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तंत्र शास्त्र .स्त्री

.स्त्री
पुरुष की सहभागिनी है,पुरुष का जन्म सकारात्मकता के लिये और स्त्री का
जन्म नकारात्मकता को प्रकट करने के लिये किया जाता है। स्त्री का रूप धरती
के समान है और पुरुष का रूप उस धरती पर फ़सल पैदा करने वाले किसान के समान
है। स्त्रियों की शक्ति को विश्लेषण करने के लिये चौसठ योगिनी की प्रकृति
को समझना जरूरी है। पुरुष के बिना स्त्री अधूरी है और स्त्री के बिना पुरुष
अधूरा है। योगिनी की पूजा का कारण शक्ति की समस्त भावनाओं को मानसिक धारणा
में समाहित करना और उनका विभिन्न अवसरों पर प्रकट करना और प्रयोग करना
माना जाता है,बिना शक्ति को समझे और बिना शक्ति की उपासना किये यानी उसके
प्रयोग को करने के बाद मिलने वाले फ़लों को बिना समझे शक्ति को केवल एक ही
शक्ति समझना निराट दुर्बुद्धि ही मानी जायेगी,और यह काम उसी प्रकार से समझा
जायेगा,जैसे एक ही विद्या का सभी कारणों में प्रयोग करना।
1.
दिव्ययोग
की दिव्ययोगिनी :- योग शब्द से बनी योगिनी का मूल्य शक्ति के रूप मेंसमय
के लिये प्रतिपादित है,एक दिन और एक रात में 1440 मिनट होते है,और एक योग
की योगिनी का समय 22.5 मिनट का होता है,सूर्योदय से 22.5 मिनट तक इस योग की
योगिनी का रूप प्रकट होता है,यह जीवन में जन्म के समय,साल के शुरु के दिन
में महिने शुरु के दिन में और दिन के शुरु में माना जाता है,इस योग की
योगिनी का रूप दिव्य योग की दिव्य योगिनी के रूप में जाना जाता है,इस
योगिनी के समय में जो भी समय उत्पन्न होता है वह समय सम्पूर्ण जीवन,वर्ष
महिना और दिन के लिये प्रकट रूप से अपनी योग्यता को प्रकट करता है। उदयति
मिहिरो विदलित तिमिरो नामक कथन के अनुसार इस योग में उत्पन्न व्यक्ति समय
वस्तु नकारात्मकता को समाप्त करने के लिये योगकारक माने जाते है,इस योग में
अगर किसी का जन्म होता है तो वह चाहे कितने ही गरीब परिवार में जन्म ले
लेकिन अपनी योग्यता और इस योगिनी की शक्ति से अपने बाहुबल से गरीबी को
अमीरी में पैदा कर देता है,इस योगिनी के समय काल के लिये कोई भी समय अकाट्य
होता है।
2.
महायोग की महायोगिनी :- यह योगिनी रूपी शक्ति का रूप अपनी
शक्ति से महानता के लिये माना जाता है,अगर कोई व्यक्ति इस महायोगिनी के
सानिध्य में जन्म लेता है,और इस योग में जन्मी शक्ति का साथ लेकर चलता है
तो वह अपने को महान बनाने के लिये उत्तम माना जाता है।
3.
सिद्ध योग की
सिद्धयोगिनी:- इस योग में उत्पन्न वस्तु और व्यक्ति का साथ लेने सेसिद्ध
योगिनी नामक शक्ति का साथ हो जाता है,और कार्य शिक्षा और वस्तु या व्यक्ति
के विश्लेषण करने के लिये उत्तम माना जाता है।
4.
महेश्वर की माहेश्वरी महाईश्वर के रूप में जन्म होता है विद्या और साधनाओं में स्थान मिलता है.
5.
पिशाच की पिशाचिनी बहता हुआ खून देखकर खुश होना और खून बहाने में रत रहना.
6.
डंक की डांकिनी बात में कार्य में व्यवहार में चुभने वाली स्थिति पैदा करना.
7.
कालधूम की कालरात्रि भ्रम की स्थिति में और अधिक भ्रम पैदा करना.
8.
निशाचर की निशाचरी रात के समय विचरण करने और कार्य करने की शक्ति देना छुपकर कार्य करना.
9.
कंकाल की कंकाली शरीर से उग्र रहना और हमेशा गुस्से से रहना,न खुद सही रहना और न रहने देना.
10.
रौद्र की रौद्री मारपीट और उत्पात करने की शक्ति समाहित करना अपने अहम को जिन्दा रखना.
11.
हुँकार की हुँकारिनी बात को अभिमान से पूर्ण रखना,अपनी उपस्थिति का आवाज से बोध करवाना.
12.
ऊर्ध्वकेश की ऊर्ध्वकेशिनी खडे बाल और चालाकी के काम करना.
13.
विरूपक्ष की विरूपक्षिनी आसपास के व्यवहार को बिगाडने में दक्ष होना.
14.
शुष्कांग की शुष्कांगिनी सूखे अंगों से युक्त मरियल जैसा रूप लेकर दया का पात्र बनना.
15.
नरभोजी की नरभोजिनी मनसा वाचा कर्मणा जिससे जुडना उसे सभी तरह चूसते रहना.
16.
फ़टकार की फ़टकारिणी बात बात में उत्तेजना में आना और आदेश देने में दुरुस्त होना.
17.
वीरभद्र की वीरभद्रिनी सहायता के कामों में आगे रहना और दूसरे की सहायता के लिये तत्पर रहना.
18.
धूम्राक्ष की धूम्राक्षिणी हमेशा अपनी औकात को छुपाना और जान पहिचान वालों के लिये मुशीबत बनना.
19.
कलह की कलहप्रिय सुबह से शाम तक किसी न किसी बात पर क्लेश करते रहना.
20.
रक्ताक्ष की रक्ताक्षिणी केवल खून खराबे पर विश्वास रखना.
21.
राक्षस की राक्षसी अमानवीय कार्यों को करते रहना और दया धर्म रीति नीति का भाव नही रखना.
22.
घोर की घोरणी गन्दे माहौल में रहना और दैनिक क्रियाओं से दूर रहना.
23.
विश्वरूप की विश्वरूपिणी अपनी पहिचान को अपनी कला कौशल से संसार में फ़ैलाते रहना.
24.
भयंकर की भयंकरी अपनी उपस्थिति को भयावह रूप में प्रस्तुत करना और डराने में कुशल होना.
25.
कामक्ष की कामाक्षी हमेशा संभोग की इच्छा रखना और मर्यादा का ख्याल नही रखना.
26.
उग्रचामुण्ड की उग्रचामुण्डी शांति में अशांति को फ़ैलाना और एक दूसरे को लडाकर दूर से मजे लेना.
27.
भीषण की भीषणी. किसी भी भयानक कार्य को करने लग जाना और बहादुरी का परिचय देना.
28.
त्रिपुरान्तक की त्रिपुरान्तकी भूत प्रेत वाली विद्याओं में निपुण होना और इन्ही कारको में व्यस्त रहना.
29.
वीरकुमार की वीरकुमारी निडर होकर अपने कार्यों को करना मान मर्यादा के लिये जीवन जीना.
30.
चण्ड की चण्डी चालाकी से अपने कार्य करना और स्वार्थ की पूर्ति के लिये कोई भी बुरा कर जाना.
31.
वाराह की वाराही पूरे परिवार के सभी कार्यों को करना संसार हित में जीवन बिताना.
32.
मुण्ड की मुण्डधारिणी जनशक्ति पर विश्वास रखना और संतान पैदा करने में अग्रणी रहना.
33.
भैरव की भैरवी तामसी भोजन में अपने मन को लगाना और सहायता करने के लिये तत्पर रहना.
34.
हस्त की हस्तिनी हमेशा भारी कार्य करना और शरीर को पनपाते रहना.
35.
क्रोध की क्रोधदुर्मुख्ययी क्रोध करने में आगे रहना.

2….माँ काली का ही स्वरूप है माँ तारा । माँ काली को नीलरूपा होने के कारण ही तारा कहा गया है। भगवती काली का यह स्वरूप सर्वदा मोक्ष देने वाला है, जीव को इस संसार सागर से तारने वाला है- इसलिए वह तारा हैं। सहज में ही वे वाक्‌ प्रदान करने वाली हैं इसलिए नीलसरस्वती हैं। भयंकर विपत्तियों से साधक की रक्षा करती हैं, उसे अपनी कृपा प्रदान करती हैं, इसलिए वे उग्रतारा या उग्रतारिणी हैं। यद्यपि मां तारा और काली में कोई भेद नहीं है, तथापि बृहन्नील तंत्रादि त्रादि ग्रंथों में उनके विशिष्ट स्वरूप का उल्लेख किया गया है। हयग्रीव दानव का वध करने के लिए देवी को नील-विग्रह प्राप्त हुआ, जिस कारण वे तारा कहलाईं। शव-रूप शिव पर प्रत्यालीढ मुद्रा में भगवती आरूढ हैं, और उनकी नीले रंग की आकृति है तथा नील कमलों के समान तीन नेत्र तथा हाथों में कैंची, कपाल, कमल और खडग धारण किये हैं। व्याघ्र-चर्म से विभूषित इन देवी के कंठ में मुण्डमाला लहराती है। वे उग्र तारा हैं, लेकिन अपने भक्तों पर कृपा करने के लिए उनकी तत्परता अमोघ है । इस कारण मां तारा महा-करूणामयी हैं।
तारा तंत्र में कहा गया है- समुद्र मथने देवि कालकूट समुपस्थितम्‌ ॥
समुद्र मंथन के समय जब कालकूट विष निकला तो बिना किसी क्षोभ के उस हलाहल विष को पीने वाले भगवान शिव ही अक्षोभ्य हैं और उनके साथ शब्द तारा विराजमान हैं। शिवशक्ति संगम तंत्र में अक्षोभ्य शब्द का अर्थ महादेव कहा गया है। अक्षोभ्य को दृष्टा ऋषि शिव कहा गया है। अक्षोभ्य शिव ऋषि को मस्तक पर धारण करने वाली तारा तारिणी अर्थात्‌ तारण करने वाली हैं। उनके मस्तक पर स्थित पिंगल वर्ण उग्र जटा का भी अद्‌भूत रहस्य है। ये फैली हुई उग्र पीली जटाएं सूर्य की किरणों की प्रतिरूपा हैं। यह एकजटा है। इस प्रकार अक्षोभ्य एवं पिंगोगै्रक जटा धारिणी उग्र तारा एकजटा के रूप में पूजी जाती हैं। वे ही उग्र तारा शव के हृदय पर चरण रखकर उस शव को शिव बना देने वाली नील सरस्वती हो जाती हैं।
सर्वप्रथम महर्षि वशिष्ट ने भगवती तारा की वैदिक रीति से आराधना की, परंतु वे सफल नहीं हुए। तब उन्हें उनके पिता ब्रह्मा जी से संकेत मिला कि वे तांत्रिक पद्धति से भगवती तारा की उपासना करें तो वे निश्चय ही सफल होंगें अतः महर्षि ने कामरूप प्रदेश (असम ) में साधना की । तदोपरान्त ही वशिष्ठ जी को भगवती तारा की सिद्धि प्राप्त हुई। इसी कारण कहा जाता है कि भगवती तारा की उपासना तांत्रिक पद्धति से ही सफल होती है।
महाकाल-संहिता के कामकला-खण्ड में तारा-रहस्य वर्णित है, जिसमें तारा-रात्रि में भगवती तारा की उपासनाका विशेष महत्व है। चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि की रात्रि को तारा-रात्रि कहा जाता है।
मां के स्वरूप का वर्णन
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मां सर्वमयी, नूतन जलधर स्वरूपा लम्बोदरी हैं। उन्होंने अपने कटि प्रदेश में व्याघ्र चर्म लपेटा हुआ है, उनके स्तन स्थूल एवं समुन्नत कुच वाले हैं, उनके तीनों नेत्र लाल-लाल और वृताकार हैं, उनकी पीठ पर अत्यंत घोर घने काले केश फैले हुए हैं, उनका सिर अक्षोभ्य महादेव के प्रिय नाग के बगलो फनों से सुशोभित है, उनकी दोनों बगलों में नील कमलों की मालाएं शोभित हो रही हैं। पंचमुद्रा-स्वरूपिणि, शुभ्र त्रिकोणाकार कगल पंचक को धारण करने वाली, अत्यंत नील जटाजूट वाली, विशाल चंवर मुद्रा रूपी केशों से अलंकृत, श्वेतवर्ण के तक्षक नाग के वलय वाली, रक्त वर्ण सर्प के समान अल्पाहार वाली, विचित्र वर्णों वाले शेषनाग से बने हार को धारण करने वाली, सुनहले पीतवर्ण के छोटे-छोटे सर्पों की मुद्रिकाएं धारण करने वाली, हल्के लाल रंग के नाग की बनी कटिसूत्र वाली, दूर्वादल के समान श्यामवर्ण के नागों के वलय वाली, सूर्य, चन्द्र, अग्निस्वरूप, त्रिनयना, करोड़ो बाल रवि की छवियुक्त दक्षिण नेत्र वाली, शीतल कोटि-कोटि बालचन्द्र के समान शीतल नयनों वाली, लाखों अग्निशिखाओं से भी नयनां तीक्ष्ण तेजोरूप्पा नयनों वाली, लपलपाती जिह्‌वा वाली, महाकाल रूपी शव के हृदय पर दायें पद को कुछ मुडी हुई मुद्रा में एवं उसके दोनों पैरों पर अपने बायें पैर का को फैली हुर्इ्र अवस्था में उस प्रत्यालीढ पद वाली महाकाली हैं, जो तुरन्त ही कटे हुए रूधिराक्त केशों से गूंथे गये मुण्डमालों से अत्यन्त रमणीय हो गयी हैं। समस्त प्रकार के स्त्री-आभूषणों से विभूषित एवं महामोह को भी मोहने वाली हैं, महामुक्ति दायिनि, विपरीत रतिक्रीड़ा, निरता एवं रति कारण कामावेश के कारण आनन्दमुखी है।
तारा मां श्मशान वासिनि हैं, अत्यन्त ही भयंकर स्वरूप वाली हैं, शव जो कि चिता पर जल रही हैं, उस शव पर प्रत्यालिङ मुद्रा पर खङी हुई हैं। कटे हुऐ सरो के माला के स्थान पर मां ने खोपङीयो तथा हड्डीयो कि माला धारण की हुई हैं तथा सर्पो, रूद्राक्ष के आभूषणो से अलंकृत हैं। मां की चार भुजाऐं है और अपने हाथो में क्रमशः कैंची, नील कमल, खप्पर तथा खडग धारण किऐ हुऐ हैं, बाघम्बर के वस्त्र धारण करती हैं। वासतव में, मां अज्ञान रूपी शव पर प्रत्यालिङ मुद्रा में विराजमान हैं और उस शव को, ज्ञान रूपी शिव में परिवर्तित कर अपने मस्तक पर धारण किए हुए हैं, जिन्हें अक्ष्योभ शिव/ऋषि के नाम से जाना जाता हैं, ऐसी असाधारण शक्ति और विद्या कि ज्ञाता हैं मां। मां की अराधना विशेषतः मोक्ष पाने के लिए कि जाती हैं, मां मोक्ष दायिनी हैं। मां भोग और मोक्ष एक साथ भक्त को प्रदान करती हैं और तन्त्र साधको की अधिष्ठात्री देवी हैं। तन्त्र और अघोर पंथ के साधको की साधना मां के वरदान और कृपा के बिना पूर्ण नहीं होती। परन्तु व्यबहारिक दृष्टी से मां का स्वरूप अत्यन्त ही भयंकर होते हुऐ भी स्वाभाव बहुत ही कोमल ऐवम सरल हैं। ऐसा इस संसार में कुछ भी नहीं हैं जो मां अपने भक्तो/साधको को प्रदान करने में असमर्थ हैं।
तारा कुल की तिन माताओ में नीलसरस्वती मां अनेको सरस्वती की जननी हैं । श्रीष्टि में जो भी ज्ञान ईधर-उधर बटा हुया हैं, उसे एक जगह संयुक्त करने पर मां नीलसरस्वती की उत्पत्ति होती हैं । मां अपने अन्दर सम्पूर्ण ज्ञान समाये हुये हैं, फलस्वरूप मां का भक्त प्ररम ज्ञानी हो जाता हैं। मां भव सागर से तारने वाली हैं, तभी मां तारा के नाम से जानी जाती हैं।
मां का स्वरूप : मां के घ्यान मंत्र के अनुसार
(शास्त्रो के अनुसार स्वरूप का वर्णन घ्यान मंत्र कहलाता हैं।)
सात्विक ध्यान :
सस्थां द्गवेताम्बराढ्‌यां हंसस्थां मुक्ताभरणभूषिताम्‌। चतुर्वक्त्रामष्टभुजैर्दधानां कुण्डिकाम्बुजे ॥
वराभये पाद्गाद्गाक्ती अक्षस्रक्पुष्पमालिके । द्गाब्दपाथोनिधौ ध्यायेत्‌ सृष्टिध्यानमुदीरितम्‌ ॥
अर्थात्‌ -
सफेद वस्त्र धारण किये हुए, हंस पर विराजित, मोती के आभूषणों से अलंकृत, चार मुखों वाली तथा अपनी आठ भुजाओं में क्रमशः कमण्डल, कमल, वर, अभय मुद्रा, पाश, शक्ति, अक्षमाला एवं पुष्पमाला धारण किये हुए शब्द समुद्र में स्थित महाविद्या का ध्यान करें ।
राजसी ध्यान :
रक्ताम्बरां रक्तसिंहासनस्थां हेमभूषिताम्‌। एकवक्त्रां वेदसंखयैर्भुजैः संबिभ्रतीं क्रमात्‌ ॥
अक्षमालां पानपात्रम-भयं वरमुत्तमम्‌ । श्वेतद्वीपस्थितां ध्यायेत्‌ स्थितिध्यानमिदं स्मृतम्‌॥
अर्थात्‌ -
रक्त वर्ण के वस्त्र धारण किये हुए, रक्त वर्ण के सिंहासन पर विराजित, सुवर्ण से बने आभूषणों से सुशोभित, एक मुख वाली, अपनी चार भुजाओं में अक्षमाला, पानपात्र, अभय एवं वर मुद्रा धारण किये हुए श्वेतद्वीप निवासिनी भगवती का ध्यान करें।
तामस ध्यान :-
कृष्णाम्बराढ्‌यां नौसंस्थामस्थ्याभरण-भूषिताम्‌ ।
नववक्त्रां भुजैरष्टादद्गाभिर्दधतींवरम्‌॥
अभयं परशुं दर्वीं खड्‌गं पाशुपतं हलम्‌ ।
भिण्डिं शूलं च मुसलं कर्त्रीं शक्तिं त्रिशीर्षकम्‌ ॥
अर्थात्‌ -
काले रंग का वस्त्र धारण किये हुए, नौका पर विराजित, हड्‌डी के आभूषणों से विभूषित, नौ मुखों वाली, अपनी अट्ठारह भुजाओं में वर, अभय, परशु, दर्वी, खड्‌ग, पाशुपत, हल, भिण्डि, शूल, मूशल, कैंची, शक्ति, त्रिशूल, संहार अस्त्र, पाश, वज्र, खट्‌वांग और गदा धारण करने वाली रक्त-सागर में स्थित देवी का ध्यान करना चाहिए।
वचनान्तरसे तारा नामका रहस्य यह भी है कि वे सर्वदा मोक्ष देनेवाली, तारनेवाली हैं, इसलिये इन्हें तारा कहा जाता है। महाविद्याओँ में ये द्वितीय स्थानपर परिगणित हैं। अनायास ही वाक्शक्ति प्रदान करने में समर्थ हैं, इसलिये इन्हें नीलसरस्वती भी कहते हैं। भयंकर विपप्तियों से भक्तों की रक्षा करती हैं। इसलिये उग्रतारा हैं। बृहन्नील-तन्त्रादि ग्रन्थों में भगवती ताराके स्वरूप की विशेष चर्चा है। हयग्रीवका वध करने के लिये इन्हें नील-विग्रह प्राप्त हुआ था। ये शवरूप शिवरूप प्रत्यालीढ़ मुद्रा में आरुढ़ हैं। भगवती तारा नीलवर्णवाली,नीलकमलों के समान तीन नेत्रोंवाली तथा हाथों में कैंची, कपाल, कमल और खड्ग धारण करनेवाली हैं। ये व्याघ्रचर्मसे विभूषिता तथा कण्ठ में मुण्डमाला धारण करने वाली हैं।
ताराका प्रादुर्भाव :-
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मेरू-पर्वतके, पश्चिम भाग में चोलना’ नामकी नदीके या चोलन सरोवरके तटपर हुआ था, जैसा कि स्वतन्त्रतन्त्रमें वर्णित है-
मेरोः पश्र्चिमकूले नु चोत्रताख्यों हृदो महान्।
तत्र जज्ञे स्वयं तारा देवी नीलसरस्वती।।
“महाकाल-संहिता ” के काम कलाखण्ड में तारा-रहस्य वर्णित है, जिसमें तारारात्रिमें ताराकी उपासनाका विशेष महत्त्व है। चैत्र-शुक्ल नवमी की रात्रि ‘तारारात्रि’ कहलाती है-
चैत्रे मासि नवम्यां तु शुक्लपक्षे तु भूपते। क्रोधरात्रिर्महेशानि तारारूपा भविष्यति।। (पुरश्चर्यार्णव भाग-3)
सृष्टि की उत्तपत्ति से पहले घोर अन्धकार था, तब न तो कोई तत्व था न ही कोई शक्ति थी, केवल एक अन्धकार का साम्राज्य था, इस परलायाकाल के अन्धकार की देवी थी काली, उसी महाअधकार से एक प्रकाश का बिन्दु प्रकट हुआ जिसे तारा कहा गया, यही तारा अक्षोभ्य नाम के ऋषि पुरुष की शक्ति है, ब्रहमांड में जितने धधकते पिंड हैं सभी की स्वामिनी उत्तपत्तिकर्त्री तारा ही हैं, जो सूर्य में प्रखर प्रकाश है उसे नीलग्रीव कहा जाता है, यही नील ग्रीवा माँ तारा हैं,
सृष्टि उत्तपत्ति के समय प्रकाश के रूप में प्राकट्य हुआ इस लिए तारा नाम से विख्यात हुई किन्तु देवी तारा को महानीला या नील तारा कहा जाता है क्योंकि उनका रंग नीला है, जिसके सम्बन्ध में कथा आती है कि जब सागर मंथन हुआ तो सागर से हलाहल विष निकला, जो तीनों लोकों को नष्ट करने लगा, तब समस्त राक्षसों देवताओं ऋषि-मुनिओं नें भगवान शिव से रक्षा की गुहार लगाई, भूत बावन शिव भोले नें सागर मन्थन से निकले कालकूट नामक विष को पी लिया, विष पीते ही विष के प्रभाव से महादेव मूर्छित होने लगे, उनहोंने विष को कंठ में रोक लिया किन्तुविष के प्रभाव
से उनका कंठ भी नीला हो गया, जब देवी नें भगवान् को मूर्छित होते देख तो देवी नासिका से भगवान शिव के भीतर चली गयी और विष को अपने दूध से प्रभावहीन कर दिया, किन्तु हलाहल विष से देवी का शरीर नीला पड़गया, तब भगवान शिव नें देवी को महानीला कह कर संबोधित किया, इस प्रकार सृष्टि उत्तपत्ति के बाद पहली बार देवी साकार रूप में प्रकट हुई, दस्माहविद्याओं में देवी तारा कीसाधना पूजा ही सबसे जटिल है, देवी के तीन प्रमुख रूप हैं -
१) उग्रतारा २) एकाजटा और ३) नील सरस्वती
देवी सकल ब्रह्म अर्थात परमेश्वर की शक्ति है, देवी की प्रमुख सात कलाएं हैं जिनसे देवी ब्रहमांड सहित जीवों तथादेवताओं की रक्षा भी करती है ये सात शक्तियां हैं-
१) परा २) परात्परा ३) अतीता ४) चित्परा ५) तत्परा ६)तदतीता ७) सर्वातीता
इन कलाओं सहित देवी का धन करने या स्मरण करने से उपासक को अनेकों विद्याओं का ज्ञान सहज ही प्राप्त होने लगता है, देवी तारा के भक्त के बुद्धिबल का मुकाबला तीनों लोकों मन कोई नहीं कर सकता, भोग और मोक्ष एक साथ देने में समर्थ होने के कारण इनको सिद्धविद्या कहा गया है | देवी तारा ही अनेकों सरस्वतियों की जननी है इस लिए उनको नील सरस्वती कहा जाता हैदेवी का भक्त प्रखरतम बुद्धिमान हो जाता है जिस कारण वो संसार और सृष्टि को समझ जाता है अक्षर के भीतर का ज्ञान ही तारा विद्य| है भवसागर से तारने वाली होने के कारण भी देवी को तारा
कहा जाता हैदेवी बाघम्बर के वस्त्र धारण करती है और नागों का हार एवं कंकन धरे हुये हैदेवी का स्वयं का रंग नीला है और नीले रंग को प्रधान रख कर ही देवी की पूजा होती हैदेवी तारा के तीन रूपों में से किसी भी रूप की साधना बना सकती है समृद्ध, महाबलशाली और ज्ञानवानसृष्टि की उतपाती एवं प्रकाशित शक्ति के रूप में देवी को त्रिलोकी पूजती है ये सारी सृष्टि देवी की कृपा से ही अनेक सूर्यों का प्रकाश प्राप्त कर रही हैशास्त्रों में देवी को ही सवित्राग्नी कहा गया हैदेवी की स्तुति से देवी की कृपा प्राप्त होती है |
तांत्रिक ध्यान :-
……………..
प्रत्यालीढ़ पदार्पिताग्ध्रीशवहृद घोराटटहासापरा
खड़गेन्दीवरकर्त्री खर्परभुजा हुंकार बीजोद्भवा,
खर्वानीलविशालपिंगलजटाजूटैकनागैर्युता
जाड्यनन्यस्य कपालिकेत्रिजगताम हन्त्युग्रतारा स्वयं !!
देवी की कृपा से साधक प्राण ज्ञान प्राप्त करने के साथ- साथ भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करता हैगृहस्थ साधक को सदा ही देवी की सौम्य रूप में साधना पूजा करनी चाहिएदेवी अज्ञान रुपी शव पर विराजती हैं और ज्ञान की खडग से अज्ञान रुपी शत्रुओं का नाश करती हैंलाल व नीले फूल और नारियल चौमुखा दीपक चढाने से देवी होतीं हैं प्रसन्नदेवी के भक्त को ज्ञान व बुद्धि विवेक में तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पतादेवी की मूर्ती पर रुद्राक्ष चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती हैमहाविद्या तारा के मन्त्रों से होता है बड़े से बड़े दुखों का नाश | देवी माँ का स्वत: सिद्ध
महामंत्र है. . .
श्री सिद्ध तारा महाविद्या महामंत्र
” ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट ”
इस मंत्र से काम्य प्रयोग भी संपन्न किये जाते हैं जैसे-
1. बिल्व पत्र, भोज पत्र और घी से हवन करने पर लक्ष्मी की
प्राप्ति होती है
2.मधु. शर्करा और खीर से होम करने पर वशीकरण होता है
3.घृत तथा शर्करा युक्त हवन सामग्री से होम करने पर आकर्षण
होता है।
4. काले तिल व खीर से हवन करने पर शत्रुओं का स्तम्भन होता
है।
देवी के तीन प्रमुख रूपों के तीन महा मंत्रमहाअंक-देवी द्वारा उतपन्न गणित का अंक जिसे स्वयं तारा ही कहा जाता है वो देवी का महाअंक है -”1”
विशेष पूजा सामग्रियां-
पूजा में जिन सामग्रियों के प्रयोग से देवी की विशेष कृपा मिलाती
है सफेद या नीला कमल का फूल चढ़ानारुद्राक्ष से बने कानों के कुंडल चढ़ानाअनार के दाने प्रसाद रूप में चढ़ाना सूर्य शंख को देवी पूजा में रखना भोजपत्र पर ह्रीं लिख करा चढ़ानादूर्वा,अक्षत,रक्तचंदन,पंचगव्य,पञ्चमेवा व पंचामृत चढ़ा एंपूजा में उर्द की ड़ाल व लौंग काली मिर्च का चढ़ावे के रूप प्रयोग करें सभी चढ़ावे चढाते हुये देवी का ये मंत्र पढ़ें-
” ॐ क्रोद्धरात्री स्वरूपिन्ये नम: ”
१) देवी तारा मंत्र – ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट
२) देवी एकाजटा मंत्र – ह्रीं त्री हुं फट
३) नील सरस्वती मंत्र – ह्रीं त्री हुं
सभी मन्त्रों के जाप से पहले अक्षोभ्य ऋषि का नाम लेना चाहिए तथा उनका ध्यान करना चाहिए
शत्रुनाश, वाक्-शक्ति की प्राप्ति तथा भोग-मोक्ष की प्राप्ति के लिये तारा अथवा उग्रतारा की साधना की जाती है। रात्रिदेवी की स्वरूपा शक्ति तारा महाविद्याओं में अद्भुत प्रभाववाली और सिद्ध की अधिष्ठाती देवी कहीं गयी है। भगवती ताराके तीन रूप हैं।–तारा, एकजटा और नील सरस्वती। तीनों रूपों के रहस्य, कार्य-कलाप तथा ध्यान परस्पर भिन्न हैं, किन्तु भिन्न भिन्न होते हुए सबकी शक्ति समान और एक है। भगवती ताराकी उपासना मुख्यरूप से तन्त्रोक्त पद्धतियों से होती हैं, जिसे आगमोक्त पद्धति भी कहते हैं। इनकी उपासना से समान्य व्यक्ति भी बृहस्पति के समान विद्वान हो जाते है।
भारतमें सर्वप्रथम महर्षि वसिष्ठ ने ताराकी अराधना की थी। इसलिये ताराको वसिष्ठाराधिता तारा भी कहा जाता है। वसिष्ठ ने पहले भगवती ताराकी आराधना वैदिक रीतिसे करनी प्रारम्भ की, जो सफल न हो सकी। इन्हें अदृश्य शक्ति से संकेत मिला कि वे तान्त्रिक-पद्धतिके द्वारा जिसे ‘चिनाचारा’ कहा जाता है, उपासना करें। जब वसिष्ठ ने तान्त्रिक पद्धति का आश्रय लिया, तब उन्हें सिद्ध प्राप्त हुई। यह कथा ‘आचार’ तन्त्र में वसिष्ट मुनि की आराधना उपाख्या में वर्णित है। इससे यह सिद्ध होता है कि पहले चीन, तिब्बत, लद्दाख आदि में ताराकी उपासना प्रचलित थी।
प्रसिद्ध ‘महिषी’ ग्राम में उग्रतारा का सिद्धपीठ विद्यमान है । कहा जाता है कि महर्षि वसिष्ठ ने यहीं ताराकी उपासना करके सिद्ध प्राप्त की थी। तन्त्रशास्त्रके प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘महाकाल’-संहिता के गुह्य-काली खण्ड में महाविद्याओं की उपासनाका विस्तृत वर्णन हैं, उनके अनुसार ताराका रहस्य अत्यन्त चमत्कारजनक हैं।


