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अब चण्डी विधान कहते हैं – सर्वप्रथम चण्डी के अनुष्ठान में प्रयुक्त होने वाले नवार्ण मन्त्र का उद्धार कहता हूँ -
वाक्‍ (ऐं), माया (ह्रीं), मदन (क्लीं), फिर दीर्घालक्ष्मी (चा), श्रुति उकार इन्द्रु (बिन्दु) सहित तन्द्रि (म) अर्थात् (मुं), फिर ‘डायै’ पद, फिर सदृक्‌जले (वि), तदनन्तर झिण्टीश सहित कूर्म द्वय (च्चे), यह नवार्ण मन्त्र कहा गया है ॥१०५-१०६॥

विमर्श – मन्त्र का स्वरुप – ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥१०५-१०६॥
अब विनियोग कहते है – इस नवार्ण मन्त्र के ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ऋषि है । गायत्री, उष्णिग् और अनुष्टुप् छन्द मुनियों ने कहा है तथा महाकाली महालक्ष्मी एवं महासरस्वती ये देवियाँ इसकी देवता हैं, नन्दा, शाकम्भरी और भीमा इसकी शक्तियाँ है । रक्तदन्तिका दुर्गा और भ्रामरी बीज है । अग्नि, वायु और सूर्य तत्त्व है । वेदत्रय से उत्पन्न इसका फल है । इस प्रकार सर्वाभीष्ट सिद्धियों का हेतु इसका विनियोग कहा गया है ॥१०६-१०९॥

अब ऋष्यादिन्यास कहते हैं – ऋषियों का शिर, छन्दों का मुख तथा देवताओं का हृदय, पर, शक्ति और बीज का क्रमशः दोनो स्तन पर तथा तत्त्वों का पुनः हृदय पर न्यास करना चाहिए ॥११०॥

विमर्श – ऋष्यादिन्यास – ब्रह्माविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः, शिरसे,
गायत्र्युष्ण्गिनुष्टुप्छन्देभ्यो नमः, मुखे,
महाकालीमहालक्ष्मीमहारसरस्वतीदेवताभ्यो नमः, हृदि,
नन्दाशाकम्भरीबेहेमाशक्तिभ्यो नमः, दक्षिणस्तने,
रक्तदन्तिकादुर्गाभ्रामरीबीजेभ्यो नमः, वामस्तने,
अग्नीवायुसूर्यतत्त्वेभ्यो नमः, हृदि ॥११०॥

एकादशन्यास – (१) शुद्धमातृकान्यास – इसकी बाद समस्त अभीष्ट फल देने वाले एकादश न्यासों को करना चाहिए । सर्वप्रथम पूर्वोक्त मार्ग से मातृकान्यास करना चाहिए जिसके करने से मनुष्य देवसदृश हो जाता है ॥१११-११२॥

विमर्श – ॐ अं नमः शिरसि, ॐ आं नमः मुखे, इत्यादि मातृकान्यास के लिये द्रष्टव्य विधि – १. ८९-९१ पृ० १८॥१११-११२॥

(२) सारस्वतन्यास – इसके बाद सारस्वत संज्ञक द्वितीय न्यास करना चाहिए । उसकी विधि इस प्रकार है – मूल मन्त्र के प्रारम्भिक ३ बीजोम के प्रारम्भ में प्रणव तथा अन्त में ‘नमः’ लगाकर कणिष्ठिका आदि पाँच अंगुलियों करतल, करपृष्ठ, मणिबन्ध एवं कोहिनी पर क्रमशः न्यास करना चाहिए । फिर हृदय आदि ६ अंगो पर जाति सहित न्यास करना चाहिए । इस सारस्वत न्यास के करने से जडता नष्ट हो जाती है ॥११२-११५॥

विमर्श – सारस्वतन्यास विधि ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः कनिष्ठिकयोः,
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः अनामिकयोः,

इसी प्रकार मध्यमा, तर्जनी, अंगुष्ठ, करतल, करपृष्ठ, मणिबन्ध एवं कूर्पर स्थानों में द्विवचन का उहापोह कर न्यास कर लेना चाहिए । पुनः ॐकार सहित तीनोम बीजों से हृदयादि स्थानोम पर न्यास करना चाहिए । यथा -
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं हृदयाय नमः, ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शिरसे स्वाहा,
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शिखायै वषट्, ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कवचाय हुम्
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ ऐं ह्रीं क्लीं अस्त्राय फट् ॥

(३) इसके बाद मातृकागण संज्ञक तृतीयन्याय करना चाहिए । उसकी विधि इस प्रकार है प्रारम्भ में मायाबीज (ह्रीं) लगाकर ‘ब्राह्यी पूर्वतः मां पातु’ से पूर्व, ‘माहेश्वरी आग्नेयां मां पातु’ से आग्नेय, ‘कौमारे दक्षिण मां पातु’ से दक्षिण, ‘वैष्णवी नैऋत्ये मां पातु’ से नैऋत्य में, वाराही पश्चिमे मां पातु’ से पश्चिम में, ‘इन्द्राणि वायव्ये मां पातु’ से वायव्य में, ‘चामुण्डा उत्तरे मां पातु’ से उत्तर में, ‘महालक्ष्मी ऐशान्ये मां पातु’ से ईशान में, ‘व्योमेश्वरी ऊर्ध्व मां पातु’ से ऊपर, ‘सप्तद्वीपेश्वरी भूमौ मां पातु’ से भूमि पर तथा ‘कामेश्वरी पाताले मां पातु’ से नीचे न्यास करना चाहिए । इस तृतीयन्यास के करने से साधक त्रैलोक्य विजयी जो जाता है ॥

