73122_488677467852478_163192146_n

कामाख्या दर्शन – सिद्ध मंत्र
1….सिद्ध मंत्र
प्रणाम मन्त्र

कामाख्ये कामसम्पन्ने कामेश्वरि हरप्रिये ।
कामनां देहि मे नित्यं कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥

अनुज्ञा मन्त्र
कामदे कामरुपस्थे सुभगे सुरसेविते ।
करोमि दर्शनं देव्याः सर्वकामार्थसिद्धये ॥
यह चलन्ता, हरगौरी अथवा भोगमूर्ति अष्टधातुमयी है । यह प्रस्तर निर्मित पचस्तर विशिष्ट सिंहासनासीन है, मूर्ति इस प्रकार की है कि उत्तर में वृषभवाहन, पंचवक्त्र एवं दशभुज विशिष्ट कामेश्वर महादेव अवस्थित हैं । दक्षिण भाग में षडानना, द्वादशबाहुइ विशिष्टा अष्टादश लोचना सिंहवाहिनी कमलासना देवी मूर्ति है । यह मूर्ति महामाया कामेश्वरी नाम से प्रख्यात है ।

विष्णुब्रह्मशिवैर्देवैर्धृयते या जगन्मयी ।
सितप्रेतो महादेवो ब्रह्मा लोहितपंकजम् ॥
हरिर्हरिस्तु विज्ञेयो वाहनानि महौजसः ।
स्वमूर्त्ता वाहनत्वन्तु तेषां यस्मान्न युज्यते ॥
- कालिका पुराण
वही जगन्मयी कामेश्वरी ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव कर्त्तक घृत हैं, महादेव ही यहाँ सितप्रेत अर्थात् शवरुप हैं, ब्रह्मा ही लोहित पंकज हैं एवं विष्णु सिंह रुप से अवस्थित हैं, इन देवताओं को अपनी – अपनी मूर्ति में वाहन, बनना युक्ति युक्त नहीं है – इसलिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर अन्य रुप धारण कर देवी के वाहन बने हुए हैं ।’
जो साधक वाहन सहित देवी की इस मूर्ति का ध्यान एवं पूजा करते हैं, उनके द्वारा ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर ये तीनों देवता भी पूजित होते हैं ।
वार्षिक उत्सवों तथा विशेष पर्वपार्वण के दिनों में यह चलन्ता मूर्ति भ्रमण कराई जाती है । तीर्थ – यात्री पहले कामेश्वरी देवी एवं कामेश्वर शिव का दर्शन करते हैं । इसके बाद देवी के महामुद्रा का दर्शन करते हैं । देवी की योनिमुद्रा पीठ दश सोपान ( सीढ़ी ) नीचे अन्धकार पूर्ण गुफा में अवस्थित होने के कारण वहाँ सदा दीपक का प्रकाश रहता है ।

कामाख्या देवी का प्रणाम मन्त्र
कामाख्ये वरदे देवि नीलपर्वतवासिनि ।
त्वं देवि जगतां मातर्योनिमुद्रे नमोऽस्तु ते ॥

स्पर्श मन्त्र
मनोभवगुहा मध्ये रक्तपाषाण रुपिणी ।
तस्याः स्पर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते ॥

चरणामृत – पान मन्त्र
शुकादीनाञ्च यज् ज्ञानं यमादि परिशोधितम् ।
तदेव द्रवरुपेण कामाख्या योनिमण्डले ॥

देवी महामाया से जो जैसी याचना करते है और देवी की प्रसन्नतार्थ जप, होम, पूजा – पाठादि करते हैं, देवी उनके मन की अभीष्ट कामनाओं को उसी रुप में पूर्ण करती हैं । जो भक्तिभाव से देवी की योनिमण्डल का दर्शन, स्पर्शन तथा मुद्रा का जलपान करते हैं वे देवऋण, पितृऋण एवं ऋषिऋण से मुक्त होते हैं । यथा –

ऋणानि त्रीण्यपाकर्तुं यस्य चित्तं प्रसीदति ।
स गच्छेत् परया भक्त्या कामाख्या योनि सन्निधि ।
- योगिनी तन्त्र
पितृऋण, ऋषिऋण एवं देवऋण चुकाने के लिए जिसका मन प्रसन्न हो वह परम भक्तिभाव के साथ कामाख्या योनिमण्डल के निकट जाए ।
गवां कोटि प्रदानात्तु यत्फलं जायते नृणाम् ।
तत्फलं समवाप्नोति कामाख्या पूजयेन्नरः ॥
- कालिका पुराण
कोटि गोदान करने से मनुष्य को जो फल मिलता है वही फल कामाख्या देवी की पूजा करने से प्राप्त होता है ।
चार वर्ग क्षेत्र विशिष्ट शिलापीठ के ऊपर, जहाँ से निरन्तर पाताल से जल निकलता रहता है, वही कामाख्या का योनिमण्डल है । इस योनिमण्डल का परिमाण एक हाथ लम्बा एवं बारह अंगुल चौड़ा है और सत्तासी धनु परिमित स्थान में रुक्ष रक्त है एवं सपुलत अष्टहस्त तथा पचास हजार पुलकान्वित शिवलिंग युक्त है । यथा –