3….51 शक्तिपीठों के बारे में जानें…

पुराणों में 51 शक्तिपीठो का वर्णन है। आइए जानते हैं देश-विदेश में स्थित इन शक्तिपीठों के बारे में| 51 शक्तिपीठों के सन्दर्भ में जो कथा है वह यह है कि सती के पिता राजा प्रजापति दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया था। परन्तु सती के पति भगवान शिव को इस यज्ञ में शामिल होने के लिए निमन्त्रण नहीं भेजा था। जिससे भगवान शिव इस यज्ञ में शामिल नहीं हुए लेकिन सती जिद्द कर यज्ञ में शामिल होने चली गई, वहां शिव की निन्दा सुनकर वह यज्ञकुण्ड में कूद गईं तब भगवान शिव ने सती के वियोग में सती का शव अपने सिर पर धारण कर लिया और सम्पूर्ण भूमण्डल पर भ्रमण करने लगे। भगवती सती ने अन्तरिक्ष में शिव को दर्शन दिया और उनसे कहा कि जिस-जिस स्थान पर उनके शरीर के खण्ड विभक्त होकर गिरेंगे, वहा महाशक्तिपीठ का उदय होगा। सती का शव लेकर शिव पृथ्वी पर विचरण करते हुए नृत्य भी करने लगे, जिससे पृथ्वी पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न होने लगी। इस पर विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खण्ड-खण्ड करने का विचार किया। जब-जब शिव नृत्य मुद्रा में पैर पटकते, विष्णु अपने चक्र से शरीर का कोई अंग काटकर उसके टुकड़े पृथ्वी पर गिरा देते। इस प्रकार जहां जहां सती के अंग के टुकड़े, वस्त्र या आभूषण गिरे, वहीं शक्तिपीठ का उदय हुआ।

हालांकि देवी भागवत में जहां 108 और देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का ज़िक्र मिलता है, वहीं तन्त्रचूडामणि में 52 शक्तिपीठ बताए गए हैं। देवी पुराण में जरूर 51 शक्तिपीठों की ही चर्चा की गई है। इन 51 शक्तिपीठों में से कुछ विदेश में भी हैं और पूजा-अर्चना द्वारा प्रतिष्ठित हैं।

ज्ञातव्य है की इन 51 शक्तिपीठों में भारत-विभाजन के बाद 5 और भी कम हो गए और आज के भारत में 42 शक्ति पीठ रह गए है। पाकिस्तान में और बांग्लादेश में, श्रीलंका में, तिब्बत में तथा नेपाल में है।

1. किरीट कात्यायनी
पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के तट लालबाग कोट पर स्थित है किरीट शक्तिपीठ, जहां सती माता का किरीट यानी शिराभूषण या मुकुट गिरा था। यहां की शक्ति विमला अथवा भुवनेश्वरी तथा भैरव संवर्त हैं।

2 कात्यायनी कात्यायनी
वृन्दावन, मथुरा के भूतेश्वर में स्थित है कात्यायनी वृन्दावन शक्तिपीठ जहां सती का केशपाश गिरा था। यहां की शक्ति देवी कात्यायनी हैं।

3 करवीर शक्तिपीठ
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का त्रिनेत्र गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव क्रोधशिश हैं। यहां महालक्ष्मी का निज निवास माना जाता है।

4 श्री पर्वत शक्तिपीठ
इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतान्तर है कुछ विद्वानों का मानना है कि इस पीठ का मूल स्थल लद्दाख है, जबकि कुछ का मानना है कि यह असम के सिलहट में है जहां माता सती का दक्षिण तल्प यानी कनपटी गिरा था। यहां की शक्ति श्री सुन्दरी एवं भैरव सुन्दरानन्द हैं।

5 विशालाक्षी शक्तिपीठ
उत्तर प्रदेश, वाराणसी के मीरघाट पर स्थित है शक्तिपीठ जहां माता सती के दाहिने कान के मणि गिरे थे। यहां की शक्ति विशालाक्षी तथा भैरव काल भैरव हैं।

6 गोदावरी तट शक्तिपीठ
आंध्रप्रदेश के कब्बूर में गोदावरी तट पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का वामगण्ड यानी बायां कपोल गिरा था। यहां की शक्ति विश्वेश्वरी या रुक्मणी तथा भैरव दण्डपाणि हैं।

7 शुचीन्द्रम शक्तिपीठ
तमिलनाडु, कन्याकुमारी के त्रिासागर संगम स्थल पर स्थित है यह शुची शक्तिपीठ, जहां सती के उफध्र्वदन्त (मतान्तर से पृष्ठ भागद्ध गिरे थे। यहां की शक्ति नारायणी तथा भैरव संहार या संकूर हैं।

8 पंच सागर शक्तिपीठ
इस शक्तिपीठ का कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है लेकिन यहां माता का नीचे के दान्त गिरे थे। यहां की शक्ति वाराही तथा भैरव महारुद्र हैं।

9. ज्वालामुखी शक्तिपीठ
हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां सती का जिह्वा गिरी थी। यहां की शक्ति सिद्धिदा व भैरव उन्मत्त हैं।

10. भैरव पर्वत शक्तिपीठ
इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतदभेद है। कुछ गुजरात के गिरिनार के निकट भैरव पर्वत को तो कुछ मध्य प्रदेश के उज्जैन के निकट क्षीप्रा नदी तट पर वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं, जहां माता का उफध्र्व ओष्ठ गिरा है। यहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण हैं।

11. अट्टहास शक्तिपीठ
अट्टहास शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के लाबपुर में स्थित है। जहां माता का अध्रोष्ठ यानी नीचे का होंठ गिरा था। यहां की शक्ति पफुल्लरा तथा भैरव विश्वेश हैं।

12. जनस्थान शक्तिपीठ
महाराष्ट्र नासिक के पंचवटी में स्थित है जनस्थान शक्तिपीठ जहां माता का ठुड्डी गिरी थी। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव विकृताक्ष..

4….५१ शक्ति पीठ भाग
सभी उपस्थित जनों के चेहरे झुके हुए थे शर्म से — कोई कुछ समझ पता इससे पहले ही माता सती ने योगाग्नि प्रकट करके खुद का दाह कर लिया — जैसे ही ये घटित हुआ — शिव गणों ने क्रोध में आकर वहाँ विनाश मचा दिया लेकिन वहाँ उपस्थित ऋषि जनों एवं अन्य देवताओं कि सामूहिक शक्ति के सामने अंततः उन्हें हार जाना पड़ा — यह सूचना जैसे ही भगवान शिव तक पहुंची क्रोध से उनका बुरा हाल हो गया — क्रोधातिरेक में उन्होंने अपनी जटाओं को खोल दिया इसी और एक लट को पत्थर पर पटक दिया जिससे अति दुर्दान्त एवं तमोगुणी गण — वीरभद्र — का प्राकट्य हुआ और वीरभद्र पवन से भी तेज गति से यज्ञ स्थल में जा पहुंचा और विनाश कि वह लीला दिखायी कि सभी शूर वीरों को भागने के लिए जमीन कम पद गयी जो ज्यादा दिलेर थे वे अंग भंग करवाकर वहीँ पड़े रहे —– इस प्रकार से यज्ञ का विध्वंश हो गया भगवान् शिव सती कि मृत देह के लेकर क्रोध में उन्मत्त ब्रह्मांड के चक्कर काटने लगे जिससे सारी व्यवस्था छिन्न भिन्न होने लगी और प्रलय के आसार नजर आने लगे — तब सभी ने मिलकर भगवान् विष्णु कि शरण पकड़ी — द्रवित होकर भगवान् विष्णु ने सोचा कि जब तक मृत देह महादेव के पास है उन्हें और प्रलय को रोक पाना असम्भव है — इसलिए उन्होंने सुदर्शन चक्र को आज्ञा दी कि सती के पार्थिव शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर दे –!

सुदर्शन चक्र ने ऐसा ही किया और इस क्रिया में माता सती के पार्थिव देह के ५१ टुकड़े हुए जो विभिन्न जगहों पर जाकर गिरे — वही इक्यावन स्थल शक्तिपीठों के नाम से विख्यात हुए !

माता के शक्ति पीठों की संख्या अलग अलग शास्त्रों में अलग अलग कही गई है. शिव चरित्र में इनकी संख्या 51 कही गई है. यूं भी सामान्यत: 51 शक्ति पीठ ही माने गये है. देवी भागवत पुराण के अनुसार माता के शक्ति पीठों की संख्या 108 कही गई है. माता के शक्ति पीठों की संख्या को लेकर अलग- अलग मतभेद है. जिसमें कालिका पुराण के मत के अनुसार 26 शक्ति पीठ है. दुर्गा सप्तसती और तंत्रचूडामणि में शक्ति पीठों की संख्या 52 बताई गई है.

5….तंत्र में कहा गया है
“ततःशून्या परारूपा श्रीमहासुन्दरी कला।
सुन्दरी राजराजेशी महाब्रह्माण्डनायिका॥
महाशून्या ततस्तारा तद्वैगुण्यक्रमेण च।
मुक्तौ संयोज्य सर्वं तं महासुन्दर्यनन्ततः॥”
श्रीमहासुन्दरी को कला और श्रीतारा को शून्यरूप
निर्देश किया है।अब द्रष्टव्य यह है कि शून्यरूप में
ही सब देवता और देवी शक्तियां हैं।इस कारण अंतिम
शून्य साधना करने के बाद शून्यरूप निर्विकार
ब्रह्मरूप में लीन होकर मुक्ति साधन किया जाता है।
जब कही आसरा नहीं मिलता तो लोग तारा माँ के
शरण में जाते है,माँ सभी को अभयदान भक्ति प्रदान
करती ही हैं।काली का एक रूप है
तारा माँ,थोड़ा सा फर्क हैं।वशिष्ट
तारा माँ की सिद्धि वेदोक्त विधि से करने लगे।पर
यह संभव ही नहीं है कारण वेद के
द्वारा तारा की साधना नहीं हो सकती।कारण ये शिव
विद्या है।वेद तो नंदीश्वर के द्वारा शापित है,कारण
दक्ष प्रजापति के यज्ञ में वेद अनुयायी ब्राह्मणों ने
शिव निन्दा की तो कुपित होकर नंदी ने
ब्राह्मणों को शापित कर दिया था।तारा के शिव
अक्षोभ्य है,इन्हे तारा अपने मस्तक पर बिठाये
रखती है।अक्षोभ्य यानि क्षोभ से मुक्त पूर्ण तृप्त
कारण तारा प्रेयसी है,पूर्ण प्रेममयी सब कुछ प्रदान
करने वाली सबसे बचाकर शिव को,पुत्र को,भक्त
को अपने से अलग न करना तथा बहुत
गलतियों को नजर अंदाज कर देना यही तारा रहस्य
है।तारा कई रूपों में जानी जाती है।बौध हो या जैन
धर्म सभी को तारा ही अपने लक्ष्य तक पहुँचाई है।
जन्म जन्म के हमारे बंधन तारा अपने कैंची से काट
देती है,यानि तार देती है।तारा धन
देती है ,विद्या भी देती है,तथा सब कुछ प्रदान
करती है यानि मूर्ख को भी ज्ञानी बना देती है।
इनका एक रूप है नीलसरस्वती का ये कवित्व
शक्ति प्रदात्री हैं।जो निश्चल हृद्वय के है,कपट से
दूर वो पूर्ण प्रेम करना जानते हो उनके लिए अराध्य
हैं ..