विमर्श – इसका न्यास ‘ह्रीं ब्रह्मी पूर्वतः मां पातु पूर्वे’ , ‘ह्रीं माहेश्वरी आग्नेयां मां पातु’ इत्यादि प्रकार से करना चाहिए ॥

(४) षड्‌वीन्यास – नन्दजा आदि पदों से युक्त मन्त्रों द्वारा चतुर्थन्यास इस प्रकार करना चाहिए -
‘कमलाकुशमण्डिता नन्दजा पूर्वाङ्गं मे पातु’ इस मन्त्र से पूर्वाङ्ग पर, ‘खड्‌गपात्रकरा रक्तदन्तिका दक्षिणाङ्गं मे पातु’ से दक्षिणाङ्ग पर, ‘पुष्पपल्लवसंयुता शाकम्भरी पृष्ठाङ्गं मे पातु’ से पृष्ठ पर, ‘धनुर्बाणकरा दुर्गा वामाङ्ग मे पातु’ से वामाङ्ग पर, ‘शिरःपात्रकराभीमा मस्तकादि चरणान्तं मे पातु’ से मस्तक से पैरों तक तथा ‘चित्रकान्तिभृत् भ्रामरी पादादि मस्तकान्त्म मे पातु’ से पादादि मस्तक पर्यन्त न्यास करना चाहिए । इस चतुर्थन्यास के करने से मनुष्य वृद्धावस्था और मृत्यु से मुक्त हो जाता है ॥

(५) इसके बाद न्यासों में उत्तम ब्रह्मसंज्ञक पञ्चमन्यास करना चाहिए । उसकी विधि इस प्रकार है -

‘ॐ सनातनः ब्रह्या पादादिनाभिपर्यन्तः मां पातु’ से पैरों से नाभि पर्यन्त,
‘ॐ जनार्दनः नाभेर्विशुद्धिपर्यन्तं नित्यं मां पातु’ से नाभि से विशुद्धि चक्र पर्यन्त,
‘ॐ रुद्रस्त्रिलोचनः विशुर्द्धेब्रह्मरंध्रान्तं मां पातु’ से विशुद्धिचक्र से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त,
‘ॐ हंसः पदद्वद्वं में पातु’ से दोनों पैरों पर, ‘ॐ वैनतेयः करद्वय्म मे पातु’ से दोनों हाथों पर ‘ॐ वृषभः चक्षुषी मे पातु’ से नेत्रों पर, ‘ॐ गजाननः सर्वाङ्गानि मे पातु’ से सभी अंगोम पर और ‘ॐ अनन्दमयो हरिः परापरौ देहभागौ मे पातु से शरीर के दोनोम भागों पर न्यास करना चाहिए । इस पञ्चमन्यास को करने से साधक के सभी मनोरथपूर्ण जो जाते है ॥

(६) इसके बाद महालक्ष्मी आदि पद से संयुक्त मन्त्रों द्वारा षष्ठन्यास करना चाहिए । उसकी विधि इस प्रकार है -

षष्ठन्यास विधि – ‘ॐ अष्टादशभुजान्विता महालक्ष्मी मध्यं मे पातु’ – इस मन्त्र से मध्य भाग पर, ‘ॐ अष्टभुजोर्जिता सरस्वती ऊर्ध्वे मे पातु’ इस मन्त्र से ऊर्ध्व भाग पर, ‘ॐ दशबाहुसमन्विता महाकाली अधः मे पातु’ – इस मन्त्र से अधो भाग पर, ‘ॐ सिंहो हस्तद्वय्म मे पातु’ – इस मन्त्र से दोनों हाथों पर, ‘ॐ परंहंसो अक्षियुग्मं मे पातु’ – इस मन्त्र से दोनों नेत्रों पर, ‘ॐ दिव्यं महिषमारुढो यमः पदद्वयं मे पातु’ – इस मन्त्र से दोनों पैरों पर, ‘ॐ चण्डिकायुक्तो महेशः सर्वाङ्गानि मे पातु’ – इस मन्त्र से सभी अङ्गों पर न्यास करना चाहिए । इस षष्ठ न्यास के करने से मनुष्य सद्‌गति प्राप्त करत है ॥

(७) अब इसके बाद मूल मन्त्र के एक एक वर्णों से सप्तम न्यास करना चाहिए । इसे मूलाक्षर न्यास कहते है । इसके विधि इस प्रकार है -

वर्णन्यास विधि – ब्रह्मरन्ध्र, दोनो नेत्रे, दोनों कान, दोनो नासापुट मुख और गुदा पर एक एक वर्णों के आदि में प्रणव तथा अन्त में ‘नमः’ लगाकर न्यास करना चाहिए । इस सप्तमन्यास के करने से साधक के सारे रोग नष्ट हो जाते है ॥

विमर्श – सप्तमन्यास विधि – ॐ ऐं नमः ब्रह्मरन्ध्रे, ॐ ह्रीं नमः दक्षिणनेत्रे,
ॐ क्लीं नमः वामनेत्रे, ॐ चां नमः दक्षिणकर्णे, ॐ म्रं नमः वामकर्णे,
ॐ डाँ नमः दक्षनासापुटे, ॐ यै नमः वामनासापुटे, ॐ विं नमः मुखे,
ॐ च्चें नमः मूलाधारे ॥

(८) अब विलोमक्रम वर्णन्यास नामक अष्टमन्यास कहते हैं – इस न्यास में विलोम क्रम से गुदा से ब्रह्मारध्रान्त पर्यन्त स्थानोम पर विलोम पूर्वक मन्त्र के एक एक वर्णों के न्यास का विधान है । इस न्यास से साधक के समस्त दुःख दूर हो जाते है ॥

