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अब सर्वार्थसाधक महाविष्णु के मन्त्रों को कहता हूँ । जिनकी उपासना कर ब्रह्मादि देवताओम ने विविध प्रजाओं की सृष्टि की ॥१॥

विशेष कार्यसिद्धि मंत्रः-नृसिंह मंत्र
नृसिंह मंत्र
शत्रु बाधा हो या तंत्र मंत्र बाधा,भय हो या अकाल मृत्यु का डर।इस मंत्र के जप करने से शांति हो जाती है।शत्रु निस्तेज होकर भाग जाते है,भूत पिशाच भाग जाते है तथा असाध्य रोग भी ठीक होने लगता है।ये श्रीविष्णु अवतार तथा भक्त वत्सल है।एक लोक प्रसिद्ध कथा है,कि जब आद्य शंकराचार्य कामाख्या गये थे,तो वहाँ का एक प्रसिद्ध तांत्रिक ने उनपर भीषण तंत्र प्रयोग कर दिया,जिसके कारण शंकराचार्य को भगन्दर रोग हो गया।आद्य चाहते तो प्रयोग निष्फल कर सकते थे,परन्तु उन्होनें वेदना सहन किया।परन्तु शंकराचार्य के एक प्रिय शिष्य ने ॐकार नृसिंह मंत्र प्रयोग कर के उस दुष्ट तांत्रिक का तंत्र प्रभाव दूर कर दिया।इसके परिणाम वह तांत्रिक मारा गया और शंकराचार्य स्वस्थ हो गये।इस मंत्र को जपने से अकाल मृत्यु से भी रक्षा होती है।इनका रुप थोड़ा उग्र है,परन्तु भक्त के सारे संकट तत्क्षण दूर कर देते है।
पहले आसन पर बैठ कर दीपक जला ले,फिर नृसिंह भगवान के चित्र को पंचोपचार पूजन कर अपने दाये हाथ में जल ले कर विनियोग मंत्र बोल कर भूमि पर छोड़ दे।तब एक पुष्प ले कर निम्न ध्यान कर,तब मंत्र का जप कर सकते है।प्रथम गुरु,गणेश पूजन कर लेना चाहिए।होली,दिवाली,नवरात्र या किसी विशेष मुहूर्त में इनकी साधना विशेष फलदायी है।अनिष्ट ग्रह या कोई भी दोष होने पर इनकी ग्यारह माला जप कर लिया जाये,तो संकट टल जाते है।

सर्वप्रथम नृसिंह मन्त्र का उद्धार कहते हैं – मेरु (क्ष) एवं कृशानु (र्) इन दोनों को अनुग्रह (औ) तथा इन्दु (अनुस्वार) से समन्वित करने पर नृसिंह का एकाक्षर (क्ष्रौं) मन्त्र निष्पन्न होता हैं जो साधकों को कल्पपृक्ष के समान फलदायी है । वही माया बीज (ह्रीं) अथवा प्रणव से संपुटित करने पर तीन तीन अक्षर के मन्त्र बन जाते हैं ॥२-३॥

विमर्श – एकक्षर मन्त्र – क्ष्रौं । प्रथम तीन अक्षर का मन्त्र – ह्रीं क्ष्र्ॐ ह्रीं । द्वितीय तीन अक्षर का मन्त्र – ॐ क्ष्रौं ॐ ॥२॥

अब विनियोग तथा न्यास कहते हैं – उक्त तीनों मन्त्रों के अत्रि ऋषि हैं । गायत्री छन्द है तथा नृसिंह देवता है । एकाक्षर मन्त्र में षड्‍ दीर्घ सहित बीज से षडङ्गन्यास करना चाहिए । तीन अक्षर वाले नृसिंह मन्त्र में माया बीज या प्रणव से संपुटित् षड् दीर्घ सहित एकाक्षर नृसिंह बीज मन्त्र से षडङ्गन्यास करना चाहिए ॥३-४॥

विमर्श – विनियोग – अस्य श्रीनृसिंहमन्त्रस्य अत्रिऋषि गायत्रीछन्दः श्रीनृसिंहो देवता आत्मनोऽभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।
एकाक्षर मन्त्र के प्रयोग में षडङ्गन्यास -
क्ष्राँ हृदयाय नमः क्ष्रीं शिरसे स्वाहा, क्ष्रुँ शिखायै वषट्,
क्ष्रैं कवचाय हुम् क्ष्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् क्ष्रः अस्त्राय फट् ।

