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ॐ श्री काल भैरव बटुक भैरव शाबर स्तोत्र मंत्र

ॐ अस्य श्री बटुक भैरव शाबर स्तोत्र मन्त्रस्य सप्त
ऋषिः ऋषयः, मातृका छंदः, श्री बटुक भैरव
देवता, ममेप्सित कामना सिध्यर्थे विनियोगः.
ॐ काल भैरु बटुक भैरु ! भूत भैरु ! महा भैरव
महा भी विनाशनम देवता सर्व सिद्दिर्भवेत .
शोक दुःख क्षय करं निरंजनम, निराकरम
नारायणं, भक्ति पूर्णं त्वं महेशं. सर्व
कामना सिद्दिर्भवेत. काल भैरव, भूषण वाहनं
काल हन्ता रूपम च, भैरव गुनी.
महात्मनः योगिनाम महा देव स्वरूपं. सर्व
सिद्ध्येत. ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु ! महा भैरव
महा भय विनाशनम देवता. सर्व सिद्दिर्भवेत.
ॐ त्वं ज्ञानं, त्वं ध्यानं, त्वं योगं, त्वं तत्त्वं, त्वं
बीजम, महात्मानम, त्वं शक्तिः, शक्ति धारणं
त्वं महा देव स्वरूपं. सर्व सिद्धिर्भवेत. ॐ काल भैरु,
बटुक भैरु, भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता. सर्व सिद्दिर्भवेत.
ॐ कालभैरव ! त्वं नागेश्वरम नाग हारम च त्वं वन्दे
परमेश्वरम, ब्रह्म ज्ञानं, ब्रह्म ध्यानं, ब्रह्म योगं,
ब्रह्म तत्त्वं, ब्रह्म बीजम महात्मनः, ॐ काल भैरु,
बटुक भैरु, भूत भैरु, महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता! सर्व सिद्दिर्भवेत.
त्रिशूल चक्र, गदा पानी पिनाक धृक ! ॐ काल
भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु, महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता! सर्व सिद्दिर्भवेत.
ॐ काल भैरव ! त्वं विना गन्धं, विना धूपम,
विना दीपं, सर्व शत्रु विनाशनम सर्व
सिद्दिर्भवेत विभूति भूति नाशाय, दुष्ट क्षय
कारकम, महाभैवे नमः. सर्व दुष्ट विनाशनम सेवकम
सर्व सिद्धि कुरु. ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु,
महा भैरव महा भय विनाशनम देवता! सर्व
सिद्दिर्भवेत.
ॐ काल भैरव ! त्वं महा-ज्ञानी , त्वं महा-
ध्यानी, महा-योगी, महा-बलि, तपेश्वर !
देही में सर्व सिद्धि . त्वं भैरवं भीम नादम च
नादनम. ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु, महा भैरव
महा भय विनाशनम देवता! सर्व सिद्दिर्भवेत.
ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ! अमुकम मारय मारय,
उच्चचाटय उच्चचाटय, मोहय मोहय, वशं कुरु कुरु.
सर्वार्थ्कस्य सिद्धि रूपम, त्वं महा कालम ! काल
भक्षणं, महा देव स्वरूपं त्वं. सर्व सिद्ध्येत. ॐ काल
भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु, महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता! सर्व सिद्दिर्भवेत.
ॐ काल भैरव ! त्वं गोविन्दं गोकुलानंदम !
गोपालं गो वर्धनम धारणं त्वं! वन्दे परमेश्वरम.
नारायणं नमस्कृत्य, त्वं धाम शिव रूपं च. साधकं
सर्व सिद्ध्येत. ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु,
महा भैरव महा भय विनाशनम देवता! सर्व
सिद्दिर्भवेत.
ॐ काल भैरव ! त्वं राम लक्ष्मणं, त्वं श्रीपतिम
सुन्दरम, त्वं गरुड़ वाहनं, त्वं शत्रु हन्ता च, त्वं यमस्य
रूपं, सर्व कार्य सिद्धि कुरु कुरु. ॐ काल भैरु, बटुक
भैरु, भूत भैरु, महा भैरव महा भय विनाशनम देवता!
सर्व सिद्दिर्भवेत.
ॐ काल भैरव ! त्वं ब्रह्म विष्णु महेश्वरम, त्वं जगत
कारणं, सृस्ती स्तिथि संहार कारकम रक्त बीज
महा सेन्यम, महा विद्या, महा भय विनाशनम .
ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु, महा भैरव महा भय
विनाशनम देवता! सर्व सिद्दिर्भवेत.
ॐ काल भैरव ! त्वं आहार मध्य, मांसं च, सर्व दुष्ट
विनाशनम, साधकं सर्व सिद्धि प्रदा.
ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं अघोर अघोर, महा अघोर,
सर्व अघोर, भैरव काल ! ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत
भैरु, महा भैरव महा भय विनाशनम देवता! सर्व
सिद्दिर्भवेत.
ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं, ॐ आं क्लीं क्लीं क्लीं, ॐ आं
क्रीं क्रीं क्रीं, ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं, रूं रूं रूं, क्रूम क्रूम
क्रूम, मोहन ! सर्व सिद्धि कुरु कुरु. ॐ आं
ह्रीं ह्रीं ह्रीं अमुकम उच्चचाटय उच्चचाटय, मारय
मारय, प्रूम् प्रूम्, प्रें प्रें , खं खं, दुष्टें, हन हन अमुकम
फट स्वाहा, ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु,
महा भैरव महा भय विनाशनम देवता! सर्व
सिद्दिर्भवेत.
ॐ बटुक बटुक योगं च बटुक नाथ महेश्वरः. बटुके वट
वृक्षे वटुकअं प्रत्यक्ष सिद्ध्येत. ॐ काल भैरु बटुक भैरु
भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम देवता सर्व
सिद्दयेत.
ॐ कालभैरव, शमशान भैरव, काल रूप कालभैरव !
मेरो वैरी तेरो आहार रे ! काडी कलेजा चखन
करो कट कट. ॐ काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव
महा भय विनाशनम देवता सर्व सिद्दयेत.
ॐ नमो हँकारी वीर ज्वाला मुखी ! तू दुष्टें बंध
करो बिना अपराध जो मोही सतावे, तेकर
करेजा चिधि परे, मुख वाट लोहू आवे. को जाने?
चन्द्र सूर्य जाने की आदि पुरुष जाने. काम रूप
कामाक्षा देवी. त्रिवाचा सत्य फुरे,
ईश्वरो वाचा . ॐ काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु !
महा भैरव महा भय विनाशनम देवता सर्व
सिद्दयेत.
ॐ कालभैरव त्वं डाकिनी शाकिनी भूत
पिसाचा सर्व दुष्ट निवारनम कुरु कुरु साधका-
नाम रक्ष रक्ष. देही में ह्रदये सर्व सिद्धिम. त्वं
भैरव भैरवीभयो, त्वं महा भय विनाशनम कुरु . ॐ
काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय
विनाशनम देवता सर्व सिद्दयेत.
ॐ आं ह्रीं. पश्चिम दिशा में सोने का मठ, सोने
का किवार, सोने का ताला, सोने की कुंजी,
सोने का घंटा, सोने की संकुली.
पहली संकुली अष्ट कुली नाग को बांधो.
दूसरी संकुली अट्ठारह कुली जाती को बांधो.
तीसरी संकुली वैरी दुष्ट्तन को बांधो,
चौथी संकुली शाकिनी डाकिनी को बांधो,
पांचवी संकुली भूत प्रेतों को बांधो,
जरती अग्नि बांधो, जरता मसान बांधो, जल
बांधो थल बांधो, बांधो अम्मरताई,
जहाँ जहाँ जाई,जेहि बाँधी मंगावू,
तेहि का बाँधी लावो. वाचा चुके, उमा सूखे,
श्री बावन वीर ले जाये, सात समुंदर तीर.
त्रिवाचा फुरो मंत्र , ईश्वरी वाचा. ॐ काल भैरु
बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता सर्व सिद्दयेत.
ॐ आं ह्रीं. उत्तर दिशा में रूपे का मठ, रूपे
का किवार, रूपे का ताला,रूपे की कुंजी, रूपे
का घंटा, रूपे की संकुली. पहली संकुली अष्ट
कुली नाग को बांधो. दूसरी संकुली अट्ठारह
कुली जाती को बांधो.
तीसरी संकुली वैरी दुष्ट्तन को बांधो,
चौथी संकुली शाकिनी डाकिनी को बांधो,
पांचवी संकुली भूत प्रेतों को बांधो,
जरती अग्नि बांधो, जरता मसान बांधो, जल
बांधो थल बांधो, बांधो अम्मरताई,
जहाँ जहाँ जाई,जेहि बाँधी मंगावू,
तेहि का बाँधी लावो. वाचा चुके, उमा सूखे,
श्री बावन वीर ले जाये, सात समुंदर तीर.
त्रिवाचा फुरो मंत्र , ईश्वरी वाचा. ॐ काल भैरु
बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता सर्व सिद्दयेत.
ॐ आं ह्रीं. पूरब दिशा में तामे का मठ, तामे
का किवार, तामे का ताला,तामे की कुंजी,
तामे का घंटा, तामे की संकुली.
पहली संकुली अष्ट कुली नाग को बांधो.
दूसरी संकुली अट्ठारह कुली जाती को बांधो.
तीसरी संकुली वैरी दुष्ट्तन को बांधो,
चौथी संकुली शाकिनी डाकिनी को बांधो,
पांचवी संकुली भूत प्रेतों को बांधो,
जरती अग्नि बांधो, जरता मसान बांधो, जल
बांधो थल बांधो, बांधो अम्मरताई,
जहाँ जहाँ जाई,जेहि बाँधी मंगावू,
तेहि का बाँधी लावो. वाचा चुके, उमा सूखे,
श्री बावन वीर ले जाये, सात समुंदर तीर.
त्रिवाचा फुरो मंत्र , ईश्वरी वाचा. ॐ काल भैरु
बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता सर्व सिद्दयेत.
ॐ आं ह्रीं. दक्षिण दिशा में अस्थि का मठ,
तामे का किवार,
अस्थि का ताला,अस्थि की कुंजी,
अस्थि का घंटा, अस्थि की संकुली.
पहली संकुली अष्ट कुली नाग को बांधो.
दूसरी संकुली अट्ठारह कुली जाती को बांधो.
तीसरी संकुली वैरी दुष्ट्तन को बांधो,
चौथी संकुली शाकिनी डाकिनी को बांधो,
पांचवी संकुली भूत प्रेतों को बांधो,
जरती अग्नि बांधो, जरता मसान बांधो, जल
बांधो थल बांधो, बांधो अम्मरताई,
जहाँ जहाँ जाई,जेहि बाँधी मंगावू,
तेहि का बाँधी लावो. वाचा चुके, उमा सूखे,
श्री बावन वीर ले जाये, सात समुंदर तीर.
त्रिवाचा फुरो मंत्र , ईश्वरी वाचा. ॐ काल भैरु
बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता सर्व सिद्दयेत.
ॐ काल भैरव ! त्वं आकाशं, त्वं पातालं, त्वं
मृत्युलोकं, चतुर भुजम, चतुर मुखं, चतुर बाहुम, शत्रु
हन्ता त्वं भैरव ! भक्ति पूर्ण कलेवरम. ॐ काल भैरु
बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता सर्व सिद्धिर भवेत् .
ॐ काल भैरव ! तुम जहाँ जहाँ जाहू, जहाँ दुश्मन
बेठो होए, तो बैठे को मारो, चालत होए
तो चलते को मारो, सोवत होए तो सोते
को मरो, पूजा करत होए तो पूजा में मारो,
जहाँ होए तहां मरो वयाग्रह ले भैरव दुष्ट
को भक्शो. सर्प ले भैरव दुष्ट को दसो. खडग ले
भैरव दुष्ट को शिर गिरेवान से मारो. दुष्तन
करेजा फटे. त्रिशूल ले भैरव शत्रु चिधि परे. मुख
वाट लोहू आवे. को जाने? चन्द्र सूरज जाने
की आदि पुरुष जाने. कामरूप कामाक्षा देवी.
त्रिवाचा सत्य फुरे मंत्र ईश्वरी वाचा. ॐ काल
भैरु बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम
देवता सर्व सिद्धिर भवेत् .
ॐ काल भैरव ! त्वं. वाचा चुके उमा सूखे, दुश्मन मरे
अपने घर में. दुहाई भैरव की. जो मूर वचन झूठा होए
तो ब्रह्म का कपाल टूटे, शिवजी के तीनो नेत्र
फूटें. मेरे भक्ति, गुरु की शक्ति फुरे मंत्र
ईश्वरी वाचा. ॐ काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु !
महा भैरव महा भय विनाशनम देवता सर्व
सिद्धिर भवेत् .
ॐ काल भैरव ! त्वं.भूतस्य भूत नाथासचा,भूतात्म
ा भूत भावनः, त्वं भैरव सर्व सिद्धि कुरु कुरु. ॐ
काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय
विनाशनम देवता सर्व सिद्धिर भवेत् .
ॐ काल भैरव ! त्वं ज्ञानी, त्वं ध्यानी, त्वं
योगी, त्वं जंगम स्थावरम त्वं सेवित सर्व काम
सिद्धिर भवेत्. ॐ काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु !
महा भैरव महा भय विनाशनम देवता सर्व
सिद्धिर भवेत् .
ॐ काल भैरव ! त्वं वन्दे परमेश्वरम, ब्रह्म रूपम,
प्रसन्नो भव. गुनी महात्मानं महादेव स्वरूपं सर्व
सिद्दिर भवेत्.

प्रयोग :
१. सायंकाल दक्षिणाभिमुख होकर पीपल
की डाल वाम हस्त में लेकर, नित्य २१ बार पाठ
करने से शत्रु क्षय होता है.
२. रात्रि में पश्चिमाभिमुख होकर उपरोक्त
क्रिया सिर्फ पीपल की डाल दक्षिण हस्त में
लेकर पुष्टि कर्मों की सिद्धि प्राप्त होती है,
२१ बार जपें.
३. ब्रह्म महूर्त में पश्चिमाभिमुख तथा दक्षिण हस्त
में कुश की पवित्री लेकर ७ पाठ करने से समस्त
उपद्रवों की शांति होती है.

ॐ परम अवधूताय नमः.

2…अनुभुत ज्वरहर बलिदानव्रत – चिरकालीन ज्वरकी शान्तिके लिये मेने ये व्रत और उपाय किया और पुर्णतः लाभ हुआ ।लगातार बुखार फिर ठीक फिर बुखार ,समझ ना पङते देख ये व्रत और ऊपाय करे ,दवाई भी लेते रहे । क्रष्ण अष्टमीके अपराह्णमें चावलोंके चूर्णसे मनुष्यकीआकृतिका पुतला बनाकर उसके हलदीका लेप करे । मुख, हदय, कण्ठ और नाभिमें पीली कौड़ी लगावे, फिर खसके आसनपर विराजमान करके उसके चारों कोणोंमें पीले रंगकी चार पताका लगावे तथा उनके पास हलदीके रससे भरे हुए पीपलकेपत्तोंके पत्तोके चार दोने रखे और ‘ मम चिरकालीनज्वरजनि तपापतापादिशप्रशमनार्थं ज्वरहबलिदानं करिष्ये । ‘ यह संकल्प करके पुतलेका पूजन करे । सायंकाल होनेपर ज्वरवाले मनुष्यकी ‘ ॐ नमो भगवते गरुडासनाय त्र्यम्बकाय स्वस्तिरस्तु स्वस्तिरस्तु स्वाहा । ॐ कं ठं यं सं वैनतेयाय नमः । ॐ ह्लीं क्षः क्षेत्रपालाय नमः । ॐ ठः ठः भो भो ज्वर श्रृणु श्रृणु हल हल गर्ज गर्ज नैमित्तिकं मौहूर्त्तिकं एकाहिकं द्वयाहिकं त्र्याहिकं चातुर्थिकं पाक्षिकादिकं चफट् हल हल मुञ्च मुञ्च भूम्यां गच्छ गच्छ स्वाहा ।’ इस मन्त्नसे तीन या सात आरती उतारकर पूर्वोक्त पुतलेको पूजा – सामग्रीसहित किसी वृक्षके मूल, चौराहे या श्मशानमें रख आवे । इस प्रकार तीन दिन करे और तीनों ही दिनोंमें नक्तव्रत ( रात्रिमें एक बार भोजन ) करे । स्मरण रहे कि पुत्तलपूजन बीमारके दक्षिण भागके स्थानमें करना चाहिये । इससे ज्वरजातव्याधियाँ शीघ्र ही शान्त होती हैं

3….दूकान की बिक्री अधिक हो-

!॰ “श्री शुक्ले महा-शुक्ले कमल-दल निवासे श्री महालक्ष्मी नमो नमः। लक्ष्मी माई, सत्त की सवाई। आओ, चेतो, करो भलाई। ना करो, तो सात समुद्रों की दुहाई। ऋद्धि-सिद्धि खावोगी, तो नौ नाथ चौरासी सिद्धों की दुहाई।”
विधि- घर से नहा-धोकर दुकान पर जाकर अगर-बत्ती जलाकर उसी से लक्ष्मी जी के चित्र की आरती करके, गद्दी पर बैठकर, 1माला उक्त मन्त्र की जपकर दुकान का लेन-देन प्रारम्भ करें। आशातीत लाभ होगा।
2॰ “भँवरवीर, तू चेला मेरा। खोल दुकान कहा कर मेरा।
उठे जो डण्डी बिके जो माल, भँवरवीर सोखे नहिं जाए।।”
विधि- 1॰ किसीशुभ रविवार से उक्त मन्त्र की 10 माला प्रतिदिन के नियम से दस दिनों में 1100 माला जप कर लें। केवल रविवार के ही दिन इस मन्त्र का प्रयोग किया जाता है। प्रातः स्नान करके दुकान पर जाएँ। एक हाथ में थोड़े-से काले उड़द ले लें। फिर 11बार मन्त्र पढ़कर, उन पर फूँक मारकर दुकान में चारों ओर बिखेर दें। सोमवार को प्रातः उन उड़दों को समेट कर किसी चौराहे पर, बिना किसी के टोके, डाल आएँ। इस प्रकार चार रविवार तक लगातार, बिना नागा किए, यह प्रयोग करें।

