विचार,कुल्लुका विचार ,मंत्रो का कीलन-उत्कीलन,मन्त्र सिधि के विभिन उपाए अदि कई ऐसे भाग है जिनका यदि साधक प्रारंभ में विचार करे तो कम समय व् कम म्हणत में ही सिधि प्राप्त होने की सम्भावना बढ जाती है.

33…मंत्रों की शक्ति असीम है। यदि साधनाकाल में नियमों का पालन न किया जाए तो कभी-कभी बड़े घातक परिणाम सामने आ जाते हैं। प्रयोग करते समय तो विशेष सावधानी‍ बरतनी चाहिए। मंत्र उच्चारण की तनिक सी त्रुटि सारे करे-कराए पर पानी फेर सकत‍ी है। तथा गुरु के द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन साधक ने अवश्‍य करना चाहिए।

साधक को चाहिए कि वो प्रयोज्य वस्तुएँ जैसे- आसन, माला, वस्त्र, हवन सामग्री तथा अन्य नियमों जैसे- दीक्षा स्थान, समय और जप संख्या आदि का दृढ़तापूर्वक पालन करें, क्योंकि विपरीत आचरण करने से मंत्र और उसकी साधना निष्‍फल हो जाती है। जबकि विधिवत की गई साधना से इष्‍ट देवता की कृपा सुलभ रहती है। साधना काल में निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है।

* जिसकी साधना की जा रही हो, उसके प्रति पूर्ण आस्था हो।
* मंत्र-साधना के प्रति दृढ़ इच्छा शक्ति।
* साधना-स्थल के प्रति दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ-साथ साधन का स्थान, सामाजिक और पारिवारिक संपर्क से अलग-अलग हो।
* उपवास प्रश्रय और दूध-फल आदि का सात्विक भोजन किया जाए तथा श्रृंगार-प्रसाधन और कर्म व विलासिता का त्याग आवश्यक है।
* साधना काल में भूमि शयन।
* वाणी का असंतुलन, कटु-भाषण, प्रलाप, मिथ्या वाचन आदि का त्याग करें और कोशिश मौन रहने की करें। निरंतर मंत्र जप अथवा इष्‍ट देवता का स्मरण-चिंतन आवश्‍यक है।

मंत्र साधना में प्राय: विघ्न-व्यवधान आ जाते हैं। निर्दोष रूप में कदाचित ही कोई साधक सफल हो पाता है, अन्यथा स्थान दोष, काल दोष, वस्तु दोष और विशेष कर उच्चारण दोष जैसे उपद्रव उत्पन्न होकर साधना को भ्रष्ट हो जाने पर जप तप और पूजा-पाठ निरर्थक हो जाता है। इसके समाधान हेतु आचार्य ने काल, पात्र आदि के संबंध में अनेक प्रकार के सावधानीपरक निर्देश दिए हैं।

मंत्रों की जानकारी एवं निर्देश—-
1. यदि शाबर मंत्रों को छोड़ दें तो मुख्यत: दो प्रकार के मंत्र है- वैदिक मंत्र और तांत्रिक मंत्र। जिस मंत्र का जप अथवा अनुष्‍ठान करना है, उसका अर्घ्य पहले से लेना चाहिए। तत्पश्चात मंत्र का जप और उसके अर्घ्य की भावना करनी चाहिए। ध्यान रहे, अर्घ्य बिना जप निरर्थक रहता है।

2. मंत्र के भेद क्रमश: तनि माने गए हैं। 1. वाचिक जप 2. मानस जप और 3. उपाशु जप।

वाचिक जप- जप करने वाला ऊँचे-ऊँचे स्वर से स्पष्‍ट मंत्रों को उच्चारण करके बोलता है, तो वह वाचिक जप कहलाता है।
उपांशु जप- जप करने वालों की जिस जप में केवल जीभ हिलती है या बिल्कुल धीमी गति में जप किया जाता है जिसका श्रवण दूसरा नहीं कर पाता वह उपांशु जप कहलाता है।

