IMG_0016

20

मङ्गलाचरण
कल्याण, लक्ष्मी और सौख्यको देनेवाली, पुत्र और जयको उत्पन्न करनेवाली, तुष्टिपुष्टिको देनेवाली, मांगल्य उत्साह करनेवाली, गत अथवा वर्तमान अच्छे बुरे कामोंको प्रगट करनेवाली, नानाप्रकारकी संपत्को देनेवाली, धन कुल और यशको बढानेवाली, दुष्टजनों आपदा और विघ्नको नाश करनेवाली और विविध गुणोंसे पूर्ण जन्मपत्रीको लिखता हूं ॥१॥
श्रीकरके युक्त आदिनाथ ( ईश्वर ) आदि लेकर जिनेश तथा पुंडरीक आदि लेकर गणेश, सूर्यादिग्रह, राशियुक्त भाव सदा कल्याण करें ॥२॥
दशअवतारोंको धारण करनेवाले, लोकमें एक ही योद्धा, गोपियोंकरके सेवित पादपद्म ऐसे श्रीकृष्णचन्द्र पुरुषोत्तम मुझे और तुम्हारे सबके अर्थ संपूर्ण यथेष्ट फलको देवें ॥३॥
राजालोगोंकरके आदरपूर्वक स्तूयमान श्रीभगवान् पार्श्वनाथ हमारी रक्षा करें और तुम्हारे कल्याण, लक्ष्मी और प्रियवस्तुकी रक्षा करें जिस मालिकके स्मरण करनेसे सूर्य आदि ग्रह संपूर्ण देहधारियोंको कुशलता देवें ॥४॥
सूर्यनारायण पराक्रम, चन्द्रमा उच्च पदवी, मंगल सुंदर मंगल, बुध उत्तम बुद्धि, बृहस्पति गुरुता, शुक्र, सुख, शनि हर्ष, राहु विपुल बाहुबल और केतु कुलकी उन्नतिको करैं. इस प्रकार संपूर्ण प्रसन्न ग्रह तुम्हारे अर्थ सदा प्रीतिके करनेवाले होवें ॥५॥
श्रीकमलासन, भगवान् विष्णु जिष्णु ( जैनीदेवता ) उमापति पुत्रसहित कल्याणको, ज्ञानको और निर्विघ्नताको देवैं । चन्द्रमा, शुक्र ( आस्फुजित् ), अर्क ( सूर्य ), भौम, बृहस्पति ( धिषण ) शनैश्चर और ज्ञ ( बुध ) इनकरके सहित ज्योतिषचक्र सदा तुम्हारी आयुको बढावै ॥६॥
श्रीसूर्यनारायण राज्यत्वको, चन्द्रमा उत्तम प्रीतिको, भौम मांगल्यताको, बुध बुद्धिको, बृहस्पति निर्मल गौरव ( बड़ाई ) को, शुक्र साम्राज्यसुख अर्थको देवैं, शनैश्चर शत्रुओंका नाश करै और राहु तनुधारियोंके रोगका क्षय करैं ॥७॥
श्रीमान् सूर्यनारायण, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु एवं गणेश ब्रह्मेश और लक्ष्मीधर सदा उसकी रक्षा करै जिसकी उत्तम पत्री लिखता हूं ॥८॥
उदकयंत्रका साधन नहीं किया, न नक्षत्रोंको देखा है तया शंकुका धारण मी नहीं किया है, केवल दूसरेसे बतायेहुए समयको जानकर मनुष्योंके जन्मफलको लिखता हूं ॥९॥
ललाटचक्र ( माथे ) में जो ब्रह्माने लिख दिया है तथा जो जो षष्ठे ( छठी ) के दिन अक्षरमालिका लिखी है उस जन्मपत्रीको मैं प्रकट ( प्रकाश ) करता हूं जैसे दीपक घोर अंधेरेसें रक्खीहुई वस्तुको प्रकट करता है ॥१०॥
जबतक पृथ्वीपर मेरु पर्वत स्थिर है और जबतक सूर्य चन्द्रमा हैं तबतक यह बालक आनंद करै जिसकी यह जन्मपत्री है ॥११॥
शुभ और अशुभ फलको प्रकट करनेवाली जन्मपत्री जिसकी नहीं है, उसका जीवन रात्रिमें दीपहीन मंदिरके समान अन्धकारमय है ॥१२॥
जिसकी यह जन्मपत्री है उसकी वंशवेल बढै, दिशाओंमें कीर्ति फैले और आयुर्दाय अधिक बढै ॥१३॥
जिसको वेदान्तके ज्ञाता ब्रह्म और अन्य सबसे पर प्रधानपुरुष कहते हैं, संसारके उत्पन्न करनेको कारण ऐसे ईश्वरको विघ्नविनाशके अर्थ नमस्कार करता हूं ॥१४॥
सूर्य आदि समस्त ग्रह नक्षत्र और राशियोंके सहित, जिसकी यह जन्मपत्री है उसके संपूर्ण कामनाको देवैं ॥१५॥
जन्म सुख देनेवाली, कुल और संपदाको बढानेवाली एवं पदवी और पूर्वपुण्यको देनेवाली जन्मपत्रिको लिखता हूं ॥१६॥
एकदन्ती, महाबुद्धिमान्, सर्वज्ञ, गणनायक देवता, पार्वतीके पुत्र विनायक सर्व सिद्धि करनेवाले होवें ॥१७॥
ब्रह्मा दीर्घायु करै, विष्णु संपदाको देवे और हर गात्रोंकी रक्षा करैं जिसकी यह जन्मपत्री है ॥१८॥
गणेशजी, सूर्यादिग्रह एवं गोत्रपक्षी और मातृपक्षी ग्रह, जिसकी यह जन्मपत्री है उसका कल्याण करैं ॥१९॥
श्रीसूर्यनारायण समस्त कल्याण करें, चन्द्रमा करें, चन्द्रमा कान्तिको बढावें, मंगल लक्ष्मी देवैं, बुध बुद्धिकी वृद्धि करैं, बृहस्पति दीर्धजीवी करैं, शुक्र साम्राज्य सर्व सुखको देवे, शनैश्वर विजय करैं, राहु सर्वसामग्री वैभवकी वृद्धि करैं और केतु मनोवांछित फल देवैं जिसकी उत्तमपत्री मैं लिखता हूं ॥२०॥
संपूर्ण भावीफल जो होनेवाले हैं जन्मपत्रीरुप दीपकसे प्रकट होंगे जैसे अंधियारी रातमें दीपककें होनेसे घरके सब पदार्थ दिखाई देते हैं ॥२१॥
जो जगतके अर्थ शुभ अशुभ करते हैं, जो संपदाको देते हैं, जो बलिदान होम विधिसे विघ्नोंको नाश करते हैं और जो संभोग, वियोग जीवित करते हैं वे सब देवता और खेचर तथा सूर्य आदि ग्रहगण तुम्हारे निमित्त शांतिको देवें ॥२२॥
मंदराचलको मूलसहित उखाडके गोकुलमें छत्रके समान करनेवाले, महाबली सुररिपुके मस्तकको राहु बनानेवाले, पृथ्वीको तीन पगके बराबर करनेवाले, लीलाकरके बलिराजाको बांधनेवाले, युगपति त्रैलोक्यनाथ हरि युगयुगमें तुम्हारी रक्षा करें ॥२३॥
श्रीसूर्यनारायण सदा पुष्टिको देवै, चंद्रमा संततिको देवै. मंगल भाग्यको बढावै, बुध पुत्रको देवै, सदा शांति और मांगल्यताको करै, बृहस्पति राज्य और सुभगताको करै, शुक्र भूमिपात्रताको करै, राहु केतु सौक्यको देवें, ये संपूर्ण ग्रह तुम्हैं निर्मल कीर्तिको देवैं ॥२४॥
ग्रह राज्यको देते हैं और ग्रहही राज्यको हरलेते हैं एवं संपूर्ण त्रैलोक्य चराचरमें ग्रहही व्याप्त हैं ॥२५॥
उमा, गौरी, शिवा, दुर्गा, भद्रा, भगवती, कुलदेवी और चामुंडा देवी बालककी सदा रक्षा करैं ॥२६॥
निरन्तर मदजल बहानेवाले, भ्रमर ( कुल ) समूहकरके सेवित कपोलवाले, मनके वांछित फलको देनेवाले, कार्यके स्वामी श्रीगणेशजीकी वंदना करता हूं ॥२७॥
श्रीयावनी प्रशस्तिः ।
पश्चिमाभिमुखास्थित एवं अप्रकटमूर्तिसे विद्यमान विश्वके चराचरमें परिवर्तित ( वर्तमान ) दुर्लक्ष्य जिनकी पराक्रमगति और कियेहुए कमोंसे लक्ष्य ऐसे रहमाण तुमको राज्य एवं लक्ष्मीको देवें ॥२८॥
शाकानयन
श्रीविक्रमादित्यराज्यके वर्तमान संवत्सरमेंसे एक सौ पैंतीस निकाल डालनेसे वर्तमान शाका होता है और आधे चैत्र अर्थात् चैत्रशुद्धी प्रतिपदासे तिथिमासादिकी गणना जानना ॥१॥
उदाहरण– जैसे विक्रमादित्यके संवत्सर १९५८ में १३५ हीन किया तो १८२३ शाका हुआ.
तदनंतर करण, गताब्द, अधिकमास, अवममास, अहर्गण आदि जिस ग्रंथके मतसे जाने हो उस ग्रंथसे देखकर लिखे ॥
युगानयन
चार लाख बत्तीस हजार ४३२००० वर्ष कलियुगकी संख्या है । इसको क्रमसे पृथक् २ चार ( ४ ) तीन ( ३ ) दो ( २ ) से गुणा करदे तो कृतयुग, त्रेता और द्वापरके प्रमाणवर्ष होंगे ॥१॥
उदाहरण– कलियुगके वर्षगण ४३२००० को ४ से गुणा तब १७२८००० सतरह लाख अट्ठाईस हजार वर्ष कृतयुगका मान हुआ, फिर वही कलिके वर्ष ४३२००० को तीन ३ से गुणा तब १२९६००० बारह लाख छानवे हजार वर्ष त्रेतायुगका मान हुआ । फिर ४३२००० को २ से गुणा तव ८६४००० आठ लाख चौंसठ हजार वर्ष द्वापरमान हुआ । इन चारोंको इकट्ठा करनेसे ४३२००० तेंतालीस लाख वीस हजार वर्ष महायुगमान हआ ।
संवत्सरनाम
प्रभवो १ विभवः २ शुक्लः ३ प्रमोदोऽथ ४ प्रजापतिः ५ । अङ्गिराः ६ श्रीमुखो ७ भावो ८ युवा ९ धाता १० तथैव च ॥१॥
ईश्वरो ११ बहुधान्यश्च १२ प्रमाथी १३ विक्रमो १४ वृषः १५। चित्रभानुः १६ सुभानुश्च १७ तारणः १८ पार्थिवो १९ व्यव्यः २० ॥२॥
सर्वजित् २१ सर्वधारी च २२ विरोधी २३ विकृतिः २४ खरः २५ । नन्दनो २६ विजयश्चैव २७ जयो २८ मन्मथ २९ दुर्मुखौ ३० ॥३॥
हेमलंबी ३१ विलंबी च ३२ विकारी ३३ शार्वरी ३४ प्लवः ३५ । शुभकृत् ३६ शोभकृत् ३७ क्रोधी ३८ विश्वावसु ३९ पराभवौ ४० ॥४॥

प्लवङ्गः ४१ कील्कः ४२ सौम्यः ४३ साधारण ४४ विरोधकृत् ४५ । परिधावी ४६ प्रमादी च ४७ आनन्दो ४८ राक्षसो ४९ नलः ५० ॥५॥
पिङ्गलः ५१ कालयुक्तश्च ५२ सिद्धार्थी ५३ रौद्र ५४ दुर्मती ५५ । दुन्दुभी ५६ रुधिरोद्नारी ५७ रक्ताक्षी ५८ क्रोधनः ५९ क्षयः ६० ॥६॥
प्रभावादि व्ययपर्यन्त संवत्सर ब्रह्मविंशोत्तरीके नामसे कहलाते हैं एवं सर्वजित् इत्यादिसे पराभवपर्यन्त ये बीस विष्णुविंशोत्तरीके नामसे कहेजाते हैं और प्लवंगसे क्षयसंवत्सरतक ये बीस रुद्रविंशोत्तरीके नामसे कहेजाते हैं ॥१-६॥
वर्त्तमान शाक्राको दो जगह स्थापित करै. एक जगह बाईस २२ से गुणाकर चार हजार दो सौ इक्यानवे ४२९१ और मिलावे, जो संख्या हो उसमें अठारहसौ पचहत्तर १८७५ का भाग दे, शेषांकको एकान्त स्थापित करदे और लब्धिको दूसरी जगह स्थापित शाकामें युक्त करके साठ ६० का भाग दे, लब्ध व्यर्थ शेष गत संवत्सर होता है, एक मिलानेसे वर्त्तमान संवत्सर होता है, फिर एकान्नस्थापित अठारह सौ पचहत्तरसे शोषितको बारहसे गुणाकर वही १८७५ का भाग दे इसी प्रकार दिनादि निकाल ले, वह गतमासादि संवत्सरके होंगे, बारहमें घटा दे तो वर्त्तमान संवत्सरके भोग्यमासादि होंगे शुरु शाकामें ॥१॥
उदाहरण– वर्तमान शाका १७९६ को द्विधा १७९६ स्थापित किया एक जगह १७९६ को २२ से गुणा तब ३९५१२ हुए इनमें ४२९१ युक्त किया तब ४३८०३ हुआ, इसमें १८७५ का भाग दिया लब्ध २३, शेष ६७८ एकान्त धरा फिर लब्ध २३ को दूसरी जगह स्थापित १७९६ शाकामें युक्त किया तव १८१९ हुए ६० का भाग दिया लब्ध ३० व्यर्थ शेष १९ गत संवत्सर हुआ इसमें एक मिलाया तो २० व्यससंवत्सर वर्तमान हुआ फिर शेष ६७८ को १२ से गुणा तब ८१३६ हुए इनमें १८७५ का भाग दिया तब गतमास ४ हुए शेष ६३६ को ३० गुणा तब १९०८० हुए १८७५ का भाग दिया लब्ध गत दिन लब्ध गव घटी १० शेष १००० को ६० से गुणा तब ६०००० हुए १८७५ का भाग दिया लब्ध गतफल ३२ हुए अर्थात् गत मासादि ४ । १० । १० । ३२ इनको १२ में हीन क्रिया तो वर्तमान संवत्सरके भोग्य मासादि हुए मा. ७ दि. १९ घ. ४९ पल २७० अर्थात् व्ययसंवत्सर इतने दिन शुरु शाकासे और भोग करेगा ॥
वर्तमानशाकामें तेईस युक्त करके साठका भाग दे लब्धव्यर्थ शेष गतसंवत्सर होता है एक मिलानेसे वर्तमानसंवत्सर होता है ॥१॥
वर्तमान शाका १८२३ में २३ युक्त किया तब १८४६ हुए ६० का भाग दिया शेष ४६ गत संवत्सर हुआः १ मिलाया तव ४७ अर्थात् प्रमादीनाम संवत्सर हुआ ।
संवत्सरफल
प्रभवनाम संवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य अपने जातिकुलके अनुसार धर्मात्मा, विद्यवान्, बडा बलवान्, दुष्ट और कृतविद्य होता है ॥१॥
विभवसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य स्त्रीके तुल्य स्वभाववाला, चपल, चोर, धनवान् और परोपकारी होता है ॥२॥
शुक्लसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य शुद्ध स्वभाववाला, शांत, सुशीलवान्, परस्त्रीका अभिलाषी, परोपकारी कर्म करनेवाला और निर्धनी होता है ॥३॥
प्रमोदसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य कहीं लक्ष्मी, कहीं स्त्री, बंधु, मित्र शत्रुके अर्थ विग्रह करनेवाला, राजासे पृज्य और प्रधान होता है ॥४॥