4…..श्रीगणेश मन्त्र “ॐ नमो सिद्ध-विनायकाय सर्व-कार्य-कर्त्रे सर्व-विघ्न-प्रशमनाय सर्व-राज्य-वश्य-करणाय सर्व-जन-सर्व-स्त्री-पुरुष-आकर्षणाय श्रीं ॐ स्वाहा।” विधि- नित्य-कर्म से निवृत्त होकर उक्त मन्त्र का निश्चित संख्या में नित्य १ से १० माला ‘जप’ करे। बाद में जब घर से निकले, तब अपने अभीष्ट कार्य का चिन्तन करे। इससे अभीष्ट कार्व सुगमता से पूरे हो जाते हैं।
2…सिद्धि के लिए श्री गणेश मंत्र
श्री गणेश को सभी देवताओं में सबसे पहले प्रसन्न किया जाता है. श्री गणेश विध्न विनाशक है. श्री गणेश जी बुद्धि के देवता है, इनका उपवास रखने से मनोकामना की पूर्ति के साथ साथ बुद्धि का विकास व कार्यों में सिद्धि प्राप्त होती है. श्री गणेश को भोग में लडडू सबसे अधिक प्रिय है. इस चतुर्थी उपवास को करने वाले जन को चन्द्र दर्शन से बचना चाहिए.
ॐ ग्लां ग्लीं ग्लूं गं गणपतये नम : सिद्धिं मे देहि बुद्धिं
प्रकाशय ग्लूं गलीं ग्लां फट् स्वाहा||
विधि :- —-
इस मंत्र का जप करने वाला साधक सफेद वस्त्र धारण कर सफेद रंग के आसन पर बैठकर पूर्ववत् नियम का पालन करते हुए इस मंत्र का सात हजार जप करे| जप के समय दूब, चावल, सफेद चन्दन सूजी का लड्डू आदि रखे तथा जप काल में कपूर की धूप जलाये तो यह मंत्र ,सर्व मंत्रों को सिद्ध करने की ताकत (Power, शक्ति) प्रदान करता है|
3…श्री गणेश मूल मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः |
ॐ श्री विघ्नेश्वराय नमः ||
विघ्न-विनाशक गणेश मन्त्र—
मन्त्रः- “जो सुमिरत सिधि होइ
गननायक करिबर बदन ।
करउ अनुग्रह सोई
बुद्धिरासी सुभ गुन सदन ।।”
मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभ
सर्व-प्रथम गणेशजी को सिन्दूर का चोला चढ़ायें और फिर रक्त-चन्दन की माला पर प्रातःकाल के समय दस माला (108*10=1080) बार इस मन्त्र का पाठ करें । यह प्रयोग ४० दिन तक करते रहें तो प्रयोग-कर्त्ता के सभी विघ्नों का अन्त होकर गणेशजी का अनुग्रह प्राप्त होता है ।
**********|| श्री गणेश कवच ||****************
एषोति चपलो दैत्यान् बाल्येपि नाशयत्यहो ।
अग्रे किं कर्म कर्तेति न जाने मुनिसत्तम ॥ १ ॥
दैत्या नानाविधा दुष्टास्साधु देवद्रुमः खलाः ।
अतोस्य कंठे किंचित्त्यं रक्षां संबद्धुमर्हसि ॥ २ ॥
ध्यायेत् सिंहगतं विनायकममुं दिग्बाहु माद्ये युगे
त्रेतायां तु मयूर वाहनममुं षड्बाहुकं सिद्धिदम् । ई
द्वापरेतु गजाननं युगभुजं रक्तांगरागं विभुम् तुर्ये
तु द्विभुजं सितांगरुचिरं सर्वार्थदं सर्वदा ॥ ३ ॥
विनायक श्शिखांपातु परमात्मा परात्परः ।
अतिसुंदर कायस्तु मस्तकं सुमहोत्कटः ॥ ४ ॥
ललाटं कश्यपः पातु भ्रूयुगं तु महोदरः ।
नयने बालचंद्रस्तु गजास्यस्त्योष्ठ पल्लवौ ॥ ५ ॥
जिह्वां पातु गजक्रीडश्चुबुकं गिरिजासुतः ।
वाचं विनायकः पातु दंतान्‌ रक्षतु दुर्मुखः ॥ ६ ॥
श्रवणौ पाशपाणिस्तु नासिकां चिंतितार्थदः ।
गणेशस्तु मुखं पातु कंठं पातु गणाधिपः ॥ ७ ॥
स्कंधौ पातु गजस्कंधः स्तने विघ्नविनाशनः ।
हृदयं गणनाथस्तु हेरंबो जठरं महान् ॥ ८ ॥
धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरश्शुभः ।
लिंगं गुह्यं सदा पातु वक्रतुंडो महाबलः ॥ ९ ॥
गजक्रीडो जानु जंघो ऊरू मंगलकीर्तिमान् ।
एकदंतो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदावतु ॥ १० ॥
क्षिप्र प्रसादनो बाहु पाणी आशाप्रपूरकः ।
अंगुलीश्च नखान् पातु पद्महस्तो रिनाशनः ॥ ११ ॥
सर्वांगानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदावतु ।
अनुक्तमपि यत् स्थानं धूमकेतुः सदावतु ॥ १२ ॥
आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोवतु ।
प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥ १३ ॥
दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैऋत्यां तु गणेश्वरः ।
प्रतीच्यां विघ्नहर्ता व्याद्वायव्यां गजकर्णकः ॥ १४ ॥
कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्याविशनंदनः ।
दिवाव्यादेकदंत स्तु रात्रौ संध्यासु यःविघ्नहृत् ॥ १५ ॥
राक्षसासुर बेताल ग्रह भूत पिशाचतः ।
पाशांकुशधरः पातु रजस्सत्त्वतमस्स्मृतीः ॥ १६ ॥
ज्ञानं धर्मं च लक्ष्मी च लज्जां कीर्तिं तथा कुलम् । ई
वपुर्धनं च धान्यं च गृहं दारास्सुतान्सखीन् ॥ १७ ॥
सर्वायुध धरः पौत्रान् मयूरेशो वतात् सदा ।
कपिलो जानुकं पातु गजाश्वान् विकटोवतु ॥ १८ ॥
भूर्जपत्रे लिखित्वेदं यः कंठे धारयेत् सुधीः ।
न भयं जायते तस्य यक्ष रक्षः पिशाचतः ॥ १९ ॥
त्रिसंध्यं जपते यस्तु वज्रसार तनुर्भवेत् ।
यात्राकाले पठेद्यस्तु निर्विघ्नेन फलं लभेत् ॥ २० ॥
युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं चाप्नुयाद्ध्रुवम् ।
मारणोच्चाटनाकर्ष स्तंभ मोहन कर्मणि ॥ २१ ॥
सप्तवारं जपेदेतद्दनानामेकविंशतिः ।
तत्तत्फलमवाप्नोति साधको नात्र संशयः ॥ २२ ॥
एकविंशतिवारं च पठेत्तावद्दिनानि यः ।
कारागृहगतं सद्यो राज्ञावध्यं च मोचयोत् ॥ २३ ॥
राजदर्शन वेलायां पठेदेतत् त्रिवारतः ।
स राजानं वशं नीत्वा प्रकृतीश्च सभां जयेत् ॥ २४ ॥
इदं गणेशकवचं कश्यपेन सविरितम् ।
मुद्गलाय च ते नाथ मांडव्याय महर्षये ॥ २५ ॥
मह्यं स प्राह कृपया कवचं सर्व सिद्धिदम् ।
न देयं भक्तिहीनाय देयं श्रद्धावते शुभम् ॥ २६ ॥
अनेनास्य कृता रक्षा न बाधास्य भवेत् व्याचित् ।
राक्षसासुर बेताल दैत्य दानव संभवाः ॥ २७ ॥
॥ इति श्री गणेशपुराणे श्री गणेश कवचं संपूर्णम् ॥
******श्री गणेशाय नमः************
श्री सङ्कष्टनाशन गणेश स्तोत्रम् नारद उवाच।
प्रणम्य शिरसा देवं गौरी पुत्रं विनायाकम्।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यम् आयुष्कामार्थसिद्धये॥१॥
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतर्थकम्॥२॥
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम्॥३॥
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्॥४॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम्॥५॥
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम्॥६॥
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः॥७॥
अष्टभयो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत्।
तस्य विद्या भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादतः॥ ८॥
॥इति श्रीनारदपुराणे सङ्कष्टनाशनं नाम गणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥

5…..श्री पञ्च मुखी हनुमान जी का शक्ति शाली तांत्रिक मन्त्र जाप जिसको नित्य नियम से करने पर आपको मारन मोहन उच्चाटन स्तम्भनं शत्रु पीड़ा से मुक्ति मिलती है ।।
ॐ हरी मरकट मर्कटाय फट् स्वाहा।
ॐ हरी मरकट मर्कटाय वं वं वं वं वं फट् स्वाहा।
ॐ हरी मरकट मर्कटाय फं फं फं फं फं फट् स्वाहा।
ॐ हरी मरकट मर्कटाय खं खं खं खं खं मारणाय फट् स्वाहा।
ॐ हरी मरकट मर्कटाय ठं ठं ठं ठं ठं स्तम्भनाय फट् स्वाहा।
ॐ हरी मरकट मर्कटाय डं डं डं डं डं आकर्षण सकल सम्पत्कराय पंचमुखी वीरहनुमते फट् स्वाहा।
ॐ उच्चाटने ढं ढं ढं ढं ढं कुर्ममूर्तये पंचमुखी हनुमते पर यंत्र तंत्रोच्चाटनाय फट् स्वाह ।
ॐ कं खं गं घ्ं डं चं छं जं झं त्रं ट ठं ढं ढ़ं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं यं रं लं वं शं षं सं हं क्ष फट् स्वाहा इति दिग्बंध।।।।
ॐ पूर्वकपिमुखे पंचमुख हनुमते ठं ठं ठं ठं ठं सकल शत्रु संहारकाय फट् स्वाहा ।
ॐ दक्षिणमुखे पंचमुखी हनुमते कारलवादनाय नरसिंघाय ह्रां ह्रां ह्रां ह्रां ह्रां सकल भूत प्रेत दमनाय फट् स्वाहा ।
ॐ पश्चिम मुखे garudaasnay पंचमुखी वीर हनुमते मं मं मं मं मं सकल विष हाराय फट् स्वाहा।
ॐ उत्तर मुखे आदिवारहाय लं लं लं लं लं नुरसिंघाय नीलकंठाय पंचमुखी हनुमते फट् स्वाहा।
ॐ अंजनिसुताय वायुपुत्राय महाबलाय रामेष्ट फाल्गुन सखाय सीता शोक निवारणाय लक्ष्मन प्राण रक्षाय कपि सैन्य परकाशय दस ग्रीवा भिमान दहनाय श्री राम चन्दर वर परसाद काय महावीर्याय पर्थम ब्रह्माण्ड नायकाय पंचमुखी हनुमते भूत प्रेत पिशाच ब्रह्म राक्षश शाकिनी डाकिनी अंतरिक्ष गृह परमंत्र पर्यंत्र सर्व गृहोच्चाटनाय सकल शत्रु संहारणाय पंचमुखी हनुमत्व द्वर् परसाद सर्व रक्षकाय जं जं जं जं जं फट् स्वाहा।।
श्री राम श्री राम श्री राम।

6…..श्री गणेश को इन मंत्रों से चढ़ाएं 21 दूर्वा, हर काम होगा सफल
अगर यह हताशा में बदलने लगे तो संभवत: जीवन में असफलता का बड़ा कारण बन सकती है।
जबकि ऐसे वक्त कमियों पर गौर करना जरूरी होता है। हिन्दू धर्म में ऐसे वक्त, नाकामियों और विघ्रों से बचने के लिए आस्था और श्रद्धा के साथ हर कार्य की शुरूआत विघ्रहर्ता श्री गणेश की उपासना से की जाती है।
श्रीगणेश विनायक नाम से भी पूजनीय है।
विनायक पूजा और उपासना कार्य बाधा और जीवन में आने वाली शत्रु बाधा को दूर कर शुभ व मंगल करती है। यही कारण है हर माह के शुक्ल पक्ष को विनायक चतुर्थी पर श्री गणेश की उपासना कार्य की सफलता के लिए बहुत ही शुभ मानी गई है। यहां जानते हैं विनायक चतुर्थी के दिन श्री गणेश उपासना का एक सरल उपाय, जो कोई भी अपनाकर हर कार्य को सफल बना सकता है -
- चतुर्थी के दिन, बुधवार को सुबह और शाम दोनों ही वक्त यह उपाय किया जा सकता है।
- स्नान कर भगवान श्री गणेश को कुमकुम, लाल चंदन, सिंदूर, अक्षत, अबीर, गुलाल, फूल, फल, वस्त्र, जनेऊ आदि पूजा सामग्रियों के अलावा खास तौर पर 21 दूर्वा चढ़ाएं। दूर्वा श्री गणेश को विशेष रूप से प्रिय मानी गई है।
- विनायक को 21 दूर्वा चढ़ाते वक्त नीचे लिखे 10 मंत्रों को बोलें यानी हर मंत्र के साथ दो दूर्वा चढ़ाएं और आखिरी बची दूर्वा चढ़ाते वक्त सभी मंत्र बोलें। जानते हैं ये मंत्र
- ॐ गणाधिपाय नम:। ॐ विनायकाय नम:। ॐ विघ्रनाशाय नम:। ॐ एकदंताय नम:। ॐ उमापुत्राय नम:। ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नम:।ॐ ईशपुत्राय नम:। ॐ मूषकवाहनाय नम:। ॐ इभवक्त्राय नम:। ॐ कुमारगुरवे नम:।
- मंत्रों के साथ पूजा के बाद यथाशक्ति मोदक का भोग लगाएं। 21 मोदक का चढ़ावा श्रेष्ठ माना जाता है।
- अंत में श्री गणेश आरती कर क्षमा प्रार्थना करें। कार्य में विघ्र बाधाओं से रक्षा की कामना करें।

7…..श्री दत्तात्रेय की उपासना विधि ,
गोरख शाबर गायत्री मन्त्र
“ॐ गुरुजी, सत नमः आदेश। सत गुरुजी को आदेश। ॐकारे शिव-रुपी, मध्याह्ने हंस-रुपी, सन्ध्यायां साधु-रुपी। हंस, परमहंस दो अक्षर। गुरु तो गोरक्ष, काया तो गायत्री। ॐ ब्रह्म, सोऽहं शक्ति, शून्य माता, अवगत पिता, विहंगम जात, अभय पन्थ, सूक्ष्म-वेद, असंख्य शाखा, अनन्त प्रवर, निरञ्जन गोत्र, त्रिकुटी क्षेत्र, जुगति जोग, जल-स्वरुप रुद्र-वर्ण। सर्व-देव ध्यायते। आए श्री शम्भु-जति गुरु गोरखनाथ। ॐ सोऽहं तत्पुरुषाय विद्महे शिव गोरक्षाय धीमहि तन्नो गोरक्षः प्रचोदयात्। ॐ इतना गोरख-गायत्री-जाप सम्पूर्ण भया। गंगा गोदावरी त्र्यम्बक-क्षेत्र कोलाञ्चल अनुपान शिला पर सिद्धासन बैठ। नव-नाथ, चौरासी सिद्ध, अनन्त-कोटि-सिद्ध-मध्ये श्री शम्भु-जति गुरु गोरखनाथजी कथ पढ़, जप के सुनाया। सिद्धो गुरुवरो, आदेश-आदेश।।”
साधन-विधि एवं प्रयोगः-
प्रतिदिन गोरखनाथ जी की प्रतिमा का पंचोपचार से पूजनकर २१, २७, ५१ या १०८ जप करें। नित्य जप से भगवान् गोरखनाथ की कृपा मिलती है, जिससे साधक और उसका परिवार सदा सुखी रहता है। बाधाएँ स्वतः दूर हो जाती है। सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है और अन्त में परम पद प्राप्त होता है।

8…..श्री दत्तात्रेय की उपासना विधि ,
शिव आदेश
ॐ अलख निरंजन शिव को आदेश।
अविगत महापुरुष मूल पुरुष पुरुषोत्तम आद पुरुष शिव को आदेश। ज्योति-परमज्योति-अयोनि रूद्र शिव को आदेश। विशूनी विश्वमूर्ति पाताल ग्रहणी शिव को आदेश। मुखेवेद पुराण नासिका गंगा – जमना – सरस्वती शिव को आदेश। ललाटी चंद मस्तके त्रिकुटा देवता धारी शिव को आदेश। नक्षत्री माला अठारह भार वनस्पती हृदय के तैतीस करोड़ देवता धारी शिव को आदेश। सेली सिंगी मीन मेखला बाघाम्बरधारी रोम – रोम सप्त सागरा शिव को आदेश। शिव के बायीं ओर निर्गुण ब्रहम् दाहिनी ओर शक्ति महामाया बीच में स्वयं पूर्ण अखण्ड ज्योति स्वरूप शिव को आदेश। विभूति धारी बीज मंत्र घोर मंत्र अघोर मंत्र क्षीर मंत्र गायत्री मंत्र अभय जाप तंत्र – मंत्र स्वरूप शिव को आदेश। नर – नारी भूत – प्रेत यक्ष किन्नर इन्द्रादि देवता ब्रह्माण्ड व्यापक शिव को आदेश। साधु – संत योगी – ज्ञानी तपस्वी त्यागी अवधूत हर भक्त के ईष्ट शिव को आदेश। जीवों का आराध्या शिव को आदेश। सूक्ष्म में सूक्ष्म विराटों में व्यापक महातत्त्व शिव को आदेश। सृष्टि उत्पत्ति संहार पालन पंच महातत्त्व शिव को आदेश। चार खानी चार बानी चन्द सूर पवन पानी शिव को आदेश। चराचर सृष्टि का बिज शिव को आदेश। करोड़ों सूर्य प्रकाशनाथ योग आदर्श शिव को आदेश। परमात्मपूर्ण आनंद सर्व शक्तिमान चैतन्य रूप जितेन्द्र मोक्ष कैवल्य मुक्तिदाता भिन्न – अभिन्न शिव को आदेश। महाज्ञानी कृपा साक्षात्कार शिव को आदेश। सर्वनाथ सिद्धों का सतगुरु आदिनाथजि ॐकार शिव को आदेश। इतना शिव सबद निरूपा सम्पूर्ण भया। श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।
श्रीशंभुजती गुरु गोरखनाथ बाल स्वरूप बोलिए। इतना नौ नाथ स्वंरूप मंत्र सम्पूर्ण भया अनन्त कोट सिद्धों में बैठकर गुरु गोरखनाथजि ने कहाया नाथजी गुरुजी आदेश।
शाबर मंत्र, एक ऐसी विधा जिसके बिना प्रत्येक साधक की साधना यात्रा अधूरी हैं, और रहेगी । शाबर मन्त्रो का इतिहास बहुत प्राचीन हैं, मेरी जानकारी मैं सबसे पहले यदि किसी ने शाबर मंत्रो से जग को ही नहीं अपितु देवतओं को भी विवश कर दिया वो थे ” गुरु गोरखनाथ जी ” । शाबर मंत्रो ने उन्हें इतनी शक्ति एवं क्षमता प्रदान की थी कि देवता भी गोरखनाथ जी के सामने नतमस्तक हो जाते थे । शाबर मंत्रो की शक्ति अपने आप मैं अद्वितीय हैं एवं इसका सबसे बड़ा कारण हैं इनकी सरलता, शाबर मंत्र साधारण जीवन की बोल – चाल वाली भाषा से निकले हैं परन्तु निरंतर प्रयास एवं सिद्धो की कृपा से आज यह मंत्र इतने प्रभावी हैं की इनका सही प्रयोग कभी खाली नहीं जाता हैं
शाबर मंत्र जंहा सरलता से पढ़े जा सकते हैं, वंही इनके साथ कुछ सख्त नियम भी बंधे हुए हैं । शाबर मन्त्रो के प्रयोग के समय स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना होता हैं । यह स्वच्छता शरीर के साथ विचारो की भी आवश्यक होती हैं । आप ये विशेष ध्यान रखे की साधना काल मैं किसी से भी झूठ न बोले, किसी के लिए मन मैं व्यर्थ डाह न पाले, ईर्ष्या एवं द्वेष के लिए एक साबर साधना के दौरान कोई स्थान नहीं होता हैं । साधना काल मैं पूर्ण ब्रहमचर्य अति आवश्यक हैं, यह ब्रहमचर्य शारीरिक एवं वैचारिक दोनो रूप से आवश्यक हैं । शाबर मन्त्रो की साधना हमेशा दिशा एवं काल का निर्णय केर के ही प्रारम्भ करनी चाहिए हैं । स्नान कर के साफ़ वस्त्रो का प्रयोग का भी ध्यान रखा जाए ।
नानक जी अन्नपूर्णा मन्त्र
ॐ सत्त नाम का सभी पसारा, धन गगन में जो वर तारा।
मन की जाय जहाँ लग आखा, तहँ तहँ सत्त नाम की राखा।
अन्नपूरना पास गई बैठाली, थुड़ो गई खुसाली।
चिनत मनी कलप तराये। कामधेनु को साथ लियाये।
आया आप कुबेर भण्डारी, साथ लक्ष्मी आज्ञाकारी।
सत गुरू पूरन किया सवारथ, विच आ बइठे पाँच पदारथ।
राखा ब्रह्मा विशनु महेश काली भैरव हनु गनेस,
सिध चैरासी अरू नवनाथ बावन वीर जती चैसाठ।
धाकन गमन पिरथवी का वासन, रहे अम्बोल न डोले आसन।
राखा हुआ आप निरंकार, थुड़ी भाग गई समुन्दरो पार।
अतुत भण्डार, अखुत अपार, खात खरचत कुछ होय न ऊना, देव देवाये दूना चैना।
गुरू की झोली मेरे हाथ, गुरू वचनी बँधे पँच तात।
वेअण्ट बेअण्ट भण्डार, जिनकी पैज रखी करतार।
मन्तर पूरना जी का संपूरन भया।
बाबा नानकजी का गुरू के चरन कमल को नमस्ते नमस्ते नमस्ते।
11 बार प्रतिदिन जप करें। 1000 जप हो जाने पर किसी प्रकार की कमी नहीं होती।

