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1…दो पक्ष – कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष !
* तीन ऋण – देव ऋण, पित्र ऋण एवं ऋषि त्रण !
* चार युग – सतयुग, त्रेता युग, द्वापरयुग एवं कलयुग !
* चार धाम – द्वारिका, बद्रीनाथ, जगन्नाथ पूरी एवं रामेश्वरम धाम !
* चारपीठ – शारदा पीठ ( द्वारिका ), ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) एवं श्रन्गेरिपीठ !
* चर वेद- ऋग्वेद, अथर्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद !
* चार आश्रम – ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, बानप्रस्थ एवं संन्यास !
* चार अंतःकरण – मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार !
* पञ्च गव्य – गाय का घी, दूध, दही, गोमूत्र एवं गोबर , !
* पञ्च देव – गणेश, विष्णु, शिव, देवी और सूर्य !
* पंच तत्त्व – प्रथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश !
* छह दर्शन- वैशेषिक, न्याय, सांख्य, योग, पूर्व मिसांसा एवं दक्षिण मिसांसा !
* सप्त ऋषि – विश्वामित्र, जमदाग्नि, भरद्वाज, गौतम, अत्री, वशिष्ठ और कश्यप !
* सप्त पूरी – अयोध्या पूरी, मथुरा पूरी, माया पूरी ( हरिद्वार ), काशी, कांची (शिन कांची – विष्णु कांची), अवंतिका और द्वारिका पूरी !
* आठ योग – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधी !
* आठ लक्ष्मी – आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य, भोग एवं योग लक्ष्मी !
* नव दुर्गा – शैल पुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री !
* दस दिशाएं – पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, इशान, नेत्रत्य, वायव्य आग्नेय, आकाश एवं पाताल !
* मुख्या ग्यारह अवतार – मत्स्य, कच्छप, बराह, नरसिंह, बामन, परशुराम, श्रीराम, कृष्ण, बलराम, बुद्ध एवं कल्कि !
* बारह मास – चेत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, अषाड़, श्रावन, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फागुन !
* बारह राशी – मेष, ब्रषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, तुला, ब्रश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ एवं कन्या !
* बारह ज्योतिर्लिंग – सोमनाथ, मल्लिकर्जुना, महाकाल, ओमकालेश्वर, बैजनाथ, रामेश्वरम, विश्वनाथ, त्रियम्वाकेश्वर, केदारनाथ, घुष्नेश्वर, भीमाशंकर एवं नागेश्वर !
* पंद्रह तिथियाँ – प्रतिपदा, द्वतीय, तृतीय, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा , अमावश्या !
* स्म्रतियां – मनु, विष्णु, अत्री, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगीरा, यम, आपस्तम्ब, सर्वत, कात्यायन, ब्रहस्पति, पराशर, व्यास, शांख्य, लिखित, दक्ष, शातातप, वशिष्ठ..
2….व्यक्ति आम हो या खास, समस्या सबके पीछे रहती हैं। हम लोग छोटे-छोटे उपाय जानते हैं पर उनकी विधिवत जानकारी के अभाव में उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं। कोई इंसान अपनी किसी इच्छा की पूर्ति के लिए कोशिशें कर के हार जाता है तो फिर वह मंदिरों में जाकर मन्नतें मांगता है। इस तरह वह पैसों व समय दोनों का नुकसान उठाता है। फिर भी वह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि उसकी मनोकामना पूरी हो ही जाएगी। लेकिन तंत्र विज्ञान मे कुछ ऐसे टोटके हैं जिन्हे अपनाकर आप निश्चित ही अपनी सारी मनोकामनाओं को पूर्ण कर सकते हैं। इनकी जानकारी निम्न है-
* आँखों में यदि काला मोतिया हो जाए तो ताम्बे के पात्र में जल लेकर उसमें ताम्बे का सिक्का व गुड डालकर प्रतिदिन सूर्य को अर्ध्य दें। यह उपाय शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार से शुरू कर चौदह रविवार करें। अर्ध्य देते समय रोग से मुक्ति की प्रार्थना करते रहें। इसके अतिरिक्त पांच प्रकार के फल लाल कपडे में बांधकर किसी भी मन्दिर में दें। यह उपाय निष्ठापूर्वक करें, लाभ होगा।
* नौकरी न मिल रही हो तो मन्दिर में बारह फल चढ़ाएं। यह उपाय नियमित रूप से करें और इश्वर से नौकरी मिलने की प्रार्थना करें।
* विवाह योग्य वर या कन्या के शीघ्र विवाह के लिए घर के मन्दिर में नवग्रह यन्त्र स्थापित करें। जिनकी नई शादी हो, उन्हें घर बुलाएं, उनका सत्कार करें और लाल वस्त्र भेंट करें उन्हें भोजन या जलपान कराने के पश्चात सौंफ मिस्री जरूर दें। यह सब करते समय शीघ्र विवाह की कामना करें। यह उपाय शुक्ल पक्ष के मंगलवार को करें, लाभ होगा।
* व्यापार मंदा हो तथा पैसा टिकता न हो, तो नवग्रह यन्त्र और धन यन्त्र घर के मन्दिर में शुभ समय में स्थापित करें। इसके अतिरिक्त सोलह सोमवार तक पांच प्रकार की सब्जियां मन्दिर में दें और पंचमेवा की खीर भोलेनाथ को मन्दिर में अर्पित करें। सभी कामनाएं पूरी होंगी।
*बच्चे पढ़ते न हों तो उनकी स्टडी टेबल पर शुभ समय में सरस्वती यन्त्र व कुबेर यन्त्र स्थापित करें। उनके पढने के लिये बैठने से पहले यंत्रों के आगे शुभ घी का दीपक तथा गुलाब की अगरबत्ती जलाएं। पढ़ते समय उनका मुंह पूर्व की ओर होना चाहिय। यह उपाय करने के बच्चों का मन पढ़ाई में लगने लगेगा और पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद उन्हें मनोवांछित काम भी मिल जायेगा।
*समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति के लिये कबूतरों को चावल मिश्रित डालें, बाजरा शुक्रवार को खरीदें व शनिवार से डालना शुरू करें।
*शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार या बुधवार को चमकीले पीले वस्त्र में शुद्ध कस्तूरी लपेटकर अपने धन रखने के स्थान पर रखें, घर में सुख-समृद्धी आयेगी।
* यदि मार्ग में कोई सफाई कर्मचारी सफाई करता दिखाई दे तो उसे यह कहकर की चाय-पानी पी लेना या कुछ खा लेना, कुछ दान अवश्य दें, परिवार में प्यार व सुख-समृद्धी बढ़ेगी। यदि सफाई कर्मचारी महिला हो तो शुभ फल अधिक मिलेगा।
*किसी भी विशेष मनोरथ की पूर्ति के लिये शुक्ल पक्ष में जटावाला नारियल नए लाल सूती कपडे में बांधकर बहते जल में प्रवाहित करें। यह उपाय निष्ठापूर्वक करें।
* शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से नित्य प्रातः में अर्पित करें। फूल हनुमानजी को मन्दिर में अर्पित करें। फूल अर्पित करते समय हनुमान जी से मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करते रहें। ध्यान रहे यह उपाय करते समय कोई आपको टोके नहीं और टोके तो आप उसका उत्तर न दें।
* जन्म पत्रिका में 12वें भाव में मंगल हो और खर्च बहुत होता हो, तो बेलपत्र पर चन्दन से ‘भौमाय नमः’ लिखकर सोमवार को शिवलिंग पर चढ़ाएं, उक्त सारे कष्ट दूर हो जायेंगे।
* बड़ के पत्ते पर अपनी मनोकामना लिखकर जल में प्रवाहित करने से मनोरथ की पूर्ति होती है।
* नए सूती लाल कपड़े में जटावाला नारियल बांधकर बहते जल में प्रवाहित करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
* बहुधा देखा गया है कि प्राणी कहीं देर तक बैठा हो तो हाथ-पैर सुन्न हो जाते हैं। जो अंग सुन्न हो गया हो, उस पर उंगली से 27 का अंक लिख दीजिये, अंग ठीक हो जाएगा।
* काले तिल और जौ का आटा तेल में गूंथकर एक मोटी रोटी बनाएं और उसे अच्छी तरह सेंकें। गुड को तेल में मिश्रित करके जिस व्यक्ति की मरने की आशंका हो, उसके सिर पर से 7 बार उतार कर मंगलवार या शनिवार को भैंस को खिला दें।
* गुड के गुलगुले सवाएं लेकर 7 बार उतार कर मंगलवार या शनिवार व इतवार को चील-कौए को डाल दें, रोगी को तुरंत राहत मिलेगी।
* महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। द्रोव, शहद और तिल मिश्रित कर शिवजी को अर्पित करें। ‘ॐ नमः शिवाय’ षडाक्षर मंत्र का जप भी करें, लाभ होगा।
* श्रावण के महीने में 108 बिल्व पत्रों पर चन्दन से नमः शिवाय लिखकर इसी मंत्र का जप करते हुए शिवजी को अर्पित करें। 31 दिन तक यह प्रयोग करें, घर में सुख-शांति एवं सम्रद्धि आएगी, रोग, बाधा, मुकदमा आदि में लाभ एवं व्यापार में प्रगति होगी व नया रोजगार मिलेगा। यह एक अचूक प्रयोग है।
* भगवान् को भोग लगाई हुई थाली अंतिम आदमी के भोजन करने तक ठाकुरजी के सामने रखी रहे तो रसोई बीच में ख़त्म नहीं होती है।
* बालक को जन्म के नाम से मत पुकारें।
* पांच वर्ष तक बालक को कपडे मांगकर ही पहनाएं।
* 3 या 5 वर्ष तक सिर के बाल न कटाएं।
* उसके जन्मदिन पर बालकों को दूध पिलाएं।
* बच्चे को किसी की गोद में दे दें और यह कहकर प्रचार करें कि यह अमुक व्यक्ति का लड़का है।
* घर में सुख-शांति के लिये मंगलवार को चना और गुड बंदरों को खिलाएं। आठ वर्ष तक के बच्चों को मीठी गोलियां बाँटें। शनिवार को गरीब व भिखारियों को चना और गुड दें अथवा भोजन कराएं। मंगलवार व शनिवार को घर में सुन्दरकाण्ड का पाठ करें या कराएं।
* सूर्य के देवता विष्णु, चन्द्र के देवता शिव, बुध की देवी दुर्गा, ब्रहस्पति के देवता ब्रह्मा, शुक्र की देवी लक्ष्मी, शनि के देवता शिव, राहु के देवता सर्प और केतु के देवता गणेश। जब भी इन ग्रहों का प्रकोप हो तो इन देवताओं की उपासना करनी चाहिए।
* स्वस्थ शरीर के लिए एक रुपये का सिक्का लें। रात को उसे सिरहाने रख कर सो जाएं। प्रातः इसे ष्मशान की सीमा में फेंक आएं। शरीर स्वस्थ रहेगा।
* ससुराल में सुखी रहने के लिए साबुत हल्दी की गांठें, पीतल का एक टुकड़ा, थोड़ा सा गुड़ अगर कन्या अपने हाथ से ससुराल की तरफ फेंक दे, तो वह ससुराल में सुरक्षापूर्वक और सुखी रहती है। सुखी वैवाहिक जीवन के लिए कन्या का जब विवाह हो चुका हो और वह विदा हो रही हो, तो एक लोटे (गड़वी) में गंगा जल, थोड़ी सी हल्दी, एक पीला सिक्का डाल कर, लड़की के सिर के उपर से ७ बार वार कर उसके आगे फेंक दें। वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा। कन्या के घर से विदा होते समय एक लोटे में गंगाजल, थोड़ी सी हल्दी और एक पीला सिक्का डालकर उसके आगे फेंक दें, उसका वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा।
* परेशानियां दूर करने व कार्य सिद्धि हेतु शनिवार को प्रातः, अपने काम पर जाने से पहले, एक नींबू लें। उसके दो टुकड़े करें। एक टुकड़े को आगे की तरफ फेंके, दूसरे को पीछे की तरफ। इन्हें चौराहे पर फेंकना है। मुख भी दक्षिण की ओर हो। नींबू को फेंक कर घर वापिस आ जाएं, या काम पर चले जाएं। दिन भर काम बनते रहेंगे तथा परेषानियां भी दूर होंगी।
* काम या यात्रा पर जाते हुए, एक नारियल लें। उसको हाथ में ले कर, ११ बार श्री हनुमते नमः कह कर, धरती पर मार कर तोड़ दें। उसके जल को अपने ऊपर छिड़क लें और गरी को निकाल कर बांट दें तथा खुद भी खाएं, तो यात्रा सफल रहेगी तथा काम भी बन जाएगा।
* अगर आपको किसी विशेष काम से जाना है, तो नीले रंग का धागा ले कर घर से निकलें। घर से जो तीसरा खंभा पड़े, उस पर, अपना काम कह कर, नीले रंग का धागा बांध दें। काम होने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। हल्दी की ७ साबुत गांठें, ७ गुड़ की डलियां, एक रुपये का सिक्का किसी पीले कपड़े में बांध कर, रेलवे लाइन के पार फेंक दें। फेंकते समय कहें काम दे, तो काम होने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।
* धन के लिए एक हंडियां में सवा किलो हरी साबुत मूंग दाल या मूंगी, दूसरी में सवा किलो डलिया वाला नमक भर दें। यह दो हंडियां घर में कहीं रख दें। यह क्रिया बुधवार को करें। घर में धन आना शुरू हो जाएगा।
* मिर्गी के रोग को दूर करने के लिए अगर गधे के दाहिने पैर का नाखून अंगूठी में धारण करें, तो मिर्गी की बीमारी दूर हो जाती है।
* भूत-प्रेत और जादू-टोना से बचने के लिए मोर पंख को अगर ताबीज में भर के बच्चे के गले में डाल दें, तो उसे भूत-प्रेत और जादू-टोने की पीड़ा नहीं रहती।
* परीक्षा में सफलता हेतु गणेश रुद्राक्ष धारण करें। बुधवार को गणेश जी के मंदिर में जाकर दर्शन करें और मूंग के लड्डुओं का भोग लगाकर सफलता की प्रार्थना करें।
* पदोन्नति हेतु शुक्ल पक्ष के सोमवार को सिद्ध योग में तीन गोमती चक्र चांदी के तार में एक साथ बांधें और उन्हें हर समय अपने साथ रखें, पदोन्नति के साथ-साथ व्यवसाय में भी लाभ होगा।
* मुकदमे में विजय हेतु पांच गोमती चक्र जेब में रखकर कोर्ट में जाया करें, मुकदमे में निर्णय आपके पक्ष में होगा।
* पढ़ाई में एकाग्रता हेतु शुक्ल पक्ष के पहले रविवार को इमली के २२ पत्ते ले आएं और उनमें से ११ पत्ते सूर्य देव को ¬ सूर्याय नमः कहते हुए अर्पित करें। शेष ११ पत्तों को अपनी किताबों में रख लें, पढ़ाई में रुचि बढ़ेगी।
* कार्य में सफलता के लिए अमावस्या के दिन पीले कपड़े का त्रिकोना झंडा बना कर विष्णु भगवान के मंदिर के ऊपर लगवा दें, कार्य सिद्ध होगा।
* कारोबार में हानि हो रही हो अथवा ग्राहकों का आना कम हो गया हो, तो समझें कि किसी ने आपके कारोबार को बांध दिया है। इस बाधा से मुक्ति के लिए दुकान या कारखाने के पूजन स्थल में शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को अमृत सिद्ध या सिद्ध योग में श्री धनदा यंत्र स्थापित करें। फिर नियमित रूप से केवल धूप देकर उनके दर्शन करें, कारोबार में लाभ होने लगेगा।
* गृह कलह से मुक्ति हेतु परिवार में पैसे की वजह से कलह रहता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख में पांच कौड़ियां रखकर उसे चावल से भरी चांदी की कटोरी पर घर में स्थापित करें। यह प्रयोग शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार को या दीपावली के अवसर पर करें, लाभ अवश्य होगा।
* क्रोध पर नियंत्रण हेतु यदि घर के किसी व्यक्ति को बात-बात पर गुस्सा आता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख को साफ कर उसमें जल भरकर उसे पिला दें। यदि परिवार में पुरुष सदस्यों के कारण आपस में तनाव रहता हो, तो पूर्णिमा के दिन कदंब वृक्ष की सात अखंड पत्तों वाली डाली लाकर घर में रखें। अगली पूर्णिमा को पुरानी डाली कदंब वृक्ष के पास छोड़ आएं और नई डाली लाकर रखें। यह क्रिया इसी तरह करते रहें, तनाव कम होगा।
* मकान खाली कराने हेतु शनिवार की शाम को भोजपत्र पर लाल चंदन से किरायेदार का नाम लिखकर शहद में डुबो दें। संभव हो, तो यह क्रिया शनिश्चरी अमावस्या को करें। कुछ ही दिनों में किरायेदार घर खाली कर देगा। ध्यान रहे, यह क्रिया करते समय कोई टोके नहीं।
* बिक्री बढ़ाने हेतु ग्यारह गोमती चक्र और तीन लघु नारियलों की यथाविधि पूजा कर उन्हें पीले वस्त्र में बांधकर बुधवार या शुक्रवार को अपने दरवाजे पर लटकाएं तथा हर पूर्णिमा को धूप दीप जलाएं। यह क्रिया निष्ठापूर्वक नियमित रूप से करें, ग्राहकों की संख्या में वृद्धि होगी और बिक्री बढ़ेगी।
* शत्रु शमन के लिए साबुत उड़द की काली दाल के 38 और चावल के 40 दाने मिलाकर किसी गड्ढे में दबा दें और ऊपर से नीबू निचोड़ दें। नीबू निचोड़ते समय शत्रु का नाम लेते रहें, उसका शमन होगा और वह आपके विरुद्ध कोई कदम नहीं उठाएगा।
* ससुराल में सुखी रहने के लिए : कन्या अपने हाथ से हल्दी की 7 साबुत गांठें, पीतल का एक टुकड़ा और थोड़ा-सा गुड़ ससुराल की तरफ फेंके, ससुराल में सुरक्षित और सुखी रहेगी।
* घर में खुशहाली तथा दुकान की उन्नति हेतु घर या व्यापार स्थल के मुख्य द्वार के एक कोने को गंगाजल से धो लें और वहां स्वास्तिक की स्थापना करें और उस पर रोज चने की दाल और गुड़ रखकर उसकी पूजा करें। साथ ही उसे ध्यान रोज से देखें और जिस दिन वह खराब हो जाए उस दिन उस स्थान पर एकत्र सामग्री को जल में प्रवाहित कर दें। यह क्रिया शुक्ल पक्ष के बृहस्पतिवार को आरंभ कर ११ बृहस्पतिवार तक नियमित रूप से करें। फिर गणेश जी को सिंदूर लगाकर उनके सामने लड्डू रखें तथा ÷जय गणेश काटो कलेश’ कहकर उनकी प्रार्थना करें, घर में सुख शांति आ जागी।
* सफलता प्राप्ति के लिए प्रातः सोकर उठने के बाद नियमित रूप से अपनी हथेलियों को ध्यानपूर्वक देखें और तीन बार चूमें। ऐसा करने से हर कार्य में सफलता मिलती है। यह क्रिया शनिवार से शुरू करें।
* धन लाभ के लिए शनिवार की शाम को माह (उड़द) की दाल के दाने पर थोड़ी सी दही और सिंदूर डालकर पीपल के नीचे रख आएं। वापस आते समय पीछे मुड़कर नहीं देखें। यह क्रिया शनिवार को ही शुरू करें और 7 शनिवार को नियमित रूप से किया करें, धन की प्राप्ति होने लगेगी।
* संपत्ति में वृद्धि हेतु किसी भी बृहस्पतिवार को बाजार से जलकुंभी लाएं और उसे पीले कपड़े में बांधकर घर में कहीं लटका दें। लेकिन इसे बार-बार छूएं नहीं। एक सप्ताह के बाद इसे बदल कर नई कुंभी ऐसे ही बांध दें। इस तरह 7 बृहस्पतिवार करें। यह निच्च्ठापूर्वक करें, ईश्वर ने चाहा तो आपकी संपत्ति में वृद्धि होगी।
3…दूकान की बिक्री अधिक हो—-
१॰ “श्री शुक्ले महा-शुक्ले कमल-दल निवासे श्री महालक्ष्मी नमो नमः। लक्ष्मी माई, सत्त की सवाई। आओ, चेतो, करो भलाई। ना करो, तो सात समुद्रों की दुहाई। ऋद्धि-सिद्धि खावोगी, तो नौ नाथ चौरासी सिद्धों की दुहाई।”
विधि- घर से नहा-धोकर दुकान पर जाकर अगर-बत्ती जलाकर उसी से लक्ष्मी जी के चित्र की आरती करके, गद्दी पर बैठकर, १ माला उक्त मन्त्र की जपकर दुकान का लेन-देन प्रारम्भ करें। आशातीत लाभ होगा।
२॰ “भँवरवीर, तू चेला मेरा। खोल दुकान कहा कर मेरा।
उठे जो डण्डी बिके जो माल, भँवरवीर सोखे नहिं जाए।।”
विधि- १॰ किसीशुभ रविवार से उक्त मन्त्र की १० माला प्रतिदिन के नियम से दस दिनों में १०० माला जप कर लें। केवल रविवार के ही दिन इस मन्त्र का प्रयोग किया जाता है। प्रातः स्नान करके दुकान पर जाएँ। एक हाथ में थोड़े-से काले उड़द ले लें। फिर ११ बार मन्त्र पढ़कर, उन पर फूँक मारकर दुकान में चारों ओर बिखेर दें। सोमवार को प्रातः उन उड़दों को समेट कर किसी चौराहे पर, बिना किसी के टोके, डाल आएँ। इस प्रकार चार रविवार तक लगातार, बिना नागा किए, यह प्रयोग करें।
२॰ इसके साथ यन्त्र का भी निर्माण किया जाता है। इसे लाल स्याही अथवा लाल चन्दन से लिखना है। बीच में सम्बन्धित व्यक्ति का नाम लिखें। तिल्ली के तेल में बत्ती बनाकर दीपक जलाए। १०८ बार मन्त्र जपने तक यह दीपक जलता रहे। रविवार के दिन काले उड़द के दानों पर सिन्दूर लगाकर उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित करे। फिर उन्हें दूकान में बिखेर दें।….
4…बंधी दूकान कैसे खोलें ?
कभी-कभी देखने में आता है कि खूब चलती हुई दूकान भी एकदम से ठप्प हो जाती है । जहाँ पर ग्राहकों की भीड़ उमड़ती थी, वहाँ सन्नाटा पसरने लगता है । यदि किसी चलती हुई दुकान को कोई तांत्रिक बाँध दे, तो ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, अतः इससे बचने के लिए निम्नलिखित प्रयोग करने चाहिए -
१॰ दुकान में लोबान की धूप लगानी चाहिए ।
२॰ शनिवार के दिन दुकान के मुख्य द्वार पर बेदाग नींबू एवं सात हरी मिर्चें लटकानी चाहिए ।
३॰ नागदमन के पौधे की जड़ लाकर इसे दुकान के बाहर लगा देना चाहिए । इससे बँधी हुई दुकान खुल जाती है ।
४॰ दुकान के गल्ले में शुभ-मुहूर्त में श्री-फल लाल वस्त्र में लपेटकर रख देना चाहिए ।
५॰ प्रतिदिन संध्या के समय दुकान में माता लक्ष्मी के सामने शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करना चाहिए ।
६॰ दुकान अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान की दीवार पर शूकर-दंत इस प्रकार लगाना चाहिए कि वह दिखाई देता रहे ।
७॰ व्यापारिक प्रतिष्ठान तथा दुकान को नजर से बचाने के लिए काले-घोड़े की नाल को मुख्य द्वार की चौखट के ऊपर ठोकना चाहिए ।
८॰ दुकान में मोरपंख की झाडू लेकर निम्नलिखित मंत्र के द्वारा सभी दिशाओं में झाड़ू को घुमाकर वस्तुओं को साफ करना चाहिए । मंत्रः- “ॐ ह्रीं ह्रीं क्रीं”
९॰ शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी के सम्मुख मोगरे अथवा चमेली के पुष्प अर्पित करने चाहिए ।
१०॰ यदि आपके व्यावसायिक प्रतिष्ठान में चूहे आदि जानवरों के बिल हों, तो उन्हें बंद करवाकर बुधवार के दिन गणपति को प्रसाद चढ़ाना चाहिए ।
११॰ सोमवार के दिन अशोक वृक्ष के अखंडित पत्ते लाकर स्वच्छ जल से धोकर दुकान अथवा व्यापारिक प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर टांगना चाहिए । सूती धागे को पीसी हल्दी में रंगकर उसमें अशोक के पत्तों को बाँधकर लटकाना चाहिए ।
१२॰ यदि आपको यह शंका हो कि किसी व्यक्ति ने आपके व्यवसाय को बाँध दिया है या उसकी नजर आपकी दुकान को लग गई है, तो उस व्यक्ति का नाम काली स्याही से भोज-पत्र पर लिखकर पीपल वृक्ष के पास भूमि खोदकर दबा देना चाहिए तथा इस प्रयोग को करते समय किसी अन्य व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए । यदि पीपल वृक्ष निर्जन स्थान में हो, तो अधिक अनुकूलता रहेगी ।
१३॰ कच्चा सूत लेकर उसे शुद्ध केसर में रंगकर अपनी दुकान पर बाँध देना चाहिए ।
१४॰ हुदहुद पक्षी की कलंगी रविवार के दिन प्रातःकाल दुकान पर लाकर रखने से व्यवसाय को लगी नजर समाप्त होती है और व्यवसाय में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है ।
१५॰ कभी अचानक ही व्यवसाय में स्थिरता आ गई हो, तो निम्नलिखित मंत्र का प्रतिदिन ग्यारह माला जप करने से व्यवसाय में अपेक्षा के अनुरुप वृद्धि होती है । मंत्रः- “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नमो भगवती माहेश्वरी अन्नपूर्णा स्वाहा ।”
१६॰ यदि कोई शत्रु आपसी जलन या द्वेष, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के कारण आप पर तंत्र-मंत्र का कोई प्रयोग करके आपके व्यवसाय में बाधा डाल रहा हो, तो ईसे में नीचे लिखे सरल शाबर मंत्र का प्रयोग करके आप अपनी तथा अपने व्यवसाय की रक्षा कर सकते हैं । सर्वप्रथम इस मंत्र की दस माला जपकर हवन करें । मंत्र सिद्ध हो जाने पर रविवार या मंगलवार की रात इसका प्रयोग करें ।
मंत्रः- “उलटत वेद पलटत काया, जाओ बच्चा तुम्हें गुरु ने बुलाया, सत नाम आदेश गुरु का ।”
रविवार या मंगलवार की रात को 11 बजे के बाद घर से निकलकर चौराहे की ओर जाएँ, अपने साथ थोड़ी-सी शराब लेते जाएँ । मार्ग में सात कंकड़ उठाते जाएँ । चौराहे पर पहुँचकर एक कंकड़ पूर्व दिशा की ओर फेंकते हुए उपर्युक्त मंत्र पढ़ें, फिर एक दक्षिण, फिर क्रमशः पश्चिम, उत्तर, ऊपर, नीचे तथा सातवीं कंकड़ चौराहे के बीच रखकर उस शराब चढ़ा दें । यह सब करते समय निरन्तर उक्त मन्त्र का उच्चारण करते रहें । फिर पीछे पलट कर सीधे बिना किसी से बोले और बिना पीछे मुड़कर देखे अपने घर वापस आ जाएँ ।
घर पर पहले से द्वार के बाहर पानी रखे रहें । उसी पानी से हाथ-पैर धोकर कुछ जल अपने ऊपर छिड़क कर, तब अन्दर जाएँ । एक बात का अवश्य ध्यान रखें कि आते-जाते समय आपके घर का कोई सदस्य आपके सामने न पड़े और चौराहे से लौटते समय यदि आपको कोई बुलाए या कोई आवाज सुनाई दे, तब भी मुड़कर न देखें ।
१७॰ यदि आपके लाख प्रयत्नों के उपरान्त भी आपके सामान की बिक्री निरन्तर घटती जा रही हो, तो बिक्री में वृद्धि हेतु किसी भी मास के शुक्ल पक्ष के गुरुवार के दिन से निम्नलिखित क्रिया प्रारम्भ करनी चाहिए -
व्यापार स्थल अथवा दुकान के मुख्य द्वार के एक कोने को गंगाजल से धोकर स्वच्छ कर लें । इसके उपरान्त हल्दी से स्वस्तिक बनाकर उस पर चने की दाल और गुड़ थोड़ी मात्रा में रख दें । इसके बाद आप उस स्वस्तिक को बार-बार नहीं देखें । इस प्रकार प्रत्येक गुरुवार को यह क्रिया सम्पन्न करने से बिक्री में अवश्य ही वृद्धि होती है । इस प्रक्रिया को कम-से-कम 11 गुरुवार तक अवश्य करें ।
5….1. वाक् सिद्धि : जो भी वचन बोले जाए वे व्यवहार में पूर्ण हो, वह वचन कभी व्यर्थ न जाये, प्रत्येक
शब्द का महत्वपूर्ण अर्थ हो, वाक् सिद्धि युक्त व्यक्ति में श्राप अरु वरदान देने की क्षमता होती हैं!
2. दिव्य दृष्टि: दिव्यदृष्टि का तात्पर्य हैं कि जिस व्यक्ति के सम्बन्ध में भी चिन्तन किया जाये, उसका भूत, भविष्य और वर्तमान एकदम सामने आ जाये, आगे क्या कार्य करना हैं, कौन सी घटनाएं घटित होने वाली हैं, इसका ज्ञान होने पर व्यक्ति दिव्यदृष्टियुक्त महापुरुष बन जाता हैं!
3. प्रज्ञा सिद्धि : प्रज्ञा का तात्पर्य यह हें की मेधा अर्थात स्मरणशक्ति, बुद्धि, ज्ञान इत्यादि! ज्ञान के सम्बंधित सारे विषयों को जो अपनी बुद्धि में समेट लेता हें वह प्रज्ञावान कहलाता हें! जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से सम्बंधित ज्ञान के साथ-साथ भीतर एक चेतनापुंज जाग्रत रहता हें!
4. दूरश्रवण : इसका तात्पर्य यह हैं की भूतकाल में घटित कोई भी घटना, वार्तालाप को पुनः सुनने की क्षमता!
5. जलगमन : यह सिद्धि निश्चय ही महत्वपूर्ण हैं, इस सिद्धि को प्राप्त योगी जल, नदी, समुद्र पर इस तरह विचरण करता हैं मानों धरती पर गमन कर रहा हो!
6. वायुगमन : इसका तात्पर्य हैं अपने शरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर एक लोक से दूसरे लोक में गमन कर सकता हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान पर सहज तत्काल जा सकता हैं!
7. अदृश्यकरण : अपने स्थूलशरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर अपने आप को अदृश्य कर देना! जिससे स्वयं की इच्छा बिना दूसरा उसे देख ही नहीं पाता हैं!
8. विषोका : इसका तात्पर्य हैं कि अनेक रूपों में अपने आपको परिवर्तित कर लेना! एक स्थान पर अलग रूप हैं, दूसरे स्थान पर अलग रूप हैं!
9. देवक्रियानुदर्शन : इस क्रिया का पूर्ण ज्ञान होने पर विभिन्न देवताओं का साहचर्य प्राप्त कर सकता हैं! उन्हें पूर्ण रूप से अनुकूल बनाकर उचित सहयोग लिया जा सकता हैं!
10. कायाकल्प : कायाकल्प का तात्पर्य हैं शरीर परिवर्तन! समय के प्रभाव से देह जर्जर हो जाती हैं, लेकिन कायाकल्प कला से युक्त व्यक्ति सदैव तोग्मुक्त और यौवनवान ही बना रहता हैं!
11. सम्मोहन : सम्मोहन का तात्पर्य हैं कि सभी को अपने अनुकूल बनाने की क्रिया! इस कला को पूर्ण व्यक्ति मनुष्य तो क्या, पशु-पक्षी, प्रकृति को भी अपने अनुकूल बना लेता हैं!
12. गुरुत्व : गुरुत्व का तात्पर्य हैं गरिमावान! जिस व्यक्ति में गरिमा होती हैं, ज्ञान का भंडार होता हैं, और देने की क्षमता होती हैं, उसे गुरु कहा जाता हैं! और भगवन कृष्ण को तो जगद्गुरु कहा गया हैं!
13. पूर्ण पुरुषत्व : इसका तात्पर्य हैं अद्वितीय पराक्रम और निडर, एवं बलवान होना! श्रीकृष्ण में यह गुण बाल्यकाल से ही विद्यमान था! जिस के कारन से उन्होंने ब्रजभूमि में राक्षसों का संहार किया! तदनंतर कंस का संहार करते हुए पुरे जीवन शत्रुओं का संहार कर आर्यभूमि में पुनः धर्म की स्थापना की!
14. सर्वगुण संपन्न : जितने भी संसार में उदात्त गुण होते हैं, सभी कुछ उस व्यक्ति में समाहित होते हैं, जैसे – दया, दृढ़ता, प्रखरता, ओज, बल, तेजस्विता, इत्यादि! इन्हीं गुणों के कारण वह सारे विश्व में श्रेष्ठतम व अद्वितीय मन जाता हैं, और इसी प्रकार यह विशिष्ट कार्य करके संसार में लोकहित एवं जनकल्याण करता हैं!
15. इच्छा मृत्यु : इन कलाओं से पूर्ण व्यक्ति कालजयी होता हैं, काल का उस पर किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं रहता, वह जब चाहे अपने शरीर का त्याग कर नया शरीर धारण कर सकता हैं!
16. अनुर्मि : अनुर्मि का अर्थ हैं-जिस पर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी और भावना-दुर्भावना का कोई प्रभाव न हो!
यह समस्त संसार द्वंद्व धर्मों से आपूरित हैं, जितने भी यहाँ प्राणी हैं, वे सभी इन द्वंद्व धर्मों के वशीभूत हैं, किन्तु इस कला से पूर्ण व्यक्ति प्रकृति के इन बंधनों से ऊपर उठा हुआ होता हैं!
6…1. मूलाधार चक्र :
यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला यह ‘आधार चक्र’ है। 99.9%
लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।
मंत्र : लं
चक्र जगाने की विधि : मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है इसीलिए
भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्‍यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने
लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना।
प्रभाव : इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतर वीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है।
2. स्वाधिष्ठान चक्र-
यह वह चक्र है, जो लिंग मूल से चार अंगुल ऊपर स्थित है जिसकी छ: पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है तो आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।
मंत्र : वं
कैसे जाग्रत करें : जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है। फिल्म सच्ची नहीं होती लेकिन उससे जुड़कर आप जो अनुभव करते हैं वह आपके बेहोश जीवन जीने का प्रमाण है। नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते।
प्रभाव : इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश
होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हो तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी।
3. मणिपुर चक्र :
नाभि के मूल में स्थित रक्त वर्ण का यह चक्र शरीर के अंतर्गत मणिपुर नामक तीसरा चक्र है, जो दस
कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी
रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।
मंत्र : रं
कैसे जाग्रत करें : आपके कार्य को सकारात्मक आयाम देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।
प्रभाव : इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो
जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना
जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं।
आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं।
4. अनाहत चक्र-
हृदय स्थल में स्थित स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से
सुशोभित चक्र ही अनाहत चक्र है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है, तो आप एक सृजनशील
व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं। आप चित्रकार, कवि, कहानीकार,
इंजीनियर आदि हो सकते हैं।
मंत्र : यं
कैसे जाग्रत करें : हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर
रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और सुषुम्ना
इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है।
प्रभाव : इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार
समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है।
इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है।व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता हैं। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है।