विमर्श – विलोमवर्णन्यास विधि – ॐ च्चें नमः, मूलाधारे ॐ विं नमः,मुखे, ॐ यैं नमः, वामनासापुटे, ॐ डां नमः दक्षिणनासापुटे, ॐ मुं नमः, वामकर्ने, ॐ चां नमः, दक्षिणकर्णे, ॐ क्लीं नमः वामनेत्रे, ॐ ह्रीं नमः, दक्षिण नेत्रे, ॐ ऐं नमः ब्रह्यरन्ध्रे ॥

(९) अब मन्त्रव्याप्तिरुप नामक नवमन्यास कहते हैं – उसकी विधि इस प्रकार है -
शिर से पाद पर्यन्त मूलमन्त्र का न्या आठ बार करे । इसी प्रकार क्रमशः आगे, दाहिने भाग में एवं पृष्ठभाग में तथा उसी प्रकार वामभाग में मस्तक से पैरों तक तथा पैरों से मस्तक पर्यन्त प्रत्येक भाग में आठ बार मूल मन्त्र का न्या करना चाहिए । इस नवम न्यास करने से साधक को देवत्व की प्राप्ति होती है ॥

विमर्श – नवमन्यास विधि – ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे मस्तकाच्चरणान्तं’ पूर्णाङ्गे (अष्टवारम्), ‘ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे पादाच्छिरोन्तम्’ दक्षिणाङ्गे (अष्टवारम्), ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ पृष्ठे (अष्टवारम्) ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामूण्डायै वामाङ्गे (अष्टवारम्)’, ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे मस्तकाच्चरणात्नम्’ (अष्टवारम्), ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे चरणात् मस्तकावधि’ (अष्टवारम्) ॥

(१०) इसके बाद दशम षडङ्गन्यास रुपी करना चाहिए । मूल मन्त्र का जाति के साथ हृदयादि ६ अङ्गो पर न्यास करना चाहिए । इस दशम न्यास को करने से तीनों लोक साधक के वश में हो जाते हैं ॥

विमर्श – दशमन्यास विधि – ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे हृदयाय नमः, ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डयै विच्चे शिरसे स्वाहा’, (शिरसि), ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे शिखायै वषट्’ (शिखायाम्), ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे कवचाय हुम्’ (बाहौ), ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट्’ (नेत्रयोः), ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट् ॥

(११) इन उक्त दश न्यासों को कर लेने के पश्चात् फलदायी एकादश न्यास इस प्रकार करना चाहिए -
‘खडि‌गनी शूलिनी घोरा’ इत्यादि ५ श्लोकों को पढकर आद्य कृष्णतर बीज (ऐं) का ध्यान कर सर्वाङ्ग में न्यास करना चाहिए । ‘शूलेन पाहि नो देवि’ इत्यादि ४ श्लोकों का उच्चारन कर सूर्य सदृश आभा द्वितीय बीज (ह्रीं) ५ श्लोकों को पढकर स्फटिक जैसी आभा वाले तृतीय बीज (क्लीं) का ध्यान अर सर्वाङ्ग में न्यास करना चाहिए ॥

विमर्श – अथैकादशन्यास विधि -
तृतीयं क्लीं बीजं स्फटिककाभं ध्यात्वा सर्वाङ्गे न्यसामि ॥

विद्वान् साधक को इस के बाद मूलमन्त्र के १, १, १, ४, २, वर्णों से तथा समस्त वर्णों से षडङ्गन्यास करना चाहिए ॥

विमर्श – मूलमन्त्र के वर्णों से षडङ्गन्यास विधि इस प्रकार है । यथा -
ऐं हृदयाय नमः, ह्रीं शिरसे स्वाहा, क्लीं शिखायै वषट्
चामुण्डायै कवचाय हुम् विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट्
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट् ॥

अक्षरन्यास – शिखा, दोनो नेत्र, दोनों कान, दोनों नासापुट, मुख एवं गुह्य स्थान में मन्त्र के एक एक अक्षर का न्यास करना चाहिए । फिर समस्त मन्त्र से आठ बार व्यापक न्यास करना चाहिए ॥

विमर्श – अक्षर न्यास विधि – ऐं नमः शिखायाम्, ह्रीं नमः दक्षिणनेत्रे, क्लीं नम्ह, वामनेत्रे चां नमः दक्षिणकर्णे, मुं नमः वामकर्णे, डां नमः दक्षिणनासापुटे, यै नमः वामनासायाम् विं नमः मुखे, नमः गुह्ये, ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै नमः सर्वागें ॥

अब महाकाली महालक्ष्मी तथा महासरस्वती का ध्यान कहते हैं -
जिन्होने अपने १० भुजाओं में क्रमशः खड्‌ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिध, त्रिशूल, भुशुण्डी मुण्ड एवं शंख धारण किया है, ऐसी त्रिनेत्रा, सभी अंगोम में आभूषणों से विभूषित, नीलमणि जैसी आभा वाली, दशमुख एवं दश पैरों वाली महाकाली का ध्यान करता हूँ जिनकी स्तुति मधु कैटभ का वध करने के लिये भगवान् विष्णु के सो जाने पर ब्रह्मदेव ने की थी ॥

अपनी १८ भुजाओं में क्रमशः अक्षमाला, परशु, गदा, बाण, वज्र, कमल, धनुष, कमण्डलु, दण्ड शक्ति, तलवार, ढाल, शंख, घण्टा, पानपात्र, त्रिशुल , पाश एवं सुदर्शन धारन करने वाली, प्रवाल जैसी शरीर की कान्तिवाली कमल पर विराजमान महिषासुरमर्दिनी महालक्ष्मी का ध्यान करता हूँ ॥