6….शिव और शक्ति…

भगवान शिव जी की अर्धांगिनी पार्वती जी को ही शैलपुत्री‍, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री आदि नामों से जाना जाता है।

आदि शक्ति मां दुर्गा का ध्यान करने वाले के जीवन में कभी शोक और दुख नहीं आता। मां का केवल एक रूप है, अनेक नहीं इस रहस्य का ज्ञात होने से जातक भगवान शिव की शक्ति के ओज मंडल में शामिल हो जाता है।

संपूर्ण संसार की उत्पत्ति के पीछे आदि शक्ति मां जगत जननी ही मूल तत्व हैं और जगत माता के रूप में उनकी उपासना की जाती है। शक्ति सृजन और नियंत्रण की पारलौकिक शक्ति है।

देवीभागवत के अनुसार शिव भी शक्ति के अभाव में शव या निष्क्रिय बताएं गए हैं। मनुष्य की विभिन्न प्रकार की शक्तियों को प्राप्त करने की अनंत इच्छा ने शक्ति की उपासना को व्यापक आयाम दिया है। यहां प्रस्तुत है माता के अनेकों रूपों का वर्णन। इन्होंने ने ही अपने योग्य पुरूषों का निर्माण किया जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहे जाते हैं|

माता पार्वती, उमा, महेश्वरी, दुर्गा, कालिका, शिवा, महिसासुरमर्दिनी, सती, कात्यायनी, अम्बिका, भवानी, अम्बा, गौरी, कल्याणी, विंध्यवासिनी, चामुन्डी, वाराही, भैरवी, काली, ज्वालामुखी, बगलामुखी, धूम्रेश्वरी, वैष्णोदेवी, जगधात्री, जगदम्बिके, श्री, जगन्मयी, परमेश्वरी, त्रिपुरसुन्दरी,जगात्सारा,जगादान्द्कारिणी, जगाद्विघंदासिनी, भावंता, साध्वी, दुख्दारिद्र्य्नाशिनी, चतुर्वर्ग्प्रदा, विधात्री, पुर्णेंदुवदना, निलावाणी, पार्वती,सर्वमंगला, सर्वसम्पत्प्रदा, शिवपूज्या, शिवप्रिता, सर्वविध्यामयी, कोमलांगी, विधात्री, नीलमेघवर्णा, विप्रचित्ता, मदोन्मत्ता, मातंगी, देवी खडगहस्ता, भयंकरी,पद्मा, कालरात्रि, शिवरुपिणी, स्वधा, स्वाहा, शारदेन्दुसुमनप्रभा, शरद्’ज्योत्सना, मुक्त्केशी, नंदा, गायत्री, सावित्री, लक्ष्मी ,अलंकार, संयुक्ता, व्याघ्रचर्मावृत्ता, मध्या, महापरा, पवित्रा, परमा, महामाया, महोदया इत्यादी देवी भगवती के कई नाम हैं।……शिव स्वरूप वर्णन…

भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही आकर्षक भी। शिव जो धारण करते हैं, उनके भी बड़े व्यापक अर्थ हैं :

जटाएं : शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं।

चंद्र : चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है।

त्रिनेत्र : शिव की तीन आंखें हैं। इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव की ये आंखें सत्व, रज, तम (तीन गुणों), भूत, वर्तमान, भविष्य (तीन कालों), स्वर्ग, मृत्यु पाताल (तीनों लोकों) का प्रतीक हैं।

सर्पहार : सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है।

त्रिशूल : शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशूल भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है।

डमरू : शिव के एक हाथ में डमरू है, जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है।

मुंडमाला : शिव के गले में मुंडमाला है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में किया हुआ है।

छाल : शिव ने शरीर पर व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल पहनी हुई है। व्याघ्र हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है।

भस्म : शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से किया जाता है। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है।

वृषभ : शिव का वाहन वृषभ यानी बैल है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ धर्म का प्रतीक है। महादेव इस चार पैर वाले जानवर की सवारी करते हैं, जो बताता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनकी कृपा से ही मिलते हैं

7….कौन हैं ये दश महाविद्या? यदा-कदा उनकी मूर्तियाँ या चित्र जो देखने को मिलते हैं तो वे अजीब-सी लगती हैं. कोई अपना सिर काट कर अपना ख़ून ख़ुद पी रही है और दो सहेलियों को भी पिला रही है, तो कोई शमशान में नर मुण्ड लिए मुँह में ख़ून लगाये हुई है. कोई नरमुंडों की माला पहने हुई है तो कोई किसी दुष्ट व्यक्ति की जीभ खींच रही है. कोई वृद्धा है जो बगैर सारथी के रथ पर सवार होकर सूप लिये बैठी है और एक कौआ रथ पर बने झंडे में बैठा हुआ है. इन्हें देख कर भय, जुगुप्सा और आश्चर्य होता है. वे क्या हैं ? क्या करती हैं ? हमारे जीवन में उनका क्या मह्त्व है ?
इसके लिए महाभागवत और कालिका पुराण पर आधारित एक किस्से से हम शुरू करते हैं, जो एक तेजस्वी स्त्री को अपने पति और पिता दोनों से ही मिली अवहेलना और प्रताड़ना तथा जिसके फलस्वरूप उसके भयानक क्रोध और निराशा की व्यथा-कथा भी है.
दक्ष प्रजापति ब्रह्मा के पुत्र थे. उनकी दत्तक पुत्री थी सती, जिन्होने तपस्या करके शिव को अपना पति बनाया, लेकिन शिव की जीवन-शैली दक्ष को बिल्कुल ही नापसंद थी. शिव और सती का अत्यंत सुखी दांपत्य जीवन था. पाँच हज़ार वर्षों तक वे आनंदपूर्वक रहे. पर शिव को बेइज़्ज़त करने का ख़याल दक्ष के दिल से नहीं गया था. इसी मंशा से उन्होंने एक यज्ञ का आयोजन किया, जिसमे शिव और सती को छोड़ कर सभी देवी-देवताओं को निमंत्रित किया.
जब सती को इसकी सूचना मिली तो उन्होंने उस यज्ञ में जाने की ठान ली. शिव से अनुमति माँगी, तो उन्होंने साफ़ मना कर दिया. ऐसा कई बार हुआ. तब सती को ग़ुस्सा आ गया. उन्होंने शिव को अपना फ़ैसला सुना दिया-“ मैं दक्ष यज्ञ में जाऊंगी ही. या तो उसमें अपना हिस्सा लूँगी या उसका विध्वंस कर दूँगी. “
इस उपेक्षा से वे इतनी आहत हुईं की क्रोध से उनकी आँखें लाल हो गयीं. वे उग्र-दृष्टि से शिव को देखने लगीं. उनके होंठ फड़फड़ाने लगे. फिर उन्होंने भयानक अट्टहास किया. शिव भयभीत हो गये. वे इधर-उधर भागने लगे. उधर क्रोध से सती का शरीर जल कर काला पड़ गया.
उनके इस विकराल रूप को देख कर शिव तो भाग चले लेकिन जिस दिशा मैं भी वे जाते वहाँ एक-न-एक भयानक देवी उनका रास्ता रोक देतीं. वे दसों दिशाओं में भागे और दस देवियों ने उनका रास्ता रोका. और अंत में सभी काली में मिल गयीं.
हार कर शिव सती के सामने आ खड़े हुए. उन्होंने सती से पूछा- ” कौन हैं ये ?”
सती ने बताया-’ ये मेरे दस रूप हैं. आपके सामने खड़ी कृष्ण रंग की काली हैं, आपके ऊपर नीले रंग की तारा हैं. पश्चिम में छिन्नमस्ता, बायें भुवनेश्वरी, पीठ के पीछे बगलामुखी, पूर्व-दक्षिण में धूमावती, दक्षिण-पश्चिम में त्रिपुर सुंदरी, पश्चिम-उत्तर में मातंगी तथा उत्तर-पूर्व में षोड़शी हैं और मैं ख़ुद भैरवी रूप में अभयदान देने के लिए आपके सामने खड़ी हूँ.’ इनकी उपासना से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है.
शिव ब्रह्म का ही नामांतर हैं. उनके भी दस तत्व-रूप हैं- पृथ्वी, जल,तेज,वायु, आकाश,चन्द्र, सूर्य, दिशा, काल तथा जीवात्मा. रुद्र दस हैं, और ग्यारहवीं आत्मा है- दश ते वायव: प्रॉक्ता आत्मा च एकादश स्मृत:.
शिव भागे यानी उनका स्पंदनात्मक गुण ,जो जड़ और चेतना का विभाजक है. तंत्रालोक के अनुसार स्थिति और गति के नियंत्रक तत्व को रुद्र कहते हैं. सती पदार्थों के समूह का और रुद्र का धावमान होना उन्हें गति प्रदान करने का सूचक है. स्थिति और गति मिल कर ही सृष्टि का निर्माण करते हैं.
रुद्र और सती की यह कहानी सृष्टि-निर्माण के प्रमुख दो तत्त्वों की ओर इशारा करते हैं. दस रूप धारण करना यानी पदार्थों की शक्ति का सक्रिय हो जाना.
शिव और सती की कथा आगे बढ़ती है. शिव को अख़िरकार सती को दक्ष यज्ञ में जाने देने की अनुमती देनी पड़ी. उसी वक़्त तारा सती में समा गयीं. शिव के वाहन नंदी पद सवार होकर वे अपने पिता के यज्ञ में शामिल होने गयीं. वहाँ दक्ष ने उनका अपमान किया तो वे यज्ञ कुंड में कूद कर जल मरीं. दक्ष यज्ञ का विध्वंस हो गया.
इस पूरे प्रकरण का प्रतीकात्मक अर्थ है. तारा ऊर्ध्वमुखी अग्नि है. सती शिव के सम्मुख भैरवी रूप में खड़ी थी. अधोमुखी अग्नि को भैरवी कहते हैं जो विध्वंसकारी है. निर्माण और विध्वंस तारा और भैरवी की कृपा हैं.
अब दक्ष यज्ञ को भी जान लें. दक्ष प्राण है, सती बुद्धि है, शिव ज्ञान है. जब प्राण या इच्छा शक्ति, क्रिया या बुद्धिशक्ति को तो अपना मानती है पर ज्ञान- शक्ति की अवहेलना करती है ,तो सृष्टि यज्ञ विफल हो जाता है. इच्छा, ज्ञान और क्रिया के संतुलन से ही कोई भी निर्माण सफल होता है..

8….कामदेव मन्त्र साधना महा शिव रात्रि के पर्व पर कीजिये कामदेव की साधना

वसंत के इस मौसम मे महा शिव रात्रि सबसे बड़ा पर्व है इस समय मे मन अद्भुत प्रसन्नता
से भरा होता है।
प्रकृति मे चारों और मादकता से छाई रहती है फल फूल सब मे बाहर आई होती हर पेड़ पौधा अपनी और बरबस आकर्षित कर लेता है
और हम मोहित से होकर प्रकृति की इस सुंदरता को बस देखते ही रह जाते है यंहा तक की अपने कमरे मे भी कैद करने की कोशिश करते है।
इस समय मे आप भी बनाइये अपने आपको आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी कामदेव की अद्भुत मन्त्र साधना से.
सब आपकी और देखते रह जायेंगे महा शिव रात्रि के पर्व पर कीजिये कामदेव की साधना
और वो सब पाइये जो आज तक आपको नहीं मिल पाया .
शिवलिंग के सामने बैठ कर नीचे दिये गये मंत्र की 5 माला का जाप हर रोज करें कुछ भी मीठा भोग मे रखें .बाद मे इसे उठा कर रख ले जल प्रवाहित करें 11 दिन की इस साधना से आप को अद्भुत लाभ होगा लोग आपकी और आकर्षित होंगे आपकी हर बात को ध्यान से सुनेगे आपकी बातें हर व्यक्ति के दिल मे अमिट छाप छोड़ देंगी
लोग आपकी हर बात को सहर्ष स्वीकार करेंगे जो आप चाहोगे वैसा ही होने लगे गा।
करके देखिये प्रभाव आपको खुद मालूम पड़ जायेगा कई मित्रों को स्वपन मे काम देव के दर्शन भी हुये है .
मन्त्र
ओम नमो आदेश गुरु का कामदेव-कामदेव क्या करे ?
तुम मेरे पास हाजिर होकर सब स्त्री पुरुष को मेरे वश मे करे ।
हर वक्त मेरे साथ रहे मेरे कार्य करे ऐसा ना हो तो महादेव के नेत्र से भस्म हो जाये ।
आदेश गुरु महा देव का । मेरे गुर का छू ।

एक माला जाप मे 10 मिनट का समय लगेगा ।
धैर्य पूर्वक करे जीवन हर वो मुकाम मिलेगा जो आप चाहोगे। आपके काम बनाने लगेंगे
आपके किसी भी कार्य के लिये कोई भी आपको माना नहीं कर पायेगा
सफलता खुद चल कर आयेगी आपके पास…

9….माता महाकाली कि नित्याएं / कलाएं

आप सबके प्रेम मार्गदर्शन एवं माता महाकाली की प्रेणा एवं कृपास्वरूप मैं माता महाकाली कि पंद्रह नित्याओं / कलाओं के वर्णन कर रहा हूँ —!

कहीं – कहीं पर सोलह कलाएं या नित्याएं मणि जाती हैं किन्तु मुझे माता कि पंद्रह नित्याओं के बारे में ही ज्ञान मिल सका है अतएव आप सबके समक्ष मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ !

एक अभाव आप सब लोगों को खटक सकता है वह ये – की अपने इस वर्णन में मैं किसी नित्या का रूप वर्णन नहीं किया है उसकी वजह ये है की ग्रंथों के हिसाब से जो रूप वर्णन मिलते हैं उनमे कही जगह कुछ ऐसी उपमाएं दी हुयी होती हैं जो मुझ जैसे पुत्रवत भक्त के लिए अशोभनीय है अस्तु मैं सिर्फ नाम और मन्त्रों का उल्लेख ही यहाँ कर रहा हूँ — विज्ञ जनों को यदि मेरे इस लेख में कोई गलतियां मिलती हैं तो कृपापूर्वक मुझे दिशानिर्देश दें — आप सबके सुझावों का स्वागत है :-

१. काली :-

प्रथम नित्य का नाम भी काली ही है और मंत्र है :-

II ॐ ह्रीं काली काली महाकाली कौमारी मह्यं देहि स्वाहा II

२. कपालिनी :-

माता काली कि द्वितीय नित्य का नाम कपालिनी है और मन्त्र है :-

II ॐ ह्रीं क्रीं कपालिनी – महा – कपाला – प्रिये – मानसे कपाला सिद्धिम में देहि हुं फट स्वाहा II

३. कुल्ला :-

माता काली कि तृतीय नित्या का नाल कुल्ला है और मंत्र है :-

II ॐ क्रीं कुल्लायै नमः II

४. कुरुकुल्ला :-

माता कि चतुर्थ नित्या का नाम कुरुकुल्ला है और मंत्र है :-

II क्रीं ॐ कुरुकुल्ले क्रीं ह्रीं मम सर्वजन वश्यमानय क्रीं कुरुकुल्ले ह्रीं स्वाहा II

५. विरोधिनी :-

माता कि पंचम नित्या का नाम विरोधिनी है और मंत्र है :-

II ॐ क्रीं ह्रीं क्लीं हुं विरोधिनी शत्रुन उच्चाटय विरोधय विरोधय शत्रु क्षयकरी हुं फट II

६. विप्रचित्ता :-

माता कि छटवीं नित्या का नाम विप्रचित्ता है और मंत्र है :-

II ॐ श्रीं क्लीं चामुण्डे विप्रचित्ते दुष्ट-घातिनी शत्रुन नाशय एतद-दिन-वधि प्रिये सिद्धिम में देहि हुं फट स्वाहा II

७. उग्रा :-

माता कि सप्तम नित्या का नाम उग्रा है और मंत्र है :-

II ॐ स्त्रीं हुं ह्रीं फट II

८. उग्रप्रभा :-

माँ कि अष्टम नित्या का नाम उग्रप्रभा है और मंत्र है :-

II ॐ हुं उग्रप्रभे देवि काली महादेवी स्वरूपं दर्शय हुं फट स्वाहा II

९. दीप्ता :-

माता कि नवमी नित्या का नाम दीप्ता है और मंत्र है :-

II ॐ क्रीं हुं दीप्तायै सर्व मंत्र फ़लदायै हुं फट स्वाहा II

१०. नीला :-

माता कि दसवीं नित्या का नाम नीला है और मंत्र है :-

II हुं हुं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हसबलमारी नीलपताके हम फट II

११. घना :-

माता कि ग्यारहवीं नित्या के रूप में माता घना को जाना जाता है और मंत्र है :-

II ॐ क्लीं ॐ घनालायै घनालायै ह्रीं हुं फट II

१२. बलाका :-

माता कि बारहवीं नित्या का नाम बलाका है और मंत्र है :-

II ॐ क्रीं हुं ह्रीं बलाका काली अति अद्भुते पराक्रमे अभीष्ठ सिद्धिम में देहि हुं फट स्वाहा II

१३. मात्रा :-

माता कि त्रयोदश नित्या का नाम मात्रा है और मंत्र है :-

II ॐ क्रीं ह्लीं हुं ऐं दस महामात्रे सिद्धिम में देहि सत्वरम हुं फट स्वाहा II

१४. मुद्रा :-

माता कि चतुर्दश नित्या का नाम मुद्रा है और मंत्र है :-

II ॐ क्रीं ह्लीं हुं प्रीं फ्रें मुद्राम्बा मुद्रा सिद्धिम में देहि भो जगन्मुद्रास्वरूपिणी हुं फट स्वाहा II

१५. मिता :-

माता की पंचादशम नित्या का नाम मिता है और मंत्र है :-

II ॐ क्रीं हुं ह्रीं ऐं मिते परामिते ॐ क्रीं हुं ह्लीं ऐं सोहं हुं फट स्वाहा II

10….साधक सर्वप्रथम स्नान आदि से शुद्ध हो कर अपने पूजा गृह में पूर्व या उत्तर की ओर मुह कर आसन पर बैठ जाए अब सर्व प्रथम आचमन – पवित्रीकरण करने के बाद गणेश -गुरु तथा अपने इष्ट देव/ देवी का पूजन सम्पन्न कर ले तत्पश्चात पीपल के 09 पत्तो को भूमि पर अष्टदल कमल की भाती बिछा ले ! एक पत्ता मध्य में तथा शेष आठ पत्ते आठ दिशाओ में रखने से अष्टदल कमल बनेगा ! इन पत्तो के ऊपर आप माला को रख दे ! अब अपने समक्ष पंचगव्य तैयार कर के रख ले किसी पात्र में और उससे माला को प्रक्षालित ( धोये ) करे ! आप सोचे-गे कि पंचगव्य क्या है ? तो जान ले गाय का दूध , दही , घी , गोमूत्र , गोबर यह पांच चीज गौ का ही हो उसको पंचगव्य कहते है ! पंचगव्य से माला को स्नान करना है – स्नान करते हुए अं आं इत्यादि सं हं पर्यन्त समस्त स्वर वयंजन का उच्चारण करे ! फिर समस्य़ा हो गयी यहाँ कि यह अं आं इत्यादि सं हं पर्यन्त समस्त स्वर वयंजन क्या है ? तो नोट कर ले – ॐ अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लॄं एं ऐं ओं औं अं अः कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं !! यह उच्चारण करते हुए माला को पंचगव्य से धोले ध्यान रखे इन समस्त स्वर का अनुनासिक उच्चारण होगा !
माला को पंचगव्य से स्नान कराने के बाद निम्न मंत्र बोलते हुए माला को जल से धो ले -
ॐ सद्यो जातं प्रद्यामि सद्यो जाताय वै नमो नमः
भवे भवे नाति भवे भवस्य मां भवोद्भवाय नमः !!
अब माला को साफ़ वस्त्र से पोछे और निम्न मंत्र बोलते हुए माला के प्रत्येक मनके पर चन्दन- कुमकुम आदि का तिलक करे -
ॐ वामदेवाय नमः जयेष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कल विकरणाय नमो बलविकरणाय नमः !
बलाय नमो बल प्रमथनाय नमः सर्वभूत दमनाय नमो मनोनमनाय नमः !!
अब धूप जला कर माला को धूपित करे और मंत्र बोले -
ॐ अघोरेभ्योथघोरेभ्यो घोर घोर तरेभ्य: सर्वेभ्य: सर्व शर्वेभया नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्य:
अब माला को अपने हाथ में लेकर दाए हाथ से ढक ले और निम्न मंत्र का १०८ बार जप कर उसको अभिमंत्रित करे -
ॐ ईशानः सर्व विद्यानमीश्वर सर्वभूतानाम ब्रह्माधिपति ब्रह्मणो अधिपति ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदा शिवोम !!
अब साधक माला की प्राण – प्रतिष्ठा हेतु अपने दाय हाथ में जल लेकर विनियोग करे -
ॐ अस्य श्री प्राण प्रतिष्ठा मंत्रस्य ब्रह्मा विष्णु रुद्रा ऋषय: ऋग्यजु:सामानि छन्दांसि प्राणशक्तिदेवता आं बीजं ह्रीं शक्ति क्रों कीलकम अस्मिन माले प्राणप्रतिष्ठापने विनियोगः !!
अब माला को बाय हाथ में लेकर दाय हाथ से ढक ले और निम्न मंत्र बोलते हुए ऐसी भावना करे कि यह माला पूर्ण चैतन्य व शक्ति संपन्न हो रही है !
ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हों ॐ क्षं सं सः ह्रीं ॐ आं ह्रीं क्रों अस्य मालाम प्राणा इह प्राणाः ! ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हों ॐ क्षं सं हं सः ह्रीं ॐ आं ह्रीं क्रों अस्य मालाम जीव इह स्थितः ! ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हों ॐ क्षं सं हं सः ह्रीं ॐ आं ह्रीं क्रों अस्य मालाम सर्वेन्द्रयाणी वाङ् मनसत्वक चक्षुः श्रोत्र जिह्वा घ्राण प्राणा इहागत्य इहैव सुखं तिष्ठन्तु स्वाहा ! ॐ मनो जूतिजुर्षतामाज्यस्य बृहस्पतिरयज्ञमिमन्तनो त्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु विश्वे देवास इह मादयन्ताम् ॐ प्रतिष्ठ !!