5. विशुद्ध चक्र-
कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां विशुद्ध चक्र है और जो सोलह पंखुरियों वाला है। सामान्यतौर पर
यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है तो आप अति शक्तिशाली होंगे।
मंत्र : हं
कैसे जाग्रत करें : कंठ में संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।
प्रभाव : इसके जाग्रत होने कर सोलह कलाओं और सोलह विभूतियों का ज्ञान हो जाता है। इसके जाग्रत
होने से जहां भूख और प्यास को रोका जा सकता है वहीं मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है।
6. आज्ञाचक्र :
भ्रूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटी में) में आज्ञा चक्र है। सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां
ज्यादा सक्रिय है तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है
लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। इस बौद्धिक सिद्धि कहते हैं।
मंत्र : ऊं
कैसे जाग्रत करें : भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।
प्रभाव : यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से ये सभी
शक्तियां जाग पड़ती हैं और व्यक्ति एक सिद्धपुरुष बन जाता है।
7. सहस्रार चक्र :
सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम
का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को
संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।
कैसे जाग्रत करें :
मूलाधार से होते हुए ही सहस्रार तक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह चक्र जाग्रत
हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।
प्रभाव : शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही मोक्ष का द्वार है।
7….काली नजर से बचाएं ये साधारण उपाय…
तंत्र-मंत्र और टोने-टोटके से बचने के लिए आम
जीवन की रोजमर्रा की कुछ वस्तुओं को बेहद
महत्वपूर्ण माना जाता है। घर की खुशियों पर
अक्सर किसी की काली नजर लग जाती है और नतीजे
में कोई बीमार हो जाता है, किसी प्रकार
की हानि होती है। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं।
1) अपने घर या कार्यस्थल को बुरी नजर के
प्रभावों से बचाने के लिए घर के बाहर नींबू और
हरी मिर्ची को शनिवार या मंगलवार को एक धागे में
पिरोकर लटका देना चाहिए। इसे सूखने पर तुरंत बदल
दें।
2) घर में प्रेतबाधा होने पर बजरंग बली के मंदिर
जाकर नींबू-मिर्च को प्रतिमा के चरणों में रखकर
प्रतिमा के चरणों से थोड़ा सिंदूर लगा कर घर, दुकान
या कार्यस्थल पर लगा दें।
इससे प्रेतबाधा का निवारण होगा। नींबू और
हरी मिर्च लटकाने के पीछे एक कारण यह भी है
कि इससे नकारात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं कर
पाएंगी।
3) नवरात्रि में मां दुर्गा की कृपा के लिए विशेष
उपाय करना चाहिए। उपाय के अनुसार किसी माता के
मंदिर में या अपने घर पर
ही माताजी की मूर्ति या चित्र पर हरे नींबूओं
की माला पहनाएं।
इसके साथ ही मां को इत्र एवं पुष्प समर्पित करें।
इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें। इस उपाय से
देवी मां की कृपा प्राप्त होती है।
4) व्यापार-धंधे में आ रही परेशानियों को मिटाने के
लिए शनिवार के दिन एक हरे नींबू को दुकान
की चारों दीवारों पर स्पर्श कराएं।
इसके बाद नींबू को चार टुकड़ों में अच्छे से काट लें
और चारों दिशाओं में नींबू का एक-एक टुकड़ा फेंक दें।
5) अगर किसी प्रियजन को काली नजर लग जाए
तो घर का कोई बड़ा व्यक्ति पीड़ित के सिर से पैर
तक सात बार नींबू वार लें।
इसके बाद नींबू के चार टुकड़े करके किसी सुनसान
स्थान या किसी तिराहे पर फेंक आए। ध्यान रखें नींबू
के टुकड़े फेंकने के बाद पीछे न देखें।
8….नौ निधियां
हमारे ग्रंथो में नव निधियों के बारे काफी कुछ कहा गया है। पुरातन काल से यह माना जाता हैं की धन के बिना जीवन के किसी भी आयाम को सार्थक रूप देना सम्भव नही है। इसलिए धन यानि लक्ष्मी को धर्म के बाद दूसरा स्थान दिया गया है। हर व्यक्ति के थोड़ा सा निष्ठापूर्ण परिश्रम करने से, साधना करने से कुछ न कुछ निधियां उसे प्राप्त हो जाती हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को “श्री” संपन्न होना ही चाहिए जिसके लिए हर व्यक्ति प्रयत्नशील भी रहता है। तो क्या हैं ये नव निधियां।
नव निधियां-
पद्म निधि, महापद्म निधि, नील निधि, मुकुंद निधि, नन्द निधि, मकर निधि, कच्छप निधि, शंख निधि, खर्व निधि।
नौ निधियों में केवल खर्व निधि को छोड़कर शेष आठ निधियां पद्मिनी नामक विद्या के सिद्ध होने पर प्राप्त हो जाती हैं परन्तु इन्हे प्राप्त करना भी काफी दुष्कर है।
पद्म निधि-यह सात्विक प्रकार की होती है। जिसका उपयोग साधक के परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है।
महापद्म निधि-यह भी सात्विक प्रकार की निधि है। इसका प्रभाव सात पीढ़ियों के बाद नहीं रहता।
नील निधि-यह सत्व व राज गुण दोनों से मिश्रित होती है। जो व्यक्ति को केवल व्यापार हेतु ही प्राप्त होती है।
मुकुंद निधि-राजसी स्वभाव वाली निधि जिससे साधक का मन भोग इत्यादि में ही लगा रहता है। एक पीढ़ी बाद नष्ट हो जाती है।
नन्द निधि-यह रजो व तमो गुण वाली निधि होती है जो साधक को लम्बी आयु व निरंतर तरक्की प्रदान करती है।
मकर निधिं-यह तामसी निधि है जो साधक को अस्त्र-शास्त्र से सम्पन्नता प्रदान करती है परन्तु उसकी मौत भी इसी कारण होती है।
कच्छप निधि-इसका साधक अपनी सम्पति को छुपा के रखता है ना तो स्वयं उसका उपयोग करता है ना करने देता है।
शंख निधि-इस निधि को प्राप्त व्यक्ति स्वयं तो धन कमाता हैं परन्तु उसके परिवार वाले गरीबी में जीते हैं वह स्वयं पर ही अपनी सम्पति का उपयोग करता है।
खर्व निधि-इस निधि को प्राप्त व्यक्ति विकलांग व घमंडी होता हैं जो समय आने पर लूट के चल देता है।
सात्विक सिद्धियां प्राप्त होना मुश्किल है परन्तु किसी भी व्यक्ति के पास तामसिक निधियां आसानी से आ जा सकती है।
9….शंख को विजय,समृद्धि,सुख,यश,कीर्ति तथा लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। वैदिक अनुष्ठानों एवं तांत्रिक क्रियाओं में भी विभिन्न प्रकार के शंखों का प्रयोग किया जाता है। आरती,धार्मिक उत्सव,हवन-क्रिया,राज्याभिषेक,गृह-प्रवेश,वास्तु-शांति आदि शुभ अवसरों पर शंखध्वनि से लाभ मिलता है। पितृ-तर्पण में शंख की अहम भूमिका होती है
शंख निधि का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि इस मंगलचिह्न को घर के पूजास्थल में रखने से अरिष्टों एवं अनिष्टों का नाश होता है और सौभाग्य की वृद्धि होती है। भारतीय धर्मशास्त्रों में शंख का विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण स्थान है। मंदिरों एवं मांगलिक कार्यों में शंख-ध्वनि करने का प्रचलन है। मान्यता है कि इसका प्रादुर्भाव समुद्र-मंथन से हुआ था। समुद्र-मंथन से प्राप्त14रत्नों में शंख भी एक है। विष्णु पुराण के अनुसार माता लक्ष्मी समुद्रराज की पुत्री हैं तथा शंख उनका सहोदर भाई है। अत यह भी मान्यता है कि जहाँ शंख है,वहीं लक्ष्मी का वास होता है। स्वर्गलोक में अष्टसिद्धियों एवं नवनिधियों में शंख का महत्वपूर्ण स्थान है। भगवान विष्णु इसे अपने हाथों में धारण करते हैं।
धार्मिक कृत्यों में शंख का उपयोग किया जाता है। पूजा-आराधना,अनुष्ठान-साधना,आरती,महायज्ञ एवं तांत्रिक क्रियाओं के साथ शंख का वैज्ञानिक एवं आयुर्वेदिक महत्व भी है। प्राचीन काल से ही प्रत्येक घर में शंख की स्थापना की जाती है। शंख को देवता का प्रतीक मानकर पूजा जाता है एवं इसके माध्यम से अभीष्ट की प्राप्ति की जाती है। शंख की विशिष्ट पूजन पद्धति एवं साधना का विधान भी है। कुछ गुह्य साधनाओं में इसकी अनिवार्यता होती है। शंख कई प्रकार के होते हैं और सभी प्रकारों की विशेषता एवं पूजन-पद्धति भिन्न-भिन्न है। शंख साधक को उसकी इच्छित मनोकामना पूर्ण करने में सहायक होते हैं तथा जीवन को सुखमय बनाते हैं। उच्च श्रेणी के श्रेष्ठ शंख कैलाश मानसरोवर,मालद्वीप,लक्षद्वीप,कोरामंडल द्वीप समूह,श्रीलंका एवं भारत में पाये जाते हैं।
शंख की आकृति के आधार पर इसके प्रकार माने जाते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं – दक्षिणावृत्ति शंख,मध्यावृत्ति शंख तथा वामावृत्ति शंख। जो शंख दाहिने हाथ से पकड़ा जाता है,वह दक्षिणावृत्ति शंख कहलाता है। जिस शंख का मुँह बीच में खुलता है,वह मध्यावृत्ति शंख होता है तथा जो शंख बायें हाथ से पकड़ा जाता है,वह वामावृत्ति शंख कहलाता है। मध्यावृत्ति एवं दक्षिणावृति शंख सहज रूप से उपलब्ध नहीं होते हैं। इनकी दुर्लभता एवं चमत्कारिक गुणों के कारण ये अधिक मूल्यवान होते हैं। इनके अलावा लक्ष्मी शंख,गोमुखी शंख,कामधेनु शंख,विष्णु शंख,देव शंख,चक्र शंख,पौंड्र शंख,सुघोष शंख,गरुड़ शंख,मणिपुष्पक शंख,राक्षस शंख,शनि शंख,राहु शंख,केतु शंख,शेषनाग शंख,कच्छप शंख आदि प्रकार के होते हैं।
घर में पूजा-वेदी पर शंख की स्थापना की जाती है। निर्दोष एवं पवित्र शंख को दीपावली,होली,महाशिवरात्रि,नवरात्र,रवि-पुष्य,गुरु-पुष्य नक्षत्र आदि शुभ मुहूर्त में विशिष्ट कर्मकांड के साथ स्थापित किया जाता है। रुद्र,गणेश,भगवती,विष्णु भगवान आदि के अभिषेक के समान शंख का भी गंगाजल,दूध,घी,शहद,गुड़,पंचद्रव्य आदि से अभिषेक किया जाता है। इसका धूप,दीप,नैवेद्य से नित्य पूजन करना चाहिए और लाल वस्त्र के आसन में स्थापित करना चाहिए। शंखराज सबसे पहले वास्तु-दोष दूर करते हैं। मान्यता है कि शंख में कपिला (लाल) गाय का दूध भरकर भवन में छिड़काव करने से वास्तुदोष दूर होते हैं। परिवार के सदस्यों द्वारा आचमन करने से असाध्य रोग एवं दुःख-दुर्भाग्य दूर होते हैं। विष्णु शंख को दुकान,ऑफिस,फैक्टरी आदि में स्थापित करने पर वहाँ के वास्तु-दोष दूर होते हैं तथा व्यवसाय आदि में लाभ होता है।
शंख की स्थापना से घर में लक्ष्मी का वास होता है। स्वयं माता लक्ष्मी कहती हैं कि शंख उनका सहोदर भ्राता है। शंख,जहाँ पर होगा,वहाँ वे भी होंगी। देव प्रतिमा के चरणों में शंख रखा जाता है। पूजास्थली पर दक्षिणावृत्ति शंख की स्थापना करने एवं पूजा-आराधना करने से माता लक्ष्मी का चिरस्थायी वास होता है। इस शंख की स्थापना के लिए नर-मादा शंख का जोड़ा होना चाहिए। गणेश शंख में जल भरकर प्रतिदिन गर्भवती नारी को सेवन कराने से संतान गूंगेपन,बहरेपन एवं पीलिया आदि रोगों से मुक्त होती है। अन्नपूर्णा शंख की व्यापारी व सामान्य वर्ग द्वारा अन्नभंडार में स्थापना करने से अन्न,धन,लक्ष्मी,वैभव की उपलब्धि होती है। मणिपुष्पक एवं पांचजन्य शंख की स्थापना से भी वास्तु-दोषों का निराकरण होता है। शंख का तांत्रिक-साधना में भी उपयोग किया जाता है। इसके लिए लघु शंखमाला का प्रयोग करने से शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार शंख-ध्वनि से वातावरण का परिष्कार होता है। इसकी ध्वनि के प्रसार-क्षेत्र तक सभी कीटाणुओं का नाश हो जाता है। इस संदर्भ में अनेक प्रयोग-परीक्षण भी हुए हैं। आयुर्वेद के अनुसार शंखोदक भस्म से पेट की बीमारियाँ,पीलिया,यकृत,पथरी आदि रोग ठीक होते हैं। त्र+षि श्रृंग की मान्यता है कि छोटे-छोटे बच्चों के शरीर पर छोटे-छोटे शंख बाँधने तथा शंख में जल भरकर अभिमंत्रित करके पिलाने से वाणी-दोष नहीं रहता है। बच्चा स्वस्थ रहता है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि मूक एवं श्वास रोगी हमेशा शंख बजायें तो बोलने की शक्ति पा सकते हैं। हृदय रोगी के लिए यह रामबाण औषधि है। दूध का आचमन कर कामधेनु शंख को कान के पास लगाने से`ँ़’की ध्वनि का अनुभव किया जा सकता है। यह सभी मनोरथों को पूर्ण करता है।
वर्तमान समय में वास्तु-दोष के निवारण के लिए जिन चीजों का प्रयोग किया जाता है,उनमें से यदि शंख आदि का उपयोग किया जाए तो कई प्रकार के लाभ हो सकते हैं। यह न केवल वास्तु-दोषों को दूर करता है,बल्कि आरोग्य वृद्धि,आयुष्य प्राप्ति,लक्ष्मी प्राप्ति,पुत्र प्राप्ति,पितृ-दोष शांति,विवाह में विलंब जैसे अनेक दोषों का निराकरण एवं निवारण भी करता है। इसे पापनाशक बताया जाता है। अत शंख का विभिन्न प्रकार की कामनाओं के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
हिंदू मान्यता के अनुसार कोई भी पूजा,हवन,यज्ञ आदि शंख के उपयोग के बिना पूर्ण नहीं माना जाता है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार शंख बजाने से भूत-प्रेत,अज्ञान,रोग,दुराचार,पाप,दुषित विचार और गरीबी का नाश होता है। शंख बजाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। महाभारत काल में श्रीकृष्ण द्वारा कई बार अपना पंचजन्य शंख बजाया गया था।आधुनिक विज्ञान के अनुसार शंख बजाने से हमारे फेफड़ों का व्यायाम होता है,श्वास संबंधी रोगों से लडऩे की शक्ति मिलती है। पूजा के समय शंख में भरकर रखे गए जल को सभी पर छिड़का जाता है जिससे शंख के जल में कीटाणुओं को नष्ट करने की अद्भूत शक्ति होती है। साथ ही शंख में रखा पानी पीना स्वास्थ्य और हमारी हड्डियों,दांतों के लिए बहुत लाभदायक है। शंख में कैल्शियम,फास्फोरस और गंधक के गुण होते हैं जो उसमें रखे जल में आ जाते हैं।
भारतीय संस्कृति में शंख को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। माना जाता है कि समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में से एक शंख भी था। इसकी ध्वनि विजय का मार्ग प्रशस्त करती है।
शंख का महत्व धार्मिक दृष्टि से ही नहीं,वैज्ञानिक रूप से भी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके प्रभाव से सूर्य की हानिकारक किरणें बाधक होती हैं। इसलिए सुबह और शाम शंखध्वनिकरने का विधान सार्थक है। जाने-माने वैज्ञानिक डॉ. जगदीश चंद्र बसु के अनुसार,इसकी ध्वनि जहां तक जाती है,वहां तक व्याप्त बीमारियों के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। इससे पर्यावरण शुद्ध हो जाता है। शंख में गंधक,फास्फोरस और कैल्शियम जैसे उपयोगी पदार्थ मौजूद होते हैं। इससे इसमें मौजूद जल सुवासित और रोगाणु रहित हो जाता है। इसीलिए शास्त्रों में इसे महाऔषधिमानाजाता है।
शंख बजाने से दमा,अस्थमा,क्षय जैसे जटिल रोगों का प्रभाव काफी हद तक कम हो सकता है। इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि शंख बजाने से सांस की अच्छी एक्सरसाइज हो जाती है। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार,शंख में जल भरकर रखने और उस जल से पूजन सामग्री धोने और घर में छिडकने से वातावरण शुद्ध रहता है। तानसेनने अपने आरंभिक दौर में शंख बजाकर ही गायन शक्ति प्राप्त की थी। अथर्ववेदके चतुर्थ अध्याय में शंखमणिसूक्त में शंख की महत्ता वर्णित है।
भागवत पुराण के अनुसार,संदीपन ऋषि आश्रम में श्रीकृष्ण ने शिक्षा पूर्ण होने पर उनसे गुरु दक्षिणा लेने का आग्रह किया। तब ऋषि ने उनसे कहा कि समुद्र में डूबे मेरे पुत्र को ले आओ। कृष्ण ने समुद्र तट पर शंखासुरको मार गिराया। उसका खोल (शंख) शेष रह गया। माना जाता है कि उसी से शंख की उत्पत्ति हुई। पांचजन्य शंख वही था। शंख से शिवलिंग,कृष्ण या लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक करने पर देवता प्रसन्न होते हैं। शंख की ध्वनि से भक्तों को पूजा-अर्चना के समय की सूचना मिलती है। आरती के समापन के बाद इसकी ध्वनि से मन को शांति मिलती है। कल्याणकारी शंख दैनिक जीवन में दिनचर्या को कुछ समय के लिए विराम देकर मौन रूप से देव अर्चना के लिए प्रेरित करता है। यह भारतीय संस्कृति की धरोहर है। शंख की पूजा इस मंत्र के साथ की जाती है.
त्वं पुरा सागरोत्पन्न:विष्णुनाविघृत:करे देवैश्चपूजित: सर्वथैपाञ्चजन्यनमोऽस्तुते।
10…कामना सिद्धि हेतु कौन-सा वृक्ष लगाएं :
लक्ष्मी प्राप्ति के लिए : तुलसी, आंवला, केला, बिल्वपत्र का वृक्ष।
आरोग्य प्राप्ति के लिए : ब्राह्मी, पलाश, अर्जुन, आंवला, सूरजमुखी, तुलसी।
सौभाग्य प्राप्ति हेतु : अशोक, अर्जुन, नारियल, बड़ (वट) का वृक्ष।
संतान प्राप्ति हेतु : पीपल, नीम, बिल्व, नागकेशर, गु़ड़हल, अश्वगंधा।
मेधा वृद्धि प्राप्ति हेतु : आंकड़ा, शंखपुष्पी, पलाश, ब्राह्मी, तुलसी।
सुख प्राप्ति के लिए : नीम, कदम्ब, घने छायादार वृक्ष।
आनंद प्राप्ति के लिए : हरसिंगार (पारिजात) रातरानी, मोगरा, गुलाब।
11….ऋण मुक्ति के उपाय
1॰ चर लग्न मेष, कर्क, तुला व मकर में कर्ज लेने पर शीघ्र उतर जाता है। लेकिन, चर लग्न में कर्जा दें नहीं। चर लग्न में पांचवें व नवें स्थान में शुभ ग्रह व आठवें स्थान में कोई भी ग्रह नहीं हो, वरना ऋण पर ऋण चढ़ता चला जाएगा।
2॰ किसी भी महीने की कृष्णपक्ष की 1 तिथि, शुक्लपक्ष की 2, 3, 4, 6, 7, 8, 10, 11, 12, 13 पूर्णिमा व मंगलवार के दिन उधार दें और बुधवार को कर्ज लें।
3॰ हस्त नक्षत्र रविवार की संक्रांति के वृद्धि योग में कर्जा उतारने से मुक्ति मिलती है।
4॰ कर्ज मुक्ति के लिए ऋणमोचन मंगल स्तोत्र का पाठ करें एवं लिए हुए कर्ज की प्रथम किश्त मंगलवार से देना शुरू करें। इससे कर्ज शीघ्र उतर जाता है।
5॰ कर्ज लेने जाते समय घर से निकलते वक्त जो स्वर चल रहा हो, उस समय वही पांव बाहर निकालें तो कार्य सिद्धि होती है, परंतु कर्ज देते समय सूर्य स्वर को शुभकारी माना है।
6॰ लाल मसूर की दाल का दान दें।
7॰ वास्तु अनुसार ईशान कोण को स्वच्छ व साफ रखें।
8॰ वास्तुदोष नाशक हरे रंग के गणपति मुख्य द्वार पर आगे-पीछे लगाएं।
9॰ हनुमानजी के चरणों में मंगलवार व शनिवार के दिन तेल-सिंदूर चढ़ाएं और माथे पर सिंदूर का तिलक लगाएं। हनुमान चालीसा या बजरंगबाण का पाठ करें।
10॰ ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र का शुक्लपक्ष के बुधवार से नित्य पाठ करें।
11॰ बुधवार को सवा पाव मूंग उबालकर घी-शक्कर मिलाकर गाय को खिलाने से शीघ्र कर्ज से मुक्ति मिलती है
12॰ सरसों का तेल मिट्टी के दीये में भरकर, फिर मिट्टी के दीये का ढक्कन लगाकर किसी नदी या तालाब के किनारे शनिवार के दिन सूर्यास्त के समय जमीन में गाड़ देने से कर्ज मुक्त हो सकते हैं।
13॰ सिद्ध-कुंजिका-स्तोत्र का नित्य एकादश पाठ करें।
14॰ घर की चौखट पर अभिमंत्रित काले घोड़े की नाल शनिवार के दिन लगाएं।
15॰ श्मशान के कुएं का जल लाकर किसी पीपल के वृक्ष पर चढ़ाना चाहिए। यह कार्य नियमित रुप से ७ शनिवार को किया जाना चाहिए।
16॰ ५ गुलाब के फूल, १ चाँदी का पत्ता, थोडे से चावल, गुड़ लें। किसी सफेद कपड़े में २१ बार गायत्री मन्त्र का जप करते हुए बांध कर जल में प्रवाहित कर दें। ऐसा ७ सोमवार को करें।
17॰ ताम्रपत्र पर कर्जनाशक मंगल यंत्र (भौम यंत्र) अभिमंत्रित करके पूजा करें या सवा चार रत्ती का मूंगायुक्त कर्ज मुक्ति मंगल यंत्र अभिमंत्रित करके गले में धारण करें..
12…हम में से हर किसी को कभी न कभी बुरे सपने आते हैं। कारण क्या है? क्या आप जानते हैं कि लगभग ५ प्रतिषत लोगों को ऐसे सपने रोज दिखाई देते हैं? अन्य सपनों की भांति इन बुरे सपनों के कारण अचानक अत्यधिक पसीने का निकलना, गालों का लाल हो जाना, नाड़ी का तेजी से चलने लगना आदि शारीरिक लक्षण दिखाई देते हैं।
यह कहना कठिन है कि बुरे सपने – या फिर सपने – क्यों आते हैं। कारण कई हो सकते हैं। दूसरों के विचारों और मतों के प्रति संवेदनषील लोगों को ऐसे सपने ज्यादा दिखाई देते हैं। यदि कोई उनकी बुराई या आलोचना करे, तो वे विचलित हो उठते हैं और उनका यह विचलित होना बुरे सपने का एक कारण हो सकता है। गहरी नकारात्मक सोच या फिर दिन में मन में उठने वाले तरह-तरह के नकारात्मक विचार बुरे सपनों का कारण हो सकते हैं।
ये बुरे सपने लंबे होते हैं और अक्सर रात के पिछले पहर में दिखाई देते हैं। कोई बुरा सपना देखने पर व्यक्ति को अपनी जान का खतरा सताता है। बुरे सपने ज्यादातर बच्चों को आते हैं, बढ़ती उम्र के साथ इनका आना कम होता जाता है।
बुरे सपनों का ताल्लुक व्यक्ति की संवेगात्मक अवस्था से होता है। किसी व्यक्ति को उसके गंभीर मानसिक अवसाद तथा तनाव के दिनों में या फिर हाल में हुई किसी प्रियजन की मौत पर अक्सर ऐसे सपने दिखाई देते हैं। अगर सपने में आपको परीक्षा में असफलता दिखाई दे या आप स्वयं को किसी ऐसी विकट स्थिति में जकड़ा हुआ पाएं जिससे आप चाहकर भी निकल न पा रहे हों, तो इसका अर्थ है कि आप यथार्थ जीवन में संभवतः अवसाद के षिकार हों। अगर आप बीते दिनों हताशा से गुजरे हों, तो संभव है कि आपकी यह मानसिक अवस्था आपको सपने में दिखाई दे।
भारतीय ज्योतिष में सपनों की विशद व्याख्या की गई है। इस व्याख्या के अनुसार सपनों में विभिन्न वस्तुओं, पशु-पक्षियों आदि के किन अवस्थाओं में दिखाई देने का क्या अशुभ फल हो सकता है इसका संक्षिप्त विवरण यहां प्रस्तुत है।
प्रार्थना : यदि कोई व्यक्ति स्वप्न में यह देखे कि वह अकेला ही अपने इष्ट देव की प्रार्थना कर रहा है, तो यह समझना चाहिए कि उसकी सहायता के सभी दरवाजे बंद हो गए हैं। यदि कोई प्रार्थना से अलग रहने का स्वप्न देखे, तो उसके परिवार के किसी सदस्य को कष्ट प्राप्त होना संभव है।
चीता : स्वप्न में चीते का दिखाई देना व्यक्ति की सफलता के मार्ग में कठिनाइयों का सूचक होता है। स्वप्न में चीता व्यक्ति पर आक्रमण करता दिखाई दे, तो व्यक्ति की कठिनाइयां शीघ्र ही बढ़ जाती हैं। यदि स्वप्न में चीता किसी दूसरे व्यक्ति पर आक्रमण करता हुआ दिखाई दे, तो किसी गभीर दुर्घटना के कारण, बड़े संकट में पड़ता है।
ढोलक : यदि व्यक्ति किसी उत्सव में स्वयं को ढोल बजाता हुआ देखे, तो उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
मशीन : यदि किसी व्यापारी को स्वप्न में पंचिंग मशीन को छोड़ कर अन्य मशीनें दिखाई दें, तो व्यवसाय में असफलता मिलती है।
तितली : यदि कोई लड़की स्वप्न में किसी तितली को पकड़े किंतु वह तितली पकड़ से बाहर निकल जाए, तो उस लड़की का विवाह इच्छित लड़के से नहीं होता
दस्तावेज : यदि स्वप्न में कोई दस्तावेज, अथवा बांड पर हस्ताक्षर करे, तो उसे धन की हानि होती है।
आंखें : यदि स्वप्न में व्यक्ति को अपनी आंखें लाल दिखाई दें, तो उसे कोई रोग होता है।
बिल्ली : यदि स्वप्न में बिल्ली दिखाई दे, तो व्यक्ति के आचरण के विषय में खराब खबरें फैलती हैं, लोग उससे घृणा करते हैं। साथ ही उसके घर चोरी आदि होने के कारण उसे आर्थिक हानि भी होती है।
भोजन : यदि व्यक्ति स्वप्न में स्वयं को भोजन करता हुआ देखे, तो उसे कोई रोग होता है।
छिपकली : यदि व्यक्ति को स्वप्न में अपने शरीर पर छिपकली गिरती दिखाई दे, तो उसे कोई रोग हो सकता है। यदि कोई स्त्री अपने कपड़ों पर छिपकली गिरती हुई देखे, तो किसी कारणवश कुछ दिनों के लिए उसका पति से वियोग हो सकता है। यदि स्वप्न में २ छिपकलियां लड़ती हुई दिखाई दें, तो परिवार पर भारी विपत्ति आ सकती है।
चूहा : स्वप्न में चूहा दिखाई दे, तो व्यक्ति के अनेकानेक शत्रु हो सकते हैं। स्वप्न में चूहे का फंसना दिखाई देना व्यक्ति के शत्रुओं के षड्यंत्र के शिकार होने का सूचक है। यदि स्वप्न में बहुत से चूहे दिखाई दें, तो व्यक्ति को प्रत्येक क्षेत्र में असफलता मिलती है।
इस तरह सपने में उक्त वस्तुओं, पशु-पक्षियों आदि का उक्त अवस्थाओं में दिखाई देना अशुभ होता है।
बुरे सपनों से बचाव के लिए क्या करें?
स्नानादि कर क्क यो मे राजन्‌ मंत्र का जप करते हुए सूर्य भगवान की उपासना करें।
क्क अधः स्वप्नास्य मंत्र का जप, विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, गजेंद्र मोक्ष और पुरुष सूक्त का पाठ तथा शिव एवं शक्ति की उपासना नियमित रूप से करें।
सूर्योदय के पूर्व पूर्वाभिमुखी आसनस्थ होकर गायत्री मंत्र का १०८ बार जप करें।
शमी का पूजन करें।
उक्त ज्योतिषीय उपायों के अतिरिक्त निम्नलिखित उपाय भी करें।
जाग्रतावस्था में ज्यादा कल्पनाएं न करें। सोने से पहले समाचार देखने, या सुनने या फिर अखबार पढ़ने से बचें। उत्तेजक या माड़-धाड़ वाली फिल्मों अथवा हर उस चीज से बचें, जो आपको उत्तेजित करे।
इसके अतिरिक्त मन में सकारात्मक विचार को स्थान दें, नकारात्मक विचार दूर होंगे। सोने से पहले कोई धार्मिक ग्रंथ या सन्मार्ग पर ले जाने वाली कोई पुस्तक पढ़ें या फिर अपने प्रियजन पर ध्यान केंद्रित करें। अपनी महान स्मृतियों का स्मरण करें और कुछ देर के लिए उनमें खो जाएं। ध्यान रखें, सोने से पहले किसी समस्या पर विचार न करें, अन्यथा बुरे सपने आएंगे।
13…कुछ लक्षणों को देखते ही व्यक्ति के मन में आषंका उत्पन्न हो जाती है कि उसका कार्य पूर्ण नहीं होगा। कार्य की अपूर्णता को दर्षाने वाले ऐसे ही कुछ लक्षणों को हम अपषकुन मान लेते हैं।
अपशकुनों के बारे में हमारे यहां काफी कुछ लिखा गया है, और उधर पष्चिम में सिग्मंड फ्रॉयड समेत अनेक लेखकों-मनोवैज्ञानिकों ने भी काफी लिखा है। यहां पाठकों के लाभार्थ घरेलू उपयोग की कुछ वस्तुओं, विभिन्न जीव-जंतुओं, पक्षियों आदि से जुड़े कुछ अपषकुनों का विवरण प्रस्तुत है।
झाड़ू का अपषकुन
• नए घर में पुराना झाड़ू ले जाना अषुभ होता है।
• उलटा झाडू रखना अपषकुन माना जाता है।
• अंधेरा होने के बाद घर में झाड़ू लगाना अषुभ होता है। इससे घर में दरिद्रता आती है।
• झाड़ू पर पैर रखना अपषकुन माना जाता है। इसका अर्थ घर की लक्ष्मी को ठोकर मारना है।
• यदि कोई छोटा बच्चा अचानक झाड़+ू लगाने लगे तो अनचाहे मेहमान घर में आते हैं।
• किसी के बाहर जाते ही तुरंत झाड़ू लगाना अषुभ होता है।
दूध का अपषकुन
• दूध का बिखर जाना अषुभ होता है।
• बच्चों का दूध पीते ही घर से बाहर जाना अपषकुन माना जाता है।
• स्वप्न में दूध दिखाई देना अशुभ माना जाता है। इस स्वप्न से स्त्री संतानवती होती है।
पशुओं का अपषकुन
• किसी कार्य या यात्रा पर जाते समय कुत्ता बैठा हुआ हो और वह आप को देख कर चौंके, तो विन हो।
• किसी कार्य पर जाते समय घर से बाहर कुत्ता शरीर खुजलाता हुआ दिखाई दे तो कार्य में असफलता मिलेगी या बाधा उपस्थित होगी।
• यदि आपका पालतू कुत्ता आप के वाहन के भीतर बार-बार भौंके तो कोई अनहोनी घटना अथवा वाहन दुर्घटना हो सकती है।
• यदि कीचड़ से सना और कानों को फड़फड़ाता हुआ दिखाई दे तो यह संकट उत्पन्न होने का संकेत है।
• आपस में लड़ते हुए कुत्ते दिख जाएं तो व्यक्ति का किसी से झगड़ा हो सकता है।
• शाम के समय एक से अधिक कुत्ते पूर्व की ओर अभिमुख होकर क्रंदन करें तो उस नगर या गांव में भयंकर संकट उपस्थित होता है।
• कुत्ता मकान की दीवार खोदे तो चोर भय होता है।
• यदि कुत्ता घर के व्यक्ति से लिपटे अथवा अकारण भौंके तो बंधन का भय उत्पन्न करता है।
• चारपाई के ऊपर चढ़ कर अकारण भौंके तो चारपाई के स्वामी को बाधाओं तथा संकटों का सामना करना पड़ता है।
• कुत्ते का जलती हुई लकड़ी लेकर सामने आना मृत्यु भय अथवा भयानक कष्ट का सूचक है।
• पषुओं के बांधने के स्थान को खोदे तो पषु चोरी होने का योग बने।
• कहीं जाते समय कुत्ता श्मषान में अथवा पत्थर पर पेषाब करता दिखे तो यात्रा कष्टमय हो सकती है, इसलिए यात्रा रद्द कर देनी चाहिए। गृहस्वामी के यात्रा पर जाते समय यदि कुत्ता उससे लाड़ करे तो यात्रा अषुभ हो सकती है।
• बिल्ली दूध पी जाए तो अपषकुन होता है।
• यदि काली बिल्ली रास्ता काट जाए तो अपषकुन होता है। व्यक्ति का काम नहीं बनता, उसे कुछ कदम पीछे हटकर आगे बढ़ना चाहिए।
• यदि सोते समय अचानक बिल्ली शरीर पर गिर पड़े तो अपषकुन होता है।
• बिल्ली का रोना, लड़ना व छींकना भी अपषकुन है।
• जाते समय बिल्लियां आपस में लड़ाई करती मिलें तथा घुर-घुर शब्द कर रही हों तो यह किसी अपषकुन का संकेत है। जाते समय बिल्ली रास्ता काट दे तो यात्रा पर नहीं जाना चाहिए।
• गाएं अभक्ष्य भक्षण करें और अपने बछड़े को भी स्नेह करना बंद कर दें तो ऐसे घर में गर्भक्षय की आषंका रहती है। पैरों से भूमि खोदने वाली और दीन-हीन अथवा भयभीत दिखने वाली गाएं घर में भय की द्योतक होती हैं।
• गाय जाते समय पीछे बोलती सुनाई दे तो यात्रा में क्लेषकारी होती है।
• घोड़ा दायां पैर पसारता दिखे तो क्लेष होता है।
• ऊंट बाईं तरफ बोलता हो तो क्लेषकारी माना जाता है।
• हाथी बाएं पैर से धरती खोदता या अकेला खड़ा मिले तो उस तरफ यात्रा नहीं करनी चाहिए। ऐसे में यात्रा करने पर प्राण घातक हमला होने की संभावना रहती है।
• प्रातः काल बाईं तरफ यात्रा पर जाते समय कोई हिरण दिखे और वह माथा न हिलाए, मूत्र और मल करे अथवा छींके तो यात्रा नहीं करनी चाहिए।
• जाते समय पीठ पीछे या सामने गधा बोले तो बाहर न जाएं।
पक्षियों का अपषकुन
सारस बाईं तरफ मिले तो अषुभ फल की प्राप्ति होती है।
सूखे पेड़ या सूखे पहाड़ पर तोता बोलता नजर आए तो भय तथा सम्मुख बोलता दिखाई दे तो बंधन दोष होता है।
मैना सम्मुख बोले तो कलह और दाईं तरफ बोले तो अषुभ हो।
बत्तख जमीन पर बाईं तरफ बोलती हो तो अषुभ फल मिले।
बगुला भयभीत होकर उड़ता दिखाई दे तो यात्रा में भय उत्पन्न हो।
यात्रा के समय चिड़ियों का झुंड भयभीत होकर उड़ता दिखाई दे तो भय उत्पन्न हो।
घुग्घू बाईं तरफ बोलता हो तो भय उत्पन्न हो। अगर पीठ पीछे या पिछवाड़े बोलता हो तो भय और अधिक बोलता हो तो शत्रु ज्यादा होते हैं। धरती पर बोलता दिखाई दे तो स्त्री की और अगर तीन दिन तक किसी के घर के ऊपर बोलता दिखाई दे तो घर के किसी सदस्य की मृत्यु होती है।
कबूतर दाईं तरफ मिले तो भाई अथवा परिजनों को कष्ट होता है।
लड़ाई करता मोर दाईं तरफ शरीर पर आकर गिरे तो अषुभ माना जाता है।
लड़ाई करता मोर दाईं तरफ शरीर पर आकर गिरे तो अषुभ माना जाता है।
अपषकुनों से मुक्ति तथा बचाव
के उपाय
विभिन्न अपशकुनों से ग्रस्त लोगों को
निम्नलिखित उपाय करने चाहिए।
यदि काले पक्षी, कौवा, चमगादड़
आदि के अपषकुन से प्रभावित हों तो अपने इष्टदेव का ध्यान करें या अपनी राषि के अधिपति देवता के मंत्र का जप करें तथा धर्मस्थल पर तिल के तेल का दान करें।
अपषकुनों के दुष्प्रभाव से बचने के लिए धर्म स्थान पर प्रसाद चढ़ाकर बांट दें।
छींक के दुष्प्रभाव से बचने के लिए निम्नोक्त मंत्र का जप करें तथा चुटकी बजाएं।
क्क राम राम रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम जपेत्‌ तुल्यम्‌ राम नाम वरानने॥
अषुभ स्वप्न के दुष्प्रभाव को समाप्त करने के लिए महामद्यमृत्युंजय के निम्नलिखित मंत्र का जप करें।
ॐ ह्रौं जूं सःॐ  भूर्भुवः स्वः क्क त्रयम्बकम्‌ यजामहे सुगन्धिम्‌ पुच्च्िटवर्(नम्‌ उर्वारूकमिव बन्धनान्‌ मृत्योर्मुक्षीयमाऽमृतात ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं ह्रौं॥ॐ….

