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महाराज क्रतवीर्य ने पुत्र कार्तवीर्य के शरीर के उपचार के लिये भगवान दतात्रेय की सेवा अर्चना की और उनसे पुत्र के स्वस्थ व सुंदर शरीर की कामना की थी I तब भगवान दतात्रेय ने एकाक्षरी मंत्र का जप और श्री गणेश जी की आराधना बारह वर्ष तक करने का उपदेश दिया था I परिणाम स्वरुप श्री गणेश जी की कृपा से कार्तवीर्य को सुंदर शरीर और सहस्त्रबाहु प्राप्त हुए थे I चूँकि यहाँ भगवान दत्त का प्रसंग आया है अतः उनके अवतार की संगक्षिप्त चर्चा करना उचित होगा I
जीवों के ह्रदय में ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिये ही प्रायः भगवान के अवतार होते हैं I वेसे तो अवतार के कई प्रयोजन होते हैं किंतु जीवों का अज्ञान-अंधकार-निवारण अवतार का परम प्रयोजन होता है I जब तक इस सृष्टि में जिव हैं, तब तक इस कार्य को अविरत रूप से चलाना अपरिहार्य है I यही सोचकर भगवान विष्णु ने सदगुरु श्री दत्तात्रेय जी के रूप में अवतार ग्रहण किया I अवतारों में चौबीस अवतारों का निर्देश श्री मदभागवत कार ने किया है I उन चौबीस अवतारों में सिद्धराज भगवान श्री दत्तात्रेय का अवतार छटा माना जाता है I इस अवतार की पारी समाप्ति नहीं है इसलिए इन्हें “अविनाश” भी कहा जाता है I समस्त “सिद्धों” के राजा होने के कारण ये “सिद्धराज” कहलाते हैं I योग विद्या में असाधारण अधिकार रखने के कारण इन्हें “योगिराज” भी कहा जाता है I और योग चातुर्य से इन्होने देवताओं का संरक्षण किया इसलिए ये “देवदेवेश्वर” भी कहलाते हैं I
अत्रि मुनि ने प्रदियों के दुख निवारण करने वाले पुत्र की कामना की तथा इस अभिप्राय से उन्होंने श्री विष्णु की भावपूर्ण घोर तपस्या की I भगवान विष्णु अत्रि मुनि की तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हुये और कहा की “हे मुनिवर मैने निज को ही तुम्हें दान कर दिया है I पुत्र के रूप में मै तुम्हारे घर में जन्म लूँगा I ” इस कारण इनकी “दत्त” संज्ञा हुई तथा “आत्रेय”दोनों नामों के संयोग से इनका नाम दत्तात्रेय पड़ा I भगवान विष्णु ने “दत्तात्रेय” जी के रूप में अवतरित होकर संसार का बड़ा ही उपकार किया है I कार्तवीर्य अर्जुन को भगवान दत्तात्रेय का अनुग्रह प्राप्त था I उन्ही की कृपा से वे तेजस्वी और यशस्वी हुए थे I
महाराज क्रतवीर्य के निधन के पश्चात् उत्तराधिकारी कार्तवीर्य अर्जुन से राज्यशासन ग्रहण करने के लिये आमात्य एवं प्रजाजनों ने निवेदन किया और राज्याभिषेक के लिये तत्पर हुए I किंतु कार्तवीर्य ने उनका यह निवेदन यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया की “अग्निहोत्र” (यज्ञ) ताप, वेद पाठन, अतिथि सत्कार, वैश्वदेव व सत्य ये सब इष्ट हैं I कूप, सरोवर बनवाना, उपयुक्त पात्र को दान देना आदि पूर्त हैं I प्रजा से कर लेकर उनके सत्यपालन में यदि समर्थ न हुआ और दूसरों से प्रजा पालन कराता रहा तो मेरी सब इच्छा पूर्ति नष्ट हो जावेगी I इनके नष्ट होने से मुझे निश्चय ही नरक की प्राप्ति होगी I अतः मुझे प्रजापालन में पूर्णरूप से प्रथम सक्षम होना चाहिए तभी मैं राज्यशासन ग्रहण करूँगा इससे पूर्व नहीं I
कार्तवीर्य अर्जुन का यह निश्चय सुनकर गर्ग मुनि ने कहा – वास्तव में आप यदि राजा का ऐसा आचरण करना चाहते हो जैसा कि आपने कहा है तो आप सह्यादी की गुफाओं में जाकर भगवान दतात्रेय की सेवा कर उनसे उपदेश ग्रहण करें I वे देवताओं के द्वारा उपासित हैं I उन्होंने स्वर्ग का राज्य वापस कराने में इन्द्र सहित देवताओं की सहायता की थी I यह सुनकर कार्तवीर्य अर्जुन ने प्रश्न किया कि भगवान दतात्रेय ने किस प्रकार देवताओं की उपासना प्राप्त की और किस प्रकार राजा इन्द्र को उनका राज्य वापस करवाया I
गर्ग मुनि ने उस वृतांत को कार्तवीर्य को सुनाया – एक समय जम्भासुर दानवों के राजा ने देवताओं से भयंकर युद्ध छेड़ दिया I देवराज इन्द्र और उनके साथी देवताओं ने दानवों का सामना किया I किंतु उनकी पराजय हुई और वे इधर-उधर भाग गये I फलतः इन्द्र से उनका राज्य छीन गया I देवराज इन्द्र निराश होकर देवगुरु ब्रहस्पति के पास गये और उन्हें पूर्ण व्यथा-कथा सुनाई I इस पर देवगुरु ने कहा की यदि आप दानवों पर विजय चाहते हैं तो सिद्धराज दत्तात्रेय जी के पास जाकर उनसे अनुनय विनय करो I वे ही तुम्हारा कल्याण करेंगे I देवराज इन्द्र के साथ सभी देवगण दत्तात्रेय जी के पास पहुँचे और उन्होंने उनकी सेवा की I अंततः दत्तात्रेय जी ने द्रवित होकर देवताओं से आने का कारण पूछा I देवताओं ने अपनी कथा-व्यथा कह सुनाई I देवताओं की बात सुनकर भगवान दत्तात्रेय ने आदेश दिया की आप लोग जाकर दानवों को युद्ध के लिये ललकारें और उन्हें मेरे पास ले आएं I वे अपनी दृष्टि से दानवों को भस्म कर देंगे I देवताओं ने उनकी आज्ञा का पालन किया और दानवों ने भी उनका पीछा किया और दत्तात्रेय जी के आश्रम तक आ गये I वहाँ लक्ष्मी स्वरुप नारी को देखकर दानवगण युद्ध करना भूलकर उस नारी पर मोहित हो गये I उस लक्ष्मी स्वरुपा नारी को पालकी में बिठाकर, पालकी को सिर पर उठाकर चल पड़े I यह देखकर दत्तात्रेय जी ने कहा की हे देवगण विधाता आपके अनुकूल है I क्योंकि लक्ष्मी सप्तम स्थान का अतिक्रमण कर दानवों के सिर पर जा बैठी है जिससे दानवों का विनाश स्पष्ट है I दत्तात्रेय जी ने देवताओं को बतलाया की जब लक्ष्मी चरण में हो तो गृह्दात्री होती है I अस्थि में हो तो रत्न आदि देती है I गुह्य स्थान में हो तो स्त्री, अंक में हो तो पुत्र, ह्रदय में हो तो सर्व मनोरथ प्रदायनी होती है I कंठ में हो तो कंठ भूषण देती है, प्रवासी प्रिय जनों के समागम में सहायक होती है I वाणी में हो तो लावण्य कवित्व शक्ति और यश देती है और लक्ष्मी यदि सिर पर आसीन हो तो विनाश करती है I तो हे देवगण, अब दानवों का विनाश निश्चित है I अतः आप लोग अब उन पर सहज ही विजय प्राप्त कर सकते हैं I तब देवताओं ने दानवों पर आक्रमण करके उनका विनाश कर दिया और लक्ष्मी स्वरुप नारी को दत्तात्रेय जी के पास ले आये I देवताओं ने दत्तात्रेय जी का पूजन किया और उनकी जय-जयकार करते हुये चले गये I यह प्रसंग सुनाकर गर्ग ऋषि ने कहा कि हे राजकुमार यदि आप भी अपने अभिमत में सफल होना चाहते हैं तो भगवान दत्तात्रेय जी की सेवा में उपस्थित होइए I
ऋषि गर्ग का यह कथन सुनकर कार्तवीर्य अर्जुन भगवान दत्तात्रेय की सेवा में उपस्थित हुये और तन, मन, धन, अर्पित कर क्षत्रिय धर्म को रखते हुये विनय और शास्त्र ज्ञान के अनुसार दत्तचित होकर भक्तिभाव से उनकी पूजा अर्चना में लग गये I अत्रि पुत्र दत्त की दुष्कर आराधना और सेवावृत्ति को देखकर दत्तात्रेय जी प्रसन्न हुये और उन्होंने वरदान मांगने को कहा I तब कार्तवीर्य ने कहा कि हे भगवान मुझे उत्तम सिद्धि का वरदान दीजिये I मुझमें अणिमा- लाघिमादी सिद्धियों का समावेश हो (वह सिद्धि जिसके द्वारा योगी अतिसूक्ष्म रूप धारण कर सकता है, लघुभाव प्राप्त करना हाथ की सफाई आदि की सिद्धियाँ) मुझे ज्ञान शक्ति और पौरुष में कोई न जीत सके I मै दान दक्षिणा करने में तथा भगवान कि अविचल भक्ति में मनसा-वाचा-कर्मणा में रात रहूँ I मैं अपने पराक्रम से सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतकर स्वधर्म पालन द्वारा सत्य एवं सन्मार्ग का पालन करते हुये प्रजा को सुखी एवं प्रसन्न रखूं I मैं कभी सन्मार्ग का परित्याग करके यदि असत्य मार्ग का आश्रय लेकर अधर्म कार्य में प्रवत्त होऊं तो श्रेष्ट पुरुष मुझे सन्मार्ग पर लाने के लिये शिक्षा दें I मैं सहस्त्रबाहु बन जाऊं और सहस्त्रार्जुन कहलाऊं I युद्ध में मेरी सहस्त्रभुजाएँ हो जावें, किंतु घर पर मेरी दो ही भुजाएँ रहें और रण भूमि में सभी सैनिक मेरी एक हज़ार भुजाएँ देखें I संग्राम में हजारों शत्रुओं को मौत के घाट उतर कर संग्राम में ही लड़ते हुए जो मुझसे अधिक शक्तिशाली और श्रेष्ट पुरुष हो उसके हाथों मेरी म्रत्यु हो I पदमपुराण में कहा गया है कि कार्तवीर्य अर्जुन ने दत्तात्रेय जी से जो वरदान मांगे उनमे विशेषकर एक वरदान उल्लेखनीय यह भी था कि “मेरे राज्य में लोगों को अधर्म कि बात सोचते हुए भी मुझसे भय हो और वे अधर्म के मार्ग से हट जाए I “ इस वरदान के करण कार्तवीर्य अर्जुन के राज्य में यदि किसी भी मनुष्य ने अधर्म कि बात मन में सोचने का ध्यान करता तो उसी समय उसे राजा का भय हो जाता था I इससे राज्य में अमन चैन, सुख और शांति व्याप्त रहती थी और राजा का शासन सुचारू रूप से चलता रहता था I भगवान दत्तात्रेय को प्रश्न करने के लिये राजा ने “भद्रदीप प्रतिष्ठा यज्ञ” का धार्मिक आयोजन किया था I
ब्रह्माण्ड पुराण में बताया गया है कि जब कार्तवीर्य अर्जुन राजधानी महिष्मति में राज्य कर रहे थे तब एक समय देवर्षि नारद जी ने महिष्मति नगरी में आकर राजा को दर्शन दिये I राजा ने ह्रदय से यथोचित उनका स्वागत किया और उनसे मोक्ष और दृव्य आनंद का मार्ग बतलाने के लिये निवेदन किया I नारद जी ने तब महाराज सहस्त्रबाहु को ” भद्रदीप प्रतिष्ठा यज्ञ ” का धार्मिक आयोजन करने के लिये उपदेश दिया था I महाराज कार्तवीर्य ने अपनी महारानी के साथ नर्मदा तट पर विधिवत ” भद्रदीप प्रतिष्ठा यज्ञ ” का धार्मिक आयोजन किया I यज्ञ के समापन के पश्चात् राजा के गुरु भगवान दत्तात्रेय प्रसन्न हुये और राजा से वरदान मांगने के लिये कहा I राजा ने हाथ जोड़कर एक हज़ार हाथ हो जाने का वरदान माँगा I भगवान दत्तात्रेय ने कार्तवीर्य अर्जुन को वरदान देते हुये “तथास्तु” कहते हुए कहा कि ऐसा ही होगा और यह भी कहा कि ” तुम चक्रवर्ती सम्राट बनोगे तथा जो व्यक्ति सायं और प्रातः काल ” नमोस्तु कार्तवीर्य ” इस वाक्य से तुम्हारा स्मरण करेंगे उन पुरषों का द्रव्य कभी नष्ट नहीं होगा I “ भगवान दत्तात्रेय से वर प्राप्त कर वे धर्म पूर्वक सप्तद्वीप प्रथ्वी का पालन करने लगे और शत्रुओं पर विजय प्राप्त की I उस तेजस्वी राजा के लिये वे सभी वरदान उसी रूप में सफल हुये I उसके पश्चात् कार्तवीर्य अर्जुन ने दत्तात्रेय जी को प्रणाम किया और उनसे विदा ली I
मार्कण्डेय पुराण में कार्तवीर्य को एक हज़ार वर्ष और हरिवंश पुराण में बारह हज़ार वर्ष दत्तात्रेय जी की उपासना करना बतलाया है I