मानस जप- यह सिद्धि का सबसे उच्च जप कहलाता है। जप करने वाला मंत्र एवं उसके शब्दों के अर्थ को एवं एक पद से दूसरे पद को मन ही मन चिंतन करता है वह मानस जप कहलाता है। इस जप में वाचक के दंत, होंठ कुछ भी नहीं हिलते है।
अभिचार कर्म के लिए वाचिक रीति से मंत्र को जपना चाहिए। शां‍‍‍ति एवं पुष्‍टि कर्म के लिए उपांशु और मोक्ष पाने के लिए मानस रीति से मंत्र जपना चाहिए।

3. मंत्र सिद्धि के लिए आवश्यक है कि मंत्र को गुप्त रखना चाहिए। मंत्र- साधक के बारे में यह बात किसी को पता न चले कि वो किस मंत्र का जप करता है या कर रहा है। यदि मंत्र के समय कोई पास में है तो मानसिक जप करना चाहिए।

4. सूर्य अथवा चंद्र ग्रहण के समय (ग्रहण आरंभ से समाप्ति तक) किसी भी नदी में खड़े होकर जप करना चाहिए। इसमें किया गया जप शीघ्र लाभदायक होता है। जप का दशांश हवन करना चाहिए। और ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। वैसे तो यह सत्य है कि प्रतिदिन के जप से ही सिद्धि होती है परंतु ग्रहण काल में जप करने से कई सौ गुना अधिक फल मिलता है।

विशेष : नदी में जप हमेशा नाभि तक जल में रहकर ही करना चाहिए।

34….रक्षा-विधानः शाबर मन्त्र
शरीर-रक्षा-मन्त्र
“छोटी-मोटी थमन्त बाँधे । वार को वार बाँधे । पार को पार बाँधे । मरघट-मसान बाँधे । जादू-वीर बाँधे । टोना-टम्बर बाँधे । दीठ-मूठ बाँधे । चोरी-छीना बाँधे । भेड़िया-बाघ बाँधे । लखूरी स्यार बाँधे । बिच्छू और साँप बाँधे । लाइल्लाह का कोट, इल्लिल्लाह की खाई, मुहम्मद रसूलिल्लाह की चौकी, हजरत अली की दुहाई ।”
विधिः- १॰ शुक्रवार को स्नानदि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करे । रात्रि में पश्चिम की ओर मुँह कर दीपक जलाए और लोबान की धूनी करे । १००८ बार या १०८ बार उक्त मन्त्र जपे । इससे मन्त्र सिद्ध हो जाएगा । फिर कभी किसी अपरिचित स्थान में रात्रि में रुकना पड़े या सोना पड़े, तब उक्त मन्त्र को ७-७ बार पढ़कर अपने दोनों हाथ घुटने के ऊपर ठंके । बाद में धरती के ऊपर मन्त्र पढ़ते हुए गोल घेरा बनाए । इसमें रहने या सोने से मन्त्र में वर्णित बातों से रक्षा होती है ।
२॰ जब तक ग्रहण या पर्व-काल रहे, उक्त मन्त्र को जपता रहे, तो यह सिद्ध हो जाता है । उसके पश्चात् उपरोक्तानुसार प्रयोग करे ।
३॰ शुक्र की मध्य-रात्रि (अन्य मत से गुरुवार) में किसी भी पुराने पीर की मजार पर जाए । पश्चिम की ओर मुँह कर धूप व बत्ती लगाए । लोबान की धूनी करे । पीर साहब को मिठाई चढ़ाए । १००८ या १०८ बार उक्त मन्त्र का जप करे । मन्त्र जप पूरा हो, तब चढ़ाई हुई मिठाई में से थोड़ी वहीं छोड़ दें और शेष घर ले आए । प्रातः-काल शेष मिठाई को बच्चों में बाँटे । इस तरह करने से मन्त्र सिद्ध हो जाएगा ।
बाद में भय-निवारण के लिए साधक मन्त्र पढ़कर अपनी हथेली के ऊपर फूँक लेकर अपना हाथ अपने मुँह के ऊपर फिराए । दूसरी बार मन्त्र पढ़ फूँक लेकर अपने हाथ को हाथ के ऊपर फिराए । तीसरी बार पैर के ऊपर, बाद में क्रमशः छाती, पीठ और पेट के ऊपर तथा अन्त में ७ वीं बार मन्त्र पढ़ हथेली के ऊपर फूँके । इस प्रकार पैर से मस्तक तक अपने हाथ फिराए । प्रतिदिन इस तरह प्रातः-सायं करने से साधक निर्भय हो जाता है । रोग, शत्रु, विषैले जीव-जन्तु, जंगली पशु उसका कुछ नहीं कर सकते । उसकी सुरक्षा सदैव बनी रहती है और रोगों से भी छुटकारा मिलता है ।
रोगी, बाधा-ग्रस्त, भय या कल्पना से पीड़ित व्यक्ति को स्वच्छ जल के ऊपर ११ बार उक्त मन्त्र पढ़कर फूँके तथा जल पिलाए, तो सभी प्रकार के कष्ट से उसकी मुक्ति होगी और सुरक्षा होगी .

