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वैदिक शिव-पूजा
ध्यान
ध्याये नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं,रत्नाकलोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीति हस्तं प्रसन्नं।
पद्माशीनं समन्तात स्तुरिममरगणेव्यार्घृतिं वसानं,विश्ववाध्यं विश्ववन्द्यम निखिल भहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम॥
स्वच्छ स्वर्णपयोदं भतिकजपावर्णेभिर्मुखे: पंचभि:,त्र्यक्षरैचितिमीशमिन्दुमुकुटं सोमेश्वराख्यं प्रभुम।
शूलैटंक कृपाणवज्रदहनान-नागेन्द्रघंटाकुशान,पाशं भीतिहरं उधानममिताकल्पोज्ज्वलांग भेजे॥
सद्योजात-स्थापन
पश्चिमं पूर्णचन्द्राभं जगत सृष्टिकरोज्ज्वलम,सद्योजातं यजेत सौम्य मन्दस्मित मनोहरम॥
वामदेव स्थापन
उत्तरं विद्रुमप्रख्य विश्वस्थितिकरं विभुम,सविलासं त्रिनयनं वामदेवं प्रपूजयेत॥
अघोर स्थापन
दक्षिणं नील नीमूतप्रभं संहारकारकम,वक्रभू कुटिलं घोरमघोराख्यं तमर्चयेत॥
तत्पुरुष स्थापन
यजेत पूर्वमुखं सौम्यं बालर्क सदृशप्रभम,तिरोधानकृत्यपर रुद्रं तत्पुरुंषभिधम॥
ईशान स्थापन
ईशानं स्फ़टिक प्रख्य सर्वभूतानुकंपितम,अतीव सौभ्यमोंकार रूपं ऊर्ध्वमुखं यजेत॥
ऊँ उमामहेश्वराभ्यां नम: श्यानं समर्पयामि॥
आवाहन
ऊँ नमस्ते रुद्र मन्यव उतो त इषये नम:।
बाहुभ्यामुत ते नम:॥
एह्योहि गौरीश पिनाकपाणे शशांकमौलेवृषभरूढं।
देवाधिदेवेश महेश नित्यं गृहाण पूजां भगवन नमस्ते॥
आवाहयामि देवेशमरादिमध्यान्तपर्तितम।
आधारं सर्वलोकानामिश्रितार्थ प्रदासिनम॥
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: आवाहनं समर्पयामि॥
आसन
ऊँ याते रुद्र शिवातनूरघोरा पापकाशिनी।
तयानस्तावा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि।
विश्वात्मने नमस्तुभ्यं चिदम्भरनिवरसिने॥
रत्नसिंहासनं चारो ददामि करुणानिधे॥
ऊँ उमामहेश्वराभ्यां नम: आसनार्थ पुष्पं समर्पयामि॥
फ़ूल चढायें।
पाद्य
ऊँ यामिषुडिंगरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे।
शिवांगिरिशतडंकरु माहि गंगवहे सी: पुरुषन्जगत।
तुभ्यं संप्रददे पाद्यं श्रीकैलास निवासिने।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: पादयो: पाद्यं समर्पयामि॥
चरणों में जल अर्पित करें।
अर्घ्य
ऊँ शिवेन वचसात्वा गिरिशाच्छावदामसि।
यथान: सर्वमिज्जगदयक्ष्य गंगवहे सुमनाऽअसत॥
अनर्घफ़लदात्रे च शास्त्रे वैवस्वतस्य च।
तुमयर्मध्य प्रदास्यामि द्वादशान्त निवासिने॥
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: हस्तयोर्घ्य समर्पयामि॥
अर्घ्य पात्रं में गन्धाक्षत पुष्प के साथ जल लेकर चढावें॥
आचमन
ऊँ अद्धयवोचदधिवक्ता प्रथमो दैव्यो भिषक।
अह्रीश्यसर्वान्जभयन्त्सर्वाश्चयातुधान्योधराची: परासुव।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: आचमनीयम जलं समर्पयामि॥
छ: बार आचमन करावें।
स्नान
ऊँ असोस्ताम्रोऽरुण उतब्रभु: सुमंगल:।
ये चेन गंगवहे रुद्राअभितोदिक्षुश्रिता: सहस्त्रशोवेषस गंगवहे हेडऽईमहे।
गंगाक्लिन्नजटाभारं सोमसोमाधशेखर॥
नद्या मया समानेतै स्नानं कुरु महेश्वर:।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: स्नानीयं जलं समर्पयामि।
स्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि॥
घन्टावादन करें और स्नान करवायें॥
पयस्नान (दूध से स्नान)
ऊँ पय: पृथिव्याम्पयऽओषपीषु पर्योर्दिव्यसिक्षे पयोधा:॥
पयस्वती: प्रदिश: सन्तुमह्यम।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: पय: स्नानं समर्पयामि।
ऊँ शुद्धवाल:सर्वशुद्धवालो मणिवालस्तेअश्विन:।
श्वेत: श्वेताक्षौ रुद्राय पशुपतये कर्णयामा अवलिप्ता रौद्रा नभो रूपा: पार्जन्या:।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
पय स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि॥
पहले दूध से फ़िर जल से स्नान करावें॥
दधि स्नान
ऊँ दधिक्रोण्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिन:। सुरभि नो मुखा करत प्रणाअयु गंगवहे
षितारिषत॥
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: दधिस्नानं समर्पयामि।
ऊँ शुद्धवाल: सर्वशुद्धवालो मणिवालस्त अश्विन:।
श्वेत श्वेताक्षौरुणस्ते रुद्राय पशुपतये कर्णायामा अवलिप्ता रौद्रा नभोरूपा: पार्जन्या:।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम:शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि।
शुद्धोदक स्नानन्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
दधि स्नानन्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि॥
पहले दही फ़िर जल से स्नान करवायें।
घृतस्नान
ऊँ घृतं मतिक्षेघृतमस्य योनिर्धिते श्रितोघृतस्य धाम।
अनष्वधमावह मदयस्व स्वाहाकृतं वृषभवक्षिहव्यम।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: घृतस्नानम समर्पयामि। घृतस्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि।
ऊँ शुद्धवाल: सर्वशुद्धवालो मणिवालस्त अश्विन:। श्वेत: श्वेताक्षौरुणस्ते रुद्राय पह्सुपतये कर्णायामा अवलिप्ता रौद्रा नभोरूपा: पार्जन्या:।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि।
शुद्धोदक स्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
पहले घी से फ़िर जल से स्नान करवायें।
मधुस्नान
ऊँ मधुव्वाता ऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धव:। माधवीर्न: सन्त्वोषधी:।
मधुनक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव गंगवहे रज:। मधुद्यौरश्रतुन पिता। मधुमान्नो। वननस्पतिर्मधमां अस्तु सूर्य:। माध्वीरर्गावो-भवन्तु न:।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: मधुस्नानं समर्पयामि। मधुस्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि।
ऊँ शुद्धवाल: सर्वशुद्धवालो मणिवालस्त अश्विन:। श्वेत: श्वेताक्षौरुणस्ते रुद्राय पह्सुपतये कर्णायामा अवलिप्ता रौद्रा नभोरूपा: पार्जन्या:।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि।
शुद्धोदक स्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
पहले शहद से फ़िर जल से स्नान करवायें।
शर्करास्नान
ऊँ अपा गंगवहे रसमुद्धयस गंगवहे सूर्ये सन्त: गंगवहे समाहितम।
अपा गंगवहे रसस्ययो रसस्तं वो गृहलाम्युतममुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृहलाम्येषेत योति रिन्द्राय त्वा जुष्टतमम।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: शर्करास्नानं समर्पयामि। शर्करास्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि।
ऊँ शुद्धवाल: सर्वशुद्धवालो मणिवालस्त अश्विन:। श्वेत: श्वेताक्षौरुणस्ते रुद्राय पह्सुपतये कर्णायामा अवलिप्ता रौद्रा नभोरूपा: पार्जन्या:।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि।
शुद्धोदक स्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
पहले चीनी फ़िर जल से स्नान करवायें।
पंचामृत स्नान
ऊँ पंचनद्य: सरस्वतीमययपिबन्ति सस्रोतस: सरस्वती तु पंचधा सो देशेभवत्सरित।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम पंचामृतस्नानं समर्पयामि। पंचामृतस्नानन्ते शुद्धोदक स्नानम समर्पयामि।
ऊँ शुद्धवाल: सर्वशुद्धवालो मणिवालस्त अश्विन:। श्वेत: श्वेताक्षौरुणस्ते रुद्राय पह्सुपतये कर्णायामा अवलिप्ता रौद्रा नभोरूपा: पार्जन्या:।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि।
शुद्धोदक स्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
पहले पंचामृत से स्नान करवाये फ़िर जल से स्नान करवायें।
गन्धोदक स्नान
ऊँ गन्धद्वारा दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वेयेश्रियम।
मलयाचल सम्भूतं चन्दगारूरंभवम। चन्द्रनं देवदेवेश स्नानार्थ प्रतिगृह्यताम।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: गन्धोदकस्नानं समर्पयामि। गन्धोदक स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि।
पहले गुलाबजल से फ़िर जल से स्नान करवायें।
शुद्धोदक स्नान
ऊँ शुद्धवाल: सर्वशुद्धवालो मणिवालस्त अश्विन:। श्वेत: श्वेताक्षौरुणस्ते रुद्राय पह्सुपतये कर्णायामा अवलिप्ता रौद्रा नभोरूपा: पार्जन्या:।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि।
शुद्धोदक स्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
घंटावदन करके जल से स्नान करवायें फ़िर आचमन करवायें।
वस्त्र
ऊँ असौ योवसर्पति नीलग्रीवो विलोहित: उतैनंगोपाऽदृश्रम नदश्रम नुदहाजै: सदषटोमृडययति न:।
दिगम्बर नमस्तुभ्यम गजाजिनधरा यच।
व्याघ्रचर्मोतरीयाय वस्त्रयुग्मं दादाम्यहम॥
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि। आचमनीयं जलं समर्पयामि।
यज्ञोपवीत
ऊँ नीलग्रीवाय सहस्त्राक्षाय मीढुषे। अथोयेऽस्य सत्वानो हन्तेभ्योकरन्नम।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: यज्ञोपवीतं समर्पयामि। आचमनं जलं समर्पयामि।
सुगन्ध द्रव्य
ऊँ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम।
उर्वारुकमिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।
ऊँ उमामह्श्वराभ्याम नम: सुगन्धं समर्पयामि।
भगवान को इत्र लगावे.
भस्म
अग्निहोत्र समुदभूतं विरजाहोमपाजितम,
गृहाण भस्म हे स्वामिन भक्तानां भूतिदाय॥
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: भस्मं समर्पयामि॥
भस्म अर्पित करें।
गन्ध
ऊँ प्रमुश्चधन्वनस्तवमुभयोरात्न्यौर्ज्याम,
याश्चते हस्तऽअंगषव: पराता भगवोवप।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: गन्धं समर्पयामि॥
अक्षत
ऊँ अक्शन्नमीमदन्तछप्रियाऽअधषत।
अस्तोषतस्वभानति विप्रान्न विष्टुयामती योजान। विन्द्रतेहरी।
अक्सह्तान धवलान देवसिद्धगन्धर्व पूजितम।
सुदन्रेश नमस्तुभ्यं गृहाण वरदो भव॥
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: अक्षतान समर्पयामि।
अक्षत चढावें।
पुष्प
ऊँ विज्जयन्धनु: कपर्दिनो विशल्यो बाधवांऽउत।
अनेकशन्नस्ययाऽड.षव आभुरस्यनिषंगधि:।
तुरीयवनसंभूतं। परमानन्दसौरभम।
पुष्पं गृहाण सोमेश पुष्पचापविभंजन॥
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: पुष्पाणि समर्पयामि।
बिल्वपत्र
ऊँ नमो बिल्विने च कवचिने च नमो वश्रिणे च वरूथिने
च नम: श्रुताव च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुभ्यरयचाहनन्यायच।
त्रिबलं द्विगुणाकारं द्विनेत्रं च त्रिधायुधम।
श्रिजन्मपाप संहारमेक बिल्वं शिवार्पणम।
दर्शनं बिल्वपत्रस्य स्पर्शनं पापनाशनम।
अघोर पाप संहारं मेक बिल्वं शिवार्पणम॥
अंगपूजा
ऊँ भवाय नम: पादो पूजयामि। ऊँ जगत्पित्र नम: जंघे पूजयामि। ऊँ मृडाय नम: जानुनीं पूजयामि। ऊँ रुद्राय नम: उरु पूजयामि। ऊँ कालान्तकाय नम: कटिं पूजयामि। ऊँ नागेन्द्रा भरणाय नमं नाभिर पूजयामि। ऊँ स्तव्याय नम: कंठं पूजयामि। ऊँ भवनाशाय नम: भुजान पूजयामि। ऊँ कालकंठाय नम: कंठं पूजयामि। ऊँ महेशाय नम: मुखं पूजयामि। ऊँ लास्यप्रियाय नम: ललाटं पूजयामि। ऊँ शिवाय नम: शिरं पूजयामि। ऊँ प्रणतार्तिहराय नम: सर्वाण्यंगानि पूजयामि।
प्रत्येक बार गंधाक्षतपुष्प से सम्बन्धित अंग को घर्षित करें।
अष्टपूजा
ऊँ शर्वाय क्षितिमूर्तये नम:,ऊँ भवाय जलमूर्तये नम:,ऊँ रुद्राय अग्निमूर्तये नम:,ऊँ उग्राय वायुमूर्तये नम:,ऊँ भीमाय आकाश मूर्तये नम:,ऊँ ईशनाय सूर्य मूर्तये नम:,ऊँ महादेवाय सोममूर्तये नम:,ऊँ पशुपतये यजमान मूर्तये नम:।
प्रत्येक बार गन्धाक्षतपुष्प बिल्वपत्र अर्पित करें।
परिवार पूजा
ऊँ उमायै नम:,ऊँ शंकर प्रियाये नम:,ऊँ पार्वत्यै नम:,ऊँ काल्यै नम:, ऊँ कालिन्द्यै नम:,ऊँ कोटि देव्यै नम:,ऊँ पिश्वधारित्रै नम:,ऊँ गंगा देव्यै नम:,नववितीन पूजयामि सर्वोपकरायै गन्धाक्षतपुष्पयाणि समर्पयामि।
प्रत्येक बार गन्ध अक्षत पुष्प अर्पण करें।
ऊँ गणपतये नम:,ऊँ कार्तिकेयाय नम:,ऊँ पुष्पदन्ताय नम:,ऊँ कपर्दिने नम:.ऊँ भैरवाय नम:,ऊँ भूलपाधये नम:,ऊँ चण्डेशाय नम:,ऊँ दण्डपाणये नम:, ऊँ नन्दीश्वराय नम:,ऊँ महाकालाय नम:,सर्वान गणाधिपान पूजयामि सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि।
ऊँ अघोराय नम:,ऊँ पशुपतये नम:,ऊँ शर्वाय नम:,ऊँ विरूपाक्षाय नम:,ऊँ विश्वरूष्ये नम:,ऊँ त्र्यम्बकाय नम:,ऊँ कपर्दिने नम:,ऊँ भैरवाय नम:,ऊँ शूलपाणये नम:,ऊँ ईशनाय नम:,एकादश रुद्रान पूजयामि सर्वोपचारार्थे गन्ध अक्षत पुष्पाणि समर्पयामि।
सौभाग्य द्रव्य
ऊँ अहिरीव भोगै: पर्येति बाहुन्ज्यावा हेतिम्परिवाधमान:।
हस्तघ्नो विश्वावयुनानिविद्वान पुमान पुमा गंगवहे समपरिपातुविश्वत:॥
हरिद्रां कुंकुमं चैव सिन्दूरं कज्जलान्वितम।
सौभाग्यद्रव्यसंयुक्तं ग्रहाण परमेश्वर॥
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: सौभाग्यद्रव्याणि समर्पयामि।
हल्दी कुमकुम सिन्दूर चढावें।
धूप
ऊँ या ते हेतीर्मीढ्ष्ट्रम हस्ते बभूव ते धनु:। तयास्मान-विश्वस्त्व मयक्ष्मया परिभुज॥
ऊँ उमा महेश्वराभ्याम नम: धूपं आघ्रायामि।
धूपबत्ती जलायें।
दीप
ऊँ परिते धन्वनो हेतिरस्मान्वृणकतुविश्वत:। अथोयऽगंषि घ्रिस्त वारेऽकअस्मन्निधेहितम।
साज्यं वर्ति युक्तं दीपं सर्वमंगलकारकम।
समर्पयामि श्येदं सोमसूर्याग्निलोचनम॥
प्रज्वलित दीपक पर घंटावादन करते हुये चावल छोडें।
नैवैद्य
नैवैद्य के ऊपर बिल्वपत्र या पुष्प में पानी लेकर रुद्रगायत्री को बोलें-
ऊँ तत्पुरुषाय विद्यमहे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात।
फ़िर नैवैद्य पर धेनु मुद्रा दिखाते हुये इस मंत्र को बोलें-
ऊँ अवतय धनुष्टव गंगवहे सहस्त्राक्षशतेषुधे। निशीर्य शलयानामुख शिवा न: सुमना भव॥
नैवैध्यं षडरसोपेतं विषाशत घृतान्वितम।
मधुक्षीरापूपयुक्तं गृह्यतां सोमशेखर॥
ऊँ या फ़लिनीयाऽफ़लाऽपुष्पा याश्चपुष्पिणि:। बृहस्पतिप्रसूस्तानो मुन्वत्व गंगवहे हस:।
यस्य स्मरण मात्रेण सफ़लता सन्ति सत्क्रिया:।
तस्य देवस्या प्रीत्यर्थ इयं ऋतुफ़लार्पणम।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: नैवैद्यम निवेदयामि नाना ऋतुफ़लानि च सपर्पयामि।
इसके बाद ग्राम मुद्रा में इस मंत्र का उच्चारण करें-
ऊँ प्राणाय स्वाहा,ऊँ अपानाय स्वाहा,ऊँ व्यानाय स्वाहा,ऊँ उदानाय स्वाहा,ऊँ समानाय स्वाहा।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: आचमनीयं जलं समर्पयामि,पूर्जापोषण समर्पयामि।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: मध्ये पानीयं समर्पयामि,नैवैद्यान्ते आचमनीयं समर्पयामि,उत्तरापोषणं समर्पयामि,हस्तप्राक्षलण समर्पयामि,मुखप्रक्षालनं समर्पयामि।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: करोद्वर्जनार्थे चन्दनं समर्पयामि।
भगवान के हाथो में चन्दन अर्पित करें।
ताम्बूल
ऊँ नमस्तुऽआयुधानाततायधृष्णवे। उमाभ्यांमुत ते नमो बाहुभ्यान्नत धन्वने।
ऊँ उमा महेश्वराभ्याम नम: मुख शुद्धयर्थे ताम्बूलं समर्पयामि।
दक्षिणा
ऊँ हरिण्यगर्भ: समवर्तमाग्रे भूतस्य जात: परिरेकऽआसीत।
सदाधार पृथिवीन्द्यामुतेमाकस्मै देवाय हविषा विधेम।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम:सांगता सिद्धयर्थ हिरण्यगर्भ दक्षिणां समर्पयामि।
नीराजंन
ऊँ इद गंगवहे हवि: प्रजननम्मे अस्तु दशवीर गंगवहे सर्वगण गंगवहे स्वस्तये।
आत्मसनि। प्रजासनि पशुसति लोकसन्यभयसनि:।
अग्नि प्रजा बहुलां में करोत्वनं न्यतो रेतोऽस्मासु धत।
ध्यान करें
वन्दे देव उमापतिं सुरुगुरु वन्दे जगत्कारणम,
वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं वन्दे पशूनांपतिम।
वन्दे सूर्य शशांक वहिनयनं वन्चे मुकुन्दप्रिय:,
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवशंकरम॥
शान्तं पदमासनस्थं शशिधर मुकुटं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम,
शूलं वज्र च खडग परशुमभयदं दक्षिणागे वहन्न्तम।
नाग पाशं च घंटां डमरूकसहितं सांकुशं वामभागे,
नानालंकार दीप्तं स्फ़टिकमणिनिभं पार्वतीशं नमामि॥
कर्पूर गौरं करुणावतारं संसार सारं भुजगेन्द्र हारम,
सदा बसन्तं ह्रदयार विन्दे भवं भवानी सहितं नमामि॥
आरती

जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा |
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा ॥ ॐ जय शिव ओंकारा……
एकानन चतुरानन पंचांनन राजे |
हंसासंन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा……
दो भुज चारु चतुर्भज दस भुज अति सोहें |
तीनों रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहें॥ ॐ जय शिव ओंकारा……
अक्षमाला, बनमाला, रुण्ड़मालाधारी |
चंदन, मृदमग सोहें, भाले शशिधारी ॥ ॐ जय शिव ओंकारा……
श्वेताम्बर,पीताम्बर, बाघाम्बर अंगें |
सनकादिक, ब्रह्मादिक, भूतादिक संगें॥ ॐ जय शिव ओंकारा……
कर के मध्य कमड़ंल चक्र, त्रिशूल धरता |
जगकर्ता, जगभर्ता, जगससंहारकर्ता ॥ ॐ जय शिव ओंकारा……
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका |
प्रवणाक्षर मध्यें ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा……
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रम्हचारी |
नित उठी भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॐ जय शिव ओंकारा……
त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावें |
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावें ॥ ॐ जय शिव ओंकारा…..
जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा|
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा.
जल आरती
ऊँ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष गंगवहे शान्ति: पृथ्वीशान्तिराप: शान्त रोषधय: शान्ति।
वनस्पतय: शान्ति शान्तिर्विश्वेदेवा शान्तिब्रह्म शान्ति सर्व गंगवहे शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि।
इस पानी को शिवजी के चारों तरफ़ थोडा थोडा डालकर शिवलिंग पर चढा दें।
प्रदक्षिणा
ऊँ मा नो महान्तमुत मा नोऽअभर्कम्मानऽउक्षन्त मुत मा नऽउक्षितम। मानो वधी: पिरंम्मोतमारम्मान: प्रियास्तस्न्वोरुद्ररीरिष:।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: प्रदक्षिणां समर्पयामि।
पुष्पांजलि
ऊँ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन। तेह ना कं महिमान: सचन्त यत्र पूर्वे साध्या: सन्ति देवा:।
ऊँ राधाधिराजाय प्रसस्रसाहिने नमोवयं वेश्रणाय कुर्महे समे कामान कामकामा महम। कामेश्वरी वेश्रवणो ददातु। कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नम:।
ऊँ स्वास्ति साम्राज्यं भोज्य स्वराज्यं वैराज्यं परमेष्ठयं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं समन्तपर्यायो स्वात सार्वभौम:। सर्वायुष आन्तादा परार्धात। पृथिव्ये समुद्रपर्यान्ताय एकराडिति तदप्येष श्लोकोऽभिगितो मरुत: परिवेष्टारो मरुतस्यावसन्नगृहे। अविक्षि तस्य कामप्रेविश्वेदेवा: सभासद इति:।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नमं मन्त्र पुष्पान्जलि समर्पयामि।
नमस्कार
ऊँ नम: शम्भवाय च मयोभवाय च नम: शंकराय च मयस्कराय च नम: शिवाय च शिवतराय च।
तव तत्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर।
यादशोसि महादेव तादृशाय नमोनम:॥
त्रिनेत्राय नमज्ञतुभ्यं उमादेहार्धधारिणे।
त्रिशूल धारिणे तुभ्यं भूतानां पतये नम:॥
गंगाधर नमस्तुभ्यं वृषमध्वज नमोस्तु ते।
आशुतोष नमस्तुभ्यं भूयो भूयो नमो नम:॥
ऊँ निधनपतये नम:। निधनपतान्तिकाय नम: उर्ध्वाय नम:।
ऊर्ध्वलिंगाय नम:। हिरण्याय नम:। हिरण्यलिंगाय नम: दिव्याय नम: सुवर्णाय नम:। सुवर्ण लिंगाय नम:। दिव्यलिंगाय नम:। भवाय नम:। भवलिंगाय नम:। शर्वाय नम:। शर्वलिंगाय नम:। शिवाय नम:। शिवलिंगाय नम:। ज्वालाय नम:। ज्वललिंगाय नम:। आत्मरस नम:। आत्मलिंगाय नम:। परमाय नम:। परमलिंगाय नम:। एतत सोमस्य सूर्यस्य सर्वलिंग गंगवहे स्थापयसि पाणि मन्त्र पवित्रम।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: नमस्करोमि।
प्रार्थनापूर्वक क्षमायपन
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम,
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर।
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर,
यह पूजितं मयादेव परिपूर्ण तदस्तुमे॥
यदक्षरं पदं भ्रष्टं मात्राहीनं च यद भवेत,
तत सर्वं क्षम्यतां देव प्रसीद परमेश्वर॥
क्षमस्व देव देवेश क्षस्व भुवनेश्वर,
तव पदाम्बुजे नित्यं निश्चल भक्तितरस्तु में॥
असारे संसारे निजभजन दूरे जडधिया,
भ्रमन्तं मामन्धं परम कृपया पातुमुचितम॥
मदन्य: को दीन स्वव कृपण रक्षाति निपुण,
स्त्वदन्य: को वा मे त्रिगति शरण्य: पशुपते॥
विशेषार्ध्य
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरंण मम,
मस्मात कारुण्य भावेन रक्ष मां परमेश्वर।
रक्ष रक्ष महादेव रक्ष त्रैलोक्य रक्षक,
भक्तानां अभयकर्ता त्राता भवभवार्णवात॥
वरद त्वं वरं देहि वांछितार्थादि।
अनेक सफ़लर्ध्येन फ़लादोस्तु सदामम॥
ऊँ मानस्तोके तनये मानऽआयुषिमानो गोषुमानोऽश्वेषुरीरिष:।
मानो वीरानुरुद्र भामिनो बधीर्हविष्मन्त: सदामित्वाहवामहे।
ऊँ उमामहेश्वराभ्याम नम: विशेषर्ध्यं समर्पयामि।
अर्ध्य पात्र में जल गन्ध अक्षत फ़ूल बिल्वपत्र आदि मंगल द्रव्य लेकर भगवान को अर्पित करें।
समर्पण
गतं पापं गतं दुखं गतं दारिद्रयमेव च,
आगता सुख सम्पत्ति: पुण्याच्च तव दर्शनात॥
दवो दाता च भोक्ता च देवरूपमितं जगत,
देवं जपति सर्वत्र यौ देव: सोहमेव हि॥
साधिवाऽसाधु वा कर्म यद्यमचारितं मया।
तत सर्व कृपया देव गृहाणाराधनम॥
शंख या आचमनी का जल भगवान के दाहिने हाथ मे देते हुये समस्त पूजा फ़ल उन्हे समर्पित करें।
अनेनकृत पूजाकर्मणा श्री संविदात्मक: साम्बसदाशिव प्रीयन्ताम। ऊँ तत सद ब्रह्मार्पणमस्तु।
इसके बाद वैदिक या संस्कृत आरती कर पुष्पांजलि दें।
शिव आरती किस प्रकार करें
शिव आरती में सबसे पहले शिव के चरणों का ध्यान करके चार बार आरती उतारें फ़िर नाभिकमल का ध्यान करनेक दो बार आरती उतारें,फ़िर मुख का स्मरण करते हुये एक बार आरती उतारें,तथा सर्वांग की सात बार आरती उतारें, इस प्रकार चौदह बार आरती उतारे। इसके बाद शंख या पात्र में जल लेकर घुमाते हुये छोडें,और इस मंत्र को बोलें-
ऊँ द्यौ हवामहे शान्तिरन्तरिक्षं हवामहे शान्ति पृथ्वी शान्ति राप: शान्तिरोषधय शान्ति: वनस्पतय: शान्तिर्विश्वेदेवा शान्ति ब्रह्माशान्ति सर्वं हवामहे शान्ति शान्ति:रे वशन्ति सामाशान्तिरेधि।
प्रदक्षिणा
यानि कानि च पापानि ज्ञाताज्ञात कृतानि च,
तानि सर्वाणि नश्यन्ति प्रदक्षिणं पदे पदे॥

