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कैसे पहचानें घर में पितृ दोष है या नही

पितृ दोष क्यों होता है

1.किसी ने किसी ब्राहमण कुलगुरु का अपमान करने के कारण

2. गाय की हत्या के कारण

3. मरते वक्त कोई इछा पूरी नहीं होने के कारण

4.पितर को जल नहीं देने के कारण

घर में पितृ दोष के लक्षण

1.जिस घर में पितृ दोष होता है, परिवार सिकुड़ने लगता है अर्थात घर में पुरुष सदस्यों की संख्या में कमी होने लगती है

2.ऐसे घर में कलह होती है, परिवार के लोगों में मनमुटाव बढ़ता जाता है, नकारात्मक सोच हो जाती है

3.बच्चे गलत रस्ते पर चल पड़ते हैं,

4. परिवार में बुजुर्गों का अपमान होता है

5.शादी योग्य बच्चों की शादी समय पर नहीं होती और शादी के बाद संतान प्राप्ति में भी बाधा आती है

6.कितना ही धनागम हो बरकत नहीं होती

7.घर की दीवारों में सीलन, टूट-फूट रहती है

8.घर में सूर्य की रौशनी कम आती है साथ ही घर अव्यवस्थित रहता है

9.घर में मास-मदिरा का सेवन होता हो तो पितृ दोष के कारण घर के लोगों को भयंकर दुष्परिणाम झेलने पड़ते है

ज्योतिष में पितृदोष का बहुत महत्व माना जाता है। प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों में पितृदोष सबसे बड़ा दोष माना गया है। इससे पीड़ित व्यक्ति का जीवन अत्यंत कष्टमय हो जाता है। जिस जातक की कुंडली
1. कुंडली में पितृ दोष बन रहा हो तब जातक को घर की दक्षिण दिशा की दीवार पर अपने स्वर्गीय परिजनों का फोटो लगाकर उस पर हार चढ़ाकर रोजाना उनकी पूजा स्तुति करना चाहिए। उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने से पितृदोष से मुक्ति मिलती है। में यह दोष होता है उसे धन अभाव से लेकर मानसिक क्लेश तक का सामना करना पड़ता है। पितृदोष से पीड़ित जातक की उन्नति में बाधा रहती है।

आमतौर पर पितृदोष के लिए खर्चीले उपाय बताए जाते हैं लेकिन यदि किसी जातक की कुंडली में पितृ दोष बन रहा है और वह महंगे उपाय करने में असमर्थ है तो भी परेशान होने की कोई बात नहीं। पितृदोष का प्रभाव कम करने के लिए ऐसे कई आसान, सस्ते व सरल उपाय भी हैं जिनसे इसका प्रभाव कम हो सकता है।

2. अपने स्वर्गीय परिजनों की निर्वाण तिथि पर जरूरतमंदों अथवा गुणी ब्राह्मणों को भोजन कराए। भोजन में मृतात्मा की कम से कम एक पसंद की वस्तु अवश्य बनाएं।
3. इसी दिन अगर हो सके तो अपनी सामर्थ्यानुसार गरीबों को वस्त्र और अन्न आदि दान करने से भी यह दोष मिटता है।
4. पीपल के वृक्ष पर दोपहर में जल, पुष्प, अक्षत, दूध, गंगाजल, काले तिल चढ़ाएं और स्वर्गीय परिजनों का स्मरण कर उनसे आशीर्वाद मांगें।

5. शाम के समय में दीप जलाएं और नाग स्तोत्र, महामृत्युंजय मंत्र या रुद्र सूक्त या पितृ स्तोत्र व नवग्रह स्तोत्र का पाठ करें। इससे भी पितृ दोष की शांति होती है।
6. सोमवार प्रात:काल में स्नान कर नंगे पैर शिव मंदिर में जाकर आक के 21 पुष्प, कच्ची लस्सी, बिल्वपत्र के साथ शिवजी की पूजा करें। 21 सोमवार करने से पितृदोष का प्रभाव कम होता है।

