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प्रेत बाधा से बचाव केसे
1. प्रेत शक्तियों से बचाव के लिए शरीर को पाक पवित्र रखें। इसके अतिरिक्त साधक आकर्षक व सुगंधित वस्तुओं के प्रयोग करते समय विशेष सावधानी का ध्यान रखें।
2. देवदारू, हींग, सरसो, जौ, नीम की पत्ती, कुटकी, कटेली, चना व मोर के पंख को गाय के घी तथा लोहबान में मिरित करके मिट्टी के पात्र में रख लें, फिर उसे अग्नि से जलाकर उसका धुंआ प्रेतादि बाधा से पीड़ित जातक को दिखाएं। इस प्रक्रिया को नित्य कुछ दिनों तक दोहराते रहें, अवश्य लाभ मिलेगा।
3. मंगलवार व शनिवार के दिन जावित्री व श्वेत अपराजिता के पत्ते को आपस में पीसकर उसके रस को प्रेतादि या ऊपरी बाधा से पीड़ित जातक को सुंघाएं। इन नकारात्मक शक्तियों से अवश्य ही मुक्ति मिलेगी।
4. सेंधा नमक, चंदन, कूट, घृत व चर्बी को सरसो के तेल के साथ मिश्रित करके किसी मिट्टी के पात्र में रख लें। फिर उसे अग्नि से जलाकर उसका धुआं प्रेतादि बाधा से पीड़ित जातक को दिखाएं। इस प्रक्रिया को शनिवार अथवा मंगलवार से प्रारंभ करके नित्य 21 दिनों तक दोहराएं। ऊपरी बाधा से अवश्य ही मुक्ति मिलेगी।
5. बबूल, देवदारू, बेल की जड़ व प्रियंगु को धूप अथवा लोहबार के साथ मिश्रित करके मिट्टी के पात्र में रख लें तथा फिर उसे अग्नि से जलाकर उसके धुएं को पीड़ित जातक के ऊपर से उतारें। मंगल या शनिवार से इस कार्य को प्रारंभ करके इसे 21 दिनों तक दोहराते रहें। जब यह प्रयोग समाप्त हो जाए, तो 22वें दिन जली हुई सारी सामग्री को किसी चौराहे पर मिट्टी के पात्र सहित प्रातः सूर्य उदय से पूर्व फेंक आएं। अवश्य लाभ होगा।
6. मंगलवार या शनिवार के दिन लौंग, रक्त-चंदन, धूप, लोहबान, गौरोचन, केसर, बंसलोचन, समुद्र-सोख, अरवा चावल, कस्तूरी, नागकेसर, जई, भालू के बाल व सुई को भोजपत्र के साथ अपने शरीर व लग्न के अनुकूल धातु के ताबीज में भरकर गले में धारण करें। शरीर पर प्रेतादि जैसे नकारात्मक तत्वों का कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ सकता।

7. प्रेत बाधा दूर करने के लिए पुष्य नक्षत्र में चिरचिटे अथवा धतूरे का पौधा जड़ सहित उखाड़कर, यदि इस प्रकार धरती में दबा दिया जाए कि उसका जड़ वाला भाग ऊपर रहे और पूरा पौधा धरती में समा जाए तो उस परिवार में सुख-शान्ति बनी रहती है। वहां प्रेतात्माएं कभी भी डेरा नहीं जमातीं।
2… किसे प्राप्त होती हैं भूत-प्रेत योनि ?

’प्रेत कल्प’ में कहा गया है कि नरक में जाने के पश्चात प्राणी प्रेत बनकर अपने परिजनों और संबंधियों को अनेकानेक कष्टों से प्रताड़ित करता रहता है। वह परायी स्त्री और पराये धन पर दृष्टि गड़ाए व्यक्ति को भारी कष्ट पहुंचाता है। जो व्यक्ति दूसरों की संपत्ति हड़प कर जाता है, मित्र से द्रोह करता है, विश्वासघात करता है, ब्राहमण अथवा मंदिर की संपत्ति का हरण करता है, स्त्रियों और बच्चों का संग्रहीत धन छीन लेता है, परायी स्त्री से व्यभिचार करता है, निर्बल को सताता है, ईश्वर में विश्वास नहीं करता, कन्या का विक्रय यकरता है, माता बहन पुत्र पुत्री स्त्री पुत्रवधु आदि के निर्दोष होने पर भी उनका त्याग कर देता है, ऐसा व्यक्ति प्रेत योनि में अवश्य जाता है। उसे अनेकानेक नारकीय कष्ट भोगना पड़ता है। उसकी कभी मुक्ति नहीं होती। ऐसे व्यक्ति को जीते जी अनेक रोग और कष्ट घेर लेते हैं। व्यापार में हानि गर्भनाश गृह कलह ज्वर कृषि हानि संतान मृत्यु आदि से वह दुखी होता रहता है। अकाल मृत्यु उसी व्यक्ति की होती है जो धर्म का आचरण और नियमों का पालन नहीं करता तथा जिसके आचार-विचार दूषित होते हैं। उसके दुष्कर्म ही उसे अकाल मृत्यु में धकेल देते हैं।

गरुड़ पुराण में प्रेत योनि और नरक में पड़ने से बचने के उपाय भी सुझाए गए हैं। उनमें सर्वाधिक उपाय दान दक्षिणा पिंडदान तथा श्राद्ध कर्म आदि बताए गए हैं।

सर्वाधिक प्रसिद्ध इस प्रेत कल्प के अतिरिक्त इस पुराण में आत्मज्ञान के महतव का भी प्रतिपदान किया गया है। परमात्मा का ध्या नही आत्मज्ञान का सबसे सरल उपाय है। उसके लिए अपने मन और इंद्रियों पर संयम रखना परम आवश्यक है। इस प्रकार कर्मकांड पर सर्वाधिक बल देने के उपरांत गरुड़ पुराण में ज्ञानी और सत्यव्रती व्यक्ति को बिना कर्मकांड किए भी सद्गति प्राप्त कर परलोक में उच्च स्थान प्राप्त करने की विधि बताई गई है।
3… कहां से आक्रमण करते हैं – भूत-प्रेत और मायावी शक्तियां ?
भूत-प्रेतों का निवास नीचे दिए गए कुछ वृक्षों एवं स्थानों पर माना गया है। इन वृक्षों के नीचे एवं स्थानों पर किसी प्रकार की तेज खुशबू का प्रयोग एवं गंदगी नहीं करनी चाहिए, नहीं तो भूत-प्रेत का असर हो जाने की संभावना रहती है।

पीपल वृक्ष:- शास्त्रों में इस वृक्ष पर देवताओं एवं भूत-प्रेतों, दोनों का निवास माना गया है। अतः कभी भी पीपल के पेड़ नहीं काटने चाहिए। इसी कारण हर प्रकार के कष्ट एवं दुख को दूर करने हेतु इसकी पूजा अर्चना करने का विधान है।
मौलसिरी:- इस वृक्ष पर भी भूत-प्रेतों का निवास माना गया है।
कीकर वृक्ष:- इस वृक्ष पर भी भूत-प्रेत रहते हैं। ऐसा कहा जाता है कि तुलसीदास ने इस वृक्ष में रोज पानी डालकर इस वृक्ष पर रहने वाले प्रेत को प्रसन्न कर उसकी मदद से हनुमान जी के दर्शन प्राप्त कर प्रभु श्री राम से मिलने का सूत्र पाया था। यह भूत प्राणियों को लाभ पहुंचाने वाली श्रेणी का था।
श्मशान या कब्रिस्तान:- इन स्थानों पर भी भूत-प्रेत निवास करते है।

भूत-प्रेतों से सावधानी
जल में भूत-प्रेतों का निवास होता है। इसलिए किसी भी स्त्री-पुरुष को नदी-तालाब में, चाहे वह कितने ही निर्जन स्थान में क्यों न हों, निर्वस्त्र होकर स्नान नहीं करना चाहिए क्योंकि भूत-प्रेत गंदगी से रुष्ट होकर मनुष्यों को नुकसान पहुंचाते हैं। कुएं में भी किसी प्रकार की गंदगी नहीं डालनी चाहिए क्योंकि कुंए में भी विशेष प्रकार के जिन्न रहते हैं जो कि रुष्ट होने पर व्यक्ति को बहुत कष्ट देते हैं।

श्मशान या कब्रिस्तान में भी कभी कुछ नहीं खाना चाहिए और न ही वहां पर कोई मिठाई, सफेद व्यंजन, शक्कर या बूरा लेकर जाना चाहिए क्योंकि इनसे भी भूत-प्रेत बहुत जल्दी आकर्षित होते हैं। ऐसे स्थानों में रात में कोई तीव्र खुशबू लेकर भी नहीं जाना चाहिए तथा मलमूल त्याग भी नहीं करना चाहिए। किसी भी अनजान व्यक्ति से विशेष रूप से दी गई इलायची, सेब, केला, लौंग आदि नहीं खानी चाहिए, क्योंकि यह भूत-प्रेत से प्रभावित करने के विशेष साधन माने गए हैं।

भूत-प्रेत से बचाव
यदि अनुभव हो कि भूत प्रेत का असर है तो घर में नियमित रूप से सुन्दरकांड या हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा सूर्य देव को जल चढ़ाएं।
1. यदि किसी मनुष्य पर भूत-प्रेत का असर अनुभव हो, तो उसकी चारपाई के नीचे नीम की सूखी पत्ती जलाएं।
2. मंगल या शनिवार को एक समूचा नींबू लेकर भूत-प्रेत ग्रसित व्यक्ति के सिर से पैर तक 7 बार उतारकर घर से बाहर आकर उसके चार टुकड़े कर चारों दिशाओं में फेंक दें। यह ध्यान रहे कि जिस चाकू से नींबू काटा है उसे भी फेंक देना चाहिए।
4…आसाम का काला जादू और तंत्र सिद्ध महिलाएं ~

आसाम को ही पुराने समय में कामरूप प्रदेश के रूप में जाना जाता था। कामरुप प्रदेश को तन्त्र साधना के गढ़ के रुप में दुनियाभर में बहुत नाम रहा है। पुराने समय में इस प्रदेश में मातृ सत्तात्मक समाज व्यवस्था प्रचलित थी, यानि कि यंहा बसने वाले परिवारों में महिला ही घर की मुखिया होती थी। कामरुप की स्त्रियाँ तन्त्र साधना में बड़ी ही प्रवीण होती थीं। बाबा आदिनाथ, जिन्हें कुछ विद्वान भगवान शंकर मानते हैं, के शिष्य बाबा मत्स्येन्द्रनाथ जी भ्रमण करते हुए कामरुप गये थे। बाबा मत्स्येन्द्रनाथ जी कामरुप की रानी के अतिथि के रुप में महल में ठहरे थे। बाबा मत्स्येन्द्रनाथ, रानी जो स्वयं भी तंत्रसिद्ध थीं, के साथ लता साधना में इतना तल्लीन हो गये थे कि वापस लौटने की बात ही भूल बैठे थे। बाबा मत्स्येन्द्रनाथ जी को वापस लौटा ले जाने के लिये उनके शिष्य बाबा गोरखनाथ जी को कामरुप की यात्रा करनी पड़ी थी। ‘जाग मछेन्दर गोरख आया’ उक्ति इसी घटना के विषय में बाबा गोरखनाथ जी द्वारा कही गई थी।
कामरुप में श्मशान साधना व्यापक रुप से प्रचलित रहा है। इस प्रदेश के विषय में अनेक आश्चर्यजनक कथाएँ प्रचलित हैं। पुरानी पुस्तकों में यहां के काले जादू के विषय में बड़ी ही अद्भुत बातें पढऩे को मिलती हैं। कहा जाता है कि बाहर से आये युवाओं को यहाँ की महिलाओं द्वारा भेड़, बकरी बनाकर रख लिया जाता था।
आसाम यानि कि कामरूप प्रदेश की तरह ही बंगाल राज्य को भी तांत्रिक साधनाओं और चमत्कारों का गढ़ माना जाता रहा है। बंगाल में आज भी शक्ति की साधना और वाममार्गी तांत्रिक साधनाओं का प्रचलन है। बंगाल में श्मशान साधना का प्रसिद्ध स्थल क्षेपा बाबा की साधना स्थली तारापीठ का महाश्मशान रहा है। आज भी अनेक साधक श्मशान साधना के लिये कुछ निश्चित तिथियों में तारापीठ के महाश्मशान में जाया करते हैं। महर्षि वशिष्ठ से लेकर बामाक्षेपा तक अघोराचार्यों की एक लम्बी धारा यहाँ तारापीठ में बहती आ रही है।
5…भूत प्रेत से बचने के लिये नदी में डालते हैं सिक्केर ~
उत्तर प्रदेश
बांदा। इसे अंधविश्वास कहा जाए या रूढि़वादी परम्परा, बुंदेलखंड में नवजात शिशु हो या नई नवेली दुल्हन के नदी पार करने का पहला अवसर, यहां अब भी नदी को धातु का सिक्का भेंट करने की पुरानी परम्परा जीवित है। ग्रामीण क्षेत्र के लोग इसे प्रेतिक बाधा से निजात पाने की तरकीब तो आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति से जुड़े लोग पानी की शुद्धता बनाए रखने का तरीका मानते हैं। बीसवीं सदी के ब्रिटिश शासन काल में दश में चलने वाले तांबे, पीतल व चांदी के सिक्कों का सरकारी नाम कुछ भी रहा हो, पर बुंदेली इन सिक्कों को ग्वालियर छाप, घोड़ा छाप, रानी विक्टोरिया व बादशाही छाप, धेलही, अधन्ना, दुकरी व छेदहा, चवन्नी व अठन्नी नाम से जानते रहे हैं।

नवजात शिशु के ननिहाल, हाट-बाजार या अस्पताल जाने का मामला हो या नई नवेली दुल्हन के पीहर अथवा नैहर जाने का अवसर हो, घर की बुजुर्ग महिलाएं धोती या गमछे में धातु के फुटकर सिक्के बांधना नहीं भूलती थीं। यह इसलिए नही कि खर्च-खराबा में काम आएंगे, बल्कि इसलिए कि रास्ता बीच कोई नदी या जलाशय मिले तो उसे भेंट करना होगा। इसके पीछे बुजुर्ग लोग भूत-प्रेत बाधा से छुटकारा पाना बताते हैं।

बांदा जनपद में तेन्दुरा गांव के बुजुर्ग दलित बुलुआ सन् 1903 के कुछ सिक्के दिखाते हुए कहते हैं, “भूत-प्रेत का साया नदी या जलाशय नहीं पार करता, इसलिये नवजात शिशु या नई दुल्हन के सिर से सात बार उतार कर तांबे का सिक्का नदी में डाला जाता था। अब पीतल, तांबा या चांदी के सिक्कों का चलन बंद होने से लोग स्टील के सिक्के नदी को भेंट कर रहे हैं।”

इतिहास गवाह है इसी गांव के धर्म ग्रंथों के जानकार पंडि़त मना महाराज गौतम बताते हैं, “यह परम्परा अनादि काल से चली आई है, चैदह वर्ष के वनवास से सकुशल लौटने पर मां सीता ने सरयू नदी को सिक्के व सोने-चांदी के आभूषण भेंट किए थे।” पनगरा गांव की बुजुर्ग महिला सुखिया बताती है, “अब भी नवजात बच्चे की कमर में टोटके के तौर पर धागे से तांबे का छेद वाला सिक्का बांधा जाता है, ताकि बच्चे को किसी की नजर न लगे।”

आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति से जुड़े चिकित्सक बुजुर्गों की इन बातों से इत्तेफाक नहीं रखते, अतर्रा कस्बे के आयुर्वेद चिकित्सक डा. महेन्द्र सिंह कहते हैं, “सिक्कों के साथ प्रेतिक बाधा से निजात पाना महज बकवास है। सच यह है कि विभिन्न धातुओं के मिश्रण से पानी की शुद्धता बरकार रहती है। मानव जीवन के लिए जड़ी-बुटी या धातुओं की आवश्यकता बहुत जरूरी है, इस रूढि़वादी परम्परा से जलाशयों के पानी में लौह, तांबा व पीतल के तत्व समाहित होते रहे हैं। आज भी कई दुर्लभ धातुओं के भस्मों से गम्भीर बीमारी का उपचार किया जाता है।”

डा. महेन्द्र सिंह कहते हैं, “डेढ़ दशक पूर्व ग्रामीण लोहे की कड़ाही में सब्जी पकाया करते थे, जिससे शरीर में लौह की कमी नहीं होती थी, अब जमाने के साथ स्टील या एल्मीनियम के बर्तन से पूरा भोजन पकाया जाने लगा, जिससे तकरीबन हर व्यक्ति में लौह की कमी पाई जाती है।” राजकीय आयुर्वेद चिकित्सालय एवं महाविद्यालय अतर्रा के प्राचार्य डा. एसएन सिंह बताते हैं, “तांबे के पात्र (बर्तन) में भरा पानी पीने से जहां पेट के समस्त विकार नष्ट हो जाते हैं, वहीं चर्म रोगों से भी छुटकारा मिलता है। वह कहते हैं कि ‘बुजुर्गों का यह ‘टोटका’ आयुर्वेद पद्धति का उपचार ही है।”

6… भूत क्या करते हैं
जन्म के पहले जिस प्रकार हम थे, उसी प्रकार मृत्यु भी कोई ऐसी घटना नहीं है, जिससे जीवन का नाश सिद्ध होता हो। नाश शब्द भी जन्म की तरह ‘‘नश अदर्शने’’ धातु से बना है; जिसका अर्थ होता है, जो अभी तक दिखायी दे रहा था, अब वह अव्यक्त हो गया। वह अपनी सूक्ष्म अवस्था में चला गया। शरीर स्थूल था-उसमें प्रविष्ट होने के कारण संरचना दिखायी दे रही थी, चेतना व्यक्त थी-पर शरीर के बाद वह नष्ट हो गई हो ऐसा नहीं है। अब इस तथ्य को विज्ञान भी मानने लगा है, अलबत्ता विज्ञान प्रकट का संबंध अभी तक मनोमय विज्ञान से जोड़ नहीं पाया, इसलिए वह परलोक, पुनर्जन्म, लोकोत्तर जीवन, भूत-प्रेत, देव-योनि, यक्ष-किन्नर, पिशाच, बैताल आदि अतींद्रिय अवस्थाओं की विश्लेषण नहीं कर पाता। पर मृत्यु के बाद जीवन नष्ट नहीं हो जाता है, यह एक अकाट्य तथ्य है और इसी आधारभूत सिद्धान्त के कारण भारतीय जीवन पद्धति का निर्धारण इस प्रकार किया गया है कि वह मृत्यु के बाद भी अपने जीवन के अनंत प्रवाह को अपने यथार्थ लक्ष्य स्वर्ग, मुक्ति और ईश्वर दर्शन की ओर मोड़े रह सके।

विक्षुब्ध जीवात्मा की दयनीय स्थिति—प्रेत-दशा

जीव चेतना का शरीर मरण के साथ ही अंत नहीं हो जाता। वरन् उसका अस्तित्व पीछे भी बना रहता है। इसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी बहुधा मिलते रहते हैं। पिछले दिनों यह तथ्य परंपरागत मान्यताओं एवं कथा-पुराणों के प्रतिपादनों पर ही निर्भर था कि मरणोत्तर काल में भी जीवात्मा का अस्तित्व बना रहता है। उसे परलोक में रहना पड़ता है। स्वर्ग-नरक भुगतना पड़ता है एवं पुनर्जन्म के चक्र में भ्रमण करना पड़ता है।

इस संदर्भ में अब तक के अन्वेषणों ने कई अनोखे तथ्य प्रतिपादित किए हैं। मरने के उपरांत अनेकों को शांति मिलती है और वे प्रत्यक्ष जीवन में अहर्निश श्रम करने की थकान को दूर करने के लिए परलोक की गुफा में विश्राम लेने लगते हैं। इसी निद्राकाल में स्वर्ग-नरक जैसे स्वप्न दिखाई पड़ते रहते होंगे। थकान उतरने पर जीव पुनः संपन्न बनता है और अपने संगृहीत संस्कारों के खिंचाव से रुचिकर परिस्थितियों के इर्द-गिर्द मँडराने लगता है। वहीं किसी के घर उसका जन्म हो जाता है।

कभी-कभी कोई मनुष्य प्रेत योनि प्राप्त करता है। यह न जीवित स्थिति कही जा सकती है और न पूर्ण मृतक ही। जीवित इसलिए नहीं कि स्थूल शरीर न होने के कारण वे वैसा कर्म तथा उपभोग नहीं कर सकते, जो इंद्रियों की सहायता से ही संभव हो सकते हैं। मृतक उन्हें इसलिए नहीं कह सकते कि वासनाओं और आवेशों से अत्यधिक ग्रसित होने के कारण उनका सूक्ष्म शरीर काम करने लगता है, अस्तु वे अपने अस्तित्व का परिचय यत्र-तत्र देते-फिरते हैं। इस विचित्र स्थिति में पड़े होने के कारण वे किसी का लाभ एवं सहयोग तो कदाचित कर ही सकते हैं; हाँ, डराने या हानि पहुँचाने का कार्य वे सरलतापूर्वक संपन्न कर सकते हैं। इसी कारण आमतौर से लोग प्रेतों से डरते हैं और उनका अस्तित्व अपने समीप अनुभव करते ही, उन्हें भगाने का प्रयत्न करते हैं। प्रेतों के प्रति किसी का आकर्षण नहीं होता वरन् उससे भयभीत रहते बचते ही रहते हैं। वैज्ञानिक शोध की दृष्टि से, वस्तुस्थिति जानने एवं कौतूहल निवारण की दृष्टि से कोई उस क्षेत्र में प्रवेश करके, तथ्यों की जानकारी के लिए प्रयत्न करे तो यह दूसरी बात है।

प्रेतात्माओं द्वारा अपने अस्तित्व का परिचय दिये जाने तथा अमुक व्यक्तियों को अपना माध्यम बनाकर त्रास देने की घटनाओं का वर्णन करना, इन पंक्तियों में अभीष्ट नहीं। जनश्रुति से लेकर सरकारी रिकार्ड में दर्ज और परामनोविज्ञान के अन्वेषकों द्वारा मान्यता प्राप्त ऐसी असंख्यों घटनाएँ सामने आती रहती हैं, जिनसे प्रेतात्माओं के अस्तित्व की पुष्टि होती है। यहाँ तो चर्चा यह है की जानी है कि प्रेत योनि में सभी को जाना पड़ता है अथवा किसी विशेष स्थिति के व्यक्ति ही उनमें प्रवेश करते हैं। उत्तर स्पष्ट है। उद्विग्न, विक्षुब्ध, आतुर, अशांत, क्रुद्ध, कामनाग्रस्त, अतृप्त लोगों को ही प्रायः प्रेत बनना पड़ता है। शांतचित्त, सौम्य एवं सज्जन प्रकृति के लोग सीधी-सादी जन्म-मरण की प्रक्रिया पूरी करते रहते हैं।