प्रजापतिसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला प्रजाके पालनमें संतुष्ट, दानी, भोगनेवाला, बहुत प्रजावान् और धनके हेतु विदेशमें विख्यात होता है ॥५॥
जिसका अंगिरासंवत्सरमें जन्म होता है वह क्रिया आदि आचारमें, धर्मशास्त्र आगम आदिमें निपुण अतिथि और मित्रका भक्त होता है ॥६॥
जिसका श्रीमुखसंवत्सरमें जन्म होताहै वह धनवान्, देवताका भक्त, धातु-व्यवहारमें निपुण और पाखंडके कर्म करनेवाला होताहै ॥७॥
भावसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य सदा तर्क करनेवाला, कार्यको करनेवाला और मछली मांससे प्रीति करनेवाला होताहै ॥८॥
युवासंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य स्त्रीसे पीडित, जलसे भयवाला एवं व्याधि दुःख आदिसे पीडित और सदा प्रीतिमान् होताहै ॥९॥
धाता संवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य, संपृर्णगुणोंसे पूर्ण, सुंदरशरीर, गुरुभक्त, कारीगरीकी विद्यामें अतिकुशल और सुशील होता है ॥१०॥ ]
ईश्वरसंवत्सरमें जिसका जन्म होताहै वह धनवान्, भोगी, कामी, पशुओंके पालनमें प्रीति करनेवाला और अर्थ धर्मसे युक्त होताहै ॥१०॥
बहुधान्य संवत्सरमें जिसका जन्म होता है वह सदा वेद शास्त्रमें रत रहनेवाला, गांधर्व ( गायनके ) कलाको जाननेवाला, सुरापान करनेपर भी अति गर्वी न होनेवाला होता है ॥११॥
प्रमाथी संवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य परस्त्रीका अभिलाषी, परद्रव्यमें रत रहनेवाला, व्यसनी और दूतवादी होता है ॥१२॥
विक्रम संवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य संतोषवान्, व्यसनमें आसक्त, प्रतापी, जितेन्द्रिय, शूर वीर और कृताविद्य होता है ॥१३॥
वृषसंवत्सरमें जिसका जन्म होताहै वह स्थूल उदरवाला, स्थूल गुल्फवाला, अल्प पाणि, कुलापवादी, कुलसेवक, धर्मार्थसे युक्त और बहुत धनहरण करनेवाला होता है ॥१४॥
चित्रभानु संवत्सरमें जिसका जन्म होता है वह तेजवान्, बुद्धिमान्, गर्वी, हीन कर्ममें स्थित न रहनेवाला और सदा देवताकी प्रीतिसे पूजा करनेवाला होता है ॥१५॥
सुभानु संवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य संपूर्ण शुभकार्य तथा मित्रामित्रके फलको पानेवाला और संपूर्ण वस्तुका संग्रह करनेवाला होता है ॥१६॥
तारण संवत्सरमें जिसका जन्म होता है वह सबको प्यारा, सदा सर्वधर्मसे बहिर्मुख रहनेवाला और राजपूजासे प्राप्त धनवाला होता है ॥१७॥
पार्थिव संवत्सरमें जिसका जन्म होता है वह शिव ( कल्याणात्मक ) ब्रह्म ( तप ) के करनेवाला, शुभ सौख्यका दायका कल्याण करके युक्त और धर्मात्मा होता है ॥१८॥

व्ययसंवत्सरमें जिसका जन्म होताहै वह दानी, भोक्ता, जन्मके कर्मकरके प्रधातत्त्व तथा सुखको पानेवाला और बहुधा मित्रोंके समागम करके युक्त होता है ॥१९॥
सर्वजित् संवत्सरमें जन्म लेनेवाला पुरुष संपूर्ण लोकोंको जीतकर विष्णुके धर्ममें परायण और संपूर्ण पुण्यकर्मोंको करनेवाला होता है ॥२०॥
सर्वधारी संवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य सदा मातापिताको प्रिय, गुरुका भक्त, शूर, वीर, शांतस्वभाववाला और प्रतापी होता है ॥२१॥
विरोधी संवत्सरमें जिसका जन्म होता है वह राक्षसी कर्म करनेवाला, मत्स्यमांसको खानेवाला, धर्मबुद्धिमें रत, प्रशस्त और लोकपूजित होताहै ॥२२॥
जिसका जन्म विकृति संवत्सरमें होताहै वह चित्रवादी, नृत्यको जाननेवाला, गांधर्व, अभिन्नसंशय, दानी, मानवान् और भोगी होताहै ॥२३॥
खरसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य हिंसा करनेवाला, परद्रव्यमें रत रहनेके निमित्त मित्रता करनेवाला, कुटुम्बका भार संभालनेवाला और उत्साही होताहै ॥२४॥
नंदसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य सदाकाल प्रीतियुक्त, गृहमें कल्याण करनेवाला और राजमान्य होता है ॥२५॥
विजयसंवत्सरमें जिसका जन्म होताहै वह कीर्ति, आयु, यश, सौख्य तथा संपूर्ण शुभकर्मोंसे युक्त, युद्धमें शूर वीर और शत्रुसे अतिपुष्ट अर्थात् शत्रुजनोंका नाश करनेवाला होताहै ॥२६॥
जयसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य युद्धमें दुर्गमस्थानोंको जीतनेवाला, मित्रामित्रफलको पानेवाला और व्यापारीकर्मसे युक्त होताहै ॥२७॥
मन्मथसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य अति कामी, अधिक बुद्धिवाला, तृष्णावान्, बहुत पुरुषोंसे युक्त, निष्ठुर, अधिकभोगवाला और अवि ( पर्वतके समान ) बलवान् होताहै ॥२८॥
दुर्भुखसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य पवित्र, शांतस्वभाव, बडा दक्ष, गुणपूजित परोपकार करनेवाला, वादी और दुष्ट स्त्रीकों भी प्रिय होताहै ॥२९॥
हेमलंबीसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य मणि, मुक्ता, रत्न और अष्टधातुओंसे युक्त, दान न करनेवाला, कृपण और पूज्य होताहै ॥३०॥
बिलंबीसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य सदा आलसी, व्याधि और दुःखोंसे युक्त एवं कुटुम्बका धारण करनेवाला होताहै ॥३१॥
विकारी संवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य रक्तविकारवाला, रक्तनेत्रोंबला, पित्तप्रकृतीवाला वनसे प्रीति करनेवाला और निर्धन होता है ॥३२॥
शार्वरीसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य वेदशास्त्रसे प्रीति करनेवाला, देवता ब्राह्मणमें रुचि, भक्तिमान् और शर्करारसका भोगनेवाला होताहै ॥३३॥
प्लवसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य निद्रावान् , भोगी, व्यवसायी, यशस्वी और सर्वलोकोंसे पूजित होताहै ॥३४॥
शुभसंवत्सर्में जिसका जन्म होताहै वह कर्मवान्, सुंदर यशवाला, धर्मशील, तप करनेवाला, प्रजापाल और बडा प्रवीण होताहै ॥३५॥
जिसका जन्म शोभनसंवत्सरमें होताहै वह सुंदरचित्तवाला, शांतचित्तवाला, शूर वीर, बहु प्रकारका दानी, न अधिक वृद्ध और न कोई काम उसका पूर्णताको प्राप्त होता है ॥३६॥
अत्यंत क्रोधी, शूर वीर, ज्ञानवान्, औषधिका संग्रह करनेवाला, तथा सर्वत्र दुसरोंका अपवाद ( मिथ्याकलंक ) करनेवाला मनुष्य क्रोधीसंवत्सरमें जन्म लेनेसे होता है ॥३७॥
जिसका जन्म विश्वावसु संवत्सरमें हो वह पुरुष छत्र, ध्वजा, पताका, चामर आदिसे विभूषित जनोमें श्रेष्ठ होता है ॥३८॥
जिसका जन्म पराभव संवत्सरमें हो वह भयसे पीडित तथा शीतसे डरनेवाला कातर ( डरपोक ), अधर्मी, दूसरोंपर चोट पहूँचानेवाला मनुष्य होता है ॥३९॥

जिसका जन्म प्लवंग संवत्सरमें हो वह मनुष्य भयानक चोरीके कर्म करनेवाला पृथ्वीका पालक नरेश्वर और योगाभ्यासमें सदा रत रहता है ॥४०॥
चित्रकर्ताकी समान, सुखी, ब्राह्मणप्रिय, माता – पिताका भक्त, कीलकसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य होता है ॥४१॥
शुद्धचित्तवाला, शीलवान्, बुद्धिमान्, प्रतापवाला, इन्द्रियजित्, दीनका भक्त, शुभफल भोगनेवाला, सौम्यसंवत्सरमें उत्पन्न मनुष्य होताहै ॥४२॥
उद्यम करनेवाला, अल्पसंतोषी, धर्मकर्ममें सदा रत रहनेवाला साधारण संवत्सरमें जन्म लेनेसे मनुष्य होता है ॥४३॥
सज्जनोंसे और भाई बंधुओंसे विरोध करनेवाला, क्षणमें क्रोधरहित और क्षणामें हीन और दुर्वार विरोधकृत् संवत्सरमें जन्म होनेसे मनुष्य होता है ॥४४॥
थोडी बुद्धि और क्रियावाला, देशदेश भ्रमण करनेवाला, देवतातीर्थमें नित्यप्रीति रखनेवाला परिधावी संवत्सरमें जन्म लेनेसें मनुष्य होता है ॥४५॥
प्रमादी संवत्सरमें उत्पन्न होनेवाला मनुष्य चन्दन, पुष्प, धूपादिसे नित्य शिवजीकी भक्तिसे पूजा करनेवाला और शौचाचारमें प्रीति रखनेवाला होता है ॥४६॥
आनंदसंवत्सरमें जन्म लेनेवाला मनुष्य सर्वकाल प्रसन्न रहनेवाला सदा अतिथिका सत्कार करनेवाला और सदा स्वजनोंसे धन पानेवाला होता है ॥४७॥
जिसका जन्म राक्षसंवत्सरमें हो वह मनुष्य सदा मछली – मांसका प्रेमी, वाधिकवृत्तिवाला, मदिरा पीनेवाला और पापी होता है ॥४८॥
जिसका जन्म नलसंवत्सरमें हो वह मनुष्य बहुतपुत्रोंवाला और बहुत मित्रोंवाला, धनका लोभ करनेवाला, लडाई झगडेका प्यार करनेवाला तथा हानि शोक एवं दुःखको भोगनेवाला होता है ॥४९॥
जिसका जन्म पिंगलसंवत्सरमें हो वह मनुष्य पित्तकोपप्रकृतिवाला, बहुधा अनेक व्याधियोंसे युक्त और बहुत वाहनों ( सवारियों ) से युक्त होता है ॥५०॥
खेती और वाणिज्य करनेवाला, तेलभांडादिक संग्रह करनेवाला, खरीदने और बेंचनेके कर्मको करनेवाला मनुष्य कालयुक्त संवत्सरमें जन्म लेनेसे होता है ॥५१॥
वेद और शास्त्रके प्रभावको जाननेवाला, सुंदर चित्तवाला, कोमल, सुकुमार, राजाओंसे पूज्य और पंडित सिद्धार्थिसंवत्सरमें उत्पन्न होनेसे मनुष्य होता है ॥५२॥
चोर, चपल, निर्दयी, पराये द्रव्यमें सदा रत रहनेवाला, निंदित काम करनेवाला मनुष्य रुद्रसंवत्सरमें जन्म लेनेसे होता है ॥५३॥
पापबुद्धिमें रत रहनेवाला, पापी और पापहीका आश्रय करनेवाला, बोध ( बौद्ध मतके ) कर्मसे युक्त मनुष्य दुर्मति संवत्सरमें उत्पन्न होनेसे होता है ॥५४॥
गाना, बजाना, शिल्प ( कारीगरी ), मंत्रविद्या, वैद्यविद्या इन सब अंगोंकें गुणको जाननेवाला दुंदुभिसंवत्सरमें उत्पन्न होनेसे मनुष्य होता है ॥५५॥
वातरक्त अथवा कफवातविकारसे युक्त, झूठ बोलनेवाला रुधिरोद्नारी संवत्सरमें उत्पन्न होनेवाला मनुष्य होता है ॥५६॥
देशको त्यागनेवाला, धनको नष्ट करनेवाला, सर्वत्र हानि पानेवाला रखेली विवाहितस्त्रीवाला रक्ताक्षी संवत्सरमें जन्म लेनेसे मनुष्य होता है ॥५७॥
क्रोधवान्, क्रोधका उत्पन्न करनेवाला, सिंहके समान पराक्रम करनेवाला, ब्राह्मण, पराधीन जीविकावाला क्रोधन संवत्सरमें उत्पन्न होनेसे मनुष्य होनेसे मनुष्य होता है ॥५८॥
कुटुंबसे कलह करनेवाला तथा मदिरा वा वेश्यामें सदा रत रहनेवाला धर्म और अधर्मका विचान करनेवाला क्षयसंवत्सरमें उत्पन्न होनेसे मनुष्य होता है ॥५९॥
युगफल
साठ संवत्सरोमें बारह युग होते हैं । एक युग पांच वर्षका होता है इस प्रकार साठ ६० वर्ष अर्थात् संवत्सरोंमें बारह युग कहे है ॥
मदिरा मांससे प्रेम करनेवाला, सदा पराई स्त्रीमें रत रहनेवाला, कवि, कारीगरीकी विद्या जाननेवाला और चतुर प्रथमयुगमें जन्म लेनेसे मनुष्य होता है ॥१॥
वाणिज्य कर्ममें व्यवहार करनेवाला, धर्मवान्, अच्छे पुरुषोंकी संगति करनेवाला, धनका लोभी और अति पापी दूसरे युगमें जन्म लेनेसे मनुष्य होता है ॥२॥
भोक्ता, दानी, उपकार करनेवाला, ब्राह्मण और देवताओंको पूजनेवाला तेजवान् और धनवान् मनुष्य तीसरे युगमें जन्म लेनेसे होता है ॥३॥
