Kali Yantra Arty

वास्तव में तंत्र क्या है
जिसे आम लोग तंत्र के नाम से जानते हैं वह है जादू-टोना, जिसका कोई दार्शनिक और वैज्ञानिक आधार नहीं है और जिसकी बुनियाद में सदियों से चले आते अंधविश्वास हैं.
जबकि तंत्र वास्तव में अंधविश्वास को तोड़ता है. तंत्र निराकार, सर्वव्यापी परब्रह्म को जानने का क्रांतिकारी और वैज्ञानिक तरीक़ा है.
तंत्र के प्रणेताओं में प्रमुख हैं : दत्तात्रेय,परशुराम , नारद, पिप्पलादि , वसिष्ठ, सनक, शुक, सनन्दन तथा सनतकुमार .इसी से समझा जा सकता है कि इसे प्राचीन काल के वरेण्य बुद्धिजीवियों ने कितने शोध के बाद आम आदमी के लिये प्रतिपादित किया होगा.
तंत्र के अनुसार ब्रह्मांड की रचना माँ काली ने की. हमारे शरीर के अंदर लघु ब्रह्मांड है, जिसमे काली के दस रूप मूलाधार में विराजमान हैं. तांत्रिक मंत्र मूलतः नाद -स्वर हैं, जो ब्रह्मांड में भी मौज़ूद हैं. जब हम किसी महाविद्या का मंत्र जाप करते हैं तो ब्रह्मांड में मौज़ूद उस नाद से जुड़ जाते हैं. इसलिये कोई भी दूसरा व्यक्ति आपके लिए मंत्र पाठ कर ही नहीं सकता. उसका फल आपको कदापि नहीं मिल सकता.
जहाँ तक बलि का सवाल है, जिस जीव की आप बलि ले रहे हैं उसका सृजन भी तो माँ काली ने ही किया है, तो आपको लाभ और उसे मृत्यु को वह कैसे और क्यों पसंद करेंगी ? स्पष्ट है कि यह सब कृत्रिम रूप से आरोपित प्रक्रियाएँ हैं जो कुछ शताब्दियों से तंत्र के नाम पर जोड़ दी गयी हैं.
शाक्त मत के दो संप्रदाय हैं-समयाचार या दक्षिणाचार, और वामाचार..हृदय में चक्र भावना के साथ पाँच प्रकार के साम्य धारण करने वाले शिव ही समय कहलाते हैं. शिव और शक्ति का सामरस्य है. समयाचार साधना में मूलाधार से सुप्त कुण्डलिनी को जगा कर अंत में सहस्रार में सदा शिव के साथ ऐक्य कराना ही साधक का मुख्य लक्ष्य होता है. कुल का अर्थ है कुण्डलिनी तथा अकुल का अर्थ है शिव. दोनों का सामरस्य कराने वाला कौल है.
कौल मार्ग के साधक मद्य, माँस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन नामक पंच मकारों का सेवन करते हैं. ब्रह्मरंध्र से स्रवित मधु मदिरा है, वासना रूपी पशु का वध माँस है, इडा-पिगला के बीच प्रवाहित श्वास-प्रश्वास मत्स्य है. प्राणायाम की प्रक्रिया से इनका प्रवाह मुद्रा है तथा सहस्रार में मौज़ूद शिव से शक्ति रूप कुण्डलिनी का मिलन मैथुन है
बाद में कुछ ऐसे लोग भी तांत्रिक साधना में घुस आये जिन्होने मकारों का भौतिक अर्थ इस्तेमाल करना शुरू किया,जो वामाचार के पतन और बदनामी का कारण बना.

