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ग्रह पीड़ा निवारक उपाय
सूर्य
१॰ सूर्य को बली बनाने के लिए व्यक्ति को प्रातःकाल सूर्योदय के समय उठकर लाल पूष्प वाले पौधों एवं वृक्षों को जल से सींचना चाहिए।
२॰ रात्रि में ताँबे के पात्र में जल भरकर सिरहाने रख दें तथा दूसरे दिन प्रातःकाल उसे पीना चाहिए।
३॰ ताँबे का कड़ा दाहिने हाथ में धारण किया जा सकता है।
४॰ लाल गाय को रविवार के दिन दोपहर के समय दोनों हाथों में गेहूँ भरकर खिलाने चाहिए। गेहूँ को जमीन पर नहीं डालना चाहिए।
५॰ किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्य पर जाते समय घर से मीठी वस्तु खाकर निकलना चाहिए।
६॰ हाथ में मोली (कलावा) छः बार लपेटकर बाँधना चाहिए।
७॰ लाल चन्दन को घिसकर स्नान के जल में डालना चाहिए।
सूर्य के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु रविवार का दिन, सूर्य के नक्षत्र (कृत्तिका, उत्तरा-फाल्गुनी तथा उत्तराषाढ़ा) तथा सूर्य की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
चन्द्रमा
१॰ व्यक्ति को देर रात्रि तक नहीं जागना चाहिए। रात्रि के समय घूमने-फिरने तथा यात्रा से बचना चाहिए।
२॰ रात्रि में ऐसे स्थान पर सोना चाहिए जहाँ पर चन्द्रमा की रोशनी आती हो।
३॰ ऐसे व्यक्ति के घर में दूषित जल का संग्रह नहीं होना चाहिए।
४॰ वर्षा का पानी काँच की बोतल में भरकर घर में रखना चाहिए।
५॰ वर्ष में एक बार किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान अवश्य करना चाहिए।
६॰ सोमवार के दिन मीठा दूध नहीं पूना चाहिए।
७॰ सफेद सुगंधित पुष्प वाले पौधे घर में लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।
चन्द्रमा के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु सोमवार का दिन, चन्द्रमा के नक्षत्र (रोहिणी, हस्त तथा श्रवण) तथा चन्द्रमा की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
मंगल
१॰ लाल कपड़े में सौंफ बाँधकर अपने शयनकक्ष में रखनी चाहिए।
२॰ ऐसा व्यक्ति जब भी अपना घर बनवाये तो उसे घर में लाल पत्थर अवश्य लगवाना चाहिए।
३॰ बन्धुजनों को मिष्ठान्न का सेवन कराने से भी मंगल शुभ बनता है।
४॰ लाल वस्त्र लिकर उसमें दो मुठ्ठी मसूर की दाल बाँधकर मंगलवार के दिन किसी भिखारी को दान करनी चाहिए।
५॰ मंगलवार के दिन हनुमानजी के चरण से सिन्दूर लिकर उसका टीका माथे पर लगाना चाहिए।
६॰ बंदरों को गुड़ और चने खिलाने चाहिए।
७॰ अपने घर में लाल पुष्प वाले पौधे या वृक्ष लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।
मंगल के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु मंगलवार का दिन, मंगल के नक्षत्र (मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा) तथा मंगल की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
बुध
१॰ अपने घर में तुलसी का पौधा अवश्य लगाना चाहिए तथा निरन्तर उसकी देखभाल करनी चाहिए। बुधवार के दिन तुलसी पत्र का सेवन करना चाहिए।
२॰ बुधवार के दिन हरे रंग की चूड़ियाँ हिजड़े को दान करनी चाहिए।
३॰ हरी सब्जियाँ एवं हरा चारा गाय को खिलाना चाहिए।
४॰ बुधवार के दिन गणेशजी के मंदिर में मूँग के लड्डुओं का भोग लगाएँ तथा बच्चों को बाँटें।
५॰ घर में खंडित एवं फटी हुई धार्मिक पुस्तकें एवं ग्रंथ नहीं रखने चाहिए।
६॰ अपने घर में कंटीले पौधे, झाड़ियाँ एवं वृक्ष नहीं लगाने चाहिए। फलदार पौधे लगाने से बुध ग्रह की अनुकूलता बढ़ती है।
७॰ तोता पालने से भी बुध ग्रह की अनुकूलता बढ़ती है।
बुध के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु बुधवार का दिन, बुध के नक्षत्र (आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती) तथा बुध की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
गुरु
१॰ ऐसे व्यक्ति को अपने माता-पिता, गुरुजन एवं अन्य पूजनीय व्यक्तियों के प्रति आदर भाव रखना चाहिए तथा महत्त्वपूर्ण समयों पर इनका चरण स्पर्श कर आशिर्वाद लेना चाहिए।
२॰ सफेद चन्दन की लकड़ी को पत्थर पर घिसकर उसमें केसर मिलाकर लेप को माथे पर लगाना चाहिए या टीका लगाना चाहिए।
३॰ ऐसे व्यक्ति को मन्दिर में या किसी धर्म स्थल पर निःशुल्क सेवा करनी चाहिए।
४॰ किसी भी मन्दिर या इबादत घर के सम्मुख से निकलने पर अपना सिर श्रद्धा से झुकाना चाहिए।
५॰ ऐसे व्यक्ति को परस्त्री / परपुरुष से संबंध नहीं रखने चाहिए।
६॰ गुरुवार के दिन मन्दिर में केले के पेड़ के सम्मुख गौघृत का दीपक जलाना चाहिए।
७॰ गुरुवार के दिन आटे के लोयी में चने की दाल, गुड़ एवं पीसी हल्दी डालकर गाय को खिलानी चाहिए।
गुरु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु गुरुवार का दिन, गुरु के नक्षत्र (पुनर्वसु, विशाखा, पूर्व-भाद्रपद) तथा गुरु की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
शुक्र
१॰ काली चींटियों को चीनी खिलानी चाहिए।
२॰ शुक्रवार के दिन सफेद गाय को आटा खिलाना चाहिए।
३॰ किसी काने व्यक्ति को सफेद वस्त्र एवं सफेद मिष्ठान्न का दान करना चाहिए।
४॰ किसी महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए जाते समय १० वर्ष से कम आयु की कन्या का चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेना चाहिए।
५॰ अपने घर में सफेद पत्थर लगवाना चाहिए।
६॰ किसी कन्या के विवाह में कन्यादान का अवसर मिले तो अवश्य स्वीकारना चाहिए।
७॰ शुक्रवार के दिन गौ-दुग्ध से स्नान करना चाहिए।
शुक्र के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शुक्रवार का दिन, शुक्र के नक्षत्र (भरणी, पूर्वा-फाल्गुनी, पुर्वाषाढ़ा) तथा शुक्र की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
शनि
१॰ शनिवार के दिन पीपल वृक्ष की जड़ पर तिल्ली के तेल का दीपक जलाएँ।
२॰ शनिवार के दिन लोहे, चमड़े, लकड़ी की वस्तुएँ एवं किसी भी प्रकार का तेल नहीं खरीदना चाहिए।
३॰ शनिवार के दिन बाल एवं दाढ़ी-मूँछ नही कटवाने चाहिए।
४॰ भड्डरी को कड़वे तेल का दान करना चाहिए।
५॰ भिखारी को उड़द की दाल की कचोरी खिलानी चाहिए।
६॰ किसी दुःखी व्यक्ति के आँसू अपने हाथों से पोंछने चाहिए।
७॰ घर में काला पत्थर लगवाना चाहिए।
शनि के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शनिवार का दिन, शनि के नक्षत्र (पुष्य, अनुराधा, उत्तरा-भाद्रपद) तथा शनि की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
राहु
१॰ ऐसे व्यक्ति को अष्टधातु का कड़ा दाहिने हाथ में धारण करना चाहिए।
२॰ हाथी दाँत का लाकेट गले में धारण करना चाहिए।
३॰ अपने पास सफेद चन्दन अवश्य रखना चाहिए। सफेद चन्दन की माला भी धारण की जा सकती है।
४॰ जमादार को तम्बाकू का दान करना चाहिए।
५॰ दिन के संधिकाल में अर्थात् सूर्योदय या सूर्यास्त के समय कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीम करना चाहिए।
६॰ यदि किसी अन्य व्यक्ति के पास रुपया अटक गया हो, तो प्रातःकाल पक्षियों को दाना चुगाना चाहिए।
७॰ झुठी कसम नही खानी चाहिए।
राहु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शनिवार का दिन, राहु के नक्षत्र (आर्द्रा, स्वाती, शतभिषा) तथा शनि की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
केतु
१॰ भिखारी को दो रंग का कम्बल दान देना चाहिए।
२॰ नारियल में मेवा भरकर भूमि में दबाना चाहिए।
३॰ बकरी को हरा चारा खिलाना चाहिए।
४॰ ऊँचाई से गिरते हुए जल में स्नान करना चाहिए।
५॰ घर में दो रंग का पत्थर लगवाना चाहिए।
६॰ चारपाई के नीचे कोई भारी पत्थर रखना चाहिए।
७॰ किसी पवित्र नदी या सरोवर का जल अपने घर में लाकर रखना चाहिए।
केतु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु मंगलवार का दिन, केतु के नक्षत्र (अश्विनी, मघा तथा मूल) तथा मंगल की होरा में अधिक शुभ होते हैं।…

