1966849_527018904085538_245681763_n

**********मंगल दोष कारण और निवारण*********************
जिस जातक की जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली आदि में मंगल ग्रह, लग्न से लग्न में (प्रथम), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भावों में से कहीं भी स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहते हैं।
गोलिया मंगल ‘पगड़ी मंगल’ तथा चुनड़ी मंगल : जिस जातक की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं पर भी मंगल स्थित हो उसके साथ शनि, सूर्य, राहु पाप ग्रह बैठे हों तो व पुरुष गोलिया मंगल, स्त्री जातक चुनड़ी मंगल हो जाती है अर्थात द्विगुणी मंगली इसी को माना जाता है।
मांगलिक कुंडली का मिलान : वर, कन्या दोनों की कुंडली ही मांगलिक हों तो विवाह शुभ और दाम्पत्य जीवन आनंदमय रहता है। एक सादी एवं एक कुंडली मांगलिक नहीं होना चाहिए।
मंगल-दोष निवारण : मांगलिक कुंडली के सामने मंगल वाले स्थान को छोड़कर दूसरे स्थानों में पाप ग्रह हों तो दोष भंग हो जाता है। उसे फिर मंगली दोष रहित माना जाता है तथा केंद्र में चंद्रमा 1, 4, 7, 10वें भाव में हो तो मंगली दोष दूर हो जाता है। शुभ ग्रह एक भी यदि केंद्र में हो तो सर्वारिष्ट भंग योग बना देता है।
शास्त्रकारों का मत ही इसका निर्णय करता है कि जहां तक हो मांगलिक से मांगलिक का संबंध करें। ‍िफर भी मांगलिक एवं अमांगलिक पत्रिका हो, दोनों परिवार पूर्ण संतुष्ट हों अपने पारिवारिक संबंध के कारण तो भी यह संबंध श्रेष्ठ नहीं है, ऐसा नहीं करना चाहिए।
ऐसे में अन्य कई कुयोग हैं। जैसे वैधव्य विषागना आदि दोषों को दूर रखें। यदि ऐसी स्थिति हो तो ‘पीपल’ विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके कन्या का संबंध अच्छे ग्रह योग वाले वर के साथ करें।
गल यंत्र विशेष परिस्थिति में ही प्रयोग करें। देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्या‍दि में ही इसे प्रयोग करें। छोटे कार्य के लिए नहीं।
विशेष : विशेषकर जो मांगलिक हैं उन्हें इसकी पूजा अवश्य करना चाहिए। चाहे मांगलिक दोष भंग आपकी कुंडली में क्यों न हो गया हो फिर भी मंगल यंत्र मांगलिकों को सर्वत्र जय, सुख, विजय और आनंद देता है।
मांगलिक-दोष दूर करते हैं मंगल के 21 नाम। निम्न 21 नामों से मंगल की पूजा करें।
1. ऊँ मंगलाय नम:
2. ऊँ भूमि पुत्राय नम:
3. ऊँ ऋण हर्वे नम:
4. ऊँ धनदाय नम:
5. ऊँ सिद्ध मंगलाय नम:
6. ऊँ महाकाय नम:
7. ऊँ सर्वकर्म विरोधकाय नम:
8. ऊँ लोहिताय नम:
9. ऊँ लोहितगाय नम:
10. ऊँ सुहागानां कृपा कराय नम:
11. ऊँ धरात्मजाय नम:
12. ऊँ कुजाय नम:
13. ऊँ रक्ताय नम:
14. ऊँ भूमि पुत्राय नम:
15. ऊँ भूमिदाय नम:
16. ऊँ अंगारकाय नम:
17. ऊँ यमाय नम:
18. ऊँ सर्वरोग्य प्रहारिण नम:
19. ऊँ सृष्टिकर्त्रे नम:
20. ऊँ प्रहर्त्रे नम:
21. ऊँ सर्वकाम फलदाय नम:
विशेष: किसी ज्योतिषी से चर्चा करके ही पूजन करना चाहिए। मंगल की पूजा का विशेष महत्व होता है। अपूर्ण या कुछ जरूरी पदार्थों के बिना की गई पूजा प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है।
*********मंगली – दोष और उसका परिहार********************
मंगली , शब्द सुनते ही वर – कन्या के अभिभावक सर्तक हो जाते है। विवाह – सम्बंधों के लिए मंगलीक शब्द एक प्रकार से भय तथा अमंगल का सूचक बन गया है। परन्तू प्रत्येक मंगली जातक विवाह के अयोग्य नहीं होता। सामान्यतः मंगलीक दिखाई पडने वाली जन्म कुण्डलिया भी ग्रहों की स्थिति तथा दृष्टि के कारण दोष – रहित हो जाती है। यहां मंगली – दोष विचार तथा मंगली दोष परिहार विषयक आवश्यक जानकारियां प्रस्तुत की जा रहीं है।
मंगली – दोष विचारः- यदि जातक की जन्मकण्डली में लग्न (प्रथम भाव) , व्यय (द्वादश भाव), पाताल(चतुर्थ भाव), जामित्र (सप्तम भाव ) , तथा अष्टम भाव (1/12/4/7/8) में मंगल बैठा हो तो कन्या अपने पति के लिए तथा पति के लिए तथा पति कन्या के लिए घातक होता है इसे मंगली दोष कहते है।
यदि वर की जन्म कुण्डली में धन (द्वितीय) , सुत(पंचम), सप्तम, मृत्यू (अष्टम) अथवा व्यय (द्वादश ), भाव (2/5/7/8/12) में मंगल बैठा हो तो वह उसकी स्त्री का नाष करता है और यदि स्त्री की जन्मकुण्डली के इन्हीं में सेे किसी भाव में मंगल बैठा हो तो वह विधवा होती है। मंगल की ऐसी स्थिति वाले वर – कन्या का विवाह वर्जित है। आचार्या ने एकादश भाव स्थित मंगल को भी अशुभ माना है।
म्ंगलीदोष परिहारः- जन्मकुण्डली के प्रथम , द्वितीय , चतुर्थ , सप्तम, अष्टम , एकादश् तथा द्वादश् – इनमें से किसी भी भाव में मंगल बैठा हो तो वह वर – वधू का विघटन कराता है परन्तु इन भावों में बैठा हुआ मंगल यदि स्वक्षेत्री हो तो दोषकारक नहीं होता।
यदि जन्मकुण्डली के प्रथम भाव (लग्न) में मंगल मेष राषि का हो , द्वादश भाव में धनु राषि का हो चतुर्थ भाव में वृच्श्रिक राशि का हो सप्तम भाव में मीन राशि का हो तथा अष्टम भाव में कुम्भ को हो तो मंगली दोष नहीं लगता।
यदि जन्मकुण्डली के सप्तम , लग्न (प्रथम ) , चतुर्थ , अष्टम अथवा द्वादश भाव में शनि बैठा हो तो मंगली दोष नहीं रहता अर्थात पहले वर्णन किए गये मंगली दोष वाले भावों – 1/2/4/7/8/11/12 में मंगल के साथ ही यदि बृहस्पति अथवा चन्द्रमा भी बैठा हो अथवा इन भावों में मंगल बैठा हो परन्तु केन्द्र अर्थात 1/4/7/10 भावों में चन्द्रमा बैठा हो तो मंगली – दोष दूर हो जाता है।
केन्द्र और त्रिकोण भावों में यदि शुभग्रह हो तथा तृतीय , षष्ठ एवं एकादष भावों में पापग्रह हो तथा सप्तमभाव का स्वामी सप्तम भाव में बैठा हो तो मंगली दोष नहीं लगता ।
वर तथा कन्या दोनों की जन्मकुण्डली में यदि मंगल शनि अथवा कोई अन्य पापग्रह एक जैसी स्थिति में बैठे हों तो मंगली दोष नष्ट हो जाता है।
यदि वर – कन्या दोनो की जन्मकुण्डली के समान भावों में मंगल अथवा वैसे ही कोई पापग्रह बैठे हो तो मंगली- दोष नहीं लगता। ऐसा विवाह शुभप्रद ,दीर्घायुष्य देने वाला तथा पुत्र – पौत्रदायक होता है।
यदि अनिष्ठ भावस्थ मंगल वक्री , नीच – राशिस्थ (कर्क का) अथवा शुत्रक्षेत्री (मिथुन अथवा कन्या राषि का ) अथवा अस्तंगत हो तो वह अनिष्ट – कारक नहीं होता।
जन्मकुण्डली में मंगल यदि द्वितीय भाव में मिथुन अथवा कन्या राशि का हो द्वादष भाव में वृष अथवा कर्क राशि का हो चतुर्थभाव में में मेष अथवा वृच्श्रिक राशि का हो सप्तम भाव में मकर अथवा कर्क राशि का हो एवं अष्टम भाव में धनु अथवा मीन राशि का हो , इनके अतिरिक्त किसी भी अनिष्ट – स्थान में कुम्भ अथवा सिंह राशि का हो तो ऐसे में मंगल का दोष नहीं लगता।
जिसकी जन्मकुण्डली के पंचम, चतुर्थ ,सप्तम , अष्टम अथवा द्वादश स्थान में मंगल बैठा हो उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिए , परन्तु यदि वह मंगल , बुध और गुरू से युक्त हो अथवा इन ग्रहों के द्वारा दृष्ट हो तो दोष का परिहार हो जाता है।
शुभ ग्रहों से संबंधित मंगल अशुभकारक नहीं होता । कर्क लग्न में स्थित मंगल कभी भी दोषी नहीं होता। यदि मंगल अपनी नीच – राशि अथवा राशि शुत्र राशि (3/6) का हो अथवा अस्तंगत हो तो वह शुभ – अशुभ कोई फल नहीं देता।
मंगली – दोष वाली कन्या मंगली – दोष वाले वर को देने से मंगली – दोष नहीं लगता तथा कोई अनिष्ट भी नहीं होता। ऐसा संबंध दाम्पत्य – सुख की वृध्दि भी करता है।
यदि वर -कन्या दोनों की जन्मकुण्डली में लग्र, चंद्रमा अथवा शुक्र से प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ ,सप्तम , अष्टम एवं द्वादष – इन छः स्थानों में से किसी भी एक भाव में मंगल एक जैसी स्थिति में बैठा हो (अर्थात वर की कुण्डली में जहां बैठा हो , वधू की कुण्डली में भी उसी जगह पर बैठा हो) तो मंगल दोष नहीं रहता तथा ऐसे स्त्री – पुरूष का दाम्पत्य- जीवन चिरस्थायी होता है , साथ ही धन धान्य पुत्र – पौत्रादि की अभिवृध्दि भी होती है। परन्तु वर कन्या में से केवल किसी एक की जन्मकुण्डली में ही उक्त प्रकार का मंगल बैठा हो (दूसरे की न हो ) तो उसका सर्वथा विपरीत -फल समझाना चाहिए अर्थात वह स्थिति दोषपूर्ण होगी । यदि मंगल अशुभ भावों में स्थित हो तो विवाह नहीं करना चाहिए , पंरतु यदि बहुत गुण मिलते हो तो तथा वर – कन्या दोनों ही मंगली हो तो विवाह करना शुभ रहता है। क्या करें जब कुंडली में हो मंगल दोष जिस जातक की जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली आदि में मंगल ग्रह, लग्न से लग्न में (प्रथम), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भावों में से कहीं भी स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहते हैं।

गोलिया मंगल ‘पगड़ी मंगल’ तथा चुनड़ी मंगल : जिस जातक की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं पर भी मंगल स्थित हो उसके साथ शनि, सूर्य, राहु पाप ग्रह बैठे हों तो व पुरुष गोलिया मंगल, स्त्री जातक चुनड़ी मंगल हो जाती है अर्थात द्विगुणी मंगली इसी को माना जाता है।

मांगलिक कुंडली का मिलान : वर, कन्या दोनों की कुंडली ही मांगलिक हों तो विवाह शुभ और दाम्पत्य जीवन आनंदमय रहता है। एक सादी एवं एक कुंडली मांगलिक नहीं होना चाहिए।

मंगल-दोष निवारण : मांगलिक कुंडली के सामने मंगल वाले स्थान को छोड़कर दूसरे स्थानों में पाप ग्रह हों तो दोष भंग हो जाता है। उसे फिर मंगली दोष रहित माना जाता है तथा केंद्र में चंद्रमा 1, 4, 7, 10वें भाव में हो तो मंगली दोष दूर हो जाता है। शुभ ग्रह एक भी यदि केंद्र में हो तो सर्वारिष्ट भंग योग बना देता है।