34…दश महाविद्या शाबर मन्त्र
सत नमो आदेश । गुरुजी को आदेश । ॐ गुरुजी । ॐ सोऽहं सिद्ध की काया, तीसरा नेत्र त्रिकुटी ठहराया । गगण मण्डल में अनहद बाजा । वहाँ देखा शिवजी बैठा, गुरु हुकम से भितरी बैठा, शुन्य में ध्यान गोरख दिठा । यही ध्यान तपे महेशा, यही ध्यान ब्रह्माजी लाग्या । यही ध्यान विष्णु की माया ! ॐ कैलाश गिरी से, आयी पार्वती देवी, जाकै सन्मुख बैठ गोरक्ष योगी, देवी ने जब किया आदेश । नहीं लिया आदेश, नहीं दिया उपदेश । सती मन में क्रोध समाई, देखु गोरख अपने माही, नौ दरवाजे खुले कपाट, दशवे द्वारे अग्नि प्रजाले, जलने लगी तो पार पछताई । राखी राखी गोरख राखी, मैं हूँ तेरी चेली, संसार सृष्टि की हूँ मैं माई । कहो शिवशंकर स्वामीजी, गोरख योगी कौन है दिठा । यह तो योगी सबमें विरला, तिसका कौन विचार । हम नहीं जानत, अपनी करणी आप ही जानी । गोरख देखे सत्य की दृष्टि । दृष्टि देख कर मन भया उनमन, तब गोरख कली बिच कहाया । हम तो योगी गुरुमुख बोली, सिद्धों का मर्म न जाने कोई । कहो पार्वती देवीजी अपनी शक्ति कौन-कौन समाई । तब सती ने शक्ति की खेल दिखायी, दस महाविद्या की प्रगटली ज्योति ।
प्रथम ज्योति महाकाली प्रगटली ।
ॐ निरंजन निराकार अवगत पुरुष तत सार, तत सार मध्ये ज्योत, ज्योत मध्ये परम ज्योत, परम ज्योत मध्ये उत्पन्न भई माता शम्भु शिवानी काली ओ काली काली महाकाली, कृष्ण वर्णी, शव वहानी, रुद्र की पोषणी, हाथ खप्पर खडग धारी, गले मुण्डमाला हंस मुखी । जिह्वा ज्वाला दन्त काली । मद्यमांस कारी श्मशान की राणी । मांस खाये रक्त-पी-पीवे । भस्मन्ति माई जहाँ पर पाई तहाँ लगाई । सत की नाती धर्म की बेटी इन्द्र की साली काल की काली जोग की जोगीन, नागों की नागीन मन माने तो संग रमाई नहीं तो श्मशान फिरे अकेली चार वीर अष्ट भैरों, घोर काली अघोर काली अजर ।। महाकाली ।।
बजर अमर काली भख जून निर्भय काली बला भख, दुष्ट को भख, काल भख पापी पाखण्डी को भख जती सती को रख, ॐ काली तुम बाला ना वृद्धा, देव ना दानव, नर ना नारी देवीजी तुम तो हो परब्रह्मा काली ।
क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।
द्वितीय ज्योति तारा त्रिकुटा तोतला प्रगटी ।
।। तारा ।।
ॐ आदि योग अनादि माया जहाँ पर ब्रह्माण्ड उत्पन्न भया । ब्रह्माण्ड समाया आकाश मण्डल तारा त्रिकुटा तोतला माता तीनों बसै ब्रह्म कापलि, जहाँ पर ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पत्ति, सूरज मुख तपे चंद मुख अमिरस पीवे, अग्नि मुख जले, आद कुंवारी हाथ खण्डाग गल मुण्ड माल, मुर्दा मार ऊपर खड़ी देवी तारा । नीली काया पीली जटा, काली दन्त में जिह्वा दबाया । घोर तारा अघोर तारा, दूध पूत का भण्डार भरा । पंच मुख करे हां हां ऽऽकारा, डाकिनी शाकिनी भूत पलिता सौ सौ कोस दूर भगाया । चण्डी तारा फिरे ब्रह्माण्डी तुम तो हों तीन लोक की जननी ।
