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क्या हैं बंधन और उनके उपाय?
बंधन अर्थात् बांधना। जिस प्रकार रस्सी से बांध देने से व्यक्ति असहाय हो कर कुछ कर नहीं पाता, उसी प्रकार किसी व्यक्ति, घर, परिवार, व्यापार आदि को तंत्र-मंत्र आदि द्वारा अदृश्य रूप से बांध दिया जाए तो उसकी प्रगति रुक जाती है और घर परिवार की सुख शांति बाधित हो जाती है। ये बंधन क्या हैं और इनसे मुक्ति कैसे पाई जा सकती है जानने केलिए पढ़िए यह आलेख…
मानव अति संवेदनशील प्राणी है। प्रकृति और भगवान हर कदम पर हमारी मदद करते हैं। आवश्यकता हमें सजग रहने की है। हम अपनी दिनचर्या में अपने आस-पास होने वाली घटनाओं पर नजर रखें और मनन करें। यहां बंधन के कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं।
किसी के घर में ८-१० माह का छोटा बच्चा है। वह अपनी सहज बाल हरकतों से सारे परिवार का मन मोह रहा है। वह खुश है, किलकारियां मार रहा है। अचानक वह सुस्त या निढाल हो जाता है। उसकी हंसी बंद हो जाती है। वह बिना कारण के रोना शुरू कर देता है, दूध पीना छोड़ देता है। बस रोता और चिड़चिड़ाता ही रहता है। हमारे मन में अनायास ही प्रश्न आएगा कि ऐसा क्यों हुआ?
किसी व्यवसायी की फैक्ट्री या व्यापार बहुत अच्छा चल रहा है। लोग उसके व्यापार की तरक्की का उदाहरण देते हैं। अचानक उसके व्यापार में नित नई परेशानियां आने लगती हैं। मशीन और मजदूर की समस्या उत्पन्न हो जाती है। जो फैक्ट्री कल तक फायदे में थी, अचानक घाटे की स्थिति में आ जाती है। व्यवसायी की फैक्ट्री उसे कमा कर देने के स्थान पर उसे खाने लग गई। हम सोचेंगे ही कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
किसी परिवार का सबसे जिम्मेदार और समझदार व्यक्ति, जो उस परिवार का तारणहार है, समस्त परिवार की धुरी उस व्यक्ति के आस-पास ही घूम रही है, अचानक बिना किसी कारण के उखड़ जाता है। बिना कारण के घर में अनावश्यक कलह करना शुरू कर देता है। कल तक की उसकी सारी समझदारी और जिम्मेदारी पता नहीं कहां चली जाती है। वह परिवार की चिंता बन जाता है। आखिर ऐसा क्यों हो गया?
कोई परिवार संपन्न है। बच्चे ऐश्वर्यवान, विद्यावान व सर्वगुण संपन्न हैं। उनकीसज्जनता का उदाहरण सारा समाज देता है। बच्चे शादी के योग्य हो गए हैं, फिर भी उनकी शादी में अनावश्यक रुकावटें आने लगती हैं। ऐसा क्यों होता है?
आपके पड़ोस के एक परिवार में पति-पत्नी में अथाह प्रेम है। दोनों एक दूसरे के लिए पूर्ण समर्पित हैं। आपस में एक दूसरे का सम्मान करते हैं। अचानक उनमें कटुता व तनाव उत्पन्न हो जाता है। जो पति-पत्नी कल तक एक दूसरे के लिए पूर्ण सम्मान रखते थे, आज उनमें झगड़ा हो गया है। स्थिति तलाक की आ गई है। आखिर ऐसा क्यों हुआ?
हमारे घर के पास हरा भरा फल-फूलों से लदा पेड़ है। पक्षी उसमें चहचहा रहे हैं। इस वृक्ष से हमें अच्छी छाया और हवा मिल रही है। अचानक वह पेड़ बिना किसी कारण के जड़ से ही सूख जाता है। निश्चय ही हमें भय की अनुभूति होगी और मन में यह प्रश्न उठेगा कि ऐसा क्यों हुआ?
हमें अक्सर बहुत से ऐसे प्रसंग मिल जाएंगे जो हमारी और हमारे आसपास की व्यवस्था को झकझोर रहे होंगे, जिनमें क्यों” की स्थिति उत्पन्न होगी। विज्ञान ने एक नियम प्रतिपादित किया है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। हमें निश्चय ही मनन करना होगा कि उपर्युक्त घटनाएं जो हमारे आसपास घटित हो रही हैं, वे किन क्रियाओं की प्रतिक्रियाएं हैं? हमें यह भी मानना होगा कि विज्ञान की एक निश्चित सीमा है। अगर हम परावैज्ञानिक आधार पर इन घटनाओं को विस्तृत रूप से देखें तो हम निश्चय ही यह सोचने पर विवश होंगे कि कहीं यह बंधन या स्तंभन की परिणति तो नहीं है ! यह आवश्यक नहीं है कि यह किसी तांत्रिक अभिचार के कारण हो रहा हो। यह स्थिति हमारी कमजोर ग्रह स्थितियों व गण के कारण भी उत्पन्न हो जाया करती है। हम भिन्न श्रेणियों के अंतर्गत इसका विश्लेषण कर सकते हैं। इनके अलग-अलग लक्षण हैं। इन लक्षणों और उनके निवारण का संक्षेप में वर्णन यहां प्रस्तुत है।
कार्यक्षेत्र का बंधन, स्तंभन या रूकावटें
दुकान/फैक्ट्री/कार्यस्थल की बाधाओं के लक्षण
किसी दुकान या फैक्ट्री के मालिक का दुकान या फैक्ट्री में मन नहीं लगना।
ग्राहकों की संख्या में कमी आना।
आए हुए ग्राहकों से मालिक का अनावश्यक तर्क-वितर्क-कुतर्क और कलह करना।
श्रमिकों व मशीनरी से संबंधित परेशानियां।
मालिक को दुकान में अनावश्यक शारीरिक व मानसिक भारीपन रहना।
दुकान या फैक्ट्री जाने की इच्छा न करना।
तालेबंदी की नौबत आना।
दुकान ही मालिक को खाने लगे और अंत में दुकान बेचने पर भी नहीं बिके।
कार्यालय बंधन के लक्षण
कार्यालय बराबर नहीं जाना।
साथियों से अनावश्यक तकरार।
कार्यालय में मन नहीं लगना।
कार्यालय और घर के रास्ते में शरीर में भारीपन व दर्द की शिकायत होना।
कार्यालय में बिना गलती के भी अपमानित होना।
घर-परिवार में बाधा के लक्षण
परिवार में अशांति और कलह।
बनते काम का ऐन वक्त पर बिगड़ना।
आर्थिक परेशानियां।
योग्य और होनहार बच्चों के रिश्तों में अनावश्यक अड़चन।
विषय विशेष पर परिवार के सदस्यों का एकमत न होकर अन्य मुद्दों पर कुतर्क करके आपस में कलह कर विषय से भटक जाना।
परिवार का कोई न कोई सदस्य शारीरिक दर्द, अवसाद, चिड़चिड़ेपन एवं निराशा का शिकार रहता हो।
घर के मुख्य द्वार पर अनावश्यक गंदगी रहना।
इष्ट की अगरबत्तियां बीच में ही बुझ जाना।
भरपूर घी, तेल, बत्ती रहने के बाद भी इष्ट का दीपक बुझना या खंडित होना।
पूजा या खाने के समय घर में कलह की स्थिति बनना।
व्यक्ति विशेष का बंधन
हर कार्य में विफलता।
हर कदम पर अपमान।
दिल और दिमाग का काम नहीं करना।
घर में रहे तो बाहर की और बाहर रहे तो घर की सोचना।
शरीर में दर्द होना और दर्द खत्म होने के बाद गला सूखना।
हमें मानना होगा कि भगवान दयालु है। हम सोते हैं पर हमारा भगवान जागता रहता है। वह हमारी रक्षा करता है। जाग्रत अवस्था में तो वह उपर्युक्त लक्षणों द्वारा हमें बाधाओं आदि का ज्ञान करवाता ही है, निद्रावस्था में भी स्वप्न के माध्यम से संकेत प्रदान कर हमारी मदद करता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम होश व मानसिक संतुलन बनाए रखें। हम किसी भी प्रतिकूल स्थिति में अपने विवेक व अपने इष्ट की आस्था को न खोएं, क्योंकि विवेक से बड़ा कोई साथी और भगवान से बड़ा कोई मददगार नहीं है।

.क्या होता हें उतारा करना..
उतारा शब्द का तात्पर्य व्यक्ति विशेष पर हावी बुरी हवा अथवा बुरी आत्मा, नजर आदि के प्रभाव को उतारने से है। उतारे आमतौर पर मिठाइयों द्वारा किए जाते हैं, क्योंकि मिठाइयों की ओर ये श्ीाघ्र आकर्षित होते हैं।
उतारा करने की विधि :—-
उतारे की वस्तु सीधे हाथ में लेकर नजर दोष से पीड़ित व्यक्ति के सिर से पैर की ओर सात अथवा ग्यारह बार घुमाई जाती है। इससे वह बुरी आत्मा उस वस्तु में आ जाती है। उतारा की क्रिया करने के बाद वह वस्तु किसी चौराहे, निर्जन स्थान या पीपल के नीचे रख दी जाती है और व्यक्ति ठीक हो जाता है।
किस दिन किस मिठाई से उतारा करना चाहिए, इसका विवरण यहां प्रस्तुत है—–
रविवार को तबक अथवा सूखे फलयुक्त बर्फी से उतारा करना चाहिए।
सोमवार को बर्फी से उतारा करके बर्फी गाय को खिला दें।
मंगलवार को मोती चूर के लड्डू से उतार कर लड्डू कुत्ते को खिला दें।
बुधवार को इमरती से उतारा करें व उसे कुत्ते को खिला दें।
गुरुवार को सायं काल एक दोने में अथवा कागज पर पांच मिठाइयां रखकर उतारा करें। उतारे के बाद उसमें छोटी इलायची रखें व धूपबत्ती जलाकर किसी पीपल के वृक्ष के नीचे पश्चिम दिशा में रखकर घर वापस जाएं। ध्यान रहे, वापस जाते समय पीछे मुड़कर न देखें और घर आकर हाथ और पैर धोकर व कुल्ला करके ही अन्य कार्य करें।
शुक्रवार को मोती चूर के लड्डू से उतारा कर लड्डू कुत्ते को खिला दें या किसी चौराहे पर रख दें।
शनिवार को उतारा करना हो तो इमरती या बूंदी का लड्डू प्रयोग में लाएं व उतारे के बाद उसे कुत्ते को खिला दें।
इसके अतिरिक्त रविवार को सहदेई की जड़, तुलसी के आठ पत्ते और आठ काली मिर्च किसी कपड़े में बांधकर काले धागे से गले में बांधने से ऊपरी हवाएं सताना बंद कर देती हैं।
नजर उतारने अथवा उतारा आदि करने के लिए कपूर, बूंदी का लड्डू, इमरती, बर्फी, कड़वे तेल की रूई की बाती, जायफल, उबले चावल, बूरा, राई, नमक, काली सरसों, पीली सरसों मेहंदी, काले तिल, सिंदूर, रोली, हनुमान जी को चढ़ाए जाने वाले सिंदूर, नींबू, उबले अंडे, गुग्गुल, शराब, दही, फल, फूल, मिठाइयों, लाल मिर्च, झाडू, मोर छाल, लौंग, नीम के पत्तों की धूनी आदि का प्रयोग किया जाता है।
स्थायी व दीर्घकालीन लाभ के लिए संध्या के समय गायत्री मंत्र का जप और जप के दशांश का हवन करना चाहिए। हनुमान जी की नियमित रूप से उपासना, भगवान शिव की उपासना व उनके मूल मंत्र का जप, महामृत्युंजय मंत्र का जप, मां दुर्गा और मां काली की उपासना करें। स्नान के पश्चात् तांबे के लोटे से सूर्य को जल का अर्य दें। पूर्णमासी को सत्यनारायण की कथा स्वयं करें अथवा किसी कर्मकांडी ब्राह्मण से सुनें। संध्या के समय घर में दीपक जलाएं, प्रतिदिन गंगाजल छिड़कें और नियमित रूप से गुग्गुल की धूनी दें। प्रतिदिन शुद्ध आसन पर बैठकर सुंदर कांड का पाठ करें। किसी के द्वारा दिया गया सेव व केला न खाएं। रात्रि बारह से चार बजे के बीच कभी स्नान न करें।
बीमारी से मुक्ति के लिए नीबू से उतारा करके उसमें एक सुई आर-पार चुभो कर पूजा स्थल पर रख दें और सूखने पर फेंक दें। यदि रोग फिर भी दूर न हो, तो रोगी की चारपाई से एक बाण निकालकर रोगी के सिर से पैर तक छुआते हुए उसे सरसों के तेल में अच्छी तरह भिगोकर बराबर कर लें व लटकाकर जला दें और फिर राख पानी में बहा दें।
उतारा आदि करने के पश्चात भलीभांति कुल्ला अवश्य करें।
इस तरह, किसी व्यक्ति पर पड़ने वाली किसी अन्य व्यक्ति की नजर उसके जीवन को तबाह कर सकती है। नजर दोष का उक्त लक्षण दिखते ही ऊपर वर्णित सरल व सहज उपायों का प्रयोग कर उसे दोषमुक्त किया जा सकता है।

1….गृह बाधा शान्ति शाबर मन्त्र
यह मंत्र जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में साधक की रक्षा करता है । कोई भी व्यक्ति इसे सिद्ध करके स्वयं को
सुरक्षित कर सकता है । जिसने इसे सिद्ध कर लिया हो, ऐसा व्यक्ति कहीं भी जाए, उसको किसी प्रकार की शारीरिक हानि की आशंका नहीं रहेगी । केवल आततायी से सुरक्षा ही नहीं, बल्कि रोग-व्याधि से मुक्ति दिलाने में भी यह मंत्र अद्भुत प्रभाव दिखाता है । इसके अतिरिक्त किसी दूकान या मकान में प्रेत-बाधा, तांत्रिक-अभिचार प्रयोग, कुदृष्टि आदि कारणों से धन-धान्य, व्यवसाय आदि की वृद्धि न होकर सदैव हानिकारक स्थिति हो, ऐसी स्थिति में इस मंत्र का प्रयोग करने से उस द्थान के समस्त दोष-विघ्न और अभिशाप आदि दुष्प्रभाव समाप्त हो जाते हैं ।
मन्त्रः-
“ॐ नमो आदेश गुरु को। ईश्वर वाचा अजपी बजरी बाड़ा, बज्जरी में बज्जरी बाँधा दसौं दुवार छवा और के घालो तो पलट बीर उसी को मारे । पहली चौकी गणपति, दूजी चौकी हनुमन्त, तिजी चौकी भैंरो, चौथी चौकी देत रक्षा करन को आवे श्री नरसिंह देवजी । शब्द साँचा पिण्ड काँचा, ऐ वचन गुरु गोरखनाथ का जुगोही जुग साँचा, फुरै मन्त्र ईशवरी वाचा ।”
विधिः-
इस मंत्र को मंत्रोक्त किसी भी एक देवता के मंदिर में या उसकी प्रतिमा के सम्मुख देवता का पूजन कर २१ दिन तक प्रतिदिन १०८ बार जप कर सिद्ध करें ।
प्रयोगः-
साधक कहीं भी जाए, रात को सोते समय इस मंत्र को पढ़कर अपने आसन के चारों ओर रेखा खींच दे या जल की पतली धारा से रेखा बना ले, फिर उसके भीतर निश्चित होकर बैठे अथवा सोयें ।
रोग व्याधि में इस मंत्र को पढ़ते हुए रोगी के शरीर पर हाथ फेरा जाए तो मात्र सात बार यह क्रिया करने से ही तत्काल वह व्यक्ति व्याधि से मुक्त हो जाता है ।
घर में जितने द्वार हो उतनी लोहे की कील लें । जितने कमरे हों, प्रति कमरा दस ग्राम के हिसाब से साबुत काले उड़द लें । थोड़ा-सा सिन्दूर तेल या घी में मिलाकर कीलों पर लगा लें । कीलों और उड़द पर 7-7 बार अलग-अलग मंत्र पढ़कर फूंक मारकर अभिमंत्रित कर लें । व्याधि-ग्रस्त घर के प्रत्येक कमरे या दुकान में जाकर मंत्र पढ़कर उड़द के दाने सब कमरे के चारों कोनों में तथा आँगन में बिखेर दें और द्वार पर कीलें ठोक दें ।
बालक या किसी व्यक्ति को नजर लग जाए, तो उसको सामने बिठाकर मोरपंख या लोहे की छुरी से मंत्र को सात बार पढ़ते हुए रोगी को झाड़ना चाहिए । यह क्रिया तीन दिन तक सुबह-शाम दोनों समय करें ।