अब माला को अपने मस्तक से लगा कर पूरे सम्मान सहित स्थान दे ! इतने संस्कार करने के बाद माला जप करने योग्य शुद्ध तथा सिद्धिदायक होती है भाइयो !

नित्य जप करने से पूर्व माला का संक्षिप्त पूजन निम्न मंत्र से करने के उपरान्त जप प्रारम्भ करे -

ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि सर्व मंत्रार्थ साधिनी साधय-साधय सर्व सिद्धिं परिकल्पय मे स्वाहा ! ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः !

जप करते समय माला पर किसी कि दृष्टि नहीं पड़नी चाहिए ! गोमुख रूपी थैली ( गोमुखी ) में माला रखकर इसी थैले में हाथ डालकर जप किया जाना चाहिए अथवा वस्त्र आदि से माला आच्छादित कर ले अन्यथा जप निष्फल होता है !

11…..*******आदेश आदेश********
जानीये आदेश शबद का मतलब—-
नाथ योगी अलख(अलक्ष) शब्द से अपने इष्ट देव का ध्यान करते है। परस्पर आदेश या आदीशशब्द से अभिवादन करते हैं। अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या परम पुरुषहोता है जिसका वर्णन वेद और उपनिषद आदि में किया गया है।गोरखनाथ कामानना था कि सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी कापरम लक्ष्य होना चाहिए। शून्य समाधि अर्थात समाधि से मुक्त हो जाना और उसपरम शिव के समान स्वयं को स्थापित कर ब्रह्मलीन हो जाना, जहाँ पर परम शक्तिका अनुभव होता आदेश गायत्री जाप ॐ नम आदेश गुरान्जीकूँ आदेश , ॐ आदेशाय विद्महे | सोहं आदेशाय धीमहि नन्नोआदेशनाम प्रचोदयात् || आदेश नाम गायत्री जाप उठन्ते अनुभवदेवा| सप्त दीप नव खण्डमें आदेश नामकी सेवा || आदेश नाम अनघड़की काया ररंकारमें झंकार समाया | सोहंकारसे ॐ उपाया वज्र शरीर अमर करी काया || आदेश नाम अमृत रसमेवाआद जुगाद करूँ मै सेवा | आदेश नाम अनघड़जीने भाख्या लख चौरासी पड़ता राख्या || आदेश नाम पाखान तराई आदेश नाम जपोरे भाई | आदेश नाम जपन्ते देवा व्रह्मा विष्णु महेश्वर एवा || सिद्ध चौरासी नाथनव जोगी आवा गमन कदे नहि भोगी | राजा प्रजा जपै दिन राति दूध पूत घर संपति आति || आदेश नाम गायत्री सार जपो भौ उतरो पार | आदेश नाम गायत्री उत्तम जपतांवार न कीजै जनम || इतना आदेश नाम गायत्री जापसम्पूरणं सही | अटल दलीचे वैठके श्रीनाथजी गुरुजी ने कही ||

12…कुंजिका स्तोत्र’ और ‘बीसा यन्त्र’ का अनुभूत अनुष्ठान

प्राण-प्रतिष्ठा करने के पर्व
चन्द्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण, दीपावली के तीन दिन (धन तेरस, चर्तुदशी, अमावस्या), रवि-पुष्य योग, रवि-मूल योग तथा महानवमी के दिन ‘रजत-यन्त्र’ की प्राण प्रतिष्ठा, पूजादि विधान करें। इनमे से जो समय आपको मिले, साधना प्रारम्भ करें। 41 दिन तक विधि-पूर्वक पूजादि करने से सिद्धि होती है। 42 वें दिन नहा-धोकर अष्टगन्ध (चन्दन, अगर, केशर, कुंकुम, गोरोचन, शिलारस, जटामांसी तथा कपूर) से स्वच्छ 41 यन्त्र बनाएँ। पहला यन्त्र अपने गले में धारण करें। बाकी आवश्यकतानुसार बाँट दें।
प्राण-प्रतिष्ठा विधि
सर्व-प्रथम किसी स्वर्णकार से 15 ग्राम का तीन इंच का चौकोर चाँदी का पत्र (यन्त्र) बनवाएँ। अनुष्ठान प्रारम्भ करने के दिन ब्राह्म-मुहूर्त्त में उठकर, स्नान करके सफेद धोती-कुरता पहनें। कुशा का आसन बिछाकर उसके ऊपर मृग-छाला बिछाएँ। यदि मृग छाला न मिले, तो कम्बल बिछाएँ, उसके ऊपर पूर्व को मुख कर बैठ जाएँ।
अपने सामने लकड़ी का पाटा रखें। पाटे पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर एक थाली (स्टील की नहीं) रखें। थाली में पहले से बनवाए हुए चौकोर रजत-पत्र को रखें। रजत-पत्र पर अष्ट-गन्ध की स्याही से अनार या बिल्व-वृक्ष की टहनी की लेखनी के द्वारा ‘यन्त्र लिखें।
पहले यन्त्र की रेखाएँ बनाएँ। रेखाएँ बनाकर बीच में ॐ लिखें। फिर मध्य में क्रमानुसार 7, 2, 3 व 8 लिखें। इसके बाद पहले खाने में 1, दूसरे में 9, तीसरे में 10, चैथे में 14, छठे में 6, सावें में 5, आठवें में 11 नवें में 4 लिखें। फिर यन्त्र के ऊपरी भाग पर ‘ॐ ऐं ॐ’ लिखें। तब यन्त्र की निचली तरफ ‘ॐ क्लीं ॐ’ लिखें। यन्त्र के उत्तर तरफ ‘ॐ श्रीं ॐ’ तथा दक्षिण की तरफ ‘ॐ क्लीं ॐ’ लिखें।
प्राण-प्रतिष्ठा
अब ‘यन्त्र’ की प्राण-प्रतिष्ठा करें। यथा- बाँयाँ हाथ हृदय पर रखें और दाएँ हाथ में पुष्प लेकर उससे ‘यन्त्र’ को छुएँ और निम्न प्राण-प्रतिष्ठा मन्त्र को पढ़े -
“ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हं हंसः सोऽहं मम प्राणाः इह प्राणाः, ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हं हंसः सोऽहं मम सर्व इन्द्रियाणि इह सर्व इन्द्रयाणि, ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हं हंसः सोऽहं मम वाङ्-मनश्चक्षु-श्रोत्र जिह्वा घ्राण प्राण इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा।”
‘यन्त्र’ पूजन
इसके बाद ‘रजत-यन्त्र’ के नीचे थाली पर एक पुष्प आसन के रूप में रखकर ‘यन्त्र’ को साक्षात् भगवती चण्डी स्वरूप मानकर पाद्यादि उपचारों से उनकी पूजा करें। प्रत्येक उपचार के साथ ‘समर्पयामि चन्डी यन्त्रे नमः’ वाक्य का उच्चारण करें। यथा-
1. पाद्यं (जल) समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 2. अध्र्यं (जल) समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 3. आचमनं (जल) समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 4. गंगाजलं समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 5. दुग्धं समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 6. घृतं समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 7. तरू-पुष्पं (शहद) समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 8. इक्षु-क्षारं (चीनी) समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 9. पंचामृतं (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 10. गन्धम् (चन्दन) समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 11. अक्षतान् समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 12 पुष्प-माला समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 13. मिष्ठान्न-द्रव्यं समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 14. धूपं समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 15. दीपं समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 16. पूगी फलं समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 17 फलं समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 18. दक्षिणा समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः। 19. आरतीं समर्पयामि चण्डी-यन्त्रे नमो नमः।
तदन्तर यन्त्र पर पुष्प चढ़ाकर निम्न मन्त्र बोलें-
पुष्पे देवा प्रसीदन्ति, पुष्पे देवाश्च संस्थिताः।।
अब ‘सिद्ध कुंजिका स्तोत्र’ का पाठ कर यन्त्र को जागृत करें। यथा-

।।शिव उवाच।।
श्रृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि, कुंजिका स्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्र प्रभावेण, चण्डी जापः शुभो भवेत।।
न कवचं नार्गला-स्तोत्रं, कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च, न न्यासो न च वार्चनम्।।
कुंजिका पाठ मात्रेण, दुर्गा पाठ फलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि ! देवानामपि दुलर्भम्।।
मारणं मोहनं वष्यं स्तम्भनोव्च्चाटनादिकम्।
पाठ मात्रेण संसिद्धयेत् कुंजिका स्तोत्रमुत्तमम्।।
मन्त्र – ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।
नमस्ते रूद्र रूपायै, नमस्ते मधु-मर्दिनि।
नमः कैटभ हारिण्यै, नमस्ते महिषार्दिनि।।1
नमस्ते शुम्भ हन्त्र्यै च, निशुम्भासुर घातिनि।
जाग्रतं हि महादेवि जप ! सिद्धिं कुरूष्व मे।।2
ऐं-कारी सृष्टि-रूपायै, ह्रींकारी प्रतिपालिका।
क्लींकारी काल-रूपिण्यै, बीजरूपे नमोऽस्तु ते।।3
चामुण्डा चण्डघाती च, यैकारी वरदायिनी।
विच्चे नोऽभयदा नित्यं, नमस्ते मन्त्ररूपिणि।।4
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नीः, वां वीं वागेश्वरी तथा।
क्रां क्रीं श्रीं में शुभं कुरू, ऐं ॐ ऐं रक्ष सर्वदा।।5
ॐॐॐ कार-रूपायै, ज्रां ज्रां ज्रम्भाल-नादिनी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिकादेवि ! शां शीं शूं में शुभं कुरू।।6
ह्रूं ह्रूं ह्रूंकार रूपिण्यै, ज्रं ज्रं ज्रम्भाल नादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे ! भवानि ते नमो नमः।।7
अं कं चं टं तं पं यं शं बिन्दुराविर्भव।
आविर्भव हं सं लं क्षं मयि जाग्रय जाग्रय
त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरू कुरू स्वाहा।
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा, खां खीं खूं खेचरी तथा।।8
म्लां म्लीं म्लूं दीव्यती पूर्णा, कुंजिकायै नमो नमः।
सां सीं सप्तशती सिद्धिं, कुरूश्व जप-मात्रतः।।9

।।फल श्रुति।।

इदं तु कुंजिका स्तोत्रं मन्त्र-जागर्ति हेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं, गोपितं रक्ष पार्वति।।
यस्तु कुंजिकया देवि ! हीनां सप्तशती पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा।।

फिर यन्त्र की तीन बार प्रदक्षिणा करते हुए यह मन्त्र बोलें-
यानि कानि च पापानि, जन्मान्तर-कृतानि च।
तानि तानि प्रणश्यन्ति, प्रदक्षिणं पदे पदे।।

प्रदक्षिणा करने के बाद यन्त्र को पुनः नमस्कार करते हुए यह मन्त्र पढ़े-
एतस्यास्त्वं प्रसादन, सर्व मान्यो भविष्यसि।
सर्व रूप मयी देवी, सर्वदेवीमयं जगत्।।
अतोऽहं विश्वरूपां तां, नमामि परमेश्वरीम्।।

अन्त में हाथ जोड़कर क्षमा-प्रार्थना करें।

13…कामाख्या स्तुतिः – अष्टमः पटलः
पूर्णाभिषेक तत्त्वं एवं गुरु लक्षण

॥ श्रीदेव्युवाच ॥

महादेव, जगद् – वन्द्य ! करुणा – सागर, प्रभो !
पूर्णाभिषेकं कौलानां, वद मे सुख – मोक्षदम् ॥१॥

॥ श्रीशिव उवाच ॥

श्रृणु देवी ! मम प्राण – वल्लभे ! परमादभुतम् ।
पूर्णाभिषेकं सर्वाशा – पूरकं शिवता – प्रदम् ॥२॥
आगत्य सदगुरुं सिद्धं, मन्त्र – तन्त्र – विशारदम् ।
कौलं सर्व – जन – श्रेष्ठमभिषेक – विधिं चरेत् ॥३॥
अति – गुप्तालये शुद्धे, रम्ये कौलिक – सम्मते ।
वेश्याङ्गनाः समानीय, तत्त्वानि च सु – यत्नतः ॥४॥
विशिष्टान् कौलिकान् भक्तया, तत्रैव सन्निवेशयेत ।
अर्चयेदभिषेकार्थं, गुरुं वस्त्रादि – भूषणैः ॥५॥
प्रणमेद् विधिवद् भक्तया, तोषयेत् स्तुति – वाक्यतः ।
प्रार्थयेच्छुद्ध – भावेन, कुल – धर्मं वदेति च ॥६॥
कृतार्थ कुरु मे नाथ ! श्रीगुरो, करुणा – निधे !
अभिषिक्तैः साधकैश्च, सेवार्थं शरणागतः ॥७॥
ततोऽभिषिक्त्वा तत्त्वानि, शोधयेच्छक्तिमान् मुदा ।
स्थापयित्वा पुरः कुम्भं, मन्त्रैर्मुद्राभिः प्रिये ! ॥८॥
वितानैर्धूप – दीपैश्च, कृत्वा चामोदितं स्थलम् ।
नाना – पुष्पैस्तथा गन्धैः, सर्वोपकरणैर्यजेत् ॥९॥
समाप्य महतीं पूजां, तत्त्वानि सन्निवेद्य च ।
आदौ स्त्रीभ्यः समर्प्यैव, प्रसादाल्पं भजेत् ततः ॥१०॥
शुभ – चक्रं विनिमयि, आगमोक्त – विधानतः ।
अभिषिक्त्वा साधकांश्च, पायेत् तु स्वयं पिबेत् ॥११॥
भुंजीरन् मत्स्य – मांसाद्यैश्चर्व्य – चोष्यादिभिश्च ।
तैः रमेरन् परमानन्दैर्वेश्यायां च यथासुखम् ॥१२॥
वदेयुः कर्म – कर्तुश्च, सिद्धिर्भवतु निश्चला ।
अभिषेचन – कर्माशु, निर्विघ्नं चेति निश्चितम् ॥१३॥
चक्रालयान्निः सरेन्न जन एकोऽपि शङ्करि ! ।
प्रातः कृत्यादि – कर्माणि, कुर्यात् तत्रैव साधकः ॥१४॥
दिनानि त्रीणि संव्याप्य, भक्तया तांस्तु समर्चयेत् ।
शिष्यश्चादौ दिवा – रात्रभिषिक्तो भवेत् ततः ॥१५॥
अनुष्ठान – विधिं वक्ष्ये, सादरं श्रृणु पार्वति ! ।
न प्रकाण्डं नहि क्षुद्रं, प्रमाणं घटमाहरेत् ॥१६॥
ताम्रेण निर्मितं वापि, स्वर्णेन निर्मितं च वा ।
प्रवालं हीरकं मुक्तां, स्वर्ण – रुप्ये तथैव च ॥१७॥
नानालङ्कार – वस्त्राणि, नाना – द्रव्याणि भूरिशः ।
कस्तूरी – कुंकुमादीनि, नाना – गन्धानि चाहरेत् ॥१८॥
नाना – पुष्पाणि माल्यानि, पञ्चतत्त्वानि यत्नतः ।
विहितान् धूप – दीपांश्च, घृतेन यत्नतः ॥१९॥
ततः शिष्यं समानीय, गुरुः शुद्धालये प्रिये ! ।
वेश्याभिः साधकैः सार्द्ध, पूजनं न समाचरेत् ॥२०॥
पटलोक्त – विधानेन, भक्तितः परिपूजयेत् ।
पूजां समाप्य देव्यास्तु, स्तवैस्तु प्रणमेन् मुदा ॥२१॥
ततो हि शिव – शक्तिभ्यो, गन्ध – माल्यानि दापयेत् ।
आसनं वस्त्र – भूषाश्च, प्रत्येकेन कुलेश्वरी ! ॥२२॥
ततः शङ्खादि – वाद्यैश्च, मङ्गलाचरणैः परैः ।
घट – स्थापनकं कुर्यात् , क्रमं तत्र श्रृणु प्रिये ! ॥२३॥
काम – बीजेन सम्प्रोक्ष्य, वाग्भवेनैव शोधयेत् ।
शक्तया कलशमारोप्य, मायया पूरयेज्जलैः ॥२४॥
प्रवालादीन् पञ्चरत्नान्, विन्यसेत् तत्र यत्नतः ।
आवाहयेच्च तीर्थानि, मन्त्रेणानेन देशिकः ॥२५॥
ॐ गङ्गाद्याः सरितः सर्वाः, समुद्राश्च सरांसि च ।
सर्वे समुद्राः सरितः, सरांसि जलदा नदाः ॥२६॥
ह्रदाः प्रस्रवणाः पुण्याः, स्वर्ग – पाताल – भू – गताः ।
सर्व – तीर्थानि पुण्यानि, घटे कुर्वन्तु सन्निधिम् ॥२७॥
रमा – बीजेन जप्तेन, पल्लवं प्रतिपादयेत् ।
कूर्चेन फल – दानं स्याद्, गन्ध – वस्त्रे हदात्मना ॥२८॥
ललनयैव सिन्दूरं, पुष्पं वद्यात् तु कामतः ।
मूलेन दूर्वां प्रणवैः, कुर्यादभ्युक्षणं ततः ॥२९॥
हूं फट् स्वाहेति मन्त्रेण, कुर्याद् दर्भैश्च ताड़नम् ।
विचिन्त्य मूलपीठं तु, संयोज्य पूजयेत् ॥३०॥
स्वतन्त्रोक्त – विधानेन, प्रार्थयेदमुना बुधः ।
तद् – घटे हस्तमारोप्य, शिष्यं पश्यन् गुरश्च सः ॥३१॥
उत्तिष्ठ ब्रह्मकलश ! देवताऽभीष्टदायक ! ।
सर्व – तीर्थाम्बु – सम्पूर्ण ! पूरयास्मन्मनोरथम् ॥३२॥
अभिषिञ्चेत् गुरुः शिष्यं, ततो मन्त्रैश्च पार्वति ! ।
मङ्गलैर्निखिलैर्द्रव्यैः, साधकैः शक्तिभिः सह ॥३३॥
पल्लवैराम्रकाद्यैश्च, नति – मत् शिष्यमेव च ।
आनन्दैः परमेशानि ! भक्तानां हित – कारिणी ॥३४॥

14… कुमारी पूजन ( कामाख्या देवी का दूसरा नाम हर गौरी मूर्ती या भोग मूर्ती है )
भक्त को देवीजी की अतिशय प्रसन्नता के लिए कुमारी कन्याओं को भोजन अवश्य खिलाना चाहिए । ये कुमारियाँ संख्या ९ में होनी चाहिए । इनमें २ वर्ष से कम तथा १० वर्ष से अधिक की कन्याएँ नहीं होनी चाहिए । इन ९ कुमारी देवियों के नाम मन्त्र क्रमशः ये हैं – १. कुमार्ये नमः, २. त्रिमुर्त्यै नः, ३. कल्याण्यै नमः, ४. रोहिण्यै नमः, ५. कालिकायै नमः, ६. चण्डिकोयै नमः, ७. शाम्भव्यै नमः, ८. दुर्गायै नमः तथा ९. सुभद्रायै नमः । इन कुमारियों में हीनांगी, अधिकांगी, कुरुपा नहीं होनी चाहिए । इनका इन्ही मन्त्रों से पूजन कर भोजन कराए । जब कुमारी देवी भोजन कर लें तो उनसे अपने सिर पर अक्षत छुड़वाए और उन्हें दक्षिणा दें । इस तरह करने पर महामाया भगवती अत्यनत प्रसन्न होकर अपनी सिद्धि देती है और साधक के मनोरथों को पूर्ण कर देती हैं ।

