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1…..महाकाली
भगवती कालिका अर्थात काली के अनेक स्वरुप, अनेक मन्त्र तथा अनेक उपासनाविधियां है। यथा-श्यामा, दक्षिणा कालिका (दक्षिण काली) गुह्म काली, भद्रकाली, महाकाली आदि । दशमहाविद्यान्तर्गत भगवती दक्षिणा काली (दक्षिणकालीका) की उपासना की जाती है।
दक्षिण कालिका के मन्त्र :- भगवती दक्षिण कालिका के अनेक मन्त्र है, जिसमें से कुछ इस प्रकार है।
(1) क्रीं,
(2) ॐ ह्रीं ह्रीं हुं हुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हुं हुं ह्रीं ह्रीं।
(3) ह्रीं ह्रीं हुं हुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं हुं हुं ह्रीं ह्रीं स्वाहा।
(4) नमः ऐं क्रीं क्रीं कालिकायै स्वाहा।
(5) नमः आं क्रां आं क्रों फट स्वाहा कालि कालिके हूं।
(6) क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हुं हुं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रींह्रीं ह्रीं हुं हुं स्वाहा। इनमें से कीसी भी मन्त्र का जप किया जा सकताहै।
पूजा -विधि :- दैनिक कृत्य स्नान-प्राणायम आदि से निवृत होकरस्वच्छ वस्त्र धारण कर, सामान्य पूजा-विधि से काली- यन्त्र का पूजन करें।तत्पश्चात ॠष्यादि- न्यास एंव करागन्यास करके भगवती का इस प्रकार ध्यानकरें-
शवारुढां महाभीमां घोरदृंष्ट्रां वरप्रदाम्।
हास्य युक्तां त्रिनेत्रां च कपाल कर्तृकाकराम्।
मुक्त केशी ललजिह्वां पिबंती रुधिरं मुहु:।
चतुर्बाहूयुतां देवीं वराभयकरां स्मरेत्॥”
इसके उपरान्त मूल-मन्त्र द्वारा व्यापक-न्यास करके यथा विधि मुद्रा-प्रदर्शन पूर्वक पुनः ध्यान करना चाहिए।
पुरश्चरण : – कालिका मन्त्र के पुरश्चरण में दो लाख की संख्या में मन्त्र-जप कियाहै। कुछ मन्त्र केवल एक लाख की संख्या में भी जपे जाते है। जप का दशांश होमघृत द्वारा करना चाहिए । होम का दशांश तर्पण, तर्प्ण का दशांश अभिषेक तथाअभिषेक का दशांश ब्राह्मण – भोजन कराने का नियम है।
विशेष : -” दक्षिणाकालिका “ देवी के मन्त्र रात्रि के समय जप करने से शीघ्र सिद्धि प्रदानकरते है। जप के पश्चात स्त्रोत, कवच, ह्रदय आदि उपलब्ध है, उनमें से चाहेंजिनका पाठ करना चाहिए । वे सभी साधकों के लिए सिद्धिदायक है।
परिचय- दुर्गाजी का एक रुप कालीजी है। यह देवी विशेष रुप से शत्रुसंहार, विघ्ननिवारण, संकटनाश और सुरक्षा की अधीश्वरी है।
यह तथ्य प्रसिद्ध है कि इनकी कृपा मात्र से भक्त को ज्ञान, सम्पति, यशऔर अन्य सभी भौतिक सुखसमृद्धि के साधन प्राप्त हो सकते है, पर विशेष रुप सेइनकी उपासन्न सुरक्षा, शौर्य, पराक्रम, युद्ध, विवाद और प्रभाव विस्तर केसंदर्भ में की जाती है। कालीजी की रुपरेखा भयानक है। देखकर सहसा रोमांच होआता है। पर वह उनका दुष्टदलन रुप है।
भक्तों के प्रति तो वे सदैव ही परम दयालु और ममतामयी रहती है। उनकी पूजाके द्वारा व्यक्ति हर प्रकार की सुरक्षा और समृद्धि प्राप्त कर सकता है।
विधि -
लाल आसन पर कालीजी की प्रतिमा अथवा चित्र या यन्त्र स्थापित करके, लालचन्दन, पुष्प तथा धूपदीप से पूजा करके मन्त्र जप करना चाहिए। नियमत रुप सेश्रद्धापूर्वक आराधना करने वालि जनों को कालीजी(प्रायः सभी शक्ति स्वरुप)स्वप्न मे दर्शन देती है। ऐसे दर्शन से घबङाना नहीं चाहिए और उस स्वप्न कीकहीं चर्चा भी नही चाहिए। कालीजी की पुजा में बली का विधान भी है। किन्तसात्विक उपासना की दृष्टि से बलि के नाम पर नारियल अथवा किसी फल का प्रयोगकिया जा सकता है।
वैसै, देवी – देवता मात्र श्रद्धा से ही प्रसन्न हो जाते है, ये भौतिकउपादान उनकी दृष्टि में बहुत महत्वपूर्ण नहीं होते । कुछ भी न हो और कोईसाधक केवल श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति ही करता रहे, तो भी वह सफल मनोरथ हो सकता है।
धयान स्तुति-
खडगं गदेषु चाप परिघां शूलम भुशुंडी शिरः
शंखं संदधतीं करैस्तिनयनां सर्वाग भूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्य पाद द्शकां सेवै महाकालिकाम्।
यामस्तौत्स्वपितो हरौ कमलजो हन्तुं मधु कैटभम्॥
जप मन्त्र-
ॐ क्रां क्रीं क्रूं कालिकाय नमः।
प्रार्थना-
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै ससतं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै निततां प्रणतां स्मताम्॥
श्री महाकाली यन्त्र
श्मशान साधना मे काली उपासना का बङा महत्व है। इसी सन्दर्भ मे महाकालीयन्त्र का प्रयोग शत्रु नाश, मोहन, मारण, उच्चाट्न आदि कार्यों मेंप्रयुक्त होता है। मध्य मे बिन्दू, पांच उल्ट कोण, तीन वृत कोण, अष्टदल वृतएवं भूरपुर से आवृत महाकाली का यन्त्र तैयार करे।
इस यन्त्र का पूजन करते समय शव पर आरुढ, मुण्ड्माला धारण की हुई, खड्ग, त्रिशूल, खप्पर व एक हाथ मे नर-मुण्ड धारण की हुई, रक्त जिह्वा लपलपाती हुईभयंकर स्वरुप वाली महाकाली का ध्यान किया जाता है। जब अन्य विद्यायें विफलहो जाती है तब इस यन्त्र का सहारा लिया जाता है।
महाकाली की उपासना अमोघ मानी गई है। इस यन्त्र के नित्य पूजन से अरिष्टबाधाओं का स्वतः ही नाश होकर शत्रुओ का पराभव होता है। शक्ति के उपासकों केलिए यह यन्त्र विशेष फलदायी है। चैत्र, आषाढ, आश्विन एवं माघ की अष्टमीइसकी साधना हेतु सर्वश्रेष्ठ काल माना गया है।
काली सम्बन्ध में तंत्र-शास्त्र के 250-300 के लगभग ग्रंथ माने गये हैं, जिनमें बहुत से ग्रथं लुप्त है, कुछ पुस्तकालयों में सुरक्षित है । अंशमात्र ग्रंथ ही अवलोकन हेतु उपलब्ध हैं । ‘काम-धेनु तन्त्र’ में लिखा है कि – “काल संकलनात् काली कालग्रासं करोत्यतः”। तंत्रों में स्थान-स्थान पर शिव नेश्यामा काली (दक्षिणा-काली) औरसिद्धिकाली(गुह्यकाली) को केवल“काली”संज्ञा से पुकारा हैं । दशमहाविद्या के मत से तथालघुक्रमऔरह्याद्याम्ताय क्रमके मत सेश्यामाकालीकोआद्या, नीलकाली (तारा) कोद्वितीयाऔरप्रपञ्चेश्वरी रक्तकाली(महा-त्रिपुर सुन्दरी) कोतृतीयाकहते हैं, परन्तु श्यामाकाली आद्या काली नहीं आद्यविद्या हैं ।पीताम्बरा बगलामुखी को पीतकाली भी कहा है।
कालिका द्विविधा प्रोक्ता कृष्णा – रक्ता प्रभेदतः ।
कृष्णा तु दक्षिणा प्रोक्ता रक्ता तु सुन्दरीमता ।।

काली के अनेक भेद हैं -
पुरश्चर्यार्णवेः-१॰ दक्षिणाकाली, २॰ भद्रकाली, ३॰श्मशानकाली, ४॰ कामकलाकाली, ५॰ गुह्यकाली, ६॰ कामकलाकाली, ७॰ धनकाली, ८॰सिद्धिकाली तथा ९॰ चण्डीकाली ।
जयद्रथयामलेः-१॰ डम्बरकाली, २॰ गह्नेश्वरी काली, ३॰एकतारा, ४॰ चण्डशाबरी, ५॰ वज्रवती, ६॰ रक्षाकाली, ७॰ इन्दीवरीकाली, ८॰धनदा, ९॰ रमण्या, १०॰ ईशानकाली तथा ११॰ मन्त्रमाता ।
सम्मोहने तंत्रेः-१॰ स्पर्शकाली, २॰ चिन्तामणि, ३॰ सिद्धकाली, ४॰ विज्ञाराज्ञी, ५॰ कामकला, ६॰ हंसकाली, ७॰ गुह्यकाली ।
तंत्रान्तरेऽपिः-१॰ चिंतामणि काली, २॰ स्पर्शकाली, ३॰ सन्तति-प्रदा-काली, ४॰ दक्षिणा काली, ६॰ कामकला काली, ७॰ हंसकाली, ८॰ गुह्यकाली ।
उक्त सभी भेदों में से दक्षिणा और भद्रकाली ‘दक्षिणाम्नाय’के अन्तर्गत हैं तथा गुह्यकाली, कामकलाकाली, महाकाली और महा-श्मशान-कालीउत्तराम्नायसे सम्बन्धित है । काली की उपासना तीन आम्नायों से होती है । तंत्रों में कहा हैं “दक्षिणोपासकः का`लः” अर्थात्दक्षिणोपासकमहाकाल के समान हो जाता हैं ।उत्तराम्नायोपासाकज्ञान योग से ज्ञानी बन जाते हैं ।ऊर्ध्वाम्नायोपासकपूर्णक्रम उपलब्ध करने से निर्वाणमुक्ति को प्राप्त करते हैं ।दक्षिणाम्नाय में कामकला काली को कामकलादक्षिणाकाली कहते हैं । उत्तराम्नायके उपासक भाषाकाली में कामकला गुह्यकाली की उपासना करते हैं । विस्तृतवर्णन पुरुश्चर्यार्णव में दिया गया है ।
गुह्यकाली की उपासना नेपाल में विशेष प्रचलित हैं । इसके मुख्य उपासकब्रह्मा, वशिष्ठ, राम, कुबेर, यम, भरत, रावण, बालि, वासव, बलि, इन्द्र आदिहुए हैं ।.