7. प्रतिदिन इष्ट देवता व कुल देवता की पूजा करने से भी पितृ दोष का शमन होता है।

2…पितृदोष के कारण संतान कष्ट होने के उपाय |
पितृ दोष के कारण कई व्यक्तियों को संतान प्राप्ति में बाधा तथा रुकावटों का सामना करना पड़ता है. इन बाधाओं के निवारण के लिए कुछ उपाय हैं जो निम्नलिखित हैं :-
1. यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य-राहु, सूर्य-शनि आदि योग के कारण पितृ दोष बन रहा है तब उसके लिए नारायण बलि, नाग बलि, गया में श्राद्ध, आश्विन कृष्ण पक्ष में पितरों का श्राद्ध, पितृ तर्पण, ब्राह्मण भोजन तथा दानादि करने से शांति प्राप्त होती है.
2. मातृ दोष |
यदि कुंडली में चंद्रमा पंचम भाव का स्वामी होकर शनि, राहु, मंगल आदि क्रूर ग्रहों से युक्त या आक्रान्त हो और गुरु अकेला पंचम या नवम भाव में है तब मातृ दोष के कारण संतान सुख में कमी का अनुभव हो सकता है.
मातृ दोष के शांति उपाय |
यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मातृ दोष बन रहा है तब इसकी शांति के लिए गोदान करना चाहिए या चांदी के बर्तन में गाय का दूध भरकर दान देना शुभ होगा. इन शांति उपायों के अतिरिक्त एक लाख गायत्री मंत्र का जाप करवाकर हवन कराना चाहिए तथा दशमांश तर्पण करना चाहिए और ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए, वस्त्रादि का दान अपनी सामर्थ्य अनुसार् करना चाहिए. इससे मातृ दोष की शांति होती है.
मातृ दोष की शांति के लिए पीपल के वृक्ष की 28 हजार परिक्रमा करने से भी लाभ मिलता है.
3. भ्रातृ दोष |
तृतीय भावेश मंगल यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में राहु के साथ पंचम भाव में हो तथा पंचमेश व लग्नेश दोनों ही अष्टम भाव में है तब भ्रातृ शाप के कारण संतान प्राप्ति बाधा तथा कष्ट का सामना करना पड़ता है.
भ्रातृ दोष के शांति उपाय |
भ्रातृ दोष की शांति के लिए श्रीसत्यनारायण का व्रत रखना चाहिए और सत्यनारायण भगवान की कथा कहनी या सुननी चाहिए तथा विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करके सभी को प्रसाद बांटना चाहिए.
4. सर्प दोष |
यदि पंचम भाव में राहु है और उस पर मंगल की दृष्टि हो या मंगल की राशि में राहु हो तब सर्प दोष की बाधा के कारण संतान प्राप्ति में व्यवधान आता है या संतान हानि होती है.
सर्प दोष के शांति उपाय |
सर्प दोष की शांति के लिए नारायण नागबली विधिपूर्वक करवानी चाहिए. इसके बाद ब्राह्मणों को अपनी सामर्थ्यानुसार भोजन कराना चाहिए, उन्हें वस्त्र, गाय दान, भूमि दान, तिल, चांदी या सोने का दान भी करना चाहिए. लेकिन एक बात ध्यान रखें कि जो भी करें वह अपनी यथाशक्ति अनुसार करें.
5. ब्राह्मण श्राप या दोष |
किसी व्यक्ति की कुंडली में यदि धनु या मीन में राहु स्थित है और पंचम भाव में गुरु, मंगल व शनि हैं और नवम भाव का स्वामी अष्टम भाव में है तब यह ब्राह्मण श्राप की कुंडली मानी जाती है और इस ब्राह्मण दोष के कारण ही संतान प्राप्ति में बाधा, सुख में कमी या संतान हानि होती है.