2…..कालसर्प योग निवारण के अनेक उपाय हैं । इस योग की शांति विधि विधान के साथ योग्य विद्धान एवं अनुभवी ज्योतिषी, कुल गुरू या पुरोहित के परामर्श के अनुसार किसी कर्मकांडी ब्राह्मण से यथा योग्य समयानुसार करा लेने से दोष का निवारण हो जाता हैं । कुछ साधारण उपाय निम्न हैं:-
1. घर में वन तुलसी के पौधे लगाने से कालसर्प योग वालों को शान्ति प्राप्त होती हैं ।
2. प्रतिदिन ‘‘सर्प सूक्त‘‘ का पाठ भी कालसर्प योग में राहत देता हैं ।
3. विश्व प्रसिद्ध तिरूपति बाला जी के पास काल हस्ती शिव मंदिर में भी कालसर्प योग शान्ति कराई जाती हैं।
4. इलाहाबाद संगम पर व नासिक के पास त्रयंबकेश्वर में व केदारनाथ में भी शान्ति कराई जाती हैं ।
5. ऊँ नमः शिवाय मंत्र का प्रतिदिन एक माला जप करें । नाग पंचमी का वृत करें, नाग प्रतिमा की अंगुठी पहनें ।
7. कालसर्प योग यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा करवाकर नित्य पूजन करें । घर एवं दुकान में मोर पंख लगाये ।
8. ताजी मूली का दान करें । मुठ्ठी भर कोयले के टुकड़े नदी या बहते हुए पानी में बहायें ।
9. महामृत्युंजय जप सवा लाख , राहू केतु के जप, अनुष्ठान आदि योग्य विद्धान से करवाने चाहिए ।
10. नारियल का फल बहते पानी में बहाना चाहिए । बहते पानी में मसूर की दाल डालनी चाहिए ।
11. पक्षियों को जौ के दाने खिलाने चाहिए ।
12. पितरों के मोक्ष का उपाय करें । श्राद्ध पक्ष में पितरों का श्राद्ध श्रृृद्धा पूर्वक करना चाहिए ।
कुलदेवता की पूजा अर्चना नित्य करनी चाहिए ।
13. शिव उपासना एवं रूद्र सूक्त से अभिमंत्रित जल से स्नान करने से यह योग शिथिल हो जाता हैं ।
14. सूर्य अथवा चन्द्र ग्रहण के दिन सात अनाज से तुला दान करें ।
15. 72000 राहु मंत्र ‘‘ऊँ रां राहवे नमः‘‘ का जप करने से काल सर्प योग शांत होता हैं ।
16. गेहू या उड़द के आटे की सर्प मूर्ति बनाकर एक साल तक पूजन करने और बाद में नदी में छोड़ देने तथा तत्पश्चात नाग बलि कराने से काल सर्प योग शान्त होता हैं ।
17. राहु एवं केतु के नित्य 108 बार जप करने से भी यह योग शिथिल होता हैं । राहु माता सरस्वती एवं
केतु श्री गणेश की पूजा से भी प्रसन्न होता हैं ।
18. हर पुष्य नक्षत्र को महादेव पर जल एवं दुग्ध चढाएं तथा रूद्र का जप एवं अभिषेक करें ।
19. हर सोमवार को दही से महादेव का ‘‘ऊँ हर-हर महादेव‘‘ कहते हुए अभिषेक करें ।
20. राहु-केतु की वस्तुओं का दान करें । राहु का रत्न गोमेद पहनें । चांदी का नाग बना कर उंगली में
धारण करें । शिव लिंग पर तांबे का सर्प अनुष्ठानपूर्वक चढ़ाऐ। पारद के शिवलिंग बनवाकर घर में प्राण प्रतिष्ठित करवाए ।
3…ग्रहों का उपाय वनस्पति से
ग्रहों की माया
सूर्य :-
ग्रह को अनुकूल बनाने के लिए-रविवार को बेल की जड़ , सोने के ताबीज मे गुलाबी धागे के सहारे हाथ मे धारण करनी चाहिए l
चन्द्र :-
सोमवार के दिन सफ़ेद ऊन के धागे मे खिरनी की जड़ धारण करने से लाभ होता है l
मंगलवार :-
मंगलवार के दिन लाल धागे मे , सोने के ताबीज मे अनन्त-मूल की जड़ धारण करना उत्तम है l
बुध :-
बुधवार के दिन हरे धागे मे चांदी के यंत्र मे रखकर विधारा की जड़ धारण करना लाभदायक होता है l
गुरूवार :-
गुरूवार के दिन केले की जड़ (कुश विधान हल्दी या नारंगी की जड़ भी उपयोगी बताते है l )पीले धागे से, यंत्र मे पहने l
शुक्र:-
सरपंखा की जड़ शुक्रवार को स्वर्ण -यंत्र मे सफ़ेद धागे से पहने l
शनि :-
बिछुआ कि जड़, राँगे के ताबीज मे काले धागे के दुआर शनिवार को धारण करेl
राहु:-
सफ़ेद चंदन की जड़ लोहे के ताबीज मे बुधवार को नीले धागे मे डालकर धारण करें l
केतु :-
असगंध की जड़ गुरूवार के दिन चांदी के यंत्र मे, नीले धागे के साथ पहिननी चाहिए l
विशेष ध्यान देने वाली बात यह है कि तांत्रिक-प्रयोग के लिए किसी भी वनस्पति को पूर्व वर्णित नियमानुसार, एक दिन पूर्व ही पोधो को निमंतरण देकर विधिपूर्वक ही प्रयाप्त किया जाए l साथ ही – मुहूर्त, मन्त्र पूजा विधि के लिए समन्धित निर्देशों का पालन भी अनिवार्य होता है l