9…..श्री दत्तात्रेय की उपासना विधि ,
नाथ गुरू मछेन्दरनाथ ने साम्ब सदाशिव से शाक्त तंत्र सीखा
नव नाथों में श्रीआदिनाथ साम्ब सदाशिव से सीधे शाक्त तंत्र सीखनेवाले मत्स्येन्द्रनाथ (लोक में प्रचलित मछेन्दर नाथ) रहे। गोरक्षविजय, मीन चेतना ग्रन्थों के अनुसार सदाशिव ने मत्स्येन्द्रनाथ को शाप दिया कि निर्णायक समय उनको इस सर्वशक्तिमान शक्ति विद्या का ज्ञान नहीं रहेगा।
आगम ग्रन्थों के अनुसार इसलिए महिलाओं के देश, कामरूप अथवा काडाली में नाथ गुरू मत्स्येन्द्रनाथ तांत्रिक शक्तियां भूलकर राग रंग में डूब गए। गोरक्षविजय में लिखा है कि गुरू गोरक्षनाथ (गोरखनाथ) ने अपनी अन्तदृष्टि से, अपने गुरू मछेन्द्रनाथ की दारूण दशा देखी। प्रकारान्तर में गुरू गोरखनाथ महिला नृत्य मण्डली में शामिल होकर रानी के दरबार में पहुंचे। दरबार में मृदंग में से ‘जाग मछन्दर गोरख आया’ के स्वर ने मोहपाश में बंधे, गुरू मछेन्दरनाथ को सत्य का ज्ञान करवाया।
पश्चिम के विद्वानों ने नाथ गुरू मत्स्येन्द्रनाथ के काल को लेकर विरोधाभाष पैदा किया है। प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के महापण्डित दामोदर धर्मानन्द कौशम्बी ने अपनी शोध में तथ्य और प्रमाणों के आधार पर पाया कि नवनाथों में गुरू योगी भर्तृहरि नाथ (भरथरी नाथ) तीसरी शताब्दी के रहे। योगी भर्तृहरि शिवस्वरूप गोरक्षनाथ के शिष्य थे। परिणामतः हठ योग के प्रवर्तक गुरू गोरखनाथ का काल संबोधिप्राप्त गौतम तथागत (बुद्ध) और महावीर के समकालीन था।
जगदगुरू शंकराचार्य की कांची काम कोटीपीठम द्वारा प्रकाशित कांची महामात्य के अनुसार आदि शंकराचार्य का समय काल ईसा पूर्व तीसरी या चौथी शती था।
दूसरे शब्दों में आदिशंकराचार्य, गुरू गोरक्षनाथ, संबोधि बुद्ध, महावीर चारों ही समकालीन रहे। कुछ पौराणिक मीठी कथाओं के अनुसार मर्यादा पुरूषोत्तम राम और आध्यात्म एवं नीति ग्रंथ के महारचियता वशिष्ठ गुरू के काल के, मध्य में राजा उधोधर के शुक्राणु से मछेन्द्रनाथ का जन्म हुआ। संगलद्वीप की दो रानियों ने तांत्रिक शक्तियों से मछेन्दरनाथ को रनिवास में बंधित किया। गोरक्षनाथ मक्खी के रूप में महल में घुसे और मछेन्दनाथ को छुडाकर लाऐ।
काश्मीर के धार्मिक आख्यान तन्त्रालोक के अनुसार, योग के प्रवर्तक सदाशिव ने युग के प्रारम्भ में मत्स्येन्द्रनाथ को सीधे तंत्र ज्ञान दिया। अतः वे काली तंत्र काल के योगनाथ थे। उन्हे मच्छन्दा, मछेन्द्रा, मछिन्द्रा, मच्छघनपदा, मीनपाद, मीननाथ आदि नामों से सम्बोधित किया गया। काश्मीर तंत्र को अदभुत रचनाओं कौलज्ञाननिर्णय, अकुलवीरतंत्र, कुलानन्दतंत्र, ज्ञान कारिका, कामख्यागुहा सिद्धि, मत्स्येन्द्र संहिता, महार्थमंजरी आदि की रचना नाथ गुरू मत्स्येन्द्रनाथ ने की। उत्तरपूर्व के नगा मानते हैं कि मत्स्येन्द्र नाथ नगा थे। नगा आख्यानों में आदिवासी परम्परा के राजा चोल ने मत्स्येन्द्र नाथ से दीक्षा ली। कहीं कहीं राज चोल को चैलेन्द्रनाथ लिखा है। चैलेन्द्रनाथ कदली देश (केले के वन में) मछन्दरनाथ से मिले।
तिब्बती के दपांग बसम गोन बजन्स आध्यात्मिक ग्रंथ में ‘केवट’ परिवार से महान संत ना-इतो-पा अर्थात लुई पा का उल्लेख है। लुई पा ने महासिद्ध शवरीपा से दीक्षा ली। लुई पा को 84 सिद्धियां प्राप्त की। तिब्बती शब्द नाम ना-इतो-पा का संस्कृत अनुवाद मत्स्येन्द्र नाथ है। तिब्बत के धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार लुई पा को कामरूप में साक्षात सदाशिव महादेव ने तांत्रिक सिद्धी दी। मत्स्येन्द्र नाथ का शरीर वज्र के समान होने से उन्हें वज्र पा भी कहा गया। स्कन्द पुराण के नागरखण्ड में लिखा है कि प्राकृतिक आपदा में उनके परिवार ने उन्हे बचाने के लिए समुद्र में फेंक दिया। समुद्र में बृहद मछली उन्हे निगल गई। उस समय सदाशिव अपनी शिवा भवानी पार्वती एवं पुत्र कार्तिकेय के साथ श्वेतद्वीप के रामायका पर्वत पर गए। यह पर्वत दूध के समुद्र से घिरा था।
पर्वत शिखर पर सदाशिव ने पार्वती को काली तंत्र, ध्यान योग, ज्ञान योग का रहस्यमय ज्ञान दिया। उसी समय महामछली उछली। मछली के पेट में फंसे बच्चे ने बताया कि गंदान्तयोग से उत्पन्न हुआ है और ज्ञान योग सुना है। सदाशिव नन्हे बालक से बहुत प्रसन्न हुए। सदाशिव ने कहा कि तुम विप्र हो, मेरे पुत्र के समान हो। समूचि शक्ति लगाकर मछली से बाहर निकलकर मेरे पास आओ। जगतजननी शक्ति स्वरूपा पार्वती ने बच्चे को गोद में उठाया। सदाशिव-पार्वती शिशु को आकाश मार्ग से पवित्र मंदार पर्वत ले गए। जहां उन्हे मत्स्येन्द्र नाथ नाम मिला।
नेपाल में मत्स्येन्द्रनाथ को संबोधि बुद्ध का अवलोकितेश्वर अवतार मानकर पूजा करते हैं। नेपाल की संस्कृति में बुगमा पर्वत पर मछेन्द्रनाथ की अर्चना की जाती है। मछेन्द्रनाथ दक्षिण नेपाल में कामारी पर्वत की निरन्तर यात्रा करते थे। एक बार उनके महान शिष्य गोरक्ष नाथ नेपाल आये। परन्तु नेपाल के पहाडों के कारण वे मछेन्दर नाथ तक नहीं पहुंच सके। इससे गोरक्षनाथ ने नेपाल को सबक सीखाने की ठानी। गोरक्षनाथ ने सात नागों को वशीकृत कर कछुए के नीचे दबाकर साधना शुरू की। परिणामतः नेपाल में 12 वर्ष तक वर्षा नहीं हुई। राजा नरेन्द्रदेव वर्षा नहीं होने का कारण जानते थे। राजा नरेन्द्रदेव असम्भव चढाई के पर्वतों से गुरू मत्स्येन्द्र नाथ को लेने गए।
राजा नरेन्द्रदेव की कापोटाला में पूजा से अवलोकितेश्वर प्रसन्न होकर प्रकट हुए। अवलोकितेश्वर ने राजा नरेन्द्रदेव को गोपनीय मंत्री दिया। निर्देशों के अनुसार दिव्य शक्तिमान मंत्री का पाठ भानुदत्त ने शुरू किया और अवलोकितेश्वर खींचे हुए मधुमक्खी के रूप में ‘कमण्डलु’ की ओर गए एवं अन्दर बैठे। भानुदत्त ने राजा को सचेत किया कि कमण्डलु का मुख बंद कर नेपाल चलें। इसे बुगमा पर्वत पर स्थापित किया गया। कौलज्ञान निर्णय में भृगपदा का उल्लेख मिलता है। अवलोकितेश्वर के आते ही वर्षा शुरू हुई। बुद्ध पुराण में भी मत्स्येन्द्रनाथ, गोरक्षनाथ का विवरण है।
ब्राह्मण ग्रंथों में लिखा है कि एकबार गोरक्षनाथ गुरू मत्स्येन्द्र नाथ के पीछे नेपाल गए। नेपाल में आतिथ्य नहीं होने से गोरक्षनाथ ने अपने नाग रक्षित आसन के नीचे बादल छिपा लिए। जिससे वर्षा नहीं हुई। नेपाल को बचाने के लिए मछेन्दरनाथ गए। गुरू मछेन्दर को देखते ही गोरख चरण स्पर्श को उठे और वर्षा हुई। इस प्रकार कमण्डलु से मछेन्द्रनाथ और प्रकारान्तर में गोरखनाथ नेपाल गए और पूजित हुए।
कौलज्ञाननिर्णय कुलागम तन्त्र का रहस्य सदाशिव ने भगवती पार्वती को चन्द्रद्वीप पर दिया। काश्मीर में मछेन्द्रनाथ को पांचवी, छठवीं शती का माना जाता है। क्योंकि तंत्रलोक रचियता अभिनवगुप्त का काल पांचवी शती माना गया। आश्चर्यजनक यह है कि संबोधि तथागत, महावीर भी मछेन्द्रनाथ, गोरखानाथ की भांति हठयोग के अध्येता रहे।

10…..श्री दत्तात्रेय की उपासना विधि ,
चौरासी सिद्ध
जोधपुर, चीन इत्यादि के चौरासी सिद्धों में भिन्नता है । अस्तु, यहाँ यौगिक साहित्य में प्रसिद्ध नवनाथ के अतिरिक्त ८४ सिद्ध नाथ इस प्रकार हैं –
१॰ सिद्ध चर्पतनाथ, २॰ कपिलनाथ, ३॰ गंगानाथ, ४॰ विचारनाथ, ५॰ जालंधरनाथ, ६॰ श्रंगारिपाद, ७॰ लोहिपाद, ८॰ पुण्यपाद, ९॰ कनकाई, १०॰ तुषकाई, ११॰ कृष्णपाद, १२॰ गोविन्द नाथ, १३॰ बालगुंदाई, १४॰ वीरवंकनाथ, १५॰ सारंगनाथ, १६॰ बुद्धनाथ, १७॰ विभाण्डनाथ, १८॰ वनखंडिनाथ, १९॰ मण्डपनाथ, २०॰ भग्नभांडनाथ, २१॰ धूर्मनाथ ।
२२॰ गिरिवरनाथ, २३॰ सरस्वतीनाथ, २४॰ प्रभुनाथ, २५॰ पिप्पलनाथ, २६॰ रत्ननाथ, २७॰ संसारनाथ, २८॰ भगवन्त नाथ, २९॰ उपन्तनाथ, ३०॰ चन्दननाथ, ३१॰ तारानाथ, ३२॰ खार्पूनाथ, ३३॰ खोचरनाथ, ३४॰ छायानाथ, ३५॰ शरभनाथ, ३६॰ नागार्जुननाथ, ३७॰ सिद्ध गोरिया, ३८॰ मनोमहेशनाथ, ३९॰ श्रवणनाथ, ४०॰ बालकनाथ, ४१॰ शुद्धनाथ, ४२॰ कायानाथ ।
४३॰ भावनाथ, ४४॰ पाणिनाथ, ४५॰ वीरनाथ, ४६॰ सवाइनाथ, ४७॰ तुक नाथ, ४८॰ ब्रह्मनाथ, ४९॰ शील नाथ, ५०॰ शिव नाथ, ५१॰ ज्वालानाथ, ५२॰ नागनाथ, ५३॰ गम्भीरनाथ, ५४॰ सुन्दरनाथ, ५५॰ अमृतनाथ, ५६॰ चिड़ियानाथ, ५७॰ गेलारावल, ५८॰ जोगरावल, ५९॰ जगमरावल, ६०॰ पूर्णमल्लनाथ, ६१॰ विमलनाथ, ६२॰ मल्लिकानाथ, ६३॰ मल्लिनाथ ।
६४॰ रामनाथ, ६५॰ आम्रनाथ, ६६॰ गहिनीनाथ, ६७॰ ज्ञाननाथ, ६८॰ मुक्तानाथ, ६९॰ विरुपाक्षनाथ, ७०॰ रेवणनाथ, ७१॰ अडबंगनाथ, ७२॰ धीरजनाथ, ७३॰ घोड़ीचोली, ७४॰ पृथ्वीनाथ, ७५॰ हंसनाथ, ७६॰ गैबीनाथ, ७७॰ मंजुनाथ, ७८॰ सनकनाथ, ७९॰ सनन्दननाथ, ८०॰ सनातननाथ, ८१॰ सनत्कुमारनाथ, ८२॰ नारदनाथ, ८३॰ नचिकेता, ८४॰ कूर्मनाथ ।

11….बारह पंथ
नाथ सम्प्रदाय के अनुयायी मुख्यतः बारह शाखाओं में विभक्त हैं, जिसे बारह पंथ कहते हैं । इन बारह पंथों के कारण नाथ सम्प्रदाय को ‘बारह-पंथी’ योगी भी कहा जाता है । प्रत्येक पंथ का एक-एक विशेष स्थान है, जिसे नाथ लोग अपना पुण्य क्षेत्र मानते हैं । प्रत्येक पंथ एक पौराणिक देवता अथवा सिद्ध योगी को अपना आदि प्रवर्तक मानता है । नाथ सम्प्रदाय के बारह पंथों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है –
१॰ सत्यनाथ पंथ – इनकी संख्या 31 बतलायी गयी है । इसके मूल प्रवर्तक सत्यनाथ (भगवान् ब्रह्माजी) थे । इसीलिये सत्यनाथी पंथ के अनुयाययियों को “ब्रह्मा के योगी” भी कहते हैं । इस पंथ का प्रधान पीठ उड़ीसा प्रदेश का पाताल भुवनेश्वर स्थान है ।
२॰ धर्मनाथ पंथ – इनकी संख्या २५ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक धर्मराज युधिष्ठिर माने जाते हैं । धर्मनाथ पंथ का मुख्य पीठ नेपाल राष्ट्र का दुल्लुदेलक स्थान है । भारत में इसका पीठ कच्छ प्रदेश धिनोधर स्थान पर हैं ।
३॰ राम पंथ – इनकी संख्या ६१ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक भगवान् श्रीरामचन्द्र माने गये हैं । इनका प्रधान पीठ उत्तर-प्रदेश का गोरखपुर स्थान है ।
४॰ नाटेश्वरी पंथ अथवा लक्ष्मणनाथ पंथ – इनकी संख्या ४३ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक लक्ष्मणजी माने जाते हैं । इस पंथ का मुख्य पीठ पंजाब प्रांत का गोरखटिल्ला (झेलम) स्थान है । इस पंथ का सम्बन्ध दरियानाथ व तुलनाथ पंथ से भी बताया जाता है ।
५॰ कंथड़ पंथ – इनकी संख्या १० है । कंथड़ पंथ के मूल प्रवर्तक गणेशजी कहे गये हैं । इसका प्रधान पीठ कच्छ प्रदेश का मानफरा स्थान है ।
६॰ कपिलानी पंथ – इनकी संख्या २६ है । इस पंथ को गढ़वाल के राजा अजयपाल ने चलाया । इस पंथ के प्रधान प्रवर्तक कपिल मुनिजी बताये गये हैं । कपिलानी पंथ का प्रधान पीठ बंगाल प्रदेश का गंगासागर स्थान है । कलकत्ते (कोलकाता) के पास दमदम गोरखवंशी भी इनका एक मुख्य पीठ है ।
७॰ वैराग्य पंथ – इनकी संख्या १२४ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक भर्तृहरिजी हैं । वैराग्य पंथ का प्रधान पीठ राजस्थान प्रदेश के नागौर में राताढुंढा स्थान है । इस पंथ का सम्बन्ध भोतंगनाथी पंथ से बताया जाता है ।
८॰ माननाथ पंथ – इनकी संख्या १० है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक राजा गोपीचन्द्रजी माने गये हैं । इस समय माननाथ पंथ का पीठ राजस्थान प्रदेश का जोधपुर महा-मन्दिर नामक स्थान बताया गया है ।
९॰ आई पंथ – इनकी संख्या १० है । इस पंथ की मूल प्रवर्तिका गुरु गोरखनाथ की शिष्या भगवती विमला देवी हैं । आई पंथ का मुख्य पीठ बंगाल प्रदेश के दिनाजपुर जिले में जोगी गुफा या गोरखकुई नामक स्थान हैं । इनका एक पीठ हरिद्वार में भी बताया जाता है । इस पंथ का सम्बन्ध घोड़ा चौली से भी समझा जाता है ।
१०॰ पागल पंथ – इनकी संख्या ४ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक श्री चौरंगीनाथ थे । जो पूरन भगत के नाम से भी प्रसिद्ध हैं । इसका मुख्य पीठ पंजाब-हरियाणा का अबोहर स्थान है ।
११॰ ध्वजनाथ पंथ – इनकी संख्या ३ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक हनुमानजी माने जाते हैं । वर्तमान में इसका मुख्य पीठ सम्भवतः अम्बाला में है ।
१२॰ गंगानाथ पंथ – इनकी संख्या ६ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक श्री भीष्म पितामह माने जाते हैं । इसका मुख्य पीठ पंजाब में गुरुदासपुर जिले का जखबार स्थान है ।
कालान्तर में नाथ सम्प्रदाय के इन बारह पंथों में छह पंथ और जुड़े – १॰ रावल (संख्या-७१), २॰ पंक (पंख), ३॰ वन, ४॰ कंठर पंथी, ५॰ गोपाल पंथ तथा ६॰ हेठ नाथी ।
इस प्रकार कुल बारह-अठारह पंथ कहलाते हैं । बाद में अनेक पंथ जुड़ते गये, ये सभी बारह-अठारह पंथों की उपशाखायें अथवा उप-पंथ है । कुछ के नाम इस प्रकार हैं – अर्द्धनारी, अमरनाथ, अमापंथी। उदयनाथी, कायिकनाथी, काममज, काषाय, गैनीनाथ, चर्पटनाथी, तारकनाथी, निरंजन नाथी, नायरी, पायलनाथी, पाव पंथ, फिल नाथी, भृंगनाथ आदि ।
नाथ सम्प्रदाय प्राचीन काल से चले आ रहे नाथ संप्रदाय को गुरु मच्छेंद्र नाथ और उनके शिष्य गोरखनाथ ने पहली दफे व्यवस्था दी। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय
की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया। गुरु और शिष्य
को तिब्बती बौद्ध धर्म में महासिद्धों के रुप में जाना जाता है। परिव्रराजक का अर्थ होता है घुमक्कड़। नाथ साधु-संत
दुनिया भर में भ्रमण करने के बाद उम्र के अंतिम चरण में
किसी एक स्थान पर रुककर अखंड धूनी रमाते हैं या फिर
हिमालय में खो जाते हैं। हाथ में चिमटा, कमंडल, कान में कुंडल,
कमर में कमरबंध, जटाधारी धूनी रमाकर ध्यान करने वाले नाथ
योगियों को ही अवधूत या सिद्ध कहा जाता है। ये योगी अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे ‘सिले’ कहते हैं।
गले में एक सींग की नादी रखते हैं। इन दोनों को ‘सींगी सेली’
कहते हैं। इस पंथ के साधक लोग सात्विक भाव से शिव की भक्ति में
लीन रहते हैं। नाथ लोग अलख (अलक्ष) शब्द से शिव का ध्यान
करते हैं। परस्पर ‘आदेश’ या आदीश शब्द से अभिवादन करते हैं।
अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या परम पुरुष होता है।
जो नागा (दिगम्बर) है वे भभूतीधारी भी उक्त सम्प्रदाय से
ही है, इन्हें हिंदी प्रांत में बाबाजी या गोसाई समाज का माना जाता है। इन्हें बैरागी,
उदासी या वनवासी आदि सम्प्रदाय का भी माना जाता है। नाथ
साधु-संत हठयोग पर विशेष बल देते हैं। इन्हीं से आगे चलकर चौरासी और नवनाथ माने गए जो निम्न
हैं:- प्रारम्भिक दस नाथ आदिनाथ, आनंदिनाथ, करालानाथ, विकरालानाथ, महाकाल
नाथ, काल भैरव नाथ, बटुक नाथ, भूतनाथ, वीरनाथ और
श्रीकांथनाथ। इनके बारह शिष्य थे जो इस क्रम में है- नागार्जुन,
जड़ भारत, हरिशचंद्र, सत्यनाथ, चर्पटनाथ, अवधनाथ,
वैराग्यनाथ, कांताधारीनाथ, जालंधरनाथ और मालयार्जुन नाथ। चौरासी और नौ नाथ परम्परा आठवी सदी में 84 सिद्धों के साथ बौद्ध धर्म के महायान के
वज्रयान की परम्परा का प्रचलन हुआ। ये सभी भी नाथ ही थे।
सिद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के अनुयायी सिद्ध कहलाते थे।
उनमें से प्रमुख जो हुए उनकी संख्या चौरासी मानी गई है। नौ नाथ गुरु : 1.मच्छेंद्रनाथ 2.गोरखनाथ 3.जालंधरनाथ 4.नागेश
नाथ 5.भारती नाथ 6.चर्पटी नाथ 7.कनीफ नाथ 8.गेहनी नाथ
9.रेवन नाथ। इसके अलावा ये भी हैं: 1. आदिनाथ 2. मीनानाथ 3.
गोरखनाथ 4.खपरनाथ 5.सतनाथ 6.बालकनाथ 7.गोलक नाथ
8.बिरुपक्षनाथ 9.भर्तृहरि नाथ 10.अईनाथ 11.खेरची नाथ
12.रामचंद्रनाथ। ओंकार नाथ, उदय नाथ, सन्तोष नाथ, अचल नाथ, गजबेली नाथ,
ज्ञान नाथ, चौरंगी नाथ, मत्स्येन्द्र नाथ और गुरु गोरक्षनाथ।
सम्भव है यह उपयुक्त नाथों के ही दूसरे नाम है। बाबा शिलनाथ,
दादाधूनी वाले, गजानन महाराज, गोगा नाथ, पंढरीनाथ और साईं
बाब को भी नाथ परंपरा का माना जाता है। उल्लेखनीय है
कि भगवान दत्तात्रेय को वैष्णव और शैव दोनों ही संप्रदाय का माना जाता है, क्योंकि उनकी भी नाथों में
गणना की जाती है। भगवान भैरवनाथ भी नाथ संप्रदाय के अग्रज
माने जाते हैं।