ब्राह्मण श्राप के शांति उपाय |
ब्राह्मण श्राप की शांति के लिए किसी मंदिर में या किसी सुपात्र ब्राह्मण को लक्ष्मी नारायण की मूर्तियों का दान करना चाहिए. व्यक्ति अपनी शक्ति अनुसार किसी कन्या का कन्यादान भी कर सकता है. बछड़े सहित गाय भी दान की जा सकती है. शैय्या दान की जा सकती है. सभी दान व्यक्ति को दक्षिणा सहित करने चाहिए. इससे शुभ फलों में वृद्धि होती है और ब्राह्मण श्राप या दोष से मुक्ति मिलती है.
6. मातुल श्राप |
यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में पांचवें भाव में मंगल, बुध, गुरु तथा राहु हो तब मामा के श्राप से संतान प्राप्ति में बाधा आती है.
मातुल श्राप के शांति उपाय |
मातुल श्राप से बचने के लिए किसी मंदिर में श्री विष्णु जी की प्रतिमा की स्थापना करानी चाहिए. लोगों की भलाई के लिए पुल, तालाब, नल या प्याउ आदि लगवाने से लाभ मिलता है और मातुल श्राप का प्रभाव कुछ कम होता है.
7. प्रेत श्राप |
किसी व्यक्ति की कुंडली में यदि पंचम भाव में शनि तथा सूर्य हों और सप्तम भाव में कमजोर चंद्रमा स्थित हो तथा लग्न में राहु, बारहवें भाव में गुरु हो तब प्रेत श्राप के कारण वंश बढ़ने में समस्या आती है.
यदि कोई व्यक्ति अपने दिवंगत पितरों और अपने माता-पिता का श्राद्ध कर्म ठीक से नहीं करता हो या अपने जीवित बुजुर्गों का सम्मान नहीं कर रह हो तब इसी प्रेत बाधा के कारण वंश वृद्धि में बाधाएँ आ सकती हैं.
प्रेत श्राप के शांति उपाय |
प्रेत शांति के लिए भगवान शिवजी का पूजन करवाने के बाद विधि-विधान से रुद्राभिषेक कराना चाहिए. ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र, फल, गोदान आदि उचित दक्षिणा सहित अपनी यथाशक्ति अनुसार देनी चाहिए. इससे प्रेत बाधा से राहत मिलती है.
गयाजी, हरिद्वार, प्रयाग आदि तीर्थ स्थानों पर स्नान तथा दानादि करने से लाभ और शुभ फलों की प्राप्ति होती है.
पितृ दोष के कारण कई व्यक्तियों को संतान प्राप्ति में बाधा
पितृ दोष के कारण कई व्यक्तियों को संतान प्राप्ति में बाधा तथा रुकावटों का सामना करना पड़ता है. इन बाधाओं के निवारण के लिए कुछ उपाय हैं जो निम्नलिखित हैं :-
1. यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य-राहु, सूर्य-शनि आदि योग के कारण पितृ दोष बन रहा है तब उसके लिए नारायण बलि, नाग बलि, गया में श्राद्ध, आश्विन कृष्ण पक्ष में पितरों का श्राद्ध, पितृ तर्पण, ब्राह्मण भोजन तथा दानादि करने से शांति प्राप्त होती है.
संतान प्राप्ति में व्यवधान
यदि पंचम भाव में राहु है और उस पर मंगल की दृष्टि हो या मंगल की राशि में राहु हो तब सर्प दोष की बाधा के कारण संतान प्राप्ति में व्यवधान आता है या संतान हानि होती है.
जन्म कुंडली का संतान भाव निर्बल सूर्य से पीड़ित होने के कारण संतान सुख की प्राप्ति में विलम्ब या बाधा हो तो हरिवंश पुराण का विधिवत श्रवण करके उसे दान करें |