2…भगवती कालिका अर्थात काली के अनेक स्वरुप, अनेक मन्त्र तथा अनेक उपासना विधियां है। यथा-श्यामा, दक्षिणा कालिका (दक्षिण काली) गुह्म काली, भद्रकाली, महाकाली आदि । दशमहाविद्यान्तर्गत भगवती दक्षिणा काली (दक्षिण कालीका) की उपासना की जाती है।
दक्षिण कालिका के मन्त्र :- भगवती दक्षिण कालिका के अनेक मन्त्र है, जिसमें से कुछ इस प्रकार है।
(1) क्रीं,
(2) ॐ ह्रीं ह्रीं हुं हुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हुं हुं ह्रीं ह्रीं।
(3) ह्रीं ह्रीं हुं हुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं हुं हुं ह्रीं ह्रीं स्वाहा।
(4) नमः ऐं क्रीं क्रीं कालिकायै स्वाहा।
(5) नमः आं क्रां आं क्रों फट स्वाहा कालि कालिके हूं।
(6) क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हुं हुं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हुं हुं स्वाहा। इनमें से कीसी भी मन्त्र का जप किया जा सकता है।
पूजा -विधि :- दैनिक कृत्य स्नान-प्राणायम आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर, सामान्य पूजा-विधि से काली- यन्त्र का पूजन करें। तत्पश्चात ॠष्यादि- न्यास एंव करागन्यास करके भगवती का इस प्रकार ध्यान करें-
शवारुढां महाभीमां घोरदृंष्ट्रां वरप्रदाम्।
हास्य युक्तां त्रिनेत्रां च कपाल कर्तृकाकराम्।
मुक्त केशी ललजिह्वां पिबंती रुधिरं मुहु:।
चतुर्बाहूयुतां देवीं वराभयकरां स्मरेत्॥”
इसके उपरान्त मूल-मन्त्र द्वारा व्यापक-न्यास करके यथा विधि मुद्रा-प्रदर्शन पूर्वक पुनः ध्यान करना चाहिए।
पुरश्चरण : – कालिका मन्त्र के पुरश्चरण में दो लाख की संख्या में मन्त्र-जप किया है। कुछ मन्त्र केवल एक लाख की संख्या में भी जपे जाते है। जप का दशांश होम घृत द्वारा करना चाहिए । होम का दशांश तर्पण, तर्प्ण का दशांश अभिषेक तथा अभिषेक का दशांश ब्राह्मण – भोजन कराने का नियम है।
विशेष : -” दक्षिणा कालिका ” देवी के मन्त्र रात्रि के समय जप करने से शीघ्र सिद्धि प्रदान करते है। जप के पश्चात स्त्रोत, कवच, ह्रदय आदि उपलब्ध है, उनमें से चाहें जिनका पाठ करना चाहिए । वे सभी साधकों के लिए सिद्धिदायक है।

3….रोग नाशक देवी मन्त्र
“ॐ उं उमा-देवीभ्यां नमः”
‘Om um uma-devibhyaM namah’
इस मन्त्र से मस्तक-शूल (headache) तथा मज्जा-तन्तुओं (Nerve Fibres) की समस्त विकृतियाँ दूर होती है – ‘पागल-पन’(Insanity, Frenzy, Psychosis, Derangement, Dementia, Eccentricity)तथा ‘हिस्टीरिया’ (hysteria) पर भी इसका प्रभाव पड़ता है ।

“ॐ यं यम-घण्टाभ्यां नमः”
‘Om yaM yam-ghantabhyaM namah’
इस मन्त्र से ‘नासिका’ (Nose) के विकार दूर होते हैं ।

“ॐ शां शांखिनीभ्यां नमः”
‘Om shaM shankhinibhyaM namah”
इस मन्त्र से आँखों के विकार (Eyes disease) दूर होते हैं । सूर्योदय से पूर्व इस मन्त्र से अभिमन्त्रित रक्त-पुष्प से आँख झाड़ने से ‘फूला’ आदि विकार नष्ट होते हैं ।

“ॐ द्वां द्वार-वासिनीभ्यां नमः”
‘Om dwaM dwar-vasineebhyaM namah’
इस मन्त्र से समस्त ‘कर्ण-विकार’ (Ear disease) दूर होते हैं ।

“ॐ चिं चित्र-घण्टाभ्यां नमः”
‘Om chiM chitra-ghantabhyaM namah’
इस मन्त्र से ‘कण्ठमाला’ तथा कण्ठ-गत विकार दूर होते हैं ।

“ॐ सं सर्व-मंगलाभ्यां नमः”
‘Om saM sarva-mangalabhyaM namah’
इस मन्त्र से जिह्वा-विकार (tongue disorder) दूर होते हैं । तुतलाकर बोलने वालों (Lisper) या हकलाने वालों (stammering) के लिए यह मन्त्र बहुत लाभदायक है ।

“ॐ धं धनुर्धारिभ्यां नमः”
‘Om dhaM dhanurdharibhyaM namah’
इस मन्त्र से पीठ की रीढ़ (Spinal) के विकार (backache) दूर होते है । This is also useful for Tetanus.

“ॐ मं महा-देवीभ्यां नमः”
‘Om mM mahadevibhyaM namah’
इस मन्त्र से माताओं के स्तन विकार अच्छे होते हैं । कागज पर लिखकर बालक के गले में बाँधने से नजर, चिड़चिड़ापन आदि दोष-विकार दूर होते हैं ।

“ॐ शों शोक-विनाशिनीभ्यां नमः”
‘Om ShoM Shok-vinashineebhyaM namah’
इस मन्त्र से समस्त मानसिक व्याधियाँ नष्ट होती है । ‘मृत्यु-भय’ दूर होता है । पति-पत्नी का कलह-विग्रह रुकता है । इस मन्त्र को साध्य के नाम के साथ मंगलवार के दिन अनार की कलम से रक्त-चन्दन से भोज-पत्र पर लिखकर, शहद में डुबो कर रखे । मन्त्र के साथ जिसका नाम लिखा होगा, उसका क्रोध शान्त होगा ।

“ॐ लं ललिता-देवीभ्यां नमः”
‘Om laM lalita-devibhyaM namah’
इस मन्त्र से हृदय-विकार (Heart disease) दूर होते हैं ।

“ॐ शूं शूल-वारिणीभ्यां नमः”
‘Om shooM shool-vaarineebhyaM namah’
इस मन्त्र से ‘उदरस्थ व्याधियों’ (Abdominal) पर नियन्त्रण होता है । प्रसव-वेदना के समय भी मन्त्र को उपयोग में लिया जा सकता है ।

“ॐ कां काल-रात्रीभ्यां नमः”
‘Om kaaM kaal-raatribhyaM namah’
इस मन्त्र से आँतों (Intestine) के समस्त विकार दूर होते हैं । विशेषतः ‘अक्सर’, ‘आमांश’ आदि विकार पर यह लाभकारी है ।

“ॐ वं वज्र-हस्ताभ्यां नमः”
‘Om vaM vajra-hastabhyaM namah’
इस मन्त्र से समस्त ‘वायु-विकार’ दूर होते हैं । ‘ब्लड-प्रेशर’ के रोगी के रोगी इसका उपयोग करें ।

“ॐ कौं कौमारीभ्यां नमः”
‘Om kauM kaumareebhyaM namah’
इस मन्त्र से दन्त-विकार (Teeth disease) दूर होते हैं । बच्चों के दाँत निकलने के समय यह मन्त्र लाभकारी है ।

“ॐ गुं गुह्येश्वरी नमः”
‘Om guM guhyeshvari namah’
इस मन्त्र से गुप्त-विकार दूर होते हैं । शौच-शुद्धि से पूर्व, बवासीर के रोगी १०८ बार इस मन्त्र का जप करें । सभी प्रकार के प्रमेह – विकार भी इस मन्त्र से अच्छे होते हैं ।

“ॐ पां पार्वतीभ्यां नमः”
‘Om paaM paarvatibhyaM namah’
इस मन्त्र से ‘रक्त-मज्जा-अस्थि-गत विकार’ दूर होते हैं । कुष्ठ-रोगी इस मन्त्र का प्रयोग करें ।

“ॐ मुं मुकुटेश्वरीभ्यां नमः”
‘Om muM mukuteshvareebhyaM namah’
इस मन्त्र से पित्त-विकार दूर होते हैं । अम्ल-पित्त के रोगी इस मन्त्र का उपयोग करें ।

“ॐ पं पद्मावतीभ्यां नमः”
‘Om paM padmavateebhyaM namah’
इस मन्त्र से कफज व्याधियों पर नियन्त्रण होता है ।
विधिः- उपर्युक्त मन्त्रों को सर्व-प्रथम किसी पर्व-काल में १००८ बार जप कर सिद्ध कर लेना चाहिये । फिर प्रतिदिन जब तक विकार रहे, १०८ बार जप करें अथवा सुविधानुसार अधिक-से-अधिक जप करें । विकार दूर होने पर ‘कुमारी-पूजन, ब्राह्मण-भोजन आदि करें ।

4…श्री त्रिपुर भैरवी कवचम्

।। श्रीपार्वत्युवाच ।।
देव-देव महा-देव, सर्व-शास्त्र-विशारद ! कृपां कुरु जगन्नाथ ! धर्मज्ञोऽसि महा-मते ! ।
भैरवी या पुरा प्रोक्ता, विद्या त्रिपुर-पूर्विका । तस्यास्तु कवचं दिव्यं, मह्यं कफय तत्त्वतः ।
तस्यास्तु वचनं श्रुत्वा, जगाद् जगदीश्वरः । अद्भुतं कवचं देव्या, भैरव्या दिव्य-रुपि वै ।

।। ईश्वर उवाच ।।
कथयामि महा-विद्या-कवचं सर्व-दुर्लभम् । श्रृणुष्व त्वं च विधिना, श्रुत्वा गोप्यं तवापि तत् ।
यस्याः प्रसादात् सकलं, बिभर्मि भुवन-त्रयम् । यस्याः सर्वं समुत्पन्नं, यस्यामद्यादि तिष्ठति ।
माता-पिता जगद्-धन्या, जगद्-ब्रह्म-स्वरुपिणी । सिद्धिदात्री च सिद्धास्या, ह्यसिद्धा दुष्टजन्तुषु ।
सर्व-भूत-प्रियङ्करी, सर्व-भूत-स्वरुपिणी । ककारी पातु मां देवी, कामिनी काम-दायिनी ।
एकारी पातु मां देवी, मूलाधार-स्वरुपिणी । ईकारी पातु मां देवी, भूरि-सर्व-सुख-प्रदा ।
लकारी पातु मां देवी, इन्द्राणी-वर-वल्लभा । ह्रीं-कारी पातु मां देवी, सर्वदा शम्भु-सु्न्दरी ।
एतैर्वर्णैर्महा-माया, शाम्भवी पातु मस्तकम् । ककारे पातु मां देवी, शर्वाणी हर-गेहिनी ।
मकारे पातु मां देवी, सर्व-पाप-प्रणाशिनी । ककारे पातु मां देवी, काम-रुप-धरा सदा ।
ककारे पातु मां देवी, शम्बरारि-प्रिया सदा । पकारे पातु मां देवी, धरा-धरणि-रुप-धृक् ।
ह्रीं-कारी पातु मां देवी, अकारार्द्ध-शरीरिणी । एतैर्वर्णैर्महा-माया, काम-राहु-प्रियाऽवतु ।
मकारः पातु मां देवी ! सावित्री सर्व-दायिनी । ककारः पातु सर्वत्र, कलाम्बर-स्वरुपिणी ।
लकारः पातु मां देवी, लक्ष्मीः सर्व-सुलक्षणा । ह्रीं पातु मां तु सर्वत्र, देवी त्रि-भुवनेश्वरी ।
एतैर्वर्णैर्महा-माया, पातु शक्ति-स्वरुपिणी । वाग्-भवं मस्तकं पातु, वदनं काम-राजिका ।
शक्ति-स्वरुपिणी पातु, हृदयं यन्त्र-सिद्धिदा । सुन्दरी सर्वदा पातु, सुन्दरी परि-रक्षतु ।
रक्त-वर्णा सदा पातु, सुन्दरी सर्व-दायिनी । नानालङ्कार-संयुक्ता, सुन्दरी पातु सर्वदा ।
सर्वाङ्ग-सुन्दरी पातु, सर्वत्र शिव-दायिनी । जगदाह्लाद-जननी, शम्भु-रुपा च मां सदा ।
सर्व-मन्त्र-मयी पातु, सर्व-सौभाग्य-दायिनी । सर्व-लक्ष्मी-मयी देवी, परमानन्द-दायिनी ।
पातु मां सर्वदा देवी, नाना-शङ्ख-निधिः शिवा । पातु पद्म-निधिर्देवी, सर्वदा शिव-दायिनी ।
दक्षिणामूर्तिर्मां पातु, ऋषिः सर्वत्र मस्तके । पंक्तिशऽछन्दः-स्वरुपा तु, मुखे पातु सुरेश्वरी ।
गन्धाष्टकात्मिका पातु, हृदयं शाङ्करी सदा । सर्व-सम्मोहिनी पातु, पातु संक्षोभिणी सदा ।
सर्व-सिद्धि-प्रदा पातु, सर्वाकर्षण-कारिणी । क्षोभिणी सर्वदा पातु, वशिनी सर्वदाऽवतु ।
आकर्षणी सदा पातु, सम्मोहिनी सर्वदाऽवतु । रतिर्देवी सदा पातु, भगाङ्गा सर्वदाऽवतु ।
माहेश्वरी सदा पातु, कौमारी सदाऽवतु । सर्वाह्लादन-करी मां, पातु सर्व-वशङ्करी ।
क्षेमङ्करी सदा पातु, सर्वाङ्ग-सुन्दरी तथा । सर्वाङ्ग-युवतिः सर्वं, सर्व-सौभाग्य-दायिनी ।
वाग्-देवी सर्वदा पातु, वाणिनी सर्वदाऽवतु । वशिनी सर्वदा पातु, महा-सिद्धि-प्रदा सदा ।
सर्व-विद्राविणी पातु, गण-नाथः सदाऽवतु । दुर्गा देवी सदा पातु, वटुकः सर्वदाऽवतु ।
क्षेत्र-पालः सदा पातु, पातु चावीर-शान्तिका । अनन्तः सर्वदा पातु, वराहः सर्वदाऽवतु ।
पृथिवी सर्वदा पातु, स्वर्ण-सिंहासनं तथा । रक्तामृतं च सततं, पातु मां सर्व-कालतः ।
सुरार्णवः सदा पातु, कल्प-वृक्षः सदाऽवतु । श्वेतच्छत्रं सदा पातु, रक्त-दीपः सदाऽवतु ।
नन्दनोद्यानं सततं, पातु मां सर्व-सिद्धये । दिक्-पालाः सर्वदा पान्तु, द्वन्द्वौघाः सकलास्तथा ।
वाहनानि सदा पान्तु, अस्त्राणि पान्तु सर्वदा । शस्त्राणि सर्वदा पान्तु, योगिन्यः पान्तु सर्वदा ।
सिद्धा सदा देवी, सर्व-सिद्धि-प्रदाऽवतु । सर्वाङ्ग-सुन्दरी देवी, सर्वदा पातु मां तथा ।
आनन्द-रुपिणी देवी, चित्-स्वरुपां चिदात्मिका । सर्वदा सुन्दरी पातु, सुन्दरी भव-सुन्दरी ।
पृथग् देवालये घोरे, सङ्कटे दुर्गमे गिरौ । अरण्ये प्रान्तरे वाऽपि, पातु मां सुन्दरी सदा ।

।। फल-श्रुति ।।
इदं कवचमित्युक्तो, मन्त्रोद्धारश्च पार्वति ! य पठेत् प्रयतो भूत्वा, त्रि-सन्ध्यं नियतः शुचिः ।
तस्य सर्वार्थ-सिद्धिः स्याद्, यद्यन्मनसि वर्तते । गोरोचना-कुंकुमेन, रक्त-चन्दनेन वा ।
स्वयम्भू-कुसुमैः शुक्लैर्भूमि-पुत्रे शनौ सुरै । श्मशाने प्रान्तरे वाऽपि, शून्यागारे शिवालये ।
स्व-शक्त्या गुरुणा मन्त्रं, पूजयित्वा कुमारिकाः । तन्मनुं पूजयित्वा च, गुरु-पंक्तिं तथैव च ।
देव्यै बलिं निवेद्याथ, नर-मार्जार-शूकरैः । नकुलैर्महिषैर्मेषैः, पूजयित्वा विधानतः ।
धृत्वा सुवर्ण-मध्यस्थं, कण्ठे वा दक्षिणे भुजे । सु-तिथौ शुभ-नक्षत्रे, सूर्यस्योदयने तथा ।
धारयित्वा च कवचं, सर्व-सिद्धिं लभेन्नरः ।
कवचस्य च माहात्म्यं, नाहं वर्ष-शतैरपि । शक्नोमि तु महेशानि ! वक्तुं तस्य फलं तु यत् ।
न दुर्भिक्ष-फलं तत्र, न चापि पीडनं तथा । सर्व-विघ्न-प्रशमनं, सर्व-व्याधि-विनाशनम् ।
सर्व-रक्षा-करं जन्तोः, चतुर्वर्ग-फल-प्रदम्, मन्त्रं प्राप्य विधानेन, पूजयेत् सततः सुधीः ।
तत्रापि दुर्लभं मन्ये, कवचं देव-रुपिणम् ।
गुरोः प्रसादमासाद्य, विद्यां प्राप्य सुगोपिताम् । तत्रापि कवचं दिव्यं, दुर्लभं भुवन-त्रयेऽपि ।
श्लोकं वास्तवमेकं वा, यः पठेत् प्रयतः शुचिः । तस्य सर्वार्थ-सिद्धिः, स्याच्छङ्करेण प्रभाषितम् ।
गुरुर्देवो हरः साक्षात्, पत्नी तस्य च पार्वती । अभेदेन यजेद् यस्तु, तस्य सिद्धिरदूरतः ।

