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श्रीगुरु मंत्र – दीक्षा , विभिन्न समस्या समाधान के लिये एवं कार्य सिध्दि के लिये हवन यज्ञ , पूजा व अनुष्ठानादि के लिये सम्पर्क करे – पंडित आशु बहुगुणा—09760924411

श्रीगुरूदेवमहिमा
जो गुरुचरणकृपा से रहित हैं वे मेरी आज्ञा से विनष्ट हो जाते हैं । वस्तुतः गुरुचरणपादुका नष्ट होने से रक्षा करती है अतः गुरुचरणसेवा सबसे बडा़ तप है । गुरु के प्रसन्न होने मात्र से सारी सिद्धि प्राप्त हो जाती है इसमें संशय नहीं ॥१८८ – १८९॥
मैं ही गुरु हूँ , मैं ही देव हूँ , मैं ही मन्त्रार्थ हूँ , नाना शास्त्रों के अर्थ को न जानने वाले जो लोग इनमें भिन्न बुद्धि रखते हैं वे नरक में पड़ते हैं । हे प्रभो ! सभी विद्याओं की प्राप्ति का मूल जैसे दीक्षा है , वैसे ही स्वतन्त्र का मूल गुरु है किं बहुना गुरु ही आत्मा है इसमें संशय नहीं ॥१८९ – १९१॥
अपनी ही आत्मा अपना बन्धु है और अपनी ही आत्मा अपना शत्रु है । अपने द्वारा जिस कर्म को जिस भाव से किया जाता है उसी भाव से सिद्धि मिलती है । चाहे हीनाङ्र , कपटी , रोगी एवं बहुभोजी तथा शीलरहित ही साधक क्यों न हो मेरी उपासना करते हुये उसे उपविद्या का अभ्यास करते रहना चाहिये । धन , धान्य , सुत , वित्त , राज्य तथा ब्राह्मण भोजन अपने कल्याण के लिये प्रयुक्त करना चाहिये । अन्य की चिन्ता नहीं करनी चाहिये क्योंकी वह निष्फल है । नित्यश्राद्ध करने वाला धर्मशील मनुष्य सभी मनुष्यों में श्रेष्ठ है ॥१९१ – १९४॥
पवित्र आचरण वाला , मेरे सिद्धपीठों में भ्रमण करने वाला महीपाल यदि मेरे उन उन पीठों में जाकर मेरा दर्शन करे , तो अव्यक्त
( सूक्ष्म ) मण्डल में रहने वाली समस्त सिद्धियाँ उसके हस्तगत हो जाती हैं , क्योंकि महामाया के प्रसन्न होने पर अकस्मात् ‍ सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥१९५ – १९६॥
भाव प्रशंसा — अथवा , महावीरभाव में अथवा महाधीर साधक को दिव्यभाव में स्थित होने से सिद्धि मिलती है , अथवा पशुभाव में स्थित मन्त्रज्ञ साधक मुझे अपने हृदयरूपी पीठ में निवास करावे तब सिद्धि प्राप्त होती है । मनोरमभावत्रय ( पशुभाव , वीरभाव और दिव्यभाव ) ही क्रिया को सफल बनाते हैं , अथवा , हे भैरव ! दिव्यभाव और वीरभाव भी क्रिया को फलवती बनाते हैं ॥१९७ – १९८॥
हीन जाति में उत्पन्न पशुभाव वाले तथा वीर भाव वाले मुझे प्राप्त करते हैं । किन्तु शास्त्रों से अभिभूत चित्त वाले इस कलियुग में मेरा दर्शन नहीं प्राप्त कर सकते । कोई हजारों वर्ष पर्यन्त लगे रहने पर भी शास्त्रों का अन्त नहीं प्राप्त कर सकता । एक तो तर्कादि अनेक शास्त्र हैं और अपेक्षाकृत मनुष्य की आयु अत्यन्त स्वल्प है तथा उसमें भी करोडों विघ्न हैं ॥१९९ – २००॥
इस कारण जिस प्रकार हंस जल में से क्षीर को अलग कर लेता है उसी प्रकार शास्त्रों के सार का ज्ञान कर लेना चाहिए । इस घोर कलियुग में दिव्य और वीरभाव के सहारे अपने चित्त का महाविद्या में लगाये हुये मेरे महाभक्त महाविद्या के परम पद का दर्शन कर लेते हैं ॥२०१ – २०२॥
मौन धारण करने वाले सर्वदा साधन में लगे हुये सज्जन दिव्य और वीरभाव के स्वभाव से मेरे चरण कमलों का दर्शन कर लेते हैं । बहुत बडे़ उत्तम फल की आकांछा रखने वाले ब्राह्मणों को दो भाव ग्राह्य है अथवा अवधूतों के लिये भी दो ही भाव कहे गये हैं । इन दो भाव के प्रभाव से साधक मनुष्य महायोगी हो जाता है । किं बहुना , भाव द्वय को सिद्ध कर लेने पर मूर्ख भी वाचस्पति हो जाता है ॥२०२ – २०५॥
हे महादेव ! जो तन्त्रार्थ से सिद्ध किये गये सभी वर्णों के लिए विहित दो भाव को जानते हैं , वे साक्षात् ‍ रुद्र हैं , इसमें संशय नहीं । भावद्वय सभी भावज्ञों का साधन है । भाव को जानने वाले साधक भक्तियोग के इन्द्र हैं वे अपने तन्त्रार्थ के पारदर्शी होते हैं । नित्या उन्मत्त और जड़ के समान बने रहते हैं ॥२०५ – २०७॥
( जो भाव नहीं जानते वे इस प्रकार हैं ) जैसे वृक्ष फूल धारण करता है किन्तु उसकी गन्ध नासिका ही जानती है । इसी प्रकार तत्त्वशास्त्र के पढ़ने वाले तो बहुत हैं पर भाव के जानकार कोई कोई होते हैं । जिस प्रकार बुद्धिहीन की पढा़ई और अन्धे को आदर्श ( दर्पण ) का दर्शन , व्यर्थ होता है उसी प्रकार प्रज्ञावानों को भी धर्मशास्त्र का ज्ञान बन्धन का कारण हो जाता है ॥२०७ – २०९॥
यह तत्त्व इस प्रकार हो सकता है यही शास्त्रार्थ का निश्चयज्ञान है । इस प्रकार वाक् ‌ पति अपने मन से मैं कर्त्ता हूँ , मैं आत्मा हूँ , मैं सर्वव्यापी हूँ इस प्रकार के स्वभाव की चिन्ता करते हैं ॥२०९ – २१०॥
प्रथम पटल – गुरूमहिमा २
गुरूमहिमा २
जब सौदामनी के समान ( क्षणिक ) तेज से युक्त शास्त्र ज्ञानी एक सहस्त्रवर्ष पर्यन्त देखता है तभी ( तन्त्रवेत्ता एवं भावज्ञ ) महाज्ञानी एक चन्द्र को सहस्त्र चन्द्र के समान देखता है । करोड़ों वर्ष तक इस प्रकार तपस्या करने से मनुष्य जो फल प्राप्त करता है वह सभी फल मेरे चरणों के रज का एक क्षण मात्र ध्यान करने से उसे प्राप्त हो जाता है ॥२११ – २१२॥
यदि कोई आनन्द बढा़ने वाले एवं त्रिकोण के आधार में ( कुण्डलिनी ) स्थित तेज वाले मेरे कामरूप पीठ मंं , जहाँ जल के बुदबुद के समान शब्द होता है तथा जो अनन्त मङ्गलात्मक है , वहाँ सर्वत्र विचरण करे तो वह गणेश और कार्त्तिकेय के समान मेरा प्रिय बन कर मेरा दास हो जाता है और भक्तों में इन्द्र बन जाता है ॥२१३ – २१४॥
यदि कोई साधक मेरे चरणकमलों को प्राप्त करना चाहता है तो साट्टहास एवं विकटाक्ष रूप उपपीठ , जिसका नाम कङ्काल है वहाँ पर विचरण करे । ज्वालामुखी नाम का महापीठ मेरा अत्यन्त प्रिय है जो मेरी संतुष्टि के लिये वहाँ भ्रमण करता है वह निश्चय ही योगी हो जाता है ॥२१५ – २१६॥
दोनों भावों का खान रूप ज्वालामुख्यादिपीठ में जो साधकेन्द्र भ्रमण करते हैं वे अवश्य ही सभी साधकों में श्रेष्ठ एवं सिद्ध हो जाते हैं इसमें संशय नहीं । त्रैलोक्य की सिद्धि चाहने वालों के लिये भाव से बढ़ कर और कोई पदार्थ नहीं क्योंकि भाव ही परमज्ञान और सर्वोत्तम ब्रह्मज्ञान है ॥२१७ – २१८॥
यदि भाव का ज्ञान नहीं हुआ तो करोड़ों कन्या दान से किं वा वाराणसी की सौ बार परिक्रमा से अथवा कुरुक्षेत्र में यात्रा करने से क्या लाभ ? भावद्वयज्ञान के बिना गया में श्राद्ध एवं दान से या अनेक पीठों में भ्रमण करने से भी कोई लाभ नहीं । बहुत क्या कहें , यदि भाव ज्ञान नहीं हुआ तो अनेक प्रकार के होम और क्रिया से भी क्या ? भाव से ज्ञान उत्पन्न होता है । ज्ञान होने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥२१९ – २२१॥
गुरु महिमा — आत्मा से , मन से एवं वाणी से गुरु ईश्वर कहा जाता है । ध्यान ही सायुज्य है और मन को लय कर देना ’ मोक्ष ’ कहा जाता है ॥२२१ – २२२ ॥
गुरु की प्रसन्नता मात्र से यहाँ ( कुण्डलिनी ) शक्ति अत्यन्त संतुष्ट हो जाती है और जब साधक पर शक्ति संतुष्ट हो जाती है तो उसे ’ मोक्ष ’ अवश्य प्राप्त हो जाता है ॥२२२ – २२३॥
इस सारे संसार का मूल गुरु है । समस्त तपस्याओं का मूल गुरु है । उत्तम और जितेन्द्रिय साधक गुरु के प्रसन्न होने मात्र से मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥२२३ – २२४॥
इसलिये साधक गुरु की आज्ञा का कभी उल्लंघन न करे तथा उनका उत्तर न दे । दिन रात दास के समान गुरु की आज्ञा का पालन करे । बुद्धिमान साधक उनके कहे गये अथवा बिना कहे कार्थों की उपेक्षा न करे ॥२२४ – २२५॥
उनके चलते रहने पर स्वयं भी नम्रतापूर्वक उनका अनुगमन करे और उनकी आज्ञा का कभी उल्लंघन न करे । जो गुरु की अहितकारी अथवा हितकारी बात नहीं सुनता अथवा सुन कर अपना मुंह फेर लेता है वह रौरव नरक में जाता है । दैवात् यदि बुद्धिरहित पुरुष अपने गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करता है वह घोर नरक में जाता है और शूकर योनि प्राप्त करता है ॥२२६ – २२८॥
जो गुरु की आज्ञा का उल्लङ्वन , गुरुनिन्दा , गुरु को चिढा़ने वाला , अप्रिय व्यवहार तथा गुरुद्रोह करता है उसका संसर्ग कभी नहीं करना चाहिये । जो गुरु के द्रव्य को चाहता है , गुरु की स्त्री के साथ सङ्गम करता है उसे बहुत बडा़ पाप लगता है अतः उसका कोई प्रायश्चित्त नहीं है । जो निन्दा के द्वारा गुरु का शत्रुवत् अहित करता है वह अरण्य में एवं निर्जन स्थान में ब्रह्मराक्षस होता है ॥२२८ – २३१॥
गुरु का खडा़ऊँ , आच्छादन , वस्त्र , शयन तथा उनके आभूषण देखकर उन्हे नमस्कार करे और अपने कार्य में कभी भी उसका उपयोग न करे । जिस मनुष्य के जिहवा के अग्रभाग में सदैव गुरुपादुका मन्त्र विद्यमान रहता है वह अनायास ही धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष को प्राप्त कर लेता है । शिष्य को अपने भोग तथा मोक्ष के लिये गुरु के चरण कमलों का सदैव ध्यान करना चाहिये । हे वीर भैरव ! उससे बढ़ कर अन्य कोई भक्ति नहीं है ॥२३१ – २३४॥
यदि शिष्य और गुरु एक ही ग्राम में निवास करते हों तो शिष्य को चाहिये कि वह तीनों संध्या में जाकर अपने गुरु को प्रणाम करे । यदि एक ही देश में गुरु और शिष्य के निवास में सात योजन का अन्तर हो तो शिष्य को महीने में एक बार जा कर उन्हें प्रणाम करना चाहिये ॥२३४ – २३५॥
श्री गुरु का चरण कमल जिस दिशा में विद्यमान हो उस दिशा में शरीर से ( दण्डवत् प्रणाम द्वारा ), मन से तथा बुद्धि से नमस्कार करे । हे प्रभो ! वेदाङ्गादि विद्या , पदमा सनादि आसन , मन्त्र , मुद्रा और तन्त्रादि ये सभी गुरु के मुख से प्राप्त होने पर सफल होते हैं अन्यथा नहीं ॥२३६ – २३७॥
कम्बल पर , कोमल स्थान ( चारपाई आदि ) पर , प्रासाद पर , दीर्घ काष्ठ पर अथवा किसी की पीठ पर गुरु के साथ एव आसन पर न बैठे । हे देवेश ! श्री गुरु का पादुका मन्त्र , उनका दिया हुआ मूल मन्त्र और अपना पादुका मन्त्र जिस किसी के शिष्य को नहीं बताना चाहिये ॥२३८ – २३९॥
जो अपनी हित में आने वाली वस्तु हो उसे न दे कर गुरु को कदापि प्रवञ्चित नहीं करना चाहिये । हे सुव्रत ! न केवल दीक्षागुरु को , किन्तु जिससे एक अक्षर का भी ज्ञान किया हो उसको भी प्रवञ्चित न करे । गुरु के उद्देेश्य से अपने वित्तानुसार जो भक्ष्य निर्माण किया जाता है उसका स्वल्पभाग भी बहुत महान् होता है । किन्तु जो गुरु की भक्ति से विवर्जित भुवनादि , किं बहुना , सर्वस्व भी प्रदान करे तो वह दरिद्रता और नरक प्राप्त करता है क्योंकि दान में भक्ति ही कारण है ॥३४० – २४२॥
गुरु में भक्ति रखने से ऐन्द्र ( महेन्द्र ) पद तथा भक्ति न रखने से शूकरत्व प्राप्त होता है । सभी जगह भक्तिशास्त्र में गुरु भक्ति से बढ़ कर और कोई उत्कृष्ट नहीं है । हे नाथ ! गुरु पूजा के बिना करोड़ों पुण्य व्यर्थ हो जाते हैं इसलिये गुरुभक्ति करनी चाहिये ॥२४३ – २४४॥

