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नारियल के प्रयोग द्वारा केसे करें अपनी सभी परेशानियों का जानिए निदान— जेसा की आप सभी जानते हें की नारियल एक ऐसी वस्तु है जो कि किसी भी सात्त्विक अनुष्ठान, सात्त्विक पूजा, धार्मिक कृत्यों तथा हरेक मांगलिक कार्यों के लिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण सामग्री है. इसकी कुछ विभिन्न विधियों द्वारा हम अपने पारिवारिक, दाम्पत्य तथा आर्थिक परेशानियों से निजात पा सकते हैं. —–घर में किसी भी प्रकार की आर्थिक समस्या हो तो—- एक नारियल पर चमेली का तेल मिले सिन्दूर से स्वास्तिक का चिन्ह बनायें. कुछ भोग (लड्डू अथवा गुड़ चना) के साथ हनुमान जी के मन्दिर में जाकर उनके चरणों में अर्पित करके ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ करें. तत्काल लाभ प्राप्त होगा. —यदि कुण्ड़ली में शनि, राहू, केतु की अशुभ दृष्टि, इसकी अशुभ दशा , शनि की ढ़ैया या साढ़े साती चल रही तो- एक सूखे मेवे वाला नारियल लेकर उस पर मुँह के आकार का एक कट करें. उसमें पाँच रुपये का मेवा और पाँच रुपये की चीनी का बुरादा भर कर ढ़क्कन को बन्द कर दें. पास ही किसी किसी पीपल के पेड़ के नीचे एक हाथ या सवा हाथ गढ्ढ़ा खोदकर उसमें नारियल को स्थापित कर दें. उसे मिट्टी से अच्छे से दबाकर घर चले जायें. ध्यान रखें कि पीछे मुड़कर नही देखना. सभी प्रकार के मानसिक तनाव से छुटकारा मिल जायेगा. —-यदि आपके व्यापार में लगातार हानि हो रही हो, घाटा रुकने का नाम नही ले रहा हो तो – गुरुवार के दिन एक नारियल सवा मीटर पीले वस्त्र में लपेटे. एक जोड़ा जनेऊ, सवा पाव मिष्ठान के साथ आस-पास के किसी भी विष्णु मन्दिर में अपने संकल्प के साथ चढ़ा दें. तत्काल ही लाभ प्राप्त होगा. व्यापार चल निकलेगा. यदि धन का संचय न हो पा रहा हो, परिवार आर्थिक दशा को लेकर चिन्तित हो तो- शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी के मन्दिर में एक जटावाला नारियल, गुलाब, कमल पुष्प माला, सवा मीटर गुलाबी, सफ़ेद कपड़ा, सवा पाव चमेली, दही, सफ़ेद मिष्ठान एक जोड़ा जनेऊ के साथ माता को अर्पित करें. माँ की कपूर व देसी घी से आरती उतारें तथा श्रीकनकधारास्तोत्र का जाप करें. धन सम्बन्धी समस्या तत्काल समाप्त हो जायेगी. —–शनि, राहू या केतु जनित कोई समस्या हो, कोई ऊपरी बाधा हो, बनता काम बिगड़ रहा हो, कोई अनजाना भय आपको भयभीत कर रहा हो अथवा ऐसा लग हो कि किसी ने आपके परिवार पर कुछ कर दिया है तो इसके निवारण के लिये- शनिवार के दिन एक जलदार जटावाला नारियल लेकर उसे काले कपड़े में लपेटें. 100 ग्राम काले तिल, 100 ग्राम उड़द की दाल तथा एक कील के साथ उसे बहते जल में प्रवाहित करें. ऐसा करना बहुत ही लाभकारी होता है –किसी भी प्रकार की बाधा, नजर दोष, किसी भी प्रकार का भयंकर ज्वर, गम्भीर से गम्भीर रोगों की समस्या विशेषकर रक्त सम्बन्धी हो तो- शनिवार के दिन एक नारियल, लाल कपड़े में लपेटकर उसे अपने ऊपर सात बार उवारें. किसी भी हनुमान मन्दिर में ले जाकर उसे हनुमान जी के चरणों में अर्पित कर दें. इस प्रयोग से तत्काल लाभ होगा. —-यदि राहू की कोई समस्या हो, तनाव बहुत अधिक रहता हो, क्रोध बहुत अधिक आ रहा हो, बनता काम बिगड़ रहा हो, परेशानियों के कारण नींद न आ रही हो तो- बुधवार की रात्रि को एक नारियल को अपने पास रखकर सोयें. अगले दिन अर्थात् वीरवार की सुबह वह नारियल कुछ दक्षिणा के साथ गणेश जी के चरणों में अर्पित कर दें. मन्दिर में यथासम्भव 11 या 21 लगाकर दान कर कर दें. हर प्रकार का अमंगल, मंगल में बदल जायेगा –यदि आप किसी गम्भीर आपत्ति में घिर गये हैं. आपको आगे बढ़ने का कोई रास्ता नही दिख रहा हो तो – दो नारियल, एक चुनरी, कपूर, गूलर के पुष्प की माला से देवी दुर्गा का दुर्गा मंदिर में पूजन करें. एक नारियल चुनरी में लपेट कर (यथासम्भव दक्षिणा के साथ) माता के चरणों में अर्पित कर दें. माता की कपूर से आरती करें. ‘हुं फ़ट्’ बोलकर दूसरा नारियल फ़ोड़कर माता को बलि दें. सभी प्रकार के अनजाने भय तथा शत्रु बाधा से तत्काल लाभ होगा.

2…दूर्वा तंत्र : दूर्वा अर्थात् दूब एक विशेष प्रकार की घास है। आयुर्वेद, तंत्र और अध्यात्म में इसकी बड़ी महिमा बताई गई है। देव पूजा में भी इसका प्रयोग अनिवार्य रूप से होता है। गणेशजी को यह बहुत प्रिय है। साधक किसी दिन शुभ मुहूर्त में गणेशजी की पूजा प्रारंभ करे और प्रतिदिन चंदन, पुष्प आदि के साथ प्रतिमा पर 108 दूर्वादल (दूब के टुकड़े) अर्पित करे। धूप-दीप के बाद गुड़ और गिरि का नैवेद्य चढ़ाना चाहिए। इस प्रकार प्रतिदिन दूर्वार्पण करने से गणेशजी की कृपा प्राप्त हो सकती है। ऐसा साधक जब कभी द्रव्योपार्जन के कार्य से कहीं जा रहा हो तो उसे चाहिए कि गणेश प्रतिमा पर अर्पित दूर्वादलों में से 5-7 दल प्रसाद स्वरूप लेकर जेब में रख ले। यह दूर्वा तंत्र कार्यसिद्धि की अद्भुत कुंजी है।

3…..दुर्भाग्य दूर करने के लिये—-
आटे का दिया, १ नीबू, ७ लाल मिर्च, ७ लड्डू,२ बत्ती, २ लोंग, २ बड़ी इलायची बङ या केले के पत्ते पर ये सारी चीजें रख दें |रात्रि १२ बजे सुनसान चौराहे पर जाकर पत्ते को रख दें व प्रार्थना करें,
जब घर से निकले तब यह प्रार्थना करें = हे दुर्भाग्य, संकट, विपत्ती आप मेरे साथ चलें और पत्ते को रख दें | फिर प्रार्थना करें = मैं विदा हो रहा हूँ | आप मेरे साथ न आयें, चारों रास्ते खुले हैं आप कहीं भी जायें | एक बार करने के बाद एक दो महीने देखें, उपाय लाभकारी है| श्रद्धा से करें |

4….सर्व-कार्य-कारी सिद्ध मन्त्र
१॰ “ॐ पीर बजरङ्गी, राम-लक्ष्मण के सङ्गी, जहाँ-जहाँ जाए, फतह के डङ्के बजाए, दुहाई माता अञ्जनि की आन।”
२॰ “ॐ नमो महा-शाबरी शक्ति, मम अनिष्ट निवारय-निवारय। मम कार्य-सिद्धि कुरु-कुरु स्वाहा।”
विधिः- यदि कोई विशेष कार्य करवाना हो अथवा किसी से अपना काम बनवाना हो तो कार्य प्रारम्भ करने के पूर्व अथवा व्यक्ति-विशेष के पास जाते समय उक्त दो मन्त्रों में से किसी भी मन्त्र का जप करता हुआ जाए। कार्य में सिद्धि होगी।

5…आज एक ऐसा ही प्रयोग
भगवान गणेश के वरदायक स्वरुप तो जीवन के हर कार्य में आवश्यक हैं ही फिर वह चाहे विद्या का क्षेत्र में हो या साधना का क्षेत्र में हो व्यापार या भौतिक जीवन का कोई भी भाग हो ..
यदि आपको व्यापार में मनोबांछित सफलता नहीं मिल रही हैं या फिर कोई आप प्रतियोगी परीक्षा में भाग लेने जा रहे हो तो इस मंत्र की 31 माला रोज़ जप करे निश्चय ही सफलता आपको प्राप्त होगी , बस आवश्यक हैं की आप का साधना और मंत्र और सदगुरुदेव के प्रति विस्वास हो . और गणपति साधना के साधारण नियम तो सभी जानते हैं ही माला , दिशा , वस्त्र ,आसन का रंग जो आपको संभव हो .
हाँ उन्हें लड्डू का भोग बहुत प्रिय हैं यह तो बात आप जानते हैं ही .
मंत्र – ॐ गं गणपतये नमः

6…लक्ष्मी प्राप्ति के कुछ सरल उपाय ————

1-गाय की सेवा भी इस श्रेणी में विशेष महत्व रखती है। जिस घर से गाय के लिए भोजन की पहली रोटी या प्रथम हिस्सा जाता है वहां भी लक्ष्मी को अपना निवास करना पड़ता है।
2- साथ ही घर के भोजन का कुछ भाग श्वान को भी देना चाहिए, क्योंकि ये भगवान भैरव के गण माने जाते हैं, इनको दिया गया भोजन आपके रोग, दरिद्रता में कमी का संकेत देता है।

7….कलियुग में पवनपुत्र हनुमान, मां भगवती और शिवशंकर भोलेनाथ की विशेष रूप से आराधना की जाती है। शंकर के अवतार हनुमान जी ऊर्जा के प्रतीक माने जाते हैं। इसकी आराधना से बल, कीर्ति, आरोग्य और निर्भीकता बढती है।

panchamukhiहनुमान का विराट स्वरूप पांच मुख पांच दिशाओं में हैं। हर रूप एक मुख वाला, त्रिनेत्रधारी यानि तीन आंखों और दो भुजाओं वाला है। यह पांच मुख नरसिंह, गरुड, अश्व, वानर और वराह रूप है। हनुमान के पांच मुख क्रमश:पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊर्ध्व दिशा में प्रतिष्ठित माने गएं हैं।

पंचमुख हनुमान के पूर्व की ओर का मुख वानर का हैं। जिसकी प्रभा करोडों सूर्यो के तेज समान हैं। पूर्व मुख वाले हनुमान का पूजन करने से समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता है।

पश्चिम दिशा वाला मुख गरुड का हैं। जो भक्तिप्रद, संकट, विघ्न-बाधा निवारक माने जाते हैं। गरुड की तरह हनुमानजी भी अजर-अमर माने जाते हैं।

हनुमानजी का उत्तर की ओर मुख शूकर का है। इनकी आराधना करने से अपार धन-सम्पत्ति,ऐश्वर्य, यश, दिर्धायु प्रदान करने वाल व उत्तम स्वास्थ्य देने में समर्थ हैं।

हनुमानजी का दक्षिणमुखी स्वरूप भगवान नृसिंह का है। जो भक्तों के भय, चिंता, परेशानी को दूर करता हैं।

श्री हनुमान का ऊर्ध्व मुख घोडे के समान हैं। हनुमानजी का यह स्वरुप ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर प्रकट हुआ था। मान्यता है कि हयग्रीवदैत्य का संहार करने के लिए वे अवतरित हुए। कष्ट में पडे भक्तों को वे शरण देते हैं। ऐसे पांच मुंह वाले रुद्र कहलाने वाले हनुमान बडे कृपालु और दयालु हैं।

हनुमतमहाकाव्य में पंचमुखीहनुमान के बारे में एक कथा हैं।

एक बार पांच मुंह वाला एक भयानक राक्षस प्रकट हुआ। उसने तपस्या करके ब्रह्माजीसे वरदान पाया कि मेरे रूप जैसा ही कोई व्यक्ति मुझे मार सके। ऐसा वरदान प्राप्त करके वह समग्र लोक में भयंकर उत्पात मचाने लगा। सभी देवताओं ने भगवान से इस कष्ट से छुटकारा मिलने की प्रार्थना की। तब प्रभु की आज्ञा पाकर हनुमानजी ने वानर, नरसिंह, गरुड, अश्व और शूकर का पंचमुख स्वरूप धारण किया। इस लिये एसी मान्यता है कि पंचमुखीहनुमान की पूजा-अर्चना से सभी देवताओं की उपासना के समान फल मिलता है। हनुमान के पांचों मुखों में तीन-तीन सुंदर आंखें आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक तीनों तापों को छुडाने वाली हैं। ये मनुष्य के सभी विकारों को दूर करने वाले माने जाते हैं।

भक्त को शत्रुओं का नाश करने वाले हनुमानजी का हमेशा स्मरण करना चाहिए। विद्वानो के मत से पंचमुखी हनुमानजी की उपासना से जाने-अनजाने किए गए सभी बुरे कर्म एवं चिंतन के दोषों से मुक्ति प्रदान करने वाला हैं।

पांच मुख वाले हनुमानजी की प्रतिमा धार्मिक और तंत्र शास्त्रों में भी बहुत ही चमत्कारिक फलदायी मानी गई है.