4…ग्रह-दोष निवारक अंगूठी :-
रतन और वनस्पति कि भांति धातु- विशेष कि अंगूठी भी ग्रह-पीड़ा का निवारण करती है l यथा -

सूर्य :-
सूर्य-ग्रह को अनुकूल करने के लिए, रविवार को प्रात: सूर्यदये के समय गाये के दूध और घी मे, ताबे की अगूठी डुबोकर उसे पहिनना चाहिए l साथ मे सूर्य मन्त्र का जप भी आवश्यक है l

चन्द्र :-
सोमवार को प्रात: गाये के कच्चे दूध और सफ़ेद चंदन के घोल मे डुबोकर शंख की अंगूठी चन्द्र-मन्त्र जपते हुए पहिने l

मंगलवार :-
मंगलवार को प्रात: गो-दुग्ध (कच्चे) मे डुबोकर भोम- मन्त्र जपते हुए स्वर्ण-मुद्रा धारण करेl

बुध :-
बुधवार को प्रात: शहद, सफ़ेद चंदन, घी और गो-दुग्ध मे डुबोकर अंगूठी पहिनना चाहिए l अंगूठी पीतल या चांदी की हो जाती है l

गुरु :-
घी, चंदन व् जल मे चांदी की अंगूठी को स्नान कराकर गुरूवार को प्रात: धारण करना लाभप्रद होता है l

शुक्र :-
शुक्रवार को प्रात: शहद, और गो-दुग्ध मे प्लेतिनम की अंगूठी को स्नान कराकर पहनेl

शनि :-
शनिवार को सीसे (राँगे) की अंगूठी को सायेकाल गो-दुग्ध मे स्नान कराकर पहिननी चाहिए l

राहु :-
शनिवार को दोपहर मे , लोह-मुद्रिका को गाये के दूध मे स्नान कराकर पहिनना चाहिए l