अपनी ८ भुजाओं में क्रमशः घण्टा, शूल, हल, शंख, मुषल, चक्र, धनुष एवं बाण धारण किये हुये, बादलों से निकलते हुये चन्द्रमा के समान आभा वाली, गौरी के देह से उत्पन्न त्रिलोकी की आधारभूता, शुम्भादि दैत्यों का मर्दन करने वाली श्री महासरस्वती का ध्यान करत हूँ ॥

इस प्रकार ध्यान कर उपर्युक्त नवार्ण मन्त्र का ४ लाख जप करना चाहिए । तदनन्तर विधिवत् पूजित अग्नि में खीर का दशांश होम करना चाहिए ॥

इसके बाद जयादि शक्तियों वाले पीठ पर तथा त्रिकोण, षट्‌कोण, अष्टदल एवं चतुर्विशति दल, तदनन्तर भूपुर वाले यन्त्र पर देवी का पूजन करना चाहिए ॥

विमर्श – पीठ पूजा विधि – (१८.१४४-१४५) में वर्णित चण्डी के तीनों स्वरुपों का ध्यान कर मानसोपचारों से उनका पूजन कर अर्घ्य स्थापित करे । फिर पीठ देवताओं का इस प्रकार पूजन करे । पीठमध्ये-
ॐ आधारशक्तये नमः,
ॐ प्रकृतये नमः,
ॐ कूर्माय नमः
ॐ शेषाय नमः,
ॐ पृथिव्यै नमः,
ॐ सुधाम्बुधये नमः,
ॐ मणिद्वीपाय नमः,
ॐ चिन्तामणि गृहाय नमः,
ॐ श्मशानाय नमः,
ॐ पारिजात्याय नमः,
ॐ रत्नवेदिकायै नमः कर्णिकायाः मूले
ॐ मणिपीठाय नमः कर्णिकोपरि

ततश्चतुर्दिक्षु- ॐ नानामुनिभ्यो नमः,
ॐ नानादेवेभ्यो नमः, ॐ शवेभ्यो नमः, ॐ सर्वमुण्डेभ्यो नमः,
ॐ शिवाभ्यो नमः ॐ धर्माय नमः, ॐ ज्ञानाय नमः
ॐ वैराग्याय नमः ॐ ऐश्वर्याय नमः,

चतुष्कोणेषु- ॐ अधर्माय नमः, ॐ अज्ञानाय नमः,
ॐ अवैराग्याय नमः, ॐ अनैश्वर्याय नमः ।

मध्ये – ॐ आनन्दकन्दाय नमः, ॐ संविन्नालाय नमः
ॐ सर्वतत्त्वात्मकपद्‌माय नमः ॐ प्रकृतमयपत्रेभ्यो नमः,
ॐ विकारमयकेसरेभ्यो नमः, ॐ पञ्चशद्‌बीजाद्यकर्णिकायै नमः,
ॐ अं द्वादशकलात्मने सूर्यमण्डल नमः, ॐ वं षोडशकलात्मने सोममण्डलाय नमः
ॐ सं दशकलात्मने वहिनमण्डलाय नमः, ॐ सं सत्त्वाय नमः,
ॐ रं रजसे नमः, ॐ तं तमसे नमः,
ॐ आं आत्मने नमः, ॐ अं अन्तरात्मने नमः,
ॐ पं परमात्मने नमः, ॐ ह्रीं ज्ञानात्मने नमः ।

इसके बाद पूर्वादि आठ दिशाओं में तथा मध्य में जयादि शक्तियोम की इस प्रकार पूजा करनी चाहिए – ॐ जयायै नमः पूर्वे, ॐ विजयायै नमः, आग्नेये,
ॐ अजितायै नमः दक्षिणे, ॐ अपराजितायै नमः, नैऋत्ये,
ॐ नित्यायै नमः पश्चिमे, ॐ विलासिन्यै नमः, वायव्ये,
ॐ दोग्ध्र्यै नमः उत्तरे, ॐ अधोरायै नमः ऐशान्ये
ॐ मङ्गलायै नमः मध्ये ।

इसके बाद ‘ह्रीं चण्डिकायोगपीठत्मने नमः’ इस पीठ मन्त्र से आसन देकर मूल मन्त्र से मूर्ति कल्पित कर ध्यान आवाहनादि उपचारों से पञ्चपुष्पाञ्जलि समर्पण पर्यन्त चण्डी की विधिवत् पूजा कर उनकी आज्ञा ले आवरण पूजा करनी चाहिए ॥

अब आवरण पूजा का विधान कहते है -
त्रिकोण के मध्य बिन्दु में देवी का ध्यान कर मूलमन्त्र से उनकी पूजा करनी चाहिए । फिर त्रिकोण के पूर्व वाले कोण में सरस्वती के साथ ब्रह्मा का, नैऋत्य वाले कोण में महालक्ष्मी के साथ विष्णु का तथा वायव्य कोण में उमा के साथ शिव का पूजन करना चाहिए । उत्तर एवं दक्षिण दिशा में क्रमशः सिंह एवं महिष का पूजन करना चाहिए ॥

षट्‌कोण में पूर्वादि ६ कोणों में क्रमशः नन्दजा, रक्तदन्तिका, शाकम्भरी, दुर्गा, भीमा एवं भ्रामरी का पूजन करना चाहिए । नन्दजा आदि शक्तियों के प्रारम्भ में प्रणव लगाकर उनके नामों के आदि अक्षर में अनुस्वार लगाकर अन्त में नमः लगाकर निष्पन्न मन्त्रों से पूजन करना चाहिए ॥

फिर अष्टदल में ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐन्द्री तथा चामुण्डा का पूजन करना चाहिए ॥

तदनन्तर चतुर्विंशति दलों में, विष्णुमाया चेतना, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, क्षान्ति, जाति, लज्जा, शान्ति, श्रद्धा कान्ति, लक्ष्मी, धृति, वृत्ति, श्रुति, स्मृति, तुष्टि, पुष्टि, दया, माता एवं भ्रान्ति का पूजन करना चाहिए ॥