15…उमामहेश्वर स्तोत्रम :
नमः शिवाभ्यां नवयौवनाभ्यां परस्पराश्लिष्ट वपुर्धराभ्याम ।
नगेन्द्रकन्यावृषकेतनाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां सरसोत्सवाभ्यां नमस्कृताभीष्टवरप्रदाभ्याम ।
नारायणेनार्चितपादुकाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम ॥
नमह शिवाभ्यां वृषवाहनाभ्यां विरिञ्चिविष्ण्विन्द्रसुपूजिताभ्याम ।
विभूतिपाटिरविलेपनाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां जगदीश्वराभ्यां जगत्पतिभ्यां जयविग्रहाभ्याम ।
जम्भारिमुख्यैरभिवन्दिताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां परमौषधाभ्याम पञ्चाशरी पञ्जररञ्चिताभ्याम ।
प्रपञ्च सृष्टिस्थिति संहृताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यामतिसुन्दराभ्याम अत्यन्तमासक्तहृदम्बुजाभ्याम ।
अशेषलोकैकहितङ्कराभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां कलिनाशनाभ्यां कङ्कालकल्याणवपुर्धराभ्याम ।
कैलाशशैलस्थितदेवताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यामशुभापहाभ्याम अशेषलोकैकविशेषिताभ्याम ।
अकुण्ठिताभ्यां स्मृतिसंभृताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां रथवाहनाभ्यां रवीन्दुवैश्वानरलोचनाभ्याम ।
राका शशाङ्काभ मुखाम्बुजाभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां जटिलन्धराभ्यां जरामृतिभ्याम च विवर्जिताभ्याम ।
जनार्दनाब्जोद्भवपूजिताभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां विषमेशणाभ्यां बिल्वच्च्हदामल्लिकदामभृद्भ्याम ।
शोभावती शान्तवतीश्वराभ्यां नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
नमः शिवाभ्यां पशुपालकाभ्याम जगत्त्रयीरशण बद्दहृद्भ्याम ।
समस्त देवासुरपूजिताभ्याम नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्यां ॥
स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं शिवपार्वतीभ्यां भक्त्या पठेद्द्वादशकं नरो यः ।
स सर्व्सौभाग्य फलानि भुङ्क्ते शतायुरन्ते शिवलोकमेति ॥
॥ इति श्री शङ्कराचार्य कृत उमामहेश्वर स्तोत्रम ॥

16…तंत्र विद्या की उपयोगिता

प्रकृति अनन्त शक्तियों का भण्डार है । वैज्ञानिकों ने वायुयान, रेडियो, विद्युत, वाष्प आदि के अनेक आश्चर्य जनक आविष्कार किये हैं और नित्यप्रति होते जा रहे हैं पर प्रकृति का शक्ति भण्डार अनन्त और अपार है कि धुरधंर वैज्ञानिक अब तक यही कह रहे हैं कि हमने उस महासागर में से अभी कुछ सीपें और घोघें ही ढूंढ पाये हैं।

उस अनन्त तत्व के शक्ति परिमाणुओं की महान् शक्ति का उल्लेख करते हुए सर्वमान्य वैज्ञानिक डॉक्टर टामसन कहते हैं कि एक ‘शक्ति-परिमाणु’ (इलैक्ट्रान) की ताकत से लन्दन जैसे तीन नगरों को भस्म किया जा सकता है । ऐसे अरबों-खरबों परिमाणु एक एक इंच जगह में घूम रहे हैं फिर समस्त ब्रह्माण्ड की शक्ति की तुलना ही क्या हो सकती है।

हमारी आत्मा भी इसी चेतन्य तत्व का अंश है हमारे शरीर में भी असंख्य इलैक्ट्रान व्याप्त हैं इसलिए मानवीय शरीर और आत्मा भी अनन्य शक्ति सम्पन्न है उसे हाड़-माँस का पुतला मात्र न समझना चाहिए।

काल चक्र सदैव घूमता रहता है उसी के अनुसार संसार की अनन्त विद्याओं में से समय पाकर कोई लुप्त हो जाती है तो कोई प्रकाश में आती है । अब तक कितनी ही विद्यायें लुप्त और प्रकट हो चुकीं हैं और आगे कितनी लुप्त और प्रकट होने वाली हैं इसे हम नहीं जानते । आज जिस प्रकार भौतिक तत्वों के अन्वेषण से योरोप में नित्य नये वैज्ञानिक यंत्रों का आविष्कार हो रहा है उसी प्रकार अब से कुछ सहास्रब्दियों पूर्व भारत वर्ष में आध्यात्म विद्या और ब्रह्मविद्या का बोलवाला था।

उस समय योग के ऐसे साधनों का आविष्कार हुआ था जिनके द्वारा नाना प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त करके साधक लोग ईश्वर का साक्षात्कार करते थे और जीवन मुक्त हो जाते थे । आज लोग अपने अज्ञान के आधार पर उन बातों की सच्चाई में भले ही संदेह करें पर सत्य-सत्य ही रहेगा ।

अब भी उस महान अध्यात्म विद्या का पूर्ण लोप नहीं हुआ है । भारतवर्ष की पुण्य भूमि में अभी असंख्य सिद्ध योगों भरे पड़े हैं और उनको विश्वास है कि भौतिक आविष्कारों की अपेक्षा आध्यात्मिक शक्तियाँ करोड़ों गुनी बलवान और स्थायी हैं वे मनुष्य और समाज का कल्याण आध्यात्म उन्नति में ही समझते हैं ।

प्रत्यक्ष उदाहरणों में धुरंधर विद्वान और महान नेता एवं विचारक योगी अरविन्द की योग साधना हमारे सामने है । इस शक्ति भण्डार में से एक सीप योरोप के पण्डितों के हाथ भी लगी है ।

मैस्मरेजम और हिप्नोटेजम नामक उनके दो छोटे आध्यात्म आविष्कार हैं । जिनके द्वारा, सिद्ध की आत्मशक्ति साधक में प्रवेश करके उस पर अपना पूर्ण आधिपत्य जमा लेती है । तब मोह निन्द्रा में डूब हुआ साधक अनेंक आश्चर्यजनक और गुप्त बातें बताता है । आँखों से पट्टी बाँध कर पूरी तरह से संदूक या कोठरी में बन्द कर देने पर भी वह लोगों के मन की बात, उनके पास छिपी हुई चीजें, गुप्त बातें आदि बताता है । मोह निद्रित साधक, सिद्ध की इच्छा का पूर्ण अनुचर बन जाता है । उससे कहा जाय कि यह नीम का पत्ता पेड़ के समान मीठा है तो सचमुच उसकी बुद्धि और ज्ञानेन्द्रियाँ उस कडुए पत्ते को मीठा अनुभव करती हैं और वह बड़े प्रेम से उन्हें खाता है ।

इस विधि से वे सिद्ध, रोगियों की चिकित्सा भी करते हैं । अब से दो शताब्दी पूर्व जब सुँघा कर बेहोश करने की ‘क्लोराफार्म’ नामक दवा का आविष्कार नहीं हुआ था तब पश्चिमोय डाक्टर मैस्मरेजम की विधि से रोगी के पीड़ित स्थान को संज्ञा शुन्य करके तब आपरेशन करते थे । कलकत्ता के बड़े अस्पताल में एक प्रसिद्ध डाक्टर ने मैस्मरेजम के तरीके से ही कई सौ रोगियों को या उनके पीड़ित स्थान को बेहोश करके बड़े-बड़े आपरेशन किये थे । यहाँ एक ध्यान रखना चाहिए कि मैस्मरेजम योग महासागर की एक बिन्दू मात्र है ।

प्राचीन काल में योग की शक्ति संसार की बड़ी सेवा की गई है । अनेक योगी, दुखियों के दुःख निवारण में ही अपना जीवन लगा देते थे । महाप्रभु ईसा मसीह ने जीवन भर अपनी आत्म शक्ति के बल से दुखियों के दुःख दूर किये । उन्होंने बीमारों के रोग मुक्त किया । अन्धों को आँखें दी, कोड़ियों के शरीर शुद्ध कर दिये, लोगों की आत्मा से चिपटे हुए दुवृत्तियों के भूतों को छुड़ाया, जो अशान्ति और नाना प्रकार के दुःखों से चिल्ला रहे थे उनको सुख और शांति प्रदान की । अन्त में उस महात्मा ने दूसरों के दुःख और पापों को अपने ऊपर ओढ़ कर उनको भार मुक्त कर दिया ।

भारतवर्ष में शंकर, अश्विनी कुमार, धनवन्तरि, गोरखनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, नागार्जुन, चरक आदि के बारे में ऐसी कथाएँ मिलती हैं जिनसे प्रतीत होता है कि जीवन भर वे लोगों के दुःख दुर करने में ही लगे रहे । दुर्भाग्य से उस समय के महात्माओं में भी दो दल हो गये ।

17…भगवती काली की कृपा-प्राप्ति का मन्त्र
चमत्कारी महा-काली सिद्ध अनुभूत मन्त्र
“ॐ सत् नाम गुरु का आदेश। काली-काली महा-काली, युग आद्य-काली, छाया काली, छूं मांस काली। चलाए चले, बुलाई आए, इति विनिआस। गुरु गोरखनाथ के मन भावे। काली सुमरुँ, काली जपूँ, काली डिगराऊ को मैं खाऊँ। जो माता काली कृपा करे, मेरे सब कष्टों का भञ्जन करे।”
सामग्रीः लाल वस्त्र व आसन, घी, पीतल का दिया, जौ, काले तिल, शक्कर, चावल, सात छोटी हाँड़ी-चूड़ी, सिन्दूर, मेंहदी, पान, लौंग, सात मिठाइयाँ, बिन्दी, चार मुँह का दिया।
विधिः उक्त मन्त्र का सवा लाख जप ४० या ४१ दिनों में करे। पहले उक्त मन्त्र को कण्ठस्थ कर ले। शुभ समय पर जप शुरु करे। गुरु-शुक्र अस्त न हों। दैनिक ‘सन्ध्या-वन्दन’ के अतिरिक्त अन्य किसी मन्त्र का जप ४० दिनों तक न करे। भोजन में दो रोटियाँ १० या ११ बजे दिन के समय ले। ३ बजे के पश्चात् खाना-पीना बन्द कर दे। रात्रि ९ बजे पूजा आरम्भ करे। पूजा का कमरा अलग हो और पूजा के सामान के अतिरिक्त कोई सामान वहाँ न हो। प्रथम दिन, कमरा कच्चा हो, तो गोबर का लेपन करे। पक्का है, तो पानी से धो लें। आसन पर बैठने से पूर्व स्नान नित्य करे। सिर में कंघी न करे। माँ की सुन्दर मूर्ति रखे और धूप-दीप जलाए। जहाँ पर बैठे, चाकू या जल से सुरक्षा-मन्त्र पढ़कर रेखा बनाए। पूजा का सब सामान ‘सुरक्षा-रेखा’ के अन्दर होना चाहिए।
सर्वप्रथम गुरु-गणेश-वन्दना कर १ माला (१०८) मन्त्रों से हवन कर। हवन के पश्चात् जप शुरु करे। जप-समाप्ति पर जप से जो रेखा-बन्धन किया था, उसे खोल दे। रात्रि में थोड़ी मात्रा में दूध-चाय ले सकते हैं। जप के सात दिन बाद एक हाँड़ी लेकर पूर्व-लिखित सामान (सात मिठाई, चूड़ी इत्यादि) उसमें डाले। ऊपर ढक्कन रखकर, उसके ऊपर चार मुख का दिया जला कर, सांय समय जो आपके निकट हो नदी, नहर या चलता पानी में हँड़िया को नमस्कार कर बहा दे। लौटते समय पीछे मुड़कर नहीं देखें। ३१ दिनों तक धूप-दीप-जप करने के पश्चात् ७ दिनों तक एक बूँद रक्त जप के अन्त में पृथ्वी पर टपका दे और ३९वें दिन जिह्वा का रक्त दे। मन्त्र सिद्ध होने पर इच्छित वरदान प्राप्त करे।
सावधानियाँ- प्रथम दिन जप से पूर्व हण्डी को जल में सायं समय छोड़े और एक-एक सपताह बाद उसी प्रकार उसी समय सायं उसी स्थान पर, यह हाँड़ी छोड़ी जाएगी। जप के एक दिन बाद दूसरी हाँड़ी छोड़ने के पश्चात् भूत-प्रेत साधक को हर समय घेरे रहेंगे। जप के समय कार के बाहर काली के साक्षात् दर्शन होंगे। साधक जप में लगा रहे, घबराए नहीं। वे सब कार के अन्दर प्रविष्ट नहीं होंगे। मकान में आग लगती भी दिखाई देगी, परन्तु आसन से न उठे। ४० से ४२वें दिन माँ वर देगी। भविष्य-दर्शन व होनहार घटनाएँ तो सात दिन जप के बाद ही ज्ञात होने लगेंगी। एक साथी या गुरु कमरे के बाहर नित्य रहना चाहिए। साधक निर्भीक व आत्म-बलवाला होना चाहिए।
18… संकट-निवारक काली-मन्त्र
“काली काली, महा-काली। इन्द्र की पुत्री, ब्रह्मा की साली। चाबे पान, बजावे थाली। जा बैठी, पीपल की डाली। भूत-प्रेत, मढ़ी मसान। जिन्न को जन्नाद बाँध ले जानी। तेरा वार न जाय खाली। चले मन्त्र, फुरो वाचा। मेरे गुरु का शब्द साचा। देख रे महा-बली, तेरे मन्त्र का तमाशा। दुहाई गुरु गोरखनाथ की।”
सामग्रीः माँ काली का फोटो, एक लोटा जल, एक चाकू, नीबू, सिन्दूर, बकरे की कलेजी, कपूर की ६ टिकियाँ, लगा हुआ पान, लाल चन्दन की माला, लाल रंग के पूल, ६ मिट्टी की सराई, मद्य।
विधिः पहले स्थान-शुद्धि, भूत-शुद्धि कर गुरु-स्मरण करे। एक चौकी पर देवी की फोटो रखकर, धूप-दीप कर, पञ्चोपचार करे। एक लोटा जल अपने पास रखे। लोटे पर चाकू रखे। देवी को पान अर्पण कर, प्रार्थना करे- हे माँ! मैं अबोध बालक तेरी पूजा कर रहा हूँ। पूजा में जो त्रुटि हों, उन्हें क्षमा करें।’ यह प्रार्थना अन्त में और प्रयोग के समय भी करें।
अब छः अङ्गारी रखे। एक देवी के सामने व पाँच उसके आगे। ११ माला प्रातः ११ माला रात्रि ९ बजे के पश्चात् जप करे। जप के बाद सराही में अङ्गारी करे व अङ्गारी पर कलेजी रखकर कपूर की टिक्की रखे। पहले माँ काली को बलि दे। फिर पाँच बली गणों को दे। माँ के लिए जो घी का दिया जलाए, उससे ही कपूर को जलाए और मद्य की धार निर्भय होकर दे। बलि केवल मंगलवार को करे। दूसरे दिनों में केवल जप करे। होली-दिवाली-ग्रहण में या अमावस्या को मन्त्र को जागृत करता रहे। कुल ४० दिन का प्रयोग है।
भूत-प्रेत-पिशाच-जिन्न, नजर-टोना-टोटका झाड़ने के लिए धागा बनाकर दे। इस मन्त्र का प्रयोग करने वालों के शत्रु स्वयं नष्ट हो जाते हैं।
19…दर्शन हेतु श्री काली मन्त्र
“डण्ड भुज-डण्ड, प्रचण्ड नो खण्ड। प्रगट देवि, तुहि झुण्डन के झुण्ड। खगर दिखा खप्पर लियां, खड़ी कालका। तागड़दे मस्तङ्ग, तिलक मागरदे मस्तङ्ग। चोला जरी का, फागड़ दीफू, गले फुल-माल, जय जय जयन्त। जय आदि-शक्ति। जय कालका खपर-धनी। जय मचकुट छन्दनी देव। जय-जय महिरा, जय मरदिनी। जय-जय चुण्ड-मुण्ड भण्डासुर-खण्डनी, जय रक्त-बीज बिडाल-बिहण्डनी। जय निशुम्भ को दलनी, जय शिव राजेश्वरी। अमृत-यज्ञ धागी-धृट, दृवड़ दृवड़नी। बड़ रवि डर-डरनी ॐ ॐ ॐ।।”
विधि- नवरात्रों में प्रतिपदा से नवमी तक घृत का दीपक प्रज्वलित रखते हुए अगर-बत्ती जलाकर प्रातः-सायं उक्त मन्त्र का ४०-४० जप करे। कम या ज्यादा न करे। जगदम्बा के दर्शन होते हैं।
महा-काली शाबर मन्त्र
“सात पूनम काल का, बारह बरस क्वाँर।
एको देवी जानिए, चौदह भुवन-द्वार।।१
द्वि-पक्षे निर्मलिए, तेरह देवन देव।
अष्ट-भुजी परमेश्वरी, ग्यारह रुद्र सेव।।२
सोलह कल सम्पूर्णी, तीन नयन भरपूर।
दसों द्वारी तू ही माँ, पाँचों बाजे नूर।।३
नव-निधी षट्-दर्शनी, पन्द्रह तिथी जान।
चारों युग में काल का, कर काली! कल्याण।।४”७ १२ १ १४
२ १३ ८ ११
१६ ३ १० ५
९ ६ १५ ४
सामग्रीः काली-यन्त्र तथा चित्र, भट-कटैया के फूल-७, पीला कनेर के फूल, लौंग, इलायची-प्रत्येक ५, पञ्च-मेवा, नीम्बू-३, सिन्दूर, काले केवाँच के बीज-१०८, दीपक, धूप, नारियल।
विधिः उक्त मन्त्र की साधना यदि भगवती काली के मन्दिर में की जाए, तो उत्तम फल होगा। वैसे एकान्त में या घर पर भी कर सकते हैं। सर्व-प्रथम अपने सामने एक बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर श्रीकाली-यन्त्र और चित्र स्थापित करे। घी का चौ-मुखा दिया जलाए। पञ्चोपचार से पूजन करे। अष्ट-गन्ध से उक्त चौंतीसा-यन्त्र का निर्माण कर उसकी भी पञ्चोपचार से पूजा करें। पूजन करते समय भट-कटैया और कनेर पुष्प को यन्त्र व चित्र पर चढ़ाए।
तीनों नीम्बुओं के ऊपर सिन्दूर का टीका या बिन्दी लगाए और उसे भी अर्पित करे। नारियल, पञ्च-मेवा, लौंग, इलायची का भोग लगाए, लेकिन इन सबसे पहले गणेश, गुरु तथा आत्म-रक्षा मन्त्र का पूजन और मन्त्र का जप आवश्यक है। ‘काली-शाबर-मन्त्र’ को जपते समय हर बार एक-एक केवाँच का बीज भी काली-चित्र के सामने चढ़ाते रहें। जप की समाप्ति पर इसी मन्त्र की ग्यारह आहुतियाँ घी और गुग्गुल की दे। तत्पश्चात् एक नीम्बू काटकर उसमें अपनी अनामिका अँगुली का रक्त मिलाकर अग्नि में निचोड़े। हवन की राख, मेवा, नीम्बू, केवाँच के बीज और फूल को सँभाल कर रखे। नारियल और अगर-बत्ती को मन्दिर में चढ़ा दे तथा एक ब्राह्मण को भोजन कराए।
प्रयोग के समय २१ बार मन्त्र का जप करे। प्रतिदिन उक्त मन्त्र का १०८ बार जप करते रहने से साधक की सभी कामनाएँ पूर्ण होती है।
उक्त मन्त्र के विभिन्न प्रयोगः
१॰ शत्रु-बाधा का निवारणः अमावस्या के दिन १ नीम्बू पर सिन्दूर से शत्रु का नाम लिखे। २१ बार सात सुइयाँ उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित के नीम्बू में चुभो दे। फिर उसे श्मशान में जाकर गाड़ दे और उस पर मद्य की धार दे। तीन दिनों में शत्रु-बाधा समाप्त होगी।
२॰ मोहनः उक्त मन्त्र से सिन्दूर और भस्म को मिलाकर ११ बार अभिमन्त्रित कर माथे पर तिलक लगाकर जिसे देखेंगे, वह आपके ऊपर मोहित हो जायेगा।
३॰ वशीकरणः पञ्च-मेवा में से थोड़ा-सा मेवा लेकर २१ बार इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करे। इसे जिस स्त्री या पुरुष को खिलाएँगे, वह आपके वशीभूत हो जाएगा।
४॰ उच्चाटनः भट-कटैया के फूल १, केवाँच-बीज और सिन्दूर के ऊपर ११ बार मन्त्र पढ़कर जिसके घर में फेंक देंगे, उसका उच्चाटन हो जाएगा।
५॰ स्तम्भनः हवन की भस्म, चिता की राख और ३ लौंग को २१ बार मन्त्र से अभिमन्त्रित करके जिसके घर में गाड़ देंगे, उसका स्तम्भन हो जाएगा।
६॰ विद्वेषणः श्मशान की राख, कलीहारी का फूल, ३ केवाँच के बीज पर २१ बार मन्त्र द्वारा अभीमन्त्रित करके एक काले कपड़े में बाँध कर शत्रु के आने-जाने के मार्ग में या घर के दरवाजे पर गाड़ दे। शत्रुओं में आपस में ही भयानक शत्रुता हो जाएगी।
७॰ भूत-प्रेत-बाधाः हवन की राख सात बार अभिमन्त्रित कर फूँक मारे तथा माथे पर टीका लगा दे। चौंतिसा यन्त्र को भोज-पत्र पर बनाकर ताँबे के ताबीज में भरकर पहना दे।
८॰ आर्थिक-बाधाः महा-काली यन्त्र के सामने घी का दीपक जलाकर उक्त मन्त्र का जप २१ दिनों तक २१ बार करे।
विशेषः- यदि उक्त मन्त्र के साथ निम्न मन्त्र का भी एक माला जप नित्य किया जाए, तो मन्त्र अधिक शक्तिशाली होकर कार्य करता है।
20…“ॐ कङ्काली महा-काली, केलि-कलाभ्यां स्वाहा।”
भगवती काली की कृपा-प्राप्ति का मन्त्र
“काली-काली महा-काली कण्टक-विनाशिनी रोम-रोम रक्षतु सर्वं मे रक्षन्तु हीं हीं छा चारक।।”
विधिः आश्विन-शुक्ल-प्रतिपदा से नवमी तक देवी का व्रत करे। उक्त मन्त्र का १०८ बार जप करे। जप के बाद इसी मन्त्र से १०८ आहुति से। घी, धूप, सरल काष्ठ, सावाँ, सरसों, सफेद-चन्दन का चूरा, तिल, सुपारी, कमल-गट्टा, जौ (यव), इलायची, बादाम, गरी, छुहारा, चिरौंजी, खाँड़ मिलाकर साकल्य बनाए। सम्पूर्ण हवन-सामग्री को नई हांड़ी में रखे। भूमि पर शयन करे। समस्त जप-पूजन-हवन रात्रि में ११ से २ बजे के बीच करे। देवी की कृपा-प्राप्ति होगी।