सप्तशीति धनुर्मानं रुक्षरक्त शिला च या ।
अष्टहस्तं सपुलकं लिंग लक्षार्द्धसंयुतम् ॥
चतुर्हस्त समं क्षेत्रः पश्चिमे योनिमण्डलम् ।
बाहुमात्रमिदञ्चैव प्रस्तारे द्वादशांगुलम् ॥
आपातालं जलं तत्र योनिमध्ये प्रतिस्थितम् ॥
- योगिनी तन्त्र
तृमा अंग होने के कारण इसका आधा भाग सोने के टोप से ढका रहता है और टोप को भी वस्त्र एवं पुष्प माल्यादि से आवृत तथा सुशोभित रखा जाता है । दर्शन, स्पर्शन एवं जप – पूजादि के लिए केवल एक अंश उन्मुक्त रखा जाता है । मातृअंग निपतित होकर यहाँ अवस्थित होने के कारण इस महातीर्थ को शक्तिपीठ स्थान कहा जाता है और यह सभी तीर्थों में प्रधान है । आद्याशक्ति प्रसन्न होने पर जीव को मुक्ति प्रदान करती है । अतः शक्ति साधक देवी को प्रसन्न करने के लिए कामाख्या को सर्वप्रधान शक्तिपीठ तथा तान्त्रिक क्रिया पद्धति का केन्द्र समझकर, यहाँ आकर महामुद्रा का नित्य दर्शन एवं उपासना करना जीवन का महान् कर्त्तव्य मानते हैं । इस पुण्य भारत भूमि के अनेक प्रातः स्मरणीय महापुरुषों ने इस पीठस्थान में आगमन कर तपस्या द्वारा सिद्धि लाभ किया है, इस बात का यथेष्ट प्रमाण है । आज भी उन सिद्धि साधकों के वंशधरों में से लोग यहा आते रहते हैं ।
2…लक्ष्मी सरस्वती
महामाया की दस महाविद्या अर्थात् दस विभूतियों के अन्तर्गत षोडशी, कामाख्या देवी का ही अन्य नाम है, एवं वे ही देवीपीठ में अवस्थित हैं । इसी देवीपीठ से संलग्न पूर्वप्रान्तर में मातंगी ( सरस्वती ) एवं कमला ( लक्ष्मी ) देवी का पीठस्थान है । यहाँ यथाशक्ति पूजा कर प्रणाम करें ।

प्रणाम मन्त्र
सदाचार प्रिये देवि, शुक्ल पुष्पाम्बर प्रिये ।
गोमयादि शुचि प्रीते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥
सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नमः ।
वेदवेदान्तवेदांग विद्यास्थानेभ्य एव च ॥

स्पर्शन मन्त्र
मध्ये च कुब्जिके देवि प्रान्ते प्रान्ते च भैरवी ।
एकैक स्पर्शनात् देव्याः कोटि जन्माघनाशनम् ॥

इसके बाद महामाया का दर्शन, स्पर्शन, पूजनादि करें । अनन्तर चलन्ता मन्दिर के चारों ओर दीवालों से संलग्न देव – देवियों की मूर्ति का दर्शन करें । मंगलचण्डी, कल्कि अवतार, युधिष्ठिर, श्री रामचन्द्र, बटुक भैरव, नारायण गोपाल, कूचविहार के राजा नर नारायण की प्राचीन मूर्ति, नील – कण्ठ महादेव, नन्दी, भृंगी, कपिल मुनि, मनसा देवी, जरत्कारु मुनि, कूचविहार के दोनों महाराजों का मन्दिर निर्माणादि विषय कीर्तिज्ञापक शिलालिपि आदि तथा पंचरत्न मन्दिर की चामुण्डा देवी का दर्शन करें ।

चामुण्डा का प्रणाम मन्त्र
महिषाघ्नि महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनि ।
आयुरारोग्यमैश्वर्य देहि मे परमेश्वरि ।
इसके अतिरिक्त नाटमन्दिर के भीतर, आहोम राजा राजेश्वरसिंह और गौरीनाथसिंह की शिला और ताम्रलिपियाँ हैं । यात्रियों के तीर्थकृत्य, कर्मकाण्ड विशेषकर कुमारी पूजा, दान, भोज्य उत्सर्ग आदि कर्मानुष्ठान इसी पंचरत्न मन्दिर के भीतर तीर्थ के पुजारी ब्राह्मणगण सम्पादन करवाते हैं ।

कुमारी पूजा
महातीर्थ कामाख्या में महामाया कुमारी रुप में विराजमान हैं । यात्रीगण देवी भाव से कुमारी पूजा कर कृतकृत्य होते हैं । जिस तरह प्रयाग में मुण्डन एवं काशी में दण्डी भोजन करवाने की विधि है, उसी तरह कामाख्या में कुमारी पूजा आवश्यक कर्त्तव्य है । यहाँ कुमारी पूजा करने से सर्व देवदेवियों की पूजा करने का फल प्राप्त होता है । भक्तिभाव एवं कर्त्तव्य बुद्धाय कुमार पूजा करने से अवश्य पुत्र, धन, पृथ्वी, विद्या आदि का लाभ होता है एवं मन की सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है ।

सर्वविद्यास्वरुपा हि कुमारी नात्र संशयः ।
एकाहि पूजिता बाला सर्वं हि पूजितं भवेत् ॥
- योगिनीतन्त्र
कुमारी सर्वविद्या स्वरुपा है, इसमें सन्देह नहीं । एक कुमारी पूजा करने से सम्पूर्ण देव – देवियों की पूजा का फल होता है ।

ध्यानम्
ॐ बालरुपाञ्च त्रैलोक्य सुन्दरीं वरवर्णिनाम् ।
नानालंकार नाम्राङ्गीं भद्रविद्या प्रकाशिनीम् ।
चारुहास्यां महानन्द हदयां चिन्तयेत् शुभाम् ॥

आवाहनम्
ॐ मन्त्राक्षरमयीं देवीं मातृणां रुपधारिणीम् ।
नवदुर्गात्मिकां साक्षात् कन्यामावाहयाम्यहम् ॥

प्रणाम मन्त्र
ॐ जगदवन्दे जगतपूज्ये सर्वशक्ति स्वरुपिणि ।
पूजां गृहाण कौमारी जगन्मातर्नमोऽस्तु ते ॥

देवी मन्दिर का प्रदक्षिणा मन्त्र
यानि यानीह पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।
तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे ॥
3…..कम्बलेश्वर
कम्बलेश्वर
कामाख्या देवी के मन्दिर के चारों ओर पर्वत के ऊपर भिन्न – भिन्न स्थानों में दशमहाविद्या के मन्दिर में देवी के नव – योनिपीठ के अन्तर्गत अन्य सातपीठ – स्थान विद्यमान हैं । पंचानत के पाँचों मुख की ओर पाँच शिवमन्दिर अवस्थित हैं । कम्बलेश्वर नाम का विष्णु – मन्दिर देवी मन्दिर के सन्निकट अवस्थित हैं । यहाँ भगवान् विष्णु कम्बलाख्य नाम से प्रसिद्ध हैं । इसके बाहर भी कामेश्वर और सिद्धेश्वर के मन्दिर के बीच में केदार क्षेत्र और उक्त दो मन्दिरों के दक्षिण प्रान्त में कुछ दूरी पर वन के बीच वनवासिनी, जयदुर्गा तथा ललिता – कान्ता के नामसे तीन शिलापीठ विद्यमान हैं ।