श्री गुरु पादुका स्तोत्र
ॐ नमो गुरुभ्यो गुरुपादुकाभ्यो नमः परेभ्यः परपादुकाभ्यः!आचार्य सिद्धेश्वरपादुकाभ्योनमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्यो!!1!!
मैं पूज्य गुरुदेव को प्रणाम करता हूँ, मेरी उच्चतम भक्ति गुरु चरणों और उनकी पादुका केप्रति हैं, क्योंकि गंगा-यमुना आदि समस्त नदियाँ और संसार के समस्त तीर्थ उनके चरणों में समाहित हैं, यह पादुकाएं ऐसे चरणों से आप्लावित रहती हैं, इसलिए मैं इस पादुकाओं को प्रणाम करता हु, यह मुझे भवसागर से पार उतारने में सक्षम हैं, यह पूर्णता देने में सहायक हैं, ये पादुकाएं आचार्य और सिद्ध योगी केचरणों में सुशोभित रहती हैं, और ज्ञान के पुंज को अपने ऊपर उठाया हैं, इसीलिए ये पादुकाएं ही सही अर्थों में सिद्धेश्वर बन गई हैं, इसीलिए मैं इस गुरु पादुकाओं कोभक्ति भावः से प्रणाम करता हूँ!!1!!
ऐंकार ह्रींकाररहस्ययुक्त श्रींकारगूढार्थ महाविभूत्या!ओंकारमर्म प्रतिपादिनीभ्याम नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम!!2!!
गुरुदेव “ऐंकार” रूप युक्त हैं, जो कि साक्षात् सरसवती के पुंज हैं, गुरुदेव”ह्रींकार” युक्त हैं, एक प्रकार से देखा जाये तो वे पूर्णरूपेण लक्ष्मी युक्त हैं, मेरे गुरुदेव”श्रींकार” युक्त हैं, जो संसार के समस्त वैभव, सम्पदा और सुख से युक्त हैं, जो सही अर्थों में महान विभूति हैं, मेरे गुरुदेव “ॐ” शब्द के मर्म को समझाने में सक्षम हैं, वे अपने शिष्यों को भी उच्च कोटि कि साधना सिद्ध कराने में सहायक हैं, ऐसे गुरुदेव के चरणों में लिपटी रहने वाली ये पादुकाएं साक्षात् गुरुदेव का ही विग्रह हैं, इसीलिए मैं इन पादुकाओं को श्रद्धा – भक्ति युक्त प्रणाम करता हूँ!!2!!
होत्राग्नि होत्राग्नि हविश्यहोतृ – होमादिसर्वाकृतिभासमानं !यद् ब्रह्म तद्वोधवितारिणीभ्याम नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम!!3!!
ये पादुकाएं अग्नि स्वरूप हैं, जो मेरे समस्त पापो को समाप्त करने में समर्थ हैं, ये पादुकाएं मेरे नित्य प्रति के पाप, असत्य, अविचार, और अचिन्तन से युक्त दोषों को दूर करनेमें समर्थ हैं, ये अग्नि कि तरह हैं, जिनका पूजन करने से मेरे समस्त पाप एक क्षण में ही नष्ट हो जाते हैं, इनके पूजन से मुझे करोडो यज्ञो का फल प्राप्त होता हैं, जिसकीवजह से मैं स्वयं ब्रह्मस्वरुप होकर ब्रह्म को पहिचानने कि क्षमता प्राप्त कर सका हूँ, जब गुरुदेव मेरे पास नहीं होते, तब ये पादुकाएं ही उनकी उपस्थिति का आभास प्रदान कराती रहती हैं, जो मुझे भवसागर से पार उतारने में सक्षम हैं, ऐसी गुरु पादुकाओं को मैं पूर्णता के साथ प्रणाम करता हूँ!!3!!
कामादिसर्प वज्रगारूडाभ्याम विवेक वैराग्यनिधिप्रदाभ्याम.बोधप्रदाभ्याम द्रुतमोक्षदाभ्याम नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम!!4!!
मेरे मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह और अंहकार के सर्प विचरते ही रहते हैं, जिसकी वजह से मैं दुखी हूँ, और साधनाओं में मैं पूर्णता प्राप्त नहीं कर पाता, ऐसी स्थिति में गुरु पादुकाएं गरुड़ के समान हैं, जो एक क्षण में ही ऐसे कामादि सर्पों को भस्म कर देती हैं, और मेरे ह्रदय में विवेक, वैराग्य, ज्ञान, चिंतन, साधना और सिद्धियों का बोध प्रदान करती हैं, जो मुझे उन्नति की ओर ले जाने में समर्थ हैं, जो मुझे मोक्ष प्रदान करने में सहायक हैं, ऐसी गुरु पादुकाओं को मैं प्रणाम करता हूँ!!4!!
अनंतसंसार समुद्रतार नौकायिताभ्यां स्थिरभक्तिदाभ्यां!जाड्याब्धिसंशोषणवाड्वाभ्यां नमो नमः श्री गुरुपादुकाभ्याम!!5!!
यह संसार विस्तृत हैं, इस भवसागर पार करने में ये पादुकाएं नौका की तरहहैं, जिसके सहारे मैं इस अनंत संसार सागर को पार कर सकता हूँ, जो मुझे स्थिर भक्ति देने में समर्थ हैं, मेरे अन्दर अज्ञान की घनी झाडियाँ हैं, उसे अग्नि की तरह जला कर समाप्त करने में सहायक हैं, ऐसी पादुकाओंको मैं भक्ति सहित प्रणाम करता हूँ!!5!!