।। श्री श्री काली सहस्त्राक्षरी ।।
ॐ क्रीं क्रीँ क्रीँ ह्रीँ ह्रीँ हूं हूं दक्षिणे कालिके क्रीँ क्रीँ क्रीँ ह्रीँ ह्रीँ हूं हूं स्वाहा शुचिजाया महापिशाचिनी दुष्टचित्तनिवारिणी क्रीँ कामेश्वरी वीँ हं वाराहिके ह्रीँ महामाये खं खः क्रोघाघिपे श्रीमहालक्ष्यै सर्वहृदय रञ्जनी वाग्वादिनीविधे त्रिपुरे हंस्त्रिँ हसकहलह्रीँ हस्त्रैँ ॐ ह्रीँ क्लीँ मे स्वाहा ॐ ॐ ह्रीँ ईं स्वाहा दक्षिण कालिके क्रीँ हूं ह्रीँ स्वाहा खड्गमुण्डधरे कुरुकुल्ले तारे ॐ. ह्रीँ नमः भयोन्मादिनी भयं मम हन हन पच पच मथ मथ फ्रेँ विमोहिनी सर्वदुष्टान् मोहय मोहय हयग्रीवे सिँहवाहिनी सिँहस्थे अश्वारुढे अश्वमुरिप विद्राविणी विद्रावय मम शत्रून मां हिँसितुमुघतास्तान् ग्रस ग्रस महानीले वलाकिनी नीलपताके क्रेँ क्रीँ क्रेँ कामे संक्षोभिणी उच्छिष्टचाण्डालिके सर्वजगव्दशमानय वशमानय मातग्ङिनी उच्छिष्टचाण्डालिनी मातग्ङिनी सर्वशंकरी नमः स्वाहा विस्फारिणी कपालधरे घोरे घोरनादिनी भूर शत्रून् विनाशिनी उन्मादिनी रोँ रोँ रोँ रीँ ह्रीँ श्रीँ हसौः सौँ वद वद क्लीँ क्लीँ क्लीँ क्रीँ क्रीँ क्रीँ कति कति स्वाहा काहि काहि कालिके शम्वरघातिनी कामेश्वरी कामिके ह्रं ह्रं क्रीँ स्वाहा हृदयाहये ॐ ह्रीँ क्रीँ मे स्वाहा ठः ठः ठः क्रीँ ह्रं ह्रीँ चामुण्डे हृदयजनाभि असूनवग्रस ग्रस दुष्टजनान् अमून शंखिनी क्षतजचर्चितस्तने उन्नस्तने विष्टंभकारिणि विघाधिके श्मशानवासिनी कलय कलय विकलय विकलय कालग्राहिके सिँहे दक्षिणकालिके अनिरुद्दये ब्रूहि ब्रूहि जगच्चित्रिरे चमत्कारिणी हं कालिके करालिके घोरे कह कह तडागे तोये गहने कानने शत्रुपक्षे शरीरे मर्दिनि पाहि पाहि अम्बिके तुभ्यं कल विकलायै बलप्रमथनायै योगमार्ग गच्छ गच्छ निदर्शिके देहिनि दर्शनं देहि देहि मर्दिनि महिषमर्दिन्यै स्वाहा रिपुन्दर्शने दर्शय दर्शय सिँहपूरप्रवेशिनि वीरकारिणि क्रीँ क्रीँ क्रीँ हूं हूं ह्रीँ ह्रीँ फट् स्वाहा शक्तिरुपायै रोँ वा गणपायै रोँ रोँ रोँ व्यामोहिनि यन्त्रनिकेमहाकायायै प्रकटवदनायै लोलजिह्वायै मुण्डमालिनि महाकालरसिकायै नमो नमः ब्रम्हरन्ध्रमेदिन्यै नमो नमः शत्रुविग्रहकलहान् त्रिपुरभोगिन्यै विषज्वालामालिनी तन्त्रनिके मेधप्रभे शवावतंसे हंसिके कालि कपालिनि कुल्ले कुरुकुल्ले चैतन्यप्रभेप्रज्ञे तु साम्राज्ञि ज्ञान ह्रीँ ह्रीँ रक्ष रक्ष ज्वाला प्रचण्ड चण्डिकेयं शक्तिमार्तण्डभैरवि विप्रचित्तिके विरोधिनि आकर्णय आकर्णय पिशिते पिशितप्रिये नमो नमः खः खः खः मर्दय मर्दय शत्रून् ठः ठः ठः कालिकायै नमो नमः ब्राम्हयै नमो नमः माहेश्वर्यै नमो नमः कौमार्यै नमो नमः वैष्णव्यै नमो नमः वाराह्यै नमो नमः इन्द्राण्यै नमो नमः चामुण्डायै नमो नमः अपराजितायै नमो नमः नारसिँहिकायै नमो नमः कालि महाकालिके अनिरुध्दके सरस्वति फट् स्वाहा पाहि पाहि ललाटं भल्लाटनी अस्त्रीकले जीववहे वाचं रक्ष रक्ष परविधा क्षोभय क्षोभय आकृष्य आकृष्य कट कट महामोहिनिके चीरसिध्दके कृष्णरुपिणी अंजनसिद्धके स्तम्भिनि मोहिनि मोक्षमार्गानि दर्शय दर्शय स्वाहा ।।
इस काली सहस्त्राक्षरी का नित्य पाठ करने से ऐश्वर्य,मोक्ष,सुख,समृद्धि,एवं शत्रुविजय प्राप्त होता है ।।
सिद्ध मंत्र
प्रणाम मन्त्र
कामाख्ये कामसम्पन्ने कामेश्वरि हरप्रिये ।
कामनां देहि मे नित्यं कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
अनुज्ञा मन्त्र
कामदे कामरुपस्थे सुभगे सुरसेविते ।
करोमि दर्शनं देव्याः सर्वकामार्थसिद्धये ॥
यह चलन्ता, हरगौरी अथवा भोगमूर्ति अष्टधातुमयी है । यह प्रस्तर निर्मित पचस्तर विशिष्ट सिंहासनासीन है, मूर्ति इस प्रकार की है कि उत्तर में वृषभवाहन, पंचवक्त्र एवं दशभुज विशिष्ट कामेश्वर महादेव अवस्थित हैं । दक्षिण भाग में षडानना, द्वादशबाहुइ विशिष्टा अष्टादश लोचना सिंहवाहिनी कमलासना देवी मूर्ति है । यह मूर्ति महामाया कामेश्वरी नाम से प्रख्यात है ।
विष्णुब्रह्मशिवैर्देवैर्धृयते या जगन्मयी ।
सितप्रेतो महादेवो ब्रह्मा लोहितपंकजम् ॥
हरिर्हरिस्तु विज्ञेयो वाहनानि महौजसः ।
स्वमूर्त्ता वाहनत्वन्तु तेषां यस्मान्न युज्यते ॥
– कालिका पुराण
वही जगन्मयी कामेश्वरी ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव कर्त्तक घृत हैं, महादेव ही यहाँ सितप्रेत अर्थात् शवरुप हैं, ब्रह्मा ही लोहित पंकज हैं एवं विष्णु सिंह रुप से अवस्थित हैं, इन देवताओं को अपनी – अपनी मूर्ति में वाहन, बनना युक्ति युक्त नहीं है – इसलिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर अन्य रुप धारण कर देवी के वाहन बने हुए हैं ।’
जो साधक वाहन सहित देवी की इस मूर्ति का ध्यान एवं पूजा करते हैं, उनके द्वारा ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर ये तीनों देवता भी पूजित होते हैं ।
वार्षिक उत्सवों तथा विशेष पर्वपार्वण के दिनों में यह चलन्ता मूर्ति भ्रमण कराई जाती है । तीर्थ – यात्री पहले कामेश्वरी देवी एवं कामेश्वर शिव का दर्शन करते हैं । इसके बाद देवी के महामुद्रा का दर्शन करते हैं । देवी की योनिमुद्रा पीठ दश सोपान ( सीढ़ी ) नीचे अन्धकार पूर्ण गुफा में अवस्थित होने के कारण वहाँ सदा दीपक का प्रकाश रहता है ।
कामाख्या देवी का प्रणाम मन्त्र
कामाख्ये वरदे देवि नीलपर्वतवासिनि ।
त्वं देवि जगतां मातर्योनिमुद्रे नमोऽस्तु ते ॥
स्पर्श मन्त्र
मनोभवगुहा मध्ये रक्तपाषाण रुपिणी ।
तस्याः स्पर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते ॥
चरणामृत – पान मन्त्र
शुकादीनाञ्च यज् ज्ञानं यमादि परिशोधितम् ।
तदेव द्रवरुपेण कामाख्या योनिमण्डले ॥
देवी महामाया से जो जैसी याचना करते है और देवी की प्रसन्नतार्थ जप, होम, पूजा – पाठादि करते हैं, देवी उनके मन की अभीष्ट कामनाओं को उसी रुप में पूर्ण करती हैं । जो भक्तिभाव से देवी की योनिमण्डल का दर्शन, स्पर्शन तथा मुद्रा का जलपान करते हैं वे देवऋण, पितृऋण एवं ऋषिऋण से मुक्त होते हैं । यथा –
ऋणानि त्रीण्यपाकर्तुं यस्य चित्तं प्रसीदति ।
स गच्छेत् परया भक्त्या कामाख्या योनि सन्निधि ।
– योगिनी तन्त्र
पितृऋण, ऋषिऋण एवं देवऋण चुकाने के लिए जिसका मन प्रसन्न हो वह परम भक्तिभाव के साथ कामाख्या योनिमण्डल के निकट जाए ।
गवां कोटि प्रदानात्तु यत्फलं जायते नृणाम् ।
तत्फलं समवाप्नोति कामाख्या पूजयेन्नरः ॥
– कालिका पुराण
कोटि गोदान करने से मनुष्य को जो फल मिलता है वही फल कामाख्या देवी की पूजा करने से प्राप्त होता है ।
चार वर्ग क्षेत्र विशिष्ट शिलापीठ के ऊपर, जहाँ से निरन्तर पाताल से जल निकलता रहता है, वही कामाख्या का योनिमण्डल है । इस योनिमण्डल का परिमाण एक हाथ लम्बा एवं बारह अंगुल चौड़ा है और सत्तासी धनु परिमित स्थान में रुक्ष रक्त है एवं सपुलत अष्टहस्त तथा पचास हजार पुलकान्वित शिवलिंग युक्त है । यथा –
सप्तशीति धनुर्मानं रुक्षरक्त शिला च या ।
अष्टहस्तं सपुलकं लिंग लक्षार्द्धसंयुतम् ॥
चतुर्हस्त समं क्षेत्रः पश्चिमे योनिमण्डलम् ।
बाहुमात्रमिदञ्चैव प्रस्तारे द्वादशांगुलम् ॥
आपातालं जलं तत्र योनिमध्ये प्रतिस्थितम् ॥
– योगिनी तन्त्र
तृमा अंग होने के कारण इसका आधा भाग सोने के टोप से ढका रहता है और टोप को भी वस्त्र एवं पुष्प माल्यादि से आवृत तथा सुशोभित रखा जाता है । दर्शन, स्पर्शन एवं जप – पूजादि के लिए केवल एक अंश उन्मुक्त रखा जाता है । मातृअंग निपतित होकर यहाँ अवस्थित होने के कारण इस महातीर्थ को शक्तिपीठ स्थान कहा जाता है और यह सभी तीर्थों में प्रधान है । आद्याशक्ति प्रसन्न होने पर जीव को मुक्ति प्रदान करती है । अतः शक्ति साधक देवी को प्रसन्न करने के लिए कामाख्या को सर्वप्रधान शक्तिपीठ तथा तान्त्रिक क्रिया पद्धति का केन्द्र समझकर, यहाँ आकर महामुद्रा का नित्य दर्शन एवं उपासना करना जीवन का महान् कर्त्तव्य मानते हैं । इस पुण्य भारत भूमि के अनेक प्रातः स्मरणीय महापुरुषों ने इस पीठस्थान में आगमन कर तपस्या द्वारा सिद्धि लाभ किया है, इस बात का यथेष्ट प्रमाण है । आज भी उन सिद्धि साधकों के वंशधरों में से लोग यहा आते रहते हैं ।

2..श्री कालीस्तुतिः
विद्युत्कान्तिसमानाभदन्तपङ्क्तिबलाकिनीम् ।
नमामि तां विश्वमातां कालमेघसमद्युतिम् ।।
मुण्डमालावलीरम्यां मुक्तकेशीं दिगम्बराम् ।।
ललज्जिह्वां घोररावामारक्तान्तत्रिलोचनाम् ।
कोटिकोटिकलानाथविलसन्मुखमण्डलाम् ।
अमाकलतासमुल्लासोज्जवलत्कोटीरमण्डलाम् ।
शवद्वयाभूषकर्णां नानामणिविभूषिताम् ।।
सूर्यकान्तेन्दुकान्तौघप्रोल्लसत्कर्णभूषणाम् ।
मृतहस्तसहस्रैस्तु कृत्काञ्चीं हसन्मुखीम् ।।
सुक्कद्वयगलद्रक्तधाराविस्फारितानननाम् ।
खड्गमुण्डवराभीतिसंशोभितचतुर्भुजानम् ।।
दन्तुरां परमां नित्यां रक्तमण्डितविग्रहाम् ।
शिवप्रेतसमारूढ़ां महाकालोपरिस्थिताम् ।
वादपादं शिवहृदि दक्षिणे लोकलाञ्छिताम् ।
कोटिसूर्यप्रीकाशां समस्तभुवनोज्ज्वलाम् ।।
विद्युत्पुञ्जसमानाभज्वलज्जटाविराजिताम् ।
रजताद्रिनिभां देवीं स्पटिकाचलविग्रहाम् ।।
दिगम्बरां महाघोरां चन्द्रार्कपरिमण्डिताम् ।
नानालङ्कारभूषाढ्यां भास्वत्स्वर्णतनूरुहाम् ।।
योगनिद्राधरां सुभ्रूं स्मेराननसरोरुहाम् ।
विपरीतरतासक्तां महाकालेन सन्ततम् ।।
अशेषब्रह्माण्डप्रकाशितमहाबलाम् ।
शिवाभिर्घोररावाभिर्वेष्टतां प्रलयोदिताम् ।।
कोटिकोटिशरच्चन्द्रन्यक्कृतोन्नखमण्डलाम् ।
सुधापूर्णशिरोशिरोहस्तयोगिनीभिर्विराजिताम् ।।
आरक्तमुखभीमाभिर्मदमत्ताभिरन्विताम् ।
घोररूपैर्महानादैश्चण्डतापैश्च भैरवैः ।।
गृहीतशवकङ्कालजयशब्दपरायणैः ।
नृत्यद्भिर्वादनपरैरनिशं च दिगम्बरैः ।।
श्मशानालयमध्यस्थां ब्रह्माद्दुपनिषेविताम् ।।
{ इति योगिनीतन्त्रे पूर्वखण्डे प्रथमपटले ईश्वरकृता – श्री कालीस्तुतिः }