प्रेत-योनि की प्राप्ति के दो मुख्य कारण होते हैं—पहला-प्रबल आकांक्षाओं की अतृप्ति। दूसरा—तृष्णा-वासनाओं की तीव्रता। प्रबल आकांक्षा की व्यक्ति-चित्त में प्रचंड प्रक्रिया होती है। दैनिक जीवन में भी यह देखा जाता है कि जब कोई नवीन योजना दिमाग में होती है, तो उनकी सुनिश्चित रूपरेखा बनने तक मन-मस्तिष्क चैन से नहीं बैठ पाता, न ही नींद आती है। ऐसी आकांक्षा खंडित हो जाने पर कई-कई रातों तक लोगों की नींद उड़ जाया करती है। यही बात तृष्णाओं के बारे में हैं। तृष्णा से व्याकुल लोग न शांत रह पाते, न आराम कर पाते, न ही सो पाते हैं, जब तक तीव्र तृष्णा की कुछ पूर्ति नहीं होती। वे उद्विग्न ही बने रहते हैं। प्रेत योनि भी ऐसी ही उद्विग्नता और अशांति से भरी जीवन-दशा का नाम है, जो मरणोत्तर अवधि में होती है।

हम भारतीयों की यह जो मान्यता है कि धन, पुत्र, वासना आदि पर आसक्ति रहते यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसे कई बार मृत्यु के बाद बहुत समय कर किसी भूत-प्रेत की योनि में रहना पड़ता है। इसीलिये भारतीय संस्कृति में सदैव ही अनासक्त जीवन जीने की प्रेरणा दी गई है। चार आश्रम—(1) ब्रह्मचर्य-विद्याध्ययन, (2) गृहस्थ, (3) वानप्रस्थ, और (4) संन्यास में अंतिम दो की अधिकांश शिक्षाएँ और कर्तव्य ऐसे हैं, जिनमें प्रत्येक व्यक्ति को धीरे-धीरे परिवार धन-संपत्ति का मोह हटाकर, अपना मन परमार्थ-साधना में लगाना पड़ता था। संन्यास-दीक्षा के बाद तो वह सब कुछ त्यागकर अपने आपको उस तरह अनुभव करता था जैसे—मकड़ी अपने बनाए जाले को स्वयं खाकर संतोष अनुभव करती है। तब जिसके पीछे बेटे होते थे, वह उनकी आवश्यकता की संपत्ति उन्हें देकर शेष लोक-कल्याण में लगाकर घर छोड़ देते थे और आत्म-कल्याण की साधना में जुट जाते थे।

मोहांध व्यक्तियों के प्रेत-योनि में जाने का कोई वैज्ञानिक आधर तो अभी समझ में नहीं आता, किंतु बौद्धिक और प्रामाणिक आधार अवश्य हैं। हम में से अनेकों को भूत का सामना करना पड़ जाता है; पर यदि सामान्य लोगों की बात को भ्रम या अंधविश्वास मानें जैसा कि अनेक लोग किसी स्वार्थवश या किसी को धोखा देने के लिये भी भूत-प्रेत की बात कहकर डरा देते हैं तो भी संसार में कई ऐसी घटनाएँ घटी हैं, जिनमें इस विश्वास को विचारशील लोगों का भी समर्थन मिला है।
7.…  क्षीण मनोबल वाले जल्दी होते है भूत प्रेतों के शिकार ~
इस भौतिक जगत और आध्यात्मिक जगत की विराट सम्पदा मनुष्य को प्राप्त हो सकती है। किन्तु इसके लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है कि आप अपने प्रति सम्मान के भाव से भरें, और अपने प्रति अपराध के भाव से मुक्त हों। जो आपका आत्मतत्व है, आत्मस्वरूप है, आपका अपना व्यक्तित्व है उसके प्रति भी आपके ह्रदय में सम्मान होना चाहिए। लेकिन सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि आप तो अपने प्रति ही सबसे ज्यादा निराशा से भरे हुए रहते हो। आपको लगता है कि जैसे आप कुछ हो ही नहीं। आपको बहुत कुछ करना चाहिए था, जबकि आप कुछ नहीं कर पाए। आप इस छोटे से समाज में व्यक्ति बनकर रह गये। यह पीड़ा आप सबको भीतर ही भीतर ग्रसित किये रहती है। एक विचित्र प्रकार का भय आपको हमेशा पकड़े रहता है और इसका दुष्परिणाम होता है कि आप हमेशा उदासी, निराशा और कुंठा में जीते रहते हैं। इस तरह जीने की आदत तरह तरह की बीमारियों और कष्टों को आमंत्रित करती रहती है, और आप उनके शिकार होते चले जाते हैं। आप तरह-तरह के लोगों के पास जाते हैं कि हमारे कष्ट का निवारण कीजिये, हमारे लिए कुछ उपाय बताइए। लेकिन इस बीमारी की जड़ है आपके चित्त में अपने ही प्रति सम्मान के भाव का अभाव, और अपने प्रति अपराधबोध। इस विषय पर ऋषियों-मनीषियों ने बड़ा चिंतन किया और उन्होंने एक महत्त्वपूर्ण बात कही कि जब आप कुंठा से ग्रसित होते हैं, जब आप दुःख में या निराशा में होते हैं और जब आप अपने प्रति ही अपराधबोध से भरे होते हैं तो आपके भीतर जो सूक्ष्म शरीर है, या आपका जो चेतन शरीर है, वह इतना सिकुड़ने लगता है कि आपके शरीर के भीतर बहुत जगह रिक्त हो जाती है। उस खाली जगह में तरह-तरह की आत्माएं प्रवेश कर जाती हैं जिससे आपका व्यक्तित्व नष्ट हो जाता है। और जो आत्मा प्रवेश करती है उस आत्मा का प्रभाव आपके शरीर पर, आपके चित्त पर, आपके ह्रदय पर गंभीरता से बैठ जाता है। और यह आपके जीवन में तरह-तरह की पीड़ाएं पैदा करता है। जिस व्यक्ति का मनोबल व संकल्प क्षीण होता है उसका शरीर इस ब्रम्हांड में घूमती हुई दुखी पीड़ित आत्मा को आमंत्रित करता है, और वह तरह-तरह की पीड़ाओं का शिकार हो जाता है।
आप और आपका सूक्ष्म शरीर
इस पृथ्वी पर चार प्रकार के लोग पाए जाते हैं। कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो अच्छाई और बुराई के भाव से परे होते हैं। ऐसी आत्माओं को पुनः जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती, वे इस जन्म मृत्यु के बंधन से परे हो जाते है, इन्हें असली संत और असली महात्मा कहते हैं। उनके लिए अच्छाई और बुराई कोई अर्थ नहीं रखती है। उनके लिए सब बराबर हैं, उनको सबसे प्रेम होता है, किसी के प्रति घृणा नहीं होती है। इसी तरह कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं जो अच्छाई और बुराई के प्रति समतुल्य होते हैं यानी दोनों को समान भाव से देखते हैं, वे भी इस जन्म मृत्यु के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। लेकिन तीसरी तरह के लोग ऐसे होते हैं जो साधारण प्रकार के होते हैं, जिनमें अच्छाई भी होती है और बुराई भी होती है। दोनों का मिश्रण होता है – उनका व्यक्तित्व। ऐसे साधारण प्रकार के लोग अपनी मृत्यु होने के बाद तत्काल किसी न किसी गर्भ को उपलब्ध हो जाते हैं, किसी न किसी शरीर को प्राप्त कर लेते हैं।
लेकिन चौथे प्रकार के लोग असाधारण प्रकार के लोग हैं, जो या तो बहुत अच्छे लोग होते हैं या बहुत बुरे लोग होते हैं। अच्छाई में भी पराकाष्ठा और बुराई में भी पराकाष्ठा। ऐसे लोगों को दूसरा गर्भ प्राप्त करना कठिन हो जाता है। उनकी आत्माएं भटकती रहती हैं। प्रतीक्षा करती रहती हैं कि उनके अनुरूप कोई गर्भ मिले तभी वह उसमें प्रवेश करें। जैसे हिटलर, नेपोलियन गांधीजी और अन्य महापुरुष। जो अच्छाई की दिशा में उत्कर्ष पर होते हैं वे प्रतीक्षा करते हैं कि उनके अनुरूप ही योनी मिले। जो बुराई की पराकाष्ठा पर होते हैं वे भी प्रतीक्षा करते हैं। देव आत्माएं जो पराकाष्ठा पर रहती हैं, वही आत्माएं होती हैं जिन्हें बुरी आत्मा कहते हैं, यह अतियों पर होती हैं और मृत्यु का बाद उन्हें गर्भ प्राप्त करने में कभी-कभी बहुत ज्यादा समय लग जाता है। ये आत्माएं जो अगले गर्भ की प्रतीक्षा करती रहती हैं ये ही मनुष्य के शरीर में भूत-प्रेत का रूप लेकर प्रवेश करती हैं और उन्हें तरह-तरह की पीड़ाओं से ग्रसित करती हैं।
अब प्रश्न उठता है कि ये आत्माएं किसकी पकडती हैं और किसके शरीर में प्रवेश करती हैं? कौन होता है इनका शिकार? जिसकी आत्मा जितनी ही अधिक संकल्पवान होती है, जिसका मनोबल ऊंचा रहता है, जितना ही आत्म-सम्मान का भाव जिस व्यक्ति की आत्मा में अपने प्रति प्रगाढ़ होता है, उस व्यक्ति का सूक्ष्म शरीर उतना ही विकसित होता है, भरा रहता है। आपके शरीर में आपका सूक्ष्म शरीर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। यही आपको संचालित करता है। जब आपकी आत्मा का मनोबल व संकल्प शक्तिशाली होता है, आप खुश होते हैं, आप आनंद में होते हैं, आप अपने प्रति आत्मसम्मान से भरे रहते हैं। तब आपका सूक्ष्म शरीर विकसित होता हिया, फैलता है और आपके शरीर में पूरी तरह व्याप्त रहता है, यह सबसे बड़ा गुण है सूक्ष्म शरीर का। यही स्वरुप उस ब्रम्हा का भी है।
9… भूत-प्रेतों की गति एवं शक्ति अपार होती है ~
जिसका कोई वर्तमान न हो, केवल अतीत ही हो वही भूत कहलाता है। अतीत में अटका आत्मा भूत बन जाता है। जीवन न अतीत है और न भविष्य वह सदा वर्तमान है। जो वर्तमान में रहता है वह मुक्ति की ओर कदम बढ़ाता है।

आत्मा के तीन स्वरुप माने गए हैं- जीवात्मा, प्रेतात्मा और सूक्ष्मात्मा। जो भौतिक शरीर में वास करती है उसे जीवात्मा कहते हैं। जब इस जीवात्मा का वासना और कामनामय शरीर में निवास होता है तब उसे प्रेतात्मा कहते हैं। यह आत्मा जब सूक्ष्मतम शरीर में प्रवेश करता है, उस उसे सूक्ष्मात्मा कहते हैं।

भूत-प्रेतों की गति एवं शक्ति अपार होती है। इनकी विभिन्न जातियां होती हैं और उन्हें भूत, प्रेत, राक्षस, पिशाच, यम, शाकिनी, डाकिनी, चुड़ैल, गंधर्व आदि कहा जाता है।

भूतों के प्रकार : हिन्दू धर्म में गति और कर्म अनुसार मरने वाले लोगों का विभाजन किया है- भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस, वेताल और क्षेत्रपाल। उक्त सभी के उप भाग भी होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार 18 प्रकार के प्रेत होते हैं। भूत सबसे शुरुआती पद है या कहें कि जब कोई आम व्यक्ति मरता है तो सर्वप्रथम भूत ही बनता है।

इसी तरह जब कोई स्त्री मरती है तो उसे अलग नामों से जाना जाता है। माना गया है कि प्रसुता, स्त्री या नवयुवती मरती है तो चुड़ैल बन जाती है और जब कोई कुंवारी कन्या मरती है तो उसे देवी कहते हैं। जो स्त्री बुरे कर्मों वाली है उसे डायन या डाकिनी करते हैं। इन सभी की उत्पति अपने पापों, व्याभिचार से, अकाल मृत्यु से या श्राद्ध न होने से होती है।

84 लाख योनियां : पशुयोनि, पक्षीयोनि, मनुष्य योनि में जीवन यापन करने वाली आत्माएं मरने के बाद अदृश्य भूत-प्रेत योनि में चले जाते हैं। आत्मा के प्रत्येक जन्म द्वारा प्राप्त जीव रूप को योनि कहते हैं। ऐसी 84 लाख योनियां है, जिसमें कीट-पतंगे, पशु-पक्षी, वृक्ष और मानव आदि सभी शामिल हैं।

प्रेतयोनि में जाने वाले लोग अदृश्य और बलवान हो जाते हैं। लेकिन सभी मरने वाले इसी योनि में नहीं जाते और सभी मरने वाले अदृश्य तो होते हैं लेकिन बलवान नहीं होते। यह आत्मा के कर्म और गति पर निर्भर करता है। बहुत से भूत या प्रेत योनि में न जाकर पुन: गर्भधारण कर मानव बन जाते हैं।

पितृ पक्ष में हिन्दू अपने पितरों का तर्पण करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि पितरों का अस्तित्व आत्मा अथवा भूत-प्रेत के रूप में होता है। गरुड़ पुराण में भूत-प्रेतों के विषय में विस्तृत वर्णन मिलता है।
10…  आत्मा
आत्मा या आत्मन् पद भारतीय दर्शन के महत्त्वपूर्ण प्रत्ययों (विचार) में से एक है। यह उपनिषदों के मूलभूत विषय-वस्तु के रूप में आता है। जहाँ इससे अभिप्राय व्यक्ति में अन्तर्निहित उस मूलभूत सत् से किया गया है जो कि शाश्वत तत्त्व है तथा मृत्यु के पश्चात् भी जिसका विनाश नहीं होता।

आत्मा का निरूपण श्रीमद्भगवदगीता या गीता में किया गया है। आत्मा को शस्त्र से काटा नहीं जा सकता, अग्नि उसे जला नहीं सकती, जल उसे गला नहीं सकता और वायु उसे सुखा नहीं सकती।
जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को त्याग कर नवीन शरीर धारण करता है।

आत्मा और परमात्माय दोनो अलग-अलग है आत्मा रचना है और परमात्मा उसके रचीयता है इस आधार से दोनो मे पिता-पुत्र क नाता हो जाता है दोनो क स्वरूप भी एक जैसा ही है. आत्मा और परमत्मा दोनो के गुन भी समान ही है आत्म के गुन है घ्यान स्वरूप,प्रेम स्वरूप, पवित्रता स्वरूप,शान्त स्वरूप,सुख स्वरूप,आन्नद स्वरूप, एव शक्ति स्वरूप, परमत्मा के गुन है ग्यान के सागर, प्रेम के सागर, पवित्रता के सागर,शान्ति के सागर,सुख के सागर,आन्नद के सागर,एव सर्व शाक्तिमान है आत्मा जन्म-मरन मै आती है परमात्मा जन्म- मरन मे नहि आते , आत्मा पूरे कल्प मे ८४ जन्मो क पार्ट बजाना होता है कल्प चार युगो का होता है सतयुग.त्रेता,द्वापुर एव कलयुग !

आचार्य शंकर ने आत्मा के अस्तित्व के समर्थन में प्रबल प्रमाण उपस्थित किया है। उनका सबसे बड़ा प्रमाण है, आत्मा की स्वयं सिद्धी अर्थात् आत्मा अपना स्वत: प्रमाण है। उसको सिद्ध करने के लिए किसी बाहरी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। वह प्रत्यगात्मा है अर्थात् उसी से विश्व के समस्त पदार्थों का प्रत्यय होता है; प्रमाण भी उसी के ज्ञान के विषय हैं। अत: उसको जानने में बाहरी प्रमाण असमर्थ हैं। परन्तु यदि किसी प्रमाण की आवश्कता हो तो, इसके लिए ऐसा कोई नहीं कहता कि ‘मैं नहीं हूँ’। ऐसा कहने वाला अपने अस्तित्व का ही निराकरण कर बैठेगा। वास्तव में जो कहता है कि ‘मैं नहीं हूँ’ वही आत्मा है (योऽस्य निराकर्ता तदस्य तद्रूपम्)।
11…… भूत-प्रेत की अवधारणा
1- किसी को भूत-प्रेत के अस्तित्व में विश्वास हो या न हो, वह भूत-प्रेत के प्रति अपनी रुचि अवश्य ही प्रदर्शित करता है।

2- यद्यपि भूत-प्रेतों के अधिकांश प्रमाण उपाख्यात्मक होते हैं फिर भी इतिहास गवाह है कि आरम्भ से ही लोगों का भूत-प्रेत में व्यापक रूप से विश्वास रहा है।

3- भूत-प्रेत की अवधारणा उतनी ही पुरानी है जितना कि स्वयं मनुष्य है। कहा जाता है कि भूत-प्रेत मृतक व्यक्तियों के आभास होते हैं जो कि प्रायः मृतक व्यक्तियों के जैसे ही दृष्टिगत होते हैं।

4- अनेकों देशों की लोकप्रिय संस्कृतियों में भूत-प्रेतों का मुख्य स्थान है। सभी देशों के संस्कृतियों में भूत-प्रेतों से सम्बंधित लोककथाएँ तथा साहित्य पाई जाती हैं।

5- एक व्यापक धारणा यह भी है कि भूत-प्रेतों के शरीर धुंधलके तथा वायु से बने होते हैं अर्थात् वे शरीर-विहीन होते हैं।

6- अधिकतर संस्कृतियों के धार्मिक आख्यानों में भूत-प्रेतों का जिक्र पाया जाता है।

7- हिन्दू धर्म में “प्रेत योनि”, इस्लाम में “जिन्नात” आदि का वर्णन भूत-प्रेतों के अस्तित्व को इंगित करते हैं।

8- पितृ पक्ष में हिन्दू अपने पितरों को तर्पण करते हैं। इसका अर्थ हुआ कि पितरों का अस्तित्व आत्मा अथवा भूत-प्रेत के रूप में होता है।

9- गरुड़ पुराण में भूत-प्रेतों के विषय में विस्तृत वर्णन किया गया है।

10- श्रीमद्भागवत पुराण में भी धुंधकारी के प्रेत बन जाने का वर्णन आता है।

11- भूत-प्रेत प्रायः उन स्थानों में दृष्टिगत होते हैं जिन स्थानों से मृतक का अपने जीवनकाल में सम्बन्ध रहा होता है।

12- भूत-प्रेत शब्द का प्रयोग मृतात्माओं के संदर्भ में भी किया जाता है।

13- मरे हुए जानवरों के भूत के विषय में भी जानकारी मिलती है।

14- जहाँ भूत-प्रेतों का वास हो उन्हें भुतहा स्थान कहा जाता है।

15- भूत-प्रेतों से सम्बंधित फिल्में तथा टी वी कार्यक्रम भी व्यापक रूप से लोकप्रिय रहे हैं।

16- आप अपने बच्चों भूत-प्रेत की कहानियां या आवाज़ें सुनाकर डराते हैं और सोने के लिए दबाव डालते हैं तो आप ग़लत करते हैं. क्योंकि इससे उनकी मानसिक सोच पर असर पड़ता है !

17- सन् 2005 में गेलुप आर्गेनाइजेशन के द्वारा किये गये सर्वेक्षण से ज्ञात होता है कि 32% अमरीकी भूत-प्रेतों में विश्वास रखते हैं।
12… प्रेतबाधा से मुक्ति के 10 सरल उपाय
हिन्दू धर्म में भूतों से बचने के अनेक उपाय बताए गए हैं। चरक संहिता में प्रेत बाधा से पीड़ित रोगी के लक्षण और निदान के उपाय विस्तार से मिलते हैं।

ज्योतिष साहित्य के मूल ग्रंथों- प्रश्नमार्ग, वृहत्पराषर, होरा सार, फलदीपिका, मानसागरी आदि में ज्योतिषीय योग हैं जो प्रेत पीड़ा, पितृ दोष आदि बाधाओं से मुक्ति का उपाय बताते हैं।

अथर्ववेद में भूतों और दुष्ट आत्माओं को भगाने से संबंधित अनेक उपायों का वर्णन मिलता है। यहां प्रस्तुत है प्रेतबाधा से मुक्ति के 10 सरल उपाय।

1. ॐ या रुद्राक्ष का अभिमंत्रित लॉकेट गले में पहने और घर के बाहर एक त्रिशूल में जड़ा ॐ का प्रतीक दरवाजे के ऊपर लगाएं। सिर पर चंदन, केसर या भभूति का तिलक लगाएं। हाथ में मौली (नाड़ा) अवश्य बांध कर रखें।

2. दीपावली के दिन सरसों के तेल का या शुद्ध घी का दिया जलाकर काजल बना लें। यह काजल लगाने से भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी आदि से रक्षा होती है और बुरी नजर से भी रक्षा होती है।

3. घर में रात्रि को भोजन पश्चात सोने से पूर्व चांदी की कटोरी में देवस्थान या किसी अन्य पवित्र स्थल पर कपूर तथा लौंग जला दें। इससे आकस्मिक, दैहिक, दैविक एवं भौतिक संकटों से मुक्त मिलती है।

4. प्रेत बाधा दूर करने के लिए पुष्य नक्षत्र में चिड़चिटे अथवा धतूरे का पौधा जड़सहित उखाड़ कर उसे धरती में ऐसा दबाएं कि जड़ वाला भाग ऊपर रहे और पूरा पौधा धरती में समा जाएं। इस उपाय से घर में प्रेतबाधा नहीं रहती और व्यक्ति सुख-शांति का अनुभव करता है।

5. प्रेत बाधा निवारक हनुमत मंत्र – ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ऊँ नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत पिशाच-शाकिनी-डाकिनी-यक्षणी-पूतना-मारी-महामारी, यक्ष राक्षस भैरव बेताल ग्रह राक्षसादिकम्‌ क्षणेन हन हन भंजय भंजय मारय मारय शिक्षय शिक्षय महामारेश्वर रुद्रावतार हुं फट् स्वाहा।

इस हनुमान मंत्र का पांच बार जाप करने से भूत कभी भी निकट नहीं आ सकते।

6. अशोक वृक्ष के सात पत्ते मंदिर में रख कर पूजा करें। उनके सूखने पर नए पत्ते रखें और पुराने पत्ते पीपल के पेड़ के नीचे रख दें। यह क्रिया नियमित रूप से करें, आपका घर भूत-प्रेत बाधा, नजर दोष आदि से मुक्त रहेगा।

7. गणेश भगवान को एक पूरी सुपारी रोज चढ़ाएं और एक कटोरी चावल दान करें। यह क्रिया एक वर्ष तक करें, नजर दोष व भूत-प्रेत बाधा आदि के कारण बाधित सभी कार्य पूरे होंगे।

8. मां काली के लिए उनके नाम से प्रतिदिन अच्छी तरह से पवित्र ‍की हुई दो अगरबत्ती सुबह और दो दिन ढलने से पूर्व लगाएं और उनसे घर और शरीर की रक्षा करने की प्रार्थना करें।

9. हनुमान चालीसा और गजेंद्र मोक्ष का पाठ करें और हनुमान मंदिर में हनुमान जी का श्रृंगार करें व चोला चढ़ाएं।

10. मंगलवार या शनिवार के दिन बजरंग बाण का पाठ शुरू करें। यह डर और भय को भगाने का सबसे अच्छा उपाय है।

इस तरह यह कुछ सरल और प्रभावशाली टोटके हैं, जिनका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं होता। ध्यान रहें, नजर दोष, भूत-प्रेत बाधा आदि से मुक्ति हेतु उपाय ही करने चाहिए टोना या टोटके नहीं।