******~ श्री गुरु स्तोत्रम् ~*************
|| श्री महादेव्युवाच ||
गुरुर्मन्त्रस्य देवस्य धर्मस्य तस्य एव वा |
विशेषस्तु महादेव ! तद् वदस्व दयानिधे ||
श्री गुरु स्तोत्रम् श्री महादेवी (पार्वती) ने कहा : हे दयानिधि शंभु ! गुरुमंत्र के देवता अर्थात् श्री गुरुदेव एवं उनका आचारादि धर्म क्या है – इस बारे में वर्णन करें |
|| श्री महादेव उवाच ||
जीवात्मनं परमात्मनं दानं ध्यानं योगो ज्ञानम् |
उत्कल काशीगंगामरणं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||१||
श्री महादेव बोले : जीवात्मा-परमात्मा का ज्ञान, दान, ध्यान, योग पुरी, काशी या गंगा तट पर मृत्यु – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||१||
प्राणं देहं गेहं राज्यं स्वर्गं भोगं योगं मुक्तिम् |
भार्यामिष्टं पुत्रं मित्रं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||२||
प्राण, शरीर, गृह, राज्य, स्वर्ग, भोग, योग, मुक्ति, पत्नी, इष्ट, पुत्र, मित्र – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||२||
वानप्रस्थं यतिविधधर्मं पारमहंस्यं भिक्षुकचरितम् |
साधोः सेवां बहुसुखभुक्तिं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||३||
वानप्रस्थ धर्म, यति विषयक धर्म, परमहंस के धर्म, भिक्षुक अर्थात् याचक के धर्म – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||३||
विष्णो भक्तिं पूजनरक्तिं वैष्णवसेवां मातरि भक्तिम् |
विष्णोरिव पितृसेवनयोगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||४||
भगवान विष्णु की भक्ति, उनके पूजन में अनुरक्ति, विष्णु भक्तों की सेवा, माता की भक्ति, श्रीविष्णु ही पिता रूप में हैं, इस प्रकार की पिता सेवा – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||४||
प्रत्याहारं चेन्द्रिययजनं प्राणायां न्यासविधानम् |
इष्टे पूजा जप तपभक्तिर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||५||
प्रत्याहार और इन्द्रियों का दमन, प्राणायाम, न्यास-विन्यास का विधान, इष्टदेव की पूजा, मंत्र जप, तपस्या व भक्ति – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||५||
काली दुर्गा कमला भुवना त्रिपुरा भीमा बगला पूर्णा |
श्रीमातंगी धूमा तारा न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||६||
काली, दुर्गा, लक्ष्मी, भुवनेश्वरि, त्रिपुरासुन्दरी, भीमा, बगलामुखी (पूर्णा), मातंगी, धूमावती व तारा ये सभी मातृशक्तियाँ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||६||
मात्स्यं कौर्मं श्रीवाराहं नरहरिरूपं वामनचरितम् |
नरनारायण चरितं योगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||७||
भगवान के मत्स्य, कूर्म, वाराह, नरसिंह, वामन, नर-नारायण आदि अवतार, उनकी लीलाएँ, चरित्र एवं तप आदि भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||७||
श्रीभृगुदेवं श्रीरघुनाथं श्रीयदुनाथं बौद्धं कल्क्यम् |
अवतारा दश वेदविधानं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||८||
भगवान के श्री भृगु, राम, कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि आदि वेदों में वर्णित दस अवतार श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||८||
गंगा काशी कान्ची द्वारा मायाऽयोध्याऽवन्ती मथुरा |
यमुना रेवा पुष्करतीर्थ न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||९||
गंगा, यमुना, रेवा आदि पवित्र नदियाँ, काशी, कांची, पुरी, हरिद्वार, द्वारिका, उज्जयिनी, मथुरा, अयोध्या आदि पवित्र पुरियाँ व पुष्करादि तीर्थ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||९||
गोकुलगमनं गोपुररमणं श्रीवृन्दावन-मधुपुर-रटनम्|
एतत् सर्वं सुन्दरि ! मातर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||१०||
हे सुन्दरी ! हे मातेश्वरी ! गोकुल यात्रा, गौशालाओं में भ्रमण एवं श्री वृन्दावन व मधुपुर आदि शुभ नामों का रटन – ये सब भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||१०||
तुलसीसेवा हरिहरभक्तिः गंगासागर-संगममुक्तिः |
किमपरमधिकं कृष्णेभक्तिर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||११||
तुलसी की सेवा, विष्णु व शिव की भक्ति, गंगा सागर के संगम पर देह त्याग और अधिक क्या कहूँ परात्पर भगवान श्री कृष्ण की भक्ति भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||११||
एतत् स्तोत्रम् पठति च नित्यं मोक्षज्ञानी सोऽपि च धन्यम् |
ब्रह्माण्डान्तर्यद्-यद् ध्येयं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||१२||
इस स्तोत्र का जो नित्य पाठ करता है वह आत्मज्ञान एवं मोक्ष दोनों को पाकर धन्य हो जाता है | निश्चित ही समस्त ब्रह्माण्ड मे जिस-जिसका भी ध्यान किया जाता है, उनमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||१२||
|| वृहदविज्ञान परमेश्वरतंत्रे त्रिपुराशिवसंवादे श्रीगुरोःस्तोत्रम् ||
||यह गुरुस्तोत्र वृहद विज्ञान परमेश्वरतंत्र के अंतर्गत त्रिपुरा-शिव संवाद में आता है ||