2…ॐ नमः शिवाय ।
अस्य श्रीशिवरक्षा-स्तोत्र-मन्त्रस्य याज्ञवल्क्य ऋषिः,
श्रीसदाशिवो देवता, अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीसदाशिव-प्रीत्यर्थे शिवरक्षा-स्तोत्र-जपे विनियोगः ॥
चरितं देवदेवस्य महादेवस्य पावनम् ।
अपारं परमोदारं चतुर्वर्गस्य साधनम् ॥ (१)
गौरी-विनायकोपेतं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रकम् ।
शिवं ध्यात्वा दशभुजं शिवरक्षां पठेन्नरः ॥ (२)
गङ्गाधरः शिरः पातु भालमर्द्धेन्दु-शेखरः ।
नयने मदन-ध्वंसी कर्णौ सर्प-विभूषणः ॥ (३)
घ्राणं पातु पुराराति-र्मुखं पातु जगत्पतिः ।
जिह्‍वां वागीश्‍वरः पातु कन्धरां शिति-कन्धरः ॥ (४)
श्रीकण्ठः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ विश्‍व-धुरन्धरः ।
भुजौ भूभार-संहर्त्ता करौ पातु पिनाकधृक् ॥ (५)
हृदयं शङ्करः पातु जठरं गिरिजापतिः ।
नाभिं मृत्युञ्जयः पातु कटी व्याघ्रजिनाम्बरः ॥ (६)
सक्थिनी पातु दीनार्त्त-शरणागत-वत्सलः ।
ऊरू महेश्‍वरः पातु जानुनी जगदीश्‍वरः ॥ (७)
जङ्घे पातु जगत्कर्त्ता गुल्फौ पातु गणाधिपः ।
चरणौ करुणासिन्धुः सर्वाङ्गानि सदाशिवः ॥ (८)
एतां शिव-बलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स भुक्त्वा सकलान् कामान् शिव-सायुज्यमाप्नुयात् ॥ (९)
ग्रह-भूत-पिशाचाद्यास्त्रैलोक्ये विचरन्ति ये ।
दूरादाशु पलायन्ते शिव-नामाभिरक्षणात् ॥ (१०)
अभयङ्कर-नामेदं कवचं पार्वतीपतेः ।
भक्त्या बिभर्त्ति यः कण्ठे तस्य वश्यं जगत् त्रयम् ॥ (११)
इमां नारायणः स्‍वप्ने शिवरक्षां यथादिशत् ।
प्रातरुत्थाय योगीन्द्रो याज्ञवल्क्यस्तथालिखत् ॥ (१२)