प्रथम त्र्यक्षर मन्त्र के प्रयोग में षडङ्गन्यास-
ह्रीं क्ष्रां ह्रीं हृदयाय नमः, ह्रीं क्ष्रीं ह्रीं शिरसे स्वाहा,
ह्रीं क्ष्रूं शिखायै वषट्, ह्रीं क्ष्रैं ह्रीं कवचाय हुम्,
ह्रीं क्ष्र्ॐ ह्रीं नेत्रत्रयाय वौषट्, ह्रीं क्ष्रः ह्रीं अस्त्राय फट्

द्वितीय त्र्यक्षर मन्त्र के प्रयोग में षडङ्गन्यास -
ॐ क्ष्रां ॐ हृदयाय नमः, ॐ क्ष्री शिरसे स्वाहा,
ॐ क्ष्रूं ॐ शिखायै वषट् ॐ क्ष्रैं ॐ कवचाय हुम्,
ॐ क्ष्रौं ॐ नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ क्ष्रः ॐ अस्त्राय फट् ॥३-४॥

अब श्रीं नृसिंह मन्त्र का ध्यान कहते हैं – तपन (सूर्य) सोम (चन्द्रमा) और अग्निरुपी नेत्रों वाले, शरत्कालीन चन्द्रमा के समान कान्तिमान्‍ अपनी चार भुजाओं में क्रमशः अभय, चक्र, धनुष एवं वर मुद्रा धारण करने वाले तथा मस्तक पर चन्द्रकला से विराजमान श्री नृसिंह मैं भजन करता हूँ ॥५॥

उक्त मन्त्र का एक लाख जप करना चाहिए । तदनन्तर घृत एवं खीर से उसका दशांश होम करना चाहिए तथा विमला आदि शक्तियों से युक्त पीठ पर इनका पूजन करना चाहिए ॥६॥

विमर्श – पीठ पूजा का प्रकार – प्रथम वृत्ताकार कर्णिका, उसके बाद अष्टदल, फिर बत्तीस दल तथा भूपुर युक्त बने मन्त्र पर भगवान्‍ नृसिंह का पूजन करना चाहिए । सामान्य विधि के अनुसार १४, ५ श्लोक में वर्णित श्री नृसिंह के स्वरुप का ध्यान कर, मानसोपचार से विधिवत्‍ पूजन कर, अर्घ्य के लिए शंख स्थापित करे । फिर १३. १० की भाषा टीका में वर्णित ‘पीठ मध्ये’ से ले कर ‘पूर्वादि दिक्षु’ पर्यन्त ‘ॐ विमलायै नमः’ से ले कर ‘पीठ मध्ये अनुग्रहायै नमः’ पर्यन्त पीठ शक्तियों का पूजन करे ।

इस प्रकार पूजित पीठ पर आसन देकर, ध्यान, आवाहन आदि उपचारों से श्रीनृसिंह की पूजा कर, पञ्चपुष्पाञ्जलि समर्पित कर, आवरण पूजा की आज्ञा लेकर, आवरण पूजा प्रारम्भ करनी चाहिए ॥६॥

अब नृसिंह के आवरण पूजा की विधि कहते हैं – केशरों में षडङ्गन्यास तदनन्तर चारों दिशाओं के पत्रों में खगेश्वर (गरुड),शंकर, शेषनाग एवं शतानन्द (ब्रह्मा), का पूजन करना चाहिए ॥७॥

फिर चारों कोनों के पत्रों में श्रीं, घृति एवं पुष्टि का पूजन करना चाहिए । इसके बाद ३२ दलों में ३२ नामों से श्रीनृसिंह भगवान् की पूजा करनी चाहिए ॥८॥

कृष्ण, रुद्र, महाघोर, भीम, भीषण, उज्ज्वल, कराल, विकराल, दैत्यान्तक, मधूसूदन, रक्ताक्ष, पिङ्गलाक्ष, आञ्जन, दीप्ततेज, सुघोण, हनू, विश्वाक्ष, राक्षसान्त, विशाल, धूम्र, केशव, हयग्रीव, घनस्वर, मेघनाद, मेघवर्ण, कुम्भकर्ण, कृतान्तक, तीव्रतेजा, अग्नि वर्ण, महोग्र, विश्वभूषण, विध्नक्षम एवं महासेन ये नृसिंह जी के ३२ नाम हैं ॥९-१३॥