8….सर्वविघ्नहरण मंत्र
ऊँ नम: शान्ते प्रशान्ते ऊँ ह्यीं ह्रां सर्व क्रोध प्रशमनी स्वाहा।
इस मंत्र को नियमपूर्वक प्रतिदिन प्रात:काल इक्कीस बार स्मरण करने के पश्चात मुख प्रक्षालन करने से तथा सायंकाल में पीपल के वृक्ष की जड़ में शर्बत चढ़ाकर धूप दीप देने से घर के सभी लोग शांतमय निर्विघ्न जीवन व्यतीत करते हैं। इसका इतना प्रभाव होता है कि पालतू जानवर भी बाधा रहित जीवन व्यतीत करता है।

9….टोटका

एक तांबे की लुटिया लें ढक्कन सहित और उसमें चांदी का सर्प-सर्पिनी का जोड़ा, चांदी का एक छोटा सा पतरा, पूजा के उपयोग में आने वाली सात सुपारियां, हल्दी की सात साबूत और साफ गांठ डाल लें। अब इस लोटे को पानी से भर लें और इसका ढक्कन अच्छी तरह से बंद कर दें। अब यह लुटिया मुख्य द्वार के पश्चिम की ओर दबा दें। इस टोटके से धन आगमन के द्वार खुल जाएंगे और आपके घर में फिर से सुख-समृद्धि का वास होगा।

10…भगवान श्रीगणेश के प्रमुख गणों के नाम
भगवान गणेशजी का उल्लेख ऋग्वेद के एक मंत्र (2-23-1) से मिलता है। चाहे कोई सा अनुष्ठान हो, इस मंत्र का जाप तो होता ही है…गणनां त्वा गणति हवामहे..। इस मंत्र में ब्रह्मणस्पति शब्द आया है। यह बृहस्पति देव के लिए प्रयुक्त हुआ है। बृहस्पति देव बुद्धि और ज्ञान के देव हैं। इसलिए गणपति देव को भी बुद्धि और विवेक का देव माना गया है। किसी भी कार्य की सिद्धि बिना बुद्धि और विवेक के नहीं हो सकती। इसलिए हर कार्य की सिद्धि के लिए बृहस्पतिदेव के प्रतीकात्मक रूप में गणेशजी की पूजा होती है।

गणेश पुराण में गणेशजी के अनेकानेक रूप कहे गए हैं। सतयुग में कश्यप ऋषि पुत्र के रूप में वह विनायक हुए और सिंह पर सवार होकर देवातंक -निरांतक का वध किया। त्रेता में मयूरेश्वर के रूप में वह अवतरित हुए।

धर्म शास्त्रों में भगवान गणेश के 21 गण बताए गए हैं, जो इस प्रकार हैं- गजास्य, विघ्नराज, लंबोदर, शिवात्मज, वक्रतुंड, शूर्पकर्ण, कुब्ज, विनायक, विघ्ननाश, वामन, विकट, सर्वदैवत, सर्वाॢतनाशी, विघ्नहर्ता, ध्रूमक, सर्वदेवाधिदेव, एकदंत, कृष्णपिंड्:ग, भालचंद्र, गणेश्वर और गणप। ये 21 गण हैं और गणेशजी की पूजा के भी 21 ही विधान हैं।

11….मूषक (चूहा) भगवान गणेश का वाहन है। गणेश का स्वरूप जितना विचित्र है उतना ही अजीब उनका वाहन है। शिवपुराण में प्रसंग आता है कि गणेश ने मूषक पर सवार होकर ही अपने माता-पिता की परिक्रमा की। कहां विशालकाय गणेश और कहां चूहे का छोटा-सा शरीर, कहीं कोई तालमेल ही नहीं। पुराण कहते हैं-
मूषकोत्तममारुह्यï देवासुरमहाहवे।
योद्धुकामं महाबाहुं वन्देऽहं गणनायकम्॥
पद्मपुराण, सृष्टिखंड 66/4
भावार्थ- उत्तम मूषक पर विराजमान देव-असुरों में श्रेष्ठ तथा युद्ध में महाबलशाली गणों के अधिपति श्रीगणेश को प्रणाम है।
भगवान गणेश के वाहन मूषक के बारे में कई प्राचीन कथाएं प्रचलित हैं। उसी के अनुसार गजमुखासुर नामक दैत्य ने अपने बाहुबल से देवताओं को बहुत परेशान कर दिया। सभी देवता एकत्रित होकर भगवान गणेश के पास पहुंचे। तब भगवान श्रीगणेश ने उन्हें गजमुखासुर से मुक्ति दिलाने का भरोसा दिलाया। तब श्रीगणेश का गजमुखासुर दैत्य से भयंकर युद्ध हुआ। युद्ध में श्रीगणेश का एक दांत टूट गया। तब क्रोधित होकर श्रीगणेश ने टूटे दांत से गजमुखासुर पर ऐसा प्रहार किया कि वह घबराकर चूहा बनकर भागा लेकिन गणेशजी ने उसे पकड़ लिया। मृत्यु के भय से वह क्षमायाचना करने लगा। तब श्रीगणेश ने मूषक रूप में ही उसे अपना वाहन बना लिया।

12…घर में इस दिशा में श्री गणेश बैठाकर करें पूजा..चलेगा दिमाग, मिलेगा पैसा
बुद्धि, ज्ञान और धन जीवन की ऐसी जरूरते हैं, जिनमें से एक के भी अभाव से पैदा रुकावटें जीवन में निराशा और असफलता ही लाती है। इन जरूरतों और विघ्रों से बचने के लिए ही हिन्दू धर्म में भगवान गणेश की पहली पूजा शुभ मानी गई है।
खासतौर पर घर में श्री गणेश की स्थापना सुख-समृद्ध बनाने वाली मानी गई है। वैसे तो किसी भी रूप में गणेश पूजा अशुभ नहीं, किंतु शास्त्रों में बताई दिशा को ध्यान रख भगवान गणेश की प्रतिमा देवालय में रखी जाए तो यह अपार बुद्धि, धन और ज्ञान की कामनाएं सिद्ध करती हैं। जानते हैं कौन-सी है यह दिशा?
शास्त्र लिखते हैं कि -
हेरम्बं तु यदा मध्ये ऐशान्यामच्युतं यजेत्।
आग्रेय्यां पञ्चवक्त्रं तु नैऋत्यां द्युमणि यजेत्।
वायव्यामम्बिकां चैव यजेन्नित्यमतन्द्रित:।।
इस मंत्र द्वारा बताया गया है कि घर की ईशान यानी उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित देवालय में भगवान गणेश की प्रतिमा पश्चिम दिशा की ओर मुख कर रखें। अगर पंचदेवता बैठाएं तो श्री गणेश को बीच में विराजित करें।
- श्री गणेश से ईशान दिशा यानी उत्तर-पूर्व में श्री विष्णु,
- आग्रेय यानी दक्षिण-पूर्व में शंकर,
- नैऋत्य यानी दक्षिण-पश्चिम में सूर्य और
- वायव्य यानी उत्तर-पश्चिम दिशा में मां दुर्गा बैठाएं।
शास्त्रों में ईशान दिशा स्वर्ग की दिशा और इस दिशा में मुख कर मंत्र ध्यान या जप ज्ञान और ज्ञान से बुद्धि व धन की वृद्धि करने वाला माना गया है। दक्षिनामुखी प्रतिमा में गणेश जी सूंड दायीं ओर मुडी होती है जिसका मिलना आधुनिक बाज़ार में जटिल हो गया है इसे सिद्ध दात्री कहा जाता है। क्यों की पुरानो का मत है की गणेश जी की दायीं तरफ़ सभी सिद्धियों का वास है .इसीलिए इस प्रकार की प्रतिमा बुद्धिजीवी वर्ग तथा विद्यार्थियों के लिए विशेष उपयोगी है। इस प्रतिमा के लगाने से पूजा करने से बौधिक विकास जीवन में प्रसिद्धि तथा विद्या के शेत्र में ख्याति प्राप्त होती है। यह प्रतिमा शान्ति देने वाली होती है लेकिन इसका प्रयोग नैतिक एवं सात्विक तत्वों पर चलने वाले व्यक्तियों को ही करना चाहिए ।
जन्म से पहले पूजा- कुछ लोग शंका करते हैं कि गणेश शिवजी के पुत्र हैं फिर भी शंकर के विवाह में उनका पूजन कैसे हुआक् वास्तव में गणेश किसी के पुत्र नहीं हैं, वे अज, अनादि और अनंत हैं। इन्होंने शिवजी के यहां गणपति के रूप में अवतार लिया। अत: उन्हें शिव विवाह में पूजा गया।