3….श्रृणुष्व परमेशानि कवचं मन्मुखोदितम्‌ ।
महामृत्युंजयाख्यस्य न देयं परमाद्भुतम्‌ ।।
यं धृत्वा यं पठित्वा च श्रुत्वा च कवचोत्तमम्‌ ।
त्रैलोक्याधिपतिर्भूत्वा सुखितोऽस्मि महेश्वरि ।।
तदेववर्णयिष्यामि तव प्रीत्यावरानने ।
तथापि परमं तत्वं न दातव्यं दुरात्मने ।।

अस्य श्री महामृत्युंजयकवचस्य भैरव ऋषिः ।
गायत्रीछन्दः मृत्युंजयरुद्रो महादेवो देवता ।।
ॐ बीजं जूं शक्तिः। सः कीलकम्‌।
हौमितितत्वं व चतुर्वर्गसाधने विनियोगः ।।
चंद्रमंडलमध्यस्थे रुद्रभाले विचिन्त्यते ।
तत्रस्थं चिन्तयेत्‌ साध्यं मृत्युमाप्नोपि जीवित ।।
ॐ जूं सः ह्रौं शिरं पातु देवो मृत्युंजयो मम ।
ॐ श्रीं शिवो ललाटं च ॐ ह्रौं भ्रु वो सदाशिव: ।।
नीलकंठो वतान्नेत्रे कपर्दी मे वतच्छुती ।
त्रिलोचनो वताद् गण्डौ नासा मे त्रिपुरान्तकः ।।
मुखं पीयूषघटमृदौष्ठौ मे कृत्तिकाम्बरः ।
हनुं मे हाटकेशनो मुखं बटुक-भैरव : ।।
कन्धरां कालमथनो गलं गण प्रियोऽवतु।
स्कन्दौ स्कन्दपिता पातु हस्तौ मे गिरिशोऽवतु ।।
नखान्‌ मे गिरिजानाथः पायादंगलि संयुतान्‌ ।
स्तनौ तारापतिः पातु वक्षः पशुपतिर्मम ।।
कुक्षि कुबेर-वरदः पार्श्वौ मे मारशासनः ।
सर्वः पातु तथा नाभिं शूली पृष्ठं ममावतु ।।
शिश्नं मे शंकरः पातु गुह्यं गुह्यक-वल्लभः ।
कटिं कालान्तकः पायादूरुमेऽन्धकघातनः ।।
जागरूकोऽवताज्जानू जंघे मे कालभैरवः ।
गुल्फो पायाज्जटाधारी पादौ मृत्युंजयोऽवतु ।।
पादादिमूर्धपर्यन्तमघोरः पातु मां सदा ।
शिरसः पादपर्यन्तं सद्योजातो ममावतु ।।
रक्षाहीनं नामहीनं वपुः पातु मृतेश्वरः ।
पूर्वे बलविकरणो दक्षिणे कालशासनः ।।
पश्चिमे पार्वतीनाथो ह्युत्तरे मां मनोन्मनः ।
ऐशान्यामीश्वरः पायादाग्नेय्यामग्निलोचनः ।।
नैऋत्याँ शम्भुरव्यान्मां वायव्याँ वायुवाहनः ।
उर्ध्वे बलप्रमथनः पाताले परमेश्वरः ।।
दशदिक्षु सदा पातु महामृत्युंजयश्च माम्‌।
रणे राजकुले द्यूते विषमे प्राणसंशये ।।
पाया दों जूं महारुद्रो देव-देवो दशाक्षरः।
प्रभाते पातु मां ब्रह्मा मध्याह्ने भैरवोऽवतु ।।
सर्व तत्‌ प्रशमं याति मृत्युंजय-प्रसादतः ।
धनं पुत्रान्‌ सुखं लक्ष्मीमारोग्यं सर्वसम्पदः ।।
प्राप्नोति साधकाः सद्यो देवि सत्यं न संशयः ।
इतीदं कवचं पुण्यं महामृत्युंजयस्य तु ।।