केतु :-
शनि या मंगलवार के दिन माध्यम मे सीसे को अंगूठी पहिनने से लाभ होता है l

5….जय शनि देव
इस स्त्रोत्र के नियमित पाठ मात्र से शनि कितना भी अशुभ हो निश्चित रूप से शांत हो कर शुभ परिणाम प्रदान करता है
दशरथ कृत शनि स्त्रोत्र :-
नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ।।१।।
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।२।।
नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते।।३।।
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नम: ।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।४।।
नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ।।५।।
अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते ।
नमो मन्दगते तुभ्यं निरिाणाय नमोऽस्तुते ।।६।।
तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ।।७।।
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे ।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ।।८।।
देवासुरमनुष्याश्च सिद्घविद्याधरोरगा: ।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:।।९।।
प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत ।
एवं स्तुतस्तद सौरिग्र्रहराजो महाबल: ।।१०।।
सरल शनि मंत्र व स्तोत्र :-
(1) सूर्यपुत्रो दीर्घदेहो विशालाक्षः शिवप्रियः
मंदचार प्रसन्नात्मा पीड़ां हरतु में शनिः
(2)नीलांजन समाभासं रवि पुत्रां यमाग्रजं।
छाया मार्तण्डसंभूतं तं नामामि शनैश्चरम्।।
(3) प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
(4) ओम शं शनैश्चराय नमः।
ध्वजिनी धामिनी चैव कंकाली कलहप्रिया।
कण्टकी कलही चाऽथ तुरंगी महिषी अजा।। शं शनैश्चराय नमः।
(5)ओम शं शनैश्चराय नमः। कोणस्थ पिंगलो बभ्रु कृष्णौ रौद्रान्तको यमः।
सौरि शनैश्चरा मंद पिप्पलादेन संस्थितः।। ओम शं शनैश्चराय नमः।
शनि देव के गुप्त उपाय
शनि के कोप से बचने हेतु आप हनुमान जी की आराधाना कर सकते हैं, क्योंकि शास्त्रों में हनुमान जी को रूद्रावतार कहा गया है।
शनि की साढ़े साते से मुक्ति हेतु :- शनिवार को बंदरों को केला व चना खिला सकते हैं।
नाव के तले में लगी कील और काले घोड़े का नाल भी शनि की साढ़े साती के कुप्रभाव से आपको बचा सकता है ,अगर आप इनकी अंगूठी बनवाकर धारण करते हैं।
लोहे से बने बर्तन, काला कपड़ा, सरसों का तेल, चमड़े के जूते, काला सुरमा, काले चने, काले तिल, उड़द की साबूत दाल ये तमाम चीज़ें शनि ग्रह से सम्बन्धित वस्तुएं हैं, शनिवार के दिन इन वस्तुओं का दान करने से एवं काले वस्त्र एवं काली वस्तुओं का उपयोग करने से शनि की प्रसन्नता प्राप्त होती है। शनि के लिए काले द्रव्यों से पूजा होती है और काली वस्तुएँ दान दी जाती हैं।
तिल, तेल और लोहा शनि के लिए दान की प्रिय वस्तुएँ हैं।
जन्मपत्रिका के निर्णय के आधार पर शनि के रत्न नीलम का धारण करना अच्छा रहता है।
शनि निम्न वर्ग के प्रतिनिधि हैं अत: गरीब, मजदूर, निर्बल और बेसहारा लोगों की सेवा करने पर शनिदेव प्रसन्न होते हैं। छोटे कर्मचारी वर्ग के ग्रह भी शनि ही हैं अत: इन वर्गो की सेवा करने या उन्हें सुख देने या दान देने से शनि प्रसन्न होते हैं।
प्रतिदिन लोबान युक्त बत्ती सरसों तेल के दीये में डालकर शाम को पीपल की जड़ में दीपक जलाएं।
कच्चे धागे को सात बार पीपल के पेड़ में लपेटें। बन्दरों को गुड़ और चना, भैसों को उड़द के आटे की रोटी खिलाएं।
जटायुक्त कच्चे नारियल सिर के ऊपर से 11 बार उतार कर 11 नारियल बहते जल में प्रवाहित करें।
काला कपड़ा, कंबल और छाया पात्र दान करें।
शनि ग्रह की प्रिय वस्‍तुएं जैसे गाली गाय, काला कपड़ा, तेल, उड़द, खट़टा-कसैला पदार्थ, काले पुष्‍प, चाकू, छाता, काली चप्‍पल और काले तिल आदि का शनिवार के दिन दान करना चाहिए।
शनि का रत्‍न नीलम, जामुनिया, कटेला पांच रत्‍ती से ऊपर का धारण करना चाहिए।
पीपल के पेड़ के नीचे प्रदोष काल में कड़ुए तेल का दीपक जलाना चाहिए। तिल्‍ली के तेल का दीपक भी जला सकते हैं।
काला तिल चढ़ाने से विशेष लाभ मिलता है।
शनिवार को सायंकाल बूढ़े-बुजुर्ग की सेवा करनी चाहिए। काले घोड़े की नाल का छल्‍ला पहनना उत्‍तम माना जाता है। भैंसा या घोड़े को शनिवार के दिन काला देशी चना खिलाने से शनि जी प्रसन्‍न होते हैं।
शनिवार के दिन पुष्‍प नक्षत्र होने पर बिछुआ बूटी की जड़ एवं शमी (छोकर) की जड़ को काले धागे में बांधकर दाहिनी भुजा में धारण करने से शनि का प्रभाव कम होता है।
मंगलवार, शनिवार व्रत से शनि जी प्रसन्‍न होते हैं। बजरंगबाण का पाठ और हनुमान जी आराधना भी साढ़ेसाती/ढैया में विशेष रूप से प्रभावकारी मानी गई है।
शनि-मंगल मंत्र का जाप:-
ऊं शं शनैश्‍चराय नम:। ऊं प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:।
शनि के दुष्‍प्रभाव को दूर करने के लिए इन मंत्रों का 23000 की संख्‍या में जाप करना चाहिए।