13….सुख-समृद्धि॰

यदि परिश्रम के पश्चात् भी कारोबार ठप्प हो, या धन आकर खर्च हो जाता हो तो यह टोटका काम में लें। किसी गुरू पुष्य योग और शुभ चन्द्रमा के दिन प्रात: हरे रंग के कपड़े की छोटी थैली तैयार करें। श्री गणेश के चित्र अथवा मूर्ति के आगे “संकटनाशन गणेश स्तोत्र´´ के 11 पाठ करें। तत्पश्चात् इस थैली में 7 मूंग, 10 ग्राम साबुत धनिया, एक पंचमुखी रूद्राक्ष, एक चांदी का रूपया या 2 सुपारी, 2 हल्दी की गांठ रख कर दाहिने मुख के गणेश जी को शुद्ध घी के मोदक का भोग लगाएं। फिर यह थैली तिजोरी या कैश बॉक्स में रख दें। गरीबों और ब्राह्मणों को दान करते रहे। आर्थिक स्थिति में शीघ्र सुधार आएगा। 1 साल बाद नयी थैली बना कर बदलते रहें।
2॰ किसी के प्रत्येक शुभ कार्य में बाधा आती हो या विलम्ब होता हो तो रविवार को भैरों जी के मंदिर में सिंदूर का चोला चढ़ा कर “बटुक भैरव स्तोत्र´´ का एक पाठ कर के गौ, कौओं और काले कुत्तों को उनकी रूचि का पदार्थ खिलाना चाहिए। ऐसा वर्ष में 4-5 बार करने से कार्य बाधाएं नष्ट हो जाएंगी।
3॰ रूके हुए कार्यों की सिद्धि के लिए यह प्रयोग बहुत ही लाभदायक है। गणेश चतुर्थी को गणेश जी का ऐसा चित्र घर या दुकान पर लगाएं, जिसमें उनकी सूंड दायीं ओर मुड़ी हुई हो। इसकी आराधना करें। इसके आगे लौंग तथा सुपारी रखें। जब भी कहीं काम पर जाना हो, तो एक लौंग तथा सुपारी को साथ ले कर जाएं, तो काम सिद्ध होगा। लौंग को चूसें तथा सुपारी को वापस ला कर गणेश जी के आगे रख दें तथा जाते हुए कहें `जय गणेश काटो कलेश´।
4॰ सरकारी या निजी रोजगार क्षेत्र में परिश्रम के उपरांत भी सफलता नहीं मिल रही हो, तो नियमपूर्वक किये गये विष्णु यज्ञ की विभूति ले कर, अपने पितरों की `कुशा´ की मूर्ति बना कर, गंगाजल से स्नान करायें तथा यज्ञ विभूति लगा कर, कुछ भोग लगा दें और उनसे कार्य की सफलता हेतु कृपा करने की प्रार्थना करें। किसी धार्मिक ग्रंथ का एक अध्याय पढ़ कर, उस कुशा की मूर्ति को पवित्र नदी या सरोवर में प्रवाहित कर दें। सफलता अवश्य मिलेगी। सफलता के पश्चात् किसी शुभ कार्य में दानादि दें।
7॰ किसी शनिवार को, यदि उस दिन `सर्वार्थ सिद्धि योग’ हो तो अति उत्तम सांयकाल अपनी लम्बाई के बराबर लाल रेशमी सूत नाप लें। फिर एक पत्ता बरगद का तोड़ें। उसे स्वच्छ जल से धोकर पोंछ लें। तब पत्ते पर अपनी कामना रुपी नापा हुआ लाल रेशमी सूत लपेट दें और पत्ते को बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। इस प्रयोग से सभी प्रकार की बाधाएँ दूर होती हैं और कामनाओं की पूर्ति होती है।
८॰ रविवार पुष्य नक्षत्र में एक कौआ अथवा काला कुत्ता पकड़े। उसके दाएँ पैर का नाखून काटें। इस नाखून को ताबीज में भरकर, धूपदीपादि से पूजन कर धारण करें। इससे आर्थिक बाधा दूर होती है। कौए या काले कुत्ते दोनों में से किसी एक का नाखून लें। दोनों का एक साथ प्रयोग न करें।
9॰ प्रत्येक प्रकार के संकट निवारण के लिये भगवान गणेश की मूर्ति पर कम से कम 21 दिन तक थोड़ी-थोड़ी जावित्री चढ़ावे और रात को सोते समय थोड़ी जावित्री खाकर सोवे। यह प्रयोग 21, 42, 64 या 84 दिनों तक करें।
10॰ अक्सर सुनने में आता है कि घर में कमाई तो बहुत है, किन्तु पैसा नहीं टिकता, तो यह प्रयोग करें। जब आटा पिसवाने जाते हैं तो उससे पहले थोड़े से गेंहू में 11 पत्ते तुलसी तथा 2 दाने केसर के डाल कर मिला लें तथा अब इसको बाकी गेंहू में मिला कर पिसवा लें। यह क्रिया सोमवार और शनिवार को करें। फिर घर में धन की कमी नहीं रहेगी।
11॰ आटा पिसते समय उसमें 100 ग्राम काले चने भी पिसने के लियें डाल दिया करें तथा केवल शनिवार को ही आटा पिसवाने का नियम बना लें।
12॰ शनिवार को खाने में किसी भी रूप में काला चना अवश्य ले लिया करें।
13॰ अगर पर्याप्त धर्नाजन के पश्चात् भी धन संचय नहीं हो रहा हो, तो काले कुत्ते को प्रत्येक शनिवार को कड़वे तेल (सरसों के तेल) से चुपड़ी रोटी खिलाएँ।
14॰ संध्या समय सोना, पढ़ना और भोजन करना निषिद्ध है। सोने से पूर्व पैरों को ठंडे पानी से धोना चाहिए, किन्तु गीले पैर नहीं सोना चाहिए। इससे धन का क्षय होता है।
15॰ रात्रि में चावल, दही और सत्तू का सेवन करने से लक्ष्मी का निरादर होता है। अत: समृद्धि चाहने वालों को तथा जिन व्यक्तियों को आर्थिक कष्ट रहते हों, उन्हें इनका सेवन रात्रि भोज में नहीं करना चाहिये।
16॰ भोजन सदैव पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर के करना चाहिए। संभव हो तो रसोईघर में ही बैठकर भोजन करें इससे राहु शांत होता है। जूते पहने हुए कभी भोजन नहीं करना चाहिए।
17॰ सुबह कुल्ला किए बिना पानी या चाय न पीएं। जूठे हाथों से या पैरों से कभी गौ, ब्राह्मण तथा अग्नि का स्पर्श न करें।
18॰ घर में देवी-देवताओं पर चढ़ाये गये फूल या हार के सूख जाने पर भी उन्हें घर में रखना अलाभकारी होता है।
19॰ अपने घर में पवित्र नदियों का जल संग्रह कर के रखना चाहिए। इसे घर के ईशान कोण में रखने से अधिक लाभ होता है।
20॰ रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र हो, तब गूलर के वृक्ष की जड़ प्राप्त कर के घर लाएं। इसे धूप, दीप करके धन स्थान पर रख दें। यदि इसे धारण करना चाहें तो स्वर्ण ताबीज में भर कर धारण कर लें। जब तक यह ताबीज आपके पास रहेगी, तब तक कोई कमी नहीं आयेगी। घर में संतान सुख उत्तम रहेगा। यश की प्राप्ति होती रहेगी। धन संपदा भरपूर होंगे। सुख शांति और संतुष्टि की प्राप्ति होगी।
21॰ `देव सखा´ आदि 18 पुत्रवर्ग भगवती लक्ष्मी के कहे गये हैं। इनके नाम के आदि में और अन्त में `नम:´ लगाकर जप करने से अभीष्ट धन की प्राप्ति होती है। यथा – ॐ देवसखाय नम:, चिक्लीताय, आनन्दाय, कर्दमाय, श्रीप्रदाय, जातवेदाय, अनुरागाय, सम्वादाय, विजयाय, वल्लभाय, मदाय, हर्षाय, बलाय, तेजसे, दमकाय, सलिलाय, गुग्गुलाय, ॐ कुरूण्टकाय नम:।
धन लाभ के लिए :
9. शनिवार की शाम को माह (उड़द) की दाल के दाने पर थोड़ी सी दही और सिंदूर डालकर पीपल के नीचे रख आएं। वापस आते समय पीछे मुड़कर नहीं देखें। यह क्रिया शनिवार को ही शुरू करें और ७ शनिवार को नियमित रूप से किया करें, धन की प्राप्ति होने लगेगी।

14….आप किसी के घर जाते हैं और चंद मिनट वहाँ बैठने पर आपको घबराहट-सी महसूस होने लगती है। ऐसे समय आपको लगता है कि आपकी तबीयत गड़बड़ा रही है मगर यह आपका नहीं उस घर की तरंगों का दोष होता है। हमारी कुंडली के ग्रहों की तरह प्रत्येक घर में भी अच्छे-बुरे ग्रहों का प्रभाव झलकता है। यदि किसी घर में छोटी-बड़ी बातों पर ‍विवाद उठ खड़ा होता है, बच्चे बड़ों का अपमान करते हों, मन में भारीपन-सा रहे, छोटी-बड़ी बातें भी बड़े-बड़े विवादों का रूप ले लेती हों, बच्चों व बड़ों का ‘परफार्मेंस’ उनकी क्षमतानुसार न हो पाए तो ऐसे घरों में अकसर शनि व राहु की नकारात्मक तरंगों का प्रभाव होता है। क्या करें _____ * घर के माहौल को शांतिमय रखें। *. घर में हमेशा खुशबू (चंदन-कपूर) का प्रयोग करें। *. घर के अंदर व बाहर तुलसी तथा फूलों के पेड़ लगाएँ। *. सुबह-शाम सामूहिक पूजा व आरती जरूर करें। *. घर में लोहे के फर्नीचर, वस्तुओं का उपयोग न करें। *. राई-लौंग-राजमा-उड़द का प्रयोग कम करें। * महीने में एक या दो बार उपवास रखें व दान करें। *. मछलियों की सेवा करें। *अपने घर में रोज गूगल और चन्दन की धुनी दे. * घर में कांटेदार पेड़ न लगाये ,

15…..तांत्रिक क्रियाओ से और इनके नुकसान से बचाव की उपाय
पहली बात तो ये की आज के ज़माने में दुसरो से ज़्यादा अपने लोगो से ही ज्यादा खतरा है।किसी भी स्त्री,पुरुष,उनके बच्चों,उनके घर,उनके परिवार,उनके व्यवसाय,उनके स्वास्थ्य पर अगर कोई तंत्र विद्या का गलत उपयोग करता है तो ये जरुरी नहीं की वो आपका दुश्मन ही हो वो आपका खास परिचित या पारिवारिक सदस्य या पडोसी या रिश्तेदार भी हो सकता है।मैं इस बात से भी इनकार नहीं करता की वो आपका दुश्मन नहीं हो सकता ।मगर तंत्र का जिस पर भी उपयोग करना है उसकी कई चीजे चाहिये होती है जो की आपका कोई परचित ही हासिल कर सकता है या कोई आपका दुश्मन भी हो तो वो भी किसी न किसी मार्ग से ये चीजे हासिल करेगा।
तंत्र से तांत्रिक अभिन्त्रण 2 प्रकार से होता है
1. किसी के द्वारा किसी पर करवाने पर
2.स्वयं के द्वार किसी गलती से स्वयं तंत्र शक्तियो को आमंत्रण देकर मगर आजकल किसी दूसरे के द्वारा ही मुख्या रूप से तंत्र क्रिया करवाई जाती है।कुछ सावधानी आप रखे तो इन तंत्र क्रियाओ से आप बच सकते है जो की ये है:—
1.यदि अचानक से आपका कोई कपडा (मुख्या रूप से अंतः वस्त्र) गायब हुआ है तो सम्भावना है की किसी ने उसको तंत्र में उपयोग हेतु चुराया हो।
2.अगर कोई सात शनिवार लगातार आपके पैर (स्त्री का बांया और पुरुष का दांया पाँव) के निचे की माटी लेने का प्रयास करे।
3.अगर बच्चों के बाल सिर के बीचो बिच से कोई काट ले।
4.कोई बार बार आकर आपके सिरहाने चुप चाप लाल सिंदूर लगा कर जाये।
5.स्त्री या पुरुष द्वारा घर से बहार यात्रा के समय किसी रज पेड़ के निचे मूत्र करने पर।
6.अगर कोई भिन्डी का बीज या काली मिर्च खिलाए।
7.स्त्री द्वारा बाल बनाने के बाद टूटे हुए बालो को बिना वत्र क्रिया के घर से बहार फेकने पर उनका उपयोग तंत्र में हो सकता है।
8.स्त्री कोे रजोधर्म का रक्त का कपडा लापरवाही से बाहर फेकने से बचना चाहिए उसको किसी नाली या किसी ऐसी जगह फेकना चाहिए जहा वो किसी के हाथ न लगे।
9.भूल के भी शनिवार के दिन किसी के बीही कहने या दबाव देने पर सोंठ नहीं कहानी चाहिए।
10. बचो कइ कपडे पुराने होने पर उन्हें सीधा घर से फेकने की बजाय उन्हें धोकर फेकना चाहिए। ये कुछ सावधानिया है जिनसे आप कुछ हद तक बच सकते है।मगर अगर आप तंत्र क्रियाओ के घेरे में फस गए है तो सिर्फ तंत्र के द्वारा ही आप उन क्रियाओ की काट कर सकते है बीलकुल वैसे ही जैसे ज़हर ज़हर को मारता है और लोहा लोहे को काटता है।