कम्बलेश्वर प्रणाम मन्त्र
नमो नमस्ते देवेश श्याम श्रीवत्सभूषित ।
लक्ष्मीकान्त नमस्तेऽस्तु नमस्ते पुरुषोत्तम ॥
देवदानव गन्धर्वपादपदमार्चित प्रभो ।
नमो बरदालिंगाय कम्बलाय नमो नमः ॥

अनुज्ञा मन्त्र
नमस्ते कम्बलेशाय महाभैरवरुपिणे ।
अनुज्ञां देहि मे नाथ कामाख्या दर्शनं प्रति ॥
4…..देवी पूजा पटल
देवी – पूजा – पटल
राजा सुरथ ने प्रश्न पूछा – हे मुनिश्वर ! अब भगवती जगदम्बा की आराधना – विधि भली भाँति बताने की कृपा कीजिए । साथ ही पूजाविधि, होम विधि तथा मन्त्र – साधना भी समझाइए ।
तब सुमेधा मुनि ने उत्तर दिया – हे राजन् ! सुनिए अब मैं भगवती की पूजा का उत्तम प्रकार बताता हूँ, जिसके प्रभाव से मनुष्यों की अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं, वे परमसुखी, ज्ञानी और मोक्ष के अधिकारी बन जाते हैं ।
देवी पूजा – हे राजन् ! जिस तरह विष्णु सर्वश्रेष्ठ तथा लक्ष्मी सर्वोत्तम हैं, उसी प्रकार काम रुप में देवी की पूजा सर्वोत्तम कही गई हैं । कामरुप देवी का ही क्षेत्र है जहाँ देवी का साक्षात् वास है । इस जैसा क्षेत्र अन्यत्र कहीं नहीं है । देवी अन्यत्र विरला है परन्तु कामरुप में घर – घर में विराजमान हैं । देवी पूजा जैसा कार्य इस क्षेत्र में जितना सिद्धदायक है उतना अन्यत्र कहीं नहीं । यहाँ पूजाकर के मनुष्य वांछित फल प्राप्त करके दीर्घजीवी हो सकता है ।

अनुष्ठान विधि – साधक को चाहिए कि वह पहले शौच स्नान करके पवित्र हो, स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें तत्पश्चात् गोबर से लिपे शुद्ध स्थान में आसन पर बैठ, सावधानी से आचमन प्राणायाम करें । साथ ही पूजा सामग्री को जल से पवित्र कर लें । तब प्राणायाम के बाद यथाविधि भूतिशुद्धि एवं प्राण – प्रतिष्ठा करके देवी की मूर्ति को विधिवत् स्थापित करें । मूर्ति के आगे एक शिला रख लाल कपड़े से ढक दें । उस लाल कपड़े पर लिंगस्था देवी ( कामाक्षा देवी ) का यन्त्र स्थापित कर पूजा जपादि करें । कामरुप में सदैव प्रेम पूर्वक देवी का पूजा जपादि ही करें ।
उपरोक्त सब कार्य मास तिथि वार का उच्चारण करके संकल्प पूर्वक मन्त्र के साथ करना चाहिए । चित्र या मूर्ति के सामनि किसी सुन्दर ताम्र – पात्र पर श्वेत तथा रक्त चन्दन से षटकोण यन्त्र लिखें । उसके बाहर अष्टकोण यन्त्र लिखकर उस यन्त्र के प्रत्येक दल में नवाक्षर मन्त्र एक – एक अक्षर लिखकर नवों अक्षर उस यन्त्र की कर्णिका में लिखें । तदनन्तर वेदोक्त या तंत्रोक्त विधि से प्राण – प्रतिष्ठा करके पूजा करें ।
हे राजन् ! उपर्युक्त यन्त्र के अभाव में सोने चाँदी आदि धातु की बनी हुई केवल प्रतिमा का ही पूजन तन्त्रोक्त – विधि से करें । अथवा एकाग्रचित्त होकर वेदोक्त मन्त्रों का उच्चारण करके देवी का ध्यान पूजन विधिवत् करें । नवाक्षर मन्त्र का जप बराबर करता रहे । साथ ही देवी के ध्यान से कभी विरत न हो ।
इस प्रकार अनुष्ठान के बाद दशांश हवन तथा दशांश तर्पण भी करना चाहिए । साथ ही जपानुसार तर्पण को दशांश संख्या में ब्राह्मण भोजन भी करना चाहिए । जब तक अनुष्ठान रहे तब तक प्रतिदिन ‘ दुर्गा सप्तशती ‘ के तीनों चरित्रों ( कीलक, कवच, अर्गला सहित त्रयोदश अध्यायों ) का पाठ होना चाहिए । तत्पश्चात् देवी का विसर्जन करना चाहिए । इस प्रकार नवरात्र व्रत का विधान विधिवत् समात करें । हे राजन् ! अश्विन मास तथा चैत्रमास के शुक्ल पक्ष में नवरात्र व्रत होता है । शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक व्रतानुष्ठान एवं व्रतोपवास करके कल्याण चाहने वालों को विधिवत् होम करना चाहिए । सुन्दर खीर एवं शाकल्य में घृत, मधु एवं चीनी मिलाकर जप के मन्त्र ( नवार्ण अथवा जो मन्त्र जपे उन मन्त्रों ) से हवन करें । अथवा बकरे के मांस, विल्वपत्र तथा लाल कनैर एवं जपाकुसुम ( अडहुल ) के फूल में तिल शक्कर मिलाकर हवन करने का विधान है । अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी तिथि को विशेष रुपेण देवी का पूजन एवं ब्राह्मण भोजन का विधान है ।

अनुष्ठान फल – हे राजन् ! ऐसा करने से निर्धन व्यक्ति धनवान हो जाता है । रोगी के रोग दूर हो जाते हैं और सन्ताहीन पुरुष को मातृ – पितृ एवं शुभ लक्षणयुक्त पुत्र उत्पन्न होते हैं । यहाँ तक कि राज्यच्युत राजा स्वराज्य प्राप्त कर लेता है । इस प्रकार महामाया जगदम्बा की कृपा से मनष्य सफल मनोरथ हो जाता है । जो विद्यार्थी इन्द्रियों को वश में करके ब्रह्मचर्य पूर्वक भगवती की आराधना करता है, उसे सर्वोत्तम विद्या प्राप्त हो जाती है । इसमें तनिक भी संशय नहीं । इसलिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रादि कोई भी मनुष्य यदि श्रद्धा भक्तिपूर्वक भगवती की उपासना करें तो अवश्यमेव सुख का भागी होता है । जो स्त्री अथवा पुरुष भक्ति पूर्वक नवरात्र का व्रत करते हैं, उसका मनोरथ कभी विफल नहीं होता । आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में जो यह उत्तम नवरात्र व्रत करता है, वह सब प्रकार का मनोवांछित फल प्राप्त करता है ।