बाग, खेतकी प्राप्ति करनेवाला, औषधीको सेवन करनेवाला और धातुवादमें घननाश करनेवाला मनुष्य चौथे युगमें जन्म लेनेसे होता है ॥४॥
पुत्रवान्, धनवान्, इन्द्रियोंका जीतनेवाला और पिता – माताका प्रिय मनुष्य पांचवे युगमें जन्म लेनेसे होता है ॥५॥
सदा नीचशत्रुओंवाला, भैंसियोंका प्यार करनेवाला, पत्थरसे चोट पानेवाला और भयसे पीडित मनुष्य छठे युगमें जन्म लेनेसे होता है ॥६॥
बहुत प्रियमित्रोंवाला, व्यापारमें कपटका करनेवाला, जल्दी चलनेवाला तथा कामी सातवें युगमें जन्म लेनेसे मनुष्य होता है ॥७॥
पापकर्म करनेवाला, संतोषी, व्याधि दुःखसे युक्त और दूसरोंकी हिंसा करनेवाला आठवें युगमें उत्पन्न होनेसे मनुष्य होता है ॥८॥
बावडी, कुंआ तडागादि तथा देवदीक्षा और अभ्यागत इनमें प्यार करनेवाला राजा इन्द्रके समान मनुष्य नवम युगमें जन्म लेनेसे होता है ॥९॥
राजाधिराजका मंत्री, स्थानप्राप्ति करनेवाला, बहुत सुखी, सुंदरवेष एवं रुपवाला, और दानी दशम युगमें जन्म लेनेसे मनुष्य होता है ॥१०॥
जिसका जन्म ग्यारहवें युगमें हो वह मनुष्य बुद्धिमान्, सुंदरशीलवान्, देवताओंका माननेवाला और युद्धमें शूरवीर होता है ॥११॥
बारहवें युगमें जन्म लेनेवाला मनुष्य तेजस्वी, प्रसन्न चित्तवाला, मनुष्योमें श्रेष्ठ खेती व वाणिज्यकर्मका करनेवाला होता है ॥१२॥
अयनानयनविधि
मकर आदि छः राशिमें सूर्यके रहनेसे उत्तरायण और कर्क आदि छः राशिमें सूर्यके होनेसे दक्षिणायन संज्ञा कहते हैं ॥१॥
रत्नामालामें अयनविधि इस भांति कहते हैं – शिशिर आदि तीन ऋतु जिनमें देवताओंका दिन होता है उसको उत्तरायण और वर्षादि तीन ऋतु जिनमें देवताओंकी रात्रि होती है उसको दक्षिणायन जानना ॥१॥
अयनफल ।
उत्तरायण सूर्यंमे उत्पन्न होनेवाला मनुष्य संपूर्णशास्त्रोंका ज्ञाता, धर्म, अर्थ और कामयुक्त, शीलवान्, गुणवान् और सुंदररुपवाला होता है ॥१॥
दक्षिणायन सूर्यमें जो उत्पन्न होताहै वह कपटही उपाय करनेवाला, झूठ बोलनेवाला, धर्मसे रहित, रोगी और बहुत व्याधियोंसे ग्रसित होता है ॥२॥
गोलानयनविधि
मेष आदि छः राशियोंमें सूर्यके रहनेसे उत्तरगोल और तुलादि छः राशियोंमें सूर्यके होनेसे याम्य गोल होता है ॥१॥
गोलफल
उत्तर गोलमें जो मनुष्य जन्म लेता है वह धनवान्, विद्यावान्, पुत्र पौत्रादिसे युक्त राजाओंका मान्य होता है ॥१॥
याम्यगोलमें जो मनुष्य उत्पन्न हुआ है वह सदा सुखसे रहित, व्यंग वचन कहनेवाला, बुरे चालचलनवाला, अंगहीन और धनहीन होता है ॥२॥
उत्तर गोलमें जो मनुष्य जन्म लेता है वह धनवान्, विद्यावान्, पुत्र पौत्रादिसे युक्त राजाओंका मान्य होता है ॥१॥
गोलफल
गोलानयनविधि
मेष आदि छः राशियोंमें सूर्यके रहनेसे उत्तरगोल और तुलादि छः राशियोंमें सूर्यके होनेसे याम्य गोल होता है ॥१॥
याम्यगोलमें जो मनुष्य उत्पन्न हुआ है वह सदा सुखसे रहित, व्यंग वचन कहनेवाला, बुरे चालचलनवाला, अंगहीन और धनहीन होता है ॥२॥
ऋतोरानयनविधि
मकरकुंभराशिके सूर्यमें शिशिर ऋतु. मीन, मेषके सूर्यमें वसंत, वृष मिथुनके सूर्यंमे ग्रीष्म, कर्क सिंहके सूर्यमें वर्षा, कन्या तुलाके सूर्यमें शरद्, वृश्चिक धनके सूर्यमें हेमंत ऋतु जानना ॥१॥
ऋतुफल
रुपयौवनवाला, दीर्घसूत्री, अत्यंत गर्ववान्, साधुतायुक्त और कामी शिशिर ऋतुमें जन्म होनेसे मनुष्य होताहै ॥१॥
वसंत ऋतुमें जन्म होनेसे मनुष्य बडा उद्यमी, विचार करनेवाला, तेजवान्, बहुतकार्यका करनेंवाला और अनेक देशके रसका जाननेवाला होता है ॥२॥
जिसका जन्म ग्रीष्मऋतुमें होताहै वह मनुष्य क्रोधवान्, क्षुधालु, कामी, लंबा, शठ, बुद्धिमान् और सदा पवित्र रहनेवाला होताहै ॥३॥
वर्षाऋतुमें जन्म लेनेवाला मनुष्य गुणवान्, भोगोंसे युक्त, राजासे पूज्य, इन्द्रियोंका जीतनेवाला, कुशल और अपने अर्थकी बात करनेवाला होता है ॥४॥
शरद ऋतुमें जन्म लेनेवाला मनुष्य वाणिज्य और खेतीसे जीविकावाला, धन-धान्यसे युक्त, तेजवान्, बहुत मान पानेवाला होताहै ॥५॥
हेमंतऋतुमें जन्म लेनेवाला पुरुष बहुत व्याधियोंसे युक्त, तेजहीन, त्रास पानेवाला, निष्ठुर, छोट और पुष्ट कंठवाला तथा भयसे युक्त होताहै ॥६॥
द्वादशमासफल
चैत्रमासमें जन्म लेनेवाला मनुष्य दर्शनीय, अहंकारसहित, श्रेष्ठकर्म करनेवाला, लाल नेत्रोंवाला, क्रोधवान् और चपल स्त्रीवाला स्त्रियोमें चंचल होताहै ॥१॥
वैशाखमासमें जो उत्पन्न होता है वह भोगी ( सर्वसुखयुक्त ), धनवान्, अच्छे चित्त ( विचार ) वाला, क्रोधवान्, सुन्दर नेत्रोंवाला, रुपवान्, स्त्रियोंका प्यारा होता है ॥२॥
ज्येष्ठमासमें जो उत्पन्न होता है वह विदेशमें ( रत ) रहनेवाला, शुभचित्तवाला, बडी उमरवाला और बुद्धिमान् होता है ॥३॥
आषाढमासमें जो उत्पन्न होता है वह पुत्रपौत्रादिसे युक्त, धर्मवान्, धन नाश हो जानेके कारण पीडित, सुन्दरवर्णवाला और थोडा सुख भोगनेवाला होता है ॥४॥
श्रावणमासमें जो उत्पन्न होता है वह सुख, दुःख तथा हानि वा लाभमें एक समान चित्तवाला, मोटा देहवाला और सुरुपवान होता है ॥५॥
भाद्रपदमें जो उत्पन्न होता है वह सदा खुश रहनेवाला, बहुत बात करनेवाला, पुत्रवान्, सुखी, मीठे वचन बोलनेवाला, सुन्दर और शीलवान् होता है ॥६॥
आश्विन मासमें जो उत्पन्न होता है वह सुन्दररुपवाला, सुखी, काव्यरचना करनेवाला, अत्यन्त पवित्रतावान्, गुणवान्, धनी और कामी होता है ॥७॥
कार्तिकमासमें जो उत्पन्न होता है वह धनवान्, काम बुद्धिवाला, दुष्ट आत्मावाला, क्रय ( खरीदना ) विक्रय ( बेंचना ) कर्म करनेवाला, पापी और दुष्ट चित्तवाला होता है ॥८॥
मार्गशीर्षमासमें जो उत्पन्न होता है वह मीठे वचन बोलनेवाला, धनवान्, धर्मवान्, बहुत मित्रोंवाला, पराक्रमी और दूसरोंका उपकार करनेवाला होता है ॥९॥
पौषमें जो उत्पन्न होता है वह शूर, उग्र ( कठोर ) प्रतापवाला, पितर – देवताओंका न माननेवाला और ऐश्वर्यका उत्पन्न करनेवाला होता है ॥१०॥
माघमासमें जो उत्पन्न होता है वह बुद्धिमान्, धनवान्, शूरवीर, निष्ठुर वचन बोलनेवाला, कामी और युद्धमें धीर होता है ॥११॥
फाल्गुनमासमें जन्म लेनेवाला मनुष्य शुक्लवर्णवाला, दूसरोंका उपकार करनेवाला, धनवान्, विद्यावान्, सुखी और सदा विदेशमें भ्रमण करनेवाला होता है ॥१२॥
मलमासमें जो उत्पन्न होत है वह संसारके विषयोंसे विरक्त, श्रेष्ठ कार्य करनेवाला, तीर्थकी यात्रा करनेवाला, रोगरहित, सबका प्यारा और अपना हित करनेवाला होता है ॥१३॥
पक्षफल
कृष्णपक्षमें जन्म लेनेवाला मनुष्य निष्ठुर, दुर्मुखवाला, स्त्रीसे द्वेष करनेवाला, हीनमतिवाला और परप्रेक्ष, जनोंकरके युक्त होता है ॥१॥
शुक्लपक्षका जन्म लेनेवाला मनुष्य पूर्ण चंद्रमाके समान आभावाला, धनवान्, उद्यमी, अनेक शास्त्रका जाननेवाला, कुशल और ज्ञानवान् होताहै ॥२॥
तिथिफल
प्रतिपदातिथिमें जिसका जन्म होताहै वह दुष्टोंका साथ करनेवाला, निर्धनी, कुलका संताप करनेवाला और व्यसनी होताहै ॥१॥
द्वितीयामें जन्म लेनेवाला सदा परस्त्रीमें रत, सत्यता और पवित्रतासे हीन, चोर और स्नेहसे रहित होता है ॥२॥
तृतीयातिथिमें जन्म लेनेवाला मनुष्य बुद्धिहीन, अत्यंत विकल, धनहीन, दूसरोंके साथ द्वेष करनेवाला होताहै ॥३॥
चतुर्थीतिथिमें जन्म लेनेवाला बडा भोगी, दानी, मित्रोंसे स्नेह रखनेवाला, चतुर, धन और संतानसे युक्त होताहै ॥४॥
पंचमीतिथिमें जन्म लेनेवाला मनुष्य व्यवहारी, गुणोंका ग्रहण करनेवाला पिता माताका रक्षक, दानी, भोगी और शरीरको सँभालनेवाला होताहै ॥५॥
षष्ठीतिथिमें जन्म लेनेवाला मनुष्य अनेक देशोंमें पर्यटन करनेवाला, सदा लडाईं झगडा करनेवाला और पेटका पालन करनेवाला होता है ॥६॥
थोडेमें संतोषवाला, तेजवान्, सौभाग्यशाली, गुणी और पुत्रवान्, सप्तमीतिथिमें जन्म लेनेवाला प्राणी होता है ॥७॥
अष्टमीतिथिमें जन्म लेनेवाला मनुष्य धर्मवान्, सत्य बोलनेवाला, दानी, भोक्ता, दयालु, गुणी और संपूर्ण कर्मोमें निपुण होता है ॥८॥
नवमीतिथिमें जन्म लेनेवाला मनुष्य देवताओंका आराधक, पुत्रवान्, धन एवं स्त्रीमें सक्तमनवाला और शास्त्रके अभ्यासमें सदा रत रहनेवाला होताहै ॥९॥
दशमीतिथिमें जन्म लेनेवाला मनुष्य धर्म व अधर्मको जाननेवाला, देवताओंकी सेवा करनेवाला, यज्ञ करनेवाला, तेजवान् और सदा सुखसे युक्त होता है ॥१०॥
एकादशीतिथिमें जन्म लेनेवाला मनुष्य थोडे धैर्यवाला, राजाके स्थानमें रहनेवाला, स्वरुपवान, धनवान्, पुत्रवान् और विद्यावान् होता है ॥११॥
द्वादशीतिथिमें जन्म लेनेवाला मनुष्य चंचल एवं चपलताको जाननेवाला, दुबले शरीरवाला और देशाटन करनेवाला होताहै ॥१२॥
त्रयोदशीतिथिमें जन्म लेनेवाला मनुष्य महासिद्ध, बडा विद्वान्, शास्त्राभ्यास करनेवाला, इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला और सदा दूसरोकें काममें रहनेवाला होता है ॥१३॥
चतुर्दशी तिथिमें जन्म लेनेवाला मनुष्य धनवान्, धर्मशील, शूरवीर, सत्य बोलनेवाला, राजासे मान पानेवाला और यशस्वी होता है ॥१४॥
पौर्णमासी तिथिमें जन्म लेनेवाला मनुष्य धनवाला, बुद्धिवाला, अधिक भोजनकी लालसा रखनेवाला, उद्यत और परस्त्रियोंमें आसक्त रहनेवाला होताहै ॥१५॥
अमावास्या तिथिमें जन्म लेनेवाला मनुष्य आलसी, दूसरोंके साथ ईर्षा रखनेवाला, क्रोधी, मूर्ख, पराक्रमी, मूढमंत्री और ज्ञानवान् होता है ॥१६॥
नंदादितिथिज्ञान
नंदा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा ये पांच तिथियें क्रमानुसार प्रतिपदासे तीन वार गणना करनेपर होती हैं. यथा १ । ६ । ११ को नंदा, २ । ७ । १२ को भद्रा, ३ । ८ ॥ १३ को जया, ४ । ९ । १४ को रिक्ता और ५ । १० । १५ को पृर्णा तिथि जानो ॥१७॥
नंदादितिथिफल
नंदातिथिमें जन्म लेनेवाला मनुष्य बडे मानवाला, पंडित, देवताओंकी भक्तिमें निष्ठावाला, ज्ञानवान् और प्यारा होता है ॥१॥
भद्रा तिथिमें जन्म लेनेवाला मनुष्य बंधुसे मान्य, राजसेवी, धनवान्, संसारके भय ( मृत्यु ) से डरनेवाला और परमार्थी होता है ॥२॥
जया तिथिमें जन्म लेनेवाला मनुष्य राजासे पूज्य, पुत्र, पौत्र आदिसे युक्त, शूरवीर, शांतस्वभाववाला, चिरंजीवी और दूसरोंके मनको जाननेवाला होताहै ॥३॥
रिक्ततिथिमें उत्पन्न हुआ मनुष्य तर्कवितर्कका ज्ञाता, विना विचारे काम करनेवाला गुरुनिंदक, शास्त्रज्ञ और कामी होता है ॥४॥
जिसका पूर्णातिथिमें जन्म होता है वह धन वेदशास्त्रार्थके तत्त्वका ज्ञाता, सत्यवक्ता, सुचित्तवाला और विज्ञ होताहै ॥५॥
जन्मवारफल
जो मनुष्य रविवारमें जन्मता है वह अधिक पित्तप्रकृतिवाला, अतिचतुर, तेजस्वी, प्रेमी, दाता और दानमें बडा उत्साही होता है ॥१॥
सोमवारमें जन्म लेनेवाला मनुष्य बुद्धिमान, प्रियवाणी बोलनेवाला, शांतस्वभाववान् राजाके आश्रयसे जीविका करनेवाला, दुःख और सुखको समान माननेवाला, धनी होता है ॥२॥