16….ॐ जय गोरख़ ॐ
ॐ नमो आदेश। गुरूजी को आदेश।ॐ गुरूजी।ॐ धरती सो आकाश महा धरती महा आकाश त्रिशूल लाया सिद्ध निवास ॐ पहली धार अनहद बानी दूजी धार अमृत बानी तीसरी धार अलख निर्वाण। सिद्ध साधक ने त्रिशूल धरिया लोहा त्रिशूल जोगी निर्वाण।आसन पवित्र त्रिशूल पवित्र कहे मछेन्द्र सुन बा गोरख़ त्रिशूल सदा रखियो पास काल कंटक आवे नही पास त्रिशूल चाले भुत पिसाच निकट नही आवे। इतना त्रिशूल मंत्र संपूर्ण भया।श्री नाथजी को आदेश।आदेश।
कही जाते डर लगे तो इस मन्त्र को किसी तिनके पे 3 बार जप कर के पास रखे।

17…रोग मुक्ति मे दान

सभी रोगों से मुक्ति के लिएविशिष्ट दान : प्रायः देखा गया है कि कुछ रोग ऐसे होतेहैं जिनका अनेक प्रकार से उपचार करने पर भी उनसे मुक्ति नहीं मिलती है। ऐसी स्थिति में चिकित्सा और जप के अतिरिक्त शास्त्रकारों की आज्ञा है कि तत्तद्वोषविनाशार्थ दानं कुर्याद् यथोदितम्। प्रतिरोगं च यदानं जपहोमादि कीर्तितम्॥ प्रायश्चित्तं तु तत्कृत्वां चिकित्साभारभेत्ततः। प्रदद्यात् सर्वरोगघ्नं छायापात्रं विधानतः॥ अर्थात कर्म दोषों से उत्पन्न रोगों से मुक्ति के लिए जिन-जिन दानों का उल्लेख किया गया है, वे दानकरने चाहिए। यहां दान के कुछ प्रभावशाली प्रयोगों का उल्लेख प्रस्तुत है। छायापात्र दान कांसे की कटोरी में घी भर कर उसमें सुवर्ण का टुकड़ा या कुछ दक्षिणा डाल कर रोगी उस घी में अपनी छाया देखे। छाया में पैर से लेकर मुंह तक देखने का विधान है। किंतु अधिक न हो तो केवल मुंह देखे। फिर किसी ब्राह्मण को दान दे। दान से पूर्व संकल्प करे जिसमें तिथि, वारादि का स्मरण करके ‘ममदीर्घायुरारोग्यसुतेजस्वित्वप्राप्तिपूर्वकं शरीरगत (अमुक) रोगनिवृत्तये अमुकनाम्ने ब्राह्मणाय सघृत-दक्षिणांक छाया पात्रदानमहं करिस्ये।’ बोलकर जल दे। फिर पात्र की निम्नलिखित मंत्र से पूजा करे। क्क आज्यं सुराणामाहारमाज्यं पापहरंपरम्। आज्यमध्ये मुखं दृष्टवा सर्वपापेः पमुच्यते॥ घृतं नाशपते व्याधिं घृतं च हरते रुजम्। घृतं तेजोधिकरणं घृतमायुः प्रवर्धते॥ पूजा के बाद आयुर्बलं यशो वर्च आज्यं स्वर्ण तथामृतम्। आधारं तेजसां यस्मादतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ कहकर पात्र ब्राह्मण को देकर प्रणाम करें।
2……रोग-प्रतिरूपदान किसी पात्र या वस्त्र में अपनी श्रद्धा के अनुसार सवाया तोल में चावल लेकर उसमें कुछ पैसे या वस्तु रखें और रोगी के सिर से पैर तक 21 बार उतारकर नीचे लिखा हुआ मंत्र बोलकर ब्राह्मण को आदरपूर्वक दान कर दें। ये मां रोगाः प्रवाधन्ते देहस्था सतंत मम। गृहणीस्वप्रतिरूपेण तान् रोगान् द्विजसत्तम॥ ब्राह्मण उसे लेकर कहे ‘बाढम्’ । दान के बाद ब्राह्मण को विदा कर दें और उसका मुंह नहीं देखें।
3… तुलादान शरीर में किसी विशेष रोग ने घर कर लिया हो और उपचार करने पर भी लाभ नहीं हो, तो सूर्य या चंद्रग्रहण के अवसर पर तुलादान करें। इस विधान में दो प्रकार के दान होते हैं- किसी एक ही वस्तु का अथवा कई वस्तुओं को एक साथ मिलाकर। सामान्य रूप से तुलादान में दानकर्ता के वजन के बराबर स्वर्ण, चांदी, तांबा, पीतल, लोहा, जस्ता आदि धातुओं, गेहूं, चावल, ज्वार, मकई, बाजरा, उड़द, चना, मूंग, मसूर, अरहर, जौ, तिल आदि धान्य तथा श्वेत, लाल, पीत, कृष्ण, काले तथा हरे रंग के वस्त्रों और फलों (सूखे और हरे), मेवों आदि का रोगी के वजन के बराबर दान संकल्पपूर्वक करना चाहिए। दान में एक तुला के एक पलड़ेपर दान सामग्री रखी जाए और दूसरे पर रोगी को बिठाया जाए। अन्यविधि तुलादान – पद्धति के अनुसार करना चाहिए।

18…शरीर बांधने का मंत्र
|| ॐ वज्र का सीकड़ ! वज्र का किवाड़ ! वज्र बंधे दसो द्वार ! वज्र का सीकड़ से पी बोल ! गहे दोष हाथ न लगे ! आगे वज्र किवाड़ भैरो बाबा ! पसारी चौसठ योगिनी रक्षा कारी ! सब दिशा रक्षक भूतनाथ !दुहाई इश्वर , महादेव, गौरा पारवती की ! दुहाई माता काली की ||
१००८ बार जपकर सिद्ध करें ।
प्रयोग के समय ११ बार बोलकर अपने शरीर पर हाथ फेर दें ।
पूजन में बैठ रहे हों तो अपने चरों ओर घेरा बना लें . इससे सुरक्षा रहेगी ।

19…नजर हटाने का मंत्र
||दोहाई हनुमान की ! दोहाई हनुमान की ! दोहाई हनुमान की ! दोहाई हनुमान की ! दोहाई हनुमान की ! दोहाई लोना चमारिन की! दोहाई पहलवान की! दोहाई दुर्गा मैय्या की! नजर टोना टोटका सब साफ़ ख़तम ||
१००८ बार पढ़कर सिद्ध करें.
जाप काल में धुप दीप लगायें.
प्रयोग करते समय ५ बार पढ़कर फूंक दें.

20….शाबर मंत्रो का शक्तिवर्धन या जागरण
|| शाबर जागरण मन्त्र ||
सत नमो आदेश ! गुरूजी को आदेश !
ॐ गुरूजी !
ड़ार शाबर बर्भर जागे ,
जागे अढैया और बराट
मेरा जगाया न जागे
तो तेरा नरक कुंड में वास !
दुहाई शाबरी माई की !
दुहाई शाबरनाथ की !
आदेश गुरु गोरख को !
|| विधि ||
इस मन्त्र को प्रतिदिन गोबर का कंडा सुलगाकर उसपर गुगल डाले और इस मन्त्र का १०८ बार जाप करे ! जब तक मन्त्र जाप हो गुगल सुलगती रहनी चाहिये ! यह क्रिया आपको २१ दिन करनी है , अच्छा होगा आप यह मन्त्र अपने गुरु के मुख से ले या किसी योग्य साधक के मुख से ले ! गुरु कृपा ही सर्वोपरि है कोई भी साधना करने से पहले गुरु आज्ञा जरूर ले !
|| प्रयोग विधि ||
जब भी कोई साधना करे तो इस मन्त्र को जप से पहले ११ बार पढ़े और जप समाप्त होने पर ११ बार दोबारा पढ़े मन्त्र का प्रभाव बढ़ जायेगा ! यदि कोई मन्त्र बार बार सिद्ध करने पर भी सिद्ध न हो तो …
दो लाल कपडे[आधा-आधा मीटर का ] मंगवाए और एक घड़ा भी पहले से मंगवा कर रखे ! किसी भी मंगलवार या रविवार के दिन उस मन्त्र (जिसे सिद्ध करना है ) को भोजपत्र या कागज़ पर केसर में गंगाजल मिलाकर अनार की कलम से या बड के पेड़ की कलम से लिख ले !
फिर किसी लकड़ी के चौकी/फट्टे पर एक लाल वस्त्र बिछाएं और उस वस्त्र पर उस भोजपत्र को स्थापित करे ! घी का दीपक जलाये , अग्नि पर गुगल सुलगाये और शाबरी देवी [ माँ पार्वती] का पूजन करे.
उपरोक्त मन्त्र को १०८ बार जपे.अब जिस मन्त्र को जगाना है उसे १०८ बार जपे और दोबारा फिर उपरोक्त मन्त्र का १०८ बार जप करे !
जिस लाल कपडे पर भोजपत्र स्थापित किया गया है उस लाल कपडे में ही भोजपत्र को लपेट कर घड़े के अन्दर रखे.
दुसरे लाल कपडे से भोजपत्र का मुह बांध दे और दोबारा उस कलश का पूजन करे और शाबरी माता से मन्त्र जगाने के लिए प्रार्थना करे.
उस कलश को बहते पानी में बहा दे ! घर से इस कलश को बहाने के लिए ले जाते समय और पानी में कलश को बहाते समय जिस मन्त्र को जगाना है उसका जाप करते रहे !
यह क्रिया एक बार करने से ही प्रभाव देती है पर फिर भी इस क्रिया को ३ बार करना चाहिये मतलब रविवार को फिर मंगलवार को फिर दोबारा रविवार को !
भगवान् आदिनाथ और माँ शाबरी आप सबको योग्यतानुसार मन्त्र सिद्धि प्रदान करे ।

