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गुरूमहिमा १
जो गुरुचरणकृपा से रहित हैं वे मेरी आज्ञा से विनष्ट हो जाते हैं । वस्तुतः गुरुचरणपादुका नष्ट होने से रक्षा करती है अतः गुरुचरणसेवा सबसे बडा़ तप है । गुरु के प्रसन्न होने मात्र से सारी सिद्धि प्राप्त हो जाती है इसमें संशय नहीं ॥१८८ – १८९॥
मैं ही गुरु हूँ , मैं ही देव हूँ , मैं ही मन्त्रार्थ हूँ , नाना शास्त्रों के अर्थ को न जानने वाले जो लोग इनमें भिन्न बुद्धि रखते हैं वे नरक में पड़ते हैं । हे प्रभो ! सभी विद्याओं की प्राप्ति का मूल जैसे दीक्षा है , वैसे ही स्वतन्त्र का मूल गुरु है किं बहुना गुरु ही आत्मा है इसमें संशय नहीं ॥१८९ – १९१॥
अपनी ही आत्मा अपना बन्धु है और अपनी ही आत्मा अपना शत्रु है । अपने द्वारा जिस कर्म को जिस भाव से किया जाता है उसी भाव से सिद्धि मिलती है । चाहे हीनाङ्र , कपटी , रोगी एवं बहुभोजी तथा शीलरहित ही साधक क्यों न हो मेरी उपासना करते हुये उसे उपविद्या का अभ्यास करते रहना चाहिये । धन , धान्य , सुत , वित्त , राज्य तथा ब्राह्मण भोजन अपने कल्याण के लिये प्रयुक्त करना चाहिये । अन्य की चिन्ता नहीं करनी चाहिये क्योंकी वह निष्फल है । नित्यश्राद्ध करने वाला धर्मशील मनुष्य सभी मनुष्यों में श्रेष्ठ है ॥१९१ – १९४॥
पवित्र आचरण वाला , मेरे सिद्धपीठों में भ्रमण करने वाला महीपाल यदि मेरे उन उन पीठों में जाकर मेरा दर्शन करे , तो अव्यक्त
( सूक्ष्म ) मण्डल में रहने वाली समस्त सिद्धियाँ उसके हस्तगत हो जाती हैं , क्योंकि महामाया के प्रसन्न होने पर अकस्मात् ‍ सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥१९५ – १९६॥
भाव प्रशंसा — अथवा , महावीरभाव में अथवा महाधीर साधक को दिव्यभाव में स्थित होने से सिद्धि मिलती है , अथवा पशुभाव में स्थित मन्त्रज्ञ साधक मुझे अपने हृदयरूपी पीठ में निवास करावे तब सिद्धि प्राप्त होती है । मनोरमभावत्रय ( पशुभाव , वीरभाव और दिव्यभाव ) ही क्रिया को सफल बनाते हैं , अथवा , हे भैरव ! दिव्यभाव और वीरभाव भी क्रिया को फलवती बनाते हैं ॥१९७ – १९८॥
हीन जाति में उत्पन्न पशुभाव वाले तथा वीर भाव वाले मुझे प्राप्त करते हैं । किन्तु शास्त्रों से अभिभूत चित्त वाले इस कलियुग में मेरा दर्शन नहीं प्राप्त कर सकते । कोई हजारों वर्ष पर्यन्त लगे रहने पर भी शास्त्रों का अन्त नहीं प्राप्त कर सकता । एक तो तर्कादि अनेक शास्त्र हैं और अपेक्षाकृत मनुष्य की आयु अत्यन्त स्वल्प है तथा उसमें भी करोडों विघ्न हैं ॥१९९ – २००॥
इस कारण जिस प्रकार हंस जल में से क्षीर को अलग कर लेता है उसी प्रकार शास्त्रों के सार का ज्ञान कर लेना चाहिए । इस घोर कलियुग में दिव्य और वीरभाव के सहारे अपने चित्त का महाविद्या में लगाये हुये मेरे महाभक्त महाविद्या के परम पद का दर्शन कर लेते हैं ॥२०१ – २०२॥
मौन धारण करने वाले सर्वदा साधन में लगे हुये सज्जन दिव्य और वीरभाव के स्वभाव से मेरे चरण कमलों का दर्शन कर लेते हैं । बहुत बडे़ उत्तम फल की आकांछा रखने वाले ब्राह्मणों को दो भाव ग्राह्य है अथवा अवधूतों के लिये भी दो ही भाव कहे गये हैं । इन दो भाव के प्रभाव से साधक मनुष्य महायोगी हो जाता है । किं बहुना , भाव द्वय को सिद्ध कर लेने पर मूर्ख भी वाचस्पति हो जाता है ॥२०२ – २०५॥
हे महादेव ! जो तन्त्रार्थ से सिद्ध किये गये सभी वर्णों के लिए विहित दो भाव को जानते हैं , वे साक्षात् ‍ रुद्र हैं , इसमें संशय नहीं । भावद्वय सभी भावज्ञों का साधन है । भाव को जानने वाले साधक भक्तियोग के इन्द्र हैं वे अपने तन्त्रार्थ के पारदर्शी होते हैं । नित्या उन्मत्त और जड़ के समान बने रहते हैं ॥२०५ – २०७॥
( जो भाव नहीं जानते वे इस प्रकार हैं ) जैसे वृक्ष फूल धारण करता है किन्तु उसकी गन्ध नासिका ही जानती है । इसी प्रकार तत्त्वशास्त्र के पढ़ने वाले तो बहुत हैं पर भाव के जानकार कोई कोई होते हैं । जिस प्रकार बुद्धिहीन की पढा़ई और अन्धे को आदर्श ( दर्पण ) का दर्शन , व्यर्थ होता है उसी प्रकार प्रज्ञावानों को भी धर्मशास्त्र का ज्ञान बन्धन का कारण हो जाता है ॥२०७ – २०९॥
यह तत्त्व इस प्रकार हो सकता है यही शास्त्रार्थ का निश्चयज्ञान है । इस प्रकार वाक् ‌ पति अपने मन से मैं कर्त्ता हूँ , मैं आत्मा हूँ , मैं सर्वव्यापी हूँ इस प्रकार के स्वभाव की चिन्ता करते हैं ॥२०९ – २१०॥
प्रथम पटल – गुरूमहिमा २
गुरूमहिमा २
जब सौदामनी के समान ( क्षणिक ) तेज से युक्त शास्त्र ज्ञानी एक सहस्त्रवर्ष पर्यन्त देखता है तभी ( तन्त्रवेत्ता एवं भावज्ञ ) महाज्ञानी एक चन्द्र को सहस्त्र चन्द्र के समान देखता है । करोड़ों वर्ष तक इस प्रकार तपस्या करने से मनुष्य जो फल प्राप्त करता है वह सभी फल मेरे चरणों के रज का एक क्षण मात्र ध्यान करने से उसे प्राप्त हो जाता है ॥२११ – २१२॥
यदि कोई आनन्द बढा़ने वाले एवं त्रिकोण के आधार में ( कुण्डलिनी ) स्थित तेज वाले मेरे कामरूप पीठ मंं , जहाँ जल के बुदबुद के समान शब्द होता है तथा जो अनन्त मङ्गलात्मक है , वहाँ सर्वत्र विचरण करे तो वह गणेश और कार्त्तिकेय के समान मेरा प्रिय बन कर मेरा दास हो जाता है और भक्तों में इन्द्र बन जाता है ॥२१३ – २१४॥
यदि कोई साधक मेरे चरणकमलों को प्राप्त करना चाहता है तो साट्टहास एवं विकटाक्ष रूप उपपीठ , जिसका नाम कङ्काल है वहाँ पर विचरण करे । ज्वालामुखी नाम का महापीठ मेरा अत्यन्त प्रिय है जो मेरी संतुष्टि के लिये वहाँ भ्रमण करता है वह निश्चय ही योगी हो जाता है ॥२१५ – २१६॥
दोनों भावों का खान रूप ज्वालामुख्यादिपीठ में जो साधकेन्द्र भ्रमण करते हैं वे अवश्य ही सभी साधकों में श्रेष्ठ एवं सिद्ध हो जाते हैं इसमें संशय नहीं । त्रैलोक्य की सिद्धि चाहने वालों के लिये भाव से बढ़ कर और कोई पदार्थ नहीं क्योंकि भाव ही परमज्ञान और सर्वोत्तम ब्रह्मज्ञान है ॥२१७ – २१८॥
यदि भाव का ज्ञान नहीं हुआ तो करोड़ों कन्या दान से किं वा वाराणसी की सौ बार परिक्रमा से अथवा कुरुक्षेत्र में यात्रा करने से क्या लाभ ? भावद्वयज्ञान के बिना गया में श्राद्ध एवं दान से या अनेक पीठों में भ्रमण करने से भी कोई लाभ नहीं । बहुत क्या कहें , यदि भाव ज्ञान नहीं हुआ तो अनेक प्रकार के होम और क्रिया से भी क्या ? भाव से ज्ञान उत्पन्न होता है । ज्ञान होने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥२१९ – २२१॥
गुरु महिमा — आत्मा से , मन से एवं वाणी से गुरु ईश्वर कहा जाता है । ध्यान ही सायुज्य है और मन को लय कर देना ’ मोक्ष ’ कहा जाता है ॥२२१ – २२२ ॥
गुरु की प्रसन्नता मात्र से यहाँ ( कुण्डलिनी ) शक्ति अत्यन्त संतुष्ट हो जाती है और जब साधक पर शक्ति संतुष्ट हो जाती है तो उसे ’ मोक्ष ’ अवश्य प्राप्त हो जाता है ॥२२२ – २२३॥
इस सारे संसार का मूल गुरु है । समस्त तपस्याओं का मूल गुरु है । उत्तम और जितेन्द्रिय साधक गुरु के प्रसन्न होने मात्र से मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥२२३ – २२४॥
इसलिये साधक गुरु की आज्ञा का कभी उल्लंघन न करे तथा उनका उत्तर न दे । दिन रात दास के समान गुरु की आज्ञा का पालन करे । बुद्धिमान साधक उनके कहे गये अथवा बिना कहे कार्थों की उपेक्षा न करे ॥२२४ – २२५॥
उनके चलते रहने पर स्वयं भी नम्रतापूर्वक उनका अनुगमन करे और उनकी आज्ञा का कभी उल्लंघन न करे । जो गुरु की अहितकारी अथवा हितकारी बात नहीं सुनता अथवा सुन कर अपना मुंह फेर लेता है वह रौरव नरक में जाता है । दैवात् यदि बुद्धिरहित पुरुष अपने गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करता है वह घोर नरक में जाता है और शूकर योनि प्राप्त करता है ॥२२६ – २२८॥
जो गुरु की आज्ञा का उल्लङ्वन , गुरुनिन्दा , गुरु को चिढा़ने वाला , अप्रिय व्यवहार तथा गुरुद्रोह करता है उसका संसर्ग कभी नहीं करना चाहिये । जो गुरु के द्रव्य को चाहता है , गुरु की स्त्री के साथ सङ्गम करता है उसे बहुत बडा़ पाप लगता है अतः उसका कोई प्रायश्चित्त नहीं है । जो निन्दा के द्वारा गुरु का शत्रुवत् अहित करता है वह अरण्य में एवं निर्जन स्थान में ब्रह्मराक्षस होता है ॥२२८ – २३१॥
गुरु का खडा़ऊँ , आच्छादन , वस्त्र , शयन तथा उनके आभूषण देखकर उन्हे नमस्कार करे और अपने कार्य में कभी भी उसका उपयोग न करे । जिस मनुष्य के जिहवा के अग्रभाग में सदैव गुरुपादुका मन्त्र विद्यमान रहता है वह अनायास ही धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष को प्राप्त कर लेता है । शिष्य को अपने भोग तथा मोक्ष के लिये गुरु के चरण कमलों का सदैव ध्यान करना चाहिये । हे वीर भैरव ! उससे बढ़ कर अन्य कोई भक्ति नहीं है ॥२३१ – २३४॥
यदि शिष्य और गुरु एक ही ग्राम में निवास करते हों तो शिष्य को चाहिये कि वह तीनों संध्या में जाकर अपने गुरु को प्रणाम करे । यदि एक ही देश में गुरु और शिष्य के निवास में सात योजन का अन्तर हो तो शिष्य को महीने में एक बार जा कर उन्हें प्रणाम करना चाहिये ॥२३४ – २३५॥
श्री गुरु का चरण कमल जिस दिशा में विद्यमान हो उस दिशा में शरीर से ( दण्डवत् प्रणाम द्वारा ), मन से तथा बुद्धि से नमस्कार करे । हे प्रभो ! वेदाङ्गादि विद्या , पदमा सनादि आसन , मन्त्र , मुद्रा और तन्त्रादि ये सभी गुरु के मुख से प्राप्त होने पर सफल होते हैं अन्यथा नहीं ॥२३६ – २३७॥
कम्बल पर , कोमल स्थान ( चारपाई आदि ) पर , प्रासाद पर , दीर्घ काष्ठ पर अथवा किसी की पीठ पर गुरु के साथ एव आसन पर न बैठे । हे देवेश ! श्री गुरु का पादुका मन्त्र , उनका दिया हुआ मूल मन्त्र और अपना पादुका मन्त्र जिस किसी के शिष्य को नहीं बताना चाहिये ॥२३८ – २३९॥
जो अपनी हित में आने वाली वस्तु हो उसे न दे कर गुरु को कदापि प्रवञ्चित नहीं करना चाहिये । हे सुव्रत ! न केवल दीक्षागुरु को , किन्तु जिससे एक अक्षर का भी ज्ञान किया हो उसको भी प्रवञ्चित न करे । गुरु के उद्देेश्य से अपने वित्तानुसार जो भक्ष्य निर्माण किया जाता है उसका स्वल्पभाग भी बहुत महान् होता है । किन्तु जो गुरु की भक्ति से विवर्जित भुवनादि , किं बहुना , सर्वस्व भी प्रदान करे तो वह दरिद्रता और नरक प्राप्त करता है क्योंकि दान में भक्ति ही कारण है ॥३४० – २४२॥
गुरु में भक्ति रखने से ऐन्द्र ( महेन्द्र ) पद तथा भक्ति न रखने से शूकरत्व प्राप्त होता है । सभी जगह भक्तिशास्त्र में गुरु भक्ति से बढ़ कर और कोई उत्कृष्ट नहीं है । हे नाथ ! गुरु पूजा के बिना करोड़ों पुण्य व्यर्थ हो जाते हैं इसलिये गुरुभक्ति करनी चाहिये ॥२४३ – २४४॥