ॐ दिगंबराय विद्महे योगीश्‍राय् धीमही तन्नो दत: प्रचोदयात्,,ॐ ऐं क्रों क्‍लीं क्‍लूं ह्रां ह्रीं ह्रूं सौ:ॐ द्रां दत्तात्रेयाय स्वाहा ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः दत्तात्रेय मंत्रों को बोलने से कोई बिगाड़ नहीं पाता काम,,हिन्दू धर्म में महायोगी व महागुरु के रूप में पूजनीय त्रिदेव स्वरूप माने गए भगवान दत्तात्रेय ज्ञान के जरिए जीवन की सफलता की प्रेरणा देते हैं। धार्मिक दृष्टि से दत्तात्रेय की उपासना ज्ञान, बुद्धि, बल प्रदान करने के साथ शत्रु बाधा दूर कर कार्य में सफलता और मनचाहे परिणामों को देने वाली मानी गई है।
धार्मिक मान्यता है कि भगवान दत्तात्रेय भक्त की पुकार पर शीघ्र प्रसन्न होकर किसी भी रूप में उसकी कामनापूर्ति या संकटनाश करते हैं। यही कारण है कि गुरु भक्ति के दिन गुरुवार की शाम भगवान दत्त की उपासना में विशेष मंत्र का स्मरण बहुत ही शुभ माना गया है। जानिए वे मंत्र व पूजा की सरल विधि -
- गुरुवार की शाम दत्त मंदिर भगवान दत्तात्रेय की प्रतिमा या दत्तात्रेय की तस्वीर पर सफेद चंदन और सुगंधित सफेल फूल चढ़ाकर फल या मिठाई का भोग लगाएं। गुग्गल धूप लगाएं और नीचे लिखे मंत्र से भगवान दत्तात्रेय का स्मरण करें या यथाशक्ति मंत्र जप करें -,,हिंदू धर्म के त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रचलित विचारधारा के विलय के लिए ही भगवान दत्तात्रेय ने जन्म लिया था, इसीलिए उन्हें त्रिदेव का स्वरूप भी कहा जाता है। दत्तात्रेय को शैवपंथी शिव का अवतार और वैष्णवपंथी विष्णु का अंशावतार मानते हैं। दत्तात्रेय को नाथ संप्रदाय की नवनाथ परंपरा का भी अग्रज माना है। यह भी मान्यता है कि रसेश्वर संप्रदाय के प्रवर्तक भी दत्तात्रेय थे। भगवान दत्तात्रेय से वेद और तंत्र मार्ग का विलय कर एक ही संप्रदाय निर्मित किया था।,दत्तविद्याठ्य लक्ष्मीशं दत्तस्वात्म स्वरूपिणे।गुणनिर्गुण रूपाय दत्तात्रेय नमोस्तुते।।,,या इस मंत्र का जप करें -,ॐ द्रां दत्तात्रेयाय स्वाहा- पूजा व मंत्र जप के बाद आरती करें और सफलता और कामनापूर्ति की प्रार्थना करें।

श्री दत्तात्रेय उपासना
भगवान शंकर का साक्षात रूप महाराज दत्तात्रेय में मिलता है,और तीनो ईश्वरीय शक्तियो से समाहित महाराज दत्तात्रेय की आराधना बहुत ही सफ़ल और जल्दी से फ़ल देने वाली है,महाराज दत्तात्रेय आजन्म ब्रह्मचारी,अवधूत,और दिगम्बर रहे थे,वे सर्वव्यापी है,और किसी प्रकार के संकट में बहुत जल्दी से भक्त की सुध लेने वाले है,अगर मानसिक,या कर्म से या वाणी से महाराज दत्तात्रेय की उपासना की जावे तो भक्त किसी भी कठिनाई से बहुत जल्दी दूर हो जाते है.
श्री दत्तात्रेय की उपासना विधि
श्री दत्तात्रेय जी की प्रतिमा,चित्र या यंत्र को लाकर लाल कपडे पर स्थापित करने के बाद चन्दन लगाकर,फ़ूल चढाकर,धूप की धूनी देकर,नैवेद्य चढाकर दीपक से आरती उतारकर पूजा की जाती है,पूजा के समय में उनके लिये पहले स्तोत्र को ध्यान से पढा जाता है,फ़िर मन्त्र का जाप किया आता है,उनकी उपासना तुरत प्रभावी हो जाती है,और शीघ्र ही साधक को उनकी उपस्थिति का आभास होने लगता है,साधकों को उनकी उपस्थिति का आभास सुगन्ध के द्वारा,दिव्य प्रकाश के द्वारा,या साक्षात उनके दर्शन से होता है,साधना के समय अचानक स्फ़ूर्ति आना भी उनकी उपस्थिति का आभास देती है,भगवान दत्तात्रेय बडे दयालो और आशुतोष है,वे कहीं भी कभी भी किसी भी भक्त को उनको पुकारने पर सहायता के लिये अपनी शक्ति को भेजते है.
श्री दत्तात्रेय की उपासना में विनियोग विधि
पूजा करने के आरम्भ में भगवान श्री दत्तात्रेय के लिय आवाहन किया जाता है,एक साफ़ बर्तन में पानी लेकर पास में रखना चाहिये,बायें हाथ में एक फ़ूल और चावल के दाने लेकर इस प्रकार से विनियोग करना चाहिये- “ऊँ अस्य श्री दत्तात्रेय स्तोत्र मंत्रस्य भगवान नारद ऋषि: अनुष्टुप छन्द:,श्री दत्त परमात्मा देवता:, श्री दत्त प्रीत्यर्थे जपे विनोयोग:”,इतना कहकर दाहिने हाथ से फ़ूल और चावल लेकर भगवान दत्तात्रेय की प्रतिमा,चित्र या यंत्र पर सिर को झुकाकर चढाने चाहिये,फ़ूल और चावल को चढाने के बाद हाथों को पानी से साफ़ कर लेना चाहिये,और दोनों हाथों को जोडकर प्रणाम मुद्रा में उनके लिये जप स्तुति को करना चाहिये,जप स्तुति इस प्रकार से है:-”जटाधरं पाण्डुरंगं शूलहस्तं कृपानिधिम। सर्व रोग हरं देव,दत्तात्रेयमहं भज॥”
श्री दत्तात्रेयजी का जाप करने वाला मंत्र
पूजा करने में फ़ूल और नैवेद्य चढाने के बाद आरती करनी चाहिये और आरती करने के समय यह स्तोत्र पढना चाहिये:-
जगदुत्पति कर्त्रै च स्थिति संहार हेतवे। भव पाश विमुक्ताय दत्तात्रेय नमो॓‍ऽस्तुते॥
जराजन्म विनाशाय देह शुद्धि कराय च। दिगम्बर दयामूर्ति दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
कर्पूरकान्ति देहाय ब्रह्ममूर्तिधराय च। वेदशास्त्रं परिज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
ह्रस्व दीर्घ कृशस्थूलं नामगोत्रा विवर्जित। पंचभूतैकदीप्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
यज्ञभोक्त्रे च यज्ञाय यशरूपाय तथा च वै। यज्ञ प्रियाय सिद्धाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
आदौ ब्रह्मा मध्ये विष्णु: अन्ते देव: सदाशिव:। मूर्तिमय स्वरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
भोगलयाय भोगाय भोग योग्याय धारिणे। जितेन्द्रिय जितज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
दिगम्बराय दिव्याय दिव्यरूप धराय च। सदोदित प्रब्रह्म दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
जम्बूद्वीपे महाक्षेत्रे मातापुर निवासिने। जयमान सता देवं दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
भिक्षाटनं गृहे ग्रामं पात्रं हेममयं करे। नानास्वादमयी भिक्षा दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
ब्रह्मज्ञानमयी मुद्रा वक्त्रो चाकाश भूतले। प्रज्ञानधन बोधाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
अवधूत सदानन्द परब्रह्म स्वरूपिणे। विदेह देह रूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
सत्यरूप सदाचार सत्यधर्म परायण। सत्याश्रम परोक्षाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
शूल हस्ताय गदापाणे वनमाला सुकंधर। यज्ञसूत्रधर ब्रह्मान दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
क्षराक्षरस्वरूपाय परात्पर पराय च। दत्तमुक्ति परस्तोत्र दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
दत्तविद्याठ्य लक्ष्मीशं दत्तस्वात्म स्वरूपिणे। गुणनिर्गुण रूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
शत्रु नाश करं स्तोत्रं ज्ञान विज्ञान दायकम।सर्वपाप शमं याति दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
इस स्तोत्र को पढने के बाद एक सौ आठबार “ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ” का जाप मानसिक रूप से करना चाहिये.इसके बाद दस माला का जाप नित्य इस मंत्र से करना चाहिये ” ऊँ द्रां दत्तात्रेयाय स्वाहा”।
दत्त स्वरूप चिंता
ब्रह्मा विष्णु और महेश की आभा में दत्तात्रेय जी का ध्यान सदा कल्याण कारी माना जाता है। गुरु दत्त के रूप में ब्रह्मा दत्त के रूप में विष्णु और शिवदत्त के रूप में भगवान शिव की आराधना करनी अति उत्तम रहती है। काशी नगरी में एक ब्राह्मण रहता था,उसने स्वप्न में देखा कि भगवान शिव के तीन सिर है,और तीनों सिरों से वे बात कर रहे है,एक सिर कुछ कह रहा है दूसरा सिर उसे सुन रहा है और तीसरा सिर उस कही हुयी बात को चारों तरफ़ प्रसारित कर रहा है,जब उसने मनीषियों से इस बात का जिक्र किया तो उन्होने भगवान दत्तात्रेय जी के बारे में उसे बताया। दत्तात्रेयजी का कहीं भी प्रकट होना भी माना जाता है,उनके उपासक गुरु के रूप में उन्हे मानते है,स्वामी समर्थ आदि कितने ही गुरु के अनुगामी साधक इस धरती पर पैदा हुये और अपनी अपनी भक्ति से भगवान दत्तात्रेय जी के प्रति अपनी अपनी श्रद्धा प्रकट करने के बाद अपने अपने धाम को चले गये है।
दत्तात्रेय की गाथा
एक बार वैदिक कर्मों का, धर्म का तथा वर्णव्यवस्था का लोप हो गया था। उस समय दत्तात्रेय ने इन सबका पुनरूद्धार किया था। हैहयराज अर्जुन ने अपनी सेवाओं से उन्हें प्रसन्न करके चार वर प्राप्त किये थे:
1. बलवान, सत्यवादी, मनस्वी, अदोषदर्शी तथा सहस्त्र भुजाओं वाला बनने का
2. जरायुज तथा अंडज जीवों के साथ-साथ समस्त चराचर जगत का शासन करने के सामर्थ्य का।
3. देवता, ऋषियों, ब्राह्मणों आदि का यजन करने तथा शत्रुओं का संहार कर पाने का तथा
4. इहलोक, स्वर्गलोक और परलोक विख्यात अनुपम पुरुष के हाथों मारे जाने का।
* कार्तवीर्य अर्जुन (कृतवीर्य का ज्येष्ठ पुत्र) के द्वारा दत्तात्रेय ने लाखों वर्षों तक लोक कल्याण करवाया। कार्तवीर्य अर्जुन, पुण्यात्मा, प्रजा का रक्षक तथा पालक था। जब वह समुद्र में चलता था तब उसके कपड़े भीगते नहीं थे। उत्तरोत्तर वीरता के प्रमाद से उसका पतन हुआ तथा उसका संहार परशुराम-रूपी अवतार ने किया।
* कृतवीर्य हैहयराज की मृत्यु के उपरांत उनके पुत्र अर्जुन का राज्याभिषेक होने का अवसर आया तो अर्जुन ने राज्यभार ग्रहण करने के प्रति उदासीनता व्यक्त की। उसने कहा कि प्रजा का हर व्यक्ति अपनी आय का बारहवां भाग इसलिए राजा को देता है कि राजा उसकी सुरक्षा करे। किंतु अनेक बार उसे अपनी सुरक्षा के लिए और उपायों का प्रयोग भी करना पड़ता हैं, अत: राजा का नरक में जाना अवश्यंभावी हो जाता है। ऐसे राज्य को ग्रहण करने से क्या लाभ? उनकी बात सुनकर गर्ग मुनि ने कहा-’तुम्हें दत्तात्रेय का आश्रय लेना चाहिए, क्योंकि उनके रूप में विष्णु ने अवतार लिया है।
* एक बार देवता गण दैत्यों से हारकर बृहस्पति की शरण में गये। बृहस्पति ने उन्हें गर्ग के पास भेजा। वे लक्ष्मी (अपनी पत्नी) सहित आश्रम में विराजमान थे। उन्होंने दानवों को वहां जाने के लिए कहा। देवताओं ने दानवों को युद्ध के लिए ललकारा, फिर दत्तात्रेय के आश्रम में शरण ली। जब दैत्य आश्रम में पहुंचे तो लक्ष्मी का सौंदर्य देखकर आसक्त हो गये। युद्ध की बात भुलाकर वे लोग लक्ष्मी को पालकी में बैठाकर अपने मस्तक से उनका वहन करते हुए चल दिये। पर नारी का स्पर्श करने के कारण उनका तेज नष्ट हो गया। दत्तात्रेय की प्रेरणा से देवताओं ने युद्ध करके उन्हें हरा दिया। दत्तात्रेय की पत्नी, लक्ष्मी पुन: उनके पास पहुंच गयी।’ अर्जुन ने उनके प्रभाव विषयक कथा सुनी तो दत्तात्रेय के आश्रम में गये। अपनी सेवा से प्रसन्न कर उन्होंने अनेक वर प्राप्त किये। मुख्य रूप से उन्होंने प्रजा का न्यायपूर्वक पालन तथा युद्धक्षेत्र में एक सहस्त्र हाथ मांगे। साथ ही यह वर भी प्राप्त किया कि कुमार्ग पर चलते ही उन्हें सदैव कोई उपदेशक मिलेगा। तदनंतर अर्जुन का राज्याभिषेक हुआ तथा उसने चिरकाल तक न्यायपूर्वक राज्य-कार्य संपन्न किया।