श्री विष्णु सहस्रनाम पाठ भी सभी अपषकुनों के प्रभाव को समाप्त करता है।
सर्प के कारण अषुभ स्थिति पैदा हो तो जय राजा जन्मेजय का जप २१ बार करें।
रात को निम्नोक्त मंत्र का ११ बार जप कर सोएं, सभी अनिष्टों से भुक्ति मिलेगी।
बंदे नव घनष्याम पीत कौषेय वाससम्‌।
सानन्दं सुंदरं शुद्धं श्री कृष्ण प्रकृते परम्‌॥
14…सप्ताह के सातों दिन में अलग-अलग देवताओं के पूजन का विधान बताया गया है जिनसे मनचाहे फल की प्राप्ति संभव है. शिवमहापुराण में इस संदर्भ में विस्तृत वर्णन मिलता है. उसके अनुसार-
* रविवार को सूर्य की पूजा करके ब्राह्मणों को भोजन कराएं. ऐसा करने से समस्त प्रकार के शारीरिक रोगों से मुक्ति मिलती है.
* सम्पत्ति प्राप्ति के लिए सोमवार को लक्ष्मी की पूजा करें तथा ब्राह्मणों को सपत्नीक घी से पका हुआ भोजन कराएं.
* मंगलवार को रोगों की शांति के लिए काली मां की पूजा करें तथा उड़द, मूंग एवं अरहर की दाल आदि अन्नों से युक्त भोजन ब्राह्मण को कराएं.
* बुधवार को दही युक्त अन्न से भगवान विष्णु का पूजन करें. ऐसा करने से पुत्र सुख मिलता है.
* जो दीर्घायु होने की इच्छा रखता है वह गुरुवार को वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा घी मिश्रित खीर से देवताओं का पूजन करें.
* समस्त प्रकार के भोगों की प्राप्ति के लिए शुक्रवार को एकाग्रचित्त होकर देवताओं का पूजन करें तथा यथासंभव ब्राह्मणों को अन्न दान करें.
* शनिवार अकाल मृत्यु का निवारण करने वाला है. इस दिन भगवान रुद्र की पूजा करें तथा तिल से होम कर व जरुरतमंदों को दान कर देवताओं को संतुष्ट करके ब्राह्मणों को तिलमिश्रित भोजन कराएं..
15….दिशा और देवता:
हर दिशा एक विशेष देव द्वारा संचालित होती है। यह देव हैं:
उत्तरी पूर्व- यह दिशा भगवान शिव द्वारा संचालित की जाती है।
पूर्व- इस दिशा में सूर्य भगवान का वास होता है।
दक्षिण पूर्व- इस दिशा में अग्नि का वास होता है।
दक्षिण- इस दिशा में यम का वास होता है।
दक्षिण पश्चिम- इस दिशा में पूर्वजों का वास होता है।
पश्चिम- वायु देवता का वास होता है।
उत्तर- धन के देवता का वास होता है।
केन्द्र- ब्रह्मांड के उत्पन्नकर्ता का वास होता है।
16….स्कंदपुराण के 18वें अध्याय में कार्तिक महात्म्य का वर्णन है। लिखा है, ‘आंवले की छाया में पिंडदान करने से पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। मुख, मस्तक या शरीर पर आंवला धारण करने से व्यक्ति विष्णु का प्रिय हो जाता है। यही नहीं आंवले के फल और पत्ती से भगवान विष्णु का पूजन करने वाले व्यक्ति को स्वर्ण मणि और मुक्ताओं के दान करने के
समान फल प्राप्त होता है।’ यहां तक भी लिखा है कि सूखे आंवले का भी अगर कोई आहार कर लेता है तो उसे नारायण की पदवी प्राप्त हो जाती है- ‘धात्री फल विलिप्तातांगो धात्री फल विभूषित:। धात्री फल कृताहारो नरो नारायणो भवेत।।’