21…अष्लक्ष्मी स्तोत्र : एक बार मनन अवश्य करे -जय माँ लक्ष्मी
1-आदिलक्ष्मी
सुमनसवन्दित सुन्दरि माधवि चन्द्र सहोदरि हेममये l
मुनिगणमण्डित मोक्षप्रदायिनि मञ्जुळभाषिणि वेदनुते ll
पङ्कजवासिनि देवसुपूजित सद्गुणवर्षिणि शान्तियुते l
जयजय हे मधुसूदन कामिनि आदिलक्ष्मि सदा पालय माम्
2-धान्यलक्ष्मी
अहिकलि कल्मषनाशिनि कामिनि वैदिकरूपिणि वेदमये l
क्षीरसमुद्भव मङ्गलरूपिणि मन्त्रनिवासिनि मन्त्रनुते ll
मङ्गलदायिनि अम्बुजवासिनि देवगणाश्रित पादयुते l
जयजय हे मधुसूदन कामिनि धान्यलक्ष्मि सदा पालय माम्
3-धैर्यलक्ष्मी
जयवरवर्णिनि वैष्णवि भार्गवि मन्त्रस्वरूपिणि मन्त्रमये l
सुरगणपूजित शीघ्रफलप्रद ज्ञानविकासिनि शास्त्रनुते ll
भवभयहारिणि पापविमोचनि साधुजनाश्रित पादयुते l
जयजय हे मधुसूदन कामिनि धैर्यलक्ष्मि सदा पालय माम्
4-गजलक्ष्मी
जयजय दुर्गतिनाशिनि कामिनि सर्वफलप्रद शास्त्रमये l
रथगज तुरगपदादि समावृत परिजनमण्डित लोकनुते ll
हरिहर ब्रह्म सुपूजित सेवित तापनिवारिणि पादयुते l
जयजय हे मधुसूदन कामिनि गजलक्ष्मि रूपेण पालय माम्
5-सन्तानलक्ष्मी
अहिखग वाहिनि मोहिनि चक्रिणि रागविवर्धिनि ज्ञानमये l
गुणगणवारिधि लोकहितैषिणि स्वरसप्त भूषित गाननुते ll
सकल सुरासुर देवमुनीश्वर मानववन्दित पादयुते l
जयजय हे मधुसूदन कामिनि सन्तानलक्ष्मि त्वं पालय माम् ll
6-विजयलक्ष्मी
जय कमलासनि सद्गतिदायिनि ज्ञानविकासिनि गानमये l
अनुदिनमर्चित कुङ्कुमधूसर भूषित वासित वाद्यनुते ll
कनकधरास्तुति वैभव वन्दित शङ्कर देशिक मान्य पदे l
जयजय हे मधुसूदन कामिनि विजयलक्ष्मि सदा पालय माम्
7-विद्यालक्ष्मी
प्रणत सुरेश्वरि भारति भार्गवि शोकविनाशिनि रत्नमये l
मणिमयभूषित कर्णविभूषण शान्तिसमावृत हास्यमुखे ll
नवनिधिदायिनि कलिमलहारिणि कामित फलप्रद हस्तयुते l
जयजय हे मधुसूदन कामिनि विद्यालक्ष्मि सदा पालय माम्
8-धनलक्ष्मी
धिमिधिमि धिंधिमि धिंधिमि धिंधिमि दुन्दुभि नाद सुपूर्णमये
घुमघुम घुंघुम घुंघुम घुंघुम शङ्खनिनाद सुवाद्यनुते ll
वेदपुराणेतिहास सुपूजित वैदिकमार्ग प्रदर्शयुते l
जयजय हे मधुसूदन कामिनि धनलक्ष्मि रूपेण पालय माम् ll

22…श्रीमहाकाली साधना के प्रयोग से लाभ

महाकाली साधना करने वाले जातक को निम्न लाभ स्वत: प्राप्त होते हैं-
(1) जिस प्रकार अग्नि के संपर्क में आने के पश्चात् पतंगा भस्म हो जाता है, उसी प्रकार काली देवी के संपर्क में आने के उपरांत साधक के समस्त राग, द्वेष, विघ्न आदि भस्म हो जाते हैं।
(2) श्री महाकाली स्तोत्र एवं मंत्र को धारण करने वाले धारक की वाणी में विशिष्ट ओजस्व व्याप्त हो जाने के कारणवश गद्य-पद्यादि पर उसका पूर्व आधिपत्य हो जाता है।
(3) महाकाली साधक के व्यक्तित्व में विशिष्ट तेजस्विता व्याप्त होने के कारण उसके प्रतिद्वंद्वी उसे देखते ही पराजित हो जाते हैं।
(4) काली साधना से सहज ही सभी सिद्धियां प्राप्त हो जाती है।
(5) काली का स्नेह अपने साधकों पर सदैव ही अपार रहता है। तथा काली देवी कल्याणमयी भी है।
(6) जो जातक इस साधना को संपूर्ण श्रद्धा व भक्तिभाव पूर्वक करता है वह निश्चित ही चारों वर्गों में स्वामित्व की प्राप्ति करता है व माँ का सामीप्य भी प्राप्त करता है।
(7) साधक को माँ काली असीम आशीष के अतिरिक्त, श्री सुख-सम्पन्नता, वैभव व श्रेष्ठता का भी वरदान प्रदान करती है। साधक का घर कुबेरसंज्ञत अक्षय भंडार बन जाता है।
(8) काली का उपासक समस्त रोगादि विकारों से अल्पायु आदि से मुक्त हो कर स्वस्थ दीर्घायु जीवन व्यतीत करता है।
(9) काली अपने उपासक को चारों दुर्लभ पुरुषार्थ, महापाप को नष्ट करने की शक्ति, सनातन धर्मी व समस्त भोग प्रदान करती है।

समस्त सिद्धियों की प्राप्ति हेतु सर्वप्रथम गुरु द्वारा दीक्षा अवश्य प्राप्त करें, चूंकि अनंतकाल से गुरु ही सही दिशा दिखाता है एवं शास्त्रों में भी गुरु का एक विशेष स्थान है।

23… जयन्ति मंगलकाली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।।

संपूर्ण विश्व को चलाने वाली कण-कण में व्याप्त महामाया की शक्ति अनादि व अनंत है। माँ जगदम्बा स्वयं ही संपूर्ण चराचर की अधिष्ठात्री भी हैं। माँ देवी के समस्त अवतारों की पूजा, अर्चना व उपासना करने से उपासना का तेज बढ़ता है एवं दुष्टों को दंड मिलता है। नवदुर्गाओं का आवाहन अर्थात् नवरात्रि में माँ भगवती श्री जगदम्बा की आराधना अत्यधिक फलप्रदायिनी होती है। हठयोगानुसार मानव शरीर के नौ छिद्रों को महामाया की नौ शक्तियाँ माना जाता है।
महादेवी की अष्टभुजाएं क्रमश: पंचमहाभूत व तीन महागुण है। महादेवी की महाशक्ति का प्रत्येक अवतार तन्त्रशास्त्र से संबंधित है, यह भी अपने आप में देवी की एक अद्भुत महिमा है।

शिवपुराणानुसार महादेव के दशम अवतारों में महाशक्ति माँ जगदम्बा प्रत्येक अवतार में उनके साथ अवतरित थीं। उन समस्त अवतारों के नाम क्रमश: इस प्रकार हैं-
(1) महादेव के महाकाल अवतार में देवी महाकाली के रूप में उनके साथ थीं।
(2) महादेव के तारकेश्वर अवतार में भगवती तारा के रूप में उनके साथ थीं।
(3) महादेव के भुवनेश अवतार में माँ भगवती भुवनेश्वरी के रूप में उनके साथ थीं।
(4) महादेव के षोडश अवतार में देवी षोडशी के रूप में साथ थीं।
(5) महादेव के भैरव अवतार में देवी जगदम्बा भैरवी के रूप में साथ थीं।
(6) महादेव के छिन्नमस्तक अवतार के समय माँ भगवती छिन्नमस्ता रूप में उनके साथ थीं।
(7) महादेव के ध्रूमवान अवतार के समय धूमावती के रूप में देवी उनके साथ थीं।
(8) महादेव के बगलामुखी अवतार के समय देवी जगदम्बा बगलामुखी रूप में उनके साथ थीं।
(9) महादेव के मातंग अवतार के समय देवी मातंगी के रूप में उनके साथ थीं।
(10) महादेव के कमल अवतार के समय कमला के रूप में देवी उनके साथ थीं।

दस महाविद्या के नाम से प्रचलित महामाया माँ जगत् जननी जगदम्बा के ये दस रूप तांत्रिकों आदि उपासकों की आराधना का अभिन्न अंग हैं, इन महाविद्याओं द्वारा उपासक कई प्रकार की सिद्धियां व मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है।
24… (महाकाली रहस्य)
आज के युग में माँ महाकाली की साधना कल्पवृक्ष के समान है क्योकि ये कलयुग में शीघ्र अतिशीघ्र फल प्रदान करने वाली महाविद्याओं में से एक महा विद्या है. जो साधक महाविद्या के इस स्वरुप की साधना करता है उसका मानव योनि में जन्म लेना सार्थक हो जाता है क्योकि एक तरफ जहाँ माँ काली अपने साधक की भौतिक आवश्कताओं को पूरा करती है वहीँ दूसरी तरफ उसे सुखोपभोग करवाते हुए एक-छत्र राज प्रदान करती है.

वैसे तो जब से इस ब्रह्मांड की रचना हुई है तब से लाखों करोडों साधनाओं को हमारे ऋषियों द्वारा आत्मसात किया गया है पर इन सबमें से दस महाविद्याओं, जिन्हें की “ मात्रिक शक्ति “ की तुलना दी जाती है, की साधना को श्रेष्टतम माना गया है. जबसे इस पृथ्वी का काल आयोजन हुआ है तब से माँ महाकाली की साधना को योगियों और तांत्रिको में सर्वोच्च की संज्ञा दी जाती है. साधक को महाकाली की साधना के हर चरण को पूरा करना चाहिए क्योकि इस साधना से निश्यच ही साधक को वाक्-सिद्धि की प्राप्ति होती है. वैसे तो इस साधना के बहुतेरे गोपनीय पक्ष साधक समाज के सामने आ चुके है परन्तु आज भी हम इस महाविद्या के कई रहस्यों से परिचित नहीं है.

काम कला काली, गुह्य काली, अष्ट काली, दक्षिण काली, सिद्ध काली आदि के कई गोपनीय विधान आज भी अछूते ही रह गए साधकों के समक्ष आने से,जितना लिखा गया है ये कुछ भी नहीं उन रहस्यों की तुलना में जो की अभी तक प्रकाश में नहीं आया है और इसका महत्वपूर्ण कारण है इन विद्याओं के रहस्यों का श्रुति रूप में रहना,अर्थात ये ज्ञान सदैव सदैव से गुरु गम्य ही रहा है,मात्र गुरु ही शिष्य को प्रदान करता रहा है और इसका अंकन या तो ग्रंथों में किया ही नहीं गया या फिर उन ग्रंथों को ही लुप्त कर दिया काल के प्रवाह और हमारी असावधानी और आलस्य ने. अघोर साधनाओं का प्रारंभ शमशान से ही होता है और होता है तीव्र साधनाओं का प्रकटीकरण भी,तभी तो साधक पशुभाव से ऊपर उठकर वीर और तदुपरांत दिव्य भाव में प्रवेश कर अपने जीवन को सार्थक कर पाता है.

किसी भी शक्ति का बाह्य स्वरुप प्रतीक होता है उनकी अन्तः शक्तियों का जो की सम्बंधित साधक को उन शक्तियों का अभय प्रदान करती हैं, अष्ट मुंडों की माला पहने माँ यही तो प्रदर्शित करती है की मैं अपने हाथ में पकड़ी हुयी ज्ञान खडग से सतत साधकों के अष्ट पाशों को छिन्न-भिन्न करती रहती हूँ, उनके हाथ का खप्पर प्रदर्शित करता है ब्रह्मांडीय सम्पदा को स्वयं में समेट लेने की क्रिया का,क्यूंकि खप्पर मानव मुंड से ही तो बनता है और मानव मष्तिष्क या मुंड को तंत्र शास्त्र ब्रह्माण्ड की संज्ञा देता है,अर्थात माँ की साधना करने वाला भला माँ के आशीर्वाद से ब्रह्मांडीय रहस्यों से भला कैसे अपरिचित रह सकता है.इन्ही रूपों में माँ का एक रूप ऐसा भी है जो अभी तक प्रकाश में नहीं आया है और वह रूप है माँ काली के अद्भुत रूप “महा घोर रावा” का,जिनकी साधना से वीरभाव,ऐश्वर्य,सम्मान,वाक् सिद्धि और उच्च तंत्रों का ज्ञान स्वतः ही प्राप्त होने लगता है,अद्भुत है माँ का यह रूप जिसने सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय रहस्यों को ही अपने आप में समेत हुआ है और जब साधक इनकी कृपा प्राप्त कर लेता है तो एक तरफ उसे समस्त आंतरिक और बाह्य शत्रुओं से अभय प्राप्त हो जाता है वही उसे माँ काली की मूल आधार भूत शक्ति और गोपनीय तंत्रों में सफलता की कुंजी भी तो प्राप्त हो जाती है.

वस्तुतः ये क्रियाएँ अत्यंत ही गुप्त रखी गयी हैं और सामन्य साधको को तो इन स्वरूपों की जानकारी भी नही है परन्तु हमारी सद्गुरु परम्परा में हमें सहजता से सभी रहस्यों का परिचय प्राप्त होता है. इनकी मूल साधना अत्यधिक ही दुष्कर मानी गयी है और श्मशान,पूर्ण तैयारी और कुशल गुरु मार्गदर्शन के बिना इसका अभ्यास भी नहीं करना चाहिय अन्यथा स्वयं के प्राण तीव्रता के साथ बाह्य्गामी होकर ब्रह्माण्डीय प्राणों के साथ योग कर लेते है और पुनः लौट कर साधक के मूल शरीर मैं नहीं आते हैं. अतः वह विधान तो यहाँ पर देना उचित नहीं होगा परन्तु उनका एक सरल क्रम जो घर में एकांत में किया जा सकता है और उपरोक्त सभी लाभों को प्राप्त किया जा सकता है यहाँ पर दिया जा रहा है.

१. इसे किसी भी रविवार से प्रारम्भ किया जा सकता है.

२. लाल वस्त्र और आसन अनिवार्य है.

३. रात्रि का तीसरा पहर और दक्षिण दिशा की प्रधानता कही गयी है.

४. महाकाली के चैतन्य चित्र या विग्रह के सामने बैठ कर इस मंत्र का २१ माला जप अगले रविवार तक नित्य किया जाता है.

५. गुरु पूजन और गुरु मंत्र तो किसी भी साधना का प्राथमिक और अनिवार्य अंग है जो अन्य साधना में सफलता के लिए हमारा आधार बनता है.

६. कुमकुम, तेल के दीपक, जवा पुष्प, गूगल धुप और अदरक के रस में डूबा हुआ गुड़ माँ के पूजन में प्रयुक्त होता है. रुद्राक्ष माला से इनका मंत्र जप किया जाता है.

ॐ क्रीं क्लीं महा घोररावयै पूर्ण घोरातिघोरा क्लीं क्रीं फट् ||

साधना के दौरान थोड़ी भयावह स्थिति बन सकती है, पदचाप सुनाई दे सकती है, साधना से उच्चाटन हो सकता है, तीव्र ज्वर और तीव्र दर्द का अनुभव हो सकता है परन्तु साधक यदि इन् स्थितियों को पार कर लेता है तो उसे स्वयं ही धीरे धीरे उपरोक्त लाभ प्राप्त होने लगते हैं…

25…मंत्र
शंकराचार्य ने पुरे भारतवर्ष में घूमकर एक ही बात कही कि संसार का सब कुछ मंत्रों के आधीन हैं! बिना मंत्रों के जीवन गतिशील नहीं हो सकता, बिना मंत्रों के जीवन की उन्नति नहीं हो सकती, बिना साधना के सफलता नहीं प्राप्त हो सकती!

गुरु तो वह हैं, जो प्रत्येक व्यक्ति को एक मंदिर बना दे, मंत्रों के माध्यम से! वैष्णो देवी जायें और देवी के दर्शन करे, उससे भी श्रेष्ठ हैं कि मंत्रों के द्वारा वैष्णो देवी का भीतर स्थापन हो, अन्दर चेतना पैदा हो जिससे वह स्वयं एक चलता फिरता मंदिर बनें, जहाँ भी वह जायें ज्ञान दे सकें, चेतना व्याप्त कर सकें तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान को सुरक्षित रख सकें!

जब मैं इंग्लैण्ड गया तो वहां भी लाख-डेढ़ लाख व्यक्ति इकट्ठे हुए, उन्होंने भी स्वीकार किया कि मंत्रों का ज्ञान प्राप्त होना चाहिए! उन्होंने कीर्तन किया, मगर कीर्तन के बाद मंत्रो को सीखने का प्रयास भी किया, निरंतर जप किया और उनकी आत्मा को शुद्धता, पवित्रता का भाव हुआ! मैक्स म्युलर जैसे विद्वान ने भी कहा हैं कि वैदिक मंत्रों से बड़ा ज्ञान संसार में हैं ही नहीं ! उसने कहा हैं कि मैं विद्वान हु और पूरा यूरोप मुझे मानता हैं, मगर वैदिक ज्ञान, वैदिक मंत्रों के आगे हमारा सारा ज्ञान अपने आप में तुच्छ हैं, बौना हैं ! आईंस्टीन जैसे वैज्ञानिक ने भी कहा कि एक ब्रह्मा हैं, एक नियंता हैं, वह मुझे वापस भारत में पैदा करें, ऐसी जगह पैदा करें, जहाँ किसी योगी, ऋषि या वेद मंत्रों के जानकार के संपर्क में आ सकूँ, उनसे मंत्रों को सीख सकूँ! अपने आप में सक्षमता प्राप्त करूँ और संसार के दुसरे देशों में भी इस ज्ञान को फैलाऊँ!

गुरु वह हैं जो आपकी समस्याओं को समझे, आपकी तकलीफों को दूर करने के लिए उस मंत्र को समझाएं, जिसके माध्यम से तकलीफ दूर हो सकें! मंत्र जप के माध्यम से दैवी सहायता को प्राप्त कर जीवन में पूर्णता संभव हैं! दैवी सहायता के लिए जरुरी हैं कि आप देवताओं से परिचित हो और देवता आपसे परिचित हो!