दश महाविद्याओं की स्तुति
माँ काली
शव पर सवार
शमशान वासिनी भयंकरा
विकराल दन्तावली,त्रिनेत्रा
हाथ में लिये खडग
और कटा सिर
दिगम्बरा
अट्टहास करती माँ काली
जय माँ काली
मुक्तकेशी लपलपाती जिहवा वाली
दे रही अभय वरदान हमेशा
चार बाहों वाली
जय माँ काली
आओ करें हम ध्यान उनका
सृजन करनेवाली
सब कुछ देनेवाली
माँ काली
जय माँ काली
माँ तारा
शव के हृदय पर
बायें पैर को आगे
दायें पैर को पीछे
वीरासन मुद्रा में
करती भयानक अट्टहास
भव सागर पार करानेवाली
माँ तारा
जय जय माँ तारा
स्वयं भयंकरी, चतुर्भुजी, त्रिनयना
हाथों में कटार, कपाल, कमल और तलवार
उच्च महाशक्ति, महाविद्या
हुंकार बीज उत्पकन्न कुबेर स्वरूपा
विशाल स्वरूपा ,नील शरीरा
सर्प जटा, बाघम्बरा
भाल पर चंद्रमा
दुश्मनों को दंडित करने वाली
साधक को सब कुछ देने वाली
करते हेँ हम उन्हें प्रणाम
निशि दिन लें तारा का नाम
माँ षोडशी
पंचप्रेत महाशव सिंहासन
उस पर खिले कमल दल
लाल रंग की दीप्तिमान
चतुरहस्ता त्रिलोचना
मस्तक पर राजे चंद्रमा
रत्न आभूषण धारिणी
बाला, त्रिपुरसुन्दरी, ललिता
माँ षोडशी
हाथों से देती अभय मुद्रा, वर मुद्रा
धारण किये पुस्तक और अक्षमाला
पाश, अंकुश, वाण ,धनुष
धारण करनेवाली माँ ललिता
योग-भोग एक साथ दिलानेवाली
कामेश्वरी, वज्रेशवरी, भग़ मालिनी, ललिताम्बिका
माँ षोडशी
बरबस आकर्षित करनेवाली
हर काम को पूरा करनेवाली
सदा नमन करते हैं उनका
सर्व उपास्या, तुरीया,
माँ षोडशी
माँ भुवनेश्वरी
जगत जननी, मुस्कराती
जपा कुसुमवत रक्त वर्णा
चतुर्भुजा, त्रिनेत्रा
अभय और वर देने वाली
माँ भुवनेश्वरी !
माँ! जग में भरा घोर अंधेरा
हमें चाहिये अभय दान
माँ आप हैं त्रिभुवन की स्रष्टा
आप ही हैं सौभाग्यकारिणी
मान बचा दें आप हमारा
पूरी कर दें सभी कामना
हम करते आपकी वंदना
भूल हमारी कर दें माफ़
जग परिपालक
भुवनेश्वरी माँ !!
माँ छिन्नमस्ता
दिगम्बरा, द्विभुजा, पहने मुण्डमाला
बायें हाथ में लिये कटा सिर अपना
दायें हाथ में लिये कटार
माँ तेरी हो जय जयकार
कटा सिर अध्यात्म है
सिर कटा शरीर व्यवहार है
माँ निज शरीर की रक्त धारा
कटे सिर को पिला रही हैं
अपनी दो सहेलियों
डाकिनी और वर्णनी को
भी पिलाती रक्त अपना
माँ खडी हैं प्रत्यालीढ़ महासन पर
काम और रति के ऊपर
यह विरक्त भाव है
व्यवहार मिले अध्यात्म से
मां मन पर विजय दिलाती हैं
कुण्डलिनी को जगाती हैं
दिव्यानंद दिलाती हैं
साधक को योगी बनाती हैं
माँ भैरवी
सह्स्र सूर्य-सी दीप्तिमान
लाल वस्त्र पहने
रक्त रंजित ओष्ठ लाल
ग्रीवा में डाले मुण्डमाल
चतुर्भुजा माँ भैरवी
दो हाथों में पुस्तक-माला
दो हाथों से देती
वरदान
और विश्वास
कमल सरीखे तीन नयन हैं माँ के
सिर पर रत्न मुकुट और अर्ध चंद्र
शत्रु संहारिणी
शव सिंहासिनी
माँ भैरवी !
शत्रुओं से घिरे हम
न दीखता कोई रास्ता है
पाएँ कैसे हम छुटकारा
माँ आप ही कर दो ऐसी युक्ति
जिससे हमें मिल जाये मुक्ति
कोई नहीं हमारा है
माँ आप ही का सहारा है
दुख हर लो मेरा
त्राता, दाता
करो कृपा
माँ भैरवी !!
माँ धूमावती
धूसर रंग शरीर, महाचंचला ,दीर्घा
मलिन वस्त्र धारण किये
बाल खुले, हाथ में सूप लिये
भूखी, रूखी माँ धूमावती
रोग, शोक, दुख हरनेवाली
शत्रु के लिए प्रलयॅंकारी
तीन रूप दिन में धरती
सुबह सुन्दरी कुमारी
दोपहर में विकसित प्रौढा
शाम में बन जाती वृद्धा
तेरा रथ सारथी बिना
तेरे ध्वज पर कौआ बैठा
संकट हारिणी शत्रु संहारिणी
सर्व दुख हरणी माँ धूमावती
माँ बगलामुखी
रत्न जड़े मणि मंडप के नीचे
पीले सिंहासन पर विराजमान
पीली माला, पीताभरण, पीत परिधान
निशिदिन करूँ आपका ध्यान
बाँये हाथ से बैरी की जिह्वा पकड़े
दायें हाथ में मुदगर गदा लिये
तिमिर मिटा कर, ज्ञान बढ़ा कर
आप करें मुझ पर उपकार
बगलामुखी माँ
त्रिविध ताप मिटानेवाली
शत्रु-गति को रोकनेवाली
उसकी वाणी हरनेवाली
नित्य रूपा, मंत्र रूपा, सुनेत्रा ,
जगन्माता, चंडिका, पीताम्बरा
बगलामुखी माँ!!
माँ मातंगी
श्यामवर्णा, त्रिनयना
मस्तक पर चंद्रमा
चतुर्भुजा, दिव्यास्त्र लिये
रत्नाभूषण धारिणी
गजगामिनी ,महाचांडालनी
माँ मातंगी !
सर्व लोक वशकारिणी, महापिशाचिनी
कला, विद्या, ज्ञान प्रदायिनी
मतन्ग कन्या माँ मातंगी
हम साधक शुक जैसे हैं
ज्ञान दिला दो हमको माँ
हम करते तेरा ध्यान निरंतर
आपका हे माँ मातंगी!!
माँ कमला
कमल पुष्प पर बैठी
शांत और विहँसती
कनक कांति, ऐश्वर्य स्वरूपा
पद्मा, पद्मालया,
माँ कमला
चार भुजाएँ जिनमें
वर मुद्रा, कमल युगल, अभय मुद्रा
साधक को दें समस्त संपदा
माँ कमला!
हमअकिंचन
कैसे जियें सुख शांति से
हम आये आपकी शरण में
हम पर भी कर दो कृपा
माँ कमला!!
सवरुहांमहाभिमागोरदंष्ट्रम हसंमुखिम
चतुर्भुजमखडगमुंडावरभयाकरम शिवम
मुण्डमलाधरमदेवी लोलाजिहवांदिगंबरम
एवं संचिंताएटकलीम शमसनालयवसिनीं”
“क्रीम क्रीम क्रीम हृीं हृीं हूँ हूँ दक्षिने कालिके
क्रीम क्रीम क्रीम हृीं हृीं हूँ हूँ स्वाहा”
दस महाविद्या…
महाविद्या अर्थात महान विद्या [ज्ञान] रूपी देवी…
त्रिगुणात्मक शक्ति रूपी नवदुर्गा की एक और विशेषता है, जोकि उनके आध्यात्मिक स्वरूप में दस महाविद्याओं के रूप में विराजमान है…
* ब्रह्माजी पुत्र दत्तात्रेय ने तंत्र शास्त्र के निगमागम ग्रंथों की रचना करते हुए महिषासुर मर्दिनी और सिद्धिदात्री देवी भगवती के अंदर समाहित उन दस महाविद्याओं का जिक्र किया है, जिनकी साधना से ऋषि मुनि और विद्वान इस संसार में चमत्कारी शक्तियों से युक्त होते हैं।
* मार्कण्डेय पुराण में दस महाविद्याओं का और उनके मंत्रों का तथा यंत्रो का जो जिक्र है उसे संक्षेप में यहां प्रस्तुत किया जा रहा है…
काली तारा महाविद्या षोडषी भुवनेश्वरी,भैरवी छिन्नमस्ता च विद्या धूमावती तथा |बगला सिद्धविद्या च मातंगी कमलात्मिका ,एता दशमहाविद्याःसिद्विद्याः प्रकीर्तिताः||
दस महाविद्याओं के नाम हैं : महाकाली , तारा , त्रिपुर सुंदरी , भुवनेश्वरी , छिन्नमस्ता , षोडषी , धूमावती , बगलामुखी , मातंगी , और कमला। जैसे कि कहा गया है :