 

भगवती भद्रकाली के ध्यान
तन्त्रों में भगवती भद्रकाली का ध्यान इस प्रकार दिया गया है -
“डिम्भं डिम्भं सुडिम्भं पच मन दुहसां झ प्रकम्पं प्रझम्पं, विल्लं त्रिल्लं
त्रि-त्रिल्लं त्रिखलमख-मखा खं खमं खं खमं खम् ।
गूहं गूहं तु गुह्यं गुडलुगड गुदा दाडिया डिम्बुदेति,
नृत्यन्ती शब्दवाद्यैः प्रलयपितृवने श्रेयसे वोऽस्तु काली ।।”
भद्रकाली के भी दो भेद हैं (१) विपरित प्रत्यंगिरा भद्रकाली तथा (२) षोडश भुजा दुर्गाभद्रकाली । मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत दुर्गासप्तशती में जो काली अम्बिका के ललाट से उत्पन्न हुई, वह कालीपुराण से भिन्न हैं । उसका ध्यान इस प्रकार है -
नीलोत्पल-दल-श्यामा चतुर्बाहु समन्विता ।
खट्वांग चन्द्रहासञ्च चिभ्रती दक्षिणकरे ।।
वामे चर्म च पाशञ्च उर्ध्वाधो-भावतः पुनः ।
दधती मुण्डमालाञ्च व्याघ्र-चर्म वराम्बरा ।।
कृशांगी दीर्घदंष्ट्रा च अतिदीर्घाऽति भीषणा ।
लोल-जिह्वा निम्न-रक्त-नयना नादभैरवा ।।
कबन्धवाहना पीनविस्तार श्रवणानना ।।
‘दक्षिणकाली’ मन्त्र विग्रह हृदय में “प्रलय-कालीन-ध्यान” इस प्रकार है -
क्षुच्छ्यामां कोटराक्षीं प्रलय घन-घटां घोर-रुपां प्रचण्डां,
दिग्-वस्त्रां पिङ्ग-केशीं डमरु सृणिधृतां खड़गपाशाऽभयानि ।
नागं घण्टां कपालं करसरसिरुहैः कालिकां कृष्ण-वर्णां
ध्यायामि ध्येयमानां सकल-सुखकरीं कालिकां तां नमामि ।।
‘महाकाल-संहिता’ के शकारादि विश्वसाम्राज्य श्यामासहस्रनाम में “निर्गुण-ध्यान” इस प्रकार है -
ब्रह्मा-विष्णु शिवास्थि-मुण्ड-रसनां ताम्बूल रक्ताषांबराम् ।
वर्षा-मेघ-निभां त्रिशूल-मुशले पद्माऽसि पाशांकुशाम् ।।
शंखं साहिसुगंधृतां दशभुजां प्रेतासने संस्थिताम् ।
देवीं दक्षिणाकालिकां भगवतीं रक्ताम्बरां तां स्मरे ।।
विद्याऽविद्यादियुक्तां हरविधिनमितांनिष्कलां कालहन्त्रीं,
भक्ताभीष्ट-प्रदात्रीं कनक-निधि-कलांविन्मयानन्दरुपाम् ।
दोर्दण्ड चाप चक्रे परिघमथ शरा धारयन्तीं शिवास्थाम् ।
पद्मासीनां त्रिनेत्रामरुण रुचिमयीमिन्दुचूडां भजेऽहम् ।।
“काली-विलास-तंत्र” में कृष्णमाता काली का ध्यान इस प्रकार दिया है -
जटा-जूट समायुक्तां चन्द्रार्द्ध-कृत शेखराम् ।
पूर्ण-चन्द्र-मुखीं देवीं त्रिलोचन समन्विताम् ।।
दलिताञ्जन संकाशां दशबाहु समन्विताम् ।
नवयौवन सम्पन्नां दिव्याभरण भूषिताम् ।।
दिड्मण्डलोज्जवलकरीं ब्रह्मादि परिपूजिताम् ।
वामे शूलं तथा खड्गं चक्रं वाणं तथैव च ।।
शक्तिं च धारयन्तीं तां परमानन्द रुपिणीम् ।
खेटकं पूर्णचापं च पाशमङ्कुशमेव च ।।
घण्टां वा परशुं वापि दक्षहस्ते च भूषिताम् ।
उग्रां भयानकां भीमां भेरुण्डां भीमनादिनीम् ।।
कालिका-जटिलां चैव भैरवीं पुत्रवेष्टिताम् ।
आभिः शक्तिरष्टाभिश्च सहितां कालिकां पराम् ।।
सुप्रसन्नां महादेवीं कृष्णक्रीडां परात् पराम् ।
चिन्तयेत् सततं देवीं धर्मकामार्थ मोक्षदाम् ।।
कादि, हादि, सादि इत्यादि क्रम से कालिका के कई प्रकार के ध्यान हैं । जिस मंत्र के आदि में “क” हैं, वह “कादि-विद्या”, जिस मंत्र के आदि में “ह″ है वह “हादि-विद्या”, मंत्र में वाग् बीज हो वह “वागादि-विद्या” तथा जिस मंत्र के प्रारम्भ में “हूं” बीज हो वह “क्रोधादि-विद्या” कहलाती है ।
“नादिक्रम” में आदि में “नमः” का प्रयोग होता है एवं “दादि-क्रम” में मंत्र के आदि में “द” होता है, जैसे “दक्षिणे कालिके स्वाहा” । “प्रणवादि-क्रम” में मंत्र प्रारम्भ में “ॐ” का प्रयोग होता है ।
१॰ कादिक्रमोक्त ध्यानम् -
“करालवदनां घोरां मुक्तकेशीं चतुर्भुजाम् ।
कालिकां दक्षिणां दिव्यां मुण्डमाला विभूषिताम् ।।
सद्यश्छिन्नशिरः खडगं वामोर्ध्व कराम्बुजाम् ।
अभयं वरदं चैव दक्षिणोर्ध्वाधः पाणिकाम् ।।
महामेघ-प्रभां श्यामां तथा चैव दिगम्बरीम् ।
कण्ठावसक्तमुण्डालीं गलद्-रुधिरं चर्चिताम् ।।
कृर्णावतंसतानीत शव-युग्म भयानकाम् ।
घोरदंष्ट्रां करालास्यां पीनोन्नत-पयोधराम् ।।
शवानां कर-सङ्घातैः कृत-काञ्चीं हसन्मुखीम् ।
सृक्कद्वयगलद् रक्त-धारा विस्फुरिताननाम् ।।
घोर-रावां महा-रौद्रीं श्मशानालय-वासिनीम् ।
बालार्क-मण्डलाकार-लोचन-त्रियान्विताम् ।।
दन्तुरां दक्षिण-व्यापि मुक्तालम्बि कचोच्चयाम् ।
शवरुपं महादेव हृदयोपरि संस्थिताम् ।।
शिवामिर्घोर रावाभिश्चतुर्दिक्षु समन्विताम् ।
महाकालेन च समं विपरित-रतातुराम् ।।
सुखप्रसन्न-वदनां स्मेरानन सरोरुहाम ।
एवं सञ्चिन्तयेत् कालीं सर्वकामार्थ सिद्धिदाम् ।।
२॰ “क्रोध-क्रम” का ध्यान इस प्रकार है -
दीपं त्रिकोण विपुलं सर्वतः सुमनोहराम् ।
कूजत् कोकिला नादाढ्यं मन्दमारुत सेवितम् ।।
भृंङ्गपुष्पलताकीर्ण मुद्यच्चन्द्र दिवाकरम् ।
स्मृत्वा सुधाब्धिमध्यस्थं तस्मिन् माणिक्य-मण्डपे ।।
रत्न-सिंहासने पद्मे त्रिकोणेज्ज्वल कर्णिके ।
पीठे सञ्चिन्तयेत् देवीं साक्षात् त्रैलोक्यसुन्दरीम् ।।
नीलनीरज सङ्काशां प्रत्यालीढ पदास्थिताम् ।
चतुर्भुजां त्रिनयनां खण्डेन्दुकृत शेखराम् ।।
लम्बोदरीं विशालाक्षीं श्वेत-प्रेतासन-स्थिताम् ।
दक्षिणोर्ध्वेन निस्तृंशं वामोर्ध्वनीलनीरजम् ।।
कपालं दधतीं चैव दक्षिणाधश्च कर्तृकाम् ।
नागाष्टकेन सम्बद्ध जटाजूटां सुरार्चिताम् ।।
रक्तवर्तुल-नेत्राश्च प्रव्यक्त दशनोज्जवलाम् ।
व्याघ्र-चर्म-परीधानां गन्धाष्टक प्रलेपिताम् ।।
ताम्बूल-पूर्ण-वदनां सुरासुर नमस्कृताम् ।
एवं सञ्चिनतयेत् कालीं सर्वाभीष्टाप्रदां शिवाम् ।।
३॰ “हादि-क्रम” का ध्यान इस प्रकार है -
देव्याध्यानमहं वक्ष्ये सर्वदेवोऽप शोभितम् ।
अञ्नाद्रिनिभां देवीं करालवदनां शिवाम् ।।
मुण्डमालावलीकीर्णां मुक्तकेशीं स्मिताननाम् ।
महाकाल हृदम्भोजस्थितां पीनपयोधराम् ।।
विपरीतरतासक्तां घोरदंष्ट्रां शिवेन वै ।
नागयज्ञोपवीतां च चन्द्रार्द्धकृत शेखराम् ।।
सर्वालंकार संयुक्तां मुक्तामणि विभूषिताम् ।
मृतहस्तसहस्रैस्तु बद्धकाञ्ची दिगम्बराम् ।।
शिवाकोटि ससहस्रैस्तु योगिनीभिर्विराजजिताम् ।
रक्तपूर्ण मुखाम्भोजां सद्यः पानप्रमम्तिकाम् ।।
सद्यश्छिन्नशिरः खड्ग वामोर्ध्धः कराम्बुजाम् ।
अभयवरदं दक्षोर्ध्वाधः करां परमेश्वरीम् ।।
वह्नयर्क -शशिनेत्रां च रण-विस्फुरिताननाम् ।
विगतासु किशोराभ्यां कृतवर्णावतंसिनीम् ।।
४॰ “वागादि-क्रम” का ध्यान इस प्रकार है -
चतुर्भुजां कृष्णवर्णां मुण्डमाला विभूषिताम् ।
खड्गं च दक्षिणे पाणौ विभ्रतीं सशरं धनुः ।।
मुण्डं च खर्परं चैव क्रमाद् वामे च विभ्रतीम् ।
द्यां लिखन्तीं जटामेकां विभ्रतीं शिरसा स्वयम् ।।
मुण्डमालाधरां शीर्षे ग्रीवायामपि सर्वदा ।
वक्षसा नागहारं तु विभ्रतीं रक्तलोचनाम् ।।
कृष्णवर्णधरां दिव्यां व्याघ्राजिन समन्विताम् ।
वामपादं शवहृदि संस्थाप्य दक्षिणं पदम् ।।
विन्यस्य सिंहपृष्ठे च लेलिहानां शवं स्वयम् ।
सट्टहासां महाशवयुक्तां महाविभीषिणा ।।
एवं विचिन्त्या भक्तैस्तु कालिका परमेश्वरी ।
सततं भक्तियुक्तैस्तु भोगेश्वर्यामभीप्सुभिः ।।
५॰ “नादि-क्रम” का ध्यान -
खड्गं च दक्षिणे पादौ विभ्रतीन्दीवरद्वयम् ।
कर्तृकां खर्परं चैव क्रमाद् भुजयोद्वयं करान्विताम् ।।
६॰ “दादि-क्रम” का ध्यान -
सद्यः कृन्तशिरः खड्गमूर्ध्वद्वय कराम्बुजाम् ।
अभयं वरदंतु भुजयोद्वयं करान्विताम् ।।
७॰ प्रणवादि-क्रम” का ध्यान -
मंत्र के प्रारम्भ में “ॐ” प्रयुक्त होता है, उनका ध्यान “कादि-क्रम” के अनुसार करें ।