सावधानी : सदा हनुमानजी का स्मरण करें। चतुर्थी, तेरस, चौदस और अमावस्या को पवि‍त्रता का पालन करें। शराब न पीएं और न ही मांस का सेवन करें।
13… 1. प्रेत शक्तियों से बचाव के लिए शरीर को पाक पवित्र रखें। इसके अतिरिक्त साधक आकर्षक व सुगंधित वस्तुओं के प्रयोग करते समय विशेष सावधानी का ध्यान रखें।
2. देवदारू, हींग, सरसो, जौ, नीम की पत्ती, कुटकी, कटेली, चना व मोर के पंख को गाय के घी तथा लोहबान में मिरित करके मिट्टी के पात्र में रख लें, फिर उसे अग्नि से जलाकर उसका धुंआ प्रेतादि बाधा से पीड़ित जातक को दिखाएं। इस प्रक्रिया को नित्य कुछ दिनों तक दोहराते रहें, अवश्य लाभ मिलेगा।
3. मंगलवार व शनिवार के दिन जावित्री व श्वेत अपराजिता के पत्ते को आपस में पीसकर उसके रस को प्रेतादि या ऊपरी बाधा से पीड़ित जातक को सुंघाएं। इन नकारात्मक शक्तियों से अवश्य ही मुक्ति मिलेगी।
4. सेंधा नमक, चंदन, कूट, घृत व चर्बी को सरसो के तेल के साथ मिश्रित करके किसी मिट्टी के पात्र में रख लें। फिर उसे अग्नि से जलाकर उसका धुआं प्रेतादि बाधा से पीड़ित जातक को दिखाएं। इस प्रक्रिया को शनिवार अथवा मंगलवार से प्रारंभ करके नित्य 21 दिनों तक दोहराएं। ऊपरी बाधा से अवश्य ही मुक्ति मिलेगी।
5. बबूल, देवदारू, बेल की जड़ व प्रियंगु को धूप अथवा लोहबार के साथ मिश्रित करके मिट्टी के पात्र में रख लें तथा फिर उसे अग्नि से जलाकर उसके धुएं को पीड़ित जातक के ऊपर से उतारें। मंगल या शनिवार से इस कार्य को प्रारंभ करके इसे 21 दिनों तक दोहराते रहें। जब यह प्रयोग समाप्त हो जाए, तो 22वें दिन जली हुई सारी सामग्री को किसी चौराहे पर मिट्टी के पात्र सहित प्रातः सूर्य उदय से पूर्व फेंक आएं। अवश्य लाभ होगा।
6. मंगलवार या शनिवार के दिन लौंग, रक्त-चंदन, धूप, लोहबान, गौरोचन, केसर, बंसलोचन, समुद्र-सोख, अरवा चावल, कस्तूरी, नागकेसर, जई, भालू के बाल व सुई को भोजपत्र के साथ अपने शरीर व लग्न के अनुकूल धातु के ताबीज में भरकर गले में धारण करें। शरीर पर प्रेतादि जैसे नकारात्मक तत्वों का कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ सकता।

प्रेत बाधा दूर करने के लिए पुष्य नक्षत्र में चिरचिटे अथवा धतूरे का पौधा जड़ सहित उखाड़कर, यदि इस प्रकार धरती में दबा दिया जाए कि उसका जड़ वाला भाग ऊपर रहे और पूरा पौधा धरती में समा जाए तो उस परिवार में सुख-शान्ति बनी रहती है। वहां प्रेतात्माएं कभी भी डेरा नहीं जमातीं।
10… कहां से आक्रमण करते हैं भूत-प्रेत और मायावी शक्तियां?
भूत-प्रेतों का निवास नीचे दिए गए कुछ वृक्षों एवं स्थानों पर माना गया है। इन वृक्षों के नीचे एवं स्थानों पर किसी प्रकार की तेज खुशबू का प्रयोग एवं गंदगी नहीं करनी चाहिए, नहीं तो भूत-प्रेत का असर हो जाने की संभावना रहती है।

पीपल वृक्ष:- शास्त्रों में इस वृक्ष पर देवताओं एवं भूत-प्रेतों, दोनों का निवास माना गया है। अतः कभी भी पीपल के पेड़ नहीं काटने चाहिए। इसी कारण हर प्रकार के कष्ट एवं दुख को दूर करने हेतु इसकी पूजा अर्चना करने का विधान है।
मौलसिरी:- इस वृक्ष पर भी भूत-प्रेतों का निवास माना गया है।
कीकर वृक्ष:- इस वृक्ष पर भी भूत-प्रेत रहते हैं। ऐसा कहा जाता है कि तुलसीदास ने इस वृक्ष में रोज पानी डालकर इस वृक्ष पर रहने वाले प्रेत को प्रसन्न कर उसकी मदद से हनुमान जी के दर्शन प्राप्त कर प्रभु श्री राम से मिलने का सूत्र पाया था। यह भूत प्राणियों को लाभ पहुंचाने वाली श्रेणी का था।
श्मशान या कब्रिस्तान:- इन स्थानों पर भी भूत-प्रेत निवास करते है।

भूत-प्रेतों से सावधानी
जल में भूत-प्रेतों का निवास होता है। इसलिए किसी भी स्त्री-पुरुष को नदी-तालाब में, चाहे वह कितने ही निर्जन स्थान में क्यों न हों, निर्वस्त्र होकर स्नान नहीं करना चाहिए क्योंकि भूत-प्रेत गंदगी से रुष्ट होकर मनुष्यों को नुकसान पहुंचाते हैं। कुएं में भी किसी प्रकार की गंदगी नहीं डालनी चाहिए क्योंकि कुंए में भी विशेष प्रकार के जिन्न रहते हैं जो कि रुष्ट होने पर व्यक्ति को बहुत कष्ट देते हैं।

श्मशान या कब्रिस्तान में भी कभी कुछ नहीं खाना चाहिए और न ही वहां पर कोई मिठाई, सफेद व्यंजन, शक्कर या बूरा लेकर जाना चाहिए क्योंकि इनसे भी भूत-प्रेत बहुत जल्दी आकर्षित होते हैं। ऐसे स्थानों में रात में कोई तीव्र खुशबू लेकर भी नहीं जाना चाहिए तथा मलमूल त्याग भी नहीं करना चाहिए। किसी भी अनजान व्यक्ति से विशेष रूप से दी गई इलायची, सेब, केला, लौंग आदि नहीं खानी चाहिए, क्योंकि यह भूत-प्रेत से प्रभावित करने के विशेष साधन माने गए हैं।

भूत-प्रेत से बचाव
यदि अनुभव हो कि भूत प्रेत का असर है तो घर में नियमित रूप से सुन्दरकांड या हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा सूर्य देव को जल चढ़ाएं।
1. यदि किसी मनुष्य पर भूत-प्रेत का असर अनुभव हो, तो उसकी चारपाई के नीचे नीम की सूखी पत्ती जलाएं।
2. मंगल या शनिवार को एक समूचा नींबू लेकर भूत-प्रेत ग्रसित व्यक्ति के सिर से पैर तक 7 बार उतारकर घर से बाहर आकर उसके चार टुकड़े कर चारों दिशाओं में फेंक दें। यह ध्यान रहे कि जिस चाकू से नींबू काटा है उसे भी फेंक देना चाहिए।

जन्म-कुंडली में बनने वाले कुछ प्रेत अरिष्ट योग इस प्रकार हैं:-
1. सूर्य अथवा चन्द्र यदि तृतीय भाव में पापी ग्रहों के साथ हैं तो बच्चा बीमार रहेगा अथवा कुछ समय पश्चात उसकी मृत्यु हो जाती है।
2. यदि चंद्र अष्टम भाव के स्वामी के साथ केंद्रस्थ है तथा अष्टम भाव में भी पापी ग्रह हैं तो शीघ्र मृत्यु होती है।
3. यदि चंद्र से सप्तम भाव में मंगल एवं शनि हैं तथा राहु लग्नस्थ है तो जन्म के कुछ दिनों के अन्दर ही मृत्यु हो जाती है।

इस प्रकार कुंडली में आने वाले कुछ भूत-प्रेत बाधा योग ये हैं:-
1. यदि कुंडली में चंद्रमा अथवा लग्न लग्नेश पर राहु केतु का प्रभाव है तो उस जातक पर ऊपरी हवा, जादू-टोने इत्यादि का असर अति शीघ्र होता है।
2. कुंडली में सप्तम भाव में अथवा अष्टम भाव में क्रूर ग्रह राहु-केतु, मंगल, शनि पीड़ित अवस्था में हैं तो ऐसा जातक भूत-प्रेत, जादू-टोने तथा ऊपरी हवा आदि जैसी परेशानियों से अति शीघ्र प्रभावित होता है।

बालारिष्ट एवं भूत-प्रेत बाधाओं का पारस्परिक संबंध
जन्म कुंडली में लग्न भाव, आयु भाव अथवा मारक भाव पर यदि पाप प्रभाव होता है तो जातक का स्वास्थ्य प्राय निर्बल रहता है अथवा उसे दीर्घायु की प्राप्ति नहीं होती है। साथ ही चन्द्रम, लग्नेश तथा अष्टमेश का अस्त होना, पीड़ित होना अथवा निर्बल होना भी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि जातक अस्वस्थ रहेगा या उसकी कुंडली में अल्पायु योग हैं। ठीक इसी प्रकार चंद्रमा लग्न, लग्नेश अष्टमेश पर पाप प्रभाव इन ग्रहों की पाप ग्रहों के साथ युति अथवा कुंडली में कहीं-कहीं पर चंद्र की राहु-केतु के साथ युति यह दर्शाती है कि जातक पर भूत-प्रेत का प्रकोप हो सकता है। मुख्यतः चंद्र-केतु की युति यदि लग्न में हो तथा मंचमेश और नवमेश भी राहु के साथ सप्तम भाव में है तो यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि जातक ऊपरी हवा इत्यादि से ग्रस्त होगा। फलतः उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, स्वास्थ्य तथा आयु पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा।

उपर्युक्त ग्रह योगों से प्रभावित कुंडली वाले जातक प्रायः मानसिक अवसाद से ग्रस्त रहते हैं। उन्हें नींद भी ठीक से नहीं आती है। एक अनजाना भय प्रति क्षण सताता रहता है तथा कभी-कभी तो वे आत्महत्या करने की स्थिति तक पहुंच जाते हैं। जो ग्रह भाव तथा भावेश बालारिष्ट का कारण होते हैं, लगभग उन्हीं ग्रहों पर पाप प्रभाव भावेशों का पीड़ित, अस्त अथवा निर्बल होना इस बात का भी स्पष्ट संकेत करता है कि जातक की कुंडली में भूत-प्रेत बाधा योग भी है। अतः स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि बालाश्रिष्ट तथा भूत-प्रेत बाधा का पारस्परिक संबंध अवश्य होता है।
11… तंत्र साधना
नजर लगना, उन्माद भूतोन्माद, ग्रहों का अनिष्ट, बुरे दिन, किसी के द्वारा प्रेरित अभिचार, मानसिक उद्वेग आदि को शांत किया जा सकता है । शारीरिक रोगों के निवारण, सर्प, बिच्छू आदि का दर्शन एवं विषैले फोड़ों का समाधान भी तंत्र द्वारा होता है । छोटे बालकों पर इस विद्या का बड़ी आसानी से भला या बुरा प्रभाव डाला जा सकता है ।
तंत्र साधना द्वारा सूक्ष्म जगत में विचरण करने वाली अनेक चेतना ग्रंथियों में से किसी विशेष प्रकार की ग्रंथि को अपने लिये जाग्रत, चैतन्य, क्रियाशील एवं अनुचरी बनाया जा सकता है । देखा गया है कि कई तांत्रिकों के मसान, पिशाच, भैरव, छाया, पुरुष, से बड़ा, ब्रह्मराक्षस, वेताल, कर्ण-पिशाचनी, त्रिपुरी-सुन्दरी, कालरात्रि, दुर्गा आदि की सिद्धि होती है ।

जैसे कोई सेवक प्रत्यक्ष शरीर से किसी यहाँ नौकर रहता है और मालिक की आज्ञानुसार काम करता है, वैसे ही यह शक्तियाँ अप्रत्यक्ष शरीर से उस तंत्र-सिद्धि पुरुष के वश में होकर सदा उसके समीप उपस्थित रहती हैं और जो आज्ञा दी जाती हैं उनको वे अपनी सामर्थ्यनुसार पूरा करती हैं । इस रीति से कई बार ऐसे-ऐसे अद्भूत का किये जाते हैं कि उनके आश्चर्य से दंग हो जाना पड़ता है ।

होता यह है कि अदृश्य लोक में कुछ ”चेनता ग्रन्थियाँ” सदा विचरण करती रहती हैं । तांत्रिक साधना-विधानों द्वारा अपने योग्य गंथियों को पकड़ कर उनमें प्राण डाला जाता है । जब वह प्राणवान हो जाती हैं तब उनका सीधा आक्रमण साधक पर होता है, यदि साधक अपनी आत्मिक बलिष्ठता द्वारा उस आक्रमण को सह गया, उससे परास्त न हुआ तो प्रतिहत होकर वह ग्रन्थि उसके वशवर्ती हो जाती है और चौबीसों घण्टे के साथी आज्ञाकारी सेवक की तरह काम करती है ।

निर्जन, श्मशान आदि भयंकर प्रदेशों में ऐसी रोमांचकारी विधि-व्यवस्था का प्रयोग करना पड़ता है, जिससे साधारण मनुष्य का कलेजा दहज जाता है । उस समय में ऐसे घोर अनुभव होते हैं, जिनमें डर जाने, बीमार पड़ जाने, पागल हो जाने या मृत्यु के मुखी में चले जाने की आशंका रहती है । ऐसी साधनाएँ हर कोई नहीं कर सकता कोई करले तो सिद्धि मिलने पर उस अदृश्य शक्तियों को साध रखने की जो कष्टसाध्य शर्त्तें होती हैं उन्हें पालन नहीं कर सकता । यही कारण है, जो साहस करते हैं उसमें से कोई विरले ही साहस करते हैं और जो सफल होते हैं उनमें से कोई विरले ही अन्तकाल तक उनसे समुचित लाभ उठा पाते हैं ।
आत्माओँ के विभिन्न प्रकार भारत देश मेँ ,

1.भूत :- सामान्य भूत जिसके बारे में आप अक्सर सुनते है

2.प्रेत :- परिवार के सताए हुए बिना क्रियाकर्म के मरे आदमी

3.हाडल :- बिना नुक्सान पहुचाये प्रेतबाधित करने वाली आत्माए

4.चेतकिन :- चुडेले जो लोगो को प्रेतबाधित कर दुर्घटनाए करवाती है

5.मुमिई :- मुंबई के कुछ घरो में प्रचलित प्रेत

6.विरिकस:- घने लाल कोहरे में छिपी और अजीबोगरीब आवाजे निकलने वाला

7.मोहिनी या परेतिन : -प्यार में धोका खाने वाली आत्माए

8.शाकिनी:- शादी के कुछ दिनों बाद दुर्घटना से मरने वाली औरत की आत्मा | कम खतरनाक

9.डाकिनी :- मोहिनी और शाकिनी का मिला जुला रूप | किन्ही कारणों से हुई मौत से बनी आत्मा

10.कुट्टी चेतन :- बच्चे की आत्मा जिसपर तांत्रिको का नियंत्रण होता है

11.ब्रह्मोदोइत्यास :- बंगाल में प्रचलित | शापित ब्राह्मणों की आत्माए

12.सकोंधोकतास :- बंगाल में प्रचलित | रेल दुर्घटना में मरे लोगो की सर कटी आत्मा

13.निशि :- बंगाल में प्रचलित | अँधेरे में रास्ता दिखाने वाली आत्मा

14.कोल्ली देवा :- कर्नाटक में प्रचलित | जंगलो में हाथो में टोर्च लिए घुमती आत्माए

15.कल्लुर्टी ,:-कर्नाटक में प्रचलित | आधुनिक रीती रिवाजो से मरे लोगो की आत्मा

16.किचचिन:- बिहार में प्रचलित | हवस की भूखी आत्मा

17.पनडुब्बा:- बिहार में प्रचलित | नदी में डूबकर मरे लोगो की आत्मा

18.चुड़ैल:- उत्तरी भारत में प्रचलित | राहगीरों को मारकर बरगद के पेड़ पर लटकाने वाली आत्मा

19.बुरा डंगोरिया :- आसाम में प्रचलित | सफ़ेद कपडे और पगड़ी पहने घोड़े पसर सवार आत्मा

20.बाक :- आसाम में प्रचलित | झीलों के पास घुमती आत्माए

21.खबीस :- पाकिस्तान ,गुल्फ देशो और यूरोप में प्रचलित |जिन्न परिवार से ताल्लुक रखने वाली आत्मा

22.घोडा पाक :- आसाम में प्रचलित | घोड़े के खुर जैसे पैर बाकी मनुष्य

23.बीरा :- आसाम में प्रचलित परिवार को खो देने वाली आत्माए

24.जोखिनी :-आसाम में प्रचलित पुरुषो को मारने वाली आत्मा

25.पुवाली भूत :-आसाम में प्रचलित छोटे घर के सामनो को चुराने वाली आत्माए

26.रक्सा :- छतीसगढ़ मे प्रचलित कुँवारे मरने वालो की खतरनाक आत्मा ,

27. मसान:- छतीसगढ़ की प्रचलित पाँच छै सौ साल पुरानी प्रेत आत्मा नरबलि लेते हैँ , जिस घर मेँ निवास करेँ पुरे परिवार को धीरे धीरे मार डालते हैँ ,

28.चटिया मटिया :- छतीसगढ़ मेँ प्रचलित बौने भुत जो बचपन मेँ खत्म हो जाते हैँ वो बनते हैँ बच्चो को नुकसान नहीँ पहुँचाते । आँखे बल्ब की तरह हाथ पैर उल्टे काले रंग के ,, मक्खी के स्पीड मेँ भागने वाले चोरी करने वाली आत्मा ,

29. बैताल:- पीपल पेड़ मेँ निवास करते हैँ एकदम सफेद रंग वाले ,, खतरनाक आत्मा

30. चकवा या भुलनभेर :- रास्ता भटकाने वाली आत्मा महाराष्ट्र ,एमपी आदि मेँ पाया जाता हैँ ,,

31. उदु:- तलाब या नहर मेँ पाये जाने वाली आत्मा जो आदमियोँ को पुरा खा जाऐँ , छतीसगढ़ मेँ प्रचलित ,,

32. गल्लारा :- अकाल मरे लोगो की आत्मा धमाचौकडी मचाने वाली आत्मा छतीसगढ़ मेँ प्रचलित ,

34. भंवेरी :- नदी मेँ पायी जाने वाली आत्मा जो पानी मेँ डुब कर मरते हैँ पानी मेँ भंवर उठाकर नाव या आदमी को डूबा देने वाली आत्मा ,, छतीसगढ़ मेँ प्रचलित

35. गरूवा परेत:- बिमारी या ट्रेन से कटकर मरने वाले गांयो और बैलो की आत्मा जो कुछ समय के लिए सिर कटे रूप मेँ घुमते दिखतेँ हैँ नुकसान नही पहुचातेँ ! छतीसगढ मेँ प्रचलित ,

36. हंडा :- धरती मेँ गडे खजानोँ मेँ जब जीव पड़ जाता हैँ याने प्रेत का कब्जा तो उसे हंडा परेत कहते हैँ , ये जिनके घर मेँ रहते हैँ वे हमेशा अमीर रहते हैँ , हंडा का अर्थ हैँ कुंभ , जिसके अंदर हीरे सोने आदि भरे रहते हैँ ,, जो लालच वश हंडा को चुराने का प्रयास करेँ उसे ये खा जाते हैँ , ये चलते भी हैँ ! छतीसगढ़ मेँ प्रचलित…

12….कभी-कभी व्यक्ति का चौराहे पर रखी हुई वस्तु पर पैर पड़ जाता है या लाग हो जाती है या कोई व्यंतर
अदृश्य बला से मुक्ति
आत्मा का शरीर से स्पर्श हो जाता है अथवा प्रेतात्मा आदि का साया पड़ जाता है तो व्यक्ति तुरंत अस्वस्थ हो जाता है। वह पागलों जैसी हरकतें कर सकता है, ज्वर से पीड़ित हो सकता है, उसका खाना-पीना छूट सकता है। इन सब कारणों का निदान चिकित्सकों के पास नहीं होता, इनका उपचार सिर्फ टोटकों द्वारा ही संभव होता है।
यह टोटका निम्न प्रकार से किया जाता है-
* सबसे पहले गाय के गोबर का कंडा व जली लकड़ी की राख को पानी से भिगोकर एक लड्डू बनाएँ।
* इसके बाद इसमें एक सिक्का गाड़ दें।
* फिर उस पर काजल और रोली की सात बिंदी लगा दें।
* तत्पश्चात्‌लोहे की एक कील उसमें गाड़ दें।
* अब उस लड्डू को अस्वस्थ व्यक्ति के ऊपर से सात बार उतारकर चुपचाप नजदीक के किसी चौराहे पर रख आएँ।
* आते-जाते समय किसी से बातचीत न करें तथा पीछे मुड़कर भी न देखें। इस क्रिया से रोगी बहुत जल्दी स्वस्थ हो जाएगा।
दूसरा प्रयोग :
* झाडू व धान कूटने वाला मूसल अस्वस्थ व्यक्ति के ऊपर से उतारकर उसके सिरहाने रख दें।
* अपने बाएँ पैर का जूता अस्वस्थ व्यक्ति के ऊपर से सात बार उतारकर (घुमाकर) प्रत्येक बार उल्टा जूता जमीन पर पीटें।
* सात ही बार वह जूता उस व्यक्ति को सुँघाएँ, इस प्रक्रिया से भी अस्वस्थ व्यक्ति ठीक हो जाएगा।
किसी भटकती आत्मा की लाग
* यदि किसी व्यक्ति को किसी भटकती आत्मा (शाकिनी, प्रेतनी) की लाग हो गई हो तो गंधक, गुग्गुल, लाख, लोबान, हाथी दाँत, सर्प की केंचुली व पीड़ित व्यक्ति के सिर का एक बाल लेकर सबको मिलाकर व पीसकर जलाएँ तथा उसका धुआँ रोगी को दें। इससे व्यक्ति पर से लाग हट जाती है।…