17… प्राचीनकाल में ऋषि-मुनियों ने ऐसे पेड़-पौधों को लगाने की सलाह दी थी, जिनसे वास्तुदोष का निवारण हो साथ ही पर्यावरण संतुलन भी बना रहे।
तुलसी- तुलसी को जीवनदायिनी और लक्ष्मी स्वरूपा बताया गया है। इसे घर में लगाने से और इसकी पूजा अर्चना करने से महिलाओं के सारे दु:ख दूर होते हैं, साथ ही घर में सुख शांति बनी रहती है। इसे घर के अंदर लगाने से किसी भी प्रकार की अशुभ ऊर्जा नष्ट हो जाती है।
अश्वगंधा- इसके बारे में कहा गया है कि यह वास्तु दोष समाप्त करने की क्षमता रखता है और शुभता को बढ़ाकर जीवन को अधिक सक्रिय बनाता है।
आंवला- आंवले का वृक्ष घर की चहारदीवारी में पूर्व व उत्तर में लगाया जाना चाहिए, जिससे यह शुभ रहता है। साथ ही इसकी नित्य पूजा-अर्चना करने से भी सभी तरह के पापों का शमन होता है।
केला- घर की चहारदीवारी में केले का वृक्ष लगाना शुभ होता है। इसे भवन के ईशान कोण में लगाना चाहिए, क्योंकि यह बृहस्पति ग्रह का प्रतिनिधि वृक्ष है। केले के समीप यदि तुलसी का पेड़ भी लगा लें तो अधिक शुभकारी रहेगा।
शतावर- शतावर को एक बेल बताया गया है। इसे घर में लगाना शुभ फलदायी होता है। बशर्ते इसे घर में कुछ इस तरह लगाएं कि यह ऊपर की ओर चढ़े।
अनार- इससे वंश वृद्धि होती है। आग्नेय में अनार का पेड़ अति शुभ परिणाम देने वाला होता है।
बेल- भगवान शिव को बेल का वृक्ष अत्यंत प्रिय है, इसको लगाने से धन संपदा की देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।