भौमवारमें जन्म लेनेवाला मनुष्य कठोरबुद्धिवाला, जराअवस्थातक जीनेवाला और रणमें उत्साह रखनेवाला, महाबली, सेनाधीश और कुटुंबपालक होताहै ॥३॥
बुधवारमें जन्मनेवाला मनुष्य लेखनीसे जीविका चलानेवाला, सुन्दरवाणीवाला, पंडित, सुन्दरबुद्धिवाला रुप और धनसे युक्त होता है ॥४॥
गुरुवारमें जन्म लेनेवाला मनुष्य धन – विद्या तथा गुणको उपार्जन करनेवाला, संपूर्ण वस्तुओंका ज्ञाता, मनुष्योंसें माननीय और अध्यापक वा मन्त्री होता है ॥५॥
शुक्रवारमें जन्म लेनेवाला मनुष्य चंचलचित देवताओंको न माननेवाला, धन एवं क्रीडामें सदा लीन रहनेवाला, बुद्धिमान्, सुन्दर और वक्ता होता है ॥६॥
जिसका जन्म शनिवारमें होता है वह मनुष्य रुक्ष, अचलवक्ता, क्रूर, दुःखित चित्त, पराक्रमी, नीचदृष्टिवाला, ( ? ) बहुत केशोंसे युक्त और सदा वृद्धास्त्रीसे रति करनेवाला होता है ॥७॥
रात्रिदिनजातफल
दिनमें जन्म लेनेवाला मनुष्य श्रेष्ठधर्मसे युक्त, बहुत पुत्रोंवाला, भोगी, स्त्रीसे युक्त, कामसे पीडित अंगवाला, उत्तम वस्त्र धारण करनेवाला, बुद्धिमान् और स्वरुपवान् होता है ॥१॥
थोडी बात करनेवाला, कामसे अधिक पीडित, क्षयरोगी, मलिन चित्तवाला, दुष्टात्मा और गुप्त पापी रात्रिमें जन्म लेनेसे मनुष्य होता है ॥२॥
जन्मनक्षत्रफल
जिसका जन्म अश्विनीनक्षत्रमें हो वह मनुष्य स्वरुपवान्, मनोहर, दक्ष, वीर, स्थूलदेहवाला, बडा धनी और मनुष्योंका प्यारा होता है ॥१॥
भरणी नक्षत्रमें जन्म लेनेवाला मनुष्य रोगरहित, सत्यवक्ता, सत्प्राण अर्थात् अधिक पराक्रमवाला, सुखी और धनी होता है ॥२॥
कृत्तिकानक्षत्रमें जन्म लेनेवाला मनुष्य कृपण, पापकर्म करनेवाला, क्षुधावाला, नित्य पीडासे युक्त और सदा नीचकर्म करनेवाला होता है ॥३॥
रोहिणीनक्षत्रमें जन्म लेनेवाला मनुष्य धनी. कृतज्ञ, बुद्धिमान् राजासे मान पानेवाला, प्रियवक्ता, सत्यवादी और सुन्दर रुपवान् होता है ॥४॥
मृगशिरनक्षमें जन्म लेनेवाला चपल, चतुर, गंभीरस्वभाववाला. कूटके कर्मोमें अकर्म करनेवाला, अहंकारी और दूसरेसे ईर्षा करनेवाला होता है ॥५॥
आर्द्रानक्षत्रमें जन्म लेनेवाला मनुष्य कृतघ्नी, क्रोधी, पापी, शठ और धानधान्यसे रहित होता है ॥६॥
पुनर्वसु नक्षत्रमें जन्माहुआ मनुष्य शांतस्वभाववाला, सुखी, भोगी, मनोहर, सबका प्यार और पुत्रमित्रादिकोंसे युक्त होता है ॥७॥
पुष्यनक्षत्रमें जन्म लेनेवाला देवताओंकी सेवा करनेवाला, धार्मिक और धनी, पुत्रवान्, विद्वान्, शांतचित्तवाला, मनोहरशरीरवाला और सुखी होता है ॥८॥
आश्लेषानक्षत्रमें जन्म लेनेवाला मनुष्य भक्ष्य एवं अभक्ष्यवस्तुको खानेवाला, नीच कर्म करनेवाला, कृतघ्न, धूर्त, शठ और कर्मी होता है ॥९॥
मघानक्षत्रमें जन्म लेनेवाला मनुष्य बहुत नौकरोंवाला, धनवान्, भोगी, पिताका भक्त, बहुत उद्यम करनेवाला, सेनाका मालिक और राजसेवी होता है ॥१०॥
पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ मनुष्य विद्या गौ और धनसे युक्त गंभीर स्वभाववाला, स्त्रियोंको प्रिय, सुखी, पंडित और पूजित होता है ॥११॥
उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें जन्म लेनेवाला मनुष्य तपस्याके क्लेशको सहनेवाला, शूरवीर, मीठे वचन बोलनेवाला, धनुर्वेदमें निपुण, बडा योद्धा और मनुष्योंको प्रिय होता है ॥१२॥
हस्तनक्षत्रमें जन्म लेनेवाला मनुष्य झूठ बोलनेवाला, निर्दयी, मदिरा पीनेवाला, बंधुरहित, चोर और परस्त्रीगामी होता है ॥१३॥
चित्रानक्षत्रमें जन्म लेनेवाला मनुष्य पुत्र और स्त्रीसे युक्त, संतोषी, धनधान्यादिसे पूर्ण, देवता ब्राह्मणका भक्त होता है ॥१४॥
स्वातीनक्षत्रमें जन्म लेनेवाला मनुष्य बडा चतुर, धर्मात्मा, कृपण, स्त्रीको प्यार करनेवाला, सुंदरशीलस्वभाववाला, देवताका भक्त होता है ॥१५॥
विशाखनक्षत्रमें जन्म लेनेवाला मनुष्य अत्यन्त लोभी, बडा मानी, निष्ठुर ( दुष्ट ) कलहसे प्रीति करनेवाला, वेश्याबाज होता है ॥१६॥
अनुराधानक्षत्रमें जन्म लेनेवाला मनुष्य परोपकारी, परदेशमें रहनेवाला, बन्धुओंके कार्यमें सदा उपाय करनेवाला अर्थात् सहारा देनेवाला और सदा दया करनेवाला होता है ॥१७॥
ज्येष्ठा नक्षत्रमें पैदा हुआ मनुष्य बहुत मित्रोंवाला, प्रधान, कवि, तपस्या करनेवाला, बडा चतुर, धर्ममें तत्पर, शूद्रोंसे पूजित होता है ॥१८॥
मूलनक्षत्रमें जिसका जन्म हुआ हो वह बालक सुखी और धन वाहनसे युक्त हिंसा करनेवाला, बलवान्, स्थिर, ( विचारके ) अथवा स्थिर कर्मका करनेवाला, शत्रुनाशक, सुकृती होता है ॥१९
पूर्वाषाढा नक्षत्रमें जिसका जन्म होता है वह दृष्टमात्रही उपकार करनेवाला, भाग्यवान्, मनुष्योंको प्रिय, सकल वस्तुके जाननेमें प्रवीण होता है ॥२०॥
उत्तराषाढामें जन्मा हुआ मनुष्य बहुत मित्रोंवाला, सुंदर वेषवाला, अच्छे शब्द बोलनेवाला, सुखी, शूरवीर और विजय पानेवाला होता है ॥२१॥
जिसके जन्मसमयमें अभिजित् नक्षत्र होय उसकी कान्ति उत्तम, सज्जनोंका संगी, उत्तमकीर्तिवाला, मनोहररुप, देवता व ब्राह्मणोंका पूजनेवाला, यथार्थ बोलनेवाला और अपने कुलमें प्रधान होता है ॥२२॥
श्रवणनक्षत्रमें जन्म लेनेवाला मनुष्य सुकृति, मनोहर शरीरवाला, दानी, संपूर्ण गुणोंकरके युक्त, धनवान्, बहुत संतानवाला होता है ॥२३॥
धनिष्ठानक्षत्रमें जिसका जन्म होता है वह गानविद्यासे प्रीति करनेवाला, बंधुओंसे मान पानेवाला, हेम – रत्नकरके विभूषित, एकशत मनुष्योंका मालिक होता है ॥२४॥
जिसका शतभिषानक्षत्रमें जन्म होता है वह कृपण, धनी, परस्त्रीके पास रहनेवाला तथा विदेशमें कामी होता है ॥२५॥
जिसका जन्म पूर्वाभाद्रपदानक्षत्रमें होता है वह बहुत बोलनेवाला, सुखी, प्रजाकरके युक्त, बहुत निद्रा लेनेवाला, निरर्थक होता है ॥२६॥
जिसका जन्म उत्तराभाद्रपदा नक्षत्रमें होता है वह गौरवर्णवाला, सत्तोगुणस्वभाववाला, धर्मका जाननेवाला, शत्रुओंको नाश करनेवाला, देवताओंके समान पराक्रमवाला साहसी होता है ॥२७॥
रेवतीनक्षत्रमें जिसका जन्म होता है वह संपूर्ण अंगोंवाला सुंदर, दक्ष, साधु, शूर, चतुर, धनधान्यकरके युक्त होता है ॥२८॥
इति नक्षत्रफलम् ॥
योगजातफल
विष्कंभयोगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य रुपवान्, भाग्यवान्, नानाप्रकारके अलंकारोंसे पूर्ण, महाबुद्धि और चतुर होता है ॥१॥
प्रीतियोगमें उत्पन्न हुआ पुरुष स्त्रियोंको प्यारा, तत्त्वका जाननेवाला, बडे उत्साहवाला, स्वार्थी और सदाही उद्यम करनेवाला होता है ॥२॥
आयुष्मान् योगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य अभिमानी, धनी, कवि, बडी आयुवाला सत्त्वकरके युक्त और युद्धमें जय पानेवाला होता है ॥३॥
सौभाग्ययोगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य राजाका मंत्री, सब कामोंमें निपुण और स्त्रियोंका प्यारा होता है ॥४॥
शोभनयोगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य स्वरुपवान् बालक, बहुत पुत्रस्त्रियोंसे युक्त, सब कार्योमें आतुर और संग्राममें सदा तत्पर रहनेवाला होता है ॥५॥
अतिगण्डयोगमें जिसका जन्म हो वह अपनी माताका मारनेवाला हो और यदि अतिगण्डके अन्तमें जन्म हो तो कुलका नाश करनेवाला होता है ॥६॥
सुकर्मायोगमें जन्म लेनेवाला मनुष्य अच्छे कर्म करनेवाला, सबसे प्रीति करनेवाला, रागी, भोगी और अधिक गुणवाला होता है ॥७॥
धृतियोगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य धैर्यवाला, यश, पुष्टि और धनकरके युक्त, भाग्यवान्, रुप विद्या और गुणोंसे युक्त होता है ॥८॥
शूलयोगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य शूलकी व्यथाकरके युक्त, धर्मवान्, शास्त्रक पारका जाननेवाला, विद्या और द्रव्यमें कुशल और यज्ञ करनेवाला होता है ॥९॥
गण्डयोगमें जिसका जन्म हो वह गण्डव्यथाकरके युक्त, बहुत क्लेशवाला, बडे मुण्डबाला, छोटी देहवाला, बडा शूर, बहुत भोगी और दृढव्रत करनेवाला होता है ॥१०॥
वृद्धियोगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य सुन्दररुपवाला, बहुत पुत्र-स्त्रीसे युक्त, धनवान्, भोगी और बलवान् होता है ॥११॥
ध्रुवयोगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य बडी आयुवाला, सबको प्रियदर्शनवाला, स्थिरकर्म करनेवाला, अतिशक्त और स्थिरबुद्धिवाला होता है ॥१२॥
व्याघातयोगमें जन्म लेनेवाला मनुष्य सर्व जाननेवाला, सबसे पूजित, सर्व कर्म करनेवाला और संसारमें सब कामोंमें प्रसिद्ध होता है ॥१३॥
हर्षणयोगमें उत्पन्न हुआ संसारमें अधिक भाग्यवाला, राजाको प्यारा, सदा ही प्रसन्न रहनेवाला, धनी और वेदशास्त्रमें निपुण होता है ॥१४॥
वज्रयोगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य वज्रमुष्टि, सब विद्याओंके पारका जाननेवाला, धनधान्य करके युक्त, तत्त्वका जाननेवाला, बडा बली होता है ॥१५॥
सिद्धियोगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य सर्व सिद्धियोंसे युक्त, दानी, भोगी, सुखी, सुन्दर शोच और रोगयुक्त होता है ॥१६॥
व्यतीपातयोगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य बडे कष्टसे जीता है. यदि भाग्यसे जीता है तो मनुष्योंमें उत्तम होत है ॥१७॥
वरीयान् योगमें पैदा हुआ मनुष्य शिल्पशास्त्रके कलामें निपुण, गीतनृत्यादिका जाननेवाला होता है ॥१८॥
परिघयोगमें जन्म लेनेवाला पुरुष अपने कुलकी वृद्धि करनेवाला, शास्त्रका जाननेवाला, कवि, वाचाल दानी, भोगी और प्रिय बोलनेवाला होता है ॥१९॥
जिसका जन्म शिवयोगमें होता है वह सर्वकल्याणोंका भाजन, महाबुद्धि, वरका देनेवाला संसारमें महादेवके समान होता है ॥२०॥
सिद्धियोगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य सिद्धिका देनेवाला, मंत्रसिद्धि करनेवाला, सुन्दर नारी और संपदाओंसे युक्त होता है ॥२१॥
साध्ययोगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य मानसीसिद्धिसे युक्त, यशस्वी, सुखी, धीरे काम करनेवाला, प्रसिद्ध और सबका मित्र होता है ॥२२॥
शुभयोगमें जन्म लेनेवाला मनुष्य सैकडों शुभकामोंसे युक्त, धनी, ज्ञानसे संपन्न, दानी और ब्राह्मणकी पूजा करनेवाला होता है ॥२३॥
शुक्लयोगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य सब कलाओंसे युक्त, सब अर्थ और ज्ञानसे युक्त, कवि, प्रतापी, शूर, धनी और सब मनुष्योंका प्यारा होता है ॥२४॥
ब्रह्मयोगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य विद्वान्, वेदशास्त्रमें परायण, सदैव ब्रह्मज्ञानमें रत और सब कामोंमें निपुण होता है ॥२५॥