शास्त्रकारों का मत ही इसका निर्णय करता है कि जहां तक हो मांगलिक से मांगलिक का संबंध करें। ‍िफर भी मांगलिक एवं अमांगलिक पत्रिका हो, दोनों परिवार पूर्ण संतुष्ट हों अपने पारिवारिक संबंध के कारण तो भी यह संबंध श्रेष्ठ नहीं है, ऐसा नहीं करना चाहिए।

ऐसे में अन्य कई कुयोग हैं। जैसे वैधव्य विषागना आदि दोषों को दूर रखें। यदि ऐसी स्थिति हो तो ‘पीपल’ विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके कन्या का संबंध अच्छे ग्रह योग वाले वर के साथ करें।

मंगल यंत्र विशेष परिस्थिति में ही प्रयोग करें। देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्या‍दि में ही इसे प्रयोग करें। छोटे कार्य के लिए नहीं।
विशेष : विशेषकर जो मांगलिक हैं उन्हें इसकी पूजा अवश्य करना चाहिए। चाहे मांगलिक दोष भंग आपकी कुंडली में क्यों न हो गया हो फिर भी मंगल यंत्र मांगलिकों को सर्वत्र जय, सुख, विजय और आनंद देता है।
मंगल बाकि ग्रहों की भांति कुण्डली के बारह भावों में से किसी एक भाव में स्थित होता है। बारह भावों में से कुछ भाव ऐसे हैं जहां मंगल की स्थिति को मंगलीक दोष के रुप में लिया जाता है।
कुण्डली में जब लग्न भाव, चतुर्थ भाव, सप्तम भाव, अष्टम भाव और द्वादश भाव में मंगल स्थित होता है तब कुण्डली में मंगल दोष माना जाता है। सप्तम भाव से हम दाम्पत्य जीवन का विचार करते हैं। अष्टम भाव से दाम्पत्य जीवन के मांगलीक सुख को देखा जाता है। मंगल लग्न में स्थित होने से सप्तम भाव और अष्टम भाव दोनों भावों को दृष्टि देता है। चतुर्थ भाव में मंगल के स्थित होने से सप्तम भाव पर मंगल की चतुर्थ पूर्ण दृष्टि पड़ती है। द्वादश भाव में यदि मंगल स्थित है तब अष्टम दृष्टि से सप्तम भाव को देखता है।
इसके अतिरिक्त सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए हम पांच बातों का विचार करते हैं -
स्वास्थ्य
भौतिक सम्पदा
दाम्पत्य सुख,
अनिष्ट का प्रभाव,
जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अच्छी क्रय शक्ति.
ज्योतिष में इन पांचों बातों का प्रतिनिधित्व लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भाव करते हैं। इसीलिए इन पांचों भावों में मंगल की स्थिति को मंगलीक दोष का नाम दिया गया है।
मंगल दोष विचार तथा मंगली दोष परिहार
मंगली दोष विचारः- यदि जातक की जन्मकण्डली में लग्न (प्रथम भाव) , व्यय (द्वादश भाव), पाताल(चतुर्थ भाव), जामित्र (सप्तम भाव ) , तथा अष्टम भाव (1/12/4/7/8) में मंगल बैठा हो तो कन्या अपने पति के लिए तथा पति के लिए तथा पति कन्या के लिए घातक होता है इसे मंगली दोष कहते है.
यदि वर की जन्म कुण्डली में धन (द्वितीय) , सुत(पंचम), सप्तम, मृत्यू (अष्टम) अथवा व्यय (द्वादश ), भाव (2/5/7/8/12) में मंगल बैठा हो तो वह उसकी स्त्री का नाष करता है और यदि स्त्री की जन्मकुण्डली के इन्हीं में से किसी भाव में मंगल बैठा हो तो वह विधवा होती है. मंगल की ऐसी स्थिति वाले वर कन्या का विवाह वर्जित है. आचार्या ने एकादश भाव स्थित मंगल को भी अशुभ माना है.
म्ंगलीदोष परिहारः
1 . जन्मकुण्डली के प्रथम , द्वितीय , चतुर्थ , सप्तम, अष्टम , एकादश् तथा द्वादश् इनमें से किसी भी भाव में मंगल बैठा हो तो वह वर वधू का विघटन कराता है परन्तु इन भावों में बैठा हुआ मंगल यदि स्वक्षेत्री हो तो दोषकारक नहीं होता.
2 .यदि जन्मकुण्डली के प्रथम भाव (लग्न) में मंगल मेष राषि का हो , द्वादश भाव में धनु राषि का हो चतुर्थ भाव में वृच्श्रिक राशि का हो सप्तम भाव में मीन राशि का हो तथा अष्टम भाव में कुम्भ को हो तो मंगली दोष नहीं लगता.
3 .यदि जन्मकुण्डली के सप्तम , लग्न (प्रथम ) , चतुर्थ , अष्टम अथवा द्वादश भाव में शनि बैठा हो तो मंगली दोष नहीं रहता अर्थात पहले वर्णन किए गये मंगली दोष वाले भावों – 1/2/4/7/8/11/12 में मंगल के साथ ही यदि बृहस्पति अथवा चन्द्रमा भी बैठा हो अथवा इन भावों में मंगल बैठा हो परन्तु केन्द्र अर्थात 1/4/7/10 भावों में चन्द्रमा बैठा हो तो मंगली – दोष दूर हो जाता है.
4 .केन्द्र और त्रिकोण भावों में यदि शुभग्रह हो तथा तृतीय , षष्ठ एवं एकादष भावों में पापग्रह हो तथा सप्तमभाव का स्वामी सप्तम भाव में बैठा हो तो मंगली दोष नहीं लगता .
वर तथा कन्या दोनों की जन्मकुण्डली में यदि मंगल शनि अथवा कोई अन्य पापग्रह एक जैसी स्थिति में बैठे हों तो मंगली दोष नष्ट हो जाता है.
5 .यदि वर कन्या दोनो की जन्मकुण्डली के समान भावों में मंगल अथवा वैसे ही कोई पापग्रह बैठे हो तो मंगली दोष नहीं लगता. ऐसा विवाह शुभप्रद ,दीर्घायुष्य देने वाला तथा पुत्र पौत्रदायक होता है.
6 .यदि अनिष्ठ भावस्थ मंगल वक्री , नीच राशिस्थ (कर्क का) अथवा शुत्रक्षेत्री (मिथुन अथवा कन्या राषि का ) अथवा अस्तंगत हो तो वह अनिष्ट कारक नहीं होता.
7 .जन्मकुण्डली में मंगल यदि द्वितीय भाव में मिथुन अथवा कन्या राशि का हो द्वादष भाव में वृष अथवा कर्क राशि का हो चतुर्थभाव में में मेष अथवा वृच्श्रिक राशि का हो सप्तम भाव में मकर अथवा कर्क राशि का हो एवं अष्टम भाव में धनु अथवा मीन राशि का हो , इनके अतिरिक्त किसी भी अनिष्ट स्थान में कुम्भ अथवा सिंह राशि का हो तो ऐसे में मंगल का दोष नहीं लगता.
8 .जिसकी जन्मकुण्डली के पंचम, चतुर्थ ,सप्तम , अष्टम अथवा द्वादश स्थान में मंगल बैठा हो उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिए , परन्तु यदि वह मंगल , बुध और गुरू से युक्त हो अथवा इन ग्रहों के द्वारा दृष्ट हो तो दोष का परिहार हो जाता है.
9 .शुभ ग्रहों से संबंधित मंगल अशुभकारक नहीं होता . कर्क लग्न में स्थित मंगल कभी भी दोषी नहीं होता. यदि मंगल अपनी नीच राशि अथवा राशि शुत्र राशि (3/6) का हो अथवा अस्तंगत हो तो वह शुभ अशुभ कोई फल नहीं देता.
11 .मंगली दोष वाली कन्या मंगली दोष वाले वर को देने से मंगली दोष नहीं लगता तथा कोई अनिष्ट भी नहीं होता. ऐसा संबंध दाम्पत्य सुख की वृध्दि भी करता है.
12 .यदि वर कन्या दोनों की जन्मकुण्डली में लग्र, चंद्रमा अथवा शुक्र से प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ ,सप्तम , अष्टम एवं द्वादष इन छः स्थानों में से किसी भी एक भाव में मंगल एक जैसी स्थिति में बैठा हो (अर्थात वर की कुण्डली में जहां बैठा हो , वधू की कुण्डली में भी उसी जगह पर बैठा हो) तो मंगल दोष नहीं रहता तथा ऐसे स्त्री पुरूष का दाम्पत्य- जीवन चिरस्थायी होता है , साथ ही धन धान्य पुत्र पौत्रादि की अभिवृध्दि भी होती है. परन्तु वर कन्या मं् से केवल किसी एक की जन्मकुण्डली में ही उक्त प्रकार का मंगल बैठा हो (दूसरे की न हो ) तो उसका सर्वथा विपरीत -फल समझाना चाहिए अर्थात वह स्थिति दोषपूर्ण होगी . यदि मंगल अशुभ भावों में स्थित हो तो विवाह नहीं करना चाहिए , पंरतु यदि बहुत गुण मिलते हो तो तथा वर – कन्या दोनों ही मंगली हो तो विवाह करना शुभ रहता है.
13 .कन्या की कुण्डली में मंगल दोष है और वर की कुण्डली में उसी स्थान पर शनि हो तो मंगल दोष का परिहार स्वयंमेव हो जाता है.
14 . यदि जन्मांग में मंगल दोष हो किन्तु शनि मंगल पर दृष्टिपात करे तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है.
15. मकर लग्न में मकर राशि का मंगल व सप्तम स्थान में कर्क राशि का चंद्र हो तो मंगल दोष नहीं रहता है.
16 . कर्क व सिंह लग्न में भी लग्नस्थ मंगल केन्द्र व त्रिकोण का अधिपति होने से राजयोग देता है, जिससे मंगल दोष निरस्त होता है.
17 . लग्न में बुध व शुक्र हो तो मंगल दोष निरस्त होता है.
18 . मंगल अनिष्ट स्थान में है और उसका अधिपति केद्र व त्रिकोण में हो तो मंगल दोष समाप्त होता है.
19 . आयु के 28वें वर्ष के पश्चात मंगल दोष क्षीण हो जाता है. ऐसा कहा जाता है किन्तु अनुभव में आया है कि मंगल अपना कुप्रभाव प्रकट करता ही है.
20 . आचार्यों ने मंगल-राहु की युति को भी मंगल दोष का परिहार बताया है.
21 . कुछ ज्योतिर्विद कहते हैं कि मंगल गुरु से युत या दृष्ट हो तो मंगल दोष समाप्त हो जाता है किन्तु आधुनिक शोध के आधार पर यह कहा जा सकता है कि गुरु की राशि में संस्थित मंगल अत्यंत कष्टकारक है, मंगल दोष से दूषित जन्मांगों का जन्मपत्री मिलान करके मंगल दोष परिहार जहां तक संभव हो करके विवाह करें तो दाम्पत्य जीवन सुखद होता है. वृश्चिक राशि में न्यून किन्तु मेष राशि का मंगल प्रबल घातक होता है. कन्या के माता-पिता को घबराना नहीं चाहिए. हमारे धर्मशास्त्रों ने व्रतानुष्ठान, मंत्र प्रयोग द्वारा मंगल दोष को शांत करने का उपाय बताये गए है
22. यदि मंगल चतुर्थ अथवा सप्तम भावस्थ हो तथा क्रूर ग्रह से युक्त या दृष्ट न हो एवं इन भावों में मेष, कर्क, वृश्चिक अथवा मकर राशि हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है. किन्तु भगवान रामजी की जन्मकुण्डली में सप्तम भाव में उच्च के मंगल ने राजयोग तो दिया किन्तु सीताजी से वियोग भी हुआ,जबकि मंगल पर गुरु की दृष्टि थी.
23. कुण्डली मिलान में यदि मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, द्वादश भाव में हो व द्वितीय जन्मांग में इन्हीं भावों में से किसी में शनि स्थित हो तो मंगल दोष निरस्त हो जाता है.
24. चतुर्थ भाव का मंगल वृष या तुला का हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है.
25. द्वादश भावस्थ मंगल कन्या, मिथुन, वृष व तुला का हो तो मंगल दोष निरस्त हो जाता है.
26. वर की कुण्डली में मंगल दोष है व कन्या की जन्मकुण्डली में मंगल के स्थानों पर सूर्य, शनि या राहु हो तो मंगल दोष का स्वयमेव परिहार हो जाता है.
27….मंगल ग्रह की शांति
मंगल ग्रह की शांति के लिए मंगलवार को उपवास करना चाहिए। यह व्रत 21 सप्ताह तक करने से पूर्ण फल मिलता है। इस दिन नमक छोड़ दें और लाल पुष्प, फल, ताम्र बर्तन, नारियल आदि द्वारा हनुमान जी की पूजन करके उन्हें सिंदूर अर्पित करना चाहिए तथा लाल चंदन की माला से पांच माला यह मंत्र जपे।
ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:
**************मंगल की हो अशुभ दृष्‍टि*************************
मंगल ग्रह से साहस, ऊर्जा, शक्ति, गुस्सा, रक्त, पराक्रम, आक्रामक शैली, युद्ध, राजयोग, शत्रु, लाल रंग, हानि, गर्मी, राजसेवा, रोग, प्रसिद्धि, हड्डी, युवावस्था, भाई, वन क्षेत्र, पुलिस-सेना, आई.पी.एस., मूत्र रोग, ठेकेदार, अग्नि, आग से जलना, मकान-भूमी, रक्त व इससे संबंधित रोग, माँस-भक्षण, दण्डाधिकारी, पारा, कृषि-भूमि, सोना, ताँबा, भोजन, गंभीरता, वाहन-सुख आदि देखा जाता है।
मेष लग्न हो तो मंगल लग्नेश व अष्टम भाव का स्वामी होगा। इस लग्न में मंगल चतुर्थ भाव में नीच राशि कर्क में होने उपरोक्त कारक तत्वों में कमी लाएगा। स्वास्थ्य पर भी विपरित असर पड़ेगा, चोट भी लग सकती है। दुर्घटना के योग भी बन सकते हैं।
वृषभ लग्न में मंगल द्वादशेश व सप्तम भाव का स्वामी होगा। द्वादश भाव बाहरी संबंध, विदेश यात्रा, भोग विलास, बाई आँख व सप्तम दाम्पत्य जीवन, सेक्स, विवाह संबंध, दैनिक व्यवसाय, स्त्री से संबंधित भाव को बिगाड़ता है। इसमें मंगल नीच का तृतीय भाव में होगा।
मिथुन लग्न में मंगल एकादशेश व षष्टेश होगा। एकादश आय भाव शेयर बाजार से जुड़े व्यक्ति को क्षति पहुँचाएगा, षष्टेश होने से शत्रुओं में, कर्ज वृद्धि का कारण बनता है।
कर्क लग्न में दशम व पंचम भाव का स्वामी होगा। दशम पिता, राज्य, नौकरी, व्यापार, राजनीति के क्षेत्र में बाधा का कारण बनता है। वही संतान, विद्या, मनोरंजन, प्रेम संबंधों में भी क्षति का कारण बनता है। मंगल लग्न में ही नीच का होगा।
सिंह लग्न में मंगल नवम व चतुर्थ भाव का स्वामी होगा। भाग्येश होने से धर्म-कर्म में कमी, भाग्य में अवरोध, यश में कमी का कारण बनता है। चतुर्थेश होने से सुख में कमी, माता से अनबन, मकान की परेशानी का कारण बनता है। स्थानीय राजनीति में भी नुकसानप्रद होता है। इस लग्न में मंगल द्वादशेश में नीच का होगा।
कन्या लग्न में मंगल अष्टम व तृतीयेश होगा। अष्टम, आयु, गुप्त रोग, गुप्त धन में क्षति का कारण बनता है। वहीं तृतीयेश होने से भाई से विरोध या भाई का न होना, मित्र से गड़बड़, साझेदार से परेशानी, पड़ोसी से अनबन का कारण बनता है। इस लग्न में मंगल एकादश भाव में नीच का होगा।
तुला लग्न में सप्तम व द्वितीय भाव का स्वामी होगा। सप्तम भाव दाम्पत्य जीवन, सेक्स, मारक भाव, दैनिक व्यवसाय इनमें नुकसानदायक रहेगा। द्वितीय होने से धन, कुटुंब, वाणी, दाईं आँख, बचत में कमी की कारण बनता है। इसमें मंगल दशम भाव में नीच का होगा।
वृश्चिक लग्न में लग्नेश व षष्ट भाव का स्वामी होगा। लग्नेश होने से साहस में कमी, काम में मन न लगना, चिड़चिड़ापन रहना यह कारण बनते है। षष्टेश होने से नाना, मामा का घर बिगाड़ता है वही कर्जदार भी बनाता है। शत्रुओं से परेशानी का कारण भी बनता है। इस लग्न में मंगल नवम भाव में नीच का होगा।
धनु लग्न में मंगल पंचम व द्वादश भाव का स्वामी होगा। पंचम होने से विद्या में रूकावट, संतान बाधा का कारण बनता है, वहीं विदेश यात्रा में बाधा, पढा़ई आदि में रूकावट आती है। इस भाव में मंगल अष्टम में नीच का होगा।
मकर लग्न में मंगल चतुर्थ व एकादश भाव का स्वामी होगा। यह आय के क्षेत्र में व माता, भूमि-मकान से संबंधित मामलों में रूकावट डालेगा। इस लग्न में मंगल सप्तम भाव में नीच का होगा।
कुंभ लग्न में मंगल तृतीय व दशम भाव का स्वामी होगा। साझेदारी, शत्रु, भाई से बाधा का कारण बनता है। लाभ के मामलों में भी रूकावट पैदा करेगा। इस लग्न में मंगल षष्ट भाव में नीच का होगा।
मीन लग्न में मंगल द्वितीय व नवम भाव का स्वामी होगा। यह वाणी को कठोर बनाता है व काम बिगाड़ता है। कुटुंब से नहीं बनने देता है। भाग्य में रूकावट का सामना करना पड़ता है। धर्म-कर्म में भी मन नहीं लगता।
मंगल पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि का प्रभाव भी खराब होता है। मंगल के अशुभ प्रभाव मिल रहे हो तो मंगल से संबंधित वस्तुओं का दान करना चाहिए। जैसे- खड़े मसूर, गुड, ताँबा, लाल वस्तु आदि व किसी विद्वान को जन्म पत्रिका दिखाकर शुभ मुहूर्त में मूँगा धारण करें।