18… गाय को घास खिलाने से कष्ट दूर होते हैं,
पंछियों को दाना डालने से रोजगार अच्छा चलता है,
कुत्तों को रोटी देने से दुश्मन दूर भागते है,
चींटियों को आहार देने से कर्जमुक्त रहते हैं,
मछलियों को आटा गोली चुगाने से समृधि आती

19… बचाव का तरीका : शनि के उपाय- सर्वप्रथम भैरवजी के मंदिर जाकर उनसे अपने पापों की क्षमा माँगे। जुआ, सट्टा, शराब, वैश्या से संपर्क, धर्म की बुराई, पिता-पूर्वजों का अपमान और ब्याज आदि कार्यों से दूर रहें। शरीर के सभी छिद्रों को प्रतिदिन अच्छे से साफ रखें। दाँत, बाल और नाखूनों की सफाई रखें।
कौवे को प्रतिदिन रोटी खिलाएँ। छायादान करें, अर्थात कटोरी में थोड़ा-सा सरसो का तेल लेकर अपना चेहरा देखकर शनि मंदिर में रख आएँ। अंधे, अपंगों, सेवकों और सफाईकर्मियों से अच्छा व्यवहार रखें। रात को सिरहाने पानी रखें और उसे सुबह कीकर, आँक या खजूर के वृक्ष पर चढ़ा आएँ।
राहु के उपाय- सिर पर चोटी रख सकते हैं, लेकिन किसी लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर। भोजन भोजनकक्ष में ही करें। ससुराल पक्ष से अच्छे संबंध रखें। रात को सिरहाने मूली रखें और उसे सुबह किसी मंदिर में दान कर दें।
केतु के उपाय- संतानें केतु हैं। इसलिए संतानों से संबंध अच्छे रखें। भगवान गणेश की आराधना करें। दोरंगी कुत्ते को रोटी खिलाएँ। कान छिदवाएँ। कुत्ता भी पाल सकते हैं, लेकिन किसी लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर।
20…ऐसे होगी हर मनोकामना पूरी
हर मनुष्य की कुछ मनोकामनाएं होती है। कुछ लोग इन मनोकामनाओं को बता देते हैं तो कुछ नहीं बताते। चाहते सभी हैं कि किसी भी तरह उनकी मनोकामना पूरी हो जाए। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। यदि आप चाहते हैं कि आपकी सोची हर मुराद पूरी हो जाए तो नीचे लिखे प्रयोग करें। इन टोटकों को करने से आपकी हर मनोकामना पूरी हो जाएगी।
टोटके
- सुबह बेल पत्र (बिल्ब) पर सफेद चंदन की बिंदी लगाकर मनोरथ बोलकर शिवलिंग पर अर्पित करें।
- बड़ के पत्ते पर मनोकामना लिखकर बहते जल में प्रवाहित करने से भी मनोरथ पूर्ति होती है। मनोकामना किसी भी भाषा में लिख सकते हैं।
- नए सूती लाल कपड़े में जटावाला नारियल बांधकर बहते जल में प्रवाहित करने से भी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
- तुलसी के पौधे को प्रतिदिन जल चढ़ाएं तथा गाय के घी का दीपक लगाएं।
- रविवार को पुष्य नक्षत्र में श्वेत आक की जड़ लाकर उससे श्रीगणेश की प्रतिमा बनाएं फिर उन्हें खीर का भोग लगाएं। लाल कनेर के फूल तथा चंदन आदि के उनकी पूजा करें। तत्पश्चात गणेशजी के बीज मंत्र (ऊँ गं) के अंत में नम: शब्द जोड़कर 108 बार जप करें।
- सुबह गौरी-शंकर रुद्राक्ष शिवजी के मंदिर में चढ़ाएं।