12…श्री दत्तात्रेय की उपासना विधि ,
नाथ सम्प्रदाय.नाथ शब्द अति प्राचीन है । अनेक अर्थों में इसका प्रयोग वैदिक काल से ही होता रहा है । नाथ शब्द नाथृ धातु से बना है, जिसके याचना, उपताप, ऐश्वर्य, आशीर्वाद आदि अर्थ हैं – “नाथृ नाथृ याचञोपता-पैश्वर्याशीः इति पाणिनी” । अतः जिसमें ऐश्वर्य, आशीर्वाद, कल्याण मिलता है वह “नाथ” है । ‘नाथ’ शब्द का शाब्दिक अर्थ – राजा, प्रभु, स्वामी, ईश्वर, ब्रह्म, सनातन आदि भी है ।
ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्त १२९ में नाथ के बारे में कहा गया है कि –
को अद्धावेदः कः इह, प्रवोचस्कतु आजातकुत इयं वि सृष्टि ।
आवीग्देवा अस्य विसर्जने नाथा, को वेदयत आवाभूय शंभूयति ।।
अर्थात् – यह सृष्टि कहाँ से हुई ? इस तत्त्व को कौन जानता है ? किसके द्वारा हुई ? क्यों हुई ? कब से हुई ? इत्यादि विषय के समाधानकर्ता व पथ-दृष्टा नाथ ही हैं ।
इस प्रकार प्राचीनतम ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ में ‘नाथ’ का प्रयोग सृष्टिकर्ता, ज्ञाता तथा सृष्टि के निमित्त रुप में मिलता है । ‘अथर्ववेद’ में भी ‘नाथ’ एवं ‘नाथित’ शब्दों का प्रयोग मिलता है ।
नाथ सम्प्रदाय के विश्वकोष ‘गोरक्ष-सिद्धान्त-संग्रह′ में उद्धृत ‘राजगुह्य’ एवं शक्ति संगम तंत्र’ ग्रन्थों में नाथ शब्द की व्याख्या दी गई हैं । ‘राज-गुह्य’ के अनुसार ‘नाथ’ शब्द में ‘ना’ का अर्थ है – ‘अनादि रुप’ और ‘थ’ का अर्थ है – ‘(भुवन त्रय) का स्थापित होना’ ।
नाकारोऽनादि रपं थकारः स्थापते सदा ।
भुवन-त्रयमेवैकः श्री गोरक्ष नमोऽस्तुते ।।
इस कारण नाथ सम्प्रदाय का स्पष्टार्थ वह अनादि धर्म है, जो भुवन-त्रय की स्थिति का कारण है । श्री गोरक्ष को इसी कारण से ‘नाथ’ कहा जाता है । ‘शक्ति-संगम-तंत्र’ के अनुसार ‘ना’ शब्द का अर्थ – ‘नाथ ब्रह्म जो मोक्ष-दान में दक्ष है, उनका ज्ञान कराना हैं’ तथा ‘थ’ का अर्थ है – ‘ज्ञान के सामर्थ्य को स्थगित करने वाला’ –
श्री मोक्षदान दक्षत्वान् नाथ-ब्रह्मानुबोधनात् ।
स्थगिताज्ञान विभवात श्रीनाथ इति गीयते ।।
चूंकि नाथ के आश्रयण से इस नाथ ब्रह्म का साक्षात्कार होता है और अज्ञान की वृद्धि स्थगित होती है, इसी कारण नाथ शब्द व्यवहृत किया जाता है ।
संस्कृत टीकाकार मुनिदत्त ने ‘नाथ’ शब्द को ‘सतगुरु’ के अर्थ में ग्रहण किया है । ‘गोरखबाणी’ में सम्पादित रचनाओं में नाथ शब्द दो अर्थों में व्यवहृत हैं । (१) रचयिता के रुप में तथा (२) परम तत्त्व के रुप में । ‘गोरक्ष-सिद्धान्त-संग्रह′ ग्रन्थ के प्रथम श्लोक में सगुण और निर्गुण की एकता को ‘नाथ’ कहा गया है –
निर्गुणवामभागे च सव्यभागे उद्भुता निजा ।
मध्यभागे स्वयं पूर्णस्तस्मै नाथाय ते नमः ।।
नेपाल के योगीराज नरहरिनाथ शास्त्री के अनुसार ‘नाथ’ शब्द पद ईश्वर वाचक एवं ब्रह्म वाचक है । ईश्वर की विभूतियाँ जिस रुप में भी जगत में विद्यमान हैं, प्रायः सब नाथ के नाम से प्रसिद्ध हैं । जैसे – आदिनाथ, पशुपतिनाथ, गोरक्षनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, गणनाथ, सोमनाथ, नागनाथ, वैद्यनाथ, विश्वनाथ, जगन्नाथ, रामनाथ, द्वारकानाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ, अमरनाथ, एकलिंगनाथ, पण्डरीनाथ, जालंधरनाथ आदि असंख्य देवता हैं । उनकी पावन स्मृति लेकर नाथ समाज (नाथ सम्प्रदाय) ‘नाथान्त’ नाम रखता है ।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी की भावना रखी जाती है । नाथ सम्प्रदाय के सदस्य उपनाम जो भी लगते हों, किन्तु मूल आदिनाथ, उदयनाथ, सत्यनाथ, संतोषनाथ, अचलनाथ, कंथड़िनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, गोरक्षनाथ, जलंधरनाथ आदि नवनाथ चौरासी सिद्ध तथा अनन्त कोटि सिद्धों को अपने आदर्श पूर्वजों के रुप में मानते हैं । मूल नवनाथों से चौरासी सिद्ध हुए हैं और चौरासी सिद्धों से अनन्त कोटि सिद्ध हुए । एक ही ‘अभय-पंथ’ के बारह पंथ तथा अठारह पंथ हुए । एक ही निरंजन गोत्र के अनेक गोत्र हुए । अन्त में सब एक ही नाथ ब्रह्म में लीन होते हैं । सारी सृष्टि नाथब्रह्म से उत्पन्न होती है । नाथ ब्रह्म में स्थित होती हैं तथा नाथ ब्रह्म में ही लीन होती है । इस तत्त्व को जानकर शान्त भाव से ब्रह्म की उपासना करनी चाहिए ।
नवनाथ
नाथ सम्प्रदाय के सबसे आदि में नौ मूल नाथ हुए हैं । वैसे नवनाथों के सम्बन्ध में काफी मतभेद है, किन्तु वर्तमान नाथ सम्प्रदाय के १८-२० पंथों में प्रसिद्ध नवनाथ क्रमशः इस प्रकार हैं –
१॰ आदिनाथ – ॐ-कार शिव, ज्योति-रुप
२॰ उदयनाथ – पार्वती, पृथ्वी रुप
३॰ सत्यनाथ – ब्रह्मा, जल रुप
४॰ संतोषनाथ – विष्णु, तेज रुप
५॰ अचलनाथ (अचम्भेनाथ) – शेषनाग, पृथ्वी भार-धारी
६॰ कंथडीनाथ – गणपति, आकाश रुप
७॰ चौरंगीनाथ – चन्द्रमा, वनस्पति रुप
८॰ मत्स्येन्द्रनाथ – माया रुप, करुणामय
९॰ गोरक्षनाथ – अयोनिशंकर त्रिनेत्र, अलक्ष्य रुप..

13…श्री दत्तात्रेय की उपासना विधि ,
दत्त स्वरूप चिंता
ब्रह्मा विष्णु और महेश की आभा में दत्तात्रेय जी का ध्यान सदा कल्याण कारी माना जाता है। गुरु दत्त के रूप में ब्रह्मा दत्त के रूप में विष्णु और शिवदत्त के रूप में भगवान शिव की आराधना करनी अति उत्तम रहती है। काशी नगरी में एक ब्राह्मण रहता था,उसने स्वप्न में देखा कि भगवान शिव के तीन सिर है,और तीनों सिरों से वे बात कर रहे है,एक सिर कुछ कह रहा है दूसरा सिर उसे सुन रहा है और तीसरा सिर उस कही हुयी बात को चारों तरफ़ प्रसारित कर रहा है,जब उसने मनीषियों से इस बात का जिक्र किया तो उन्होने भगवान दत्तात्रेय जी के बारे में उसे बताया। दत्तात्रेयजी का कहीं भी प्रकट होना भी माना जाता है,उनके उपासक गुरु के रूप में उन्हे मानते है,स्वामी समर्थ आदि कितने ही गुरु के अनुगामी साधक इस धरती पर पैदा हुये और अपनी अपनी भक्ति से भगवान दत्तात्रेय जी के प्रति अपनी अपनी श्रद्धा प्रकट करने के बाद अपने अपने धाम को चले गये है।
दत्तात्रेय की गाथा
एक बार वैदिक कर्मों का, धर्म का तथा वर्णव्यवस्था का लोप हो गया था। उस समय दत्तात्रेय ने इन सबका पुनरूद्धार किया था। हैहयराज अर्जुन ने अपनी सेवाओं से उन्हें प्रसन्न करके चार वर प्राप्त किये थे:
1. बलवान, सत्यवादी, मनस्वी, अदोषदर्शी तथा सहस्त्र भुजाओं वाला बनने का
2. जरायुज तथा अंडज जीवों के साथ-साथ समस्त चराचर जगत का शासन करने के सामर्थ्य का।
3. देवता, ऋषियों, ब्राह्मणों आदि का यजन करने तथा शत्रुओं का संहार कर पाने का तथा
4. इहलोक, स्वर्गलोक और परलोक विख्यात अनुपम पुरुष के हाथों मारे जाने का।
* कार्तवीर्य अर्जुन (कृतवीर्य का ज्येष्ठ पुत्र) के द्वारा दत्तात्रेय ने लाखों वर्षों तक लोक कल्याण करवाया। कार्तवीर्य अर्जुन, पुण्यात्मा, प्रजा का रक्षक तथा पालक था। जब वह समुद्र में चलता था तब उसके कपड़े भीगते नहीं थे। उत्तरोत्तर वीरता के प्रमाद से उसका पतन हुआ तथा उसका संहार परशुराम-रूपी अवतार ने किया।
* कृतवीर्य हैहयराज की मृत्यु के उपरांत उनके पुत्र अर्जुन का राज्याभिषेक होने का अवसर आया तो अर्जुन ने राज्यभार ग्रहण करने के प्रति उदासीनता व्यक्त की। उसने कहा कि प्रजा का हर व्यक्ति अपनी आय का बारहवां भाग इसलिए राजा को देता है कि राजा उसकी सुरक्षा करे। किंतु अनेक बार उसे अपनी सुरक्षा के लिए और उपायों का प्रयोग भी करना पड़ता हैं, अत: राजा का नरक में जाना अवश्यंभावी हो जाता है। ऐसे राज्य को ग्रहण करने से क्या लाभ? उनकी बात सुनकर गर्ग मुनि ने कहा-‘तुम्हें दत्तात्रेय का आश्रय लेना चाहिए, क्योंकि उनके रूप में विष्णु ने अवतार लिया है।
* एक बार देवता गण दैत्यों से हारकर बृहस्पति की शरण में गये। बृहस्पति ने उन्हें गर्ग के पास भेजा। वे लक्ष्मी (अपनी पत्नी) सहित आश्रम में विराजमान थे। उन्होंने दानवों को वहां जाने के लिए कहा। देवताओं ने दानवों को युद्ध के लिए ललकारा, फिर दत्तात्रेय के आश्रम में शरण ली। जब दैत्य आश्रम में पहुंचे तो लक्ष्मी का सौंदर्य देखकर आसक्त हो गये। युद्ध की बात भुलाकर वे लोग लक्ष्मी को पालकी में बैठाकर अपने मस्तक से उनका वहन करते हुए चल दिये। पर नारी का स्पर्श करने के कारण उनका तेज नष्ट हो गया। दत्तात्रेय की प्रेरणा से देवताओं ने युद्ध करके उन्हें हरा दिया। दत्तात्रेय की पत्नी, लक्ष्मी पुन: उनके पास पहुंच गयी।’ अर्जुन ने उनके प्रभाव विषयक कथा सुनी तो दत्तात्रेय के आश्रम में गये। अपनी सेवा से प्रसन्न कर उन्होंने अनेक वर प्राप्त किये। मुख्य रूप से उन्होंने प्रजा का न्यायपूर्वक पालन तथा युद्धक्षेत्र में एक सहस्त्र हाथ मांगे। साथ ही यह वर भी प्राप्त किया कि कुमार्ग पर चलते ही उन्हें सदैव कोई उपदेशक मिलेगा। तदनंतर अर्जुन का राज्याभिषेक हुआ तथा उसने चिरकाल तक न्यायपूर्वक राज्य-कार्य संपन्न किया।
**भगवान दत्तात्रेय आदि गुरु है नाथ परम्परा के ये आदि गुरु है यह स्तोत्र साधक को हर समय कवचित रखता है जिस से साधक अनेक प्रकार की तामसिक शक्तिओ से सुरक्षित रहता है ग्रह बाधा ,तंत्र बाधा ,कार्य सिद्धि ,सुरक्षा के लिए ये स्तोत्र रामबाण है “स्मरण मात्रेण संसिध्येत दत्तात्रेय जगद्गुरुं ”
दत्तात्रेयाष्टचक्रबीजस्तोत्रम्
दिगंबरं भस्मसुगन्धलेपनं
चक्रं त्रिशूलं डमरुं गदां च ।
पद्मासनस्थं ऋषिदेववन्दितं
दत्तात्रेयध्यानमभीष्टसिद्धिदम् ॥ १॥
मूलाधारे वारिजपद्मे सचतुष्के
वंशंषंसं वर्णविशालैः सुविशालैः ।
रक्तं वर्णं श्रीभगवतं गणनाथं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ २॥
स्वाधिष्ठाने षट्दलपद्मे तनुलिंगे
बालान्तैस्तद्वर्णविशालैः सुविशालैः ।
पीतं वर्णं वाक्पतिरूपं द्रुहिणं तं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ३॥
नाभौ पद्मे पत्रदशांके डफवर्णे
लक्ष्मीकान्तं गरूढारूढं मणिपूरे ।
नीलवर्णं निर्गुणरूपं निगमाक्षं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ४॥
हृत्पद्मांते द्वादशपत्रे कठवर्णे
अनाहतांते वृषभारूढं शिवरूपम् ।
सर्गस्थित्यंतां कुर्वाणं धवलांगं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ५ ॥
कंठस्थाने चक्रविशुद्धे कमलान्ते
चंद्राकारे षोडशपत्रे स्वरवर्णे
मायाधीशं जीवशिवं तं भगवंतं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ६॥
आज्ञाचक्रे भृकुटिस्थाने द्विदलान्ते
हं क्षं बीजं ज्ञानसमुद्रं गुरूमूर्तिं
विद्युत्वर्णं ज्ञानमयं तं निटिलाक्षं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ७॥
मूर्ध्निस्थाने वारिजपद्मे शशिबीजं
शुभ्रं वर्णं पत्रसहस्रे ललनाख्ये
हं बीजाख्यं वर्णसहस्रं तूर्यांतं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ८॥
ब्रह्मानन्दं ब्रह्ममुकुन्दं भगवन्तं
ब्रह्मज्ञानं ज्ञानमयं तं स्वयमेव
परमात्मानं ब्रह्ममुनीद्रं भसिताङ्गं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ९॥

14…..दत्तात्रेय की उपासना विधि ,
दत्त स्वरूप चिंता
ब्रह्मा विष्णु और महेश की आभा में दत्तात्रेय जी का ध्यान सदा कल्याण कारी माना जाता है। गुरु दत्त के रूप में ब्रह्मा दत्त के रूप में विष्णु और शिवदत्त के रूप में भगवान शिव की आराधना करनी अति उत्तम रहती है। काशी नगरी में एक ब्राह्मण रहता था,उसने स्वप्न में देखा कि भगवान शिव के तीन सिर है,और तीनों सिरों से वे बात कर रहे है,एक सिर कुछ कह रहा है दूसरा सिर उसे सुन रहा है और तीसरा सिर उस कही हुयी बात को चारों तरफ़ प्रसारित कर रहा है,जब उसने मनीषियों से इस बात का जिक्र किया तो उन्होने भगवान दत्तात्रेय जी के बारे में उसे बताया। दत्तात्रेयजी का कहीं भी प्रकट होना भी माना जाता है,उनके उपासक गुरु के रूप में उन्हे मानते है,स्वामी समर्थ आदि कितने ही गुरु के अनुगामी साधक इस धरती पर पैदा हुये और अपनी अपनी भक्ति से भगवान दत्तात्रेय जी के प्रति अपनी अपनी श्रद्धा प्रकट करने के बाद अपने अपने धाम को चले गये है।
दत्तात्रेय की गाथा
एक बार वैदिक कर्मों का, धर्म का तथा वर्णव्यवस्था का लोप हो गया था। उस समय दत्तात्रेय ने इन सबका पुनरूद्धार किया था। हैहयराज अर्जुन ने अपनी सेवाओं से उन्हें प्रसन्न करके चार वर प्राप्त किये थे:
1. बलवान, सत्यवादी, मनस्वी, अदोषदर्शी तथा सहस्त्र भुजाओं वाला बनने का
2. जरायुज तथा अंडज जीवों के साथ-साथ समस्त चराचर जगत का शासन करने के सामर्थ्य का।
3. देवता, ऋषियों, ब्राह्मणों आदि का यजन करने तथा शत्रुओं का संहार कर पाने का तथा
4. इहलोक, स्वर्गलोक और परलोक विख्यात अनुपम पुरुष के हाथों मारे जाने का।
* कार्तवीर्य अर्जुन (कृतवीर्य का ज्येष्ठ पुत्र) के द्वारा दत्तात्रेय ने लाखों वर्षों तक लोक कल्याण करवाया। कार्तवीर्य अर्जुन, पुण्यात्मा, प्रजा का रक्षक तथा पालक था। जब वह समुद्र में चलता था तब उसके कपड़े भीगते नहीं थे। उत्तरोत्तर वीरता के प्रमाद से उसका पतन हुआ तथा उसका संहार परशुराम-रूपी अवतार ने किया।
* कृतवीर्य हैहयराज की मृत्यु के उपरांत उनके पुत्र अर्जुन का राज्याभिषेक होने का अवसर आया तो अर्जुन ने राज्यभार ग्रहण करने के प्रति उदासीनता व्यक्त की। उसने कहा कि प्रजा का हर व्यक्ति अपनी आय का बारहवां भाग इसलिए राजा को देता है कि राजा उसकी सुरक्षा करे। किंतु अनेक बार उसे अपनी सुरक्षा के लिए और उपायों का प्रयोग भी करना पड़ता हैं, अत: राजा का नरक में जाना अवश्यंभावी हो जाता है। ऐसे राज्य को ग्रहण करने से क्या लाभ? उनकी बात सुनकर गर्ग मुनि ने कहा-‘तुम्हें दत्तात्रेय का आश्रय लेना चाहिए, क्योंकि उनके रूप में विष्णु ने अवतार लिया है।
* एक बार देवता गण दैत्यों से हारकर बृहस्पति की शरण में गये। बृहस्पति ने उन्हें गर्ग के पास भेजा। वे लक्ष्मी (अपनी पत्नी) सहित आश्रम में विराजमान थे। उन्होंने दानवों को वहां जाने के लिए कहा। देवताओं ने दानवों को युद्ध के लिए ललकारा, फिर दत्तात्रेय के आश्रम में शरण ली। जब दैत्य आश्रम में पहुंचे तो लक्ष्मी का सौंदर्य देखकर आसक्त हो गये। युद्ध की बात भुलाकर वे लोग लक्ष्मी को पालकी में बैठाकर अपने मस्तक से उनका वहन करते हुए चल दिये। पर नारी का स्पर्श करने के कारण उनका तेज नष्ट हो गया। दत्तात्रेय की प्रेरणा से देवताओं ने युद्ध करके उन्हें हरा दिया। दत्तात्रेय की पत्नी, लक्ष्मी पुन: उनके पास पहुंच गयी।’ अर्जुन ने उनके प्रभाव विषयक कथा सुनी तो दत्तात्रेय के आश्रम में गये। अपनी सेवा से प्रसन्न कर उन्होंने अनेक वर प्राप्त किये। मुख्य रूप से उन्होंने प्रजा का न्यायपूर्वक पालन तथा युद्धक्षेत्र में एक सहस्त्र हाथ मांगे। साथ ही यह वर भी प्राप्त किया कि कुमार्ग पर चलते ही उन्हें सदैव कोई उपदेशक मिलेगा। तदनंतर अर्जुन का राज्याभिषेक हुआ तथा उसने चिरकाल तक न्यायपूर्वक राज्य-कार्य संपन्न किया।
**भगवान दत्तात्रेय आदि गुरु है नाथ परम्परा के ये आदि गुरु है यह स्तोत्र साधक को हर समय कवचित रखता है जिस से साधक अनेक प्रकार की तामसिक शक्तिओ से सुरक्षित रहता है ग्रह बाधा ,तंत्र बाधा ,कार्य सिद्धि ,सुरक्षा के लिए ये स्तोत्र रामबाण है “स्मरण मात्रेण संसिध्येत दत्तात्रेय जगद्गुरुं ”
दत्तात्रेयाष्टचक्रबीजस्तोत्रम्
दिगंबरं भस्मसुगन्धलेपनं
चक्रं त्रिशूलं डमरुं गदां च ।
पद्मासनस्थं ऋषिदेववन्दितं
दत्तात्रेयध्यानमभीष्टसिद्धिदम् ॥ १॥
मूलाधारे वारिजपद्मे सचतुष्के
वंशंषंसं वर्णविशालैः सुविशालैः ।
रक्तं वर्णं श्रीभगवतं गणनाथं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ २॥
स्वाधिष्ठाने षट्दलपद्मे तनुलिंगे
बालान्तैस्तद्वर्णविशालैः सुविशालैः ।
पीतं वर्णं वाक्पतिरूपं द्रुहिणं तं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ३॥
नाभौ पद्मे पत्रदशांके डफवर्णे
लक्ष्मीकान्तं गरूढारूढं मणिपूरे ।
नीलवर्णं निर्गुणरूपं निगमाक्षं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ४॥
हृत्पद्मांते द्वादशपत्रे कठवर्णे
अनाहतांते वृषभारूढं शिवरूपम् ।
सर्गस्थित्यंतां कुर्वाणं धवलांगं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ५ ॥
कंठस्थाने चक्रविशुद्धे कमलान्ते
चंद्राकारे षोडशपत्रे स्वरवर्णे
मायाधीशं जीवशिवं तं भगवंतं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ६॥
आज्ञाचक्रे भृकुटिस्थाने द्विदलान्ते
हं क्षं बीजं ज्ञानसमुद्रं गुरूमूर्तिं
विद्युत्वर्णं ज्ञानमयं तं निटिलाक्षं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ७॥
मूर्ध्निस्थाने वारिजपद्मे शशिबीजं
शुभ्रं वर्णं पत्रसहस्रे ललनाख्ये
हं बीजाख्यं वर्णसहस्रं तूर्यांतं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ८॥
ब्रह्मानन्दं ब्रह्ममुकुन्दं भगवन्तं
ब्रह्मज्ञानं ज्ञानमयं तं स्वयमेव
परमात्मानं ब्रह्ममुनीद्रं भसिताङ्गं
दत्तात्रेयं श्रीगुरूमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥ ९॥

15……श्री दत्तात्रेय की उपासना विधि ,
श्री दत्तात्रेयजी का जाप करने वाला मंत्र
पूजा करने में फ़ूल और नैवेद्य चढाने के बाद आरती करनी चाहिये और आरती करने के समय यह स्तोत्र पढना चाहिये:-
जगदुत्पति कर्त्रै च स्थिति संहार हेतवे। भव पाश विमुक्ताय दत्तात्रेय नमो॓‍ऽस्तुते॥
जराजन्म विनाशाय देह शुद्धि कराय च। दिगम्बर दयामूर्ति दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
कर्पूरकान्ति देहाय ब्रह्ममूर्तिधराय च। वेदशास्त्रं परिज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
ह्रस्व दीर्घ कृशस्थूलं नामगोत्रा विवर्जित। पंचभूतैकदीप्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
यज्ञभोक्त्रे च यज्ञाय यशरूपाय तथा च वै। यज्ञ प्रियाय सिद्धाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
आदौ ब्रह्मा मध्ये विष्णु: अन्ते देव: सदाशिव:। मूर्तिमय स्वरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
भोगलयाय भोगाय भोग योग्याय धारिणे। जितेन्द्रिय जितज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
दिगम्बराय दिव्याय दिव्यरूप धराय च। सदोदित प्रब्रह्म दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
जम्बूद्वीपे महाक्षेत्रे मातापुर निवासिने। जयमान सता देवं दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
भिक्षाटनं गृहे ग्रामं पात्रं हेममयं करे। नानास्वादमयी भिक्षा दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
ब्रह्मज्ञानमयी मुद्रा वक्त्रो चाकाश भूतले। प्रज्ञानधन बोधाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
अवधूत सदानन्द परब्रह्म स्वरूपिणे। विदेह देह रूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
सत्यरूप सदाचार सत्यधर्म परायण। सत्याश्रम परोक्षाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
शूल हस्ताय गदापाणे वनमाला सुकंधर। यज्ञसूत्रधर ब्रह्मान दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
क्षराक्षरस्वरूपाय परात्पर पराय च। दत्तमुक्ति परस्तोत्र दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
दत्तविद्याठ्य लक्ष्मीशं दत्तस्वात्म स्वरूपिणे। गुणनिर्गुण रूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
शत्रु नाश करं स्तोत्रं ज्ञान विज्ञान दायकम।सर्वपाप शमं याति दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
इस स्तोत्र को पढने के बाद एक सौ आठबार “ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ऊँ द्रां ” का जाप मानसिक रूप से करना चाहिये.इसके बाद दस माला का जाप नित्य इस मंत्र से करना चाहिये ” ऊँ द्रां दत्तात्रेयाय स्वाहा”।