13…ऊपरी हवाओं के प्रभाव से मुक्ति के सरल उपाय
ऊपरी हवाओं से मुक्ति हेतु शास्त्रों में अनेक उपाय बताए गए हैं। अथर्ववेद में इस हेतु कई मंत्रों व स्तुतियों का उल्लेख है। आयुर्वेद में भी इन हवाओं से मुक्ति के उपायों का विस्तार से वर्णन किया गया है। यहां कुछ प्रमुख सरल एवं प्रभावशाली उपायों का विवरण प्रस्तुत है।
ऊपरी हवाओं से मुक्ति हेतु हनुमान चालीसा का पाठ और गायत्री का जप तथा हवन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त अग्नि तथा लाल मिर्ची जलानी चाहिए।
रोज सूर्यास्त के समय एक साफ-सुथरे बर्तन में गाय का आधा किलो कच्चा दूध लेकर उसमें शुद्ध शहद की नौ बूंदें मिला लें। फिर स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर मकान
की छत से नीचे तक प्रत्येक कमरे, जीने, गैलरी आदि में उस दूध के छींटे देते हुए द्वार तक आएं और बचे हुए दूध को मुख्य द्वार के बाहर गिरा दें। क्रिया के दौरान इष्टदेव का स्मरण करते रहें। यह क्रिया इक्कीस दिन तक नियमित रूप से करें, घर पर प्रभावी ऊपरी हवाएं दूर हो जाएंगी।
रविवार को बांह पर काले धतूरे की जड़ बांधें, ऊपरी हवाओं से मुक्ति मिलेगी।
लहसुन के रस में हींग घोलकर आंख में डालने या सुंघाने से पीड़ित व्यक्ति को ऊपरी हवाओं से मुक्ति मिल जाती है।
ऊपरी बाधाओं से मुक्ति हेतु निम्नोक्त मंत्र का यथासंभव जप करना चाहिए।
” ओम नमो भगवते रुद्राय नमः कोशेश्वस्य नमो ज्योति पंतगाय नमो रुद्राय नमः सिद्धि स्वाहा।”
घर के मुख्य द्वार के समीप श्वेतार्क का पौधा लगाएं, घर ऊपरी हवाओं से मुक्त रहेगा।
उपले या लकड़ी के कोयले जलाकर उसमें धूनी की विशिष्ट वस्तुएं डालें और उससे उत्पन्न होने वाला धुआं पीड़ित व्यक्त्ि को सुंघाएं। यह क्रिया किसी ऐसे व्यक्ति से करवाएं जो अनुभवी हो और जिसमें पर्याप्त आत्मबल हो।
प्रातः काल बीज मंत्र ÷क्लीं’ का उच्चारण करते हुए काली मिर्च के नौ दाने सिर पर से घुमाकर दक्षिण दिशा की ओर फेंक दें, ऊपरी बला दूर हो जाएगी।
रविवार को स्नानादि से निवृत्त होकर काले कपड़े की छोटी थैली में तुलसी के आठ पत्ते, आठ काली मिर्च और सहदेई की जड़ बांधकर गले में धारण करें, नजर दोष बाधा से मुक्ति मिलेगी।
निम्नोक्त मंत्र का १०८ बार जप करके सरसों का तेल अभिमंत्रित कर लें और उससे पीड़ित व्यक्ति के शरीर पर मालिश करें, व्यकित पीड़ामुक्त हो जाएगा।
मंत्र : ओम नमो काली कपाला देहि देहि स्वाहा।
ऊपरी हवाओं के शक्तिषाली होने की स्थिति में शाबर मंत्रों का जप एवं प्रयोग किया जा सकता है। प्रयोग करने के पूर्व इन मंत्रों का दीपावली की रात को अथवा होलिका दहन की रात को जलती हुई होली के सामने या फिर श्मषान में १०८ बार जप कर इन्हें सिद्ध कर लेना चाहिए। यहां यह उल्लेख कर देना आवष्यक है कि इन्हें सिद्ध करने के इच्छुक साधकों में पर्याप्त आत्मबल होना चाहिए, अन्यथा हानि हो सकती है।
निम्न मंत्र से थोड़ा-सा जीरा ७ बार अभिमंत्रित कर रोगी के शरीर से स्पर्श कराएं और उसे अग्नि में डाल दें। रोगी को इस स्थिति में बैठाना चाहिए कि उसका धूंआ उसके मुख के सामने आये। इस प्रयोग से भूत-प्रेत बाधा की निवृत्ति होती है।
मंत्र : जीरा जीरा महाजीरा जिरिया चलाय। जिरिया की शक्ति से फलानी चलि जाय॥ जीये तो रमटले मोहे तो मशान टले। हमरे जीरा मंत्र से अमुख अंग भूत चले॥ जाय हुक्म पाडुआ पीर की दोहाई॥
एक मुट्ठी धूल को निम्नोक्त मंत्र से ३ बार अभिमंत्रित करें और नजर दोष से ग्रस्त व्यक्ति पर फेंकें, व्यक्ति को दोष से मुक्ति मिलेगी।
मंत्र : तह कुठठ इलाही का बान। कूडूम की पत्ती चिरावन। भाग भाग अमुक अंक से भूत। मारुं धुलावन कृष्ण वरपूत। आज्ञा कामरु कामाख्या। हारि दासीचण्डदोहाई।
थोड़ी सी हल्दी को ३ बार निम्नलिखित मंत्र से अभिमंत्रित करके अग्नि में इस तरह छोड़ें कि उसका धुआं रोगी के मुख की ओर जाए। इसे हल्दी बाण मंत्र कहते हैं।
हल्दी गीरी बाण बाण को लिया हाथ उठाय। हल्दी बाण से नीलगिरी पहाड़ थहराय॥ यह सब देख बोलत बीर हनुमान। डाइन योगिनी भूत प्रेत मुंड काटौ तान॥ आज्ञा कामरु कामाक्षा माई। आज्ञा हाड़ि की चंडी की दोहाई॥
जौ, तिल, सफेद सरसों, गेहूं, चावल, मूंग, चना, कुष, शमी, आम्र, डुंबरक पत्ते और अषोक, धतूरे, दूर्वा, आक व ओगां की जड़ को मिला लें और उसमें दूध, घी, मधु और गोमूत्र मिलाकर मिश्रण तैयार कर लें। फिर संध्या काल में हवन करें और निम्न मंत्रों का १०८ बार जप कर इस मिश्रण से १०८ आहुतियां दें।
मंत्र : ओम नमः भवे भास्कराय आस्माक अमुक सर्व ग्रहणं पीड़ा नाशनं कुरु-कुरु स्वाहा।

जानिए उपरी बाधा के बारे में :-
माने या ना माने लेकिन उपरी बाधा होती है जैसे प्राय: सुनने में आता है कि उसके ऊपर भूत आ गया है या उसको प्रेत ने पकड़ लिया है, ऐसे लोगों के ऊपर दावा भी असर नहीं करती है लोग इस परेशानी से बचने के लिए तांत्रिक , मौलवी और ओझा के पास जा कर रोज उनके चक्कर काटते है , और ये लोग भूत प्रेतों से छुटकारा दिलाने के नाम पर मोटे पैसे ले लेते है लेकिन परेशानी फिर भी ख़त्म नहीं होती …
कब और किन परिसिथतियों में डालती हैं ऊपरी हवाएँ किसी व्यकित पर अपना प्रभाव ?

जब कोर्इ व्यकित दूध पीकर या कोर्इ सफेद मिठार्इ खाकर किसी चौराहे पर जाता है, तब ऊपरी हवाएँ उस पर अपना प्रभाव डालती हैं। गंदी जगहों पर इन हवाओं का वास होता है, इसीलिए ऐसी जगहों पर हाने वाले लोगों को ये हवाएँ अपने प्रभाव में ले लेती हैं। इन हवाओं का प्रभाव रजस्वला सित्रयों पर भी पड़ता है। कुएँ, बावड़ी आदि पर भी इनका वास होता है। विवाह व अन्य मांगलिक कार्यों के अवसर पर ये हवाएँ सक्रिय होती हैं। इसके अतिरिक्त रात और दिन के 12 बजे दरवाजे की चौखट पर इनका प्रभाव होता है।
दूध व सफेद मिठार्इ चन्द्र के धोतक हैं। चौराहा राहु का धोतक है। चन्द्र राहु का शत्रु है। अत: जब कोर्इ व्यकित उक्त चीजों का सेवन कर चौराहे पर जाता है तो उस पर ऊपरी हवाओं के प्रभाव की संभावना रहती है।
कोर्इ स्त्री जब राजस्वला होती है, तब उसका चन्द्र व मंगल दोनो दुर्बल हो जाते हैं। ये दोनो राहु व शनि के शत्रु हैं।
राजस्व में स्त्री अशुद्ध होती है और अशुद्धता राहु का धोतक हैै। ऐसे में उस स्त्री पर हवाओं के प्रकोप की सम्भावना रहती है।
कुएँ एवं बावड़ी का अर्थ होता है कि जल स्थान और चन्द्र जल स्थान का कारक है। चन्द्र राहु का शत्रु है, इसीलिए ऐसे स्थानों पर ऊपरी हवाओं का प्रभाव होता है।
जब किसी व्यकित की कुण्डली में किसी भाव विशेष पर सूर्य, गुरू, चन्द्र व मंगल का प्रभाव होता है, तब उसके घर विवाह व मांगलिक कार्य के अवसर हाते हैं, ये सभी ग्रह शनि व राहु के शत्रु हैं, अत: मांगलिक अवसरों पर ऊपरी हवाएँ व्यकित को परेशान कर सकती हैं।
दिन व रात के 12:00 बजे सूर्य व चन्द्र अपने पूर्ण बल की अवस्था में होते हैं, शनिव राहुल इनके शत्रु हैं, अत: इन्हें प्रभावित करते हैं। दरवाजे की चौखट राहु की धोतक हैं। अत: राहु क्षेत्र में चन्द्र या सूर्य को बल मिलता है, तो ऊपरी हवा सक्रिय होने की संभावना प्रबल होती है।
मनुष्य की दायीं आँख पर सूर्य की और बांयी पर चन्द्र का नियंत्रण होता है। इसीलिये ऊपरी हवाओं का प्रभाव सबसे पहले आँखों पर ही पड़ता है।
आइये जानते है ज्योतिष के माध्यम से …
पहला योगः कुण्डली में पहले भाव में चन्द्र के साथ राहु हो और पांचवे और नौवे भाव में क्रूर ग्रह सिथत हों। इस योग के होने पर जातक या जातिका पर भूत-प्रेत, पिशाच या गन्दी आत्माओं का प्रकोप शीघ्र होता है। यदि गोचर में भी यही सिथति हो तो अवश्य ऊपरी बाधाएँ तंग करती हैं।

दूसरा योग :यदि किसी कुण्डली में शनि, राहु, केतु या मंगल में से कर्इ भी ग्रहस सप्तम भाव में हो तो ऐसे लोग भी भूत-प्रेस बाधा या पिशाच या ऊपरी हवा आदि से परेशान रहते हैं।

तीसरा योग :यदि किसी की कुण्डली में शनि-मंगल-राहु की युति हो तो उसे भी ऊपरी बाधा, प्रेत पिशाच या भूत बाधा तंग करती है। उक्त योगों में दशा-अन्र्तदशा में भी ये ग्रह आते हों और गोचर में इन योगों की उपसिथति हो तो समझ लें कि जातक या जातिका इस कष्ट से अवश्य परेशान है।

यदि कुण्डली में इस प्रकार के योग हों तो इनसे बचने के लिए योगकारक ग्रहों के उपाय अथवा यहां एक प्रयोग बता रहे हैं उसे कर सकते हैं।
इस उपाय को किसी भी शुक्लपक्ष के मंगलवार से प्रारम्भ कर सकते हैं, हनुमान जी की मूर्ति के आगे बैठ कर बजरंग बाण का पाठ और इस मंत्र का 108 बार 45 दिनों तक नित्य जाप करें और रोगी के ऊपर जल छिडके ..

भूत-प्रेत बाधा निवारक श्री हनुमानजी का मन्त्र इस प्रकार हैं :-

नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत पिशाच-शाकिनी-डाकिनी यक्षणी-पूतना-मारी-महामारी, यक्ष राक्षस भैरव बेताल ग्रह राक्षसादिकम क्षणेन हन हन भंजय भंजय मारय मारय शिक्षय शिक्ष्य महामारेश्रवर रूद्रावतार हुं फट स्वाहा।

उक्त मंत्र को श्रद्वा, विश्वास के साथ जप कर मन्त्र से अभिमनित्रत जल पीडि़त जातक या जातिका को पिलाने या छींटे मारने से इस प्रकार की बाधा से मुकित मिलती है।

भूत-प्रेतों की गति एवं शक्ति अपार होती है। इनकी विभिन्न जातियाँ होती हैं और उन्हें भूत, प्रेस, राक्षस, पिशाच, यम, शाकिनी, डाकिनी, चुडै़ल, गंधर्व आदि विभिन्न नामों से पुकारा जाता है।

ज्योतिष के अनुसार राहु की महादशा में चन्द्र की अंतर्दशा हो और चन्द्र दशापति राहु से भाव 6, 8 या 12 में बलहीन हो, तो व्यकित पिशाच द्वेष से ग्रस्त होता है। वास्तुशस्त्र में भी उल्लेख है कि पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद, ज्येष्ठा, अनुराधा, स्वाति या भरणी नक्षत्र में शनि के सिथत होने पर शनिवार को गृह-निर्माण आरंभ नहीं करना चाहिए, अन्यथा वह घर राक्षसों, भूतों और पिशाचों से ग्रस्त हो जायेगा।

भूतादि से पीडि़त व्यकित की पहचान उसके स्वभाव एवं क्रिया में आये बदलाव से की जा सकती है। इन विभिन्न आसुरी शकितयों से पीडि़त होने पर लोगों के स्वभाव एवं कार्यकलापों में आये बदलावों का संक्षिप्त विवरण यहां प्रस्तुत है।

भूत पीड़ा :भूत से पीडि़त व्यकित किसी विश्यवास की तरह बात करता है। मूर्ख होने पर भी उसकी बांतो से लगता है कि वह कोर्इ ज्ञानी पुरूष हो। उसमें गजब की शकित आ जाती है। क्रुद्ध होने पर वह कर्इ व्यकितयों को एक साथ पछाड़ सकता है। उसकी आखें लाल हो जाती है और देह में कंपन होता है।

यक्ष पीड़ा :यक्ष प्रभावित व्यकित लाल वस्त्र में रूचि लेने लगता है। उसकी आवाज धीमी और चाल तेज हो जाती है इसकी आंखें ताबें जैसी दिखने लगती हैं। वह ज्यादातर आंखों से इशारा करता है।

पिशाच पीड़ा :पिशाच प्रभाविश व्यकित नग्न होते से भी हिचकता नहीं है। वह कमजोर हो जाता है और कटु शब्दों का प्रयोग करता है वह गंदा रहता है और उसकी देह से दुर्गन्ध आती है उसे भूख बहुत लगती है। वह एकान्त चाहता है और कभी-कभी रोने भी लगता है।

शाकिन पीड़ा :शाकिनी से सामान्यत: महिलायें पीडि़त होती हैं। शाकिनी से प्रभावित स्त्री को सारी देह दर्द रहता है। उसकी आँखों में भी पीड़ा होती है। वह अक्सर बेहोश भी हो जाया करती है। वह रोती और चिल्लाती रहती है, वह कांपती रहती है।

प्रेत पीड़ा :प्रेत से पीडि़त व्यकित चीखता-चिल्लाता है, रोता है और इधर-उधर भागता रहता है। वह किसी का कहा नहीं सुनता। उसकी वाणी कटु हो जाती है। वह खाता पीता नहीं है और तीव्र स्वर के साथ सांसे लेता है।

चूडैल :चूडैल प्रभावित व्यकित की देह पुष्ट हो जाती है। वह हमेंशा मुस्कराता रहता है और मांस खाना चाहता है।

इस तरह भूत-प्रेतादि प्रभावित व्यकितयों की पहचान भिन्न-भिन्न होती है। इन आसुरी शकितयों को वश में कर चुके लोगों की नजर अन्य लोगों को भी लग सकती है। इन शकितयों की पीड़ा से मुकित हेतु निम्नलिखित उपाय करने चाहिये।

यदि बच्चा बाहर से खेलकर, पढ़कर, घूमकर आये और थका घबराया परेशान सा लगे तो उसे नजर या हाय लगने की पहचान है। ऐसे में उसके सर से 7 लाल मिर्च और एक चम्मच रार्इ के दाने 7 बार घुमकारकर उतारा कर लें और फिर आग में जला दें।

यदि बेवजह डर लगता हो, डरावने सपने आते हों, तो हनुमान चालिसा और गजेन्द्र मोक्ष का पाठ करें और हनुमान मंदिर में हनुमान जी का श्रंगार करें व चोला चढ़ायें।

व्यकित की बीमार होने की सिथति में दवा काम नहीं कर रही हो, तो सिरहाने कुछ सिक्के रखें और सबेरे उन सिक्कों को शमशन में डाल आयें।

व्यवसाय बाधित हो, वांछित उन्नति नहीं हो रही हो तो 7 शनिवार को सिंदूर, चादी का वर्क, मोती चूर के पांच लडडू, चमेली का तेल, मीठा पान, सूखा नारियल और लौंक हनुमान जी को अर्पित करें।

किसी काम में मन न लगता हो, उचाट सा रहता हो तो रविवार को प्रात: भैरव मदिरा अर्पित करें और खाली बोतल को सात बार अपने सरसे उतारकर पीपल के पेड़ के नीचे रख दें। शनिवार को नारियल और बादाम जल में प्रवाहित करें।

अशोक वृक्ष के सात पत्ते मंदिर में रखकर पूजा करें। उनके सूखने पर नये पत्ते पीपल के पेड़ के नीचे रख दें। यह क्रिया नियमित रूप से करें, घर भूत-प्रेस बाधा, नजर दोष आदि से मुक्त रहेगा।

एक कटोरी चावल दान करें और गणेश भगवान को एक पूरी सुपारी रोज चढ़ायें। यह क्रिया एक वर्ष तक करें, नजर दोष व भूत-प्रेस बाधा आदि के कारण बाधित कार्य पूरे होेंगे।

इस तरह से कुछ सरल और प्रभावशाली टोटके हैं, जिनका कोर्इ प्रतिकूल प्रभाव नहीं होता। ध्यान रहे, नजर दोष, भूत-प्रेत बाधा आदि से मुक्त हेतु टोटके या उाय ही करवाने चाहिए टोना नहीं।

ऐसे पहचानें :-

जब कोर्इ व्यकित दूध पीकर या कोर्इ सफेद मिठार्इ खाकर किसी चौराहे पर जाता है, तब ऊपरी हवाएँ उस पर अपना प्रभाव डालती हैं। गंदी जगहों पर इन हवाओं का वास होता है। इसलिए ऐसी जगहों पर आने वाले लोगों को ये हवायें अपने प्रभाव में ले लेती हैं। इन हवाओं का प्रभाव रजस्वला सित्रयों पर भी पड़ता है। कुँए, बावड़ी आदि पर भी इनका वास होता है। विवाह व अन्य मांगलिक कार्य के अवसर पर ये हवाएँ सक्रिय होती हैं। इसके अतिरिक्त रात और दिन के 12:00 बजे दरवाजे की चौखट पर इनका प्रभाव होता है।

दूध व सफेद मिठार्इ चन्द्र के धोतक हैं। चौराहा राहु का धोतक है, चन्द्र राहु का शत्रु है। अत: जब कोर्इ व्यकित उक्त चीजों का सेवन कर चौराहे पर जाता है, तो उस पर ऊपरी हवाओं के प्रभाव की सम्भावना रहती है।

कोर्इ स्त्री जब राजस्वला होती है, तब उसका चन्द्र व मंगल दोनो दुर्बल हो जाते हैं। ये दोनो राहुल व शनि के शत्रु हैं। रजस्वलावस्था में स्त्री अशुद्ध होती है और शुद्धता राहु की धोतक है। ऐसे में उस स्त्री पर ऊपरी हवाओं के प्रकोप की सम्भावना रहती है।

कुएँ एवं बावड़ी का अर्थ होता है कि जल स्थान और चन्द्र जल स्थान का कारक है। चन्द्र राहु का शत्रु है, इसलिए ऐसे स्थानों पर ऊपरी हवाओं का प्रभाव होता है।

नजर दोष से पीडि़त व्यकित का शरीर कंपकपाता रहता है। वह अक्सर ज्वर, मिरगी आदि से ग्रस्त रहता है।

ऊपरी हवा – पहचान एवं निदान

प्राय: सभी धर्मग्रन्थों में ऊपरी हवाओं, नजर दोषों आदि का उल्लेख है। कुछ ग्रंथों में इन्हें बुरी आत्महा कहा गया है तो कुछ अन्य में भूत-प्रेत और जिन्न।

यहाँ ज्योतिष के आधार पर नजर दोष का विश्लेषण प्रस्तुत है।

ज्योतिष सिद्धान्त के अनुसार गुरू पितृदोष, शनि यमदोष, चन्द्र व शुक्र चल देवी दोष, राहु सर्प व प्रेत दोष, मंगल शाकिनी दोष, सूर्य देव दोष एवं बुध कुल देवता दोष का कारक होता है। राहु, शनि व केतु ऊपरी हवाओं के कारक ग्रह हैं। जब किसी व्यकित के लग्न (शरीर), गुरू (ज्ञान) त्रिकोण (धर्म भाव) तथा द्विस्वभाव राशियों पर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है, तो उस पर ऊपरी हवा की सम्भावना होती है।

लक्षण :-नजर दोष से पीडि़त व्यकित का शरीर कंपकंपाता रहता है। वह अक्सर मिरगी आदि से ग्रस्त रहता है।

यही ऊपरी हवाओं से सम्बद्ध ग्रहों, भावों आदि का विश्लेषण प्रस्तुत है।

राहु-केतु :जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, शनिवत राहु ऊपरी हवाओं का कारक है। यह प्रेत बाधा का सबसे पमुख करक है। इस ग्रह का प्रभाव जब भी मन, शरीर, ज्ञान, धर्म आत्मा आदि के भावों पर होता है, तो ऊपरी हवायें सक्रिय होती है।

शनि :इसे भी राहु के समान माना गया है। यह भी उक्त भावों से सम्बन्ध बनाकर भूत-प्रेत पीड़ा देता है।

चन्द्र :मन पर जब पाप ग्रहों राहु और शनि का दूषित प्रभाव होता है अशुभ भाव सिथत चन्द्र बलहीन होता है, तब व्यकित भूत-प्रेत पीड़ा से ग्रस्त होता है।

गुरू :गुरू सातिवक ग्रह है। शनि, राहु या केतु से सम्बन्ध होने पर यह दुर्बल हो जाता है। इसकी दुर्बल सिथति में ऊपरी हवाएँ जातक पर अपना प्रभाव डालती हैं।

लग्न :

यह जातक के शरीर का प्रतिनिधित्व करता है। इसका सम्बन्ध ऊपरी हवाओं के कारक राहु, शनि या केतु से हो या इस पर मंगल का पाप प्रभाव प्रबल हो, तो व्यकित के ऊपरी हवाओं से ग्रस्त होने की सम्भावना बनती है।

पंचम :पंचम भाव से पूर्व जन्म के संचित कर्मों का विचार किया जाता है। इस भाव पर जब ऊपरी हवाओं के कारक पाप ग्रहों का प्रभाव पड़ता है, तो इसका अर्थ यह है कि व्यकित से पूर्व जन्म के अच्छे कर्मों में कमी है। अच्छे कर्म अल्प हों, तो प्रेत बाधा योग बनता है।

अष्टम :इस भाव को गूढ़ विधाओं व आयु तथा मृत्यु का भाव भी कहते हैं। इसमें चन्द्र और पाप ग्रह या ऊपरी हवाओं के कारक ग्रह का सम्बन्ध प्रेत बाधा को जन्म देता है।

नवम :यह धर्म भाव है। पूर्व जन्म में पुण्य कर्मों में कमी रही हो, तो यह भाव दुर्बल होता है।