श्री गुरु पादुका स्तोत्र
ॐ नमो गुरुभ्यो गुरुपादुकाभ्यो नमः परेभ्यः परपादुकाभ्यः!आचार्य सिद्धेश्वरपादुकाभ्योनमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्यो!!1!!
मैं पूज्य गुरुदेव को प्रणाम करता हूँ, मेरी उच्चतम भक्ति गुरु चरणों और उनकी पादुका केप्रति हैं, क्योंकि गंगा-यमुना आदि समस्त नदियाँ और संसार के समस्त तीर्थ उनके चरणों में समाहित हैं, यह पादुकाएं ऐसे चरणों से आप्लावित रहती हैं, इसलिए मैं इस पादुकाओं को प्रणाम करता हु, यह मुझे भवसागर से पार उतारने में सक्षम हैं, यह पूर्णता देने में सहायक हैं, ये पादुकाएं आचार्य और सिद्ध योगी केचरणों में सुशोभित रहती हैं, और ज्ञान के पुंज को अपने ऊपर उठाया हैं, इसीलिए ये पादुकाएं ही सही अर्थों में सिद्धेश्वर बन गई हैं, इसीलिए मैं इस गुरु पादुकाओं कोभक्ति भावः से प्रणाम करता हूँ!!1!!
ऐंकार ह्रींकाररहस्ययुक्त श्रींकारगूढार्थ महाविभूत्या!ओंकारमर्म प्रतिपादिनीभ्याम नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम!!2!!
गुरुदेव “ऐंकार” रूप युक्त हैं, जो कि साक्षात् सरसवती के पुंज हैं, गुरुदेव”ह्रींकार” युक्त हैं, एक प्रकार से देखा जाये तो वे पूर्णरूपेण लक्ष्मी युक्त हैं, मेरे गुरुदेव”श्रींकार” युक्त हैं, जो संसार के समस्त वैभव, सम्पदा और सुख से युक्त हैं, जो सही अर्थों में महान विभूति हैं, मेरे गुरुदेव “ॐ” शब्द के मर्म को समझाने में सक्षम हैं, वे अपने शिष्यों को भी उच्च कोटि कि साधना सिद्ध कराने में सहायक हैं, ऐसे गुरुदेव के चरणों में लिपटी रहने वाली ये पादुकाएं साक्षात् गुरुदेव का ही विग्रह हैं, इसीलिए मैं इन पादुकाओं को श्रद्धा – भक्ति युक्त प्रणाम करता हूँ!!2!!
होत्राग्नि होत्राग्नि हविश्यहोतृ – होमादिसर्वाकृतिभासमानं !यद् ब्रह्म तद्वोधवितारिणीभ्याम नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम!!3!!
ये पादुकाएं अग्नि स्वरूप हैं, जो मेरे समस्त पापो को समाप्त करने में समर्थ हैं, ये पादुकाएं मेरे नित्य प्रति के पाप, असत्य, अविचार, और अचिन्तन से युक्त दोषों को दूर करनेमें समर्थ हैं, ये अग्नि कि तरह हैं, जिनका पूजन करने से मेरे समस्त पाप एक क्षण में ही नष्ट हो जाते हैं, इनके पूजन से मुझे करोडो यज्ञो का फल प्राप्त होता हैं, जिसकीवजह से मैं स्वयं ब्रह्मस्वरुप होकर ब्रह्म को पहिचानने कि क्षमता प्राप्त कर सका हूँ, जब गुरुदेव मेरे पास नहीं होते, तब ये पादुकाएं ही उनकी उपस्थिति का आभास प्रदान कराती रहती हैं, जो मुझे भवसागर से पार उतारने में सक्षम हैं, ऐसी गुरु पादुकाओं को मैं पूर्णता के साथ प्रणाम करता हूँ!!3!!
कामादिसर्प वज्रगारूडाभ्याम विवेक वैराग्यनिधिप्रदाभ्याम.बोधप्रदाभ्याम द्रुतमोक्षदाभ्याम नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम!!4!!
मेरे मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह और अंहकार के सर्प विचरते ही रहते हैं, जिसकी वजह से मैं दुखी हूँ, और साधनाओं में मैं पूर्णता प्राप्त नहीं कर पाता, ऐसी स्थिति में गुरु पादुकाएं गरुड़ के समान हैं, जो एक क्षण में ही ऐसे कामादि सर्पों को भस्म कर देती हैं, और मेरे ह्रदय में विवेक, वैराग्य, ज्ञान, चिंतन, साधना और सिद्धियों का बोध प्रदान करती हैं, जो मुझे उन्नति की ओर ले जाने में समर्थ हैं, जो मुझे मोक्ष प्रदान करने में सहायक हैं, ऐसी गुरु पादुकाओं को मैं प्रणाम करता हूँ!!4!!
अनंतसंसार समुद्रतार नौकायिताभ्यां स्थिरभक्तिदाभ्यां!जाड्याब्धिसंशोषणवाड्वाभ्यां नमो नमः श्री गुरुपादुकाभ्याम!!5!!
यह संसार विस्तृत हैं, इस भवसागर पार करने में ये पादुकाएं नौका की तरहहैं, जिसके सहारे मैं इस अनंत संसार सागर को पार कर सकता हूँ, जो मुझे स्थिर भक्ति देने में समर्थ हैं, मेरे अन्दर अज्ञान की घनी झाडियाँ हैं, उसे अग्नि की तरह जला कर समाप्त करने में सहायक हैं, ऐसी पादुकाओंको मैं भक्ति सहित प्रणाम करता हूँ!!5!!