।। इति श्री रुद्र-यामले भैरव-भैरवी-सम्वादे-श्रीत्रिपुर-भैरवी-कवचं सम्पूर्णम् ।।

5….हनुमान रक्षा-शाबर मन्त्र
“ॐ गर्जन्तां घोरन्तां, इतनी छिन कहाँ लगाई ? साँझ क वेला, लौंग-सुपारी-पान-फूल-इलायची-धूप-दीप-रोट॒लँगोट-फल-फलाहार मो पै माँगै। अञ्जनी-पुत्र प्रताप-रक्षा-कारण वेगि चलो। लोहे की गदा कील, चं चं गटका चक कील, बावन भैरो कील, मरी कील, मसान कील, प्रेत-ब्रह्म-राक्षस कील, दानव कील, नाग कील, साढ़ बारह ताप कील, तिजारी कील, छल कील, छिद कील, डाकनी कील, साकनी कील, दुष्ट कील, मुष्ट कील, तन कील, काल-भैरो कील, मन्त्र कील, कामरु देश के दोनों दरवाजा कील, बावन वीर कील, चौंसठ जोगिनी कील, मारते क हाथ कील, देखते क नयन कील, बोलते क जिह्वा कील, स्वर्ग कील, पाताल कील, पृथ्वी कील, तारा कील, कील बे कील, नहीं तो अञ्जनी माई की दोहाई फिरती रहे। जो करै वज्र की घात, उलटे वज्र उसी पै परै। छात फार के मरै। ॐ खं-खं-खं जं-जं-जं वं-वं-वं रं-रं-रं लं-लं-लं टं-टं-टं मं-मं-मं। महा रुद्राय नमः। अञ्जनी-पुत्राय नमः। हनुमताय नमः। वायु-पुत्राय नमः। राम-दूताय नमः।”
विधिः- अत्यन्त लाभ-दायक अनुभूत मन्त्र है। १००० पाठ करने से सिद्ध होता है। अधिक कष्ट हो, तो हनुमानजी का फोटो टाँगकर, ध्यान लगाकर लाल फूल और गुग्गूल की आहुति दें। लाल लँगोट, फल, मिठाई, ५ लौंग, ५ इलायची, १ सुपारी चढ़ा कर पाठ करें।

6…..गोरख शाबर गायत्री मन्त्र
“ॐ गुरुजी, सत नमः आदेश। गुरुजी को आदेश। ॐकारे शिव-रुपी, मध्याह्ने हंस-रुपी, सन्ध्यायां साधु-रुपी। हंस, परमहंस दो अक्षर। गुरु तो गोरक्ष, काया तो गायत्री। ॐ ब्रह्म, सोऽहं शक्ति, शून्य माता, अवगत पिता, विहंगम जात, अभय पन्थ, सूक्ष्म-वेद, असंख्य शाखा, अनन्त प्रवर, निरञ्जन गोत्र, त्रिकुटी क्षेत्र, जुगति जोग, जल-स्वरुप रुद्र-वर्ण। सर्व-देव ध्यायते। आए श्री शम्भु-जति गुरु गोरखनाथ। ॐ सोऽहं तत्पुरुषाय विद्महे शिव गोरक्षाय धीमहि तन्नो गोरक्षः प्रचोदयात्। ॐ इतना गोरख-गायत्री-जाप सम्पूर्ण भया। गंगा गोदावरी त्र्यम्बक-क्षेत्र कोलाञ्चल अनुपान शिला पर सिद्धासन बैठ। नव-नाथ, चौरासी सिद्ध, अनन्त-कोटि-सिद्ध-मध्ये श्री शम्भु-जति गुरु गोरखनाथजी कथ पढ़, जप के सुनाया। सिद्धो गुरुवरो, आदेश-आदेश।।”

साधन-विधि एवं प्रयोग
प्रतिदिन गोरखनाथ जी की प्रतिमा का पंचोपचार से पूजनकर २१, २७, ५१ या १०८ जप करें। नित्य जप से भगवान् गोरखनाथ की कृपा मिलती है, जिससे साधक और उसका परिवार सदा सुखी रहता है। बाधाएँ स्वतः दूर हो जाती है। सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है और अन्त में परम पद प्राप्त होता है।

दुर्गा शाबर मन्त्र
“ॐ ह्रीं श्रीं चामुण्डा सिंह-वाहिनी। बीस-हस्ती भगवती, रत्न-मण्डित सोनन की माल। उत्तर-पथ में आप बैठी, हाथ सिद्ध वाचा ऋद्धि-सिद्धि। धन-धान्य देहि देहि, कुरु कुरु स्वाहा।”
विधिः- उक्त मन्त्र का सवा लाख जप कर सिद्ध कर लें। फिर आवश्यकतानुसार श्रद्धा से एक माला जप करने से सभी कार्य सिद्ध होते हैं। लक्ष्मी प्राप्त होती है, नौकरी में उन्नति और व्यवसाय में वृद्धि होती है।

लक्ष्मी शाबर मन्त्र
“विष्णु-प्रिया लक्ष्मी, शिव-प्रिया सती से प्रकट हुई। कामाक्षा भगवती आदि-शक्ति, युगल मूर्ति अपार, दोनों की प्रीति अमर, जाने संसार। दुहाई कामाक्षा की। आय बढ़ा व्यय घटा। दया कर माई। ॐ नमः विष्णु-प्रियाय। ॐ नमः शिव-प्रियाय। ॐ नमः कामाक्षाय। ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं फट् स्वाहा।”
विधिः- धूप-दीप-नैवेद्य से पूजा कर सवा लक्ष जप करें। लक्ष्मी आगमन एवं चमत्कार प्रत्यक्ष दिखाई देगा। रुके कार्य होंगे। लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी।

7…….श्रीललिता-महा-लक्ष्म्याः स्तोत्रम्
वैष्णव-सम्प्रदाय के प्रसिद्ध ग्रन्थ “लक्ष्मी-नारायण-संहिता” से उद्धृत निम्न स्तोत्र शक्ति-साधना से सम्बन्धित है । वैष्णव ग्रन्थ होने के कारण इनकी साधना-प्रणाली ‘वैष्णवाचार’-परक है ।
।। श्री नारायणी श्रीरुवाच ।।
ललिताख्य-महा-लक्ष्म्या, नामान्यसंख्यानि वै । तथाप्यष्टोत्तर-शतं, स-पादं श्रावय प्रभो ! ।।
हे प्रभो ! ललिता महा-लक्ष्मी के असंख्य नाम हैं । तथापि उनके एक सौ पैंतीस नामों को सुनाइए ।
।। श्री पुरुषोत्तमोवाच ।।
मुख्य-नाम्नां प्रपाठेन, फलं सर्वाभिधानकम् । भवेदेवेति मुख्यानि, तत्र वक्ष्यामि संश्रृणु ।।
ललिता श्री महा-लक्ष्मीर्लक्ष्मी रमा च पद्मिनी । कमला सम्पदीशा च, पद्मालयेन्दिरेश्वरी ।।
परमेशी सती ब्राह्मी, नारायणी च वैष्णवी । परमेश्वरी महेशानी, शक्तीशा पुरुषोत्तमी ।।
बिम्बी माया महा-माया, मूल-प्रकृतिरच्युती । वासुदेवी हिरण्या च हरिणी च हिरण्मयी ।।
कार्ष्णी कामेश्वरी चापि कामाक्षी भगमालिनी । वह्निवासा सुन्दरी च संविच्च विजया जया ।।
मंगला मोहिनी तापी वाराही सिद्धिरीशिता । भुक्तिः कौमारिकी बुद्धिश्चामृता दुःखहा प्रसूः ।।
सुभाग्यानन्दिनी संपद्, विमला विंद्विकाभिधा । माता मूर्तिर्योगिनी च, चक्रिकार्चा रतिधृती ।।
श्यामा मनोरमा प्रीतिः ऋद्धिः छाया च पूर्णिमा । तुष्टिः प्रज्ञा पद्मावती दुर्गा लीला च माणिकी ।।
उद्यमा भारती विश्वा, विभूतिर्विनता शुभा । कीर्तिः क्रिया च कल्याणी विद्या कला च कुंकुमा ।।
पुण्या पुराणा वागीशी, वरदा विभवात्मिनी । सरस्वती शिवा नादा, प्रतिष्ठा संस्कृता त्रयी ।।
आयुर्जीवा स्वर्ण-रेखा, दक्षा वीरा च रागिनी । चपला पंडिता काली, भद्राम्बिका च मानिनी ।।
विशालाक्षी वल्लभा च गोपी नारी नारायणी । संतुष्टा च सुषुम्ना च, क्षमा धात्री च वारुणी ।।
गुर्वी साध्वी च गायत्री, दक्षिणा चान्नपूर्णिका । राजलक्ष्मीः सिद्धमाता माधवी भार्गवी परो ।।
हारिती राशियानी च, प्राचीनी गौरिका श्रुतिः ।
।। फल-श्रुति ।।
इत्यष्टोत्तर-शतकं, सप्त-विंशतिरित्यपि । ललिता-मुख्य-नामानि, कथितानि तव प्रिये !
नित्यं यः पठते तस्य, भुक्तिर्मुक्तिः कर-स्थिता । स्मृद्धिर्वंशस्य विस्तारः, सर्वानन्दा भवन्ति वै ।।
हे प्रिये ! ललिता के मुख्य एक सौ आठ और सत्ताइस नाम तुमसे कहे हैं । जो नित्य इन नामों को पढ़ता है, उसके कुल की सम्पन्नता बढ़ती है, सभी प्रकार के सुख मिलते हैं और भोग-मोक्ष उसके हाथ में रहते हैं अर्थात् साधक सभी भोगों को भोगकर अन्त में मोक्ष पाता है ।

8……गुरु गोरखनाथ का सरभंगा (जञ्जीरा) मन्त्र
“ॐ गुरुजी में सरभंगी सबका संगी, दूध-मास का इक-रणगी, अमर में एक तमर दरसे, तमर में एक झाँई, झाँई में परछाई दरसे, वहाँ दरसे मेरा साँई। मूल चक्र सर-भंग आसन, कुण सर-भंग से न्यारा है, वाँहि मेरा श्याम विराजे। ब्रह्म तन्त से न्यारा है, औघड़ का चेला-फिरुँ अकेला, कभी न शीश नावाऊँगा, पुत्र-पूर परत्रन्तर पूरुँ, ना कोई भ्रान्त ल्लावूँगा, अजर-बजर का गोला गेरूँ परवत पहाड़ उठाऊँगा, नाभी डंका करो सनेवा, राखो पूर्ण बरसता मेवा, जोगी जुग से न्यारा है, जुग से कुदरत है न्यारी, सिद्धाँ की मुँछयाँ पकड़ो, गाड़ देओ धरणी माँही, बावन भैरुँ, चौंसठ जोगन, उलटा चक्र चलावे वाणी, पेडू में अटके नाड़ा, ना कोई माँगे हजरत भाड़ा, मैं भटियारी आग लगा दियूँ, चोरी चकारी बीज मारी, सात राँड दासी म्हारी, वाना-धारी कर उपकारी, कर उपकार चल्यावूँगा, सीवो दावो ताप तिजारी, तोडूँ तीजी ताली, खट-चक्र का जड़ दूँ ताला, कदेई ना निकले गोरख बाला, डाकिनी शाकिनी, भूताँ जा का करस्यूँ जूता, राजा पकडूँ, हाकिम का मुँह कर दूँ काला, नौ गज पाछे ठेलूँगा, कुँएं पर चादर घालूँ गहरा, मण्ड मसाणा, धुनी धुकाऊँ नगर बुलाऊँ डेरा। यह सरभंग का देह, आप ही कर्ता, आपकी देह, सरभंग का जाप सम्पूर्ण सही, सन्त की गद्दी बैठ के गुरु गोरखनाथ जी कही।”
विधिः- किसी एकान्त स्थान में धूनी जलाकर उसमें एक चिमटा गाड़ दें। उस धूनी में एक रोटी पकाकर पहले उसे चिमटे पर रखें। इसके बाद किसी काले कुत्ते को खिला दें। धूनी के पास ही पूर्व तरफ मुख करके आसन बिछाकर बैठ जाएँ तथा २१ बार उक्त मन्त्र का जप करें।
उक्त क्रिया २१ दिन तक करने से मन्त्र सिद्ध हो जाता है। सिद्ध होने पर ३ काली मिर्चों पर मन्त्र को सात बार पढ़कर किसी ज्वर-ग्रस्त रोगी को दिया जाए, तो आरोग्य-लाभ होता है। भूत-प्रेत, डाकिनी, शाकिनी, नजर झपाटा होने पर सात बार मन्त्र से झाड़ने पर लाभ मिलता है। कचहरी में जाना हो, तो मन्त्र का ३ बार जप करके जाएँ। इससे वहाँ का कार्य सिद्ध होगा

9…..पितृ-आकर्षण मन्त्र
(कभी-कभी पितृ-पीड़ा से मनुष्य का जीवन दुःख-मय हो जाता है। निर्धारित कार्यों में बाधा, विफलता की प्राप्ति होती है। आकस्मिक दुर्घटनाएँ घटती है। पूरा कुटुम्ब दुःखी रहता है। ऐसी दशा में निम्नलिखित ‘प्रयोग’ करे। यह ‘प्रयोग’ निर्दोष है। पितृ-पीड़ा हो या न हो, सभी प्रकार की बाधाएँ नष्ट हो जाती है और सुख-शान्ति की प्राप्ति होती है। यदि यह ज्ञात हो कि किस पितृ की पीड़ा है, तो उस पितृ का मन-ही-मन आवाहन-पूजन कर निम्न ‘प्रयोग’ करे। पितृ-पीड़ा दूर हो जाएगी।)
“ॐ नमो कामद काली कामाक्षा देवी। तेरे सुमरे, बेड़ा पार। पढ़ि-पढ़ि मारूँ, गिन-गिन फूल। जाहि बुलाई, सोई आये। हाँक मार हनुमान बीर, पकड़ ला जल्दी। दुहाई तोय, सीता सती, अञ्जनी माता की, मेरा मन्त्र साँचा, पिण्ड काँचा। फुरो मन्त्र, ईश्वरो वाचा।”
विधिः- उक्त मन्त्र का राम-दूत परम-वीर श्री हनुमान जी के मन्दिर में एकान्त में, प्रतिदिन १ हजार जप ४१ दिन तक करें। यन-नियम का पालन करें। पहले दिन पूजन करें। ४१ दिन में मन्त्र चैतन्य हो जाएगा। ४२वें दिन, श्री हनुमानजी के उसी मन्दिर में २१ गुलाब के फूल लेकर जाए। हनुमानजी के सामने बैठकर उक्त मन्त्र से २१ फूलों को अभिमन्त्रित करें और मन-ही-मन संकल्प करें-”ज्ञात-अज्ञात पितृ-देवता मुझे दर्शन दें या आशीष दें।” इसके बाद सभी फूल, सभी दिशाओं-विदिशाओं में फेंक दें। फिर थोड़ी देर मन्दिर में रुके रहें, ध्यान से बैठे रहें। फिर गृह चले जायें। एक सप्ताह के अन्दर उचित निर्देश मिल जायेगा।

10…दस महाविद्या शाबर मन्त्र
सत नमो आदेश । गुरुजी को आदेश । ॐ गुरुजी । ॐ सोऽहं सिद्ध की काया, तीसरा नेत्र त्रिकुटी ठहराया । गगन मण्डल में अनहद बाजा। वहाँ देखा शिवजी बैठा, गुरु हुकम से भितरी बैठा, शुन्य में ध्यान गोरख दिठा । यही ध्यान तपे महेशा, यही ध्यान ब्रह्माजी लाग्या । यही ध्यान विष्णु की माया ! ॐ कैलाश गिरी से, आयी पार्वती देवी, जाकै सन्मुख बैठ गोरक्ष योगी, देवी ने जब किया आदेश । नहीं लिया आदेश, नहीं दिया उपदेश । सती मन में क्रोध समाई, देखु गोरख अपने माही, नौ दरवाजे खुले कपाट, दशवे द्वारे अग्नि प्रजाले, जलने लगी तो पार पछताई । राखी राखी गोरख राखी, मैं हूँ तेरी चेली, संसार सृष्टि की हूँ मैं माई । कहो शिवशंकर स्वामीजी, गोरख योगी कौन है दिठा । यह तो योगी सबमें विरला, तिसका कौन विचार । हम नहीं जानत, अपनी करणी आप ही जानी । गोरख देखे सत्य की दृष्टि । दृष्टि देख कर मन भया उनमन, तब गोरख कली बिच कहाया । हम तो योगी गुरुमुख बोली, सिद्धों का मर्म न जाने कोई । कहो पार्वती देवीजी अपनी शक्ति कौन-कौन समाई । तब सती ने शक्ति की खेल दिखायी, दस महाविद्या की प्रगटली ज्योति ।