इन प्रयोगों को करने से आपकी सभी मनोकामनाएं शीघ्र ही पूरी हो जाएंगी।
21….अगर परिवार में कोई परिवार में कोई व्यक्ति बीमार है तथा लगातार औषधि सेवन के पश्चात् भी स्वास्थ्य लाभ नहीं हो रहा है, तो किसी भी रविवार से आरम्भ करके लगातार 3 दिन तक गेहूं के आटे का पेड़ा तथा एक लोटा पानी व्यक्ति के सिर के ऊपर से उबार कर जल को पौधे में डाल दें तथा पेड़ा गाय को खिला दें। अवश्य ही इन 3 दिनों के अन्दर व्यक्ति स्वस्थ महसूस करने लगेगा। अगर टोटके की अवधि में रोगी ठीक हो जाता है, तो भी प्रयोग को पूरा करना है, बीच में रोकना नहीं चाहिए। 16॰ अमावस्या को प्रात: मेंहदी का दीपक पानी मिला कर बनाएं। तेल का चौमुंहा दीपक बना कर 7 उड़द के दाने, कुछ सिन्दूर, 2 बूंद दही डाल कर 1 नींबू की दो फांकें शिवजी या भैरों जी के चित्र का पूजन कर, जला दें। महामृत्युजंय मंत्र की एक माला या बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ कर रोग-शोक दूर करने की भगवान से प्रार्थना कर, घर के दक्षिण की ओर दूर सूखे कुएं में नींबू सहित डाल दें। पीछे मुड़कर नहीं देखें। उस दिन एक ब्राह्मण -ब्राह्मणी को भोजन करा कर वस्त्रादि का दान भी कर दें। कुछ दिन तक पक्षियों, पशुओं और रोगियों की सेवा तथा दान-पुण्य भी करते रहें। इससे घर की बीमारी, भूत बाधा, मानसिक अशांति निश्चय ही दूर होती है। 17॰ किसी पुरानी मूर्ति के ऊपर घास उगी हो तो शनिवार को मूर्ति का पूजन करके, प्रात: उसे घर ले आएं। उसे छाया में सुखा लें। जिस कमरे में रोगी सोता हो, उसमें इस घास में कुछ धूप मिला कर किसी भगवान के चित्र के आगे अग्नि पर सांय, धूप की तरह जलाएं और मन्त्र विधि से ´´ ॐ माधवाय नम:। ॐ अनंताय नम:। ॐ अच्युताय नम:।´´ मन्त्र की एक माला का जाप करें। कुछ दिन में रोगी स्वस्थ हो जायेगा। दान-धर्म और दवा उपयोग अवश्य करें। इससे दवा का प्रभाव बढ़ जायेगा। 18॰ अगर बीमार व्यक्ति ज्यादा गम्भीर हो, तो जौ का 125 पाव (सवा पाव) आटा लें। उसमें साबुत काले तिल मिला कर रोटी बनाएं। अच्छी तरह सेंके, जिससे वे कच्ची न रहें। फिर उस पर थोड़ा सा तिल्ली का तेल और गुड़ डाल कर पेड़ा बनाएं और एक तरफ लगा दें। फिर उस रोटी को बीमार व्यक्ति के ऊपर से 7 बार वार कर किसी भैंसे को खिला दें। पीछे मुड़ कर न देखें और न कोई आवाज लगाए। भैंसा कहाँ मिलेगा, इसका पता पहले ही मालूम कर के रखें। भैंस को रोटी नहीं खिलानी है, केवल भैंसे को ही श्रेष्ठ रहती है। शनि और मंगलवार को ही यह कार्य करें। 19॰ पीपल के वृक्ष को प्रात: 12 बजे के पहले, जल में थोड़ा दूध मिला कर सींचें और शाम को तेल का दीपक और अगरबत्ती जलाएं। ऐसा किसी भी वार से शुरू करके 7 दिन तक करें। बीमार व्यक्ति को आराम मिलना प्रारम्भ हो जायेगा। 20॰ किसी कब्र या दरगाह पर सूर्यास्त के पश्चात् तेल का दीपक जलाएं। अगरबत्ती जलाएं और बताशे रखें, फिर वापस मुड़ कर न देखें। बीमार व्यक्ति शीघ्र अच्छा हो जायेगा। 21॰ किसी तालाब, कूप या समुद्र में जहां मछलियाँ हों, उनको शुक्रवार से शुक्रवार तक आटे की गोलियां, शक्कर मिला कर, चुगावें। प्रतिदिन लगभग 125 ग्राम गोलियां होनी चाहिए। रोगी ठीक होता चला जायेगा। 22॰ शुक्रवार रात को मुठ्ठी भर काले साबुत चने भिगोयें। शनिवार की शाम काले कपड़े में उन्हें बांधे तथा एक कील और एक काले कोयले का टुकड़ा रखें। इस पोटली को किसी तालाब या कुएं में फेंक दें। फेंकने से पहले रोगी के ऊपर से 7 बार वार दें। ऐसा 3 शनिवार करें। बीमार व्यक्ति शीघ्र अच्छा हो जायेगा।

22…अजपा जाप
जिसका उच्चारण नही किया जाता,अपितु जो स्वास और प्रतिस्वास के के गमन और आगमन से सम्पादित किया जाता है,(हं-स:) यह अजपा कहलाता है,इसके देवता अर्ध्नारीश्वर है.उद्यदभानुस्फ़ुरिततडिदाकारमर्द्धाम्बिकेशम,पाशाभीति वरदपरशुं संदधानं कराब्जै:,दिव्यार्कल्पैर्नवमणिमये: शोभितं विश्वमूल्म,सौमाग्यनेयम वपुरवतु नश्चन्द्रचूडं त्रिनेत्रम॥
उदित होते हुए सूर्य के समान तथा चमकती हुई बिजली के तुल्य जिनकी अंगशोभा है,जो चार भुजाओं में अभय मुद्रा,पाशु,वरदान मुद्रा,तथा परशु को धारण किये है,जो नूतम मणिमय दिव्य वस्तुओं से सुशोभित और विश्व के मूल कारण हैं,ऐसे अम्बिका के अर्ध भाग से युक्त चन्द्रचूड त्रिनेत्र शंकरजी का सौम्य और आग्नेय शरीर हमारी रक्षा करे.स्वाभाविक नि:श्वास-प्रश्वास रूप से जीव के जपने के लिये हंस-मंत्र इस प्रकार है:-अथ व्क्ष्ये महेशानि प्रत्यहं प्रजपेन्नर:,मोहबन्धं न जानति मोक्षतस्य न विद्यते ।श्रीगुरौ: कृपया देवि ज्ञायते जप्यते यदा,उच्छवासानि:श्वास्तया तदा बन्धक्षयो भवेत ।उच्छवासैरेव नि:श्वासैहंस इत्यक्षरद्वयम,तस्मात प्राणस्य हंसाख्य आत्माकारेण संस्थित:।नाभेरुच्छवासानि:श्वासाद ह्र्दयाग्रे व्यवस्थित:,षष्टिश्वासेर भवित प्राण: षट प्राणा: नाडिका गत: ।षष्टिनाड्या अहोतात्रम जपसंख्याक्रमो गत:,एक विंशति साहस्त्रं षटशताधिकमीश्वरि।जपते प्रत्यहं प्राणी सान्द्रानन्दमयीं पराम,उतपत्तिअर्जपमारम्भो मृत्युस्तत्र निवेदनम।बिना जपेन देवेशि,जपो भवति मन्त्रिण:,अजपेयं तत: प्रोक्ता भव पाश निकृन्तनी ।अर्थ:- हे पार्वती ! अब एक मन्त्र कहता हूँ,जिसका मनुष्य नित जप करे,इसका जप करने से मोह का बन्धन नही आता है,और मोक्ष की आवश्यकता नही पडती है,हे देवी ! श्री गुरु कृपा से जब ज्ञान हो जाता है,तथा जब श्वास प्रतिश्वास से मनुष्य जप करता है,उस समय बन्धन का नाश हो जाता है,श्वास लेने और छोडने में ही “हँ-स:” इन दो अक्षरों का उच्चारण होता है,इसीलिये प्राण को हँस कहते हैं,और वह आत्मा के रूप में नाभि स्थान से उच्छवास-निश्वास के रूप में उठता हुआ ह्रदय के अग्र भाग में स्थित रहता है,साठ श्वास का एक प्राण होता है,और छ: प्राण की एक नाडी होती है,साठ नाडियों का एक अहोरात्र होता है,यह जप संख्या का क्रम है,हे ! ईश्वरी इस प्रकार इक्कीस हजार छ: सौ श्वासों के रूप में आनन्द देने वाली पराशक्ति का प्राणी प्रतिदिन जाप करता है,जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त यह जप माना जाता है,हे ! देवी,मन्त्रज्ञ के बिना जप करने से भी श्वास के द्वारा जप हो जाता है,इसीलिये इसे अजपा कहते है,और यह भव (संसार) के पाश (कष्टों) को दूर करने वाला है.महाभारत मे कहा है:-”षटशतानि दिवा रात्रौ,सहस्त्राण्येकविंशति:,एतत्संख्यान्वितं मन्त्रं जीवौ जपति सर्वदा”.रात दिन इक्कीस हजार छ: सौ संख्या तक मन्त्र को प्रानी सदा जप करता है.सिद्ध साहित्य में अजपा की पर्याप्त चर्चा है,”गोरखपंथ” में भी एक दिन रात में आने जाने वाले २१६०० श्वास-प्रश्वासों को अजपा कहा गया है.”इक्कीस सहस षटसा आदू,पवन पुरिष जप माली,इला प्युन्गुला सुषमन नारी,अहिनिशि बसै प्रनाली”.गोरखपंथ का अनुसरण करते हुए श्वास को “ओहं” तथा प्रश्वास को “सोहं” बतलाया है,इन्ही का निरन्तर प्रवाह अजपाजप है,इसी को नि:अक्षर ध्यान भी कहा गया है,”निह अक्षर जाप तँह जापे,उठत धुन सुन्न से आवे”(गोररखवानी}
23….अनिष्ट शक्तिसे सम्बन्धित आध्यात्मिक उपाय
आजकल अधिकांश घरोंमें अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट है, फलस्वरूप घरमें कलह क्लेश रहना, नींद न आना, नींद अधिक आना, नींदमें भयानक स्वप्न आना, या डर जाना, शरीरमें वेदना रहना, गर्भपात होना, आर्थिक हानि होना, आदि कष्ट पाये गए हैं | यह सब वास्तुदोषके कारण हो सकते हैं |
वास्तु क्या है ? जिस स्थानपर भी चार दीवारें खड़ी हो जाएँ, उसे वास्तु कहते हैं और वहाँ जो शक्ति निर्मित हो जाती है, उसे वास्तु देवता कहते हैं |
आजकल ‘वास्तु’, यह शब्द एक फ़ैशन समान प्रचलित हो गया है और अनेक ढोंगी इस शास्त्रका आधार ले, लोगोंको दिशाहीनकर, उन्हें लूटते हैं | अतः सर्व-सामान्य व्यक्तिको इसके बारेमें शिक्षित करना और वास्तु शुद्धिके सरल उपाय बताना हम सबका कर्तव्य है |
सर्वप्रथम यह जान लें कि वास्तुके अनुसार अधिकतम ६% ही कष्ट हो सकते हैं और शेष कष्ट अन्य कारणोंसे होते हैं; परंतु वास्तुका शुद्ध एवं पवित्र रहना, हमारी साधना एवं सुखी जीवनके लिए आवश्यक एवं पूरक भी है | घर यदि सौ प्रतिशत वास्तुशास्त्र अनुसार भी बना हो, तो भी आपके जीवनमें कष्ट आएंगे ही | अतः वास्तु शुद्धिके प्रयत्नके साथ ही योग्य प्रकारसे साधना करना परम आवश्यक है | तो आइए वास्तु शुद्धिके कुछ सरल उपाय देख लें |
१. तुलसीके पौधे लगायें |
२. घर एवं आसपासके परिसरको स्वच्छ रखें |
३. घरमें नियमित गौ मूत्रका छिड़काव करें, देसी गायके गौ मूत्रमें अनिष्ट शक्तिको दूर करनेकी सर्वाधिक क्षमता होती है |
४. घरमें सप्ताहमें दो दिन कच्ची नीमपत्तीकी धुनी जलाएं |
५. घरमें कंडे या लकड़ीसे अग्नि प्रज्ज्वलितकर, धुना एवं गूगुल जलाएं और उसके धुएँको प्रत्येक कमरेमें थोड़ी देर दिखाएँ |
७. संतोंके भजन, स्त्रोत्र पठन या सात्त्विक नामजपकी ध्वनि चक्रिका, अर्थात सीडी चलायें | (हमारे पास वास्तु शुद्धि हेतु मंत्रजपकी सीडी उपलब्ध है |)
८. घरमें अधिकाधिक समय नामजप करें, नामजपसे निकलनेवाले स्पंदनसे घरकी शुद्धि होती है |
९. घरमें कलह-क्लेश टालें, वास्तु देवता “तथास्तु” कहते रहते हैं, अतः क्लेशसे क्लेश और बढ़ता है और धनका नाश होता है |
१०. सत्संग प्रवचनका आयोजन करें | अतिरिक्त स्थान घरमें हो तो धर्मकार्य हेतु या साप्ताहिक सत्संग हेतु वह स्थान किसी संत या धर्मकार्य हेतु अर्पण करें |
११. संतोंके चरण घरमें पड़नेसे घरकी वास्तु १०% तक शुद्ध हो जाती है | अतः संतोके आगमन हेतु अपनी भक्ति बढ़ाएं |
१२. प्रसन्न एवं संतुष्ट रहें | घरके सदस्योंके मात्र प्रसन्नचित्त रहनेसे घरकी ३०% शुद्धि हो जाती है |
१३. घरकी रंगाई और पुताई समय-समयपर कराते रहें | घरके पर्दे, दीवारें, चादरें काले, हरे, बैगनी रंगोंके न हों, यह ध्यानमें रखें |
१४. घरमें कृत्रिम और प्लास्टिकके फूलसे सजावट न करें |
१५. घरमें दूरदर्शन संचपर रज-तम प्रधान धारावाहिक, भुतहा फिल्में या धारावाहिक न देखें |
१६. फेंग-शुई, यह एक आसुरी पद्धति है | इससे घरकी शुद्धि नहीं, वरन काली शक्ति बढ़ती है | अतः इससे सम्बंधित सर्व सामग्रीका उपयोग पूर्णत: टालें |
१७. घरमें नैसर्गिक धूप और हवाके लिए प्रतिदिन द्वार और खिड़की खोलें, इससे घरकी शुद्धि होती है |
१८. घरमें पितरोंके चित्र दृष्टिके सामने न रखें |
१९. घरके किसी एक कोने या कमरेमें विशेषकर भण्डार-गृह (स्टोर रूम) में कबाड़ एकत्रित न रखें | वह एक प्रकारसे अनिष्ट शक्तियोंको घरमें रहने हेतु आमंत्रण देना है |
२०. घरके शौचालय और स्नानगृहको सदैव स्वच्छ रखें |
२१. घरके पूजाघरको शास्त्रानुसार रचनाकर, वहाँ प्रातःकाल एवं संध्या आरती करें | (इस बारेमें और अधिक जानकारी हम आगामी अंकों में देते रहेंगे )
२२. घरमें फिल्मी अभिनेता और अभिनेत्रियों एवं आजके राजनेता, क्रिकेट खिलाड़ी, इत्यादिके चित्र न लगाएँ, इससे भी रज-तम प्रधान स्पंदन घरमें निर्मित होते हैं |
२३. घरमें सात्त्विक पुष्प, जैसे गेंदा, जाई, जुई, राजनीगंधा, चंपा, चमेली जैसे पौधे लगाएँ |
२४. घरके सामने काँटेदार पौधे जैसे कैक्टस(cactus) इत्यादि न लगाएँ |
२५. घरके बाहर भयानक मुखौटे टाँगकर न रखें !
24….किस व्यक्ति को कौन-सा पौधा लगाना चाहिए।
प्रकृति का भी एस्ट्रो में अपना महत्व हैं। चाहे खान-पान हो या फूल और फल, हर वस्तु किसी न किसी तरह से ग्रहों से जुडी है और इस तरह हर मनुष्य प्रकृति की सेवा करके ग्रहों को सुधार सकता है। आइए हम जाने कि वृक्ष किस तरह ग्रहों से जुड़े हैं :-
कुल नौ ग्रह ऐसे हैं जिन्हें अलग-अलग राशि का स्वामित्व प्राप्त है। हम ग्रहों के आधार पर जानेंगे कि किस व्यक्ति को कौन-सा पौधा लगाना चाहिए।
यदि आपकी राशि सिंह है तो मुख्य ग्रह सूर्य है। अत: आपको मुख्य रूप से बेल का वृक्ष लगाना चाहिए और इसकी कमजोरी की स्थिति में बेल का फल दान करना चाहिए।
यदि आपकी राशि कर्क है तो आपका मुख्य ग्रह चन्द्रमा है। ऐसी स्थिति में शरीफा और रसभरी या खिरनी के पेड़-पौधे लगाना चाहिए व इन्ही फलों का दान करना चाहिए।
यदि आपकी राशि मेष या वृश्चिक है तो मुख्य ग्रह मंगल होगा। अत: आपको अनार का पेड़ लगाना चाहिए और इसकी कमजोरी की स्थिति में अनार को खाना और दान करना चाहिए।
यदि आपकी राशि कन्या या मिथुन है तो आपका मुख्य ग्रह बुध होगा। ऐसी स्थिति में संतरा, नींबू और मौसंबी के पेड़ लगाने चाहिए व इसकी कमजोरी की अवस्था में इन्ही फलों का दान करना चाहिए।
यदि आपकी राशि धनु या मीन है तो गुरु आपका मुख्य प्लेनेट है। ऐसे में केले का पेड़ लगाना, उसकी पूजा करना और केले का दान करना चाहिए। इसके अलावा बरगद का पेड़ भी लगा सकते है।
यदि आपकी राशि वृषभ या तुला है तो शुक्र आपका मुख्य ग्रह है। अत: आपके लिए नारियल का पेड़ लगाना अच्छा होगा। इसके अलावा आम और पपीते के पेड़ लगाने से भी लाभ होगा।
यदि आपकी राशि मकर या कुंभ है तो शनि आपका मुख्य ग्रह है। ऐसे में पीपल और नीम का पेड़ अवश्य लगाए। काले अंगूर की बेल लगाना, चीकू के पेड़ लगाना भी लाभ दे सकता है।
विशेष : यदि मुख्य ग्रह अच्छी स्थिति में है तो पेड़ लगाकर इनके फलों का सेवन करें। मगर ग्रह पाप प्रभाव में होने पर इन फलों का दान करें, खाएँ नहीं।
25…हर व्यक्ति यदि अपने लग्र के देवता की पूजा करें तो उनको अपने हर काम में सफलता मिलने लगेगी।
मेष लग्र- मेष लग्र में जन्म लेने वाले लोगों को रवि, मंगल, गुरु, ये ग्रह शुभ फल देते हैं। इसलिए इन लोगों को रवि और गणेश जी की आराधना करनी चाहिए।
वृषभ लग्र- इस लग्र वाले को शनि देव की उपासना करनी चाहिए।
मिथुन लग्र- लग्र पर जिनका जन्म होगा उनको शुक्र फल देता है। इसलिए वे कुल देवता की उपासना करें।
कर्क लग्र- कर्क लग्र वाले लोगों को गणेश जी और शंकर भगवान की उपासना करनी चाहिए।
सिंह लग्र- सिंह लग्र में वाले कुलदेवता का पूजन करें।
कन्या लग्र- कन्या लग्र वाले लोगों को शुक्र शुभफल देता है। इसलिए कुलदेवता की आराधना करें।
तुला लग्र- तुला लग्र वाले जातकों को ग्रहों की उपासना करनी चाहिए।
वृश्चिक लग्र- वृश्चिक लग्र वाले लोगों के लिए भी ग्रहों की पूजा शुभ फल देने वाली होती है।
धनु लग्र- इस लग्र पर जिनका जन्म होता है। उन्हे सूर्य और गणेश की आराधना करनी चाहिए।
मकर लग्र- मकर लग्र वाले जातकों को अपनी कुलदेवी और कुबेर की उपासना करनी चाहिए।
कुंभ लग्र- कुंभ लग्र वालों के लिए भी कुल देवी की ही आराधना शुभकारी होती है।
मीन लग्र- इस लग्र वाले शंकर और गणपति जी की भक्ति करें।
26….भगवान गणेश आदिदेव माने गए हैं. उनका पूजन करने से धन-धान्य बढ़ता है. ज्योतिषीय राशिनुसार भगवान गणेश का पूजन और आराधना करने से सभी प्रकार की समस्याएं जैसे रोग, आर्थिक समस्या, भय, नौकरी, व्यवसाय, मकान, वाहन, विवाह, संतान, प्रमोशन आदि संबंधित सभी समस्याओं का समाधान हो जाता है. राशि अनुसार आगे जानिए कि कैसे करें भगवान गणेश का पूजन-
मेष राशि : मेष राशि वालों को ‘वक्रतुण्ड’ रूप में गणेश जी की आराधना करनी चाहिए और ‘गं’ या ‘ॐ वक्रतुण्डाय हूं’ मंत्र की एक माला प्रतिदिन जप कर गुड़ का भोग लगाना चाहिए. इससे तुरंत ही जीवन में जो भी समस्या होगी उसका समाधान हो जाएगा… विशेष: मेष राशि के ईष्ट देव गणेश और हनुमानजी हैं. मंगलवार को हनुमानजी का प्रसाद चढ़ाएं और पूरा प्रसाद मंदिर में ही बांट दें.
वृषभ राशि: वृषभ राशि वालों को गणेशजी के ‘शक्ति विनायक’ रूप की आराधना करना चाहिए और उन्हें भी ‘गं’ या ‘ॐ हीं ग्रीं हीं’ मंत्र की एक माला प्रतिदिन जपकर घी में मिश्री मिलाकर भोग लगाएं. निश्चित ही उन्हें सभी तरह की समस्याओं का समाधान मिलेगा… विशेष : हनुमान या गणेश मंदिर में मंगलवार को शुद्ध घी का दोमुखी दिया लगाएं. आमदनी में दिक्कत हो तो केसर का टीका माथे पर लगाएं.
मिथुन राशि : मिथुन राशि वाले गणेशजी की आराधना ‘लक्ष्मी गणेश’ के रूप में करें. गणेशजी के लिए मूंग के लड्डू बनाएं और ‘श्रीगणेशाय नम: या ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र की प्रतिदिन एक माला जपें…. विशेष : गणेशजी को बुधवार के दिन मंदिर में लड्डू का भोग लगाए. गरीब व्यक्ति को काला कंबल दान दें, काम सुचारू चलेगा.
कर्क राशि : कर्क राशि वालों को ‘वक्रतुण्ड’ रूप में गणेशजी की पूजा करना चाहिए और उन्हें ‘ॐ वरदाय न:’ या ‘ॐ वक्रतुण्डाय हूं’ की एक माला प्रतिदिन जपना चाहिए. पूजन के दौरान गणेशजी को सफेद चंदन लगाकर सफेद फूल चढ़ाएं…. विशेष : प्रतिदिन रोज चंदन का टीका लगाएं और बुजुर्गों का सम्मान करें.
सिंह राशि : सिंह राशि वालों को ‘लक्ष्मी गणेश’ रूप में गणेशजी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए और उन्हें लाल पुष्प चढ़ाकर मोतीचूर के लड्डू का भोग लगाएं. ‘ॐ सुमंगलाये नम:’ मंत्र की एक माला का जाप करना चाहिए जिससे सभी तरह की समस्याओं का समाधान होगा…. विशेष : लाल रंग का रूमाल अपने पास रखें जिससे भाग्योदय होगा और मंदिर में जाकर गणेशजी को किशमिश चढ़ाएं.
कन्या राशि : कन्या राशि के जातकों को भी गणेशजी के ‘लक्ष्मी गणेश’ रूप का ध्यान करना चाहिए. पूजन के दौरान दुर्वा के 21 जोड़े अर्पित कर ‘ॐ चिंतामण्ये नम:’ मंत्र की एक माला प्रतिदिन जपना चाहिए. इससे उनके जीवन की सभी तरह की चिंताएं मिट जाएंगी…. विशेष : गणेशजी की प्रतिदिन पूजा करें. स्थायी सफलता के लिए तुलसी की माला पहनें और घर में कभी कुत्ता न पालें.
तुला राशि : तुला राशि वाले लोगों को ‘वक्रतुण्ड’ रूप में गणेशजी की पूजा करना चाहिए और पूजा के दौरान गणेशजी को 5 नारियल का भोग लगाएं. तत्पश्चात्य एक माला ‘ॐ वक्रतुण्डाय नम:’ मंत्र का जप करें. इससे उनकी जो भी समस्याएं होंगी वह भगवान गणेश जल्द ही दूर करेंगे…. विशेष : छोटे भाई-बहनों की मदद करें और गणेशजी के मंदिर में शुद्ध घी का दीया दिन में 11 बजे के पूर्व जिस किसी दिन मन करें लगाकर आएं.
वृश्चिक राशि : वृश्चिक राशि मंगल की राशि है अत: इस राशि वाले जातकों को ‘श्वेतार्क गणेश’ रूप की पूजा करनी चाहिए तथा पूजा में सिंदूर और लाल फूल अर्पित करना चाहिए. उस जातक के जीवन में किसी भी प्रकार का संकट नहीं रहेगा जो ‘ॐ नमो भगवते गजाननाय’ मंत्र की एक माला रोज जपेगा…. विशेष : केले के पेड़ की पूजा करें और जल चढ़ाएं. कभी भी नशा न करें.