गोप्यं सिद्धिप्रदं गुह्यं गोपनीयं स्वयोनिवत्‌ ।

4…..रुद्राष्टाध्यायी में अन्य मंत्रों के साथ इस मंत्र का भी उल्लेख मिलता है। शिव और रुद्र परस्पर एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। शिव को ही रुद्र कहा जाता है क्योंकि- रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: यानि की भोले सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं। हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं। रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारे पटक-से पातक कर्म भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है।
रूद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है कि- सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका: अर्थात् सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रूद्र की आत्मा हैं।
हमारे शास्त्रों में विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक के पूजन के निमित्त अनेक द्रव्यों तथा पूजन सामग्री को बताया गया है। साधक रुद्राभिषेक पूजन विभिन्न विधि से तथा विविध मनोरथ को लेकर करते हैं। किसी खास मनोरथ की पूर्ति के लिये तदनुसार पूजन सामग्री तथा विधि से रुद्राभिषेक की जाती है।
रुद्राभिषेक के विभिन्न पूजन के लाभ इस प्रकार हैं-
• जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है।
• असाध्य रोगों को शांत करने के लिए कुशोदक से रुद्राभिषेक करें।
• भवन-वाहन के लिए दही से रुद्राभिषेक करें।
• लक्ष्मी प्राप्ति के लिये गन्ने के रस से रुद्राभिषेक करें।
• धन-वृद्धि के लिए शहद एवं घी से अभिषेक करें।
• तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
• इत्र मिले जल से अभिषेक करने से बीमारी नष्ट होती है ।
• पुत्र प्राप्ति के लिए दुग्ध से और यदि संतान उत्पन्न होकर मृत पैदा हो तो गोदुग्ध से रुद्राभिषेक करें।
• रुद्राभिषेक से योग्य तथा विद्वान संतान की प्राप्ति होती है।
• ज्वर की शांति हेतु शीतल जल/गंगाजल से रुद्राभिषेक करें।
• सहस्रनाम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए घृत की धारा से रुद्राभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।
• प्रमेह रोग की शांति भी दुग्धाभिषेक से हो जाती है।
• शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने पर जडबुद्धि वाला भी विद्वान हो जाता है।
• सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है।
• शहद के द्वारा अभिषेक करने पर यक्ष्मा (तपेदिक) दूर हो जाती है।
• पातकों को नष्ट करने की कामना होने पर भी शहद से रुद्राभिषेक करें।
• गो दुग्ध से तथा शुद्ध घी द्वारा अभिषेक करने से आरोग्यता प्राप्त होती है।
• पुत्र की कामनावाले व्यक्ति शक्कर मिश्रित जल से अभिषेक करें।
ऐसे तो अभिषेक साधारण रूप से जल से ही होता है। परन्तु विशेष अवसर पर या सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि पर्व के दिनों मंत्र गोदुग्ध या अन्य दूध मिला कर अथवा केवल दूध से भी अभिषेक किया जाता है। विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग अथवा सब को मिला कर पंचामृत से भी अभिषेक किया जाता है। तंत्रों में रोग निवारण हेतु अन्य विभिन्न वस्तुओं से भी अभिषेक करने का विधान है। इस प्रकार विविध द्रव्यों से शिवलिंग का विधिवत् अभिषेक करने पर अभीष्ट कामना की पूर्ति होती है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी पुराने नियमित रूप से पूजे जाने वाले शिवलिंग का अभिषेक बहुत ही उत्तम फल देता है। किन्तु यदि पारद के शिवलिंग का अभिषेक किया जाय तो बहुत ही शीघ्र चमत्कारिक शुभ परिणाम मिलता है। रुद्राभिषेक का फल बहुत ही शीघ्र प्राप्त होता है। वेदों में विद्वानों ने इसकी भूरि भूरि प्रशंसा की गयी है। पुराणों में तो इससे सम्बंधित अनेक कथाओं का विवरण प्राप्त होता है।
वेदों और पुराणों में रुद्राभिषेक के बारे में तो बताया गया है कि रावण ने अपने दसों सिरों को काट कर उसके रक्त से शिवलिंग का अभिषेक किया था तथा सिरों को हवन की अग्नि को अर्पित कर दिया था। जिससे वो त्रिलोकजयी हो गया। भष्मासुर ने शिव लिंग का अभिषेक अपनी आंखों के आंसुओ से किया तो वह भी भगवान के वरदान का पात्र बन गया।
रुद्राभिषेक करने की तिथियां
कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, चतुर्थी, पंचमी, अष्टमी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या, शुक्लपक्ष की द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, नवमी, द्वादशी, त्रयोदशी तिथियों में अभिषेक करने से सुख-समृद्धि संतान प्राप्ति एवं ऐश्वर्य प्राप्त होता है। कालसर्प योग, गृहकलेश, व्यापार में नुकसान, शिक्षा में रुकावट सभी कार्यो की बाधाओं को दूर करने के लिए रुद्राभिषेक आपके अभीष्ट सिद्धि के लिए फलदायक है।
किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वास का विचार करने पर अनुष्ठान अवश्य सफल होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है। प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, अमावस्या तथा शुक्लपक्ष की द्वितीया व नवमी के दिन भगवान शिव माता गौरी के साथ होते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है।
कृष्णपक्ष की चतुर्थी, एकादशी तथा शुक्लपक्ष की पंचमी व द्वादशी तिथियों में भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर होते हैं और उनकी अनुकंपा से परिवार में आनंद-मंगल होता है।
कृष्णपक्ष की पंचमी, द्वादशी तथा शुक्लपक्ष की षष्ठी व त्रयोदशी तिथियों में महादेव नंदी पर सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते है। अत: इन तिथियों में रुद्राभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है।
कृष्णपक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी तथा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, पूर्णिमा में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं। अतएव इन तिथियों में किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर उनकी साधना भंग होती है जिससे अभिषेककर्ता पर विपत्ति आ सकती है।
कृष्णपक्ष की द्वितीया, नवमी तथा शुक्लपक्ष की तृतीया व दशमी में महादेव देवताओं की सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं। इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने पर संताप या दुख मिलता है।
कृष्णपक्ष की तृतीया, दशमी तथा शुक्लपक्ष की चतुर्थी व एकादशी में सदाशिव क्रीडारत रहते हैं। इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चन संतान को कष्ट प्रदान करते है।
कृष्णपक्ष की षष्ठी, त्रयोदशी तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी व चतुर्दशी में रुद्रदेव भोजन करते हैं। इन तिथियों में सांसारिक कामना से किया गया रुद्राभिषेक पीडा देते हैं।
ज्योर्तिलिंग-क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, श्रावण के सोमवार आदि पर्वो में शिव-वास का विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है। वस्तुत: शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिव को शीघ्र प्रसन्न करके साधक को उनका कृपापात्र बना देता है और उनकी सारी समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाती हैं। अतः हम यह कह सकते हैं कि रुद्राभिषेक से मनुष्य के सारे पाप-ताप धुल जाते हैं। स्वयं श्रृष्टि कर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है की जब हम अभिषेक करते है तो स्वयं महादेव साक्षात् उस अभिषेक को ग्रहण करते है। संसार में ऐसी कोई वस्तु, वैभव, सुख नही है जो हमें रुद्राभिषेक से प्राप्त न हो सके।
सुख-शांति-वैभव और मोक्ष का प्रतीक महाशिवरात्रि
साथ ही महाशिवरात्रि पूजन का प्रभाव हमारे जीवन पर बड़ा ही व्यापक रूप से पड़ता है। सदाशिव प्रसन्न होकर हमें धन-धान्य, सुख-समृधि, यश तथा वृद्धि देते हैं। महाशिवरात्रि पूजन को विधिवत करने से हमें सदाशिव का सानिध्य प्राप्त होता है और उनकी महती कृपा से हमारा कल्याण होता है।
शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता में बताया गया है कि शिवरात्रि व्रत करने से व्यक्ति को भोग एवं मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते हैं। देवताओं के पूछने पर भगवान सदाशिव ने बताया कि शिवरात्रि व्रत करने से महान पुण्य की प्राप्ति तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि परम कल्याणकारी व्रत है जिसके विधिपूर्वक करने से व्यक्ति के दुःख, पीड़ाओं का अंत होता है और उसे इच्छित फल की प्राप्ति होती है।
पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री, धन, सौभाग्य, समृद्धि व आरोग्यता प्राप्त होती है। पूजन करने वाला अपने तप-साधना के बल पर मोक्ष की प्राप्ति करता है। परम कल्याणकारी व्रत महाशिवरात्रि के व्रत को विधि-पूर्वक करने से व्यक्ति के दुःख, पीड़ाओं का अंत होता है और उसे इच्छित फल-प्राप्ति, पति, पत्नी, पुत्र, धन, सौभाग्य, समृद्धि व आरोग्यता प्राप्त होती है तथा वह जीवन में गति और मोक्ष को प्राप्त करते हैं और चिरंतर-काल तक शिव-स्नेही बने रहते हैं और शिव-आशीष प्राप्त करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं।
परोपकार करने के लिए महाशिवरात्रि का दिवस होना भी आवश्यक नहीं है। पुराण में चार प्रकार के शिवरात्रि पूजन का वर्णन है। मासिक शिवरात्रि, प्रथम आदि शिवरात्रि, तथा महाशिवरात्रि। पुराण वर्णित अंतिम शिवरात्रि है-नित्य शिवरात्रि। वस्तुत: प्रत्येक रात्रि ही `शिवरात्रि` है अगर हम उन परम कल्याणकारी आशुतोष भगवान में स्वयं को लीन कर दें तथा कल्याण मार्ग का अनुसरण करें, वही शिवरात्रि का सच्चा व्रत है।
महाशिवरात्रि का व्रत मनोवांछित अभिलाषाओं को पूर्ण करनेवाली तथा परम कल्याणकारी है। देवों-के-देव महादेव की प्रसन्नता की कामना लिये हुए जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनका अभीष्ट मनोरथ पूर्ण होता है तथा वे हमेशा-हमेशा के लिया शिव-सानिध्यता को प्राप्त कर लेते हैं।