शक्तिपात :- हमारे गुरु या ईष्ट देव हम पर समयानुसार शक्तिपात भी करते रहते हैं. उस समय हमें ऐसा लगता है जैसे मूर्छा (बेहोशी) सी आ रही है या अचानक आँखें बंद होकर गहन ध्यान या समाधि की सी स्थिति हो जाती है, साथ ही एक दिव्य तेज का अनुभव होता है और परमानंद का अनुभव बहुत देर तक होता रहता है. ऐसा भी लगता है जैसे कोई दिव्या धारा इस तेज पुंज से निकलकर अपनी और बह रही हो व अपने अपने भीतर प्रवेश कर रही हो.
वह आनंद वर्णनातीत होता है. इसे शक्तिपात कहते है. जब गुरु सामने बैठकर शक्तिपात करते हैं तो ऐसा लगता है की उनकी और देखना कठिन हो रहा है. उनके मुखमंडल व शरीर के चारों तरफ दिव्य तेज/प्रकाश दिखाई देने लगता है और नींद सी आने लगती है और शरीर एकदम हल्का महसूस होता है व परमानन्द का अनुभव होता है. इस प्रकार शक्तिपात के द्वारा गुरु पूर्व के पापों को नष्ट करते हैं व कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करते हैं. ध्यान/समाधी की उच्च अवस्था में पहुँच जाने पर ईष्ट देव या ईश्वर द्वारा शक्तिपात का अनुभव होता है.
साधक को एक घूमता हुआ सफ़ेद चक्र या एक तेज पुंज आकाश में या कमरे की छत पर दीख पड़ता है और उसके होने मात्र से ही परमानन्द का अनुभव ह्रदय में होने लगता है. उस समय शारीर जड़ सा हो जाता है व उस चक्र या पुंज से सफ़ेद किरणों का प्रवाह निकलता हुआ अपने शरीर के भीतर प्रवेश करता हुआ प्रतीत होता है. उस अवस्था में बिजली के हलके झटके लगने जैसा अनुभव भी होता है और उस झटके के प्रभाव से शरीर के अंगा भी फड़कते हुए देखे जाते हैं.
यदि ऐसे अनुभव होते हों तो समझ लेना चाहिए कि आप पर ईष्ट या गुरु की पूर्ण कृपा हो गई है, उनहोंने आपका हाथ पकड़ लिया है और वे शीघ्र ही आपको इस माया से बाहर खींच लेंगे.
१.अश्विनी मुद्रा, मूल बांध का लगना :- श्वास सामान्य चलना और गुदा द्वार को बार-बार संकुचित करके बंद करना व फिर छोड़ देना. या श्वास भीतर भरकर रोक लेना और गुदा द्वार को बंद कर लेना, जितनी देर सांस भीतर रुक सके रोकना और उतनी देर तक गुदा द्वार बंद रखना और फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए गुदा द्वार खोल देना इसे अश्विनी मुद्रा कहते हैं. कई साधक इसे अनजाने में करते रहते हैं और इसको करने से उन्हें दिव्य शक्ति या आनंद का अनुभव भी होता है परन्तु वे ये नहीं जानते कि वे एक यौगिक क्रिया कर रहे हैं. अश्विनी मुद्रा का अर्थ है “अश्व यानि घोड़े की तरह करना”. घोडा अपने गुदा द्वार को खोलता बंद करता रहता है और इसी से अपने भीतर अन्य सभी प्राणियों से अधिक शक्ति उत्पन्न करता है.
इस अश्विनी मुद्रा को करने से कुण्डलिनी शक्ति शीघ्रातिशीघ्र जाग्रत होती है और ऊपर की और उठकर उच्च केन्द्रों को जाग्रत करती है. यह मुद्रा समस्त रोगों का नाश करती हैं. विशेष रूप से शरीर के निचले हिस्सों के सब रोग शांत हो जाते हैं. स्त्रियों को प्रसव पीड़ा का भी अनुभव नहीं होता. प्रत्येक नए साधक को या जिनकी साधना रुक गई है उनको यह अश्विनी मुद्रा अवश्य करनी चाहिए. इसको करने से शरीर में गरमी का अनुभव भी हो सकता है, उस समय इसे कम करें या धीरे-धीरे करें व साथ में प्राणायाम भी करें. सर्दी में इसे करने से ठण्ड नहीं लगती. मन एकाग्र होता है. साधक को चाहिए कि वह सब अवस्थाओं में इस अश्विनी मुद्रा को अवश्य करता रहे. जितना अधिक इसका अभ्यास किया जाता है उतनी ही शक्ति बदती जाती है. इस क्रिया को करने से प्राण का क्षय नहीं होता और इस प्राण उर्जा का उपयोग साधना की उच्च अवस्थाओं की प्राप्ति के लिए या विशेष योग साधनों के लिए किया जा सकता है. मूल बांध इस अश्विनी मुद्रा से मिलती-जुलती प्रक्रिया है. इसमें गुदा द्वार को सिकोड़कर बंद करके भीतर – ऊपर की और खींचा जाता है. यह वीर्य को ऊपर की और भेजता है एवं इसके द्वारा वीर्य की रक्षा होती है. यह भी कुंडलिनी जागरण व अपानवायु पर विजय का उत्तम साधन है. इस प्रकार की दोनों क्रियाएं स्वतः हो सकती हैं. इन्हें अवश्य करें. ये साधना में प्रगति प्रदान करती हैं.
2.. गुरु या ईष्ट देव की प्रबलता :- जब गुरु या ईष्ट देव की कृपा हो तो वे साधक को कई प्रकार से प्रेरित करते हैं. अन्तःकरण में किसी मंत्र का स्वतः उत्पन्न होना व इस मंत्र का स्वतः मन में जप आरम्भ हो जाना, किसी स्थान विशेष की और मन का खींचना और उस स्थान पर स्वतः पहुँच जाना और मन का शांत हो जाना, अपने मन के प्रश्नों के समाधान पाने के लिए प्रयत्न करते समय अचानक साधू पुरुषों का मिलना या अचानक ग्रन्थ विशेषों का प्राप्त होना और उनमें वही प्रश्न व उसका उत्तर मिलना, कोई व्रत या उपवास स्वतः हो जाना, स्वप्न के द्वारा आगे घटित होने वाली घटनाओं का संकेत प्राप्त होना व समय आने पर उनका घटित हो जाना, किसी घोर समस्या का उपाय अचानक दिव्य घटना के रूप में प्रकट हो जाना, यह सब होने पर साधक को आश्चर्य, रोमांच व आनंद का अनुभव होता है. वह सोचने लगता है की मेरे जीवन में दिव्य घटनाएं घटित होने लगी हैं, अवश्य ही मेरे इस जीवन का कोई न कोई विशेष उद्देश्य है, परन्तु वह क्या है यह वो नहीं समझ पाटा. किन्तु साधक धैर्य रखे आगे बढ़ता रहे, क्योंकि ईष्ट या गुरु कृपा तो प्राप्त है ही, इसमें संदेह न रखे; क्योंकि समय आने पर वह उद्देश्य अवश्य ही उसके सामने प्रकट हो जाएगा.
3… ईष्ट भ्रष्टता का भ्रम :- कई बार साधकों को ईष्ट भ्रष्टता का भ्रम उपस्थित हो जाता है. उदाहरण के लिए कोई साधक गणेशजी को इष्ट देव मानकर उपासना आरम्भ करता है. बहुत समय तक उसकी आराधना अच्छी चलती है, परन्तु अचानक कोई विघ्न आ जाता है जिससे साधना कम या बंद होने लगती है. तब साधक विद्वानों, ब्राह्मणों से उपाय पूछता है, तो वे जन्मकुंडली आदि के माध्यम से उसे किसी अन्य देव (विष्णु आदि) की उप्पसना के लिए कहते हैं. कुछ दिन वह उनकी उपासना करता है परन्तु उसमें मन नहीं लगता. तब फिर वह और किसी की पास जाता है. वह उसे और ही किसी दुसरे देव-देवी आदि की उपासना करने के लिए कहता है. तब साधक को यह लगता है की मैं अपने ईष्ट गणेशजी से भ्रष्ट हो रहा हूँ. इससे न तो गणेशजी ही मिलेंगे और न ही दूसरे देवता और मैं साधना से गिर जाऊँगा. यहाँ साधकों से निवेदन है की यह सही है की वे अपने ईष्ट देव का ध्यान-पूजन बिलकुल नहीं छोड़ें, परन्तु वे उनके साथ ही उन अन्य देवताओं की भी उपासना करें. साधना के विघ्नों की शांति के लिए यह आवश्यक हो जाता है. उपासना से यहाँ अर्थ उन-उन देवी देवताओं के विषय में जानना भी है क्योंकि उन्हें जानने पर हम यह पाते हैं की वस्तुतः वे एक ही ईश्वर के अनेक रूप हैं (जैसे पानी ही लहर, बुलबुला, भंवर, बादल, ओला, बर्फ आदि है). इस प्रकार ईष्ट देव यह चाहता है कि साधक यह जाने. इसलिए इसे ईष्ट भ्रष्टता नहीं बल्कि ईष्ट का प्रसार कहना चाहिए.”
4.. शरीर का हल्का लगना :- जब साधक का ध्यान उच्च केन्द्रों (आज्ञा चक्र, सहस्रार चक्र) में लगने लगता है तो साधक को अपना शरीर रूई की तरह बहुत हल्का लगने लगता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब तक ध्यान नीचे के केन्द्रों में रहता है (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर चक्र तक), तब तक “मैं यह स्थूल शरीर हूँ” ऐसी दृढ भावना हमारे मन में रहती है और यह स्थूल शरीर ही भार से युक्त है, इसलिए सदा अपने भार का अनुभव होता रहता है. परन्तु उच्च केन्द्रों में ध्यान लगने से “मैं शरीर हूँ” ऐसी भावना नहीं रहती बल्कि “मैं सूक्ष्म शरीर हूँ” या “मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ परमात्मा का अंश हूँ” ऎसी भावना दृढ हो जाती है. यानि सूक्ष्म शरीर या आत्मा में दृढ स्थिति हो जाने से भारहीनता का अनुभव होता है. दूसरी बात यह है कि उच्च केन्द्रों में ध्यान लगने से कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होती है जो ऊपर की और उठती है. यह दिव्य शक्ति शरीर में अहम् भावना यानी “मैं शरीर हूँ” इस भावना का नाश करती है, जिससे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल का भान होना कम हो जाता है. ध्यान की उच्च अवस्था में या शरीर में हलकी चीजों जैसे रूई, आकाश आदि की भावना करने से आकाश में चलने या उड़ने की शक्ति आ जाती है, ऐसे साधक जब ध्यान करते हैं तो उनका शरीर भूमि से कुछ ऊपर उठ जाता है. परन्तु यह सिद्धि मात्र है, इसका वैराग्य करना चाहिए.
5.. हाथ के स्पर्श के बिना केवल दूर से ही वस्तुओं का खिसक जाना :- कई बार साधकों को ऐसा अनुभव होता है कि वे किसी हलकी वास्तु को उठाने के लिए जैसे ही अपना हाथ उसके पास ले जाते हैं तो वह वास्तु खिसक कर दूर चली जाती है, उस समय साधक को अपनी अँगुलियों में स्पंदन (झन-झन) का सा अनुभव होता है. साधक आश्चर्यचकित होकर बार-बार इसे करके देखता है, वह परीक्षण करने लगता है कि देखें यह दुबारा भी होता है क्या. और फिर वही घटना घटित होती है. तब साधक यह सोचता है कि अवश्य ही यह कोई दिव्य घटना उसके साथ घटित हो रही है. वास्तव में यह साधक के शरीर में दिव्य उर्जा (कुंडलिनी, मंत्र जप, नाम जप आदि से उत्पन्न उर्जा) के अधिक प्रवाह के कारण होता है. वह दिव्य उर्जा जब अँगुलियों के आगे एकत्र होकर घनीभूत होती है तब इस प्र रोगी के रुग्ण भाग पर हाथ रखने से उसका स्वस्थ होना :- कई बार साधकों को ऐसा अनुभव होता है कि वे अनजाने में किसी रोगी व्यक्ति के रोग वाले अंग पर कुछ समय तक हाथ रखते हैं और वह रोग नष्ट हो जाता है. तब सभी लोग इसे आश्चर्य की तरह देखते हैं. वास्तव में यह साधक के शरीर से प्रवाहित होने वाली दिव्य उर्जा के प्रभाव से होता है. रोग का अर्थ है उर्जा के प्रवाह में बाधा उत्पन्न हो जाना. साधक के संपर्क से रोगी की वह रुकी हुई उर्जा पुनः प्रवाहित होने लगती है, और वह स्वस्थ हो जाता है. मंत्र शक्ति व रेकी चिकित्सा पद्धति का भी यही आधार है कि मंत्र एवं भावना व ध्यान द्वारा रोगी की उर्जा के प्रवाह को संतुलित करने की तीव्र भावना करना. आप अपने हाथ की अंजलि बनाकर उल्टा करके अपने या अन्य व्यक्ति के शरीर के किसी भाग पर बिना स्पर्श के थोडा ऊपर रखें. फिर किसी मंत्र का जप करते हुए अपनी अंजलि के नीचे के स्थान पर ध्यान केन्द्रित करें और ऐसी भावना करें कि मंत्र जप से उत्पन्न उर्जा दुसरे व्यक्ति के शरीर में जा रही है. कुछ ही देर में आपको कुछ झन झन या गरमी का अनुभव उस स्थान पर होगा. इसे ही दिव्य उर्जा कहते हैं. यह मंत्र जाग्रति का लक्षण है…..