 

कालिका अष्टक
विरंच्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणास्त्रीँ, समाराध्य कालीं प्रधाना बभूवुः |
अनादिं सुरादिं मखादिं भवादिं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || १ ||
जगन्मोहिनीयं तु वाग्वादिनीयं, सुहृदपोषिणी शत्रुसंहारणीयं |
वचस्तम्भनीयं किमुच्चाटनीयं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || २ ||
इयं स्वर्गदात्री पुनः कल्पवल्ली, मनोजास्तु कामान्यथार्थ प्रकुर्यात |
तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ३ ||
सुरापानमत्ता सुभक्तानुरक्ता, लसत्पूतचित्ते सदाविर्भवस्ते |
जपध्यान पुजासुधाधौतपंका, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ४ ||
चिदानन्दकन्द हसन्मन्दमन्द, शरच्चन्द्र कोटिप्रभापुन्ज बिम्बं |
मुनिनां कवीनां हृदि द्योतयन्तं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ५ ||
महामेघकाली सुरक्तापि शुभ्रा, कदाचिद्विचित्रा कृतिर्योगमाया |
न बाला न वृद्धा न कामातुरापि, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ६ ||
क्षमास्वापराधं महागुप्तभावं, मय लोकमध्ये प्रकाशीकृतंयत् |
तवध्यान पूतेन चापल्यभावात्, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ७ ||
यदि ध्यान युक्तं पठेद्यो मनुष्य, स्तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च |
गृहे चाष्ट सिद्धिर्मृते चापि मुक्ति, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः || ८ ||
साधनाकाल में एक समय भोजन करें, भूमि शयन करें तथा ब्रह्मचर्य का दृढ़ता से पालन करें|
यदि चंडी यन्त्र ताबीज रूप में है तो अनुष्ठान के उपरांत उसे धारण करने से साधना का लाभ जीवन पर्यन्त साधक के साथ बना रहता है|

 

महाकाली

महाकाली को ही महाकाल पुरुष की शक्ति के रूप में माना जाता है । महाकाल का कोई लक्षण नहीं, वह अज्ञात है, तर्क से परे है । उसी की शक्ति का नाम है महाकाली । सृष्टि के आरंभ में यही महाविद्या चतुर्दिक विकीर्ण थी । महाकाली शक्ति का आरंभ में यही महाविद्या चतुर्दिक विकीर्ण थी । महाकाली शक्ति का आरंभिक अवतरण था । यही कारण है कि आगमशास्त्र में इसे प्रथमा व आद्या आदि नामों से भी संबोधित किया गया है ।

आगमशास्त्र में रात्रि को महाप्रल्य का प्रतीक माना गया है । रात के १२ बजे का समय अत्यंत अंधकारमय होता है । यही कालखंड महाकाली है । रात के १२ बजे से लेकर सूर्योदय होने से पहले तक संपूर्ण कालखंड महाकाली है । रात के १२ बजे से लेकर सूर्योदय होने से पहले तक संपूर्ण कालखंड महाकाली है । सूर्योदय होते ही अंधकार क्रमश: घटता जाता है । अंधकार के उतार-चढाव को देखते हुए इस कालखंड को ऋषि-मुनियों ने कुल ६२ विभागों में विभाजित किया है । इसी प्रकार महाकाली के भी अलग-अलग रूपों के ६२ विभाग हैं । शक्ति के अलग-अलग रूपों की व्याख्या करने के उद्देश्य से ऋषि-मुनियों ने निदान विद्या के आधार पर उनकी मूर्तियां बनाईं ।

समस्त शक्तियों को अचिंत्या कहा गया है । वे अदृश्य और निर्गुण हैं । शक्तियों की मूर्तियों को उनकी काया का स्वरूप मानना चाहिए ।

अचिंत्यस्थाप्रामैयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ।
उपासकानां सिद्धयर्थ ब्रह्मणों रूपकल्पना ॥

अर्थात शक्तियों के रूप की कल्पना करते हुए काल्पनिक मूर्तियों का इसलिए निर्माण किया गया, ताकि उनकी उपासना की जा सके तथा उनके रूप के दर्शन किए जा सकें ।

निदान शास्त्र में इन मूर्तियों के बारे में विस्तार से उल्लेख किया गया है । किंतु खेद है कि आज यह ग्रंथ विलुप्त और अनुपलब्ध है । यही कारण है कि शक्तियों की विलक्षण और विचित्र मूर्तियों की वास्ततिकता पर संदेह प्रकट किया जा रहा है । दश महाविद्याओं के स्वरूपों का संबंध निदान से है ।

यहां निदान का किस अर्थ में उपयोग किया जाता है । वस्तुत: संकेत को ही निदान कहा जाता है । निदान से पता चलता है कि किसका संबंध किससे है । इहलोक हो या परलोक-सर्वत्र यही नियम लागु है । कहीं संकट मंडराता है तो वहां लाल कपडे अथवा लाल तख्ती से संकेत किया जाता है । यानी संकट का निदान लाल कपडे में निहित है । इसी प्रकार काले वस्त्र को शोक का निदान माना है तो श्वेत वस्त्र को यश व सम्मान का निदान । शांति और उत्पादकता का निदा हरा वस्त्र है, विजयश्री का निदान पताका है और अंतरिक्ष का निदान नीला वस्त्र है ।

कई अज्ञानी लोग प्रश्न करते हैं कि शोक का काले वस्त्र से कैसा संबंध ? शोकाकुल व्यक्ति काला वस्त्र पहने या श्वेत वस्त्र, उससे शोक पर कोई असर नहीं पडता । अतएव काले वस्त्र को शोक का निदान मानना तार्किक नहीं है ।

किंतु निदान शास्त्र में इसके पक्ष में अनेक सबल तर्क दिए गए हैं । शोकसंतप्त व्यक्ति का सबसे नाता टूट जाता है, वह स्वयं को भी भूल जाता है । उसे प्रतीत होता है, मानो वह घोर तम (अंधकार) से घिर गया है । उसे रोशनी भली नहीं लगती, अंधेरे बंद कमरे में ही वह रोना-कलपना चाहता है । इसी करण निदान शास्त्र काले वस्त्र को शोक का प्रतीक मानता है ।

काला वस्त्र रोशनी को अपने अंदर समा लेता है, जबकि श्वेत वस्त्र रोशनी की परावर्तित करता है, सर्वत्र विकीर्ण कर देता है । इसीलिए इसे यश और सम्मान का निदान माना गया है, क्योंकि यशस्वी व्यक्ति की ख्याति सर्वत्र विकीर्ण हो जाती है ।

निदान विद्या का दृढ विश्वास है कि सृष्टि की रचना जल से हुई है । जल से ही पैदा होता है कमल, अतः कमल को पृथ्वी का निदान माना गया है । वर्षा ऋतु में चारों ओर हरियाली छा जाती है । हरियाली से उत्पादन होता है और शांति व्याप्त होती है। अतः हरे वस्त्र को शांति और उत्पादकता का निदान माना गया है ।

इससे सिद्ध होता है कि निदान का अपने समभाव से अटूट संबंध है । शक्ति का प्राकृतिक स्वरूप निराकार और अदृश्य है । किंतु कौन-सी शक्ति किस शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है, उसी के आधार पर उनकी मूर्तियों की भव्य कल्पना की गई है ।

शक्ति की मूर्तियां हम अनेक रूपों में देखते हैं । किसी में उसकी जीभ निकली हुई है तो किसी में उसने गले गले में नरमुंडों की माला धारण कर रखी है । इन मूर्तियों में शक्ति की भुजाओं की संख्या में भी अंतर है और भुजाओं द्वारा पकडे गए अवदानों में भी । किसी में वह दो भुजाओं में नजर आती है तो किसी में कमलपुष्प ।

मूर्तियों में शक्ति का उदार व विनम्र भव्य स्वरूप भी है और विकराला स्वरूप भी । किसी में वह मुर्दे पर आरूढ तो किसी में मदिरा पीते हुए अट्टहास कर रही है । मूर्तियों में उसे दिगंबर और पीतांबर दोनों अवस्थाओं में देखा जा सकता है ।

निस्संदेह प्रत्येक मूर्ति विशिष्ट अर्थ और उद्देश्य का निदान है । किंतु जो लोग इनमें अंतर्निहित भावों से अनभिज्ञ हैं, वे इनको अवज्ञा से देखते हैं और उपहास करते हैं । ये निरर्थक या मनमानी कल्पनाओं का मूर्त रूप नहीं, बल्कि विभिन्न शक्तियों के विभिन्न स्वरूपों का निरूपण है ।

हमारे यहां प्रत्येक देवता की भिन्न शक्ति और भिन्न स्वरूप होता है । ऋषिमुनियों ने निदान के माध्यम देवातों की स्तुति व उपासना करने की विधि बताई है । उनका कहना है कि जिस देवता की स्तुति करना चाहते हो, सर्वप्रथम उसठे स्वरूप का स्मरण का स्मरण करो । यदि महाकाली का उपासक महाकाली की स्तुति करना चाहता है तो सबसे पहले उसे उसके स्वरूप को चित्त में धारण करना चाहिए. जो इस प्रकार है:

महाकाली शव पर आरूढ है । उसका स्वरूप महाभयावह है । उसकी दाढ महाविकराल है । वह विद्रूपता से हंस रही है । उसकी चार भुजाओं में से एक में खडग है, दूसरे में नरमुंड, तीसरे में अभयमुद्रा और चौथे में वर । जीभ बाहर निकली हुई है और गले में मुंडों की माला । व्ह नग्रावस्था में है । उसका निवास स्थान श्मशान है ।

महाशक्ति महाकाली का संबंध प्रलयरात्रि मध्यकाल से है । जब तक मनुष्य शक्तिशाली होता है, वह शिव है । किंतु शक्तिहीन होते ही वह शव में परिवर्तित होता है । उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है ।

विश्व के अस्तित्व में आने से पहले महाकाली का अविर्भाव हो चुका था । वही विश्व की संहारक कालरात्रि है । उसकी प्रतिष्ठा संहार और प्रलय से है, सृष्टि की रचना से नहीं । प्रलय और संहार के समय सारी सृष्टि शव के समान हो गई है और उसके ऊपर महाकाली पांव धरकर खडी हुई है । विश्व मरणशील है, अतः शवस्वरूप है । इसी शवस्वरूप को विश्व का निदान कहा गया है ।

जो संहार करता है, प्रलय लाता है, वह महाप्रचंड होता है । उसकी मुखाकृति अत्यंत वीभत्स होती है । कोई उसकी ओर आंख उठाकर देखने का साहस नहीं जुटा पाता । महाकाली की कुखाकृति अत्यंत प्रचंड होती है. क्योंकि वह नाश और संहार की देवी है । उसकी आंखों में करुणा नहीं, काल होता है । उसके नाशक संहारक स्वरूप का निदान है यह भयोत्पादक मूर्ति ।

महाकाली का अट्टहास विजय का द्योतक है । उसका अट्टहास सुनकर चारों तरफ भय की सृष्टि होती है । सृष्टि उसकी प्रचंडता और भीषणता से त्राहि-त्राहि कर उठती है । यह अट्टहास महाकाली की विजय और भयावहता का निदान है ।

महाकाली की अनेक भुजाएं हैं । किंतु जब वह संहार अभियान पर निकलती है तो केवल चार भुजाओं का उपयोग करती है । वह खड्ग से विनाशलीला करती है । यह खड्ग उसकी संहारक शक्ति का निदान है । प्राणियों का संहार करने का निदान नरमुंड है । किंतु विनाशलीला करने वाली महाकाली का एक हाथ अभय मुद्रा में और दूसरा वरभाव में क्यों ?