ऐन्द्रयोगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य यदि राजकुलमें पैदा हुआ हो तो निश्चय राजा होता है परंतु थोडी आयुवाला, सुखी, भोगी और गुणवान् होता है ॥२६॥
वैधृतियोगमें जिसका जन्म होता है वह उत्साहहीन, बुभुक्षित मनुष्योंसे प्रीति करता हुआ मी अप्रिय होता है ॥२७॥
इति योगफलम् ॥
करणानयन
कृष्णपक्षमें तिथिको दूना करके सातका भाग देवे, शेषसे बवादि करण तिथिके आदिभागमें जानै ॥१॥
एवं शुक्लपक्षमें तिथिको दूना करके दो हीन करदे फिर सातका भाग देवे तो शेष बवादि करण तिथिके आदिमें होता है ॥२॥ जैसा चक्रमें स्पष्ट देखना ॥ इति करणानयनम् ।
करणफल
बवकरणमें उत्पन्न हुआ मनुष्य अभिमानी, सदाही धर्मतें रत, शुभ मंगल कर्म और स्थिरकर्म करनेवाला होता है ॥१॥
बालवकरणमें पैदा हुआ जन तीर्थ करनेवाला, देवतादिकी सेवा करनेवाला, विद्या-धन-सौख्यसे युक्त एवं राजाओंमें पूज्य होता है ॥२॥
कौलवमें उत्पन्न मनुष्य सब मनुष्योंसे प्रीति करनेवाला और मित्रजनोंसे संगति करनेवाला होता है ॥३॥
तैतिलकरणमें उत्पन्न मनुष्य सौभाग्य और गुणयुक्त, सब मनुष्योंसे स्नेह करनेवाला और सुंदर सुंदर घरवाला होता है ॥४॥
गरकरणमें उत्पन्न मनुष्य खेती करनेवाला, घरके काममें निपुण और जिस वस्तुकी कांक्षा करै वह बडे उपायोंसे मिलजावे ॥५॥
वाणिजकरणमें उत्पन्न मनुष्य वाणिज्यसे जीविकावाला और परदेशके आने-जानेसे वाञ्छित प्राप्त करनेवाल होता है ॥६॥
विष्टिकरणमें पैदा हुआ मनुष्य अशुभ आरंभ करनेवाला, सदाही परस्त्रीमें रत और विषकार्यमें प्रवीण होता है ॥७॥
शकुनिकरणमें उत्पन्न हुआ मनुष्य पौष्टिकादिक क्रियाओंका करनेवाला, औषघादिकोमें निपुण, वैद्यकीसे जीविकावाला होता है ॥८॥
चतुष्पादकरणमें उत्पन्न मनुष्य देवता-ब्राह्मणोंमें सदा रत, गाइयोंका कार्य करनेवाला, गाइयोंका मालिक ( रक्षक ) चौपायोंकी औषध करनेवाला होता है ॥९॥
नागकरणमें उत्पन्न हुआ मनुष्य नीचजनोंसे प्रीति करनेवाला, दारुण कर्म करनेवाला, अभागी और चंचलनेत्रवाला होता है ॥१०॥
किंस्तुघ्नकरणमें जिसका जन्म होता है वह शुभकर्ममें रत रहनेवाला, तुष्टि, पुष्टि मांगल्य और सिद्धिको प्राप्त करनेवाला होता है ॥११॥
इति बवादि करणफलम् ॥
गणज्ञान
अश्विनी, मृग, रेवती, हस्त, पुष्य, पुनर्वसु, अनुराधा, श्रवण, स्वाती यह नक्षत्र देवतागण कहलाते हैं. इन नक्षत्रोंका जन्म हो तो देवतागण जानै अन्यमें भी ऐसेही जाने ॥१॥
पूर्वा ३, उत्तरा ३, आर्द्रा, रोहिणी, भरणी यह मनुष्यगण जानिये ॥२॥
कृत्तिका, मघा, आश्लेषा, विशाखा शतभिषा, चित्रा, ज्येष्ठा, धनिष्ठा, मूल ये नक्षत्र राक्षसगण कहलाते हैं ॥३॥
योनिविचारचक्र
घोडाकी योनिमें पैदा हुआ मनुष्य स्वच्छंद, अच्छे गुणवाला, शूरवीर, तेजस्वी, वाद्यमें प्रवीण, स्वामीका भक्त होता है ॥१॥
गज ( हाथी ) योनिमें उत्पन्न हुआ मनुष्य राजमान्य, बलवान्, भोगी, राजाके स्थानसे सत्कार पानेवाला, उत्साही होता है ॥२॥
पशुयोनिमें उत्पन्न हुआ मनुष्य स्त्रियोंको प्यारा, सदा उत्साहयुक्त, वाक्यरचनामें निपुण, थोडी आयुवाला होता है ॥३॥
सर्पयोनिमें उत्पन्न हुआ मनुष्य बडा क्रोधी, क्रूर, उपकारको ग्रहण न करनेवाला, वराये मकानको हरनेवाला होता है ॥४॥
श्वान ( कुत्ता ) योनिमें उत्पन्न हुआ मनुष्य उद्यमवान्, बडा उत्साही, शूर, स्वजातिका विग्रही, मातापिताका भक्त होता है ॥५॥
मार्जार ( बिलाव ) योनिमें उत्पन्न हुआ मनुष्य अपने कार्यमें शूर तथा दक्ष, मिष्टान्नका भोजन करनेवाल निर्दयी, दुष्ट, अच्छे भाग्यवाला होता है ॥६॥
मेष योनिमें उत्पन्न मनुष्य महापराक्रमी, योद्धा, समर्थ, धनका स्वामी ( धनी ), परोपकारी होता है ॥७॥
मूषकयोनिमें उत्पन्न हुआ मनुष्य बुद्धिमान, धनवान्, अपने कार्यके करनेमें उद्यत, मदसे रहित, विश्वास न करनेवाला होता है ॥८॥
सिंहयोनिमें उत्पन्न हुआ मनुष्य अपने धर्ममें तत्पर, शुभ आचारवाला, अच्छे क्रियाओंका करनेवाला, सुंदर गुणकरके युक्त, कुटुंबके उद्धार करनेवाला होत है ॥९॥
महिषयोनिमें जिसका जन्म हो वह संग्राममें विजयको पानेवाला, योद्धा, कामी, प्रजावला, अधिकवातवाला, मन्दबुद्धिवाला होता है ॥१०॥
व्याघ्रयोनिमें उत्पन्न हुआ मनुष्य स्वच्छन्द, धनमें रत, ग्राही, दीक्षावान्, धनवान् अपने आप अपनी प्रशंसा करनेवाला होता है ॥११॥
मृगयोनिमें पैदाहुआ मनुष्य स्वच्छंद, शांतस्वभाव, भली जीविकावाला, सत्य बोलनेवाला, अपने जनोंसे प्रीति करनेवाला अथवा स्वजनोंका प्रिय, धर्मवान्, युद्धमें शूर होता है ॥१२॥
वानरयोनिमें उत्पन्न हुआ मनुष्य चपल, मिष्टभोगी, धनका लोभी, लडाईसे प्रीति करनेवाला, कामी, प्रजावाला, शूर होता है ॥१३॥
नकुलयोनिमें जिसका जन्म हो वह परोपकार करनेमें दक्ष, धनका स्वामी, चतुर, पितामातासे प्रीति करनेवाला होता है ॥१४॥
इति योनिफलम् ॥
वारफल
रविवारके दिन जिसका जन्म होता है उसको पहिले मासमें पीडा हो और बत्तीसवें और तेरहवें छठवें वर्षमें भी पीडा होकर साठ वर्ष जीवे ॥१॥
जिसका सोमवारके दिन जन्म हो उसको ग्यारहवें, आठवें और सोलहवें महीने तथा सत्ताईसवें वर्षमें पीडा होकर चौरासी वर्ष जीवे ॥२॥
जिसका मंगलके दिन जन्म हो उसको बत्तीसवें और दूसरे वर्षमें पीडा हो और सदाही रोगी रहताहुआ चौहत्तर वर्ष जीवे ॥३॥
जिसका बुधवारके दिन जन्म हो उसको आठवें महीना आठवें ही वर्षमें पीडा होकर चौसठ वर्ष जीवे ॥४॥
जिसका बृहस्पतिके दिन जन्म हो उसकी सातवें, सोलहवें या तेरहवें महीनेमे पीडा होकर चौरासी वर्ष जीवे ॥५॥
जिसका शुक्रवारके दिनमें जन्म हो उसको रोग नहीं होता और निश्चय करके पूरे साठ वर्षमें मरे ॥६॥
जिसका शनिवारका जन्म हो उसको पहिले महीना और तेरहवें वर्षमें पीडा हो फिर पुष्ठदेह होकर सौवर्ष जीवे ॥७॥
इति वारायुः ॥
जन्मलग्नफल
मेषलग्नमें जिसका जन्म होता है वह घोर, मानी, धनी, सुंदर, क्रोधी, भाइयोंका नाश करनेवाला, पराक्रमी और परायेको प्यारा होत है ॥१॥
जिसका वृषलग्नमें जन्म होता है वह गुरुका भक्त, प्रिय बोलनेवाला, गुणी, कृते, धनी, लोभी, वीर और सबका प्यारा होता है ॥२॥
मिथुनलग्नमें जिसका जन्म होता है वह अभिमानी, भाइयोंका प्यारा, दानी, भोगी, धनी, कामी, धीरे काम करनेवाला और शत्रुओंका मारनेवाला होता है ॥३॥
कर्कलग्नमें उत्पन्न होनेवाल मनुष्य भोगी, धर्मवान्, जनोंका प्यारा, मिष्टान्न आदिका भोजन करनेवाला, सौभाग्यवाला, भाइयोंका प्यारा होता है ॥४॥
सिंहलग्नमें जिसका जन्म होता है वह भोगी, शत्रुओंका मारनेवाला, छोटे पेटवाला, थोडी संतानवाला, उत्साह करनेवाला और रणमें पराक्रम करनेवाला होता है ॥५॥
जिसका कन्यालग्नमें जन्म होता है वह बालक अनेक शास्त्रोंमें निपुण, सौभाग्य और गुणोंकरके युक्त, सुंदर, सुरतप्रिय होता है ॥६॥
जिसका तुलालग्नमें जन्म होता है वह सुन्दर बुद्धिवाला, अच्छे कर्मोसे जीविका करनेवाला, विद्वान्, सब कलाओंका जाननेवाला, धनवान् और जनोंकरके पूजित होता है ॥७॥
जिसका वृश्चिकलग्नमें जन्म होता है वह शौर्यवान् ( महावीर ), धनवान्, पंडित, कुलमें प्रधान, बुद्धिमान् सबका पालन करनेवाला होता है ॥८॥
धनु लग्नके उदयमें जिसका जन्म हो वह नीतिमान् धर्मवान्, सुंदर बुद्धिवाला, श्रेष्ठ कुलवाला, बुद्धिमान् और सबका पालन करनेवाला होता है ॥९॥
मकरलग्नमें जिसका जन्म होता है वह नीचकर्म करनेवाला, बहुत संतानवाला, लोभी, नष्ट, आलसी और अपने काममें उद्यम करनेवाला होता है ॥१०॥
कुंभ लग्नके उदयमें जन्म लेनेवाला मनुष्य स्थिरचित्तवाला, बहुत मित्रोंवाला, सद पराई स्त्रीमें रत, कोमल अंगवाल और महासुखी होता है ॥११॥
मीन लग्नके उदयमें उत्पन्न हुआ मनुष्य रत्न और सोनेसे पूरित, थोडी कामनावाला, बहुत दुर्बल और दुर्बल और बहुत देरतक चिन्तन करनेवाला होता है ॥१२॥
इति जन्मलग्नफलम् ॥
नवांशफल
जन्मराशिके पहिले नवांशमें जिसका जन्म हो वह चुगुल, चंचल, दुष्ट, पापी, कुरुप, शत्रुओंके व्यसनमें आसक्त होता है ॥१॥
दूसरेमें उत्पन्न हुआ भोगी, लडाईकी इच्छा नही करनेवाला, गानेवाले पुरुषकी स्त्रीमें आसक्त हो ॥२॥
तीसरे नवांशमें जन्माहुआ धर्मवान्, सदा व्याधियुक्त, सब सारका जाननेवाला, सर्वज्ञ और देवोंका भक्त होता है ॥३॥
चौथे अंशमें उत्पन्न हुआ मनुष्य दीक्षा लिये गुरुकी भक्ति करनेवाला, जितनी वस्तु पृथ्वीमें हैं तिन सबको लाभ करनेवाला होता है ॥४॥
पांचवें अंशमें उत्पन्न हुआ मनुष्य बडी आयुवाला, बहुत पुत्रोंसे युक्त, सब लक्षणोंसे संपन्न राजा होता है ॥५॥
छठे अंशमें उत्पन्न हुआ मनुष्य स्त्रीसे हाराहुआ, शुभहीन, बडा मानी. नपुंसक, द्रव्यहीन और प्रमाथी होता है ॥६॥
सातवें अंशमें उत्पन्न मनुष्य पराक्रमी, बुद्धिमान्, वीर, लडाईमें जीतनेवाला, बडे उत्साहयुक्त और संतोषी होता है ॥७॥
आठवें अंशवाला कृतघ्नी, ईर्षा करनेवाला, क्रूर, क्लेश भोगनेवाला, बहुत सन्तानवाला, कालमें फलत्याग करनेवाला होता है ॥८॥
नववें नवांशकमें उत्पन्न हुआ मनुष्य क्रियाओंमें प्रवीण, निपुण, अच्छे प्रतापवाला, जितेन्द्रिय और सदाही नौकरोंकरके युक्त होता है ॥९॥
इति राशिनवांशकफलम् ॥
चन्द्रकुण्डलिका
जन्मलग्न अपना शरीर है और षड्वर्ग अंग है और चन्द्रमा प्राण है और अत्यग्रहोंको धातु जानना. इस प्रकार प्राणके नाश होजानेसे देह धातु अंगादिकामी नाश होजात है, इस कारण चन्द्रवीर्यही प्रधान माना गय है ॥ लग्न आत्मा है और चन्द्रमा मन है तो आत्मा और जीवका लग्नांश अथवा द्वादशांशसे ग्रहोंद्वारा फल कहना चाहिये ॥ सर्वत्र चन्द्रमा बीज और जल कहा है, लग्नको पुष्प, नवांशको फल और भावोंको स्वादुरस माना है ॥१-३॥
इति चन्द्रकुंडलिका ॥
चन्द्रराशिफल
मेषराशिमें जिसका जन्म होता है वह चंचलनेत्रोंवाला, सदा ही रोगी, धर्म और धनमें निश्चय करनेवाला, मोटी जंघावाला, पापरहित, राजाओंसे पूजित होता है, स्त्रीके हदयको आनन्द देनेवाला, दानी, जलसे डरनेवाला, धोरकर्म करनेवाला अंतमें कोमल होता है ॥१॥२॥
जिसका वृषराशिभें जन्म हो वह भोगी, दानी, पवित्र, चतुर, महासत्त्ववान्, महाबली, धनी, विलासी, तेजवान् और सुंदरमित्रवाला होता है ॥३॥
जिसका मिथुनराशिमें जन्म होता है वह विचारके बात करनेवाला, चंचलदृष्टिवाला, दयावान्, मैथुन जिसको प्यारा लगे, गानेवाला, कंठरोगी, यशका भागी, धनी, गुणी, गोरे रंगवाला, लम्बा, प्रवीण, वक्ता, बुद्धिमान्, दृढव्रत करनेवाला, समर्थ और न्यायवादी होता है ॥४॥५॥
कर्कराशिमें जिसका जन्म होता है वह कार्य करनेवाला, धनी, शूर, धर्मवान्, गुरुका प्यारा, शिरोरोगवाला, महाबुद्धिमान्, दुर्बलदेहवाला, अच्छा जाननेवाला, प्रवास करनेवाला, कोपी, दुःखी और सुन्दरमित्रवाला, घरमें अनासक्त, ढीठ होता है ॥६॥७॥