अब प्रयोग द्वारा सिद्धि प्रदान करने वाले षट्कसर्मों को कहता हूँ -
१. शान्ति, २. वश्य, ३. स्तम्भन, ४. विद्वेषण ५. उच्चाटन और ६. मारण – ये तन्त्र शास्त्र में षट्‌कर्म कहे गए हैं ॥१॥

रोगादिनाश के उपा को शान्ति कहते है । आज्ञाकारिता वश्यकर्म हैं । वृत्तियों का सर्वथा निरोध स्तम्भन है । परस्पर प्रीतिकारी मित्रों में विरोध उत्पन्न करन विद्वेषण है । स्थान नीचे गिरा देना उच्चाटन है, तथा प्राणवियोगानुकूल कर्म मारण है । षट्‌कर्मों के यही लक्षण है ॥२-३॥
अब षट्‌कर्मों में ज्ञेय १९ पदार्थो को कहते हैं -
१. देवता, २. देवताओम के वर्ण, ३. ऋतु, ४. दिशा, ५. दिन, ६. आसन, ७. विन्यास ८. मण्डल ९. मुद्रा, १०. अक्षर, ११. भूतोदय १२. समिधायें १३. माला, १४. अग्नि, १५. लेखनद्रव्य, १६. कुण्ड, १७. स्त्रुक्‍, १८. स्त्रुवा, तथा १९ लेखनी इन पदार्थों को भलीभाँति जानकारी कर षट्‌कर्मों में इनका प्रयोग करना चाहिए ॥४-५॥

अब क्रम प्राप्त (१) देवताओं और उनके (२) वर्णो को कहते हैं – १. रति, २. वाणी, ३. रमा, ४. ज्येष्ठा, ५. दुर्गा, एवं ६. काली यथाक्रम शान्ति आदि षट्कतर्मों के देवता कहे गए हैं । १. श्वेत, २. अरुण. ३. हल्दी जैसा पीला, ४. मिश्रित, ५. श्याम (काला) एवं ६. धूसरित ये उक्त देवताओं के वर्ण हैं । प्रत्येक कर्म के आरम्भ में कर्म के देवता के अनुकूल पुष्पों से उनका पूजन करना चाहिए ॥६-७॥

(३) एक अहोरात्र में प्रतिदिन वसन्तादि ६ ऋतुयें होती हैं । इनमें एक – एक ऋतु का मान १० – १० घटी माना गया है । १ हेमन्त, २. वसन्त, ३. शिशिर, ४. ग्रीष्म, ५. वर्षा और ६. शरद्‍ इन छः ऋतुओं का साधक को शान्ति आदि षट्‌कर्मों में उपयोग करना चाहिए । प्रतिदिन सूर्योदय से १० घटी (४घण्टी) वसन्त, उसके आगे दश घटी शिशिर इत्यादि क्रम समझना चाहिए ॥७-९॥

(४) दिशाएं – ईशान-उत्तर-पूर्व-निऋति वायव्य और आग्नेय ये शान्ति आदि कर्मों के लिए दिशायें कही गई हैम । अतः शान्ति आदि कर्मोम के लिए उन उन दिशाओं की ओर मुख कर जपादि कार्य करना चाहिए ॥९-१०॥

(५) अब षट्‌कर्मों में क्रियमाण तिथि एवं वार का निर्देश करते हैं
शुक्ल पक्ष की द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी एवं सप्तमी तिथि को बुधवार बृहस्पतिवार आये तो शान्तिकर्म करना चाहिए । शुक्लपक्ष की चतुर्थी, षष्ठी, नवमी एवं त्रयोदशी को सोमवार बृहस्पतिवार आने पर वशीकरण कर्म प्रशस्त होता है ॥१०-१२॥

विद्वेषण – में एकादशी, दशमी, नवमी और अष्टमी तिथि को शुक्र या शनिवार का दिन हो तो शुभावह कहा गया है ॥१२-१३॥

यदि कृष्णपक्ष की अष्टमी एवं चतुर्दशी को शनिवार हो तो फल सिद्धि के लिए उच्चाटन कर्म करना चाहिए । कृष्णपक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी एवं अमावस्या तथा शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को रवि, मङ्गल शनिवार, का दिन हो तो स्तम्भन और मारण कर्म सिद्ध हो जाता है ॥१३-१५॥

(६) शान्ति आदि षट्‌कर्मों में क्रमशः पद्‌मासन, स्वस्तिकासन, विकटासन, कुक्कुटासन, वज्रासन एवं भद्रासन का उपयोग करना चाहिए । गाय, गैंडा, हाथी, सियार, भेड एवं भैसे के चमडे के आसन पर बैठ कर शान्ति आदि षट्‌कर्मों में जपादि कार्य करना चाहिए ॥१५-१७॥

विमर्श – पद्‌मासन का लक्षण – दोनों ऊरु के ऊपर दोनों पादतल को स्थापित कर व्युत्क्रम पूर्वक (हाथों को उलट कर) दोनों हाथों से दोनों हाथ के अंगूठे को बींध लेने का नाम पद्‌मासन कहा गया है ।

स्वस्तिकासन का लक्षण – पैर के दोनों जानु और दोनों ऊरु के बीच दोनों पादतल को अर्थात्‍ दक्षिण पद के जानु और ऊरु के मध्य वाम पादतल एवं वामपाद के जानु और ऊरु के मध दक्षिण पादतल को स्थापित कर शरीर को सीधे कर बैठने का नाम स्वस्तिकासन है ।

विकटासन का लक्षण – जानु और जंघाओ के बीच में दोनों हाथों को जब लाया जाए तो अभिचार प्रयोग में इसे विकटासन कहते हैं ।

कुक्कुटासन का लक्षण – पहले उत्कटासन करके फिर दोनों पैरों को एक साथ मिलावे । दोनों घुटनों के मध्य दोनों भुजाओं को रखना कुक्कुटासन कहा गया है ।

वज्रासन का लक्षण – पैर के परस्पर जानु प्रदेश पर एक दूसरे को स्थापित्‍ करे तथा हाथ की अंगुलियों को सीधे ऊपर की ओर उठाए रखे तो इस प्रकार के आसन को वज्रासन कहते हैं ।

भद्रासन का लक्षण – सीवनी (गुदा और लिंग के बीचोबीच ऊपर जाने वाली एक रेखा जैसी पतली नाडी है) के दोनों तरफ दोनों पै के गुल्फों को अर्थात्‍ वामपार्श्व में दक्षिणपाद के गुल्फ को एवं दक्षिण पार्श्व में वामपाद के गुल्फ को निश्चल रुप से स्थापित कर वृषण (अण्डकोश) के नीचे दोनों पैर की घुट्टी अर्थात्‍ वृषण के नीचे दाहिनी ओर वामपाद की घृट्टॆए तथा बाँई ओर दक्षिण पाद की घुट्टी स्थापित कर पूर्ववत्‍ दोनों हाथों से बींध लेने से भद्रासन हो जाता है ॥१५-१७॥

(७) इस प्रकार आसनों को कह कर अब विन्यास कहता हूँ -
शान्ति आदि ६ कर्मोम में क्रमशः १. ग्रन्थन, २. विदर्भ, ३. सम्पुट, ४. रोधन, ५. योग और ६. पल्लव ये ६ विन्यास कहे गए हैं । इन छहों को क्रमशः कहता हूँ ॥१७-१९॥

१. मन्त्र का एक अक्षर उसके बाद नाम का एक अक्षर फिर मन्त्र का एक अक्षर तदनन्तर नाम का एक अक्षर इस प्रकार मन्त्र और नाम के अक्षरों का ग्रन्थन करना ‘ग्रन्थन विन्यास’ है ।
२. प्रारम्भ में मन्त्र के दो अक्षर उसके बाद नाम का एक अक्षर इस प्रकार मन्त्र और नाम के अक्षरों के बारम्बार विन्यास को मन्त्र शात्रों को जानने वाले ‘विदर्भ विन्यास’ कहते हैं ॥१९-२१॥

३. पहले समग्र मन्त्र का उच्चारण, तदनन्तर समग्र नामाक्षरों का उच्चारण करना फिर इसके बाद विलोम क्रम से मन्त्र बोलना ‘संपुट विन्यास’ कहा जाता है ।४. नाम के आदि, मध्य और अन्त में मन्त्र का उच्चारण करना ‘रोधन विन्यास’ कहा जाता है ॥२१-२२॥