16….श्री दत्तात्रेय की उपासना विधि
ॐ दिगंबराय विद्महे योगीश्रािय् धीमही तन्नो दत: प्रचोदयात्,,ॐ ऐं क्रों क्लीं क्लूंक ह्रां ह्रीं ह्रूं सौ:ॐ द्रां दत्तात्रेयाय स्वाहा ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः दत्तात्रेय मंत्रों को बोलने से कोई बिगाड़ नहीं पाता काम,,हिन्दू धर्म में महायोगी व महागुरु के रूप में पूजनीय त्रिदेव स्वरूप माने गए भगवान दत्तात्रेय ज्ञान के जरिए जीवन की सफलता की प्रेरणा देते हैं। धार्मिक दृष्टि से दत्तात्रेय की उपासना ज्ञान, बुद्धि, बल प्रदान करने के साथ शत्रु बाधा दूर कर कार्य में सफलता और मनचाहे परिणामों को देने वाली मानी गई है।
धार्मिक मान्यता है कि भगवान दत्तात्रेय भक्त की पुकार पर शीघ्र प्रसन्न होकर किसी भी रूप में उसकी कामनापूर्ति या संकटनाश करते हैं। यही कारण है कि गुरु भक्ति के दिन गुरुवार की शाम भगवान दत्त की उपासना में विशेष मंत्र का स्मरण बहुत ही शुभ माना गया है। जानिए वे मंत्र व पूजा की सरल विधि –
– गुरुवार की शाम दत्त मंदिर भगवान दत्तात्रेय की प्रतिमा या दत्तात्रेय की तस्वीर पर सफेद चंदन और सुगंधित सफेल फूल चढ़ाकर फल या मिठाई का भोग लगाएं। गुग्गल धूप लगाएं और नीचे लिखे मंत्र से भगवान दत्तात्रेय का स्मरण करें या यथाशक्ति मंत्र जप करें -,,हिंदू धर्म के त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रचलित विचारधारा के विलय के लिए ही भगवान दत्तात्रेय ने जन्म लिया था, इसीलिए उन्हें त्रिदेव का स्वरूप भी कहा जाता है। दत्तात्रेय को शैवपंथी शिव का अवतार और वैष्णवपंथी विष्णु का अंशावतार मानते हैं। दत्तात्रेय को नाथ संप्रदाय की नवनाथ परंपरा का भी अग्रज माना है। यह भी मान्यता है कि रसेश्वर संप्रदाय के प्रवर्तक भी दत्तात्रेय थे। भगवान दत्तात्रेय से वेद और तंत्र मार्ग का विलय कर एक ही संप्रदाय निर्मित किया था।,दत्तविद्याठ्य लक्ष्मीशं दत्तस्वात्म स्वरूपिणे।गुणनिर्गुण रूपाय दत्तात्रेय नमोस्तुते।।,,या इस मंत्र का जप करें -,ॐ द्रां दत्तात्रेयाय स्वाहा- पूजा व मंत्र जप के बाद आरती करें और सफलता और कामनापूर्ति की प्रार्थना करें।
श्री दत्तात्रेय उपासना
भगवान शंकर का साक्षात रूप महाराज दत्तात्रेय में मिलता है,और तीनो ईश्वरीय शक्तियो से समाहित महाराज दत्तात्रेय की आराधना बहुत ही सफ़ल और जल्दी से फ़ल देने वाली है,महाराज दत्तात्रेय आजन्म ब्रह्मचारी,अवधूत,और दिगम्बर रहे थे,वे सर्वव्यापी है,और किसी प्रकार के संकट में बहुत जल्दी से भक्त की सुध लेने वाले है,अगर मानसिक,या कर्म से या वाणी से महाराज दत्तात्रेय की उपासना की जावे तो भक्त किसी भी कठिनाई से बहुत जल्दी दूर हो जाते है.
श्री दत्तात्रेय की उपासना विधि
श्री दत्तात्रेय जी की प्रतिमा,चित्र या यंत्र को लाकर लाल कपडे पर स्थापित करने के बाद चन्दन लगाकर,फ़ूल चढाकर,धूप की धूनी देकर,नैवेद्य चढाकर दीपक से आरती उतारकर पूजा की जाती है,पूजा के समय में उनके लिये पहले स्तोत्र को ध्यान से पढा जाता है,फ़िर मन्त्र का जाप किया आता है,उनकी उपासना तुरत प्रभावी हो जाती है,और शीघ्र ही साधक को उनकी उपस्थिति का आभास होने लगता है,साधकों को उनकी उपस्थिति का आभास सुगन्ध के द्वारा,दिव्य प्रकाश के द्वारा,या साक्षात उनके दर्शन से होता है,साधना के समय अचानक स्फ़ूर्ति आना भी उनकी उपस्थिति का आभास देती है,भगवान दत्तात्रेय बडे दयालो और आशुतोष है,वे कहीं भी कभी भी किसी भी भक्त को उनको पुकारने पर सहायता के लिये अपनी शक्ति को भेजते है.
श्री दत्तात्रेय की उपासना में विनियोग विधि
पूजा करने के आरम्भ में भगवान श्री दत्तात्रेय के लिय आवाहन किया जाता है,एक साफ़ बर्तन में पानी लेकर पास में रखना चाहिये,बायें हाथ में एक फ़ूल और चावल के दाने लेकर इस प्रकार से विनियोग करना चाहिये- “ऊँ अस्य श्री दत्तात्रेय स्तोत्र मंत्रस्य भगवान नारद ऋषि: अनुष्टुप छन्द:,श्री दत्त परमात्मा देवता:, श्री दत्त प्रीत्यर्थे जपे विनोयोग:”,इतना कहकर दाहिने हाथ से फ़ूल और चावल लेकर भगवान दत्तात्रेय की प्रतिमा,चित्र या यंत्र पर सिर को झुकाकर चढाने चाहिये,फ़ूल और चावल को चढाने के बाद हाथों को पानी से साफ़ कर लेना चाहिये,और दोनों हाथों को जोडकर प्रणाम मुद्रा में उनके लिये जप स्तुति को करना चाहिये,जप स्तुति इस प्रकार से है:-“जटाधरं पाण्डुरंगं शूलहस्तं कृपानिधिम। सर्व रोग हरं देव,दत्तात्रेयमहं भज॥”

17…..श्री दत्तात्रेय की उपासना विधि
महाराज क्रतवीर्य ने पुत्र कार्तवीर्य के शरीर के उपचार के लिये भगवान दतात्रेय की सेवा अर्चना की और उनसे पुत्र के स्वस्थ व सुंदर शरीर की कामना की थी I तब भगवान दतात्रेय ने एकाक्षरी मंत्र का जप और श्री गणेश जी की आराधना बारह वर्ष तक करने का उपदेश दिया था I परिणाम स्वरुप श्री गणेश जी की कृपा से कार्तवीर्य को सुंदर शरीर और सहस्त्रबाहु प्राप्त हुए थे I चूँकि यहाँ भगवान दत्त का प्रसंग आया है अतः उनके अवतार की संगक्षिप्त चर्चा करना उचित होगा I
जीवों के ह्रदय में ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिये ही प्रायः भगवान के अवतार होते हैं I वेसे तो अवतार के कई प्रयोजन होते हैं किंतु जीवों का अज्ञान-अंधकार-निवारण अवतार का परम प्रयोजन होता है I जब तक इस सृष्टि में जिव हैं, तब तक इस कार्य को अविरत रूप से चलाना अपरिहार्य है I यही सोचकर भगवान विष्णु ने सदगुरु श्री दत्तात्रेय जी के रूप में अवतार ग्रहण किया I अवतारों में चौबीस अवतारों का निर्देश श्री मदभागवत कार ने किया है I उन चौबीस अवतारों में सिद्धराज भगवान श्री दत्तात्रेय का अवतार छटा माना जाता है I इस अवतार की पारी समाप्ति नहीं है इसलिए इन्हें “अविनाश” भी कहा जाता है I समस्त “सिद्धों” के राजा होने के कारण ये “सिद्धराज” कहलाते हैं I योग विद्या में असाधारण अधिकार रखने के कारण इन्हें “योगिराज” भी कहा जाता है I और योग चातुर्य से इन्होने देवताओं का संरक्षण किया इसलिए ये “देवदेवेश्वर” भी कहलाते हैं I
अत्रि मुनि ने प्रदियों के दुख निवारण करने वाले पुत्र की कामना की तथा इस अभिप्राय से उन्होंने श्री विष्णु की भावपूर्ण घोर तपस्या की I भगवान विष्णु अत्रि मुनि की तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हुये और कहा की “हे मुनिवर मैने निज को ही तुम्हें दान कर दिया है I पुत्र के रूप में मै तुम्हारे घर में जन्म लूँगा I ” इस कारण इनकी “दत्त” संज्ञा हुई तथा “आत्रेय”दोनों नामों के संयोग से इनका नाम दत्तात्रेय पड़ा I भगवान विष्णु ने “दत्तात्रेय” जी के रूप में अवतरित होकर संसार का बड़ा ही उपकार किया है I कार्तवीर्य अर्जुन को भगवान दत्तात्रेय का अनुग्रह प्राप्त था I उन्ही की कृपा से वे तेजस्वी और यशस्वी हुए थे I
महाराज क्रतवीर्य के निधन के पश्चात् उत्तराधिकारी कार्तवीर्य अर्जुन से राज्यशासन ग्रहण करने के लिये आमात्य एवं प्रजाजनों ने निवेदन किया और राज्याभिषेक के लिये तत्पर हुए I किंतु कार्तवीर्य ने उनका यह निवेदन यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया की “अग्निहोत्र” (यज्ञ) ताप, वेद पाठन, अतिथि सत्कार, वैश्वदेव व सत्य ये सब इष्ट हैं I कूप, सरोवर बनवाना, उपयुक्त पात्र को दान देना आदि पूर्त हैं I प्रजा से कर लेकर उनके सत्यपालन में यदि समर्थ न हुआ और दूसरों से प्रजा पालन कराता रहा तो मेरी सब इच्छा पूर्ति नष्ट हो जावेगी I इनके नष्ट होने से मुझे निश्चय ही नरक की प्राप्ति होगी I अतः मुझे प्रजापालन में पूर्णरूप से प्रथम सक्षम होना चाहिए तभी मैं राज्यशासन ग्रहण करूँगा इससे पूर्व नहीं I
कार्तवीर्य अर्जुन का यह निश्चय सुनकर गर्ग मुनि ने कहा – वास्तव में आप यदि राजा का ऐसा आचरण करना चाहते हो जैसा कि आपने कहा है तो आप सह्यादी की गुफाओं में जाकर भगवान दतात्रेय की सेवा कर उनसे उपदेश ग्रहण करें I वे देवताओं के द्वारा उपासित हैं I उन्होंने स्वर्ग का राज्य वापस कराने में इन्द्र सहित देवताओं की सहायता की थी I यह सुनकर कार्तवीर्य अर्जुन ने प्रश्न किया कि भगवान दतात्रेय ने किस प्रकार देवताओं की उपासना प्राप्त की और किस प्रकार राजा इन्द्र को उनका राज्य वापस करवाया I
गर्ग मुनि ने उस वृतांत को कार्तवीर्य को सुनाया – एक समय जम्भासुर दानवों के राजा ने देवताओं से भयंकर युद्ध छेड़ दिया I देवराज इन्द्र और उनके साथी देवताओं ने दानवों का सामना किया I किंतु उनकी पराजय हुई और वे इधर-उधर भाग गये I फलतः इन्द्र से उनका राज्य छीन गया I देवराज इन्द्र निराश होकर देवगुरु ब्रहस्पति के पास गये और उन्हें पूर्ण व्यथा-कथा सुनाई I इस पर देवगुरु ने कहा की यदि आप दानवों पर विजय चाहते हैं तो सिद्धराज दत्तात्रेय जी के पास जाकर उनसे अनुनय विनय करो I वे ही तुम्हारा कल्याण करेंगे I देवराज इन्द्र के साथ सभी देवगण दत्तात्रेय जी के पास पहुँचे और उन्होंने उनकी सेवा की I अंततः दत्तात्रेय जी ने द्रवित होकर देवताओं से आने का कारण पूछा I देवताओं ने अपनी कथा-व्यथा कह सुनाई I देवताओं की बात सुनकर भगवान दत्तात्रेय ने आदेश दिया की आप लोग जाकर दानवों को युद्ध के लिये ललकारें और उन्हें मेरे पास ले आएं I वे अपनी दृष्टि से दानवों को भस्म कर देंगे I देवताओं ने उनकी आज्ञा का पालन किया और दानवों ने भी उनका पीछा किया और दत्तात्रेय जी के आश्रम तक आ गये I वहाँ लक्ष्मी स्वरुप नारी को देखकर दानवगण युद्ध करना भूलकर उस नारी पर मोहित हो गये I उस लक्ष्मी स्वरुपा नारी को पालकी में बिठाकर, पालकी को सिर पर उठाकर चल पड़े I यह देखकर दत्तात्रेय जी ने कहा की हे देवगण विधाता आपके अनुकूल है I क्योंकि लक्ष्मी सप्तम स्थान का अतिक्रमण कर दानवों के सिर पर जा बैठी है जिससे दानवों का विनाश स्पष्ट है I दत्तात्रेय जी ने देवताओं को बतलाया की जब लक्ष्मी चरण में हो तो गृह्दात्री होती है I अस्थि में हो तो रत्न आदि देती है I गुह्य स्थान में हो तो स्त्री, अंक में हो तो पुत्र, ह्रदय में हो तो सर्व मनोरथ प्रदायनी होती है I कंठ में हो तो कंठ भूषण देती है, प्रवासी प्रिय जनों के समागम में सहायक होती है I वाणी में हो तो लावण्य कवित्व शक्ति और यश देती है और लक्ष्मी यदि सिर पर आसीन हो तो विनाश करती है I तो हे देवगण, अब दानवों का विनाश निश्चित है I अतः आप लोग अब उन पर सहज ही विजय प्राप्त कर सकते हैं I तब देवताओं ने दानवों पर आक्रमण करके उनका विनाश कर दिया और लक्ष्मी स्वरुप नारी को दत्तात्रेय जी के पास ले आये I देवताओं ने दत्तात्रेय जी का पूजन किया और उनकी जय-जयकार करते हुये चले गये I यह प्रसंग सुनाकर गर्ग ऋषि ने कहा कि हे राजकुमार यदि आप भी अपने अभिमत में सफल होना चाहते हैं तो भगवान दत्तात्रेय जी की सेवा में उपस्थित होइए I
ऋषि गर्ग का यह कथन सुनकर कार्तवीर्य अर्जुन भगवान दत्तात्रेय की सेवा में उपस्थित हुये और तन, मन, धन, अर्पित कर क्षत्रिय धर्म को रखते हुये विनय और शास्त्र ज्ञान के अनुसार दत्तचित होकर भक्तिभाव से उनकी पूजा अर्चना में लग गये I अत्रि पुत्र दत्त की दुष्कर आराधना और सेवावृत्ति को देखकर दत्तात्रेय जी प्रसन्न हुये और उन्होंने वरदान मांगने को कहा I तब कार्तवीर्य ने कहा कि हे भगवान मुझे उत्तम सिद्धि का वरदान दीजिये I मुझमें अणिमा- लाघिमादी सिद्धियों का समावेश हो (वह सिद्धि जिसके द्वारा योगी अतिसूक्ष्म रूप धारण कर सकता है, लघुभाव प्राप्त करना हाथ की सफाई आदि की सिद्धियाँ) मुझे ज्ञान शक्ति और पौरुष में कोई न जीत सके I मै दान दक्षिणा करने में तथा भगवान कि अविचल भक्ति में मनसा-वाचा-कर्मणा में रात रहूँ I मैं अपने पराक्रम से सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतकर स्वधर्म पालन द्वारा सत्य एवं सन्मार्ग का पालन करते हुये प्रजा को सुखी एवं प्रसन्न रखूं I मैं कभी सन्मार्ग का परित्याग करके यदि असत्य मार्ग का आश्रय लेकर अधर्म कार्य में प्रवत्त होऊं तो श्रेष्ट पुरुष मुझे सन्मार्ग पर लाने के लिये शिक्षा दें I मैं सहस्त्रबाहु बन जाऊं और सहस्त्रार्जुन कहलाऊं I युद्ध में मेरी सहस्त्रभुजाएँ हो जावें, किंतु घर पर मेरी दो ही भुजाएँ रहें और रण भूमि में सभी सैनिक मेरी एक हज़ार भुजाएँ देखें I संग्राम में हजारों शत्रुओं को मौत के घाट उतर कर संग्राम में ही लड़ते हुए जो मुझसे अधिक शक्तिशाली और श्रेष्ट पुरुष हो उसके हाथों मेरी म्रत्यु हो I पदमपुराण में कहा गया है कि कार्तवीर्य अर्जुन ने दत्तात्रेय जी से जो वरदान मांगे उनमे विशेषकर एक वरदान उल्लेखनीय यह भी था कि “मेरे राज्य में लोगों को अधर्म कि बात सोचते हुए भी मुझसे भय हो और वे अधर्म के मार्ग से हट जाए I “ इस वरदान के करण कार्तवीर्य अर्जुन के राज्य में यदि किसी भी मनुष्य ने अधर्म कि बात मन में सोचने का ध्यान करता तो उसी समय उसे राजा का भय हो जाता था I इससे राज्य में अमन चैन, सुख और शांति व्याप्त रहती थी और राजा का शासन सुचारू रूप से चलता रहता था I भगवान दत्तात्रेय को प्रश्न करने के लिये राजा ने “भद्रदीप प्रतिष्ठा यज्ञ” का धार्मिक आयोजन किया था I
ब्रह्माण्ड पुराण में बताया गया है कि जब कार्तवीर्य अर्जुन राजधानी महिष्मति में राज्य कर रहे थे तब एक समय देवर्षि नारद जी ने महिष्मति नगरी में आकर राजा को दर्शन दिये I राजा ने ह्रदय से यथोचित उनका स्वागत किया और उनसे मोक्ष और दृव्य आनंद का मार्ग बतलाने के लिये निवेदन किया I नारद जी ने तब महाराज सहस्त्रबाहु को ” भद्रदीप प्रतिष्ठा यज्ञ ” का धार्मिक आयोजन करने के लिये उपदेश दिया था I महाराज कार्तवीर्य ने अपनी महारानी के साथ नर्मदा तट पर विधिवत ” भद्रदीप प्रतिष्ठा यज्ञ ” का धार्मिक आयोजन किया I यज्ञ के समापन के पश्चात् राजा के गुरु भगवान दत्तात्रेय प्रसन्न हुये और राजा से वरदान मांगने के लिये कहा I राजा ने हाथ जोड़कर एक हज़ार हाथ हो जाने का वरदान माँगा I भगवान दत्तात्रेय ने कार्तवीर्य अर्जुन को वरदान देते हुये “तथास्तु” कहते हुए कहा कि ऐसा ही होगा और यह भी कहा कि ” तुम चक्रवर्ती सम्राट बनोगे तथा जो व्यक्ति सायं और प्रातः काल ” नमोस्तु कार्तवीर्य ” इस वाक्य से तुम्हारा स्मरण करेंगे उन पुरषों का द्रव्य कभी नष्ट नहीं होगा I “ भगवान दत्तात्रेय से वर प्राप्त कर वे धर्म पूर्वक सप्तद्वीप प्रथ्वी का पालन करने लगे और शत्रुओं पर विजय प्राप्त की I उस तेजस्वी राजा के लिये वे सभी वरदान उसी रूप में सफल हुये I उसके पश्चात् कार्तवीर्य अर्जुन ने दत्तात्रेय जी को प्रणाम किया और उनसे विदा ली I
मार्कण्डेय पुराण में कार्तवीर्य को एक हज़ार वर्ष और हरिवंश पुराण में बारह हज़ार वर्ष दत्तात्रेय जी की उपासना करना बतलाया है I