**भगवान दत्तात्रेय आदि गुरु है नाथ परम्परा के ये आदि गुरु है यह स्तोत्र साधक को हर समय कवचित रखता है जिस से साधक अनेक प्रकार की तामसिक शक्तिओ से सुरक्षित रहता है ग्रह बाधा ,तंत्र बाधा ,कार्य सिद्धि ,सुरक्षा के लिए ये स्तोत्र रामबाण है “स्मरण मात्रेण संसिध्येत दत्तात्रेय जगद्गुरुं ”
दत्तात्रेयाष्टचक्रबीजस्तोत्रम्
दिगंबरं भस्मसुगन्धलेपनं
चक्रं त्रिशूलं डमरुं गदां च ।
पद्मासनस्थं ऋषिदेववन्दितं
दत्तात्रेयध्यानमभीष्टसिद्धिदम् ॥ १॥
मूलाधारे वारिजपद्मे सचतुष्के
वंशंषंसं वर्णविशालैः सुविशालैः ।
रक्तं वर्णं श्रीभगवतं गणनाथं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ २॥
स्वाधिष्ठाने षट्दलपद्मे तनुलिंगे
बालान्तैस्तद्वर्णविशालैः सुविशालैः ।
पीतं वर्णं वाक्पतिरूपं द्रुहिणं तं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ३॥
नाभौ पद्मे पत्रदशांके डफवर्णे
लक्ष्मीकान्तं गरूढारूढं मणिपूरे ।
नीलवर्णं निर्गुणरूपं निगमाक्षं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ४॥
हृत्पद्मांते द्वादशपत्रे कठवर्णे
अनाहतांते वृषभारूढं शिवरूपम् ।
सर्गस्थित्यंतां कुर्वाणं धवलांगं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ५ ॥
कंठस्थाने चक्रविशुद्धे कमलान्ते
चंद्राकारे षोडशपत्रे स्वरवर्णे
मायाधीशं जीवशिवं तं भगवंतं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ६॥
आज्ञाचक्रे भृकुटिस्थाने द्विदलान्ते
हं क्षं बीजं ज्ञानसमुद्रं गुरूमूर्तिं
विद्युत्वर्णं ज्ञानमयं तं निटिलाक्षं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ७॥
मूर्ध्निस्थाने वारिजपद्मे शशिबीजं
शुभ्रं वर्णं पत्रसहस्रे ललनाख्ये
हं बीजाख्यं वर्णसहस्रं तूर्यांतं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ८॥
ब्रह्मानन्दं ब्रह्ममुकुन्दं भगवन्तं
ब्रह्मज्ञानं ज्ञानमयं तं स्वयमेव
परमात्मानं ब्रह्ममुनीद्रं भसिताङ्गं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ९॥