5….ॐ महाकाल महाकाय महाकाल जगत्पते
महाकाल महायोगिन महाकाल नमोस्तुते
महाकाल महादेव महाकाल महा प्रभो
महाकाल महारुद्र महाकाल नमोस्तुते
महाकाल महाज्ञान महाकाल तमोपहन
महाकाल महाकाल महाकाल नमोस्तुते
भवाय च नमस्तुभ्यं शर्वाय च नमो नमः
रुद्राय च नमस्तुभ्यं पशुना पतये नमः
उग्राय च नमस्तुभ्यं महादेवाय वै नमः
भीमाय च नमस्तुभ्यं मिशानाया नमो नमः
ईश्वराय नमस्तुभ्यं तत्पुरुषाय वै नमः
सघोजात नमस्तुभ्यं शुक्ल वर्ण नमो नमः
अधः काल अग्नि रुद्राय रूद्र रूप आय वै नमः
स्थितुपति लयानाम च हेतु रूपआय वै नमः
परमेश्वर रूप स्तवं नील कंठ नमोस्तुते
पवनाय नमतुभ्यम हुताशन नमोस्तुते
सोम रूप नमस्तुभ्यं सूर्य रूप नमोस्तुते
यजमान नमस्तुभ्यं अकाशाया नमो नमः
सर्व रूप नमस्तुभ्यं विश्व रूप नमोस्तुते
ब्रहम रूप नमस्तुभ्यं विष्णु रूप नमोस्तुते
रूद्र रूप नमस्तुभ्यं महाकाल नमोस्तुते
स्थावराय नमस्तुभ्यं जंघमाय नमो नमः
नमः उभय रूपा भ्याम शाश्वताय नमो नमः
हुं हुंकार नमस्तुभ्यं निष्कलाय नमो नमः
सचिदानंद रूपआय महाकालाय ते नमः
प्रसीद में नमो नित्यं मेघ वर्ण नमोस्तुते
प्रसीद में महेशान दिग्वासाया नमो नमः
ॐ ह्रीं माया – स्वरूपाय सच्चिदानंद तेजसे
स्वः सम्पूर्ण मन्त्राय सोऽहं हंसाय ते नमः

इत्येवं देव देवस्य मह्कालासय भैरवी
कीर्तितम पूजनं सम्यक सधाकानाम सुखावहम

आकाशे यानि लिँगानि यानि लिंगानि भूतले पाताले यानि लिँगानि सर्वाणि लिँगानि नमोस्तुते
मृत्युंजय महादेव त्राहिमाम शरणागतम जन्म मृत्यु जरा व्याधि पीडितं कर्म बन्धनै:………
शिव ज्योति लिंग मंगलम हर हर महादेव मंगलम मा पार्वती मंगलम सदा शिव मंगलम
शिव। शंकर। महादेव। अघोर। भागवत। प्रभु। चंद्रशेखर। गंगाधर। गिरीश। पशुपति। कालंजर। जलमूर्ति। काल। जटाधर। ईशान। हर। सर्व सदाशिव। विश्वनाथ। चंद्रभाल। स्वयंभू। शंभु। भोलेनाथ। ज्ञान। त्रयम्बक। उग्र। नीलकंठ।

6….चिदान्द रूपः शिवोऽहम् !शिवोऽहम् !!

मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ, न मैं कान,
जिह्वा, नाक और आँख हूँ। न मैं आकाश, भूमि, तेज और
वायु ही हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥१॥
न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पञ्च प्राणों (प्राण,
उदान, अपान, व्यान, समान) में कोई हूँ, न मैं सप्त
धातुओं (त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि, मज्जा) में
कोई हूँ और न पञ्च कोशों (अन्नमय, मनोमय, प्राणमय,
विज्ञानमय, आनंदमय) में से कोई, न मैं वाणी, हाथ, पैर
हूँ और न मैं जननेंद्रिय या गुदा हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ,
शिव हूँ, शिव हूँ ॥२॥
न मुझमें राग और द्वेष हैं, न ही लोभ और मोह, न
ही मुझमें मद है न ही ईर्ष्या की भावना, न मुझमें धर्म,
अर्थ, काम और मोक्ष ही हैं, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव
हूँ, शिव हूँ ॥३॥
न मैं पुण्य हूँ, न पाप, न सुख और न दुःख, न मन्त्र, न
तीर्थ, न वेद और न यज्ञ, मैं न भोजन हूँ, न खाया जाने
वाला हूँ और न खाने वाला हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ,
शिव हूँ, शिव हूँ ॥४॥
न मुझे मृत्यु का भय है, न मुझमें जाति का कोई भेद है, न
मेरा कोई पिता ही है, न कोई माता ही है, न
मेरा जन्म हुआ है, न मेरा कोई भाई है, न कोई मित्र, न
कोई गुरु ही है और न ही कोई शिष्य, मैं चैतन्य रूप हूँ,
आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥५॥
मैं समस्त संदेहों से परे, बिना किसी आकार वाला,
सर्वगत, सर्वव्यापक, सभी इन्द्रियों को व्याप्त करके
स्थित हूँ, मैं सदैव समता में स्थित हूँ, न मुझमें मुक्ति है और
न बंधन, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ ॥६॥