फिर इन्द्रादि दिक्पालों का तदनन्तर उनके वज्रादि आयुधोम का चतुरस्र में पूजन करना चाहिए ॥१३॥

विमर्श – नृसिंह यन्त्र में आवरण पूजा – सर्वप्रथम आग्नेयादि चारों कोणों, मध्य तथा दिशाओम में षडङ्गपूजा इस प्रकार करे -
क्ष्रां हृदयाय नमः, आग्नेये, क्ष्रीं शिरसे स्वाहा, नैऋत्ये,
क्ष्रूं शिखायै वषट्, वायव्ये, क्ष्रैं, कवचाय हुम्, ईशान्ये,
क्ष्र्ॐ नेत्रत्रयाय वौषट् मध्ये क्ष्रः अस्त्राय फट् चतुर्दिक्षु ।

फिर अष्टदल में पूर्वादि चारों दिशाओं के दलें में गरुड आदि की यथा -
ॐ गरुडाय नमः, पूर्व ॐ शंकराय नमः, दक्षिणे,
ॐ शेषनागाय नमः, पश्चिमे, ॐ ब्रह्मणे नमः, उत्तरे,

फिर अष्टदल के चारों कोणों में आग्नेयादि क्रम से श्री आदि की यथा -
ॐ श्रियै नमः आग्नेये, ॐ ह्रियै नमः नैऋत्ये,
ॐ घृत्यै नमः वायव्ये, ॐ पुष्टयै नमः ऐशान्ये

इसके बाद ३२ दलों में नृसिंह के ३ नामीं से – यथा
ॐ कृष्णाय नमः ॐ रुद्राय नमः ॐ महाघोराय नमः,
ॐ भीमाय नमः ॐ भीषणाय नमः ॐ उज्ज्वलाय नमः,
ॐ करालाय नम्ह, ॐ विकरालाय नमः ॐ दैत्यान्तकाय नमः,
ॐ मधुसूदनाय नमः, ॐ रक्ताक्षाय नमः, ॐ पिङ्गलाक्षाय नमः,
ॐ अञ्जनाय नमः ॐ दीप्ततेजसे नमः, ॐ सुघोणाय नमः
ॐ हनवे नमः ॐ विश्वाक्षाय नमः ॐ राक्षसान्ताय नमः,
ॐ विशालाय नमः ॐ धूम्रकेशवाय नमः ॐ हयग्रीवाय नमः
ॐ घनस्वराय नमः ॐ मेघनादाय नमः ॐ मेघवर्णाय नमः
ॐ कुम्भवर्णाय नमः, ॐ कृतान्तकाय नमः ॐ तीव्रतेजसे नमः
ॐ अग्निवर्णाय नमः, ॐ महोग्राय नमः, ॐ विश्वभूषणाय नमः
ॐ विघ्नक्षमाय नमः, ॐ महासेनाय नमः ।

इसके पश्चात् भूपुर में पूर्वादि दिशाओं के क्रम से इन्द्रादि द्श दिक्पालों का
ॐ लं इन्द्राय नमः, पूर्वे ॐ रं अग्नये, ॐ यं यमाय नमः दक्षिणे,
ॐ क्षं निऋतये नमः, नैऋत्ये ॐ वं वरुणाय नमः पश्चिमे,
ॐ यं वायवे नमः, वायव्ये, ॐ सं सोमाय नमः उत्तरे, ॐ हं ईशानाय नमः ऐशान्ये

फिर भूपुर के बाहर वज्रादि आयुधों का यथा पूर्वादिक्रम से-
ॐ वज्राय नमः ॐ शक्तये नमः, ॐ दण्डाय नमः,
ॐ खड्‌गाय नमः, ॐ पाशाय नमः, ॐ अंकुशाय नमः,
ॐ गदायै नमः, ॐ शूलाय नमः, ॐ पद्माय नमः,
ॐ चक्राय नमः,
आवरण पूजा करने के बाद धूप दीपादि उपचारों से नृसिंह भगवान् का पूजन करना चाहिए ॥९-१३॥