राशियाँ :जन्म कुण्डली में द्विस्वभाव राशियों मिथुन, कन्या और मीन पर वायु तत्व ग्रहों का प्रभाव हो, तो प्रेत बाधा होती है।

वार :शनिवार, मंगलवार, रविवार को प्रेत बाधा की सम्भावनाएँ प्रबल होती हैं।

तिथि :रिक्त तिथि एवं अमावस्या प्रेत बाधा को जन्म देती है।

नक्षत्र :वायु संज्ञक नक्षत्र प्रेत बाधा के कारक होते हैं।

योग :विष्कुंभ, व्याधात, ऐन्द्र, व्यतिपात, शूल आदि योग प्रेत बाधा को जन्म देते हैं।

कारण :विषिट, किस्तुन और नाग करणों के कारण व्यकित प्रेस बाधा से ग्रस्त होता है।

दशाएँ :मुख्यत: शनि, राहु, अष्टमेश व राहु तथा केतु से पूर्णत: प्रभावित ग्रहों की दशान्तर्दशा में व्यकित के भूत-प्रेत बाधाओं से ग्रस्त होने की सम्भावना रहती है।

युति :किसी स्त्री के सप्तम भाव में शनि, मंगल और राहु या केतु की युति हो, तो उसके पिशाच पीड़ा से ग्रस्त होने की सम्भावना रहती है।

गुरू नीच राशि अथवा नीच राशि के नवांश में हो, या राहु से युत हो और उस पर पाप गहों की दृषिट हो, तो जातक की चांडाल प्रवृत्ति होती है।

पंचम भाव में शनि का सम्बन्ध बने तो व्यकित प्रेस एवं क्षुद्र देवियों की भकित करता है।

ऊपरी हवाओं के कुछ अन्य मुख्य ज्योतिषीय योग-

यदि लग्न, पंचम, षष्ठ, अष्टम या नवम भाव पर राहु, केतु, शिन, मंगल, क्षीण चन्द्र आदि का प्रभाव हो, तो जातक के ऊपरी हवाओं से ग्रस्त होने की सम्भावना रहती है। यदि उक्त ग्रहों का परस्पर सम्बन्ध हो तो जातक प्रेत आदि से पीडि़त हो सकता है।
यदि पंचम भाव में सूर्य और शनि की युति हो, सप्तम में क्षीण चन्द्र हो तथा द्वादश में गुरू हो, तो इस सिथति में भी व्यकित प्रेत बाधा का शिकार होता है।
यदि लग्न पर क्रूर ग्रहों की दृषिट हो, लग्न निर्बल हो, लग्नेश पाप स्थान में हो अथवा राहु या केतु से युत हो, तो जातक जादू टोने से पीडि़त होता है।
लग्न में राहु के साथ चन्द्र हो तथा त्रिकोण में मंगल, शनि अथवा कोर्इ अन्य क्रूर ग्रह हो, तो जातक भूत-प्रेत आदि से पीडि़त होता है।
यदि षष्ठेश लग्न में हो, लग्न निर्बल हो और उस पर मंगल की दृषिट हो, तो जातक जादू टोने से पीडि़त होता है। यदि लग्न पर किसी अन्य शुभ ग्रह की दृषिट न हो, तो जादू-टोने से पीडि़त होने की सम्भावना प्रबल होती है। षष्ठेश के सप्तम या दशम में सिथत होने पर भी जातक जादू-टोना से पीडि़त हो सकता है।
यदि लग्न में राहु पंचम में शनि तथा अष्टम में गुरू हो, तो जातक पे्रत शाप से पीडि़त होता है।
”ऊपरी हवाओं के सरल उपाय”

ऊपरी हवाओं से मुकित हेतु शास्त्रों में अनेक उपाय बताये गये हैं। अर्थवेद में इस हेतु कर्इ मंत्रों व स्तुतियों का उल्लेख है।

आयुर्वेद में भी इन हवाओं से मुकित के उपायों का विस्तारण से वर्णन किया गया है। यहां कुछ प्रमुख सरल एवं प्रभावशाली उपायों का विवरण प्रस्तुत है।

ऊपरी हवाओं से मुकित हेतु हनुमान चालीसा का पाठ और गायत्री का जप तथा हवन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त अगिन तथा लाल मिर्जी चलानी चाहिये।
रोज सूर्यास्त के समय एक साफ-सुथरे बर्तन में गाय का आधा किलो दूध लेकर उसमें शुद्ध शहद की नौ बूँदें मिला लें। फिर स्नन करके, शुद्व वस्त्र पहनकर मकान की छत से नीचे तक प्रत्येक कमरे, जीने, गैलरी आदि में उस दूध के छींटे देते हुए द्वार तक आयें और बचे हुए दूध को मुख्य द्वार के बाहर गिरा दें।
क्रिया के दौरान इष्टदेव का स्मरण करते रहें। यह क्रिया इक्कीस दिन तक नियमित रूप से करें, घर पर प्रभावी ऊपरी हवाएँ दूर हो जायेंगी।
रविवार को बांह पर काले धतूरे की जड़ बांधे, ऊपरी हवाओं से मुकित मिलेगी।
लहसुन के रस में हींग घोलकर आँख में डालने या सूँधने से पीडि़त व्यकित को ऊपरी हवाओं से मुकित मिल जाती है।
ऊपरी बाधाओं से मुकित हेतु निम्नोक्त मंत्र का यथासम्भव जपकरना चाहिये।
ष ओम नमो भगवते रूद्राय नम: कोशेश्रस्य नमो ज्योति पंतगाय नमो रूद्राय नम: सिद्धि स्वाहा।।
घर के मुख्य द्वार के समीप स्वेतार्क का पौधा लगायें, घर ऊपरी हवाओं से मुक्त रहेगा।
उपले या लकड़ी के कोयले जलाकर उसमें धूनी की विशिष्ट वस्तुएँ डालें और उसमें उत्पन्न होने वाला धुआँ पीडि़त व्यकित को सुंघाएँ। यह क्रिया किसी ऐसे व्यकित से करवायें जो अनुभवी हो और जिसमें पर्याप्त आत्मबल हो।
प्रात: काल बीच मंत्र इक्लीश का उच्चारण करते हुए काली मिर्ज के नौ दाने सिर पर से घुमाकर दक्षिण दिशा की ओर फेंक दें ऊपरी बला दूर हो जायेगी।
रविवार को स्नानादि से निवृत्त होकर काले कपड़े की छोटी थैली में तुलसी के आठ पत्ते, आठ काली मिर्च और सहदेर्इ की जड़ बाँधकर गले में धारण करें, नजर दोष जप करके सरसों का तेल अभिमंत्रित कर लें और उसमें पीडि़त व्यकित के शरीर पर मालिश करें, व्यकित पीड़ामुक्त हो जायेगा।
मंत्र : ओम नमो काली कपाला देहि-देहि स्वाहा।
ऊपरी हवाओं के शकितशाली होने की सिथति में शाबर मंत्रों का जप एवं प्रयोग किया जा सकता है। प्रयोग करने के पूर्व इन मंत्रों का दीपावली की रात को अथवा होलिका दहन की रात को जलती हुर्इ होली के सामने या फिर शमशान में 108 बार जप कर इन्हें सिद्ध कर लेना चाहिए। यहां यह उल्लेख कर देना आवश्यक है कि इन्हें सिद्ध करने के इच्छुक साधकों में पर्याप्त आत्मबल होना चाहिए, अन्यथा हानि हो सकती है।

प्रेत बाधा से बचाव केसे
1. प्रेत शक्तियों से बचाव के लिए शरीर को पाक पवित्र रखें। इसके अतिरिक्त साधक आकर्षक व सुगंधित वस्तुओं के प्रयोग करते समय विशेष सावधानी का ध्यान रखें।
2. देवदारू, हींग, सरसो, जौ, नीम की पत्ती, कुटकी, कटेली, चना व मोर के पंख को गाय के घी तथा लोहबान में मिरित करके मिट्टी के पात्र में रख लें, फिर उसे अग्नि से जलाकर उसका धुंआ प्रेतादि बाधा से पीड़ित जातक को दिखाएं। इस प्रक्रिया को नित्य कुछ दिनों तक दोहराते रहें, अवश्य लाभ मिलेगा।
3. मंगलवार व शनिवार के दिन जावित्री व श्वेत अपराजिता के पत्ते को आपस में पीसकर उसके रस को प्रेतादि या ऊपरी बाधा से पीड़ित जातक को सुंघाएं। इन नकारात्मक शक्तियों से अवश्य ही मुक्ति मिलेगी।
4. सेंधा नमक, चंदन, कूट, घृत व चर्बी को सरसो के तेल के साथ मिश्रित करके किसी मिट्टी के पात्र में रख लें। फिर उसे अग्नि से जलाकर उसका धुआं प्रेतादि बाधा से पीड़ित जातक को दिखाएं। इस प्रक्रिया को शनिवार अथवा मंगलवार से प्रारंभ करके नित्य 21 दिनों तक दोहराएं। ऊपरी बाधा से अवश्य ही मुक्ति मिलेगी।
5. बबूल, देवदारू, बेल की जड़ व प्रियंगु को धूप अथवा लोहबार के साथ मिश्रित करके मिट्टी के पात्र में रख लें तथा फिर उसे अग्नि से जलाकर उसके धुएं को पीड़ित जातक के ऊपर से उतारें। मंगल या शनिवार से इस कार्य को प्रारंभ करके इसे 21 दिनों तक दोहराते रहें। जब यह प्रयोग समाप्त हो जाए, तो 22वें दिन जली हुई सारी सामग्री को किसी चौराहे पर मिट्टी के पात्र सहित प्रातः सूर्य उदय से पूर्व फेंक आएं। अवश्य लाभ होगा।
6. मंगलवार या शनिवार के दिन लौंग, रक्त-चंदन, धूप, लोहबान, गौरोचन, केसर, बंसलोचन, समुद्र-सोख, अरवा चावल, कस्तूरी, नागकेसर, जई, भालू के बाल व सुई को भोजपत्र के साथ अपने शरीर व लग्न के अनुकूल धातु के ताबीज में भरकर गले में धारण करें। शरीर पर प्रेतादि जैसे नकारात्मक तत्वों का कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ सकता।

7. प्रेत बाधा दूर करने के लिए पुष्य नक्षत्र में चिरचिटे अथवा धतूरे का पौधा जड़ सहित उखाड़कर, यदि इस प्रकार धरती में दबा दिया जाए कि उसका जड़ वाला भाग ऊपर रहे और पूरा पौधा धरती में समा जाए तो उस परिवार में सुख-शान्ति बनी रहती है। वहां प्रेतात्माएं कभी भी डेरा नहीं जमातीं।
2… किसे प्राप्त होती हैं भूत-प्रेत योनि
’प्रेत कल्प’ में कहा गया है कि नरक में जाने के पश्चात प्राणी प्रेत बनकर अपने परिजनों और संबंधियों को अनेकानेक कष्टों से प्रताड़ित करता रहता है। वह परायी स्त्री और पराये धन पर दृष्टि गड़ाए व्यक्ति को भारी कष्ट पहुंचाता है। जो व्यक्ति दूसरों की संपत्ति हड़प कर जाता है, मित्र से द्रोह करता है, विश्वासघात करता है, ब्राहमण अथवा मंदिर की संपत्ति का हरण करता है, स्त्रियों और बच्चों का संग्रहीत धन छीन लेता है, परायी स्त्री से व्यभिचार करता है, निर्बल को सताता है, ईश्वर में विश्वास नहीं करता, कन्या का विक्रय यकरता है, माता बहन पुत्र पुत्री स्त्री पुत्रवधु आदि के निर्दोष होने पर भी उनका त्याग कर देता है, ऐसा व्यक्ति प्रेत योनि में अवश्य जाता है। उसे अनेकानेक नारकीय कष्ट भोगना पड़ता है। उसकी कभी मुक्ति नहीं होती। ऐसे व्यक्ति को जीते जी अनेक रोग और कष्ट घेर लेते हैं। व्यापार में हानि गर्भनाश गृह कलह ज्वर कृषि हानि संतान मृत्यु आदि से वह दुखी होता रहता है। अकाल मृत्यु उसी व्यक्ति की होती है जो धर्म का आचरण और नियमों का पालन नहीं करता तथा जिसके आचार-विचार दूषित होते हैं। उसके दुष्कर्म ही उसे अकाल मृत्यु में धकेल देते हैं।

गरुड़ पुराण में प्रेत योनि और नरक में पड़ने से बचने के उपाय भी सुझाए गए हैं। उनमें सर्वाधिक उपाय दान दक्षिणा पिंडदान तथा श्राद्ध कर्म आदि बताए गए हैं।

सर्वाधिक प्रसिद्ध इस प्रेत कल्प के अतिरिक्त इस पुराण में आत्मज्ञान के महतव का भी प्रतिपदान किया गया है। परमात्मा का ध्या नही आत्मज्ञान का सबसे सरल उपाय है। उसके लिए अपने मन और इंद्रियों पर संयम रखना परम आवश्यक है। इस प्रकार कर्मकांड पर सर्वाधिक बल देने के उपरांत गरुड़ पुराण में ज्ञानी और सत्यव्रती व्यक्ति को बिना कर्मकांड किए भी सद्गति प्राप्त कर परलोक में उच्च स्थान प्राप्त करने की विधि बताई गई है।
कहां से आक्रमण करते हैं – भूत-प्रेत और मायावी शक्तियां
भूत-प्रेतों का निवास नीचे दिए गए कुछ वृक्षों एवं स्थानों पर माना गया है। इन वृक्षों के नीचे एवं स्थानों पर किसी प्रकार की तेज खुशबू का प्रयोग एवं गंदगी नहीं करनी चाहिए, नहीं तो भूत-प्रेत का असर हो जाने की संभावना रहती है।

पीपल वृक्ष:- शास्त्रों में इस वृक्ष पर देवताओं एवं भूत-प्रेतों, दोनों का निवास माना गया है। अतः कभी भी पीपल के पेड़ नहीं काटने चाहिए। इसी कारण हर प्रकार के कष्ट एवं दुख को दूर करने हेतु इसकी पूजा अर्चना करने का विधान है।
मौलसिरी:- इस वृक्ष पर भी भूत-प्रेतों का निवास माना गया है।
कीकर वृक्ष:- इस वृक्ष पर भी भूत-प्रेत रहते हैं। ऐसा कहा जाता है कि तुलसीदास ने इस वृक्ष में रोज पानी डालकर इस वृक्ष पर रहने वाले प्रेत को प्रसन्न कर उसकी मदद से हनुमान जी के दर्शन प्राप्त कर प्रभु श्री राम से मिलने का सूत्र पाया था। यह भूत प्राणियों को लाभ पहुंचाने वाली श्रेणी का था।
श्मशान या कब्रिस्तान:- इन स्थानों पर भी भूत-प्रेत निवास करते है।

भूत-प्रेतों से सावधानी
जल में भूत-प्रेतों का निवास होता है। इसलिए किसी भी स्त्री-पुरुष को नदी-तालाब में, चाहे वह कितने ही निर्जन स्थान में क्यों न हों, निर्वस्त्र होकर स्नान नहीं करना चाहिए क्योंकि भूत-प्रेत गंदगी से रुष्ट होकर मनुष्यों को नुकसान पहुंचाते हैं। कुएं में भी किसी प्रकार की गंदगी नहीं डालनी चाहिए क्योंकि कुंए में भी विशेष प्रकार के जिन्न रहते हैं जो कि रुष्ट होने पर व्यक्ति को बहुत कष्ट देते हैं।

श्मशान या कब्रिस्तान में भी कभी कुछ नहीं खाना चाहिए और न ही वहां पर कोई मिठाई, सफेद व्यंजन, शक्कर या बूरा लेकर जाना चाहिए क्योंकि इनसे भी भूत-प्रेत बहुत जल्दी आकर्षित होते हैं। ऐसे स्थानों में रात में कोई तीव्र खुशबू लेकर भी नहीं जाना चाहिए तथा मलमूल त्याग भी नहीं करना चाहिए। किसी भी अनजान व्यक्ति से विशेष रूप से दी गई इलायची, सेब, केला, लौंग आदि नहीं खानी चाहिए, क्योंकि यह भूत-प्रेत से प्रभावित करने के विशेष साधन माने गए हैं।

भूत-प्रेत से बचाव
यदि अनुभव हो कि भूत प्रेत का असर है तो घर में नियमित रूप से सुन्दरकांड या हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा सूर्य देव को जल चढ़ाएं।
1. यदि किसी मनुष्य पर भूत-प्रेत का असर अनुभव हो, तो उसकी चारपाई के नीचे नीम की सूखी पत्ती जलाएं।
2. मंगल या शनिवार को एक समूचा नींबू लेकर भूत-प्रेत ग्रसित व्यक्ति के सिर से पैर तक 7 बार उतारकर घर से बाहर आकर उसके चार टुकड़े कर चारों दिशाओं में फेंक दें। यह ध्यान रहे कि जिस चाकू से नींबू काटा है उसे भी फेंक देना चाहिए।