जन्म कुंडली का संतान भाव निर्बल चन्द्र से पीड़ित होने के कारण संतान सुख की प्राप्ति में विलम्ब या बाधा हो तो रामेश्वर तीर्थ में स्नान करें ,एक लक्ष गायत्री मन्त्र का जाप कराएं तथा चांदी के पात्र में दूध भर कर दान दें |

जन्म कुंडली का संतान भाव निर्बल मंगल से पीड़ित होने के कारण संतान सुख की प्राप्ति में विलम्ब या बाधा हो तो भूमि दान करें ,प्रदोष व्रत करें |

जन्म कुंडली का संतान भाव निर्बल बुध से पीड़ित होने के कारण संतान सुख की प्राप्ति में विलम्ब या बाधा हो तो विष्णु सहस्रनाम का जाप करें |

जन्म कुंडली का संतान भाव निर्बल गुरु से पीड़ित होने के कारण संतान सुख की प्राप्ति में विलम्ब या बाधा हो तो गुरूवार को फलदार वृक्ष लगवाएं ,ब्राह्मण को स्वर्ण तथा वस्त्र का दान दें |

जन्म कुंडली का संतान भाव निर्बल शुक्र से पीड़ित होने के कारण संतान सुख की प्राप्ति में विलम्ब या बाधा हो तो गौ दान करें , आभूषणों से सज्जित लक्ष्मी -नारायण की मूर्ति दान करें |

जन्म कुंडली का संतान भाव निर्बल शनि से पीड़ित होने के कारण संतान सुख की प्राप्ति में विलम्ब या बाधा हो तो पीपल का वृक्ष लगाएं तथा उसकी पूजा करें ,रुद्राभिषेक करें और ब्रह्मा की मूर्ति दान करें |
संतान गोपाल स्तोत्र
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते
देहि में तनयं कृष्ण त्वामहम शरणम गतः |
उपरोक्त मन्त्र की १००० संख्या का जाप प्रतिदिन १०० दिन तक करें | तत्पश्चात १०००० मन्त्रों से हवन,१००० से तर्पण ,१०० से मार्जन तथा १० ब्राह्मणों को भोजन कराएं |
.संतान गणपति स्तोत्र

श्री गणपति की दूर्वा से पूजा करें तथा उपरोक्त स्तोत्र का प्रति दिन ११ या २१ की संख्या में पाठ करें |
. संतान कामेश्वरी प्रयोग
|
. पुत्र प्रद प्रदोष व्रत )
शुक्ल पक्ष की जिस त्रयोदशी को शनिवार हो उस दिन से साल भर यह प्रदोष व्रत करें |प्रातःस्नान करके पुत्र प्राप्ति हेतु व्रत का संकल्प करें | सूर्यास्त के समय शिवलिंग की भवाय भवनाशाय मजौ का सत्तू ,घी ,शक्कर का भोग लगाएं |न्त्र से पूजा करें | आठ दिशाओं में दीपक रख कर आठ -आठ बार प्रणाम करें | नंदी को जल व दूर्वा अर्पित करें तथा उसके सींग व पूंछ का स्पर्श करें | अंत में शिव पार्वती की आरती पूजन करें |
. पुत्र व्रत ( वराह पुराण )
भाद्रपद कृष्ण सप्तमी को उपवास करके विष्णु का पूजन करें | अगले दिन ओम् क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपी जन वल्लभाय स्वाहा मन्त्र से तिलों की १०८ आहुति दे कर ब्राह्मण भोजन कराएं | बिल्व फल खा कर षडरस भोजन करें | वर्ष भर प्रत्येक मास की सप्तमी को इसी प्रकार व्रत रखने से पुत्र प्राप्ति होगी |
गर्भ मास के अधिपति ग्रह व उनका दान
गर्भाधान से नवें महीने तक प्रत्येक मास के अधिपति ग्रह के पदार्थों का उनके वार में दान करने से गर्भ क्षय का भय नहीं रहता | गर्भ मास के अधिपति ग्रह व उनके दान निम्नलिखित हैं ——
प्रथम मास — – शुक्र (चावल ,चीनी ,गेहूं का आटा ,दूध ,दही ,चांदी ,श्वेत वस्त्र व दक्षिणा शुक्रवार को )
द्वितीय मास -
तृतीय मास — – गुरु ( पीला वस्त्र ,हल्दी ,स्वर्ण , पपीता ,चने कि दाल , बेसन व दक्षिणा गुरूवार को )
चतुर्थ मास -
पंचम मास —- चन्द्र (चावल ,चीनी ,गेहूं का आटा ,दूध ,दही ,चांदी ,श्वेत वस्त्र व दक्षिणा सोमवार को )
षष्ट मास -
सप्तम मास —– बुध ( हरा वस्त्र ,मूंग ,कांसे का पात्र ,हरी सब्जियां व दक्षिणा बुधवार को )
अष्टम मास —- गर्भाधान कालिक लग्नेश ग्रह से सम्बंधित दान उसके वार में |यदि पता न हो तो अन्न ,वस्त्र व फल का दान अष्टम मास लगते ही नकार दें |
नवं मास —- चन्द्र (चावल ,चीनी ,गेहूं का आटा ,दूध ,दही ,चांदी ,श्वेत वस्त्र व दक्षिणा सोमवार को )