**********~ श्री गुरु स्तोत्रम् ~*****************
|| श्री महादेव्युवाच ||
गुरुर्मन्त्रस्य देवस्य धर्मस्य तस्य एव वा |
विशेषस्तु महादेव ! तद् वदस्व दयानिधे ||
श्री गुरु स्तोत्रम् श्री महादेवी (पार्वती) ने कहा : हे दयानिधि शंभु ! गुरुमंत्र के देवता अर्थात् श्री गुरुदेव एवं उनका आचारादि धर्म क्या है – इस बारे में वर्णन करें |
|| श्री महादेव उवाच ||
जीवात्मनं परमात्मनं दानं ध्यानं योगो ज्ञानम् |
उत्कल काशीगंगामरणं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||१||
श्री महादेव बोले : जीवात्मा-परमात्मा का ज्ञान, दान, ध्यान, योग पुरी, काशी या गंगा तट पर मृत्यु – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||१||
प्राणं देहं गेहं राज्यं स्वर्गं भोगं योगं मुक्तिम् |
भार्यामिष्टं पुत्रं मित्रं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||२||
प्राण, शरीर, गृह, राज्य, स्वर्ग, भोग, योग, मुक्ति, पत्नी, इष्ट, पुत्र, मित्र – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||२||
वानप्रस्थं यतिविधधर्मं पारमहंस्यं भिक्षुकचरितम् |
साधोः सेवां बहुसुखभुक्तिं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||३||
वानप्रस्थ धर्म, यति विषयक धर्म, परमहंस के धर्म, भिक्षुक अर्थात् याचक के धर्म – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||३||
विष्णो भक्तिं पूजनरक्तिं वैष्णवसेवां मातरि भक्तिम् |
विष्णोरिव पितृसेवनयोगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||४||
भगवान विष्णु की भक्ति, उनके पूजन में अनुरक्ति, विष्णु भक्तों की सेवा, माता की भक्ति, श्रीविष्णु ही पिता रूप में हैं, इस प्रकार की पिता सेवा – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||४||
प्रत्याहारं चेन्द्रिययजनं प्राणायां न्यासविधानम् |
इष्टे पूजा जप तपभक्तिर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||५||
प्रत्याहार और इन्द्रियों का दमन, प्राणायाम, न्यास-विन्यास का विधान, इष्टदेव की पूजा, मंत्र जप, तपस्या व भक्ति – इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||५||
काली दुर्गा कमला भुवना त्रिपुरा भीमा बगला पूर्णा |
श्रीमातंगी धूमा तारा न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||६||
काली, दुर्गा, लक्ष्मी, भुवनेश्वरि, त्रिपुरासुन्दरी, भीमा, बगलामुखी (पूर्णा), मातंगी, धूमावती व तारा ये सभी मातृशक्तियाँ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||६||
मात्स्यं कौर्मं श्रीवाराहं नरहरिरूपं वामनचरितम् |
नरनारायण चरितं योगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||७||
भगवान के मत्स्य, कूर्म, वाराह, नरसिंह, वामन, नर-नारायण आदि अवतार, उनकी लीलाएँ, चरित्र एवं तप आदि भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||७||
श्रीभृगुदेवं श्रीरघुनाथं श्रीयदुनाथं बौद्धं कल्क्यम् |
अवतारा दश वेदविधानं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||८||
भगवान के श्री भृगु, राम, कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि आदि वेदों में वर्णित दस अवतार श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||८||
गंगा काशी कान्ची द्वारा मायाऽयोध्याऽवन्ती मथुरा |
यमुना रेवा पुष्करतीर्थ न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||९||
गंगा, यमुना, रेवा आदि पवित्र नदियाँ, काशी, कांची, पुरी, हरिद्वार, द्वारिका, उज्जयिनी, मथुरा, अयोध्या आदि पवित्र पुरियाँ व पुष्करादि तीर्थ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||९||
गोकुलगमनं गोपुररमणं श्रीवृन्दावन-मधुपुर-रटनम्|
एतत् सर्वं सुन्दरि ! मातर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||१०||
हे सुन्दरी ! हे मातेश्वरी ! गोकुल यात्रा, गौशालाओं में भ्रमण एवं श्री वृन्दावन व मधुपुर आदि शुभ नामों का रटन – ये सब भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||१०||
तुलसीसेवा हरिहरभक्तिः गंगासागर-संगममुक्तिः |
किमपरमधिकं कृष्णेभक्तिर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||११||
तुलसी की सेवा, विष्णु व शिव की भक्ति, गंगा सागर के संगम पर देह त्याग और अधिक क्या कहूँ परात्पर भगवान श्री कृष्ण की भक्ति भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||११||
एतत् स्तोत्रम् पठति च नित्यं मोक्षज्ञानी सोऽपि च धन्यम् |
ब्रह्माण्डान्तर्यद्-यद् ध्येयं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ||१२||
इस स्तोत्र का जो नित्य पाठ करता है वह आत्मज्ञान एवं मोक्ष दोनों को पाकर धन्य हो जाता है | निश्चित ही समस्त ब्रह्माण्ड मे जिस-जिसका भी ध्यान किया जाता है, उनमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ||१२||
|| वृहदविज्ञान परमेश्वरतंत्रे त्रिपुराशिवसंवादे श्रीगुरोःस्तोत्रम् ||
||यह गुरुस्तोत्र वृहद विज्ञान परमेश्वरतंत्र के अंतर्गत त्रिपुरा-शिव संवाद में आता है ||