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता |नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ||

देवी दुर्गा के आभामंडल में उपरोक्त दस महाविद्याएं दस प्रकार की शक्तियों के प्रतीक हैं। सृष्टि के क्रम में चारों युग में यह दस महाविद्याएं विराजमान रहती हैं। इनकी साधना कल्प वृक्ष के समान शीघ्र फलदायक और साधक की सभी कामनाओं को पूर्ण करने में सहायक होती हैं। नवरात्र में सिद्धि और तंत्र शास्त्र के मर्मज्ञ इनकी साधना करने के लिए हिमालय से लेकर पूर्वांचल बंगाल आदि प्रान्तों में अपने तप बल से साधनारत होकर इनके स्वरूप का मंत्र जाप करते हैं।
दस महाविद्याओं का वर्णन इस प्रकार से है :
1) महाकाली : महाविनाशक महाकाली, जहां रक्तबीज का वध करती हैं, वहां अपने साधकों को अपार शक्ति देकर मां भगवती की कृपा से सबल और सक्षम बनाती हैं। यह कज्जल पर्वत के समान शव पर आरूढ़ मुंडमाला धारण किए हुए एक हाथ में खड्ग दूसरे हाथ में त्रिशूल और तीसरे हाथ में कटे हुए सिर को लेकर भक्तों के समक्ष प्रकट हो जाती हैं। यह महाकाली एक प्रबल शत्रुहन्ता महिषासुर मर्दिनी और रक्तबीज का वध करने वाली शिव प्रिया चामुंडा का साक्षात स्वरूप है, जिसने देव दानव युद्ध में देवताओं को विजय दिलवाई है।

2) तारा : शत्रुओं का नाश करने वाली सौन्दर्य और रूप ऐश्वर्य की देवी तारा
आर्थिक उन्नति और भोग दान और मोक्ष की प्राप्ति के लिए जानी जाती हैं। भगवती तारा के तीन स्वरूप हैं। तारा , एकजटा और नील सरस्वती। चैत्र मास की नवमी तिथि और शुक्ल पक्ष के दिन तारा रूपी देवी की साधना करना तंत्र साधकों के लिए सर्वसिद्धिकारक माना गया है। तारा महाविद्या के फलस्वरूप व्यक्ति इस संसार में व्यापार रोजगार और ज्ञान-विज्ञान से परिपूर्ण विख्यात यश वाला प्राणी बन सकता है।