ॐ ह्रीं स्त्रीं फट्, ॐ ऐं ह्रीं स्त्रीं हूँ फट्
तृतीय ज्योति त्रिपुर सुन्दरी प्रगटी ।
।। षोडशी-त्रिपुर सुन्दरी ।।
ॐ निरञ्जन निराकार अवधू मूल द्वार में बन्ध लगाई पवन पलटे गगन समाई, ज्योति मध्ये ज्योत ले स्थिर हो भई ॐ मध्याः उत्पन्न भई उग्र त्रिपुरा सुन्दरी शक्ति आवो शिवधर बैठो, मन उनमन, बुध सिद्ध चित्त में भया नाद । तीनों एक त्रिपुर सुन्दरी भया प्रकाश । हाथ चाप शर धर एक हाथ अंकुश । त्रिनेत्रा अभय मुद्रा योग भोग की मोक्षदायिनी । इडा पिंगला सुषम्ना देवी नागन जोगन त्रिपुर सुन्दरी । उग्र बाला, रुद्र बाला तीनों ब्रह्मपुरी में भया उजियाला । योगी के घर जोगन बाला, ब्रह्मा विष्णु शिव की माता ।
श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः ॐ ह्रीं श्रीं कएईलह्रीं
हसकहल ह्रीं सकल ह्रीं सोः
ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं ।
चतुर्थ ज्योति भुवनेश्वरी प्रगटी ।‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍
।। भुवनेश्वरी ।।
ॐ आदि ज्योति अनादि ज्योत ज्योत मध्ये परम ज्योत परम ज्योति मध्ये शिव गायत्री भई उत्पन्न, ॐ प्रातः समय उत्पन्न भई देवी भुवनेश्वरी । बाला सुन्दरी कर धर वर पाशांकुश अन्नपूर्णी दूध पूत बल दे बालका ऋद्धि सिद्धि भण्डार भरे, बालकाना बल दे जोगी को अमर काया । चौदह भुवन का राजपाट संभाला कटे रोग योगी का, दुष्ट को मुष्ट, काल कन्टक मार । योगी बनखण्ड वासा, सदा संग रहे भुवनेश्वरी माता ।
ह्रीं
पञ्चम ज्योति छिन्नमस्ता प्रगटी ।
।। छिन्नमस्ता ।।
सत का धर्म सत की काया, ब्रह्म अग्नि में योग जमाया । काया तपाये जोगी (शिव गोरख) बैठा, नाभ कमल पर छिन्नमस्ता, चन्द सूर में उपजी सुष्मनी देवी, त्रिकुटी महल में फिरे बाला सुन्दरी, तन का मुन्डा हाथ में लिन्हा, दाहिने हाथ में खप्पर धार्या । पी पी पीवे रक्त, बरसे त्रिकुट मस्तक पर अग्नि प्रजाली, श्वेत वर्णी मुक्त केशा कैची धारी । देवी उमा की शक्ति छाया, प्रलयी खाये सृष्टि सारी । चण्डी, चण्डी फिरे ब्रह्माण्डी भख भख बाला भख दुष्ट को मुष्ट जती, सती को रख, योगी घर जोगन बैठी, श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथजी ने भाखी । छिन्नमस्ता जपो जाप, पाप कन्टन्ते आपो आप, जो जोगी करे सुमिरण पाप पुण्य से न्यारा रहे । काल ना खाये ।