प्रथम ज्योति महाकाली प्रगटली ।
।। महाकाली ।।
ॐ निरंजन निराकार अवगत पुरुष तत सार, तत सार मध्ये ज्योत, ज्योत मध्ये परम ज्योत, परम ज्योत मध्ये उत्पन्न भई माता शम्भु शिवानी काली ओ काली काली महाकाली, कृष्ण वर्णी, शव वहानी, रुद्र की पोषणी, हाथ खप्पर खडग धारी, गले मुण्डमाला हंस मुखी । जिह्वा ज्वाला दन्त काली । मद्यमांस कारी श्मशान की राणी । मांस खाये रक्त-पी-पीवे । भस्मन्ति माई जहाँ पर पाई तहाँ लगाई । सत की नाती धर्म की बेटी इन्द्र की साली काल की काली जोग की जोगीन, नागों की नागीन मन माने तो संग रमाई नहीं तो श्मशान फिरे अकेली चार वीर अष्ट भैरों, घोर काली अघोर काली अजर बजर अमर काली भख जून निर्भय काली बला भख, दुष्ट को भख, काल भख पापी पाखण्डी को भख जती सती को रख, ॐ काली तुम बाला ना वृद्धा, देव ना दानव, नर ना नारी देवीजी तुम तो हो परब्रह्मा काली ।
ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।

द्वितीय ज्योति तारा त्रिकुटा तोतला प्रगटी ।
।। तारा ।।
ॐ आदि योग अनादि माया जहाँ पर ब्रह्माण्ड उत्पन्न भया । ब्रह्माण्ड समाया आकाश मण्डल तारा त्रिकुटा तोतला माता तीनों बसै ब्रह्म कापलि, जहाँ पर ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पत्ति, सूरज मुख तपे चंद मुख अमिरस पीवे, अग्नि मुख जले, आद कुंवारी हाथ खण्डाग गल मुण्ड माल, मुर्दा मार ऊपर खड़ी देवी तारा । नीली काया पीली जटा, काली दन्त में जिह्वा दबाया । घोर तारा अघोर तारा, दूध पूत का भण्डार भरा । पंच मुख करे हां हां ऽऽकारा, डाकिनी शाकिनी भूत पलिता सौ सौ कोस दूर भगाया । चण्डी तारा फिरे ब्रह्माण्डी तुम तो हों तीन लोक की जननी ।
ॐ ह्रीं स्त्रीं फट्, ॐ ऐं ह्रीं स्त्रीं हूँ फट्

तृतीय ज्योति त्रिपुर सुन्दरी प्रगटी ।
।। षोडशी-त्रिपुर सुन्दरी ।।
ॐ निरञ्जन निराकार अवधू मूल द्वार में बन्ध लगाई पवन पलटे गगन समाई, ज्योति मध्ये ज्योत ले स्थिर हो भई ॐ मध्याः उत्पन्न भई उग्र त्रिपुरा सुन्दरी शक्ति आवो शिवधर बैठो, मन उनमन, बुध सिद्ध चित्त में भया नाद । तीनों एक त्रिपुर सुन्दरी भया प्रकाश । हाथ चाप शर धर एक हाथ अंकुश । त्रिनेत्रा अभय मुद्रा योग भोग की मोक्षदायिनी । इडा पिंगला सुषम्ना देवी नागन जोगन त्रिपुर सुन्दरी । उग्र बाला, रुद्र बाला तीनों ब्रह्मपुरी में भया उजियाला । योगी के घर जोगन बाला, ब्रह्मा विष्णु शिव की माता ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः ॐ ह्रीं श्रीं कएईलह्रीं हसकहल ह्रीं सकल ह्रीं सोः ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं ।

चतुर्थ ज्योति भुवनेश्वरी प्रगटी ।
।। भुवनेश्वरी ।।
ॐ आदि ज्योति अनादि ज्योत ज्योत मध्ये परम ज्योत परम ज्योति मध्ये शिव गायत्री भई उत्पन्न, ॐ प्रातः समय उत्पन्न भई देवी भुवनेश्वरी । बाला सुन्दरी कर धर वर पाशांकुश अन्नपूर्णी दूध पूत बल दे बालका ऋद्धि सिद्धि भण्डार भरे, बालकाना बल दे जोगी को अमर काया । चौदह भुवन का राजपाट संभाला कटे रोग योगी का, दुष्ट को मुष्ट, काल कन्टक मार । योगी बनखण्ड वासा, सदा संग रहे भुवनेश्वरी माता ।
ॐ ह्रीं ॐ

पञ्चम ज्योति छिन्नमस्ता प्रगटी ।
।। छिन्नमस्ता ।।
सत का धर्म सत की काया, ब्रह्म अग्नि में योग जमाया । काया तपाये जोगी (शिव गोरख) बैठा, नाभ कमल पर छिन्नमस्ता, चन्द सूर में उपजी सुष्मनी देवी, त्रिकुटी महल में फिरे बाला सुन्दरी, तन का मुन्डा हाथ में लिन्हा, दाहिने हाथ में खप्पर धार्या । पी पी पीवे रक्त, बरसे त्रिकुट मस्तक पर अग्नि प्रजाली, श्वेत वर्णी मुक्त केशा कैची धारी । देवी उमा की शक्ति छाया, प्रलयी खाये सृष्टि सारी । चण्डी, चण्डी फिरे ब्रह्माण्डी भख भख बाला भख दुष्ट को मुष्ट जती, सती को रख, योगी घर जोगन बैठी, श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथजी ने भाखी । छिन्नमस्ता जपो जाप, पाप कन्टन्ते आपो आप, जो जोगी करे सुमिरण पाप पुण्य से न्यारा रहे । काल ना खाये ।
ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं ऐं वज्र-वैरोचनीये हूं हूं फट् स्वाहा ।

षष्टम ज्योति भैरवी प्रगटी ।
।। भैरवी ।।
ॐ सती भैरवी भैरो काल यम जाने यम भूपाल तीन नेत्र तारा त्रिकुटा, गले में माला मुण्डन की । अभय मुद्रा पीये रुधिर नाशवन्ती ! काला खप्पर हाथ खंजर, कालापीर धर्म धूप खेवन्ते वासना गई सातवें पाताल, सातवें पाताल मध्ये परम-तत्त्व परम-तत्त्व में जोत, जोत में परम जोत, परम जोत में भई उत्पन्न काल-भैरवी, त्रिपुर-भैरवी, सम्पत्त-प्रदा-भैरवी, कौलेश-भैरवी, सिद्धा-भैरवी, विध्वंसिनि-भैरवी, चैतन्य-भैरवी, कामेश्वरी-भैरवी, षटकुटा-भैरवी, नित्या-भैरवी । जपा अजपा गोरक्ष जपन्ती यही मन्त्र मत्स्येन्द्रनाथजी को सदा शिव ने कहायी । ऋद्ध फूरो सिद्ध फूरो सत श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथजी अनन्त कोट सिद्धा ले उतरेगी काल के पार, भैरवी भैरवी खड़ी जिन शीश पर, दूर हटे काल जंजाल भैरवी मन्त्र बैकुण्ठ वासा । अमर लोक में हुवा निवासा ।
ॐ ह्सैं ह्स्क्ल्रीं ह्स्त्रौः

सप्तम ज्योति धूमावती प्रगटी
।। धूमावती ।।
ॐ पाताल निरंजन निराकार, आकाश मण्डल धुन्धुकार, आकाश दिशा से कौन आये, कौन रथ कौन असवार, आकाश दिशा से धूमावन्ती आई, काक ध्वजा का रथ अस्वार आई थरै आकाश, विधवा रुप लम्बे हाथ, लम्बी नाक कुटिल नेत्र दुष्टा स्वभाव, डमरु बाजे भद्रकाली, क्लेश कलह कालरात्रि । डंका डंकनी काल किट किटा हास्य करी । जीव रक्षन्ते जीव भक्षन्ते जाजा जीया आकाश तेरा होये । धूमावन्तीपुरी में वास, न होती देवी न देव तहा न होती पूजा न पाती तहा न होती जात न जाती तब आये श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथ आप भयी अतीत ।
ॐ धूं धूं धूमावती स्वाहा ।

अष्टम ज्योति बगलामुखी प्रगटी ।
।। बगलामुखी ।।
ॐ सौ सौ दुता समुन्दर टापू, टापू में थापा सिंहासन पिला । संहासन पीले ऊपर कौन बसे । सिंहासन पीला ऊपर बगलामुखी बसे, बगलामुखी के कौन संगी कौन साथी । कच्ची बच्ची काक-कूतिया-स्वान-चिड़िया, ॐ बगला बाला हाथ मुद्-गर मार, शत्रु हृदय पर सवार तिसकी जिह्वा खिच्चै बाला । बगलामुखी मरणी करणी उच्चाटण धरणी, अनन्त कोट सिद्धों ने मानी ॐ बगलामुखी रमे ब्रह्माण्डी मण्डे चन्दसुर फिरे खण्डे खण्डे । बाला बगलामुखी नमो नमस्कार ।
ॐ ह्लीं ब्रह्मास्त्राय विद्महे स्तम्भन-बाणाय धीमहि तन्नो बगला प्रचोदयात् ।

नवम ज्योति मातंगी प्रगटी ।
।। मातंगी ।।
ॐ शून्य शून्य महाशून्य, महाशून्य में ॐ-कार, ॐ-कार में शक्ति, शक्ति अपन्ते उहज आपो आपना, सुभय में धाम कमल में विश्राम, आसन बैठी, सिंहासन बैठी पूजा पूजो मातंगी बाला, शीश पर अस्वारी उग्र उन्मत्त मुद्राधारी, उद गुग्गल पाण सुपारी, खीरे खाण्डे मद्य-मांसे घृत-कुण्डे सर्वांगधारी । बुन्द मात्रेन कडवा प्याला, मातंगी माता तृप्यन्ते । ॐ मातंगी-सुन्दरी, रुपवन्ती, कामदेवी, धनवन्ती, धनदाती, अन्नपूर्णी अन्नदाती, मातंगी जाप मन्त्र जपे काल का तुम काल को खाये । तिसकी रक्षा शम्भुजती गुरु गोरखनाथजी करे ।
ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा ।

दसवीं ज्योति कमला प्रगटी ।
।। कमला ।।
ॐ अ-योनी शंकर ॐ-कार रुप, कमला देवी सती पार्वती का स्वरुप । हाथ में सोने का कलश, मुख से अभय मुद्रा । श्वेत वर्ण सेवा पूजा करे, नारद इन्द्रा । देवी देवत्या ने किया जय ॐ-कार । कमला देवी पूजो केशर पान सुपारी, चकमक चीनी फतरी तिल गुग्गल सहस्र कमलों का किया हवन । कहे गोरख, मन्त्र जपो जाप जपो ऋद्धि सिद्धि की पहचान गंगा गौरजा पार्वती जान । जिसकी तीन लोक में भया मान । कमला देवी के चरण कमल को आदेश ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सिद्ध-लक्ष्म्यै नमः ।

सुनो पार्वती हम मत्स्येन्द्र पूता, आदिनाथ नाती, हम शिव स्वरुप उलटी थापना थापी योगी का योग, दस विद्या शक्ति जानो, जिसका भेद शिव शंकर ही पायो । सिद्ध योग मर्म जो जाने विरला तिसको प्रसन्न भयी महाकालिका । योगी योग नित्य करे प्रातः उसे वरद भुवनेश्वरी माता । सिद्धासन सिद्ध, भया श्मशानी तिसके संग बैठी बगलामुखी । जोगी खड दर्शन को कर जानी, खुल गया ताला ब्रह्माण्ड भैरवी । नाभी स्थाने उडीय्यान बांधी मनीपुर चक्र में बैठी, छिन्नमस्ता रानी । ॐ-कार ध्यान लाग्या त्रिकुटी, प्रगटी तारा बाला सुन्दरी । पाताल जोगन (कुण्डलिनी) गगन को चढ़ी, जहां पर बैठी त्रिपुर सुन्दरी । आलस मोड़े, निद्रा तोड़े तिसकी रक्षा देवी धूमावन्ती करें । हंसा जाये दसवें द्वारे देवी मातंगी का आवागमन खोजे । जो कमला देवी की धूनी चेताये तिसकी ऋद्धि सिद्धि से भण्डार भरे । जो दसविद्या का सुमिरण करे । पाप पुण्य से न्यारा रहे । योग अभ्यास से भये सिद्धा आवागमन निवरते । मन्त्र पढ़े सो नर अमर लोक में जाये । इतना दस महाविद्या मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया । अनन्त कोट सिद्धों में, गोदावरी त्र्यम्बक क्षेत्र अनुपान शिला, अचलगढ़ पर्वत पर बैठ श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथजी ने पढ़ कथ कर सुनाया श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश । आदेश ।।

11..नाहरसिंह इस नाम से आप सभी लोग परीचित होंगे ! नाहरसिंह नौ प्रकार के होते है ! प्राचीन मान्यताओ के अनुसार पांच नाहरसिंह मोहम्मदा वीर ने अपनी शक्ति द्वारा बांध लिए थे ! वे नौ के नौ नाहरसिंह बांधना चाहते थे पर केवल पांच को ही बांध पाए क्योंकि बाकी सभी नाहरसिंह अपने आप में दिव्य शक्ति रखते थे और उन्हें कुछ महान आत्माओ का समर्थन प्राप्त था ! एक नाहरसिंह कामरूप कामख्या में है,उनके बारे में कहा जाता है कि वे योगी इस्माइलनाथ के शिष्य थे और जादूगरनी चैनावंती जो कि उनकी गुरु बहन थी उनके साथ विचरण करते थे ! एक नाहरसिंह की उपासना हिमाचल में की जाती है,यह नाहरसिंह बाबा बालकनाथ जी और बाबा वडभाग सिंह जी के अधिकार में आता है ! एक नाहरसिंह को मोहन नाहरसिंह कहा जाता है यदि इनकी पूजा कर इन्हें सिद्ध कर लिया जाये तो किसी का भी वशीकरण किया जा सकता है ! इन्हें ढाक के पेड़ के नीचे सिद्ध किया जाता है और ढाक के पत्ते पर कड़वा पान रखकर उस पर शराब की धार दी जाती है ! , एक नाहरसिंह की उपासना राजस्थान में होती है यह नाहरसिंह सबसे शक्तिशाली माना जाता है ! इन्हें नाहरसिंह वीर भी कहते है,नाहरसिंह वीर बाबा जाहरवीर के वजीर कहे जाते है ! इनकी माता का नाम नारी ब्राह्मणी था,यह जाति के ब्राह्मण थे ! जिस प्रकार रामजी के दुत हनुमान जी है ठीक उसी प्रकार गोगा जाहरवीर जी के दुत नाहरसिंह वीर है ! , नाहरसिंह वीर गुरु गोरखनाथ जी के प्रमुख शिष्य थे यदि नाहरसिंह वीर को सिद्ध कर लिया जाये तो साधक बड़े से बड़े कार्य बड़ी आसानी से पूर्ण कर सकता है ! नाहरसिंह वीर का उपासक जिस स्थान पर बैठ जाता है उस स्थान से भूत प्रेत पलायन कर जाते है क्योंकि नाहरसिंह वीर 12 कोस का इलाका बांध देते है ! इसके इलावा यदि किसी की खबर मंगवानी हो तो नाहरसिंह वीर कर्ण पिशाचिनी की तरह कान में आवाज़ भी दे देते है ! नाहरसिंह वीर को सिद्ध करने के बाद आप भूत प्रेत आदि से पीड़ित लोगो का इलाज बड़ी आसानी से कर सकते है !

12….शाबर धूमावती साधना

दस महाविद्याओं में माँ धूमावती का स्थान सातवां है और माँ के इस स्वरुप को बहुत ही उग्र माना जाता है ! माँ का यह स्वरुप अलक्ष्मी स्वरूपा कहलाता है किन्तु माँ अलक्ष्मी होते हुए भी लक्ष्मी है ! एक मान्यता के अनुसार जब दक्ष प्रजापति ने यज्ञ किया तो उस यज्ञ में शिव जी को आमंत्रित नहीं किया ! माँ सती ने इसे शिव जी का अपमान समझा और अपने शरीर को अग्नि में जला कर स्वाहा कर लिया और उस अग्नि से जो धुआं उठा images (1)उसने माँ धूमावती का रूप ले लिया ! इसी प्रकार माँ धूमावती की उत्पत्ति की अनेकों कथाएँ प्रचलित है जिनमे से कुछ पौराणिक है और कुछ लोक मान्यताओं पर आधारित है !

नाथ सम्प्रदाय के प्रसिद्ध योगी सिद्ध चर्पटनाथ जी माँ धूमावती के उपासक थे ! उन्होंने माँ धूमावती पर अनेकों ग्रन्थ रचे और अनेकों शाबर मन्त्रों की रचना भी की !

यहाँ मैं माँ धूमावती का एक प्रचलित शाबर मंत्र दे रहा हूँ जो बहुत ही शीघ्र प्रभाव देता है !