देवी पूजा का क्रम – अतः विधिवत् मण्डप बनाकर पूजा स्थान का निर्माण करना चाहिए । सर्वप्रथम वैदिक मन्त्रों द्वारा वेदी पर कलश स्थापन करें । तत्पश्चात् सुन्दर यन्त्र बनाकर कलश के ऊपर रखे और उस कलश के चारों ओर उत्तम जौ बो देना चाहिए । फिर उस मण्डल ( वेदी ) के ऊपर चाँदगी लगा देना चाहिए, जिससे पूरा स्थान सुशोभित हो जाए । उस पूजा मण्डप को यथाशक्ति तोरण पताका एवं पुष्प माला आदि से सजा देना चाहिए । धूप – दीप द्वारा देवी के स्थान को सुगान्धित एवं सुसज्जित कर देना चाहिए । तत्पश्चात् प्रातः मध्याह्न तथा सायंकालीन पूजा विधिवत् करके आरती उतारनी चाहिए । इस कार्य में कृपणता न करनी चाहिए । इस प्रकार देवी के पूजा करके धूप – दीप, नैवेद्य आदि ( षोडशोपचार ) से पूजा करें । पुष्प – पत्र, फल एवं मिष्ठान का प्रसाद विवरण करना चाहिए । साथ ही देवी पुराण, सप्तशती, दुर्गापाठ, वेदपाठ एवं पुराण पाठ के साथ – साथ संगीत एवं कीर्तन का भी प्रबन्ध करना चाहिए । वैभव के अनुसार नृत्य आदि का प्रबन्ध करके देवी क उत्सव मंगल करना चाहिए । अन्त में हवन पूजन के बाद कन्या पूजन भी विधिवत् होना चाहिए । अन्त में हवन पूजन के बाद कन्या पूजन भी विधिवत् होना चाहिए तथा उन कन्याओं को भोजन भी कराना चाहिए । कन्या पूजन में वस्त्र, भूषण, चन्दन, माला तथा अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थो एवं सुगान्धित द्रव्यों का व्यवहार अवश्य करना चाहिए । इससे भगवती बहुत प्रसन्न होती है । उपर्युक्त विधि से पूजन करने के बाद अष्टमी या नवमी को विधिवत् मन्त्रोच्चारण पूर्वक होम करें । तब दशमी के दिन ( विजया दशमी ) अपराजिता देवी का पूजन करके शास्त्रादि का पूजन भी करें और ब्राह्मण – भोजन कराकर स्वयं भी व्रत का पालन करें । उस समय यथाशक्ति ब्राह्मणों को दान – दक्षिणा देकर विदा करें ।
इस प्रकार जो पुरुष तथा सधवा या विधवा नारी भी भक्तिपूर्वक नवरात्र व्रत करती है, वह इस लोक में नाना प्रकार के मनोवांछित सुखों का उपभोग करती हैं और अन्त में देह त्याग कर दिव्य देवो लोक में चली जाती है ।