6…..दान का महत्व एवं विधि
ज्योतिष शास्त्र में ग्रह शांति के विभिन्न उपायों में ग्रहनुसार दान देने का विशेष महत्व है किन्तु ऐसा देखने में आया हैं कि लोग दान के महत्व व विधि से पूर्णतः अवगत नहीं है। इसलिये दान देने के बावजूद भी दान का फल दानदाता को नहीं मिल पाता है।
दान देने की सही विधि व सही कारण दान के पुण्य को दुगुना कर देता है। दान का फल उतना ही लौटकर आ जाता है, जैसे :- कुएं में झाककर आवाज देने से
हमारे स्वर पुनः लौट आते है। दान का सुफल किसी भी रुप में निश्चित मिलता ही है। किन्तु हम यह जान नहीं पाते कि किस दान का क्या सुफल हमें मिला। दान के पुण्य का न तो कोई निश्चित समय होता है और न ही कोई निश्चित मात्रा।
अशुभ ग्रहो कि शांति और दान किये जाते है
ग्रहो के दान कब करे
दान देने से पूर्व यह जरुर मालूम होना चाहिये कि दान किसे, कब और क्यों देना है, अर्थात दान हमेशा किसी जरुरतमंद को, किसी उपयुक्त दिन व समय में देना शुभ माना गया है।
दान करने के उपरांत दान के बारे में किसी अन्य व्यक्ति से चर्चा करने से दान का महत्व खत्म हो जाता है। अतः जब हम निःस्वार्थ भाव से, शुद्ध मन से, शुद्ध भावना से बिना विचलित हुये एवं विनम्रता से दान करते है तभी पुण्य कमा सकते है।
दान हमेशा ही फल्दाये हो ऐसा नही है, लाल किताब के अनुसार निम्न स्थितियो मे दान नही करना चाहिए:-
1.जातक की कुण्डली जो ग्रह उच्च का है उससे सम्बन्धित दान नही देना चाहिए व नीच ग्रह से सम्बन्धित दान कभी लेना नही चाहिए।
2.यदि गुरु सप्तम भाव मे हो तो साधु या धर्म स्थल के पुजारी को नए कपडों का दान नही करना चाहिए.
3.दशम भाव मे गुरु व चतुर्थ स्थान चन्द्रमासे गज्केशरी योग बनने पर जातक को धर्मार्थ स्थल,मन्दिर,मस्जिद आदि नही बनवानी चाहिए ,इससे जातक पर झूठे इल्जाम लगते है व सजा भी हो सकती है।
4. जिस जातक के कुण्डली मे चन्द्रमा छठे घर मे हो तो उसे आमजन हेतु कुआं,तालाब के लिए दान नही देना चाहिए व यदि चन्द्रमा बारहवें घर मे हो तो भिखारियो को नित्य भोजन ना कराए,समयांतराल मे कर सकते है,ऐसा करने से स्वास्थ्य मे गिरावट आ सकती है।
5. यदि शुक्र भाग्य भाव मे हो तो ऐसे जातक को पढाई के लिए छात्रवृति,पुस्तके व दवा के लिए पैसे दान नही करने चाहिए (पुस्तके व दवा दी जा सकती है)।
6. यदि शनि अष्टम भाव मे हो तो ऐसे जातक को किसी के लिए मुफ्त प्रयोगार्थ आवास का निर्माण नही कराना चाहिए,ऐसा करने पर वह स्वयं घर्हीन हो सकता है।
7. यदि शनि लग्न मे व गुरु पंचम भाव मे हो तो ऐसे जातको को कभी भी ताम्बे का दान नही करना चाहिए ऐसे मे अशुभ समाचार प्राप्त होते है।
वर्जित वस्तुओ का दान करने से बचना चाहिए
१. दान देने से पूर्व यह जरुर मालूम होना चाहिये कि दान किसे, कब और क्यों देना है, अर्थात दान हमेशा किसी जरुरतमंद को, किसी उपयुक्त दिन व समय में देना शुभ माना गया है।
२. शास्त्रों में विभिन्न ग्रहों की शांति के लिये विभिन्न उपाय बताये गये है। विभिन्न ग्रहो के अनुसार दान भी अलग – अलग है। अतः ग्रहों के उपयुक्त दिन, रंग व वस्तु को ध्यान में रखकर दान देना चाहिए।
३. सूर्य ग्रह की शांति के लिये आटे, गुड तथा तांबे का दान करना चाहिए।रत्नों में माणिक भी दान कर सकते है।
४. चंद्र ग्रह की शांति हेतु चांदी, दूध, चांवल, सफेद कपडे, सफेद मिठाई, आदि का दान करना चाहिए। शंख, कपूर, श्वेत चंदन और मोती का दान भी उपयुक्त है।
५. मंगल ग्रह की शांति के लिये लाल कपडा, मूंगा, मसूर की दाल, गुड, सिन्दूर, व लाल मिर्ची का दान उपयुक्त माना गया है।
६. बुध ग्रह की शांति के लिये हरे कपडे, हरा धनिया, पन्ना, साबूत मूंग की दाल, हरी सब्जी, कांस्य के बर्तन, घी, मिश्री, आदि का दान उपयुक्त है।
७. बृहस्पति ग्रह की शांति हेतु पीले वस्त्र, चने की दाल, सोना, पुखराज, पीले फूल, केसर, पीले फल, हल्दी, शहद, भूमि आदि का दान उपयुक्त है।
८. शुक्र ग्रह की शांति के लिये चांदी, दूध, चांवल, सफेद कपडे, सफेद मिठाई, आदि का दान करना चाहिए। शंख, कपूर, श्वेत चंदन और अमेरिकन डायमंड का दान भी उपयुक्त है।
९. शनि ग्रह की शांति हेतु काले वस्त्र, काला छाता, काला कम्बल, काला नमक, उदड की दाल, लोहा, नेत्र रोग की दवाईयां, नीलम, या तुरमुली, काला तिल, चमडा, सरसों का तेल, शराब, आदि का दान उचित माना गया है।
१०. राहु ग्रह की शांति के लिये जौ, गोमेद, उडद, सोने का साप, सात प्रकार के अन्न, नीला वस्त्र, काले फूल, काले तिल, तांबे का बर्तन आदि का दान करना उपयुक्त माना गया है।
११. केतु ग्रह की शांति हेतु उडद, कम्बल, कस्तूरी, लहसुनिया, काले फूल, काले तिल, लोहा, सोना व सात प्रकार के अन्न दान करना उपयुक्त माना गया है।
दान करने के उपरांत दान के बारे में किसी अन्य व्यक्ति से चर्चा करने से दान का महत्व खत्म हो जाता है। अतः जब हम निःस्वार्थ भाव से, शुद्ध मन से, शुद्ध भावना से बिना विचलित हुये एवं विनम्रता से दान करते है तभी पुण्य कमा सकते है।