कौन बनता है भूत, कैसे रहें भूतों से सुरक्षित…
जिसका कोई वर्तमान न हो, केवल अतीत ही हो वही भूत कहलाता है। अतीत में अटका आत्मा भूत बन जाता है। जीवन न अतीत है और न भविष्य वह सदा वर्तमान है। जो वर्तमान में रहता है वह मुक्ति की ओर कदम बढ़ाता है।
आत्मा के तीन स्वरुप माने गए हैं- जीवात्मा, प्रेतात्मा और सूक्ष्मात्मा। जो भौतिक शरीर में वास करती है उसे जीवात्मा कहते हैं। जब इस जीवात्मा का वासना और कामनामय शरीर में निवास होता है तब उसे प्रेतात्मा कहते हैं। यह आत्मा जब सूक्ष्मतम शरीर में प्रवेश करता है, उस उसे सूक्ष्मात्मा कहते हैं।
भूत-प्रेतों की गति एवं शक्ति अपार होती है। इनकी विभिन्न जातियां होती हैं और उन्हें भूत, प्रेत, राक्षस, पिशाच, यम, शाकिनी, डाकिनी, चुड़ैल, गंधर्व आदि कहा जाता है।
भूतों के प्रकार : हिन्दू धर्म में गति और कर्म अनुसार मरने वाले लोगों का विभाजन किया है- भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्मांडा, ब्रह्मराक्षस, वेताल और क्षेत्रपाल। उक्त सभी के उप भाग भी होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार 18 प्रकार के प्रेत होते हैं। भूत सबसे शुरुआती पद है या कहें कि जब कोई आम व्यक्ति मरता है तो सर्वप्रथम भूत ही बनता है।
इसी तरह जब कोई स्त्री मरती है तो उसे अलग नामों से जाना जाता है। माना गया है कि प्रसुता, स्त्री या नवयुवती मरती है तो चुड़ैल बन जाती है और जब कोई कुंवारी कन्या मरती है तो उसे देवी कहते हैं। जो स्त्री बुरे कर्मों वाली है उसे डायन या डाकिनी करते हैं। इन सभी की उत्पति अपने पापों, व्याभिचार से, अकाल मृत्यु से या श्राद्ध न होने से होती है।
84 लाख योनियां : पशुयोनि, पक्षीयोनि, मनुष्य योनि में जीवन यापन करने वाली आत्माएं मरने के बाद अदृश्य भूत-प्रेत योनि में चले जाते हैं। आत्मा के प्रत्येक जन्म द्वारा प्राप्त जीव रूप को योनि कहते हैं। ऐसी 84 लाख योनियां है, जिसमें कीट-पतंगे, पशु-पक्षी, वृक्ष और मानव आदि सभी शामिल हैं।
प्रेतयोनि में जाने वाले लोग अदृश्य और बलवान हो जाते हैं। लेकिन सभी मरने वाले इसी योनि में नहीं जाते और सभी मरने वाले अदृश्य तो होते हैं लेकिन बलवान नहीं होते। यह आत्मा के कर्म और गति पर निर्भर करता है। बहुत से भूत या प्रेत योनि में न जाकर पुन: गर्भधारण कर मानव बन जाते हैं।
पितृ पक्ष में हिन्दू अपने पितरों का तर्पण करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि पितरों का अस्तित्व आत्मा अथवा भूत-प्रेत के रूप में होता है। गरुड़ पुराण में भूत-प्रेतों के विषय में विस्तृत वर्णन मिलता है। श्रीमद्*भागवत पुराण में भी धुंधकारी के प्रेत बन जाने का वर्णन आता है।
अतृप्त आत्माएं बनती है भूत : जो व्यक्ति भूखा, प्यासा, संभोगसुख से विरक्त, राग, क्रोध, द्वेष, लोभ, वासना आदि इच्छाएं और भावनाएं लेकर मरा है अवश्य ही वह भूत बनकर भटकता है। और जो व्यक्ति दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या आदि से मरा है वह भी भू*त बनकर भटकता है। ऐसे व्यक्तियों की आत्मा को तृप्त करने के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। जो लोग अपने स्वजनों और पितरों का श्राद्ध और तर्पण नहीं करते वे उन अतृप्त आत्माओं द्वारा परेशान होते हैं।
यम नाम की वायु : वेद अनुसार मृत्युकाल में ‘यम’ नामक वायु में कुछ काल तक आत्मा स्थिर रहने के बाद पुन: गर्भधारण करती है। जब आत्मा गर्भ में प्रवेश करती है तब वह गहरी सुषुप्ति अवस्था में होती है। जन्म से पूर्व भी वह इसी अवस्था में ही रहती है। जो आत्मा ज्यादा स्मृतिवान या ध्यानी है उसे ही अपने मरने का ज्ञान होता है और वही भूत बनती है।
जन्म मरण का चक्र : जिस तरह सुषुप्ति से स्वप्न और स्वप्न से आत्मा जाग्रति में जाती हैं उसी तरह मृत्युकाल में वह जाग्रति से स्वप्न और स्वप्न से सु*षुप्ति में चली जाती हैं फिर सुषुप्ति से गहन सुषुप्ति में। यह चक्र चलता रहता है।
भूत की भावना : भूतों को खाने की इच्छा अधिक रहती है। इन्हें प्यास भी अधिक लगती है, लेकिन तृप्ति नहीं मिल पाती है। ये बहुत दुखी और चिड़चिड़ा होते हैं। यह हर समय इस बात की खोज करते रहते हैं कि कोई मुक्ति देने वाला मिले। ये कभी घर में तो कभी जंगल में भटकते रहते हैं।
भूत की स्थिति : ज्यादा शोर, उजाला और मंत्र उच्चारण से यह दूर रहते हैं। इसीलिए इन्हें कृष्ण पक्ष ज्यादा पसंद है और तेरस, चौदस तथा अमावस्या को यह मजबूत स्थिति में रहकर सक्रिय रहते हैं। भूत-प्रेत प्रायः उन स्थानों में दृष्टिगत होते हैं जिन स्थानों से मृतक का अपने जीवनकाल में संबंध रहा है या जो एकांत में स्थित है। बहुत दिनों से खाली पड़े घर या बंगले में भी भूतों का वास हो जाता है।
भूत की ताकत : भूत अदृश्य होते हैं। भूत-प्रेतों के शरीर धुंधलके तथा वायु से बने होते हैं अर्थात् वे शरीर-विहीन होते हैं। इसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं। आयुर्वेद अनुसार यह 17 तत्वों से बना होता है। कुछ भूत अपने इस शरीर की ताकत को समझ कर उसका इस्तेमाल करना जानते हैं तो कुछ नहीं।
कुछ भूतों में स्पर्श करने की ताकत होती है तो कुछ में नहीं। जो भूत स्पर्श करने की ताकत रखता है वह बड़े से बड़े पेड़ों को भी उखाड़ कर फेंक सकता है। ऐसे भूत यदि बुरे हैं तो खतरनाक होते हैं। यह किसी भी देहधारी (व्यक्ति) को अपने होने का अहसास करा देते हैं।
इस तरह के भूतों की मानसिक शक्ति इतनी बलशाली होती है कि यह किसी भी व्यक्ति का दिमाग पलट कर उससे अच्छा या बुरा कार्य करा सकते हैं। यह भी कि यह किसी भी व्यक्ति के शरीर का इस्तेमाल करना भी जानते हैं।
ठोसपन न होने के कारण ही भूत को यदि गोली, तलवार, लाठी आदि मारी जाए तो उस पर उनका कोई प्रभाव नहीं होता। भूत में सुख-दुःख अनुभव करने की क्षमता अवश्य होती है। क्योंकि उनके वाह्यकरण में वायु तथा आकाश और अंतःकरण में मन, बुद्धि और चित्त संज्ञाशून्य होती है इसलिए वह केवल सुख-दुःख का ही अनुभव कर सकते हैं।
अच्छी और बुरी आत्मा : वासना के अच्छे और बुरे भाव के कारण मृतात्माओं को भी अच्छा और बुरा माना गयाहै। जहां अच्छी मृतात्माओं का वास होता है उसे पितृलोक तथा बुरी आत्मा का वास होता है उसे प्रेतलोक आदि कहते हैं।
अच्छे और बुरे स्वभाव की आत्माएं ऐसे लोगों को तलाश करती है जो उनकी वासनाओं की पूर्ति कर सकता है। बुरी आत्माएं उन लोगों को तलाश करती हैं जो कुकर्मी, अधर्मी, वासनामय जीवन जीने वाले लोग हैं। फिर वह आत्माएं उन लोगों के गुण-कर्म, स्वभाव के अनुसार अपनी इच्छाओं की पूर्ति करती है।
जिस मानसिकता, प्रवृत्ति, कुकर्म, सत्कर्मों आदि के लोग होते हैं उसी के अनुरूप आत्मा उनमें प्रवेश करती है। अधिकांशतः लोगों को इसका पता नहीं चल पाता। अच्छी आत्माएं अच्छे कर्म करने वालों के माध्यम से तृप्त होकर उसे भी तृप्त करती है और बुरी आत्माएं बुरे कर्म वालों के माध्यम से तृप्त होकर उसे बुराई के लिए और प्रेरित करती है। इसीलिए धर्म अनुसार अच्छे कर्म के अलावा धार्मिकता और ईश्वर भक्ति होना जरूरी है तभी आप दोनों ही प्रकार की आत्मा से बचे रहेंगे।
कौन बनता है भूत का शिकार : धर्म के नियम अनुसार जो लोग तिथि और पवित्रता को नहीं मानते हैं, जो ईश्वर, देवता और गुरु का अपमान करते हैं और जो पाप कर्म में ही सदा रत रहते हैं ऐसे लोग आसानी से भूतों के चंगुल में आ सकते हैं।
इनमें से कुछ लोगों को पता ही नहीं चल पाता है कि हम पर शासन करने वाला कोई भूत है। जिन लोगों की मानसिक शक्ति बहुत कमजोर होती है उन पर ये भूत सीधे-सीधे शासन करते हैं।
जो लोग रात्रि के कर्म और अनुष्ठान करते हैं और जो निशाचारी हैं वह आसानी से भूतों के शिकार बन जाते हैं। हिन्दू धर्म अनुसार किसी भी प्रकार का धार्मिक और मांगलिक कार्य रात्रि में नहीं किया जाता। रात्रि के कर्म करने वाले भूत, पिशाच, राक्षस और प्रेतयोनि के होते हैं।
हिन्दू धर्म में भूतों से बचने के अनेकों उपाय बताए गए हैं। पहला धार्मिक उपाय यह कि गले में ॐ या रुद्राक्ष का लाकेट पहने, सदा हनुमानजी का स्मरण करें। चतुर्थी, तेरस, चौदस और अमावस्य को पवि*त्रता का पालन करें। शराब न पीएं और न ही मांस का सेवन करें। सिर पर चंदन का तिलक लगाएं। हाथ में मौली (नाड़ा) अवश्य बांधकर रखें।
घर में रात्रि को भोजन पश्चात सोने से पूर्व चांदी की कटोरी में देवस्थान पर कपूर और लौंग जला दें। इससे आकस्मिक, दैहिक, दैविक एवं भौतिक संकटों से मुक्त मिलती है।
प्रेत बाधा दूर करने के लिए पुष्य नक्षत्र में धतूरे का पौधा जड़ सहित उखाड़कर उसे ऐसा धरती में दबाएं कि जड़ वाला भाग ऊपर रहे और पूरा पौधा धरती में समा जाए। इस उपाय से घर में प्रेतबाधा नहीं रहती।
प्रेत बाधा निवारक हनुमत मंत्र- ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ऊँ नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत पिशाच-शाकिनी-डाकिनी-यक्षणी-पूतना-मारी-महामारी, यक्ष राक्षस भैरव बेताल ग्रह राक्षसादिकम्* क्षणेन हन हन भंजय भंजय मारय मारय शिक्षय शिक्षय महामारेश्वर रुद्रावतार हुं फट् स्वाहा। इस हनुमान मंत्र का पांच बार जाप करने से भूत कभी भी निकट नहीं आ सकते।
हनुमान जी के बाद मां कालका के स्मरण मात्र से किसी भी प्रकार की भूतबाधा है तो तत्काल ही हट जाती है। मां काली के कालिका पुराण में कई मंत्रों का उल्लेख मिलता है।
सरसों के तेल का या शुद्ध घी का दिया जलाकर काजल बना लें। ये काजल लगाने से भूत, प्रेत, पिशाच आदि से रक्षा होती है और बुरी नजर से भी रक्षा होती है।
चरक संहिता में प्रेत बाधा से पीड़ित रोगी के निदान के उपाय विस्तार से मिलते हैं। ज्योतिष साहित्य के मूल ग्रंथों- प्रश्नमार्ग, वृहत्पराषर, होरा सार, फलदीपिका, मानसागरी आदि में ज्योतिषीय योग हैं जो प्रेत पीड़ा, पितृदोष आदि बाधाओं से मुक्ति का उपाय बताते हैं। अथर्ववेद में दुष्ट आत्माओं को भगाने से संबंधित अनेक उपायों का वर्णन मिलता है।
सावधानी : नदी, पूल या सड़क पार करते समय भगवान का स्मरण जरूर करें। एकांत में शयन या यात्रा करते समय पवित्रता का ध्यान रखें। पेशाब करने के बाद धेला अवश्य लें और जगह देखकर ही पेशाब करें। रात्रि में सोने से पूर्व भूत-प्रेत पर चर्चा न करें। किसी भी प्राकार के टोने-टोटकों से बच कर रहें।
ऐसे स्थान पर न जाएं जहां पर तांत्रिक अनुष्ठान होता हो, जहां पर किसी पशु की बलि दी जाती हो या जहां भी लोबान आदि धुंवे से भूत भगाने का दावा किया जाता हो। भूत भागाने वाले सभी स्थानों से बच कर रहें, क्योंकि यह धर्म और पवित्रता के विरुद्ध है।
जो लोग भूत, प्रेत या पितरों की उपासना करते हैं वह राक्षसी कर्म के होते हैं ऐसे लोगों का संपूर्ण जीवन ही भूतों के अधिन रहता है। भूत-प्रेत से बचने के लिए ऐसे कोई से भी टोने-टोटके न करें जो धर्म विरुद्ध हो। हो सकता है आपको इससे तात्कालिक लाभ मिल जाए, लेकिन अंतत: जीवन भर आपको परेशान ही रहना पड़ेगा।
अन्य उपाय :
यदि बच्चा बाहर से आए और थका, घबराया या परेशान सा लगे तो यह नजर लगने की पहचान है। ऐसे में उसके सर से 7 लाल मिर्च और एक चम्मच राई के दाने 7 बार घूमाकर उतारा कर लें और फिर आग में जला दें। यदि डरावने सपने आते हों, तो हनुमान चालीसा और गजेंद्र मोक्ष का पाठ करें और हनुमान मंदिर में हनुमानजी का श्रृंगार करें व चोला चढ़ाएं।
अशोक वृक्ष के सात पत्ते मंदिर में रख कर पूजा करें। उनके सूखने पर नए पत्ते रखें और पुराने पत्ते पीपल के पेड़ के नीचे रख दें। यह क्रिया नियमित रूप से करें, घर भूत-प्रेत बाधा, नजर दोष आदि से मुक्त रहेगा।
भूतादि से पीड़ित व्यक्ति की पहचान उसके स्वभाव एवं क्रिया में आए बदलाव से की जाती है। अगल-अलग स्वाभाव परिवर्तन अनुसार जाना जाता है कि व्यक्ति कौन से भूत से पीड़ित है।
भूत पीड़ा : यदि किसी व्यक्ति को भूत लग गया है तो वहपागल की तरह बात करने लगता है। मूढ़ होने पर भी वह किसी बुद्धिमान पुरुष जैसा व्यवहार भी करता है। गुस्सा आने पर वह कई व्यक्तियों को एक साथ पछाड़ सकता है। उसकी आंखें लाल हो जाती हैं और देह में सदा कंपन बना रहता है।
पिशाच पीड़ा : पिशाच प्रभावित व्यक्ति सदा खराब कर्म करना है जैसे नग्न हो जाना, नाली का पानी पीना, दूषित भोजन करना, कटु वचन कहना आदि। वह सदा गंदा रहता है और उसकी देह सेबदबू आती है। वह एकांत चाहता है। इससे वह कमजोर होता जाता है।
प्रेत पीड़ा : प्रेत से पीड़ित व्यक्ति चिल्लाता और इधर-उधर भागता रहता है। वह किसी का कहना नहीं सुनता। वह हर समय बुरा बोलता रहता है। वह खाता-पीता नही हैं और जोर-जोर से श्वास लेता रहता है।
शाकिनी पीड़ा : शाकिनी से ज्यादातर महिलाएं ही पीड़ित रहती हैं। ऐसी महिला को पूरे बदन में दर्द बना रहता है और उसकी आंखों में भी दर्द रहता है। वह अक्सर बेहोश भी हो जाती है। कांपते रहना, रोना और चिल्लाना उसकी आदत बन जाती है।
चुडैल पीड़ा : चुडैल भी ज्यादातर किसी माहिला को ही लगती है। ऐसी महिला यदि शाकाहारी भी है तो मांस खाने लग जाएगी। वह कम बोलती, लेकिन मुस्कुराती रहती है। ऐसी महिला कब क्या कर देगी कोई भरोसा नहीं।
यक्ष पीड़ा : यक्ष से पीड़ित व्यक्ति लाल रंग में रुचि लेने लगता है। उसकी आवाज धीमी और चाल तेज हो जाती है। वह ज्यादातर आंखों से इशारे कहता रहता है। इसकी आंखें तांबे जैसी और गोलदिखने लगती हैं।
ब्रह्मराक्षस पीड़ा : जब किसी व्यक्ति को ब्रह्मराक्षस लग जाता है तो ऐसा व्यक्ति बहुत ही शक्तिशाली बन जाता है। वह हमेशा खामोश रहकर अनुशासन में जीवन यापन करता है। इसे ही जिन्न कहते हैं। यह बहुत सारा खाना खाते हैं और घंटों तक एक जैसे ही अवस्था में बैठे या खड़े रहते हैं। जिन्न से ग्रस्त व्यक्ति का जीवन सामान्य होता है ये घर के किसी सदस्य को परेशान भी नहीं करते हैं बस अपनी ही मस्ती में मस्त रहते हैं। जिन्नों को किसी के शरीर से निकालना अत्यंत ही कठीन होता है।
इस तरह से और भी कई तरह के भूत होते हैं जिनके अलग अलग लक्षण और लक्ष्य होते हैं।
भूत-प्रेत से जुड़े दस सवाल और उनके उत्तर
भूत के कई अर्थ होते हैं उनमें से एक है बीता हुआ काल या समय। जो लोग भूतकाल में ही जिते रहते हैं उन्हें भूत कहने में कोई हर्ज है क्या? मृत्यु के बाद नया जन्म लेने में यही एक आदत जीवात्मा को नया जन्म नहीं लेने देती है कि उसमें अभी तक आसक्ति, स्मृति और वासनाओं का मन में वास रहता हैं। जो लोग अपने इस जीवन की स्मृतियों को नहीं छोड़ना चाहते प्रकृति उन्हें दूसरा गर्भ उपलब्ध कराने में अक्षम होती है।
जानिए पितृलोक को…
कभी कभार ऐसा होता है कि कोई नया जन्म ले लेता है लेकिन उसकी पीछले जन्म की याददश्त बनी रहती है, उसे कहते हैं कि इसे पीछले जन्म की सब याद है। भूत से जुड़ी धारणा और मान्यताओं के संबंध में प्रश्नों के माध्यम से उत्तर दिए जाने का प्रयास करेंगे।
सवाल पहला : प्रेत क्या है और प्रेत किसे कहते हैं?
जवाब : पितृ शब्द से बना है प्रेत। स्थूल शरीर छोड़ने के बाद मान्यता अनुसार जो अंतिम क्रिया और तर्पण-पिंड या श्राद्ध कर्म करने तक व्यक्ति प्रेत योनी में रहता है तो उसे प्रेत कहते हैं। तीसरे, तेरहवें, सवा माह या एक वर्ष तक वह प्रेत योनी में रहता है।
एक वर्ष के भीतर वह यदि पक्का स्मृतिवान है तो जीवात्मा पितृलोक चला जाता है तब उसे पितर या पितृ कहा जाता है। लेकिन यदि नहीं गया है तो और यहीं धरती पर ही विचरण कर रहा है तो वह प्रेत या भूत बनकर ही तब तक रहता है जब तक कि उसकी आत्मा को शांति नहीं मिल जाती।
सवाल : भूत या प्रेत बाधा से ग्रसित व्यक्ति व्यक्ति का उपचार हो सकता है होता है तो कैसे?
जवाब : भूत या प्रेत बनी जीवात्मा की मानसिक शक्ति इंसानों से कहीं अधिक ताकतवर होती है। ऐसे व्यक्ति अपनी शांति के लिए या किसी से बदला लेने के लिए दूसरों के मन और मस्तिष्क पर कब्जा कर लेते हैं। ऐसे में भूत बाधा ग्रस्त व्यक्ति का आध्यात्मिक रूप से इलाज करना जरूरी होता है।
इसके लिए व्यक्ति को हनुमान की शरण में जाना चाहिए या योगसाधना के द्वारा अपनी शारीरिक और मानसिक शक्ति को बढ़ाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति को ध्यान रखना चाहिए कि वो मन, वचन और कर्म से शुद्ध और पवित्र रहे। पवित्र रहने वाले व्यक्ति के आसपास भूत नहीं फटकते हैं।
ऐसे व्यक्ति को अंधकार से दूर रहकर ध्यान द्वारा मन और मस्तिष्क में सकारात्म ऊर्जा का संचार करना चाहिए। तेरस, चौदस, अमावस्य और पूर्णिमा के दिन व्यक्ति शुद्ध और निर्मर बना रहे। मंगलवार और रविवार के दिन विशेष ध्यान रखे और इस दिन अंधकार या बाहरी प्रवास से बचे।
सवाल : भूत के कितने वर्ग और प्रकार होते हैं।
जवाब : वर्ग की बात करें तो प्रेत आत्माएं भी इंसानों की तरह सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी होती है। सतोगुणी आत्माएं किसी को परेशान नहीं करती और सदा शांत रहकर लोगों की मदद करती हैं। रजोगुणी आत्माओं का कोई भरोसा नहीं, वे अपनी इच्छापूर्ति के लिए संस्कार अनुसार कार्य करती है ऐसी आत्माएं किसी के भी शरीर में प्रवेश कर अपनी इच्छा की पूर्ति कर सकती है। तमोगुरु आत्माएं सदा लोगों को परेशान करती रहती है।
ऐसी आत्माएं धरती पर बुराइयों का साथ देती हैं जो लोग सदा मांस भक्षण और शराब इत्यादि का सेवन करते रहते हैं उनके आसपास तमोगुणी आत्माएं रहती है।
भूतों के प्रकार : हिन्दू धर्म में गति और कर्म अनुसार मरने वाले लोगों का विभाजन किया है- भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्मांडा, ब्रह्मराक्षस, वेताल और क्षेत्रपाल। उक्त सभी के उप भाग भी होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार 18 प्रकार के प्रेत होते हैं। भूत सबसे शुरुआती पद है या कहें कि जब कोई आम व्यक्ति मरता है तो सर्वप्रथम भूत ही बनता है।
इसी तरह जब कोई स्त्री मरती है तो उसे अलग नामों से जाना जाता है। माना गया है कि प्रसुता, स्त्री या नवयुवती मरती है तो चुड़ैल बन जाती है और जब कोई कुंवारी कन्या मरती है तो उसे देवी कहते हैं। जो स्त्री बुरे कर्मों वाली है उसे डायन या डाकिनी करते हैं। इन सभी की उत्पति अपने पापों, व्याभिचार से, अकाल मृत्यु से या श्राद्ध न होने से होती है।
सवाल : कहां रहते हैं भूत-प्रेत?
जवाब : भूत निवास के संबंध में मान्यता है कि वे सालों से सुनसान पड़े मकान में, किसी तालाब किनारे के वृक्षों पर या खंडहर में निवास करते हैं। इसके अलावा वे नकारात्मक तमोगुणी मनुष्य के शरीर पर कब्जा पर उसके पास ही रहते हैं।
कुछ लोग मानते हैं कि भूत-प्रेत अंधेरे और दुर्गन्धयुक्त किसी मलिन स्थानों पर भी रहते हैं और पैसे ही पदार्थों का सेवन भी करते हैं।
सवाल : कौन बन जाता है भूत या प्रेत?
जवाब : अतृप्त आत्माएं बनती है भूत। जो व्यक्ति भूखा, प्यासा, संभोगसुख से विरक्त, राग, क्रोध, द्वेष, लोभ, वासना आदि इच्छाएं और भावनाएं लेकर मरा है अवश्य ही वह भूत बनकर भटकता है। तमोगुण प्रधान व्यक्ति भी भूत बनकर भटकते हैं।
और जो व्यक्ति दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या आदि से मरा है वह भी भूत बनकर भटकता है। ऐसे व्यक्तियों की आत्मा को तृप्त करने के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। जो लोग अपने स्वजनों और पितरों का श्राद्ध और तर्पण नहीं करते वे उन अतृप्त आत्माओं द्वारा परेशान होते हैं।
सवाल: भूत, प्रेत बाधा से ग्रस्त व्यक्ति के क्या लक्षण हैं?
जवाब : अगल अलग प्रेत होते हैं जो व्यक्ति जिस प्रेत के वश में होता है उसके वैसे वैसे लक्षण होते हैं। सामान्य तौर पर प्रेत बाधा से ग्रस्त व्यक्ति की आंखें स्थिर, अधमुंदी और लाल रहती हैं। उके नाखून काले हो जाते हैं।
उसका सामान्य व्यवहार नहीं होते। स्वभाव में अत्यधिक क्रोध, जिद और उग्रता पैदा हो जाती है। शरीर से बदबूदार पसीना आता रहता है और कहीं कहीं सूजन रहती है।
सवाल : क्यों नहीं दिखाई देती प्रेत आत्माएं हम लोगों को दिखाई क्यों नहीं देतीं?
जवाब : जीवित मनुष्य का शरीर पांच तत्वों से बना होता है जिसमें पृथ्वी तत्व सबसे अधिक होता है। जबकि मरने के बाद जीवात्मा सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाती है।
सूक्ष्म शरीर में वायुत्व की अधिकता होती है जिससे वे दिखाई नहीं देते। केवल उनका स्पर्श और अस्तित्व महसूस होता है। इस शरीर को केवल अंधकार में देखा जा सकता है। रात के घोर अंधकार में भी देख सकने वाले कुत्तों, बिल्ली, सियार और उल्लू जैसे निशाचारी प्राणियों को ये आसानी से दिखाई देते हैं।
सवाल: किन लोगों को भूत-प्रेत परेशान नहीं कर सकते?
जवाब : जो व्यक्ति ईश्वर की प्रार्थना करता रहता है उसके चेहरे पर तेज नजर आता है। हजारों देवी-देवताओं की पूजा-पाठ से श्रेष्ठ है ईश आराधना।
इसके अलावा योग साधना, ध्यान साधना करने वालों लोगों से भूत दूर ही रहते हैं क्योंकि ऐसे व्यक्तियों का आभा मण्डल विराट हो जाता है जिससे डरकर भूत भाग जाते हैं। अभा मंडल कमजोर है तो भूत ऐसे व्यक्ति पर आसानी से कब्जा पर लेते हैं।
इसके अलावा वे लोग जो शारीरिक और मानसिक स्तर से मजबूत हैं उन्हें भी भूत परेशान नहीं कर सकते। मन में ईश्वर और खुद के प्रति विश्वास और दृढ़ता होना जरूरी है। भूत बाधा केवल कमजोर मन और शरीर वाले प्राणियों, विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों तथा कमजोर दिमाग वाले व्यक्तियों को परेशान करते हैं।
सवाल : क्या भूत प्रेत के फोटो खिंच सकते हैं?
जवाब : आजकल अमेरिका और रूस में ऐसे कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और कैमरे हैं जिनके बल पर किसी भी सूक्ष्म से सूक्ष्म चीज को कैमरे में कैद किया जा सकता है। दूसरी और कभी-कभार भूत अपनी शक्ति के बल पर प्रकाट हो जाते हैं ऐसे समय उनका फोटो खिंचा जा सकता है।
सवाल : क्या भूत-प्रेतों को वश में करने की कोई विधि है?
जवाब : भूत-प्रेतों को वश में करने का बहुत से लोग दावा करते हैं। इसके लिए उनके अनुसार भूतों से संबंधित विशेष मंत्र साधनाओं की जाती है लेकिन ऐसी आत्माएं अपना स्वार्थ साधन न होने पर वश में करने वाले का ही अहित भी कर देती हैं।
भूत-प्रेतों की साधना करके उन्हें अपने वश में करने के क्या भयानक परिणाम हो सकते हैं। जो व्यक्ति भूत-प्रेतों को वश में करता है वे भूत-प्रेत उस व्यक्ति के शरीर और मन के शक्ति संपन्न रहने तक ही उसके अनुसार कार्य करते हैं। शरीर और मन के कमजोर होते ही वे उस व्यक्ति की दुर्गति आरंभ कर देते हैं।