धनु राशि : जिसकी भी राशि धनु है उन्हें प्रतिदिन ‘ॐ गं गणपते मंत्र’ का जप करना चाहिए. धनु राशि गुरु की राशि होती है अत: गणेशजी को पीले फूल चढ़ाकर बेसन के लड्डुओं का भोग लगाएं. ऐसा करने से जहां समस्याएं समाप्त होंगी वहीं मनोकामनाएं भी पूर्ण होगी. धनु राशि वालों को गणेशजी के ‘लक्ष्मी गणेश’ रूप की पूजा करनी चाहिए…. विशेष : शांति और समृद्धि के लिए घर में कचरा या गंदगी ना रहने दें. पीले वस्त्र के आसन पर गणेशजी को ईशान कोन में विराजमान कर उनके समक्ष गुरुवार को घी का शुद्ध दीपक लगाएं.
मकर राशि : जिस किसी की राशि मकर है वह प्रतिदिन ‘शक्ति विनायक’ गणेश की आराधना करें. पूजन के दौरान गणेशजी को पान, सुपारी, इलायची व लौंग अर्पित करें और ‘ॐ गं नम:’ मंत्र की एक माला रोज जपें…. विशेष : गुरुवार को गणेश, लक्ष्मी या विष्णु मंदिर में पीले फूल चढ़ाएं. लाल सांड को मीठी रोटी खिलाएं.
कुंभ राशि : कुंभ राशि वालों को भी ‘शक्ति विनायक’ गणेशजी की पूजा करना चहिए और ‘ॐ गण मुक्तये फट्‍ मंत्र की एक माला रोज जपना चाहिए. इससे सभी तरह के कष्टों का निवारण होगा…. कुंभ : ध्यान रखें कि आपके यहां से कोई भूखा न जाएं और भोजन में कभी भी ऊपर से नमक न डालें. मंगल, गुरु या रविवार का व्रत रखें.
मीन राशि : मीन राशि वाले जातक ‘हरिद्रा गणेश’ की पूजा करना चाहिए. ‘ॐ गं गणपतये नमः’ या ‘ॐ अंतरिक्षाय स्वाहा’ मंत्र की एक माला प्रतिदिन जपना चाहिए. पूजा के दौरान शहद और केसर का भोग लगाएं…. विशेष : गणेश मंदिर में प्याऊ के लिए पैसा दान करें. पीपल के पेड़ की जड़ में पानी डालें और कभी भी झूठ न बोलें.
27…..तुलसी भक्षण (खाने) के अद्भुत लाभ…
१. – गरुड़ पुराण में कहा गया है कि किसी के मुख मस्तक अथवा कर्णद्वय में तुलसी पत्र को देखकर यमराज अथवा उसके पापों को विदुरित कर देते है.
तुलसी भक्षण करने से चंद्रायण, तप्तकृच्छ, ब्रह्कुर्त्य व्रत, से भी अधिक देह शुद्ध होती है.
२. – स्कंध पुराण में कहा गया है – स्वयं श्री विष्णु स्वर्णमय अथवा पद्म राग मनिमय यहाँ तक कि रत्न खचित विविध शुभ पुष्प को परित्याग करके तुलसी पत्र ग्रहण करते है व्याध भी यदि तुलसी पत्र भक्षण करके देह त्याग करता है तो उसके देह्स्थ पाप भस्मीभूत हो जाते है.
जिस प्रकार शुक्ल और कृष्ण वर्ण जल अर्थात गंगा और यमुना का जल पातक को विनष्ट करता है उसी प्रकार रामा और श्यामा तुलसी पत्र भक्षण से सर्वभिलाषा सिद्ध होती है .
३. – जैसे अग्नि समस्त वन को जला देती है उसी प्रकार तुलसी भक्षण समस्त पापों को जला देता है.
अमृत से आवला और तुलसी श्री हरि की वल्लभा है इन दोनो के स्मरण कीर्तन ध्यान और भक्षण करने से समस्त कामनाये पूर्ण होती है
४. – मृत्यु काल के समय मुख मस्तक और शरीर में आमलकी की फल और तुलसी पत्र विघमान हो तो कभी भी उसकी दुर्गति नहीं हो सकती.
यदि कोई मानव पाप लिप्त होता है और कभी पुण्य अर्जन नहीं किया तो वह भी तुलसी भक्षण करके मुक्त हो जाता है.
स्वयं भगवान ने कहा है कि शरीर त्याग करने से पूर्व यदि मुख में तुलसी पत्र डाल दिया जाये तो वह मेरे लोक में जाता है.
५. – ऐसा भी वर्णन आता है कि द्वादशी तिथि में उपवास करने पर दिन में पारण करते समय तुलसी पत्र भक्षण करने से अष्ट अश्वमेघ यज्ञानुष्ठान का फल मिल जाता है..
28….श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय
1. अर्जुनविषादयोग 2. सांख्ययोग 3. कर्मयोग
4. ज्ञानकर्मसंन्यासयोग 5. कर्मसंन्यासयोग 6. आत्मसंयमयोग
7. ज्ञानविज्ञानयोग 8. अक्षरब्रह्मयोग 9. राजविद्याराजगुह्ययोग
10. विभूतियोग 11. विश्वरूपदर्शनयोग 12. भक्तियोग
13. क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग 14. गुणत्रयविभागयोग 15. पुरुषोत्तमयोग
16. दैवासुरसम्पद्विभागयोग 17. श्रद्धात्रयविभागयोग 18. मोक्षसंन्यासयोग..
29…ऊँ गं गणपतये नम:
“श्री गणेश का नाम लिया तो बाधा फ़टक न पाती है,देवों का वरदान बरसता बुद्धि विमल बन जाती है”कहावत सटीक भी और खरी भी उतरती है.बिना गणेश के कोई भी काम बन ही नही सकता,चाहे कितने ही प्रयास क्यों नही किये जायें,भारत ही नही विश्व के कौने कौने मे भगवान श्री गणेश जी की मान्यता है,कोई किस रूप में पूजता है तो कोई किसी रूप में उनकी पूजा और श्रद्धा रखता है।
ऊँ
ऊँ का वास्त्विक रूप ही गणेश जी का रूप है,हिन्दू धर्म के अन्दर अक्षरों की पूजा की जाती है,अक्षर को ही मान्यता प्राप्त है,हर देवता का रूप है हिन्दी भाषा का प्रत्येक अक्षर,”अ” को सजाया गया और श्रीराम की शक्ल बन गयी,”क्रौं” को सजाया गया तो हनुमान जी का रूप बन गया,”शं” को सजाया गया तो श्रीकृष्ण का रूप बन गया,इसी तरह से मात्रा को शक्ति का रूप दिया गया,जैसे “शव” को मुर्दा का रूप तब तक माना जायेगा जब तक कि छोटी इ की मात्रा को इस पर नही चढाया जाता,छोटी की मात्रा लगाते ही “शव” रूप बदल कर और शक्ति से पूरित होकर “शिव” का रूप बन जाता है। ऊँ को उल्टा करने पर वह “अल्लाह” का रूप धारण कर लेता है.
चन्द्र बिन्दु का स्थान
ऊँ के ऊपर चन्द्र बिन्दु का स्थान चन्द्रमा की दक्षिण भुजा का रूप है,चन्द्रमा का आकार एक बिन्दु के अन्दर बताया गया है,और बिन्दु को ही श्रेष्ठ उपमा से सुशोभित किया गया है,बिन्दु का रूप उस कर्ता से है जिससे श्रष्टि का निर्माण किया है,अ उ और म के ऊपर भी शक्ति के रूप में चन्द्र बिन्दु का रूपण केवल इस भाव से किया गया है कि अ से अज यानी ब्रह्मा,उ से उदार यानी विष्णु और म से मकार यानी शिवजी का भी आस्तित्व तभी सुरक्षित है जब वे तीनो शक्ति रूपी चन्द्र बिन्दु से आच्छादित है।
ब्रह्म-विद्या है श्रीगणेश जी आराधना में
ब्रह्म विद्या को जाने बिना कोई भी विद्या मे पारंगत नही हो पाता है,तालू और नाक के स्वर से जो शक्ति का निरूपण अक्षर के अन्दर किया जाता है वही ब्रह्मविद्या का रूप है। बीजाक्षरों को पढते समय बिन्दु का प्रक्षेपण करने से वह ब्रह्मविद्या का रूप बन जाता है.ब्रह्मविद्या का नियमित उच्चारण अगर एक मंदबुद्धि से भी करवाया जाये तो वह भी विद्या में उसी तरह से पारंगत हो जाता है जैसे महाकवि कालिदास जी विद्या में पारंगत हुये थे।
गणेशजी के नाम के साथ ब्रह्मविद्या का उच्चारण
ऊँ गं गणपतये नम: का जाप करते वक्त “गं” अक्षर मे सम्पूर्ण ब्रह्मविद्या का निरूपण हो जाता है,गं बीजाक्षर को लगातार जपने से तालू के अन्दर और नाक के अन्दर जमा मल का विनास होता है और बुद्धि की ओर ले जाने वाली शिरायें और धमनियां अपना रास्ता मस्तिष्क की तरफ़ खोल देतीं है,आंख नाक कान और ग्रहण करने वाली शिरायें अपना काम करना शुरु कर देतीं है और बुद्धि का विकास होने लगता है.
ब्रह्म विद्या का उच्चारण ही सर्व गणपति की आराधना है
अं आं इं ईं उं ऊं ऋं लृं एं ऐं ओं औं अं अ: कं खं गं घं डं. चं छं जं झं यं टं ठं डं णं तं थं दं धं नं पं फ़ं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं त्रं ज्ञं,ब्रह्म विद्या कही गयी है। उल्टा सीधा जाप करना अनुलोम विलोम विद्या का विकास करना कहा जाता है,लेकिन इस विद्या को गणेश की शक्ल में या ऊँ के रूप को ध्यान में रख कर करने से इस विद्या का विकास होता चला जाता है।
30….एक नारियल का चमत्कार, अब नहीं बिगड़ेंगे आपके काम क्योंकि…
क्या आपके कार्य बार-बार बिगड़ जाते हैं? किसी भी कार्य की सफलता में कड़ी मेहनत करनी पड़ती है? क्या अंतिम पलों में आपके हाथ से सफलता हाथ निकल जाती है? यदि आपको लगता है आपका भाग्य आपका साथ नहीं दे रहा है तो शास्त्रों के अनुसार कई उपाय बताए गए हैं।
शास्त्रों के अनुसार जब देवी-देवता आपसे रुष्ट या असप्रसन्न होते हैं तब आपको कार्यों में सफलता प्राप्त नहीं हो पाती। इसके अलावा कुंडली में यदि कोई ग्रह दोष हो तब भी काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार की परिस्थितियों से बचने के लिए कई उपाय बताए गए हैं, जो कि निश्चित रूप से लाभदायक ही हैं। इन्हीं उपायों में से एक उपाय ये है कि एक नारियल पानी में बहा दिया जाए।
नारियल पानी में कैसे बहना है? इस संबंध में ध्यान रखें ये बातें-
किसी भी पवित्र बहती नदी के किनारे एक नारियल लेकर जाएं। किनारे पर पहुंचकर अपना नाम और गौत्र बोलें। इसके साथ ही प्रार्थना करें कि आपकी समस्याएं दूर हो जाएं। अब नारियल को नदी में प्रवाहित कर दें। इसके तुरंत बाद वहां से घर लौट आएं। नदी किनारे से लौटते समय ध्यान रखें पीछे पलटकर न देखें। अन्यथा उपाय निष्फल हो जाएगा।
इसप्रकार नारियल नदी में बहाने से निश्चित ही आपको सकारात्मक परिणाम प्राप्त होने लगेंगे। बिगड़े कार्य बनने लगेंगे। भाग्य का साथ मिलने लगेगा, दुर्भाग्य का नाश होगा। इसके अलावा ध्यान रखें कि किसी भी प्रकार अधार्मिक कृत्यों से खुद को दूर रखें और किसी का मन न दुखाएं…