2….नाथ सम्प्रदाय.नाथ शब्द अति प्राचीन है । अनेक अर्थों में इसका प्रयोग वैदिक काल से ही होता रहा है । नाथ शब्द नाथृ धातु से बना है, जिसके याचना, उपताप, ऐश्वर्य, आशीर्वाद आदि अर्थ हैं – “नाथृ नाथृ याचञोपता-पैश्वर्याशीः इति पाणिनी” । अतः जिसमें ऐश्वर्य, आशीर्वाद, कल्याण मिलता है वह “नाथ” है । ‘नाथ’ शब्द का शाब्दिक अर्थ – राजा, प्रभु, स्वामी, ईश्वर, ब्रह्म, सनातन आदि भी है ।
ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्त १२९ में नाथ के बारे में कहा गया है कि -
को अद्धावेदः कः इह, प्रवोचस्कतु आजातकुत इयं वि सृष्टि ।
आवीग्देवा अस्य विसर्जने नाथा, को वेदयत आवाभूय शंभूयति ।।
अर्थात् – यह सृष्टि कहाँ से हुई ? इस तत्त्व को कौन जानता है ? किसके द्वारा हुई ? क्यों हुई ? कब से हुई ? इत्यादि विषय के समाधानकर्ता व पथ-दृष्टा नाथ ही हैं ।
इस प्रकार प्राचीनतम ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ में ‘नाथ’ का प्रयोग सृष्टिकर्ता, ज्ञाता तथा सृष्टि के निमित्त रुप में मिलता है । ‘अथर्ववेद’ में भी ‘नाथ’ एवं ‘नाथित’ शब्दों का प्रयोग मिलता है ।
नाथ सम्प्रदाय के विश्वकोष ‘गोरक्ष-सिद्धान्त-संग्रह′ में उद्धृत ‘राजगुह्य’ एवं शक्ति संगम तंत्र’ ग्रन्थों में नाथ शब्द की व्याख्या दी गई हैं । ‘राज-गुह्य’ के अनुसार ‘नाथ’ शब्द में ‘ना’ का अर्थ है – ‘अनादि रुप’ और ‘थ’ का अर्थ है – ‘(भुवन त्रय) का स्थापित होना’ ।
नाकारोऽनादि रपं थकारः स्थापते सदा ।
भुवन-त्रयमेवैकः श्री गोरक्ष नमोऽस्तुते ।।
इस कारण नाथ सम्प्रदाय का स्पष्टार्थ वह अनादि धर्म है, जो भुवन-त्रय की स्थिति का कारण है । श्री गोरक्ष को इसी कारण से ‘नाथ’ कहा जाता है । ‘शक्ति-संगम-तंत्र’ के अनुसार ‘ना’ शब्द का अर्थ – ‘नाथ ब्रह्म जो मोक्ष-दान में दक्ष है, उनका ज्ञान कराना हैं’ तथा ‘थ’ का अर्थ है – ‘ज्ञान के सामर्थ्य को स्थगित करने वाला’ -
श्री मोक्षदान दक्षत्वान् नाथ-ब्रह्मानुबोधनात् ।
स्थगिताज्ञान विभवात श्रीनाथ इति गीयते ।।
चूंकि नाथ के आश्रयण से इस नाथ ब्रह्म का साक्षात्कार होता है और अज्ञान की वृद्धि स्थगित होती है, इसी कारण नाथ शब्द व्यवहृत किया जाता है ।
संस्कृत टीकाकार मुनिदत्त ने ‘नाथ’ शब्द को ‘सतगुरु’ के अर्थ में ग्रहण किया है । ‘गोरखबाणी’ में सम्पादित रचनाओं में नाथ शब्द दो अर्थों में व्यवहृत हैं । (१) रचयिता के रुप में तथा (२) परम तत्त्व के रुप में । ‘गोरक्ष-सिद्धान्त-संग्रह′ ग्रन्थ के प्रथम श्लोक में सगुण और निर्गुण की एकता को ‘नाथ’ कहा गया है -
निर्गुणवामभागे च सव्यभागे उद्भुता निजा ।
मध्यभागे स्वयं पूर्णस्तस्मै नाथाय ते नमः ।।
नेपाल के योगीराज नरहरिनाथ शास्त्री के अनुसार ‘नाथ’ शब्द पद ईश्वर वाचक एवं ब्रह्म वाचक है । ईश्वर की विभूतियाँ जिस रुप में भी जगत में विद्यमान हैं, प्रायः सब नाथ के नाम से प्रसिद्ध हैं । जैसे – आदिनाथ, पशुपतिनाथ, गोरक्षनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, गणनाथ, सोमनाथ, नागनाथ, वैद्यनाथ, विश्वनाथ, जगन्नाथ, रामनाथ, द्वारकानाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ, अमरनाथ, एकलिंगनाथ, पण्डरीनाथ, जालंधरनाथ आदि असंख्य देवता हैं । उनकी पावन स्मृति लेकर नाथ समाज (नाथ सम्प्रदाय) ‘नाथान्त’ नाम रखता है ।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी की भावना रखी जाती है । नाथ सम्प्रदाय के सदस्य उपनाम जो भी लगते हों, किन्तु मूल आदिनाथ, उदयनाथ, सत्यनाथ, संतोषनाथ, अचलनाथ, कंथड़िनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, गोरक्षनाथ, जलंधरनाथ आदि नवनाथ चौरासी सिद्ध तथा अनन्त कोटि सिद्धों को अपने आदर्श पूर्वजों के रुप में मानते हैं । मूल नवनाथों से चौरासी सिद्ध हुए हैं और चौरासी सिद्धों से अनन्त कोटि सिद्ध हुए । एक ही ‘अभय-पंथ’ के बारह पंथ तथा अठारह पंथ हुए । एक ही निरंजन गोत्र के अनेक गोत्र हुए । अन्त में सब एक ही नाथ ब्रह्म में लीन होते हैं । सारी सृष्टि नाथब्रह्म से उत्पन्न होती है । नाथ ब्रह्म में स्थित होती हैं तथा नाथ ब्रह्म में ही लीन होती है । इस तत्त्व को जानकर शान्त भाव से ब्रह्म की उपासना करनी चाहिए ।
नवनाथ
नाथ सम्प्रदाय के सबसे आदि में नौ मूल नाथ हुए हैं । वैसे नवनाथों के सम्बन्ध में काफी मतभेद है, किन्तु वर्तमान नाथ सम्प्रदाय के १८-२० पंथों में प्रसिद्ध नवनाथ क्रमशः इस प्रकार हैं -
१॰ आदिनाथ – ॐ-कार शिव, ज्योति-रुप
२॰ उदयनाथ – पार्वती, पृथ्वी रुप
३॰ सत्यनाथ – ब्रह्मा, जल रुप
४॰ संतोषनाथ – विष्णु, तेज रुप
५॰ अचलनाथ (अचम्भेनाथ) – शेषनाग, पृथ्वी भार-धारी
६॰ कंथडीनाथ – गणपति, आकाश रुप
७॰ चौरंगीनाथ – चन्द्रमा, वनस्पति रुप
८॰ मत्स्येन्द्रनाथ – माया रुप, करुणामय
९॰ गोरक्षनाथ – अयोनिशंकर त्रिनेत्र, अलक्ष्य रुप
********चौरासी सिद्ध************
चौरासी सिद्ध
जोधपुर, चीन इत्यादि के चौरासी सिद्धों में भिन्नता है । अस्तु, यहाँ यौगिक साहित्य में प्रसिद्ध नवनाथ के अतिरिक्त ८४ सिद्ध नाथ इस प्रकार हैं -
१॰ सिद्ध चर्पतनाथ, २॰ कपिलनाथ, ३॰ गंगानाथ, ४॰ विचारनाथ, ५॰ जालंधरनाथ, ६॰ श्रंगारिपाद, ७॰ लोहिपाद, ८॰ पुण्यपाद, ९॰ कनकाई, १०॰ तुषकाई, ११॰ कृष्णपाद, १२॰ गोविन्द नाथ, १३॰ बालगुंदाई, १४॰ वीरवंकनाथ, १५॰ सारंगनाथ, १६॰ बुद्धनाथ, १७॰ विभाण्डनाथ, १८॰ वनखंडिनाथ, १९॰ मण्डपनाथ, २०॰ भग्नभांडनाथ, २१॰ धूर्मनाथ ।
२२॰ गिरिवरनाथ, २३॰ सरस्वतीनाथ, २४॰ प्रभुनाथ, २५॰ पिप्पलनाथ, २६॰ रत्ननाथ, २७॰ संसारनाथ, २८॰ भगवन्त नाथ, २९॰ उपन्तनाथ, ३०॰ चन्दननाथ, ३१॰ तारानाथ, ३२॰ खार्पूनाथ, ३३॰ खोचरनाथ, ३४॰ छायानाथ, ३५॰ शरभनाथ, ३६॰ नागार्जुननाथ, ३७॰ सिद्ध गोरिया, ३८॰ मनोमहेशनाथ, ३९॰ श्रवणनाथ, ४०॰ बालकनाथ, ४१॰ शुद्धनाथ, ४२॰ कायानाथ ।
४३॰ भावनाथ, ४४॰ पाणिनाथ, ४५॰ वीरनाथ, ४६॰ सवाइनाथ, ४७॰ तुक नाथ, ४८॰ ब्रह्मनाथ, ४९॰ शील नाथ, ५०॰ शिव नाथ, ५१॰ ज्वालानाथ, ५२॰ नागनाथ, ५३॰ गम्भीरनाथ, ५४॰ सुन्दरनाथ, ५५॰ अमृतनाथ, ५६॰ चिड़ियानाथ, ५७॰ गेलारावल, ५८॰ जोगरावल, ५९॰ जगमरावल, ६०॰ पूर्णमल्लनाथ, ६१॰ विमलनाथ, ६२॰ मल्लिकानाथ, ६३॰ मल्लिनाथ ।
६४॰ रामनाथ, ६५॰ आम्रनाथ, ६६॰ गहिनीनाथ, ६७॰ ज्ञाननाथ, ६८॰ मुक्तानाथ, ६९॰ विरुपाक्षनाथ, ७०॰ रेवणनाथ, ७१॰ अडबंगनाथ, ७२॰ धीरजनाथ, ७३॰ घोड़ीचोली, ७४॰ पृथ्वीनाथ, ७५॰ हंसनाथ, ७६॰ गैबीनाथ, ७७॰ मंजुनाथ, ७८॰ सनकनाथ, ७९॰ सनन्दननाथ, ८०॰ सनातननाथ, ८१॰ सनत्कुमारनाथ, ८२॰ नारदनाथ, ८३॰ नचिकेता, ८४॰ कूर्मनाथ ।………….
***********बारह पंथ***********************
नाथ सम्प्रदाय के अनुयायी मुख्यतः बारह शाखाओं में विभक्त हैं, जिसे बारह पंथ कहते हैं । इन बारह पंथों के कारण नाथ सम्प्रदाय को ‘बारह-पंथी’ योगी भी कहा जाता है । प्रत्येक पंथ का एक-एक विशेष स्थान है, जिसे नाथ लोग अपना पुण्य क्षेत्र मानते हैं । प्रत्येक पंथ एक पौराणिक देवता अथवा सिद्ध योगी को अपना आदि प्रवर्तक मानता है । नाथ सम्प्रदाय के बारह पंथों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है -
१॰ सत्यनाथ पंथ – इनकी संख्या 31 बतलायी गयी है । इसके मूल प्रवर्तक सत्यनाथ (भगवान् ब्रह्माजी) थे । इसीलिये सत्यनाथी पंथ के अनुयाययियों को “ब्रह्मा के योगी” भी कहते हैं । इस पंथ का प्रधान पीठ उड़ीसा प्रदेश का पाताल भुवनेश्वर स्थान है ।
२॰ धर्मनाथ पंथ – इनकी संख्या २५ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक धर्मराज युधिष्ठिर माने जाते हैं । धर्मनाथ पंथ का मुख्य पीठ नेपाल राष्ट्र का दुल्लुदेलक स्थान है । भारत में इसका पीठ कच्छ प्रदेश धिनोधर स्थान पर हैं ।
३॰ राम पंथ – इनकी संख्या ६१ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक भगवान् श्रीरामचन्द्र माने गये हैं । इनका प्रधान पीठ उत्तर-प्रदेश का गोरखपुर स्थान है ।
४॰ नाटेश्वरी पंथ अथवा लक्ष्मणनाथ पंथ – इनकी संख्या ४३ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक लक्ष्मणजी माने जाते हैं । इस पंथ का मुख्य पीठ पंजाब प्रांत का गोरखटिल्ला (झेलम) स्थान है । इस पंथ का सम्बन्ध दरियानाथ व तुलनाथ पंथ से भी बताया जाता है ।
५॰ कंथड़ पंथ – इनकी संख्या १० है । कंथड़ पंथ के मूल प्रवर्तक गणेशजी कहे गये हैं । इसका प्रधान पीठ कच्छ प्रदेश का मानफरा स्थान है ।
६॰ कपिलानी पंथ – इनकी संख्या २६ है । इस पंथ को गढ़वाल के राजा अजयपाल ने चलाया । इस पंथ के प्रधान प्रवर्तक कपिल मुनिजी बताये गये हैं । कपिलानी पंथ का प्रधान पीठ बंगाल प्रदेश का गंगासागर स्थान है । कलकत्ते (कोलकाता) के पास दमदम गोरखवंशी भी इनका एक मुख्य पीठ है ।
७॰ वैराग्य पंथ – इनकी संख्या १२४ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक भर्तृहरिजी हैं । वैराग्य पंथ का प्रधान पीठ राजस्थान प्रदेश के नागौर में राताढुंढा स्थान है । इस पंथ का सम्बन्ध भोतंगनाथी पंथ से बताया जाता है ।
८॰ माननाथ पंथ – इनकी संख्या १० है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक राजा गोपीचन्द्रजी माने गये हैं । इस समय माननाथ पंथ का पीठ राजस्थान प्रदेश का जोधपुर महा-मन्दिर नामक स्थान बताया गया है ।
९॰ आई पंथ – इनकी संख्या १० है । इस पंथ की मूल प्रवर्तिका गुरु गोरखनाथ की शिष्या भगवती विमला देवी हैं । आई पंथ का मुख्य पीठ बंगाल प्रदेश के दिनाजपुर जिले में जोगी गुफा या गोरखकुई नामक स्थान हैं । इनका एक पीठ हरिद्वार में भी बताया जाता है । इस पंथ का सम्बन्ध घोड़ा चौली से भी समझा जाता है ।
१०॰ पागल पंथ – इनकी संख्या ४ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक श्री चौरंगीनाथ थे । जो पूरन भगत के नाम से भी प्रसिद्ध हैं । इसका मुख्य पीठ पंजाब-हरियाणा का अबोहर स्थान है ।
११॰ ध्वजनाथ पंथ – इनकी संख्या ३ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक हनुमानजी माने जाते हैं । वर्तमान में इसका मुख्य पीठ सम्भवतः अम्बाला में है ।
१२॰ गंगानाथ पंथ – इनकी संख्या ६ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक श्री भीष्म पितामह माने जाते हैं । इसका मुख्य पीठ पंजाब में गुरुदासपुर जिले का जखबार स्थान है ।
कालान्तर में नाथ सम्प्रदाय के इन बारह पंथों में छह पंथ और जुड़े – १॰ रावल (संख्या-७१), २॰ पंक (पंख), ३॰ वन, ४॰ कंठर पंथी, ५॰ गोपाल पंथ तथा ६॰ हेठ नाथी ।
इस प्रकार कुल बारह-अठारह पंथ कहलाते हैं । बाद में अनेक पंथ जुड़ते गये, ये सभी बारह-अठारह पंथों की उपशाखायें अथवा उप-पंथ है । कुछ के नाम इस प्रकार हैं – अर्द्धनारी, अमरनाथ, अमापंथी। उदयनाथी, कायिकनाथी, काममज, काषाय, गैनीनाथ, चर्पटनाथी, तारकनाथी, निरंजन नाथी, नायरी, पायलनाथी, पाव पंथ, फिल नाथी, भृंगनाथ आदि ।