क्या हैं विषपुत्रएवं विषकन्या योग…यदि शनिवार, रविवार यामंगलवार के दिनकृत्तिका, आश्लेषा एवं शतभिषानक्षत्र हो औरद्वितीया, सप्तमी या द्वादशीमें से एकतिथि हो तोइस योग मेंजन्मी कन्या विषकन्यामानी जाती है।यदि विवाह केलिए कुंडली मेलनकरते समय दोशुभ ग्रह वरके शत्रु मेंहों और वहींदो ग्रह वधूके जन्म लग्नमें हों तोविषयोग होता है।अगर वर केशत्रु ग्रह मेंजो ग्रह हो,वहीं ग्रह वधूके जन्म लग्नमें हो तोभी विषयोग कहाजाता है। इसकेअलावा कन्या केजन्म लग्न मेंशनि, पंचम स्थानमें सूर्य एवंनवम स्थान मेंमंगल होने परभी विषयोग बनताहै। विषकन्या कीतरह विषपुत्र योगके उतने दुष्परिणामएवं सविस्तार वर्णनप्राप्त न होनेपर भी मूलनक्षत्र के प्रारंभिकतीन चरण, आश्लेषाके अंतिम चरण,ज्येष्ठा के चौथेचरण तथा मघाके प्रथम चरणमें जन्मा लडकाविषपुत्र होता। उनेऊ धारणकरने के बादइस कुयोग केदुष्परिणाम खत्म होजाते है-ऎसाकई ज्योतिर्विदों कामानना है। अर्थातजहां-जहां कुयोगबताए गए हैं,वहां-वहां कुयोगोंके परिहार केजनन शांति काउपाय दिया गयाहै।