श्रीं क्लीं ह्रीं ऐं वज्र-वैरोचनीये हूं हूं फट् स्वाहा ।
षष्टम ज्योति भैरवी प्रगटी ।
।। भैरवी ।।
ॐ सती भैरवी भैरो काल यम जाने यम भूपाल तीन नेत्र तारा त्रिकुटा, गले में माला मुण्डन की । अभय मुद्रा पीये रुधिर नाशवन्ती ! काला खप्पर हाथ खंजर, कालापीर धर्म धूप खेवन्ते वासना गई सातवें पाताल, सातवें पाताल मध्ये परम-तत्त्व परम-तत्त्व में जोत, जोत में परम जोत, परम जोत में भई उत्पन्न काल-भैरवी, त्रिपुर-भैरवी, सम्पत्त-प्रदा-भैरवी, कौलेश-भैरवी, सिद्धा-भैरवी, विध्वंसिनि-भैरवी, चैतन्य-भैरवी, कामेश्वरी-भैरवी, षटकुटा-भैरवी, नित्या-भैरवी । जपा अजपा गोरक्ष जपन्ती यही मन्त्र मत्स्येन्द्रनाथजी को सदा शिव ने कहायी । ऋद्ध फूरो सिद्ध फूरो सत श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथजी अनन्त कोट सिद्धा ले उतरेगी काल के पार, भैरवी भैरवी खड़ी जिन शीश पर, दूर हटे काल जंजाल भैरवी मन्त्र बैकुण्ठ वासा । अमर लोक में हुवा निवासा ।
ॐ ह्सैं ह्स्क्ल्रीं ह्स्त्रौः
सप्तम ज्योति धूमावती प्रगटी
।। धूमावती ।।
ॐ पाताल निरंजन निराकार, आकाश मण्डल धुन्धुकार, आकाश दिशा से कौन आये, कौन रथ कौन असवार, आकाश दिशा से धूमावन्ती आई, काक ध्वजा का रथ अस्वार आई थरै आकाश, विधवा रुप लम्बे हाथ, लम्बी नाक कुटिल नेत्र दुष्टा स्वभाव, डमरु बाजे भद्रकाली, क्लेश कलह कालरात्रि । डंका डंकनी काल किट किटा हास्य करी । जीव रक्षन्ते जीव भक्षन्ते जाजा जीया आकाश तेरा होये । धूमावन्तीपुरी में वास, न होती देवी न देव तहा न होती पूजा न पाती तहा न होती जात न जाती तब आये श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथ आप भयी अतीत ।
ॐ धूं धूं धूमावती स्वाहा ।
अष्टम ज्योति बगलामुखी प्रगटी ।
।। बगलामुखी ।।
ॐ सौ सौ दुता समुन्दर टापू, टापू में थापा सिंहासन पिला । संहासन पीले ऊपर कौन बसे । सिंहासन पीला ऊपर बगलामुखी बसे, बगलामुखी के कौन संगी कौन साथी । कच्ची बच्ची काक-कूतिया-स्वान-चिड़िया, ॐ बगला बाला हाथ मुद्-गर मार, शत्रु हृदय पर सवार तिसकी जिह्वा खिच्चै बाला । बगलामुखी मरणी करणी उच्चाटण धरणी, अनन्त कोट सिद्धों ने मानी ॐ बगलामुखी रमे ब्रह्माण्डी मण्डे चन्दसुर फिरे खण्डे खण्डे । बाला बगलामुखी नमो नमस्कार ।
ॐ ह्लीं ब्रह्मास्त्राय विद्महे स्तम्भन-बाणाय धीमहि तन्नो बगला प्रचोदयात् ।
नवम ज्योति मातंगी प्रगटी ।
।। मातंगी ।।