५. नाम के अन्त मन्त्र बोलना ‘योग विन्यास’ होता है ।

६. मन्त्र के अन्त में नामोच्चारण को ‘पल्लवविन्यास’ कहते हैं ॥२३॥

(८) अब मन्त्र के आठवें प्रकार, मण्डल का लक्षण कहते हैं -
दोनों ओर दो दो कमलोम से युक्त अर्द्धचन्द्राकार चिन्ह को जल का मण्डल कहा गया है, यह शान्तिकर्म में प्रशस्त कहा गया है । त्रिकोण के भीतर उपयोग स्वस्तिक का चिन्ह रखा अग्नि क मण्डल माना गया है, वश्यकर्म में इसका उपयोग प्रशस्त कहा गया है । वज्र चिन्ह से युक्त चौकोर भूमि का मण्डल कहा गया है जो स्तम्भन कार्य के लिए प्रशस्त कहा गया है ॥२३-२५॥

आकाश मण्डल वृत्ताकार होता है । यह विद्वेषण कार्य में प्रशस्त है, छह बिन्दुओं से अंकित वृत्त वायु मण्डल कहा गया है, जो उच्चाटन क्रिया में प्रशस्त है । मारण में पूर्वोक्त वहिनमण्डल का उपयोग करना चाहिए ॥२५-२६॥

(९) अब मण्डल का लक्षण कह कर मुद्रा के विषय में कहते हैं – शान्ति आदि षट्कवर्मों में पदम्‍, पाश, गदा, मुशल, वज्र एवं खड्‌ग मुद्राओं का प्रदर्शन करना चाहिए । अब आगे होम की मुद्रायें कहेगें ॥२६-२७॥

विमर्श – (१) पद्‌ममुद्रा – दोनों हाथों को सम्मुख करके हथेलियां ऊपर करे, अंगुलियों को बन्द कर मुट्ठी बॉधे । अब दोनों ऐगूठों को अंगुलियों के ऊपर से परस्पर स्पर्श कराये । यह पद्‌म मुद्रा है ।

(२) पाशमुद्रा – दोनों हाथ की मुटिठयां बांधकर बाईं तर्जनी को दाहिनी तर्जनी से बांधे । फिर दोनोम तर्जनियों को अपने-अपने अंगूठोम से दबाये । इसके बाद दाहिनी तर्जनी के अग्रभाग को कुछ अलग करने से पाश मुद्रा निष्पन्न होती है ।

(३) गदामुद्रा – दोनों हाथों की हथेलियों को मिला कर, फिर दोनोम हाथ की अंगुलियाम परस्पर एक दूसरे से ग्रथित करे । इसी स्थिति में मध्यमा उगलियों को मिलाकर सामने की ओर फैला दे । तब यह विष्णु को सन्तुष्ट करने वाली ‘गदा मुद्रा’ होती है ।

(४) मुशलमुद्रा – दोनों हाथों की मुट्ठी बांधे फिर दाहिनी मुट्ठी को बायें पर रखने से मुशल मुद्रा बनती है ।

(५) वज्रमुद्रा – कनिष्ठा और अंगूठे को मिलाकर त्रिकोण बनाने को अशनि (वज्रमुद्रा) कहते हैं अर्थात्‍ कनिष्ठा और अंगूठे को मिलाकर प्रसारित कर त्रिक्‍ बनाना वज्रमुद्रा है ।

(६) खड्‌गमुद्रा – कनिष्ठिका और अनामिका उंगलियों को एक दूसरे के साथ बांधकर अंगूठों को उनसे मिलाए । शेष उंगलियों को एक साथ मिला कर फैला देने से खड्‌गमुद्रा निष्पन्न होती है ॥२६-२७॥

मृगी, हंसी एवं सूकरी ये तीन होम की मुद्रायें हैं । मध्यमा अनामिका और अंगूठे के योग से मृगी मुद्रा, कनिष्ठा को छोड कर शेष सभी अङ्गगुलियों का योग करने से हंसी मुद्रा और हाथ को संकुचित कर लेने से सूकरी मुद्रा बनती है । इस प्रकार इन तीन मुद्राओं का लक्षण कहा गया है । शान्ति कार्य में मृगी वश्य में हंसी तथा शेष स्तम्भनादि कार्यों में सूकरी मुद्रा का प्रयोग किया जाता है ॥२७-२८॥

(१०) अक्षर – शान्ति आदि षट्‌कर्मों में यन्त्र पर चन्द्र, जल, धरा, आकाश, पवन, और अनल वर्णो के बीजाक्षरों का क्रमशः लेखन करना चाहिए । ऐसा मन्त्र शास्त्र के विद्वानों ने कहा हैं ॥३०॥

सोलह, स्वर, स एवं ठ ये अठारह चन्द्र वर्ण के बीजाक्षर हैं, चन्द्रवर्ण से हीन पञ्चभूतो के अक्षर जलादि तत्वों के बीजाक्षर वश्यादि कर्मों के लिए उपयुक्त है । कुछ आचार्यो ने स व ल ह य एवं र को क्रमशः चन्द्र जल, भूमि, आकाश और वायु एवं का बीजाक्षर कहा है ॥३१॥

शान्ति आदि षट्‌कर्मों में मन्त्रशास्त्रज्ञों ने क्रमशः नमः, स्वाहा, वषट्‍, वौषट, हुम्‍ एवं फट्‍ इन छः को जातित्वेन स्वीकार किया है ॥३२॥

(११) अब मन्त के ग्यारहवें प्रकार, भूतों का उदय कहते हैं – जब दोनों नासापुटों के नीचे तक श्वास चलता हो तब जलतत्त्व का उदय समझना चाहिए, जो शान्ति कर्म में सिद्धिदायक होता है । नाक के मध्य में सीधे दण्ड की तरह श्वास गति होने पर पृथ्वीतत्त्व का उदय समझना चाहिए, यह स्तम्भन काम में सिद्धिदायक होता है । नासा छिद्रों के मध्य में श्वास की गति होने पर आकाशतत्त्व का उदय समझना चाहिए, जो विद्वेषण में सिद्धिदायक है । नासापुटों के ऊपर श्वास की गति होने पर अग्नितत्त्व का उदय समझना चाहिए ॥३३-३५॥

ऐसे समय में मारण एवं वशीकरण दोनों कार्यो में सफलता मिलती है । श्वास की गति तिर्यक्‍ (तिरछी) होने पर वायुतत्त्व का उदय समझना चाहिए जो उच्चाटन क्रिया में शुभावह होता है ॥३६॥

(१२) अब मन्त्र के बारहवें प्रकार, विभिन्न समिधाओं को कहते हैं – शान्ति कार्य में गोघृत मिश्रित दूर्वा से, वश्य में बकरी के घी से मिश्रित अनार की समिधा से स्तम्भन में भेंडी का घी मिला कर अमलतास वृक्ष की समिधा से, विद्वेषण में अतसी के तेल मिश्रित धतूरे की समिधा से, उच्चाटन में सरसों के तेल से मिश्रित आम की वृक्ष की समिधा से तथा मारण में कटुतैल मिश्रित खैर की लकडी की समिधा से होम करना चाहिए ॥३७-३९॥

(१३) अब तेरहवें प्रकार में माला की विधि कहते हैं – शान्ति आदि षट्‌कर्मों में शंख की शान्ति में, कवलगद्दा की वश्य में, नींबू की स्तम्भन में, नीम की विद्वेषण में, घोडे के दाँत उच्चाटन में तथा गदहे के दाँत की जप माला मारण कर्म में उपयोग करना चाहिए ॥४०॥

शान्ति, वश्य, पूष्टि, भोग एवं मोक्ष के कर्मों में मध्यमा में स्थित माला को अंगूठे से घुमाना चाहिए । स्तम्भनादि कार्यो के लिए बुद्धिमान साधक को अनामिका एवं अंगूठे से जप करना चाहिए । विद्वेषण एवं उच्चाटन में तर्जनी एवं अंगूठे से जप करना चाहिए तथा मारण में कनिष्ठिका एवं अंगूठे से जप करने का विधान है ॥४१-४३॥

अब प्रसङ्ग प्राप्त माला की मणियोम की गणना कहते हैं – शुभकार्य के लिए माला में मणियोम की संख्या १०८, ५४ या २७ कही गई है, किन्तु अभिचार (मारण) कर्म मे मणियों की संख्या १५ कही गई है ॥४४॥

(१४) अब चौदहवें प्रकार वाले अग्नि के विषय में कहते हैं -
शान्ति और वशीकरण कर्म में लौकिक अग्नि में, स्तम्भन में बरगद के काठ की बनी अग्नि में, विद्वेषण में बहेडे की लकडी की अग्नि में तथा उच्चाटन एवं मारण के प्रयोगोम में श्मशानाग्नि में होम का विधान है ॥४५॥

अग्नि प्रज्वलित करने के लिए समिधाओं के विषय में कहते हैं – शुभ कार्यो में वेल, आक, पलाश एवं दुधारु वृक्षों की समिधाओम से तथा अशुभ कर्मों में विषकृत कुचिला, बहेडा, नीबू, धतूरा एवं लिसोडे की समिधाओं से मान्त्रिक को अग्नि प्रज्वलित करनी चाहिए ॥४६॥

अब अग्नि जिहवाओं का तत्तत्कर्मों में पूजन का विधान कहते हैं – शान्ति कर्म में अग्नि की सुप्रभा संज्ञक जिहवा का, वश्य में रक्तनामक जिहवा का, स्तम्भन में हिरण्या नामक जिहवा का,विद्वेषण में गगना नामक जिहवा का, उच्चाटन में अतिरिक्तिका जिहवा का तथा मारण में कृष्णा नामक अग्नि जिहवा और सभी जगह बहुरुपा नामक अग्निजिहवा का पूजन करना चाहिए ॥४७-४९॥