नाथ सम्प्रदाय प्राचीन काल से चले आ रहे नाथ संप्रदाय को गुरु मच्छेंद्र नाथ और उनके शिष्य गोरखनाथ ने पहली दफे व्यवस्था दी। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय
की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया। गुरु और शिष्य
को तिब्बती बौद्ध धर्म में महासिद्धों के रुप में जाना जाता है। परिव्रराजक का अर्थ होता है घुमक्कड़। नाथ साधु-संत
दुनिया भर में भ्रमण करने के बाद उम्र के अंतिम चरण में
किसी एक स्थान पर रुककर अखंड धूनी रमाते हैं या फिर
हिमालय में खो जाते हैं। हाथ में चिमटा, कमंडल, कान में कुंडल,
कमर में कमरबंध, जटाधारी धूनी रमाकर ध्यान करने वाले नाथ
योगियों को ही अवधूत या सिद्ध कहा जाता है। ये योगी अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे ‘सिले’ कहते हैं।
गले में एक सींग की नादी रखते हैं। इन दोनों को ‘सींगी सेली’
कहते हैं। इस पंथ के साधक लोग सात्विक भाव से शिव की भक्ति में
लीन रहते हैं। नाथ लोग अलख (अलक्ष) शब्द से शिव का ध्यान
करते हैं। परस्पर ‘आदेश’ या आदीश शब्द से अभिवादन करते हैं।
अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या परम पुरुष होता है।
जो नागा (दिगम्बर) है वे भभूतीधारी भी उक्त सम्प्रदाय से
ही है, इन्हें हिंदी प्रांत में बाबाजी या गोसाई समाज का माना जाता है। इन्हें बैरागी,
उदासी या वनवासी आदि सम्प्रदाय का भी माना जाता है। नाथ
साधु-संत हठयोग पर विशेष बल देते हैं। इन्हीं से आगे चलकर चौरासी और नवनाथ माने गए जो निम्न
हैं:- प्रारम्भिक दस नाथ आदिनाथ, आनंदिनाथ, करालानाथ, विकरालानाथ, महाकाल
नाथ, काल भैरव नाथ, बटुक नाथ, भूतनाथ, वीरनाथ और
श्रीकांथनाथ। इनके बारह शिष्य थे जो इस क्रम में है- नागार्जुन,
जड़ भारत, हरिशचंद्र, सत्यनाथ, चर्पटनाथ, अवधनाथ,
वैराग्यनाथ, कांताधारीनाथ, जालंधरनाथ और मालयार्जुन नाथ। चौरासी और नौ नाथ परम्परा आठवी सदी में 84 सिद्धों के साथ बौद्ध धर्म के महायान के
वज्रयान की परम्परा का प्रचलन हुआ। ये सभी भी नाथ ही थे।
सिद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के अनुयायी सिद्ध कहलाते थे।
उनमें से प्रमुख जो हुए उनकी संख्या चौरासी मानी गई है। नौ नाथ गुरु : 1.मच्छेंद्रनाथ 2.गोरखनाथ 3.जालंधरनाथ 4.नागेश
नाथ 5.भारती नाथ 6.चर्पटी नाथ 7.कनीफ नाथ 8.गेहनी नाथ
9.रेवन नाथ। इसके अलावा ये भी हैं: 1. आदिनाथ 2. मीनानाथ 3.
गोरखनाथ 4.खपरनाथ 5.सतनाथ 6.बालकनाथ 7.गोलक नाथ
8.बिरुपक्षनाथ 9.भर्तृहरि नाथ 10.अईनाथ 11.खेरची नाथ
12.रामचंद्रनाथ। ओंकार नाथ, उदय नाथ, सन्तोष नाथ, अचल नाथ, गजबेली नाथ,
ज्ञान नाथ, चौरंगी नाथ, मत्स्येन्द्र नाथ और गुरु गोरक्षनाथ।
सम्भव है यह उपयुक्त नाथों के ही दूसरे नाम है। बाबा शिलनाथ,
दादाधूनी वाले, गजानन महाराज, गोगा नाथ, पंढरीनाथ और साईं
बाब को भी नाथ परंपरा का माना जाता है। उल्लेखनीय है
कि भगवान दत्तात्रेय को वैष्णव और शैव दोनों ही संप्रदाय का माना जाता है, क्योंकि उनकी भी नाथों में
गणना की जाती है। भगवान भैरवनाथ भी नाथ संप्रदाय के अग्रज
माने जाते हैं।

नाथ गुरू मछेन्दरनाथ ने साम्ब सदाशिव से शाक्त तंत्र सीखा
नव नाथों में श्रीआदिनाथ साम्ब सदाशिव से सीधे शाक्त तंत्र सीखनेवाले मत्स्येन्द्रनाथ (लोक में प्रचलित मछेन्दर नाथ) रहे। गोरक्षविजय, मीन चेतना ग्रन्थों के अनुसार सदाशिव ने मत्स्येन्द्रनाथ को शाप दिया कि निर्णायक समय उनको इस सर्वशक्तिमान शक्ति विद्या का ज्ञान नहीं रहेगा।
आगम ग्रन्थों के अनुसार इसलिए महिलाओं के देश, कामरूप अथवा काडाली में नाथ गुरू मत्स्येन्द्रनाथ तांत्रिक शक्तियां भूलकर राग रंग में डूब गए। गोरक्षविजय में लिखा है कि गुरू गोरक्षनाथ (गोरखनाथ) ने अपनी अन्तदृष्टि से, अपने गुरू मछेन्द्रनाथ की दारूण दशा देखी। प्रकारान्तर में गुरू गोरखनाथ महिला नृत्य मण्डली में शामिल होकर रानी के दरबार में पहुंचे। दरबार में मृदंग में से ‘जाग मछन्दर गोरख आया’ के स्वर ने मोहपाश में बंधे, गुरू मछेन्दरनाथ को सत्य का ज्ञान करवाया।
पश्चिम के विद्वानों ने नाथ गुरू मत्स्येन्द्रनाथ के काल को लेकर विरोधाभाष पैदा किया है। प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के महापण्डित दामोदर धर्मानन्द कौशम्बी ने अपनी शोध में तथ्य और प्रमाणों के आधार पर पाया कि नवनाथों में गुरू योगी भर्तृहरि नाथ (भरथरी नाथ) तीसरी शताब्दी के रहे। योगी भर्तृहरि शिवस्वरूप गोरक्षनाथ के शिष्य थे। परिणामतः हठ योग के प्रवर्तक गुरू गोरखनाथ का काल संबोधिप्राप्त गौतम तथागत (बुद्ध) और महावीर के समकालीन था।
जगदगुरू शंकराचार्य की कांची काम कोटीपीठम द्वारा प्रकाशित कांची महामात्य के अनुसार आदि शंकराचार्य का समय काल ईसा पूर्व तीसरी या चौथी शती था।
दूसरे शब्दों में आदिशंकराचार्य, गुरू गोरक्षनाथ, संबोधि बुद्ध, महावीर चारों ही समकालीन रहे। कुछ पौराणिक मीठी कथाओं के अनुसार मर्यादा पुरूषोत्तम राम और आध्यात्म एवं नीति ग्रंथ के महारचियता वशिष्ठ गुरू के काल के, मध्य में राजा उधोधर के शुक्राणु से मछेन्द्रनाथ का जन्म हुआ। संगलद्वीप की दो रानियों ने तांत्रिक शक्तियों से मछेन्दरनाथ को रनिवास में बंधित किया। गोरक्षनाथ मक्खी के रूप में महल में घुसे और मछेन्दनाथ को छुडाकर लाऐ।
काश्मीर के धार्मिक आख्यान तन्त्रालोक के अनुसार, योग के प्रवर्तक सदाशिव ने युग के प्रारम्भ में मत्स्येन्द्रनाथ को सीधे तंत्र ज्ञान दिया। अतः वे काली तंत्र काल के योगनाथ थे। उन्हे मच्छन्दा, मछेन्द्रा, मछिन्द्रा, मच्छघनपदा, मीनपाद, मीननाथ आदि नामों से सम्बोधित किया गया। काश्मीर तंत्र को अदभुत रचनाओं कौलज्ञाननिर्णय, अकुलवीरतंत्र, कुलानन्दतंत्र, ज्ञान कारिका, कामख्यागुहा सिद्धि, मत्स्येन्द्र संहिता, महार्थमंजरी आदि की रचना नाथ गुरू मत्स्येन्द्रनाथ ने की। उत्तरपूर्व के नगा मानते हैं कि मत्स्येन्द्र नाथ नगा थे। नगा आख्यानों में आदिवासी परम्परा के राजा चोल ने मत्स्येन्द्र नाथ से दीक्षा ली। कहीं कहीं राज चोल को चैलेन्द्रनाथ लिखा है। चैलेन्द्रनाथ कदली देश (केले के वन में) मछन्दरनाथ से मिले।
तिब्बती के दपांग बसम गोन बजन्स आध्यात्मिक ग्रंथ में ‘केवट’ परिवार से महान संत ना-इतो-पा अर्थात लुई पा का उल्लेख है। लुई पा ने महासिद्ध शवरीपा से दीक्षा ली। लुई पा को 84 सिद्धियां प्राप्त की। तिब्बती शब्द नाम ना-इतो-पा का संस्कृत अनुवाद मत्स्येन्द्र नाथ है। तिब्बत के धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार लुई पा को कामरूप में साक्षात सदाशिव महादेव ने तांत्रिक सिद्धी दी। मत्स्येन्द्र नाथ का शरीर वज्र के समान होने से उन्हें वज्र पा भी कहा गया। स्कन्द पुराण के नागरखण्ड में लिखा है कि प्राकृतिक आपदा में उनके परिवार ने उन्हे बचाने के लिए समुद्र में फेंक दिया। समुद्र में बृहद मछली उन्हे निगल गई। उस समय सदाशिव अपनी शिवा भवानी पार्वती एवं पुत्र कार्तिकेय के साथ श्वेतद्वीप के रामायका पर्वत पर गए। यह पर्वत दूध के समुद्र से घिरा था।
पर्वत शिखर पर सदाशिव ने पार्वती को काली तंत्र, ध्यान योग, ज्ञान योग का रहस्यमय ज्ञान दिया। उसी समय महामछली उछली। मछली के पेट में फंसे बच्चे ने बताया कि गंदान्तयोग से उत्पन्न हुआ है और ज्ञान योग सुना है। सदाशिव नन्हे बालक से बहुत प्रसन्न हुए। सदाशिव ने कहा कि तुम विप्र हो, मेरे पुत्र के समान हो। समूचि शक्ति लगाकर मछली से बाहर निकलकर मेरे पास आओ। जगतजननी शक्ति स्वरूपा पार्वती ने बच्चे को गोद में उठाया। सदाशिव-पार्वती शिशु को आकाश मार्ग से पवित्र मंदार पर्वत ले गए। जहां उन्हे मत्स्येन्द्र नाथ नाम मिला।
नेपाल में मत्स्येन्द्रनाथ को संबोधि बुद्ध का अवलोकितेश्वर अवतार मानकर पूजा करते हैं। नेपाल की संस्कृति में बुगमा पर्वत पर मछेन्द्रनाथ की अर्चना की जाती है। मछेन्द्रनाथ दक्षिण नेपाल में कामारी पर्वत की निरन्तर यात्रा करते थे। एक बार उनके महान शिष्य गोरक्ष नाथ नेपाल आये। परन्तु नेपाल के पहाडों के कारण वे मछेन्दर नाथ तक नहीं पहुंच सके। इससे गोरक्षनाथ ने नेपाल को सबक सीखाने की ठानी। गोरक्षनाथ ने सात नागों को वशीकृत कर कछुए के नीचे दबाकर साधना शुरू की। परिणामतः नेपाल में 12 वर्ष तक वर्षा नहीं हुई। राजा नरेन्द्रदेव वर्षा नहीं होने का कारण जानते थे। राजा नरेन्द्रदेव असम्भव चढाई के पर्वतों से गुरू मत्स्येन्द्र नाथ को लेने गए।
राजा नरेन्द्रदेव की कापोटाला में पूजा से अवलोकितेश्वर प्रसन्न होकर प्रकट हुए। अवलोकितेश्वर ने राजा नरेन्द्रदेव को गोपनीय मंत्री दिया। निर्देशों के अनुसार दिव्य शक्तिमान मंत्री का पाठ भानुदत्त ने शुरू किया और अवलोकितेश्वर खींचे हुए मधुमक्खी के रूप में ‘कमण्डलु’ की ओर गए एवं अन्दर बैठे। भानुदत्त ने राजा को सचेत किया कि कमण्डलु का मुख बंद कर नेपाल चलें। इसे बुगमा पर्वत पर स्थापित किया गया। कौलज्ञान निर्णय में भृगपदा का उल्लेख मिलता है। अवलोकितेश्वर के आते ही वर्षा शुरू हुई। बुद्ध पुराण में भी मत्स्येन्द्रनाथ, गोरक्षनाथ का विवरण है।
ब्राह्मण ग्रंथों में लिखा है कि एकबार गोरक्षनाथ गुरू मत्स्येन्द्र नाथ के पीछे नेपाल गए। नेपाल में आतिथ्य नहीं होने से गोरक्षनाथ ने अपने नाग रक्षित आसन के नीचे बादल छिपा लिए। जिससे वर्षा नहीं हुई। नेपाल को बचाने के लिए मछेन्दरनाथ गए। गुरू मछेन्दर को देखते ही गोरख चरण स्पर्श को उठे और वर्षा हुई। इस प्रकार कमण्डलु से मछेन्द्रनाथ और प्रकारान्तर में गोरखनाथ नेपाल गए और पूजित हुए।
कौलज्ञाननिर्णय कुलागम तन्त्र का रहस्य सदाशिव ने भगवती पार्वती को चन्द्रद्वीप पर दिया। काश्मीर में मछेन्द्रनाथ को पांचवी, छठवीं शती का माना जाता है। क्योंकि तंत्रलोक रचियता अभिनवगुप्त का काल पांचवी शती माना गया। आश्चर्यजनक यह है कि संबोधि तथागत, महावीर भी मछेन्द्रनाथ, गोरखानाथ की भांति हठयोग के अध्येता रहे।