18….महायोगी गुरु गोरखनाथ
सिद्ध गोरक्षनाथ को प्रणाम
सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रतिक्रिया के रूप में आदिकाल में नाथपंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई। इस पंथ को चलाने वाले मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) तथा गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) माने जाते हैं। इस पंथ के साधक लोगों को योगी, अवधूत, सिद्ध, औघड़ कहा जाता है। कहा यह भी जाता है कि सिद्धमत और नाथमत एक ही हैं।
गोरक्षनाथ के जन्मकाल पर विद्वानों में मतभेद हैं। राहुल सांकृत्यायन इनका जन्मकाल 845 ई. की 13वीं सदी का मानते हैं। नाथ परम्परा की शुरुआत बहुत प्राचीन रही है, किंतु गोरखनाथ से इस परम्परा को सुव्यवस्थित विस्तार मिला। गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ थे। दोनों को चौरासी सिद्धों में प्रमुख माना जाता है।
गुरु गोरखनाथ को गोरक्षनाथ भी कहा जाता है। इनके नाम पर एक नगर का नाम गोरखपुर है। गोरखनाथ नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। गोरखपंथी साहित्य के अनुसार आदिनाथ स्वयं भगवान शिव को माना जाता है। शिव की परम्परा को सही रूप में आगे बढ़ाने वाले गुरु मत्स्येन्द्रनाथ हुए। ऐसा नाथ सम्प्रदाय में माना जाता है।
गोरखनाथ से पहले अनेक सम्प्रदाय थे, जिनका नाथ सम्प्रदाय में विलय हो गया। शैव एवं शाक्तों के अतिरिक्त बौद्ध, जैन तथा वैष्णव योग मार्गी भी उनके सम्प्रदाय में आ मिले थे।
गोरखनाथ ने अपनी रचनाओं तथा साधना में योग के अंग क्रिया-योग अर्थात तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणीधान को अधिक महत्व दिया है। इनके माध्य म से ही उन्होंने हठयोग का उपदेश दिया। गोरखनाथ शरीर और मन के साथ नए-नए प्रयोग करते थे।
जनश्रुति अनुसार उन्होंने कई कठ‍िन (आड़े-त‍िरछे) आसनों का आविष्कार भी किया। उनके अजूबे आसनों को देख लोग अचकम्भित हो जाते थे। आगे चलकर कई कहावतें प्रचलन में आईं। जब भी कोई उल्टे-सीधे कार्य करता है तो कहा जाता है कि ‘यह क्या गोरखधंधा लगा रखा है।’
गोरखनाथ का मानना था कि सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य होना चाहिए। शून्य समाधि अर्थात समाधि से मुक्त हो जाना और उस परम शिव के समान स्वयं को स्थापित कर ब्रह्मलीन हो जाना, जहाँ पर परम शक्ति का अनुभव होता है। हठयोगी कुदरत को चुनौती देकर कुदरत के सारे नियमों से मुक्त हो जाता है और जो अदृश्य कुदरत है, उसे भी लाँघकर परम शुद्ध प्रकाश हो जाता है।
सिद्ध योगी : गोरखनाथ के हठयोग की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले सिद्ध योगियों में प्रमुख हैं :- चौरंगीनाथ, गोपीनाथ, चुणकरनाथ, भर्तृहरि, जालन्ध्रीपाव आदि। 13वीं सदी में इन्होंने गोरख वाणी का प्रचार-प्रसार किया था। यह एकेश्वरवाद पर बल देते थे, ब्रह्मवादी थे तथा ईश्वर के साकार रूप के सिवाय शिव के अतिरिक्त कुछ भी सत्य नहीं मानते थे।
नाथ सम्प्रदाय गुरु गोरखनाथ से भी पुराना है। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया। पूर्व में इस समप्रदाय का विस्तार असम और उसके आसपास के इलाकों में ही ज्यादा रहा, बाद में समूचे प्राचीन भारत में इनके योग मठ स्थापित हुए। आगे चलकर यह सम्प्रदाय भी कई भागों में विभक्त होता चला गया।
गोरखनाथ
महायोगी गोरखनाथ मध्ययुग (11वीं शताब्दी अनुमानित) के एक विशिष्ट महापुरुष थे। गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) थे। इन दोनों ने नाथ सम्प्रदाय को सुव्यवस्थित कर इसका विस्तार किया। इस सम्प्रदाय के साधक लोगों को योगी, अवधूत, सिद्ध, औघड़ कहा जाता है।
गुरु गोरखनाथ हठयोग के आचार्य थे। कहा जाता है कि एक बार गोरखनाथ समाधि में लीन थे। इन्हें गहन समाधि में देखकर माँ पार्वती ने भगवान शिव से उनके बारे में पूछा। शिवजी बोले, लोगों को योग शिक्षा देने के लिए ही उन्होंने गोरखनाथ के रूप में अवतार लिया है। इसलिए गोरखनाथ को शिव का अवतार भी माना जाता है। इन्हें चौरासी सिद्धों में प्रमुख माना जाता है। इनके उपदेशों में योग और शैव तंत्रों का सामंजस्य है। ये नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। गोरखनाथ की लिखी गद्य-पद्य की चालीस रचनाओं का परिचय प्राप्त है। इनकी रचनाओं तथा साधना में योग के अंग क्रिया-योग अर्थात् तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान को अधिक महत्व दिया है। गोरखनाथ का मानना था कि सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य होना चाहिए। शून्य समाधि अर्थात् समाधि से मुक्त हो जाना और उस परम शिव के समान स्वयं को स्थापित कर ब्रह्मलीन हो जाना, जहाँ पर परम शक्ति का अनुभव होता है। हठयोगी कुदरत को चुनौती देकर कुदरत के सारे नियमों से मुक्त हो जाता है और जो अदृश्य कुदरत है, उसे भी लाँघकर परम शुद्ध प्रकाश हो जाता है।
गोरखनाथ के जीवन से सम्बंधित एक रोचक कथा इस प्रकार है- एक राजा की प्रिय रानी का स्वर्गवास हो गया। शोक के मारे राजा का बुरा हाल था। जीने की उसकी इच्छा ही समाप्त हो गई। वह भी रानी की चिता में जलने की तैयारी करने लगा। लोग समझा-बुझाकर थक गए पर वह किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था। इतने में वहां गुरु गोरखनाथ आए। आते ही उन्होंने अपनी हांडी नीचे पटक दी और जोर-जोर से रोने लग गए। राजा को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कि वह तो अपनी रानी के लिए रो रहा है, पर गोरखनाथ जी क्यों रो रहे हैं। उसने गोरखनाथ के पास आकर पूछा, ‘महाराज, आप क्यों रो रहे हैं?’ गोरखनाथ ने उसी तरह रोते हुए कहा, ‘क्या करूं? मेरा सर्वनाश हो गया। मेरी हांडी टूट गई है। मैं इसी में भिक्षा मांगकर खाता था। हांडी रे हांडी।’ इस पर राजा ने कहा, ‘हांडी टूट गई तो इसमें रोने की क्या बात है? ये तो मिट्टी के बर्तन हैं। साधु होकर आप इसकी इतनी चिंता करते हैं।’ गोरखनाथ बोले, ‘तुम मुझे समझा रहे हो। मैं तो रोकर काम चला रहा हूं तुम तो मरने के लिए तैयार बैठे हो।’ गोरखनाथ की बात का आशय समझकर राजा ने जान देने का विचार त्याग दिया।
कहा जाता है कि राजकुमार बप्पा रावल जब किशोर अवस्था में अपने साथियों के साथ राजस्थान के जंगलों में शिकार करने के लिए गए थे, तब उन्होंने जंगल में संत गुरू गोरखनाथ को ध्यान में बैठे हुए पाया। बप्पा रावल ने संत के नजदीक ही रहना शुरू कर दिया और उनकी सेवा करते रहे। गोरखनाथ जी जब ध्यान से जागे तो बप्पा की सेवा से खुश होकर उन्हें एक तलवार दी जिसके बल पर ही चित्तौड़ राज्य की स्थापना हुई।
गोरखनाथ जी ने नेपाल और पाकिस्तान में भी योग साधना की। पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में स्थित गोरख पर्वत का विकास एक पर्यटन स्थल के रूप में किया जा रहा है। इसके निकट ही झेलम नदी के किनारे राँझा ने गोरखनाथ से योग दीक्षा ली थी। नेपाल में भी गोरखनाथ से सम्बंधित कई तीर्थ स्थल हैं। उत्तरप्रदेश के गोरखपुर शहर का नाम गोरखनाथ जी के नाम पर ही पड़ा है। यहाँ पर स्थित गोरखनाथ जी का मंदिर दर्शनीय है।
गोरखनाथ जी से सम्बंधित एक कथा राजस्थान में बहुत प्रचलित है। राजस्थान के महापुरूष गोगाजी का जन्म गुरू गोरखनाथ के वरदान से हुआ था। गोगाजी की माँ बाछल देवी निःसंतान थी। संतान प्राप्ति के सभी यत्न करने के बाद भी संतान सुख नहीं मिला। गुरू गोरखनाथ ‘गोगामेडी’ के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी शरण मे गईं तथा गुरू गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई और तदुपरांत गोगाजी का जन्म हुआ। गुगल फल के नाम से इनका नाम गोगाजी पड़ा। गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा बने। गोगामेडी में गोगाजी का मंदिर एक ऊंचे टीले पर मस्जिदनुमा बना हुआ है, इसकी मीनारें मुस्लिम स्थापत्य कला का बोध कराती हैं। कहा जाता है कि फिरोजशाह तुगलक सिंध प्रदेश को विजयी करने जाते समय गोगामेडी में ठहरे थे। रात के समय बादशाह तुगलक व उसकी सेना ने एक चमत्कारी दृश्य देखा कि मशालें लिए घोड़ों पर सेना आ रही है। तुगलक की सेना में हाहाकार मच गया। तुगलक की सेना के साथ आए धार्मिक विद्वानों ने बताया कि यहां कोई महान सिद्ध है जो प्रकट होना चाहता है। फिरोज तुगलक ने लड़ाई के बाद आते समय गोगामेडी में मस्जिदनुमा मंदिर का निर्माण करवाया। यहाँ सभी धर्मो के भक्तगण गोगा मजार के दर्शनों हेतु भादौं (भाद्रपद) मास में उमड़ पडते हैं।
गोरखनाथ जी की जानकारी
गोरक्षनाथ जी
नाथ सम्प्रदाय के प्रवर्तक गोरक्षनाथ जी के बारे में लिखित उल्लेख हमारे पुराणों में भी मिलते है। विभिन्न पुराणों में इससे संबंधित कथाएँ मिलती हैं। इसके साथ ही साथ बहुत सी पारंपरिक कथाएँ और किंवदंतियाँ भी समाज में प्रसारित है। उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल, बंगाल, पश्चिमी भारत, सिंध तथा पंजाब में और भारत के बाहर नेपाल में भी ये कथाएँ प्रचलित हैं। ऐसे ही कुछ आख्यानों का वर्णन यहाँ किया जा रहा हैं।
1. गोरक्षनाथ जी के आध्यात्मिक जीवन की शुरूआत से संबंधित कथाएँ विभिन्न स्थानों में पाई जाती हैं। इनके गुरू के संबंध में विभिन्न मान्यताएँ हैं। परंतु सभी मान्यताएँ उनके दो गुरूऑ के होने के बारे में एकमत हैं। ये थे-आदिनाथ और मत्स्येंद्रनाथ। चूंकि गोरक्षनाथ जी के अनुयायी इन्हें एक दैवी पुरूष मानते थे, इसीलिये उन्होनें इनके जन्म स्थान तथा समय के बारे में जानकारी देने से हमेशा इन्कार किया। किंतु गोरक्षनाथ जी के भ्रमण से संबंधित बहुत से कथन उपलब्ध हैं। नेपालवासियों का मानना हैं कि काठमांडु में गोरक्षनाथ का आगमन पंजाब से या कम से कम नेपाल की सीमा के बाहर से ही हुआ था। ऐसी भी मान्यता है कि काठमांडु में पशुपतिनाथ के मंदिर के पास ही उनका निवास था। कहीं-कहीं इन्हें अवध का संत भी माना गया है।
2. नाथ संप्रदाय के कुछ संतो का ये भी मानना है कि संसार के अस्तित्व में आने से पहले उनका संप्रदाय अस्तित्व में था।
इस मान्यता के अनुसार संसार की उत्पत्ति होते समय जब विष्णु कमल से प्रकट हुए थे, तब गोरक्षनाथ जी पटल में थे। भगवान विष्णु जम के विनाश से भयभीत हुए और पटल पर गये और गोरक्षनाथ जी से सहायता मांगी। गोरक्षनाथ जी ने कृपा की और अपनी धूनी में से मुट्ठी भर भभूत देते हुए कहा कि जल के ऊपर इस भभूति का छिड़काव करें, इससे वह संसार की रचना करने में समर्थ होंगे। गोरक्षनाथ जी ने जैसा कहा, वैस ही हुआ और इसके बाद ब्रह्मा, विष्णु और महेश श्री गोर-नाथ जी के प्रथम शिष्य बने।
3. एक मानव-उपदेशक से भी ज्यादा श्री गोरक्षनाथ जी को काल के साधारण नियमों से परे एक ऐसे अवतार के रूप में देखा गया जो विभिन्न कालों में धरती के विभिन्न स्थानों पर प्रकट हुए।
सतयुग में वो लाहौर पार पंजाब के पेशावर में रहे, त्रेतायुग में गोरखपुर में निवास किया, द्वापरयुग में द्वारिका के पार हरभुज में और कलियुग में गोरखपुर के पश्चिमी काठियावाड़ के गोरखमढ़ी(गोरखमंडी) में तीन महीने तक यात्रा की।
4.वर्तमान मान्यता के अनुसार मत्स्येंद्रनाथ को श्री गोरक्षनाथ जी का गुरू कहा जाता है। कबीर गोरक्षनाथ की ‘गोरक्षनाथ जी की गोष्ठी ‘ में उन्होनें अपने आपको मत्स्येंद्रनाथ से पूर्ववर्ती योगी थे, किन्तु अब उन्हें और शिव को एक ही माना जाता है और इस नाम का प्रयोग भगवान शिव अर्थात् सर्वश्रेष्ठ योगी के संप्रदाय को उद्गम के संधान की कोशिश के अंतर्गत किया जाता है।
5. गोरक्षनाथ के करीबी माने जाने वाले मत्स्येंद्रनाथ में मनुष्यों की दिलचस्पी ज्यादा रही हैं। उन्हें नेपाल के शासकों का अधिष्ठाता कुल गुरू माना जाता हैं। उन्हें बौद्ध संत (भिक्षु) भी माना गया है,जिन्होनें आर्यावलिकिटेश्वर के नाम से पदमपवाणि का अवतार लिया। उनके कुछ लीला स्थल नेपाल राज्य से बाहर के भी है और कहा जाता है लि भगवान बुद्ध के निर्देश पर वो नेपाल आये थे। ऐसा माना जाता है कि आर्यावलिकिटेश्वर पद्मपाणि बोधिसत्व ने शिव को योग की शिक्षा दी थी। उनकी आज्ञानुसार घर वापस लौटते समय समुद्र के तट पर शिव पार्वती को इसका ज्ञान दिया था। शिव के कथन के बीच पार्वती को नींद आ गयी, परन्तु मछली (मत्स्य) रूप धारण किये हुये लोकेश्वर ने इसे सुना। बाद में वहीं मत्स्येंद्रनाथ के नाम से जाने गये।
6. एक अन्य मान्यता के अनुसार श्री गोरक्षनाथ के द्वारा आरोपित बारह वर्ष से चले आ रहे सूखे से नेपाल की रक्षा करने के लिये मत्स्येंद्रनाथ को असम के कपोतल पर्वत से बुलाया गया था।
7.एक मान्यता के अनुसार मत्स्येंद्रनाथ को हिंदू परंपरा का अंग माना गया है। सतयुग में उधोधर नामक एक परम सात्विक राजा थे। उनकी मृत्यु के पश्चात् उनका दाह संस्कार किया गया परंतु उनकी नाभि अक्षत रही। उनके शरीर के उस अनजले अंग को नदी में प्रवाहित कर दिया गया, जिसे एक मछली ने अपना आहार बना लिया। तदोपरांत उसी मछ्ली के उदर से मत्स्येंद्रनाथ का जन्म हुआ। अपने पूर्व जन्म के पुण्य के फल के अनुसार वो इस जन्म में एक महान संत बने।
8.एक और मान्यता के अनुसार एक बार मत्स्येंद्रनाथ लंका गये और वहां की महारानी के प्रति आसक्त हो गये। जब गोरक्षनाथ जी ने अपने गुरु के इस अधोपतन के बारे में सुना तो वह उसकी तलाश मे लंका पहुँचे। उन्होंने मत्स्येंद्रनाथ को राज दरबार में पाया और उनसे जवाब मांगा । मत्स्येंद्रनाथ ने रानी को त्याग दिया,परंतु रानी से उत्पन्न अपने दोनों पुत्रों को साथ ले लिया। वही पुत्र आगे चलकर पारसनाथ और नीमनाथ के नाम से जाने गये,जिन्होंने जैन धर्म की स्थापना की।
9.एक नेपाली मान्यता के अनुसार, मत्स्येंद्रनाथ ने अपनी योग शक्ति के बल पर अपने शरीर का त्याग कर उसे अपने शिष्य गोरक्षनाथ की देखरेख में छोड़ दिया और तुरंत ही मृत्यु को प्राप्त हुए और एक राजा के शरीर में प्रवेश किया। इस अवस्था में मत्स्येंद्रनाथ को लोभ हो आया। भाग्यवश अपने गुरु के शरीर को देखरेख कर रहे गोरक्षनाथ जी उन्हें चेतन अवस्था में वापस लाये और उनके गुरु अपने शरीर में वापस लौट आयें।
10. संत कबीर पंद्रहवीं शताब्दी के भक्त कवि थे। इनके उपदेशों से गुरुनानक भी लाभान्वित हुए थे। संत कबीर को भी गोरक्षनाथ जी का समकालीन माना जाता हैं। “गोरक्षनाथ जी की गोष्ठी ” में कबीर और गोरक्षनाथ के शास्त्रार्थ का भी वर्णन है। इस आधार पर इतिहासकर विल्सन गोरक्षनाथ जी को पंद्रहवीं शताब्दी का मानते हैं।
11. पंजाब में चली आ रही एक मान्यता के अनुसार राजा रसालु और उनके सौतेले भाई पुरान भगत भी गोरक्षनाथ से संबंधित थे। रसालु का यश अफगानिस्तान से लेकर बंगाल तक फैला हुआ था और पुरान पंजाब के एक प्रसिद्ध संत थे। ये दोनों ही गोरक्षनाथ जी के शिष्य बने और पुरान तो एक प्रसिद्ध योगी बने। जिस कुँए के पास पुरान वर्षो तक रहे, वह आज भी सियालकोट में विराजमान है। रसालु सियालकोट के प्रसिद्ध सालवाहन के पुत्र थे।
12. बंगाल से लेकर पश्चिमी भारत तक और सिंध से पंजाब में गोपीचंद, रानी पिंगला और भर्तृहरि से जुड़ी एक और मान्यता भी है। इसके अनुसार गोपीचंद की माता मानवती को भर्तृहरि की बहन माना जाता है। भर्तृहरि ने अपनी पत्नी रानी पिंगला की मृत्यु के पश्चात् अपनी राजगद्दी अपने भाई उज्जैन के विक्रमादित्य (चंन्द्रगुप्त द्वितीय) के नाम कर दी थी। भर्तृहरि बाद में गोरक्षनाथी बन गये थे।
विभिन्न मान्यताओं को तथा तथ्यों को ध्यान में रखते हुये ये निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि गोरक्षनाथ जी का जीवन काल तेरहवीं शताब्दी से पहले का नहीं था।

19……ॐ काली-काली महा-काली कण्टक-विनाशिनी रोम-रोम रक्षतु सर्वं मे रक्षन्तु हीं हीं छा चारक।।”
विधिः चेत्र या आश्विन-शुक्ल-प्रतिपदा से नवमी तक देवी का व्रत करे। उक्त मन्त्र का १०८ बार जप करे। जप के बाद इसी मन्त्र से १०८ आहुति से। घी, धूप, सरल काष्ठ, सावाँ, सरसों, सफेद-चन्दन का चूरा, तिल, सुपारी, कमल-गट्टा, जौ (यव), इलायची, बादाम, गरी, छुहारा, चिरौंजी, खाँड़ मिलाकर साकल्य बनाए। सम्पूर्ण हवन-सामग्री को नई हांड़ी में रखे। भूमि पर शयन करे। समस्त जप-पूजन-हवन रात्रि में ११ से २ बजे के बीच करे। देवी की कृपा-प्राप्ति होगी तथा रोजाना अपने दोनों की हथेली पर 8 बार मन्त्र बोलकर फूक मारे व हाथो को पूरे शरीर पर फेरे इससे उपरी बाधा – तांत्रिक अभिचार से रक्षा होती है..