कोर्ट कचहरी आदि के पचड़े में फस जाने पर अथवा शत्रुओं से परेशान होने पर इस मंत्र का प्रयोग करे !

माँ धूमावती की उपासना से व्यक्ति अजय हो जाता है और उसके शत्रु उसे मूक होकर देखते रह जाते है !

|| मंत्र ||

ॐ पाताल निरंजन निराकार
आकाश मंडल धुन्धुकार
आकाश दिशा से कौन आई
कौन रथ कौन असवार
थरै धरत्री थरै आकाश
विधवा रूप लम्बे हाथ
लम्बी नाक कुटिल नेत्र दुष्टा स्वभाव
डमरू बाजे भद्रकाली
क्लेश कलह कालरात्रि
डंका डंकिनी काल किट किटा हास्य करी
जीव रक्षन्ते जीव भक्षन्ते
जाया जीया आकाश तेरा होये
धुमावंतीपुरी में वास
ना होती देवी ना देव
तहाँ ना होती पूजा ना पाती
तहाँ ना होती जात न जाती
तब आये श्री शम्भु यती गुरु गोरक्षनाथ
आप भई अतीत
ॐ धूं: धूं: धूमावती फट स्वाहा !

|| विधि ||

41 दिन तक इस मंत्र की रोज रात को एक माला जाप करे ! तेल का दीपक जलाये और माँ को हलवा अर्पित करे ! इस मंत्र को भूल कर भी घर में ना जपे, जप केवल घर से बाहर करे ! मंत्र सिद्ध हो जायेगा !

|| प्रयोग विधि १ ||

जब कोई शत्रु परेशान करे तो इस मंत्र का उजाड़ स्थान में 11 दिन इसी विधि से जप करे और प्रतिदिन जप के अंत में माता से प्रार्थना करे –

“ हे माँ ! मेरे (अमुक) शत्रु के घर में निवास करो ! “

ऐसा करने से शत्रु के घर में बात बात पर कलह होना शुरू हो जाएगी और वह शत्रु उस कलह से परेशान होकर घर छोड़कर बहुत दुर चला जायेगा !

|| प्रयोग विधि २ ||

शमशान में उगे हुए किसी आक के पेड़ के साबुत हरे पत्ते पर उसी आक के दूध से शत्रु का नाम लिखे और किसी दुसरे शमशान में बबूल का पेड़ ढूंढे और उसका एक कांटा तोड़ लायें ! फिर इस मंत्र को 108 बार बोल कर शत्रु के नाम पर चुभो दे !

ऐसा 5 दिन तक करे , आपका शत्रु तेज ज्वर से पीड़ित हो जायेगा और दो महीने तक इसी प्रकार दुखी रहेगा !

नोट – इस मंत्र के और भी घातक प्रयोग है जिनसे शत्रु के परिवार का नाश तक हो जाये ! किसी भी प्रकार के दुरूपयोग के डर से मैं यहाँ नहीं लिखना चाहता ! इस मंत्र का दुरूपयोग करने वाला स्वयं ही पाप का भागी होगा !

13….महाविद्या तारा साबर महासाधना

।। तारा ।।
ॐ आदि योग अनादि माया जहाँ पर ब्रह्माण्ड उत्पन्न भया । ब्रह्माण्ड समाया आकाश मण्डल तारा त्रिकुटा तोतला माता तीनों बसै ब्रह्म कापलि, जहाँ पर ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पत्ति, सूरज मुख तपे चंद मुख अमिरस पीवे, अग्नि मुख जले, आद कुंवारी हाथ खण्डाग गल मुण्ड माल, मुर्दा मार ऊपर खड़ी देवी तारा । नीली काया पीली जटा, काली दन्त में जिह्वा दबाया । घोर तारा अघोर तारा, दूध पूत का भण्डार भरा । पंच मुख करे हां हां ऽऽकारा, डाकिनी शाकिनी भूत पलिता सौ सौ कोस दूर भगाया । चण्डी तारा फिरे ब्रह्माण्डी तुम तो हों तीन लोक की जननी ।
ॐ ह्रीं स्त्रीं फट्, ॐ ऐं ह्रीं स्त्रीं हूँ फट्

14…कार्य-सिद्धि हेतु गणेश शाबर मन्त्र
“ॐ गनपत वीर, भूखे मसान, जो फल माँगूँ, सो फल आन। गनपत देखे, गनपत के छत्र से बादशाह डरे। राजा के मुख से प्रजा डरे, हाथा चढ़े सिन्दूर। औलिया गौरी का पूत गनेश, गुग्गुल की धरुँ ढेरी, रिद्धि-सिद्धि गनपत धनेरी। जय गिरनार-पति। ॐ नमो स्वाहा।”
विधि-
सामग्रीः- धूप या गुग्गुल, दीपक, घी, सिन्दूर, बेसन का लड्डू। दिनः- बुधवार, गुरुवार या शनिवार। निर्दिष्ट वारों में यदि ग्रहण, पर्व, पुष्य नक्षत्र, सर्वार्थ-सिद्धि योग हो तो उत्तम। समयः- रात्रि १० बजे। जप संख्या-१२५। अवधिः- ४० दिन।
किसी एकान्त स्थान में या देवालय में, जहाँ लोगों का आवागमन कम हो, भगवान् गणेश की षोडशोपचार से पूजा करे। घी का दीपक जलाकर, अपने सामने, एक फुट की ऊँचाई पर रखे। सिन्दूर और लड्डू के प्रसाद का भोग लगाए और प्रतिदिन १२५ बार उक्त मन्त्र का जप करें। प्रतिदिन के प्रसाद को बच्चों में बाँट दे। चालीसवें दिन सवा सेर लड्डू के प्रसाद का भोग लगाए और मन्त्र का जप समाप्त होने पर तीन बालकों को भोजन कराकर उन्हें कुछ द्रव्य-दक्षिणा में दे। सिन्दूर को एक डिब्बी में सुरक्षित रखे। एक सप्ताह तक इस सिन्दूर को न छूए। उसके बाद जब कभी कोई कार्य या समस्या आ पड़े, तो सिन्दूर को सात बार उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित कर अपने माथे पर टीका लगाए। कार्य सफल होगा।

15….शत्रु-नाशक प्रयोग-श्रीकृष्ण कीलक
श्रीकृष्ण कीलक
ॐ गोपिका-वृन्द-मध्यस्थं, रास-क्रीडा-स-मण्डलम्।
क्लम प्रसति केशालिं, भजेऽम्बुज-रूचि हरिम्।।
विद्रावय महा-शत्रून्, जल-स्थल-गतान् प्रभो !
ममाभीष्ट-वरं देहि, श्रीमत्-कमल-लोचन !।।
भवाम्बुधेः पाहि पाहि, प्राण-नाथ, कृपा-कर !
हर त्वं सर्व-पापानि, वांछा-कल्प-तरोर्मम।।
जले रक्ष स्थले रक्ष, रक्ष मां भव-सागरात्।
कूष्माण्डान् भूत-गणान्, चूर्णय त्वं महा-भयम्।।
शंख-स्वनेन शत्रूणां, हृदयानि विकम्पय।
देहि देहि महा-भूति, सर्व-सम्पत्-करं परम्।।
वंशी-मोहन-मायेश, गोपी-चित्त-प्रसादक !
ज्वरं दाहं मनो दाहं, बन्ध बन्धनजं भयम्।।
निष्पीडय सद्यः सदा, गदा-धर गदाऽग्रजः !
इति श्रीगोपिका-कान्तं, कीलकं परि-कीर्तितम्।
यः पठेत् निशि वा पंच, मनोऽभिलषितं भवेत्।
सकृत् वा पंचवारं वा, यः पठेत् तु चतुष्पथे।।
शत्रवः तस्य विच्छिनाः, स्थान-भ्रष्टा पलायिनः।
दरिद्रा भिक्षुरूपेण, क्लिश्यन्ते नात्र संशयः।।
ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपी-जन-वल्लभाय स्वाहा।।
विशेष – एक बार माता पार्वती कृष्ण बनी तथा श्री शिवजी माँ राधा बने। उन्हीं पार्वती रूप कृष्ण की उपासना हेतु उक्त ‘कृष्ण-कीलक’ की रचना हुई।
यदि रात्रि में घर पर इसके 5 पाठ करें, तो मनोकामना पूरी होगी। दुष्ट लोग यदि दुःख देते हों, तो सूर्यास्त के बाद चैराहे पर एक या पाँच पाठ करे, तो शत्रु विच्छिन होकर दरिद्रता एवं व्याधि से पीड़ित होकर भाग जायेगें।

16….व्यक्तिगत ऋण उतरने के लिए
अगर आपके ऊपर कोई कर्ज है और आप उसे वापस करने में असमर्थ हों तो मंगलवार को शिव मन्दिर में शिवलिंग पर मसूर की दाल चढ़ाते हुए ॐ ऋण मुक्तेश्वर महादेवाय नम: मंत्र का जाप करें. ऋण से मुक्ति पाने के लिए अनेक प्रचलित उपाय में से एक है स्कन्दपुराण में वर्णित ऋणमोचन मंगलस्तोत्र। ऋणमोचन मंगलस्तोत्र का प्रति मंगलवार 11 बार जप करना चाहिए। अगर इसके प्रभाव तेजी से चाहिए तो प्रतिदिन लाल आसन पर बैठकर इसके 3 पाठ भी कर सकते हैं। पेश है ऋणमोचन मंगलस्तोत्र -
।।ऋणमोचन मंगलस्तोत्रम्।।
मंगलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रद:।
स्थिरामनो महाकाय: सर्वकर्मविरोधक:।।
लोहितो लोहिताश्वश्च सामगानां कृपाकरं।
वैरात्मज: कुंजौ भौमो भूतिदो भूमिनंदन:।।
धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्कान्ति समप्रभ।
कुमारं शक्तिहस्तं च मंगलं प्रणमाम्यहम्।
अंगारको यमश्चैव सर्वरोगापहारक:।
वृष्टे: कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रद:।।
एतानि कुंजनामानि नित्यं य: श्रद्धया पठेत्।
ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात् ।।
स्तोत्रमंगारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभि:।
न तेषां भौमजा पीड़ा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्।।
अंगारको महाभाग भगवन्भक्तवत्सल।
त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय:।।
ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यव:।
भयक्लेश मनस्तापा: नश्यन्तु मम सर्वदा।।
अतिवक्र दुराराध्य भोगमुक्तजितात्मन:।
तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्।।
विरञ्चि शुक्रादिविष्णुनां मनुष्याणां तु कथा।
तेन त्वं सर्वसत्वेन ग्रहराजो महाबल:।।
पुत्रांदेहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गत:।
ऋणदारिद्रयं दु:खेन शत्रुणां च भयात्तत:।।
एभिद्वादशभि: श्लोकैर्य: स्तुति च धरासुतम्।
महतीं श्रियमाप्नोति ह्यपरा धनदो युवा:।