शक्तिपात :- हमारे गुरु या ईष्ट देव हम पर समयानुसार शक्तिपात भी करते रहते हैं. उस समय हमें ऐसा लगता है जैसे मूर्छा (बेहोशी) सी आ रही है या अचानक आँखें बंद होकर गहन ध्यान या समाधि की सी स्थिति हो जाती है, साथ ही एक दिव्य तेज का अनुभव होता है और परमानंद का अनुभव बहुत देर तक होता रहता है. ऐसा भी लगता है जैसे कोई दिव्या धारा इस तेज पुंज से निकलकर अपनी और बह रही हो व अपने अपने भीतर प्रवेश कर रही हो.
वह आनंद वर्णनातीत होता है. इसे शक्तिपात कहते है. जब गुरु सामने बैठकर शक्तिपात करते हैं तो ऐसा लगता है की उनकी और देखना कठिन हो रहा है. उनके मुखमंडल व शरीर के चारों तरफ दिव्य तेज/प्रकाश दिखाई देने लगता है और नींद सी आने लगती है और शरीर एकदम हल्का महसूस होता है व परमानन्द का अनुभव होता है. इस प्रकार शक्तिपात के द्वारा गुरु पूर्व के पापों को नष्ट करते हैं व कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करते हैं. ध्यान/समाधी की उच्च अवस्था में पहुँच जाने पर ईष्ट देव या ईश्वर द्वारा शक्तिपात का अनुभव होता है.
साधक को एक घूमता हुआ सफ़ेद चक्र या एक तेज पुंज आकाश में या कमरे की छत पर दीख पड़ता है और उसके होने मात्र से ही परमानन्द का अनुभव ह्रदय में होने लगता है. उस समय शारीर जड़ सा हो जाता है व उस चक्र या पुंज से सफ़ेद किरणों का प्रवाह निकलता हुआ अपने शरीर के भीतर प्रवेश करता हुआ प्रतीत होता है. उस अवस्था में बिजली के हलके झटके लगने जैसा अनुभव भी होता है और उस झटके के प्रभाव से शरीर के अंगा भी फड़कते हुए देखे जाते हैं.
यदि ऐसे अनुभव होते हों तो समझ लेना चाहिए कि आप पर ईष्ट या गुरु की पूर्ण कृपा हो गई है, उनहोंने आपका हाथ पकड़ लिया है और वे शीघ्र ही आपको इस माया से बाहर खींच लेंगे.
१.अश्विनी मुद्रा, मूल बांध का लगना :- श्वास सामान्य चलना और गुदा द्वार को बार-बार संकुचित करके बंद करना व फिर छोड़ देना. या श्वास भीतर भरकर रोक लेना और गुदा द्वार को बंद कर लेना, जितनी देर सांस भीतर रुक सके रोकना और उतनी देर तक गुदा द्वार बंद रखना और फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए गुदा द्वार खोल देना इसे अश्विनी मुद्रा कहते हैं. कई साधक इसे अनजाने में करते रहते हैं और इसको करने से उन्हें दिव्य शक्ति या आनंद का अनुभव भी होता है परन्तु वे ये नहीं जानते कि वे एक यौगिक क्रिया कर रहे हैं. अश्विनी मुद्रा का अर्थ है “अश्व यानि घोड़े की तरह करना”. घोडा अपने गुदा द्वार को खोलता बंद करता रहता है और इसी से अपने भीतर अन्य सभी प्राणियों से अधिक शक्ति उत्पन्न करता है.
इस अश्विनी मुद्रा को करने से कुण्डलिनी शक्ति शीघ्रातिशीघ्र जाग्रत होती है और ऊपर की और उठकर उच्च केन्द्रों को जाग्रत करती है. यह मुद्रा समस्त रोगों का नाश करती हैं. विशेष रूप से शरीर के निचले हिस्सों के सब रोग शांत हो जाते हैं. स्त्रियों को प्रसव पीड़ा का भी अनुभव नहीं होता. प्रत्येक नए साधक को या जिनकी साधना रुक गई है उनको यह अश्विनी मुद्रा अवश्य करनी चाहिए. इसको करने से शरीर में गरमी का अनुभव भी हो सकता है, उस समय इसे कम करें या धीरे-धीरे करें व साथ में प्राणायाम भी करें. सर्दी में इसे करने से ठण्ड नहीं लगती. मन एकाग्र होता है. साधक को चाहिए कि वह सब अवस्थाओं में इस अश्विनी मुद्रा को अवश्य करता रहे. जितना अधिक इसका अभ्यास किया जाता है उतनी ही शक्ति बदती जाती है. इस क्रिया को करने से प्राण का क्षय नहीं होता और इस प्राण उर्जा का उपयोग साधना की उच्च अवस्थाओं की प्राप्ति के लिए या विशेष योग साधनों के लिए किया जा सकता है. मूल बांध इस अश्विनी मुद्रा से मिलती-जुलती प्रक्रिया है. इसमें गुदा द्वार को सिकोड़कर बंद करके भीतर – ऊपर की और खींचा जाता है. यह वीर्य को ऊपर की और भेजता है एवं इसके द्वारा वीर्य की रक्षा होती है. यह भी कुंडलिनी जागरण व अपानवायु पर विजय का उत्तम साधन है. इस प्रकार की दोनों क्रियाएं स्वतः हो सकती हैं. इन्हें अवश्य करें. ये साधना में प्रगति प्रदान करती हैं.
2.. गुरु या ईष्ट देव की प्रबलता :- जब गुरु या ईष्ट देव की कृपा हो तो वे साधक को कई प्रकार से प्रेरित करते हैं. अन्तःकरण में किसी मंत्र का स्वतः उत्पन्न होना व इस मंत्र का स्वतः मन में जप आरम्भ हो जाना, किसी स्थान विशेष की और मन का खींचना और उस स्थान पर स्वतः पहुँच जाना और मन का शांत हो जाना, अपने मन के प्रश्नों के समाधान पाने के लिए प्रयत्न करते समय अचानक साधू पुरुषों का मिलना या अचानक ग्रन्थ विशेषों का प्राप्त होना और उनमें वही प्रश्न व उसका उत्तर मिलना, कोई व्रत या उपवास स्वतः हो जाना, स्वप्न के द्वारा आगे घटित होने वाली घटनाओं का संकेत प्राप्त होना व समय आने पर उनका घटित हो जाना, किसी घोर समस्या का उपाय अचानक दिव्य घटना के रूप में प्रकट हो जाना, यह सब होने पर साधक को आश्चर्य, रोमांच व आनंद का अनुभव होता है. वह सोचने लगता है की मेरे जीवन में दिव्य घटनाएं घटित होने लगी हैं, अवश्य ही मेरे इस जीवन का कोई न कोई विशेष उद्देश्य है, परन्तु वह क्या है यह वो नहीं समझ पाटा. किन्तु साधक धैर्य रखे आगे बढ़ता रहे, क्योंकि ईष्ट या गुरु कृपा तो प्राप्त है ही, इसमें संदेह न रखे; क्योंकि समय आने पर वह उद्देश्य अवश्य ही उसके सामने प्रकट हो जाएगा.
3… ईष्ट भ्रष्टता का भ्रम :- कई बार साधकों को ईष्ट भ्रष्टता का भ्रम उपस्थित हो जाता है. उदाहरण के लिए कोई साधक गणेशजी को इष्ट देव मानकर उपासना आरम्भ करता है. बहुत समय तक उसकी आराधना अच्छी चलती है, परन्तु अचानक कोई विघ्न आ जाता है जिससे साधना कम या बंद होने लगती है. तब साधक विद्वानों, ब्राह्मणों से उपाय पूछता है, तो वे जन्मकुंडली आदि के माध्यम से उसे किसी अन्य देव (विष्णु आदि) की उप्पसना के लिए कहते हैं. कुछ दिन वह उनकी उपासना करता है परन्तु उसमें मन नहीं लगता. तब फिर वह और किसी की पास जाता है. वह उसे और ही किसी दुसरे देव-देवी आदि की उपासना करने के लिए कहता है. तब साधक को यह लगता है की मैं अपने ईष्ट गणेशजी से भ्रष्ट हो रहा हूँ. इससे न तो गणेशजी ही मिलेंगे और न ही दूसरे देवता और मैं साधना से गिर जाऊँगा. यहाँ साधकों से निवेदन है की यह सही है की वे अपने ईष्ट देव का ध्यान-पूजन बिलकुल नहीं छोड़ें, परन्तु वे उनके साथ ही उन अन्य देवताओं की भी उपासना करें. साधना के विघ्नों की शांति के लिए यह आवश्यक हो जाता है. उपासना से यहाँ अर्थ उन-उन देवी देवताओं के विषय में जानना भी है क्योंकि उन्हें जानने पर हम यह पाते हैं की वस्तुतः वे एक ही ईश्वर के अनेक रूप हैं (जैसे पानी ही लहर, बुलबुला, भंवर, बादल, ओला, बर्फ आदि है). इस प्रकार ईष्ट देव यह चाहता है कि साधक यह जाने. इसलिए इसे ईष्ट भ्रष्टता नहीं बल्कि ईष्ट का प्रसार कहना चाहिए.”