भूत -प्रेत ,वायव्य बाधाओं और तांत्रिक अभिचार से बचाव के उपाय
भूत-प्रेत ,वायव्य बाधाएं अथवा तांत्रिक अभिचार व्यक्ति की शारीरिक क्षमता के साथ ही आर्थिक क्षमता पर भी प्रभाव डालते हैं ,इनके कारण पारिवारिक ,दाम्पत्य सम्बन्धी और संतान सम्बन्धी समस्याएं भी हो सकती हैं ,कभी कभी ये गंभीर रोग भी उत्पन्न करते है और मृत्यु का कारण बन जाते है अथवा दुर्घटनाएं करा कर व्यक्ति की मृत्यु के कारण बनते हैं ,कभी कभी इनके कारण शरीर की स्थिति में परिवर्तन हो जाता है और व्यक्ति विकलांग हो सकता है ,मूक-बधिर जैसा हो सकता है ,दौरे आ सकते हैं ,गूम-सुम हो सकता है ,सोचने -समझने अथवा चलने-फिरने में अक्षम हो सकता है ,कुछ शक्तियां व्यक्ति को गलत कार्यों के लिए प्रेरित करती हैं ,अथवा सीधे व्यक्ति के साथ गलत कार्य करती हैं ,कभी-कभी कोई आत्मा किसी महिला के साथ जुड़कर उसका शारीरिक शोषण कर सकती है ,यह व्यक्ति में मांस-मदिरा की और रूचि उत्पन्न कर सकते हैं ,गलत कार्य करवा सकते हैं ,जबकि व्यक्ति ऐसा नहीं चाहता पर उसके शरीर पर उसका नियंत्रण नहीं रहता .इनके प्रभाव से व्यक्ति गलत निर्णय ले सकता है ,लड़ाई-झगडे कर सकता है ,आदि आदि
यदि लगे की व्यक्ति पर किसी आत्मा आदि का प्रभाव है अथवा किसी अभिचार की आशंका हो ,घर में घुसने पर सर भारी हो जाए ,तनाव लगे ,मानसिक विक्षुब्धता हो ,कलह अनावश्यक हो ,हर काम बिगड़ने लगे ,उन्नति रुक जाए ,व्यक्ति विशेष के पसीने से दुर्गन्धयुक्त पसीना आये ,सर चकराए,सर गर्म रहे ,बडबडाये ,आँखे तिरछी हों ,आवेश आये ,उछले-कूड़े-गिरे,आकास की और मुह करके बातें करे ,अचानक इतना बल आ जाए की कई लोगो से मुकाबला कर सके ,शरीर पीला होता जाए ,दिन प्रतिदिन दुर्बल होता जाए ,स्त्री जातक कपडे फाड़ने लगे ,बहुत सात्विक हो जाए या तामसिक हो उग्र रहने लगे अचानक से ,किसी प्रकार का आवेश आने लगे ,बाल बिखेरे झूमे ,व्यक्ति को बुरे सपने आये ,अचानक भय लगे ,छ्या आदि दिखे ,लगे कोई साथ है ,बुरे शकुन दिखे ,बीमारी हो पर कारण पता न लगे ,दुर्घटनाये हो ,बार बार गलतियाँ होने लगें ,तामसिक व्यवहार हो जाए ,उग्रता बढ़ जाए ,कहीं मन न लगे ,एकांत पसंद होने लगे ,अधिक सफाई या गन्दगी अचानक पसंद आने लगे ,कार्य-व्यवहार अस्त-व्यस्त हो जाए ,अचानक व्यवसाय में हानि हो या व्यवसाय रुक जाए ,परिवार में बीमारियाँ बढ़ जाएँ तो यह समस्या हो सकती है ,बच्चे का बहुत रोना ,नोचना ,दांत किटकिटाना,,घर पर पत्थर या हड्डी आदि बरसना ,अचानक आग लग्न जबकि कारण पता न चले तो भी ऐसा हो सकता है ,,यद्यपि इनमे से कुछ ग्रह स्थितियों के कारण भी हो सकता है ,पर लगे की ऐसा है तो किसी योग्य व्यक्ति से संपर्क करना बेहतर होता है |
भूत-प्रेत-चुड़ैल जैसी समस्याओं से व्यक्ति अथवा परिवार के सहयोग से मुक्ति पायी जा सकती है ,किन्तु उच्च स्तर की शक्तियां सक्षम व्यक्ति ही हटा सकता है ,कुछ शक्तियां ऐसी होती हैं की अच्छे अच्छे साधक के छक्के छुडा देती हैं और उनके तक के लिए जान के खतरे बन जाती है ,ऐसे में केवल श्मशान साधक अथवा बेहद उच्च स्तर का साधक ही उन्हें हटा या मना सकता है ,किन्तु यहाँ समस्या यह आती है की इस स्तर का साधक सब जगह मिलता नहीं ,उसे सांसारिक लोगों से मतलब नहीं होता या सांसारिक कार्यों में रूचि नहीं होती ,पैसे आदि का उसके लिए महत्व नहीं होता या यदि वह सात्विक है तो इन आत्माओं के चक्कर में पना नहीं चाहता ,क्योकि इसमें उसकी उस शक्ति का खर्च होता है जो वह अपनी मुक्ति के लिए अर्जन कर रहा होता है .
भूत-प्रेत चुड़ैल जैसी समस्याओं को कौवा तंत्र के प्रयोग से हटाया जा सकता है किन्तु यह जानकार साधक ही कर सकता है ,प्रेत अथवा पिशाच-पिशाचिनी साधक भी इन्हें हटा सकता है ,अच्छा तांत्रिक भी इन्हें हटा सकता है ,देवी साधक,हनुमान-भैरव साधक इन्हें हटा सकता है ,किन्तु उच्च शक्तिया केवल उच्च साधक ही हटा सकता है,इन्हें देवी[दुर्गा-काली-बगला आदि महाविद्या ]साधक ,भैरव-हनुमान साधक ,श्मशान साधक ,अघोर साधक ,रूद्र साधक हटा सकता है , .
बजरंग बाण का पाठ ,सुदर्शन कवच ,दुर्गा कवच,काली सहस्त्रनाम ,बगला सहस्त्रनाम ,काली कवच, बगला कवच, आदि के पाठ से इनके प्रभाव पर अंकुश लगता है ,उग्र शक्तियों की आराधना इनके प्रभाव को रोकती है ,,
भूत-प्रेत बाधा,किये कराये को निष्प्रभावी करने के लिए अथवा रोकने के लिए वनस्पति और पशु-पक्षी तंत्र में नीली अपराजिता जी जड़ ,नागदौन की जड़ ,हत्थाजोड़ी,तगर ,मेहंदी ,काली हल्दी ,समुद्रफल ,सियार सिंगी ,श्वेतार्क गणपति ,श्वेतार्क की जड़ ,कौवा ,गोरोचन,लौंग,भालू का नाख़ून ,शेर का नाख़ून ,भालू के बाल ,गैंडे की खाल ,उल्लू के नाख़ून ,सूअर के दांत ,रुद्राक्ष ,गंध्मासी की जड़,जटामांसी की जड़ ,तेलिया कंद ,काली कनेर की जड़ ,वच ,शंखपुष्पी ,संग इ मिक्नातीस ,लाल पलाश की जड़, चिरचिटा की जड़ आदि का भी प्रयोग किया जाता है |
भूत-प्रेत से कुछ सुरक्षात्मक उपाय पर ध्यान देने से बचाव रहता है ,,कभी भी भरी दोपहर में ,काली रात में अथवा रात में सुनसान स्थान पर ,श्मशान-कब्र-चौरी-नदी किनारे ,बड़े वृक्ष ,बांस की कोठी आदि के आसपास अकेले जाने से बचना चाहिए ,गले में कोई ताबीज आदि पहनना चाहिए विशेषकर बच्चों ,गर्भवती महिलाओं और कुँवारी कन्याओं को ,घर में गंगाजल और अभिमंत्रित जल का छिडकाव कभी कभी कर देना चाहिए ,गूगल-लोबान की धूनी देनी चाहिए ,तांत्रिक अभिचार का भय हो तो घर में योग्य व्यक्ति से कील लगवा देनी चाहिए ,,स्थान हो तो घर के दरवाजे पर श्वेतार्क का पौधा लगाना चाहिए ,शमी का पौधा लगाना चाहिए ,पूजा स्थान में शंख रखना चाहिए और संभव हो तो घर में शंख ध्वनि करनी चाहिए ,
अकसर भूत-प्रेत ,वायव्य बाधा या अभिचार आदि का भय उन परिवारों पर अधिक होता है जहां पित्र दोष हो अथवा जहां कुल देवता की पूजा न होती हो अथवा कुलदेवता नाराज हो अथवा ईष्ट मजबूत न हों ,,कुल देवता परिवार की रक्षा इस प्रकार की समस्याओं से करते हैं ,यदि यह नाराज हों तो सुरक्षा नहीं करते अथवा यह कमजोर हों तो सुरक्षा कर नहीं पाते ,परिणामतः कोई भी समस्या बिना रुकावट घर में प्रवेश कर जाती है ,,इसीतरह अगर पित्र दोष है तो वे जो समस्या उत्पन्न करते हैं वह तो होगा ही साथ में जैसे आपमें मित्रता होती है ,इन आत्माओं में भी मित्रता हो सकती है ,अतः पितरों के साथ उनके मित्र भी आपके परिवार के आसपास आ जाते हैं जबकि ये आपके परिवार से सम्बंधित नहीं होते और इनका कोई लगाव परिवार से नहीं होता ,अतः ये अपनी अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति परिवार से करने का प्रयास कर सकते हैं ,अर्थात यह परिवार के लिए अधिक कष्टकारक हो जाते हैं ,अतः यथा संभव पित्र दोष से मुक्ति पाने का उपाय करना चाहिए और कुलदेवता आदि की पूजा नियमानुसार जरुर करनी चाहिए ,,इसी प्रकार यदि आपके ईष्ट कमजोर हैं या ईष्ट नहीं हैं या आप नास्तिक हैं तो भी कोई समस्या प्रभावी शीघ्र हो जाती है

कभी-कभी व्यक्ति का चौराहे पर रखी हुई वस्तु पर पैर पड़ जाता है या लाग हो जाती है या कोई व्यंतर
अदृश्य बला से मुक्ति
आत्मा का शरीर से स्पर्श हो जाता है अथवा प्रेतात्मा आदि का साया पड़ जाता है तो व्यक्ति तुरंत अस्वस्थ हो जाता है। वह पागलों जैसी हरकतें कर सकता है, ज्वर से पीड़ित हो सकता है, उसका खाना-पीना छूट सकता है। इन सब कारणों का निदान चिकित्सकों के पास नहीं होता, इनका उपचार सिर्फ टोटकों द्वारा ही संभव होता है।
यह टोटका निम्न प्रकार से किया जाता है-
* सबसे पहले गाय के गोबर का कंडा व जली लकड़ी की राख को पानी से भिगोकर एक लड्डू बनाएँ।
* इसके बाद इसमें एक सिक्का गाड़ दें।
* फिर उस पर काजल और रोली की सात बिंदी लगा दें।
* तत्पश्चात्‌लोहे की एक कील उसमें गाड़ दें।
* अब उस लड्डू को अस्वस्थ व्यक्ति के ऊपर से सात बार उतारकर चुपचाप नजदीक के किसी चौराहे पर रख आएँ।
* आते-जाते समय किसी से बातचीत न करें तथा पीछे मुड़कर भी न देखें। इस क्रिया से रोगी बहुत जल्दी स्वस्थ हो जाएगा।
दूसरा प्रयोग :
* झाडू व धान कूटने वाला मूसल अस्वस्थ व्यक्ति के ऊपर से उतारकर उसके सिरहाने रख दें।
* अपने बाएँ पैर का जूता अस्वस्थ व्यक्ति के ऊपर से सात बार उतारकर (घुमाकर) प्रत्येक बार उल्टा जूता जमीन पर पीटें।
* सात ही बार वह जूता उस व्यक्ति को सुँघाएँ, इस प्रक्रिया से भी अस्वस्थ व्यक्ति ठीक हो जाएगा।
किसी भटकती आत्मा की लाग
* यदि किसी व्यक्ति को किसी भटकती आत्मा (शाकिनी, प्रेतनी) की लाग हो गई हो तो गंधक, गुग्गुल, लाख, लोबान, हाथी दाँत, सर्प की केंचुली व पीड़ित व्यक्ति के सिर का एक बाल लेकर सबको मिलाकर व पीसकर जलाएँ तथा उसका धुआँ रोगी को दें। इससे व्यक्ति पर से लाग हट जाती है।

उतारा टोटके
दुख-सुख, अच्छे-बुरे दिन, लाभ-हानि, यश-अपयश, सफलता-विफलता, हारी-बीमारी आदि सभी इस जीवन के विभिन्न रंग हैं। समय-समय पर मनुष्य को विभिन्न प्रकार के सुख-दुख भोगने पडते हैं। यद्यपि ये सभी हमारे जन्म और पूर्व जन्मों के प्रभाव का फल हैं, परन्तु फिर भी इनके दुष्प्रभावों को कम तो किया ही जा सकता है। इस कार्य के लिए सम्पूर्ण विश्व में ही मानव अनेक टोने-टोटकों का प्रयोग करता रहा है। यही नहीं, सौभाग्य को बढाने, घर में सुख-समृद्धि लाने, व्यापार को चमकाने के लिए भी अनेके टोने-टोटकों का प्रयोग किया ही जाता है। यही नहीं, नि:संतान दम्पतियों ने सन्तान और दरिद्रों ने राजसी वैभव भी टोने-टोटकों के बल पर प्राप्त किए हैं।
टोने-टोटकों और गंडे-तावीजों का अपना एक पूर्ण विज्ञान है और यही कारण है कि इस क्षेत्र में सफलता प्राप्ति के कुछ नियमों का पालन आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है। टोटकों में सफलता के सूत्र आस्था, विश्वास, प्रयास और उनकी सिद्धि के विविध नियम का पालन टोटका-सिद्धि का मूल आधार है, जिसके द्वारा आपके सभी प्रकार के कष्टों का निवारण हो सकता है। जब किसी भी उपचार या औषधि का कोई प्रभाव नहीं पडता, तो उसके समय टोने-टोटके का सहारा लेना पड जाता है। ये टोटके उस व्याधि का अंत ही नहीं करते, बल्कि सदा के लिए उसकी जडें भी उखाड फेंकते हैं।
कुछ टोटके केवल वस्तु के प्रयोग से ही सफल हो जाते हैं, जबकि कुछ टोटकों के प्रयोग में एक विशेष प्रकार की ध्वनि या मंत्र का भी उच्चारण करना पडता है। टोटकों के प्रयोग से पूर्व इन बातों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। उतारों की विधि व महत्व टोने-टोटकों के संसार में उतारों का बहुत ही अधिक महत्व हैं। बालको को नजर लग जाने, किसी के भूत बाधाग्रस्त होने अथवा बीमार हो जाने पर झाड-फूंक के साथ ही उतारे भी किए जाते हैं। कोई भी उतारा सर से पैर की ओर सात बार उतारा जाता है। इस उतारे के करने से वह बीमारी अथवा दुष्ट आत्मा उस मिठाई के टुकडे पर आ जाती है और इस उतारे को घर से दूर रख आने पर उसके साथ ही घर से बाहर चली जाती है।
रविवार : इतवार के रोज यदि उतारा करना हो, तो बर्फी से उतारा करे बर्फी गाय को खिला देनी चाहिए।
सोमवार : सोमवार के रोज भी यदि उतारा करना हो, तो उस रोज भी बर्फी के टुकडे से उतारा करके गाय को ही खिलाना चाहिए।
मंगलवार : यदि मंगल के रोज उतारा करने की आवश्यकता पडे, तो उस रोज मोतीचूर के लड्डू से उतारा करना चाहिए और उसे कुत्ते को डालना चाहिए।
बुधवार : बुधवार के रोज यदि उतारा करना हो, तो उस दिन इमरती अथवा मोतीचूर के लड्डू से उतारा करना चाहिए और उसे कुत्ते को डालना चाहिए।
गुरूवार : बृहस्पतिवार के रोज शाम के समय पांच मिठाइयां एक दोने में रखकर उताररा करना चाहिए। उतारा करके उसमें धूपबत्ती और छोटी इलायची रखकर पीपल के पेड की जड में पश्चिम दिशा में रखकर लौट आना चाहिए। उतारा करके आते समय पलटकर नहीं देखना चहिए और न ही रास्ते में किसी से बोलना चाहिए। घर आकर हाथ-पैर धोने के बाद कोई कार्य करना चाहिए।
शुक्रवार : शुक्रवार को यदि उतारा करना हो, तो शाम के समय मोतीचूर के लड्डृ से ही उतारा करके उसे कुत्ते को डालना चाहिए।
शनिवार : शनिवार के दिन इमरती और मोतीचूर के लड्डू से उतार किया जाता है। यदि शनिवार के दिन काला कुत्ता मिले और उसे इमरती डाली जाए तो बहुत अच्छा होता है।

***********भूत -प्रेत और आत्माओं के विभिन्न प्रकार भारतीय समाज में ***************
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1.भूत :- सामान्य भूत जिसके बारे में आप अक्सर सुनते है
2.प्रेत :- परिवार के सताए हुए बिना क्रियाकर्म के मरे आदमी
3.हाडल :- बिना नुक्सान पहुचाये प्रेतबाधित करने वाली आत्माए
4.चेतकिन :- चुडेले जो लोगो को प्रेतबाधित कर दुर्घटनाए करवाती है
5.मुमिई :- मुंबई के कुछ घरो में प्रचलित प्रेत
6.विरिकस:- घने लाल कोहरे में छिपी और अजीबोगरीब आवाजे निकलने वाला
7.मोहिनी या परेतिन : -प्यार में धोका खाने वाली आत्माए
8.शाकिनी:- शादी के कुछ दिनों बाद दुर्घटना से मरने वाली औरत की आत्मा | कम खतरनाक
9.डाकिनी :- मोहिनी और शाकिनी का मिला जुला रूप | किन्ही कारणों से हुई मौत से बनी आत्मा
10.कुट्टी चेतन :- बच्चे की आत्मा जिसपर तांत्रिको का नियंत्रण होता है
11.ब्रह्मोदोइत्यास :- बंगाल में प्रचलित | शापित ब्राह्मणों की आत्माए
12.सकोंधोकतास :- बंगाल में प्रचलित | रेल दुर्घटना में मरे लोगो की सर कटी आत्मा
13.निशि :- बंगाल में प्रचलित | अँधेरे में रास्ता दिखाने वाली आत्मा
14.कोल्ली देवा :- कर्नाटक में प्रचलित | जंगलो में हाथो में टोर्च लिए घुमती आत्माए
15.कल्लुर्टी ,:-कर्नाटक में प्रचलित | आधुनिक रीती रिवाजो से मरे लोगो की आत्मा
16.किचचिन:- बिहार में प्रचलित | हवस की भूखी आत्मा
17.पनडुब्बा:- बिहार में प्रचलित | नदी में डूबकर मरे लोगो की आत्मा
18.चुड़ैल:- उत्तरी भारत में प्रचलित | राहगीरों को मारकर बरगद के पेड़ पर लटकाने वाली आत्मा
19.बुरा डंगोरिया :- आसाम में प्रचलित | सफ़ेद कपडे और पगड़ी पहने घोड़े पसर सवार आत्मा
20.बाक :- आसाम में प्रचलित | झीलों के पास घुमती आत्माए
21.खबीस :- पाकिस्तान ,गुल्फ देशो और यूरोप में प्रचलित |जिन्न परिवार से ताल्लुक रखने वाली आत्मा
22.घोडा पाक :- आसाम में प्रचलित | घोड़े के खुर जैसे पैर बाकी मनुष्य
23.बीरा :- आसाम में प्रचलित परिवार को खो देने वाली आत्माए
24.जोखिनी :-आसाम में प्रचलित पुरुषो को मारने वाली आत्मा
25.पुवाली भूत :-आसाम में प्रचलित छोटे घर के सामनो को चुराने वाली आत्माए
26.रक्सा :- छतीसगढ़ मे प्रचलित कुँवारे मरने वालो की खतरनाक आत्मा ,
27. मसान:- छतीसगढ़ की प्रचलित पाँच छै सौ साल पुरानी प्रेत आत्मा नरबलि लेते हैँ , जिस घर मेँ निवास करेँ पुरे परिवार को धीरे धीरे मार डालते हैँ ,
28.चटिया मटिया :- छतीसगढ़ मेँ प्रचलित बौने भुत जो बचपन मेँ खत्म हो जाते हैँ वो बनते हैँ बच्चो को नुकसान नहीँ पहुँचाते । आँखे बल्ब की तरह हाथ पैर उल्टे काले रंग के ,, मक्खी के स्पीड मेँ भागने वाले चोरी करने वाली आत्मा ,
29. बैताल:- पीपल पेड़ मेँ निवास करते हैँ एकदम सफेद रंग वाले ,, खतरनाक आत्मा
30. चकवा या भुलनभेर :- रास्ता भटकाने वाली आत्मा महाराष्ट्र ,एमपी आदि मेँ पाया जाता हैँ ,,
31. उदु:- तलाब या नहर मेँ पाये जाने वाली आत्मा जो आदमियोँ को पुरा खा जाऐँ , छतीसगढ़ मेँ प्रचलित ,,
32. गल्लारा :- अकाल मरे लोगो की आत्मा धमाचौकडी मचाने वाली आत्मा छतीसगढ़ मेँ प्रचलित ,
34. भंवेरी :- नदी मेँ पायी जाने वाली आत्मा जो पानी मेँ डुब कर मरते हैँ पानी मेँ भंवर उठाकर नाव या आदमी को डूबा देने वाली आत्मा ,, छतीसगढ़ मेँ प्रचलित
35. गरूवा परेत:- बिमारी या ट्रेन से कटकर मरने वाले गांयो और बैलो की आत्मा जो कुछ समय के लिए सिर कटे रूप मेँ घुमते दिखतेँ हैँ नुकसान नही पहुचातेँ ! छतीसगढ मेँ प्रचलित ,
36. हंडा :- धरती मेँ गडे खजानोँ मेँ जब जीव पड़ जाता हैँ याने प्रेत का कब्जा तो उसे हंडा परेत कहते हैँ , ये जिनके घर मेँ रहते हैँ वे हमेशा अमीर रहते हैँ , हंडा का अर्थ हैँ कुंभ , जिसके अंदर हीरे सोने आदि भरे रहते हैँ ,, जो लालच वश हंडा को चुराने का प्रयास करेँ उसे ये खा जाते हैँ , ये चलते भी हैँ ! छतीसगढ़ मेँ प्रचलित
37. सरकट्टा:-छत्तीसगढ़ में प्रचलित एक प्रेत जिसका सिर कटा होता है,बहुत ही खतरनाक |
38.ब्रह्म :-ब्राह्मणों की आत्मा जो सात्विक और धार्मिक रहे हों अथवा जो साधक और पुजारी रहे हों किन्तु दुर्घनावश अथवा स्वयं जीवन समाप्त कर चुके हों |बेहद शक्तिशाली ,तांत्रिक नियंत्रित नहीं कर सकते |केवल मना कर या प्राथना कर ही शांत किया जा सकता है |जिस परिवार के पीछे पड़ जाएँ खानदान साफ़ हो जाता है ,कोई रोक नहीं सकता |पूजा देने पर ही शांत हो सकते हैं |
39.जिन्न :-अग्नि तत्वीय मुश्लिम धर्म से सम्बंधित आत्मा |बेहद शक्तिशाली |नियंत्रण मुश्किल |मनाया जा सकता है |
40.शहीद :-युद्ध अथवा दुर्घटना में मृत मुस्लिम बीर|अक्सर मजारें बनी मिलती हैं |शक्तिशाली आत्माएं जो पूजा पा और शक्तिशाली हो उठती हैं |
41.बीर:- लड़ाकू अथवा उग्र ,साहसी व्यक्ति जिसकी दुर्घटना अथवा हत्या से मृत्यु हुई हो |ताकतवर आत्मा