जिसका सिंहराशिमें जन्म होता है वह क्षमायुक्त क्रियामें आसक्त, मदिरामांसमें सदा रत रहनेवाला, देशमें घूमनेवाला, जाडेसे डरनेवाला. सुन्दर मित्रवाला, विनयी, जल्दी क्रोधवाला मातापिताको प्यारा. व्यसनी और संसारमें प्रसिद्ध होता है ॥८॥९॥
जिसका कन्याराशिमें जन्म होता है वह विलासी, सज्जन जनोंका आनन्द देनेवाला, सुंदर, धर्मसे युक्त, दानी, निपुण. कवि, वृद्ध, बेदमार्गमें परायण, सब संसारको प्यारा, गाने बजानमे रत, परदेश जिसको अच्छा लगे स्त्रीकरके दुःखी होता है ॥१०॥११॥
जिसका तुलाराशिमें जन्म होत है वह अस्थानमें क्रोधी, दुःखी, मीठा बोलनेवाला, दयायुक्त, चंचलनेत्रवाला, चललक्ष्मीवाला, घरमें बडा बली, वाणिज्यमें निपुण, देवताओंक पूजनेवाला, मित्रोंका प्यारा, परदेशी, सज्जनोंको प्रिय ऐसा मनुष्य होता है ॥१२॥१३॥
जिसका वृश्चिकराशिका जन्म हो बाल्यावस्थासे ही परदेशी. क्रूर आत्मावाला, वीर, पिंगल नेत्रवाला, पराई स्त्रीमें रत, अभिमानी, बंधुओंमें निष्ठुर, माहससे लक्ष्मीका पानेवाला, मातामें भी दुष्ट बुद्धिवाला, धूर्त, चोरकलाओंका आरंभ करने वाला होता है ॥१४॥१५॥
जिसका धनुराशिमें जन्म होता है वह वीर, बराबर बुद्धिवाला, सात्त्विकजनोंको आनंद देनेवाला, शिल्पविज्ञानमें युक्त, धनकरके युक्त, सुंदरभार्यावाला, अभिमानी, चरित्र युक्त, मनोहर अक्षरोंक बोलनेवाला, तेजस्वी, स्थूल देहवाला, कुलनाश करनेवाला होता है ॥१६॥१७॥
जिसका मकरराशिमें जन्म हो वह कुलमें नेष्ट, स्त्रियोंके वशमें रहनेवाला, पण्डित, परिवादवाला, गीतका जाननेवाला, स्त्रियोंके प्रसंगकी इच्छा करनेवाला, पुत्रवान्, माताका प्यारा होता है, धनी, दानी, अच्छे नौकरोंवाला, दयावान्, बहुत भाइयोंवाला और सुखकी चिन्ता करनेवाला होता है ॥१८॥१९॥
जिसका कुंभराशिमें जन्म हो वह दानी, आलसी, कृतज्ञ, हाथी घोडे और धनका स्वामी, अच्छी दृष्टिवाला, सदा सौम्य, धनविद्याके लिये उद्यम करनेवाला, पुण्ययुक्त, स्नेहकीर्तिवाला, धनी, भोगी, बली, शालूर पक्षीके तुल्य कोखिवाला और निर्भय होता है ॥२०॥२१॥
जिसका मीनराशिमें जन्म होता है वह गंभीर चेष्टवाला, वीर, प्रवीण, मीठी वाणीवाला, मनुष्योमें श्रेष्ठ. क्रोधी, कृपण, ज्ञानी, गुणमें श्रेष्ठ, कुलका प्यार, सदा सेवा करनेवाला, जल्दी चलनेवाला, गानेमें निपुण, शुभ और भाईयोंका प्यारा होता है ॥२२॥२३॥
इति चन्द्रराशिफलम् ॥
सूर्यभावाध्याय
जिसके जन्मसमयमें सूर्य चन्द्रमाके साथ स्थित हो तो वह विदेशगामी, भोगी, कलहमें वासनावाला होता है ॥१॥
जिसके सूर्य चन्द्रमासे दूसरे स्थिर हो तो वह बहुत नौकरों और यशवाला राजासे मान्य होता है ॥२॥
चन्द्रमासे तीसरे सूर्य हो तो वह सुवर्ण, धनका स्वामी. पवित्र, राजाके समान होता है ॥३॥
चन्द्रमासे चतुर्थ सूर्य हो तो वह माताका मारनेवाला, अभक्तिमान् होता है ऐसा पण्डित कहते हैं ॥४॥
चन्द्रमासे पंचम सूर्य स्थित हो तो वह कन्याओं करके असुखी और बहुत पुत्रोंवाला होता है ॥५॥
चन्द्रमासे छठे सूर्य हो तो वह शत्रुओंसे जीतनेवाला, शूर ( वीर ), क्षत्रिय धर्मके कर्ममें सदा रत रहनेवाला होता है ॥६॥
चन्द्रमासे सातवें सूर्य स्थित हो तो वह सुन्दर स्त्रीवाला, शीलवान्, राजमान्य और बडा तपस्वी होता है ॥७॥
जिसके चन्द्रमासे आठवें सूर्य स्थित हो वह सदा क्लेश सहनेवाला, अनेक रोगोंसे पीडित होता है ॥८॥
चन्द्रमासे नवम सूर्य स्थित हो तो वह मनुष्य धर्मात्मा, सत्य बोलनेवाला, बन्धनका क्लेश पानेवाला होता है ॥९॥
जिसके चन्द्रमासे दशम सूर्य स्थित हो तो उसके दरवाजेपर धनवान् ठहरैं अर्थात् अधिक धनवाला और प्रतापी होत है ॥१०॥
जिसके चन्द्रमासे ग्यारहवें सूर्य स्थित हो तो वह राजगर्वी, अधिक वेत्ता, प्रसिद्ध, कुलका नायक होता है ॥११॥
जिसके चन्द्रमासे सूर्य बारहवें हो तो वह नेत्रोंमें अल्प प्रकाशवाला और क्रोधी होता है ॥१२॥
इति सूर्यभावाध्यायः ॥
भौमभावाध्याय
जिसके जन्मकालमें भौम चन्द्रमासे पहिले हो तो वह रक्तनेत्रोंवाल, रुधिर प्रवाही और रक्तवर्ण होता है ॥१॥
जिसके चन्द्रमासे दूसरेमें भौम हो तो वह भूमिके मालिक, पुत्रवाला और खेतीका करनेवाला होता है ॥२॥
जिसके चन्द्रमासे भौम तीसरे स्थित हो वह चार भाइयोंसे युक्त. सुन्दर शीलवाला और हमेशा सुखी होता है ॥३॥
जिसके भौम चन्द्रमासे चतुर्थ हो वह सुखसे हीन, दरिद्री और स्त्री शीघ्र मरै ऐसा होता है ॥४॥
जिसके भौम चन्द्रमासे पॉंचवें हो वह पुत्रहीन मनुष्य होता है तथा स्त्रियोंके लग्नमें पडे तो भी पुत्रहीन जानन ॥५॥
जिसके भौम चन्द्रमासे छठे हो उसे अधर्म करनेमें शत्रुता और सदा रोग करके पीडित होता है ॥६॥
जिसके चन्द्रमासे सातवें भौम हो तो वह अप्रियवादिनी दुष्टा स्त्रीवाला होता है ॥७॥
जिसके भौम चन्द्रमासे आठवें स्थित हो तो वह जीव मारनेवाला, बडा पापी और शील सत्पतासे रहित होता है ॥८॥
जिसके भौम चन्द्रमासे नवम स्थित हो तो उसके वृद्धअवस्थामें पुत्र होता है तथा धनवान् होता है ॥९॥
जिसके भौम चन्द्रमासे दशम हो तो उसके दरवाजेपर गज ( हाथी ) घोडा बँधे रहते हैं ॥१०॥
जिसके भौम चन्द्रमासे ग्यारहवें हो तो वह राजद्वारमें प्रसिद्ध, यश और रुप करके युक्त होता है ॥११॥
जिसके जन्मकालमें भौम चन्द्रमासे बारहवें स्थानमें स्थित हो तो माताको असुखकारी तथा सदा कष्ट देनेवाला होता है ॥१२॥
बुधभावाध्याय
जिसके जन्मसमयमें बुध चन्द्रमासे प्रथम स्थित हो तो वह सुख तथा रुप करके हीन, दुष्टवचन बोलनेवाला, बुद्धिहीन तथा नष्ट स्थानवाला होता है ॥१॥
जिसके बुध चन्द्रमासे दूसरे स्थित हो वह धनधान्य गृह बंधुसे युक्त, धनकी प्राप्ति करनेवाला तथा जूडी रोगसे विनाश होनेवाला होता है ॥२॥
जिसके जन्मसमयमें बुध चन्द्रमासे तीसरे हो वह धन संपदासे युक्त, राज्यकी प्राप्ति करनेवाला तथा महात्माओंके संगमवाला होता है ॥३॥
जिसके बुध चन्द्रमासे चतुर्थ हो वह सदा सुखी माताके पक्षसे लाभवाला होता है ॥४॥
चन्द्रमासे पंचम बुध जिसके हो वह बुद्धिमान् प्रवीण, रुपवान्, अधिक कामी, कुवचन बोलनेवाला होता है ॥५॥
जिसके बुध चन्द्रमासे छठे हो वह कृपण, भयानक, विवादमें बडा डरपोक, बहुरोमयुक्त और दीर्घनेत्रोंवाला होता है ॥६॥
जिसके बुध चन्द्रमासे सातवें हो वह स्त्रियोंके वश रहनेवाला, कृपण, धनवान् और ज्यादा उमरवाला होता है ॥७॥
जिसके बुध चन्द्रमासे अष्टम हो वह देहमें शीतवाला, राजमध्यमें प्रसिद्ध, शत्रुओंको भयंकर होता है ॥८॥
जिसके बुध चन्द्रमासे नवम स्थित हो वह अपने धर्मका विरोधी, अन्य धर्ममें लीन, विरोधी और दारुण ( दुष्ट ) होता है ॥९॥
जिसके बुध चन्द्रमासे दशम स्थित हो तो वह राजयोगी जानना और चन्द्रमा यदि दशमराशि ( भाव ) में स्थित हो तो कुंटुबमें नायक होता है ॥१०॥
जिसके बुध चन्द्रमासे लाभ भावमें हो वह पदपदमें लाभ करनेवाला होता है तथा ग्यारहवें वर्षमें विवाह हो जाता है ॥११॥
जिसके बुध चन्द्रमासे बारहवें हो वद सदा कृपण रहता है और उसके पुत्रकी जय नहीं, परंतु पराजय होती है ॥१२॥
इति बुधभावाध्यायः ॥
गुरुभावाध्याय
जिसके जन्मसमयमें बृहस्पति चन्द्रमासे प्रथम स्थित हो वह जीवयोग्य व्याधिरहित, शूर ( वीर ), धनवान् होता है ॥१॥
जिसके बृहस्पति चन्द्रमासे दूसरे हो वह राजासे मान पानेवाला, सौ वर्षकी उमरवाला, अधिक क्रूर प्रतापवाला, धर्मवान्, पापसे रहित होता है ॥२॥
जिसके बृहस्पति चन्द्रमासे तीसरे हो वह स्त्रियोंका प्यारा, पिताके घरसे सत्रह वर्षमें धनकी वृद्धिवाला होता है ॥३॥
जिसके बृहस्पति चन्द्रमासे चतुर्थ स्थित हो वह सुख करके हीन माताके पक्षमें बडा कष्टी, दूसरोंके घर काम करनेवाला होता है ॥४॥
जिसके बृहस्पति चन्द्रमासे पंचम स्थित हो वह दिव्यदृष्टिवाला, तेजवान्, पुत्रवती स्त्रीवाला, अत्यंतक्रूर और महाधनी होता है ॥५॥
जिसके बृहस्पति चन्द्रमासे छठे हो वह उदासी, गृहसे हीन, विदेशमें आयुको बितानेवाला, भिक्षासे भोजन करनेवाला होता है ॥६॥
जिसके बृहस्पति चन्द्रमासे सातवें स्थित हो वह अधिक उमरवाला, व्ययरहित, स्थूल ( मोटी ) देहवाला, नपुंसक, पाण्डुवाला और घरके मध्यमें नायक होता है ॥७॥
जिसके बृहस्पति चन्द्रमासे आठवें स्थित हो वह सदा देहरोगी, अच्छे पितावाला होनेपरभी महाक्लेशवाला, स्वप्नमें भी सुख न पानेवाला होता है ॥८॥
जिसके बृहस्पति चन्द्रमासे नवम स्थित हो वह धनवान्, धन करके युक्त, अच्छे मार्गमें चलनेवाला देवता गुरुका सेवक होता है ॥९॥
जिसके बृहस्पति चन्द्रमासे दशम हो वह पुत्र स्त्रीको त्याग करके तपस्वी होता है ॥१०॥
जिसके बृहस्पति चन्द्रमासे ग्यारहवें हो उसके पुत्र घोडेपर सवार होकर चलते हैं और राजाके समान वह मनुष्य होता है ॥११॥
जिसके बृहस्पति चन्द्रमासे बारहवे स्थित हो वह कुटुंबसे विरोध करनेवाला होता है तया लग्नसे छठे स्थानके स्वामीकी दशामें सुख होता है ॥१२॥
इति गुरुभावाध्यायः ॥
शुक्रभावाध्यायः
जिसके जन्मसमयमें शुक्र चन्द्रमासे प्रथम स्थित हो उसकी जलमें मृत्यु होती है सन्निपात हिंसा करके ॥१॥
जिसके शुक्र चन्द्रमासे दूसरे हो वह महाधनवान्, महाज्ञानवान्, राजाके समान निश्चय होता है ॥२॥
जिसके शुक्र चन्द्रमासे तीसरे हो वह धर्मवान्, बुद्धिमान, म्लेच्छसे लाभ होता है ॥३॥
जिसके शुक्र चन्द्रमासे चतुर्थ हो वह अधिक कफवाला, दुर्बल, वृद्धावस्थामें धन करके हीन होता है ॥४॥
जिसके शुक्र चन्द्रमासे पॉंचवें स्थित हो वह बहुत कन्याओंवाला, धन करके युक्त और यशसे वर्जित होता है ॥५॥
जिसके शुक्र चन्द्रमासे छठे स्थित हो वह दुष्ट हानिसे भय पानेवाला और युद्धमें पराजय पानेवाला होता है ॥६॥
जिसके शुक्र चन्द्रमासे सप्तम स्थित हो वह पुरुषार्थसे हीन, अप्रवीण, जगह जगहर्में शंकित होता है ॥७॥
जिसके शुक्र चन्द्रमासे अष्टम स्थित हो वह प्रसिद्ध, बडा योद्धा, दानी, भोगी, बडा धनी होता है ॥८॥
जिसके शुक्र चन्द्रमासे नवम स्थित हो वह बहुत भाइयों मित्रों तथा भगिनियोंवाला होता है ॥९॥
जिसके शुक्र चन्द्रमासे दशम हो वह माता पिताके सुख प्राप्तिवाला, बहुत जीवितवाला होता है ॥१०॥
जिसके शुक्र चन्द्रमासे ग्यारहवें हो वह बहुत उमरवाला, शत्रु और रोगकरके वर्जित होता है ॥११॥
जिसके शुक्र चन्द्रमासे बारहवें स्थित हो वह पराई स्त्रीमें रत रहनेवाला, लंपट और ज्ञानसे हीन होता है ॥१२॥
इति शुक्रभावाध्यायः ॥
शनिभावाध्याय
जिसके जन्मसमयमें शनि चन्द्रमासे प्रथम स्थित हो वह प्राणके नाशवाला, धनका नाश करनेवाला तथा बंधुओंके नाश करनेवाला होता है ॥१॥
जिसके शनि चन्द्रमासे दूसरे हो वह माताके कष्टवाला तथा बकरीके दूधसे जीवन प्राप्ति होनेवाला होता है ॥२॥