4.. शरीर का हल्का लगना :- जब साधक का ध्यान उच्च केन्द्रों (आज्ञा चक्र, सहस्रार चक्र) में लगने लगता है तो साधक को अपना शरीर रूई की तरह बहुत हल्का लगने लगता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब तक ध्यान नीचे के केन्द्रों में रहता है (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर चक्र तक), तब तक “मैं यह स्थूल शरीर हूँ” ऐसी दृढ भावना हमारे मन में रहती है और यह स्थूल शरीर ही भार से युक्त है, इसलिए सदा अपने भार का अनुभव होता रहता है. परन्तु उच्च केन्द्रों में ध्यान लगने से “मैं शरीर हूँ” ऐसी भावना नहीं रहती बल्कि “मैं सूक्ष्म शरीर हूँ” या “मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ परमात्मा का अंश हूँ” ऎसी भावना दृढ हो जाती है. यानि सूक्ष्म शरीर या आत्मा में दृढ स्थिति हो जाने से भारहीनता का अनुभव होता है. दूसरी बात यह है कि उच्च केन्द्रों में ध्यान लगने से कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होती है जो ऊपर की और उठती है. यह दिव्य शक्ति शरीर में अहम् भावना यानी “मैं शरीर हूँ” इस भावना का नाश करती है, जिससे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल का भान होना कम हो जाता है. ध्यान की उच्च अवस्था में या शरीर में हलकी चीजों जैसे रूई, आकाश आदि की भावना करने से आकाश में चलने या उड़ने की शक्ति आ जाती है, ऐसे साधक जब ध्यान करते हैं तो उनका शरीर भूमि से कुछ ऊपर उठ जाता है. परन्तु यह सिद्धि मात्र है, इसका वैराग्य करना चाहिए.
5.. हाथ के स्पर्श के बिना केवल दूर से ही वस्तुओं का खिसक जाना :- कई बार साधकों को ऐसा अनुभव होता है कि वे किसी हलकी वास्तु को उठाने के लिए जैसे ही अपना हाथ उसके पास ले जाते हैं तो वह वास्तु खिसक कर दूर चली जाती है, उस समय साधक को अपनी अँगुलियों में स्पंदन (झन-झन) का सा अनुभव होता है. साधक आश्चर्यचकित होकर बार-बार इसे करके देखता है, वह परीक्षण करने लगता है कि देखें यह दुबारा भी होता है क्या. और फिर वही घटना घटित होती है. तब साधक यह सोचता है कि अवश्य ही यह कोई दिव्य घटना उसके साथ घटित हो रही है. वास्तव में यह साधक के शरीर में दिव्य उर्जा (कुंडलिनी, मंत्र जप, नाम जप आदि से उत्पन्न उर्जा) के अधिक प्रवाह के कारण होता है. वह दिव्य उर्जा जब अँगुलियों के आगे एकत्र होकर घनीभूत होती है तब इस प्रकार की घटना घटित हो जाती है.
6… रोगी के रुग्ण भाग पर हाथ रखने से उसका स्वस्थ होना :- कई बार साधकों को ऐसा अनुभव होता है कि वे अनजाने में किसी रोगी व्यक्ति के रोग वाले अंग पर कुछ समय तक हाथ रखते हैं और वह रोग नष्ट हो जाता है. तब सभी लोग इसे आश्चर्य की तरह देखते हैं. वास्तव में यह साधक के शरीर से प्रवाहित होने वाली दिव्य उर्जा के प्रभाव से होता है. रोग का अर्थ है उर्जा के प्रवाह में बाधा उत्पन्न हो जाना. साधक के संपर्क से रोगी की वह रुकी हुई उर्जा पुनः प्रवाहित होने लगती है, और वह स्वस्थ हो जाता है. मंत्र शक्ति व रेकी चिकित्सा पद्धति का भी यही आधार है कि मंत्र एवं भावना व ध्यान द्वारा रोगी की उर्जा के प्रवाह को संतुलित करने की तीव्र भावना करना. आप अपने हाथ की अंजलि बनाकर उल्टा करके अपने या अन्य व्यक्ति के शरीर के किसी भाग पर बिना स्पर्श के थोडा ऊपर रखें. फिर किसी मंत्र का जप करते हुए अपनी अंजलि के नीचे के स्थान पर ध्यान केन्द्रित करें और ऐसी भावना करें कि मंत्र जप से उत्पन्न उर्जा दुसरे व्यक्ति के शरीर में जा रही है. कुछ ही देर में आपको कुछ झन झन या गरमी का अनुभव उस स्थान पर होगा. इसे ही दिव्य उर्जा कहते हैं. यह मंत्र जाग्रति का लक्षण है.
7… अंग फड़कना :- शिव पुराण के अनुसार यदि सात या अधिक दिन तक बांयें अंग लगातार फड़कते रहें तो मृत्यु योग या मारक प्रयोग (अभिचारक प्रयोग) हुआ मानना चाहिए. कोई बड़ी दुर्घटना या बड़ी कठिन समस्या का भी यह सूचक है. इसके लिए पहले कहे गए उपाय करें (देखें विघ्न सूचक स्वप्नों के उपाय). इसके अतिरिक्त काली की उपासना करें. दुर्गा सप्तशती में वर्णित रात्रिसूक्तम व देवी कवच का पाठ करें. मान काली से रक्षार्थ प्रार्थना करें. दांयें अंग फड़कने पर शुभ घटना घटित होती है, साधना में सफलता प्राप्त होती है. यदि बांया व दांया दोनों अंग एक साथ फडकें तो समझना चाहिए कि विपत्ति आयेगी परन्तु ईश्वर की कृपा से बहुत थोड़े से नुक्सान में ही टल जायेगी. एक और संकेत यह भी है कि कोई पूर्वजन्म के पापों के नाश का समय है इसलिए वे पाप के फल प्रकट तो होंगे किन्तु ईश्वर की कृपा से कोई विशेष हानि नहीं कर पायेंगे. इसके अतिरिक्त यह साधक के कल्याण के लिए ईश्वर के द्वारा बनाई गई योजना का भी संकेत है.
8.. गुरु/ईष्ट के परकाय प्रवेश द्वारा साधक को परमात्मबोध की प्राप्ति :- गुरु या ईष्ट देव अपने सूक्ष्म शरीर से साधक के शरीर में प्रवेश करते हैं और उसे प्रबुद्ध करते हैं. प्रारम्भ में साधक को यह महसूस होता है कि आसपास कोई है जो अदृश्य रूप से उसके साथ साथ चलता है. कभी कोई सुगंध, कभी कोई स्पर्श, कभी कोई ध्वनि सुनाई दे सकती है, जिसका पता आसपास के किसी आदमी को नहीं लगेगा, उनका कोई वास्तविक कारण प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देगा. इसके बाद जब यह अभ्यास दृढ हो जाता है तो शरीर का कोई अंग तेजी से अपने आप हिलना, रोकने की कोशिश करने पर भी नहीं रुकना और उस समय एक आनंद बना रहना, इस प्रकार के अनुभव होते हैं. तब साधक यह सोचता है कि यह क्या है? कहीं साधना में कुछ गलत तो नहीं हो रहा. यह किसी दैवीय शक्ति का प्रभाव है या आसुरी शक्ति का? तो इसका उत्तर है कि यदि दांया अंग हिले तो समझना चाहिए कि दैवीय शक्ति का प्रभाव है और यदि बांया अंग हिले तो समझना चाहिए कि आसुरी शक्ति का प्रभाव है और वह शरीर में प्रवेश करना चाहती है. साथ ही यदि एक आनंद बना रहे तो समझें कि दैवीय शक्ति प्रवेश करना चाहती है. किन्तु यदि क्रोध से आँखें लाल हो जाएँ, मन में बेचैनी जैसी हो तो समझना चाहिए कि आसुरी शक्ति है. इस प्रकार जब पहचान हो जाए तो यदि आसुरी शक्ति हो तो उसे बलपूर्वक रोकना चाहिए. इसके लिए भगवान् व गुरु से प्रार्थना करें कि वह इस आसुरी शक्ति से हमारी रक्षा करें व उसे सदा के लिए हमसे दूर हटा दें. यदि दैवीय शक्ति है तो आपको प्रयत्न करने पर शीघ्र ही यह पता लग जाएगा कि वे कौन हैं और आगे आपको क्या करना चाहिए.”….