देवी पूजन न करने का परिणाम – जो मनुष्य जड़ता वश देवी के पूजन नहीं करते उनके इस जन्म के और उस जन्म के पुण्य नष्ट हो जाते हैं, वे इस लोक में अनेक प्रकार के रोग से जकड़े रहते हैं, सर्वत्र अनादर के पात्र बने रहते हैं और शत्रुओं से पराजित होकर नाना प्रकार के कष्ट सहते हैं ।
5….कुमारी पूजन
भक्त को देवीजी की अतिशय प्रसन्नता के लिए कुमारी कन्याओं को भोजन अवश्य खिलाना चाहिए । ये कुमारियाँ संख्या ९ में होनी चाहिए । इनमें २ वर्ष से कम तथा १० वर्ष से अधिक की कन्याएँ नहीं होनी चाहिए । इन ९ कुमारी देवियों के नाम मन्त्र क्रमशः ये हैं – १. कुमार्ये नमः, २. त्रिमुर्त्यै नः, ३. कल्याण्यै नमः, ४. रोहिण्यै नमः, ५. कालिकायै नमः, ६. चण्डिकोयै नमः, ७. शाम्भव्यै नमः, ८. दुर्गायै नमः तथा ९. सुभद्रायै नमः । इन कुमारियों में हीनांगी, अधिकांगी, कुरुपा नहीं होनी चाहिए । इनका इन्ही मन्त्रों से पूजन कर भोजन कराए । जब कुमारी देवी भोजन कर लें तो उनसे अपने सिर पर अक्षत छुड़वाए और उन्हें दक्षिणा दें । इस तरह करने पर महामाया भगवती अत्यनत प्रसन्न होकर अपनी सिद्धि देती है और साधक के मनोरथों को पूर्ण कर देती हैं ।
6….विशेष पूजनाध्याय
जो मनुष्य श्रीदेवी को श्रद्धा भक्तिपूर्वक पंचामृत से स्नान कराता है, वह देवी के सायुज्य को प्राप्त होता है । जो लाल गन्ने के रस से भरे हुए सँकडों घड़े ( कलशों ) द्वारा भगवती को स्नान कराता है, वह आवागमन से रहित हो जाता है । जो पुरुष आम के रस से या ईख के रस से देवी का अभिषेक करता है अथवा अंगूर या मुनक्का के रस से स्नान कराता है, वह देवीलोक को जाता है । जो पुरुष कपूर, अगरु, केसर, कस्तूरी तथा कमल के जल से देवी को स्नान कराते हैं, उनके सैकड़ों जन्म के अर्जित पाप पुंज भस्मीभूत हो जाते हैं । जो कलश में भरे दूध से देवी को स्नान कराते हैं, वे कल्प पर्यन्त क्षीरसागर में निरन्तर निवास करते हैं । इसी प्रकार जो दही से स्नान कराते हैं वे दधिसागर या दधिकुण्ड के अधिपति होते हैं । मधु – घृत तथा शर्करा ( विषम भाव से मिश्रित ) के रस से स्नान कराने वाले पुरुषों को उन उन वस्तुओं के स्वामी होने का सौभाग्य प्राप्त होता है, अर्थात् वे मधुकुल्यादि नदियों के स्वामी होते हैं । जो लोग भक्तिपूर्वक सहस्रों घड़ों से देवी को स्नान कराते हैं, वे इस लोक में जीवनपर्यन्त सुखी रहते हैं और अन्त में परलोक में भी सुखी होते हैं ।
जो भक्त देवी को श्रद्धा भक्ति पूर्वक रेशमी वस्त्र चढ़ाते हैं वे वायुलोक में जाते हैं । जो रत्न निर्मित भूषण प्रदान करते हैं, वे धनाढ्य घर में जन्म पाकर खजाने के स्वामी बनते हैं । जो काश्मीर का या मलयागिरि का चन्दन तथा कस्तूरी की बिन्दी देवी के भाल पर चढ़ाते हैं और चरणों में महावर लगाते हैं, वे देवताओं के स्वामी बनकर इन्द्रासन पर विराजमान होते हैं ।
अब पुष्प – फल चढ़ाने का विधान बताते हैं । देवी को अनेक प्रकार के फल – फूलादि चढ़ाने चाहिए । उन तथा प्राप्त वस्तुओं को देने वाले देवी की कृपा से कैलास को प्राप्त होते हैं । इसी प्रकार परा देवता को जो लोग विल्वपत्र चढ़ाते हैं । उन्हें कहीं कभी किसी प्रकार का क्लेश नहीं होता । त्रिदल विल्वपत्र पर रक्त चन्दन से सुन्दर एवं स्पष्ट एवं स्पष्ट अक्षरों में मायाबीज ‘ ह्नीं ‘ तीन बार ( तीन फांक पर ) लिखे और बड़ी सावधानी से महामाया मूल प्रकृति के मूल मन्त्र ( ॐ ह्नीं भुवनेश्वर्यै नमः ) से महादेवी जगदम्बा के श्री चरणों पर श्रद्धा भक्ति के साथ उस कोमल पवित्र पत्र को चढ़ाए । इस प्रकार प्रेम पूर्वक नियम से जो भगवती की उपासना करता है, वह ‘ मनु ‘ ( राजराजेश्वर ) होता है । साथ ही जो इसी प्रकार लिखकर एक करोड़ कोमल एवं निर्मल विल्वपत्र देवी को समर्पण करता है, वह ब्रह्माण्ड का अधिपति ( ब्रह्मा ) बन पुष्पों द्वारा देवी की अर्चना करता है, वह निश्चय ही प्रजापति के पद का अधिकारी हो जाता है । ऐसे ही अष्टगन्ध – चर्चित कोटि – कोटि मल्लिका एवं मालती से भगवती की जो पूजा करता है, वह चतुर्मुख ब्रह्मा होता है । दस करोड़ से पूजा करने वाला मनुश्ज्य देव – दुर्लभ विष्णु – पद को प्राप्त कर लेता है । क्योंकि पूर्वकाल के मन्वनतर में विष्णु भगवान् ने भी इस पद की प्राप्ति के लिए यह व्रत किया था । इस प्रकार सौ करोड़ पुष्पों को चढ़ाने से सूत्रात्मा ( सूक्षमब्रह्म ) की प्राप्ति होती है । क्योंकि विधिवत् भक्तिपूर्वक किए गए इस व्रत के प्रभाव से ही भगवान् विष्णु भी पूर्व समय में ‘ हिरण्यगर्भ ‘ कहलाए । जो कनेर के फूल, कमल तथा चम्पा के फूल से देवी की पूजा करते हैं वे पुण्यात्मा मनुष्य शक्ति की भक्ति में सर्वदा निरत होने के कारण विविध प्रकार के भोग – विलास का आनन्द लेते हैं । यों तो जपाकुसुम ( अड़हुल ), बन्धूक ( दुपहरिया का फूल ) तथा दाडिम ( अनार ) का पुष्प भगवती को विशेष प्रिय हैं । अतः इन्हें देवी को चढ़ाने । का विधान है । इनके अतिरिक्त और भी अनेक दिव्य पुष्प विधिवत् समर्पण करके देवी को प्रसन्न करना चाहिए । ऐसे दिव्य पुष्प विधिवत् समर्पण करके देवी को प्रसन्न करना चाहिए । ऐसे देवी भक्तों के पुष्प – फल का अनन्त विस्तार साक्षात् भगवान् भी करने में समर्थ नहीं हो सकते । इसलिए तत्तत् ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाले पुष्प – फलों को चढ़ाकर सर्वदा श्री महादेवी की पूजा करनी चाहिए । इस प्रकार भक्ति पूर्वक जो भगवती की उपासना करता है, उसके सभी महापातक, उपपातक आदि भस्म हो जाते हैं और शरीरान्त ( मरण ) होने पर श्री भगवती के देव दुर्लभ चरण – कमलों को प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह की बात नहीं है ।
काला अगुरु, कपूर, चन्दन, सिल्हक ( लोहबान ), घृत एवं गुग्गुल से धूप देने पर भगवती बहुत प्रसन्न होती हैं, क्योंकि उससे देवी का स्थान भी सुवासित हो जाता है । इससे सन्तुष्ट होकर देव – देवेश्वरी श्रीदेवी जी साधक को तीनों लोकों का वैभव दे देती हैं । अतः कपूर खण्डों से युक्त दीपक देवी को सर्वदा समर्पण करें । इस प्रकार सैकड़ों तथा सहस्रों दीप – दान से निः सन्देह सूर्यलोक की प्राप्ति होती है ।
इसके बाद देवी के सामने विविध प्रकार के नैवेद्य अर्पण करें । उनमें लेह्य, चोष्य, पेय, भोज्य तथा षडरस सभी पदार्थ हों । अनेक प्रकार के स्वादिष्ट रसीले दिव्यफल हों । ये सभी पदार्थ यथा सम्भव सुवर्ण – पात्रों में रखकर समर्पित करने चाहिए । क्योंकि महादेवी के तृप्त हो जाने पर तीनों लोक तृप्त हो जाते हैं । अखिल संसार के समस्त चराचर प्राणी उन्हीं के रुप तो हैं । अन्त में प्रचुरमात्रा से देवी को पवित्र गंगाजल अर्पित करें । कपूर तथा नारियल युक्त कलश जल ( शीतल जल ) भी देवी को भेंट करें ।
तत्पश्चात् मुखशुद्धि के लिए ताम्बूल, लवंग, इलायची आदि अर्पण करना चाहिए । वह ताम्बूल सुगान्धित द्रव्यों से मिश्रित रहे यह स्मरण रखने की बात है । इन्हें भक्तिपूर्वक अर्पण करने से भगवती जगदम्बा शीघ्र प्रसन्न होती है । फिर मृदंग, वीणा, मञ्जीर, डमरु तथा दुन्दुभी ( नगारे ) आदि वाद्यों की ध्वनि से अत्यन्त मनोहर संगीत, कीर्तन, प्रार्थना, स्तुति, वेदपुराणों के पाठ से उन्हें सन्तुष्ट करना चाहिए । इसके बाद श्रद्धा भक्ति और प्रेमपूर्वक श्रीभगवती को छत्र और चंवर अर्पण करें तथा राजोचित पूजा सामग्री से देवी की उपासना करें । साथ ही देवी को विविध प्रकार की दान – दक्षिणा देकर नमस्कार पूर्वक उनसे बार – बार क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए यही नियम है ।
तन्त्रोक्त विधि से ही पूजा करना चाहिए । जो कोई तन्त्रोक्त मन्त्रों द्वारा भगवती का पूजन करते हैं, वे सब इस संसार में सब प्रकार के ऐश्वर्यो से युक्त होते हैं, अर्थात् धन – धान्य, पुत्र – पौत्र एवं सुयश पाकर संसार में सम्मानित होते हैं । वे सम्राट् होते हैं और सभी राजाओं में श्रेष्ठ माने जाते हैं ।