शान्त्यादि कर्मों में ब्राह्मण भोजन के विषय में कुछ विशेषतायें हैं । शान्ति एवं वश्य में होम के दशांश संख्या मे ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए, यह उत्तम पक्ष माना गया हैं ॥४९-५०॥

होम की संख्या के पच्चीसवें अंश की संख्या में ब्राह्मण भोजन मध्यम तथा शतांश संख्या में ब्राह्मण भोजन अधम पक्ष कहा गया है । स्तम्भन कार्य में शान्ति की संख्या से दूने ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए । इसी प्रकार विद्वेषण एवं उच्चाटन में शान्ति संख्या से तीन गुने ब्राह्मणों को तथा मारण में संख्या के तुल्य ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए ॥५०-५१॥

अब भोजनार्ह ब्राह्मणों का स्वरुप कहते हैं -
अत्यन्त विशुद्ध कुलों में उत्पन्न साङ्‌गवेद के विद्वान पवित्र निर्मल अन्तःकरण वाले सदाचार परायण ब्राह्मणों को विविध प्रकार के मनोहर भोज्य पदार्थो से भोजन कराना चाहिए । उनमें देवबुद्धि रखकर पूजन करन चाहिए तथा बारम्बार उन्हे प्रणाम करना चाहिए । मधुर वाणी से तथा सुर्वणदि दे दान से उन्हे सन्तुष्ट करना चाहिए । इस प्रकार के ब्राह्मणों द्वारा दिए गए आशीर्वाद के प्राप्त करने से साधक के समस्त अभिचारादि पाप नष्ट हो जाते हैं, तथा शीघ्र ही उसे मनोऽभिलषित पदार्थो की प्राप्ति हो जाती है ॥५२-५५॥

(१५) अब लेखन द्रव्य के विषय में कहते हैं -
चन्दन, गोरोचन, हल्दी, गृहधूम, चिता का अङ्गार तथा विषाष्टक यन्त्र लेखन के द्रव कहे गए हैं । यन्त्र तरङ्ग (२०) में पूर्वोक्त द्रव्यादि भी तत्तत्कामनाओम में लेखन द्रव्य कहे गए हैं । वे भी ग्राह्य हैं । १. पिप्पली, २. मिर्च, ३. सोंठ, ४. बाज पक्षी की विष्टा, ५. चित्रक (अण्डी), ६. गृहधूम, ७. धतूरे का रस तथा ८. लवण ये ८ वस्तुयें विषाष्टक कही गई हैं ॥५५-५७॥

शान्ति और वश्य कर्म में भोज पत्र पर, स्तम्भन में व्याघ्र चर्म पर, विद्वेष में गदहे की खाल पर, उच्चाटन में ध्वज वस्त्र पर, और मारण में मनुष्य की हड्डी पर, मान्त्रिक को मन्त्र लिखना चाहिए । यत्र तरङ्ग (२० में विविध प्रयोगों में यन्त्र लिखने के जो जो आधार कहे गए हैं वे भी यन्त्राधार में ग्राह्य हैं ॥५८-५९॥

(१६) अब मन्त्र के १६वें प्रकार, कुण्ड के विषय में कहते हैं -
शान्ति आदि षट्‌कर्मोम में क्रमशः वृत्तकार, पद्‌माकार, चतुरस्त्र, त्रिकोण, षट्‌कोण और अर्द्धचन्द्रकार कुण्ड का निर्माण पश्चिम उत्तर-पूर्व नैऋत्य वायव्य और दक्षिण दिशा में करना चाहिए ॥६०॥

(१७) स्त्रुवा और स्त्रुची – शान्ति में सुवर्ण की एवं वश्य में यज्ञवृक्ष की स्त्रुवा और स्त्रुची बनानी चाहिए । शेष स्तम्भनादि कार्योम में लौह की स्त्रुवा और स्त्रुची बनानी चाहिए ॥६१॥

(१८) अब मन्त्र के उन्नीसवें प्रकार, लेखनी के विषय में कहते हैं -
शान्ति कर्म में सोने, चांदी, अथवा चमेली की, वश्य कर्म में दूर्वा की, स्तम्भन में अगस्त्य वृक्ष की अथवा अमलतास की, विद्वेषण में करञ्ज की, उच्चाटन में बहेडे की तथा मारण में मनुष्य की हड्डी की लेखनी से यन्त्र लिखना चाहिए । शुभ कर्म में साधक को शुभमुहूर्त में अशुभ कार्य में रिक्ता (चौथ, नवमी, चतुर्दशी) तिथियों में मङ्गलवार के दिन तथा विष्टी (भद्रा) में लेखनी का निर्माण करना चाहिए ॥६२-६५॥

अब उक्तकर्मों में भक्ष्यपदार्थों को, तर्पण द्रव्यों को तथा उपयोग में लाये जाने योग्य पात्रों के विषय में कहता हूँ -
शान्ति और वश्य कर्म करते समय हविष्यान्न, स्तम्भन करते समय खीर, विद्वेषण करते समय उडद एवं मूँग, उच्चाटन करते समय गेहूँ तथा मरण करते समय मान्त्रिक को मसूर एवं काली बेकरी के दूध में बने खीर का भोजन करना चाहिए ॥६५-६७॥

शान्ति कर्म में तथा वश्य कर्म में हल्दी मिला जल, स्तम्भन और मारण कर्म में मिर मिला कुछ गुणगुना जल तथा विद्वेषण एवं उच्चाटन में भेद् के खून से कमकश्रत जल तर्पण द्रव्य कहा गया है ॥६८॥

शान्ति एवं वश्य कर्म में सोने के पात्र में, स्तम्भन में मिट्टी के पात्र में, विद्वेषण में खैर के पात्र में, उचाटन में लोहे के पात्र में तथा मारण में मुर्गी ल्के अण्डे में तर्पण करना चाहिए ॥६८-७१॥

शान्ति एवं वश्य कर्म में मृदु आसन पर बैठकर तर्पण करना चाहिए । स्तम्भन में घुटनोम से उठकर तथा विद्वेषण आदि में एक पैर से खडे हो कर तर्पण करना चाहिए ॥७१॥

हमने मन्त्र साधकों के सन्तोष के लिए षट्कहर्मोम (शान्ति, वश्य, स्तम्भन, विद्वेषण उच्चाटन और मारण) की विधि बताई है । सर्वप्रथम विधिवत्‍ न्यास द्वारा आत्मरक्षा करने के बाद ही काम्य कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए । अन्यथा हानि और असफलता ही प्राप्त होती है ॥७२॥

जो व्यक्ति शुभ अथवा अशुभ किसी भी प्रकार का काम्य कर्म करता है मन्त्र उसका शत्रु बन जाता है इसलिए काम्यकर्म न करे । यही उत्तम है ॥७३-७४॥

अब प्रश्न होता है कि यदि काम्य कर्म करने का निषेध है तो इतनी बडी विधियुक्त पुस्तक के निर्माण का क्या हेतु है? इसका उत्तर देते हैं – विषयासक्त चित्त वालों के सन्तोष के लिए प्राचीन आचार्यों ने काम्य कम की विधि का प्रतिपादन किया है किन्तु यह हितकारी नहीं है । काम्य कर्म वालों के लिए केवल कामना सिद्धि मात्र फल की प्राप्ति होती है ॥७४-७५॥

किन्तु निष्काम भाव से देवताओं की उपासना करने वालों की सारी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है । केवल सुख प्राप्ति के लिए प्रत्येक मन्त्रों के जितने भी प्रयोग बतलाये गए हैं उनकी आसक्ति का त्याग कर निष्काम रुप से देवता की पूजा करनी चाहिए ॥७६॥

वेदों में कर्मकाण्ड, उपासना और ज्ञान तीन काण्ड बतलाये गए हैं । ‘ज्योतिष्टोमेन यजेत्‍’ यह कर्मकाण्ड है, ‘सूर्यो ब्रह्मेत्युपासीत’ यह उपासना है, ये दोनों काण्ड ज्ञान के साधन हैं हैं ‘अयमात्मा ब्रह्म’ यह ज्ञान है जो स्वयं में साध्य है । यही उक्त दोनों में ही वेदोक्त मार्ग के अनुसार प्रवृत्त होना चाहिए । देवता की उपासना से अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है । जिससे उत्तम ज्ञान की प्राप्ति होती है । कार्यकारणसंघात शरीर में प्रविष्ट हुआ जीव ही परब्रह्म है । इसी ज्ञान से साधक मुक्त हो जाता है । अतः मनुष्य देह प्राप्त कर देवताओम की उपासना से मुक्ति प्राप्त कर लेनी चाहिए । जो मनुष्य देह प्राप्त कर संसार बन्धन से मुक्त नही होता, वही महापापी ॥८०॥

इसलिए उपासना और कर्म से काम-क्रोधादि शत्रुओं का नाश कर आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए सत्पुरुषों को सतत्‍ प्रयत्न करते रहना चाहिए ॥७७-८१॥

देवता की उपासना करने वाले को अपना भविष्य विचार कर उसमें प्रवृत्त होना चाहिए । उसकी विधि इस प्रकार है -
स्नान और दान आदि करने के बाद भगवान्‍ विष्णु के चरण कमलों का ध्यान कर कुश की शय्या पर सोना चाहिए । तथा भगवान शिव से ‘भगवान देवदेवेश…… त्वत्प्रसादान्महेश्वर’ पर्यन्त तीन श्लोकों से (द्र० २५. ८३. ८६) से प्रार्थना कर निश्चिन्त हो सो जाना चाहिए ॥८२-८६॥

प्रातःकाल उठने पर देखा हुआ स्वप्न अपने गुरुदेव से बतला देना चाहिए । उनके न होने पर स्वयं साधक को अपने स्वप्न के भविष्य के विषय में विचार कर लेना चाहिए ॥८७॥