2….शिष्य किस प्रकार से पूर्णता प्राप्त करें, किस प्रकार से अपने जीवन को श्रेष्ठता दे, और अपने में शिष्यत्व के गुण समाहित कर गुरु के योग्य बनें, सदगुरुदेव के कालजयी अमृत वचन शिष्य का अर्थ हैं, नजदीक जाना “शिष्य” का अर्थ हैं, समीपता, निकटता, नजदीकता – जो साधक जितना ही ज्यादा गुरु के समीप जा सकता हैं, गुरु के हृदय को स्पर्श कर सकता हैं, गुरु के हृदय में स्थापित हो सकता हैं, और पूर्ण समर्पण की भावना से गुरु के साथ एकाकार हो सकता हैं, वही सही अर्थों में शिष्य हैं.

विरागोपनिषद में शिष्य के छः गुण बताये हैं, जिससे शिष्य अपने जीवन में पूर्णता प्राप्त कर सकें, जो व्यक्ति या साधक जितनी ही गहराई के साथ इन गुणों को अपने में समाहित कर सकता हैं, वह उतना ही श्रेष्ठ शिष्य बन सकता हैं.

1. शिष्य का दूसरा अर्थ समर्पण हैं, जो जीतनी ही गहरे के साथ गुरु के प्रति समर्पित हैं, वह उतना ही श्रेष्ठ शिष्य हैं, समर्पण में किसी प्रकार की शर्त नहीं होती, समर्पण में बुद्धि प्रधान न होकर भावना प्रधान होती हैं. जो सभी पूर्वा ग्रहों और अपनी विशेषताओं से मुक्त होकर समर्पण करता हैं, वही सही अर्थों में शिष्य बनने का अधिकारी हो सकता हैं.

2. शिष्य की व्यक्तिगत कोई इच्छा या आकांक्षा नहीं होती, जब वह मुक्त गुरु के सामने होता हैं, तब सरल बालक की तरह ही होता हैं, गुरु के सामने तो शिष्य कच्ची मिटटी के लौन्दे की तरह होता हैं, उस समय उसका स्वयं का कोई आकर नहीं होता, ऐसी स्थिति होने पर ही वह सही अर्थों में शिष्य बनने का अधिकारी हो सकता हैं. इसीलिए शिष्य को चाहिए की वह जब भी गुरु के सामने उपस्थित हो, तब वह सारी उपाधियों और विशेषताओं को परे रखकर उपस्थित हो, ऐसा होने पर ही परस्पर पूर्ण तादात्म्य सम्भव हैं.

3. शिष्य आधारभूत रूप से भावना प्रधान होना चाहिए, तर्क प्रधान नहीं, क्योंकि तर्क ही आगे चलकर कुतर्क का रूप धारण कर लेता हैं, आपने अपने जीवन में अपने से ज्यादा उन्हें महत्त्व दिया हैं, इसीलिए गुरु को भावना से ही प्राप्त किया जा सकता हैं यदि गुरु कोई आगया देता हैं, तो उसमें क्यों और कैसे विशेषण लगते ही नहीं हैं, उनकी आगया जीवन की सर्वोपरिता हैं, और उस आज्ञा का पालन करना ही शिष्य का प्रधान और एक मात्र धर्म हैं, यदि आप में क्यों और कैसे विचार विद्यमान हैं तो आपको चाहिए की आप किसी को गुरु बनावें ही नहीं. और जब एक बार आपने किसी को गुरु बना दिया, तो कम से कम संसार में उसके सामने तो क्यों और कैसे विशेषण आने ही नहीं चाहिए, ऐसा होने पर ही पारस्परिक संयोग – सम्बन्ध और एकाकार होना सम्भव हैं.

4. शिष्य परीक्षक नहीं होता, उसे यह अधिकार नहीं हैं, कि वह गुरु की परीक्षा ले, यह कार्य तो गुरु बनाने से पहले किया जा सकता हैं, आप जिस व्यक्तित्व को गुरु बना रहे हैं, उसके बारे में भली प्रकार से जांच ले, विचार कर ले, उसके व्यक्तित्व को परख लें, और जब आप सभी तरीके से संतुष्ट हो जायें, तभी आप उसे गुरु बनावे, पर एक बार जब उसे गुरु बना दिया, तब फिर परीक्षा लेने की स्थिति नहीं आती, ना अपनी तुलना गुरु से की जा सकती हैं, ना एक गुरु की तुलना दुसरे गुरु से की जा सकती हैं. गुरु की आज्ञा में किसी प्रकार की हिचक या व्यवधान समर्पण की भावना में न्यूनता ही देता हैं.

5. शिष्य का अर्थ निकटता होता हैं, और वह जितना ही गुरु के निकट रहता हैं, उतना ही प्राप्त कर सकता हैं, आप अपने शरीर से गुरु के चरणों में उपस्थित रह सकते हैं. यदि सम्भव हो तो साल में तिन या चार बार स्वयं उनके चरणों में जाकर बैठे, क्योंकि गुरु परिवार का ही एक अंश होता हैं, परिवार का मुखिया होता हैं, अतः समय-समय पर उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करना, उससे कुछ प्राप्त करना, शिष्य का पहला धर्म हैं, यदि आप गुरु के पास जायेंगे ही नहीं, तो उनसे कुछ प्राप्त ही किस प्रकार से कर सकेंगे? गुरु से बराबर सम्बन्ध बनाये रखना और गुरु के साथ अपने को एकाकार कर लेना ही शिष्यता हैं.

6. गुरु आज्ञा ही सर्वोपरि हैं, जब आप शिष्य हैं तो यह आपका धर्म हैं, कि आप गुरु की आज्ञा का पालन करें गुरु की आज्ञा में कोई ना कोई विशेषता अवश्य छिपी रहती हैं. जितनी क्षमता और शक्ति के द्वारा. जितना ही जल्दी सम्भव हो सकें, गुरु की आज्ञा का पालन करना शिष्यता का धर्म हैं.

विरागोपनिषद के अनुसार जो शिष्य इन गुणों को अपने स्वयं के जीवन में आत्मसात करता हैं, वही सही अर्थों में शिष्य बनने का अधिकारी होता हैं, इसलिए आप अपने स्वयं में झांक कर देखे कि मैं जो गुरु से उम्मीदें लगाये बैठा हूँ, क्या उससे पूर्व मैं सही अर्थों में शिष्य हूँ, या नहीं, क्या मैं शिष्य की कसौटी पर खरा हूँ, या कि आप स्वयं ही इस कसौटी पर अधूरे हैं, तो आप कैसे उम्मीद लगा सकते हैं, कि आपकी इच्छाओं की पूर्ति गुरु कर देंगे. गुरु और शिष्य के सम्बन्ध शीशे की तरह नाजुक और साफ़ होते हैं, थोडी सी ठसक लग जाने से जिस प्रकार शीशे पर दरार आ जाती हैं, उसी प्रकार गुरु और शिष्य के बीच संदेह मतिभ्रम होने पर दरार आ जाती हैं, और वह दरार आगे चलकर खाई का रूप धारण कर लेती हैं, इसलिए शिष्य को चाहिए, कि वह निरंतर अपने मन का विश्लेषण करता रहे, निरंतर यह सोचता रहे कि मैं शिष्य कि कसौटी पर खरा हूँ, या नहीं? क्या मैं शाश्त्रों में वर्णित शिष्य के गुणों को अपने आप में समाहित कर लिया हैं या नहीं? क्या मैं सही अर्थों में शिष्य बन सका हूँ या नहीं? ऐसा विश्लेषण करते रहने से उसका हृदय साफ़ होता रहता हैं, और इन सम्बन्धों में दरार नहीं आ पाती हैं. सम्पूर्ण समर्पण तथा अपने को अंहकार रहित बनाये रखना ही आध्यात्मिक शक्ति को प्राप्त करने का प्रथम पद हैं, यह शक्ति साधना गुरु कृपा से ही प्राप्त हो सकती हैं.