।। इति श्रीस्कन्दपुराणे भार्गवप्रोक्त ऋणमोचन मंगलस्तोत्रम् ।।

17…..तंत्र विज्ञान में हर समस्या का समाधान व्यक्ति आम हो या खास, समस्या सबके पीछे रहती हैं। हम लोग छोटे-छोटे उपाय जानते हैं पर उनकी विधिवत जानकारी के अभाव में उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं। कोई इंसान अपनी किसी इच्छा की पूर्ति के लिए कोशिशें कर के हार जाता है तो फिर वह मंदिरों में जाकर मन्नतें मांगता है। इस तरह वह पैसों व समय दोनों का नुकसान उठाता है। फिर भी वह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि उसकी मनोकामना पूरी हो ही जाएगी। लेकिन तंत्र विज्ञान मे कुछ ऐसे टोटके हैं जिन्हे अपनाकर आप निश्चित ही अपनी सारी मनोकामनाओं को पूर्ण कर सकते हैं। इनकी जानकारी निम्न है-
* आँखों में यदि काला मोतिया हो जाए तो ताम्बे के पात्र में जल लेकर उसमें ताम्बे का सिक्का व गुड डालकर प्रतिदिन सूर्य को अर्ध्य दें। यह उपाय शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार से शुरू कर चौदह रविवार करें। अर्ध्य देते समय रोग से मुक्ति की प्रार्थना करते रहें। इसके अतिरिक्त पांच प्रकार के फल लाल कपडे में बांधकर किसी भी मन्दिर में दें। यह उपाय निष्ठापूर्वक करें, लाभ होगा।
* नौकरी न मिल रही हो तो मन्दिर में बारह फल चढ़ाएं। यह उपाय नियमित रूप से करें और इश्वर से नौकरी मिलने की प्रार्थना करें।
* विवाह योग्य वर या कन्या के शीघ्र विवाह के लिए घर के मन्दिर में नवग्रह यन्त्र स्थापित करें। जिनकी नई शादी हो, उन्हें घर बुलाएं, उनका सत्कार करें और लाल वस्त्र भेंट करें उन्हें भोजन या जलपान कराने के पश्चात सौंफ मिस्री जरूर दें। यह सब करते समय शीघ्र विवाह की कामना करें। यह उपाय शुक्ल पक्ष के मंगलवार को करें, लाभ होगा।
* व्यापार मंदा हो तथा पैसा टिकता न हो, तो नवग्रह यन्त्र और धन यन्त्र घर के मन्दिर में शुभ समय में स्थापित करें। इसके अतिरिक्त सोलह सोमवार तक पांच प्रकार की सब्जियां मन्दिर में दें और पंचमेवा की खीर भोलेनाथ को मन्दिर में अर्पित करें। सभी कामनाएं पूरी होंगी।
*बच्चे पढ़ते न हों तो उनकी स्टडी टेबल पर शुभ समय में सरस्वती यन्त्र व कुबेर यन्त्र स्थापित करें। उनके पढने के लिये बैठने से पहले यंत्रों के आगे शुभ घी का दीपक तथा गुलाब की अगरबत्ती जलाएं। पढ़ते समय उनका मुंह पूर्व की ओर होना चाहिय। यह उपाय करने के बच्चों का मन पढ़ाई में लगने लगेगा और पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद उन्हें मनोवांछित काम भी मिल जायेगा।
*समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति के लिये कबूतरों को चावल मिश्रित डालें, बाजरा शुक्रवार को खरीदें व शनिवार से डालना शुरू करें।
*शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार या बुधवार को चमकीले पीले वस्त्र में शुद्ध कस्तूरी लपेटकर अपने धन रखने के स्थान पर रखें, घर में सुख-समृद्धी आयेगी।
* यदि मार्ग में कोई सफाई कर्मचारी सफाई करता दिखाई दे तो उसे यह कहकर की चाय-पानी पी लेना या कुछ खा लेना, कुछ दान अवश्य दें, परिवार में प्यार व सुख-समृद्धी बढ़ेगी। यदि सफाई कर्मचारी महिला हो तो शुभ फल अधिक मिलेगा।
*किसी भी विशेष मनोरथ की पूर्ति के लिये शुक्ल पक्ष में जटावाला नारियल नए लाल सूती कपडे में बांधकर बहते जल में प्रवाहित करें। यह उपाय निष्ठापूर्वक करें।
* शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से नित्य प्रातः में अर्पित करें। फूल हनुमानजी को मन्दिर में अर्पित करें। फूल अर्पित करते समय हनुमान जी से मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करते रहें। ध्यान रहे यह उपाय करते समय कोई आपको टोके नहीं और टोके तो आप उसका उत्तर न दें।
* जन्म पत्रिका में 12वें भाव में मंगल हो और खर्च बहुत होता हो, तो बेलपत्र पर चन्दन से ‘भौमाय नमः’ लिखकर सोमवार को शिवलिंग पर चढ़ाएं, उक्त सारे कष्ट दूर हो जायेंगे।
* बड़ के पत्ते पर अपनी मनोकामना लिखकर जल में प्रवाहित करने से मनोरथ की पूर्ति होती है।
* नए सूती लाल कपड़े में जटावाला नारियल बांधकर बहते जल में प्रवाहित करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
* बहुधा देखा गया है कि प्राणी कहीं देर तक बैठा हो तो हाथ-पैर सुन्न हो जाते हैं। जो अंग सुन्न हो गया हो, उस पर उंगली से 27 का अंक लिख दीजिये, अंग ठीक हो जाएगा।
* काले तिल और जौ का आटा तेल में गूंथकर एक मोटी रोटी बनाएं और उसे अच्छी तरह सेंकें। गुड को तेल में मिश्रित करके जिस व्यक्ति की मरने की आशंका हो, उसके सिर पर से 7 बार उतार कर मंगलवार या शनिवार को भैंस को खिला दें।
* गुड के गुलगुले सवाएं लेकर 7 बार उतार कर मंगलवार या शनिवार व इतवार को चील-कौए को डाल दें, रोगी को तुरंत राहत मिलेगी।
* महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। द्रोव, शहद और तिल मिश्रित कर शिवजी को अर्पित करें। ‘ॐ नमः शिवाय’ षडाक्षर मंत्र का जप भी करें, लाभ होगा।
* श्रावण के महीने में 108 बिल्व पत्रों पर चन्दन से नमः शिवाय लिखकर इसी मंत्र का जप करते हुए शिवजी को अर्पित करें। 31 दिन तक यह प्रयोग करें, घर में सुख-शांति एवं सम्रद्धि आएगी, रोग, बाधा, मुकदमा आदि में लाभ एवं व्यापार में प्रगति होगी व नया रोजगार मिलेगा। यह एक अचूक प्रयोग है।
* भगवान् को भोग लगाई हुई थाली अंतिम आदमी के भोजन करने तक ठाकुरजी के सामने रखी रहे तो रसोई बीच में ख़त्म नहीं होती है।
* बालक को जन्म के नाम से मत पुकारें।
* पांच वर्ष तक बालक को कपडे मांगकर ही पहनाएं।
* 3 या 5 वर्ष तक सिर के बाल न कटाएं।
* उसके जन्मदिन पर बालकों को दूध पिलाएं।
* बच्चे को किसी की गोद में दे दें और यह कहकर प्रचार करें कि यह अमुक व्यक्ति का लड़का है।
* घर में सुख-शांति के लिये मंगलवार को चना और गुड बंदरों को खिलाएं। आठ वर्ष तक के बच्चों को मीठी गोलियां बाँटें। शनिवार को गरीब व भिखारियों को चना और गुड दें अथवा भोजन कराएं। मंगलवार व शनिवार को घर में सुन्दरकाण्ड का पाठ करें या कराएं।
* सूर्य के देवता विष्णु, चन्द्र के देवता शिव, बुध की देवी दुर्गा, ब्रहस्पति के देवता ब्रह्मा, शुक्र की देवी लक्ष्मी, शनि के देवता शिव, राहु के देवता सर्प और केतु के देवता गणेश। जब भी इन ग्रहों का प्रकोप हो तो इन देवताओं की उपासना करनी चाहिए।
* स्वस्थ शरीर के लिए एक रुपये का सिक्का लें। रात को उसे सिरहाने रख कर सो जाएं। प्रातः इसे ष्मशान की सीमा में फेंक आएं। शरीर स्वस्थ रहेगा।
* ससुराल में सुखी रहने के लिए साबुत हल्दी की गांठें, पीतल का एक टुकड़ा, थोड़ा सा गुड़ अगर कन्या अपने हाथ से ससुराल की तरफ फेंक दे, तो वह ससुराल में सुरक्षापूर्वक और सुखी रहती है। सुखी वैवाहिक जीवन के लिए कन्या का जब विवाह हो चुका हो और वह विदा हो रही हो, तो एक लोटे (गड़वी) में गंगा जल, थोड़ी सी हल्दी, एक पीला सिक्का डाल कर, लड़की के सिर के उपर से ७ बार वार कर उसके आगे फेंक दें। वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा। कन्या के घर से विदा होते समय एक लोटे में गंगाजल, थोड़ी सी हल्दी और एक पीला सिक्का डालकर उसके आगे फेंक दें, उसका वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा।
* परेशानियां दूर करने व कार्य सिद्धि हेतु शनिवार को प्रातः, अपने काम पर जाने से पहले, एक नींबू लें। उसके दो टुकड़े करें। एक टुकड़े को आगे की तरफ फेंके, दूसरे को पीछे की तरफ। इन्हें चौराहे पर फेंकना है। मुख भी दक्षिण की ओर हो। नींबू को फेंक कर घर वापिस आ जाएं, या काम पर चले जाएं। दिन भर काम बनते रहेंगे तथा परेषानियां भी दूर होंगी।
* काम या यात्रा पर जाते हुए, एक नारियल लें। उसको हाथ में ले कर, ११ बार श्री हनुमते नमः कह कर, धरती पर मार कर तोड़ दें। उसके जल को अपने ऊपर छिड़क लें और गरी को निकाल कर बांट दें तथा खुद भी खाएं, तो यात्रा सफल रहेगी तथा काम भी बन जाएगा।
* अगर आपको किसी विशेष काम से जाना है, तो नीले रंग का धागा ले कर घर से निकलें। घर से जो तीसरा खंभा पड़े, उस पर, अपना काम कह कर, नीले रंग का धागा बांध दें। काम होने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। हल्दी की ७ साबुत गांठें, ७ गुड़ की डलियां, एक रुपये का सिक्का किसी पीले कपड़े में बांध कर, रेलवे लाइन के पार फेंक दें। फेंकते समय कहें काम दे, तो काम होने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।
* धन के लिए एक हंडियां में सवा किलो हरी साबुत मूंग दाल या मूंगी, दूसरी में सवा किलो डलिया वाला नमक भर दें। यह दो हंडियां घर में कहीं रख दें। यह क्रिया बुधवार को करें। घर में धन आना शुरू हो जाएगा।
* मिर्गी के रोग को दूर करने के लिए अगर गधे के दाहिने पैर का नाखून अंगूठी में धारण करें, तो मिर्गी की बीमारी दूर हो जाती है।
* भूत-प्रेत और जादू-टोना से बचने के लिए मोर पंख को अगर ताबीज में भर के बच्चे के गले में डाल दें, तो उसे भूत-प्रेत और जादू-टोने की पीड़ा नहीं रहती।
* परीक्षा में सफलता हेतु गणेश रुद्राक्ष धारण करें। बुधवार को गणेश जी के मंदिर में जाकर दर्शन करें और मूंग के लड्डुओं का भोग लगाकर सफलता की प्रार्थना करें।
* पदोन्नति हेतु शुक्ल पक्ष के सोमवार को सिद्ध योग में तीन गोमती चक्र चांदी के तार में एक साथ बांधें और उन्हें हर समय अपने साथ रखें, पदोन्नति के साथ-साथ व्यवसाय में भी लाभ होगा।
* मुकदमे में विजय हेतु पांच गोमती चक्र जेब में रखकर कोर्ट में जाया करें, मुकदमे में निर्णय आपके पक्ष में होगा।
* पढ़ाई में एकाग्रता हेतु शुक्ल पक्ष के पहले रविवार को इमली के २२ पत्ते ले आएं और उनमें से ११ पत्ते सूर्य देव को ¬ सूर्याय नमः कहते हुए अर्पित करें। शेष ११ पत्तों को अपनी किताबों में रख लें, पढ़ाई में रुचि बढ़ेगी।
* कार्य में सफलता के लिए अमावस्या के दिन पीले कपड़े का त्रिकोना झंडा बना कर विष्णु भगवान के मंदिर के ऊपर लगवा दें, कार्य सिद्ध होगा।
* कारोबार में हानि हो रही हो अथवा ग्राहकों का आना कम हो गया हो, तो समझें कि किसी ने आपके कारोबार को बांध दिया है। इस बाधा से मुक्ति के लिए दुकान या कारखाने के पूजन स्थल में शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को अमृत सिद्ध या सिद्ध योग में श्री धनदा यंत्र स्थापित करें। फिर नियमित रूप से केवल धूप देकर उनके दर्शन करें, कारोबार में लाभ होने लगेगा।
* गृह कलह से मुक्ति हेतु परिवार में पैसे की वजह से कलह रहता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख में पांच कौड़ियां रखकर उसे चावल से भरी चांदी की कटोरी पर घर में स्थापित करें। यह प्रयोग शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार को या दीपावली के अवसर पर करें, लाभ अवश्य होगा।
* क्रोध पर नियंत्रण हेतु यदि घर के किसी व्यक्ति को बात-बात पर गुस्सा आता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख को साफ कर उसमें जल भरकर उसे पिला दें। यदि परिवार में पुरुष सदस्यों के कारण आपस में तनाव रहता हो, तो पूर्णिमा के दिन कदंब वृक्ष की सात अखंड पत्तों वाली डाली लाकर घर में रखें। अगली पूर्णिमा को पुरानी डाली कदंब वृक्ष के पास छोड़ आएं और नई डाली लाकर रखें। यह क्रिया इसी तरह करते रहें, तनाव कम होगा।
* मकान खाली कराने हेतु शनिवार की शाम को भोजपत्र पर लाल चंदन से किरायेदार का नाम लिखकर शहद में डुबो दें। संभव हो, तो यह क्रिया शनिश्चरी अमावस्या को करें। कुछ ही दिनों में किरायेदार घर खाली कर देगा। ध्यान रहे, यह क्रिया करते समय कोई टोके नहीं।
* बिक्री बढ़ाने हेतु ग्यारह गोमती चक्र और तीन लघु नारियलों की यथाविधि पूजा कर उन्हें पीले वस्त्र में बांधकर बुधवार या शुक्रवार को अपने दरवाजे पर लटकाएं तथा हर पूर्णिमा को धूप दीप जलाएं। यह क्रिया निष्ठापूर्वक नियमित रूप से करें, ग्राहकों की संख्या में वृद्धि होगी और बिक्री बढ़ेगी।
* शत्रु शमन के लिए साबुत उड़द की काली दाल के 38 और चावल के 40 दाने मिलाकर किसी गड्ढे में दबा दें और ऊपर से नीबू निचोड़ दें। नीबू निचोड़ते समय शत्रु का नाम लेते रहें, उसका शमन होगा और वह आपके विरुद्ध कोई कदम नहीं उठाएगा।
* ससुराल में सुखी रहने के लिए : कन्या अपने हाथ से हल्दी की 7 साबुत गांठें, पीतल का एक टुकड़ा और थोड़ा-सा गुड़ ससुराल की तरफ फेंके, ससुराल में सुरक्षित और सुखी रहेगी।
* घर में खुशहाली तथा दुकान की उन्नति हेतु घर या व्यापार स्थल के मुख्य द्वार के एक कोने को गंगाजल से धो लें और वहां स्वास्तिक की स्थापना करें और उस पर रोज चने की दाल और गुड़ रखकर उसकी पूजा करें। साथ ही उसे ध्यान रोज से देखें और जिस दिन वह खराब हो जाए उस दिन उस स्थान पर एकत्र सामग्री को जल में प्रवाहित कर दें। यह क्रिया शुक्ल पक्ष के बृहस्पतिवार को आरंभ कर ११ बृहस्पतिवार तक नियमित रूप से करें। फिर गणेश जी को सिंदूर लगाकर उनके सामने लड्डू रखें तथा ÷जय गणेश काटो कलेश’ कहकर उनकी प्रार्थना करें, घर में सुख शांति आ जागी।
* सफलता प्राप्ति के लिए प्रातः सोकर उठने के बाद नियमित रूप से अपनी हथेलियों को ध्यानपूर्वक देखें और तीन बार चूमें। ऐसा करने से हर कार्य में सफलता मिलती है। यह क्रिया शनिवार से शुरू करें।
* धन लाभ के लिए शनिवार की शाम को माह (उड़द) की दाल के दाने पर थोड़ी सी दही और सिंदूर डालकर पीपल के नीचे रख आएं। वापस आते समय पीछे मुड़कर नहीं देखें। यह क्रिया शनिवार को ही शुरू करें और 7 शनिवार को नियमित रूप से किया करें, धन की प्राप्ति होने लगेगी।
* संपत्ति में वृद्धि हेतु किसी भी बृहस्पतिवार को बाजार से जलकुंभी लाएं और उसे पीले कपड़े में बांधकर घर में कहीं लटका दें। लेकिन इसे बार-बार छूएं नहीं। एक सप्ताह के बाद इसे बदल कर नई कुंभी ऐसे ही बांध दें। इस तरह 7 बृहस्पतिवार करें। यह निच्च्ठापूर्वक करें, ईश्वर ने चाहा तो आपकी संपत्ति में वृद्धि होगी।

18….तांत्रोक्त नारियल..
1- तांत्रोक्त नारियल घर मे रखने से स्वतः लक्ष्मी कृपा प्ररम्भ होने लग जाता है और आर्थिक अनुकूलता होने लगती है ।
2. इस नारियल को घर मे रखने से यदि घर पर किसी प्रकार का तंत्रिक प्रयोग किया हुआ हो तो वह दूर हो जाता है ।
3. इस नारियल को घर मे रखने से भूत-प्रेत पिशाच आदि का भय व्यप्त नही होता ।
4. जिसके घर मेँ तांत्रोक्त नारियल रहता है , उसके घर के व्यक्तियो मे परस्पर प्रेम , भाई चारा और आत्मीयता पूर्ण संबंध बने रहते है ।
5. यदि स्नान करने की बाल्टी मे इस नारियल को डाल कर जल भर कर उस पानी से स्नान किया जाय तो बीमारी समाप्त होती है ।
6. तांत्रोक्त नारियल के द्वारा गृहस्थ जीवन मे अनुरुपता और एकता लाई जा सकती है । इसके घर मे रहने से लडाई झगडे, मतभेद , आदि स्वयं समाप्त हो जाते है और गृहस्थ जीवन मे पूर्णता अनुकूलता आने लगती है ।
इसके अलावा भी तांत्रोक्त नारियल से कई प्रयोग सिद्ध किये जा सकते है । इस नारियल से जल्द परिणाम प्राप्त करने के लिये । रोज इसे देखते हुए गुरु मंत्र का 30 मिनट जप करना चाहिए ।
कुछ उपयोगिताएं—
1- तांत्रोक्त नारियल घर मे रखने से स्वतः लक्ष्मी कृपा प्ररम्भ होने लग जाता है और आर्थिक अनुकूलता होने लगती है ।
2. इस नारियल को घर मे रखने से यदि घर पर किसी प्रकार का तंत्रिक प्रयोग किया हुआ हो तो वह दूर हो जाता है ।
3. इस नारियल को घर मे रखने से भूत-प्रेत पिशाच आदि का भय व्यप्त नही होता ।
4. जिसके घर मेँ तांत्रोक्त नारियल रहता है , उसके घर के व्यक्तियो मे परस्पर प्रेम , भाई चारा और आत्मीयता पूर्ण संबंध बने रहते है ।
5. यदि स्नान करने की बाल्टी मे इस नारियल को डाल कर जल भर कर उस पानी से स्नान किया जाय तो बीमारी समाप्त होती है ।
6. तांत्रोक्त नारियल के द्वारा गृहस्थ जीवन मे अनुरुपता और एकता लाई जा सकती है । इसके घर मे रहने से लडाई झगडे, मतभेद , आदि स्वयं समाप्त हो जाते है और गृहस्थ जीवन मे पूर्णता अनुकूलता आने लगती है ।
इसके अलावा भी तांत्रोक्त नारियल से कई प्रयोग सिद्ध किये जा सकते है । इस नारियल से जल्द परिणाम प्राप्त करने के लिये । रोज इसे देखते हुए गुरु मंत्र का 30 मिनट जप करना चाहिए ।