शिव आदेश
ॐ अलख निरंजन शिव को आदेश।
अविगत महापुरुष मूल पुरुष पुरुषोत्तम आद पुरुष शिव को आदेश। ज्योति-परमज्योति-अयोनि रूद्र शिव को आदेश। विशूनी विश्वमूर्ति पाताल ग्रहणी शिव को आदेश। मुखेवेद पुराण नासिका गंगा – जमना – सरस्वती शिव को आदेश। ललाटी चंद मस्तके त्रिकुटा देवता धारी शिव को आदेश। नक्षत्री माला अठारह भार वनस्पती हृदय के तैतीस करोड़ देवता धारी शिव को आदेश। सेली सिंगी मीन मेखला बाघाम्बरधारी रोम – रोम सप्त सागरा शिव को आदेश। शिव के बायीं ओर निर्गुण ब्रहम् दाहिनी ओर शक्ति महामाया बीच में स्वयं पूर्ण अखण्ड ज्योति स्वरूप शिव को आदेश। विभूति धारी बीज मंत्र घोर मंत्र अघोर मंत्र क्षीर मंत्र गायत्री मंत्र अभय जाप तंत्र – मंत्र स्वरूप शिव को आदेश। नर – नारी भूत – प्रेत यक्ष किन्नर इन्द्रादि देवता ब्रह्माण्ड व्यापक शिव को आदेश। साधु – संत योगी – ज्ञानी तपस्वी त्यागी अवधूत हर भक्त के ईष्ट शिव को आदेश। जीवों का आराध्या शिव को आदेश। सूक्ष्म में सूक्ष्म विराटों में व्यापक महातत्त्व शिव को आदेश। सृष्टि उत्पत्ति संहार पालन पंच महातत्त्व शिव को आदेश। चार खानी चार बानी चन्द सूर पवन पानी शिव को आदेश। चराचर सृष्टि का बिज शिव को आदेश। करोड़ों सूर्य प्रकाशनाथ योग आदर्श शिव को आदेश। परमात्मपूर्ण आनंद सर्व शक्तिमान चैतन्य रूप जितेन्द्र मोक्ष कैवल्य मुक्तिदाता भिन्न – अभिन्न शिव को आदेश। महाज्ञानी कृपा साक्षात्कार शिव को आदेश। सर्वनाथ सिद्धों का सतगुरु आदिनाथजि ॐकार शिव को आदेश। इतना शिव सबद निरूपा सम्पूर्ण भया। श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।
श्रीशंभुजती गुरु गोरखनाथ बाल स्वरूप बोलिए। इतना नौ नाथ स्वंरूप मंत्र सम्पूर्ण भया अनन्त कोट सिद्धों में बैठकर गुरु गोरखनाथजि ने कहाया नाथजी गुरुजी आदेश।

शाबर मंत्र, एक ऐसी विधा जिसके बिना प्रत्येक साधक की साधना यात्रा अधूरी हैं, और रहेगी । शाबर मन्त्रो का इतिहास बहुत प्राचीन हैं, मेरी जानकारी मैं सबसे पहले यदि किसी ने शाबर मंत्रो से जग को ही नहीं अपितु देवतओं को भी विवश कर दिया वो थे ” गुरु गोरखनाथ जी ” । शाबर मंत्रो ने उन्हें इतनी शक्ति एवं क्षमता प्रदान की थी कि देवता भी गोरखनाथ जी के सामने नतमस्तक हो जाते थे । शाबर मंत्रो की शक्ति अपने आप मैं अद्वितीय हैं एवं इसका सबसे बड़ा कारण हैं इनकी सरलता, शाबर मंत्र साधारण जीवन की बोल – चाल वाली भाषा से निकले हैं परन्तु निरंतर प्रयास एवं सिद्धो की कृपा से आज यह मंत्र इतने प्रभावी हैं की इनका सही प्रयोग कभी खाली नहीं जाता हैं
शाबर मंत्र जंहा सरलता से पढ़े जा सकते हैं, वंही इनके साथ कुछ सख्त नियम भी बंधे हुए हैं । शाबर मन्त्रो के प्रयोग के समय स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना होता हैं । यह स्वच्छता शरीर के साथ विचारो की भी आवश्यक होती हैं । आप ये विशेष ध्यान रखे की साधना काल मैं किसी से भी झूठ न बोले, किसी के लिए मन मैं व्यर्थ डाह न पाले, ईर्ष्या एवं द्वेष के लिए एक साबर साधना के दौरान कोई स्थान नहीं होता हैं । साधना काल मैं पूर्ण ब्रहमचर्य अति आवश्यक हैं, यह ब्रहमचर्य शारीरिक एवं वैचारिक दोनो रूप से आवश्यक हैं । शाबर मन्त्रो की साधना हमेशा दिशा एवं काल का निर्णय केर के ही प्रारम्भ करनी चाहिए हैं । स्नान कर के साफ़ वस्त्रो का प्रयोग का भी ध्यान रखा जाए ।

नानक जी अन्नपूर्णा मन्त्र
ॐ सत्त नाम का सभी पसारा, धन गगन में जो वर तारा।
मन की जाय जहाँ लग आखा, तहँ तहँ सत्त नाम की राखा।
अन्नपूरना पास गई बैठाली, थुड़ो गई खुसाली।
चिनत मनी कलप तराये। कामधेनु को साथ लियाये।
आया आप कुबेर भण्डारी, साथ लक्ष्मी आज्ञाकारी।
सत गुरू पूरन किया सवारथ, विच आ बइठे पाँच पदारथ।
राखा ब्रह्मा विशनु महेश काली भैरव हनु गनेस,
सिध चैरासी अरू नवनाथ बावन वीर जती चैसाठ।
धाकन गमन पिरथवी का वासन, रहे अम्बोल न डोले आसन।
राखा हुआ आप निरंकार, थुड़ी भाग गई समुन्दरो पार।
अतुत भण्डार, अखुत अपार, खात खरचत कुछ होय न ऊना, देव देवाये दूना चैना।
गुरू की झोली मेरे हाथ, गुरू वचनी बँधे पँच तात।
वेअण्ट बेअण्ट भण्डार, जिनकी पैज रखी करतार।
मन्तर पूरना जी का संपूरन भया।
बाबा नानकजी का गुरू के चरन कमल को नमस्ते नमस्ते नमस्ते।
11 बार प्रतिदिन जप करें। 1000 जप हो जाने पर किसी प्रकार की कमी नहीं होती।

*******श्री गुरु गोरखनाथ का शाबर मंत्र **********
विधि – सात कुओ या किसी नदी से सात बार जल लाकर इस मंत्र का उच्चारण करते हुए रोगी को स्नान करवाए तो उसके ऊपर से सभी प्रकार का किया-कराया उतर जाता है.
मंत्र
ॐ वज्र में कोठा, वज्र में ताला, वज्र में बंध्या दस्ते द्वारा, तहां वज्र का लग्या किवाड़ा, वज्र में चौखट, वज्र में कील, जहां से आय, तहां ही जावे, जाने भेजा, जांकू खाए, हमको फेर न सूरत दिखाए, हाथ कूँ, नाक कूँ, सिर कूँ, पीठ कूँ, कमर कूँ, छाती कूँ जो जोखो पहुंचाए, तो गुरु गोरखनाथ की आज्ञा फुरे, मेरी भक्ति गुरु की शक्ति, फुरो मंत्र इश्वरोवाचा.