भूपुर के बारह कोणो में गणेश, क्षेत्रपाल, बटुक और योगिनियों का, तदनन्तर पूर्वादि दिशाओं में इन्द्रादि दिक्पालों का भी पूजन करना चाहिए । इस प्रकार मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर साधक सौभाग्यशाली बन जाता है ॥

विमर्श – आवरण पूजा विधि – त्रिकोण के मध्य बिन्दु पर देवी का ध्यान कर मूल मन्त्र से पूजन करने के बाद पुष्पाञ्जलि लेकर ‘ॐ संविन्मये परे देवि परामृतरसप्रिये अनुज्ञां चण्डिके देहि परिवारार्चनाय में’ इस मन्त्र से पुष्पाञ्जलि चढाकर देवी की आज्ञा ले इस प्रकार आवरण पूजा करनी चाहिए । आवरण पूजा में सर्वप्रथम षडङ्गपूजा का विधान है । अतः त्रिकोण के बाहर आग्नेयादि कोणों में मध्य में तथा चतुर्दिक्षु इस प्रकार प्रथमावरण में षडङ्ग पूजा करनी चाहिए-
ऐं हृदयाय नमः, आग्नेये, ह्रीं शिरसे स्वाहा, ऐशान्ये,
क्लीं शिखायै वषट्, नैऋत्ये, चामुण्डायै कवचाय हुम्, वायव्ये,
विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट्, मध्ये, ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट् चतुर्दिक्षु

इसके बाद पुष्पाञ्जलि लेकर ‘अभीष्टसिद्धिं’ में देहि शरनागतवत्सले भक्त्या समर्पये तुभ्य्म प्रथमावरणार्चनम’ – इस मन्त्र से पुष्पाञ्जलि देनी चाहिए ।
द्वितीयावरण में त्रिकोण के पूर्वादि कोणों में सरस्वती ब्रह्मादिक की पूजा निम्न रीति से करनी चाहिए । यथा – ॐ सरस्वतीब्रह्माभ्यां नमः पूर्वकोणे,
ॐ लक्ष्मीविष्णुभ्यां नमः, नैऋत्यकोणे ॐ गौरीरुद्राभ्यां नमः, वायव्यकोणे,
ॐ सिं सिंहाय नमः, उत्तरे, ॐ मं महिषाय नमः दक्षिणे,
फिर पुष्पाञ्जलि पर्यान्त मन्त्र पढकर द्वितीय पुष्पाञ्जलि समर्पित करनी चाहिए ।

इसके बाद तृतीयावरण में षट्‌कोणो में नन्दजा आदि ६ शक्तियोम की निम्मलिखित मन्त्रों से पूजा करनी चाहिए । यथा – ॐ नं नन्दजायै नमः पूर्वे, ॐ रं रक्तदन्तिकायै नमः आग्नेये, ॐ शां शाकर्म्भ्यै नमः, दक्षिणे, ॐ दुं दुर्गायै नमः, नैऋत्ये, ॐ भीं भीमायै नमः, पश्चिमे, ॐ भ्रां भ्रामर्णै नमः, वायव्ये ।

तदनन्तर पुष्पाञ्जलि दे कर मूल मन्त्र के साथ ‘अभीष्टसिद्धिं … तृतीयावरणार्चनम’ पर्यन्त मन्त्र बोल कर तृतीय पुष्पाञ्जलि समर्पित करनी चाहिए ।

चतुर्थ आवरण में अष्टदल में पूर्वादि दल के क्रम से ब्रह्माणी आदि ८ मातृकाओं की निम्न नाम मन्त्रों से पूजा करनी चाहिए । यथा -
ॐ ब्रं ब्रह्मण्यै नमः पूर्वोदले, ॐ मां माहेश्वर्यै नमः आग्नेयदले,
ॐ कीं कौमार्यै नमः दक्षिणदले, ॐ वैं वैष्णव्यै नमः नैऋत्यदले,
ॐ वां वाराह्यै नम्ह पश्चिमदले, ॐ नां नारसिंहयै नमः वायव्यदले,
ॐ ऐं ऐन्द्रयै नमः उत्तरदले, ॐ चां चामुण्डायै नमः, ऐशान्य दल

इसके पश्चात् पुष्पाञ्जलि लेकर मूल मन्त्र के साथ ‘अभीष्टसिद्धिं…चतुर्थवरणार्चनम्’ पर्यन्त मन्त्र पढकर चतुर्थ पुष्पाञ्जलि समर्पित करनी चाहिए ।

पञ्चम आवरण में चतुर्विंशति दल में पूर्वादि क्रम से विष्णु माया आदि २४ शक्तियों की इस प्रकार पूजा करनी चाहिए । यथा -
ॐ विं विष्णुमायायै नमः, ॐ चे चेतनायै नमः ॐ बुं बुद्धयै नमः,
ॐ निं निद्रायै नमः ॐ क्षुं क्षुधायै नमः, ॐ छां छायायै नमः
ॐ शं शक्त्यै नमः ॐ तृं वृष्णायै नमः, ॐ क्षां क्षान्त्यै नमः,
ॐ जां जात्यै नमः ॐ लं लज्जायै नमः ॐ शां शान्त्यै नमः
ॐ श्रं श्रद्धायै नमः, ॐ कां कान्त्यै नमः ॐ लं लक्ष्म्यै नमः
ॐ धृं धृत्यै नमः, ॐ वृं वृत्यै नमः ॐ श्रुं श्रुत्यै नमः
ॐ स्मृं स्मृत्यै नमः ॐ तुं तुष्ट‌यै नमः ॐ पु पुष्टयै नमः
ॐ दं दयायै नमः ॐ मां मात्रे नमः ॐ भ्रां भ्रान्त्यै नमः