21….ब्रह्माण्ड में लाखों आत्माओं का अस्तित्व विद्यमान है। जो वायुमंडल में स्वतंत्र रूप सें विचरण करते हैं। जिनमें कई प्रकार के आत्माएं होती है। जैसे राजा, महाराजा, वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, विद्वान, चोर, डाकू, बदमाश, सामान्य मनुष्य तथा उच्चकोटि के मनुष्य आदि, जिनमें मुख्यतः दो प्रकार की आत्माएं होती है। दिव्यात्मा तथा दुष्टात्मा।
शरीर से निकलने के बाद सैकड़ो वर्ष तक आत्मायें वायुमंडल में विचरण करती रहती हैं, क्योंकि वह पुनः गर्भ में जाने के इच्छुक नहीं होती या किसी ऐसे गर्भ में जन्म लेने को उत्सुक होते हैं जो उनका मनोवांछित हो। उदाहरण के लिए अधिकांश आत्मायें तो जन्म ही नहीं लेना चाहती क्योंकि उन्होंने गर्भ में या गर्भ के बाहर जो कुछ भोगा है वह ज्यादा सुखकर नहीं होता
दिव्य आत्मा –
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ये आत्माएं कभी-कभी किसी मनुष्य की जिंदगी से प्रभावित हो जाते है और उसको सहयोग भी करते है। खासकर उस व्यक्ति के जिंदगी से प्रभावित होते हैं, जिनकी जिंदगी उसी आत्मा के जिंदगी से मिलती-जुलती है, जैसे उस आत्मा ने अपनी पूर्व जिंदगी में बहुत कष्ट झेले हों और दुःखों का सामना किया हो तो वह आत्मा किसी व्यक्ति के जिंदगी के कष्टों एवं दुःखों को देख नहीं सकता, क्योंकि वह अपने जिंदगी में दुख, कष्ट, कठिनाईयों और परेशानियों से भली-भांति परिचित रहा है। अतः वह किसी ऐसे व्यक्ति की सहायता अवश्य करता है, जो इस प्रकार की समस्याओं से ग्रस्त रहता है। ऐसी आत्मा जिनकी जिंदगी से प्रभावित हो जाते हैं, उनकी जिंदगी खुशियों से भर जाती है और जीवन में किसी प्रकार का अभाव नहीं रहता। पग-पग पर सफलताएं कदम चूमने लगती है। गांव तथा शहरों में ऐसे सैकडों उदारण देखने को मिल जाते हैं, जैसे अनायास ही गड़े धन का पता लग जाना, चांदी के सिक्कों से भरा घड़ा मिल जाना, इच्छा करते ही उसकी पूर्ति हो जाना, एक्सीडेंट या दुर्घटना का पूर्वाभास होना यह सब दिव्यात्माओं के प्रसन्न होने के कारण अनायास ही होने लगता है।
दुष्टात्मा –
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ये आत्माएं बहुत ही दुष्ट होती है। इन्हें हमेशा किसी न किसी को सताते रहने में बहुत आनंद आता है। ये आत्माएं कभी किसी का भला नहीं करती। ये आत्माएं जिनके पीछे पड़ जाती है, उसकी जिंदगी बर्बाद कर देती है। उनके परिवार में कभी सुख-शांति नहीं रहती।
मनोवांछित आत्माओं से संपर्क स्थापित कर उनसे बातचीत किया जा सकता है। यह कार्य थोड़ा कठिन है पर असंभव नहीं। आत्माओं के इस भीड़ में मनोवांछित आत्माओं को ढूंढ निकालना उतना ही कठिन कार्य है, जितना कि दिल्ली जैसे महानगरों में किसी इच्छित व्यक्ति को बिना पता के ढूंढ निकालना। परन्तु हिमालय के कुछ विशिष्ट योगियों एवं कुछ ज्ञाताओं एवं मनोवैज्ञानिकों ने अपने रिसर्च एवं प्रेक्टिकल के द्वारा कुछ ऐसी विधियाँ ढूंढ निकाले हैं जिससे सामान्य व्यक्ति अथवा उच्च कोटि का साधक मनोवांछित आत्माओं से संपर्क स्थापित कर सकता है।
कदम-कदम पर हानि पहुंचाते है। उनके साथ कब कौन सी घटना घट जाये कुछ कहा नहीं जा सकता। जिस व्यक्ति पर ऐसी आत्माओं का प्रकोप हो जाता है, वह व्यक्ति पागल भी हो जाता है। दुष्ट आत्मायें किसी भी दृष्टि से हितकर नहीं है|
आत्माओं का रहस्य –
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शरीर से निकलने के बाद सैकड़ो वर्ष तक आत्मायें वायुमंडल में विचरण करती रहती हैं, क्योंकि वह पुनः गर्भ में जाने के इच्छुक नहीं होती या किसी ऐसे गर्भ में जन्म लेने को उत्सुक होते हंव जो उनका मनोवांछित हो। उदाहरण के लिए अधिकांश आत्मायें तो जन्म ही नहीं लेना चाहती क्योंकि उन्होंने गर्भ में या गर्भ के बाहर जो कुछ भोगा है वह ज्यादा सुखकर नहीं होता है। अगर वे जन्म भी लेना चाहें तो किसी ऐसे गर्भ की खोज में रहतें है जो सभी दृष्टियों से सुखी एवं सम्पन्न हों, तथा उन्हें खुलकर कार्य करने का मौका मिले, पर ऐसा संयोग से ही प्राप्त हो पाता है।
क्या मनोवांछित आत्माओं से बातचीत किया जा सकता है ?
मनोवांछित आत्माओं से संपर्क स्थापित कर उनसे बातचीत किया जा सकता है। यह कार्य थोड़ा कठिन है पर असंभव नहीं। आत्माओं के इस भीड़ में मनोवांछित आत्माओं को ढूंढ निकालना उतना ही कठिन कार्य है, जितना कि दिल्ली जैसे महानगरों में किसी इच्छित व्यक्ति को बिना पता के ढूंढ निकालना। परन्तु हिमालय के कुछ विशिष्ट योगियों एवं कुछ ज्ञाताओं एवं मनोवैज्ञानिकों ने अपने रिसर्च एवं प्रेक्टिकल के द्वारा कुछ ऐसी विधियाँ ढूंढ निकाले हैं जिससे सामान्य व्यक्ति अथवा उच्च कोटि का साधक मनोवांछित आत्माओं से संपर्क स्थापित कर सकता है। इस बात को मानने के लिए नास्तिक एवं अंधविश्वासी जन ही शामिल नहीं है बल्कि बड़े-बड़े वैज्ञानिकों को भी नतमस्तक होकर यह स्वीकारना पड़ता है कि वास्तव में ही भूत-प्रेतों व आत्माओं का अस्तित्व इस ब्राह्मांड में विद्यमान है। आजकल ऐसे सैकड़ों आश्चर्यजनक करिश्में गावों और शहरों में देखने को मिल जाएंगे, जो भूत-प्रेतों और आत्माओं से संबंधित होते हैं।
यदि किसी युक्ति द्वारा आत्माओं से संपर्क स्थापित कर लिया जाये तो निश्चय ही आश्चर्यजनक तथ्य हाथ लगते हैं। किसी भी आत्मा से संपर्क स्थापित कर उसके जीवन के उन रहस्यों को जाना जा सकता है। जो किसी कारण वश वह व्यक्ति किसी से बता नहीं पाया हो। इसी तरह अपने मृत पूर्वजों माता-पिता भाई बहन प्रेमी-प्रेमिका से संपर्क स्थापित कर उन रहस्यों का पता लगाया जा सकता है। जो कि वे अपने परिवारजनों से बता नहीं पाये हों या उनकी अचानक किसी एक्सीडेंट या दुर्घटना से मृत्यु हो गई हो। साथ ही साथ किसी भी प्रकार के सवालों का जवाब प्राप्त किया जा सकता है। जैसे घर से भागा हुआ व्यक्ति कहाँ है ? वह जीवित है भी या नही? मेरी शादी कब होगी ? अमुक लड़की मुझसे प्रेम करती है या नही ? नौकरी कब मिलेगी ? मुझे किस क्षेत्र में सफलता मिलेगी? परीक्षा में पास होऊँगा या फेल ? लाॅटरी या सट्टे में कल कौन सा नम्बर फसेगा ? ऐसे सैकड़ों प्रकार के सवालों का जवाब आत्मा से प्राप्त किया जा सकता है।
आत्मायें कैसे आकर्षित होती है ?
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मनुष्य का शरीर जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और आकाश इन पांच तत्वों से निर्मित होता है। मृत्यु के पश्चात् जब मनुष्य स्थूल शरीर को छोड़कर सूक्ष्म शरीर धारण करता है तो इसमे मात्र दो तत्व शेष रह जातें है – वायु और आकाश तत्व, पृथ्वी तत्व समाप्त हो जाने के कारण पृथ्वी की गुरूत्वाकर्षण शक्ति का आत्माओं पर कोई असर नहीं होता। फलस्वरूप स्थूल शरीर के अलावा सूक्ष्म शरीर की शक्ति हजारों गुणा अधिक हो जाती है और विचारों के माध्यम से ही वे पूरे ब्रह्मांड में विचरण करने में समर्थ हो जाते हैं। आत्माओं की गति वायु से भी अधिक तेज होती है एक मिनट में वे पूरे ब्रह्मांड में विचरण कर सकते हैं।
आत्माओं से संपर्क स्थापित करने के लिये प्रयोगकर्ता या साधक की इच्छा शक्ति तीव्र होना अति आवश्यक है। जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं कि इस ब्रह्मांड में असंख्य आत्माएं विद्यमान हैं आत्माओं के इस भीड़ में मनोवांछित आत्माओं को बुलाने के लिए तीव्र इच्छाशक्ति का होना अति आवश्यक है।
यह इच्छाशक्ति लगभग सभी मनुष्यों में विद्यमान रहती है। किसी में ज्यादा तो किसी में कम, मगर जो लोग मंत्र, तंत्र साधना एवं सिद्धियों में रूचि रखते हैं, उन लोगों में यह इच्छाशक्ति तीव्र होनी चाहिए। क्योंकि इच्छाशक्ति के माध्यम से ही हर असंभव कार्य को संभव किया जा सकता हैं। मनुष्य के शरीर में अनंत शक्तियां छिपी है फिर भी उन शक्तियों का सदुपयोग वह नहीं करता।
योग के प्राणायाम, त्राटक आदि क्रियाओं के द्वारा इच्छा शक्ति को प्रबल एवं मन को नियंत्रित कर लिया जाये तो मनुष्य के पास अदभुत शक्तियां प्राप्त हो जाती है। कभी-कभी आपने अनुभव किया होगा कि आप किसी प्रिय व्यक्ति की याद करते हैं। और उस व्यक्ति का फोन तुरंत आ जाता है। कभी आप किसी काम के लिए कहीं जा रहे हैं तो मन में बार-बार यह विचार आता है कि शायद वहां जाकर मेरा काम नहीं बनेगा और जब वहां पहुंचकर वह काम वास्तव में नहीं बनता तब आप हैरान रह जाते है। इसी तरह कई बार ऐसी घटना घट जाती है, जिसकी आप कल्पना करते रहतें है। यह सब इच्छाशक्ति के
माध्यम से स्वतः ही होने लगता है। जिनके पास इच्छा शक्ति अधिक होती है, उनकी संभावनाएं लगभग सत्य निकलती है।
आत्माए इसी इच्छाशक्ति के माध्यम से आकर्षित होती हैं तथा साधक के सभी सवालों का जवाब दिया करती हैं| जैसा कि आप जानते हैं कि मन की सीमा एक सेकेंड में करोड़ों मील की रफ्तार से अधिक गतिमान रहती है। उसी तरह जब साधक आत्मा का ध्यान करता है तो पूरे ब्रह्मांड में मस्तिष्क की अल्फा तरंगे फैल जाती है और तीव्र इच्छा शक्ति के माध्यम से मनोवांछित आत्माओं तक संदेश प्राप्त हो जाता है तथा मस्तिष्क की विद्युत धारा की तरंगें आत्माओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। फलस्वरूप आत्माएं साधक के पास आकर अपने अनुसार जवाब दिया करती हैं।
आत्मा आह्वान की विधि –
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आत्मा आह्वान की कई विधियां भारत में प्रचलित है आटोमेटिक राइटिंग (स्वचलित लेखन), आटोमैटिक टायपिंग, बालक के द्वारा, यंत्र द्वारा आत्मा आह्वान, प्लेनचिट द्वारा तथा आत्म रत्न के द्वारा।
आटोमेटिक रायटिंग –
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इस विधि में साधक को एक माध्यम की आवश्यकता होती है जो सरल चित्त और निस्वार्थ मन का व्यक्ति हो। अनुभवी साधक या व्यक्ति बिना माध्यम के भी यह प्रयोग स्वयं कर सकता है। इस प्रयोग को रात में किसी शांत कमरे में करना चाहिए। सर्वप्रथम कमरे में धूप या अगरबत्ती जलाकर कमरे के वातावरण को शुद्ध एवं पवित्र बना लें। तत्पश्चात् माध्यम को पीले आसन पर बैठाकर चारो तरफ 4-5 व्यक्तियों को बैठा दें और माध्यम के हाथ में एक पेन दे दें तथा सामने एक कापी रख दें। अब सभी लोग हाथ जोड़कर किसी आत्मा का आह्वान करें और साधक आत्मा आह्वान मंत्र का 11 या 21 बार जप करें। तको आत्मा उस माध्यम के शरीर में प्रवेश कर जाता है तथा आपके द्वारा पूछे गये सवालों का जवाब कलम से कापी के पन्नों पर लिख कर देता है।
आटोमेटिक टायपिंग
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यह भी आटोमेटिक रायटिंग की तरह प्रयोग किया जाता है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि इस विधि में टायपिंग की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रयोग में
माध्यम को टाईप राइटर के सामने बैठाकर उपरोक्त विधि के अनुसार आत्मा का आह्वान किया जाता है, तब आत्मा आकर टाइप राइटर के जरिये साधक द्वारा पूछे गये सवालों का जवाब देता है।
बालक द्वारा
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इस प्रयोग के लिए 8 या 10 वर्ष के आयु के बालक की आवश्यकता पड़ती है, जो शांत चित् और सरल स्वभाव का हो। उसे एक छोटे से कमरे में बैठाकर 6-7 व्यक्ति उसके सामने बैठ जायें तथा कमरे को अगरबत्ती जलाकर वातावरण को शुद्ध कर दें और बालक के कपड़े पर इत्र लगा दें। फिर साधक आत्मा आह्वान मंत्र का 21 बार आत्मा के नाम सहित उच्चारण करें और सामने बैठे हुए सभी व्यक्ति हाथ जोड़कर निवेदन करें कि अमुक आत्मा इस बालक के शरीर में विराजमान हों। ऐसा 5 या 7 बार करने से बालक के चेहरे का रंग स्वतः बदल जाएगा। तब आप समझ लें कि आत्मा आ गई है। अब आप उस आत्मा से उसका नाम पूछें। फिर जो भी सवाल पूछना चाहते हों वह पूछ सकते हैं।
आत्मा आह्वान यंत्र
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यह यंत्र विशेष प्रकार से ताम्र पत्र पर अंकित होता है। यह यंत्र बहुत प्रभावशाली होता है। इसके माध्यम से किसी भी आत्मा सें डायरेक्ट संबंध स्थापित किया जा सकता है और सामान्य व्यक्ति भी इसके माध्यम से किसी भी आत्मा से डायरेक्ट संबंध स्थापित किया जा सकता है और सामान्य व्यक्ति भी इसके माध्यम से किसी भी आत्मा से किसी भी प्रकार के सवालों का जवाब प्राप्त कर सकता है। इस प्रयोग को रात के सात बजे के लगभग करना चाहिए। सर्वप्रथम लकड़ी के तख्ते पर सफेद आसन बिछाकर आत्मा आह्वान यंत्र को स्थापित कर दें और सामने घी का एक दीपक जला दें तथा अगरबत्ती धूप या गुगुल जलाकर कमरें के वातावरण को शुद्ध बना लें। तत्पश्चात् आत्मा आह्वान मंत्र का 21 बार जप करें। तो दीपक की लौ हिलकर इस बात का संकेत देता है कि आत्मा यंत्र में विराजमान हो गयी है। कभी-कभी तेज हवा का झोंका का अनुभव भी होता है। तब हाथ जोड़कर नम्र भाव से जो कुछ पूछना हो वह पूछ सकते हैं और अंत में हाथ जोड़कर कहें आप हमारे बुलाने पर आये इसके लिए आपको धन्यवाद। अब आप जा सकते हैं। इसी तरह आप अपनी समस्याओं का समाधान आत्माओं के द्वारा पूछ सकते हैं। ध्यान रहे किसी आत्मा को बार-बार बुलाकर कष्ट न दें।
प्लेनचिट
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प्लेनचिट का अविष्कार 1889 में इंग्लैंड के परावैज्ञानिक चैटस्मिथ के द्वारा किया गया था। इस प्रयोग में एक सनमाईका प्लाई की आवश्यकता होती है जो दो फिट लंबा और दो फिट चैड़ा होता है। उस सनमाईका में किसी पेंट से एक गोल घेरा बनाएं उसके चारों तरफ ’ए‘ से ’जेड‘ तक के सारे अक्षर क्रमानुसार लिखें और घेरे के बीच एक से नौ तक के अंक भी लिखें तथा एक शून्य भी बनायें चारों दिशाओं में उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम भी लिखें। घेरे के मध्य में यस और नो लिखें। फिर उसे धूप में सुखा दें। जब प्रयोग करना हो, तब किसी एकांत कमरे में धूप दीप जलाकर कमरे के वातावरण को शुद्ध बना लें। तत्पश्चात कांसा, त्रिधातु या अष्ट धातु से निर्मित कटोरी या प्लेनचिट उलटा रखें जो विशेष अवसर पर निर्मित एवं आत्मा आह्वान मंत्र से चैतन्य किया गया हो। फिर 4-5 व्यक्ति उस कटोरी पर हल्के से अपनी तर्जनी उंगली रखें। तत्पश्चात जिस आत्मा को बुलाना हो उस आत्मा का ध्यान करते हुए आत्मा आह्वान मंत्र का 11 या 21 बार जप करें तो कटोरी स्वयं चलने लगेगी तब एक कोने में मिश्री या शक्कर का नैवेद्य रख दें और उस आत्मा से उसका नाम पूछें तो वह कटोरी फिसलती हुई पहले आर में फिर ए पर फिर एम फिर आर, ए, जे पर प्लेनचिट फिसलती हुई जाएगी इस तरह उन शब्दों को जोड़कर रामराज शब्द बनेंगे इस तरह स्पष्ट हो जाएगा कि रामराज नाम की आत्मा आपके प्लेनचिट में विराजमान हो गयी है, तब आपको जो भी सवाल पूछना हो वह पूछ सकते है। सभी सवालों का जवाब कटोरी या प्लेनचिट फिसलती हुई देगी। इस प्रयोग में विस्तारित जवाब की आशा न करें। सभी सवालों का जवाब हां या नहीं में प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रयोग को प्रदर्शन के उद्ेश्य से कदापि न करें। हमेशा जन कल्याण की भावना से इस प्रयोग को करना चाहिए। कोई भी सामान्य व्यक्ति या साधक यह प्रयोग सफलतापूर्वक कर सकता है। बसरते प्लेनचिट प्राण प्रतिष्ठा युक्त हो।
आत्मरत्न
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भारत के पौराणिक ग्रंथो में एक विशेष प्रकार के रत्न का उल्लेख मिलता है, जिसे ’आत्मरत्न‘ कहते है। इस रत्न को सोने या चांदी की अंगूठी में जड़वाकर पहनने से कोई दिव्य आत्मा हमेशा उसकी रक्षा करती है। विदेशों में इस प्रकार की मुद्रिका को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। विदेशों में बहुत से लोग ऐसी मुद्रिका को धारण किये रहते है।
इस रत्न की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे गौर से देखने पर इसकी लकीरें हिलती-डुलती नजर आती हैं। आत्मा आह्वान में इस रत्न की बहुत विशेषता होती है। इसके द्वारा आत्माओं से डायरेक्ट संबंध स्थापित किये जा सकते है। इस मुद्रिका पर त्राटक करते हुए जिस आत्मा का आह्वान किया जाता है, वह आत्मा तुरंत उस रत्न में दिखाई देने लगती है। तब जो भी प्रश्न पूछना हो पूछ सकते हैं। सभी सवालों का जवाब प्रश्नकर्ता के मन में स्वतः मिल जाता है।
इस तरह आत्माओं से संपर्क स्थापित करके सभी प्रकार के सवालों का जवाब प्राप्त किया जा सकता है एवं समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। इस प्रकार आप जनहित एवं लोक कल्याण कर समाज में अपना नाम रोशन कर सकते है। इस क्षेत्र में रूचि रखने वाले साधकों एवं पाठकों को इच्छाशक्ति
साधना अवश्य कर लेना चाहिए। जिससे आत्माओं से संपर्क स्थापित करने में कोई कठिनाई न हो।
साधना विधि निम्न प्रकार से है – किसी भी माह की पूर्णिमा को रात्रि 10 बजे स्नान कर सफेद धोती पहनकर पूजा कक्ष में पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके बैठ जायें। सामने किसी तख्ते पर सफेद आसन बिछाकर इच्छाशक्ति यंत्र को स्थापित करें। तत्पश्चात विद्युत माला से निम्न मंत्र का 21 माला जप करें।
मंत्र –
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“ॐ हृीं क्लीं क्लीं हृीं ॐ”
इस प्रकार 6 दिन तक करें तो साधक की इच्छाशक्ति तीव्र हो जाती है। वह किसी भी आत्मा से संपर्क स्थापित करने में समर्थ हो जाता है।
आत्मा आह्वान मंत्र-
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“ॐ हृीं क्लीं अमुक आत्मा स्थापयामि फट्।”
उक्त मंत्र को इच्छा शक्ति मंत्र के बाद उसी माला से सात माला जप करना चाहिए। अमुक के स्थान पर जिस आत्मा को बुलाना चाहें उसका नाम लें।