*******निम्न मंत्र का जाप किसि भी शनिवार से करे,यह साधना 11 दिन का है,साधना शाम के समय करना अनुकूल है,साधना मे नित्य 108 बार मंत्र जाप आवश्यक है,मंत्र का जब भी स्वयं के लिए प्रयोग करना हो तो 7 बार मंत्र बोलकर जल पे 3 बार फुक मारे और जल को ग्रहण करले दूसरे व्यक्ति के लिये भि यही विधान है,अगर प्रयोग आपके सामने किया जा रहा हो तो तुरंत ही ७ बार मंत्र बोलकर अपने सिने पे ३ फुक मारले……..तो तंत्र-मंत्र का असर नष्ट होता है और किया गया तंत्र-मंत्र करनेवाले पे वापस लौट जाता है……
मंत्र-
जल बाँधो,जलाजल बाँधो । जल के बाँधो कीरा,नौ नगर के राजा बाँधो,टोना के बाँधो जंजीरा । धरमदास कबीर, चकमक धुरी धर के काटे जाम के जूरी । काकर फूँके, मोर फूँके । मोर गुरु धरमदास के फूँके, जिहा से आय हस, वही चले जा, सत गुरु,सत कबीर ।
********चौसठ योगिनी नामस्तोत्रम्:-***********
गजास्या सिंह-वक्त्रा च, गृध्रास्या काक-तुण्डिका ।
उष्ट्रा-स्याऽश्व-खर-ग्रीवा, वाराहास्या शिवानना ॥
उलूकाक्षी घोर-रवा, मायूरी शरभानना ।
कोटराक्षी चाष्ट-वक्त्रा, कुब्जा चविकटानना॥
शुष्कोदरी ललज्जिह्वा, श्व-दंष्ट्रा वानरानना ।
ऋक्षाक्षी केकराक्षी च, बृहत्-तुण्डा सुराप्रिया ॥
कपालहस्ता रक्ताक्षी, शुकी श्येनी कपोतिका ।
पाशहस्ता दंडहस्ता, प्रचण्डा चण्डविक्रमा ॥
शिशुघ्नी पाशहन्त्री च, काली रुधिर-पायिनी।
वसापाना गर्भरक्षा, शवहस्ताऽऽन्त्रमालिका ॥
ऋक्ष-केशी महा-कुक्षिर्नागास्या प्रेतपृष्ठका।
दन्द-शूक-धरा क्रौञ्ची, मृग-श्रृंगा वृषानना ॥
फाटितास्या धूम्रश्वासा, व्योमपादोर्ध्वदृष्टिका ।
तापिनी शोषिणी स्थूलघोणोष्ठा कोटरी तथा ॥
विद्युल्लोला वलाकास्या, मार्जारी कटपूतना।
अट्टहास्या चकामाक्षी, मृगाक्षी चेति ता मताः ॥
फल-श्रुति :-
चतुष्षष्टिस्तुयोगिन्यः पूजिता नवरात्रके।
दुष्ट-बाधां नाशयन्ति, गर्भ-बालादि-रक्षिकाः॥
नडाकिन्यो नशाकिन्यो, न कूष्माण्डा नराक्षसाः ।
तस्य पीड़ांप्रकुर्वन्ति, नामान्येतानि यः पठेत् ॥
बलि-पूजोपहारैश्च, धूप-दीप-समर्पणैः।
क्षिप्रं प्रसन्ना योगिन्यो, प्रयच्छेयुर्मनोरथान् ॥
कृष्णा-चतुर्दशी-रात्रावुपवासी नरोत्तमः ।
प्रणवादि-चतुर्थ्यन्त-नामभिर्हवनं चरेत् ॥
प्रत्येकं हवनं चासां, शतमष्टोत्तरंमतम् ।
स-सर्पिषा गुग्गुलुना, लघु-बदर-मानतः॥
विधि :-
साधक कृष्ण-पक्षकी चतुर्दशी को उपवासकरे।
रात्रि में गुग्गुलऔरघृत सेविभक्तियुक्तप्रत्येकनामके आगे प्रणव ॐलगाकर, प्रत्येकनाम से१०८आहुतियाँ अर्पित करे ।
पूरी तरह शुद्ध होकर, एकाग्र-मनसे जो इन नामों का पाठ करता है । उसे डाकिनी, शाकिनी, कूष्माण्डऔरराक्षसआदि किसी प्रकारकी पीड़ा नहीं होती ।
धूप-दीपादि उपचारों सहित पूजन औरबलि प्रदान करने से योगनियाँ शीघ्र प्रसन्नहोकरसभी कामनाओं को पूरा करती है ।
हवनके लियेचौंसठ योगिनी नाम इस प्रकारहै। प्रत्येक नाम के आदि में ‘ॐ’तथा अन्तमेंस्वाहा लगाकरहवनकरें ॥
ॐगजास्यै स्वाहा ॥ ॐ सिंह-वक्त्रायैस्वाहा ॥ ॐ गृध्रास्यायैस्वाहा ॥ ॐकाक-तुण्डिकायै स्वाहा ॥ ॐ उष्ट्रास्यायैस्वाहा ॥ ॐअश्व-खर-ग्रीवायैस्वाहा ॥ ॐवाराहस्यायै स्वाहा ॥ ॐशिवाननायै स्वाहा ॥ ॐ उलूकाक्ष्यै स्वाहा ॥ ॐ घोर-रवायैस्वाहा ॥ ॐमायूर्यै स्वाहा ॥ ॐशरभाननायै स्वाहा ॥ ॐकोटराक्ष्यै स्वाहा ॥ ॐअष्ट-वक्त्रायै स्वाहा॥ ॐकुब्जायै स्वाहा ॥ ॐविकटाननायै स्वाहा ॥ ॐ शुष्कोदर्यैस्वाहा ॥ ॐललज्जिह्वायैस्वाहा ॥ ॐश्व-दंष्ट्रायैस्वाहा ॥ ॐवानराननायै स्वाहा ॥ ॐ ऋक्षाक्ष्यै स्वाहा ॥ ॐ केकराक्ष्यै स्वाहा ॥ ॐबृहत्-तुण्डायैस्वाहा ॥ ॐसुरा-प्रियायै स्वाहा ॥ ॐकपाल-हस्तायै स्वाहा ॥ ॐरक्ताक्ष्यै स्वाहा ॥ ॐ शुक्यै स्वाहा ॥ ॐश्येन्यैस्वाहा ॥ ॐकपोतिकायै स्वाहा ॥ ॐ पाश-हस्तायै स्वाहा ॥ ॐदण्ड-हस्तायैस्वाहा ॥ ॐप्रचण्डायै स्वाहा ॥ ॐचण्ड-विक्रमायै स्वाहा ॥ ॐशिशुघ्न्यैस्वाहा ॥ ॐपाश-हन्त्र्यै स्वाहा ॥ ॐ काल्यै स्वाहा ॥ ॐरुधिर-पायिन्यै स्वाहा ॥ ॐ वसा-पानायै स्वाहा ॥ ॐगर्भ-भक्षायैस्वाहा ॥ ॐशव-हस्तायै स्वाहा ॥ ॐआन्त्र-मालिकायै स्वाहा ॥ ॐ ऋक्ष-केश्यैस्वाहा ॥ ॐमहा-कुक्ष्यै स्वाहा ॥ ॐ नागास्यायै स्वाहा ॥ ॐप्रेत-पृष्ठकायै स्वाहा ॥ ॐदंष्ट्र-शूकर-धरायै स्वाहा ॥ ॐक्रौञ्च्यैस्वाहा ॥ ॐमृग-श्रृंगायै स्वाहा ॥ ॐवृषाननायै स्वाहा ॥ ॐफाटितास्यायै स्वाहा ॥ ॐ धूम्र-श्वासायै स्वाहा ॥ ॐव्योम-पादायै स्वाहा॥ ॐऊर्ध्व-दृष्टिकायैस्वाहा ॥ ॐतापिन्यै स्वाहा ॥ ॐशोषिण्यै स्वाहा ॥ ॐस्थूल-घोणोष्ठायैस्वाहा ॥ ॐकोटर्यैस्वाहा ॥ ॐविद्युल्लोलायै स्वाहा॥ ॐबलाकास्यायै स्वाहा ॥ ॐमार्जार्यैस्वाहा ॥ ॐकट-पूतनायै स्वाहा ॥ ॐअट्टहास्यायै स्वाहा॥ ॐकामाक्ष्यैस्वाहा ॥ ॐ मृगाक्ष्यै स्वाहा ॥
चौंसठ योगिनी मंत्र:-१. ॐकाली नित्य सिद्धमाता स्वाहा २. ॐकपालिनी नागलक्ष्मी स्वाहा ३. ॐकुला देवी स्वर्णदेहा स्वाहा ४. ॐकुरुकुल्ला रसनाथा स्वाहा ५. ॐविरोधिनी विलासिनी स्वाहा ६. ॐविप्रचित्ता रक्तप्रिया स्वाहा ७. ॐउग्ररक्त भोग रूपा स्वाहा ८. ॐउग्रप्रभा शुक्रनाथा स्वाहा ९. ॐदीपामुक्तिःरक्तादेहा स्वाहा १०.ॐ नीला भुक्ति रक्त स्पर्शा स्वाहा ११.ॐ घना महा जगदम्बा स्वाहा १२.ॐ बलाका काम सेविता स्वाहा १३.ॐ मातृ देवी आत्मविद्या स्वाहा १४.ॐ मुद्रा पूर्णा रजतकृपा स्वाहा १५.ॐ मिता तंत्रकौला दीक्षा स्वाहा १६.ॐ महाकालीसिद्धेश्वरी स्वाहा १७.ॐ कामेश्वरी सर्वशक्तिस्वाहा १८.ॐ भगमालिनी तारिणी स्वाहा १९.ॐ नित्यकलींना तंत्रार्पिता स्वाहा २०.ॐ भेरुण्ड तत्त्व उत्तमा स्वाहा २१.ॐ वह्निवासिनी शासिनि स्वाहा २२.ॐ महवज्रेश्वरी रक्तदेवी स्वाहा २३.ॐ शिवदूती आदिशक्ति स्वाहा २४.ॐ त्वरिता ऊर्ध्वरेतादा स्वाहा २५.ॐ कुलसुंदरी कामिनी स्वाहा २६.ॐ नीलपताका सिद्धिदा स्वाहा २७.ॐ नित्य जनन स्वरूपिणी स्वाहा २८.ॐ विजया देवी वसुदा स्वाहा २९.ॐ सर्वमङ्गला तन्त्रदा स्वाहा ३०.ॐ ज्वालामालिनी नागिनी स्वाहा ३१.ॐ चित्रा देवीरक्तपुजा स्वाहा ३२.ॐ ललिता कन्या शुक्रदा स्वाहा ३३.ॐ डाकिनी मदसालिनी स्वाहा ३४.ॐ राकिनी पापराशिनी स्वाहा ३५.ॐ लाकिनी सर्वतन्त्रेसी स्वाहा ३६.ॐ काकिनी नागनार्तिकी स्वाहा ३७.ॐ शाकिनी मित्ररूपिणीस्वाहा ३८.ॐ हाकिनी मनोहारिणीस्वाहा ३९.ॐ तारायोग रक्ता पूर्णा स्वाहा ४०.ॐ षोडशीलतिका देवी स्वाहा ४१.ॐ भुवनेश्वरी मंत्रिणी स्वाहा ४२.ॐ छिन्नमस्ता योनिवेगा स्वाहा ४३.ॐ भैरवी सत्य सुकरिणी स्वाहा ४४.ॐ धूमावती कुण्डलिनी स्वाहा ४५.ॐ बगलामुखी गुरु मूर्ति स्वाहा ४६.ॐ मातंगी कांटा युवती स्वाहा ४७.ॐ कमला शुक्ल संस्थिता स्वाहा ४८.ॐ प्रकृति ब्रह्मेन्द्री देवी स्वाहा ४९.ॐ गायत्री नित्यचित्रिणी स्वाहा ५०.ॐ मोहिनी माता योगिनी स्वाहा ५१.ॐ सरस्वती स्वर्गदेवी स्वाहा ५२.ॐ अन्नपूर्णी शिवसंगी स्वाहा ५३.ॐ नारसिंही वामदेवी स्वाहा ५४.ॐ गंगा योनि स्वरूपिणी स्वाहा ५५.ॐ अपराजिता समाप्तिदा स्वाहा ५६.ॐ चामुंडा परि अंगनाथा स्वाहा ५७.ॐ वाराही सत्येकाकिनी स्वाहा ५८.ॐ कौमारी क्रिया शक्तिनि स्वाहा ५९.ॐ इन्द्राणी मुक्ति नियन्त्रिणी स्वाहा ६०.ॐ ब्रह्माणी आनन्दा मूर्ती स्वाहा ६१.ॐ वैष्णवी सत्यरूपिणी स्वाहा ६२.ॐ माहेश्वरी पराशक्ति स्वाहा ६३.ॐ लक्ष्मी मनोरमायोनि स्वाहा ६४.ॐ दुर्गा सच्चिदानंद स्वाहा .हीरापुरमें योगिनियो के जिननामों या रूपों का अस्तित्व मिलता है वे इसप्रकारहैं :-
१. बहुरूपा २. तारा ३. नर्मदा ४. यमुना ५. शांति ६. वारुणी ७. क्षेमकरी ८. ऐन्द्री ९. वाराही १०.रणवीरा ११.वानरमुखी १२.वैष्णवी १३.कालरात्रि १४.वैद्यरूपा १५.चर्चिका १६.बेताली १७.छिनमास्तिका १८.वृषभानना १९.ज्वाला कामिनी २०.घटवारा २१.करकाली २२.सरस्वती २३.बिरूपा २४.कौबेरी २५.भालुका २६.नारसिंही २७.बिराजा २८.विकटानन २९.महालक्ष्मी ३०.कौमारी ३१.महामाया ३२.रति ३३.करकरी ३४.सर्पश्या ३५.यक्षिणी ३६.विनायकी ३७.विन्द्यावालिनी ३८.वीरकुमारी ३९.माहेश्वरी ४०.अम्बिका ४१.कामायनी ४२.घटाबारी ४३.स्तुति ४४.काली ४५.उमा ४६.नारायणी ४७.समुद्रा ४८.ब्राह्मी ४९.ज्वालामुखी ५०.आग्नेयी ५१.अदिति ५२.चन्द्रकांति ५३.वायुबेगा ५४.चामुंडा ५५.मूर्ति ५६.गंगा ५७.धूमावती ५८.गांधारी ५९.सर्वमंगला ६०.अजिता ६१.सूर्य पुत्री ६२.वायुवीणा ६३.अघोरा ६४.भद्रकाली प्रमुखमंदिर:- मंदिरों के हिसाबसे देखा जाये तो चौसठ योगिनियों के २प्रमुखमंदिरउड़ीसा राज्य मेंऔर२प्रमुख मंदिर मध्य प्रदेश में अवस्थितहैं!
उड़ीसा:-
१. एक प्रमुखमंदिर उड़ीसा मेंनवीं शताब्दी में निर्मित हुआ था जो खुर्दा डिस्ट्रिक्ट हीरापुरमें भुवनेश्वरसे १५ किलोमीटरकि दूरी पर स्थित है ! २. दूसरा चौंसठ योगिनी मंदिर (रानीपुरझरिअल )टिटिलागढ़ बलांगीरडिस्ट्रिक्ट मेंस्थित है लेकिनइस मंदिरमें ६४ के बजायअब ६२मूर्तियां ही उपलब्धहैं !
मध्य प्रदेश :-
१. नविनशताब्दी में ही निर्मित एकमंदिरमध्य प्रदेश के खजुराहो नामक स्थान परहै जो छतरपुरडिस्ट्रिक्ट में पड़ता है औरयहाँपहुँचने केलिएझाँसी से इलाहबाद वाली रेलवे लाइन से जाकरमहोबा स्टेशन परउतरने के बाद लगभग६० किलोमीटरका सफ़र तय करनेके बाद खजुराहो पहुंचा जा सकता है
२. दूसरा मंदिरमध्य प्रदेश में ही भेड़ाघाट नमकस्थलपरहै जो कि मध्य प्रदेश के जबलपुर डिस्ट्रिक्ट में पड़ता है
अन्य :- स्थान स्थान पर इनके रूपऔरस्थित मेंभेद दृष्टिगतहो सकता हैजैसेकि :-
१. हीरापुरमें सभीयोगिनियां अपने-२वाहनोंपरसवारहैं और खड़ी मुद्रा में हैं २. रानीपुरझरिअल मेंसभी योगिनियांनृत्य मुद्रा में हैं ३. जबकि भेड़ाघाट में सभी मूर्तियां ललितासन में बैठी हुयी हैं चौंसठ योगिनी पूजन एक श्वेत वस्त्रपररोली सेचौंसठ खानेबनाकर एक – एक खाने में एक – एकयोगिनियोंको स्थितकरें। इनके नाम क्रम से यह हैं-१. गजानना, २. सिंहमुखी, ३.गृहस्था, ४. काकतुंडिका, ५. उग्रग्रीवा, ६.हयग्रीवा, ७.वाराही, ८.शरमानना, ९. उलूकी, १०.शिवाख्या, ११.मयूरा, १२.विकटानन, १३. अष्टवक्रा, १४.कोटराक्षी, १५.कुब्जा, १६.विकटलोचना, १७. शुष्कोदरी, १८.ललजिह्वा, १९.श्वेतदष्ट्रा, २०.वानरानना, २१.ऋक्षाक्षी, २२.केकरा, २३. वृहत्तुन्डा, २४.सुराप्रिया, २५.कपालहस्ता, २६. रक्ताक्षी, २७.शुक्री, २८.श्येनी, २९.कपोतिका, ३०.पाशहस्ता, ३१.दण्डहस्ता, ३२. प्रचण्डा, ३३. चण्डविक्रमा, ३४.शिशुघ्री, ३५.पापहन्त्री, ३६.काली, ३७. रुधिरपायिनि, ३८. वसोधरा, ३९. गर्भभक्षा, ४०.हस्ता, ४१. ऽऽन्त्रमालिनी, ४२.स्थूलकेशी, ४३.वृहत्कुक्षिः, ४४.सर्पास्या, ४५.प्रेतहस्ता, ४६. दशशूकरा, ४७.क्रौञ्ची, ४८. मृगशीर्षा, ४९.वृषानना, ५०. व्वात्तास्या, ५१. धूमिनि, श्वाषाः, ५२.व्यौमैकचरणा, ५३. उर्ध्वदृक् , ५४.तापनी, ५५.शोषिणी दृष्टि, ५६.कोटरी, ५७. स्थूल नासिका, ५८. विद्युत्प्रभा, ५९.बलाकास्या, ६०. मार्जारी, ६१.कटपूतना, ६२.अट्ठाटटहासा, ६३. कामाक्षी, ६४.मृगाक्षी मृगलोचना । यदि हम८ मातृका शक्तिया मानकर चलते हैं तो ये ८सहायक सहकतियों के साथमिश्रित होती हैं जिससे इनकीसंख्या ८ गुना ८ =६४होतीहैकिन्तु जबहम ९मातृका शक्तियों के आधार पर गणनाकरते हैं तोइनकी संख्या ८१ हो जाती है -प्रत्येक मातृका शक्ति एक योगिनी केरूप में गणित होती है और अन्य ८ मातृका शक्तियों के साथ गुणित किजाती है!आदेश आदेश गुरुजी को आदेश..