*****************भूत-प्रेत ,वायव्य बाधाएं और तांत्रिक अभिचार *************
भूत-प्रेतों ,वायव्य बाधाओं और तांत्रिक अभिचार पर बहुत लोगों को विश्वास होता है बहुतों को नहीं ,जब तक व्यक्ति का अनहोनियों से सामना नहीं होता ,जब तक अनचाही-असामान्य घटनाएं नहीं होती ,अदृश्य शक्ति का अहसास नहीं होता व्यक्ति मानता नहीं की ऐसा कुछ होता है ,,समय अच्छा रहते ,सामान्य स्थिति में तार्किक बुद्धि विश्वास नहीं करती ,पर परेशान होता है तब ज्योतिषियों-तांत्रिको-पंडितों-साधकों-मंदिरों-मस्जिदों -मजारों पर दौड़ने लगता है ,,कभी हल मिलता है कभी नहीं ,इसके बहुत से कारण होते हैं .
भूत-प्रेत तब बनते हैं जब किसी व्यक्ति की असामान्य मृत्यु हो जाए और उसका शरीर अचानक काम करना बंद कर दे ,ऐसी स्थिति में उसकी कोशिकाओं की संरक्षित ऊर्जा से सम्बंधित विद्युत् ऊर्जा जो सूक्ष्म शरीर से जुडी होती है ,क्षरित नहीं हो पाती और सूक्ष्म शरीर के माध्यम से आत्मा को जोड़े रखती है ,आत्मा मुक्त नहीं हो पाती ,,व्यक्ति की ईच्छाएं ,आकांक्षाएं उसके मन में जीवित रहती हैं किन्तु उन्हें पूरा करने के लिए शरीर नहीं होता ,,ऐसी स्थिति में वे अपनी अतृप्त आकांक्षाएं पूरी करने के लिए अन्य व्यक्ति के शरीर को माध्यम बनाते हैं ,कभी यह सीधे किसी व्यक्ति के शरीर पर अधिकार कर लेते है ,कभी उन्हें डराकर उनमे प्रवेश कर जाते हैं ,,कभी-कभी ये सदैव साथ न रहकर अपनी आवश्यकतानुसार व्यक्ति के शरीर को प्रभावित करते हैं ,यह सब इनके शक्ति पर निर्भर करता है ,आवश्यक नहीं की कमजोर ही इनके शिकार हों किन्तु अक्सर बच्चे-महिलायें-नव विवाहिताएं-गर्भावस्था वाली महिलायें-सुन्दर कन्याएं-कमजोर मनोबल वाले पुरुष-ठंडी प्रकृति के व्यक्ति इनके आसान शिकार होते हैं ,यद्यपि यह किसी को भी प्रभावित कर सकते है अगर शक्तिशाली हैं तो ,चाहे परोक्ष करें या अपरोक्ष ,,
इनकी कई श्रेणियां होती है ,जो इनके शक्ति के अनुसार होती है ,,भूत-चुड़ैल कम शक्ति रखते हैं ,प्रेत उनसे अधिक शक्ति रखते हैं ,बीर-शहीद आदि प्रेतों से भी शक्तिशाली होते हैं ,जिन्न-ब्रह्म राक्षस इनसे भी अधिक शक्तिशाली होते हैं, डाकिनी-शाकिनी-पिशाच-भैरव आदि और शक्तिशाली नकारात्मक शक्तियां हैं ,
,, जिन स्थानों पर पहले कभी बहुत मारकाट हुई हो ,युद्ध हुए हों वहां इनकी संख्या अधिक होती है ,अपने मरने के स्थान से भी इनका लगाव होता है यद्यपि ये कहीं भी आ जा सकते हैं ,श्मशानों -कब्रिस्तानों आदि अंत्येष्टि के स्थानों पर ये अधिकता में पाए जाते है ,,ऐसी जगहों जहां अन्धेरा रहता हो ,नकारात्मक ऊर्जा हो ,गन्दगी हो ,सीलन हो ,प्रकाश की पहुँच न हो वहां और कुछ वृक्षों -वनस्पतियों के पास इन्हें शांति मिलती है और इन्हें अच्छा लगता है अतः ये वहां रहना पसंद करते है ,यद्यपि कुछ शक्तिशाली आत्माएं मंदिरों -मजारों-मस्जिदों तक में जा सकती है ,राजधानियों में ,खँडहर महलों में,पहले के युद्ध मैदानों के आसपास ,सडकों के आसपास के वृक्षों पर ,चौराहों आदि पर जहां अधिक दुर्घटनाएं हुई हों ये अधिकता में पाए जाते हैं |
इनकी शक्ति रात्री में बढ़ जाती है क्योकि इन्हें वातावरण की रिनात्मक ऊर्जा से सहारा मिलता है और इनके नकारात्मकता की क्षति नहीं होती ,अँधेरी रातों में ,गर्मी की दोपहर में यह अधिक क्रियाशील होते हैं ,यद्यपि यह चांदनी रातों में और दिन में भी क्रियाशील हो सकते हैं ,कुछ शक्तिया पूर्णिमा के चन्द्रमा का सहारा लेकर भी कुछ लोगों को अधिक परेशान करती है ,क्योकि पूर्णिमा -अमावस्या को कुछ लोगों को मानसिक तनाव -डिप्रेसन की परेशानी होती है ,ऐसे में यह उन्हें अधिक परेशां करते हैं |
कुछ लोग दुर्भावनावश अथवा दुश्मनी में कुछ लोगों पर तांत्रिक टोटके कर देते हैं या तांत्रिक की सहायता से अभिचार करवा देते हैं ,कभी कभी तांत्रिक इन अभिचारों के साथ आत्माएं भी संयुक्त कर भेज देते हैं ,यद्यपि यह प्रक्रिया सामान्य भूत-प्रेतों के प्रभाव से भिन्न होती है किन्तु यह अधिक परेशान करती है ,और इसका इलाज तांत्रिक ही कर सकता है ,इलाज में भी परस्पर शक्ति संतुलन प्रभावी होता है ,,टोटकों और अभिचारों का उर्जा विज्ञान भिन्न होता है जो वस्तुगत ऊर्जा और अभिचार करने वाले के मानसिक बल पर निर्भर करता है ,इनमे दिन-समय-मुहूर्त-स्थान-वस्तु -सामग्री-पद्धति का विशिष्ट संयोग और शक्ति होता है |यह क्रिया किसी भी रूप में व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है ,मानसिक तनाव ,उन्नति में अवरोध,व्यापार में नुक्सान ,दूकान बंधना ,कार्य क्षेत्र में तनाव ,मन न लगना ,दुर्घटनाएं,मानसिक विचलन-डिप्रेसन,अशुभ शकुन,अनिद्रा ,पतन ,दुर्व्यसन,निर्णय में गलतियां ,कलह,मारपीट आपस में ,मतभिन्नता आदि इसके कारण से उत्पन्न हो सकते हैं .|
**************तंत्र से तांत्रिक अभिन्त्रण 2 प्रकार से होता है *********************
1. किसी के द्वारा किसी पर करवाने पर
2.स्वयं के द्वार किसी गलती से स्वयं तंत्र शक्तियो को आमंत्रण देकर
मगर आजकल किसी दूसरे के द्वारा ही मउख्या रूप से तंत्र क्रिया करवाई जाती है।कुछ सावधानी आप रखे तो इन तंत्र क्रियाओ से आप बच सकते है जो की ये है:—
1.यदि अचानक से आपका कोई कपडा (मुख्या रूप से अंतः वस्त्र) गायब हुआ है तो सम्भावना है की किसी ने उसको तंत्र में उपयोग हेतु चुराया हो।
2.अगर कोई सात शनिवार लगातार आपके पैर (स्त्री का बांया और पुरुष का दांया पाँव) के निचे की माटी लेने की कोसिस करे।
3.अगर बच्चों के बाल सिर के बीचो बिच से कोई काट ले।
4.कोई बार बार आकर आपके सिरहाने चुप चाप लाल सिंदूर लगा कर जाये।
5.स्त्री या पुरुष द्वारा घर से बहार यात्रा के समय किसी रज पेड़ के निचे मूत्र करने पर।
6.अगर कोई भिन्डी का बीज या काली मिर्च खिलाए।
7.स्त्री द्वारा बाल बनाने के बाद टूटे हुए बालो को बिना वत्र क्रिया के घर से बहार फेकने पर उनका उपयोग तंत्र में हो सकता है।
8.स्त्री कोे रजोधर्म का रक्त का कपडा लापरवाही से बाहर फेकने से बचना चाहिए उसको किसी नाली या किसी ऐसी जगह फेकना चाहिए जहा वो किसी के हाथ न लगे।
9.भूल के भी शनिवार के दिन किसी के बीही कहने या दबाव देने पर सोंठ नहीं कहानी चाहिए।
10. बचो कइ कपडे पुराने होने पर उन्हें सीधा घर से फेकने की बजाय उन्हें धोकर फएकन चाहिए।
ये कुछ सावधानिया है जिनसे अआप कीच हद तक बाख सकते है।मगर अगर आप तंत्र क्रियाओ के घेरे में फास गए है तो सिर्फ तंत्र के द्वारा ही आप उन क्रियाओ की काट कर सकते है बीइलकुल वैसे हई जैसे ज़हर ज़हर को मारता है।

***************पित्र दोष निवारण के कुछ खास उपाय *******************
1. याद रखे घर के सभी बड़े बुजर्ग को हमेशा प्रेम, सम्मान, और पूर्ण अधिकार दिया जाय , घर के महत्वपूर्ण मसलों पर उनसे सलाह मशविरा करते हुए उनकी राय का भी पूर्ण आदर किया जाय ,प्रतिदिन उनका अभिवादन करते हुए उनका आशीर्वाद लेने, उन्हे पूर्ण रूप से प्रसन्न एवं संतुष्ट रखने से भी निश्चित रूप से पित्र दोष में लाभ मिलता है ।
2.अपने ज्ञात अज्ञात पूर्वजो के प्रति ईश्वर उपासना के बाद उनके प्रति कृतज्ञता का भाव रखने उनसे अपनी जाने अनजाने में की गयी भूलों की क्षमा माँगने से भी पित्र प्रसन्न होते है ।
3. सोमवती अमावस्या को दूध की खीर बना, पितरों को अर्पित करने से भी इस दोष में कमी होती है ।
4. सोमवती अमावस्या के दिन यदि कोई व्यक्ति पीपल के पेड़ पर मीठा जल मिष्ठान एवं जनेऊ अर्पित करते हुये “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाएं नमः” मंत्र का जाप करते हुए कम से कम सात या 108 परिक्रमा करे तत्पश्चात् अपने अपराधों एवं त्रुटियों के लिये क्षमा मांगे तो पितृ दोष से उत्पन्न समस्त समस्याओं का निवारण हो जाता है।
5.प्रत्येक अमावस्या को गाय को पांच फल भी खिलाने चाहिए।
6. अमावस्या को बबूल के पेड़ पर संध्या के समय भोजन रखने से भी पित्तर प्रसन्न होते है।
7. प्रत्येक अमावस्या को एक ब्राह्मण को भोजन कराने व दक्षिणा वस्त्र भेंट करने से पितृ दोष कम होता है ।
8. पितृ दोष से पीड़ित व्यक्ति को प्रतिदिन शिव लिंग पर जल चढ़ाकर महामृत्यूंजय का जाप करना चाहिए ।
9. माँ काली की नियमित उपासना से भी पितृ दोष में लाभ मिलता है।
10. आप चाहे किसी भी धर्म को मानते हो घर में भोजन बनने पर सर्वप्रथम पित्तरों के नाम की खाने की थाली निकालकर गाय को खिलाने से उस घर पर पित्तरों का सदैव आशीर्वाद रहता है घर के मुखियां को भी चाहिए कि वह भी अपनी थाली से पहला ग्रास पित्तरों को नमन करते हुये कौओं के लिये अलग निकालकर उसे खिला दे।
11. पितरों के निमित घर में दीपक, अगरबत्ती को प्रात:काल पूजा के समय ऊँ पितृय नम: कम से कम 21 बार उच्चारण करें।
12. पशु-पक्षियों को खाना खिलायें।
13. श्री मद भागवत गीता का ग्यारहवां अध्याय का पाठ करें।
14.पित्र पक्ष अथवा अमावस्या के दिन पितरों को ध्यान करके सामर्थ्यनुसार ब्राह्मण पूजन के बाद गरीबों को दान करने से पितर खुश होते हैं। ब्राह्मण के माध्यम से पितृपक्ष में दिये हुऐ दान-पुण्य का फल दिवंगत पितरों की आत्मा की शांति के लिए किया जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार आज के दिन पिंडदान, तिलांजली और ब्राह्मणों को पूर्ण श्रद्धा से भोजन कराने से जीवन में सभी सांसारिक सुख और भोग प्राप्त होता है।
15. हिन्दु मान्यता के अनुसार मृत्यु के बाद भी स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। इसके लिए प्रसनचित होकर हव्य से देवताओं का, कव्य से पितृगणों का तथा अन्न द्वारा बंधुओं का भंडारा करें। इससे परिवार एवं सगे-सम्बन्धियों, मित्रों को भी विशेष फल की प्राप्ति होती है। इसके फलस्वरूप परिवार में अशान्ति, वंश वृद्घि में रुकावट, आकस्मिक बीमारी, धन से बरकत न होना, सभी भौतिक सुखों के होते हुए भी मन असंतुष्ट रहना आदि परेशानियों से मुक्ति मिल सकती है।
16. शनिवार के दिन पीपल की जड़ में गंगा जल, कला तिल चढाये । पीपल और बरगद के वृ्क्ष की पूजा करने से पितृ दोष की शान्ति होती है ।
17. याद रखिए पूर्वजो के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करने उन्हे पूर्ण रूप से संतुष्ट करने उनको प्रसन्न रखने वाले व्यक्ति पर हमेशा दैवी कृपा बनी रहती है….उसके कार्यों में कोई भी अवरोध नही होता है ..उसकी सर्वत्र जयजयकार होती है ।
18. “ओम् नमो भगवते वासुदेवाय” की एक माला का नित्य जाप करें ।
19. जब भी किसी तीर्थ पर जाएं तो अपने पितरों के लिए तीन बार अंजलि में जल से उनका तर्पण अवश्य ही करें ।
20. पितृपक्ष मे अपने पितरों की याद मे वृक्ष, विशेषकर पीपल लगाकर, उसकी पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने से भी पितृदोष समाप्त होता है
************उपरी हवा अथवा नकारात्मक ऊर्जा के निराकरण का उपाय ******************

घर के सदस्य या घर पर किसी उपरी हवा का असर महसूस हो तो निम्न उपाय से राहत मिलती है

|उपरी हवा के निम्न लिखित संकेत हैं –
घर में भोजन के समय क्लेश होना |घर के छोटे सदस्यों द्वारा बड़ों का अपमान होना |
अचानक आग लगना
अचानक चोरी होना
अचानक छत का गिरना या छत में दरार आना
घर में दीमक लग्न ,घर में सीलन आना |घर में मकड़ी के जाले लगना
घर के सदस्यों में वैचारिक मतभेद रहना
घर की स्त्रियों का मासिक धर्म अनियमित होना
लगातार घर की रसोई में रोटियां जल जाना ,सब्जियां जल जाना
लगातार घर की रसोई में दूध का फटना या बहना
घर में कहीं भी खून के छींटे मिलना |घर के सदस्यों के कपडे फटना ,या जलना या काटना
घर की छत पर पत्थर गिरना
घर में रखे हुए पैसे गायब होना
इस तरह के संकेतों से अंदाजा लगाया जा सकता है की घर पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव है |जब ऐसा लगे की ऐसी कोई समस्या दिख रही है तो निम्न उपाय [उतारे] से लाभ हो सकता है |इस उतारे के लिए निम्न सामग्रियां लें -
तीन पीले नीम्बू बिना दाग के |तीन पीले बूंदी के लड्डू |तीन फूलदार लौंग |तीन गेंदा के पीले फूल |एक काली काजल की डिबिया |एक लाल लिपस्टिक |एक केले का पत्ता या धाक की पत्तल |एक निकिली कील |
सर्व प्रथम केले का पत्ता या पत्तल लें और उसे किसी चौकी पर बिछाकर एक पीले नीम्बू को पत्ते पर रखें |अब दूसरा निम्बू लें और उसको लिपस्टिक से लाल करले |अब तीसरे नीम्बू को काजल से काला कर लें औए केले के पत्ते पर रख दें |सभी निम्बुओं को लाइन से कर दें | अब पहले पीले निम्बू पर फिर लाल निम्बू पर फिर तीसरे काले निम्बू पर निकिली चीज से एक एक छिद्र कर लें और उनमे एक एक फूल वाली लौंग गाड़ दें |अब एक एक गेंदे के पीले फूल निम्बुओं पर चढ़ाएं |एक एक पीला बूंदी का लड्डू भी तीनो निम्बुओं पर चढ़ाएं |फिर सब चीजों को केले के पत्ते में लपेट लें |अब उतारे का सामान तैयार है |इसे लेकर घर के मुख्य द्वार पर पर जाकर इसे हाथ में लेकर मुख्या द्वार पर से ३१ बार उल्टा अर्थात एंटी क्लाक वाईज इसे उतारें और बोले-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी
एकमेव त्वया कार्यंम मस्मद्वैरी विनाशनम
मंत्र की शुद्धता के लिए दुर्गा सप्तशती में से देख लें |दुर्गा मंत्र का ३१ बार पाठ करें और उलटे क्रम से उतारा करते रहें |उतारा करने के बाद सभी उतारे की सामग्रियों को बहती हुई नदी या नाहर के किनारे रख आयें
घर से निकलते हुए समय से लेकर घर वापस आने तक मौन धारण रखे |घर वापस आने पर हाथ पैर मुंह धो लें और घर में घूनी करें |
सावधानी -क्रिया शुरू करने से पहले शरीर शुद्धि ,एवं शरीर बंधन अवश्य कर लें |या अपने गुरु का नाम लेकर कलाई पर धागा या रुमाल बाँध लें |केवल गुरुमुखी ही प्रयोग का इस्तेमाल करें |जो गुरु दीक्षित नहीं हैं इस प्रयोग को न करें |.

*************परिवार के आगामी समय लिए अशुभ संकेत है ये घटनाएं ****************
प्रकृति में हर कार्य की एक व्यवस्था है ,प्रकृति के अपने नियम हैं |प्रकृति हब को आगामी समय का संकेत देती है |समय शुभ है ,शुभ आने वाला है |अशुभ है या अशुभ समय आने वाला है ,इसका संकेत भी प्रकृति हदैव देती है |हमारे घर -परिवार पर व्याप्त सकारात्मक अथवा नकारात्मक उर्जाये ऐसी घटनाएं घटाती है जो आगामी समय की सूचक होती है |अगर इन पर सावधानी से ध्यान दें और समय रहते सचेत हो उपाय करें तो आगामी कष्ट से बचा जा सकता है |इस हेतु प्रकृति के इन संकेतों को समझना चाहिए |
बिना किसी कारण के भोजन नीचे जमीन पर गिरता है तो, यह संकेत शुभ नहीं होता है, समझ लो कि धन हानि या दरिद्रता का आगमन होने वाला है.|
अशुभ संकेत
१:- घर के परिसर में बिल्ली या बिलाव का रोना या आपस में झगड़ा करना विपत्ति या घर में क्लेश का सूचक है.
२:- यदि घर के मुख्य द्वार से सांप का प्रवेश होता है तो, यह गृहस्वामी या गृहस्वामिनी के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होता है.
३:-यदि घर में कोई चोट खाया या घायल पक्षी या उसका कोई काटा हुआ अंग आँगन में गिरता है तो, समझ लीजिए कि महासंकट आने वाला है.
४:- घर में यदि कुतिया प्रसव करती है तो यह गृहस्वामी के लिए अच्छा संकेत नहीं है, इसके कारण शत्रु की वृद्धि होती है तथा अपने ही परिवार में मतभेद होने लगते है.
५:- यदि घर में कौवा, गिद्ध, चील या कबूतर नित्य बैठते है और छह मास तक लगातार निवास बनाए हुए है तो गृहस्वामी पर नाना प्रकार की विपत्ति आने का सूचक होता है.
६:- यदि घर में काले रंग के चूहे बहुत अधिक तादाद में दिन और रात भर घूमते रहते हो तो, समझ लीजिए कि किसी रोग या शत्रु का आक्रमण होने वाला है.
७:- यदि घर की छत पर, दीवार पर या घर के किसी भी कोने में लाल रंग की चींटिया घुमती या रेंगती हुई दिखाई दे, तो समझ लीजिए कि संपत्ति का क्षय होता है. या संपत्ति का कोई नुक्सान हो जाता है. और यदि पंख वाली चींटियां हो तो घर में बिना किसी कारण के क्लेश की स्थिति उत्पन्न होने लगती है.
८:- यदि पालतू गाय अपना दूध पीती हो या अत्यधिक सिर हिलाती हो, तो घर के गृहस्वामी के ऊपर कर्ज बढ़ता है और भाग्य खराब होने लगता है.
९:- यदि किसी खुशी के कार्य पर घर में आग लग जाय तो धन हानि की संभावना बन जाति है.
१०:- यदि घर में बने मंदिर की कोई मूर्ति या चित्र अपने आप खंडित या जल जाए, या जमीन पर हाथ से छूट कर टूट जाए तो, यह संकेत पूरे परिवार के लिए शुभ नहीं होता तथा इसके कारण समाज में मां हानि और कलंक लगता है. घर में विवाह आदि शुभ कार्यों में अनावश्यक बाधाओं का सामना करना पडता है.
११:- यदि घर में रसोई का प्लेटफार्म का चटकना या टूटना, चाकले का टूटना या तड़क जाना दरिद्रता की निशानी होती है.
१२:- यदि घर में दूध बार बार जमीन पर गिरता हो, किसी भी कारण से तो घर में क्लेश और विवाद की स्थिति बनती है.
१३:- यदि सुबह के समय या शाम के समय कौवा मांस या हड्डी लाकर गिराता है तो, समझ लीजिए कि अमंगल होने वाला है और बिमारी, चोट आदि पर धन खर्च होगा.
१४:- यदि कोई भी पक्षी घर में किसी भी समय कोई लोहे का टुकड़ा गिराता है तो, यह अशुभ संकेत होता है जिसके कारण अचानक छापा या कारावास होने की पूरी पूरी संभावना बनने लगती है.
१५:- यदि जिस दिन नए घर में प्रवेश करना हो तो, उसी दिन सूर्योदय के समय कोई भी पशु रोता है तो उस दिन गृह प्रवेश टाल दें यह संकेत शुभ नहीं होता है घर में प्रवेश करते ही दुःख आरम्भ हो जायेंगे.
१६. बिना किसी कारण के भोजन नीचे जमीन पर गिरता है तो, यह संकेत शुभ नहीं होता है, समझ लो कि धन हानि या दरिद्रता का आगमन होने वाला है.|..

 

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