7…दान व दान के प्रकार …..
भारतीय संस्कृति मे दान का महत्व सर्वादिक बताया गया है हमारे यहाँ जप तप दान यज्ञ का बड़ा भारी प्रभाव है। जब औशधीयों द्वारा किसी बीमार व्यक्ति की व्याधी समाप्त नही होती तो दवा के साथ दुआ व दान की गरिमा को अधिक सफल माना गया है। हमारे यहाँ ग्रहों द्वारा पीडि़त व्यक्ति को पंडि़त लोग दान का सहारा देकर रोग मुक्ति के उपाय सुझाते रहे है गोदान,कन्यादान आदि को हमारे षास्त्रों ने दान की श्रेश्ट श्रेणी में रखा है आईये कुछ एैसे दान भी है जिन्हें हम समाज के हित में करने का बीड़ा उठावें।
1. रक्तदान:- लोगो ने रक्तदान को महादान की संबा दी है व “सारे दान एक बार रक्त दान बार-बार” कहा है।
2. औशघीदानः- अस्वस्थ व्यक्ति को स्वस्थ करने के लिए रोगी व असमर्थ लोगो को औशघी दिलाना श्रेश्ठ दान है।
3. आरोग्यदानः- किसी असहाय व्यक्ति को अपनी देख-रेख में रखकर उसका ईलाज व आपरेषन आदि करवाना।
4. अंगदानः- रोगी का प्राण बचाने के लिए रक्त,माँस या किसी अंग का दान देना।
5. नेत्रदानः- मरणोपरान्त अपने नैत्रों को किसी एैसे व्यक्ति हेतु दान कर जाना जो जन्मान्घ है व हमारे नेत्र दान से दुनिया की रोषनी देख सकें।
6. कायादानः- अपने षरीर से परोपकार के कार्य करना व निस्वार्थ कार्य करके पुण्योपार्जन किया जाय, लुले लगंड़े आदि अथवा किसी अनाथ व निराघार बालक को संरक्षण देना। कायादान दपने आप मे एक विषिश्ठ पुण्य है। किसी व्यक्ति के पास धन न हो साधन न हो, बुद्वि या वाचिक षक्ति न हो फिर भी वह षरीर द्वारा दुसरे की सेवा करें।
7.श्रमदानः- श्रम दान प्रायः सामुहिक कार्यो के लिए होता है। श्रमदान से कई तालाब,सड़क बाॅध आदि का निर्माण करके ग्रामीण लोगो ने अपने कर्तव्य व ग्राम धर्म का परिचय दिया है।
8.समयदानः- व्यक्ति अपनी दिन चर्या मे से थोड़ा समय निकाल कर या ग्रीश्मावकाष या अन्य छुट्टीयों मे सत्कार्य के लिए अपना समय दे।
9.अभयदानः- सब दोनो मे अभयदान श्रेश्ट है बड़े-बड़े दानो का फल समय आने पर क्षीण हो जाता है लेकिन भयभीत प्राणी को अभयदान का फल कभी क्षीण नही होता।
10.आर्षीवाद दानः- हृदय से दिया गया आर्षीर्वाद फलदायी होता है बहु-सास को दैनिक प्रणाम करे तो मन वेमनस्य दूर होकर झगड़े कम होते है धर मे सुखषान्ति रहती है।
11. दयादानः- दयाधर्म का मूल हे, पाप मूल अभिमान,
तुलसी दया न छोडि़ये जब लग घट मे प्राण।।
जो गरीब का हित करे धन्य-धन्य वे लोग कहाँ सुदामा वापुरो कृश्ण मिताई योग, दया दि लमे रखिये, तू क्यो निरदय होय, सरई के सब जीव है कीड़ी कुन्जर सोय महापुरूशो ने कहा है-
छया के समान कोई धर्म नही, हिसां के समान कोई पाप नही, ब्रह्मचर्य के समान कोई व्रत नही व ज्ञान के समान कोई साधन नही, षान्ति के समान कोई सुख नही, ऋण के समान कोई दुख नही, ज्ञान के समान कोई पवित्र नही, ईष्वर के समान कोई इश्छ नही।
12.क्षमादाानः- क्षमा बड़न को चाहिए छोटेन को उत्पात,
कहा कवश्णु को धट गयो जो भृगूमारी लात,
क्षमा करने से मानसिक षान्ति मिलती है।
13.त्यागदानः- सारे सुख त्याग से मिलते है, दुसरो के अधिकार के लिए अपने अधिकार का त्याग करनो, दुसरो की इच्छा के लिए अपनी इच्छा त्याग करना, एैसा करने से निष्चय ही हमारा जीवन सफल होगा।
जे तो को काँटा बुवै ताही तू फूल बोही तू फूल के फूल है वो को है तिरसुल त्याग से सयुक्त परिवार में रहकर संयुक्त परिवार के लिए त्याग करना, सयुक्त परिवार मे बाप-बेटा, सास-बहु, दवेरानी-जिठानी, भाई-बहन, पति-पत्नि, भाई-बहन, एक दुसरे के लिए त्याग करना संयुक्त परिवार एक अनमोल कवच है।
इसी श्रेणी के जीवन में कई दान है जिनसे हमारे जीव न मे सुख षान्ति का अनुभव किया जा सकता है।