2…..जिन कुमारी कन्याओ का विवाह नही हो रहा है या विवाह में परेशानियाँ आ रही है वे कन्यायें इस मंत्र का नित्य प्रति दिन 11 माला जप करे तो उनका विवाह शीघ्र होगा मंत्र का उच्चारण शुद्ध करे
ॐ कात्यायनी महामाया, महायोगीन्यधीश्वरी
नंद गोप सुतं देहि पति में कुरु ते नम: ॐ ।।
या इस मंत्र के सम्पुट से १० पाठ दुर्गा शप्तशती के किसी योग्य पंडित जी से करवाये तो आप की
कन्या का विवाह शीघ्र होगा…
मनोवांछित श्रेष्ठ वर-प्राप्ति प्रयोग
१॰ भगवती सीता ने गौरी की उपासना निम्न मन्त्र द्वारा की थी, जिसके
फलस्वरुप उनका विवाह भगवान् श्रीराम से हुआ। अतः कुमारी कन्याओं को
मनोवाञ्छित वर पाने के लिये इसका पाठ करना चाहिए।
“ॐ श्रीदुर्गायै सर्व-विघ्न-विनाशिन्यै नमः स्वाहा।
सर्व-मङ्गल-मङ्गल्ये,
सर्व-काम-प्रदे देवि, देहि मे वाञ्छितं नित्यं, नमस्ते शंकर-प्रिये।।
दुर्गे शिवेऽभये माये, नारायणि सनातनि, जपे मे मङ्गले देहि, नमस्ते
सर्व-मङ्गले।।”
विधि- प्रतिदिन माँ गौरी का स्मरण-पूजन कर ११ पाठ करे।
२॰ कन्याओं के विवाहार्थ अनुभूत प्रयोग
इसका प्रयोग द्वापर में गोपियों ने श्रीकृष्ण को पति-रुप में प्राप्त
करने
के लिए किया था। ‘नन्द-गोप-सुतं देवि’ पद को आवश्यकतानुसार परिवर्तित
किया
जा सकता है, जैसे- ‘अमुक-सुतं अमुकं देवि’।
“कात्यायनि महा-माये महा-योगिन्यधीश्वरि।
नन्द-गोप-सुतं देवि, पतिं मे कुरु ते नमः।”
विधि- भगवती कात्यायनी का पञ्चोपचार (१ गन्ध-अक्षत २ पुष्प ३ धूप ४ दीप ५
नैवेद्य) से पूजन करके उपर्युक्त मन्त्र का १०,००० (दस हजार) जप तथा
दशांश
हवन, तर्पण तथा कन्या भोजन कराने से कुमारियाँ इच्छित वर प्राप्त कर
सकती
है।
३॰. लड़की के शीघ्र विवाह के लिए ७० ग्राम चने की दाल, ७० से॰मी॰ पीला
वस्त्र, ७ पीले रंग में रंगा सिक्का, ७ सुपारी पीला रंग में रंगी, ७
गुड़
की डली, ७ पीले फूल, ७ हल्दी गांठ, ७ पीला जनेऊ- इन सबको पीले वस्त्र
में
बांधकर विवाहेच्छु जातिका घर के किसी सुरक्षित स्थान में गुरुवार प्रातः
स्नान करके इष्टदेव का ध्यान करके तथा मनोकामना कहकर पोटली को ऐसे स्थान
पर
रखें जहाँ किसी की दृष्टि न पड़े। यह पोटली ९० दिन तक रखें।
४॰ श्रेष्ठ वर की प्राप्ति के लिए बालकाण्ड का पाठ करे।
५॰ किसी स्त्री जातिका को अगर किसी कारणवश विवाह में विलम्ब हो रहा हो,
तो
श्रावण कृष्ण सोमवार से या नवरात्री में गौरी-पूजन करके निम्न मन्त्र का
२१००० जप करना चाहिए-
“हे गौरि शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकर प्रिया।
तथा मां कुरु कल्याणी कान्त कान्तां सुदुर्लभाम।।”
६॰ “ॐ गौरी आवे शिव जी व्याहवे (अपना नाम) को विवाह तुरन्त सिद्ध करे,
देर न
करै, देर होय तो शिव जी का त्रिशूल पड़े। गुरु गोरखनाथ की दुहाई।।”
उक्त मन्त्र की ११ दिन तक लगातार १ माला रोज जप करें। दीपक और धूप जलाकर
११वें दिन एक मिट्टी के कुल्हड़ का मुंह लाल कपड़े में बांध दें। उस
कुल्हड़ पर बाहर की तरफ ७ रोली की बिंदी बनाकर अपने आगे रखें और ऊपर
दिये
गये मन्त्र की ५ माला जप करें। चुपचाप कुल्हड़ को रात के समय किसी
चौराहे
पर रख आवें। पीछे मुड़कर न देखें। सारी रुकावट दूर होकर शीघ्र विवाह हो
जाता है।
७॰ जिस लड़की के विवाह में बाधा हो उसे मकान के वायव्य दिशा में सोना
चाहिए।
८॰ लड़की के पिता जब जब लड़के वाले के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें
तो
लड़की अपनी चोटी खुली रखे। जब तक पिता लौटकर घर न आ जाए तब तक चोटी नहीं
बाँधनी चाहिए।
९॰ लड़की गुरुवार को अपने तकिए के नीचे हल्दी की गांठ पीले वस्त्र में
लपेट
कर रखे।
१०॰ पीपल की जड़ में लगातार १३ दिन लड़की या लड़का जल चढ़ाए तो शादी की
रुकावट दूर हो जाती है।
११॰ विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब हो और जातिकाएँ अपने अहं के कारण अनेक
युवकों की स्वीकृति के बाद भी उन्हें अस्वीकार करती रहें तो उसे निम्न
मन्त्र का १०८ बार जप प्रत्येक दिन किसी शुभ मुहूर्त्त से प्रारम्भ करके
करना चाहिए।
“सिन्दूरपत्रं रजिकामदेहं दिव्याम्बरं सिन्धुसमोहितांगम् सान्ध्यारुणं
धनुः
पंकजपुष्पबाणं पंचायुधं भुवन मोहन मोक्षणार्थम क्लैं मन्यथाम।
महाविष्णुस्वरुपाय महाविष्णु पुत्राय महापुरुषाय पतिसुखं मे शीघ्रं देहि
देहि।।”
१२॰ किसी भी लड़के या लड़की को विवाह में बाधा आ रही हो यो विघ्नहर्ता
गणेशजी की उपासना किसी भी चतुर्थी से प्रारम्भ करके अगले चतुर्थी तक एक
मास
करना चाहिए। इसके लिए स्फटिक, पारद या पीतल से बने गणेशजी की मूर्ति
प्राण-प्रतिष्ठित, कांसा की थाली में पश्चिमाभिमुख स्थापित करके स्वयं
पूर्व की ओर मुँह करके जल, चन्दन, अक्षत, फूल, दूर्वा, धूप, दीप,
नैवेद्य
से पूजा करके १०८ बार “ॐ गं गणेशाय नमः” मन्त्र पढ़ते हुए गणेश जी पर
१०८
दूर्वा चढ़ायें एवं नैवेद्य में मोतीचूर के दो लड्डू चढ़ायें। पूजा के
बाद
लड्डू बच्चों में बांट दें।
यह प्रयोग एक मास करना चाहिए। गणेशजी पर चढ़ये गये दूर्वा लड़की के पिता
अपने जेब में दायीं तरफ लेकर लड़के के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें।
१३॰ पति-स्तवनम्
नमः कान्ताय सद्-भर्त्रे, शिरश्छत्र-स्वरुपिणे।
नमो यावत् सौख्यदाय, सर्व-सेव-मयाय च।।
नमो ब्रह्म-स्वरुपाय, सती-सत्योद्-भवाय च।
नमस्याय प्रपूज्याय, हृदाधाराय ते नमः।।
सती-प्राण-स्वरुपाय, सौभाग्य-श्री-प्रदाय च।
पत्नीनां परनानन्द-स्वरुपिणे च ते नमः।।
पतिर्ब्रह्मा पतिर्विष्णुः, पतिरेव महेश्वरः।
पतिर्वंश-धरो देवो, ब्रह्मात्मने च ते नमः।।
क्षमस्व भगवन् दोषान्, ज्ञानाज्ञान-विधापितान्।
पत्नी-बन्धो, दया-सिन्धो दासी-दोषान् क्षमस्व वै।।
।।फल-श्रुति।।
स्तोत्रमिदं महालक्ष्मि, सर्वेप्सित-फल-प्रदम्।
पतिव्रतानां सर्वासाण, स्तोत्रमेतच्छुभावहम्।।
नरो नारी श्रृणुयाच्चेल्लभते सर्व-वाञ्छितम्।
अपुत्रा लभते पुत्रं, निर्धना लभते ध्रुवम्।।
रोगिणी रोग-मुक्ता स्यात्, पति-हीना पतिं लभेत्।
पतिव्रता पतिं स्तुत्वा, तीर्थ-स्नान-फलं लभेत्।।
विधिः-
१॰ पतिव्रता नारी प्रातः-काल उठकर, रात्रि के वस्त्रों को त्याग कर,
प्रसन्नता-पूर्वक उक्त स्तोत्र का पाठ करे। फिर घर के सभी कामों से निबट
कर, स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर, भक्ति-पूर्वक पति को सुगन्धित जल से
स्नान करा कर शुक्ल वस्त्र पहनावे। फिर आसन पर उन्हें बिठाकर मस्तक पर
चन्दन का तिलक लगाए, सर्वांग में गन्ध का लेप कर, कण्ठ में पुष्पों की
माला
पहनाए। तब धूप-दीप अर्पित कर, भोजन कराकर, ताम्बूल अर्पित कर, पति को
श्रीकृष्ण या श्रीशिव-स्वरुप मानकर स्तोत्र का पाठ करे।
२॰ कुमारियाँ श्रीकृष्ण, श्रीविष्णु, श्रीशिव या अन्य किन्हीं
इष्टदेवता
का पूजन कर उक्त स्तोत्र के नियमित पाठ द्वारा मनो-वाञ्छित पति पा सकती है।
३॰ प्रणय सम्बन्धों में माता-पिता या अन्य लोगों द्वारा बाधा डालने की
स्थिति में उक्त स्तोत्र पाठ कर कोई भी दुखी स्त्री अपनी कामना पूर्ण कर
सकती है।
४॰ उक्त स्तोत्र का पाठ केवल स्त्रियों को करना चाहिए। पुरुषों को
‘विरह-ज्वर-विनाशक, ब्रह्म-शक्ति-स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए, जिससे
पत्नी
का सुख प्राप्त हो सकेगा।..
3….कैसा होगा जीवन साथी और कब होगा विवाह ???
आजकल लड़के-लड़कियाँ उच्च शिक्षा या अच्छा करियर बनाने के चक्कर में बड़ी उम्र के हो जाने पर विवाह में काफी विलंब हो जाता है। उनके माता-पिता भी असुरक्षा की भावनावश बच्चों के अच्छे खाने-कमाने और आत्मनिर्भर होने तक विवाह न करने पर सहमत हो जाने से भी विवाह में विलंब निश्चित होता है।
अच्छा होगा किसी विद्वान ज्योतिषी को अपनी जन्म कुंडली दिखाकर विवाह में बाधक ग्रह या दोष को ज्ञात कर उसका निवारण करें।
ज्योतिषीय दृष्टि से जब विवाह योग बनते हैं, तब विवाह टलने से विवाह में बहुत देरी हो जाती है। वे विवाह को लेकर अत्यंत चिंतित हो जाते हैं। वैसे विवाह में देरी होने का एक कारण बच्चों का मांगलिक होना भी होता है।
इनके विवाह के योग 27, 29, 31, 33, 35 व 37वें वर्ष में बनते हैं। जिन युवक-युवतियों के विवाह में विलंब हो जाता है, तो उनके ग्रहों की दशा ज्ञात कर, विवाह के योग कब बनते हैं, जान सकते हैं।
जिस वर्ष शनि और गुरु दोनों सप्तम भाव या लग्न को देखते हों, तब विवाह के योग बनते हैं। सप्तमेश की महादशा-अंतर्दशा या शुक्र-गुरु की महादशा-अंतर्दशा में विवाह का प्रबल योग बनता है। सप्तम भाव में स्थित ग्रह या सप्तमेश के साथ बैठे ग्रह की महादशा-अंतर्दशा में विवाह संभव है।
विवाह के अन्य योग निम्नानुसार हैं-
(1) लग्नेश, जब गोचर में सप्तम भाव की राशि में आए।
(2) जब शुक्र और सप्तमेश एक साथ हो, तो सप्तमेश की दशा-अंतर्दशा में।
(3) लग्न, चंद्र लग्न एवं शुक्र लग्न की कुंडली में सप्तमेश की दशा-अंतर्दशा में।
(4) शुक्र एवं चंद्र में जो भी बली हो, चंद्र राशि की संख्या, अष्टमेश की संख्या जोड़ने पर जो राशि आए, उसमें गोचर गुरु आने पर।
(5) लग्नेश-सप्तमेश की स्पष्ट राशि आदि के योग के तुल्य राशि में जब गोचर गुरु आए।
(6) दशमेश की महादशा और अष्टमेश के अंतर में।
(7) सप्तमेश-शुक्र ग्रह में जब गोचर में चंद्र गुरु आए।
(8) द्वितीयेश जिस राशि में हो, उस ग्रह की दशा-अंतर्दशा में।
क्या आपकी भी शादी की उम्र ढल रही है और शादी की बात नहीं बन पा रही है…???….
आजकल अधिकतर लड़कियों की पढ़ाई या अन्य किसी कारण से अक्सर शादी में देरी हो जाती है। किसी को अपने हिसाब का पढ़ा- लिखा लड़का नहीं मिलता तो कहीं किसी और कारण से बात नहीं बन पाती। यदि आपकी भी शादी की उम्र ढल रही है और शादी की बात नहीं बन पा रही है तो नीचे लिखे इन उपायों को जरुर अपनाएं। विवाह योग्य युवती जब किसी अन्य युवती के विवाह में जाएं तो उससे अपने हाथों में थोड़ी मेहंदी लगवा ले। ऐसा करने से उसका विवाह शीघ्र ही हो जाएगा। जब लड़के वाले विवाह की बात करने घर आए तो युवती खुले बालों से, लाल वस्त्र धारण कर, हंसते हुए उन्हें कोई मीठी वस्तु खिलाकर विदा करें। विवाह की बात अवश्य ही पक्की होगी।विवाह की इच्छा रखने वाली युवती एक सफेद खरगोश पाले और उसे अपने हाथ से ही प्रतिदिन भोजन करवाएं। इन उपायों को करने से शीघ्र ही विवाह की इच्छा रखने वाली युवतियों का विवाह हो जाता है।