इस प्रकार के पुरश्चरण करने से सिद्ध किया गया मन्त्र काम्य प्रयोग करने के योग्य होता है ॥१४॥

तीन गाँठ वाली (तीन पत्तों वाली) दूर्वा से जो साधक १००८ आहुतियाँ देता है वह सभी उपद्रवों से मुक्त हो जाता है । इस प्रकार से किया गया होम महान् उत्पातों को शान्त करता है यथा मनुष्यों को अभीष्टसिद्धि देता है ॥१५॥

विधिपूर्वक कलश स्थापित कर १००८ बार उक्त नृसिंह मन्त्र का जप करे फिर उस कलश के जल से विष पीडित व्यक्ति का अभिषेक करे तो रोगी की विषजन्य पीडा दूर हो जाती है ॥१६॥

इस मन्त्र का जप करते हुये मनुष्य व्याघ्र, सर्पादि से संकुल घोर अरण्य में विचरण करते हुये भी भयभीत नहीं होता ॥१७॥

यदि रात्रि में दुःस्वप्न दिखाई पड जाय तो इस मन्त्र का जप करते हुये जागरण पूर्वक रात्रि व्यतीत कर देने से दुःस्वप्न निश्चित ही सुस्वप्न का फल देता है ॥१८॥

यह नृसिंह मन्त्र कर्णरोग, नेत्ररोग, शिरोरोग तथा कण्ठगत रोगों को विनष्ट कर देता है । इस मन्त्र से अभिमन्त्रित भस्म का उद्धोलन अभिचार जनित पीडा को दूर कर देता है ॥१९॥

स्वयं को नृसिंह तथा शत्रु को मृगशावक मानते हुये उसे पकडकर जिस दिशा में फेंक दिया जाय वह अपने परिवार को छोडकर उसी दिशा में चला जाता है और फिर कभी नहीं लौटता ॥२०-२१॥

विवाद में शत्रु को मारणे के लिए नृसिंह मन्त्र का जप करना चाहिए । किन्तु उसके मर जाने पर पाप को दूर करने के लिए पुनः इस मन्त्र का १० हजार जप करना चाहिए ॥२१-२२॥

अपनी इच्छानुसार श्री समृद्धि के लिए बेल के फूल एवं उसकी लकडी से इस मन्त्र द्वारा एक हजार आहुतियाँ देनी चाहिए ॥२२-२३॥

पुत्र के दीर्घायुष्य के लिए तथा पुत्र रुप संपत्ति प्राप्त करने के लिए विल्व की लकडी में बिल्व फल से होम करना चाहिए ॥२३॥

ब्राह्यी अथवा वचा को इस मन्त्र से १०० बार अभिमन्त्रित कर एक वर्ष तक प्रातःकाल लगाकार खाने वाला व्यक्ति विद्या में पारङ्गत हो जाता है ॥२४॥

इस विषय में विशेष क्या कहें भगवान् नृसिंह का मन्त्र साधकोम के समस्त मनोरथों को पूर्ण करता है ॥२५॥

अब भयनाशक श्री नृसिंह मन्त्र का उद्धार कहते हैं – दो बार जय (जय जय) फिर श्री नृसिंह लगाने से ८ अक्षरों का मन्त्र निष्पन्न होता है ॥२५-२६॥

विमर्श – मन्त्र का स्वरुप इस प्रकार है – जय जय श्रीनृसिंह (८)-॥२६॥

इस मन्त्र के ब्रह्मा ऋषि है, गायत्री छन्द है तथा नृसिंह देवता है । अनुस्वार सहित नेत्र (इं) तथा अनुस्वार वियत् (हं) क्रमशः शक्ति एव्णं बीज है । अनुस्वार एवं षड् दीर्घसहित वियत् (ह) वर्णो से षडङ्गन्यास करना चाहिए ॥२६-२७॥

विमर्श – विनियोग – अस्य जयनृसिंहमन्त्रस्य ब्रह्माऋषिः गायत्रीछन्दः श्री नृसिंहो देवता आत्मनोऽभीष्टसिद्धयर्थे जप विनियोगः ।