3…तान्त्रिक सम्प्रदायों का मार्मिक साम्य तान्त्रिक -संस्कृति में मूलतः साम्य रहने पर भी देश -काल और क्षेत्र
-भेद से उसमें विभिन्न सम्प्रदायों का आविर्भाव हुआ है । इस प्रकार का भेद साधकों के प्रकृति -गत भेद के अनुरोध से स्वभावतः ही होता हैं । भावी पीढी के ऐतिहासिक विद्वान् जब भिन्न तान्त्रिक साम्प्रदायों के इतिहास का संकलन करेंगे और गहराई से उसका विश्लेषण करेंगे तो इस निष्कर्ष पर पहुँच सकेंगे कि यद्यपि भिन्न -भिन्न तान्त्रिक सम्प्रदायों में आपाततः वैषम्य प्रतिभासित हो रहा है किन्तु उनमें निगूढ रुप से मार्मिक साम्य है । संख्या मंष तान्त्रिक सम्प्रदाय कितने आविर्भूत हुए और पश्चात् काल में कितने विलुप्त हुए यह कहना कठिन है । उपास्य -भेद के कारण उपासना -प्रक्रियाओं में भेद तथा आचारादि -भेद होते है , साधारनतया पार्थक्य का यही कारण हैं। १ .शैव , २ . शाक्त , ३ . गाणपत्य ये तो सर्वत्र ही प्रसिद्ध हैं । इन सम्प्रदायों के भी अनेकानेक अवान्तर भेद हैं । शैव तथा शैव -शाक्त -मिश्र सम्प्रदायों में कुछ के निम्नलिखित उल्लेखनीय नाम हैं -सिद्धान्त शैव , वीरशैव , अथवा जंगम शैव , रौद्र , पाशुपत , कापालिक अथवा सोम , वाम , भैरव आदि। अद्वैतदृष्टि से शैवसम्प्रदाय में त्रिक अथवा प्रत्यभिज्ञा , स्पन्द प्रभृति विभाग हैं । अद्वैत -मत में भी शक्ति की प्रधानता मानने पर स्पन्द , महार्थ , क्रम इत्यादि भेद अनुभूत होते हैं । दश शिवागम और अष्टादश रुद्रागम तो सर्वप्रसिद्ध ही हैं । इनमें भी परस्पर किंचित् किंचित् भेद नहीं है यह नहीं कहा जा सकता । द्वैत -मत में कोई कट्टर द्वैत , कोई द्वैतद्वैत और कोई शुद्धाद्वैतवादी है । इनमें किसी सम्प्रदाय को भेदवादी , किसी को शिव -साम्यवादी और किसी को शिखा -संक्रान्तिवादी कहते हैं । काश्मीर का त्रिक या शिवद्वैतवाद अद्वैतस्वरुप से आविष्ट से आविष्ट है । शाक्तों में उत्तरकौल प्रभृति भी ऐसे ही हैं । किसी समय भारतवर्ष में पाशुपत संस्कृति का व्यापक विस्तार हुआ था । न्यानवर्तिककार उद्योतकर संभवतः पाशुपत रहे और न्यायभूषणकार भासर्वज्ञ तो पाशुपत थे ही । इनकी बनाई गण -कारिका आकार में यद्यपि छोटी है किन्तु पाशुपतदर्शन के विशिष्ट ग्रन्थों में इसकी गणना है । लकुलीश पाशुपत की भी बात सुनने में आती है । यह पाशुपतदर्शन पञ्चार्थवाद -दर्शन तथा पञ्चार्थलाकुलाम्नाय नाम से विख्यात था । प्राचीन पाशुपत सूत्रों पर राशीकर का भाष्य था , वर्तमान समय में दक्षिण से इस पर कौण्डिन्य -भाष्य का प्रकाशन हुआ है । लाकुल -मत वास्तव में अत्युन्त प्राचीन है , सुप्रभेद और स्वयम्भू आगमों में लाकुलागमों का उल्लेख दिखाई देता है । महाव्रत -सम्प्रदाय कापालिक -सम्प्रदाय का ही नामान्तर प्रतीत होता है । यामुन मुनि के आगम प्रामाण्य , शिवपुराण तथा आगमपुराण में विभिन्न तान्त्रिक सम्प्रदायों के भेद दिखाय गये हैं । वाचस्पति मिश्र ने चार माहेश्वर सम्प्रदायों के नाम लिये हैं । यह प्रतीत होता है कि श्रीहर्ष ने नैषध (१० ,८८ ) में समसिद्धान्त नाम से जिसका उल्लिखित है , वह कापालिक सम्प्रदाय ही है । कपालिक नाम के उदय का कारण नर -कपाल धारण करना बताय जाता है । वस्तुतः यह भी बहिरंग मत ही है । इसका अन्तरंग रहस्य प्रबोध -चन्द्रोदय की प्रकाश नाम की टीका में प्रकट किया गया है । तदनुसार इस सम्प्रदाय के साधक कपालस्थ अर्थात् ब्रह्मारन्ध्र उपलक्षित नरकपालस्थ अमृत या चान्द्रीपान करते थे । इस प्रकार के नामकरण का यही रहस्य है । इन लोगों की धारणा के अनुसार यह अमृतपान है , इसी से लोग महाव्रत की समाप्ति करते थे , यही व्रतपारणा थी । बौद्ध आचार्य हरिवर्मा और असंग के समय में भी कापालिकों के सम्प्रदाय विद्यमान थे । सरबरतन्त्र में १२ कापालिक गुरुओं और उनके १२ शिष्यों के नाम सहित वर्णन मिलते हैं । गुरुओं के नाम हैं — आदिनाथ , अनादि , काल , अमिताभ , कराल , विकराल आदि । शिष्यों के नाम हैं –नागार्जुन , जडभरत , हरिश्चन्द्र , चर्पट आदि। ये सब शिष्य तन्त्र के प्रवर्तक रहे हैं । पुराणादि में कापालिक मत के प्रवर्तक धनद या कुबेर का उल्लेख है । कालामुख तथा भट्ट नाम से भी सम्प्रदाय मिलते हैं , किन्तु इनका विशेष विवरण उपलब्ध नहीं है । प्राचीन काल में शाक्तों में भी समयाचार और कौलाचार का भेद विद्यमान था । कुछ लोग समझते हैं कि समयाचार वैदिक मार्ग का सहवर्ती था और गौडपाद , शंकर प्रभृति समयाचार के ही उपासक थे । कौलाचारसंप्रद्राय में कौलों के भीतर भी पूर्व कौल और उत्तर कौल का भेद विद्यमान था । पूर्व कौल मत शिव एवं शक्ति , आनन्द -भैरव और आनन्द -भैरवी से परिचित है । इस मत में दोनों के मध्य शेष -शेषिभाव माना जाता था , किन्तु उत्तर कौल के अनुसार शेष -शेषिभाव नहीं हैं । इस मत में सदा शक्ति का ही प्राधान्य स्वीकृत है , शक्ति कभी शेष होती है , शिव तत्त्व रुप में परिणत हो जाते हैम और शक्ति तत्त्वातीत ही रहती है । रुद्रयामल के उत्तरतन्त्र ’ होने का यही रहस्य हैं – पूर्व कौल शिव और शक्ति के मध्य शेष -शेषिभाव मानते हैं । अतः पूर्व कौल के मत में शेष -शेषिभाव पूर्वतन्त्र का परिचायक होना चाहिए । जब शक्ति कार्यात्मक समग्र प्रपञ्च को अपने में आरोपित करती है तो उसका नाम होता है – कारण , और उसका पारिभाषिक नाम आधार कुण्डलिनी है । कुण्डलिनी के जागरण से शक्ति शेष नहीं रहती । तत्त्व रुप में सदाशिव परिणत हो जाते हैं और शक्ति तत्त्वातीत ही रहती है । यही उत्तरतन्त्र का उत्तरत्व है । कौल मत की आलोचना प्राचीन समय से ही कौल -मत की आलोचना हो रही है । कौल मत में ही मानवीय चरम उत्कर्ष की अवधि स्वीकृत होती है । इन लोगों का कहना है कि तपस्या , मन्त्र -साधना प्रभृति से चित्तशुद्धि होने पर ही कौल -ज्ञान धारण करने की मनुष्य में योग्यता आता है । योगिनीह्रदय की सेतुबन्धटीका (पृ०२५ ) में कहा है — पुराकृततपोदानयज्ञतीर्थजपव्रतैः । शुद्धचित्तस्य शान्तस्य धर्मिणो गुरुसेविनः ॥ अतिगुप्तस्य भक्तस्य कौलज्ञानं प्रकाशते । विज्ञान -भैरव की टीका में क्षेमराज ने कहा है — वेदादिभ्यः परं शैवं शैवात् वामं तु दक्षिणम् । दक्षिणात् परतः कौलं कौलात् परतरं नहि ॥ किन्तु शुभागमपञ्चक के अन्तर्गत सनत्कुमारसंहिता में कौल -ज्ञान की निन्दा की गयी है । १ . कौलक , २ . क्षपणक , ३ . दिगम्बर , ४ . वामक आदि के सम्प्रदाय बराबर माने गये हैं । शक्तिसंगमतन्त्र के विभिन्न खण्डों में विभिन्न तान्त्रिक सम्प्रदायों के यत्किञ्चित् विवरण मिलते हैं । बौद्ध तथा तन्त्रों के विषय में भी बहुत कुछ कहना था , किन्तु यहाँ संभव नहीं होगा और रुद्रयामल के प्रसंग में असंगत भी है । यद्यपि बुद्ध की चर्चा रुद्रयामल के १७ वें अध्याय में आयी है ।