वस्तुः जिसने भी विनाशकारी महाकाली के रूप को साकार किया था, वह अवश्य कल्पनाशील और रचनाशील था । जिस शक्ति का महाकाली प्रतिनिधित्व करती है, उसके अर्थ, उद्देश्य और भाव से वह निस्संदेह भलीभांति परिचित था. तभी तों मूर्ति को सार्थकता दे सका ।

यह सच है कि महाकाली साक्षात भय और विनाश है । उसका काम केवल प्रलय और विध्वंस है । किंतु वह अभय और वर प्रदायनी है । विश्व मायाशील है, शोक संतप्त है, सुख की कामना से विह्वल है । उसे सबसे अधिक भयभाव सताता है । यदि वह महाकाली की शरण में आए तो अभयपद को प्राप्त हो सकता है । अतः महाकाली की उपासना करने वाला भयहीन और शोकमुक्त हो जाता है ।

प्रलय की बेला में जब प्राणी कालग्रास बनते हैं, तब महाकाली शवों को स्वयं धारण करती है । मरण महासत्य है । महाकाली इस सत्य की वाहक है । अतएव मृतकों को स्वयं पर प्रतिष्ठित कर उनका उद्धार करती है । इसी भाव को प्रकट करती है उसके गले में मुंडमाला ।

संपूर्ण ब्रह्मांड में महाकाली व्याप्त है । वह सृष्टि के चराचर में समाहित है । वह अनावृत है । आकाश, दिगंत और दिशाएं ही उसकी परिधान है । उसकी गग्रावस्था का निदान इसी भाव में है ।

महाकाली अपना विशाल, चरम और परम स्वरूप तब धारण करती है, जब प्रलय का आह्वान करती है । चारों ओर विनाशलीला का घनघोर रौरव व्याप्त हो जाता है । वह संपूर्ण विश्व को श्मशान बनाकर अपने नितांत तमस्वरूप को प्राप्त होती है । तभी तो श्मशान को उसका निवास स्थान बताया गया है । यह श्मशान और कुछ नहीं केवल उसके तमस्वरूप का निदान है । यही वास्तविक महाकाली है ।

निस्संदेह महाकाली के इस स्वरूप को देखकर साधारण जन उसकी उपासना करने की कल्पना से ही कांप उठता है । इस सत्य से ऋषि-मुनि अनभिज्ञ नहीं थे । अतः उन्होंने महाशक्तियों की आंतरिक संरचना ध्यान रखते हुए निदान के माध्यम से उनकी काल्पनिक मूर्तियों का निर्माण किया और उनके प्रत्येक स्वरूप की मीमांसा प्रस्तुत की, ताकि लोग उनके कल्याणकारी पहलू से परिचित हो सकें
साभार काली तंत्र से उद्धृत………

 

आद्या काली स्तोत्र
त्रिलोक्य विजयस्थ कवचस्य शिव ऋषि ,
अनुष्टुप छन्दः, आद्य काली देवता, माया बीजं,
रमा कीलकम , काम्य सिद्धि विनियोगः || १ ||

ह्रीं आद्य मे शिरः पातु श्रीं काली वदन ममं,
हृदयं क्रीं परा शक्तिः पायात कंठं परात्परा ||२||

नेत्रौ पातु जगद्धात्री करनौ रक्षतु शंकरी,
घ्रान्नम पातु महा माया रसानां सर्व मंगला ||३||

दन्तान रक्षतु कौमारी कपोलो कमलालया,
औष्ठांधारौं शामा रक्षेत चिबुकं चारु हासिनि ||४|

ग्रीवां पायात क्लेशानी ककुत पातु कृपा मयी,
द्वौ बाहूबाहुदा रक्षेत करौ कैवल्य दायिनी ||५||

स्कन्धौ कपर्दिनी पातु पृष्ठं त्रिलोक्य तारिनी,
पार्श्वे पायादपर्न्ना मे कोटिम मे कम्त्थासना ||६||

नभौ पातु विशालाक्षी प्रजा स्थानं प्रभावती,
उरू रक्षतु कल्यांनी पादौ मे पातु पार्वती ||७||

जयदुर्गे-वतु प्राणान सर्वागम सर्व सिद्धिना,
रक्षा हीनां तू यत स्थानं वर्जितं कवचेन च ||८||

इति ते कथितं दिव्य त्रिलोक्य विजयाभिधम,
कवचम कालिका देव्या आद्यायाह परमादभुतम ||९||

पूजा काले पठेद यस्तु आद्याधिकृत मानसः,
सर्वान कामानवाप्नोती तस्याद्या सुप्रसीदती ||१०||

मंत्र सिद्धिर्वा-वेदाषु किकराह शुद्रसिद्धयः,
अपुत्रो लभते पुत्र धनार्थी प्राप्नुयाद धनं ||११|

विद्यार्थी लभते विद्याम कामो कामान्वाप्नुयात
सह्स्त्रावृति पाठेन वर्मन्नोस्य पुरस्क्रिया ||१२||

पुरुश्चरन्न सम्पन्नम यथोक्त फलदं भवेत्,
चंदनागरू कस्तूरी कुम्कुमै रक्त चंदनै ||१३||

भूर्जे विलिख्य गुटिका स्वर्नस्याम धार्येद यदि,
शिखायां दक्षिणे बाह़ो कंठे वा साधकः कटी ||१४||

तस्याद्या कालिका वश्या वांछितार्थ प्रयछती,
न कुत्रापि भायं तस्य सर्वत्र विजयी कविः ||१५||

अरोगी चिर जीवी स्यात बलवान धारण शाम,
सर्वविद्यासु निपुण सर्व शास्त्रार्थ तत्त्व वित् ||१६||

वशे तस्य माहि पाला भोग मोक्षै कर स्थितो,
कलि कल्मष युक्तानां निःश्रेयस कर परम ||१७||

 

काली कवचम्
काली कवचम्
कवचं श्रोतुमिच्छामि तां च विद्यां दशाक्षरीम् । नाथ त्वत्तो हि सर्वज्ञ भद्रकाल्याश्च साम्प्रतम् ॥

नारायण उवाच

श्रृणु नारद वक्ष्यामि महाविद्यां दशाक्षरीम् । गोपनीयं च कवचं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ॥

ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहेति च दशाक्षरीम् । दुर्वासा हि ददौ राज्ञे पुष्करे सूर्यपर्वणि ॥

दशलक्षजपेनैव मन्त्रसिद्धि: कृता पुरा । पञ्चलक्षजपेनैव पठन् कवचमुत्तमम् ॥

बभूव सिद्धकवचोऽप्ययोध्यामाजगाम स: । कृत्स्नां हि पृथिवीं जिग्ये कवचस्य प्रसादत: ॥

नारद उवाच

श्रुता दशाक्षरी विद्या त्रिषु लोकेषु दुर्लभा । अधुना श्रोतुमिच्छामि कवचं ब्रूहि मे प्रभो ॥

नारायण उवाच

श्रृणु वक्ष्यामि विपे्रन्द्र कवचं परमाद्भुतम् । नारायणेन यद् दत्तं कृपया शूलिने पुरा॥

त्रिपुरस्य वधे घोरे शिवस्य विजयाय च । तदेव शूलिना दत्तं पुरा दुर्वाससे मुने ॥

दुर्वाससा च यद् दत्तं सुचन्द्राय महात्मने । अतिगुह्यतरं तत्त्‍‌वं सर्वमन्त्रौघविग्रहम् ॥

ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा मे पातु मस्तकम् । क्लीं कपालं सदा पातु ह्रीं ह्रीं ह्रीमिति लोचने ॥

ह्रीं त्रिलोचने स्वाहा नासिकां मे सदावतु । क्लीं कालिके रक्ष रक्ष स्वाहा दन्तं सदावतु ॥

ह्रीं भद्रकालिके स्वाहा पातु मेऽधरयुग्मकम् । ह्रीं ह्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा कण्ठं सदावतु ॥

ह्रीं कालिकायै स्वाहा कर्णयुग्मं सदावतु । क्रीं क्रीं क्लीं काल्यै स्वाहा स्कन्धं पातु सदा मम ॥

क्रीं भद्रकाल्यै स्वाहा मम वक्ष: सदावतु । क्रीं कालिकायै स्वाहा मम नाभिं सदावतु ॥

ह्रीं कालिकायै स्वाहा मम पष्ठं सदावतु । रक्त बीजविनाशिन्यै स्वाहा हस्तौ सदावतु ॥

ह्रीं क्लीं मुण्डमालिन्यै स्वाहा पादौ सदावतु । ह्रीं चामुण्डायै स्वाहा सर्वाङ्गं मे सदावतु ॥

प्राच्यां पातु महाकाली आगन्ेय्यां रक्त दन्तिका । दक्षिणे पातु चामुण्डा नैर्ऋत्यां पातु कालिका ॥

श्यामा च वारुणे पातु वायव्यां पातु चण्डिका । उत्तरे विकटास्या च ऐशान्यां साट्टहासिनी ॥

ऊध्र्व पातु लोलजिह्वा मायाद्या पात्वध: सदा । जले स्थले चान्तरिक्षे पातु विश्वप्रसू: सदा ॥

इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम् । सर्वेषां कवचानां च सारभूतं परात्परम् ॥

सप्तद्वीपेश्वरो राजा सुचन्द्रोऽस्य प्रसादत: । कवचस्य प्रसादेन मान्धाता पृथिवीपति: ॥

प्रचेता लोमशश्चैव यत: सिद्धो बभूव ह । यतो हि योगिनां श्रेष्ठ: सौभरि: पिप्पलायन: ॥

यदि स्यात् सिद्धकवच: सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् । महादानानि सर्वाणि तपांसि च व्रतानि च ॥

निश्चितं कवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥

इदं कवचमज्ञात्वा भजेत् कलीं जगत्प्रसूम् । शतलक्षप्रप्तोऽपि न मन्त्र: सिद्धिदायक:॥ अर्थ :- नारदजी ने कहा – सर्वज्ञ नाथ! अब मैं आपके मुख से भद्रकाली-कवच तथा उस दशाक्षरी विद्या को सुनना चाहता हूँ ।

श्रीनारायण बोले – नारद! मैं दशाक्षरी महाविद्या तथा तीनों लोकों में दुर्लभ उस गोपनीय कवच का वर्णन करता हूँ, सुनो । ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा यही दशाक्षरी विद्या है । इसे पुष्करतीर्थ में सूर्य-ग्रहण के अवसर पर दुर्वासा ने राजा को दिया था । उस समय राजा ने दस लाख जप करके मन्त्र सिद्ध किया और इस उत्तम कवच के पाँच लाख जप से ही वे सिद्धकवच हो गये । तत्पश्चात् वे अयोध्या में लौट आये और इसी कवच की कृपा से उन्होंने सारी पृथ्वी को जीत लिया ।

नारदजी ने कहा – प्रभो! जो तीनों लोकों में दुर्लभ है, उस दशाक्षरी विद्या को तो मैंने सुन लिया । अब मैं कवच सुनना चाहता हूँ, वह मुझसे वर्णन कीजिये ।

श्रीनारायण बोले- विप्रेन्द्र! पूर्वकाल में त्रिपुर-वध के भयंकर अवसर पर शिवजी की विजय के लिये नारायण ने कृपा करके शिव को जो परम अद्भुत कवच प्रदान किया था, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो । मुने! वह कवच अत्यन्त गोपनीयों से भी गोपनीय, तत्त्‍‌वस्वरूप तथा सम्पूर्ण मन्त्रसमुदाय का मूर्तिमान् स्वरूप है । उसी को पूर्वकाल में शिवजी ने दुर्वासा को दिया था और दुर्वासा ने महामनस्वी राजा सुचन्द्र को प्रदान किया था ।

ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा मेरे मस्तक की रक्षा करे । क्लीं कपाल की तथा ह्रीं ह्रीं ह्रीं नेत्रों की रक्षा करे । ह्रीं त्रिलोचने स्वाहा सदा मेरी नासिका की रक्षा करे । क्रीं कालिके रक्ष रक्ष स्वाहा सदा दाँतों की रक्षा करे । ह्रीं भद्रकालिके स्वाहा मेरे दोनों ओठों की रक्षा करे । ह्रीं ह्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा सदा कण्ठ की रक्षा करे । ह्रीं कालिकायै स्वाहा सदा दोनों कानों की रक्षा करें । क्रीं क्रीं क्लीं काल्यै स्वाहा सदा मेरे कंधों की रक्षा करे । क्रीं भद्रकाल्यै स्वाहा सदा मेरे वक्ष:स्थल की रक्षा करे । क्रीं कालिकायै स्वाहा सदा मेरी नाभि की रक्षा करे । ह्रीं कालिकायै स्वाहा सदा मेरे पृष्ठभाग की रक्षा करे । रक्तबीजविनाशिन्यै स्वाहा सदा हाथों की रक्षा करे । ह्रीं क्लीं मुण्डमालिन्यै स्वाहा सदा पैरों की रक्षा करे । ह्रीं चामुण्डायै स्वाहा सदा मेरे सर्वाङ्ग की रक्षा करे । पूर्व में महाकाली और अगिन्कोण में रक्तदन्तिका रक्षा करें । दक्षिण में चामुण्डा रक्षा करें । नैर्ऋत्यकोण में कालिका रक्षा करें । पश्चिम में श्यामा रक्षा करें । वायव्यकोण में चण्डिका, उत्तर में विकटास्या और ईशानकोण में अट्टहासिनी रक्षा करें । ऊर्ध्वंभाग में लोलजिह्वा रक्षा करें । अधोभाग में सदा आद्यामाया रक्षा करें । जल, स्थल और अन्तरिक्ष में सदा विश्वप्रसू रक्षा करें ।