इसके बाद पुष्पाञ्जलि लेकर मूलमन्त्र के साथ ‘अभीष्टसिद्धिं … षष्ठावरणार्चनम्’ पर्यन्त मन्त्र पढकर षष्ठ पुष्पाञ्जलि समर्पित करनी चाहिए ।

षष्ठ आवरण में भूपुर के बाहर आग्नेयादि कोणों में निम्न मन्त्रों से गणेश आदि का पूजन करना चाहिए । यथा -
गं गणपतये नमः, आग्नेये, क्षं क्षेत्रपालाय नमः, नैऋत्ये,
बं बटुकाय नमः, वायव्ये, यों योगिनीभ्यो नमः, ऐशान्ये,
इसके बाद पुष्पाञ्जलि लेकर मूल मन्त्र के साथ ‘अभीष्टसिद्धिं…षष्ठावरणार्चनम्‍’ पर्यन्त मन्त्र पढकर षष्ठ पुष्पाञ्जलि समर्पित करनी चाहिए ।

सप्तम आवरण में भूपुर के पूर्वादि अपनी अपनी दिशाओं में इन्द्रादि दिक्पालों का निम्नलिखित मन्त्रों से पूजन करना चाहिए । यथा -
ॐ लं इन्द्राय नमः पूर्वे, ॐ रं अग्नये नमः आग्नेये,
ॐ म यमाय नमः दक्षिणे, ॐ क्षं निऋतये नमः नैऋत्ये,
ॐ वं वरुणाय नमः, पश्चिमे ॐ यं वायवे नमः, वायव्ये,
ॐ सं सोमाय नमः उत्तरे, ॐ हं ईशानाय नमः ऐशान्ये,
ॐ अं ब्रह्मणे नमः पूर्वशानयोर्मध्ये, ॐ ह्रीं अनन्ताय नमः नैऋत्यपश्चिमयोर्मध्ये

तदनन्तर पुष्पाञ्जलि लेकर मूलमन्त्र के साथ ‘अभीष्टसिद्धिं… सप्तमावरणार्चनम’ पर्यन्त मन्त्र बोल कर सत्पम् पुष्पाञ्जलि चढानी चाहिए ।

अष्टम आवरण में भूपुर के बाहर पूर्वादि दिशाओं में दिक्पालोम के वज्रादि आयुधों की पूजा करनी चाहिए । यथा – वं वज्राय नमः,
ॐ शं शक्तये नमः, ॐ दं दण्डाय नमः, ॐ खं खड्‌गाय नमः,
ॐ पां पाशय नमः, ॐ अं अंकुशाय नमः, ॐ गं गदायै नमः,
ॐ शूं शूलाय नमः, ॐ चं चक्राय नमः, ॐ पं पद्माय नमः

फिर पुष्पाञ्जलि लेकर मूल मन्त्र के साथ ‘अभीष्टसिद्धिं… अष्टमावरणार्चनम्’ मन्त्र से अष्टम पुष्पाञ्जलि समर्पित करनी चाहिए । इस प्रकार आवरण पूजा के बाद महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवताओं की धूप दीपादि उपचारों से विधिवत् पूजा करनी चाहिए ॥

साधक मूलमन्त्र से संपुटित मार्कण्डेय पुराणोक्त चण्डी पाठ को करने से तथा नवार्ण मन्त्र का जप करने से अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करता है ॥

आश्विन शुक्ल प्रतिपद से अष्टमी पर्यन्त मूल मन्त्र का एक लाख जप तथा उसका दशांश होम करना चाहिए ॥

प्रतिदिन देवी का पूजन तथा सप्तशती आ पाठ और साधक को अन्त में ब्राह्यण भोजन कराना चाहिए । ऐसा करने से वह शीध्र ही मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है ॥

अब प्रकरण प्राप्त सप्तशती के तीनोम चरित्रों का विनियोग कहते है – सप्तशती के प्रथम चरित्र के ब्रह्मा ऋषि है, गायत्री छन्द तथा महाकाली देवता हैं । वाग्बीज (ऐं) अग्नि तत्त्व तथा धमार्थ इसका विनियोग किया जाता है ॥

मध्यम चरित्र के विष्णु ऋषि, उष्णिक् छन्द तथा महालक्ष्मी देवता कही गई है । अद्रिजा (ह्रीं) बीज तथा वायुतत्त्व है तथा धन प्राप्ति हेतु इसका विनियोग होता है ॥

उत्तर चरित्र के रुद्र ऋषि कहे गये हैं, त्रिष्टुप् छन्द और महासरस्वती देवता हैं । काम (क्लीं) बीज तथा सूर्य तत्त्व हैं काम प्राप्ति हेतु इसका विनियोग होता है ॥

विमर्श – विनियोग विधि १. अस्य श्रीप्रथमचरित्रस्य ब्रह्माऋषिः गायत्रीछन्दः महाकालीदेवता ऐं बीजमग्निस्तत्त्वं धमार्थे जपे विनियोगः ।
२. अस्य श्रीमध्यमचरित्रस्य विष्णुऋषिरुष्णिक‌छन्दः महालक्ष्मीदेवता ह्रीं बीज्म वायुस्तत्त्वं धनप्राप्त्यै जपे विनियोगः ।
३. अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य रुद्रऋषिस्त्रिष्टुप्‌छन्दः महासरस्वतीदेवता क्लीं बीजं सूर्यस्तत्त्व्म कामप्रदायै जपे विनियोगः ॥