*********गोरख शाबर गायत्री मन्त्र *****************
“ॐ गुरुजी, सत नमः आदेश। सत गुरुजी को आदेश। ॐकारे शिव-रुपी, मध्याह्ने हंस-रुपी, सन्ध्यायां साधु-रुपी। हंस, परमहंस दो अक्षर। गुरु तो गोरक्ष, काया तो गायत्री। ॐ ब्रह्म, सोऽहं शक्ति, शून्य माता, अवगत पिता, विहंगम जात, अभय पन्थ, सूक्ष्म-वेद, असंख्य शाखा, अनन्त प्रवर, निरञ्जन गोत्र, त्रिकुटी क्षेत्र, जुगति जोग, जल-स्वरुप रुद्र-वर्ण। सर्व-देव ध्यायते। आए श्री शम्भु-जति गुरु गोरखनाथ। ॐ सोऽहं तत्पुरुषाय विद्महे शिव गोरक्षाय धीमहि तन्नो गोरक्षः प्रचोदयात्। ॐ इतना गोरख-गायत्री-जाप सम्पूर्ण भया। गंगा गोदावरी त्र्यम्बक-क्षेत्र कोलाञ्चल अनुपान शिला पर सिद्धासन बैठ। नव-नाथ, चौरासी सिद्ध, अनन्त-कोटि-सिद्ध-मध्ये श्री शम्भु-जति गुरु गोरखनाथजी कथ पढ़, जप के सुनाया। सिद्धो गुरुवरो, आदेश-आदेश।।”

साधन-विधि एवं प्रयोगः-
प्रतिदिन गोरखनाथ जी की प्रतिमा का पंचोपचार से पूजनकर २१, २७, ५१ या १०८ जप करें। नित्य जप से भगवान् गोरखनाथ की कृपा मिलती है, जिससे साधक और उसका परिवार सदा सुखी रहता है। बाधाएँ स्वतः दूर हो जाती है। सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है और अन्त में परम पद प्राप्त होता है।

******हनुमान रक्षा-शाबर मन्त्र***************

“ॐ गर्जन्तां घोरन्तां, इतनी छिन कहाँ लगाई ? साँझ क वेला, लौंग-सुपारी-पान-फूल-इलायची-धूप-दीप-रोट॒लँगोट-फल-फलाहार मो पै माँगै। अञ्जनी-पुत्र प्रताप-रक्षा-कारण वेगि चलो। लोहे की गदा कील, चं चं गटका चक कील, बावन भैरो कील, मरी कील, मसान कील, प्रेत-ब्रह्म-राक्षस कील, दानव कील, नाग कील, साढ़ बारह ताप कील, तिजारी कील, छल कील, छिद कील, डाकनी कील, साकनी कील, दुष्ट कील, मुष्ट कील, तन कील, काल-भैरो कील, मन्त्र कील, कामरु देश के दोनों दरवाजा कील, बावन वीर कील, चौंसठ जोगिनी कील, मारते क हाथ कील, देखते क नयन कील, बोलते क जिह्वा कील, स्वर्ग कील, पाताल कील, पृथ्वी कील, तारा कील, कील बे कील, नहीं तो अञ्जनी माई की दोहाई फिरती रहे। जो करै वज्र की घात, उलटे वज्र उसी पै परै। छात फार के मरै। ॐ खं-खं-खं जं-जं-जं वं-वं-वं रं-रं-रं लं-लं-लं टं-टं-टं मं-मं-मं। महा रुद्राय नमः। अञ्जनी-पुत्राय नमः। हनुमताय नमः। वायु-पुत्राय नमः। राम-दूताय नमः।”

विधिः- अत्यन्त लाभ-दायक अनुभूत मन्त्र है। १००० पाठ करने से सिद्ध होता है। अधिक कष्ट हो, तो हनुमानजी का फोटो टाँगकर, ध्यान लगाकर लाल फूल और गुग्गूल की आहुति दें। लाल लँगोट, फल, मिठाई, ५ लौंग, ५ इलायची, १ सुपारी चढ़ा कर पाठ करें।

****भूत भगाने का शाबर मंत्र **********
ॐ नमो आदेश गुरुजी को आदेश माता भभूत पिता भभूत त्रिलोक तारिणी या भभूत किसने हाणी किसने छानी महादेव ने हाणी पार्वती ने छाणी !! स्यानौनाथ चौरासी सिद्धो की भभूत इस पिण्ड के मस्तिषक चढानी चढे भभूत धर्ती पडे धाऊ रक्षा करे गुरु गोरख राऊ !! भाग भाग रे शाकनि डाकनि मडी मसाणी दैत्य दानव राग – दाग शक्ति पाताल मीन मेखला को पुत्र उत्र हाको तेरो प्राण मै गाडो पांडवी बाण सरसों चेडा मैने साधी लंका जाये रावण बांधों कौउनिकी जिउदाल काल की पाती जाग जाग रे भैरों तीन त्रिलोकी नाथ हांकती डैणी वज्र मारो फांकती डैणी वज्र मारो अंम्बादी जंम्बादी डैणी वज्र मारो जल भूत को मारो थल भूत को मारो !!

*********“नमो सत्य आदेश। गुरु का ओम नमो नजर, जहाँ पर-पीर न जानी। बोले छल सो अमृत-बानी। कहे नजर कहाँ से आई ? यहाँ की ठोर ताहि कौन बताई ? कौन जाति तेरी ? कहाँ ठाम ? किसकी बेटी ? कहा तेरा नाम ? कहां से उड़ी, कहां को जाई ? अब ही बस कर ले, तेरी माया तेरी जाए। सुना चित लाए, जैसी होय सुनाऊँ आय। तेलिन-तमोलिन, चूड़ी-चमारी, कायस्थनी, खत-रानी, कुम्हारी, महतरानी, राजा की रानी। जाको दोष, ताही के सिर पड़े। जाहर पीर नजर की रक्षा करे। मेरी भक्ति, गुरु की शक्ति। फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा।”
विधि- मन्त्र पढ़ते हुए मोर-पंख से व्यक्ति को सिर से पैर तक झाड़ दें।

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