3) त्रिपुर सुन्दरी : शांत और उग्र दोनों की स्वरूपों में मां त्रिपुर सुन्दरी की साधना की जाती है। त्रिपुर सुन्दरी के अनेक रूप हैं। मसलन , सिद्धि भैरवी , रूद्र भैरवी , कामेश्वरी आदि। जीवन में काम, सौभाग्य और शारीरिक सुख के साथ वशीकरण आरोग्य सिद्धि के लिए इस देवी की आराधना की जाती है। कमल पुष्पों से होम करने से धन सम्पदा की प्राप्ति होती है। मनोवांछित वर या कन्या से विवाह होता है। वांछित सिद्धि और मनोअभिलाषापूर्ति सहित व्यक्ति दुख से रहित और सर्वत्र पूज्य होता है।

4) भुवनेश्वरी : आदि शक्ति भुवनेश्वरी भगवान शिव की समस्त लीला विलास की सहचरी हैं। मां का स्वरूप सौम्य एवं अंग कांति अरूण हैं। भक्तों को अभय एवं सिद्धियां प्रदान करना इनका स्वभाविक गुण है। इस महाविद्या की आराधना से जहां साधक के अंदर सूर्य के समान तेज और ऊर्जा प्रकट होने लगती है, वहां वह संसार का सम्राट भी बन सकता है। इसको अभिमंत्रित करने से लक्ष्मी वर्षा होती है और संसार के सभी शक्ति स्वरूप महाबली उसका चरणस्पर्श करते हैं।

5) छिन्नमस्ता : विश्व की वृद्धि और उसका ह्रास सदैव होता रहता है। जब निर्गम अधिक और आगम कम होता है , तब छिन्नमस्ता का प्राधान्य होता है। माता का स्वरूप अतयंत गोपनीय है। चतुर्थ संध्याकाल में मां छिन्नमस्ता की उपासना से साधक को सरस्वती सिद्ध हो जाती है। कृष्ण और रक्त गुणों की देवियां इनकी सहचरी हैं। पलास और बेलपत्रों से छिन्नमस्ता महाविद्या की सिद्धि की जाती है। इससे प्राप्त सिद्धियां मिलने से लेखन और कवित्व शक्ति की वृद्धि होती है । शरीर रोग मुक्त होता है। शत्रु परास्त होते हैं। योग ध्यान और शास्त्रार्थ में साधक को संसार में ख्याति मिलती है।

6) षोडशी : सोलह अक्षरों के मंत्र वाली माता की अंग कांति उदीयमान सूर्य मंडल की आभा की भांति है। इनकी चार भुजाएं और तीन नेत्र हैं। षोडशी को श्री विद्या भी माना जाता है। यह साधक को युक्ति और मुक्ति दोनों ही प्रदान करती है। इसकी साधना से षोडश कला निपुण सन्तान की प्राप्ति होती है। जल, थल और नभ में उसका वर्चस्व कायम होता है। आजीविका और व्यापार में इतनी वृद्धि होती है कि व्यक्ति संसार भर में धन श्रेष्ठ यानि सर्वाधिक धनी बनकर सुख भोग करता है।

7) धूमावती : मां धूमावती महाशक्ति स्वयं नियंत्रिका हैं। इनका स्वामी नहीं है। ऋग्वेद में रात्रिसूक्त में इन्हें ‘ सुतरा ‘ कहा गया है। अर्थात ये सुखपूर्वक तारने योग्य हैं। इन्हें अभाव और संकट को दूर करने वाली मां कहा गया है। इस महाविद्या की सिद्धि के लिए तिल मिश्रित घी से होम किया जाता है। धूमावती महा विद्या के लिए यह भी जरूरी है कि व्यक्ति सात्विक और नियम संयम और सत्यनिष्ठा को पालन करने वाला लोभ लालच से रहित हो इस महाविद्या के फल से देवी धूमावती सूकरी के रूप में प्रत्यक्ष प्रकट होकर साधक के सभी रोग अरिष्ट और शत्रुओं का नाश कर देती है। प्रबल महाप्रतापी तथा सिद्ध पुरूष के रूप में उस साधक की ख्याति हो जाती है।

8) बगलामुखी : व्यक्ति रूप में शत्रुओं को नष्ट करने वाली समष्टि रूप में परमात्मा की संहार शक्ति ही बगला है। इनकी साधना शत्रु भय से मुक्ति और वाक् सिद्धि के लिए की जाती है। पीतांबरा माला पर विधि – विधान के साथ जाप करें – दस महावद्याओं में बगला मुखी सबसे अधिक प्रयोग में लाई जाने वाली महाविद्या है, जिसकी साधना सप्तऋषियों ने वैदिक काल में समय समय पर की है। इसकी साधना से जहां घोर शत्रु अपने ही विनाश बुद्धि से पराजित हो जाते हैं वहां साधक का जीवन निष्कंटक तथा लोकप्रिय बन जाता है।

9) मातंगी : मतंग शिव का नाम है। इनकी शक्ति मातंगी है । यह श्याम वर्ण और चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करती हैं। यह पूर्णतया वाग्देवी की ही पूर्ति हैं। चार भुजाएं चार वेद हैं। मां मातंगी वैदिकों की सरस्वती हैं। पलास और मल्लिका पुष्पों से युक्त बेलपत्रों की पूजा करने से व्यक्ति के अंदर आकर्षण और स्तम्भन शक्ति का विकास होता है। ऐसा व्यक्ति जो मातंगी महाविद्या की सिद्धि प्राप्त करेगा, वह अपने क्रीड़ा कौशल से या कला संगीत से दुनिया को अपने वश में कर लेता है। वशीकरण में भी यह महाविद्या कारगर होती है।