वत्स! यह कवच समस्त मन्त्रसमूह का मूर्तरूप, सम्पूर्ण कवचों का सारभूत और उत्कृष्ट से भी उत्कृष्टतर है; इसे मैंने तुम्हें बतला दिया । इसी कवच की कृपा से राजा सुचन्द्र सातों द्वीपों के अधिपति हो गये थे । इसी कवच के प्रभाव से पृथ्वीपति मान्धाता सप्तद्वीपवती पृथ्वी के अधिपति हुए थे । इसी के बल से प्रचेता और लोमश सिद्ध हुए थे तथा इसी के बल से सौभरि और पिप्पलायन योगियों में श्रेष्ठ कहलाये । जिसे यह कवच सिद्ध हो जाता है, वह समस्त सिद्धियों का स्वामी बन जाता है । सभी महादान, तपस्या और व्रत इस कवच की सोलहवीं कला की भी बराबरी नहीं कर सकते, यह निश्चित है । जो इस कवच को जाने बिना जगज्जननी काली का भजन करता है, उसके लिये एक करोड जप करने पर भी यह मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता ।

 

कामाक्षायाष्टक
एक समय यज्ञ दक्ष कियोतब न्योत सबै जग के सुर डारो ।
ब्रह्म सभा बिच माख लग्य तेहि कारण शंकर को तजिडारो ।
रोके रुके नहिं दक्ष सुता, बुझाय बहू विधि शंकर हारो ।
नाम तेरो बड़ है जग में करुणा करके मम कष्ट निवारो ॥१॥
संग सती गण भेज द
िये, त्रिपुरारि हिये मँह नेक विचारो ।
राखे नहीं संग नीक अहै जो रुके तो कहूँ नहिं तन तजि डारो ।
जाय रुकी जब तात गृहे तब काहु न आदर बैन उचारो ।
नाम तेरो बड़ है जम में करुणा करके मम कष्ट निवारो ॥२॥
मातु से आदर पाय मिली भगिनी सब व्यंग मुस्काय उचारो ।
तात न पूछ्यो बात कछू यह भेद सती ने नहीं विचारो ।
जाय के यज्ञ में भाग लख्यो पर शंकर भाग कतहुँ न निहारो ।
नाम तेरो बड़ है९ जग में ‘ करुणा करके मम कष्ट निवारो ॥३॥
तनक्रोध बढ्यो मनबोध गयो, अपमान भले सहि जाय हजारो ।
जाति निरादर होई जहाँ तहँ जीवन धारन को धिक्कारो ।
देह हमार है दक्षके अंश से जीवन ताकि सो मैं तजि डारो ।
नाम तेरो बड़ है जग में करुणा करके मम कष्ट निवारो ॥४॥
अस कहि लाग समाधि लगाय के बैठि भई निश्चय उर धारो ।
प्रान अपान को नाभि मिलय उदानहिं वायु कपाल निकारो ।
जोग की आग लगी अब ही जरि छार भयो छन में तन सारो ।
नाम तेरो बड़ है जग में करुणा करके मम कष्ट निवारो ॥५॥
हाहाकार सुन्यो गण शंभु तो जग विध्वंस सबै करि डारो ।
जग्य विध्वंसि देखि मुनि भृगु मन्त्र रक्षक से सब यज्ञ सम्हारो ।
वीरभद्र करि कोप गये और दक्ष को दंड कठिन दै डारो ।
नाम तेरो बड़ है जग में करुणा करके मम कष्ट निवारो ॥६॥
दुखकारन सतीशव कांधे पे डार के विचरत है शिवजगत मंझारो ।
काज रुक्यो तब देव गये और श्रीपति के ढिंग जाय पुकारो ।
विष्णु ने काटि किये शव खण्ड गिट्यो जो जहाँ तहँ सिद्धि बिठारो ।
नाम तेरो बड़ है जग में करुणा करके मम कष्ट निवारो ॥७॥
योनि गियो कामाख्या थल सों, बन्यो अतिसिद्ध न जाय संभारो ।
बास करें सुर तीन दिना जब मासिक धर्म में देवि निहारो ।
कहत गोपाल सो सिद्ध है पीठ जो माँगता है मिल जात सो सारो ।
नाम तेरी बड़ है जग में करुणा करके मम कष्ट निवारो ॥८॥
॥ दोहा ॥
लाल होई खल तीन दिन, जब देवि रजस्वला होय ।
मज्जन कर नर भव तरहिं, जो ब्रह्म हत्यारा होय ॥१॥
कामाख्या तीरथ सलिल, अहै सुधा सम जान ।
कह गोपाल सेवन करुँ, खान, पान, स्नान ॥२॥
भक्ति सहित पढ़िहै सदा, जो अष्टक को मूल ।
तिनकी घोर विपत्ति हित, शरण तुम्हारि त्रिशूल ॥३॥
कामाख्या जगदम्बिक, रक्षहु सब परिवार ।
भक्त ‘ गिरि ‘ पर कृपा करि, देहु सबहिं सुख डार ॥४॥

कामाख्या चालीसा
॥ दोहा ॥
सुमिरन कामाख्या करुँ, सकल सिद्धि की खानि ।
होइ प्रसन्न सत करहु माँ, जो मैं कहौं बखानि ॥
जै जै कामाख्या महारानी । दात्री सब सुख सिद्धि भवानी ॥
कामरुप है वास तुम्हारो । जहँ ते मन नहिं टरत है टारो ॥
ऊँचे गिरि पर करहुँ निवासा । पुरवहु सदा भगत मन आसा ।
ऋद्धि सिद्धि तुरतै मिलि जाई । जो जन ध्यान धरै मनलाई ॥
जो देवी का दर्शन चाहे । हदय बीच याही अवगाहे ॥
प्रेम सहित पंडित बुलवावे । शुभ मुहूर्त निश्चित विचारवे ॥
अपने गुरु से आज्ञा लेकर । यात्रा विधान करे निश्चय धर ।
पूजन गौरि गणेश करावे । नान्दीमुख भी श्राद्ध जिमावे ॥
शुक्र को बाँयें व पाछे कर । गुरु अरु शुक्र उचित रहने पर ॥
जब सब ग्रह होवें अनुकूला । गुरु पितु मातु आदि सब हूला ॥
नौ ब्राह्मण बुलवाय जिमावे । आशीर्वाद जब उनसे पावे ॥
सबहिं प्रकार शकुन शुभ होई । यात्रा तबहिं करे सुख होई ॥
जो चह सिद्धि करन कछु भाई । मंत्र लेइ देवी कहँ जाई ॥
आदर पूर्वक गुरु बुलावे । मन्त्र लेन हित दिन ठहरावे ॥
शुभ मुहूर्त में दीक्षा लेवे । प्रसन्न होई दक्षिणा देवै ॥
ॐ का नमः करे उच्चारण । मातृका न्यास करे सिर धारण ॥
षडङ्ग न्यास करे सो भाई । माँ कामाक्षा धर उर लाई ॥
देवी मन्त्र करे मन सुमिरन । सन्मुख मुद्रा करे प्रदर्शन ॥
जिससे होई प्रसन्न भवानी । मन चाहत वर देवे आनी ॥
जबहिं भगत दीक्षित होइ जाई । दान देय ऋत्विज कहँ जाई ॥
विप्रबंधु भोजन करवावे । विप्र नारि कन्या जिमवावे ॥
दीन अनाथ दरिद्र बुलावे । धन की कृपणता नहीं दिखावे ॥
एहि विधि समझ कृतारथ होवे । गुरु मन्त्र नित जप कर सोवे ॥
देवी चरण का बने पुजारी । एहि ते धरम न है कोई भारी ॥
सकल ऋद्धि – सिद्धि मिल जावे । जो देवी का ध्यान लगावे ॥
तू ही दुर्गा तू ही काली । माँग में सोहे मातु के लाली ॥
वाक् सरस्वती विद्या गौरी । मातु के सोहैं सिर पर मौरी ॥
क्षुधा, दुरत्यया, निद्रा तृष्णा । तन का रंग है मातु का कृष्णा ।
कामधेनु सुभगा और सुन्दरी । मातु अँगुलिया में है मुंदरी ॥
कालरात्रि वेदगर्भा धीश्वरि । कंठमाल माता ने ले धरि ॥
तृषा सती एक वीरा अक्षरा । देह तजी जानु रही नश्वरा ॥
स्वरा महा श्री चण्डी । मातु न जाना जो रहे पाखण्डी ॥
महामारी भारती आर्या । शिवजी की ओ रहीं भार्या ॥
पद्मा, कमला, लक्ष्मी, शिवा । तेज मातु तन जैसे दिवा ॥
उमा, जयी, ब्राह्मी भाषा । पुर हिं भगतन की अभिलाषा ॥
रजस्वला जब रुप दिखावे । देवता सकल पर्वतहिं जावें ॥
रुप गौरि धरि करहिं निवासा । जब लग होइ न तेज प्रकाशा ॥
एहि ते सिद्ध पीठ कहलाई । जउन चहै जन सो होई जाई ॥
जो जन यह चालीसा गावे । सब सुख भोग देवि पद पावे ॥
होहिं प्रसन्न महेश भवानी । कृपा करहु निज – जन असवानी ॥
॥ दोहा ॥
कर्हे गोपाल सुमिर मन, कामाख्या सुख खानि ।
जग हित माँ प्रगटत भई, सके न कोऊ खानि ॥
.कामाख्या कवच
ॐ कामाख्याकवचस्य मुनिर्वृहस्पति स्मृतः ।
देवी कामेश्वरी तस्य अनुष्टुपछन्द इष्यतः ॥
विनियोगः सर्व्वसिद्धौ नञ्च श्रृण्वन्तु देवताः ।
शिरः कामेश्वरी देवी कामाख्या चक्षुषी मम ॥
शारदा कर्णयुगलं त्रिपुरा वदनं तथा ।
कण्ठे पातु महामाया हदि कामेश्वरी पुनः ॥
कामाख्या जठरे पातु शारदा पातु नाभितः ।
त्रिपुरा पार्श्वयोः पातु महामाया तु मेहने ॥
गुदे कामेश्वरी पातु कामाख्योरुद्वये तु माम् ।
जानुनोः शारदा पातु त्रिपुरा पातु जङ्घयोः ॥
महामाया पादयुगे नित्यं रक्षतु कामदा ।
केशे कोटेश्वरी पातु नासायां पातु दीर्घिका ॥
दन्तसङ्घाते मातङ्यवतु चाङ्गयोः ।
बाह्वोर्म्मां ललिता पातु पाण्योस्तु बनवासिनी ॥
विनध्यवासिन्यङ्ग लीषु श्रीकामा नखकोटिषु ।
रोमकूपेषु सर्व्वेषु गुप्तकामा सदावतु ॥
पादाङ्गुलि – पार्ष्णिभागे पातु मां भुवनेश्वरी ।
जिह्वायां पातु मां सेतुः कः कण्ठाभ्यन्तरेऽवतु ॥
पातु नश्चान्तरे वक्षः ईः पातु जठारान्तरे ।
सामिन्दुः पातु मां वस्तौ विन्दुर्व्विद्वन्तरेऽवतु ॥
ककारस्त्वचि मां पातु रकारोऽस्थिषु सर्व्वदा ।
लकाराः सर्व्वनाडिषु ईकारः सर्व्वसन्धिषु ॥
चन्द्रः स्नायुषु मां पातु विन्दुर्मज्जासु सन्ततम् ।
पूर्व्वस्यां दिशि चाग्नेष्यां दक्षिणे नैऋते तथा ॥
वारुणे चैव वायव्यां कौवेरे हरमन्दिरे ।
अकाराद्यास्तु वैष्णवा अष्टौ वर्णास्तु मन्त्रगाः ॥
पान्तु तिष्ठन्तु सततं समुदभवविवृद्धये ।
ऊर्द्घाधः पातु सततं मान्तु सेतुद्वयं सदा ॥
नवाक्षराणि मन्त्रेषु शारदा मन्त्रगोचरे ।
नवस्वरन्तु मां नित्यं नासादिषु समन्ततः ॥
वातपित्तकफेभ्यस्तु त्रिपुरायास्तु त्र्यक्षरम् ।
नित्यं रक्षतु भूतेभ्यः पिशाचेभ्यस्तथैव च ॥
तत् सेतु सततं पाता क्रव्यादभ्यो मान्निवारकौ ।
नमः कामेश्वरी देवीं महामायां जगन्मयीम् ॥
या भूत्वा प्रकृतिर्नित्यं तनोति जगदायतम् ।
कामाख्यामक्षमालाभयवरदकरां सिद्धसूत्रैकहस्तां ॥
श्वेतप्रेतोपरिस्थां मणिकनकयुतां कुङ्कमापीतवर्णाम् ।
ज्ञानध्यानप्रतिष्ठामतिशयविनयां ब्रह्मशक्रादिवन्द्या ॥
मग्नौ विन्द्वन्तमन्त्रप्रियतमविषयां नौमि विद्धयैरतिस्थाम् ।
मध्ये मध्यस्य भागे सततविनमिता भावहावली या,
लीला लोकस्य कोष्ठे सकलगुणयुता व्यक्त रुपैकनम्रा ।
विद्या विद्यैकशान्ता शमनशमकरी क्षेमकत्रीं वरास्या,
नित्यं पायात् पवित्रप्रणववरकरा कामपूर्वीश्वरी नः ॥
इति हरकवचं तनुस्थितं शमयति वै शमनं तथा यदि ।
इह गृहाण यतस्व विमोक्षणे सहित एष विधिः सह चामरैः ॥
इतीदं कवचं यस्तु कामाख्यायाः पठेद् बुधः ।
सुकृत् तं तु महादेवी तनुव्रजति नित्यदा ॥
नाधिव्याधिभयं तस्य न क्रव्यादमो भयं तथा ।
नाग्नितो नापि तोयेभ्यो न रिपुभ्यो न राजतः ॥
दीर्घायुर्व्वहुभोगी च पुत्रपौत्रसमन्वितः ।
आवर्त्तयन् शतं देवी मन्दिरे मोदते परे ॥
यथा यथा भवेदबद्धः संग्रामेऽन्यत्र वा बुधः ।
ततक्षणादेव मुक्तः स्यात् स्मरणात् कवचस्य तु ॥
- कालिका पुराण
कामाख्या ध्यानम्
रविशशियुतकर्णा कुंकुमापीतवर्णा,
मणिकनकविचित्रा लोलजिह्वा त्रिनेत्रा ।
अभयवरदहस्ता साक्षसूत्रप्रहस्ता,
प्रणतसुरनरेशा सिद्धकामेश्वरी सा ॥
अरुण – कमलसंस्था रक्तपदमासनस्था,
नवतरुणशरीरा मुक्तकेशी सुहारा ।
शवह्यदि पृथुतुङ्गा स्वांघ्रि, युग्मा मनोज्ञा,
शिशुरविसमवस्त्रा सर्वकामेश्वरी सा ।
विपुलविभवदात्री स्मेरवक्त्रा सुकेशी,
दलितकरकदन्ता सामिचन्द्रावनभ्रा ।
मनसिज – दृशदिस्था योनिमुद्रांलसन्ती ।
पवनगगनसक्तां संश्रुतस्थानभागा ॥
चिन्त्या चैवं दीप्यदग्निप्रकाशा,
धर्मार्थाद्यैः साधकैर्वाञ्छितार्थः ॥
- कालिका पुराण
.कामाख्या स्तोत्र
जय कामेशि चामुण्डे जय भूतापहारिणि ।
जय सर्वगते देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
विश्वमूर्ते शुभे शुद्धे विरुपाक्षि त्रिलोचने ।
भीमरुपे शिवे विद्ये कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
मालाजये जये जम्भे भूताक्षि क्षुभितेऽक्षये ।
महामाये महेशानि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
कालि कराल विक्रान्ते कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
कालि कराल विक्रान्ते कामेश्वरि हरप्रिये ।
सर्व्वशास्त्रसारभूते कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
कामरुप – प्रदीपे च नीलकूट – निवासिनि ।
निशुम्भ – शुम्भमथनि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
कामाख्ये कामरुपस्थे कामेश्वरि हरिप्रिये ।
कामनां देहि में नित्यं कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
वपानाढ्यवक्त्रे त्रिभुवनेश्वरि ।
महिषासुरवधे देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
छागतुष्टे महाभीमे कामख्ये सुरवन्दिते ।
जय कामप्रदे तुष्टे कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
भ्रष्टराज्यो यदा राजा नवम्यां नियतः शुचिः ।
अष्टम्याच्च चतुदर्दश्यामुपवासी नरोत्तमः ॥
संवत्सरेण लभते राज्यं निष्कण्टकं पुनः ।
य इदं श्रृणुवादभक्त्या तव देवि समुदभवम् ॥
सर्वपापविनिर्म्मुक्तः परं निर्वाणमृच्छति ।
श्रीकामरुपेश्वरि भास्करप्रभे, प्रकाशिताम्भोजनिभायतानने ।
सुरारि – रक्षः – स्तुतिपातनोत्सुके, त्रयीमये देवनुते नमामि ॥
सितसिते रक्तपिशङ्गविग्रहे, रुपाणि यस्याः प्रतिभान्ति तानि ।
विकाररुपा च विकल्पितानि, शुभाशुभानामपि तां नमामि ॥
कामरुपसमुदभूते कामपीठावतंसके ।
विश्वाधारे महामाये कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
अव्यक्त विग्रहे शान्ते सन्तते कामरुपिणि ।
कालगम्ये परे शान्ते कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
या सुष्मुनान्तरालस्था चिन्त्यते ज्योतिरुपिणी ।
प्रणतोऽस्मि परां वीरां कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
दंष्ट्राकरालवदने मुण्डमालोपशोभिते ।
सर्व्वतः सर्वंव्गे देवि कामेश्वरि नमोस्तु ते ॥
चामुण्डे च महाकालि कालि कपाल – हारिणी ।
पाशहस्ते दण्डहस्ते कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
चामुण्डे कुलमालास्ये तीक्ष्णदंष्ट्र महाबले ।
शवयानस्थिते देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
- योगिनीतन्त्र