4…विवाह बाधा निवारणार्थ अनुभूत प्रयोग
मंगल चंडिका प्रयोग
प्रथम :- मंत्र और स्त्रोत्र प्रयोग
यह प्रयोग मंगली लोगो को मंगल की वजह से उनके विवाह, काम-धंधे में आ रही रूकावटो को दूर कर देता है
मंत्र:- ॐ ह्रीं श्रीं कलीम सर्व पुज्ये देवी मंगल चण्डिके ऐं क्रू फट् स्वाहा ||
देवी भगवत के अनुसार अन्य मंत्र :- ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्व पुज्ये देवी मंगल चण्डिके हूँ हूँ फट् स्वाहा )
दोनों में से कोई भी मन्त्र जप सकते है
ध्यान :-
देवी षोडश वर्षीया शास्वत्सुस्थिर योवनाम| सर्वरूप गुणाढ्यं च कोमलांगी मनोहराम|
स्वेत चम्पक वऱॅणाभाम चन्द्र कोटि सम्प्रभाम| वन्हिशुद्धाशुका धानां रत्न भूषण भूषिताम|
बिभ्रतीं कवरीभारं मल्लिका माल्य भूषितं| बिम्बोष्ठिं सुदतीं शुद्धां शरत पद्म निभाननाम|
ईशदहास्य प्रसन्नास्यां सुनिलोत्पल लोचनाम| जगद धात्रीं च दात्रीं च सर्वेभ्य सम्पत्प्रदाम|
संसार सागरेघोरे पोत रूपां वरां भजे|
स्त्रोत्र:-
||शंकर उवाच||
रक्ष रक्ष जगन मातर देवी मंगल चण्डिके | हारिके विपदां राशे: हर्ष मंगल कारिके ||
हर्ष मंगल दक्षे च हर्ष मंगल चण्डिके | शुभ मंगल दक्षे च शुभ मंगल चण्डिके ||
मंगले मंगलार्हे च सर्व मंगल मंगले | सतां मंगलदे देवी सर्वेषां मंग्लालये ||
पूज्या मंगलवारे च मंगलाभीष्ट दैवते | पूज्य मंगल भूपस्य मनुवंशस्य संततम ||
मंगलाधिष्ठात्रिदेवी मंगलानां च मंगले | संसार मंगलाधारे मोक्ष मंगलदायिनी ||
सारे च मंगलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम | प्रति मंगलवारे च पूज्य च मंगलप्रदे ||
स्त्रोत्रेणानेन शम्भुश्च स्तुत्वा मंगल चंडीकाम | प्रति मंगलवारे च पूजां कृत्वा गत: शिव: ||
देव्याश्च मंगल स्त्रोत्रम यं श्रुणोति समाहित: | तन्मंगलं भवेत्श्चान्न भवेत् तद मंगलं ||
विधि विधान :-
मंगलवार को संध्या समय पर स्नान करके पवित्र होकर एक पंचमुखी दीपक जलाकर माँ मंगल चंडिका की पूजा श्रधा भक्ति पूर्वक करे/ माँ को एक नारियल और खीर का भोग लगाये | उपरोक्त दोनों में से किसी एक मंत्र का मन ही मन १०८ बार जप करे तथा स्त्रोत्र का ११ बार उच्च स्वर से श्रद्धा पूर्वक प्रेम सहित पाठ करे | ऐसा आठ मंगलवार को करे | आठवे मंगलवार को किसी भी सुहागिन स्त्री को लाल ब्लाउज, लाल रिब्बन, लाल चूड़ी, कुमकुम, लाल सिंदूर, पान-सुपारी, हल्दी, स्वादिष्ट फल, फूल आदि देकर संतुष्ट करे | अगर कुंवारी कन्या या पुरुष इस प्रयोग को कर रहे है तो वो अंजुली भर कर चने भी सुहागिन स्त्री को दे , ऐसा करने से उनका मंगल दोष शांत हो जायेगा | इस प्रयोग में व्रत रहने की आवश्यकता नहीं है अगर आप शाम को न कर सके तो सुबह कर सकते है |
यह अनुभूत प्रयोग है और आठ सप्ताह में ही चमत्कारिक रूप से शादी-विवाह की समस्या, धन की समस्या, व्यापार की समस्या, गृह-कलेश, विद्या प्राप्ति आदि में चमत्कारिक रूप से लाभ होता है |
2. जिस कन्या का विवाह न हो पा रहा हों, वह भगवती पार्वती के चित्र या मूर्ति के सामने शुद्ध घी का दीपक जलाकर प्रतिदिन निम्न मंत्र का 11 माला जाप 10 दिनों तक करें- हे गौरि शंकरार्द्धागि यथा शंकरप्रिया। तथा मां कुरू कल्याणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्।।
3. जिन लडकों का विवाह नहीं होता है, उन्हें निम्नलिखित मंत्र का नित्य 11 माला जप करना चाहिए- ओम् क्लीं पत्नी मनोरम देहि मनोवृत्तानुसारिणीम। तारणी दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भावाम ||
4. विवाह योग्य लडके और लडकियां प्रत्येक गुरूवार को स्नान के जल में एक चुटकी पिसी हल्दी डालकर स्नान करें। गुरूवार के दिन आटे के दो पेडों पर थोडी-सी हल्दी लगाकर, थोडी गुड और चने की दाल गाय को खिलाएं। इससे विवाह का योग शीघ्र बनता है।
6. बृहस्पतिवार को केले के वृक्ष के समक्ष गुरूदेव बृहस्पति के 108 नामों के उच्चारण के साथ शुद्ध घी का दीपक जलाकर, जल अर्पित करें।
7. यदि किसी कन्या की कुंडली में मंगली योग होने के कारण उसका विवाह नहीं हो पा रहा है तो वह मंगलवार को “मंगल चंडिका स्तोत्र” का तथा शनिवार को “सुंदरकांड” का पाठ करें।
8. किसी भी शुक्लपक्ष की प्रथमा तिथि को प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर राम-सीता के संयुक्त चित्र का षोडशोपचार पूजन कर अग्रलिखित चौपाई का 108 जाप करे। यह उपाय 40 दिन किया जाता है। कन्या को उसके अस्वस्थ दिनों की छूट है। जब तक वह पुन: शुद्ध न हो जाए, तब तक यह प्रयोग न करें। अशुद्ध तथा शुद्ध होने के बाद के दिनों को मिलाकर ही दिनों की गिनती करनी चाहिए। कुल 40 दिनों में कहीं न कहीं रिश्ता अवश्य हो जाएगा। चौपाई इस प्रकार है- सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पुरहि मनकामना तुम्हारी।|
9. जो कन्या पार्वती देवी की पूजा करके उनके सामने प्रतिदिन निम्नलिखित मंत्र का एक माला जप करती है, उसका विवाह शीघ्र हो जाता है- कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवं पतिं मे कुरू ते नम:।।

**************कैसे करें शनिदेव को प्रसन्न*****************************
शनि भक्तों को इस दिन शनि मंदिर में जाकर शनि देव को नीले लाजवंती का फूल, तिल, तेल, गु़ड़ अर्पण करना चाहिए। शनि देव के नाम से दीपोत्सर्ग करना चाहिए।
* शनि अमावस्या के दिन या रात्रि में शनि चालीसा का पाठ, शनि मंत्रों का जाप एवं हनुमान चालीसा का पाठ करें।
* इस दिन पीपल के पेड़ पर सात प्रकार का अनाज चढ़ाएं और सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
* तिल से बने पकवान, उड़द से बने पकवान गरीबों को दान करें।
* उड़द दाल की खिचड़ी दरिद्रनारायण को दान करें।
* अमावस्या की रात्रि में 8 बादाम और 8 काजल की डिब्बी काले वस्त्र में बांधकर संदूक में रखें।
* शनि यंत्र, शनि लॉकेट, काले घोड़े की नाल का छल्ला धारण करें।
* इस दिन नीलम या कटैला रत्न धारण करें। जो फल प्रदान करता है।
* काले रंग का श्वान इस दिन से पालें और उसकी सेवा करें।
* शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा के पश्चात उनसे अपने अपराधों एवं जाने*अनजाने जो भी आपसे पाप कर्म हुआ हो उसके लिए क्षमा याचना करनी चाहिए।
* शनि महाराज की पूजा के पश्चात राहु और केतु की पूजा भी करनी चाहिए।
* इस दिन शनि भक्तों को पीपल में जल देना चाहिए और पीपल में सूत्र बांधकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए।
* शनिवार के दिन भक्तों को शनि महाराज के नाम से व्रत रखना चाहिए।
* शनि की शांति के लिए नीलम को तभी पहना जा सकता है।
* शनिश्वर के भक्तों को संध्या काल में शनि मंदिर में जाकर दीप भेंट करना चाहिए और उड़द दाल में खिचड़ी बनाकर शनि महाराज को भोग लगाना चाहिए। शनिदेव का आशीर्वाद लेने के पश्चात आपको प्रसाद स्वरूप खिचड़ी खाना चाहिए।
* सूर्यपुत्र शनिदेव की प्रसन्नता हेतु इस दिन काली चींटियों को गु़ड़ एवं आटा देना चाहिए।
* इस दिन काले रंग का वस्त्र धारण करना चाहिए।
* श्रावण मास में शनिवार का व्रत प्रारंभ करना अति मंगलकारी माना जाता है।
इस प्रकार भक्ति एवं श्रद्धापूर्वक शनिवार के दिन शनिदेव का व्रत एवं पूजन करने से शनि का कोप शांत होता है और शनि की दशा के समय उनके भक्तों को कष्ट की अनुभूति नहीं होती है।
शनि की साढ़ेसाती व ढैया के उपाय
व्रत
शनिवार का व्रत रखें। व्रत के दिन शनिदेव की पूजा (कवच, स्तोत्र, मंत्र जप) करें। शनिवार व्रत कथा पढ़ना भी लाभकारी रहता है। व्रत में दिन में दूध, लस्सी तथा फलों के रस ग्रहण करें। सायंकाल हनुमानजी या भैरवजी का दर्शन करें। काले उड़द की खिचड़ी (काला नमक मिला सकते हैं) या उड़द की दाल का मीठा हलवा ग्रहण करें।
दान
शनि की प्रसन्नता के लिए उड़द, तेल, इन्द्रनील (नीलम), तिल, कुलथी, भैंस, लोह, दक्षिणा और श्याम वस्त्र दान करें। किसी भी शनि मंदिरों में शनि की वस्तुओं जैसे काले तिल, काली उड़द, काली राई, काले वस्त्र, लौह पात्र तथा गुड़ का दान करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है।
रत्न/धातु
शनिवार के दिन काले घोड़े की नाल या नाव की सतह की कील का बना छल्ला मध्यमा में धारण करें।
औषधि
प्रति शनिवार सुरमा, काले तिल, सौंफ, नागरमोथा और लोध मिले हुए जल से स्नान करें।
अन्य उपाय
शनिवार को सायंकाल पीपल वृक्ष के चारों ओर 7 बार कच्चा सूत लपेटें, इस समय शनि के किसी मंत्र का जप करते रहें। फिर पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक प्रज्ज्वलित करें तथा ज्ञात अज्ञात अपराधों के लिए क्षमा मांगें।
* शनिवार को अपने हाथ की नाप का 19 हाथ काला धागा माला बनाकर पहनें।
* शनि अमावस्या के दिन 108 बेलपत्र की माला भगवान शिव के शिवलिंग पर चढाए। साथ ही अपने गले में गौरी शंकर रुद्राक्ष 7 दानें लाल धागें में धारण करें।
शनि अमावस्या पर शनिदेव से अपने बुरे कर्मों के लिए माफ़ी मांग लें और निम्न मंत्रों का जाप करें
शनि मंत्र व स्तोत्र सर्वबाधा निवारक वैदिक गायत्री मंत्र:-
‘ॐ भगभवाय विद्महे मृत्युरुपाय धीमहि, तन्नो शनि: प्रचोदयात्।’
प्रतिदिन श्रध्दानुसार शनि गायत्री का जाप करने से घर में सदैव मंगलमय वातावरण बना रहता है।
वैदिक शनि मंत्र
‘ॐ शन्नोदेवीरमिष्टय आपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्रवन्तुन:।’
शनिदेव को प्रसन्न करने का सबसे पवित्र और अनुकूल मंत्र है इसकी दो माला सुबह शाम करने से शनिदेव की भक्ति व प्रीति मिलती है।
कष्ट निवारण शनि मंत्र नीलाम्बर:
‘शूलधर: किरीटी गृघ्रस्थितस्त्रसकरो धनुष्मान्। चर्तुभुज: सूर्यसुत: प्रशान्त: सदाऽस्तुं मह्यं वरंदोऽल्पगामी॥’
इस मंत्र से अनावश्यक समस्याओं से छुटकारा मिलता है। प्रतिदिन एक माला सुबह शाम करने से शत्रु चाह कर भी नुकसान नहीं पहुंचा पायेगा।
सुख-समृध्दि दायक शनि मंत्र
‘कोणस्थ:पिंगलो वभ्रु: कृष्णौ रौद्रान्त को यम:। सौरि: शनैश्चरौ मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:॥’
इस शनि स्तुति को प्रात:काल पाठ करने से शनिजनित कष्ट नहीं व्यापते और सारा दिन सुख पूर्वक बीतता है।
शनि पत्नी नाम स्तुति
‘ॐ शं शनैश्चराय नम: ध्वजनि धामिनी चैव कंकाली कलहप्रिया। कंटकी कलही चाऽथ तुरंगी महिषी अजा॥ ॐ शं शनैश्चराय नम:’
यह बहुत ही अद्भुत और रहस्यमय स्तुति है यदि आपको कारोबारी, पारिवारिक या शारीरिक समस्या हो। इस मंत्र का विधिविधान से जाप और अनुष्ठान किया जाये तो कष्ट आपसे कोसों दूर रहेंगे।
अचूक शनि मंत्र .
शनि दण्ड देने वाले देवता के रूप में पूजनीय है। शनि की टेढ़ी चाल किसी भी व्यक्ति को बेहाल कर सकती है। यही कारण है कि उनकी छबि क्रूर भी मानी जाती है। जिससे शनि की साढ़े साती, महादशा आदि में शनिदेव की उपासना का महत्व है। शनि के बुरे असर से अनेक तरह की पीड़ाएं मिलती है, किंतु इनमें से शारीरिक रोग की बात करें तो शनि दोष से पैरों की बीमारी, गैस की समस्या, लकवा, वात और मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। जिससे व्यक्ति की कमजोरी उसे सुख और आनंद से वंचित कर सकती है। शनि दोष से पैदा हुए ऐसे ही रोगों से छुटकारे और बचाव के लिए यह वैदिक शनि मंत्र अचूक माना गया है। इस मंत्र का जप स्वयं या किसी विद्वान ब्राह्मण से कराना रोगनाश के लिए अचूक माना जाता है।
शनि के इस खास मंत्र और सामान्य पूजा विधि :
शनिवार के दिन सुबह स्नान कर घर या नवग्रह मंदिर में शनिदेव की गंध, अक्षत, काले तिल, उड़द और तिल का तेल चढ़ाकर पूजा करें। पूजा के बाद शनि के इस वैदिक मंत्र का जप कम से कम 108 बारे जरूर करें -
ऊँ शन्नो देवीरभीष्टय, आपो भवन्तु पीतये। शं योर
भिस्त्रवन्तु न:।।
मंत्र जप के बाद शनिदेव से पूजा या मंत्र जप में हुई गलती के लिए क्षमा मांग स्वयं या परिजन की बीमारी से मुक्ति के लिए प्रार्थना करें। हिन्दू धर्म में प्रकृति को भी देव रूप मानता है। जिससे कोई भी इंसान चाहे वह धर्म को मानने वाला हो या धर्म विरोधी सीधे ही किसी न किसी रूप में प्रकृति और प्राणियों से प्रेम के द्वारा जुड़कर धर्म पालन कर ही लेता है। कुदरत की देव रूप उपासना का ही अंग हे पीपल पूजा। पीपल को अश्वत्थ भी कहा जाता है। शास्त्रों के मुताबिक पीपल देववृक्ष होकर इसमें त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है। ब्रह्मा का स्थान जड़ में, विष्णु का मध्य भाग या तने और अगले भाग यानि शाखाओं में शिव का स्थान है। इस वृक्ष की टहनियों में त्रिदेव सहित इंद्र और गो, ब्राह्मण, यज्ञ, नदी और समुद्र देव वास भी माना जाता है। इसलिए यह वृक्ष पंचदेव, ऊंकार या कल्पवृक्ष के नाम से भी पूजित है।
पीपल वृक्ष की पूजा से सांसारिक जीवन के अनेक कष्टों का दूर करती है। यहां हम ग्रहदोष खासतौर पर शनि पीड़ा का अंत करने के लिए पीपल पूजा की सरल विधि जानते हैं -
स्नान कर सफेद वस्त्र पहन पीपल के व़ृक्ष के नीचे की जमीन गंगाजल से पवित्र करें। दु:खों को दूर करने के मानसिक संकल्प के साथ स्वस्तिक बनाकर पीपल में सात बार जल चढ़ाएं। सामान्य पूजा सामग्रियों कुंकुम, अक्षत, फूल चढ़ाकर भगवान विष्णु, लक्ष्मी, त्रिदेव, शिव-पार्वती का ध्यान करें। इन देवताओं के सरल मंत्रों का बोलें।
इसके बाद पीपल वृक्ष के आस-पास वस्त्र या सूत लपेट कर परिक्रमा करें। परिक्रमा के समय भी भगवान विष्णु का ध्यान जरूर करते रहें। यथाशक्ति मिठाई का भोग लगाएं। घी या तिल के तेल का दीप जलाकर शिव, विष्णु या त्रिदेव की आरती करें। अंत में शनि पीड़ा दूर करने और अपने दोषों के लिए क्षमा प्रार्थना करें। पीपल वृक्ष की मात्र परिक्रमा से ही शनि पीड़ा का अंत हो जाता है।