22….शाबर मंत्र प्रयोग
महाकाली शाबर मंत्र अत्यंत दुर्लभ और तीव्र प्रभावशाली है। इस मंत्र को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ विधि पूर्वक जपकर सिद्ध कर लिया जाये तो
साधक की सभी मनोकामनायें पूर्ण हो जाती है, और साधक संपूर्ण सुख, सौभाग्य, ऐश्वर्य एवं धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाता है। साथ ही साथ समस्त प्रकार की बाधायें भी स्वतः ही दूर हो जाती है।
मंत्र –
“सात पुनम कालका, बारह बरस क्वांर।
एको देवि जानिए, चौदह भुवन द्वार।।
द्वि-पक्षे निर्मलिए, तेरह देवन देव।
अष्टभुजी परमेश्वरी, ग्यारह रूद्र सेव।।
सोलह कला सम्पुर्णी, तीन नयन भरपुर।
दशों द्वारी तू ही माँ, पांचों बाजे नूर।।
नव-निधि षट्-दर्शनी, पंद्रह तिथि जान।
चारों युग मे काल का कर काली कल्याण।।”
इस मंत्र के द्वारा जन कल्याण तथा परोपकार भी किया जा सकता है। साधक इस मंत्र के द्वारा किसी भी बाधाग्रस्त व्यक्ति जैसे भूत प्रेतबाधा, आर्थिक बाधा, नजर दोष, शारीरिक मानसिक बाधा इत्यादि को आसानी से मिटा सकता है। यही नही बल्कि सम्मोहन, वशीकरण, स्तम्भन, उच्चाटन, विद्वेषण इत्यादि प्रयोग भी सफलता पूर्वक सम्पन्न कर सकता है।
प्रयोग विधी:-
किसी भी होली, दीपावली, नवरात्रि, अथवा ग्रहण काल में इस प्रयोग को सिद्ध करना चाहिए। सर्वप्रथम निम्न सामग्रीयाँ जुटा लें। महाकाली यंत्र, महाकाली चित्र, कनेर का पीला फूल, भटकटैया का फूल, लौंग, इलायची, 3 निंबू, सिन्दूर, काले केवाच के 108 बीज धूप, दीप, नारियल, अगरबत्ती इत्यादी।
माता काली के मंदिर में या किसी एकान्त स्थान में इस साधना को सिद्ध किये जा सकते हैं।सर्वप्रथम स्नान आदि से निवृत होकर एक लकड़ी के तख्ते पर लाल वस्त्र बिछाकर महाकाली चित्र तथा यंत्र को स्थापित करें तत्पश्चात घी का चैमुखा दिया जलाकर गुरू गणेश का ध्यान कर गुरू स्थापन मंत्र तथा आत्मरक्षा मंत्र का प्रयोग करें। फिर भोजपत्र पर निम्न चैतीसा यंत्र का निर्माण करें तथा महाकाली यंत्र, महाकाली चित्र सहित चैंतीसा यंत्र का पंचोपचार या षोड़शोपचार से पूजन करे।
पूजन के समय कनेर, भटकटैया के फूल को यंत्र चित्र पर चढ़ायें, नारियल इलायची, पंचमेवा का भोग लगायें, फिर तीनों निम्बूओं को काटकर सिन्दूर का टीका लगाकर अर्पित करें तत्पश्चात हाथ में एक-एक केवाच के बीजों को लेकर उक्त मंत्र को पढ़ते हुए काली के चित्र के सामने चढ़ाते जायें इस तरह 108 बार मंत्र जपते हुए केवाच के बीजों को चढ़ायें। मंत्र जप पुर्ण होने पर उसी मंत्र से 11 बार हवन करें। एक ब्राम्हण को भोजन करायें तथा यथाशक्ति दान दक्षिणा दें। फिर इस मंत्र का प्रयोग किसी भी इछित कार्य के लिये कर सकते हैं
भूत-प्रेत बधा निवारण:-
हवन के राख से किसी भी भूत-प्रेत ग्रस्त रोगी को सात बार मंत्र पढ़ते हुए झाड़ दें तथा हवन के राख का टीका लगा दें फिर भोजपत्र पर चैतिसा यंत्र को अष्टगंध से लिख कर तांबे के ताबीज में भर कर पहना दें तो भूत प्रेत बाधा सदा के लिए दूर हो जाता है।
शत्रु बाधा निवारण:-
अमावस्या के दिन एक़ निंम्बू लेकर उस पर सिंदुर से शत्रु का नाम लिखकर महाकाली मंत्र का उच्चारण करते हुये 21 बार 7 सुइयां चुभाये फिर उसे श्मशान मे ले जाकर गाड़ दें तथा उस पर शराब की धार चढ़ायें ऐसा करने से 3 दिनों मे शत्रु बाधा समाप्त हो जाती है।
आर्थिक बाधा निवारण:-
महाकाली यंत्र के सामने घी का दीपक जलाकर महाकाली शाबर मंत्र का 21 बार जाप 21 दिनों तक करने से आर्थिक बाधा समाप्त हो जाता है।
वशीकरण प्रयोग:-
पंचमेवा को 21 बारt मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित कर जिसे खिला दें वह वशीभूत हो जाता है।
विद्वेषण प्रयोग:-
3 केवाच के बीज कलिहारी का फूल तथा श्मशान की राख को मिलाकर 21 बार मंत्र द्वारा अभिमंत्रित कर जिसके घर के आने जाने वाले मार्ग में गाड़ दें उसका विद्वेषण हो जायेगा।
उच्चाटन प्रयोग:-
एक केवाच के बीज भटकटैया के फूल और सिंदुर तीनों को मिलाकर मंत्र द्वारा 11 बार अभिमंत्रित कर जिसके घर में फेंक दे उसका उच्चाटन हो जायेगा।
स्तम्भन प्रयोग:-
तीन लौंग, हवन की राख, तथा श्मशान की राख तीनों को मिलाकर मंत्र से अभिमंत्रित कर जिसके घर में गाड़ दे उसका स्तम्भन हो जायेगा।