अब शुभाशुभ स्वप्न के विषय में कहते हैं -
लिङ्ग चन्द्र और सूर्यकर बिम्ब, सरस्वती, गङ्गा, गुरु, लालवर्ण वाले समुद्र में तैरना, युद्ध में विजय, अग्नि का अर्चन, मयूरयुक्त, हंसयुक्त अथवा चक्रयुक्त रथ पर बैठना, स्नान, संभोग, सारस की सवारी, भूमिलाभ, नदी, ऊचे ऊचे महल, रथ, कमल, छत्र, कन्या, फलवान्‍ वृक्ष, सर्प अथवा हाथी, दीया, घोडा, पुष्प, वृषभ और अश्व, पर्वत, शराब का घडा, ग्रह नक्षत्र, स्त्री, उदीयमान सूर्य अप्सराओं का दर्शन, लिपे पोते स्वच्छ मकान पर, पहाड पर तथा विमान पर चढना, आकाश यात्रा, मद्य पीना, मांस खाना, विष्टा का लेप, खून से स्नान, दही भात का भोजन, राज्यभिषेक होना (राज्य प्राप्ति), गाय, बैल और ध्वजा का दर्शन, सिंह और सिंहासन , शंख बाजा, गोरोचन, दधि, चन्दन तथा दर्पण इनका स्वप्न में दिखलायी पडना शुभावह कहा गया है ॥८८-९३॥

तैल की मालिश किए पुरुष का, काला अथवा नग्न व्यक्ति का, गङ्गा, कौआ, सूखा वृक्ष, काँटेदार वृक्ष, चाण्डाल बडे कन्धे वाला पुरुष, तल (छत) रहित पक्ता महल इनका स्वप्न में दिखलाई पडना अशुभ है ॥९४-९५॥

दुःस्वप्न की शात्नि के उपाय – दुःस्वप्न दिखई पडने पर उसकी शान्ति करानी चाहिए । तदनन्तर एकाग्रमन से इष्टदेव के मन्त्र को जप करना चाहिए । ३ वर्ष तक जप करने वाले को विघ्न की संभावना रहती है, अतः विघ्नसमूह की परवाह न कर अपने जप में तत्पर रहना चाहिए । अपने चित्त में विश्वस्त रहने वाला सिद्धपुरुष चौथे वर्ष में अवश्य ही सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥९५-९७॥

अब मन्त्र सिद्धि का लक्षण कहते हैं -
मन में प्रसन्नता आत्मसन्तोष, नगाङ्गे की ध्वनि, गाने की ध्वनि, ताल की ध्वनि, गन्धर्वो का दर्शन, अपने तेज को सूर्य के समान देखना, निद्रा, क्षुधा, जप करना, शरीर का सौन्दर्य बढना, आरोग्य होना, गाम्भीर्य, क्रोध और लोभ का अपने में सर्वथा अभाव, इत्यादि चिन्ह जब साधक को दिखाई पडे ती मन्त्र की सिद्धि तथा देवता की प्रसन्नता समझनी चाहिए ॥९७-१००॥

अब मन्त्र सिद्धि के बाद के कर्त्तव्य का निर्देश करते हैं – मन्त्र सिद्धि प्राप्त कर लेने वाले साधक को ज्ञान प्राप्ति के लिए जप की संख्या में निरन्तर वृद्धि का यन्त करते रहना चाहिए । जब वेदान्त प्रतिपादित (अयमात्माब्रह्म, अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वामसि श्वेतोकेतो इत्यादि) तत्त्वों का ज्ञान प्राप्त है जाय तब साधक कृतार्थ हो जाता है और संसार बन्धन से छूट जाता है ॥१००-१०१॥

माला
अन्य धर्मों की तरह सनातन (हिन्दू) धर्म में भी जप के लिए माला का प्रयोग होता है। क्योंकि किसी भी जप में संख्या का बहुत महत्त्व होता है। निश्चित संख्या में जप करने के लिए माला का प्रयोग करते हैं। माला फेरने से एकाग्रता भी बनी रहती है। वैसे तो माला के अन्य बहुत से प्रयोग हैं, लेकिन मैं यहां जप संबंधी बातें बताना चाहता हूँ।
किसी देवी-देवता के मंत्र का जप करने के लिए एक निश्चित संख्या होती है। उस संख्या का १० प्रतिशत हवन, हवन का १० प्रतिशत तर्पण, तर्पण का १० प्रतिशत मार्जन, मार्जन की १० प्रतिशत संख्या में ब्राह्मण भोजन करना होता है। इन सभी संख्यों का निर्धारण बिना माना के संभव नहीं।
माला में १०८ (+१ सुमेरु) दाने (मनके) होने चाहिए। ५४, २७ या ३० (इत्यादि) मनको की माला से भी जप किया जाता है। साधना विशेष के लिए मनकों की संख्या का विचार है। दो मनकों के बीच डोरी में गांठ होना जरूर है, आमतौर से ढाई गांठ की माला अच्छी होती है। अर्थात् डोरी में मनके पिरोते समय साधक हर मनके के बाद ढाई गांठ लगाए। मनके पिरोते समय अपने इष्टदेव का जप करते रहना चाहिए। सफेद डोरी शान्ति, सिद्धि आदि शुभ कार्यों के लिए प्रयाग करनी चाहिए। लाल धागे से वशीकरण आदि तथा काले धागे से पिरोई गई माला द्वारा मारण कर्म किये जाते हैं।
माला पिरोते समय मुख और पुछ का ध्यान रखना चाहिए। मनके के माटे वाले सिरे को मुख तथा पतले किनारे को पुछ कहते हैं। माला पिरोते समय मनकों के मुख से मुख तथा पुछ से पुछ मिलाकर पिरोने चाहिए।
मनके किसी भी चीज (प्लास्टिक इत्यादि छोड़कर) के हों मगर खंडित नहीं होने चाहिए।
रुद्राक्ष की माला भगवान् शंकर को प्रिय है और इसे एज़ ए डिफ़ाल्ट सभी देवी देवताओं की पूजा आराधना प्रयोग किया जा सकता है। रुद्राक्ष पर जप करने से अनन्त गुना (अन्य सभी मालाओं की तुलना में बहुत अधिक) फल मिलता है। इसे धारण करना भी स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। जिस माला को धारण करते हैं उस पर जप नहीं करते लेकिन उसी जाति (किस्म) कि दूसरी माला पर जप कर सकते हैं।
जप करते समय माला गोमुखी या किसी वस्त्र से ढकी होनी चाहिए अन्यथा जप का फल चोरी हो जाता है। जप के बाद जप-स्थान की मिट्टी मस्तक पर लगा लेनी चाहिए अन्यथा जप का फल इन्द्र को चला जाता है।
प्रातःकाल जप के समय माला नाभी के समीप होनी चाहिए, दोपहर में हृदय और शाम को मस्तक के सामने।
जप में तर्जनी अंगुली का स्पर्श माला से नहीं होना चाहिए। इसलिए गोमुखी के बड़े छेद से हाथ अन्दर डाल कर छोटे छेद से तर्जनी को बाहर निकलकर जप करना चाहिए। अभिचार कर्म में तर्जनी का प्रयोग होता है।
जप में नाखून का स्पर्श माला से नहीं होना चाहिए।
सुमेरु के अगले दाने से जप आरम्भ करे, माला को मध्यमा अंगुली के मघ्य पोर पर रख कर दानों को अंगूठे की सहायता से अपनी ओर गिराए। सुमेरु को नहीं लांघना चाहिए। यदि एक माला से अधिक जप करना हो तो, सुमेरु तक पहुंच कर अंतिम दाने को पकड़ कर, माला पलटी कर के, माला की उल्टी दिशा में, लेकिन पहले की तरह ही जप करना चाहिए।
देवता विषेश के लिए माला का चयन करना चाहिए-
हाथी दांत की माला गणेशजी की साधना के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।
लाल चंदन की माला गणेशजी व देवी साधना के लिए उत्तम है।
तुलसी की माला से वैष्णव मत की साधना होती है (विष्णु, राम व कृष्ण)।
मूंगे की माला से लक्ष्मी जी की आराधना होती है। पुष्टि कर्म के लिए भी मूंगे की माला श्रेष्ठ होती है।
मोती की माला वशीकरण के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।
पुत्र जीवा की माला का प्रयोग संतान प्राप्ति के लिए करते हैं।
कमल गट्टे की माला की माला का प्रयोग अभिचार कर्म के लिए होता है।
कुश-मूल की माला का प्रयोग पाप-नाश व दोष-मुक्ति के लिये होता है।
हल्दी की माला से बगलामुखी की साधना होती है।
स्फटिक की माला शान्ति कर्म और ज्ञान प्राप्ति; माँ सरस्वती व भैरवी की आराधना के लिए श्रेष्ठ होती है।
चाँदी की माला राजसिक प्रयोजन तथा आपदा से मुक्ति में विशेष प्रभावकरी होती है।
जप से पूर्व निम्नलिखित मंत्र से माला की वन्दना करनी चाहिए–
(साधना या देवता विशेष के लिए अलग-अलग माला-वन्दना होती है)
ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणी।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव॥
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे।
जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये॥

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥.

.विशेषः- इस प्रकार के मन्त्र उग्र प्रकृति के होते है। स्व-रक्षा व गुरु निर्देशन के अभाव में प्रयुक्त करना हानिकारक है तथा सामाजिक व नैतिक दृष्टि से अनुचित भी। यहाँ पर मात्र प्राचीन विद्या के संरक्षण हेतु प्रस्तुत किये ।

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