 

प्रार्थना -
जय कामेशि चामुण्डे जय भूतापहारिणि ।
जय सर्वगते देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥
नमों देविमहाविद्ये ! सृष्टिस्थित्यन्त कारिणी ।
नमः कमल पत्राक्षि ! सर्वाधारे नमोऽस्तु ते ॥
सविश्वतैजसप्राज्ञ वराट्ं! सूत्रात्मिके नमः ।
नमोव्याकृतरुपायै कूटस्थायै नमो नमः ॥
कामाक्ष्ये सर्गादिरहिते दुष्टसंरोधनार्गले ! ।
निरर्गल प्रेमगम्ये ! भर्गे देवि ! नमोऽस्तु ते ॥
नमः श्री कालिके ! मातर्नमो नील सरस्वति ।
उग्रतारे महोग्रे ते नित्यमेव नमोनमः ॥
छिन्नमस्ते ! नमस्तेऽस्तु क्षीरसागर कन्यके ।
नमः शाकम्भरि शिवे ! नमस्ते रक्तदन्तिके ॥
निशुम्भ शुम्भदलनि ! रक्तबीज विनाशिनि ।
धूम्रलोचन निर्णासे ! वृत्रासुरनिबर्हिणिं ॥
चण्डमुण्ड प्रमथिनि ! दानवान्त करे शिवे ! ।
नमस्ते विजये गंगे शारदे ! विकटानने ॥
पृथ्वीरुपे दयारुपे तेजोरुपे ! नमो नमः ।
प्राणरुपे महारुपे भूतरुपे ! नमोऽस्तु ते ॥
विश्वमूर्ते दयामूर्ते धर्ममूर्ते नमो नमः ।
देवमूर्ते ज्योतिमूर्ते ज्ञानमूर्ते नमोऽस्तु ते ॥
कामाख्ये काम रुपस्थे कामेश्वरी हर प्रिये ।
कामांश्च देहि मे नित्यं कामेश्वरि नमोस्तुते ॥

कामाख्या देवी सिद्धि विधान
आसन शुद्धि
कामाख्या में देवी जी पूजन वहाँ के पुजारी जैसे कराएँ वैसे करना चाहिए अथवा देवी – पूजन – विधि के अनुसार करना चाहिए । मन्दिर में सब देवों का पूजन कर लाल वस्त्र पर देवीजी का पूजन करें और घर में, गणेश – गौ
रि, कलश, नवग्रह षोडश मातृकादि का स्थापन पूजनादि के बाद कामाख्या देवी का स्थापन पूजन करें ।

अथ आसन शुद्धि – साधक को चाहिए कि स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करके आचार्य के आदेशानुसार पूर्वादिक मुँह करके आसन पर बैठे । तब आसन के नीचे पूर्वादिक भाग में त्रिकोण मण्डल बनाकर निम्नांकित मन्त्र द्वारा गन्ध पुष्पादि धूप दीप नैवेद्य दक्षिणादि से पूजन करें ।

मन्त्र – ह्लीं आधार शक्तये नमः ॥ ॐ कूर्माय नमः ॥ ॐ अनन्ताय नमः ॥ ॐ पृथिव्यै नमः ॥
पूजन के बाद उस त्रिकोण का स्पर्श इस मन्त्र द्वारा करें ।

मन्त्र – ॐ पृथ्वि ! त्वया धृतालोका देवि त्वं विष्णुना धृता । त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥
अब शुद्धासन पर डालकर पूजा के निमित्त आसन ग्राहण करें और रक्षा विधान करें ।

आचमन विधि – पुण्य कार्य के आरम्भ में आचमन अवश्य करना चाहिए । आचमन के समय जल का नख से स्पर्श तथा ओष्ठ का शब्द नहीं होना चाहिए । प्रथम आचमन से आध्यात्मिक, दूसरे से अधिभौतिक और तीसरे से अधिदैविक शान्ति होती है । इसलिए तीन बार आचमन करें और चौथे मन्त्र से बोलते हुए दूसरे पात्र के जल से हाथ की शुद्धि करें ।

मन्त्र – ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः । ॐ माधवाय नमः ॥ तत्पश्चात् हाथ धोये – ॐ हषीकेशाय नमः ॥
पुष्प शुद्धि – नीचे के मन्त्र से पूजा – पुष्प को देखें -
ॐ पुष्पे पुष्पे महापुष्पे सुपुष्पे पुष्प सम्भवे ।
पुष्प चमा वकीर्णन च हुँ फट् स्वाहा ॥
कर शुद्धि – साधक ऐं कहकर रक्त पुष्प हाथ में लेवे और ॐ कहकर दोनों हाथों से प्रेषण करें ( उक्त पुष्प को हाथ में घुमाए ) । इसके बाद उस पुष्प को ईशान कोण में रख दें ।
शरीर तथा पूजन सामग्री शुद्धि – अब आचार्य अथवा साधक स्वयं अपने सिर पर जल छिड़के ।

मन्त्र – ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपिवा ।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं सावाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥
पुनः पूजन सामग्री पर जल छिड़के ।
मन्त्र – ॐ पुण्डरीकाक्षं पुनातु ।
यज्ञोपवीत धारण करना – तब इस मन्त्र से यज्ञोपवीत धारण करें ।
मन्त्र – ॐ यज्ञोपवीतं परमं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।
आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥
तपश्चात् दो बार आचमन करें ।
भस्म और टीका लगाना – ‘ ॐ हुं फट् ‘ से मस्तक, कण्ठ, हदय और बाहु में त्रिपुण्ड धारण करें । पुनः ‘ ऐं ‘ कहकर रोली ले बाएँ हाथ पर रखे और ‘ ह्लीं ‘ का उच्चारण कर जल मिलाकर दाहिने हाथ की अनामिका उंगली से गीला करें और ‘ श्री ‘ बोलकर मध्यमा उंगली से मस्तक के मध्य में एक लम्बा टीका लगाए । ‘ क्लीं ‘ बोलते हुए हाथ धोए और पुनः हाथ जोड़ ‘ ॐ ‘ का उच्चारण कर देवी का ध्यान करें ।
मां काली का ही स्वरूप है। मां काली को नीलरूपा होने के कारण ही तारा कहा गया है। भगवती काली का यह स्वरूप सर्वदा मोक्ष देने वाला है, जीव को इस संसार सागर से तारने वाला है- इसलिए वह तारा हैं। सहज में ही वे वाक्‌ प्रदान करने वाली हैं इसलिए नीलसरस्वती हैं। भयंकर विपत्तियों से साधक की रक्षा करती हैं, उसे अपनी कृपा प्रदान करती हैं, इसलिए वे उग्रतारा या उग्रतारिणी हैं। यद्यपि मां तारा और काली में कोई भेद नहीं है, तथापि बृहन्नील तंत्रादि त्रादि ग्रंथों में उनके विशिष्ट स्वरूप का उल्लेख किया गया है। हयग्रीव दानव का वध करने के लिए देवी को नील-विग्रह प्राप्त हुआ, जिस कारण वे तारा कहलाईं। शव-रूप शिव पर प्रत्यालीढ मुद्रा में भगवती आरूढ हैं, और उनकी नीले रंग की आकृति है तथा नील कमलों के समान तीन नेत्र तथा हाथों में कैंची, कपाल, कमल और खडग धारण किये हैं। व्याघ्र-चर्म से विभूषित इन देवी के कंठ में मुण्डमाला लहराती है। वे उग्र तारा हैं, लेकिन अपने भक्तों पर कृपा करने के लिए उनकी तत्परता अमोघ है । इस कारण मां तारा महा-करूणामयी हैं।