अब ऋष्यादिन्यास तथा सप्तशती के पाठ का विधान कहते हैं -
इस प्रकार सप्तशती के ऋषि देवता तथा छन्दादि का विनियोग कर पूर्वोक्त (द्र० १८. १४४-१४६) मार्ग से देवी का ध्यान कर, उसके अर्थ का स्मरण करते हुये, पद एवं अक्षरों का स्पष्टरुप में उच्चारण करते हुये, सप्तशतीस्तव का पाठ करना चाहिए । पाठ की समाप्ति में महालक्ष्मी का ध्यान षडङ्गान्यास तथा मूलमन्त्र का १०८ बार जप करना चाहिए । फिर देवी को सारा जप निवेदन कर देना चाहिए ॥

इस विधि से जो व्यक्ति सप्तशती का पाठ करता है वह कभी भी दुःख नहीं प्राप्त करता है । चण्डिका की उपासना करने वाला व्यक्ति धन, धान्य, यश, पुत्र पौत्र और आरोग्य सहित बहुत वर्षो तक जीवित रहता है ॥

मनुष्यों के कल्याण के लिये शतचण्डी का विधान कहता हूँ -
शास्त्रोक्त विधान से शतचण्डी का अनुष्ठान करने से राजा के द्वारा उपद्रव दुर्भिक्ष, भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, शत्रु का आक्रमण तथा निरन्तर होने वाला विनाश ये सारे उपद्रव नष्ट हो जाते हैं । रोगं एवं शत्रुओं का विनाश तो हो जाता है धन और पुत्रादि की अभिवृद्धि भी होती है ॥

अब शतचण्डी अनुष्ठान का प्रयोग कहते है -
शास्त्रोक्त विधि के अनुसार शिवालय अथवा किसी देवी मन्दिर के सन्निकट ध्वज एवं तोरण, वन्दनवारों से सजे हुए सुन्दर मण्डप, द्वार एवं मध्य में वेदी का और पश्चिम दिशा में अथवा मध्य में कुण्ड का निर्माण करे ॥

फिर स्नानादि नित्यक्रिया कर (मण्डप में पधार कर ‘अमुक कामोऽहं शतचण्डी विधानमहं करिष्ये’ इस प्रकार का संकल्प कर गणेश पूजनादि मातृस्थापन, नान्दीश्राद्ध, स्वस्ति वाचनादि कर्म कर) जितेन्दिय, सदाचारी, कुलीन, सत्यवादी, चण्डीपाठ में व्युत्पन्न लज्जालु, दयावान् एवं शीलवान् दश ब्राह्मणों का मधुपर्क विधान से वस्त्र, स्वर्ण और जप के लिये आसन और माला दे कर वरण करे और उन्हें भोजन कराए ॥

वे ब्राह्मण भी यजमान द्वारा प्रदत्त आसन पर बैठकर समाहित चित्त से देवी को स्मरण कर, सप्तशती के मूलमन्त्र से वेदी पर कलश स्थापित कर, उस पर देवों का आवाहन कर, षोडशोपचार से पूजन करे, उसी कलश के आगे बैठकर पूजन करें । उन ब्राह्मणों को हविष्यान्न का भोजन कराते हुए और भूमि में ब्रह्मचर्यपूर्वक शयन करते हुए मन्त्रों के अर्थों में मन लगाकर दश दश की संख्या में मार्कण्डेय पुराणोक्त सप्तशती का पाठ करना चाहिए (तथा प्रत्येक दश दश की संख्या में पृथक् पृथक् नवार्ण मन्त्र का जप करे तथा अस्पृश्य का स्पर्श न करना आदि समस्त वर्जित नियमों का भी पालन करे ॥

अब कुमारी पूजन का विधान कहते हैं – इसके बाद यजमान अधिकाङ्ग हीनाङ्गादि दुर्लक्षणो से रहित २ वर्ष से लेकर १० वर्ष की आयु वाली बटुक सहित १० कन्याओं का पूजन करे ॥

कुण्ठ रोग ग्रस्त, व्रत, अन्धी, कानी, केकराक्षी, कुरुपा, रोगयुक्ता दासी पुत्री और दुष्टा कन्या का पूजन वर्जित है । अभीष्ट सिद्धि हेतु ब्राह्मणकन्या, यशोवृद्धि के लिये क्षत्रिय कन्या, धनलाभ के लिये वैश्य कन्या तथा पुत्र प्राप्ति के लिये शूद्र कन्या का पूजन करना चाहिए ॥

दो वर्ष की कन्या – कुमारी, ३ वर्ष की – त्रिमूर्ति, ४ वर्ष की – कल्याणी, ५ वर्ष की – रोहिणी, ६ वर्ष की – कालिका, ७ वर्ष की – चण्डिका, ८ वर्ष की – शाम्भवी, ९ वर्ष की – दुर्गा तथा १० वर्ष की कन्या सुभद्रा कही जाती है । इनका मन्त्रों के द्वारा पूजन करना चाहिए ॥

१ वर्ष की कन्या में प्रीति का अभाव होने से पूजन मे अयोग्य तथा ११ वर्ष वाली कन्या पूजन में वर्जित है ॥

अब उनके आवाहनादि के लिये शंकराचार्य द्वारा संप्रोक्त मन्त्र कहता हूँ…

‘मन्त्राक्षरमयीं’ से लेकर ‘कन्यामावाह्याम्यहम् पर्यन्त (द्र० १८. १८४-१८५) मन्त्र का उच्चारण करते हुये उन कुमारियों का आवाहन करना चाहिए ॥