परन्तु देवता आपसे परिचित हैं नहीं! इसलिए जो भगवान् शिव का मंत्र हैं, जो सरस्वती का मंत्र हैं, जो लक्ष्मी का मंत्र हैं, उसका नित्य जप करें और पूर्णता के साथ करें, तो निश्चय ही आपके और उनके बीच की दुरी कम होगी! जब दुरी कम होगी तो उनसे वह चीज प्राप्त हो सकेगी! एक करोडपति से हम सौ-हजार रुपये प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु लक्ष्मी अपने आपमें करोडपति ही नहीं हैं, असंख्य धन का भण्डार हैं उसके पास, उससे हम धन प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु तभी जब आपके और उनके बीच की दुरी कम हो…. और वह दुरी मंत्र जप से कम हो सकती हैं! मंत्र का तात्पर्य हैं – उन शब्दों का चयन जिन्हें देवता ही समझ सकते हैं! मैं अभी आपको ईरान की भाषा में या चीन की भाषा में आधे घंटे भी बताऊं, तो आप नहीं समझ सकेंगे! दस साल भी भक्ति करेंगे, तो उसके बीस साल बाद भी समस्याएं सुलझ नहीं पाएंगी, क्योंकि उसका रास्ता भक्ति नहीं हैं उसका रास्ता साधना हैं, मंत्र हैं!
ज्ञान नाम मन्त्र को माना जाता है, मन्त्र से ही मन्त्रणा शब्द का विकास हुआ है.यन्त्र भी बिना मन्त्र के बेकार ही है, कार तो है लेकिन उसे चलाने और रखरखाव का ज्ञान नही है तो वह कार भी बेकार मानी जा सकती है, कार तभी सफ़ल है जब उसे चलाने से लेकर समय पर प्रयोग करने का पूरा ज्ञान पता हो, संसार के सभी शब्द मन्त्र है, रोटी खाने के लिये जब रसोइये को रोटी बनाने का मन्त्र पता नही होगा तो वह रोटी नही बना सकता है, खाने बाले को खाने का ज्ञान नही होगा तो वह खा भी नही स्कता.गन्ना बहुत मीठा होता है, लेकिन अगर उसे चूसने का ज्ञान नही होगा तो वह अपनी लकडियों से गले को फ़ाड देगा.आम को खाने के लिये छिलका सहित या गुठली सहित खा लिया जाये तो वह अर्थ की जगह अनर्थ ही करेगा.किसी भी वस्तु, व्यक्ति, स्थान के बारे मे मालुम करने के लिये उसका मन्त्र जानना भी जरूरी है, डाक्टर अगर शब्द को पढने और दवाइयों को प्रयोग करने का मन्त्र नही जानता है तो वह किसी काम का डाक्टर नही है.डाक्टरी पढाई और डिग्री मन्त्र से पूर्णता का भान ही कराती है, मीडिया वाले भी अगर कवरेज का ज्ञान नही रखते है, शब्दों के जाल बनाने का ज्ञान नही रखते, या जन्रलिस्ट की पढाई के द्वारा सफ़ल मीडिया कर्मी का मन्त्र नही जाना है तो वह किस प्रकार से कवरेज को टीवी पर दिखा सकता है.
नियत ध्वनियों के समूह को मंत्र कहते हैं । मंत्र वो विज्ञान या विद्या है, जिससे शक्ति का उदभव होता है । जहां मंत्र का विधिपूर्वक प्रयोग किया जाता है, वहां शक्तियों का निवास बना रहता है ।
मंत्र – साधन द्वारा देवी – देवता तक वश में हो जाते हैं और मंत्र – योग की सिद्धि प्राप्त साधक को जगत् का समस्त वैभव सुलभ हो जाता है ( ऐसा माना गया है ) । इस भौतिक प्रधान युग में मानव सुख – सुविधा चाहता है और चमत्कार भी । किन्तु पाखंडियों ने छल व प्रपंच का जाल इस प्रकार फैलाया हुआ है कि केवल अपने साधारण स्वार्थ के लिए एक महान् विद्या के प्रति घृणा व अविश्वास पैदा करवा दिया ।
किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि मंत्रों में शक्ति नहीं है या वे केवल वाग्जाल हैं । मंत्र आज भी विद्यमान हैं । लेकिन चाहिए सिद्ध महापुरुष की छत्रछाया में साधना करने वाला । श्रद्धा, भक्ति व विश्वास से की गई साधना कभी निष्फल नहीं होती । मंत्रों से होने वाले लाभ अचानक ही किसी की कृपा से प्राप्त नहीं हो जाते वरन् उनके द्वारा जो वैज्ञानिक प्रक्रिया अपने आप मंत्रवत् होती हैं, उससे लाभ होता है । मंत्रों का अपना एक स्वतंत्र विधान है ।
मंत्र – साधना में सामान्यतः जो विधि अपनाई जाती है, उसकी कुछ मूलभूत क्रियाओं का ध्यान रखता नितांत आवश्यक है, जो निम्न प्रकार से हैं -
स्थान पवित्र, शुद्ध व स्वच्छ होना चाहिए, जैसे – देव – स्थान, तीर्थ – भूमि, वन – पद्रेश, पर्वत या उच्च – स्थान, उपासनागृह और पवित्र नदी का तट ! गृह में एकांत, शांत जहां अधिक आवाज न पहुंचे, ऐसा स्थान उपासना – गृह रखना चाहिए ।
प्रभु की प्रतिमा, चित्र या यंत्र को अपने सम्मुख रखना चाहिए ।
प्रत्येक मंत्र के जाप का समय व संख्या निर्धारित होती है, उसी के अनुरुप जप का प्रारंभ करना चाहिए और जितने समय तक जितनी संख्या में जप करना है, उसे विधि – पूर्वक करना चाहिए । समय में हेर – फेर कभी नहीं करनी चाहिए ।
वस्त्र धुला हुआ, स्वच्छ, शुद्ध व बिना सिला होना चाहिए ।
धूप – दीप अवश्य रखना चाहिए ।
जब तक मंत्र का जप या साधना चले, तब तक अभक्ष्य पदार्थ नहीं खाने चाहिए । ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए तथा नीतिमय जीवन बिताना चाहिए ।
मंत्रों के शब्दों का उच्चारण शुद्ध व बहुत धीमा होना चाहिए । सबसे अच्छा है कि ” मानस जप ” करें ।
मंत्र की उपासना, ध्यान, पूजन और जप श्रद्धा व विश्वासपूर्वक करना चाहिए ।
दिशा, काल, मुद्रा, आसन, वर्ण, पुष्प, माला, मंडल, पल्लव और दीपनादि प्रकार को जानकर ही किसी मंत्र की साधना प्रारंभ की जानी चाहिए ।

26…मंत्रो की साधना में नियमो का पालन
मंत्रो की साधना में नियमो का पालन– मंत्रो की शक्ति असीम है! प्रयोग करते समय विशेष सावधानी ! बरतनी चाहिए! मन्त्र उच्चारण की तनिक-सी त्रुटी सारे करे -कराये पर पानी फेर देती है! यदि साधना -काल में नियमो का पालन न किया जाये,तो कभी- कभी बड़े घातक परिणाम सामने आ जाते है! इसी के साथ गुरु के ध्दारा दिए गए निर्देशों का पालन साधक ने अवश्य करना चाहिए ! साधक को चाहिए कि वो प्रयोज्य वस्तुए जेसे -
आसन ,माला, वस्त्र, हवन-साम्रगी तथा नियमो जेसे दीक्षा स्थान,समय एवं जप-संख्या आदि का द्र्द्तापूर्वक
पालन करे! क्योकि विपरीत आचरण करने से मन्त्र तथा उसकी साधना निष्फल हो जाती है! जबकि- विधिवत की गई साधना से इष्ट देवता की क्रपा सुलभ रहती है! साधना-काल में निम्न नियमो का पालन अनिवार्य है !
, १.-जिसकी साधना की जा रही हो, उसके प्रति पूर्ण आस्था !
२. मन्त्र -साधना के प्रति पूर्ण विस्वास ३. साधना-स्थल के प्रति विस्वास के साथ-साथ
साधना का स्थान सामाजिक, पारिवारिक संपर्क से अलग हो! ४. उपवास में दूध, फल आदि का, सात्विक भोजन किया जाये,सोंदर्य -प्रसाधन,क्षोर- कर्म व् विलासिता का त्याग आवश्यक है! ५. साधना-काल में भूमि शयन करे! ६. वाणी का असंतुलन,कटु -भाषण,प्रलाप, मिथ्या -वचन आदि का त्याग करे, कोशिश मोन रहने की करे! निरंतर मन्त्र जप अथवा इष्ट-देवता का स्मरण-चिन्तन आवश्यक है!
! मन्त्र साधना में प्राय; विघ्न आते आप साबधानी रखकर मन्त्र जप करे, अवस्य सफल होगे..

27….मंत्रों का प्रयोग मानव ने अपने कल्याण के साथ-साथ दैनिक जीवन की संपूर्ण समस्याओं के समाधान हेतु यथासमय किया है और उसमें सफलता भी पाई है, परंतु आज के भौतिकवादी युग में यह विधा मात्र कुछ ही व्यक्तियों के प्रयोग की वस्तु बनकर रह गई है। मंत्रों में छुपी अलौकिक शक्ति का प्रयोग कर जीवन को सफल एवं सार्थक बनाया जा सकता है। सबसे पहले प्रश्न यह उठता है कि ‘मंत्र’ क्या है, इसे कैसे परिभाषित किया जा सकता है। इस संदर्भ में यह कहना उचित होगा कि मंत्र का वास्तविक अर्थ असीमित है। किसी देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए प्रयुक्त शब्द समूह मंत्र कहलाता है। जो शब्द जिस देवता या शक्ति को प्रकट करता है उसे उस देवता या शक्ति का मंत्र कहते हैं। मंत्र एक ऐसी गुप्त ऊर्जा है, जिसे हम जागृत कर इस अखिल ब्रह्मांड में पहले से ही उपस्थित इसी प्रकार की ऊर्जा से एकात्म कर उस ऊर्जा के लिए देवता (शक्ति) से सीधा साक्षात्कार कर सकते हैं। ऊर्जा अविनाशिता के नियमानुसार ऊर्जा कभी भी नष्ट नहीं होती है, वरन् एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती रहती है। अतः जब हम मंत्रों का उच्चारण करते हैं तो उससे उत्पन्न ध्वनि एक ऊर्जा के रूप में ब्रह्मांड में प्रेषित होकर जब उसी प्रकार की ऊर्जा से संयोग करती है तब हमें उस ऊर्जा में छुपी शक्ति का आभास होने लगता है। ज्योतिषीय संदर्भ में यह निर्विवाद सत्य है कि इस धरा पर रहने वाले सभी प्राणियों पर ग्रहों का अवश्य प्रभाव पड़ता है। चंद्रमा मन का कारक ग्रह है और यह पृथ्वी के सबसे नजदीक होने के कारण खगोल में अपनी स्थिति के अनुसार मानव मन को अत्यधिक प्रभावित करता है। अतः इसके अनुसार जो मन का त्राण (दुःख) हरे उसे मंत्र कहते हैं। मंत्रों में प्रयुक्त स्वर, व्यंजन, नाद व बिंदु देवताओं या शक्ति के विभिन्न रूप एवं गुणों को प्रदर्शित करते हैं। मंत्राक्षरों, नाद, बिंदुओं में दैवीय शक्ति छुपी रहती है। मंत्र उच्चारण से ध्वनि उत्पन्न होती है, उत्पन्न ध्वनि का मंत्र के साथ विशेष प्रभाव होता है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति, स्थान, वस्तु के ज्ञानर्थ कुछ संकेत प्रयुक्त किए जाते हैं, ठीक उसी प्रकार मंत्रों से संबंधित देवी-देवताओं को संकेत द्वारा संबंधित किया जाता है, इसे बीज कहते हैं। विभिन्न बीज मंत्र इस प्रकार हैं : ॐ- परमपिता परमेश्वर की शक्ति का प्रतीक है। ह्रीं- माया बीज, श्रीं- लक्ष्मी बीज, क्रीं- काली बीज, ऐं- सरस्वती बीज, क्लीं- कृष्ण बीज। मंत्रों में देवी-देवताओं के नाम भी संकेत मात्र से दर्शाए जाते हैं, जैसे राम के लिए ‘रां’, हनुमानजी के लिए ‘हं’, गणेशजी के लिए ‘गं’, दुर्गाजी के लिए ‘दुं’ का प्रयोग किया जाता है। इन बीजाक्षरों में जो अनुस्वार (ं) या अनुनासिक (जं) संकेत लगाए जाते हैं, उन्हें ‘नाद’ कहते हैं। नाद द्वारा देवी-देवताओं की अप्रकट शक्ति को प्रकट किया जाता है। लिंगों के अनुसार मंत्रों के तीन भेद होते हैं- पुर्लिंग : जिन मंत्रों के अंत में हूं या फट लगा होता है। स्त्रीलिंग : जिन मंत्रों के अंत में ‘स्वाहा’ का प्रयोग होता है। नपुंसक लिंग : जिन मंत्रों के अंत में ‘नमः’ प्रयुक्त होता है। अतः आवश्यकतानुसार मंत्रों को चुनकर उनमें स्थित अक्षुण्ण ऊर्जा की तीव्र विस्फोटक एवं प्रभावकारी शक्ति को प्राप्त किया जा सकता है। मंत्र, साधक व ईश्वर को मिलाने में मध्यस्थ का कार्य करता है। मंत्र की साधना करने से पूर्व मंत्र पर पूर्ण श्रद्धा, भाव, विश्वास होना आवश्यक है तथा मंत्र का सही उच्चारण अति आवश्यक है। मंत्र लय, नादयोग के अंतर्गत आता है। मंत्रों के प्रयोग से आर्थिक, सामाजिक, दैहिक, दैनिक, भौतिक तापों से उत्पन्न व्याधियों से छुटकारा पाया जा सकता है। रोग निवारण में मंत्र का प्रयोग रामबाण औषधि का कार्य करता है। मानव शरीर में 108 जैविकीय केंद्र (साइकिक सेंटर) होते हैं जिसके कारण मस्तिष्क से 108 तरंग दैर्ध्य (वेवलेंथ) उत्सर्जित करता है। शायद इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने मंत्रों की साधना के लिए 108 मनकों की माला तथा मंत्रों के जाप की आकृति निश्चित की है। मंत्रों के बीज मंत्र उच्चारण की 125 विधियाँ हैं। मंत्रोच्चारण से या जाप करने से शरीर के 6 प्रमुख जैविकीय ऊर्जा केंद्रों से 6250 की संख्या में विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा तरंगें उत्सर्जित होती हैं, जो इस प्रकार हैं : मूलाधार 4×125=500 स्वधिष्ठान 6×125=750 मनिपुरं 10×125=1250 हृदयचक्र 13×125=1500 विध्रहिचक्र 16×125=2000 आज्ञाचक्र 2×125=250 कुल योग 6250 (विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा तरंगों की संख्या) भारतीय कुंडलिनी विज्ञान के अनुसार मानव के स्थूल शरीर के साथ-साथ 6 अन्य सूक्ष्म शरीर भी होते हैं। विशेष पद्धति से सूक्ष्म शरीर के फोटोग्राफ लेने से वर्तमान तथा भविष्य में होने वाली बीमारियों या रोग के बारे में पता लगाया जा सकता है। सूक्ष्म शरीर के ज्ञान के बारे में जानकारी न होने पर मंत्र शास्त्र को जानना अत्यंत कठिन होगा। मानव, जीव-जंतु, वनस्पतियों पर प्रयोगों द्वारा ध्वनि परिवर्तन (मंत्रों) से सूक्ष्म ऊर्जा तरंगों के उत्पन्न होने को प्रमाणित कर लिया गया है। मानव शरीर से 64 तरह की सूक्ष्म ऊर्जा तरंगें उत्सर्जित होती हैं जिन्हें ‘धी’ ऊर्जा कहते हैं। जब धी का क्षरण होता है तो शरीर में व्याधि एकत्र हो जाती है। मंत्रों का प्रभाव वनस्पतियों पर भी पड़ता है। जैसा कि बताया गया है कि चारों वेदों में कुल मिलाकर 20 हजार 389 मंत्र हैं, प्रत्येक वेद का अधिष्ठाता देवता है। ऋग्वेद का अधिष्ठाता ग्रह गुरु है। यजुर्वेद का देवता ग्रह शुक्र, सामवेद का मंगल तथा अथर्ववेद का अधिपति ग्रह बुध है। मंत्रों का प्रयोग ज्योतिषीय संदर्भ में अशुभ ग्रहों द्वारा उत्पन्न अशुभ फलों के निवारणार्थ किया जाता है। ज्योतिष वेदों का अंग माना गया है। इसे वेदों का नेत्र कहा गया है। भूत ग्रहों से उत्पन्न अशुभ फलों के शमनार्थ वेदमंत्रों, स्तोत्रों का प्रयोग अत्यन्त प्रभावशाली माना गया है। उदाहरणार्थ आदित्य हृदयस्तोत्र सूर्य के लिए, दुर्गास्तोत्र चंद्रमा के लिए, रामायण पाठ गुरु के लिए, ग्राम देवता स्तोत्र राहु के लिए, विष्णु सहस्रनाम, गायत्री मंत्रजाप, महामृत्युंजय जाप, क्रमशः बुध, शनि एवं केतु के लिए, लक्ष्मीस्तोत्र शुक्र के लिए और मंगलस्रोत मंगल के लिए। मंत्रों का चयन प्राचीन ऐतिहासिक ग्रंथों से किया गया है। वैज्ञानिक रूप से यह प्रमाणित हो चुका है कि ध्वनि उत्पन्न करने में नाड़ी संस्थान की 72 नसं् आवश्यक रूप से क्रियाशील रहती हैं। अतः मंत्रों के उच्चारण से सभी नाड़ी संस्थान क्रियाशील रहते हैं।

28…मंत्रों की जानकारी एवं निर्देश—-

1. यदि शाबर मंत्रों को छोड़ दें तो मुख्यत: दो प्रकार के मंत्र है- वैदिक मंत्र और तांत्रिक मंत्र। जिस मंत्र का जप अथवा अनुष्‍ठान करना है, उसका अर्घ्य पहले से लेना चाहिए। तत्पश्चात मंत्र का जप और उसके अर्घ्य की भावना करनी चाहिए। ध्यान रहे, अर्घ्य बिना जप निरर्थक रहता है।

2. मंत्र के भेद क्रमश: तनि माने गए हैं। 1. वाचिक जप 2. मानस जप और 3. उपाशु जप।

वाचिक जप- जप करने वाला ऊँचे-ऊँचे स्वर से स्पष्‍ट मंत्रों को उच्चारण करके बोलता है, तो वह वाचिक जप कहलाता है।
उपांशु जप- जप करने वालों की जिस जप में केवल जीभ हिलती है या बिल्कुल धीमी गति में जप किया जाता है जिसका श्रवण दूसरा नहीं कर पाता वह उपांशु जप कहलाता है।

मानस जप- यह सिद्धि का सबसे उच्च जप कहलाता है। जप करने वाला मंत्र एवं उसके शब्दों के अर्थ को एवं एक पद से दूसरे पद को मन ही मन चिंतन करता है वह मानस जप कहलाता है। इस जप में वाचक के दंत, होंठ कुछ भी नहीं हिलते है।
अभिचार कर्म के लिए वाचिक रीति से मंत्र को जपना चाहिए। शां‍‍‍ति एवं पुष्‍टि कर्म के लिए उपांशु और मोक्ष पाने के लिए मानस रीति से मंत्र जपना चाहिए।

3. मंत्र सिद्धि के लिए आवश्यक है कि मंत्र को गुप्त रखना चाहिए। मंत्र- साधक के बारे में यह बात किसी को पता न चले कि वो किस मंत्र का जप करता है या कर रहा है। यदि मंत्र के समय कोई पास में है तो मानसिक जप करना चाहिए।

4. सूर्य अथवा चंद्र ग्रहण के समय (ग्रहण आरंभ से समाप्ति तक) किसी भी नदी में खड़े होकर जप करना चाहिए। इसमें किया गया जप शीघ्र लाभदायक होता है। जप का दशांश हवन करना चाहिए। और ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। वैसे तो यह सत्य है कि प्रतिदिन के जप से ही सिद्धि होती है परंतु ग्रहण काल में जप करने से कई सौ गुना अधिक फल मिलता है।

विशेष : नदी में जप हमेशा नाभि तक जल में रहकर ही करना चाहिए।..