19…..|| दरिद्रता-नाशक तथा धन-सम्पत्ति-दायक स्तोत्र ||
भगवान् शिव के तीन नेत्र हैं। मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट शोभायमान है। जटाजूट कुछ-कुछ पीला हो रहा है। सर्पों के हार से उनकी शोभा बढ़ रही है। उनके कण्ठ में नीला चिह्न है। उमके हाथ में वरद तथा दूसरे हाथ में अभय-मुद्रा है। वे व्याघ्र-चर्म पहने रत्नमय सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके वाम भाग में भगवती उमा का चिन्तन करे।
इस प्रकार युगल दम्पति का ध्यान करके उनकी मानसिक पूजा करे। इसके बाद सिंहासन पर स्थित महादेवजी का पूजन करे। पूजा के आरम्भ में एकाग्रचित्त हो संकल्प पढ़े। तदनन्तर हाथ जोड़कर मन-ही-मन उनका आह्वान करे-’ हे भगवान् शंकर ! आप ऋण, पातक, दुर्भाग्य आदि की निवृत्ति के लिये मुझ पर प्रसन्न हों।’ इसके पश्चात् गिरिजापति की प्रार्थना इस प्रकार करे-
जय देव जगन्नाथ, जय शंकर शाश्वत। जय सर्व-सुराध्यक्ष, जय सर्व-सुरार्चित ! ।।
जय सर्व-गुणातीत, जय सर्व-वर-प्रद ! जय नित्य-निराधार, जय विश्वम्भराव्यय ! ।।
जय विश्वैक-वेद्येश, जय नागेन्द्र-भूषण ! जय गौरी-पते शम्भो, जय चन्द्रार्ध-शेखर ! ।।
जय कोट्यर्क-संकाश, जयानन्त-गुणाश्रय ! जय रुद्र-विरुपाक्ष, जय चिन्त्य-निरञ्जन ! ।।
जय नाथ कृपा-सिन्धो, जय भक्तार्त्ति-भञ्जन ! जय दुस्तर-संसार-सागरोत्तारण-प्रभो ! ।।
प्रसीद मे महा-भाग, संसारार्त्तस्य खिद्यतः। सर्व-पाप-भयं हृत्वा, रक्ष मां परमेश्वर ! ।।
महा-दारिद्रय-मग्नस्य, महा-पाप-हृतस्य च। महा-शोक-विनष्टस्य, महा-रोगातुरस्य च।।
ऋणभार-परीत्तस्य, दह्यमानस्य कर्मभिः। ग्रहैः प्रपीड्यमानस्य, प्रसीद मम शंकर ! ।।
(स्क॰ पु॰ ब्रा॰ ब्रह्मो॰ ७।५९-६६)
फल-श्रुतिः
दारिद्रयः प्रार्थयेदेवं, पूजान्ते गिरिजा-पतिम्। अर्थाढ्यो वापि राजा वा, प्रार्थयेद् देवमीश्वरम्।।
दीर्घमायुः सदाऽऽरोग्यं, कोष-वृद्धिर्बलोन्नतिः। ममास्तु नित्यमानन्दः, प्रसादात् तव शंकर ! ।।
शत्रवः संक्षयं यान्तु, प्रसीदन्तु मम गुहाः। नश्यन्तु दस्यवः राष्ट्रे, जनाः सन्तुं निरापदाः।।
दुर्भिक्षमरि-सन्तापाः, शमं यान्तु मही-तले। सर्व-शस्य समृद्धिनां, भूयात् सुख-मया दिशः।।
अर्थात् ‘देव ! जगन्नाथ ! आपकी जय हो। सनातन शंकर ! आपकी जय हो। सम्पूर्ण देवताओं के अधीश्वर ! आपकी जय हो। सर्वदेवपूजित ! आपकी जय हो। सर्वगुणातीत ! आपकी जय हो। सबको वर प्रदान करने वाले प्रभो ! आपकी जय हो। नित्य, आधार-रहित, अविनाशी विश्वम्भर ! आपकी जय हो, जय हो। सम्पूर्ण विश्व के लिये एकमात्र जानने योग्य महेश्वर ! आपकी जय हो। नागराज वासुकी को आभूषण के रुप धारण करने वाले प्रभो ! आपकी जय हो। गौरीपते ! आपकी जय हो। चन्द्रार्द्धशेखर शम्भो ! आपकी जय हो। कोटी-सूर्यों के समान तेजस्वी शिव ! आपकी जय हो। अनन्त गुणों के आश्रय ! आपकी जय हो। भयंकर नेत्रों वाले रुद्र ! आपकी जय हो। अचिन्त्य ! निरञ्जन ! आपकी जय हो। नाथ ! दयासिन्धो ! आपकी जय हो। भक्तों की पीड़ा का नाश करने वाले प्रभो ! आपकी जय हो। दुस्तर संसारसागर से पार उतारने वाले परमेश्वर ! आपकी जय हो। महादेव, मैं संसार के दुःखों से पीड़ित एवं खिन्न हूँ, मुझ पर प्रसन्न होइये। परमेश्वर ! समस्त पापों के भय का अपहरण करके मेरी रक्षा कीजिये। मैं घोर दारिद्रय के समुद्र में डूबा हुआ हूँ। बड़े-बड़े पापों ने मुझे आक्रान्त कर लिया है। मैं महान् शोक से नष्ट और बड़े-बड़े रोगों से व्याकुल हूँ। सब ओर से ऋण के भार से लदा हुआ हूँ। पापकर्मों की आग में जल रहा हूँ और ग्रहों से पीड़ित हो रहा हूँ। शंकर ! मुझ पर प्रसन्न होइये।’
और कोई विधि-विधान न बन सके तो श्रद्धा-विश्वास-पूर्वक केवल उपर्युक्त स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करे।

20….त्रिविध फल-दायक शाबर मन्त्र
मन्त्रः-१॰ “या भुज ते महिषासुर मारि, औ शुम्भ-निशुम्भ दोऊ दल थम्बा । आरत हेतु पुकारत हौं, जाइ कहाँ बैठी जगदम्बा ?।। खड्ग टूटो कि खप्पर फूटो कि सिंह थको, तुमरो जगदम्बा ! आज तोहे माता भक्त शपथ, बिनु शान्ति दिए जनि सोवहु अम्बा ! ।।”२॰ “जे भुज ते महिषासुर मारो, शुम्भ-निशुम्भ हत्यो बल-थम्बा । सेवक को प्रण राख ले मात ! भई पर-मन्त्र तुही अवलम्बा ।। आरत होय पुकारत हौं, कर ते तरवार गहो जगदम्बा ! आनि तुम्हें शिव-विष्णु की, जनि शत्रु बधे बिन सोवहु अम्बा !।।बाँधों, बाँधों अम्मरताई । जहाँ तहाँ जाई । जेहि बाँधि मँगावों, तेहिं का बाँधि लाओ । वाचा चूके, उमा सूखै । श्री बावन वीर ले जाय, सात समुन्दर तीर । त्रिवाच फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।ॐ आं ह्रीं । पश्चिम दिशा में सोने का मठ, सोने का किवार, सोने का ताला, सोने की कुञ्जी, सोने का घण्टा, सोने की सांकुली । पहिली साँकुली अठारह कुल नाग बाँधों, दूसरी साँकुली अठारह कुल-जाति को बाँधूँ, तीसरी साँकुली बैरी-दुश्मन को बाँधों, चौथी साँकुली डाकिनी-शाकिनी को बाँधों, पाँचवीं साँकुली भूत-प्रेत को बाँधों । जलत अगिन बाँधों, जलत मसान बाँधों, जल बाँधों, थल बाँधों, बाँधों अम्मरताई । जहाँ भेजूँ, तहाँ जाई । जेहि बाँधि मँगावों, तेहिं का बाँधि लाओ । वाचा चूकै, उमा सूखै । श्रीबावन वीर ले जाय, समुन्दर तीर । त्रिवाचा फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।ॐ आं ह्रीं । उत्तर दिशा में रुपे का मठ, रुपे का किवार, रुपे का ताला, रुपे की कुञ्जी, रुपे का घण्टा, रुपे की सांकुली । पहिली साँकुली अठारह कुल नाग बाँधों, दूसरी साँकुली अठारह कुल-जाति को बाँधूँ, तीसरी साँकुली बैरी-दुश्मन को बाँधों, चौथी साँकुली डाकिनी-शाकिनी को बाँधों, पाँचवीं साँकुली भूत-प्रेत को बाँधों । जलत अगिन बाँधों, जलत मसान बाँधों, जल बाँधों, थल बाँधों, बाँधों अम्मरताई । जहाँ भेजूँ, तहाँ जाई । जेहि बाँधि मँगावों, तेहिं का बाँधि लाओ । वाचा चूकै, उमा सूखै । श्रीबावन वीर ले जाय, समुन्दर तीर । त्रिवाचा फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।ॐ आं ह्रीं । पूरब दिशा में तामे का मठ, तामे का किवार, तामे का ताला, तामे की कुञ्जी, तामे का घण्टा, तामे की साँकुली । पहिली साँकुली अठारह कुल नाग बाँधों, दूसरी साँकुली अठारह कुल-जाति को बाँधूँ, तीसरी साँकुली बैरी-दुश्मन को बाँधों, चौथी साँकुली डाकिनी-शाकिनी को बाँधों, पाँचवीं साँकुली भूत-प्रेत को बाँधों । जलत अगिन बाँधों, जलत मसान बाँधों, जल बाँधों, थल बाँधों, बाँधों अम्मरताई । जहाँ भेजूँ, तहाँ जाई । जेहि बाँधि मँगावों, तेहिं का बाँधि लाओ । वाचा चूकै, उमा सूखै । श्रीबावन वीर ले जाय, समुन्दर तीर । त्रिवाचा फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।ॐ आं ह्रीं । दक्षिण दिशा में अस्थि का मठ, अस्थि का किवार, अस्थि का ताला, अस्थि की कुञ्जी, अस्थि का घण्टा, अस्थि की साँकुली । पहिली साँकुली अठारह कुल नाग बाँधों, दूसरी साँकुली अठारह कुल-जाति को बाँधूँ, तीसरी साँकुली बैरी-दुश्मन को बाँधों, चौथी साँकुली डाकिनी-शाकिनी को बाँधों, पाँचवीं साँकुली भूत-प्रेत को बाँधों । जलत अगिन बाँधों, जलत मसान बाँधों, जल बाँधों, थल बाँधों, बाँधों अम्मरताई । जहाँ भेजूँ, तहाँ जाई । जेहि बाँधि मँगावों, तेहिं का बाँधि लाओ । वाचा चूकै, उमा सूखै । श्रीबावन वीर ले जाय, समुन्दर तीर । त्रिवाचा फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।विधिः- उक्त दोनों मन्त्रों की विधि एक ही है । नवरात्र में नित्य भगवती का पूजन कर एक हजार जप करें । फिर प्रयोग करें । यथा -१॰ सायं-काल दक्षिणाभिमुख होकर पीपल (अश्वत्थ) की डाल हाथ में लेकर, हाथ ऊँचा उठाकर, नित्य 21 बार पढ़ने से शत्रु परास्त होंगे ।२॰ रात्रि में पश्चिमाभिमुख होकर उक्त क्रिया-सहित 21 बार पाठ करने से पुष्टि-कर्म की सिद्धि होगी ।३॰ ब्राह्म-मुहूर्त में पूर्वाभिमुख होकर हाथ में कुश लेकर उक्त क्रिया-पूर्वक 7 बार पाठ करने से शान्ति-कर्म की सिद्धि होगी ।

21…तांत्रिक अभिकर्म से प्रतिरक्षण हेतु उपाय-

१. पीली सरसों, गुग्गल, लोबान व गौघृत इन सबको मिलाकर इनकी धूप बना लें व सूर्यास्त के 1 घंटे भीतर उपले जलाकर उसमें डाल दें। ऐसा २१ दिन तक करें व इसका धुआं पूरे घर में करें। इससे नकारात्मक शक्तियां दूर भागती हैं।
२. जावित्री, गायत्री व केसर लाकर उनको कूटकर गुग्गल मिलाकर धूप बनाकर सुबह शाम २१ दिन तक घर में जलाएं। धीरे-धीरे तांत्रिक अभिकर्म समाप्त होगा।
३. गऊ, लोचन व तगर थोड़ी सी मात्रा में लाकर लाल कपड़े में बांधकर अपने घर में पूजा स्थान में रख दें। शिव कृपा से तमाम टोने-टोटके का असर समाप्त हो जाएगा।
४. घर में साफ सफाई रखें व पीपल के पत्ते से ७ दिन तक घर में गौमूत्र के छींटे मारें व तत्पश्चात् शुद्ध गुग्गल का धूप जला दें।
५. कई बार ऐसा होता है कि शत्रु आपकी सफलता व तरक्की से चिढ़कर तांत्रिकों द्वारा अभिचार कर्म करा देता है। इससे व्यवसाय बाधा एवं गृह क्लेश होता है अतः इसके दुष्प्रभाव से बचने हेतु सवा 1 किलो काले उड़द, सवा 1 किलो कोयला को सवा 1 मीटर काले कपड़े में बांधकर अपने ऊपर से २१ बार घुमाकर शनिवार के दिन बहते जल में विसर्जित करें व मन में हनुमान जी का ध्यान करें। ऐसा लगातार ७ शनिवार करें। तांत्रिक अभिकर्म पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगा।
६. यदि आपको ऐसा लग रहा हो कि कोई आपको मारना चाहता है तो पपीते के २१ बीज लेकर शिव मंदिर जाएं व शिवलिंग पर कच्चा दूध चढ़ाकर धूप बत्ती करें तथा शिवलिंग के निकट बैठकर पपीते के बीज अपने सामने रखें। अपना नाम, गौत्र उच्चारित करके भगवान् शिव से अपनी रक्षा की गुहार करें व एक माला महामृत्युंजय मंत्र की जपें तथा बीजों को एकत्रित कर तांबे के ताबीज में भरकर गले में धारण कर लें।
७. शत्रु अनावश्यक परेशान कर रहा हो तो नींबू को ४ भागों में काटकर चौराहे पर खड़े होकर अपने इष्ट देव का ध्यान करते हुए चारों दिशाओं में एक-एक भाग को फेंक दें व घर आकर अपने हाथ-पांव धो लें। तांत्रिक अभिकर्म से छुटकारा मिलेगा।
८. शुक्ल पक्ष के बुधवार को ४ गोमती चक्र अपने सिर से घुमाकर चारों दिशाओं में फेंक दें तो व्यक्ति पर किए गए तांत्रिक अभिकर्म का प्रभाव खत्म हो जाता है।

22..जीवन से हर समस्या का समाधान शास्त्रों में बताया गया है। एक उपाय तो ये है कि हम अपनी मेहनत से और स्वयं की समझदारी इन समस्याओं को दूर करने का प्रयास करें और दूसरा उपाय है धार्मिक कार्य करें। हमें प्राप्त होने वाले सुख-दुख हमारे कर्मों का प्रतिफल ही है। पुण्य कर्म किए जाए
तो दुख का समय जल्दी निकल जाता है। शास्त्रों के अनुसार गाय, पक्षी, कुत्ता, चींटियां और मछली से हमारे जीवन की सभी समस्याएं दूर हो सकती हैं।
1.यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से गाय को रोटी खिलाएं तो उसके ज्योतिषीय ग्रह दोष नष्ट हो जाते हैं। गाय को पूज्य और पवित्र माना जाता है, इसी वजह से इसकी सेवा करने वाले व्यक्ति को सभी सुख प्राप्त हो जाते हैं।
2. इसी प्रकार पक्षियों को दाना डालने पर आर्थिक मामलों में लाभ प्राप्त होता है। व्यवसाय करने वाले लोगों को विशेष रूप से प्रतिदिन पक्षियों को दाना अवश्य डालना चाहिए।
3. यदि कोई व्यक्ति दुश्मनों से परेशान हैं और उनका भय हमेशा ही सताता रहता है तो कुत्ते को रोटी खिलाना चाहिए। नियमित रूप से जो कुत्ते को रोटी खिलाते हैं उन्हें दुश्मनों का भय नहीं सताता है।
4.कर्ज से परेशान से लोग चींटियों को शक्कर और आटे डालें। ऐसा करने पर कर्ज की समाप्ति जल्दी हो जाती है।
5. जिन लोगों की पुरानी संपत्ति उनके हाथ से निकल गई है या कई मूल्यवान वस्तु खो गई है तो ऐसे लोग यदि प्रतिदिन मछली को आटे की गोलियां खिलाते हैं तो उन्हें लाभ प्राप्त होता है। मछलियों को आटे की गोलियां देने पर पुरानी संपत्ति पुन: प्राप्त होने के योग बनते हैं।
इन पांचों को जो भी व्यक्ति खाना खिलाते हैं उनके सभी दुख-दर्द दूर हो जाते हैं और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

23….जीवन से हर समस्या का समाधान शास्त्रों में बताया गया है। एक उपाय तो ये है कि हम अपनी मेहनत से और स्वयं की समझदारी इन समस्याओं को दूर करने का प्रयास करें और दूसरा उपाय है धार्मिक कार्य करें। हमें प्राप्त होने वाले सुख-दुख हमारे कर्मों का प्रतिफल ही है। पुण्य कर्म किए जाए
तो दुख का समय जल्दी निकल जाता है। शास्त्रों के अनुसार गाय, पक्षी, कुत्ता, चींटियां और मछली से हमारे जीवन की सभी समस्याएं दूर हो सकती हैं।
1.यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से गाय को रोटी खिलाएं तो उसके ज्योतिषीय ग्रह दोष नष्ट हो जाते हैं। गाय को पूज्य और पवित्र माना जाता है, इसी वजह से इसकी सेवा करने वाले व्यक्ति को सभी सुख प्राप्त हो जाते हैं।
2. इसी प्रकार पक्षियों को दाना डालने पर आर्थिक मामलों में लाभ प्राप्त होता है। व्यवसाय करने वाले लोगों को विशेष रूप से प्रतिदिन पक्षियों को दाना अवश्य डालना चाहिए।
3. यदि कोई व्यक्ति दुश्मनों से परेशान हैं और उनका भय हमेशा ही सताता रहता है तो कुत्ते को रोटी खिलाना चाहिए। नियमित रूप से जो कुत्ते को रोटी खिलाते हैं उन्हें दुश्मनों का भय नहीं सताता है।
4.कर्ज से परेशान से लोग चींटियों को शक्कर और आटे डालें। ऐसा करने पर कर्ज की समाप्ति जल्दी हो जाती है।
5. जिन लोगों की पुरानी संपत्ति उनके हाथ से निकल गई है या कई मूल्यवान वस्तु खो गई है तो ऐसे लोग यदि प्रतिदिन मछली को आटे की गोलियां खिलाते हैं तो उन्हें लाभ प्राप्त होता है। मछलियों को आटे की गोलियां देने पर पुरानी संपत्ति पुन: प्राप्त होने के योग बनते हैं।
इन पांचों को जो भी व्यक्ति खाना खिलाते हैं उनके सभी दुख-दर्द दूर हो जाते हैं और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