जिसके शनि चन्द्रमासे तीसरे हो उसके बहुत कन्या हो तथा पुत्र उत्पन्न होकर शीघ्र मरजावें ॥३॥
जिसके शनि चन्द्रमासे चतुर्थ हो वह बडा पौरुषी और शत्रुओंका मारनेवाला होता है ॥४॥
जिसके शनि चन्द्रमासे पंचम हो वह श्यामवर्ण अथवा प्रियवादिनी स्त्रीवाला होता है ॥५॥
जिसके शनि चन्द्रमासे षष्ठ स्थित हो वह अधिक क्लेशवाला, दुःखी, हीनआयुवाला होता है ॥६॥
जिसके शनि चन्द्रमासे सप्तम स्थित हो वह बडा धर्मवान्, दानी और बहुत स्त्रियोंका विवाह करनेवाला अर्थात् कई विवाह हो ऐसा होता है ॥७॥
जिसके शनि चन्द्रमासे अष्टम स्थित हो वह पिताका कष्टकारी और दानमें शुभ होता है ॥८॥
जिसके शनि चन्द्रमासे नवम होवे तो मुग्धदशामें धनकी हानि होती है ॥९॥
जिसके शनि चन्द्रमासे दशम स्थित हो वह राजाके समान, कृपण और धन करके युक्त होता है ॥१०॥
जिसके शनि ग्यारहवें हो वह देहका क्लेश पानेवाला. अधिक दुःखी और अधर्मी होता है ॥११॥
जिसके शनि चन्द्रमासे बारहवें हो वह निर्धनी, भिक्षुक और धर्मसे रहित होता है ॥१२॥
इति शनिभावाध्यायः ॥
राहुभावाध्याय
जिसके जन्मसमयमें राहु चन्द्रमासे प्रथम दशम, तृतीय, नवम इन स्थानोमें स्थित हो वह राजा होता है और वृद्धावस्थामें अधिक धनी होता है ॥१॥
जिसके राहु चन्द्रमासे चौथे, सातवें स्थित हो तो उसके माता पिता दुःखी और सदा सुखहीन मनुष्य होता है ॥३॥
जिसका राहु चन्द्रमासे दूसरे ग्यारहवें स्थित हो वह धन और मान करके हीन तथा स्वप्नमें भी सुख न पानेवाला होता है ॥४॥
जिसके राहु चन्द्रमासे पंचम स्थित होवे तो उसको जलसे मृत्यु कहे और पद पदमें आपदा भोगनेवाला होता है ॥५॥
इति राहुभावफलम् ॥
लग्नायु
दिक कहिये दश १०, काल छः ६, नख बीस २०, बाण पांच ५, इभ आठ ८, दृक् दो २, नख बीस २०, समय छः ६, दिशा दश १०, मनु चौदह १४, राम तीन ३, वेद चार ४, ये क्रमसे मेषादिद्वादशराशियोंके ध्रुवांक जानना, जन्मकुण्डलीमें सूर्यादिग्रह जिस २ राशिमें स्थित हों उन २ के ध्रुवांक एकत्र करनेसे स्पष्ट लग्नायु होती है ॥१॥

2… ग्रह बाधा के पूर्व संकेत
ग्रह अपना शुभाशुभ प्रभाव गोचर एवं दशा-अन्तर्दशा-प्रत्यन्तर्दशा में देते हैं । जिस ग्रह की दशा के प्रभाव में हम होते हैं, उसकी स्थिति के अनुसार शुभाशुभ फल हमें मिलता है । जब भी कोई ग्रह अपना शुभ या अशुभ फल प्रबल रुप में देने वाला होता है, तो वह कुछ संकेत पहले से ही देने लगता है । ऐसे ही कुछ पूर्व संकेतों का विवरण यहाँ दृष्टव्य है -
सूर्य के अशुभ होने के पूर्व संकेत -
> सूर्य अशुभ फल देने वाला हो, तो घर में रोशनी देने वाली वस्तुएँ नष्ट होंगी या प्रकाश का स्रोत बंद होगा । जैसे – जलते हुए बल्ब का फ्यूज होना, तांबे की वस्तु खोना ।
> किसी ऐसे स्थान पर स्थित रोशनदान का बन्द होना, जिससे सूर्योदय से दोपहर तक सूर्य का प्रकाश प्रवेश करता हो । ऐसे रोशनदान के बन्द होने के अनेक कारण हो सकते हैं । जैसे – अनजाने में उसमें कोई सामान भर देना या किसी पक्षी के घोंसला बना लेने के कारण उसका बन्द हो जाना आदि ।
> सूर्य के कारकत्व से जुड़े विषयों के बारे में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है । सूर्य जन्म-कुण्डली में जिस भाव में होता है, उस भाव से जुड़े फलों की हानि करता है । यदि सूर्य पंचमेश, नवमेश हो तो पुत्र एवं पिता को कष्ट देता है । सूर्य लग्नेश हो, तो जातक को सिरदर्द, ज्वर एवं पित्त रोगों से पीड़ा मिलती है । मान-प्रतिष्ठा की हानि का सामना करना पड़ता है ।
> किसी अधिकारी वर्ग से तनाव, राज्य-पक्ष से परेशानी ।
> यदि न्यायालय में विवाद चल रहा हो, तो प्रतिकूल परिणाम ।
> शरीर के जोड़ों में अकड़न तथा दर्द ।
> किसी कारण से फसल का सूख जाना ।
> व्यक्ति के मुँह में अक्सर थूक आने लगता है तथा उसे बार-बार थूकना पड़ता है ।
> सिर किसी वस्तु से टकरा जाता है ।
> तेज धूप में चलना या खड़े रहना पड़ता है ।
चन्द्र के अशुभ होने के पूर्व संकेत
> जातक की कोई चाँदी की अंगुठी या अन्य आभूषण खो जाता है या जातक मोती पहने हो, तो खो जाता है ।
> जातक के पास एकदम सफेद तथा सुन्दर वस्त्र हो वह अचानक फट जाता है या खो जाता है या उस पर कोई गहरा धब्बा लगने से उसकी शोभा चली जाती है ।
> व्यक्ति के घर में पानी की टंकी लीक होने लगती है या नल आदि जल स्रोत के खराब होने पर वहाँ से पानी व्यर्थ बहने लगता है । पानी का घड़ा अचानक टूट जाता है ।
> घर में कहीं न कहीं व्यर्थ जल एकत्रित हो जाता है तथा दुर्गन्ध देने लगता है ।
उक्त संकेतों से निम्नलिखित विषयों में अशुभ फल दे सकते हैं ->
> माता को शारीरिक कष्ट हो सकता है या अन्य किसी प्रकार से परेशानी का सामना करना पड़ सकता है ।
> नवजात कन्या संतान को किसी प्रकार से पीड़ा हो सकती है ।
> मानसिक रुप से जातक बहुत परेशानी का अनुभव करता है ।
> किसी महिला से वाद-विवाद हो सकता है ।
> जल से जुड़े रोग एवं कफ रोगों से पीड़ा हो सकती है । जैसे – जलोदर, जुकाम, खाँसी, नजला, हेजा आदि ।
> प्रेम-प्रसंग में भावनात्मक आघात लगता है ।
> समाज में अपयश का सामना करना पड़ता है । मन में बहुत अशान्ति होती है ।
> घर का पालतु पशु मर सकता है ।
> घर में सफेद रंग वाली खाने-पीने की वस्तुओं की कमी हो जाती है या उनका नुकसान होता है । जैसे – दूध का उफन जाना ।
> मानसिक रुप से असामान्य स्थिति हो जाती है ।
मंगल के अशुभ होने के पूर्व संकेत
> भूमि का कोई भाग या सम्पत्ति का कोई भाग टूट-फूट जाता है ।
> घर के किसी कोने में या स्थान में आग लग जाती है । यह छोटे स्तर पर ही होती है ।
> किसी लाल रंग की वस्तु या अन्य किसी प्रकार से मंगल के कारकत्त्व वाली वस्तु खो जाती है या नष्ट हो जाती है ।
> घर के किसी भाग का या ईंट का टूट जाना ।
> हवन की अग्नि का अचानक बन्द हो जाना ।
> अग्नि जलाने के अनेक प्रयास करने पर भी अग्नि का प्रज्वलित न होना या अचानक जलती हुई अग्नि का बन्द हो जाना ।
> वात-जन्य विकार अकारण ही शरीर में प्रकट होने लगना ।
> किसी प्रकार से छोटी-मोटी दुर्घटना हो सकती है ।
बुध के अशुभ होने के पूर्व संकेत
> व्यक्ति की विवेक शक्ति नष्ट हो जाती है अर्थात् वह अच्छे-बुरे का निर्णय करने में असमर्थ रहता है ।
> सूँघने की शक्ति कम हो जाती है ।
>काम-भावना कम हो जाती है । त्वचा के संक्रमण रोग उत्पन्न होते हैं । पुस्तकें, परीक्षा ले कारण धन का अपव्यय होता है । शिक्षा में शिथिलता आती है ।
गुरु के अशुभ होने के पूर्व संकेत
> अच्छे कार्य के बाद भी अपयश मिलता है ।
> किसी भी प्रकार का आभूषण खो जाता है ।
> व्यक्ति के द्वारा पूज्य व्यक्ति या धार्मिक क्रियाओं का अनजाने में ही अपमान हो जाता है या कोई धर्म ग्रन्थ नष्ट होता है ।
> सिर के बाल कम होने लगते हैं अर्थात् व्यक्ति गंजा होने लगता है ।
> दिया हुआ वचन पूरा नहीं होता है तथा असत्य बोलना पड़ता है ।
शुक्र के अशुभ होने के पूर्व संकेत
> किसी प्रकार के त्वचा सम्बन्धी रोग जैसे – दाद, खुजली आदि उत्पन्न होते हैं ।
> स्वप्नदोष, धातुक्षीणता आदि रोग प्रकट होने लगते हैं ।
> कामुक विचार हो जाते हैं ।
> किसी महिला से विवाद होता है ।
> हाथ या पैर का अंगुठा सुन्न या निष्क्रिय होने लगता है ।
शनि के अशुभ होने के पूर्व संकेत
> दिन में नींद सताने लगती है ।
> अकस्मात् ही किसी अपाहिज या अत्यन्त निर्धन और गन्दे व्यक्ति से वाद-विवाद हो जाता है ।
> मकान का कोई हिस्सा गिर जाता है ।
> लोहे से चोट आदि का आघात लगता है ।
> पालतू काला जानवर जैसे- काला कुत्ता, काली गाय, काली भैंस, काली बकरी या काला मुर्गा आदि मर जाता है ।
> निम्न-स्तरीय कार्य करने वाले व्यक्ति से झगड़ा या तनाव होता है ।
> व्यक्ति के हाथ से तेल फैल जाता है ।
> व्यक्ति के दाढ़ी-मूँछ एवं बाल बड़े हो जाते हैं ।
> कपड़ों पर कोई गन्दा पदार्थ गिरता है या धब्बा लगता है या साफ-सुथरे कपड़े पहनने की जगह गन्दे वस्त्र पहनने की स्थिति बनती है ।
> अँधेरे, गन्दे एवं घुटन भरी जगह में जाने का अवसर मिलता है ।
राहु के अशुभ होने के पूर्व संकेत ->
> मरा हुआ सर्प या छिपकली दिखाई देती है ।
> धुएँ में जाने या उससे गुजरने का अवसर मिलता है या व्यक्ति के पास ऐसे अनेक लोग एकत्रित हो जाते हैं, जो कि निरन्तर धूम्रपान करते हैं ।
> किसी नदी या पवित्र कुण्ड के समीप जाकर भी व्यक्ति स्नान नहीं करता ।
> पाला हुआ जानवर खो जाता है या मर जाता है ।
> याददाश्त कमजोर होने लगती है ।
> अकारण ही अनेक व्यक्ति आपके विरोध में खड़े होने लगते हैं ।
> हाथ के नाखुन विकृत होने लगते हैं ।
> मरे हुए पक्षी देखने को मिलते हैं ।
> बँधी हुई रस्सी टूट जाती है । मार्ग भटकने की स्थिति भी सामने आती है । व्यक्ति से कोई आवश्यक चीज खो जाती है ।
केतु के अशुभ होने के पूर्व संकेत
> मुँह से अनायास ही अपशब्द निकल जाते हैं ।
> कोई मरणासन्न या पागल कुत्ता दिखायी देता है ।
> घर में आकर कोई पक्षी प्राण-त्याग देता है ।
> अचानक अच्छी या बुरी खबरें सुनने को मिलती है ।
> हड्डियों से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है ।
> पैर का नाखून टूटता या खराब होने लगता है ।
> किसी स्थान पर गिरने एवं फिसलने की स्थिति बनती है ।
> भ्रम होने के कारण व्यक्ति से हास्यास्पद गलतियाँ होती हैं ।

3….आइये जाने धन प्राप्ति/शिक्षा/रोजगार के कुछ खास/महत्वपूर्ण करक योग—
इंजीनियरिंग शिक्षा के कुछ योग -
जन्म, नवांश या चन्द्रलग्न से मंगल चतुर्थ स्थान में हो या चतुर्थेश मंगल की राशि में स्थित हो।
मंगल की चर्तुथ भाव या चतुर्थेश पर दृष्टि हो अथवा चतुर्थेश के साथ युति हो।
मंगल और बुध का पारस्परिक परिवर्तन योग हो अर्थात मंगल बुध की राशि में हो अथवा बुध मंगल की राशि में हो।
चिकित्सक (डाक्टर )शिक्षा के कुछ योग -
जैमिनि सूत्र के अनुसार चिकित्सा से सम्बन्धित कार्यो में बुध और शुक्र का विशेष महत्व हैं। शुक्रन्दौ शुक्रदृष्टो रसवादी (1/2/86) – यदि कारकांश में चन्द्रमा हो और उस पर शुक्र की दृष्टि हो तो रसायनशास्त्र को जानने वाला होता हैं। बुध दृष्टे भिषक (1/2/87) – यदि कारकांश में चन्द्रमा हो और उस पर बुध की दृष्टि हो तो वैद्य होता हैं।
जातक परिजात (अ.15/44) के अनुसार यदि लग्न या चन्द्र से दशम स्थान का स्वामी सूर्य के नवांश में हो तो जातक औषध या दवा से धन कमाता हैं। (अ.15/58) के अनुसार यदि चन्द्रमा से दशम में शुक्र – शनि हो तो वैद्य होता हैं।