********पित्र दोष निवारण के कुछ खास उपाय****************
1. याद रखे घर के सभी बड़े बुजर्ग को हमेशा प्रेम, सम्मान, और पूर्ण अधिकार दिया जाय , घर के महत्वपूर्ण मसलों पर उनसे सलाह मशविरा करते हुए उनकी राय का भी पूर्ण आदर किया जाय ,प्रतिदिन उनका अभिवादन करते हुए उनका आशीर्वाद लेने, उन्हे पूर्ण रूप से प्रसन्न एवं संतुष्ट रखने से भी निश्चित रूप से पित्र दोष में लाभ मिलता है ।
2.अपने ज्ञात अज्ञात पूर्वजो के प्रति ईश्वर उपासना के बाद उनके प्रति कृतज्ञता का भाव रखने उनसे अपनी जाने अनजाने में की गयी भूलों की क्षमा माँगने से भी पित्र प्रसन्न होते है ।
3. सोमवती अमावस्या को दूध की खीर बना, पितरों को अर्पित करने से भी इस दोष में कमी होती है ।
4. सोमवती अमावस्या के दिन यदि कोई व्यक्ति पीपल के पेड़ पर मीठा जल मिष्ठान एवं जनेऊ अर्पित करते हुये “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाएं नमः” मंत्र का जाप करते हुए कम से कम सात या 108 परिक्रमा करे तत्पश्चात् अपने अपराधों एवं त्रुटियों के लिये क्षमा मांगे तो पितृ दोष से उत्पन्न समस्त समस्याओं का निवारण हो जाता है।
5.प्रत्येक अमावस्या को गाय को पांच फल भी खिलाने चाहिए।
6. अमावस्या को बबूल के पेड़ पर संध्या के समय भोजन रखने से भी पित्तर प्रसन्न होते है।
7. प्रत्येक अमावस्या को एक ब्राह्मण को भोजन कराने व दक्षिणा वस्त्र भेंट करने से पितृ दोष कम होता है ।
8. पितृ दोष से पीड़ित व्यक्ति को प्रतिदिन शिव लिंग पर जल चढ़ाकर महामृत्यूंजय का जाप करना चाहिए ।
9. माँ काली की नियमित उपासना से भी पितृ दोष में लाभ मिलता है।
10. आप चाहे किसी भी धर्म को मानते हो घर में भोजन बनने पर सर्वप्रथम पित्तरों के नाम की खाने की थाली निकालकर गाय को खिलाने से उस घर पर पित्तरों का सदैव आशीर्वाद रहता है घर के मुखियां को भी चाहिए कि वह भी अपनी थाली से पहला ग्रास पित्तरों को नमन करते हुये कौओं के लिये अलग निकालकर उसे खिला दे।
11. पितरों के निमित घर में दीपक, अगरबत्ती को प्रात:काल पूजा के समय ऊँ पितृय नम: कम से कम 21 बार उच्चारण करें।
12. पशु-पक्षियों को खाना खिलायें।
13. श्री मद भागवत गीता का ग्यारहवां अध्याय का पाठ करें।
14.पित्र पक्ष अथवा अमावस्या के दिन पितरों को ध्यान करके सामर्थ्यनुसार ब्राह्मण पूजन के बाद गरीबों को दान करने से पितर खुश होते हैं। ब्राह्मण के माध्यम से पितृपक्ष में दिये हुऐ दान-पुण्य का फल दिवंगत पितरों की आत्मा की शांति के लिए किया जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार आज के दिन पिंडदान, तिलांजली और ब्राह्मणों को पूर्ण श्रद्धा से भोजन कराने से जीवन में सभी सांसारिक सुख और भोग प्राप्त होता है।
15. हिन्दु मान्यता के अनुसार मृत्यु के बाद भी स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। इसके लिए प्रसनचित होकर हव्य से देवताओं का, कव्य से पितृगणों का तथा अन्न द्वारा बंधुओं का भंडारा करें। इससे परिवार एवं सगे-सम्बन्धियों, मित्रों को भी विशेष फल की प्राप्ति होती है। इसके फलस्वरूप परिवार में अशान्ति, वंश वृद्घि में रुकावट, आकस्मिक बीमारी, धन से बरकत न होना, सभी भौतिक सुखों के होते हुए भी मन असंतुष्ट रहना आदि परेशानियों से मुक्ति मिल सकती है।
16. शनिवार के दिन पीपल की जड़ में गंगा जल, कला तिल चढाये । पीपल और बरगद के वृ्क्ष की पूजा करने से पितृ दोष की शान्ति होती है ।
17. याद रखिए पूर्वजो के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करने उन्हे पूर्ण रूप से संतुष्ट करने उनको प्रसन्न रखने वाले व्यक्ति पर हमेशा दैवी कृपा बनी रहती है….उसके कार्यों में कोई भी अवरोध नही होता है ..उसकी सर्वत्र जयजयकार होती है ।
18. “ओम् नमो भगवते वासुदेवाय” की एक माला का नित्य जाप करें ।
19. जब भी किसी तीर्थ पर जाएं तो अपने पितरों के लिए तीन बार अंजलि में जल से उनका तर्पण अवश्य ही करें ।
20. पितृपक्ष मे अपने पितरों की याद मे वृक्ष, विशेषकर पीपल लगाकर, उसकी पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने से भी पितृदोष समाप्त होता है ।