7….”पार्थिव में बसे शिव कल्याणकारी”
शिव सनातन देव हैं।दुनियां में जितने भी धर्म है वे किसी न किसी रूप या नाम से शिव की ही अराधना करते है।ये कही गुरू रूप में पूज्य है तो कही निर्गुण,निराकार रूप में।शिव बस एक ही हैं पर लीला वश कइ रूपों में प्रकट होकर जगत का कल्याण करते हैं।शक्ति इनकी क्रिया शक्ति है।सृष्टि में जब कुछ नहीं था तब सृजन हेतु शिव की शक्ति को साकार रूप धारण करना पड़ा और शिव भी साकार रूप में आ पाये इसलिए ये दोनों एक ही हैं।भेद लीला वश होता है।और इसका कारण तो ये ही जानते हैं क्योकिं इनके रहस्य को कोई भी जान नहीं सकता और जो इनकी कृपा से कुछ जान गये उन्होनें कुछ कहा ही नहीं,सभी मौन रह गए।शिव भोले औघड़दानी है इसलिए दाता है सबको कुछ न कुछ देते है,देना उनको बहुत प्रिय है।ये भाव प्रधान देव है,भक्ति से प्रसन्न हो जाते है,तभी तो ये महादेव कहलाते है।मैं आज यहाँ पार्थिव पूजन की विधि दे रहा हूँ इसे कोई भी कम समय में कर शिव की कृपा प्राप्त कर सकता है।शिव सबके अराध्य है एक बार भी दिल से कोई बस कहे “ॐ नमः शिवाय” फिर शिव भक्त के पास क्षण भर में चले आते है।
-:पार्थिव शिव लिंग पूजा विधि:-
पार्थिव शिवलिंग पूजन से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।इस पूजन को कोई भी स्वयं कर सकता है।ग्रह अनिष्ट प्रभाव हो या अन्य कामना की पूर्ति सभी कुछ इस पूजन से प्राप्त हो जाता है।सर्व प्रथम किसी पवित्र स्थान पर पुर्वाभिमुख या उतराभिमुख ऊनी आसन पर बैठकर गणेश स्मरण आचमन,प्राणायाम पवित्रिकरण करके संकल्प करें।दायें हाथ में जल,अक्षत,सुपारी,पान का पता पर एक द्रव्य के साथ निम्न संकल्प करें।
-:संकल्प:-
“ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्री मद् भगवतो महा पुरूषस्य विष्णोराज्ञया पर्वतमानस्य अद्य ब्रह्मणोऽहनि द्वितिये परार्धे श्री श्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति तमे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भारतवर्षे भरतखण्डे जम्बूद्वीपे आर्यावर्तेक देशान्तर्गते बौद्धावतारे अमुक नामनि संवत सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुक तिथौ अमुकवासरे अमुक नक्षत्रे शेषेशु ग्रहेषु यथा यथा राशि स्थानेषु स्थितेषु सत्सु एवं ग्रह गुणगण विशेषण विशिष्टायां अमुक गोत्रोत्पन्नोऽमुक नामाहं मम कायिक वाचिक,मानसिक ज्ञाताज्ञात सकल दोष परिहार्थं श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्तयर्थं श्री मन्महा महामृत्युञ्जय शिव प्रीत्यर्थं सकल कामना सिद्धयर्थं शिव पार्थिवेश्वर शिवलिगं पूजनमह करिष्ये।”
तत्पश्चात त्रिपुण्ड और रूद्राक्ष माला धारण करे और शुद्ध की हुई मिट्टी इस मंत्र से अभिमंत्रित करे…
“ॐ ह्रीं मृतिकायै नमः।”
फिर “वं”मंत्र का उच्चारण करते हुए मिटी् में जल डालकर “ॐ वामदेवाय नमःइस मंत्र से मिलाए।
१.ॐ हराय नमः,
२.ॐ मृडाय नमः,
३.ॐ महेश्वराय नमः बोलते हुए शिवलिंग,माता पार्वती,गणेश,कार्तिक,एकादश रूद्र का निर्माण करे।अब पीतल,तांबा या चांदी की थाली या बेल पत्र,केला पता पर यह मंत्र बोल स्थापित करे,
ॐ शूलपाणये नमः।
अब “ॐ”से तीन बार प्राणायाम कर न्यास करे।
-:संक्षिप्त न्यास विधि:-
विनियोगः-
ॐ अस्य श्री शिव पञ्चाक्षर मंत्रस्य वामदेव ऋषि अनुष्टुप छन्दःश्री सदाशिवो देवता ॐ बीजं नमःशक्तिःशिवाय कीलकम मम साम्ब सदाशिव प्रीत्यर्थें न्यासे विनियोगः।
ऋष्यादिन्यासः-
ॐ वामदेव ऋषये नमः शिरसि।ॐ अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे।ॐ साम्बसदाशिव देवतायै नमः हृदये।ॐ ॐ बीजाय नमः गुह्ये।ॐ नमः शक्तये नमः पादयोः।ॐ शिवाय कीलकाय नमः नाभौ।ॐ विनियोगाय नमः सर्वांगे।
शिव पंचमुख न्यासः ॐ नं तत्पुरूषाय नमः हृदये।ॐ मम् अघोराय नमःपादयोः।ॐ शिं सद्योजाताय नमः गुह्ये।ॐ वां वामदेवाय नमः मस्तके।ॐ यम् ईशानाय नमःमुखे।
कर न्यासः-
ॐ ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः।ॐ नं तर्जनीभ्यां नमः।ॐ मं मध्यमाभ्यां नमः।ॐ शिं अनामिकाभ्यां नमः।ॐ वां कनिष्टिकाभ्यां नमः।ॐ यं करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयादिन्यासः-
ॐ ॐ हृदयाय नमः।ॐ नं शिरसे स्वाहा।ॐ मं शिखायै वषट्।ॐ शिं कवचाय हुम।ॐ वाँ नेत्रत्रयाय वौषट्।ॐ यं अस्त्राय फट्।
“ध्यानम्”
ध्यायेनित्यम महेशं रजतगिरि निभं चारू चन्द्रावतंसं,रत्ना कल्पोज्जवलागं परशुमृग बराभीति हस्तं प्रसन्नम।
पदमासीनं समन्तात् स्तुतम मरगणै वर्याघ्र कृतिं वसानं,विश्वाधं विश्ववन्धं निखिल भय हरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्।
-:प्राण प्रतिष्ठा विधिः-
विनियोगः-
ॐ अस्य श्री प्राण प्रतिष्ठा मन्त्रस्य ब्रह्मा विष्णु महेश्वरा ऋषयःऋञ्यजुःसामानिच्छन्दांसि प्राणख्या देवता आं बीजम् ह्रीं शक्तिः कौं कीलकं देव प्राण प्रतिष्ठापने विनियोगः।
ऋष्यादिन्यासः-
ॐ ब्रह्मा विष्णु रूद्र ऋषिभ्यो नमः शिरसि।ॐ ऋग्यजुः सामच्छन्दोभ्यो नमःमुखे।ॐ प्राणाख्य देवतायै नमःहृदये।ॐआं बीजाय नमःगुह्ये।ॐह्रीं शक्तये नमः पादयोः।ॐ क्रौं कीलकाय नमः नाभौ।ॐ विनियोगाय नमःसर्वांगे। अब न्यास के बाद एक पुष्प या बेलपत्र से शिवलिंग का स्पर्श करते हुए प्राणप्रतिष्ठा मंत्र बोलें।
प्राणप्रतिष्ठा मंत्रः-
ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं शिवस्य प्राणा इह प्राणाःॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं शिवस्य जीव इह स्थितः।ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं शिवस्य सर्वेन्द्रियाणि,वाङ् मनस्त्वक् चक्षुः श्रोत्र जिह्वा घ्राण पाणिपाद पायूपस्थानि इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा।अब नीचे के मंत्र से आवाहन करें।
आवाहन मंत्रः-
ॐ भूः पुरूषं साम्ब सदाशिवमावाहयामि,ॐ भुवः पुरूषं साम्बसदाशिवमावाहयामि,ॐ स्वः पुरूषं साम्बसदाशिवमावाहयामि।अब शिद्ध जल,मधु,गो घृत,शक्कर,हल्दीचूर्ण,रोड़ीचंदन,जायफल,गुलाबजल,दही,एक,एक कर स्नान कराये”,नमःशिवाय”मंत्र का जप करता रहे,फिर चंदन, भस्म,अभ्रक,पुष्प,भांग,धतुर,बेलपत्र से श्रृंगार कर नैवेद्य अर्पण करें तथा मंत्र जप या स्तोत्र का पाठ,भजन करें।अंत में कपूर का आरती दिखा क्षमा प्रार्थना का मनोकामना निवेदन कर अक्षत लेकर निम्न मंत्र से विसर्जन करे,फिर पार्थिव को नदी,कुआँ,या तालाब में प्रवाहित करें।
विसर्जन मंत्रः-
गच्छ गच्छ गुहम गच्छ स्वस्थान महेश्वर पूजा अर्चना काले पुनरगमनाय च।

8…..बैल पर बैठे हुए शिव पार्वती का ध्यान कर माँ पार्वती से दया की भीख माँगनी चाहिए। जैसे सन्तान पेट दिखाकर माता से माँगती है, वैसे ही माँगना चाहिए। कल्याण की इच्छा होगी तो माँ अवश्य सर्वतोमुखी कल्याण करेगीं।

मन्दार कल्प हरि चन्दन पारिजात मध्ये सुधाब्धि1 मणि मण्डप वेदि संस्थे।
अर्धेन्दु-मौलि-सुललाट षडर्ध नेत्रे, भिक्षां प्रदेहि गिरिजे ! क्षुधिताय मह्यम्।।1
आली-कदम्ब-परिशोभित-पार्श्व-भागे, शक्रादयः सुरगणाः प्रणमन्ति तुभ्यम्।2
देवि ! त्वदिय चरणे शरणं प्रपद्ये, भिक्षां प्रदेहि गिरिजे ! क्षुधिताय मह्यम्।।2
केयूर-हार-मणि-कंकण-कर्ण-पूरे, कांची-कलापमणि-कान्त-लसद्-दुकूले।
दुग्धान्न-पूर्ण3-वर-कांचन-दर्वि-हस्ते, भिक्षां प्रदेहि गिरिजे ! क्षुधिताय मह्यम्।।3
सद्-भक्त-कल्प-लतिके भुवनैक-वन्द्ये, भूतेश-हृत्-कमल-लग्न-कुचाग्र-भृंगे !
कारूण्य-पूर्ण-नयने किमुपेक्ष्यसे मां, भिक्षां प्रदेहि गिरिजे ! क्षुधिताय मह्यम्।।4
शब्दात्मिके शशि-कलाऽऽभरणाब्धि-देहे, शम्भोः उरूस्थल-निकेतन-नित्यवासे।
दारिद्र्यदुःखभय हारिणि ! का त्वदन्या, भिक्षां प्रदेहि गिरिजे ! क्षुधिताय मह्यम्।।5
लीला वचांसि तव देवि! ऋगादि-वेदाः, सृष्टियादि कर्मरचना भवदीय चेष्टाः।
त्वत्तेजसा जगत् इदं प्रतिभाति4 नित्यं, भिक्षां प्रदेहि गिरिजे ! क्षुधिताय मह्यम्।।6
वृन्दार वृन्द मुनि5 नारद कौशिकात्रि व्यासाम्बरीष कलशोद्भव कश्यपादयः6।
भक्त्या स्तुवन्ति निगमागम सूक्त मन्त्रैः, भिक्षां प्रदेहि गिरिजे ! क्षुधिताय मह्यम्।।7
अम्ब ! त्वदीय चरणाम्बुज सेवनेन, ब्रह्मादयोऽपि विपुलाः श्रियमाश्रयन्ते।
तस्मादहं तव नतोऽस्मि पदारविन्दे, भिक्षां प्रदेहि गिरिजे ! क्षुधिताय मह्यम्।।8
सन्ध्यालये7 सकल भू सुर सेव्यमाने, स्वाहा स्वधाऽसि पितृ देव गणार्त्ति हन्त्रि।
जाया सुतो परिजनोऽतिथयोऽन्य कामा, भिक्षां प्रदेहि गिरिजे ! क्षुधिताय मह्यम्।।9
एकात्म मूल निलयस्य महेश्वरस्य, प्राणेश्वरि ! प्रणत भक्त जनाय शीघ्रम्।
कामाक्षि! रक्षित जगत त्रितये अन्न पूर्णे, भिक्षां प्रदेहि गिरिजे! क्षुधिताय मह्यम्।।10
भक्त्या पठन्ति गिरिजा दशकं प्रभाते, कामार्थिनो बहु धनान्न समृद्धि कामा।
प्रीत्या महेश वनिता हिमशैलकन्या, तेभ्यो ददाति सततं मनसेप्सितानि।।11