20…ऋण-मोचन महा-गणपति-स्तोत्र
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीऋण-मोचन महा-गणपति-स्तोत्र-मन्त्रस्य भगवान् शुक्राचार्य ऋषिः, ऋण-मोचन-गणपतिः देवता, मम-ऋण-मोचनार्थं जपे विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यासः- भगवान् शुक्राचार्य ऋषये नमः शिरसि, ऋण-मोचन-गणपति देवतायै नमः हृदि, मम-ऋण-मोचनार्थे जपे विनियोगाय नमः अञ्जलौ।
।।मूल-स्तोत्र।।
ॐ स्मरामि देव-देवेश ! वक्र-तुणडं महा-बलम्। षडक्षरं कृपा-सिन्धु, नमामि ऋण-मुक्तये।।१
महा-गणपतिं देवं, महा-सत्त्वं महा-बलम्। महा-विघ्न-हरं सौम्यं, नमामि ऋण-मुक्तये।।२
एकाक्षरं एक-दन्तं, एक-ब्रह्म सनातनम्। एकमेवाद्वितीयं च, नमामि ऋण-मुक्तये।।३
शुक्लाम्बरं शुक्ल-वर्णं, शुक्ल-गन्धानुलेपनम्। सर्व-शुक्ल-मयं देवं, नमामि ऋण-मुक्तये।।४
रक्ताम्बरं रक्त-वर्णं, रक्त-गन्धानुलेपनम्। रक्त-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये।।५
कृष्णाम्बरं कृष्ण-वर्णं, कृष्ण-गन्धानुलेपनम्। कृष्ण-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये।।६
पीताम्बरं पीत-वर्णं, पीत-गन्धानुलेपनम्। पीत-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये।।७
नीलाम्बरं नील-वर्णं, नील-गन्धानुलेपनम्। नील-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये।।८
धूम्राम्बरं धूम्र-वर्णं, धूम्र-गन्धानुलेपनम्। धूम्र-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये।।९
सर्वाम्बरं सर्व-वर्णं, सर्व-गन्धानुलेपनम्। सर्व-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये।।१०
भद्र-जातं च रुपं च, पाशांकुश-धरं शुभम्। सर्व-विघ्न-हरं देवं, नमामि ऋण-मुक्तये।।११
।।फल-श्रुति।।
यः पठेत् ऋण-हरं-स्तोत्रं, प्रातः-काले सुधी नरः। षण्मासाभ्यन्तरे चैव, ऋणच्छेदो भविष्यति।।१
जो व्यक्ति उक्त “ऋण-मोचन-स्तोत्र’ का नित्य प्रातः-काल पाठ करता है, उसका छः मास में ऋण-निवारण होता है।

21…..चौराहे पर पड़े नींबू को लांघना क्यों अशुभ है
कई बार रास्ते से गुजरते वक्त, चौराहे पर आधा कटा हुआ या सुई चुभा हुआ नींबू दिखाई दे जाता है, या फिर किसी कपड़े में लपेटे हुए।इस तरह सड़क पर पड़ा हुआ नींबू किसी टोटके में प्रयोग करके चौराहे पर रखा जाता है। जैसे घर की समस्याओं, बीमारियों या प्रेत बाधा से संबंधित टोटके। इसीलिए जब भी आपको इस तरह नींबू या अन्य सामग्री सड़क अथवा चौराहे पर दिखाई दे, तो उनसे संभल कर निकलें, क्योंकि यह सामग्री आपके लिए परेशानी खड़ी कर सकती है।
तंत्र- मंत्र और टोटकों में अधिकांशत: नींबू का उपयोग किया जाता है। धार्मिक या तांत्रिक कार्यों में बलि देने के लिए भी प्रतीकात्मक रूप में नींबू का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा घर, व्यवसाय या अन्य स्थानों पर नकारात्मक उर्जा को खत्म करने या उसे अंदर प्रवेश करने से रोकने के लिए भी नींबू का प्रयोग होता है। हम आपको बता रहे हैं, वे टोटके जिनके लिए नींबू का प्रयोग किया जाता है, और वह नींबू किस तरह आपके लिए परेशानी खड़ी कर सकता है-
1 सामान्यत: किसी व्यक्ति पर जब भूत-प्रेत का प्रभाव होता है, तो अक्सर उसे उतारने के लिए नींबू का प्रयोग किया जाता है, जिसके बाद उसे किसी चौराहे पर फें‍क दिया जाता है। ऐसा माना जाता है, कि यदि कोई उस नींबू पर पैर रख दे या गाड़ी से उसे कुचल दे, तो संबंधि‍त व्यक्ति की वह बाधा दूर हो जाती है। लेकिन बाधा का असर पैर रखने वाले व्यक्ति पर भी हो सकता है। इसीलिए जब भी आप वहां से गुजर रहें हो, तो ध्यान रखें कि उस नींबू पर आपका पैर न पड़े या आपकी गाड़ी का पहिया न चढ़े। अन्यथा आप पर भी समस्या का प्रभाव हो सकता है।
2 यदि कोई व्यक्ति किसी भयंकर या लंबी बीमारी से पीड़ित हो, तब भी दवा का असर न होने पर नींबू को लेकर एक टोटका किया जाता है। ऐसी स्थिति में एक नींबू लेकर उसमें पतली पिन या सुई से छेद करके, उसे पीड़ि‍त रोगी के ऊपर से उतार कर आधी रात के वक्त चौराहे पर ले जाकर रख दिया जाता है। यदि कोई व्यक्ति उस नींबू को लांघ कर निकल जाए, तो पीड़ित व्यक्ति ठीक हो जाता है, परंतु पीड़ि‍त का रोग लांघने वाले व्यक्ति को लग जाता है। इसीलिए चौराहे पर पड़े नींबू को देखकर उससे दूरी बना लें।
3 सड़क पर वे लोग भी नींबू रखते हैं, जि‍न्हें अपने व्यापार में भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है। ऐसा माना जाता है, कि यदि कोई व्यक्ति नींबू को व्यापार स्थल पर घुमा कर, सुबह जल्दी उठकर सूरज निकलने से पहले सड़क या प्रमुख चौराहे पर रख दे, तो जल्द ही उसका आर्थिक संकट दूर होगा।
4 यदि कोई महिला गर्भवती है, तो उसे सड़क पर पड़े हुए नींबू से अधि‍क सावधान रहना चाहिए। गर्भवती महिला का नींबू को लांघना, गर्भपात का कारण बन सकता है। गर्भवती महिला को अपने हाथ से नींबू काटना भी नहीं चाहिए।

22….”ॐ अमुक-नाम्ना ॐ नमो वायु-सूनवे झटिति आकर्षय-आकर्षय स्वाहा।”
विधि- केसर, कस्तुरी, गोरोचन, रक्त-चन्दन, श्वेत-चन्दन, अम्बर, कर्पूर और तुलसी की जड़ को घिस या पीसकर स्याही बनाए। उससे द्वादश-दल-कलम जैसा ‘यन्त्र’ लिखकर उसके मध्य में, जहाँ पराग रहता है, उक्त मन्त्र को लिखे। ‘अमुक’ के स्थान पर ‘साध्य’ का नाम लिखे। बारह दलों में क्रमशः निम्न मन्त्र लिखे-
१. हनुमते नमः, २. अञ्जनी-सूनवे नमः, ३. वायु-पुत्राय नमः, ४. महा-बलाय नमः, ५. श्रीरामेष्टाय नमः, ६. फाल्गुन-सखाय नमः, ७. पिङ्गाक्षाय नमः, ८. अमित-विक्रमाय नमः, ९. उदधि-क्रमणाय नमः, १०. सीता-शोक-विनाशकाय नमः, ११. लक्ष्मण-प्राण-दाय नमः और १२. दश-मुख-दर्प-हराय नमः।
यन्त्र की प्राण-प्रतिष्ठा करके षोडशोपचार पूजन करते हुए उक्त मन्त्र का ११००० जप करें। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए लाल चन्दन या तुलसी की माला से जप करें। आकर्षण हेतु अति प्रभावकारी है।

23….माँ काली कृपा प्राप्ति मंत्र साधना :-
मंत्र :- ॐ काली-काली, महा-काली, इन्द्र की बेटी ब्रह्मा की साली, कुचेपान बजावे ताली, चल काली कल्कत्ते वाली, आल बांधू-ताल बांधू ओर बांधू तलैया, शिवजी का मंदिर बांधू, हनुमान जी की दुहेया, शब्द साँचा पिंड काचा, फुरे मंत्र ईश्वरो वाचा ।।
विधि :- इस मंत्र का अनुस्थान 21 दिन का हे । साधक को नदी के किनारे एकांत स्थान पे बेठकर शुद्ध घी का दीपक जलाकर सुगंधित धूप करके ऋतुफल ओर मिठाई का नेवेध करे ओर रोज 2 माला का जाप करे तो ये मंत्र सिद्ध हो जाएगा । मंत्र जाप के दोहरन जब माँ कालि प्रत्यक्ष दर्शन दे तब दो पान एक पान सीधा ओर एक पान उल्टा (पान का चिकास वाला जो बाग हो उसको ऊपर रखे) रखके उसके ऊपर कपूर जलाकर साधक को अपनी अनामिका उंगली से खून की दो बूंद जमीन पे गिरा के माँ कालि से 3 वचन ले .।।

24……चामुंडा स्वप्न सिद्धि मंत्र साधना :-
ॐ ह्रीम आगच्छा गच्छ चामुंडे श्रीं स्वाहा ।।
विधि :- सबसे पहले मिट्टी ओर गोबर से जमीन को लीप ले ओर वो जगह पर कोई बिछोना बिछाले । फिर पंचोपचार से मटा का पूजन करके देवी मटा को नेवेध्य अर्पण करे । उसके बाद रुद्राक्ष की माला से उपरोक्त मंत्र का जाप 10,000 बार करे ओर देवी का द्यान करे इस तरह मंत्र सिद्धि कारले फिर उसके बाद जब कभी भी कोई प्रश्न मन मे हो तो मंत्र का 1 माला यानि 108 बार मंत्र का जाप करके सो जाए तो देवी अर्धरात्रि को स्वप्न मे आकार प्रश्न का उत्तर प्रदान करती हे …

25….दुर्गा शाबर मन्त्र
“ॐ ह्रीं श्रीं चामुण्डा सिंह-वाहिनी। बीस-हस्ती भगवती, रत्न-मण्डित सोनन की माल। उत्तर-पथ में आप बैठी, हाथ सिद्ध वाचा ऋद्धि-सिद्धि। धन-धान्य देहि देहि, कुरु कुरु स्वाहा।”
विधिः- उक्त मन्त्र का सवा लाख जप कर सिद्ध कर लें। फिर आवश्यकतानुसार श्रद्धा से एक माला जप करने से सभी कार्य सिद्ध होते हैं। लक्ष्मी प्राप्त होती है, नौकरी में उन्नति और व्यवसाय में वृद्धि होती है।
26…॰ लक्ष्मी शाबर मन्त्र
“विष्णु-प्रिया लक्ष्मी, शिव-प्रिया सती से प्रकट हुई। कामाक्षा भगवती आदि-शक्ति, युगल मूर्ति अपार, दोनों की प्रीति अमर, जाने संसार। दुहाई कामाक्षा की। आय बढ़ा व्यय घटा। दया कर माई। ॐ नमः विष्णु-प्रियाय। ॐ नमः शिव-प्रियाय। ॐ नमः कामाक्षाय। ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं फट् स्वाहा।”
विधिः- धूप-दीप-नैवेद्य से पूजा कर सवा लक्ष जप करें। लक्ष्मी आगमन एवं चमत्कार प्रत्यक्ष दिखाई देगा। रुके कार्य होंगे। लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी।..

27…..सिद्ध मोहन मन्त्र
क॰ “ॐ अं आं इं ईं उं ऊं हूँ फट्।”
विधिः- ताम्बूल को उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित कर साध्या को खिलाने से उसे खिलानेवाले के ऊपर मोह उत्पन्न होता है।
ख॰ “ॐ नमो भगवती पाद-पङ्कज परागेभ्यः।”
ग॰ “ॐ भीं क्षां भीं मोहय मोहय।”
विधिः- किसी पर्व काल में १२५ माला अथवा १२,५०० बार मन्त्र का जप कर सिद्ध कर लेना चाहिए। बाद में प्रयोग के समय किसी भी एक मन्त्र को तीन बार जप करने से आस-पास के व्यक्ति मोहित होते हैं..

28…..वशीकरण मंत्र
सबसे पहला मंत्र मोहन और सम्मोहन के सबसे बड़े देवता अर्थात् श्रीकृष्ण का है. मंत्र है-
ॐ क्लीं कृष्णाय नमः
अगर आप किसी व्यक्ति को ध्यान में रखकर और सकंल्प के साथ कहते हैं कि – हे प्रभु! आपकी कृपा से यह व्यक्ति मेरे वश में हो जाये क्योंकि मुझे स्वयं को सही साबित करने का और कोई साधन नही है. ऐसा संकल्प लेकर भगवान श्रीकृष्ण के संमुख कहेंगे तो निश्चित ही आपको लाभ मिलेगा. जिस किसी व्यक्ति को सम्मोहित करना चाहते हैं, अपनी तरफ़ करना चाहते हैं हो जायेगा.
दूसरा मंत्र भगवान नारायण का है-
ॐ नमो नारायणाय सर्व लोकन मम वश्य कुरु कुरु स्वहा.
अर्थात् हे प्रभु नारायण आपकी कृपा से सर्वलोक को वशीकरण करने की शक्ति मुझमे आ जाये. (सर्वलोक की जगह उस व्यक्ति का भी नाम लिया जा सकता है जिसे सम्मोहित करना हो) वह अवश्य आपके प्रति आकर्षित होगा.
तीसरा मंत्र दुर्गासप्तशती से है-
ज्ञानि न मपि चेतान्शी देवी भग्वति हिसा ग्रहा बलादा कृष्य मोहाय महामाया प्रयक्षति.
इस अत्यधिक चमत्कारिक मंत्र का 40 दिन तक नियमित रुप से 108 बार जाप करना है. यह मंत्र इतना प्रभावशाली है कि इसका जाप होते ही कितना भी ज्ञानी, विद्वान व्यक्ति क्यों न हो आपके नियंत्रण में आ जायेगा.

29…..देवी छिन्नमस्ता का शत्रु नाशक मंत्र
स्तुति
छिन्न्मस्ता करे वामे धार्यन्तीं स्व्मास्ताकम,प्रसारितमुखिम भीमां लेलिहानाग्रजिव्हिकाम,
पिवंतीं रौधिरीं धारां निजकंठविनिर्गाताम,विकीर्णकेशपाशान्श्च नाना पुष्प समन्विताम,
दक्षिणे च करे कर्त्री मुण्डमालाविभूषिताम,दिगम्बरीं महाघोरां प्रत्यालीढ़पदे स्थिताम,
अस्थिमालाधरां देवीं नागयज्ञो पवीतिनिम,डाकिनीवर्णिनीयुक्तां वामदक्षिणयोगत:,
पंचोपचार पूजन करें-धूप,दीप,फल,पुष्प,जल आदि चढ़ाएं
देवी के शिव को कबंध शिव के नाम से पूजा जाता है
ॐ कबंध शिवाय नम:
इस मंत्र का 21 बार जाप करे
मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं वज्र वैरोचिनिये फट
लाल रंग के वस्त्र और पुष्प देवी को अर्पित करें
नवैद्य प्रसाद,पुष्प,धूप दीप आरती आदि से पूजन करें
रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें
काले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें
दक्षिण दिशा की ओर मुख रखें
अखरो व अन्य फलों का फल प्रसाद रूप में चढ़ाएं..!!!

30….|| काली पञ्च वाण ||
आज के इस युग में प्रत्येक व्यक्ति अच्छे रोजगार की प्राप्ति में लगा हुआ है पर बहुत प्रयत्न करने पर भी अच्छी नौकरी नहीं मिलती है ! रोजगार सम्बन्धी किसी भी समस्या के समाधान के लिए इस मन्त्र का प्रतिदिन 11बार सुबह और 11बार शाम को जप करे !
प्रथम वाण
ॐ नमः काली कंकाली महाकाली
मुख सुन्दर जिए ब्याली
चार वीर भैरों चौरासी
बीततो पुजू पान ऐ मिठाई
अब बोलो काली की दुहाई !
द्वितीय वाण
ॐ काली कंकाली महाकाली
मुख सुन्दर जिए ज्वाला वीर वीर
भैरू चौरासी बता तो पुजू
पान मिठाई !
तृतीय वाण
ॐ काली कंकाली महाकाली
सकल सुंदरी जीहा बहालो
चार वीर भैरव चौरासी
तदा तो पुजू पान मिठाई
अब बोलो काली की दुहाई !
चतुर्थ वाण
ॐ काली कंकाली महाकाली
सर्व सुंदरी जिए बहाली
चार वीर भैरू चौरासी
तण तो पुजू पान मिठाई
अब राज बोलो
काली की दुहाई !
पंचम वाण
ॐ नमः काली कंकाली महाकाली
मख सुन्दर जिए काली
चार वीर भैरू चौरासी
तब राज तो पुजू पान मिठाई
अब बोलो काली की दोहाई !
|| विधि ||
इस मन्त्र को सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं है ! यह मन्त्र स्वयं सिद्ध है केवल माँ काली के सामने अगरबती जलाकर 11 बार सुबह और 11 बार शाम को जप कर ले ! मन्त्र एक दम शुद्ध है भाषा के नाम पर हेर फेर न करे !शाबर मन्त्र जैसे लिखे हो वैसे ही पढने पर फल देते है शुद्ध करने पर निष्फल हो जाते है !

31….।।उग्र साधनाओ मेँ रछा हेतु शाबर मंत्र ।।
रछा मंत्र :-
छोटी मोटी थमंत वार को वार बांधे , पार को पार बांधे, मरगट मसान बांधे , टोना बांधे , जादु वीर बांधे दीठ और मूठ बांधे बिच्छू बांधे और सांप बांधे भेड़िया बाघ बांधे लखूरी सियार बांधे अस्सी अस्सी दोष बांधे कालिका लिलार बांधे योगिनी संहार बांधे, ताडिका कलेज बांधे, उत्तर दछिण पूर्व पश्चिम बांधे, मारी मसानी बांधे, और बांधे डायन भूत के गुण, लाइल्लाह को कोट इल्ललाह की खाई ,मुहम्मद रसूल्लिल्लाह की चौकी, हजरत अली की दुहाई ।
विधि:- ईस मंत्र का जप किसी भी शुभ मुहूर्त या अमावस्या की रात्र मेँ एक हजार जप करने से सिद्ध होता और ग्रहण के समय तो मात्र 20 या 25 मिनट तक मंत्र जप करने सेँ मंत्र सिद्ध हो जाता है माला हकिक की लेनी हैँ और वस्त्र कोई भी पेहन सक्ते हैँ सर पर एक सफेद कपडा रखना हैँ और जप के समय अगरबत्ती और तेल का दिया जलता रहना चाहियेँ दिशा पश्चिम होगी अगर जप आप अमावस्या को कर रहेँ हैँ तो समय रात्री का होगा और अगर जप ग्रहण काल मेँ कर है तो समय जब ग्रसण चालू हो तब का रहेगा प्रयोग:- प्रयोग के समय मात्र सात बार मंत्र को पढ़कर लोहे के चिज या जल से घेरा बनाने पर हर प्रकार से रछा होती है ईसे शमशान साधना मेँ भी रछा हेतु प्रयोग किया जा सक्ता है ।

32…..मंत्र :
ॐ मलयाचल बागला भगवती माहाक्रूरी माहाकराली
राज मुख बन्धनं , ग्राम मुख बन्धनं , ग्राम पुरुष बन्धनं ,
काल मुख बन्धनं , चौर मुख बन्धनं , व्याघ्र मुख बन्धनं ,
सर्व दुष्ट ग्रेह बन्धनं , सर्व जन बन्धनं , वाशिकुरु हूँ फट स्वाहः ||
विधान : इस मंत्र का जाप माता बागला के सामान्य नियमो का पालन करते हुए १ माला प्रतिदिन करें ११ दिनों तक और दसांश हवन करें और नित्य १ माला जाप करते रहें मंत्र जागृत हो जाए गा | किसी भी प्रयोग को करने के लिए संकल्प लें (इछित गिनती का कम से कम ३ माला) और हवन कर दें प्रयोग सिद्ध होगा | रक्षा के लिए ७ बार मंत्र पढ़ के छाती पे और दसो दीशाओ मैं फुक मार दें , किसी भी चीज़ का भये नहीं रहे गा | नियमित जाप से मंत्र मैं लिखे सभी कार्य स्वम सिद्ध होते हैं अलग से प्रयोग की अवशाकता नहीं है | मंत्र का ग्रहन , दिवाली आदी पर्व में जाप कर पूर्णता जागृत कर लें | नज़र दोष के लिए मंत्र को पढ़ते हुए मोर पंख से झाडे | पिला नवद्य ज़रोर अर्पित करे | ध्यान मग्न होकर जाप करने से जल्दी सिद्ध हो |

33….सर्व-संकट- हारी-प्रयोग
“सर्वा बाधासु, वेदनाभ्यर्दितोऽप- ।
स्मरन् ममैच्चरितं, नरो मुच्यते संकटात्।।
ॐ नमः शिवाय।”
उपर्युक्त मन्त्र से ‘सप्त-श्लोकी दुर्गा का एकादश अर्थात् ११ बार सम्पुट-पाठ करने से सब प्रकार के संकटों से छुटकारा मिलता है। प्रत्येक ‘पाठ’ करने के बाद उक्त ‘सम्पुट-मन्त्र’ के अन्त में “स्वाहा” जोड़कर एकादश बार निम्न-लिखित वस्तुओं से हवन करेः-
१॰ अर्जुन की छाल का चूर्ण, २॰ शुद्ध शहद, ३॰ मिश्री ४॰ गाय का घी और ५॰ खीर- यह सब मिलाकर रख लें और उसी से हवन करें।
खीर बनाने के लिए सायंकाल ‘चावल’ को जल में भिगो दें। प्रातः जल गिराकर भीगे हुए चावलों को गाय के शुद्ध घी से भून लें। चावल हल्का लाल भूनने के बाद उसमें आवश्यकतानुसार चीनी, पञ्चमेवा, गाय का दूध डालकर पकावें। जब गाय का दूध पककर सूख जावे, तब ‘खीर’ को उतार लें और ठण्डी कर उपर्युक्त ४ वस्तुओं के साथ मिला कर रखें।…

34……श्री भैरव मन्त्र
“ॐ गुरुजी काला भैरुँ कपिला केश, काना मदरा, भगवाँ भेस। मार-मार काली-पुत्र। बारह कोस की मार, भूताँ हात कलेजी खूँहा गेडिया। जहाँ जाऊँ भैरुँ साथ। बारह कोस की रिद्धि ल्यावो। चौबीस कोस की सिद्धि ल्यावो। सूती होय, तो जगाय ल्यावो। बैठा होय, तो उठाय ल्यावो। अनन्त केसर की भारी ल्यावो। गौरा-पार्वती की विछिया ल्यावो। गेल्याँ की रस्तान मोह, कुवे की पणिहारी मोह, बैठा बाणिया मोह, घर बैठी बणियानी मोह, राजा की रजवाड़ मोह, महिला बैठी रानी मोह। डाकिनी को, शाकिनी को, भूतनी को, पलीतनी को, ओपरी को, पराई को, लाग कूँ, लपट कूँ, धूम कूँ, धक्का कूँ, पलीया कूँ, चौड़ कूँ, चौगट कूँ, काचा कूँ, कलवा कूँ, भूत कूँ, पलीत कूँ, जिन कूँ, राक्षस कूँ, बरियों से बरी कर दे। नजराँ जड़ दे ताला, इत्ता भैरव नहीं करे, तो पिता महादेव की जटा तोड़ तागड़ी करे, माता पार्वती का चीर फाड़ लँगोट करे। चल डाकिनी, शाकिनी, चौडूँ मैला बाकरा, देस्यूँ मद की धार, भरी सभा में द्यूँ आने में कहाँ लगाई बार ? खप्पर में खाय, मसान में लौटे, ऐसे काला भैरुँ की कूण पूजा मेटे। राजा मेटे राज से जाय, प्रजा मेटे दूध-पूत से जाय, जोगी मेटे ध्यान से जाय। शब्द साँचा, ब्रह्म वाचा, चलो मन्त्र ईश्वरो वाचा।”
विधिः- उक्त मन्त्र का अनुष्ठान रविवार से प्रारम्भ करें। एक पत्थर का तीन कोनेवाला टुकड़ा लिकर उसे अपने सामने स्थापित करें। उसके ऊपर तेल और सिन्दूर का लेप करें। पान और नारियल भेंट में चढावें। वहाँ नित्य सरसों के तेल का दीपक जलावें। अच्छा होगा कि दीपक अखण्ड हो। मन्त्र को नित्य २१ बार ४१ दिन तक जपें। जप के बाद नित्य छार, छरीला, कपूर, केशर और लौंग की आहुति दें। भोग में बाकला, बाटी बाकला रखें (विकल्प में उड़द के पकोड़े, बेसन के लड्डू और गुड़-मिले दूध की बलि दें। मन्त्र में वर्णित सब कार्यों में यह मन्त्र काम करता है।