23….ॐ नमो भैंरुनाथ, काली का पुत्र ! हाजिर होके, तुम मेरा कारज करो तुरत । कमर विराज मस्तंगा लँगोट, घूँघर-माल । हाथ बिराज डमरु खप्पर त्रिशूल । मस्तक बिराज तिलक सिन्दूर । शीश बिराज जटा-जूट, गल बिराज नोद जनेऊ । ॐ नमो भैंरुनाथ, काली का पुत्र ! हाजिर होके तुम मेरा कारज
करो तुरत । नित उठ करो आदेश-आदेश ।”
विधिः- पञ्चोपचार से पूजन । रविवार से शुरु करके इक्कीस दिन तक मृत्तिका की मणियों की माला से नित्य अट्ठाइस जप करें । भोग में गुड़ व तेल का शीरा तथा उड़द का दही-बड़ा चढ़ाए और पूजा-जप से उठकर उसे काले श्वान को खिलाए । यह प्रयोग किसी अटके हुए कार्य में सफलता प्राप्ति हेतु हैं ।

24…..श्री वीर भैरों शाबर मन्त्र
‘स्व-रक्षा’ और ‘शत्रु-त्रासन हेतु श्री वीर भैरों मन्त्र
“हमें जो सतावै, सुख न पावै सातों जन्म ।
इतनी अरज सुन लीजै, वीर भैरों ! आज तुम ।।
जितने होंय सत्रु मेरे, और जो सताय मुझे ।
वाही को रक्त-पान, स्वान को कराओ तुम ।।
मार-मार खड्गन से, काट डारो माथ उनके ।
मास रक्त से नहावो, वीर-भैरों ! तुम ।।
कालका भवानी, सिंह-वाहिनी को छोड़ ।
मैंने करी आस तेरी, अब करो काज इतनो तुम ।।”
विधिः- सवा सेर बूँदी के लड्डू, नारियल, अगरबत्ती और लाल फूलों की माला से श्री वीर भैरव का पूजन कर २१ दिनों तक नित्य १०८ बार पाठ करें । बाद में आवश्यक होने पर ७ बार नित्य पाठ करते रहें, तो स्वयं की रक्षा होती है और शत्रु-वर्ग का नाश होता है ।

25….जन्म वार से शरीर का आकर्षण
रविवार यह सूर्य का वार है। सर्वप्रथम इसका नंबर एक है। जिसका जन्म 1, 10, 19 और 28 तारीख में हो तो उस जातक पर सूर्य का प्रभाव रहेगा। सूर्य ग्रहों का राजा है और आत्मा का कारक है। इस वार को जन्मे जातक का सिर गोल, चैकोर, नाटे और मोटे शरीर वाला, शहद के समान मटमैली आंखें, पूर्व दिशा का स्वामी होने के कारण, इसे पूर्व में शुभ लाभ मिलते हैं। सूर्य के इन जातकों का 22-24वें वर्ष में भाग्योदय होता है। सूर्य मेष राशि में उच्च का और तुला राशि में नीच का होता है। इन जातकों की प्रकृति पितृ प्रधान है। दिल का दौरा, फेफड़ों में सूजन, पेट संबंधी बीमारियां हो सकती हैं। चेहरे में गाल के ऊपर दोनों हड्डियां उभरी हुई होती हैं। जब सूर्य 00 से 100 अंश तक हो तो अपना प्रभाव देता है क्योंकि यह ग्रहों का राजा है इसलिए इन जातकों में राजा के समान गुण होने के कारण पल में प्रसन्न और पल में रुष्ट होने की आदत होती है, ये जातक शक्की स्वभाव के होते हैं। गंभीर वाणी, निर्मल दृष्टि और रक्त श्याम वर्ण इनका स्वरूप होता है। गांठ के पक्के और प्रतिशोध लेने की भावना तीव्र होती है। इन्हें pitt की तकलीफ होती है।
सोमवार यह चंद्रमा का वार है,इसका अंक दो अर्थात् जिन जातकों का जन्म सोमवार 2, 11, 20, 29 तारीखों में हो तो चंद्रमा का स्वरूप स्पष्ट करते हुए कहा गया है ‘स्वज्ञं प्राज्ञौः गौरश्चपलः, कफ वातिको रुधिसार, मृदुवाणी प्रिय सरवस्तनु, वृतश्चचंद्रमाः हाशुः।। अर्थात् सुंदर नेत्र वाला, बुद्धिमान, गौर वर्ण, चंचल स्वभाव, चंचल प्रकृति, कफ, वात प्रकृति प्रधान, मधुरभाषी, मित्रों का प्रिय, होता है। ऐसा जातक हर समय अपने आप को सजाने में रहता है चंद्रमा मन का कारक है। 24 से 25 वर्ष में यह अपना प्रभाव पाता है। रक्त और मुख के आस-पास इसका अधिकार रहता है। ऐसे जातक के केश घने, काले, चिकने और घुंघराले होते हैं। सोच समझकर बात करते हैं। परिस्थतियों को मापने की इनमें क्षमता होती है। ये भावुक भी होते हैं। बात-चीत करने में कुशल और विरोधी को अपने पक्ष में करने की इनमें क्षमता होती है। इस दिन जन्मी स्त्रियां प्यार में धोखा खाती हैं। ये जातक कल्पना में अधिक रहते हैं। ये प्रेमी, लेखक, शौकीन, पतली वाणी वाले होते हैं। वात् और कफ प्रकृति के कारण जीवन के अंतिम दिनों में फेफड़ों की परेशानी, हार्ट की बीमारियां संभव हैं। चर्म और रक्त संबंधी बीमारियां अक्सर होती रहती हैं।
मंगलवार यह हनुमान जी का वार है इसका नंबर नौ है। 9, 19, 27 तरीख को जन्मे जातक का स्वामी मंगल ग्रह है इस दिन जन्मे जातक का सांवला रंग, घुंघराले बाल, लंबी गर्दन, वीर, साहसी, खिलाड़ी, भू-माफिया पुलिस के अधिकारी, सेनाध्यक्ष स्वार्थी होते हैं। इनकी आंखों में हल्का-हल्का पीलापन और आंखों के चारों ओर हल्की सी कालिमा या छाई रहती है। इनका चेहरा तांबे के समान चमकीला होता है। प्रत्येक कार्य करने से पहले हित-अहित का विचार कर लेते हैं। यदि मंगल उच्च का अर्थात मकर राशि का हो तो जातक डाक्टर, ठेकेदार, खेती का व्यापार करने वाला होता है। यदि मंगल अकारक हो तो जातक चोर, डाकू भी हो सकते हैं। मंगल दक्षिण दिशा का स्वामी होता है। ऐसा जातक किसी पर विश्वास नहीं करता। शर्क प्रधान प्रकृति है यहां तक मां-बाप, पति-पत्नी और संतान पर भी शक करता है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में यह जातक विचलित नहीं होता। राजनीतिक क्षेत्र में अच्छे से अच्छा और बुरे से बुरा कार्य कर सकता है। एक बार जो काम हाथ में ले ले उसे पूरा करके छोड़ता है। बहुत साहसी, खतरों की जिंदगी में इन्हें आनंद मिलता है। शत्रुओं से लड़ना इनका स्वभाव होता है। मज्जा और मुख के आस-पास इसका अधिकार क्षेत्र है। 28 से 32वें वर्ष में यह फल देता है। महिलायें चिड़चिड़ी और कटुभाषी होती हैं। रक्त एवं चर्म रोग से ग्रस्त रहते हैं।
बुधवार गणेश जी इसके स्वामी हैं। इसका अंक पांच है जो जातक 5, 14, 23 तारीखों में जन्मा हो वह जातक ठिगना, सामान्य रंग, फुर्तीला, बहुत बोलने वाला, दुर्बल शरीर, छोटी आंखें, क्रूर दृष्टि, पि प्रकृति, चंचल स्वभाव द्विअर्थक बात करने वाला, हास्य प्रिय, शरीर के मध्य भाग में संदा दुर्बल, उर दिशा का स्वामी, माता-पिता से प्रेम करने वाला, चित्रकार, 8वें और 22वें वर्ष में अरिष्ट 32वें वर्ष में भाग्योदय, त्वचा और नाभि के निकट स्थल पर अधिकार, वाणी, वात-पि का कारक होता है। यह जातक अधिकतर बैंकर्स, दलाल, संपादक, इस जातक को देश, काल और पात्र की पहचान होती है। वातावरण के अनुकूल बातचीत करने में होशियार होते हैं। बुध ग्रह जिस जातक का कारकत्व होता है उसका रंग गोरा, आंखें सुंदर और त्वचा सुंदर और मजबूत होती है, ये अच्छे गुप्तचर या राजदूत बन सकते हैं। यह जातक स्पष्ट वक्ता होता है और मुंह पर खरी-खरी कहता है और इस प्रकार से बात करता है कि दूसरे को बुरा न लगे। सफाई प्रिय होता है कफ-पि-वात प्रकृति प्रधान होने से बाल्यावस्था में जीर्ण ज्वर से पीड़ित रहता है। वृद्धावस्था मंे अनेक रोगों से पीड़ित रहता है। यौवनावस्था में प्रसन्नचि रहता है। सफल व्यापारी के इसमें गुण होते हैं। अनेक रंगों का शौकीन होता है। हरा रंग इसे प्रिय होता है और वह शुभ भी होता है। ज्योतिष या ग्रह नक्षत्रों का ज्ञान, गणितज्ञ, पुरोहित का कार्य करना, लेखाधिकारी। इस वार में जन्मी महिलाएं शीघ्र रूठने वाली, चुगली, निंदा करने वाली और पति से इनकी अनबन रहती है।
गुरुवार यह समस्त देवताओं का गुरु है। इसका अंक तीन है अर्थात् 3, 12, 21, 30 तारीखों में जन्मे जातक स्वस्थ शरीर, लंबा कद, घुंघराले बाल, तीखी नाक, बड़ा शरीर, ऊंची आवाज, शहद के समान नेत्र वाले ऐसे जातक सच्चे मित्रों के प्रेमी, कानून जानने वाले अधिकारी, जज, खाद्य सामग्री के व्यापारी, नेता अभिनेता भी होते हैं। ऐसे जातक बोलते समय शब्दों का चयन सावधानी पूर्वक करते हैं। आंखों से झांकने की ऐसी प्रवृ होती है कि मानो समस्त संसार की शांति और करुणा इसमें आकर भर गई हो, जीव हिंसा और पाप कर्म से बचते हैं। महिलाएं चरित्रवान, पति की सेविका, पति को वश में रखने वाली सद्गुणी, कुशल अध्यापिकाएं होती हैं। पुजारी, आश्रम चलाना, सरकारी, नौकरी, पुराण, शास्त्र वेदादि, नीतिशास्त्र, धर्मोपदेश से ब्याज पर धन देने से जीविका होती है। ऐसे जातक शत्रु से भी बातचीत करने में नम्रता रखते हैं। चर्बी-नाक के मध्य अधिकर क्षेत्र है। 16-22 या 40वें वर्ष में सफलता मिलती है। उर-पूर्व (ईशान) इस ग्रह का स्वामी है कर्क राशि में यह ग्रह उच्च का होता है। पीला रंग इनके लिए शुभ होता है। यह एक राशि में एक वर्ष रहता है। यह 110 अंश से 200 अंश में अपने फल देता है, 7, 12, 13, 16 और 30 वर्ष की आयु में कष्ट पाता है। दीर्घ आयु कारक है। यह गुल्म और सूजन वाले रोग भी देता है। चर्बी और कफ की वृद्धि करता है। नेतृत्व की शक्ति इसमें स्वाभाविक रूप से होती है।
शुक्रवार यह लक्ष्मी का वार है। इसका अंक छः है अर्थात् 6, 15, 24 तारीखों में जन्म लेने वाले जातक पर शुक्र ग्रह का प्रभाव होता है। इस दिन जन्मे जातकों का सिर बड़ा, बाल घुंघराले, शरीर पतला, दुबला, नेत्र बड़े, रंग गोरा, लंबी भुजाएं, शौकीन, विनोदी, चित्रकलाएं, चतुर, मिठाई फिल्ममेकर, आभूषण विक्रेता होते हैं। शुक्र तीक्ष्ण बुद्धि, उभरा हुआ वक्षस्थल और कांतिमान चेहरा होता है। वीर्य प्रधान ऐसा व्यक्ति स्त्रियों में बहुत प्रिय होता है। यह जातक मुस्कुराहट बिखेरने वाला सर्वदा प्रसन्नचित रहने वाला होता है। शुक्र ग्रह स्त्री कारक होता है और नवग्रहों में सबसे अधिक प्रिय होता है। ऐसे जातक कामुक और शंगार प्रिय होते हैं, इस दिन जन्मा जातक विपरीत लिंग को आकर्षित करता है। ऐसे व्यक्ति सफल होते हैं, विपक्षी को किस प्रकार से सम्मोहित करना चाहिए आदि गुण इनमें जन्मजात होते हैं। मित्रों की संख्या बहुत होती है और मित्रों में लोकप्रिय होते हैं। वात-कफ प्रधान इनकी प्रकृति है और वृद्धावस्था में जोड़ों में दर्द और हड्डियां में पीड़ा होती है। प्रेम के बदले प्रेम चाहते हैं। नृत्य संगीत में रुचि रखते हैं। आग्नेय दिशा का स्वामी है।
शनिवार शनि को काल पुरुष का दास कहा गया है। इसका अंक आठ है। दिनांक 8, 17, 26 को जन्मे जातकों का स्वामी शनि है। यह अपने पिता सूर्य का शत्रु है। तुला में शनि उच्च का होता है तथा 210 अंश से 300 अंश तक अपना फल शुभ-अशुभ देता है, इस दिन जन्मा जातक सांवला रंग नसें उभरी हुई, चुगलखोर, लंबी गर्दन, लंबी नाक, जिद्दी, कर्कश आवाज, घोर मेहनती, मोटे नाखून, छोटे बाल, आलसी, अधिक सोने (नींद) वाला, गंदी राजनीति वाला होता है छोटी आयु में कष्ट पाने वाला, दूसरों की भलाई से प्रसन्न न होने वाला, परिवार का शत्रु, 20-25-45वें वर्ष में कष्ट भोगने वाला, स्नायु (नसंे) पेट पर अधिकार 36-42वें वर्ष में शुभ या अशुभ प्रभाव, निर्दयी, दूसरों को विप में डालने वाला और इन्हें परेशान करने में आनंद आता है, शिक्षण काल में काफी रुकावटें, अपशब्द कहने में प्रसन्नता मिलती है। महिलाएं कटुभाषी, पति से नित्य तकरार करने वाली, दाम्पत्य जीवन सुखमय नहीं होता, शुद्धता का ध्यान कम होता है। स्वभाव, क्रोधी, आर्थिक मामलों में यह सामान्य होता है। लोहा आदि या काले रंग के उद्योगों में सफलता मिलती है, वायु प्रधान, मूर्ख, तमोगुणी, आयु से अधिक दिखने वाला, कबाड़ी का काम, कुर्सी बुनना, मजदूरी करना, पति-पत्नी के विचारों में मतभेद। यह तुला राशि में उच्च और मेष राशि में नीच का होता है। 210 अंश से 300 अंश में इस जातक के जीवन पर प्रभाव डालता है। दांत का दर्द, नाक संबंधी तकलीफें, लकवा, नामर्दी, कुष्ठ रोग, कैंसर, दमा, गंजापन रोग संभव हो सकते हैं। इन जातकों को पश्चिम दिशा में लाभ मिल सकता है।