************कैसे करें शनिदेव को प्रसन्न***********************
शनि भक्तों को इस दिन शनि मंदिर में जाकर शनि देव को नीले लाजवंती का फूल, तिल, तेल, गु़ड़ अर्पण करना चाहिए। शनि देव के नाम से दीपोत्सर्ग करना चाहिए।

* शनि अमावस्या के दिन या रात्रि में शनि चालीसा का पाठ, शनि मंत्रों का जाप एवं हनुमान चालीसा का पाठ करें।
* इस दिन पीपल के पेड़ पर सात प्रकार का अनाज चढ़ाएं और सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
* तिल से बने पकवान, उड़द से बने पकवान गरीबों को दान करें।
* उड़द दाल की खिचड़ी दरिद्रनारायण को दान करें।
* अमावस्या की रात्रि में 8 बादाम और 8 काजल की डिब्बी काले वस्त्र में बांधकर संदूक में रखें।
* शनि यंत्र, शनि लॉकेट, काले घोड़े की नाल का छल्ला धारण करें।
* इस दिन नीलम या कटैला रत्न धारण करें। जो फल प्रदान करता है।
* काले रंग का श्वान इस दिन से पालें और उसकी सेवा करें।
* शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा के पश्चात उनसे अपने अपराधों एवं जाने*अनजाने जो भी आपसे पाप कर्म हुआ हो उसके लिए क्षमा याचना करनी चाहिए।
* शनि महाराज की पूजा के पश्चात राहु और केतु की पूजा भी करनी चाहिए।
* इस दिन शनि भक्तों को पीपल में जल देना चाहिए और पीपल में सूत्र बांधकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए।
* शनिवार के दिन भक्तों को शनि महाराज के नाम से व्रत रखना चाहिए।
* शनि की शांति के लिए नीलम को तभी पहना जा सकता है।
* शनिश्वर के भक्तों को संध्या काल में शनि मंदिर में जाकर दीप भेंट करना चाहिए और उड़द दाल में खिचड़ी बनाकर शनि महाराज को भोग लगाना चाहिए। शनिदेव का आशीर्वाद लेने के पश्चात आपको प्रसाद स्वरूप खिचड़ी खाना चाहिए।
* सूर्यपुत्र शनिदेव की प्रसन्नता हेतु इस दिन काली चींटियों को गु़ड़ एवं आटा देना चाहिए।
* इस दिन काले रंग का वस्त्र धारण करना चाहिए।
* श्रावण मास में शनिवार का व्रत प्रारंभ करना अति मंगलकारी माना जाता है।

इस प्रकार भक्ति एवं श्रद्धापूर्वक शनिवार के दिन शनिदेव का व्रत एवं पूजन करने से शनि का कोप शांत होता है और शनि की दशा के समय उनके भक्तों को कष्ट की अनुभूति नहीं होती है।

शनि की साढ़ेसाती व ढैया के उपाय

व्रत
शनिवार का व्रत रखें। व्रत के दिन शनिदेव की पूजा (कवच, स्तोत्र, मंत्र जप) करें। शनिवार व्रत कथा पढ़ना भी लाभकारी रहता है। व्रत में दिन में दूध, लस्सी तथा फलों के रस ग्रहण करें। सायंकाल हनुमानजी या भैरवजी का दर्शन करें। काले उड़द की खिचड़ी (काला नमक मिला सकते हैं) या उड़द की दाल का मीठा हलवा ग्रहण करें।

दान
शनि की प्रसन्नता के लिए उड़द, तेल, इन्द्रनील (नीलम), तिल, कुलथी, भैंस, लोह, दक्षिणा और श्याम वस्त्र दान करें। किसी भी शनि मंदिरों में शनि की वस्तुओं जैसे काले तिल, काली उड़द, काली राई, काले वस्त्र, लौह पात्र तथा गुड़ का दान करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है।

रत्न/धातु
शनिवार के दिन काले घोड़े की नाल या नाव की सतह की कील का बना छल्ला मध्यमा में धारण करें।

औषधि
प्रति शनिवार सुरमा, काले तिल, सौंफ, नागरमोथा और लोध मिले हुए जल से स्नान करें।

अन्य उपाय
शनिवार को सायंकाल पीपल वृक्ष के चारों ओर 7 बार कच्चा सूत लपेटें, इस समय शनि के किसी मंत्र का जप करते रहें। फिर पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक प्रज्ज्वलित करें तथा ज्ञात अज्ञात अपराधों के लिए क्षमा मांगें।

* शनिवार को अपने हाथ की नाप का 19 हाथ काला धागा माला बनाकर पहनें।
* शनि अमावस्या के दिन 108 बेलपत्र की माला भगवान शिव के शिवलिंग पर चढाए। साथ ही अपने गले में गौरी शंकर रुद्राक्ष 7 दानें लाल धागें में धारण करें।

शनि अमावस्या पर शनिदेव से अपने बुरे कर्मों के लिए माफ़ी मांग लें और निम्न मंत्रों का जाप करें

शनि मंत्र व स्तोत्र सर्वबाधा निवारक वैदिक गायत्री मंत्र:-
‘ॐ भगभवाय विद्महे मृत्युरुपाय धीमहि, तन्नो शनि: प्रचोदयात्।’
प्रतिदिन श्रध्दानुसार शनि गायत्री का जाप करने से घर में सदैव मंगलमय वातावरण बना रहता है।

वैदिक शनि मंत्र
‘ॐ शन्नोदेवीरमिष्टय आपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्रवन्तुन:।’
शनिदेव को प्रसन्न करने का सबसे पवित्र और अनुकूल मंत्र है इसकी दो माला सुबह शाम करने से शनिदेव की भक्ति व प्रीति मिलती है।

कष्ट निवारण शनि मंत्र नीलाम्बर:
‘शूलधर: किरीटी गृघ्रस्थितस्त्रसकरो धनुष्मान्। चर्तुभुज: सूर्यसुत: प्रशान्त: सदाऽस्तुं मह्यं वरंदोऽल्पगामी॥’
इस मंत्र से अनावश्यक समस्याओं से छुटकारा मिलता है। प्रतिदिन एक माला सुबह शाम करने से शत्रु चाह कर भी नुकसान नहीं पहुंचा पायेगा।

सुख-समृध्दि दायक शनि मंत्र
‘कोणस्थ:पिंगलो वभ्रु: कृष्णौ रौद्रान्त को यम:। सौरि: शनैश्चरौ मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:॥’
इस शनि स्तुति को प्रात:काल पाठ करने से शनिजनित कष्ट नहीं व्यापते और सारा दिन सुख पूर्वक बीतता है।

शनि पत्नी नाम स्तुति
‘ॐ शं शनैश्चराय नम: ध्वजनि धामिनी चैव कंकाली कलहप्रिया। कंटकी कलही चाऽथ तुरंगी महिषी अजा॥ ॐ शं शनैश्चराय नम:’
यह बहुत ही अद्भुत और रहस्यमय स्तुति है यदि आपको कारोबारी, पारिवारिक या शारीरिक समस्या हो। इस मंत्र का विधिविधान से जाप और अनुष्ठान किया जाये तो कष्ट आपसे कोसों दूर रहेंगे।