8….शनि साढ़े-साती निवारण
१॰ किसी छोटे मिट्टी के बर्तन में या मोटा मजबूत कपड़े में २५० ग्राम तम्बाकू (बनाकर या बना हुआ खरीद कर) तथा ५०० ग्राम तेल डालकर उस बर्तन या कपड़े में नीचे एक छोटा-सा छेद करें तथा उसको शनिवार के दिन पीपल के पेड़ पर बाँध दें । फिर ५ सप्ताह तक प्रति शनिवार उसमें ५०० ग्राम तेल डालें ।
२॰ जिस पेड़ पर शहद का छत्ता लगा हो उस पेड़ के नीचे हर शनिवार के दिन तेल का चिराग जलायें । कच्चे सूत को शहद के छत्ते के समीप से जड़ तक बाँधें । सात शनिवार तक करने के बाद उस छत्ते को तोड़ कर उससे जो शहद निकले उसका प्रतिदिन सेवन करें ।
बारह राशियों पर साढ़े-साती
मेष राशि की साढ़े-सातीः- जौ का सवा पाँच किलो आटा पिसवायें और उस आटे से रोजाना सवा सौ ग्राम आटा चीटियों के बिल पर चढ़ायें । यह क्रिया करने के प्रथम तथा आखिरी दिन चीटियों के बिल पर तेल का दीपक जलायें ।
वृष राशि की साढ़े-सातीः- पूर्णमासी के दिन सवा ५ किलो चावल का आटा बनवायें, प्रतिदिन उस आटे में से सवा सौ ग्राम गाय के दूध के साथ गाय को खिलायें । हर रोज पीपल के पत्ते या पीपल पर किसी भी चीज से अपना नाम लिखें । आखिरी दिन पीपल पर घी की ज्योत लगाके मीठा प्रसाद चढ़ायें ।
मिथुन राशि की साढ़े-सातीः- गाय का सींग अपने घर रखो, प्रतिदिन उस सींग को अपने माथे से लगायें । सवा महीने तक प्रतिदिन गाय को बाजरा, चौलाई तथा मीठा मिलाकर खिलायें ।
कर्क राशि की साढ़े-सातीः- हर रविवार के दिन कन्याओं (छः वर्ष तक की) को हलवा पूरी से भोजन करायें तथा उन्हें सवा रुपया भेंट करें । किसी कन्या की शादी हो रही हो तो उसमें कन्यादान करें, बारातियों के लिए बन रहे खाने में यथा-शक्ति धन का योगदान करें ।
सिंह राशि की साढ़े-सातीः- भूखे-गरीब, गरीब-कन्याओं को भोजन-कपड़े दें । प्रत्येक मंगलवार भूखे को रोटी-कपड़ा दें । पीपल पर तेल की ज्योत जलायें ।
कन्या राशि की साढ़े-सातीः- जो मनुष्य पागल की स्थिति में हो, जिसको सांसारिक विषयों का ज्ञान न हो, उसे अपने हाथों से खाना खिलायें और अपने हाथों से नहलायें, नये कपड़े पहनायें । यह कार्य करने के बाद किसी अनजान जगह पर शनिवार के दिन तेल का चिराग जलाकर हल्दी की दो गाँठ रखकर आ जायें । यह कार्य पाँच शनिवार करना है ।
तुला राशि की साढ़े-सातीः- रविवार के दिन सवा किलो सरसों का तेल लेकर पीपल की पाँच बार प्रदक्षिणा करें फिर उसी दिन उस तेल से हलवा, पूरी तथा सब्जी बनायें तथा बारह वर्ष के कम-से-कम दो लड़कों को भोजन करायें ।
वृश्चिक राशि की साढ़े-सातीः- सोमवार के दिन खीर बनाकर कुछ खीर लेकर उसमें गुलाब के पाँच फूल मिलाकर शिवलिंग पर चढ़ायें । फिर उन फूलों को शिवजी के आशीर्वाद-स्वरुप वापस उठाकर ले आयें तथा शेष बची खीर में उन फूलों को तोड़कर मिला दें । साठ वर्ष से अधिक आयु के कम-से-कम पाँच बूढ़ों को वह खीर खिलायें ।
धनु राशि की साढ़े-सातीः- सोमवार के दिन अपनी मेहनत की कमाई से नये कपड़े खरीद कर अपने माता-पिता को नहला-कर पहनायें । उनसे अपनी पिछली गलतियों के लिये माफी माँगे । घर में ज्योत जलायें । उसके बाद आने वाले अन्य चार सोमवार नये कपड़े आवश्यक नहीं है लेकिन शेष क्रिया करनी है । अगर किसी के माता-पिता न हो, तो दूसरे किसी दोस्त आदि के माता-पिता की सेवा कर सकते हैं ।
मकर राशि की साढ़े-सातीः- रविवार की रात्रि में किसी छोटे बच्चों की स्कूल के सामने सरसों के तेल में भिगोकर पाँच हल्दी की गाँठ किसी भारी वस्तु के नीचे दबा कर रखें । फिर सोमवार से अगले सोमवार तक स्कूल में काले चने उबालकर ले जाकर बाँट दें । अगर स्कूल में नहीं कर सको तो कहीं बच्चों का समूह हो उन्हें बांट सकते हैं । उक्त क्रिया प्रत्येक रविवार व सोमवार को करनी है ।
कुम्भ राशि की साढ़े-सातीः- सोमवार से अगले सोमवार तक प्रातःकाल शिवलिंग पर घी की ज्योत लगाकर हाथ में गंगाजल लेकर २१ प्रदक्षिणा करें तथा अन्तिम प्रदक्षिणा में गंगाजल शिवलिंग पर चढ़ादें ।
मीन राशि की साढ़े-सातीः- सतनजा बनाकर २१ दिन लगातार चलते दरिया में रोज एक मुट्ठी डालें । प्रतिदिन नदी के किनारे एक तेल का दिया जलाकर एक मुट्ठी सतनजा चढ़ावें..

9…..शनि : शनि के लिए दशरथ कृत शनि स्तोत्र में लिखा है जो व्यक्ति पीपल वृक्ष के नीचे बैठ कर शनि देवता के दस नामों को रोज पढ़ेगा उसे शनि की पीढा कभी नहीं होगी ….शनि वार के दिन सरसों के तेल को अपने ऊपर से उतार कर शनि मंदिर में रख के आ जाना चहिये …चढाना नहीं है सिर्फ रख के आ जाना है ,शनि वार को काले वस्त्र आदि का दान करना चहिये ,शनि को मजबूत करने के लिए नीलम पहन लेना चहिये ,हनुमान चालीसा का नित्य दो पार पाठ करना भी अति लाभ प्रद होता है तथा हनुमान जी पूर्ण निष्काम भक्ति बहुत मार्ग खोल देती है …ऐसा कहा गया है की शनि देवता हनुमान जी के भक्तों को कभी परेशान नहीं करते हैं …