10) कमला : कमला की कांति सुवर्ण के समान है। श्वेत वर्ण के चार हाथी सूंड में सुवर्ण कलश लेकर मां को स्नान करा रहे हैं। कमल पर आसीन कमल पुष्प धारण किए हुए मां सुशोभित होती हैं। समृद्धि की प्रतीक , स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति , नारी , पुत्रादि के लिए इनकी साधना की जाती है ।
इस प्रकार दस महामाताएं गति , विस्तर , भरण – पोषण , जन्म – मरण , बंधन और मोक्ष की प्रतीक हैं। इस महाविद्या की साधना नदी तालाब या समुद्र में गिरने वाले जल में आकंठ डूब कर की जाती है। इसकी पूजा करने से व्यक्ति साक्षात कुबेर के समान धनी और विद्यावान होता है। व्यक्ति का यश और व्यापार या प्रभुत्व संसांर भर में प्रचारित हो जाता है।

ॐ सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके | शरण्ये त्रियाम्बके देवी नारायणी नमोस्तुते ||
दशमहाविद्या यंत्र एवं संपूर्ण महाविद्या यंत्र रेखा कल्पदेव दस महाविद्याओं की उपासना विभिन्न शक्ति विग्रहों के रूप में की जाती है। जबकि पराशक्ति जो नित्य तत्व है और हमेशा वर्तमान स्थिति में रहकर विश्व का संचालन करती है उसकी उपासना यंत्र रूप में करने पर सर्वश्रेष्ठ फल देती है। इन दस महाविद्याओं में विभिन्न विद्याओं से जुड़े हुए यंत्र और संपूर्ण महाविद्या यंत्र की उपासना से क्या प्रत्यक्ष लाभ होता है इसकी जानकारी दी गयी है, इस लेख में। ब्रह्ममांड बिंदु-आकार में स्पंदन कर रहा है। उसके विभिन्न स्तरों पर भांति-भांति के विश्व विराजमान हैं। हर स्तर का अपना एक निश्चित स्पंदन और चेतना है। इस महाविशाल बिंदु के शिखर पर दश महाविद्याएं रहती हैं जो ब्रह्ममांड का सृजन, व्यवस्था और अवशोषण करती हैं। ये परम ब्रह्ममांडीय मां के व्यक्तित्व के ही दस पहलू हैं। बिंदु रूप ब्रह्म वामाशक्ति है क्योंकि वही विश्व का वमन (यानी उत्पन्न) करती है- ब्रह्म बिंदुर् महेशानि वामा शक्तिर्निगते विश्वं वमति यस्मात्तद्वामेयम् प्रकीर्तिता (ज्ञानार्णव तंत्र, प्रथम पटल-14) पराशक्ति नित्य तत्व है जो हमेशा वर्तमान स्थिति में रहती और विश्व का संचालन करती है। वही शक्ति आद्या यानी ब्रह्म की जन्मदात्री है। वही जगत का मूल कारण, निमित्त और उपादान भी है। शक्ति साधना क्रम में दस महाविद्याओं की उपासना की प्रधानता है। ये महाविद्याएं ज्ञान और शक्ति का प्रतीक हैं। दश महाविद्याओं की यंत्र रूप में उपासना करना सर्वश्रेष्ठ फल देता हैं। सिद्ध महाकाली यंत्र सिद्ध महाकाली यंत्र एक दुर्लभ यंत्र है जो कि अत्यन्त ही प्रभावशाली है, शक्तिशाली है, चमत्कारी है। इसे आप घर में, दुकान में, फैक्ट्री में, आॅफिस में रख भी सकते हैं और दबा भी सकते हैं। महाकाली की उपासना अमोघ मानी गई है। इस रेखा कल्पदेव यंत्र के नित्य पूजन से अरिष्ट बाधाओं का स्वतः ही नाश होकर शत्रुओं का पराभव होता है। महाकाली यंत्र शत्रु नाश, मोहन, मारण, उच्चाटन आदि कार्यों में प्रयुक्त होता है। देवी तारा यंत्र: तारा शत्रुओं का नाश करने वाली सौंदर्य, रूप और ऐश्वर्य की देवी हैं। इसकी उपासना से आर्थिक उन्नति, भोग, दान और मोक्ष प्राप्ति होती हैं। देवी तारा यंत्र की साधना करना तंत्र साधकों के लिए सर्व सिद्धि कारक माना गया हैं। तारा महाविद्या के फलस्वरूप व्यक्ति इस संसार में व्यापार, रोजगार और ज्ञान और विज्ञान से परिपूर्ण विख्यात यश वाला प्राणी बन सकता हैं। इनके यंत्र की पूजा करना अत्यंत लाभकारी हैं। षोडशी त्रिपुर सुन्दरी यंत्र जीवन में काम, सौभाग्य और शारीरिक सुख के साथ वशीकरण, आरोग्य-सिद्धि के लिए षोडशी त्रिपुर सुंदरी महाविद्या यंत्र की आराधना की जाती है। कमल पुष्पों से होम करने से धन, सम्पदा की प्राप्ति होती है। मनोवांछित वर प्राप्ति या कन्या का विवाह होता है। वांछित सिद्धि और मनोभिलाषा पूर्ति सहित व्यक्ति दुख से रहित और सर्वत्रपूज्य होता है। माता भुवनेश्वरी यंत्र आदि शक्ति भुवनेश्वरी भगवान शिव की समस्त लीला विलास की सहचरी हैं। मां का स्वरूप सौम्य एवं अंगकांति अरूण हैं। भक्तों को अभय एवं सिद्धियां प्रदान करना इनका स्वभाविक गुण है। माता भुवनेश्वरी यंत्र आराधना से जहां साधक के अंदर सूर्य के समान तेज और ऊर्जा प्रकट होने लगती है, वहीं वह संसार का सम्राट भी बन सकता है। माता भुवनेश्वरी यंत्र अभिमंत्रित करने से लक्ष्मी वर्षा होती है और संसार के सभी शक्ति स्वरूप महाबली उसका चरणस्पर्श करते हैं। छिन्नमस्ता यंत्र माता का स्वरूप अत्यंत गोपनीय है। चतुर्थ संध्याकाल में छिन्नमस्ता