********शनि की शांति के लिये नीलम,रैनबो रत्न तथा बिदारीकंद की जड का प्रयोग***********
शनि की शांति के लिये नीलम को तभी पहिना जा सकता है जब राहु किसी अशुभ भाव में न हो,राहु अगर किसी अशुभ भाव में है तो रैनबो पहिना जा सकता है,नीलम सवा पांच रत्ती का मिल जाता है,तथा रैनबो सवा पांच रत्ती का मिल जाता है,जो व्यक्ति नीलम या रैनबो नहीं धारण कर सकते है,उन्हे “बिदारी कंद” को धारण करना चाहिये,बिदारी कंद की जड पंसारी या जडी बूटी बेचने वालों के पास उपलब्ध है, शनि देवता का प्रभाव
मानव के अंत:करण का प्रतीक शनि है। यह मनुष्य की बाह्य चेतना और अंत:चेतना को मिलाने में सेतु का काम करता है। पुरुषार्थ चतुष्टय धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति मंे भी शनि ग्रह की ही महती भूमिका रहती है। शनि के अतिरिक्त अन्य ग्रह तो दूसरी राशि एवं ग्रहों के प्रभाव में पड़कर अपना फल देना भूल जाते हैं लेकिन शनि अपनी मौलिकता को कभी भी नहीं भूलता है।
शनि वात प्रधान ग्रह है। आयुर्वेद में वात पित्त एवं कफ प्रकृति के अनेक रोगों का वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त व्यापार, यात्रा, संचार माध्यम, न्यायपालिका, वकील, चिकित्सा, चिकित्सालय, शेयर्स, सट्टा, वायदा, काल्पनिक चिंतन, लेखन, अभिव्यक्ति, राजनीति, प्राचीन शिक्षा, पुरा महत्व की वस्तुएं, इतिहास, रसायन, उद्योग-धंधे, वाहन, ट्रांसपोर्ट व्यवसाय, प्राचीन एवं परंपरागत कला, सेना एवं पुलिस के सामान्य सदस्य एवं सहायक उपकरण, शास्त्र, विस्फोटक पदार्थ आदि के अतिरिक्त भी अनेक कार्यक्षेत्र यथा जमीन जायदाद, ठेकेदारी, संन्यासी व नौकरियां शनि के अधीन रहती हैं। इसी के साथ मनोरोग, अस्थि रोग, वात रोग, जोड़ों के दर्द, नसों से संबंधी रोग, खून की कमी, खून में लौह तत्व की कमी, दमा, हृदय, कैंसर, क्षयरोग, दंतरोग, गुप्तरोग, ज्वर आदि भी शनि से नियंत्रित होते हैं।
आयुर्वेद शास्त्र में शरीर की रचना में अन्न से रस, रस से रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा एवं शुक्र का निर्माण बताया गया है।
शनि अस्थि का कारक ग्रह है। आयुर्वेद एवं ज्योतिष शास्त्र में शनि के गुणधर्म प्रभाव रोग एवं निदान एक जैसे ही होते हैं। मनुष्य के शरीर में रोग होने के कारण, रोग के निदान, रोग के लक्षण, औषधि, औषधि के प्रभाव एवं स्वभाव आदि सभी में एकरूपता दिखाई देती है।
आयुर्वेद एवं ज्योतिषशास्त्र में शनि को समान रूप से वर्णित किया गया है जिन्हें पांच भागों में विभक्त किया गया है
शनि की शांति के लिये नीलम,रैनबो रत्न तथा बिदारीकंद की जड का प्रयोग
शनि की शांति के लिये नीलम को तभी पहिना जा सकता है जब राहु किसी अशुभ भाव में न हो,राहु अगर किसी अशुभ भाव में है तो रैनबो पहिना जा सकता है,नीलम सवा पांच रत्ती का मिल जाता है,तथा रैनबो सवा पांच रत्ती का मिल जाता है,जो व्यक्ति नीलम या रैनबो नहीं धारण कर सकते है,उन्हे “बिदारी कंद” को धारण करना चाहिये,बिदारी कंद की जड पंसारी या जडी बूटी बेचने वालों के पास उपलब्ध है शनि और छाया
ज्योतिष शास्त्र में शनि की उत्पत्ति सूर्य पत्नी छाया से मानी गई है तथा वात की उत्पत्ति आयुर्वेद के अनुसार आकाश एवं वायु महाभूत से मानी गई है। छाया भी शीत प्रधान एवं आकाश प्रधान है। अत: दोनों की उत्पत्ति एक ही स्थान से हुई है। ज्योतिष में शनि
ज्योतिष शास्त्र में शनि की प्रकृति धूल-धूसरित केश, मोटे दांत, कृश, दीर्घ आदि वर्णित है, वहीं आयुर्वेद में वात की प्रकृति बतलाई गई है। अष्टांगहृदय में कहा गया है: दोषात्मका: स्फुटितधूसरकेशगात्रा।
शरीर में शनि का स्थान
ज्योतिष शास्त्र में शनि का स्थान शरीर में कमर, जंघा, पिंडली, कान एवं अस्थि आदि है। चरक संहिता में भी इन्हीं स्थानों को वात प्रधान बताया गया है।
शनि की व्याधियां
आयुर्वेद में वात का स्थान विशेष रूप से अस्थि माना गया है। शनि वात प्रधान रोगों की उत्पत्ति करता है आयुर्वेद में जिन रोगों का कारण वात को बताया गया है उन्हें ही ज्योतिष शास्त्र में शनि के दुष्प्रभाव से होना बताया गया है। शनि के दुष्प्रभाव से केश, लोम, नख, दंत, जोड़ों आदि में रोग उत्पन्न होता है। आयुर्वेद अनुसार वात विकार से ये स्थितियां उत्पन्न होती हैं। प्रशमन एवं निदान
ज्योतिष शास्त्र में शनि के दुष्प्रभावों से बचने के लिए दान आदि बताए गए हैं
माषाश्च तैलं विमलेन्दुनीलं तिल: कुलत्था महिषी च लोहम्।
कृष्णा च धेनु: प्रवदन्ति नूनं दुष्टाय दानं रविनन्दनाय॥
तेलदान, तेलपान, नीलम, लौहधारण आदि उपाय बताए गए हैं, वे ही आयुर्वेद में अष्टांगहृदय में कहे गए हैं। अत: चिकित्सक यदि ज्योतिष शास्त्र का सहयोग लें तो शनि के कारण उत्पन्न होने वाले विकारों को आसानी से पहचान सकते हैं। इस प्रकार शनि से उत्पन्न विकारों की चिकित्सा आसान हो जाएगी।
शनि ग्रह रोग के अतिरिक्त आम व्यवहार में भी बड़ा प्रभावी रहता है लेकिन इसका डरावना चित्र प्रस्तुत किया जाता है जबकि यह शुभफल प्रदान करने वाला ग्रह है। शनि की प्रसन्नता तेलदान, तेल की मालिश करने से, हरी सब्जियों के सेवन एवं दान से, लोहे के पात्रों व उपकरणों के दान से, निर्धन एवं मजदूर लोगों की दुआओं से होती है।
मध्यमा अंगुली को तिल के तेल से भरे लोहे के पात्र में डुबोकर प्रत्येक शनिवार को निम्न शनि मंत्र का 108 जप करें तो शनि के सारे दोष दूर हो जाते हैं तथा मनोकामना पूर्ण हो जाती है। ढैया सा साढ़े साती शनि होने पर भी पूर्ण शुभ फल प्राप्त होता है।
शनि मंत्र : ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:। 27000 जाप रोजाना सत्ताइस दिन तक करें
॥ शनिवार व्रत ॥
आकाशगंगा के सभी ग्रहों में शनि ग्रह का मनुष्य पर सबसे हानिकारक प्रकोप होता है। शनि की कुदृष्टि से राजाओं तक का वैभव पलक झपकते ही नष्ट हो जाता है। शनि की साढ़े साती दशा जीवन में अनेक दु:खों, विपत्तियों का समावेश करती है। अत: मनुष्य को शनि की कुदृष्टि से बचने के लिए शनिवार का व्रत करते हुए शनि देवता की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। श्रावण मास में शनिवार का व्रत प्रारंभ करने का विशेष महत्व है।
शनिवार का व्रत कैसे करें?
* ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नदी या कुएँ के जल से स्नान करें।
* तत्पश्चात पीपल के वृक्ष पर जल अर्पण करें।
* लोहे से बनी शनि देवता की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराएँ।
* फिर इस मूर्ति को चावलों से बनाए चौबीस दल के कमल पर स्थापित करें।
* इसके बाद काले तिल, फूल, धूप, काला वस्त्र व तेल आदि से पूजा करें।
* पूजन के दौरान शनि के निम्न दस नामों का उच्चारण करें- कोणस्थ, कृष्ण, पिप्पला, सौरि, यम, पिंगलो, रोद्रोतको, बभ्रु, मंद, शनैश्चर।
* पूजन के बाद पीपल के वृक्ष के तने पर सूत के धागे से सात परिक्रमा करें।
* इसके पश्चात निम्न मंत्र से शनिदेव की प्रार्थना करें-
शनैश्चर नमस्तुभ्यं नमस्ते त्वथ राहवे।
केतवेअथ नमस्तुभ्यं सर्वशांतिप्रदो भव।।
* इसी तरह सात शनिवार तक व्रत करते हुए शनि के प्रकोप से सुरक्षा के लिए शनि मंत्र की समिधाओं में, राहु की कुदृष्टि से सुरक्षा के लिए दूर्वा की समिधा में, केतु से सुरक्षा के लिए केतु मंत्र में कुशा की समिधा में, कृष्ण जौ, काले तिल से 108 आहुति प्रत्येक के लिए देनी चाहिए।
* फिर अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर लौह वस्तु धन आदि का दान अवश्य करें।
नीलांजनं समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥
शनि का व्रत करने से लाभ
* शनिवार की पूजा सूर्योदय के समय करने से श्रेष्ठ फल मिलता है।
* शनिवार का व्रत और पूजा करने से शनि के प्रकोप से सुरक्षा के साथ राहु, केतु की कुदृष्टि से भी सुरक्षा होती है।
* मनुष्य की सभी मंगलकामनाएँ सफल होती हैं।
* व्रत करने तथा शनि स्तोत्र के पाठ से मनुष्य के जीवन में धन, संपत्ति, सामाजिक सम्मान, बुद्धि का विकास और परिवार में पुत्र, पौत्र आदि की प्राप्ति होती है।

शनि ग्रह का उपाय …
एक समय में केवल एक ही उपाय करें.उपाय कम से कम 40 दिन और अधिक से अधिक 43 दिनो तक करें.यदि किसी करणवश नागा हो तो फिर से प्रारम्भ करें., यदि कोइ उपाय नहीं कर सकता तो खून का रिश्तेदार ( भाई, पिता, पुत्र इत्यादि) भी कर सकता है.–

१- ऐसे जातक को मांस , मदिरा, बीडी- सिगरेट नशीला पदार्थ आदि का सेवन न करे ,
२-हनुमान जी की पूजा करे , बंरंग बाण का पाठ करे ,
३- पीपल को जल दे अगर ज्यादा ही शनि परेशां करे तो शनिवार के दिन शमसान घाट या नदी के किनारे पीपल का पेड़ लगाये ,
४-सवा किलो सरसों का तेल किसी मिट्टी के कुल्डह में भरकर काला कपडा बांधकर किसी को दान दे दें या नदी के किनारे भूमि में दबाये .
५-शनि के मंत्र का प्रतिदिन १०८ बार पाठ करें। मंत्र है ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः। या शनिवार को शनि मन्त्र ॐ शनैश्वराय नम का २३,००० जाप करे .
६- उडद के आटे के 108 गोली बनाकर मछलियों को खिलाने से लाभ होगा ,
७-बरगद के पेड की जड में गाय का कच्चा दूध चढाकर उस मिट्टी से तिलक करे तो शनि अपना अशुभ प्रभाव नहीं देगा ,
८- श्रद्धा भाव से काले घोडे की नाल या नाव की कील का छल्ला मध्यमा अंगुली में धारण करें या शनिवार सरसों के तेल की मालिश करें,
९- शनिवार को शनि ग्रह की वस्तुओं का दान करें, शनि ग्रह की वस्तुएं हैं –काला उड़द,चमड़े का जूता, नमक, सरसों तेल, तेल, नीलम, काले तिल, लोहे से बनी वस्तुएं, काला कपड़ा आदि।
१०-शनिवार के दिन पीपल वृक्ष की जड़ पर तिल या सरसों के तेल का दीपक जलाएँ।
११- गरीबों, वृद्धों एवं नौकरों के प्रति अपमान जनक व्यवहार नहीं करना चहिए.
१२-शनिवार को साबुत उडद किसी भिखारी को दान करें.या पक्षियों को ( कौए ) खाने के लिए डाले ,
१३-ताऊ एवं चाचा से झगड़ा करने एवं किसी भी मेहनतम करने वाले व्यक्ति को कष्ट देने, अपशब्द कहने से कुछ लोग मकान एवं दुकान किराये से लेने के बाद खाली नहीं करते अथवा उसके बदले पैसा माँगते हैं तो शनि अशुभ फल देने लगता है।
१४- बहते पानी में रोजाना नारियल बहाएँ। या किसी बर्तन में तेल लेकर उसमे अपना क्षाया देखें और बर्तन तेल के साथ दान करे. क्योंकि शनि देव तेल के दान से अधिक प्रसन्ना होते है,
अपना कर्म ठीक रखे तभी भाग्य आप का साथ देगा और कर्म कैसे ठीक होगा इसके लिए आप मन्दिर में प्रतिदिन दर्शन के लिए जाएं.,माता-पिता और गुरु जानो का सम्मान करे ,अपने धर्मं का पालन करे,भाई बन्धुओं से अच्छे सम्बन्ध बनाकर रखें.,पितरो का श्राद्ध करें. या प्रत्येक अमावस को पितरो के निमित्त मंदिर में दान करे,गाय और कुत्ता पालें, यदि किसी कारणवश कुत्ता मर जाए तो दोबारा कुत्ता पालें. अगर घर में ना पाल सके तो बाहर ही उसकी सेवा करे,यदि सन्तान बाधा हो तो कुत्तों को रोटी खिलाने से घर में बड़ो के आशीर्वाद लेने से और उनकी सेवा करने से सन्तान सुख की प्राप्ति होगी .गौ ग्रास. रोज भोजन करते समय परोसी गयी थाली में से एक हिस्सा गाय को, एक हिस्सा कुत्ते को एवं एक हिस्सा कौए को खिलाएं आप के घर में हमेसा बरक्कत रहेगी,