*****कई बार यह भी देखने में आया है कि जन्म कुंडली में कोई दोष नहीं होता है फिर भी जातक मुश्किलों में घिरा रहता है। तो इसके लिए उसे अपने परिवार की पृष्ठभूमि पर विचार करना चाहिए।
क्या उनके परिवार में उनके पूर्वजों का विधिवत श्राद्ध किया जाता है। क्या उसके
पूर्वजों को कहीं से मुफ्त का धन तो नहीं मिला। कुछ लोग श्राद्ध करने की बजाय
मजबूरों को भोजन करवाना अधिक उचित समझते हैं। उनका तर्क होता है कि ब्राह्मणों की बजाय ये लोग ज्यादा आशीर्वाद देंगे। यह बात सही है कि किसी भी भूखे को भोजन करवाएंगे तो वह आशीर्वाद देगा ही। तो आशीर्वाद के लिए जरुर भोजन करवाएं। लेकिन श्राद्ध कर्म तो एक ब्राह्मण ही कर सकता है और तभी पूर्वजों का आशीर्वाद भी मिलेगा। यह श्राद्ध करने वाले को यह ध्यान रखना चाहिए कि वह सुपात्र को ही आमंत्रित करे। मंदिर का पुजारी हो तो अधिक उचित रहेगा नहीं तो कोई भी कर्मकांडी या जनेउ धारी ब्राह्मण होना चाहिए।शास्त्रों के अनुसार ब्राहमण भोजन से ही पित्र तृप्त होते हैं |इसके कई कारण होते हैं |ब्राहण संतुष्टि और आशीर्वाद के रूप में ही पित्र कृपा प्राप्त होती है |हर व्यक्ति की अपनी निश्चित क्षमताएं और संस्कार होते है और पित्र ब्राह्मण से ही अपना अंश पाते हैं |
मुफ्त का धन जिसे कोई निसन्तान व्यक्ति अपनी जायदाद विरासत में दे जाता है
या ससुराल से मिला धन। मैं यहाँ उस धन की बात नहीं हो रही जो किसी स्त्री को उसके विवाह में मिला है। यहाँ मैं कहना चाहूँगा की यह वो धन है जो ससुराल में स्त्री के पिता की मृत्यु के बाद मिला है जबकि उसके भाई ना हो। ऐसी स्थिति में धन का उपभोग तो हो रहा है लेकिन जिसके धन का उपभोग हो रहा है उसके नाम का कोई भी दान – पुन्य नहीं किया जा रहा।
हमारे समाज में वंश परम्परा चलती है इसी के सिलसिले में पुत्र का जन्म अनिवार्य
माना गया है। अगर पुत्र ना हो तो उसकी विरासत पुत्रियों में बाँट दी जाती है। जैसे की समाज का चलन है तो विचार भी यही हैं कि अगर पुत्र नहीं होगा तो उसका कमाया धन लोग ही खायेंगे। उनका नाम लेने वाला कोई नहीं होगा , आदि -आदि।
जब ऐसे इन्सान के धन का उपभोग किया जाये और उसके नाम को भी याद ना किया जाये तो घर में अशांति तो होगी ही। एक अशांत आत्मा किसी को खुश रहने का आशीर्वाद कैसे दे सकती है। ऐसी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध तो करना ही चाहिए। साथ ही वर्ष में एक बार उसके नाम का कोई दान कर देना चाहिए। जैसे
किसी जरूरत मंद कन्या का विवाह , कहीं पानी की व्यवस्था , या किसी बच्चे की स्कूल की फीस आदि कुछ न कुछ धन राशि जरुर उसके नाम की निकालनी चाहिए।