षडङ्गन्यास – हां हृदयाय नमः, हीं शिरसे स्वाहा, हूँ शिखायै वषट्,
हैं कवचाय हुम् हौं नेत्रत्रयाय वौषट् , हः अस्त्राय फट् ॥२६-२७॥

अब इस जयनृसिंह मन्त्र का ध्यान कहते हैं – हे नर और सिंह रुप उभयात्मक शरीर वाले, हे जगत् के एक मात्र बन्धो, हे नीलकण्ठ, हे करुणासागर, हे सामगान से प्रसन्न होने वाले, हे चन्द्र, सूर्य तथा अग्नि स्वरुप तीन नेत्रों वाले, हे धनुर्धर, हे चन्द्रकला को मस्तक पर धारण करने वाले, हे रमा के स्वामी श्री विष्णो मेरी रक्षा कीजिये ॥२८॥

इसं प्रकार ध्यान कर उक्त मन्त्र का ८ लाख की संख्या में जप करना चाहिए । तदनन्तर विधिवत् स्थापित अग्नि में खीर का होम करना चाहिए । इनके पूजा आदि की विधि पूर्ववत् हैं ॥२९॥

अब लक्ष्मी नृसिंह मन्त्र का उद्धार कहते हैं – तार (ॐ), पद्म (श्रीं), हृल्लेखा (ह्रीं), फिर ‘जयलक्ष्मी प्रियाय नित्यप्रमुदित’ इतने पद के बाद ‘चेतसे’ कहना चाहिए । फिर ‘लक्ष्मीश्रितार्द्धदेहाय’ कहकर रमा बीजं (श्रीं), माया बीज (ह्रीं), इसके अन्त में ‘नमः’ पद लगाने से ३१ अक्षर का मन्त्र बनता है ॥३०-३१॥

विमर्श – मन्त्र का स्वरुप इस प्रकार हैम – ॐ श्रें ह्रीं जयलक्ष्मीप्रियाय नित्यप्रमुदितचेतसे लक्ष्मीश्रितार्द्धदेहाय श्रीं ह्रीं नमः (३१) ॥३०-३१॥

इस मन्त्र के पद्‌मभव ऋषि हैं अतिजगति छन्द हैं, श्रीनरकेसरी देवता हैं, रमा बीज है तथा अद्रिजा (ह्रीं) शक्ति है । षट् दीर्घ युक्त श्री बीज से षडङ्गन्यास करना चाहिए ॥३२॥

विमर्श – विनियोग – ॐ अस्य श्रीलक्ष्मीनृसिंहमन्त्रस्य पद्मोभवऋषिः अतिजगतीछन्दः श्रीनृकेसरीदेवता श्रीं बीजं ह्रीं शक्तिः आत्मनोऽभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।

षडङ्गन्यास – श्रां हृदाय नमः, श्रीं शिरसे स्वाहा, श्रूं शिखायै वौषट्,
श्रैं कवचाय हुम्, श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्, श्रः अस्त्राय फट् ॥३२॥

अब लक्ष्मीनृसिंह मन्त्र का ध्यान कहते हैं – क्षीरसागर में स्थित श्वेत द्वीप में वसु, रुद्र, आदित्य एवं विश्वेदेवों से क्रमशः अग्रभाग में, दाहिनी ओर, पीछे पश्चिम में तथा बाईं ओर से उनसे घिरे हुये, अपने चारों हाथों में क्रमशः शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण करने वाले, तीन नेत्रों से युक्त, शेषनाग के फण रुप छत्रों से सुशोभित पीताम्बरालंकृत, लक्ष्मी से आलिङ्गित शरीर वाले श्रीनीलकण्ठ नृसिंह भगवान्‍ हमें हर्ष प्रदान करे ॥३३॥

ऐसा ध्यान कर उक्त मन्त्र का तीन लाख साठ हजार जप करे तदनन्तर घी, शर्करा एवं मधुमिश्रित मालती के फूलों से अग्नि में तीन हजार छः सौ आहुतियाँ प्रदान करे । पूर्वोक्त (द्र० १३ . १० श्लोक) वैष्णव पीठ पर इनका भजन करे ॥३४-३५॥