छाया पुत्र शनि देव की सहजता बनाए रखने और उनकी तेजस्वी दृष्टि से राहत पाने के लिए ज्योतिष शास्त्र में विभिन्न उपाय सुझाए गए हैं। हम यहां उनके व्यक्तित्व, स्वभाव, जिम्मेदारी और चारित्रिक विशेषताओं के अनुरूप उन्हें सहज और प्रसन्न करने के कुछ उपाय साझा कर रहे हैं।
-शनि देव की सबसे बड़ी विशेषता है संघर्ष में भी अडिग बने रहना। धैर्य पूर्वक आगे बढ़ना।
-स्वाभिमान की रक्षा के लिए पुरजोर प्रयासरत रहना। माता के सम्मान की रक्षा के लिए कठोर तप करना। पिता तक की ज्यादतियों के खिलाफ झंडा बुलंद करना।
-सूक्ष्म और अनदेखे किए जा रहे जीवधारियों को भी उचित संबल और बल प्रदान करना। समाज के निम्नतम तबके तक पहुंच बनाए रखना।
-शिखर पर बैठे मठाधीशों को नियंत्रण में रखना। न्याय की रक्षा करना और उसे संरक्षित करना।
-सब रंगों को खुद समाहित कर लेने वाले श्यामवर्ण को धारण करना। मसालों, रसायनों, खनिज तेलों, लौह अयस्क और स्वर्ण पसंद करना।
उक्त के अतिरिक्त अन्य विभिन्न प्रकार की विशेषताओं के आधार पर शनि की सहजता के लिए निम्न उपाय अपनाए जा सकते हैं।
मेष- शारीरिक ऊर्जा का सर्वाधिक दोहन करने वाले मस्तिष्क का प्रतिनिधित्व करने वाली इस राशि के जातकों को शनि को बौद्धिक प्रयासों से प्रसन्न करने पर जोर देना चाहिए। इनमें शनि देव को समर्पित मंत्रों का जाप करना एवं विधिविधान पूर्वक समर्पण भाव से पूजा-अर्चना करना शामिल है। इस राशि वालों से शनि देव इसलिए भी अधिक अप्रसन्न रहते हैं क्योंकि इस राशि में सूर्य देव उच्चता को धारण करते हैं। मंगल गृह के राशि स्वामी होने के नाते हनुमान भक्ति से भी शनिदेव सहज होते हैं। शनि की अप्रसन्नता में जातकों को मतिभ्रम और मानसिक व्याधि उत्पन्न होने की आशंका रहती है।
वृषभ- मुख-चेहरे का प्रतिनिधित्व करने वाली इस राशि वालों को शनि देव असहजता से कलंक लगने का सर्वाधिक खतरा होता है। जातक को चेहरा छिपाने को मजबूर होना पड़ सकता है। हालांकि शुक्र-शनि मित्रता इस राशि वालों को राहत देती है। शुक्र इस राशि के स्वामी जो हैं। शनि की सहजता और प्रसन्नता की स्थिति में जातक खूब तरक्की करता है। भूमि, भवन, धन-धान्य, पशुधन और जन समर्थन को प्राप्त करता है। इन्हें शनि देव की शुभता के लिए उपलब्ध धन-धान्य और शनिदेव की प्रिय वस्तुओं का दान करना चाहिए। इनमें चना, तिल, तेल, मसाले एवं अन्य विभिन्न प्रकार की दैनिक उपयोग की वस्तुएं शामिल हैं।
मिथुन- कंधों और छाती की प्रतिनिधि इस राशि के जातकों को शनि की प्रसन्नता के लिए शुभ कर्मों पर जोर देना चाहिए। कमजोरों को सताना नहीं चाहिए। चालाकियों और अनैतिक बल के प्रयोग से बचना चाहिए। सबसे प्रेम करना चाहिए विशेषकर छोटे और अधीनस्थों को भ्राता तुल्य स्नेह देना चाहिए। सामाजिक कार्यों में हिस्सेदारी बढ़ाना चाहिए। करियर-कारोबार को कभी भी तुच्छ लाभों के लिए अनैतिकता से नहीं जोड़ना चाहिए। वाणिज्यिक कार्यों में स्वस्थ प्रतियोगिता पर जोर देना चाहिए।
कर्क- हृदय की प्रतिनिधि इस राशि के जातकों को व्यर्थ क्रोध और उच्च रक्तचाप से बचने के लिए शनि के धैर्य धारण करने के गुण को आत्मसात करना चाहिए। विपरीत परिस्थितियों में भी संतुलित रहकर लक्ष्य केंद्रित रहना सीखना चाहिए। शनि की सहजता के लिए रक्त शुद्धि पर जोर देना चाहिए। खानपान में उन्हीं तत्वों को शामिल करना चाहिए जो शरीर के लिए हितकर हों। मीठे से परहेज करना चाहिए। रुष्ट शनि की अवस्था में ऐसे जातक घोर शारीरिक कष्टों से जूझ सकते हैं। अतः जीवन भर अनुशासन अपनाए रहना चाहिए।
सिंह- पेट की प्रतिनिधि राशि है। ऐसे जातकों को गरीबों, कमजोरों को संरक्षण देना चाहिए और उनकी सबलता के लिए प्रयास करना चाहिए। उनके लिए भोजन का प्रबंध करना चाहिए। सिंह के जातकों को जीवनयापन के लिए समाज, सत्ता और आम लोगों का समर्थन ही सर्वाधिक शक्ति प्रदान करता है। इन सबके जुड़ाव के लिए ऊर्जा संरक्षण और पोषण ही सर्वश्रेष्ठ उपाय हो सकता है। असहज शनि की अवस्था में ये जातक कुपोषण, भूख न लगना या अतिभोजन की बीमारी जैसे रोगों से घिर सकते हैं। सामाजिक स्तर पर प्रभावहीनता और अकेलेपन को झेलने को मजबूर भी हो सकते हैं। जिम्मेदारियों से मुक्त किए जा सकते हैं।
कन्या- कमर का प्रतिनिधित्व करती है। चिर युवा की सोच रखने वाले इस राशि के जातकों को शनि देव की सहजता के लिए धैर्य, अनुशासन और नियमित दिनचर्या पर जोर देना चाहिए। संबंधों में अतिवादी रवैये से बचना चाहिए। मित्रों और करीबियों की कमियों को छिपाए रखने पर जोर देना चाहिए। असहज शनि की स्थिति में इस राशि के जातक समय से पहले बूढ़े और तेज हीन दिखाई देने लगते हैं। स्मृति का ह्रास होने लगता है। औरों की नापसंदगी इन्हें घोर निराशा तक पहुंचा सकती है। इन्हें शनि की प्रिय वस्तुओं का दान भी करना चाहिए। इनमें विशेषकर दाल, मसाले और तेल शामिल हैं।
तुला– ये राशि पेडू, श्रोणि, वस्ति-प्रदेश, (pelvis, hip) का प्रतिनिधित्व करती है। शनि इस राशि में उच्चता प्राप्त करते हैं। पद-प्रतिष्ठा और मान-सम्मान इस राशि वालों को सर्वाधिक प्रिय होता है। जो शनि देव का भी मूल स्वभाव है। अत्यधिक संघर्ष के बाद शनि देव ने देवताओं के मध्य स्तरीय स्थान अर्जित कर पाया था। ऐसे जातकों को कभी कोई ओछी बात और व्यवहार नहीं करना चाहिए। अपनी भूमिका का पूरी ईमानदारी और क्षमता से निर्वहन करना चाहिए। छोटे लाभों के आकर्षण से बचना चाहिए। जल्दी-जल्दी स्थान परिवर्तन से परहेज करना चाहिए। सामाजिक जिम्मेदारियों में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी करना चाहिए। आत्मसम्मान से कभी समझौता नहीं करना चाहिए।
वृश्चिक- लिंग प्रदेश की प्रतिनिधि है। ऐसे जातक खुद से प्रेम करते हैं। साहसिक कार्यों में बढ़चढ़कर हिस्सेदारी करते हैं। दिखावा प्रिय और आदर्शवादी होते हैं। गुरु जनों और वरिष्ठों के प्रति वचनबद्ध और आज्ञाकारी होते हैं। करीबियों के प्रति इनका व्यवहार अक्सर कठोर और दमनात्मक हो सकता है। शनि की सहजता के लिए इन्हें उन्हीं तथ्यों का अनुपालन करना चाहिए जो सत्य को समर्पित हों। नैतिक हों। इसके लिए महत्वपूर्ण और प्रिय जन के विरोध से भी पीछे नहीं हटना चाहिए। देशभक्ति और सर्वोच्च सत्ता को ही अपना आदर्श मानना चाहिए।
धनु- इस राशि के जातक प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ में बहुत अंतर रखते हैं। इनमें गजब का आकर्षण होता है। इसी कारण ये अति व्यावहारिक होते हैं। नई-पुरानी संस्कृतियों और संस्कारों का इनमें बेहतरीन संतुलन देखने को मिलता है। शनि की सहजता के लिए इन्हें घर-बाहर सभी जगह नैतिकता का पक्षधर बने रहना चाहिए। स्वार्थों के वशीभूत होने और चरित्र पतन से बचना चाहिए। शनि समर्पित मंत्रों का जाप करना चाहिए। अप्रसन्न शनि इन्हंल कठोरतम दंड देने से भी नहीं हिचकते हैं। अपयश और धन हानि से लेकर स्वास्थ्य और आत्मबल तक हर लेते हैं।
मकर- घुटने का प्रतिनिधित्व करने वाली इस राशि के जातक पेशेवर और हुनर के धनी होते हैं। अपना काम बखूबी करते हैं। हस्तक्षेप इन्हें कम ही पसंद होता है। नवीन जिम्मेदारियों से घबराते नहीं हैं। लेकिन एक ही प्रकार का काम लगातार करते रहने से ऊब महसूस करते हैं। इससे बचने के लिए वह सब भी करते हैं जो सामान्यतः नहीं किया जाना चाहिए। जैसे-नशा इत्यादि। शनि की सहजता बनाए रखने के लिए इन्हें केवल सरल, सज्जन और सामाजिक प्राणी बने रहने की जरूरत है। शनि इस राशि के स्वामी भी हैं। अतः ऐसे जातकों विशेष लाभ के लिए संपूर्ण अनुष्ठानिक तौर-तरीकों से शनि देव की पूजा करना चाहिए।
कुंभ- पिंडली और टखने की प्रतिनिधित्वकर्ता कुंभ राशि के जातक संवेदनशील और संघर्ष में अडिग रहने में सक्षम होते हैं। सटीकता और सरलता से आगे बढ़ना पसंद करते हैं। स्वच्छता और सौंदर्यप्रिय होते हैं। अनोखी और आकर्षक वस्तुओं के संग्रह में रुचि लेते हैं। विचारवान और बुद्धिजीवी होते हैं। शनि इस राशि के स्वामी भी हैं। सहजता और प्रसन्नता के लिए इस राशि के जातकों को शनि देव के आदर्शों और ज्ञान का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। अच्छी बातों के अनुसरण के लिए लोगों को प्रेरित करना चाहिए। समाज के अंतिम तबके तक के कल्याण के लिए यथासंभव प्रयास करना चाहिए। गलत के विरोध में सदैव खुद को समर्पित रखना चाहिए।
मीन-पगतल और अंगुलियों की प्रतिनिधि इस राशि के जातकों की स्थापित आदर्शों और संवैधानिक नियमों में गहरी आस्था होती है। ये अच्छे प्रशासक और नियंत्रणकर्ता होते हैं। अधिकांश सत्ता से जुडी जिम्मेदारियों को ये ही सुशोभित करते हैं। आम लोगों के थोड़े कम प्रिय होते हैं लेकिन सम्मान भरपूर प्राप्त होता है। अनुशासित और सभ्य होते हैं। शनि की सहजता के लिए इन जातकों को गलत के समर्थन से बचना चाहिए। छोटे लाभ में फंसकर ओछे काम नहीं करना चाहिए। बाहरी और आंतरिक स्वच्छता का पूरा ख्याल रखना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>