जब किसी को परिवार से ही जैसे ताऊ या चाचा जो कि या निसन्तान हो या अविवाहित हो। अथवा असमय अकाल मौत हुई हो और उनका कोई वारिस ना हो तो ऐसे धन का उपभोग भी परिवार में अशांति लाता है। अक्सर देखा गया है कि ऐसे धन को उपभोग वाले की सबसे छोटी संतान अधिक संताप भोगती है। ‘ऐसे में फिर क्या किया जाए ?’ यहाँ भी जिसका भी धन उपभोग किया जा रहा है उसका विधिवत श्राद्ध और उसके नाम से कुछ धन राशी का दान किया जाये तो शांति बनी रह सकती है।
कई बार परिवार के कुल देवता का अनादर भी परिवार में अशांति का कारण बनती है। ये जो कुल देवता या पितृ होते हैं , वे हमारे और ईश्वर के मध्य संदेशवाहक का कार्य हैं। यदि ये प्रसन्न होंगे तो ईश्वर की कृपा जल्दी प्राप्त होती है। कई बार कोई व्यक्ति किसी निसंतान दम्पति द्वारा गोद लिया जाता है। ऐसे में उसे , वह जिस परिवार में जन्मा है , उस परिवार के कुल देवताओं की पूजा भी करने पड़ती है। क्यूंकि उसमें उस परिवार का (जहाँ जन्म लिया है उसने ) भी ऋण चुकाना होता है। जहाँ वह रहता है वहां के कुल देवता की भी पूजा करनी होती है उसे। तभी उसके
जीवन में शांति बनी रहती है।
वह पित्र सब से ज्यादा परेशान करते है जो कुवरें होते है । कम उम्र में मरते है , जिनके संतान नहीं होती | कई मामलों में इनके द्वारा बच्चो को भी परेशान करते देखा गया है । कुछ परिवारों में देखा जाता है की परिवार के किसी सदस्य की घर से बाहर मृत्यु हुई हो । दुर्घटना में मारा हो |ऐसे व्यक्ति मरने के बाद परिवार को पीड़ित करते है । जिस में कुवरें पुरुष अत्यधिक परेशान करते देखे गये है ।
ये लोग परिवार से कुछ उम्मीद करते है पर ये बोलते कम है । उनका इलाज कठिन होता है । ऐसा ही होता है जब परिवार की कोई विवाहिता आकस्मिक अथवा जलने आदि से मृत्यु को प्राप्त हुई हो ,वह अन्य विवाहिताओं को अथवा कुवांरियों को परेशान करती है ,मांगलिक कार्यों में बाधा उत्पन्न करती है | इनका इलाज़ विशेष युक्तियों से किया जाता है ।
एक बार पित्र संतुष्ट हो जाएँ ,सहयोगी हो जाएँ तो परिवार की उन्नति सुरक्षा आदि करते है । घर में खुशहली बनी रहती है ।इसीलिए प्रत्येक हिन्दू परिवार में प्रतिवर्ष पित्र पक्ष में पितरों के श्राद्ध आदि की व्यवस्था है |यह हमारे द्वारा किया गया श्राद्ध हमारे पितरों को प्राप्त होता है और वह संतुष्ट हो हमें आशीर्वाद देते हैं ,भले ही वह किसी योनी में हों |पितरों को जो अन्न या खाद्य दिया जाता है वह विश्वेदेवा आदि देवों द्वारा हमारे पितरों तक पहुंचा दिया जाता है ,वह जिस योनी में होते हैं उसके अनुकूल पदार्थ के रूप में |यह कुछ वैसा ही होता है ,जैसे हम अमेरिका में बैठे अपने किसी रिश्तेदार को यहाँ से रूपये भेजें और उसे वह वहां की मुद्रा डालर के रूप में मिले |जो पित्र असंतुष्ट होते हैं, अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए होते हैं उनके लिए अलग से विशेष प्रयास की जरुरत होती है |

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