निषेध – अक्षत से भगवान् विष्णु की, तुलसी से गणेश की, दूर्वा से देवी की और केतकी के फूल से शिवजी की पूजा नहीं करना चाहिए, ऐसा विधान है ।
7…..तिथि नैवैद्य
प्रतिपदा तिथि को भगवती जगदम्बा कामाख्या की पूजा गो घृत से करनी चाहिए अर्थात् षोडशोपचार से देवी की पूजा करके नैवेद्य के रुप में गोघृत अर्पण करके किसी देवी भक्त ब्राह्मण को दे देना चाहिए । ऐसा करने से मनुष्य कभी रोगी नहीं होता । इसी प्रकार द्वितीया तिथि को चीनी का भोग लगाकर ब्राह्मण को दे दें, इससे दीर्घायु मिलती है । तृतीया के दिन भगवती की पूजा में दूध का भोग लगाकर किसी विद्वान् द्विज को दे देना चाहिए इससे सब प्रकार का कष्ट निवृत्त हो जाता है । चतुर्थी तिथि को मालपूवा का नैवेद्य करके ब्राह्मण को दे दें इन दान के फलस्वरुप दाता के किसी कार्य में विघ्न नहीं आ सकता है । पंचमी तिथि के दिन देवी की पूजा में केले का भोग लगाकर ब्राह्मण को दे दें, ऐसा करने से दाता ( साधक ) की बुद्धि का विकास होता है । षष्ठी तिथि को देवी – पूजन में मधु का महत्त्व कहा गया है, क्योंकि मधुदान से सौन्दर्य प्राप्त होता है । सप्तमी के दिन भगवती की आराधना में गुड़ का भोग लगाकर किसी द्विज को देना चाहिए, इसके फलस्वरुप साधक पुरुष शोकमुक्त हो जाता है । अष्टमी तिथि को नारियल का भोग लगाकर किसी विप्र या तपस्वी को दे देना चाहिए, इससे किसी प्रकार सन्ताप ( चिन्ता ) दाता के पास नहीं आने पाती । नवमी तिथि के दिन देवी को धान का लावा अर्पण करके ब्राह्मण को दें इस दान के प्रभाव से दाता दोनों लोकों में सदा सुखी रहता है । दशमी के दिन भगवती को काले तिल का लडडू नैवेद्य में चढ़ाना चाहिए, पूजन के बाद वह लडडू ब्राह्मण को दे दें, ऐसा करने से यमलोक का भय दूर हो जाता है । एकादशी के दिन भगवती का जो दही का भोग लगाकर ब्राह्मण को देता है, उस पर जगज्जननी भगवती अत्यन्त प्रसन्न होती हैं । द्वादशी के दिन चिउड़े का भोग लगाकर ब्राह्मण के लिए जो देता है, वह सन्तानवान् एवं धन्य हो जाती है । जो पुरुष देवी को चतुर्दशी के दिन सत्तू का भोग लगाकर दीन को देता है, उस पर भगवान् शंकर प्रसन्न होते हैं । पूर्णिमा के दिन भगवती को खीर का भोग लगाकर जो श्रेष्ठ ब्राह्मण को अर्पण करता है, वह मानो अपने समस्त पितरों को तार देता है ।
इसी प्रकार देवी को प्रसन्न करने के लिए हवन करने की भी बात है । जिस तिथि में जो वस्तु नैवेद्य चढ़ाने के लिए कहा गया है । उसी वस्तु से उन – उन तिथियों में हवन करने का भी विधान हैं; क्योंकि इस प्रकार का हवन सभी अरिष्टों का नाशक है ।

दिवस नैवेद्य – अब वार पूजा बताते हैं – रविवार को खीर का नैवेद्य अर्पण करना चाहिए । सोमवार को दूध, मंगलवाल को केला, बुधवार को मक्खन, गुरुवार को खाँड़, शुक्रवार को चीनी तथा शनिवार को गोघृत का भोग लगाना चाहिए ।

नक्षत्र नैवेद्य – अब सत्ताइसों नक्षत्रों के नैवेद्य क्रमशः जानिए – घृत, तिल, चीनी, दही, दूध, मलाई, लस्सी, लडडू, तारफेनी, शक्कर पाश, कसार, पापड़, घीवर, बरी – पकौडी़, खजूर – रस, गुड़ घृत मिश्रित चने का मोदक, मधु ( शहद ), सूरन ( जिमीकन्द ), गुड़ – चिउड़ा, दाख, खजूर, चारक, पूआ, मक्खन, मग्दूल ( मूंग के बेसन का लडडू ) तथा अनार ( बेदाना ) ये २७ वस्तुएँ हैं जो क्रमशः प्रति नक्षत्र में भगवती को नैवेद्य के रुप में विहित हैं ।