मन्दार कल्पवृक्ष, श्वेत चन्दन एवं पारिजात वृक्षों के मध्य में अमृत सिन्धु के बीच मणि मण्डप की वेदी पर बैठी हुई, सुन्दर ललाट पर अर्ध चन्द्रमा से सुशोभिता एवं तीन नेत्रोंवाली हे गिरिजे ! मुझ भूखे को भोजन दीजिए।

आपके दोनों ओर सखियाँ शोभायमान हैं, इन्द्रादि देवगण आपको नमस्कार करते हैं, हे देवि ! मैं आपके चरणों की शरण लेता हूँ। मुझ भूखे को भोजन दीजिए।

भुजबन्ध, मणियों का हार, कंकन, कर्णाभूषण, करधनी और मणियों के समान सुन्दर वस्त्र पहने तथा हाथों में खीर से भरी हुई श्रेष्ठ सोने की थाली लिए हे गिरिजे ! मुझ भूखे को भोजन दीजिए।

कल्पलता के समान सच्चे भक्तों की सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली, अखिल विश्व पूजिता, भगवान शंकर के हृदय कमल में अपने कुचाग्र रूपी भौरों के द्वारा प्रविष्टा और दया पूर्ण नेत्रोंवाली हे गिरिजे ! मुझ भूखे को भोजन दीजिए।

शब्द ब्रह्म स्वरूपे, अर्द्ध चन्द्र के आभूषण से विभूषित शरीर वाली और शिव के हृदय में सदा निवास करने वाली, आपके अतिरिक्त दरिद्रता के दुःख और भय को दूर करने वाला अन्य कोई नहीं है। हे गिरिजे ! मुझ भूखे को भोजन दीजिए।

हे देवि ! ऋक् आदि वेदों की वाणी आपके ही लीला वचन है। सृष्टि आदि क्रियाएँ आपकी ही चेष्टा हैं। आपके तेज से ही यह विश्व सदा दिखाई देता है। हे गिरिजे ! मुझ भूखे को भोजन दीजिए।
देव समूह, मुनि नारद, कौशिक, अत्रि, व्यास, अम्बरिष, अगस्त्य, कश्यप् आदि भक्ति पूर्वक वेद और तन्त्र के सूक्त मन्त्रों से आपकी स्तुति करते हैं। हे गिरिजे ! मुझ भूखे को भोजन दीजिए।

हे माँ ! तुम्हारे चरणों की सेवा से ब्रह्मा आदि भी अपार ऐश्वर्य पा जाते हैं। अतः मैं आपके चरण कमलों में नत मस्तक हूँ। हे गिरिजे ! मुझ भूखे को भोजन दीजिए।

सन्ध्या समय समस्त ब्राह्मणों द्वारा वन्दिता, पितरों व देवों के दुःख की नाशिका ‘स्वाहा-स्वधा’ आप ही हैं। मैं पत्नी, पुत्र, सेवक, अतिथियों एवं अन्य कामनाओंवाला हूँ। हे गिरिजे ! मुझ भूखे को भोजन दीजिए।
हे एकात्मा मूल महेश्वर की प्राणेश्वरि ! प्रणत भक्तों पर शीघ्र कृपा करने वाली हे कामाक्षि ! हे अन्नपूर्णे ! तीनों लोकों की रक्षा करने वाली हे गिरिजे ! मुझ भूखे को भोजन दीजिए।

बहु धन अन्न और ऐश्वर्य चाहने वाले जो लोग प्रातः काल इस ‘गिरिजा दशक’ को पढ़ते हैं, उन्हें महेश प्रिया, हिमालय पुत्री सदैव प्रेम पूर्वक मनचाही वस्तूएँ प्रदान करती हैं।

9…..शिव पंचवक्त्र – पंचायतन पूजन….= आदि ब्रह्माण्ड की रचना समय निराकार ब्रह्म से पाच तत्व और तत्व देवता ही प्रकट हुवे थे.उन समय हर देवी-देवता ,रिषी-मूनी,सनकादिक योगियो और सप्त्राशी सहित हर देव,दानव,गान्धर्व ,यक्ष,किन्नर,चारण,मानव सभी निराकार ब्रह्म स्वरुप शिवलिंग में पञ्च देवता की पूजा करते थे.शिवलिंग की पूर्व,पश्चिम,उतर,दक्षिण और उर्ध्व दिशाओं में अलग अलग देवता की पूजा होती हे.[१] पूर्व में तत्पुरुष याने शिव के सूर्यदेव स्वरुप का पूजन होता हे.हरिताल चन्दन,रक्त अक्षत,दूर्वा,अर्क के पुष्प,क्रुष्ण गुरु धुप,और मोदक के नैवेध्य के साथ शिवलिंग के पूर्वमुख पे सूर्यपूजा की जाती हे.[२]शिवलिंग के पश्चिम मुख पे सद्योजात याने महागणपति-ब्रह्मा की पूजा की जाती हे.मानशील चन्दन,अक्षत,सफ़ेद पुष्प,गूगल धुप,और पायस के नैवेध्य से पूजन होता हे.[३]उत्तर मुख पे वामदेव याने नारायण की पूजा होती हे.हरी चन्दन,केशर-हल्दी अक्षत,पच्सुगंधित धुप,शतपत्र पुष्प,तुलसीपत्र,और गौध्रुत्पाक के नैवेध्य से पूजन होता हे.[४]दक्षिण मुख पे अघोरेश्वर याने महारुद्र के हस्त में महामाया भगवती की पूजा होती हे.अगर चन्दन,कृष्ण अक्षत,अगर धुप,कनेर और नीलकमल पुष्प,और माशान्न्पाक के नैवेध्य से पूजन होता हे.[५]उर्ध्व मुख पे ईशान याने महादेव का पूजन भस्म चन्दन,स्वेत अक्ष,कनक पुष्प,बिल्लिपत्र,चन्दन धुप और साकर मिश्रित अक्षत के नैवेध्य से पूजन होता हे.इनके पूरे विधान का पुस्तक मिलता हे.ये आर्य परंपरा की पूजा हे.शिवलिंग पर पूजा से पाचो देवता की पूजा होती हे.घर मंदीर में पाचो देवता की मूर्ति स्थापित की जाती हे.२७ =१४ के आसन पर आराध्य देव मध्य में और बाकी चारो कोने पर स्थापित किये जाते हे.कूल परंपरा या आपके मनोभाव की रूचि के अनुसार मध्य में आप जिस आराध्य देव का स्थापन करे तब अग्नि,वायव्य,ईशान और नैरुत्य में ब्रह्माण्ड की स्थिति के सूक्ष्म अभ्यासी रूशी-मत के अनुसार बाकी देवताओ स्थापन किया जाता हे.निशदिन पंचायत का पूजन श्रेष्ठ हे क्युकी सारे धर्म-संप्रदायों के सभी देवता का पूजन हो जाता हे.श्री विद्या उपासना का पूजन पद्धति के प्रकरण शरू करने से पहेले ऐसे महत्वपूर्ण विषयो को पहेले समजने केलिए पंचायत पूजा यहाँ प्रसिद्द की हे ।

10…शिव तांडव स्तोत्रं :-
जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डम न्निनादवड्डमर्वयं चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥
जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी । विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥
धरा धरेंद्र नंदिनी विलाधुवंधुर- स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥
जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा- कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥
सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर- प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥
ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा- निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥
कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक- प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥
नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर- त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥
प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा- विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥
अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी- रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥
जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर- द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल- ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो- र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥
कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌ ।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥13॥
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका- निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌ ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥
पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥
॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌॥

 

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