यंत्र की उपासना से साधक को सरस्वती सिद्ध हो जाती है। कृष्ण और रक्त गुणों की देवियां इनकी सहचरी हैं। इससे लेखन और कवित्व शक्ति की वृद्धि होती है। शरीर रोग मुक्त होता है। शत्रु परास्त होते हैं। इस की उपासना से योग ध्यान और शास्त्रार्थ में साधक को संसार में ख्याति मिलती है। छिन्नमस्ता यंत्र की साधना को दसो महाविधाओं में सबसे श्रेष्ठ माना गया हैं क्योंकि एक तो ये शीघ्र फल देने वाली है दूसरा अपने साधकों की सभी कामनाओं को पूर्ण करती हैं। माता भैरवी यंत्र सोलह अक्षरों के मंत्र वाली माता की अंग-कांति उदीयमान सूर्य मंडल की आभा की भांति है। इन की चार भुजाएं और तीन नेत्र हैं। षोडशी को श्री विद्या भी माना जाता है। यह माता भैरवी यंत्र साधक को भक्ति और मुक्ति दोनों ही प्रदान करती है। माता भैरवी यंत्र साधना से षोडश कला निपुण संतान की प्राप्ति होती है। जल, थल और नभ में उसका वर्चस्व कायम होता है। माता भैरवी यंत्र उपासना से आजीविका और व्यापार में इतनी वृद्धि होती है कि व्यक्ति संसार भर में धन श्रेष्ठ यानी सर्वाधिक धनी व्यक्ति बनकर सुख-भोग करता है। धूमावती यंत्र मां धूमावती महाशक्ति स्वयं नियंत्रिका हैं। इनका स्वामी नहीं है। इन्हें अभाव और संकट को दूर करने वाली मां कहा गया है। धूमावती महाविद्या यंत्र के लिए यह भी जरूरी है कि व्यक्ति सात्विक और नियम-संयम और सत्यनिष्ठा को पालन करने वाला, लोभ-लालच से रहित हो। इस यंत्र के फल से देवी धूमावती सूकरी के रूप में प्रत्यक्ष प्रकट होकर साधक के सभी रोग, अरिष्ट और शत्रुओं को नाश कर देती है। प्रबल महाप्रतापी तथा सिद्ध पुरूष के रूप में उस साधक की ख्याति हो जाती है। बगलामुखी यंत्र व्यक्ति रूप में शत्रुओं को नष्ट करने वाली समष्टि रूप में परमात्मा की संहार शक्ति ही बगला मुखी है। इनकी साधना शत्रु भय से मुक्ति और वाक् सिद्धि के लिए की जाती है। दसमहाविद्याओं में बगलामुखी सबसे अधिक प्रयोग में लाई जाने वाली महाविद्या है, जिसकी साधना सप्तऋषियों ने वैदिककाल में समय-समय पर की है। बगलामुखी यंत्र की साधना से साधक का जीवन निष्कंटक तथा लोकप्रिय बन जाता है। मातंगी यंत्र मतंग शिव का नाम है। इनकी शक्ति मातंगी है। यह श्याम वर्ण और चंद्रमा को मस्तक पर धारण करती हैं। यह पूर्णतया वाग्देवी की ही मूर्ति हैं। चार भुजाएं चार वेद हैं। मां मातंगी वैदिकों की सरस्वती हैं। मातंगी यंत्र की नित्य उपासना से व्यक्ति के अंदर आकर्षण और स्तंभन शक्ति का विकास होता है। ऐसा व्यक्ति जो मातंगी यंत्र महाविद्या की सिद्धि प्राप्त करेगा, वह अपने क्रीडा-कौशल से या कला संगीत से दुनिया को अपने वश में कर लेता है। वशीकरण में भी यह यंत्र कारगर सिद्ध हुआ है। कमला यंत्र स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति, नारी-पुत्रादि के लिए कमला यंत्र की साधना की जाती है। इस प्रकार दस महामाताएं गति, विस्तार, भरण-पोषण, जन्म-मरण, बंधन और मोक्ष की प्रतीक हैं। कमला यंत्र की पूजा करने से व्यक्ति साक्षात कुबेर के समान धनी और विद्यावान होता है। व्यक्ति का यश और व्यापार या प्रभुत्व संसार भर में प्रचारित हो जाता है। संपूर्ण महाविद्या यंत्र दशमहा विद्या महा यंत्र, समस्त इच्छाओं की पूर्ति, शक्तिमान व भूमिवान बनाने के अतिरिक्त समस्त सिद्धियों को सुलभ करवाता हैं तथा धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए इसका प्रयोग किया जाता हैं। श्रीयंत्र के चारों ओर भगवती दुर्गा के दशावतारों काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, बगलामुखी के आशीर्वाद से जीवन को अधिक से अधिक सार्थक व सफल बनाया जा सकता है।
जन्म से मृत्यु तक देखभाल करनेवाली सातवीं महाविद्या माँ धूमावती
वे महाप्रलय के समय मौज़ूद रहती हैं. उनका रंग महाप्रलय के बादलों जैसा है. जब ब्रह्मांड की उम्र ख़त्‍म हो जाती है, काल ख़त्म हो जाता है और स्वयं महाकाल शिव भी अंतर्ध्यान हो जाते हैं, माँ धूमावती अकेली खड़ी रहती हैं और काल तथा अंतरिक्ष से परे काल की शक्ति को जताती हैं. उस समय न तो धरती, न ही सूरज, चाँद , सितारे रहते हैं. रहता है सिर्फ़ धुआँ और राख- वही चरम ज्ञान है, निराकार- न अच्छा. न बुरा; न शुद्ध, न अशुद्ध; न शुभ, न अशुभ- धुएँ के रूप में अकेली माँ धूमावती. वे अकेली रह जाती हैं, सभी उनका साथ छोड़ जाते हैं. इसलिए अल्प जानकारी रखने वाले लोग उन्हें अशुभ घोषित करते हैं.