योग नैवेद्य – अब विष्कुंभादि योगों में अर्पण करने योग्य नैवेद्यों को बताया जाता है, जिन्हें देवी का भोग लगाने से वे परम प्रसन्न होती हैं । वे पदार्थ ये हैं – गुड़ मधु, दही, मट्ठा, घी, मक्खन, ककड़ी, कोंहड़ा, लडडू, कटहल, केला, अनार, आम, तिल, सन्तरा, बेर, आँवला, दूध, चना, नारियल, नींबू, कसेरु, लीची, महुआ, जामुन, खजूर तथा सूरन – ये देवी को परम प्रिय नैवेद्य है ।

करण नैवेद्य – कसार, मण्डक, फेनी, मोदक, पापड़, लडडू, घृतपूर, तिल, दही, घृत एवं मधु से पदार्थ करणों के लिए निश्चित हैं । इन्हें आदरपूर्वक देवी को प्रत्येक करण में क्रम से अर्पण करने से भगवती प्रसन्न होकर साधक की मनोकामना पूर्ण कर देती है ।
8….मास विधि
भगवती को प्रसन्न करने का यह अदभुत श्रेष्ठ साधन है । पूरे वर्ष हर महीने इस विधि से पूजा करनी चाहिए । यह एक प्रकार या अनुष्ठान है जिसको प्रत्येक महीने केवल देवी पूजा करके ही पूर्ण किया जा सकता है ।
चैत्र मास की शुक्ल पक्ष में तृतीया के दिन महुआ के वृक्ष में भगवती की स्थापना करके वृक्ष की पूजा करें । उस वृक्ष को पाँचों प्रकार के खाद्य नैवेद्य अर्पण करना चाहिए । इस प्रकार बारह महिने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को पूजन का विधान है । इनमें वैशाख मास में गुड़ निर्मित पदार्थ भोग लगाना चाहिए । ज्येष्ठ में मधु, आषाढ़ में मक्खन से बना पदार्थ, श्रावण में दही, भादों में चीनी, आश्विन में खीर, कार्तिक में दूध, अगहन में फेनी, पौष में लस्सी, माघ में गोघृत तथा फाल्गुन मास में नारियल अर्पण करने का विधान है । इस प्रकार बारहों महीने में बारह प्रकार के नैवेद्यों से देवी का पूजन क्रमशः करना चाहिए । मंगला, वैष्णवी, माया, कालरात्रि, दुरत्यया, महामाया, मातंगी, काली, कमलवासिनी, शिवा, सहस्रचरणा तथा सर्व मंगलरुपिणी – इन द्वादश नामों का उच्चारण करके महुए के वृक्ष में विराजने वाली देव देवेश्वरी महादेवी भगवती शिवा को व्रत समाप्ति पूर्वक समस्त कामनाओं की सिद्धि के लिए इस प्रकार उनकी स्तुति करे -

नमः पुष्करनेत्रायै जगद्धात्र्यै नमोऽस्तु ते ।
माहेश्वर्ये महादेव्यै महामङ्गलमूर्त्तये ॥
परमा पापहन्त्री च परमार्ग प्रदायिनी ।
परमेश्वरी प्रजोत्पत्तिः मातगस्या महीश्वरः ।
मनस्विनी मुनिध्येया मार्तण्डसहचारिणी ॥
जय लोकेश्वरि प्राज्ञे ! प्रलयाम्बुदसन्तिभे ।
महामोह विनाशार्थ पूजिताऽसि सुराऽसुरैः ॥
यमलोकाऽभावर्त्री यमपूज्यां यमाऽग्रजा ।
यमनिग्रह रुपा च यमनीये नमोनमः ॥
समस्वभावा सर्वेशी सर्वसङ्गविवर्जिता ।
सङ्गनाशकरी काम्यरुपा कारुण्यविग्रहा ॥
कङ्कलक्रूरा कामाक्षी मीनाक्षी मर्मभेदिनी ।
माधुर्यरुपशीला च मधुरस्वरपूजिता ॥
महामन्त्रवती मन्त्रगम्या मन्त्रप्रियङ्करी ।
मनुष्यमान सगमामन्मथारी प्रियङ्करी ॥
अश्वत्त्थवटनिम्बाऽम्रक पित्थ बदरीगते ! ।
पसाऽर्ककरीरादि क्षीरवृक्षस्वरुपिणि ! ॥
दुग्धवल्लीनिवासार्हे ! दयनीये वलाधिके ! ।
दाक्षिण्य करुणारुपे जय सर्वज्ञ वल्लभे ! ॥
यह स्तोत्र देवी को परम प्रिय है । पूजनोपरान्त इस प्रकार की स्तुति से देवेश्वरी जगदम्बा की स्तुति करने वाले मनुष्यों को व्रत सम्बन्धी सम्पूर्ण पुण्य सुलभ हो जाते हैं । यह स्तोत्र देवी को प्रसन्न करने का सर्वोत्तम साधन है । अतः जो मनुष्य इसका निरन्तर पाठ करता है उसे आधि – व्याधि तथा शत्रु आदि का भय नहीं रहता । इस स्तोत्र के प्रभाव से धनार्थी धन तथा धर्मार्थी पुरुष धर्म पा लेता है । इस स्तोत्र में वशीकरण शक्ति है, अतः प्रतिदिन पढने वाले के वश में सारा चराचर रहता है । किसी प्रकार के मनोरथ की इच्छा रखने वाले के मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं और मुमुक्षु पुरुष मोक्ष पा लेते हैं । यहाँ तक कि चारों वर्ण के लोग अपने – अपने कर्त्तव्य में सफलता प्राप्त कर लेते हैं, अर्थात् ब्राह्मण वेद – सम्पन्न, क्षत्रिय विजयी, वैश्य धनाढ्य एवं शूद्र अपनी सेवाओं से सुख सम्पन्न हो जाता है । अतः जो मनुष्य श्राद्धकाल में एकाग्र मन से इस स्तोत्र का पाठ करता है या सुनता है, उसके पितर लोग कल्पान्त तक तृत्प रहते हैं । देवताओं से पूजित एवं मुक्ति – प्रदात्री इस भगवती की आराधना को जो मनुष्य श्रद्धा – भक्ति के साथ नित्य करता है, वह अवश्य ही देवीलोक का अधिकारी होता है । देवी पूजा के प्रभाव से सभी कार्य सिद्ध होते हैं और अन्त में सभी पापों को हरने वाली विशुद्ध बुद्धि प्राप्त होती है । वह पुरुष जहाँ – जहाँ जाता है, वहाँ – वहाँ सर्वत्र ही उसे धन – धान्य एवं सुयश लाभ होता है । देवी के भक्तजन को स्वप्न में भी नरक का भय नहीं रहता, और उनकी कृपा से पुत्र – पौत्रादि को वृद्धि में पूर्ण सफलता मिलती है । श्री कामाख्या देवी की पूजा एवं स्तुति सब प्रकार के मंगलों को देने वाली है । साथ ही बारहों मास महुए के वृक्ष के पूजन भी सब कामनाओं को देने वाला है । इसलिए सबको विधिवत् देवी पूजन करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने वाले लोगों को न कभी रोग होता है न कोई भूत – प्रेतादि की बाधा सताती है । साथ ही यह स्तोत्र ही मन्त्र भी है । प्रतिदिन इसका पाठ करने वाला यदि इस मन्त्र को पढ़्कर रोगी को झाड़ दें तो केवल ५ – ५ बार प्रतिदिन झाड़ने से ५ दिन में भूत – प्रेत निश्चय ही रोगी को छोड़कर भाग खड़े होते हैं और रोगी रोग मुक्त हो जाता है ।
9…..आचार्य पूजन
आचार्य को तिलक करे -
ॐ गन्ध द्वारा दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरीं सर्व भुतानां तामिहोपह्वे श्रियम् ॥