फिर १. ‘ॐ जगत्पुज्ये… नमोस्तुते’ पर्यन्त मन्त्र (द्र०. १९. १८६) से कुमारी का, २. ‘ॐ त्रिपुरा त्रिपुराधाराम्’ से त्रिमूर्ति का, ३. ‘ॐ कालात्मिकाकलातीता’ से कल्याणी कां, ४, ४. ‘ॐ अणिमाणिदिगुणाधराम्’ से रोहिणी का, ५. ‘ॐ कामचारां शुभां कान्ताम्’ स कालिका का, ६. ‘ॐ चण्डवीरां चण्डमाया०’ से चण्डिका का, ७. ‘ॐ सदानन्दकरीम शान्ताम्‍०’ से शाम्भई का, ८. ‘ॐ दुर्गमे दुस्तरे कार्ये०’ से दुर्गा का, ९, ‘ॐ सुन्दरीं स्वर्णवर्णाभां०’ से सुभद्रा का पूजन करना चाहिए ॥

पुराणोक्त इन इन मन्त्रों से स्नान की हुई कन्याओं का गन्ध, पुष्प, भक्ष्य, भोज्य, वस्त्र एवं आभूषणों से पूजन करना चाहिए ॥

अब सर्वतोभद्रमण्डल पर घटस्थापन, पूजन एवं हवन का विधान कहते हैं -
वेदी पर बनाये गये परम रमणीय सर्वतोभद्रमण्डल पर घटस्थापन कर भगवती का विधिवत् आवाहन एवं पूजन करना चाहिए । उसके आगे यथोपलब्ध विविध उपचारों से कन्या एवं ब्राह्मणों का विधिवत् पूजन करना चाहिए । तदनन्तर पूर्वोक्त (द्र०, १८, १४६-१५७) आवरण पूजा करनी चाहिए ॥

इस विधि से ४ दिन तक अनुष्ठान कर ५ वें दिन होम करना चाहिए । सप्तशती १० आवृत्तियों से प्रत्येक श्लोक से मधुरत्रय (घृत, शक्कर, मधु) सहित खीर, अंगूर, केला, बिजौरा, उख के टुकडे नारियल, तिल, आम और अन्य मधूर वस्तुओं से होम करना चाहिए ॥

इसी प्रकार विधिवत् स्थापित अग्नि में नवार्ण मन्त्र से १० हजार आहुतियाँ भी देनी चाहिए । फिर आवरण देवताओम का उनके नाम मन्त्रों के आरम्भ में प्रणव तथा अन्त में ‘स्वाहा’ लगाकर एक एक आहुति देनी चाहिए । फिर पूर्णाहुति कर विधिवत् देवताओं और अग्नि का विसर्जन करना चाहिए । कुम्भस्थ देवी का पूजन बलिदान प्रदान कर प्रत्येक ऋत्विजों को निष्क अथवा अशक्त होने पर सुवर्ण दक्षिणा देवे ॥

अब अभिषेक विधान एवं ब्राह्मण भोजन का प्रकार कहते है -
होम के अनन्तर समस्त वरण किए गए ब्राह्मणो को चाहिए कि कलश के जल से यजमान का अभिषेक कर आशीर्वाद प्रदान करें । यजमान भी प्रत्येक ब्राह्मणोम को निष्क अथवा सुवर्ण दक्षिणा देवे और विविध भक्ष्य भोज्यादि पदार्थों से सौ की संख्या में ब्राह्मणों को भोजन करावे । उन्हें भी यथाशक्ति दक्षिणा देवे और उनका आशीर्वाद भी ग्रहण करे ॥

ऐसा करने से संसार वश में हो जाता है । सारे उपद्रव नष्ट हो जाते हैं तथा राज्य, धन, यश, पुत्र की प्राप्ति एवं सारे मनोरथों की पूर्ति भी हो जाती है ॥

अब सहस्त्रचण्डी का विधान कहते हैं -
सह्स्त्र चण्डी विधान में शतचण्डी विधान का दश गुना कार्य (पाठ, जप, होम, दक्षिणा, कन्या पूजन, ब्राह्यण वरण, और ब्राह्मण भोजन) करना चाहिए । इस अनुष्ठान में विद्वान् और सदाचारी १०० ब्राह्मणों का वरण करना चाहिए ॥

उनमें से प्रत्येक को १०-१० चण्डी पाठ तथा १०-१० हजार नवार्ण मन्त्र का जप करना चाहिए ॥

इसी प्रकार पूर्वोक्त शुभ लक्षण वाली (द्र०, १८. १७७-१८३) सौ कन्याओं का पूर्वोक्त मन्त्रों से (द्र० १८. १८४-१९४) पूजन करना चाहिए । इस प्रकार १० दिन पर्यन्त कार्य करने के बाद विधिवत् होम करन चाहिए ॥

सप्तशती की १०० आवृत्तियों से, एक-एक श्लोक द्वारा तथा एक लाख नवार्ण मन्त्रों द्वारा विधिपूर्वक पूर्वोक्त द्रव्यों से हवन करना चाहिए । फिर ऋत्विजों को दक्षिना देने के बाद पूर्वोक्त लक्षण युक्त (द्र० १८. १७३-१७६) एक हजार सज्जन और देवी की आराधना में तत्पर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए ।

इस प्रकार विधिवत् सह्स्त्रचण्डी करने पर उपासक की सारी कामनायें पूरी होती है तथा समस्त दुःख और पाप नष्ट हो जाते है ॥

सह्स्त्रचण्डी के पाठ से महामारि, दुर्भिक्ष, रोग तथ सभी प्रकार के दुर्व्यसनादि नष्ट हो जाते है । चण्डी का विधान दुष्ट, खल, चोर, गुरुद्रोही को नहीं बताना चाहिए ॥

सज्जन, जितेन्द्रिय और संयमी को ही इस विधि का उपदेश करना चाहिए । इस प्रकार सत्पात्र को उपदेश करने से भगवती चण्डिका वक्ता और और श्रोता दोनों की रक्षा करती हैं ॥

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