4….गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु र्गुरूदेवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
व्यास जयन्ती ही गुरुपूर्णिमा है। गुरु को गोविंद से भी ऊंचा कहा गया है। गुरुपरंपरा कोग्रहण लगाया तो सद्गुरु का लेबिल लगाकर धर्मभीरुता की आड़ में धंधा चलाने वाले
‘‘कालिनेमियों ने।
शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाकासे निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जानेवाले को ‘गुरु’ कहा जाता है।
गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। ‘व्यास’ का शाब्दिक संपादक, वेदों का व्यास यानी विभाजन भी संपादन की श्रेणी में आता है।
कथावाचक शब्द भी व्यास का पर्याय है। कथावाचन भी देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप पौराणिक कथाओं का विश्लेषण भी संपादन है। भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, 18पुराणों और उपपुराणों की रचना की। ऋषियों के बिखरे अनुभवों को समाजभोग्य बना कर व्यवस्थित किया।
पंचम वेद ‘महाभारत’ की रचना इसी पूर्णिमा के दिन पूर्ण की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ ब्रह्मसूत्र का लेखन इसी दिन आरंभ किया। तब देवताओं ने वेदव्यासजी का पूजन किया। तभी से व्यासपूर्णिमा मनायी जा रही है।
‘‘तमसो मा ज्योतिगर्मय’’ अंधकार की बजाय प्रकाश की ओर ले जाना ही गुरुत्व है। आगम-निगम-पुराण का निरंतर संपादन ही व्यास रूपी सद्गुरु शिष्य को परमपिता परमात्मा से साक्षात्कार का माध्यम है। जिससे मिलती है सारूप्य मुक्ति। तभी कहा गया- ‘‘सा विद्या या विमुक्तये।’’
आज विश्वस्तर पर जितनी भी समस्याएं दिखाई दे रही हैं, उनका मूल कारण है गुरु-शिष्य परंपरा का टूटना। श्रद्धावाॅल्लभते ज्ञानम्। आज गुरु-शिष्य में भक्ति का अभाव गुरु का धर्म ‘‘शिष्य को लूटना, येन केन प्रकारेण धनार्जन है’’ क्योंकि धर्मभीरुता का लाभ उठाते हुए धनतृष्णा कालनेमि गुरुओं को गुरुता से पतित करता है।
यही कारण है कि विद्या का लक्ष्य ‘मोक्ष’ न होकर धनार्जन है। ऐसे में श्रद्धा का अभाव स्वाभाविक है। अन्ततः अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार, भ्रष्टाचारादि कदाचार बढ़ा। व्यासत्व यानी गुरुत्व अर्थात् संपादकत्व का उत्थान परमावश्यक है।

5….श्रेष्ठ तांत्रिक गुरु के लक्षण :-
श्रेष्ठ तांत्रिक गुरु को अपने गुरु का एक अच्छा शिष्य होना चाहिये. अपने गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण होना चाहिये.
श्रेष्ठ तांत्रिक गुरु को साधक होना चाहिये. उसे निरंतर साधना करते रहना चाहिये.
श्रेष्ठ तांत्रिक गुरु को कम से कम एक महाविद्या सिद्ध होनी चाहिये.
श्रेष्ठ तांत्रिक गुरु को वाक सिद्धि होनी चाहिये अर्थात उसे आशिर्वाद और श्राप दोनों देने में सक्षम होना चाहिये.
श्रेष्ठ तांत्रिक गुरु को पूजन करना और कराना आना चाहिये.
श्रेष्ठ तांत्रिक गुरु को योग और मुद्राओं का ज्ञान होना चाहिये.
श्रेष्ठ तांत्रिक गुरु को रस सिद्धि होनी चाहिये, अर्थात पारद के संस्कारों का ज्ञान होना चाहिये.
श्रेष्ठ तांत्रिक गुरु को मन्त्र निर्माण की कला आती है. वह आवश्यकतानुसार मंत्रों का निर्माण कर सकता है और पुराने मंत्रों मे आवश्यकतानुसार संशोधन करने में समर्थ होता है..

“गुरु महिमा”.
“गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।गुरू साक्षात् परंब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नमः॥”
गुरू वंदना के लिए बहुत ही प्रसिद्ध यह स्तुति शिष्य के लिए बड़ा प्यारा है तथा इस वंदना का अपने समझ से मैने अर्थ एवं विवेचना किया है,जो मेरे जीवन में अनूभुत है।
-:गुरु स्तुति:-
“अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरूवे नमः॥
अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।चक्षुरून्मीलितं येन तस्मै श्री गुरूवे नमः॥
गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।गुरू साक्षात परंब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नमः॥
स्थावरं जंगमं व्याप्तं यत्किञ्चित् सचराचरम् ।तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरूवे नमः॥
चिन्मयं व्यापितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥
सर्वश्रुति शिरोरत्न विराजित पदाम्बुजः।वेदान्ताम्बुज सूर्याय तस्मै श्री गुरवे नमः॥
चैतन्य शाश्वतं शान्तं व्योमातीतं निञ्जनः।बिन्दु नाद कलातीतःतस्मै श्री गुरवे नमः॥
ज्ञानशक्ति समारूढःतत्त्व माला विभूषितम्।भुक्ति मुक्ति प्रदाता च तस्मै श्री गुरवे नमः॥
अनेक जन्म सम्प्राप्त कर्म बन्ध विदाहिने।आत्मज्ञान प्रदानेन तस्मै श्री गुरवे नमः॥
शोषणं भव सिन्धोश्च ज्ञापनं सार संपदः।गुरोर्पादोदकं सम्यक् तस्मै श्री गुरवे नमः॥
न गुरोरधिकं त्तत्वं न गुरोरधिकं तपः।तत्त्व ज्ञानात् परं नास्ति तस्मै श्री गुरवे नमः॥
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोर्पदम् ।मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोर्कृपा॥
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं।द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्षयम्॥
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं।भावातीतं त्रिगुणरहितं सद् गुरूं तन्नमामि॥
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥
ध्यानं सत्यं पूजा सत्यं सत्यं देवो निरञ्जनम्।गुरिर्वाक्यं सदा सत्यं सत्यं देव उमापतिः॥”
-:अर्थ और विवेचना:-
इस गुरू वंदना में गुरू के स्वरूप,शक्ति,सृजन और महत्व का सूक्ष्म रहस्य छिपा हैं।गुरू,ब्रह्मा है,गुरू विष्णु है,गुरूदेव महेश्वर है।गुरू साक्षात परम ब्रह्म है,उनको नमस्कार है।गुरू ब्रह्मा क्यों है?कारण कई जन्मों के बुरे संस्कारों से हमारे अन्दर बहुत सा विकार पैदा हो गया है।हम दैविक मार्ग पर चलेंगे,क्या उसके लिए हमारा शरीर,मन,बुद्धि तैयार है या नहीं।हम उस रास्ते चलेंगे जो सुनने में आसान लगता है लेकिन जब उस पर चलेंगे तो ऐसा प्रतीत होगा कि बहुत ही कठिन एवं दुर्गम रास्ता है।इस कारण से गुरू को भी ब्रह्मा के जैसे ही हमारे अंदर के विकार और गन्दगी को हटाकर बुद्धि को शुद्ध कर हमारे बिगड़े संस्कार को ठीक करना पड़ता है।यानि साधना,संयम,योग,जप द्वारा गुरू हमे चलने लायक बना देते है।गुरू विष्णु के जैसे हमारा पालन करेंगे वरना हम भौतिक कष्ट से मर्माहत होकर साधना क्या कर पायेंगे।कोइ भी साधक या संत हो भले ही वो त्यागी हो फिर भी जरूरत की चीज मिल जाये और किसी के सामने शर्म से सिर झुकाकर भिक्षा या दान न मांगना पड़े।इसके लिए गुरू बिष्णु जैसा बनकर साधना,मंत्र,तंत्र द्वारा या वर,आशिर्वाद देकर उस लायक बना देते है कि सब कुछ स्वतः प्राप्त होता रहे।गुरू विष्णु के समान है जब चाहे भक्त,साधक को पुष्ट बना दें ताकि उसे साधना मार्ग में कभी भी भौतिक विघ्न न सताये।गुरू महेश्वर यानि शिव है जिनके पास सारी शक्तियां विद्यमान है परन्तु दाता होते हुए भी कोई दिखावा नहीं है।वो सबका मालिक है।गुरू का यह रूप सदाशिव सदगुरू बनकर साधक और भक्त को दिव्य शक्ति प्रदान करवाते है।यहाँ जो भी करते हैं,गुरू ही करते है।कारण कैसी साधना,कौन सा मंत्र या क्या करना है यह गुरू कृपा से ही प्रदान होती है।ये अपने शिष्य को जगत के सारे रहस्य से परिचित कराके स्वयं और शक्ति की लीला का साक्षात्कार कराने के साथ ही आत्म दर्शन द्वारा साकार परमात्मा के परम ब्रह्म का ज्ञान कराते है।साकार,निराकार सब कुछ समझ में आ जाता हैं .

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