10…..शनिदेव का विधिवत पूजन कर पर्याप्त लाभ उठा सकते हैं :-
1. सर्वप्रथम नित्यकर्म से निवृत हो स्नानोपरांत माता-पिता के चरण स्पर्श करें।
2. भोजन में उड़द दाल, गुड़ तिल के पकवान, मीठी पूड़ी बनाकर शनिदेव को भोग लगाकर गाय, गरीब, कुत्ते को भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करें तथा प्रशाद बांटे। इस दिन केसरीया, काला वस्त्र पहनना लाभदायक व अनुकूल रहेगा।
3. शनि अमावस्या के दिन संपूर्ण श्रद्धा भाव से पवित्र करके घोडे की नाल या नाव की पेंदी की कील का छल्ला मध्यमा अंगुली में धारण करें। (किसी योग्य पंडित जी से ज़रूर पूछ ले, धारण करने से पहले)
4. शनि अमावस्या के दिन 108 बेलपत्र की माला भगवान शिव के शिवलिंग पर चढाए।
5. शनिवार को साबुत उडद किसी भिखारी को दान करें.या पक्षियों को ( कौए ) खाने के लिए डाले।
6. शनि ग्रह की वस्तुओं का दान करें, शनि ग्रह की वस्तुएं हैं –काला उड़द,चमड़े का जूता, नमक, सरसों तेल, तेल, नीलम, काले तिल, लोहे से बनी वस्तुएं, काला कपड़ा आदि। (योग्य पंडित जी से ज़रूर पूछ ले, दान करने से पहले)
7. उडद के आटे के 108 गोली बनाकर मछलियों को खिलाने से लाभ होगा ।
8. १६ शनिवार सूर्यास्त्र के समय एक पानी वाला नारियल, ५ बादाम, कुछ दक्षिणा शनि मंदिर में चढायें । (योग्य पंडित जी से ज़रूर पूछ ले)
9. शनि को दरिद्र नारायण भी कहते हैं इसलिए दरिद्रो की सेवा से भी शनि प्रसन्न होते हैं, असाध्य व्यक्ति को काला छाता, चमडे के जूते चप्पल पहनाने से शनि देव प्रसन्न होते हैं ।
10. शनिवार को हनुमान मन्दिर में पूजा उपासना कर तथा प्रसाद चढायें ।
11. शनि के कोप से बचने के लिये मंगलमूर्ति श्री गणेश की भक्ति भी बहुत मंगलकारी है। इसलिए शनिवार को श्री गणेश पूजन में 21 दूर्वा या मोदक का भोग लगाएं और काम पर जाते समय श्री गणेश मूर्ति से कार्यसिद्धी और शनि कोप व अनिष्ठ से रक्षा की कामना करें।
12. शुक्रवार की रात सवा-सवा किलो काले चने अलग-अलग तीन बर्तनों में भिगो कर रख दें। शनिवार की सुबह नहाकर साफ वस्त्र पहनकर शनिदेव का पूजन करें और चनों को सरसौं के तेल में छौंककर इनका भोग शनिदेव को लगाएं और अपनी समस्याओं के निवारण के लिए प्रार्थना करें। इसके बाद पहला सवा किलो चना भैंसे को खिला दें। दूसरा सवा किलो चना कुष्ट रोगियों में बांट दें और तीसरा सवा किलो चना अपने ऊपर से ऊतारकर किसी सुनसान स्थान पर रख आएं। इस टोटके को करने से शनिदेव के प्रकोप में अवश्य कमी होगी।

11…सर्व ग्रह -बाधा निवारक तंत्र [टोटका ]यदि कोई ग्रह बाधा -कष्ट से पीड़ित है और ग्रहों के उपद्रव ,रोग-शोक ,असफलताए ,कष्ट शांत ,समाप्त करना चाहता है तो यह वनस्पति तंत्र का प्रयोग करने से उसकी समस्या दूर होती है |इसे करने में किसी तरह का भय भी नहीं है |..आक [मदार ],धतुरा ,अपामार्ग [चिरचिटा ],दुब ,बरगद ,पीपल की जड़े ,,शमी ,आम ,गुलर के पत्ते एक मिटटी के नए पात्र [कलश ]में रखकर गाय का घी ,दूध ,मठा [छाछ ]व् गोमूत्र डाले |फिर चना ,चावल ,मूंग ,गेहू ,काले और सफ़ेद तिल ,सफ़ेद सरसों ,लाल और सफ़ेद चन्दन का टुकड़ा ,शहद डालकर पात्र को मिटटी के ही ढक्कन से ढककर शनिवार को संध्याकाळ में पीपल वृक्ष की की जड़े के पास लकड़ी या हाथ से गड्ढा खोदकर सतह से एक फुट नीचे दबा दे ताकि हवा या किसी तरह की ठोकर से पात्र निकल न सके |फिर उसी पीपल वृक्ष के नीचे या किसी शिवालय में बैठकर गाय के घृत का दीपक और अगरबत्ती जलाकर “ओउम नमो भास्कराय [अमुकं ] सर्व ग्रहानाम पीड़ा नाशं कुरु -कुरु स्वाहा “मन्त्र का कम से कम १०८ बार जपं करे |अमुक के स्थान पर पीड़ित व्यक्ति अपना नाम ले या मम कहे |इस क्रिया को करते समय निम्न बातो का ध्यान रखे ..[१] यह क्रिया सर्व ग्रहों की अनिष्टता के लिए है अतः किसी भी ग्रह की खराब दशा में शनिवार के दिन ही संध्याकाळ में क्रिया की जाए और ग्रह पीड़ित यह क्रिया अपने घर में ही अपने हाथो करे |……..[२] मिटटी का कलश नया हो ,समस्त वस्तुए किसी भी क्रम में कलश में डाली जा सकती है |व्यक्ति स्वयं मौन धारण कर कलश में सब वस्तुए डाले ,ढक्कन लगाने के पश्चात फिर कभी न खोले ,वाही पात्र पर ढक्कन लगाए |पूर्ण क्रिया तक मौन ही रहे |………..[३] वृक्ष की जड़ो को इकठ्ठा करते समय जड़े हाथ से ही तोड़े या अन्य व्यक्ति से हाथ से ही तुडवाकर मंगवाए |कटे -फटे ,जमीन पर पड़े हुए पत्ते न ले |[४] क्रिया को पूर्ण गोपनीय रखे॥..

12….नवग्रहस्तोत्रम्
जपाकुसुमसंकाशं काश्र्यपेयं महाद्युतिम् ।
तमोरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोsस्ति दिवाकरम् ॥१॥
दधिशङ्‍कतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम् ।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम् ॥२॥
धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् ।
कुमारं शक्तिहस्तं तं मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥३॥
प्रियङ्गुकुलिकाश्र्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् ।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ॥४॥
देवानां च ऋषीणां च गुरूं काञ्चनसंनिभम् ।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ॥५॥
हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरूम् ।
सर्वशास्त्रप्रवक्तरं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ॥६॥
निलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् ।
छायामार्तणडसम्भूतं तं नमामि शनैश्र्वरम् ॥७॥
अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम् ।
सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ॥८॥
पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम् ।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ॥९॥
इति व्यासमुखोद् गीतं य: पठेत् सुसमाहित: ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ॥१०॥

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