ॐ शून्य शून्य महाशून्य, महाशून्य में ॐ-कार, ॐ-कार में शक्ति, शक्ति अपन्ते उहज आपो आपना, सुभय में धाम कमल में विश्राम, आसन बैठी, सिंहासन बैठी पूजा पूजो मातंगी बाला, शीश पर अस्वारी उग्र उन्मत्त मुद्राधारी, उद गुग्गल पाण सुपारी, खीरे खाण्डे मद्य-मांसे घृत-कुण्डे सर्वांगधारी । बुन्द मात्रेन कडवा प्याला, मातंगी माता तृप्यन्ते । ॐ मातंगी-सुन्दरी, रुपवन्ती, कामदेवी, धनवन्ती, धनदाती, अन्नपूर्णी अन्नदाती, मातंगी जाप मन्त्र जपे काल का तुम काल को खाये । तिसकी रक्षा शम्भुजती गुरु गोरखनाथजी करे ।
ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा ।
दसवीं ज्योति कमला प्रगटी ।
।। कमला ।।
ॐ अ-योनी शंकर ॐ-कार रुप, कमला देवी सती पार्वती का स्वरुप । हाथ में सोने का कलश, मुख से अभय मुद्रा । श्वेत वर्ण सेवा पूजा करे, नारद इन्द्रा । देवी देवत्या ने किया जय ॐ-कार । कमला देवी पूजो केशर पान सुपारी, चकमक चीनी फतरी तिल गुग्गल सहस्र कमलों का किया हवन । कहे गोरख, मन्त्र जपो जाप जपो ऋद्धि सिद्धि की पहचान गंगा गौरजा पार्वती जान । जिसकी तीन लोक में भया मान । कमला देवी के चरण कमल को आदेश ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सिद्ध-लक्ष्म्यै नमः ।
सुनो पार्वती हम मत्स्येन्द्र पूता, आदिनाथ नाती, हम शिव स्वरुप उलटी थापना थापी योगी का योग, दस विद्या शक्ति जानो, जिसका भेद शिव शंकर ही पायो । सिद्ध योग मर्म जो जाने विरला तिसको प्रसन्न भयी महाकालिका । योगी योग नित्य करे प्रातः उसे वरद भुवनेश्वरी माता । सिद्धासन सिद्ध, भया श्मशानी तिसके संग बैठी बगलामुखी । जोगी खड दर्शन को कर जानी, खुल गया ताला ब्रह्माण्ड भैरवी । नाभी स्थाने उडीय्यान बांधी मनीपुर चक्र में बैठी, छिन्नमस्ता रानी । ॐ-कार ध्यान लाग्या त्रिकुटी, प्रगटी तारा बाला सुन्दरी । पाताल जोगन (कुण्डलिनी) गगन को चढ़ी, जहां पर बैठी त्रिपुर सुन्दरी । आलस मोड़े, निद्रा तोड़े तिसकी रक्षा देवी धूमावन्ती करें । हंसा जाये दसवें द्वारे देवी मातंगी का आवागमन खोजे । जो कमला देवी की धूनी चेताये तिसकी ऋद्धि सिद्धि से भण्डार भरे । जो दसविद्या का सुमिरण करे । पाप पुण्य से न्यारा रहे । योग अभ्यास से भये सिद्धा आवागमन निवरते । मन्त्र पढ़े सो नर अमर लोक में जाये । इतना दस महाविद्या मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया । अनन्त कोट सिद्धों में, गोदावरी त्र्यम्बक क्षेत्र अनुपान शिला, अचलगढ़ पर्वत पर बैठ श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथजी ने पढ़ कथ कर सुनाया श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश । आदेश ।।