आचार्य को अक्षत लगाए -
ॐ अक्षत नाममदनतहये व पिवा अधूषता । अस्तोषत स्वभानवो विप्रान मतीयोजान्विन्द्रते हरी ।

आचार्य को माला पहनाए -
ॐ यद्यशोप्सरसा मिन्द्रश्चकार विपुलं पृथु । तेन संग्राथिता सुमन
स आवध्नामि यशोमयि ।

आचार्य को दक्षिणा दें -
ॐ हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
सदाधार पृथिवीन्द्यामुतेमां कस्मैं देवाय हविषा विधेम् ।

आचार्य की प्रार्थना करें -
गुरुब्रह्मा गुरुर्विष्णुगुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
पुनः आचार्य से प्रार्थना करें – कि हे प्रभो ! यथा विहित पूजन करवाइए जिससे भगवती प्रसन्न हों और मेरा तथा मेरे परिवार का कल्याण करें ।
आचार्य बोले कि मैं यथाविहित ही पूजन करवाऊँगा ।
जब आचार्य यजमान को पुष्प अक्षत देकर स्वस्ति वाचन करें -
ॐ स्वास्तिन ऽ इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वास्तिनः पूषा विश्ववेदाः । स्वास्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्तिनो वृहस्पतिर्द धातु । पृषदश्वामरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः । अग्निर्जिह्वामनवः सूरचक्षसो विश्वेनोदेवा अवसागमन्निह । भद्रं कर्णेभिः श्रृणुयाम देवा भद्रम्पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरंगैस्तुष्टुवा सस्तनूव्यसेमहि देव हितं यदायुः । शतामिन्नुशरदोऽअन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसन्तनूनाम् । पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मानो मद्धयारीरिषतायुर्गन्तोः । अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्ष मदितिर्म्माता स पिता स पुत्रः । विश्वेदेवाऽअदितिः पञ्चजनाऽअदितिर्ज्जातमदितिर्जनित्वम् दीर्घायुत्वाय वलाय वर्चसे सुप्रजा त्वाय सहसा अथो जीव शरदः शतम् । द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथ्वी शान्तिः आपः शान्तिः ओषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिः विश्वेदेवाः शान्ति ब्रह्मशान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः विश्वेदेवाः शान्ति ब्रह्मशान्तिः सर्व शान्तिः वनस्पतयः शान्तिः विश्वेदेवाः शान्ति ब्रह्मशान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि । विश्वानि देव सवितुर्दुरितानिपरऽसुवऽसद्भद्रं तन्न आसुव ॥ सुशान्तिर्भवतु ॥
पूजन करते समय तक देवी का ध्यान बराबर करते रहना चाहिए । वह इस प्रकार है – रक्तवर्ण वाले जल का एक समुद्र है, वह मानो एक जहाज है, जिस पर एक कमल खिला हुआ है, इस रक्तोत्पल पर कामाख्या देवी विराजमान हैं जिनके तीन सिर हैं, जो अपने छः कर – कमलों में त्रिशूल, इक्ष धनुष, रत्नजटित पाश, अंकुश, पाँच बाण, रक्त पूर्ण कपाल ( खप्पर ) धारण कर रही हैं । तीन नेत्र इनकी शोभा बढ़ा रहे हैं, स्थूल स्तनों तथा सुन्दर नितम्बों से युक्त हैं, बाल सूर्य के समान लाल वर्ण हैं जिनके – ऐसी कामाख्या भगवती हमें सुख प्रदान करें ।
वह देवी अपने भक्तों को इच्छित वरदान देने को उत्सुक दिखाई पड़ती है उनके पीछे शिवजी हैं । शिवजी के बगल में नन्दी वृषभ है जबकि देवी के बगल में सिंह हैं । वे नाना आभूषणों से सुसज्जित हैं । उनकी प्रभा चारों ओर फैल रही हैं, संसार की उत्पत्ति पालन और संहार के स्थान वही है ।
इस प्रकार की मूर्ति या तस्वीर भी रखकर पूजा की जा सकती है । कामाक्षा यन्त्र की तो पूजा अवश्यमेव करना चाहिए । इसके अभाव में पार्वती की ही तस्वीर रख लेना चाहिए ।
एक बात और ध्यान रहे कि देवी की आराधना चतुर्भुजी या दशभुजी रुप में भी कर सकते हैं । यह तो साधक की कामना और भक्ति पर निर्भर हैं ।

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>