वृहज्जातक (अ.10/2) के अनुसार लग्न, चन्द्र और सूर्य से दशम स्थान का स्वामी जिस नवांश में हो उसका स्वामी सूर्य हो तो जातक को औषध से धनप्राप्ति होती हैं। उत्तर कालामृत (अ. 5 श्लो. 6 व 18) से भी इसकी पुष्टि होती हैं।
फलदीपिका (5/2) के अनुसार सूर्य औषधि या औषधि सम्बन्धी कार्यो से आजीविका का सूचक हैं। यदि दशम भाव में हो तो जातक लक्ष्मीवान, बुद्धिमान और यशस्वी होता हैं (8/4) ज्योतिष के आधुनिक ग्रन्थों में अधिकांश ने चिकित्सा को सूर्य के अधिकार क्षेत्र में माना हैं और अन्य ग्रहों के योग से चिकित्सा – शिक्षा अथवा व्यवसाय के ग्रहयोग इस प्रकार बतलाए हैं -
सूर्य एवं गुरू — फिजीशियन
सूर्य एवं बुध — परामर्श देने वाला फिजीशियन
सूर्य एवं मंगल — फिजीशियन
सूर्य एवं शुक्र एवं गुरू — मेटेर्निटी
सूर्य,शुक्र,मंगल, शनि—- वेनेरल
सूर्य एवं शनि —– हड्डी/दांत सम्बन्धी
सूर्य एवंशुक्र , बुध —- कान, नाक, गला
सूर्य एवं शुक्र $ राहु , यूरेनस —- एक्सरे
सूर्य एवं युरेनस —- शोध चिकित्सा
सूर्य एवं चन्द्र , बुध — उदर चिकित्सा, पाचनतन्त्र
सूर्य एवंचन्द्र , गुरू — हर्निया , एपेण्डिक्स
सूर्य एवं शनि (चतुर्थ कारक) — टी0 बी0, अस्थमा
सूर्य एवं शनि (पंचम कारक) —- फिजीशियन
न्यायाधीश बनने के कुछ योग – —
यदि जन्मकुण्डली के किसी भाव में बुध-गुरू अथवा राहु-बुध की युति हो।
यदि गुरू, शुक्र एवं धनेश तीनों अपने मूल त्रिकोण अथवा उच्च राशि में केन्द्रस्थ अथवा त्रिकोणस्थ हो तथा सूर्य मंगल द्वारा दृष्ट हो तो जातक न्यायशास्त्र का ज्ञाता होता हैं।
यदि गुरू पंचमेश अथवा स्वराशि का हो और शनि व बुध द्वारा दृष्ट हो।
यदि लग्न, द्वितीय, तृतीय, नवम्, एकादश अथवा केन्द्र में वृश्चिक अथवा मकर राशि का शनि हो अथवा नवम भाव पर गुरू-चन्द्र की परस्पर दृष्टि हो।
यदि शनि से सप्तम में गुरू हो।
यदि सूर्य आत्मकारक ग्रह के साथ राशि अथवा नवमांश में हो।
यदि सप्तमेश नवम भाव में हो तथा नवमेश सप्तम भाव में हो।
यदि तृतीयेश, षष्ठेश, गुरू तथा दशम भाव – ये चारों बलवान हो।
शिक्षक के कुछ योग -
यदि चन्द्रलग्न एवं जन्मलग्न से पंचमेश बुध, गुरू तथा शुक्र के साथ लग्न चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम अथवा दशम भाव में स्थित हो।
यदि चतुर्थेश चतुर्थ भाव में हो अथवा चतुर्थ भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो अथवा चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह स्थित हो।
यदि पंचमेश स्वगृही, मित्रगृही, उच्चराशिस्थ अथवा बली होकर चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम अथवा दशम भाव में स्थित हो और दशमेश का एकादशेश से सम्बन्ध हो।
यदि पंचम भाव में सूर्य-मंगल की युति हो अथवा राहु, शनि, शुक्र में से कोई ग्रह पंचम भाव में बैठा हो और उस पर पापग्रह की दृष्टि भी हो तो जातक अंग्रेजी भाषा का विद्वान अथवा अध्यापक होता हैं।
यदि पंचमेश बुध, शुक्र से युक्त अथवा दृष्ट हो अथवा पंचमेश जिस भाव में हो उस भाव के स्वामी पर शुभग्रह की दृष्टि हो अथवा उसके दोनों ओर शुभग्रह बैठें हो।
यदि बुध पंचम भाव में अपनी स्वराशि अथवा उच्चराशि में स्थित हो।
यदि द्वितीय भाव में गुरू या उच्चस्थ सूर्य, बुध अथवा शनि हो तो जातक विद्वान एवं सुवक्ता होता हैं।
यदि बृहस्पति ग्रह चन्द्र, बुध अथवा शुक्र के साथ शुभ स्थान में स्थित होकर पंचम एवं दशम भाव से सम्बन्धित हो।
सूर्य,चन्द्र और लग्न मिथुन,कन्या या धन राशि में हो व नवम तथा पंचम भाव शुभ व बली ग्रहों से युक्त हो ।
ज्योतिष शास्त्रीय ग्रन्थों में सरस्वती योग शारदा योग, कलानिधि योग, चामर योग, भास्कर योग, मत्स्य योग आदि विशिष्ट योगों का उल्लेख हैं। अगर जातक की कुण्डली में इनमे से कोई योग हो तो वह विद्वान अनेक शास्त्रों का ज्ञाता, यशस्वी एवं धनी होता है।

जानिए राशियों से जुड़े नौकरी और व्यवसाय
1-मेष: पुलिस अथवा सेना की नौकरी, इंजीनियंिरंग, फौजदारी का वकील, सर्जन, ड्राइविंग, घड़ी का कार्य, रेडियो व टी.वी. का निर्माण या मरम्मत, विद्युत का सामान, कम्प्यूटर, जौहरी, अग्नि सम्बन्धी कार्य, मेकेनिक, ईंटों का भट्टा, किसी फैक्ट्री में कार्य, भवन निर्माण सामग्री, धातु व खनिज सम्बन्धी कार्य, नाई, दर्जी, बेकरी का कार्य, फायरमेन, कारपेन्टर।
2-वृषभ: सौन्दर्य प्रसाधन, हीरा उद्योग, शेयर ब्रोकर, बैंक कर्मचारी, नर्सरी, खेती, संगीत, नाटक, फिल्म या टी.वी. कलाकार, पेन्टर, केमिस्ट, ड्रेस डिजाइनर, कृषि अथवा राजस्व विभाग की नौकरी, महिला विभाग, सेलटेक्स या आयकर विभाग की नौकरी, ब्याज से धन कमाने का कार्य, सजावट तथा विलासिता की वस्तुओं का निर्माण अथवा व्यापार, चित्रकारी, कशीदाकारी, कलात्मक वस्तुओं सम्बन्धी कार्य, फैशन, कीमती पत्थरों या धातु का व्यापार, होटल व बर्फ सम्बन्धी कारोबार।
3-मिथुन: पुस्तकालय अध्यक्ष, लेखाकार, इंजीनियर, टेलिफोन आपरेटर, सेल्समेन, आढ़तिया, शेयर ब्रोकर, दलाल, सम्पादक, संवाददाता, अध्यापक, दुकानदार, रोडवेज की नौकरी, ट्यूशन से जीविका कमाने वाला, उद्योगपति, सचिव, साईकिल की दुकान, अनुवादक, स्टेशनरी की दुकान, ज्योतिष, गणितज्ञ, लिपिक का कार्य, चार्टड एकाउन्टेंट, भाषा विशेषज्ञ, लेखक, पत्रकार, प्रतिलिपिक, विज्ञापन प्रबन्धन, प्रबन्धन (मेनेजमेन्ट) सम्बन्धी कार्य, दुभाषिया, बिक्री एजेन्ट।

4-कर्क: जड़ी-बूटिंयों का व्यापार, किराने का सामान, फलों के जड़ पौध सम्बन्धी कार्य, रेस्टोरेन्ट, चाय या काफी की दुकान, जल व कांच से सम्बन्धित कार्य, मधुशाला, लांड्री, नाविक, डेयरी फार्म, जीव विज्ञान, वनस्सपति विज्ञान, प्राणी विज्ञान आदि से सम्बन्धित कार्य, मधु के व्यवसाय, सुगन्धित पदार्थ व कलात्मक वस्तुओं से सम्बन्धित कार्य, सजावट की वस्तुएं, अगरबत्ती, फोटोग्राफी, अभिनय, पुरातत्व इतिहास, संग्रहालय, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता या सामाजिक संस्थाओं के कर्मचारी, अस्पताल की नौकरी, जहाज की नौकरी, मौसम विभाग, जल विभाग या जल सेना की नौकरी, जनरल मर्चेन्ट।
5-सिंह: पेट्रोलियम, भवन निर्माण, चिकित्सक, राजनेता, औषधि निर्माण एवं व्यापार, कृषि से उत्पादित वस्तुएं, स्टाक एक्सचेंज, कपड़ा, रूई, कागज, स्टेशनरी आदि से सम्बन्धित व्यवसाय, जमीन से प्राप्त पदार्थ, शासक, प्रसाशक, अधिकारी, वन अधिकारी, राजदूत, सेल्स मैनेजर, ऊन के गरम कपड़ों का व्यापार, फर्नीचर व लकड़ी का व्यापार, फल व मेवों का व्यापार, पायलेट, पेतृक व्यवसाय।
6-कन्या: अध्यापक, दुकान, सचिव, रेडियो या टी.वी. का उद्घोषक, ज्योतिष, डाक सेवा, लिपिक, बैकिंग, लेखा सम्बन्धी कार्य, स्वागतकर्ता, मैनेजर, बस ड्रायवर और संवाहक, जिल्दसाज, आशुलिपिक, अनुवादक, पुस्तकालय अध्यक्ष, कागज के व्यापारी, हस्तलेख और अंगुली के विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक, अन्वेषक, सम्पादक, परीक्षक, कर अधिकारी, सैल्स मेन, शोध कार्य पत्रकारिता आदि।
7-तुला: न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट, परामर्शदाता, फिल्म या टी.वी. से सम्बन्ध, फोटोग्राफर, फर्नीचर की दुकान, मूल्यवान वस्तुओं का विनिमय, धन का लेन-देन, नृत्य-संगीत या चित्रकला से सम्बन्धित कार्य, साज-सज्जा, अध्यापक, बैंक क्लर्क, एजेन्सी, दलाली, विलासिता की वस्तुएं, राजनेता, जन सम्पर्क अधिकारी, फैशन मॉडल, सामाजिक कार्यकर्ता, रेस्तरां का मालिक, चाय या काफी की दुकान, मूर्तिकार, कार्टूनिस्ट, पौशाक का डिजाइनर, मेकअप सहायक, केबरे प्रदर्शन।
8-वृश्चिक: केमिस्ट, चिकित्सक, वकील, इंजीनियर, भवन निर्माण, टेलीफोन व बिजली का सामान, रंग, सीमेन्ट, ज्योतिषी और तांत्रिक, जासूसी का काम करने वाला, दन्त चिकित्सक, मेकेनिक, ठेकेदार, जीवन बीमा एजेन्ट, रेल या ट्रक कर्मचारी, पुलिस और सेना के कर्मचारी, टेलिफोन आपरेटर, समुद्री खाद्यान्नों के व्यापारी, गोता लगाकर मोती निकालने का काम, होटय या रेस्टोरेन्ट, चोरी या डकैती, शराब की फैक्ट्री, वर्कशाप का कार्य, कल-पुर्जो की दुकान या फैैक्ट्री, लोहे या स्टील का कार्य, तम्बाकू या सिगरेट का कार्य, नाई, मिष्ठान की दुकान, फायर बिग्रेड की नौकरी।
9-धनु: बैंक की नौकरी, अध्यापन, किसी धार्मिक स्थान से सम्बन्ध, ऑडिट का कार्य, कम्पनी सेकेट्री, ठेकेदार, सट्टा व्यापार, प्रकाशक, विज्ञापन से सम्बन्धित कार्य, सेल्समेन, सम्पादक, शिक्षा विभाग में कार्य, लेखन, वकालात या कानून सम्बन्धी कार्य, उपदेशक, न्यायाधीश, धर्म-सुधारक, कमीशन ऐजेन्ट, आयात-निर्यात सम्बन्धी कार्य, प्रशासनाधिकारी, पशुओं से उत्पन्न वस्तुओं का व्यापार, चमड़े या जूते के व्यापारी, घोड़ों के प्रशिक्षक, ब्याज सम्बन्धी कार्य, स्टेशनरी विक्रेता।
10-मकर: नेवी की नौकरी, कस्टम विभाग का कार्य, बड़ा व्यापार या उच्च पदाधिकारी, समाजसेवी, चिकित्सक, नर्स, जेलर या जेल से सम्बन्धित कार्य, संगीतकार, ट्रेवल एजेन्ट, पेट्रोल पम्प, मछली का व्यापार, मेनेजमेन्ट, बीमा विभाग, ठेकेदारी, रेडिमेड वस्त्र, प्लास्टिक, खिलौना, बागवानी, खान सम्बन्धी कार्य, सचिव, कृषक, वन अधिकारी, शिल्पकार, फैक्ट्री या मिल कारीगर, सभी प्रकार के मजदूर।
11 -कुम्भ: शोध कार्य, शिक्षण कार्य, ज्योतिष, तांत्रिक, प्राकृतिक चिकित्सक, इंजीनियर या वैज्ञानिक, दार्शनिक, एक्स-रे कर्मचारी, चिकित्सकीय उपकरणों के विक्रेता, बिजली अथवा परमाणु शक्ति से सम्बन्धित कार्य, कम्प्यूटर, वायुयान, वैज्ञानिक, दूरदर्शन टैक्नोलोजी, कानूनी सलाहकार, मशीनरी सम्बन्धी कार्य, बीमा विभाग, ठेकेदार, लोहा, तांबा, कोयला व ईधन के विक्रेता, चौकीदार, शव पेटिका और मकबरा बनाने वाले, चमड़े की वस्तुओं का व्यापार।
12 -मीन: लेखन, सम्पादन, अध्यापन कार्य, लिपिक, दलाली, मछली का व्यापार, कमीशन एजेन्ट, आयात-निर्यात सम्बन्धी कार्य, खाद्य पदार्थ या मिष्ठान सम्बन्धी कार्य, पशुओं से उत्पन्न वस्तुओं का व्यापार, फिल्म निर्माण, सामाजिक कार्य, संग्रहालय या पुस्तकालय का कार्य, संगीतज्ञ, यात्रा एजेन्ट, पेट्रोल और तेल के व्यापारी, समुद्री उत्पादों के व्यापारी, मनोरंजन केन्द्रों के मालिक, चित्रकार या अभिनेता, चिकित्सक, सर्जन, नर्स, जेलर और जेल के कर्मचारी, ज्योतिषी, पार्षद, वकील, प्रकाशक, रोकड़िया, तम्बाकू और किराना का व्यापारी, साहित्यकार।………..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>