35….उतारा टोटके
दुख-सुख, अच्छे-बुरे दिन, लाभ-हानि, यश-अपयश, सफलता-विफलता, हारी-बीमारी आदि सभी इस जीवन के विभिन्न रंग हैं। समय-समय पर मनुष्य को विभिन्न प्रकार के सुख-दुख भोगने पडते हैं। यद्यपि ये सभी हमारे जन्म और पूर्व जन्मों के प्रभाव का फल हैं, परन्तु फिर भी इनके दुष्प्रभावों को कम तो किया ही जा सकता है। इस कार्य के लिए सम्पूर्ण विश्व में ही मानव अनेक टोने-टोटकों का प्रयोग करता रहा है। यही नहीं, सौभाग्य को बढाने, घर में सुख-समृद्धि लाने, व्यापार को चमकाने के लिए भी अनेके टोने-टोटकों का प्रयोग किया ही जाता है। यही नहीं, नि:संतान दम्पतियों ने सन्तान और दरिद्रों ने राजसी वैभव भी टोने-टोटकों के बल पर प्राप्त किए हैं।
टोने-टोटकों और गंडे-तावीजों का अपना एक पूर्ण विज्ञान है और यही कारण है कि इस क्षेत्र में सफलता प्राप्ति के कुछ नियमों का पालन आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है। टोटकों में सफलता के सूत्र आस्था, विश्वास, प्रयास और उनकी सिद्धि के विविध नियम का पालन टोटका-सिद्धि का मूल आधार है, जिसके द्वारा आपके सभी प्रकार के कष्टों का निवारण हो सकता है। जब किसी भी उपचार या औषधि का कोई प्रभाव नहीं पडता, तो उसके समय टोने-टोटके का सहारा लेना पड जाता है। ये टोटके उस व्याधि का अंत ही नहीं करते, बल्कि सदा के लिए उसकी जडें भी उखाड फेंकते हैं।
कुछ टोटके केवल वस्तु के प्रयोग से ही सफल हो जाते हैं, जबकि कुछ टोटकों के प्रयोग में एक विशेष प्रकार की ध्वनि या मंत्र का भी उच्चारण करना पडता है। टोटकों के प्रयोग से पूर्व इन बातों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। उतारों की विधि व महत्व टोने-टोटकों के संसार में उतारों का बहुत ही अधिक महत्व हैं। बालको को नजर लग जाने, किसी के भूत बाधाग्रस्त होने अथवा बीमार हो जाने पर झाड-फूंक के साथ ही उतारे भी किए जाते हैं। कोई भी उतारा सर से पैर की ओर सात बार उतारा जाता है। इस उतारे के करने से वह बीमारी अथवा दुष्ट आत्मा उस मिठाई के टुकडे पर आ जाती है और इस उतारे को घर से दूर रख आने पर उसके साथ ही घर से बाहर चली जाती है।
रविवार : इतवार के रोज यदि उतारा करना हो, तो बर्फी से उतारा करे बर्फी गाय को खिला देनी चाहिए।
सोमवार : सोमवार के रोज भी यदि उतारा करना हो, तो उस रोज भी बर्फी के टुकडे से उतारा करके गाय को ही खिलाना चाहिए।
मंगलवार : यदि मंगल के रोज उतारा करने की आवश्यकता पडे, तो उस रोज मोतीचूर के लड्डू से उतारा करना चाहिए और उसे कुत्ते को डालना चाहिए।
बुधवार : बुधवार के रोज यदि उतारा करना हो, तो उस दिन इमरती अथवा मोतीचूर के लड्डू से उतारा करना चाहिए और उसे कुत्ते को डालना चाहिए।
गुरूवार : बृहस्पतिवार के रोज शाम के समय पांच मिठाइयां एक दोने में रखकर उताररा करना चाहिए। उतारा करके उसमें धूपबत्ती और छोटी इलायची रखकर पीपल के पेड की जड में पश्चिम दिशा में रखकर लौट आना चाहिए। उतारा करके आते समय पलटकर नहीं देखना चहिए और न ही रास्ते में किसी से बोलना चाहिए। घर आकर हाथ-पैर धोने के बाद कोई कार्य करना चाहिए।
शुक्रवार : शुक्रवार को यदि उतारा करना हो, तो शाम के समय मोतीचूर के लड्डृ से ही उतारा करके उसे कुत्ते को डालना चाहिए।
शनिवार : शनिवार के दिन इमरती और मोतीचूर के लड्डू से उतार किया जाता है। यदि शनिवार के दिन काला कुत्ता मिले और उसे इमरती डाली जाए तो बहुत अच्छा होता है।

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One thought on “उड्डीस तंत्र साधना

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