यही उनका रहस्य है. वे दरअसल वास्तविकता को जताती हैं जो कड़वी,रूखी और इसलिए अशुभ लगती हैं. लेकिन वहीं से अध्यात्मिक ज्ञान जागता है जो हमें मोक्ष दिलाता है. माँ धूमावती अपने साधक को सारे सांसारिक बंधनों से आज़ाद करती हैं. सांसारिक मोह -माया से विरक्ति दिलाती हैं. यही विरक्त भाव उनके साधकों को अन्य लोगों से अलग-थलग और एकांतवास करने को प्रेरित करता है.
हिंदू धर्म में इसे अध्यात्मिक खोज की चरम स्थिति कहा जाता है. सन्यासी लोग परम संतुष्ट जीव होते हैं-जो भी मिला खा लिया, पहन लिया, जहाँ भी ठहरने को मिला, ठहर लिये. तभी तो धूमावती धुएँ के रूप में हैं-हमेशा अस्थिर, गतिशील और बेचैन. उनका साधक भी बेचैन रहता है.
उन्हें अशुभ माना जाता है क्योंकि बहुधा सच वह नही होता, जैसा कि हम चाहते हैं. वस्तुत: हम एक काल्पनिक संसार में जीते हैं, जिसमें सारी चीज़ें, सारी बातें, सारी घटनायें हमारे मनमाफ़िक होती हैं. जब वैसा नही होता, हम दुखी हो जाते हैं. क्योंकि हमारे लिए सब कुछ अच्छा हो एक मायालोक रचता है, जो हमें काम, क्रोध, मद, लोभ और ईर्ष्या के पाश में बाँध देता है. माँ धूमावती बड़े बेदर्दी और रूखेपन से उन पाशों को फाड़ देती हैं और साधक अकेला रहना पसंद करने लगता है. वे तांत्रिक जो धूमावती का रहस्यवाद नही समझते शादीशुदा लोगों के लिए धूमावती-साधना करने से मना करते हैं, सधवाओं को भी मना करते हैं.
किंतु वे भूल जाते हैं कि धूमावती सहस्रनाम में यह भी कहा गया है कि वे महिलाओं के बीच निवास करती हैं और संतान प्राप्ति कराती हैं .
इसका क्या तात्पर्य है? वास्तव में वे सहज-सुलभ महाविद्या हैं. बच्चे की प्रसूति से लेकर मनुष्य की मृत्यु तक सिर्फ़ वही खड़ी रहती हैं. उनकी मूर्ति में भी उन्हें हमेशा वरदान देने की मुद्रा में दिखाया जाता है. हालाँकि. उनके चेहरे पर उदासी छायी रहती है. वे महाविद्या तो हैं लेकिन उनका व्यवहार गाँव-टोले की दादी- माँ जैसा है-सभी के लिए मातृत्व से लबालब.
यानी उनका अशुभत्व शुभ की ओर बदलाव का संकेत है. उनके बारे में दो कहानियाँ प्रचलित हैं. आइये, उनके आलोक में हम उनके दैविक व्यक्तित्व की जानकारी लें.
पहली कहानी तो यह है कि जब सती ने पिता के यज्ञ में स्वेच्छा से स्वयं को जला कर भस्म कर दिया तो उनके जलते हुए शरीर से जो धुआँ निकला, उससे धूमावती का जन्म हुआ. इसीलिए वे हमेशा उदास रहती हैं. यानी धूमावती धुएँ के रूप में सती का भौतिक स्वरूप है. सती का जो कुछ बचा रहा- उदास धुआँ.
दूसरी कहानी यह है कि एक बार सती शिव के साथ हिमालय में विचरण कर रही थी. तभी उन्हें ज़ोरों की भूख लगी. उन्होने शिव से कहा-” मुझे भूख लगी है. मेरे लिए भोजन का प्रबंध करें.” शिव ने कहा-” अभी कोई प्रबंध नहीं हो सकता.” तब सती ने कहा-” ठीक है, मैं तुम्हें ही खा जाती हूँ.” और वे शिव को ही निगल गयीं. शिव, जो इस जगत के सर्जक हैं, परिपालक हैं.
फिर शिव ने उनसे अनुरोध किया कि’ मुझे बाहर निकालो’, तो उन्होंने उगल कर उन्हें बाहर निकाल दिया. निकालने के बाद शिव ने उन्हें शाप दिया कि ‘ अभी से तुम विधवा रूप में रहोगी.’
तभी से वे विधवा हैं-अभिशप्त और परित्यक्त.भूख लगना और पति को निगल जाना सांकेतिक है. यह इंसान की कामनाओं का प्रतीक है, जो कभी ख़त्म नही होती और इसलिए वह हमेशा असंतुष्ट रहता है. माँ धूमावती उन कामनाओं को खा जाने यानी नष्ट करने की ओर इशारा करती हैं.
उनका विधवापन वास्तव में स्थितप्रज्ञता है.
कहानी में क्या होता है? पहले तो वे शिव को खा जाती हैं. यानी आत्मरक्षा के लिए वे किसी भी हद तक जा सकती हैं. लेकिन दूसरी ओर वे शिव का शाप भी सहर्ष स्वीकार कर लेती हैं. यानी प्रकृति के, सृष्टि के नियमों को स्वीकार कर लेना चाहिए. स्थितप्रज्ञता अकर्मण्यता नही है.
इसलिए माँ धूमावती रोग, शोक आौर दुख की नियंत्रक महाविद्या मानी जाती हैं. वे काफ़ी शक्तिशाली और प्रभावशाली हैं. उनके मंदिर बहुत कम हैं. बनारस के धूमावती मंदिर में लोगों का ताँता लगा रहता है जो अपनी हर प्रकार की मन्नतें पूरी करने के लिए उनके पास गुहार लगाने आते हैं.
वे प्रसन्न होती हैं तो रोगों को दूर कर देती हैं और क्रुद्ध होती हैं तो समस्त सुखों और कामनाओं का नाश कर देती हैं. उनकी शरण मैं गये लोगों की विपत्ति दूर हो जाती है, वे संपन्न होकर दूसरों को शरण देने वाले हो जाते हैं. ऋग्वेद के रात्रि सूक्त में उन्हें सुतरा कहा गया है-सुखपूर्वक तरने योग्य. ऋण, अभाव और संकट दूर कर धन और सुख देने के कारण उन्हें ‘भूति’‘ कहा गया है.-उष ऋणेक यातय(ऋग्वेद,१०.१२७.७).
शाम्भवी मुद्रा