24…..श्रीविचित्र-वीर-हनुमन्-माला-मन्त्र
प्रस्तुत ‘विचित्र-वीर-हनुमन्-माला-मन्त्र’ दिव्य प्रभाव से परिपूर्ण है। इससे सभी प्रकार की बाधा, पीड़ा, दुःख का निवारण हो जाता है। शत्रु-विजय हेतु यह अनुपम अमोघ शस्त्र है। पहले प्रतिदिन इस माला मन्त्र के ११०० पाठ १० दिनों तक कर, दशांश गुग्गुल से ‘हवन’ करके सिद्ध कर ले। फिर आवश्यकतानुसार एक बार पाठ करने पर ‘श्रीहनुमानजी’ रक्षा करते हैं। सामान्य लोग प्रतिदिन केवल ११ बार पाठ करके ही अपनी कामना की पूर्ति कर सकते हैं। विनियोग, ऋष्यादि-न्यास, षडंग-न्यास, ध्यान का पाठ पहली और अन्तिम आवृत्ति में करे।
विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीविचित्र-वीर-हनुमन्माला-मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्रो भगवान् ऋषिः। अनुष्टुप छन्दः। श्रीविचित्र-वीर-हनुमान्-देवता। ममाभीष्ट-सिद्धयर्थे माला-मन्त्र-जपे विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यासः-
श्रीरामचन्द्रो भगवान् ऋषये नमः शिरसि। अनुष्टुप छन्दसे नमः मुखे। श्रीविचित्र-वीर-हनुमान्-देवतायै नमः हृदि। ममाभीष्ट-सिद्धयर्थे माला-मन्त्र-जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।
षडङ्ग-न्यासः-
ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः (हृदयाय नमः)। ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः (शिरसे स्वाहा)। ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः (शिखायै वषट्)। ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः (कवचाय हुं)। ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः (नेत्र-त्रयाय वौषट्)। ॐ ह्रः करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः (अस्त्राय फट्)।
ध्यानः-
वामे करे वैर-वहं वहन्तम्, शैलं परे श्रृखला-मालयाढ्यम्।
दधानमाध्मातमु्ग्र-वर्णम्, भजे ज्वलत्-कुण्डलमाञ्नेयम्।।
माला-मन्त्रः-
“ॐ नमो भगवते, विचित्र-वीर-हनुमते, प्रलय-कालानल-प्रभा-ज्वलत्-प्रताप-वज्र-देहाय, अञ्जनी-गर्भ-सम्भूताय, प्रकट-विक्रम-वीर-दैत्य-दानव-यक्ष-राक्षस-ग्रह-बन्धनाय, भूत-ग्रह, प्रेत-ग्रह, पिशाच-ग्रह, शाकिनी-ग्रह, डाकिनी-ग्रह ,काकिनी-ग्रह ,कामिनी-ग्रह ,ब्रह्म-ग्रह, ब्रह्मराक्षस-ग्रह, चोर-ग्रह बन्धनाय, एहि एहि, आगच्छागच्छ, आवेशयावेशय, मम हृदयं प्रवेशय प्रवेशय, स्फुट स्फुट, प्रस्फुट प्रस्फुट, सत्यं कथय कथय, व्याघ्र-मुखं बन्धय बन्धय, सर्प-मुखं बन्धय बन्धय, राज-मुखं बन्धय बन्धय, सभा-मुखं बन्धय बन्धय, शत्रु-मुखं बन्धय बन्धय, सर्व-मुखं बन्धय बन्धय, लंका-प्रासाद-भञ्जक। सर्व-जनं मे वशमानय, श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सर्वानाकर्षयाकर्षय, शत्रून् मर्दय मर्दय, मारय मारय, चूर्णय चूर्णय, खे खे श्रीरामचन्द्राज्ञया प्रज्ञया मम कार्य-सिद्धिं कुरु कुरु, मम शत्रून् भस्मी कुरु कुरु स्वाहा। ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः फट् श्रीविचित्र-वीर-हनुमते। मम सर्व-शत्रून् भस्मी-कुरु कुरु, हन हन, हुं फट् स्वाहा।।”

25…..सर्व ग्रह -बाधा निवारक तंत्र [टोटका ]यदि कोई ग्रह बाधा -कष्ट से पीड़ित है और ग्रहों के उपद्रव ,रोग-शोक ,असफलताए ,कष्ट शांत ,समाप्त करना चाहता है तो यह वनस्पति तंत्र का प्रयोग करने से उसकी समस्या दूर होती है |इसे करने में किसी तरह का भय भी नहीं है |..आक [मदार ],धतुरा ,अपामार्ग [चिरचिटा ],दुब ,बरगद ,पीपल की जड़े ,,शमी ,आम ,गुलर के पत्ते एक मिटटी के नए पात्र [कलश ]में रखकर गाय का घी ,दूध ,मठा [छाछ ]व् गोमूत्र डाले |फिर चना ,चावल ,मूंग ,गेहू ,काले और सफ़ेद तिल ,सफ़ेद सरसों ,लाल और सफ़ेद चन्दन का टुकड़ा ,शहद डालकर पात्र को मिटटी के ही ढक्कन से ढककर शनिवार को संध्याकाळ में पीपल वृक्ष की की जड़े के पास लकड़ी या हाथ से गड्ढा खोदकर सतह से एक फुट नीचे दबा दे ताकि हवा या किसी तरह की ठोकर से पात्र निकल न सके |फिर उसी पीपल वृक्ष के नीचे या किसी शिवालय में बैठकर गाय के घृत का दीपक और अगरबत्ती जलाकर “ओउम नमो भास्कराय [अमुकं ] सर्व ग्रहानाम पीड़ा नाशं कुरु -कुरु स्वाहा “मन्त्र का कम से कम १०८ बार जपं करे |अमुक के स्थान पर पीड़ित व्यक्ति अपना नाम ले या मम कहे |इस क्रिया को करते समय निम्न बातो का ध्यान रखे ..[१] यह क्रिया सर्व ग्रहों की अनिष्टता के लिए है अतः किसी भी ग्रह की खराब दशा में शनिवार के दिन ही संध्याकाळ में क्रिया की जाए और ग्रह पीड़ित यह क्रिया अपने घर में ही अपने हाथो करे |……..[२] मिटटी का कलश नया हो ,समस्त वस्तुए किसी भी क्रम में कलश में डाली जा सकती है |व्यक्ति स्वयं मौन धारण कर कलश में सब वस्तुए डाले ,ढक्कन लगाने के पश्चात फिर कभी न खोले ,वाही पात्र पर ढक्कन लगाए |पूर्ण क्रिया तक मौन ही रहे |………..[३] वृक्ष की जड़ो को इकठ्ठा करते समय जड़े हाथ से ही तोड़े या अन्य व्यक्ति से हाथ से ही तुडवाकर मंगवाए |कटे -फटे ,जमीन पर पड़े हुए पत्ते न ले |[४] क्रिया को पूर्ण गोपनीय रखे॥

26….सर्व-यंत्र-मन्त्र-तंत्रोत्कीलन-स्तोत्र

।। पार्वत्युवाच ।।
देवेश परमानन्द, भक्तानाम भयं प्रद !
आगमाः निगमाश्चैव, बीजं बीजोदयस्तथा ।।१।।
समुदायेन बीजानां, मन्त्रो मंत्रस्य संहिता ।
ऋषिच्छन्दादिकं भेदो, वैदिकं यामलादिकम् ।।२।।
धर्मोऽधर्मस्तथा ज्ञानं, विज्ञानं च विकल्पन ।
निर्विकल्प-विभागेन, तथा षट्-कर्म-सिद्धये ।।३।।
भुक्ति-मुक्ति-प्रकारश्च, सर्वं प्राप्तं प्रसादतः ।
कीलनं सर्व-मन्त्राणां, शंसयद् हृदये वचः ।।४।।
इति श्रुत्वा शिवा-नाथः, पार्वत्या वचनं शुभम् ।
उवाच परया प्रीत्या, मन्त्रोत्कीलनकं शिवां ।।५।।
।। शिव उचाव ।।
वरानने ! हि सर्वस्य, व्यक्ताव्यक्तस्य वस्तुनः ।
साक्षी-भूय त्वमेवासि, जगतस्तु मनोस्तथा ।।६।।
त्वया पृष्टं वरारोहे ! तद्वक्ष्याम्युत्कीलनम् ।
उद्दीपनं हि मंत्रस्य, सर्वस्योत्कीलनम भवेत् ।।७।।
पूरा तव मया भद्रे ! समाकर्षण-वश्यजा ।
मन्त्राणां कीलिता-सिद्धिः, सर्वे ते सप्त-कोटयः ।।८।।
तदानुग्रह-प्रीतस्त्वात्, सिद्धिस्तेषां फलप्रदा ।
येनोपायेन भवति, तं स्तोत्रं कथाम्यहम ।।९।।
श्रृणु भद्रेऽत्र सततमावाम्यामखिलं जगत् ।
तस्य सिद्धिर्भवेत्तिष्ठे, माया येषां प्रभावकम् ।।१०।।
अन्नं पानं हि सौभाग्यं, दत्तं तुभ्यं मया शिवे !
संजीवनं च मन्त्राणां, तथा दत्तुं पुनर्धुवम ।।११।।
यस्य स्मरण-मात्रेण, पाठेन जपतोऽपि वा !
अकीला अखिला मन्त्राः, सत्यं सत्यं न संशयः ।।१२।।
विनियोगः- ॐ अस्य सर्व-यन्त्र-मन्त्र-तन्त्राणामुत्कीलन-मन्त्र-स्तोत्रस्य मूल-प्रकृतिः ऋषिः, जगतीच्छन्द, निरञ्जनो देवता, क्लीं वीजं, ह्रीं शक्तिः, ह्रः सौं कीलकं, सप्त-कोटि-मन्त्र-यन्त्र-तन्त्र-कीलकानां सञ्जीवन-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।
ऋष्यादि-न्यासः-ॐ मूल-प्रकृतिः ऋषये नमः शिरसि, ॐ जगतीच्छन्दसे नमः मुखे, ॐ निरञ्जनो देवतायै नमः हृदि, ॐ क्लीं वीजाय नमः गुह्ये, ॐ ह्रीं शक्तये नमः पादयो, ॐ ह्रः सौं कीलकाय नमः नाभौ, ॐ सप्त-कोटि-मन्त्र-यन्त्र-तन्त्र-कीलकानां सञ्जीवन-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः सर्वांगे ।
षडङ्ग-न्यास – कर-न्यास – अंग-न्यास -
ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वषट्
ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः कवचाय हुम्
ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र-त्रयाय वौषट्
ॐ ह्रः करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः अस्त्राय फट्

ध्यानः-
ॐ ब्रह्म-स्वरुपममलं च निरञ्जनं तं,
ज्योतिः-प्रकाशमनिशं महतो महान्तम् ।
कारुण्य-रुपमति-बोध-करं प्रसन्नं,
दिव्यं स्मरामि सततं मनु-जीवनाय ।।
एवं ध्यात्वा स्मरेन्नित्यं, तस्य सिद्धिरस्तु सर्वदा । वाञ्छितं फलमाप्नोति, मन्त्र-संजीवनं ध्रुवम् ।।
मन्त्रः- ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं सर्व-मन्त्र-यन्त्र-तन्त्रादीनामुत्कीलनं कुरु-कुरु स्वाहा ।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं षट्-पञ्चाक्षराणामुत्कीलय उत्कीलय स्वाहा । ॐ जूं सर्व-मन्त्र-यन्त्र-तन्त्राणां सञ्जीवनं कुरु-कुरु स्वाहा ।
ॐ ह्रीं जूं, अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लृं ॡं एं ऐं ओं औं अं अः, कं खं गं घं ङं, चं छं जं झं ञं, टं ठं डं ढं णं, तं थं दं धं नं, पं फं बं भं मं, यं रं लं वं, शं षं सं हं ळं क्षं । मात्राऽक्षराणां सर्व उत्कीलनं कुरु-कुरु स्वाहा ।
ॐ सोऽहं हंसोऽहं ॐ सोऽहं हंसोऽहं ॐ सोऽहं हंसोऽहं ॐ सोऽहं हंसोऽहं ॐ सोऽहं हंसोऽहं ॐ सोऽहं हंसोऽहं ॐ सोऽहं हंसोऽहं ॐ सोऽहं हंसोऽहं ॐ सोऽहं हंसोऽहं ॐ सोऽहं हंसोऽहं ॐ सोऽहं हंसोऽहं ॐ जूं सोहं हंसः ॐ ॐ ॐ जूं सोहं हंसः ॐ ॐ ॐ जूं सोहं हंसः ॐ ॐ ॐ जूं सोहं हंसः ॐ ॐ ॐ जूं सोहं हंसः ॐ ॐ ॐ जूं सोहं हंसः ॐ ॐ ॐ जूं सोहं हंसः ॐ ॐ ॐ जूं सोहं हंसः ॐ ॐ ॐ जूं सोहं हंसः ॐ ॐ ॐ जूं सोहं हंसः ॐ ॐ ॐ जूं सोहं हंसः ॐ ॐ हं जूं हं सं गं हं जूं हं सं गं हं जूं हं सं गं हं जूं हं सं गं हं जूं हं सं गं हं जूं हं सं गं हं जूं हं सं गं हं जूं हं सं गं हं जूं हं सं गं हं जूं हं सं गं हं जूं हं सं गं सोऽहं हंसो यं सोऽहं हंसो यं सोऽहं हंसो यं सोऽहं हंसो यं सोऽहं हंसो यं सोऽहं हंसो यं सोऽहं हंसो यं सोऽहं हंसो यं सोऽहं हंसो यं सोऽहं हंसो यं सोऽहं हंसो यं लं लं लं लं लं लं लं लं लं लं लं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ यं यं यं यं यं यं यं यं यं यं यं , ॐ ह्रीं जूं सर्व-मन्त्र-यन्त्र-तन्त्र-स्तोत्र-कवचादीनां सञ्जीवय-सञ्जीवय कुरु-कुरु स्वाहा । ॐ सोऽहं हंसः ॐ सञ्जीवनं स्वाहा । ॐ ह्रीं मन्त्राक्षराणामुत्कीलय, उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा ।
ॐ ॐ प्रणव-रुपाय, अं आं परम-रुपिणे । इं ईं शक्ति-स्वरुपाय, उं ऊं तेजो-मयाय च ।।
ऋं ॠं रंजित-दीप्ताय, लृं ॡं स्थूल-स्वरुपिणे, एं ऐं वाचां विलासाय, ओं औं अं अः शिवाय च ।।
कं खं कमल-नेत्राय, गं घं गरुड़-गामिने । ङं चं श्री चन्द्र-भालाय, छं जं जय-कराय च ।।
झं ञं टं ठं जय-कर्त्रे, डं ढं णं तं पराय च । थं दं धं नं नमस्तस्मै, पं फं यन्त्र-मयाय च ।।
बं भं मं बल-वीर्याय, यं रं लं यशसे नमः । वं शं षं बहु-वादाय, सं हं ळं क्षं-स्वरुपिणे ।।
दिशामादित्य-रुपाय, तेजसे रुप-धारिणे । अनन्ताय अनन्ताय, नमस्तस्मै नमो नमः ।।
मातृकाया प्रकाशायै, तुभ्यं तस्यै नमो नमः । प्राणेशायै क्षीणदायै, सं सञ्जीव नमो नमः ।।
निरञ्जनस्य देवस्य, नाम-कर्म-विधानतः । त्वया ध्यानं च शक्तया च, तेन सञ्जायते जगत् ।।
स्तुतामहमचिरं ध्यात्वा, मायाया ध्वंस-हेतवे । सन्तुष्टा भार्गवायाहं, यशस्वी जायते हि सः ।।
ब्रह्माणं चेतयन्ती विविध-सुर-नरास्तर्पयन्ती प्रमोदाद् ।
ध्यानेनोद्दीपयन्ती निगम-जप-मनुं षट्-पदं प्रेरयन्ती ।।
सर्वान् देवान् जयन्ती दिति-सुत-दमनी साऽप्यहंकार-मूर्ति-
स्तुभ्यं तस्मै च जाप्यं स्मर-रचितमनुं मोचये शाप-जालात् ।।
इदं श्रीत्रिपुरा-स्तोत्रं पठेद् भक्तया तु यो नरः ।
सर्वान् कामानवाप्नोति सर्व-शापाद् विमुच्यते ।।

27….सर्व-संकट- हारी-प्रयोग
“सर्वा बाधासु, वेदनाभ्यर्दितोऽप- ।
स्मरन् ममैच्चरितं, नरो मुच्यते संकटात्।।
ॐ नमः शिवाय।”
उपर्युक्त मन्त्र से ‘सप्त-श्लोकी दुर्गा का एकादश अर्थात् ११ बार सम्पुट-पाठ करने से सब प्रकार के संकटों से छुटकारा मिलता है। प्रत्येक ‘पाठ’ करने के बाद उक्त ‘सम्पुट-मन्त्र’ के अन्त में “स्वाहा” जोड़कर एकादश बार निम्न-लिखित वस्तुओं से हवन करेः-
१॰ अर्जुन की छाल का चूर्ण, २॰ शुद्ध शहद, ३॰ मिश्री ४॰ गाय का घी और ५॰ खीर- यह सब मिलाकर रख लें और उसी से हवन करें।
खीर बनाने के लिए सायंकाल ‘चावल’ को जल में भिगो दें। प्रातः जल गिराकर भीगे हुए चावलों को गाय के शुद्ध घी से भून लें। चावल हल्का लाल भूनने के बाद उसमें आवश्यकतानुसार चीनी, पञ्चमेवा, गाय का दूध डालकर पकावें। जब गाय का दूध पककर सूख जावे, तब ‘खीर’ को उतार लें और ठण्डी कर उपर्युक्त ४ वस्तुओं के साथ मिला कर रखें।………