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31….एक लोटा जल किस्मत में भारी बदलाव ला सकता है
यदि गंभीरता से केवल एक लोटे जल के साथ कुछ क्रियाएं कर दी जाए ,तो व्यक्ति के जीवन की बहुत सी समस्याएं ,दुःख ,रोग-शोक-कष्ट ,ग्रह बाधा दूर हो सकती है ,सफलता बढ़ सकती है और सुख प्राप्ति के साथ आय के साधन बढ़ सकते हैं |इसके लिए केवल नियमित कुछ क्रियाएं भर कर दें ,बिना किसी अतिरिक्त खर्च और श्रम के जीवन में बहुत कुछ अच्छा होने लगेगा |
इसके लिए करें बस इतना ही कि सुबह सूर्योदय पूर्व उठें और नित्यकर्मों से निवृत्त हो स्नान कर ले ,शुद्ध वस्त्र धारण कर एक लोटा शुद्ध जल लें ,उसमे एक चुटकी रोली ,थोड़ा गुड और लाल फूल डालें ,अब उगते सूर्य को यह जल अर्पित करें अपने हाथों को सर की उंचाई तक रखते हुए ,यहाँ केवल इतना ध्यान दें की सूर्य उगता हुआ हो जिसे आप देख सकें अर्थात लालिमा युक्त निकलता सूर्य हो न की तपता हुआ सूर्य ,दूसरा यह की इस चढ़ते जल के छींटे आपके पैरों पर न पड़ें अर्थात किसी ऐसे स्थान पर गिरें जिससे आपके पैरों पर छींटे न आयें ,न ही यह किसी अशुद्ध स्थान पर गिरें ,इस समय सूर्य का या गायत्री मंत्र बोल सकें तो और अच्छा है |,यह क्रिया किसी भी शुक्ल पक्ष के रविवार से शुरू करें और लगातार करते रहें ,यदि किसी कारणवश रोज संभव नहीं है तो रविवार-रविवार जरुर करें |,,इसके साथ एक क्रिया और केवल रविवार -रविवार करें ,रात्री में सोते समय अपने सिरहाने एक लोटा जल में थोड़ा सा दूध डालकर रख लें ,ध्यान दें की यह गिरे -फैले नहीं ,,सुबह[सोमवार ] उठाकर इसे किसी बबूल के वृक्ष को चढ़ा दें ,यहाँ यह ध्यान दें की कोई आपको टोके नहीं |
उपरोक्त एक लोटे जल की क्रियाओं से आपके ग्रह दोष ,बाधा दोष ,अशुभता ,रोग-शोक-कष्ट धीरे धीरे समाप्त होने लगेंगे ,जीवन में नवीन ऊर्जा और उमंग का संचार होने लगेगा ,दैनिक दिनचर्या व्यवस्थित-शुभ और मंगलमय हो जायेगी ,पित्र दोष में कमी आने लगेगी ,ईष्ट कृपा बढ़ जायेगी, स्वास्थय अच्छा होने लगेगा ,सफ़लता बढ़ जायेगी |..
32….कलियुग में जप चार गुना अधिक करने से सिद्धि प्राप्त होती है।
मंत्रों का गलत उच्चारण कर जप करने से दोष लगता है।
केवल दूध पीकर जो मंत्र, तंत्र, अनुष्ठान आदि किया जाता है, उसका फल शीघ्र मिलता है।
मंत्र का जप मन से करें। स्तोत्र जप बोलकर करें।
अपवित्र अवस्था में, लेटे हुए, चलते-फिरते मंत्र जप न करें।
गं, रां, ह्वीं आदि का उच्चारण लोग प्राय: अशुद्ध करते हैं। ये अनुनासिक उच्चारण है, जो नाक व मुंह से किए जाते हैं।
मंत्र, तंत्र, यंत्र की प्राप्ति दीपावली, होली की रात, सूर्य व चंद्र ग्रहण पर विशेष रू प से होती है।
जल में रहकर, बहते हुए जल में खड़े होकर जप करने से सिद्धि प्राप्त होती है।
मंत्र, तंत्र, यंत्र गुप्त रखें। उनका प्रचार न करें।
नीचे स्थल, गड्ढे आदि में जप न करें।
दिन में पूर्व दिशा में, रात्रि में उत्तर की ओर मुंह करके जप करें।
केवल रेशम, कंबल (ऊनी) व कुशा के आसन पर बैठकर जप करें।
जप करते समय माला हिले नहीं।
किसी दुखी, पीडि़त व्यक्ति को यंत्र या मंत्र देना हो, तो दीपावली, होली, ग्रहण के दिन दें।
अनुष्ठानकर्ता सदाचारी हो, सद्गुणी हो।
अशुद्ध व्यक्ति पर तंत्र-मंत्र, जादू-टोना शीघ्र असर करते हैं। अत: शुद्ध रहें और ईश्वर आराधना करते रहने से लाभ मिलना संभव है।

33….कुछ लोगो की सदा शिकायत रहती है की हमारे घर में सदा कलह होता
रहता है । धन टिकता नहीं है । जबसे हम यहाँ आये है हमारे घर में कोई
न कोई बीमार रहता ही है । या अन्य कोई विपदा आती ही रहती है
जिसके कारण मानसिक अशांति बनी रहती है । मित्रो उसके कई कारण
हो सकते है । घर में नकारत्मक उर्जा के होने से भी ये सब होता ही
है । अतः करे ये लघु प्रयोग ॥
सामग्री :-
हल्दी की 7 साबूत गाठ, पूजा की 5 सुपारी, ताम्बे का लोटा ढक्कन
सहित, चांदी का चोकोर चोड़ा टुकड़ा, चांदी का सर्प सर्पिनी का जोड़ा ॥
प्रयोग किसी भी सोमवार को प्रातः काल में करे,लोटे में थोडा सा गंगा
जल भरे । गंगाजल न हो तो शुद्ध जल भर दे । बाकि उपरोक्त सभी
सामग्री लोटे में डाल दे । तथा लोटे को ताम्बे के ढक्कन से ढ़क दे । और
इस लोटे को बिना खोले मकान के मुख्य द्वार की दाहिनी और ज़मीन में
गाड दे । स्मरण रहे घर से बाहर जाते वक़्त आपको आपके दाहिनी हाथ की और इसे गाड़ना है । यदि आप बाहर खड़े होंगे तो ये हिस्सा आपकी
बायीं और आएगा ॥
तो देर कैसी फेक दीजिये घर की सभी समस्यायों को घर के बाहर, और
स्वागत करे आनंद और उत्साह का ॥
34…कुश अजमाए हुए पॉवर फुल नुक्ते
1. काले घोड़े की नाल तो सभी जानते है इस का छला बना कर मध्यमा
उंगली में पहन ने से शनि कभी नुकसान नहीं करता और शुभ फल
देता है इस नाल को घर के मुख्या दुयार पे लगाने से घर में गलत
चीज परवेश नहीं करती !
2. नाव की कील जो तांबे की होती है जयादा कर उसे हासिल करे
उसको बिना गरम किये एक छला बना कर पर्थम ऊँगली में धारण
करे आपका कोइ भी काम नहीं रुकेगा और साधना करते वक़्त भी
रक्षा व् विध्नो का नाश होता है !यह कील कोइ नाव वाला नहीं देता !
3. हाथी दन्त का कड़ा अगर मिल जाये तो उस पे ॐ गं गणपतये नमः
मन्त्र का ११००० हजार जप कर उसे शक्ति कृत करे और गुरुवार को
धारण कर ले इस से कोइ भी किसी भी किस्म का तंत्र प्रयोग साधक
पे असर नहीं करता और किया हुआ तंत्र निछ्फल हो जाता है !
4. नाग दोन के बूटी होती है उस की जड़ घर रखने से कभी धन की
कमी नहीं अति उसे विधि पूर्वक हासिल कर पूजन कर हरे रंग के
कपडे में लपेट कर धन रखने की जगह रखना चाहिए !
5. केले की जड़ गुरु पुष्य नक्षत्र के दिन धारण करने से रुका हुआ
साधना कर्म चल पड़ता है !उसे विधि पूर्वक गुरु पुष्य नक्षत्र से एक
दिन पहले नियुता देना चाहिए फिर गुरु पुष्य नक्षत्र को ले कर पूजन
करे और पीले वस्त्र में लपेट कर धारण कर ले !इस से साधक ही नहीं
एक साधारण आदमी के रुके हुए काम भी गतिमान हो जाते है ।
35….क्लेश-हरण-मर्यादा-रक्षक मन्त्र,मन्त्र:-
“हरन कठिन कलि कलुष कलेषु ।
महामोह निसि दलन दिनेसू ।।”
मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभ
रुद्राक्ष की माला पर १००० बार प्रतिदिन जप करते हुए ४० दिन में इस क्रिया को करते हुए इसे सिद्ध कर ले । जब भी आवश्यकता हो इस मन्त्र के १०८ पाठ करलें ।
इस मन्त्र के प्रयोग से समस्त क्लेशों का अन्त हो जाता है तथा मर्यादा की रक्षा होती है इस प्रकार से इस मन्त्र के प्रभाव से सभी कार्यों में अपूर्व सफलता मिलती

36….गंडा-ताबीज के दिशा-निर्देश
गंडा-ताबीज देने वाले के लिए दिशा-निर्देश
* गंडा देन वाले मांत्रिक, तांत्रिक, ओझा या मौलवी का चरित्र साफ होना चाहिए तथा लाभ या कष्ट निवारण के लिए ही गंडा बनाकर देना चाहिए।
* किसी का अनिष्ट या बुरा करने के उद्देश्य से कभी गंडा नहीं देना चाहिए, क्योंकि बुरे कर्म का फल भी बुरा ही होता है।
* धन के लालची लोग दूसरों को पीड़ा पहुँचाने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते, किन्तु बाद में उन्हें इसका फल भोगना पड़ता है।
* किसी को हानि पहुँचाना, पीड़ित करना अथवा रोगी बना देना, धन के लालच में ऐसा कृत्य करना सर्वथा निंदनीय है।
* गंडे का निर्माण करने वाले को स्वच्छ रहना चाहिए व स्वच्छ वस्त्र पहनने चाहिए।
* स्वच्छ व शुद्ध स्थान पर बैठकर गंडा बनाना या धारणकर्ता को देना चाहिए।
* नीच व्यक्तियों के साथ वार्तालाप व उनका स्पर्श नहीं करना चाहिए।
* झूठ नहीं बोलना चाहिए, क्रोध नहीं करना चाहिए तथा जहाँ तक हो सके चुप रहना चाहिए। चित्त स्थिर व स्वस्थ रखना चाहिए।
* किसी को शाप या आशीर्वाद नहीं देना चाहिए। अपना नित्यकर्म बराबर करते रहना चाहिए।
* किसी भी धर्मशास्त्र की अथवा व्यक्ति की निंदा नहीं करनी चाहिए।
* निर्भय होना चाहिए और विश्वासपूर्वक कार्य करना चाहिए।
* काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद, हिंसा और असत्य से जहाँ तक हो सके, बचना चाहिए।
ध्यान दें : इन सभी दिशा-निर्देशों को उस समय भी ध्यान में रखना चाहिए, जबकि आप स्वयं पर ही गंडे का प्रयोग करें।
37..घर में क्लेश ना होने के लिए
दत्तात्रेय भगवान का चित्र स्तापित करे, चित्र के समुख एक पानीवाला नारियल मिटटी के घड़े के ऊपर रखकर चारो तरफ पत्ते लगाकर कलश स्तापित करे, और चार मुख वाला दीपक उसके सामने प्रज्वलित करे, स्वयम पीले वस्त्र धारण करे और दत्तात्रेय भगवान को भी पीले वस्त्र अर्पित करे, पीले रंग का आसन का प्रयोग करे और निचे दिए हुवे मन्त्र की चन्दन के मालापर सात माला जप करे, जप पूरा होनेके बाद कन्या को भोजन या मीठा प्रसाद, सिंगारका सामान, दक्षिणा अप्रीत करके मंवांचित फल प्राप्त कर सकते है I
मंत्र – उं झं ‍‌द्रां विपुलमुर्तेये नमः स्वाहा

02… शत्रुओ से छुटकारा
दत्तात्रेय भगवान का चित्र स्तापित करेके उनके सामने एक सुखा नारियल काले कपडे में लिपटा कर मोली सूत्रसे बांध दे और भगवान को अर्पित करे, साथ ही एक सुपारी अर्पित करे, कम्बल के आसन का प्रयोग करे और निचे दिए हुवे मन्त्र की रुद्राक्ष के मालापर आठ माला जप करे, जप पूरा होनेके बाद भगवान को मीठे रोटी का भोग लगाये उसमेसे एक भाग कव्वे को और एक भाग कुत्ते को खिलाये और कपडे में लिपटा नारियल शिव मंदिर में जाकर शत्रुका नाश होने की प्रार्थना करके शिव को अर्पित करे.
मंत्र – ऊं ‍‌द्रां ह्रीं स्पोटकाय स्वाहा

03.. परीक्षा में सफलता
दत्तात्रेय भगवान का चित्र स्तापित करेके उनके सामने ताम्बे की थाली में खीर बनाके प्रसाद के रूप में रखे और भगवान के सामने पान की तिन पत्तिया लेकर उसपर चावल की छोटी छोटी ढ़ेरिया बनाकर रख दे भगवान को सफ़ेद वस्त्र अप्रीत करे और लाल कम्बल के आसन का प्रयोग करे और निचे दिए हुवे मन्त्र की तुलशी के मालापर पाच माला जप करे.
मंत्र – ऊं विध्याधिनायकाय द्रां दत्तारे स्वाहा

04.. धन-दौलत मिलने के लिए
ये साधना रात में करनी है दत्तात्रेय भगवान का चित्र स्तापित करे, चित्र के समुख एक पानीवाला नारियल मिटटी के घड़े के ऊपर रखकर चारो तरफ पत्ते लगाकर कलश स्तापित करे, तद्पछात तुलाशिदल,बिल्वपत्र और गेंदे के फुल भगवान को अप्रीत करे और मेवे का भोग लगाये और पाच अखंड दीप लगाये जो साधना शुरवात से पूरी रात जलते रहे और लाल कम्बल के आसन का प्रयोग करे और निचे दिए हुवे मन्त्र की तुलशी के मालापर नव माला जप करे.
मंत्र – ऊं ह्रीं विद्दुत जिव्हाय माणिक्यरुपिणे स्वाहा

05… घर प्राप्ति के लिए
दत्तात्रेय भगवान का चित्र स्तापित करे, चित्र के समुख ग्यारा पत्ते पर पाच-पाच लौग, इलायची रखकर दक्षिणा के साथ अर्पित करे तद्पछात अपनी मनोकामना कह दे और पीले रंग के आसन का प्रयोग करे और निचे दिए हुवे मन्त्र की रुद्राक्ष के मालापर आठ माला जप करे. जप पूरा होनेके बाद लौग,इलायची शनि महाराज या शेत्रपाल देवता को चढ़ा दे और अति शिग्र सफलता के लिए किसी गरीब या ब्राम्हण को कंबल या वस्त्र दान देना चाहिए.
मंत्र – श्रीं ह्रीं ऊं स्ताननायकाय स्वाहा

06.. वाहन दुर्घटना से बचाव के लिए
दत्तात्रेय भगवान का चित्र स्तापित करे, चित्र के समुख ताम्बे की थाली में पानी भरकर उसमे एक दिया जलाये तद्पछात काले कंबल के आसन का प्रयोग करे और निचे दिए हुवे मन्त्र की रुद्राक्ष के मालापर चार माला जप करे. जप पूरा होने के बाद भगवान को पुष्प,धुप,दीप लगाकर बेसन का भोग लगाये.
मंत्र – ऊं ‍‌द्रां द्रां वज्र कवचाय हुम्

07… मनचाहा प्यार मिलने के लिए
दत्तात्रेय भगवान का चित्र स्तापित करे, लाल कंबल के आसन का प्रयोग करे और निचे दिए हुवे मन्त्र की स्पटिक के मालापर नौ माला जप करे, जप पूरा होने के बाद भगवान को पुष्प,धुप,दीप लगाकर गुड,शहद और मिश्री का भोग लगाये और गुलाबी रंग का वस्त्र अर्पित करे और इकीस केले का प्रसाद चढ़कर सभी परिवार के लोगो में और आसपास या पड़ोस के लोगो में बाटे.
मंत्र – ऊं ह्रीं नमो अकर्शानाय ‍‌द्रां ह्रीं हुम्….
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