वेदशास्त्रपुराणानि समान्यगणिका इव |
एकैव शांभवी मुद्रा गुप्ता कुलवधूरिव ||
अंतर्लक्ष्यं बहीदृष्टिर्निर्मेषोन्मेवर्जिता |
एषा सा शांभवी मुद्रा वेदशास्त्रषु गोपिता ||
शांभवी मुद्रा का वर्णन आरम्भ करते हुए प्रथम उसका महत्व प्रकट किया है यह मुद्रा कुलवधू के समान गोपनीय है |

अन्तर्लक्षविलीनचित्तपवनो योगी यदा वर्तते |
दृष्टया निश्चलतातारया बहिरध: पश्यन्नपश्यन्नपि||
मुद्रेयं खलु शांभवी भवति सा लब्धा प्रसादाद्गुरो : |
शून्याशून्यविलक्षणं स्फुरति तत्तत्वं परं शाम्भवं ||
जब योगी अपने चित्त और वायु को अन्तर्लक्ष्य में लय करके निश्चल तारे दृष्टि से शरीर के बाहर देखता हुआ भी नहीं देखता ,यह शाम्भवी मुद्रा गुरु के प्रसाद से प्राप्त होती है ||
श्रीशांभव्याश्च खेचर्यां अवस्थाधामभेदतः |
भावेच्चित्तलयानन्द: शून्ये चित्सुखरूपिणी ||
शाम्भवी और खेचरी मुद्राओं के द्वारा अवस्था और धाम के भेद से शून्य चित्त सुख स्वरूप चित्त के लय का आनन्द होता है ||

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