प्रथमावरण में अङ्गपूजा द्वितीयावरण में इन शक्तियों का पूजन करना चाहिए । १. भास्वती, २. भास्करी, ३. चिन्ता, ४. द्युति, ५. उन्मीलिनि, ६. रमा, ७. कान्ति और ८. रुचि – ये ८ शक्तियाँ है । तदनन्तर अपने अपने आयुधों के साथ इन्द्रादि दिक्पालों का पूजन करना चाहिए ॥३५-३६॥

विमर्श – आवरण पूजा – वृत्ताकार कर्णिका,अष्टदल एवं भूपुर युक्त बने यन्त्र पर श्री सहित नृसिंह का पूजन करना चाहिए । सर्वप्रथम केसरों के आग्नेयादि कोणों के मध्य में तथा चारों दिशाओं में षडङ्गपूजा यथा -
श्रां हृदयाय नमः आग्नेये, श्रीं शिरसे स्वाहा, नैऋत्ये,
श्रूं शिखायै वषट् वायव्ये, श्रैं कवचाय हुम्, ऐशान्ये,
श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् मध्ये, श्रः अस्त्राय फट् चतुर्दिक्षु,

फिर अष्टदल में पूर्वादि दिशाओं के क्रम से भास्वती आदि शक्तियों की पूजा करनी चाहिए । यथा -
ॐ भास्वत्यै नमः, पूर्वदले, ॐ भास्कर्यै नमः आग्नेयदले,
ॐ चिन्तायै नम दक्षिणदले, ॐ द्युत्यै नमः नैऋत्यदले,
ॐ उन्मीलिन्यै नमः, पश्चिमदले, ॐ रमायै नमः वायव्यदले,
ॐ कान्त्यै नमः उत्तरदले, ॐ रुच्यै नमः ईशानदले ।

इसके बाद भूपुर में १४, ७ की भाषा टीका में लिखी गई रीति से दिक्पालों एवं उनके आयुधों का पूजन करना चाहिए । इस प्रकार आवरण पूजा समाप्त कर मन्त्र पर धूप दीपादि उपचारों से श्रीलक्ष्मीनृसिंह का पूजन कर जप प्रारम्भ करना चाहिए ॥३५-३६॥

इस प्रकार पुरश्चरण से मन्त्र सिद्ध हो जाने पर साधक निग्रह और अनुग्रह में सक्षम हो जाता है । मालती के पुष्पों से इस मन्त्र द्वारा आहुति देने से साधक अपना अभीष्ट प्राप्त कर लेता है ॥३७॥

अब दशावतार श्रीनृसिंह मन्त्र का उद्धार कहते हैं – प्रणव (ॐ), फिर नृसिंह बीज (क्ष्रौं), फिर‘नमो भगवते नरसिंहाय’ फिर प्रणव एवं नृसिंह बीज, उसके बाद १. मत्स्यरुपाय, फिर प्रणव एवं उक्त बीज के बाद २. कूर्मरुपाय, फिर प्रणव एवं उक्त बीज के बाद ३. वराहरुपाय, फिर प्रणव एवं बीज उसके बाद ४. नृसिंहरुपाय, फिर प्रणव एवं बीज के बाद ५. वामन रुपाय, फिर तीन बार प्रणव के साथ तीन बार बीज मन्त्र उसके बाद ६. रामाय, फिर प्रणव एवं बीज के बाद ७. कृष्णाय, फिर प्रणव एवं बीज के बाद ८. ‘कल्किने’, फिर दो बार ‘जय’ पद (जय जय) शालग्रा, सनेत्र दीर्घा (नि), फिर ‘वासिने’, फिर ‘दिव्य सिंहाय’ के बाद चतुर्थ्यन्त स्वयम्भू (स्वयंभुवे), फिर ‘पुरुषाय नमः’, तथा अन्त में पुनः तार (ॐ) और बीज (क्ष्रौं) लगाने से ९९ अक्षरों का दशावतार मन्त्र निष्पन्न होता है ॥३८-४२॥

विमर्श – दशावतार मन्त्र का स्वरुप – ॐ क्ष्रौं नमो भगवते नरसिंहाय, ॐ क्ष्रौं मत्स्यरुपाय, ॐ क्ष्रौं कूर्मरुपाय, ॐ क्ष्रौ वराहरुपाय, ॐ नृसिंहरुपाय, ॐ क्ष्रौ वामनरुपाय, ॐ क्ष्रौं ॐ क्ष्र् ॐ क्ष्रौं रामाय, ॐ क्ष्रौं कृष्णाय ॐ क्ष्रौं कल्किने, जय जय शालग्रामनिवासिने दिव्यसिंहाय स्वयंभुवे पुरुषाय नमः ॐ क्ष्र्ॐ ॥३८-४२॥