35…..चौसठ योगिनी नामस्तोत्रम्:-
गजास्या सिंह-वक्त्रा च, गृध्रास्या काक-तुण्डिका ।
उष्ट्रा-स्याऽश्व-खर-ग्रीवा, वाराहास्या शिवानना ॥
उलूकाक्षी घोर-रवा, मायूरी शरभानना ।
कोटराक्षी चाष्ट-वक्त्रा, कुब्जा चविकटानना॥
शुष्कोदरी ललज्जिह्वा, श्व-दंष्ट्रा वानरानना ।
ऋक्षाक्षी केकराक्षी च, बृहत्-तुण्डा सुराप्रिया ॥
कपालहस्ता रक्ताक्षी, शुकी श्येनी कपोतिका ।
पाशहस्ता दंडहस्ता, प्रचण्डा चण्डविक्रमा ॥
शिशुघ्नी पाशहन्त्री च, काली रुधिर-पायिनी।
वसापाना गर्भरक्षा, शवहस्ताऽऽन्त्रमालिका ॥
ऋक्ष-केशी महा-कुक्षिर्नागास्या प्रेतपृष्ठका।
दन्द-शूक-धरा क्रौञ्ची, मृग-श्रृंगा वृषानना ॥
फाटितास्या धूम्रश्वासा, व्योमपादोर्ध्वदृष्टिका ।
तापिनी शोषिणी स्थूलघोणोष्ठा कोटरी तथा ॥
विद्युल्लोला वलाकास्या, मार्जारी कटपूतना।
अट्टहास्या चकामाक्षी, मृगाक्षी चेति ता मताः ॥
फल-श्रुति :-
चतुष्षष्टिस्तुयोगिन्यः पूजिता नवरात्रके।
दुष्ट-बाधां नाशयन्ति, गर्भ-बालादि-रक्षिकाः॥
नडाकिन्यो नशाकिन्यो, न कूष्माण्डा नराक्षसाः ।
तस्य पीड़ांप्रकुर्वन्ति, नामान्येतानि यः पठेत् ॥
बलि-पूजोपहारैश्च, धूप-दीप-समर्पणैः।
क्षिप्रं प्रसन्ना योगिन्यो, प्रयच्छेयुर्मनोरथान् ॥
कृष्णा-चतुर्दशी-रात्रावुपवासी नरोत्तमः ।
प्रणवादि-चतुर्थ्यन्त-नामभिर्हवनं चरेत् ॥
प्रत्येकं हवनं चासां, शतमष्टोत्तरंमतम् ।
स-सर्पिषा गुग्गुलुना, लघु-बदर-मानतः॥
विधि :-
साधक कृष्ण-पक्षकी चतुर्दशी को उपवासकरे।
रात्रि में गुग्गुलऔरघृत सेविभक्तियुक्तप्रत्येकनामके आगे प्रणव ॐलगाकर, प्रत्येकनाम से१०८आहुतियाँ अर्पित करे ।
पूरी तरह शुद्ध होकर, एकाग्र-मनसे जो इन नामों का पाठ करता है । उसे डाकिनी, शाकिनी, कूष्माण्डऔरराक्षसआदि किसी प्रकारकी पीड़ा नहीं होती ।
धूप-दीपादि उपचारों सहित पूजन औरबलि प्रदान करने से योगनियाँ शीघ्र प्रसन्नहोकरसभी कामनाओं को पूरा करती है ।
हवनके लियेचौंसठ योगिनी नाम इस प्रकारहै। प्रत्येक नाम के आदि में ‘ॐ’तथा अन्तमेंस्वाहा लगाकरहवनकरें ॥
ॐगजास्यै स्वाहा ॥ ॐ सिंह-वक्त्रायैस्वाहा ॥ ॐ गृध्रास्यायैस्वाहा ॥ ॐकाक-तुण्डिकायै स्वाहा ॥ ॐ उष्ट्रास्यायैस्वाहा ॥ ॐअश्व-खर-ग्रीवायैस्वाहा ॥ ॐवाराहस्यायै स्वाहा ॥ ॐशिवाननायै स्वाहा ॥ ॐ उलूकाक्ष्यै स्वाहा ॥ ॐ घोर-रवायैस्वाहा ॥ ॐमायूर्यै स्वाहा ॥ ॐशरभाननायै स्वाहा ॥ ॐकोटराक्ष्यै स्वाहा ॥ ॐअष्ट-वक्त्रायै स्वाहा॥ ॐकुब्जायै स्वाहा ॥ ॐविकटाननायै स्वाहा ॥ ॐ शुष्कोदर्यैस्वाहा ॥ ॐललज्जिह्वायैस्वाहा ॥ ॐश्व-दंष्ट्रायैस्वाहा ॥ ॐवानराननायै स्वाहा ॥ ॐ ऋक्षाक्ष्यै स्वाहा ॥ ॐ केकराक्ष्यै स्वाहा ॥ ॐबृहत्-तुण्डायैस्वाहा ॥ ॐसुरा-प्रियायै स्वाहा ॥ ॐकपाल-हस्तायै स्वाहा ॥ ॐरक्ताक्ष्यै स्वाहा ॥ ॐ शुक्यै स्वाहा ॥ ॐश्येन्यैस्वाहा ॥ ॐकपोतिकायै स्वाहा ॥ ॐ पाश-हस्तायै स्वाहा ॥ ॐदण्ड-हस्तायैस्वाहा ॥ ॐप्रचण्डायै स्वाहा ॥ ॐचण्ड-विक्रमायै स्वाहा ॥ ॐशिशुघ्न्यैस्वाहा ॥ ॐपाश-हन्त्र्यै स्वाहा ॥ ॐ काल्यै स्वाहा ॥ ॐरुधिर-पायिन्यै स्वाहा ॥ ॐ वसा-पानायै स्वाहा ॥ ॐगर्भ-भक्षायैस्वाहा ॥ ॐशव-हस्तायै स्वाहा ॥ ॐआन्त्र-मालिकायै स्वाहा ॥ ॐ ऋक्ष-केश्यैस्वाहा ॥ ॐमहा-कुक्ष्यै स्वाहा ॥ ॐ नागास्यायै स्वाहा ॥ ॐप्रेत-पृष्ठकायै स्वाहा ॥ ॐदंष्ट्र-शूकर-धरायै स्वाहा ॥ ॐक्रौञ्च्यैस्वाहा ॥ ॐमृग-श्रृंगायै स्वाहा ॥ ॐवृषाननायै स्वाहा ॥ ॐफाटितास्यायै स्वाहा ॥ ॐ धूम्र-श्वासायै स्वाहा ॥ ॐव्योम-पादायै स्वाहा॥ ॐऊर्ध्व-दृष्टिकायैस्वाहा ॥ ॐतापिन्यै स्वाहा ॥ ॐशोषिण्यै स्वाहा ॥ ॐस्थूल-घोणोष्ठायैस्वाहा ॥ ॐकोटर्यैस्वाहा ॥ ॐविद्युल्लोलायै स्वाहा॥ ॐबलाकास्यायै स्वाहा ॥ ॐमार्जार्यैस्वाहा ॥ ॐकट-पूतनायै स्वाहा ॥ ॐअट्टहास्यायै स्वाहा॥ ॐकामाक्ष्यैस्वाहा ॥ ॐ मृगाक्ष्यै स्वाहा ॥
चौंसठ योगिनी मंत्र:-१. ॐकाली नित्य सिद्धमाता स्वाहा २. ॐकपालिनी नागलक्ष्मी स्वाहा ३. ॐकुला देवी स्वर्णदेहा स्वाहा ४. ॐकुरुकुल्ला रसनाथा स्वाहा ५. ॐविरोधिनी विलासिनी स्वाहा ६. ॐविप्रचित्ता रक्तप्रिया स्वाहा ७. ॐउग्ररक्त भोग रूपा स्वाहा ८. ॐउग्रप्रभा शुक्रनाथा स्वाहा ९. ॐदीपामुक्तिःरक्तादेहा स्वाहा १०.ॐ नीला भुक्ति रक्त स्पर्शा स्वाहा ११.ॐ घना महा जगदम्बा स्वाहा १२.ॐ बलाका काम सेविता स्वाहा १३.ॐ मातृ देवी आत्मविद्या स्वाहा १४.ॐ मुद्रा पूर्णा रजतकृपा स्वाहा १५.ॐ मिता तंत्रकौला दीक्षा स्वाहा १६.ॐ महाकालीसिद्धेश्वरी स्वाहा १७.ॐ कामेश्वरी सर्वशक्तिस्वाहा १८.ॐ भगमालिनी तारिणी स्वाहा १९.ॐ नित्यकलींना तंत्रार्पिता स्वाहा २०.ॐ भेरुण्ड तत्त्व उत्तमा स्वाहा २१.ॐ वह्निवासिनी शासिनि स्वाहा २२.ॐ महवज्रेश्वरी रक्तदेवी स्वाहा २३.ॐ शिवदूती आदिशक्ति स्वाहा २४.ॐ त्वरिता ऊर्ध्वरेतादा स्वाहा २५.ॐ कुलसुंदरी कामिनी स्वाहा २६.ॐ नीलपताका सिद्धिदा स्वाहा २७.ॐ नित्य जनन स्वरूपिणी स्वाहा २८.ॐ विजया देवी वसुदा स्वाहा २९.ॐ सर्वमङ्गला तन्त्रदा स्वाहा ३०.ॐ ज्वालामालिनी नागिनी स्वाहा ३१.ॐ चित्रा देवीरक्तपुजा स्वाहा ३२.ॐ ललिता कन्या शुक्रदा स्वाहा ३३.ॐ डाकिनी मदसालिनी स्वाहा ३४.ॐ राकिनी पापराशिनी स्वाहा ३५.ॐ लाकिनी सर्वतन्त्रेसी स्वाहा ३६.ॐ काकिनी नागनार्तिकी स्वाहा ३७.ॐ शाकिनी मित्ररूपिणीस्वाहा ३८.ॐ हाकिनी मनोहारिणीस्वाहा ३९.ॐ तारायोग रक्ता पूर्णा स्वाहा ४०.ॐ षोडशीलतिका देवी स्वाहा ४१.ॐ भुवनेश्वरी मंत्रिणी स्वाहा ४२.ॐ छिन्नमस्ता योनिवेगा स्वाहा ४३.ॐ भैरवी सत्य सुकरिणी स्वाहा ४४.ॐ धूमावती कुण्डलिनी स्वाहा ४५.ॐ बगलामुखी गुरु मूर्ति स्वाहा ४६.ॐ मातंगी कांटा युवती स्वाहा ४७.ॐ कमला शुक्ल संस्थिता स्वाहा ४८.ॐ प्रकृति ब्रह्मेन्द्री देवी स्वाहा ४९.ॐ गायत्री नित्यचित्रिणी स्वाहा ५०.ॐ मोहिनी माता योगिनी स्वाहा ५१.ॐ सरस्वती स्वर्गदेवी स्वाहा ५२.ॐ अन्नपूर्णी शिवसंगी स्वाहा ५३.ॐ नारसिंही वामदेवी स्वाहा ५४.ॐ गंगा योनि स्वरूपिणी स्वाहा ५५.ॐ अपराजिता समाप्तिदा स्वाहा ५६.ॐ चामुंडा परि अंगनाथा स्वाहा ५७.ॐ वाराही सत्येकाकिनी स्वाहा ५८.ॐ कौमारी क्रिया शक्तिनि स्वाहा ५९.ॐ इन्द्राणी मुक्ति नियन्त्रिणी स्वाहा ६०.ॐ ब्रह्माणी आनन्दा मूर्ती स्वाहा ६१.ॐ वैष्णवी सत्यरूपिणी स्वाहा ६२.ॐ माहेश्वरी पराशक्ति स्वाहा ६३.ॐ लक्ष्मी मनोरमायोनि स्वाहा ६४.ॐ दुर्गा सच्चिदानंद स्वाहा .हीरापुरमें योगिनियो के जिननामों या रूपों का अस्तित्व मिलता है वे इसप्रकारहैं :-
१. बहुरूपा २. तारा ३. नर्मदा ४. यमुना ५. शांति ६. वारुणी ७. क्षेमकरी ८. ऐन्द्री ९. वाराही १०.रणवीरा ११.वानरमुखी १२.वैष्णवी १३.कालरात्रि १४.वैद्यरूपा १५.चर्चिका १६.बेताली १७.छिनमास्तिका १८.वृषभानना १९.ज्वाला कामिनी २०.घटवारा २१.करकाली २२.सरस्वती २३.बिरूपा २४.कौबेरी २५.भालुका २६.नारसिंही २७.बिराजा २८.विकटानन २९.महालक्ष्मी ३०.कौमारी ३१.महामाया ३२.रति ३३.करकरी ३४.सर्पश्या ३५.यक्षिणी ३६.विनायकी ३७.विन्द्यावालिनी ३८.वीरकुमारी ३९.माहेश्वरी ४०.अम्बिका ४१.कामायनी ४२.घटाबारी ४३.स्तुति ४४.काली ४५.उमा ४६.नारायणी ४७.समुद्रा ४८.ब्राह्मी ४९.ज्वालामुखी ५०.आग्नेयी ५१.अदिति ५२.चन्द्रकांति ५३.वायुबेगा ५४.चामुंडा ५५.मूर्ति ५६.गंगा ५७.धूमावती ५८.गांधारी ५९.सर्वमंगला ६०.अजिता ६१.सूर्य पुत्री ६२.वायुवीणा ६३.अघोरा ६४.भद्रकाली प्रमुखमंदिर:- मंदिरों के हिसाबसे देखा जाये तो चौसठ योगिनियों के २प्रमुखमंदिरउड़ीसा राज्य मेंऔर२प्रमुख मंदिर मध्य प्रदेश में अवस्थितहैं!
उड़ीसा:-
१. एक प्रमुखमंदिर उड़ीसा मेंनवीं शताब्दी में निर्मित हुआ था जो खुर्दा डिस्ट्रिक्ट हीरापुरमें भुवनेश्वरसे १५ किलोमीटरकि दूरी पर स्थित है ! २. दूसरा चौंसठ योगिनी मंदिर (रानीपुरझरिअल )टिटिलागढ़ बलांगीरडिस्ट्रिक्ट मेंस्थित है लेकिनइस मंदिरमें ६४ के बजायअब ६२मूर्तियां ही उपलब्धहैं !
मध्य प्रदेश :-
१. नविनशताब्दी में ही निर्मित एकमंदिरमध्य प्रदेश के खजुराहो नामक स्थान परहै जो छतरपुरडिस्ट्रिक्ट में पड़ता है औरयहाँपहुँचने केलिएझाँसी से इलाहबाद वाली रेलवे लाइन से जाकरमहोबा स्टेशन परउतरने के बाद लगभग६० किलोमीटरका सफ़र तय करनेके बाद खजुराहो पहुंचा जा सकता है
२. दूसरा मंदिरमध्य प्रदेश में ही भेड़ाघाट नमकस्थलपरहै जो कि मध्य प्रदेश के जबलपुर डिस्ट्रिक्ट में पड़ता है
अन्य :- स्थान स्थान पर इनके रूपऔरस्थित मेंभेद दृष्टिगतहो सकता हैजैसेकि :-
१. हीरापुरमें सभीयोगिनियां अपने-२वाहनोंपरसवारहैं और खड़ी मुद्रा में हैं २. रानीपुरझरिअल मेंसभी योगिनियांनृत्य मुद्रा में हैं ३. जबकि भेड़ाघाट में सभी मूर्तियां ललितासन में बैठी हुयी हैं चौंसठ योगिनी पूजन एक श्वेत वस्त्रपररोली सेचौंसठ खानेबनाकर एक – एक खाने में एक – एकयोगिनियोंको स्थितकरें। इनके नाम क्रम से यह हैं-१. गजानना, २. सिंहमुखी, ३.गृहस्था, ४. काकतुंडिका, ५. उग्रग्रीवा, ६.हयग्रीवा, ७.वाराही, ८.शरमानना, ९. उलूकी, १०.शिवाख्या, ११.मयूरा, १२.विकटानन, १३. अष्टवक्रा, १४.कोटराक्षी, १५.कुब्जा, १६.विकटलोचना, १७. शुष्कोदरी, १८.ललजिह्वा, १९.श्वेतदष्ट्रा, २०.वानरानना, २१.ऋक्षाक्षी, २२.केकरा, २३. वृहत्तुन्डा, २४.सुराप्रिया, २५.कपालहस्ता, २६. रक्ताक्षी, २७.शुक्री, २८.श्येनी, २९.कपोतिका, ३०.पाशहस्ता, ३१.दण्डहस्ता, ३२. प्रचण्डा, ३३. चण्डविक्रमा, ३४.शिशुघ्री, ३५.पापहन्त्री, ३६.काली, ३७. रुधिरपायिनि, ३८. वसोधरा, ३९. गर्भभक्षा, ४०.हस्ता, ४१. ऽऽन्त्रमालिनी, ४२.स्थूलकेशी, ४३.वृहत्कुक्षिः, ४४.सर्पास्या, ४५.प्रेतहस्ता, ४६. दशशूकरा, ४७.क्रौञ्ची, ४८. मृगशीर्षा, ४९.वृषानना, ५०. व्वात्तास्या, ५१. धूमिनि, श्वाषाः, ५२.व्यौमैकचरणा, ५३. उर्ध्वदृक् , ५४.तापनी, ५५.शोषिणी दृष्टि, ५६.कोटरी, ५७. स्थूल नासिका, ५८. विद्युत्प्रभा, ५९.बलाकास्या, ६०. मार्जारी, ६१.कटपूतना, ६२.अट्ठाटटहासा, ६३. कामाक्षी, ६४.मृगाक्षी मृगलोचना । यदि हम८ मातृका शक्तिया मानकर चलते हैं तो ये ८सहायक सहकतियों के साथमिश्रित होती हैं जिससे इनकीसंख्या ८ गुना ८ =६४होतीहैकिन्तु जबहम ९मातृका शक्तियों के आधार पर गणनाकरते हैं तोइनकी संख्या ८१ हो जाती है -प्रत्येक मातृका शक्ति एक योगिनी केरूप में गणित होती है और अन्य ८ मातृका शक्तियों के साथ गुणित किजाती है!आदेश आदेश गुरुजी को आदेश..

36….विद्या लाभ तथा स्मरणशक्ति के लिए
[१] जो विद्यार्थी पढ़ाई में कमजोर हों ,हमेशा असफल होता हो तो सियार के बाल को चांदी या सोने की ताबीज में धारण कराने से लाभ होता है |
[2] यदि कोई विद्यार्थी मंगलवार व् शनिवार को सुन्दरकाण्ड का पाठ व् शिव की पूजा करता है तो वह विद्यावान बनता है |
[३] प्रत्येक रविवार सुर्यपूजन व् बिना नमक का भोजन कर लाल वस्तु का दान करने से सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है |
[४] बच्चे की स्मरणशक्ति बढाने के लिए शनिवार से शनिवार तक नित्य रात्री बारह बजे उसकी शिखा मूल के दो या चार केश काटकर एकत्र कर लें ,,फिर रविवार को इन सबको एकत्र करके दरवाजे की चौखट पर जलाकर पैर की एड़ी से मसल दें |
[५] शुक्रवार को रात्री में कौवे के सात पंखों को धोकर श्वत धागे से बांधकर रखें |फिर दुसरे दिन रात्रि में उन पंखों को धुप दीप दिखाकर धागा हटा दें |हटाये हुए धागे को दायें हाथ में धारण करें तथा पंखों को अपने पास रखें तो स्मरण शक्ति बढती है
[६] शनिवार को कौवे की पीठ के सात पंखों को दिन में धोकर सुखा लें तथा रात्री में धुप-दीप दिखाकर सिरहाने के नीचे रख दें |दुसरे दिन पंखों का चूरा बनाकर किसी भी रंगीन कागज़ में पुडिया बनाकर ताम्र या रजत यन्त्र में डालकर धारण करने से से स्मरण शक्ति बढती है |धारण करने के बाद यन्त्र को उतारें नहीं विद्या बुद्धि एवं सफलता प्राप्ति हेतु रुद्राक्ष धारण
विद्या,ज्ञान व बुद्धि की प्राप्ति के लिए तीन मुखी व छ: मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए, इसे धारण करने से तीब्र बुद्धि होती है व अद्भुत स्मरण शक्ति प्राप्त होती है, जो पढाई में कमजोर हों वे इसे अवश्य धारण करें,बहुत ज्यादा लाभ मिलेगा, तीन मुखी या छ: मुखी रुद्राक्ष धारण, करने से रचनात्मक कार्यों में भी बहुत लाभ मिलता है, जैसे यदि आप फैशन डिजाइनर हो, सौन्दर्य जगत से जुड़े हो, लेखक या सम्पादक हों, चित्रकार या अनुसंधानकर्ता हों तो ये रुद्राक्ष आपको बहुत लाभ प्रदान करेंगे,|……

37….काली-शाबर-मन्त्र
“काली काली महा-काली, इन्द्र की बेटी, ब्रह्मा की साली। पीती भर भर रक्त प्याली, उड़ बैठी पीपल की डाली। दोनों हाथ बजाए ताली। जहाँ जाए वज्र की ताली, वहाँ ना आए दुश्मन हाली। दुहाई कामरो कामाख्या नैना योगिनी की, ईश्वर महादेव गोरा पार्वती की, दुहाई वीर मसान की।।”
विधिः- प्रतिदिन १०८ बार ४० दिन तक जप कर सिद्ध करे। प्रयोग के समय पढ़कर तीन बार जोर से ताली बजाए। जहाँ तक ताली की आवाज जायेगी, दुश्मन का कोई वार या भूत, प्रेत असर नहीं करेगा।

38….लक्ष्मी शाबर मन्त्र“विष्णु-प्रिया लक्ष्मी, शिव-प्रिया सती से प्रकट हुई। कामाक्षा भगवती आदि-शक्ति, युगल मूर्ति अपार, दोनों की प्रीति अमर, जाने संसार। दुहाई कामाक्षा की। आय बढ़ा व्यय घटा। दया कर माई। ॐ नमः विष्णु-प्रियाय। ॐ नमः शिव-प्रियाय। ॐ नमः कामाक्षाय। ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं फट् स्वाहा।”
विधिः- धूप-दीप-नैवेद्य से पूजा कर सवा लक्ष जप करें। लक्ष्मी आगमन एवं चमत्कार प्रत्यक्ष दिखाई देगा। रुके कार्य होंगे। लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी।

 

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