27….लक्षणों से ग्रह की खराबी ज्ञात करना
किसी मनुष्य के जीवन में कौन-सा ग्रह अशुभ प्रभाव दाल रहा है, इसका औसत निर्धारण उसके जीवन में घटने वाली घटनाओं के आधार पर भी ज्ञात किया जा सकता है | विभिन्न ग्रहों की अशुभ स्थिति पर निम्नलिखित लक्षण प्राप्त होते हैं –
1-सूर्य- तेज का अभाव, आलस्य, अकड़न, जड़ता, कन्तिहिनता, म्लान छवि, मुख(कंठ) में हमेशा थूक का आना | लाल गाय या वस्तुओं का खो जाना या नष्ट हो जाना, भूरी भैंस या इस रंग के सामान की क्षति | हृदय क्षेत्र में दुर्बलता का अनुभव |
2-चन्द्र- दुखी, भावुकता, निराशा, अपनी व्यथा बताकर रोना, अनुभूति क्षमता का ह्रास, पालतू पशुओं की मृत्यु, जल का अभाव (घर में), तरलता का अभाव (शरीर में), मानसिक विक्षिप्तता की स्तिथि, मानसिक असन्तुलन या हताशा के कारण गुमसुम रहना, घर के क्षेत्र में कुआं या नल का सूखना, अपने प्रभाव क्षेत्र में तालाब का सुखना आदि |
3-मंगल- दृष्टि दुर्बलता, चक्षु (आंख) क्षय, शरीर के जोड़ों में पीड़ा और अकड़न, कमर एवं रीढ़ की हड्डी में दर्द तथा अकड़न, रक्त की कमी, त्वचा के रंग का पिला पड़ना, पीलिया होना, शारीरिक रूप से सबल होने पर भी संतानोत्पत्ति की क्षमता का न होना, शुक्राणुओं की दुर्बलता, नपुंसकता (शिथिलता), पति पक्ष की हानि (स्वास्थ्य , धन, प्राण आदि) |
4-बुध- अस्थि दुर्बलता, दंतक्षय, घ्राणशक्ति का क्षय होना, हकलाहट, वाणी दोष, हिचकी, अपनी बातें कहने में गड़बड़ा जाना, नाक से खून बहना, रति शक्ति का क्षय (स्त्री-पुरुष दोनों की), नपुंसकता (स्नायविक), स्नायुओं का कमजोर पड़ना, बन्ध्यापन (स्नायविक), कंधो का दर्द, गर्दन की अकड़न, वैवाहिक सम्बन्ध में क्षुब्धता, व्यापार की भागीदारी में हानि, रोजगार में अकड़न, शत्रु उपद्रव, परस्त्री लोलुपता या सम्बन्ध, परपुरुष लोलुपता या सम्बन्ध, अहंकार से हानि, पड़ोसी से अनबन रहना, कर्ज |
5-बृहस्पति- चोटी के बाल का उड़ना, धन या सोने का खो जाना या चोरी हो जाना या हानि हो जाना, शिक्षा में रुकावट, अपयश , व्यर्थ का कलंक, सांस का दोष, अर्थहानी, परतंत्रता, खिन्नता, प्रेम में असफलता, प्रियतमा की हानि (मृत्यु या अनबन), प्रियमत की हानि (मृत्यु या अनबन), जुए में हानि, सन्तानहानि (नपुंसकता, बन्ध्यापन, अल्पजीवन), आत्मिक शक्ति का अभाव, बुरे स्वप्नों का आना आदि |
6-शुक्र– स्वप्नदोष, लिंगदोष, परस्त्री लोलुपता, शुक्राणुहीनता या कर्ज, नाजायज सन्तान, त्वचा रोग, अंगूठे की हानि (हाथ), पड़ोसी से हानि, कर्ज की अधिकता, परिश्रम करने पर भी आर्थिक लाभ नहीं, भूमि हानि आदि |
7-शनि- व्यवसाय में हानि, अर्थहानि, रोजगार में हानि, अधिकार हानि, अपयश, मान-सम्मान की हानि, कृषि-भूमि की हानि, बुरे कार्यों में प्रवृत्ति, मकान हानि, अधार्मिक प्रवृत्ति (नास्तिकता), रिश्वत लेते पकड़े जाना या रिश्वत में हंगामा और अपयश, रोग, आकस्मिक मृत्यु, ऊंचाई से गिरकर शरीर या प्राणहानि, अचानक धनहानि, दुर्घटना, निराशा, घोर अपमान, निन्दक प्रवृत्ति, राजदण्ड |
8-राहु- संतानहीनता, विद्याहानि, बुद्धिहानि, उज्जड़ता, अरुचि, पूर्ण नपुंसकता, बन्ध्यापन, अन्याय करने की प्रवृत्ति, क्रूरता, रोजगारहानि, भूमिहानि, आकस्मिक अर्थहानि, राजदण्ड, शत्रुपिड़ा, बदनामी, कारावास का दण्ड, घर से निकाला, चोरी हो जाना, चोर-डाकू से हानि, दु:स्वप्न, अनिद्रा, मानसिक असंयता |
9-केतु- रोग, ऋण की बढ़ोत्तरी, लड़ाई-झगड़े से हानि, भाई से दुश्मनी, घोर दु:ख, नौकरों की कमी, अस्त्र से शारीरक क्षति, सांप द्वारा काटना, आग से हानि, शत्रु से हानि, अन्याय की प्रवृत्ति, पाप-प्रवृत्ति, मांस खाने की प्रवृत्ति, राजदण्ड (कैद) |
विशेष- उपर्युक्त लक्षणों के अनुसार बिना कुण्डली देखे भी आप जान सकते हैं कि आपको किस ग्रह के अशुभ प्रभाव का उपचार करना चाहिए | ग्रहों के उपचार ग्रहफल में हैं |

आप हमारे यहा से व्यापार वृर्दि यंत्र . धनाधीशकुबेरदेवता यंत्र . बगलामुखी यंत्र . श्री यंत्र .  शत्रु नाशक यंत्र . आर्थिक स्थिति में सुधार यंत्र . कर्ज मुक्ति यंत्र . सम्पूर्णवास्तु दोष निवारण यंत्र. सर्वकार्य सिद्धि यंत्र . वशीकरण यंत्र  . नवगग्रह यंत्र  . ऑर तंत्र व नकारात्मक ऊर्जा दूर करने का उपाय जाने . रक्षा मंत्र यंत्र  .विशेष सामग्री से प्रेत बाधा से ग्रस्त घर में धूनी दें, प्रेत बाधा, क्लेशादि दूर होंगे और परिवार में शांति और सुख का वातावरण उत्पन्न होगा। व्यापार स्थल पर यह सामग्री धूनी के रूप में प्रयोग करें, व्यापार में उन्नति होगी।

मंगवाने के लिये सम्पर्क करे ।

मेरा मोबाईल न0॰है। (9760924411) इसी नंबर पर और दोपहर-11.00 –बजे से शाम -08.00 -के मध्य ही संपर्क करें। मुजफ्फरनगर ॰उ0॰प्र0……..

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