 

जप नियम
इसके बाद ( १ ) ‘ ऐं ह्लीं क्ली चामुण्डायै विच्चे ‘ ( यह मन्त्र राज है ) या ( २ ) ‘ ॐ ऐं ह्लीं क्लीं कामाख्यै स्वाहा ‘ ( यह कामाख्या देवी का दशाक्षर मन्त्र है ) या ( ३ ) ‘ॐ भूः भुवः स्वः ॐ कामाक्ष्यै चामुण्डायै विदमहे भगवत्यै धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् । ‘ ( यह कामाख्या देवी का गायत्री मन्त्र है ) इसका प्रतिदिन यथाशक्ति बराबर से जप करें । मन्त्र में जितने अक्षर हैं उतने लाख का मन्त्र जप एक पुरश्चरण कहलाता है । पुरश्चरणहीन मन्त्र भी निष्प्राण समझा जाता है । एक पुरश्चरण समाप्त होने पर हवनादि करना चाहिए । जप संख्या का दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण किया जाता है । हवन द्रव्यों में विशेषकर घृत, खीर, तिल, बिल्व पत्र, यव मधु आदि लेकर दशांश हवन करे । तब देवी की सिद्धि प्राप्त होती है ।
तत्पश्चात् अन्य मन्त्रों की सिद्धि के लिए उपरोक्त किसी एक मन्त्र को, अथवा किसी दो या तीनों को १०८ बार जपे । यह साधक के मनोबल और इच्छा के ऊपर है और तब मन्त्र के विधि और संख्यानुसार वह मन्त्र जपे । पश्चात् संख्यानुसार जप समाप्त होने पर हवन करें । शेष नियम पहले जैसा ही है अर्थात् उपरोक्त मन्त्रों के जप के १० हवन के और १ तर्पण के हुआ और जो अन्य कामनार्थ मन्त्र जपा गया है उसकी संख्यानुसार दशांश हवन और दशांश तर्पण करे तब वह मन्त्र भी सिद्ध हो जाता है । इसमें तनिक भी संशय नहीं हैं ।

 

ॐॐॐॐॐ जयन्ति मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।।ॐॐॐॐॐॐ
1)ॐ जयन्ती — जयति सर्वोत्कर्षेण वर्तते इति ‘जयन्ती ‘ —सबसे
उत्कृष्ट एवं विजयशालिनी ।।

2) ॐ मङ्गला –मङ्गं जननमरणादिरूपं समर्पणं
भक्तानां लाति गृह्णाति नाशयति या सा मङ्गला मोक्षप्रदा –
जो अपने भक्तों के जन्म -मरण आदि संसार बन्धनको दूर करती है उन
मोक्ष दायिनी मंगलमयी देवीका नाम ‘मङ्गला’ है ।।

3) ॐ काली — कलयति भक्षयति प्रलयकाले सर्वम् इति ‘काली’ –
जो प्रलयकालमे सम्पूर्ण सृष्टि को अपना ग्रास बना लेती है ; वह
‘काली ‘ है ।।

4) ॐ भद्रकाली — भद्रं मङ्गलं सुखं
वा कलयति स्वीकरोति भक्तेभ्यो दातुम् इति भद्रकाली सुखप्रदा —
जो अपने भक्तों को देनेके लिए ही भद् , सुख किंवा मंगल स्वीकार
करती है , वह ‘भद्रकाली’ है ।।

5) ॐ कपालिनी –धारयति हस्ते कपाल मुण्डभूषिता च
या सा कपालिनी — हातमे कपाल तथा गलेमे मुण्डमाला धारण करने
वाली ।।

6) ॐ दुर्गा –दुःखेन अष्टाङ्गयोगकर्मोपासनारूपेण क्लेशेन गम्यते
प्राप्यते या सा ‘दुर्गा’ –जो अष्टांगयोग, कर्म एवं उपासनारूप
दुःसाध्य साधन से प्राप्त होती है , वे जगदम्बिका ‘दुर्गा’
कहलाती है ।।

7) ॐ क्षमा –क्षमते सहते भक्तानाम् अन्येषां वा सर्वानपराधान्
जननीत्वेनातिशयकरूणामयस्वभावादिति ‘क्षमा’ — सम्पूर्ण जगत्
की जननी होनेसे अत्यन करूणामय स्वभाव होनेके कारण
जो भक्तों अथवा दूसरों के भी सारे अपराध क्षमा करती है ,
उनका नाम ‘क्षमा’ है ।।

ॐ शिवा — सबका कल्याण अर्थात शिव
करनेवाली जगदम्बाको ‘शिवा ‘ कहते है ।।

9) ॐ धात्री –सम्पूर्ण प्रपंचको धारण करनेके कारण भगवती का नाम
‘धात्री’ है ।।

10) ॐ स्वाहा –स्वाहारूपसे यज्ञभाग ग्रहण करके देवताओं का पोषण
करनेवाली भगवती को ‘स्वाहा ‘ कहते है ।।

11) ॐस्वधा — स्वधारूपसे श्राद्ध और तर्पणको स्वीकार करके
पितरोंका पोषण करनेवाली भगवती को ‘स्वधा ‘ कहते है ।।

इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके ! तुम्हे मेरा नमस्कार हो ।
देवि चामुण्डे ! तुम्हारी जय हो ।सम्पूर्ण
प्राणियोंकी पीडा हरनेवाली देवि ! तुम्हारी जय हो ।सबमे व्याप्त
रहने वाली देवि ! तुम्हारी जय हो ।कालरात्रि ! तुम्हें नमस्कार हो ।।

 

लक्ष्मी सरस्वती
महामाया की दस महाविद्या अर्थात् दस विभूतियों के अन्तर्गत षोडशी, कामाख्या देवी का ही अन्य नाम है, एवं वे ही देवीपीठ में अवस्थित हैं । इसी देवीपीठ से संलग्न पूर्वप्रान्तर में मातंगी ( सरस्वती ) एवं कमला ( लक्ष्मी ) देवी का पीठस्थान है । यहाँ यथाशक्ति पूजा कर प्रणाम करें ।
प्रणाम मन्त्र
सदाचार प्रिये देवि, शुक्ल पुष्पाम्बर प्रिये ।
गोमयादि शुचि प्रीते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥
सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नमः ।
वेदवेदान्तवेदांग विद्यास्थानेभ्य एव च ॥
स्पर्शन मन्त्र
मध्ये च कुब्जिके देवि प्रान्ते प्रान्ते च भैरवी ।
एकैक स्पर्शनात् देव्याः कोटि जन्माघनाशनम् ॥
इसके बाद महामाया का दर्शन, स्पर्शन, पूजनादि करें । अनन्तर चलन्ता मन्दिर के चारों ओर दीवालों से संलग्न देव – देवियों की मूर्ति का दर्शन करें । मंगलचण्डी, कल्कि अवतार, युधिष्ठिर, श्री रामचन्द्र, बटुक भैरव, नारायण गोपाल, कूचविहार के राजा नर नारायण की प्राचीन मूर्ति, नील – कण्ठ महादेव, नन्दी, भृंगी, कपिल मुनि, मनसा देवी, जरत्कारु मुनि, कूचविहार के दोनों महाराजों का मन्दिर निर्माणादि विषय कीर्तिज्ञापक शिलालिपि आदि तथा पंचरत्न मन्दिर की चामुण्डा देवी का दर्शन करें ।
चामुण्डा का प्रणाम मन्त्र
महिषाघ्नि महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनि ।
आयुरारोग्यमैश्वर्य देहि मे परमेश्वरि ।
इसके अतिरिक्त नाटमन्दिर के भीतर, आहोम राजा राजेश्वरसिंह और गौरीनाथसिंह की शिला और ताम्रलिपियाँ हैं । यात्रियों के तीर्थकृत्य, कर्मकाण्ड विशेषकर कुमारी पूजा, दान, भोज्य उत्सर्ग आदि कर्मानुष्ठान इसी पंचरत्न मन्दिर के भीतर तीर्थ के पुजारी ब्राह्मणगण सम्पादन करवाते हैं ।
कुमारी पूजा
महातीर्थ कामाख्या में महामाया कुमारी रुप में विराजमान हैं । यात्रीगण देवी भाव से कुमारी पूजा कर कृतकृत्य होते हैं । जिस तरह प्रयाग में मुण्डन एवं काशी में दण्डी भोजन करवाने की विधि है, उसी तरह कामाख्या में कुमारी पूजा आवश्यक कर्त्तव्य है । यहाँ कुमारी पूजा करने से सर्व देवदेवियों की पूजा करने का फल प्राप्त होता है । भक्तिभाव एवं कर्त्तव्य बुद्धाय कुमार पूजा करने से अवश्य पुत्र, धन, पृथ्वी, विद्या आदि का लाभ होता है एवं मन की सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है ।
सर्वविद्यास्वरुपा हि कुमारी नात्र संशयः ।
एकाहि पूजिता बाला सर्वं हि पूजितं भवेत् ॥
– योगिनीतन्त्र
कुमारी सर्वविद्या स्वरुपा है, इसमें सन्देह नहीं । एक कुमारी पूजा करने से सम्पूर्ण देव – देवियों की पूजा का फल होता है ।
ध्यानम्
ॐ बालरुपाञ्च त्रैलोक्य सुन्दरीं वरवर्णिनाम् ।
नानालंकार नाम्राङ्गीं भद्रविद्या प्रकाशिनीम् ।
चारुहास्यां महानन्द हदयां चिन्तयेत् शुभाम् ॥
आवाहनम्
ॐ मन्त्राक्षरमयीं देवीं मातृणां रुपधारिणीम् ।
नवदुर्गात्मिकां साक्षात् कन्यामावाहयाम्यहम् ॥
प्रणाम मन्त्र
ॐ जगदवन्दे जगतपूज्ये सर्वशक्ति स्वरुपिणि ।
पूजां गृहाण कौमारी जगन्मातर्नमोऽस्तु ते ॥
देवी मन्दिर का प्रदक्षिणा मन्त्र
यानि यानीह पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।
तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे ॥
.कम्बलेश्वर
कम्बलेश्वर
कामाख्या देवी के मन्दिर के चारों ओर पर्वत के ऊपर भिन्न – भिन्न स्थानों में दशमहाविद्या के मन्दिर में देवी के नव – योनिपीठ के अन्तर्गत अन्य सातपीठ – स्थान विद्यमान हैं । पंचानत के पाँचों मुख की ओर पाँच शिवमन्दिर अवस्थित हैं । कम्बलेश्वर नाम का विष्णु – मन्दिर देवी मन्दिर के सन्निकट अवस्थित हैं । यहाँ भगवान् विष्णु कम्बलाख्य नाम से प्रसिद्ध हैं । इसके बाहर भी कामेश्वर और सिद्धेश्वर के मन्दिर के बीच में केदार क्षेत्र और उक्त दो मन्दिरों के दक्षिण प्रान्त में कुछ दूरी पर वन के बीच वनवासिनी, जयदुर्गा तथा ललिता – कान्ता के नामसे तीन शिलापीठ विद्यमान हैं ।
कम्बलेश्वर प्रणाम मन्त्र
नमो नमस्ते देवेश श्याम श्रीवत्सभूषित ।
लक्ष्मीकान्त नमस्तेऽस्तु नमस्ते पुरुषोत्तम ॥
देवदानव गन्धर्वपादपदमार्चित प्रभो ।
नमो बरदालिंगाय कम्बलाय नमो नमः ॥
अनुज्ञा मन्त्र
नमस्ते कम्बलेशाय महाभैरवरुपिणे ।
अनुज्ञां देहि मे नाथ कामाख्या दर्शनं प्रति ॥

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