29….यंत्र साधना सबसे सरल है। बस यंत्र लाकर और उसे सिद्ध करके घर में रखें लोग तो अपने आप कार्य सफल होते जाएंगे। यंत्र साधना को कवच साधना भी कहते हैं।

यं‍त्र को दो प्रकार से बनाया जाता है- अंक द्वारा और मंत्र द्वारा। यंत्र साधना में अधिकांशत: अंकों से संबंधित यंत्र अधिक प्रचलित हैं। श्रीयंत्र, घंटाकर्ण यंत्र आदि अनेक यंत्र ऐसे भी हैं जिनकी रचना में मंत्रों का भी प्रयोग होता है और ये बनाने में अति क्लिष्ट होते हैं।

इस साधना के अंतर्गत कागज अथवा भोजपत्र या धातु पत्र पर विशिष्ट स्याही से या किसी अन्यान्य साधनों के द्वारा आकृति, चित्र या संख्याएं बनाई जाती हैं। इस आकृति की पूजा की जाती है अथवा एक निश्चित संख्या तक उसे बार-बार बनाया जाता है। इन्हें बनाने के लिए विशिष्ट विधि, मुहूर्त और अतिरिक्त दक्षता की आवश्यकता होती है।

यंत्र या कवच भी सभी तरह की मनोकामना पूर्ति के लिए बनाए जाते हैं जैसे वशीकरण, सम्मोहन या आकर्षण, धन अर्जन, सफलता, शत्रु निवारण, भूत बाधा निवारण, होनी-अनहोनी से बचाव आदि के लिए यंत्र या कवच बनाए जाते हैं।

दिशा- प्रत्येक यंत्र की दिशाएं निर्धारित होती हैं। धन प्राप्ति से संबंधित यंत्र या कवच पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके रखे जाते हैं तो सुख-शांति से संबंधित यंत्र या कवच पूर्व दिशा की ओर मुंह करके रख जाते हैं। वशीकरण, सम्मोहन या आकर्षण के यंत्र या कवच उत्तर दिशा की ओर मुंह करके, तो शत्रु बाधा निवारण या क्रूर कर्म से संबंधित यंत्र या कवच दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके रखे जाते हैं। इन्हें बनाते या लिखते वक्त भी दिशाओं का ध्यान रखा जाता है।

30….यंत्र’

साधना विज्ञान में विशेष कर वाममार्गी तांत्रिक साधनाओं में यंत्र-साधना का बड़ा महत्व है । जिस तरह देवी-देवताओं की प्रतीकोपासना की जाती है और उनमें सन्निहित दिव्यताओं, की अवधारणा की जाती है, उसी तरह ‘यंत्र’ भी किसी देवी या देवता के प

्रतीक होते हैं ।
इनकी रचना ज्यामितीय होती है । यह बिन्दू, रेखाओं, वक्र-रेखाओं, वर्गों, वृत्तों और पद्ददलों से मिलाकर बनाये जाते हैं और अलग-अलग प्रकार से बनाये जाते हैं । कई का तो बनाना भी कठिन होता है । इनका एक सुनिश्चित उद्देश्य होता है । इन रेखाओं, त्रिभुजों, वर्गों, वृत्तों और यहाँ तक कि कोण, अंश का भी विशेष अर्थ होता है ।
जिस तरह से देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं । उसी तरह यंत्रों में भी गंभीर लक्ष्य निहित होते हैं । इनका निर्माण पत्थर, धातु या अन्य वस्तुओं के तल पर होता है । रेखाओं और त्रिभुजों आदि के माध्यम से बने चित्रों को ‘भण्डार’ कहा जाता है, जो किसी भी देवता के प्रतीक हो सकते हैं, किन्तु ‘यंत्र’ किसी विशिष्ट देवी या देवता के प्रतीक होते हैं ।
तंत्र विद्या विशारदों के अनुसार यंत्र अलौकिक एवं चमत्कारिक दिव्य शक्तियों के निवास स्थान है । ये सामान्यतता स्वर्ण, चाँदी एवं ताँबा जैसी उत्तम धातुओं उत्तम माने जाते हैं । ये चारों ही पदार्थ कास्मिक तरंगे उत्पन्न करने और ग्रहण करने की सर्वाधिक क्षमता रखते हैं । उच्चस्तरीय साधनाओं में प्रायः इन्हीं से बने यंत्र प्रयुक्त होते हैं ।
ये यंत्र केवल रेखाओं और त्रिकोणों आदि से बने ज्यामिति विज्ञान के प्रदर्शक चित्र ही नहीं होते, वरन् उनकी रचना विशेष आध्यात्मिक दृष्टिकोण से की जाती है । जिस प्रकार से विभिन्न देवी-देवताओं के रंग-रूप के रहस्य होते हैं, उसी तरह सभी यंत्र विशेष उद्देश्य से बनाये गये हैं । इन यंत्रों में पिण्ड और ब्रह्माण्ड का दर्शन पिरोया हुआ है ।
भारतीय दर्शन का मत है कि जो कुछ ब्रह्माण्ड में है, वह सारी देव शक्तियाँ पिण्ड अर्थात् मानवीकाया में भी सूक्ष्म रूप में विद्यमान हैं । मानवी काय-पिण्ड उस विराट् विश्व-ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त संस्करण है, अतः उसमें सन्निहित शक्तियों को यदि जाग्रत एवं विकसित किया जा सके तो वे भी उतनी ही समर्थ एवं चमत्कारी हो सकती है ।
यंत्र साधना में साधक यंत्र का ध्यान करता है और क्रमशः आगे बढ़ते हुए अपनी पिण्ड चेतना को वह ब्रह्म जितना ही विस्तृत अनुभव करने लगता है । एक समय आता है जब दोनों में कोई अंतर नहीं रहता और वह अपनी ही पूजा करता है । उसके ध्यान में पिण्ड और ब्रह्माण्ड का ऐक्य हो जाता है । वह भगवती महाशक्ति को अपना ही रूप समझता है, फिर उसे सारा जगत ही अपना रूप लगने लगता है । वह अपने को सब में समाया हुआ पाता है, अपने अतिरिक्त उसे और कुछ दृष्टिगोचर ही नहीं होता । वह अद्वेत सिद्धि के मार्ग पर प्रशस्त होता है और ऐसी अवस्था में आ जाता है कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय एक रूप ही लगने लगते हैं । साधक की चेतना अब अनंत विश्व और अखण्ड ब्रह्म का रूप धारण कर देती है । यंत्र पूजा में यही भाव निहित है ।
‘यंत्र’ का अर्थ ‘ग्रह’ होता है । यह ‘यम’ धातु से बनता है जिससे ग्रह का ही बोध होता है, क्योंकि यही नियंत्रण की प्रक्रिया दृष्टिगोचर होती है यों तो सामान्य-भौतिक अर्थ में यंत्र का तात्पर्य मशीन से लिया जाता है जो मानव से अधिक श्रम साध्य और चमत्कारी कार्य कर सकती है और हर कार्य में सहायक सिद्ध होती है । उदाहरण के लिए मोटर-कार, रेलगाड़ी, वायुयान,सैटेलाइट आदि की उपयोगिता एवं द्रुतगामिता से सभी परिचित हैं । इसी तरह माइक्रोस्कोप, टेलीस्कोप जैसे सूक्ष्म एवं दूरदर्शी यंत्रों को भी सभी लोग जानते हैं कि किस तरह उनसे सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्तुओं एवं दूरस्थ वस्तुओं को देखा जा सकता है । इसी तरह विराट् ब्रह्म को देखना हो तो भी यंत्र की अपेक्षा रहती है, उसकी भावना करनी पड़ती है । तांत्रिक यंत्र को निर्गुण ब्रह्म के शक्ति-विकास का प्रतीक माना जाता है ।
अध्यात्मेत्ताओं ने यंत्र के अभिप्राय को स्पष्ट करते हुए कहा भी है-”जिससे पूजा की जाये, वह यंत्र है । तंत्र परम्परा में इसे देवता के द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा प्राप्त यंत्र शरीर के रूप में इसे देवता के रूप का प्रतीक है जिसकी उपस्थिति को वह मूर्तिमान करता है और जिसका कि मंत्र प्रतीक होता है ।” इस तरह यंत्र को देवता का शरीर कहते हैं और मंत्र को देवता की आत्मा ।
इसके द्वारा मन को केन्द्रिरत और नियंत्रित किया जाता है । कुलार्णव तंत्र के अनुसार-”यम और समस्त प्राणियों से तथा सब प्रकार के भयों से त्राण करने के कारण ही इसे ‘यंत्र’ कहा जाता है ।
यह काम, क्रोधादि दोषों के समस्त दुःखों को नियंत्रण करता है । इस पर पूजित देव तुरंत ही प्रसन्न हो जाते हैं । सुप्रसिद्ध पाश्चात्य मनीषी सर जॉन वुडरफ ने भी अपने कृति ”प्रिसिपल्स ऑफ तंत्र” में लिखा है कि इसका नाम ‘यंत्र’ इसलिए पड़ा कि यह काम, क्रोध व दूसरे मनोविकारों एवं उनके दोषों को नियंत्रित करता है ।
यंत्र-साधना का उद्देश्य ब्रह्म की एकता सिद्धि प्राप्त करना है । यंत्र द्वारा इस अंतिम लक्ष्य तक पहुँचने के लिए विभिन्न प्रकार की साधनायें करनी पड़ती है । इनका संकेत सूत्र यंत्र के विभिन्न अंगों से परिलक्षित होता है । उनका चिंतन, मनन, करना होता है । विकार परिष्कृत एवं भावसाधना से ही उत्कर्ष होता है । यंत्र के बीच में बिन्दू होता है, जो गतिशीलता का, प्रतीक है । शरीर और ब्रह्माण्ड का प्रत्येक परमाणु अपनी धुरी पर तीव्रतम गति से सतत चक्कर काट रहा है । यह सर्वव्यापक है । अतः हमें भी उन्नति के मार्ग पर संतुष्ट नहीं रहना है, वरन हर क्षण आगे बढ़ने के लिए तत्पर और गतिशील हो सकते हैं । बिन्दु आकाशतत्व का प्रतिनिधित्व करता है क्योंकि इसमें अनुप्रवेश भाव रहता है जो आकाश का गुण है । बिन्दु यंत्र का आदि और अंत भी होता है । अतः यह उस परात्पर परम चेतन का प्रतीक है जो सबसे परे है, जहाँ शिव और शक्ति एक हो जाते हैं ।
वस्तुतः प्रत्येक यंत्र शिव और शक्ति की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति कराने वाला एक अमूर्त ज्यामितीय संरचना होता है । इसमें उलटा त्रिकोण ‘शक्ति’ का और सीधा त्रिकोण ‘शिव’ का प्रतीक माना जाता है । एक-दूसरे को काटते हुए उलटे और सीधे त्रिकोणों से ही यंत्र विनिर्मित होता है ।
त्रिभुज का शीषकोण-(वर्टिकल-एंगल) जब ऊपर की ओर बना होता है तो यह अग्निशिखा का प्रतीक माना जाता है जो उन्नति का ऊपर उठने का भाव प्रदर्शित करता है । जब यह शीर्षकोण नीचे की ओर होता है तो जल-तत्त्व का द्योतक माना जाता है, क्योंकि नीचे की ओर प्रवाहित होना ही जल का स्वभाव है । यंत्र में त्रिकोणों के चारों ओर गोलाकार वृत-सर्किल बनाये जाते हैं जिसे पूर्णता का और खगोल का प्रतीक कहा जा सकता है । इसे वायु का द्योतक भी माना जाता है, क्योंकि वृत में वृत्ताकार गति के लक्षण पाये जाते हैं । जब एक बिन्दू दूसरे के चारों ओर चक्कर लगाता है तो वृत बनता है वायु भी यही करती है और जिसके साथ संपर्क में आती है, उसे घुमाने लगती है । अग्नि और जल के साथ यही स्थिति रहती है । यंत्र में इस गोलाकार वृत के सबसे बाहर जो चार ‘द्वार’ वाला चतुष्कोण या चतुर्भुज बना होता है, उसे ‘भूपुर’ कहते हैं । इसमें बहुमुखता का भाव है । यह पृथ्वी का, भौतिकता का और विश्व-नगर का प्रतीक माना जाता है । किसी भी दशा में इसके चारों द्वारों को पार करके ही साधक मध्य में स्थित उस महाबिन्दू तक पहुँच सकता है जहाँ परम सत्य स्थित है । यह बिन्दु यंत्र के बीच में रहता है और यह अंतिम लक्ष्य माना जाता है । वहीं ईश्वर के दर्शन होते हैं और एकता सधती है ।
आगम ग्रंथों के अनुसार यंत्रों में चौदह प्रकार की शक्तियाँ अंतर्निहित होती हैं और प्रत्येक इन्हीं में से किसी न किसी शक्ति के अधीन रहते हैं । इन्हीं शक्तियों के आधार पर यंत्रों की रेखायें और कोष्ठकों को निर्माण होता है ।
इन यंत्रों में २६ तत्त्वों का समावेश होता है, जिनमें पंचमहाभूत, पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, पंचर्कमेन्दि्रयाँ और पांच इनके विषय-रूप रस, गंध आदि तन्मात्रयें, मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति पुरुष, कला, अविद्या, राग, काल, नियति, माया, विद्या, ईश्वर, शिव, शक्ति आदि आते हैं ।
जिस तरह मंत्रों में बीजाधार होते हैं, उसी तरह यंत्रों में भी १ से लेकर २६ तक की संख्या बीज संख्या मानी गयी है । ये बीज संख्यायें चौदह शक्तियों पर आधारित होकर २६ तत्वों के भावों को भिन्न-भिन्न प्रकट कर रेखाओं, कोष्ठकों के आकार-प्रकार और बीजाक्षरों के अधिष्ठाता देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करती हुई उन देव शक्तियों को स्थान विशेष पर प्रकट कर मानव संकल्प की सिद्धि प्रदान करती हैं । इन्हीं २६ तत्वों के अंतर्गत पृथ्वी जल, वायु, अग्नि आदि जो २५ वर्ण बीजों से संबंध रखते हैं ।
यंत्र विज्ञान में १,९ तथा शून्य (()की संख्या अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है । जिस प्रकार एकाक्षरी बीज मंत्रों के अनेक अर्थ होते हैं उसी तरह प्रत्येक संख्या बीज भी अनेक अर्थों वाले होते हैं । ये अंकबीज विभिन्न प्रकृति के मनुष्यों के ऊपर प्रभाव डालने की अपार शक्ति रखते हैं ।
मीमांसाशास्त्र में कहा गया है कि देवताओं की कोई अलग मूर्ति नहीं होती । ये मंत्र मूर्ति होते हंअ । वे यंत्रों में आवद्ध रहते हैं और उन पर अंकित अंकों एवं शब्दों का जब लयबद्ध ढंग से भावपूर्ण जप किया जाता है तो उनसे एक विशिष्ट प्रकार की तरंगें उत्पन्न होती हैं जिसका प्रभाव उच्चारणकर्त्ता पर ही नहीं पड़ता, समूचे आकाश मंडल एवं ग्रह-नक्षत्रें पर भी पड़ता है ।
यंत्र शरीर में स्थित शक्ति केन्द्र को मंत्र एवं अंकों के शक्ति के सहकार से उद्यीप्त-उत्तेजित करता है । मानवी काया में अनेकों सूक्ष्म शक्ति केन्द्र हैं जिन्हें देवता की संज्ञा दी जा सकती है । यंत्र वस्तुतः इन्हीं विभिन्न शक्ति केन्द्रों के मानचित्र के समान हैं जिनकी साधना से साधक में तदनुरूप ही शक्तियों का विकास होता है और वह उत्तरोत्तर प्रगति करते हुए आत्मोकर्ष के चरमलक्ष्य तक जा पहुँचता है ।मंत्रों की तरह यंत्र भी बहुविध एवं संख्या में अनेकों हैं और उनका रचना विधान भी प्रयोजन के अनुसार कई प्रकार का होता है । तंत्रशास्त्रों में इस तरह के ९९० प्रकार के यंत्रों का वर्णन मिलता है जिनकी प्रतीकात्मकता की विशद व्याख्या भी की गयी है इनमें से कुछ यंत्रों को ‘दिव्य यंत्र’ कहा जाता है । ये स्वतः सिद्ध माने जाते हैं और दैवी शक्ति संपन्न होते हैं ।
उदाहरण के लिए बीसायंत्र, श्री यंत्र, पंचदशी यंत्र आदि की गणना दिव्य यंत्रोंमें की जाती है । इसमें ‘श्री यंत्र’ सबसे प्रसिद्ध है । इसकी उत्पति के संबंध में ‘योगिनीहृदय’ में कहा है कि ”जब परम्पराशक्ति अपने संकल्प बल से ही विश्व-ब्रह्मण्ड का रूप धारण करती है और अपने स्वरूप को निहारती है तभी ‘श्री यंत्र’ का आविर्भाव होता है ।”
‘श्री यंत्र’ आद्यशक्ति का बोधक है । इसका आकार ब्रह्मण्डांकार है जिसमें ब्राह्मण्ड की उत्पति और विकास का प्रदर्शन किया गया है । यह कई चक्रों में बँटा होता है जिनमें से प्रत्येक की अपने महिमा-महत्ता है ।
इस यंत्र के सबसे अंदर वाले वृत्त के केन्द्र में बिन्दू स्थित होता है जिसके चारों ओर नौ त्रिकोण बने होते हैं । इनमें से पाँच की नोंक ऊपर की ओर और चार की नीचे की ओर होती है । ऊपर की ओर नोंक वाले त्रिभुजों को भगवती का प्रतिनिधि माना जाता है और शिव युवती की संज्ञा दी जाती है । नीचे की ओर नोंक वाले शिव का प्रतिनिधित्व करते हैं । इन्हें ‘श्री कंठ’ कहते हैं ।
उर्ध्वमुखी पाँच त्रिकोण, पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्दि्रयाँ, पाँच कमेन्दि्रयाँ, पाँच तन्मात्रयें और पाँच महाभूतों के प्रतीक हैं । शरीर में यह अस्थि, माँस, त्वचा आदि के रूप में विद्यमान हैं । अधोमुखी चार त्रिकोण शरीर में जीव, प्राण, शुक्र और मज्ज् के प्रतीक हैं और ब्रह्मण्ड में मन, बुद्धि चित्त और अहंकार के प्रतीक हैं । ये सभी नौ त्रिकोण नौ मूल प्रकृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं । त्रिकोण के बाहर या पश्चात जो वृत्त होते हैं वे शक्ति के द्योतक हैं । इस यंत्र में पहले वाले वृत्त के बाहर एक आठ दल वाला कमल है तथा दूसरा सोलह दलों वाला कमल दूसरे वृत्त के बाहर है । सबसे बाहर चार द्वारों वाला ‘भूपुर’ है जो ब्रह्मण्ड की सीमा होने से शक्ति गति-क्षेत्र है । इस यंत्र में उर्ध्वमुखी त्रिकोण अग्नितत्व के, वृत्त वायु के, बिन्दु आकाश का और भूपुर पृथ्वी तत्वका प्रतीक माना जाता है । यह यंत्र सृष्टिक्रम का है । ”आनन्द लहरी” में आद्य शंकराचार्य ने इसका विस्तृत वर्णन किया है । वे स्वयं इसके उपासक थे । उनके हर मठ में यह यंत्र रहता है ।
योगिनी तंत्र में भी इसका वर्णन करते हुए कहा गया है कि आध्यात्मिक उन्नति के विशेष स्तर पहुँचने पर ही साधक इसकी पूजा का अधिकारी होता है । सिद्धयोगी अंतर पूजा में प्रवेश करते हुए यंत्र की पूजा से प्रारंभ करता है जो ब्रह्म विज्ञान को संकेत है ।
यंत्रों में बिन्दु, रेखा, त्रिकोण, वृत्त आदि ज्यामितीय विज्ञान का असाधारण प्रयोग होता है । इसकी महत्ता प्रदर्शित करते हुए प्रख्यात यूनानी तत्वज्ञ प्लेटो ने अपनी पाठशाला के बाह्मकक्ष पर यह घोषणा लिखवा दी थी कि जो विद्यार्थी ज्योमिती से अपरिचित हों वह इस पाठशाला में प्रवेश के लिए प्रयत्न न करें । आधुनिक विज्ञानवेत्ता-भी यंत्र रचना पर गंभीरतापूर्वक अनुसंधानरत हैं और उसकी मेटाफिजीकल पावर एवं अद्भूत स्थापत्य को देखकर आश्चर्यचकित हैं ।
मास्को विश्वविद्यालय रूस के मूर्धन्य भौतिकी विद् एवं गणितज्ञ डॉ. अलेक्सेई कुलाई-चेव ने प्राचीन भारतीय कर्मकाण्डीय आकृतियों विशेषकर ‘श्री यंत्र’ के बारे में गहन खोज की है और पाया है कि यह एक जटिल आकृति है जो वृत्त में अंतनिर्हित नौ त्रिभुजों से बनी है । उच्च बीज गणित, सांख्यिक-विश्लेषण, ज्यामिती एवं कम्प्यूटर आदि की मदद से ही वे इस आकृति को बनाने में सफल हुए ‍उनका कहना है कि विश्व प्रपंच से संबंधित तंत्र की धारणायें बहुत कुछ विश्वोत्पति की ‘विग-बैग’ वाली वैज्ञानिक मान्यताओं तथा ‘तप्त विश्व’ के सिद्धान्तों से मिलती-जुलती हैं । यंत्र रचना का रहस्य वैज्ञानिक एवं गणितज्ञों के लिए अभी एक चुनौती बना हुआ है । यंत्रों के अर्थ, उद्देश्य एवं उनमें अंतनिर्हित प्रेरणाओं को यदि समझा और तदनुरूप साधना की जा सके तो सिद्धि अवश्य मिलती है, इनमें कोई संदेह नहीं…

31..योनिस्तोत्रम्

ॐभग-रूपा जगन्माता सृष्टि-स्थिति-लयान्विता ।

दशविद्या – स्वरूपात्मा योनिर्मां पातु सर्वदा ।।१।।

कोण-त्रय-युता देवि स्तुति-निन्दा-विवर्जिता ।

जगदानन्द-सम्भूता योनिर्मां पातु सर्वदा ।।२।।

कात्र्रिकी – कुन्तलं रूपं योन्युपरि सुशोभितम् ।

भुक्ति-मुक्ति-प्रदा योनि: योनिर्मां पातु सर्वदा ।।३।।

वीर्यरूपा शैलपुत्री मध्यस्थाने विराजिता ।

ब्रह्म-विष्णु-शिव श्रेष्ठा योनिर्मां पातु सर्वदा ।।४।।

योनिमध्ये महाकाली छिद्ररूपा सुशोभना ।

सुखदा मदनागारा योनिर्मां पातु सर्वदा ।।५।।

काल्यादि-योगिनी-देवी योनिकोणेषु संस्थिता ।

मनोहरा दुःख लभ्या योनिर्मां पातु सर्वदा ।।६।।

सदा शिवो मेरु-रूपो योनिमध्ये वसेत् सदा ।

वैâवल्यदा काममुक्ता योनिर्मां पातु सर्वदा ।।७।।

सर्व-देव स्तुता योनि सर्व-देव-प्रपूजिता ।

सर्व-प्रसवकत्र्री त्वं योनिर्मां पातु सर्वदा ।।८।।

सर्व-तीर्थ-मयी योनि: सर्व-पाप प्रणाशिनी ।

सर्वगेहे स्थिता योनि: योनिर्मां पातु सर्वदा ।।९।।

मुक्तिदा धनदा देवी सुखदा कीर्तिदा तथा ।

आरोग्यदा वीर-रता पञ्च-तत्व-युता सदा ।।१०।।

योनिस्तोत्रमिदं प्रोत्तंâ य: पठेत् योनि-सन्निधौ ।

शक्तिरूपा महादेवी तस्य गेहे सदा स्थिता ।।११।

 

 

 

 

 

 

 

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