९९ अक्षर वाले इस मन्त्र के अत्रि ऋषि हैं, अतिजगति छन्द है तथा अवतारवान् नृसिंह देवता हैं । पूर्वोक्त क्ष्र् ॐ बीज तथा आद्या (ॐ) शक्ति हैं ॥४३-४४॥

षड्‌दीर्घसहित पूर्वोक्त बीज से षडङ्गन्यास कर क्षीरसागर में स्थित श्रीनृसिंह भगवान् का ध्यान करना चाहिए ॥४४॥

विमर्श – विनियोग – अस्य दशावतारश्रीनृसिंहमन्त्रस्य अत्रिऋषिः अतिजगतीछन्दः अवतारवान्श्री नृसिंहो देवता क्ष्र्ॐ बीजं ॐशक्तिः आत्मनोऽभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।

षडङ्गन्यास – ॐ क्ष्रां हृदयाय नमः, ॐ क्ष्रीं शिरसे स्वाहा,
ॐ क्ष्रूं शिखायै वषट्, ॐ क्ष्रैं कवचाय हुम्
ॐ क्ष्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ॐ क्ष्रः अस्त्राय फट् ॥४४॥

अब दशावतार श्रीनृसिंह मन्त्र का ध्यान कहते हैं – अगणित चन्द्र समूहों के समान कान्तिपुञ्ज से युक्त, दयालु स्वभाव वाले, लक्ष्मी का मुख देखने के लिए पुनः पुनः आकुल नेत्रों वाले, चारों ओर से दशावतारों से घिरे हुये भगवान् नृसिंह हमारा मङ्गल करें ॥४५॥

उक्त मन्त्र का १० हजार की संख्या में जप करना चाहिए । खीर से उसका दशांश होम करना चाहिए । पूर्वोक्त पीठ पर प्रथम अङ्गपूजा, फिर मत्स्यादि दश अवतारों की पूजा, तदनन्तर दिक्पालोम एवं उनके आयुधों का पूजन करना चाहिए । सर्वसिद्धिदायक इस मन्त्र के काम्यप्रयोग पूर्वोक्त मन्त्र के समान हैं ॥४६-४७॥

अब अभयप्रद श्रीनृसिंह मन्त्र कहते हैं – तार (ॐ), फिर ‘नमो भगवते नरसिंहाय’ के बाद हॄदय (नमः), फिर ‘तेजस्तेजसे आविराविर्भव वज्रनख’, के बाद ‘वज्रदंष्ट्रकर्माशयान्’, फोर दो बार ‘रन्धय’ पद (रन्धय रन्धय), फिर ‘तमो’ के बाद दो बार ‘ग्रस’ पद (ग्रस ग्रस), फिर वहिनपत्नी (स्वाहा) तथा ‘अभयमात्मनि भूयिष्ठा’ फिर तार (ॐ) तथा बीज (क्ष्र् ॐ) लगाने से ६२ अक्षरों का अभयप्रद मन्त्र बनता है ॥४९-५०॥

इस मन्त्र के शुक ऋषि हैं, देवता अभयनरसिंह हैं, अतिजगती छन्द है तथा न्यास, ध्यान एवं पूजा आदि पूर्वोक्त मन्त्र के समान समझना चाहिए ॥५०-५१॥

विमर्श – विनियोग – अस्याभयनरसिंहमन्त्रस्य शुकऋषिरतिजगतीछन्दः अभयप्रद नरसिंहो देवता आत्मनोऽभीष्टसिद्धयर्थेजपे विनियोगः । षडङ्गन्यासादि पूर्ववत् है ॥५०-५१॥

विशेषः- इस प्रकार के मन्त्र उग्र प्रकृति के होते है। स्व-रक्षा व गुरु निर्देशन के अभाव में प्रयुक्त करना हानिकारक है तथा सामाजिक व नैतिक दृष्टि से अनुचित भी। यहाँ पर मात्र प्राचीन विद्या के संरक्षण हेतु प्रस्तुत किये ।

 

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